पुलिन बाबू : एक जनप्रतिबद्ध यायावर की आधी अधूरी कथा

पुलिन बाबू : एक जनप्रतिबद्ध यायावर की आधी अधूरी कथा

पुलिन बाबू की जीवनी (Biography of Pulin Babu in Hindi)

Pulin Babu: Half-Unfinished Story of a People’s Committed Yayavar

पुलिन बाबू मेरे पिता का नाम है। उनके जीते जी मैं उन्हें कभी नहीं समझ सका। उनके देहांत के बाद जिनके लिए वे तजिंदगी जीते रहे, खुद उनके हक-हकूक के लिए देशभर के शरणार्थी आंदोलनों से उलझ जाने की वजह से उनके कामकाज के तौर तरीके की व्यावाहारिकता अब थोड़ा समझने लगा हूं।

हवा हवाई नहीं थे पुलिन बाबू

पुलिन बाबू चरित्र से यायावर थे लेकिन किसान थे और किसानों के नेता थे। वे हवा हवाई नहीं थे और उनके पांव मजबूती से तराई की जमीन से लेकर उत्तराखंड के पहाड़ों पर जमे हुए थे। वे जड़ों से जुड़े हुए इंसान थे और जड़ों से कटे हुए मुझ जैसे इंसान के लिए उन्हें समझना बहुत आसान नहीं रहा है।

पुलिन बाबू मेहनतकशों के हकहकूक के लिए जाति, धर्म और भाषा की कोई दीवार नहीं मानते थे। फिरभी वे शरणार्थियों के देशभर में निर्विवाद नेता थे। विभाजन पीड़ित ऐसे एकमात्र शरणार्थी नेता, जिन्होंने मुसलमानों को भारत विभाजन के लिए कभी जिम्मेदार नहीं माना और उत्तर प्रदेश और अन्यत्र भी वे बेझिझक दंगापीड़ित मुसलमानों के बीच जाते रहे, जैसे वे देश भर में शरणार्थियों के किसी भी संकट के वक्त आंधी तूफान कैंसर वगैरह-वगैरह की परवाह किये बिना भागते रहे आखिरी सांस तक।

वे जोगेन मंडल के अनुयायी बने रहे आजीवन, जबकि बंगाल में जोगेन मंडल को विभाजन का जिम्मेदार माना जाता है।

उन्होंने भारत विभाजन कभी नहीं माना और जब चाहा तब बिना पासपोर्ट और बिना वीसा सीमा पार करते रहे तो किसी ने उन्हें रोका भी नहीं। मेरे लिए बिना पासपोर्ट और बिना वीसा सीमा पार जाना संभव नहीं है और पिता के उस अखंड भारत की राजनीतिक सीमाओं को भी मानना संभव नहीं है। उन्होंने मरते दम तक इस महादेश को अखंड माना तो हमारे लिए खंड-खंड देश स्वीकार करना भी मुश्किल है।

भारत विभाजन उन्होंने नहीं माना लेकिन पूर्वी बंगाल से खदेड़े गये तमाम शरणार्थियों को उन्होंने जाति-धर्म-भाषा-लिंग निर्विशेष जैसे अपना परिजन माना, वैसे ही उन्होंने पश्चिम पाकिस्तान से आये सिख पंजाबी शरणार्थियों को भी अपने परिवार में शामिल माना।

उन्हीं की वजह से तराई और पहाड़ के गांव-गांव में हमें इतना प्यार मिलता रहा है। पहाड़ के लोगों को उन्होंने हमेशा शरणार्थियों से जोड़े रखने की कोशिश की है और कुल मिलाकर यही उनकी राजनीति रही है। पहाड़ से हमारे रिश्ते की बुनियाद भी यही है। जो कभी टस से मस नहीं हुई है।

पुलिन बाबू अखंड भारत के हर हिस्से को अपनी मातृभूमि मानते थे और मनुष्यता की हर भाषा को अपनी मातृभाषा मानते थे।

वे आपातकाल में भी प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के दफ्तर में बेहिचक घुस जाते थे और जब तक जीवित रहे हर राष्ट्रपति, हर प्रधानमंत्री, हर मुख्यमंत्री, विपक्ष के हर नेता के साथ उनका संवाद जारी था।

सर्वोच्च स्तरों पर संपर्कों के बावजूद अपने और अपने परिवार के हित में उन संबंधों को उन्होंने कभी भुनाया नहीं। वे हमारे लिए टूटे-फूटे छप्परों वाले घर छोड़ गये और आधी जमीन आंदोलनों में खपा गये। हम भी उनकी कोई मदद नहीं कर सके। इसलिए उनसे कोई शिकायत हमारी हो नहीं सकती।

