किसान आंदोलन : सुनहरे अक्षरों में दर्ज होगी किसानों की जीत

किसान आंदोलन : सुनहरे अक्षरों में दर्ज होगी किसानों की जीत

स्थगित हुआ किसान आंदोलन

तीन कृषि कानूनों के विरुद्ध एक वर्ष से भी अधिक समय तक चल रहे किसान आंदोलन को स्थगित कर दिया गया है (Farmer’s movement suspended)। केंद्र में काबिज भाजपा सरकार ने किसानों को लिखित में कई आश्वासन दिए हैं। इसे किसानों और लोकतंत्र की बड़ी जीत (Big victory for farmers and democracy) के रूप में जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी भले ही एक वर्ष बाद सही, पर वक्त की नजाकत भांपते हुए समझदारी भरा फैसला लिया है। लेकिन प्रश्न खड़ा हुआ है कि पीएम नरेंद्र मोदी कितना डैमेज कंट्रोल कर पाए? किसान आंदोलन के महत्व (importance of peasant movement in India) और लोकतंत्र की रक्षा में किसान आंदोलन की भूमिका (Role of Peasant Movement in Defense of Democracy) पर देशबन्धु में संपादकीय आज (Editorial in Deshbandhu today) प्रकाशित हुआ है। उक्त संपादकीय का किंचित् संपादित रूप साभार

एक साल से भी अधिक समय से अपने हक की लोकतांत्रिक तरीके से लड़ाई लड़ रहे किसानों को आखिरकार सफलता मिल ही गई है। कृषि कानूनों की वापसी के बाद अब केंद्र सरकार ने किसानों की कई और महत्वपूर्ण मांगों पर लिखित आश्वासन दे दिया है। कृषि सचिव संजय अग्रवाल की ओर से किसानों को भेजी गई चिठ्ठी में पांच महत्वपूर्ण मांगों पर सहमति दी गई है। ये पांच मांगें हैं-

  • न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी (Minimum Support Price (MSP))– केंद्र सरकार इसे लेकर एक किसान समिति बनाएगी जिसमें संयुक्त किसान मोर्चा के प्रतिनिधि लिए जाएंगे। जिन फसलों पर अभी एमएसपी मिल रहा है वो जारी रहेगा।
  • किसानों पर दर्ज मुकदमों की वापसी (Cancellation of cases filed against farmers)– हरियाणा, उप्र, उत्तराखंड सरकार मुकदमों की वापसी पर सहमत हो गई हैं। दिल्ली, अन्य प्रदेश और रेलवे भी तत्काल मुकदमों की वापसी करेंगे।
  • मुआवज़ा- उप्र और हरियाणा में सहमति बन गई है। पंजाब की तर्ज पर यहां भी पांच लाख रुपये का मुआवज़ा दिया जाएगा।
  • बिजली विधेयक- किसानों पर असर डालने वाले प्रावधानों पर पहले सभी पक्षों के साथ चर्चा होगी। किसान मोर्चा से चर्चा होने के बाद ही विधेयक संसद में पेश किया जाएगा।
  • पराली- भारत सरकार ने जो क़ानून पारित किए हैं उसकी धारा 14 और 15 के तहत किसानों पर कार्रवाई नहीं होगी।

नरेन्द्र मोदी की 56 इंच की छवि और किसान आंदोलन

जिन मानसिक, शारीरिक और आर्थिक कष्टों को उठाकर किसानों ने अपना संघर्ष जारी रखा और तमाम तकलीफों के बावजूद अपने आंदोलन से डिगे नहीं, उस लिहाज से किसानों के लिए यह बड़ी जीत है। किसानों ने देश को यह दिखला दिया कि मजबूत इरादों से किस तरह सफलता हासिल की जाती है। नरेन्द्र मोदी ने देश में जब से सत्ता संभाली है, उनकी छवि ऐसी ही बनाई गई है कि वे अपने फैसलों से पीछे नहीं हटते। लेकिन किसानों ने उन्हें अपने फैसले को वापस लेने पर बाध्य किया, यह बड़ी बात है। अच्छा है कि वक्त की नजाकत देखते हुए प्रधानमंत्री ने लचीला रुख अपनाया। सरकार में हठधर्मी नहीं चलती है, यह मोदीजी भी समझते हैं। भले ही उन्होंने विधानसभा चुनावों के मद्देनजर पहले कृषि कानूनों की वापसी का ऐलान (Announcement of withdrawal of agricultural laws) किया, फिर किसानों की अन्य मांगों पर भी गौर फरमाया, लेकिन जिस पद पर वे बैठे हैं, उनसे इसी तरह के व्यवहार की उम्मीद थी।

