राम मंदिर का भूमि पूजन : हेडगेवार जीते, कांशीराम हारे !  

एच.एल. दुसाध (लेखक बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं.)  

एक नए ऐतिहासिक दिवस के रूप में चिन्हित होने जा रहा है 5 अगस्त !

Bhoomi Poojan of Ram temple: Hedgewar wins, Kanshi Ram loses!

आज 5 अगस्त, 2020 है, जो हिन्दू भारत के इतिहास में एक ऐतिहासिक दिवस के रूप में चिन्हित होने जा रहा है. इस ऐतिहासिक दिवस पर उस राम मंदिर निर्माण का शुभारंभ होने जा रहा है, जो इसके निर्माण का अभियान चलाने वाले संघियों के अनुसार करोड़ों भारतीयों की कालजयी आस्था और गौरव का प्रतीक है।

70 एकड़ के परिसर में 161 फीट ऊंचा राम मंदिर का निर्माण बमुश्किल एक एकड़ में होगा, जिसका शुभारंभ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज दोपहर 12.30 करेंगे,जो 32 सैकंड में पूरा हो जाएगा. हालांकि एकाधिक कारणों से प्रधानमंत्री द्वारा इसका शुभारंभ करने से भारी संख्यक लोगों को आपत्ति है।

आपत्ति का पहला आधार भारतीय संविधान के सेक्युलर चरित्र को बनाया गया है, जबकि दूसरा आधार गृह मंत्री अमित शाह के कोरोना संक्रमण को बनाया गया है. चूंकि कोरोना से संक्रमित गृह मंत्री कुछ दिन पूर्व ही प्रधानमंत्री से मिल चुके हैं, इसलिए कायदे से उन्हें आइसोलेशन में रहकर कोरोना का टेस्ट करवाना चाहिए था। किन्तु आपत्ति करने वालों के विपरीत श्री राम जन्मभूमि तीर्थ ट्रस्ट से जुड़े लोगों के अनुसार चूंकि भगवान राम आस्था के केंद्र ही नहीं, राष्ट्र पुरुष के तौर पर प्रतिष्ठित हैं और उनका मंदिर वस्तुतः राष्ट्र मंदिर है, ऐसे में प्रधानमंत्री मोदी सर्वसम्मति से सबसे बड़ी पसंद थे, इसलिए उनके हाथों से मंदिर निर्माण का शुभारंभ कराया जा रहा है.

भूमि पूजन के लिए 5 अगस्त की तारीख के चयन के पीछे भी दो युक्ति सामने आ रही है. ट्रस्ट की राय है कि श्रीराम नाम का जो मुहूर्त है, वह पाँच का है। यह सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त है और इसमें अगर भूमि पूजन किया जाय तो सवार्थ की सिद्धि प्रपट होगी.

माना जाता है इस मुहूर्त में सभी कामनाओं की सिद्धि होती है। यही देखकर इस तिथि को फाइनल किया गया है। दूसरी राय यह है कि चूंकि बीते वर्ष, 2019 में आज के ही दिन कश्मीर से धारा 370 को हटाया गया था, इसलिए इस खास दिन को और यादगार बनाने के लिए ही बहुप्रतीक्षित राम मंदिर निर्माण के भूमिपूजन के लिए 5 अगस्त का चयन किया गया है.

प्रधानमंत्री मोदी ही रखेंगे राम मंदिर की आधारशिला !