हम सही मायने में उनके जीते जी न उनका जुनून समझ सकें और न उनका साथ दे सकें। फिर भी हम ऐसा कुछ भी कर नहीं सकते, जिससे उनके अधूरे मिशन को कोई नुकसान हो। कमसकम इतना तो हम कर ही सकते हैं और वही कोशिश हम कर रहे हैं।

उनका कहना था कि हर हाल में सर्वोच्च स्तर पर हमारी सुनवाई सुनिश्चित होनी चाहिए। उनका कहना था कि इन दबे कुचले लोगों का काम हमें खुद ही करना है।

हमारी योग्यता न हो तो हमें अपेक्षित योग्यताएं हासिल करनी चाहिए। संसाधनों के बारे में उनका कहना था कि जनता के लिए जनता के बीच काम करोगे तो संसाधनों की कोई कमी होगी नहीं। जुनून की हद तक आम जनता की हर समस्या से टकराना उनकी आदत थी। उन्होंने सिर्फ शरणार्थियों के बारे में कभी सोचा नहीं है। उनका मानना था कि स्थानीय तमाम जन समुदायों के साथ मिलकर ही शरणार्थी अपनी समस्याओं को सुलझा सकते हैं।

शरणार्थियों को बाकी समुदायों से जोड़ते रहना उनका काम था।

पुलिन बाबू अलग उत्तराखंड राज्य के तब पक्षधर थे जब उत्तराखंड संघर्ष वाहिनी के कार्यकर्ता की हैसियत से हम अलग राज्य की मांग बेमतलब मानते थे। वे पहाड़ और तराई के हकहकूक के लिए अलग राज्य अनिवार्य मानते थे। वे मानते थे कि उत्तराखंड में अगर तराई नहीं रही तो यूपी में बिना पहाड़ के समर्थन के तराई में बंगाली शरणार्थियों को बेदखली से बचाना असंभव है। तराई और पहाड़ को भूमाफिया के शिकंजे से बचाने के लिए वे हिमालय के साथ तराई को जोड़े रखने का लक्ष्य लेकर हमेशा सक्रिय रहे। यह मोर्चाबंदी उन्हें हमेशा सबसे जरूरी लगती रही है।

वे हिमालय को उत्तराखंड और यूपी में बसे बंगाली शरणार्थियों का रक्षाकवच और संजीवनी दोनों मानते थे। उनका यह नजरिया महतोष मोड़ आंदोलन के वक्त तराई के साथ पूरे पहाड़ के आंदोलित होने से जैसे साबित हुआ वैसे ही अलग उत्तराखंड राज्य बनने के बाद पुलिन बाबू के देहांत के तुरंत बाद सत्ता में आयी पहली केसरिया सरकार के तराई के बंगाली शरणार्थियों की नागरिकता छीनने के खिलाफ पहाड़ और तराई की आम जनता के शरणार्थियों के पक्ष में खड़े हो जाने के साथ हुए कामयाब आंदोलन के बाद से लेकर अब तक वह निरंतरता जारी है।

मैंने आजीविका और नौकरी की वजह से 1979 में नैनीताल और पहाड़ छोड़ा, लेकिन पुलिन बाबू का उत्तराखंड के राजनेताओं के अलावा जनपक्षधर कार्यकर्ताओं जैसे शेखर पाठक, राजीव लोचन साह और गिरदा से संबंध 2001 में उनकी मौत तक अटूट रहे। कभी भी किसी भी मौके पर वे नैनीताल समाचार के दफ्तर जाने से हिचके नहीं। न हमारे पुराने तमाम साथियों से उनके संवाद का सिलसिला कभी टूटा।

पुलिन बाबू हर हाल में पहाड़ और तराई के नाभि नाल का संबंध अपने बंगाली और सिख शरणार्थियों, आम किसानों, बुक्सा थारु आदिवासियों के हक हकूक की लड़ाई और पहाड़ के आम लोगों के हितों के लिए बनाये रखने के पक्ष में थे। उन्हीं की वजह से पहाड़ से हमारा रिश्ता न कभी टूटा है और न टूटने वाला है।

Pulin Kumar Vishwas aka Pulin Babu

तराई के भूमि आंदोलन में पुलिन बाबू किंवदंती हैं और हमेशा तराई में भूमिहीनों, किसानों और शरणार्थियों की जमीन, जान माल की हिफाजत के लिए वे पहाड़ और तराई की मोर्चाबंदी अनिवार्य मानते थे। इसके लिए उन्होंने गोविंद बल्लभ पंत और श्याम लाल वर्मा से लेकर डूंगर सिंह बिष्ट, प्रताप भैय्या, रामदत्त जोशी और नंदन सिंह बिष्ट तक हर पहाड़ी नेता के साथ काम करते रहे और आजीवन उनकी खास दोस्ती नारायणदत्त तिवारी और केसी पंत से बनी रही।