किसान देश के दुश्मन नहीं, जिनसे लड़ रही थी सरकार

किसान इस देश के ही नागरिक हैं (Farmers are citizens of this country), कोई दुश्मन नहीं हैं, जिनसे एक साल लंबी लड़ाई सरकार लड़ रही थी। कृषि कानून पारित करवाने के सरकार के जो भी तर्क थे, अगर वे किसानों को अपने लिए सही नहीं लग रहे थे, तो सरकार का यह फर्ज था कि वह तभी कोई मध्यममार्ग निकालती। लेकिन सरकार ने शुरुआत में जो कड़ा रवैया दिखाया, उसके बाद हालात बिगड़ते चले गए। पूर्वाग्रहों के साथ सरकार और किसानों के बीच वार्ताएं हुईं, जिनका नतीजा सिफर ही रहना था।

मोदी सरकार की किसान विरोधी छवि क्यों बनी? (Why did the Modi government have an anti-farmer image?)

इसके बाद आंदोलन को लेकर तथाकथित राष्ट्रवादियों (so called nationalists) ने बेसिरपैर की बयानबाजी और हंगामे किए, किसानों पर अनावश्यक लांछन लगे। और इन सब में शक की उंगली सरकार पर ही उठी कि उसकी शह पर किसानों को मानसिक और शारीरिक तौर पर प्रताड़ित किया जा रहा है। सरकार अगर किसानों को अपशब्द कहने वालों को पहले ही खामोश करा देती तो उसकी किसान विरोधी छवि न बनती। लेकिन सरकार ऐसा करने से चूक गई, बल्कि कई किसानों पर, और आंदोलन के समर्थन में खड़े हुए कुछ लोगों पर मुकदमे चले, अंतरराष्ट्रीय स्तर के ख्यातिनाम लोगों पर ट्रोल आर्मी ने कीचड़ उछाला। इन सबसे भी सरकार की छवि खराब हुई।

काश नरेन्द्र मोदी ने शुरु से दूरदर्शिता दिखलाई होती!

चुनावों में इसका खामियाजा भाजपा को भुगतना पड़ा और आगे भी बड़ा नुकसान हो सकता था। इसलिए अब नरेन्द्र मोदी ने बिगड़ी बातों को सुधारने की पहल की। अगर शुरु से उन्होंने दूरदर्शिता दिखलाई होती, उनके सलाहकारों ने उन्हें सही सलाह दी होती, तो आज हालात दूसरे होते। अभी तो नरेन्द्र मोदी अवसरवादी प्रधानमंत्री की तरह दिख रहे हैं (Narendra Modi looking like an opportunistic prime minister), जो अपनी पार्टी की जीत के लिए अपने ही फैसलों से पलट रहे हैं।

खैर, देर आए, दुरुस्त आए। सरकार ने अपने रुख में लचीलापन दिखलाया है, तो अब किसान संगठनों ने भी नरमी दिखलाई है।

अब किसान आंदोलन स्थगित कर दिया गया है और 11 दिसंबर से दिल्ली की सीमाओं को खाली कर किसान अपने घरों को लौट जाएंगे। इसी दिन किसान फतह मार्च निकालेंगे और 15 तारीख को स्वर्ण मंदिर में मत्था टेकेंगे।

अगले साल 15 जनवरी को संयुक्त किसान मोर्चा की एक समीक्षा बैठक होगी, जिसमें यह देखा जाएगा कि सरकार ने वादे किस तरह पूरे किए और अगर ऐसा नहीं हुआ तो फिर से आंदोलन शुरु हो सकता है। मगर फिलहाल जो हालात बने हैं, उसमें किसान आंदोलन एक बड़ी जीत के साथ खत्म नज़र आ रहा है। देश के लोकतांत्रिक इतिहास में यह जीत सुनहरे अक्षरों में दर्ज होगी।

आज का देशबन्धु का संपादकीय (Today’s Deshbandhu editorial) का संपादित रूप साभार.

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