बहरहाल राम मंदिर का भूमि पूजन काशी के पुजारी सम्पन्न कराएंगे. भूमिपूजन के बाद प्रधानमंत्री मोदी ही आधारशिला भी रखेंगे। अयोध्या में राम मंदिर के नींव पूजन में मोदी ताम्र कलश स्थापित करेंगे. मंदिर की नीव पूजन में प्रयुक्त होने वाले ताम्र कलश में वैदिक रीति के मुताबिक गंगा जल के साथ सभी तीर्थों के जल, सर्व औषधि, पाँच रत्न, जिनमें हीरा, पन्ना, माणिक, सोना और पीतल भी है, रखे जाएंगे. इसके साथ पाताल लोक के राजा शेषनाग और शेषावतार की प्रसन्नता के लिए चांदी के नाग-नागिन, भूमि के आधारदेव भगवान विष्णु के कच्छप अवतार के प्रतीक कछुया भी नीव में स्थापित होंगे. मंगल कलश में सेवर घास रखकर सभी तीर्थों सहित गंगा जल से कलश को भरा जाएगा. इसके बाद वैदिक वास्तु पूजन और विधान के अनुसार कलश स्थापित करने के बाद नन्दा, भाद्र, जाया, रिक्ता और पूर्ण नाम की पाँच ईंटों /शिलाओं की पूजा की जाएगी। वैदिक पूजन के बाद ही सारी सामाग्री नींव में स्थापित कर मंदिर का औपचारिक निर्माण आरंभ किया जाएगा। इस अवसर पर प्रधानमंत्री मोदी 40 किलो चांदी की शिला का पूजन कर इसे मंदिर की नींव में स्थापित करेंगे.

भूमि पूजन समारोह में सशरीर नहीं उपस्थित होंगे राम मंदिर आंदोलन के प्रधान शिल्पी !

मंदिर निर्माण के मद्दे नजर अयोध्या में दीवाली मनाने के लिए दीप प्रज्वलन और लाइटिंग की जबर्दस्त तैयारी की गयी है। दीप प्रज्वलन के लिए अयोध्या में 30 स्थान चयनित किए गए हैं. इसके लिए करीब 135 टीन सरसों का तेल, करीब दो लाख रूई की बत्तियाँ, एक लाख से ज्यादा मिट्टी के दियों के अलावा सात हजार से ज्यादा मोमबत्ती के पैकेटों का वितरण किया गया है. इस ऐतिहासिक दिन का जश्न मनाने के लिए देश के विभिन्न जगहों पर संघ परिवार की ओर से मुंह मीठा कराने की व्यवस्था की गयी है। भूमि पूजन समारोह में हिन्दू धर्म से जुड़े सभी संप्रदायों का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित कराने की योजना बनाई गयी है. इसमें रामानंदी एवं रामानुज संप्रदाय से जुड़े संत तो शामिल होंगे ही, जैन, बौद्ध, सीख, शाक्त, कबीर, आर्य समाजी, रविदास, वनवासी, गिरिवासी, रामनामी संत भी आएंगे.

भूमि पूजन समारोह में मंदिर आंदोलन में प्राणों का उत्सर्ग करने वाले कारसेवकों के परिवारों की भागीदारी भी रहेगी उनके परिवारों के एक-एक सदस्य को को आमंत्रित किया गया है. इसमें चर्चित हुतात्मा कोठारी बंधु की बहन पूर्णिमा कोठारी शामिल हैं. भूमि पूजन समारोह में हुतात्माओं के परिवारों के साथ लगभग 175 ऐसे लोगों को आमंत्रित किया गया है, जिन्होंने राम मंदिर आन्दोलन को तुंग पर पहुंचाने में योगदान किया है. इनमें सर संघचालक मोहन भागवत, सरकार्यवाह भैयाजी जोशी सहित आरएसएस से जुड़े 11 लोगों को आमंत्रित किया गया है.

कुल मिलाकर भूमि पूजन को मंदिर आंदोलन को परवान चढ़ाने वाले विशिष्ट लोगों को सम्मानित करने का एक बड़ा जरिया बनाया गया है. ऐसे में इस क्षेत्र में महान योगदान करने वाले कुछ खास व्यक्तियों की अनदेखी चर्चा का विषय बन गयी है. इनमें जिन कुछ खास लोगों की अनदेखी की है उनमें विनय कठियार, साध्वी ऋतंभरा, कल्याण सिंह इत्यादि शूद्र नेताओं का नाम है. किन्तु जिस व्यक्ति की अनदेखी चर्चा का सबसे बड़ा विषय बनी हुई है, वह हैं मंदिर आंदोलन के प्रधान शिल्पी लालकृष्ण आडवाणी, जिन्होंने प्रायः अपने एकल प्रयास से न सिर्फ मंदिर आंदोलन को तुंग पर पहुंचाया, बल्कि भाजपा को केंद्र से लेकर राज्यों तक मे काबिज करा दिया। रामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने मुरली मनोहर जोशी के साथ उन्हें भी उम्र और स्वास्थ्य का हवाला देते हुये, भूमि पूजन समारोह में शिरकत करने से वंचित कर दिया है.