सत्ता की राजनीति से उनके इस तालमेल का मैं विरोधी रहा हूं हमेशा, जबकि उनका कहना था कि विचारधारा से क्या होना है, जब हम अपने लोगों को बचा नहीं सकते। अपने लोगों को बचाने के लिए बिना किसी राजनीति या संगठन वे अकेले दम समीकरण साधते और बिगाड़ते रहे हैं।

जिन लोगों के साथ वे खड़े थे, उनके हित उनके लिए हमेशा सर्वोच्च प्राथमिकता पर होते थे।

हम इसे मौकापरस्ती मानते रहे हैं और वोट बैंक राजनीति के आगे आत्मसमर्पण भी मानते रहे हैं। वैचारिक भटकाव और विचलन भी मानते रहे हैं। इस वजह से उनके आंदोलनों में हमारी खास दिलचस्पी कभी नहीं रही है। इसके विपरीत, उनके समीकरण के मुताबिक तराई के हकहकूक के लिए पहाड़ के हकूकूक की साझा लड़ाई और भू माफिया के खिलाफ राजनीतिक गोलबंदी जरूरी थी। वे तराई के बड़े फार्मरों के खिलाफ हैरतअंगेज ढंग से तराई के सिखों, पंजाबियों, बुक्सों और थारुओं, देशियों और मुसलमानों को गोलबंद करने में कामयाब रहे थे।

ढिमरी ब्लाक किसान आंदोलन

ढिमरी ब्लाक की लड़ाई पुलिन बाबू बेशक हार गये थे और उनके तमाम साथी टूट और बिखर गये थे लेकिन उन्होंने हार कभी नहीं मानी और आखिरी दम तक वे ढिमरी ब्लाक की लड़ाई लड़ रहे थे।

अब जबकि तराई के अलावा उत्तराखंड का चप्पा-चप्पा भूमाफिया के शिकंजे में कैद है और उसका कोई प्रतिरोध शायद इसलिए नहीं हो पा रहा है कि पहाड़ और तराई की वह मोर्चाबंदी नहीं है, जिसे वे हर कीमत पर बनाये रखना चाहते थे, ऐसे में उनकी पहाड़ के साथ तराई की मोर्चाबंदी की राजनीति समझ में आने लगी है, जिसके लिए उन्होंने तराई में, खास तौर पर बंगाली शरणार्थियों के विरोध की परवाह भी नहीं की।

उनकी इस रणनीति की प्रासंगिकता अब समझ में आती है कि कैसे बिना राजनीतिक प्रतिनिधित्व के वे न सिर्फ अपने लोगों की हिफाजत कर रहे थे बल्कि शरणार्थी इलाकों के विकास की निरंतरता बनाये रखने में भी कामयाब थे। उनके हिसाब से यह उनकी व्यवहारिक राजनीति थी, जो हमारी समझ से बाहर की चीज रही है। वे हमेशा कहते थे जमीन पर जनता के बीच रहे बिना और उनके रोजमर्रे के मुद्दों से टकराये बिना विचारधारा का किताबी ज्ञान कोई काम नहीं आता। हम उनसे वैचारिक बहस करने की स्थिति ही नहीं बना पाते थे क्योंकि वे विचारों पर नहीं, मुद्दों पर बात करते थे। हम अपनी विश्वविद्यालयी शिक्षा के अहंकार में समझते थे कि विचारधारा पर बहस करने के लिए जरुरी शिक्षा उनकी नहीं है।

पुलिन बाबू अंबेडकर और कार्ल मार्क्स की बात एक साथ करते थे और यह भी कहते थे कि नागरिकता छिनने की स्थिति में किसी शरणार्थी की न कोई जाति होती है और न उसका कोई धर्म होता है जैसे उसकी कोई मातृभाषा भी नहीं होती है।

वे अस्मिता राजनीति के विरुद्ध थे और एक मुश्त कम्युनिस्ट और वामपंथी दोनों थे, लेकिन मैंने उन्हें कभी किसी से कामरेड या जयभीम कहते कभी नहीं सुना।

हमारे तमाम पुरखों की तरह उनके बारे में कोई आधिकारिक संदर्भ और प्रसंग उपलब्ध नहीं हैं।