संघ संस्थापक डॉ. हेडगेवार के बिना अधूरी है राम मंदिर निर्माण या भाजपा के सफलता की चर्चा   

बहरहाल आडवाणी की उपेक्षा की ओर राजनीतिक विश्लेषकों का ध्यान जरूर गया है, पर, अनदेखी के लिहाज से एक और शख्स है, जिसकी 5 अगस्त के ऐतिहासिक आयोजन मे बुरी तरह अनदेखी हुई है. यह शख्स हालांकि जीवित नहीं : उसने मंदिर आंदोलन में कोई सक्रिय भूमिका भी नहीं अदा की है. बावजूद इसके आज अगर भव्य राम मंदिर का शिलान्यास होने जा रहा है तो विचार के रूप में सदियों तक जीवित रहने की कूवत रखने वाले उस शख्स की राममंदिर निर्माण में परोक्ष भूमिका को कभी नहीं भुलाया जा सकता. लेकिन हैरत की बात है कि विगत कुछ सप्ताहों से जो तमाम चैनल दिन ब दिन विकराल रूप धारण करते कोरोना की अनदेखी कर डिबेट को राम मंदिर निर्माण के भूमि पर केन्द्रित किए हुये थे, उनमें शायद ही किसी ने आधा घंटा भी समय संघ संस्थापक डॉ. हेडगेवार के लिए दिया होगा।

इसी तरह प्रिंट मीडिया में भूमि पूजन पर जो हजारों पन्नें रंगे गए, उनमें शायद ही 10 पन्ने भी हेडगेवार पर खर्च किए गए होंगे। जबकि सच्चाई है चाहे राम मंदिर का निर्माण हो या राज्यों से लेकर केंद्र तक भाजपा की सत्ता : किसी पर भी चर्चा डॉ. हेडगेवार के बिना अधूरी है।

बहरहाल राम मंदिर आंदोलन हो या भाजपा की बेहिस्साब सत्ता, डॉ हेडगेवार की प्रभावकारिता का आंकलन करने के लिए 1925 के दौर में लौटना होगा।

संघ की स्थापना के पीछे : डॉ. हेडगेवार की परिकल्पना          

1925 के पूर्व दिनों में हालात बड़ी तेजी से ब्राह्मणों के विरुद्ध होने लगे थे. उन दिनों अग्रणीय ब्राह्मण विद्वान लोकमान्य तिलक के नेतृत्व में ब्राह्मणों को विदेशी प्रमाणित करने की होड़ तुंग पर पहुँच चुकी थी. 1922 में सिन्धु-सभ्यता के सत्यान्वेषण ने भारत में प्राचीनतम विदेशागत लोगों के आगमन की पुष्टि कर दी थी. उधर सिन्धु सभ्यता के सत्यान्वेषण और ज्योतिबा फुले के आर्य –अनार्य सिद्धांत से प्रेरित ई.व्ही.रामास्वामी नायकर पेरियार दक्षिण भारत में आर्य-द्रविड़ सिद्धांत का प्रचार कर ब्राह्मण सत्ता के विनाश की आधारशिला तैयार करना शुरू कर चुके थे. इस दौरान ब्रिटेन में 30 वर्ष से ऊपर की महिलाओं के मताधिकार का कानून पास हो चुका था. इन सारे हालात पर किसी की सजग दृष्टि थी तो बंगाल की ‘अनुशीलन समिति’, जिसमें शुद्रातिशूद्रों का प्रवेश पूरी तरह निषिद्ध था, के पूर्व सदस्य डॉ.हेडगेवार की. उन्हें यह अनुमान लगाने में कोई दिक्कत नहीं हुई कि अग्रेजों के चले जाने के बाद भारत में भी संसदीय प्रणाली लागू होगी, जिसमें विशिष्टजन ही नहीं, भूखे-अधनंगे दलित-पिछड़ों को भी वोट देने, अपना प्रतिनिधि चुनने का अवसर मिलेगा. मताधिकार मिलने पर दलित-आदिवासी और पिछड़े और चाहें जो कुछ भी करें, अंततः तिलक-नेहरु इत्यादि द्वारा विदेशी प्रमाणित किये गए ब्राह्मणों को वोट तो नहीं ही देंगे. इसी चिंता से ही, जिन दिनों देश के दूसरे नेता आजादी की जंग लड़ रहे थे, उन्होंने आजाद भारत के ब्राह्मणों के हित में मुस्लिम-विद्वेष और हिन्दू-धर्म-संस्कृति के उज्जवल पक्ष के प्रचार-प्रसार के जरिये विशाल हिन्दू समाज बनाने में खुद को निमग्न किया. उन्होंने अपनी प्रखर मनीषा से यह जान लिया था कि जो दलित-पिछड़े हिन्दू-धर्म के अनुपालन के नाम पर सदियों से पशुवत जिंदगी जीते रहे हैं, उन्हें जब मुस्लिम विद्वेष और हिन्दू-धर्म के नाम पर उद्वेलित किया जायेगा, वे आसानी से हिन्दू के नाम पर ध्रुवीकृत हो जायेंगे. और जब असंख्य जातियों में बंटे लोग हिन्दू के नाम पर ध्रुवीकृत होंगे, नेतृत्व स्वतः ही ब्राहमणों के हाथ में चला जायेगा. इसी सोच के तहत उन्होंने विशाल हिन्दू समाज बनाने के लिए 1925 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की थी

राम जन्मभूमि मुक्ति के नाम पर संघ ने खड़ा किया आज़ाद भारत का सबसे बड़ा आंदोलन!

डॉ. हेडगेवार से यह गुरुमंत्र पा कर संघ अरसे से चुपचाप काम करता रहा. किन्तु 7 अगस्त, 1990 को मंडल रिपोर्ट सामने आने के बाद जब दलित-पिछड़ों के हाथ में सत्ता के जाने के आसार दिखा, संघ ने अपने तीन दर्जन आनुषांगिक संगठनों के साथ मिलकर राम जन्मभूमि मुक्ति के नाम पर आजाद भारत का सबसे बड़ा आन्दोलन खड़ा कर दिया. इस आन्दोलन में संघ परिवार ने बाबर की संतानों के प्रति वंचित जातियों में वर्षों से संचित अपार नफरत और राम के प्रति दुर्बलता का जमकर सद्व्यवहार किया. परिणाम सबको मालूम है. इस आन्दोलन को दूर से निहारते रहने वाले ब्राह्मण अटल बिहारी वाजपेयी हिन्दू-ध्रुवीकरण की नैया पर सवार होकर केंद्र की सत्ता पर काबिज हुए. राम जन्मभूमि मुक्ति आन्दोलन की सफलता के बाद संघ परिवार चुनाव दर चुनाव विकास की आड़ में प्रधानतः हिन्दू ध्रुवीकरण के सहारे सत्ता दखल की मंजिलें तय करता गया .बहरहाल संघ संस्थापक की दूरगामी परिकल्पना को किसी ने समझा तो वह थे कांशीराम.

डॉ. हेडगेवार की काट पैदा की मान्यवर कांशीराम ने ! 

कांशीराम ने जब सार्वजनिक जीवन में प्रवेश कर भारत के अतीत, वर्तमान और भविष्य का अध्ययन किया तो उन्हें विशाल ‘हिन्दू समाज’ के विपरीत ‘बहुजन समाज’ बनाने से भिन्न कोई उपाय नजर नहीं आया. उन्होंने डॉ. हेडगेवार के फार्मूले से यह जान लिया कि अगर हिन्दू धर्म-संकृति के उज्जवल पक्ष और अल्पसंख्यकों के खिलाफ नफरत के जरिये वंचित जातियों को हिन्दू के नाम पर गोलबंद कर नेतृत्व यदि ब्राह्मण व सवर्णों के हाथ में थमाया जा सकता है तो हिन्दू –धर्म –संस्कृति के अंधकार पक्ष अर्थात वर्ण व्यवस्था की वंचना और व्यवस्था के लाभान्वित वर्ग के खिलाफ वंचितों को आक्रोशित कर विशाल बहुजन समाज बनाया जा सकता है. ऐसा होने पर सत्ता की बागडोर अवश्य ही दलित-आदिवासी –पिछडों या इनसे धर्मान्तरित लोगों के हाथ में थमाई जा सकती है. हालांकि कांशीराम ने यह कभी कबूल नहीं किया कि उन्होंने हेडगेवार का अनुसरण किया है, लेकिन उनकी कार्य प्रणाली में उसकी झलक मिलती है. चूंकि कार्य प्रणाली एक होने के बावजूद ‘विशाल हिन्दू-समाज‘ और ‘बहुजन समाज‘ दो विपरीत ध्रुव हैं, इसलिए उनका उल्टा फार्मूला ही एक दूसरे के खिलाफ रास आता है. यही कारण है कि भारतीय समाज का लम्बे समय तक अध्ययन करने के बाद जब कांशीराम ने 6 दिसंबर 1978 को बामसेफ (आल इंडिया बैकवर्ड एंड माइनरिटीज इम्प्लायज फेडरेशन) नामक अपंजीकृत, गैर-धार्मिक,गैर-आन्दोलानात्मक और गैर-राजनीतिक संगठन बनाया तो हेडगेवार जिस आर्य-अनार्य सिद्धांत से अपने समाज को बचाना चाहते थे, उसको प्रधानता देने से वे खुद को रोक नहीं पाए .

बामसेफ बनाम संघ !

हाँ! डॉ.हेडगेवार और कांशीराम ने अपने-अपने सपनों के भारत निर्माण के जो वैचारिक संगठन तैयार किया उनमें एक ही साम्यता रही कि दोनों ही घोषित तौर पर अराजनैतिक संगठन रहे, पर मूल मकसद राजनीतिक रहा. इस मकसद को हासिल करने के लिए संघ जहां वंचितों की धार्मिक चेतना के राजनीतिकरण पर सक्रिय रहा, वहीँ बामसेफ वर्ण-व्यवस्था के वंचितों की जाति चेतना पर. संघ जहां अल्पसंख्यकों, विशेषकर मुस्लिमों के खिलाफ नफरत को हथियार बनाया, वहीँ बामसेफ शक्ति के स्रोतों (आर्थिक-राजनीतिक –धार्मिक-शैक्षिक ) पर 80-85 प्रतिशत कब्ज़ा जमाये सवर्णों,विशेषकर ब्राह्मणों के खिलाफ बहुजनों को संगठित करने का हर मुमकिन प्रयास किया. हां, बामसेफ ने भी संघ की तर्ज पर जागृति जत्था, बामसेफ सहकारिता, समाचार पत्र एवं प्रकाशन, संसदीय संपर्क शाखा, विधिक सहयोग एवं सलाह, विद्यार्थी, युवक, महिलाएं, औद्योगिक श्रमिक, खेतिहर श्रमिक इत्यादि जैसे कई विंग स्थापित किये. इनके जरिये ही कांशीराम ने योजनाबद्ध तरीके से पहले दलितों की जाति चेतना का राजनीतिकरण किया जो धीरे-धीरे पिछड़ों और अल्पसंख्यकों तक में प्रसारित हो गयी. इसके फलस्वरूप मंडल उत्तर काल में सवर्ण राजनीतिक रूप से लाचार समूह में तब्दील होने के लिए बाध्य हुए.यह कांशीराम की जाति चेतना की रणनीति का ही कमाल था कि तमाम राजनीतिक दल, जिनमें संघ का राजनीतिक संगठन भाजपा भी है, नेतृत्व गैर-ब्राह्मणों, विशेषकर पिछड़ों के हाथ में देने के लिए बाध्य हुए.

कांशीरामवाद से विचलन का परिणाम : राम मंदिर और भाजपा की सत्ता 

बहरहाल सवर्णवादी दलों की लाचारी दीर्घ स्थाई न हो सकी. कारण, जाति चेतना के चलते क्षत्रप बने बहुजन समाज के नेता 2009 आते-आते अपनी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा की पूर्ति के लिए सवर्णपरस्ती की राह पकड़ लिए. अब उनमें सवर्णों के खिलाफ बहुजनों को ध्रुवीकृत करने का जज्बा ही नहीं रहा. इस कारण बहुजन नेतृत्व ‘भूरा बाल..’ तिलक तराजू..इत्यादि जैसे उन नारों से तौबा कर लिया, जो बहुजनों की जाति चेतना के राजनीतिकरण में प्रभावी रोल अदा किया करते थे. उन नारों से से बहुजनों भारत के जन्मजात शोषक वर्ग के खिलाफ एक नफरत सैलाब उमड़ता था, जो बहुजन नेताओं के चुनाव में विजय का बड़ा सबब बनता. लेकिन बहुजनवादी दल भले ही शोषकों के खिलाफ नफरत का सैलाब पैदा करने वाले नारों और राजनीतिक शैली से तौबा कर लिए :  किन्तु घोषित तौर पर विकास की बात करने वाले संघवादी डॉ. हेडगेवार के फार्मूले से कभी डिगे नहीं. इसलिए उनका धार्मिक चेतना के राजनीतिकरण से कभी विचलन नहीं हुआ. वे राजनीतिक रूप से बेहतर स्थिति में आते जाने के बावजूद कभी मुस्लिम विद्वेष के प्रसार से पीछे नहीं हटे. यही कारण है 2014 से हेडगेवारपंथी हिंदी पट्टी की राजनीति में नए सिरे से छाते चले गए.

हेडगेवार के अल्पसंख्यक विद्वेष वाले फार्मूले को लगातार धार देते रहने के कारण ही भारत दुनिया के सबसे बड़े मॉब लिंचिंग सेंटर में विकसित होते गया, साथ-साथ बढ़ते गया हेडगेवार के आरएसएस के राजनीतिक संगठन भाजपा की राजनीतिक सफलता का ग्राफ !

काश! लालू यादव से प्रेरणा ल होती मायावती और अखिलेश ने

बहरहाल बहुजनों के सौभाग्य से अरसे बाद लालू प्रसाद यादव ने सवर्णपरस्ती से उबर कर 2015 में बिहार विधानसभा चुनाव में जाति चेतना के राजनीतिकरण का रिस्क लिया और रास्ता दिखाया कि जाति चेतना के जरिये साधू-संतों और लेखकों तथा मीडिया और धनपतियों के प्रबल समर्थन से पुष्ट करिश्माई मोदी और संघ के राजनीतिक संगठन भाजपा को शिकस्त दी जा सकती है. लालू यादव ने जिस तरह अपने प्रबल प्रतिद्वंदी नीतीश कुमार से गंठजोड़ कर मोहन भागवत के आरक्षण की समीक्षा सम्बन्धी बयान को पकड़कर सर्वव्यापी आरक्षण का शोर मचाकर जाति चेतना की राजनीति को तुंग पर पहुँचाया, वैसे ही हालात 2017 में यूपी में भी बने. किन्तु बहुजन हित की बजाय अपने मान-अभिमान को प्राथमिकता देने वाले मायावती और अखिलेश यादव ने शक्तिशाली भाजपा के खिलाफ गंठबंधन से तौबा किया ही, मोहन भागवत की भांति ही संघ के मनमोहन वैद्य ने आरक्षण पर बयान देकर जो अवसर स्वर्णिम अवसर सुलभ कराया, उसका सद्व्यहार करने कोई में रूचि नहीं लिया. खासतौर से संघ के मनमोहन वैद्य के बाद सपा की अपर्णा यादव के आरक्षण विरोधी बयान ने मायावती के समक्ष तो दोहरा अवसर सुलभ करा दिया था. किन्तु वह इसका सद्व्यहार करने आधे-अधूरे मन से आगे बढ़ी, जिसका परिणाम इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया.

बहरहाल 2017 में यूपी विधानसभा में भाजपा की हैरतंगेज विजय के बाद हेडगेवारवाद ने कांशीरामवाद पर निर्णायक विजय हासिल कर ली. उसके फलस्वरूप देश की दिशा तय करने वाले यूपी में हेडगेवारवादियों की अभूतपूर्व सत्ता कायम हो गयी, जिसके फलस्वरूप राम मंदिर निर्माण के हालात और बेहतर हुये।

अगर योगी यूपी की सत्ता में नहीं आते तो भी राम मंदिर जरूर बनता, पर वह तिथि 2020 के 5 अगस्त की न होकर शायद पाँच-दस साल के बाद की होती।

 नए सिरे से धार देना होगा कांशीरामवाद को

बहरहाल आज से जो राम मंदिर निर्माण शुरू हो रहा है, उसके बाद बहुत से व्यक्ति आश्वस्त हो सकते हैं कि राम मंदिर का मुद्दा खत्म हो गया, जैसे कि नरसिंह राव ने 6 दिसंबर, 1992 को बाबरी मस्जिद के ध्वंस के बाद बेफिक्र हो गए थे. किन्तु राम मंदिर जिस तरह सवर्णवादी सत्ता के लिए कारगर साबित हुआ है, उसे देखते हुये यह मानकर चलना ही बेहतर होगा कि संघ परिवार विविध बहानों के जरिये मंदिर निर्माण का घोषित कार्यकाल साढ़े तीन साल को बढ़ाकर कमसे से कम आगामी दो लोकसभा चुनाव अर्थात और 10 वर्षों तक जरूर कर लेगा.

स्मरण रहे मंदिर निर्माण से जुड़े लोग धन-संग्रह के लिए 10 करोड़ परिवारों से संपर्क साधने की योजना बना चुके हैं. इस संपर्क परियोजना को पूरे करने मे कितने साल लग सकते हैं, यह कल्पना करने का विषय है.

याद रहे 70 एकड़ में फैले मंदिर परिसर में नाम मात्र क्षेत्र के ही फिलहाल निर्माण की घोषणा हुई है. बाद में इसका निर्माण क्षेत्र 35 एकड़ तक नहीं बढ़ जाएगा, इसकी गारंटी कोई नहीं दे सकता. इसलिए यह मानकर चलिये कि आरक्षण के खात्मे के लिए सितंबर, 1990 से एल के आडवाणी ने जिस राम जन्मभूमि मुक्ति अभियान की शुरुआत की, वह अभी और कई सालों तक, तब तक चलेगा, जब तक आरक्षण बिलकुल शून्य नहीं हो जाता।

इसका मतलब हिन्दू धर्म संस्कृति के उज्ज्वल पक्ष और मुस्लिम विद्वेष का प्रसार अर्थात हेडगेवारवाद अभी और कई सालों तक चलेगा। चूंकि हेडगेवार की काट सिर्फ कांशीरामवाद में है इसलिए वक्त की मांग है कि सभी सामाजिक न्यायवादी दल संगठित होकर कांशीरामवाद को और प्रभावी बनाने की दिशा में आगे बढ़ें. यदि सामाजिक न्यायवादी दल संगठित होकर इमानदारी से दलित, आदिवासी, पिछड़ों और मुसलमानों के लिए सरकारी और निजी क्षेत्र की नौकरियों सहित सप्लाई, डीलरशिप, ठेकों, पार्किंग, परिवहन, फिल्म-मीडिया, ज्ञान-उद्योग और पौरोहित्य इत्यादि तमाम क्षेत्रों में संख्यानुपात में भागीदारी की मांग उठायें तो इससे जाति चेतना का वह सैलाब उठेगा जिसके सामने धार्मिक चेतना पर निर्भर राजनीति तिनके की भांति बह जाएगी. पर लाख टके का सवाल है कि बहुजन नेता क्या कांशीरामवाद को नए सिरे से धार देने की दिशा में आगे बढ़ेंगे!

एच. एल. दुसाध

(लेखक बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।)      

                    

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