पुलिन बाबू नियमित डायरी लिखा करते थे। रोजाना सैकड़ों पत्र और ज्ञापन राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्रियों, मंत्रियों, राजनेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं को देश भर के शरणार्थियों, किसानों और मेहनतकशों की तमाम समस्याओं को लेकर दुनियाभर के समकालीन मुद्दों पर लिखा करते थे।

वे पारिवारिक कारणों से स्कूल में कक्षा दो तक ही पढ़ सके थे और पूर्वी बंगाल में तेज हो रहे तेभागा आंदोलन के मध्य भारत विभाजन से पहले रोजगार की तलाश में बंगाल आ गये थे। फिर भी आजीवन वे तमाम भाषाओं को सीखने की कोशिश में लगे रहे। तमाम पत्र और ज्ञापन वे हिंदी में ही लिखा करते थे और मेरे कक्षा दो पास करते न करते उन पत्रों और ज्ञापनों का मसविदा मुझे ही तैयार करना होता था। इससे मेरे छात्र जीवन तक देश भर में उनकी गतिविधियों में मेरा साझा रहा है। लेकिन भारत विभाजन से पहले और उसके बाद करीब सन 1960 तक की अवधि के दौरान जो घटनाएं हुई, वे जाहिर है कि मेरी स्मृतियों में दर्ज नहीं हैं।

उनके बारे में उनके साथियों से ही ज्यादा जानना समझना हुआ है और वह जानकारी भी बहुत आधी अधूरी है।

मसलन हम अब तक यही जानते रहे हैं कि 1956 में बंगाली विस्थापितों के पुनर्वास के लिए रुद्रपुर में हुए आंदोलन के सिलसिले में दिनेशपुर की आम सभा में उन्होंने कमीज उतारकर कसम खाई थी कि जब तक एक भी शरणार्थी का पुनर्वास बाकी रहेगा, वे फिर कमीज नहीं पहनेंगे।

उन्होंने मृत्युपर्यंत कमीज नहीं पहनी। पिछले दिनों कोलकाता के दमदम में निखिल भारत उद्वास्तु समन्वय समिति के 22 राज्यों के प्रतिनिधियों के कैडर कैंप में बांग्ला के साहित्यकार कपिल कृष्ण ठाकुर ने कहा कि बंगाल और उड़ीशा में शरणार्थी आंदोलन के नेतृत्व की वजह से वे सत्ता की आंखों में किरकिरी बन गये थे और उन्हें और उनके साथियों को खदेड़कर नैनीताल की तराई में भेज दिया गया था। तराई जाने से पहले बंगाल छोड़ते हुए हावड़ा स्टेशन के प्लेटफार्म पर शरणार्थियों के हुजूम के सामने उन्होंने कमीज उतारकर उन्होंने यह शपथ ली थी।

इसी तरह ढिमरी ब्लाक में चालीस गांव बसाने और हर भूमिहीन किसान परिवार को दस-दस एकड़ बांटने के आंदोलन और उसके सैन्य दमन के बारे में उस आंदोलन में उनके साथियों के कहे के अलावा हमें आज तक कोई दस्तावेज वगैरह बहुत खोजने के बाद भी नहीं मिले हैं।

पूर्वी बंगाल में वे तेभागा आंदोलन से जुड़े थे तो भारत विभाजन के बाद पूर्वी बंगाल में भाषा आंदोलन के दौरान ढाका में आंदोलन में शामिल होने के लिए वे जेल गये और फिर बांग्लादेश बनने के बाद दोनों बंगाल के एकीकरण की मांग लेकर भी वे ढाका में आंदोलन करने के कारण जेल गये। दोनों मौकों पर बंगाल के मशहूर पत्रकार और अमृत बाजार पत्रिका के संपादक तुषार कांति घोष उन्हें आजाद कराकर भारत ले आये। तुषार बाबू की मृत्यु से पहले भी पुलिन बाबू ने बारासात में उनके घर जाकर उनसे मुलाकात की थी और देवघर के सत्संग वार्षिकोत्सव में मैंने 1973 में तुषार बाबू और पुलिन बाबू को एक ही मंच को साझा करते देखा था लेकिन तुषारबाबू से हमारी कोई मुलाकात नहीं हुई।

इसी तरह बलिया के स्वतंत्रता सेनानी दिवंगत रामजी त्रिपाठी ने पुलिन बाबू की चंद्रशेखर से मित्रता की वजह सुचेता कृपलानी के मुख्यमंत्रित्व काल में पूर्वी पाकिस्तान से दंगों की वजह से भारत आये शरणार्थियों के पुनर्वास की मांग लेकर पुलिन बाबू ने जो लखनऊ के चारबाग रेलवे स्टेशन पर तीन दिनों तक ट्रेनें रोक दी थी, उस आंदोलन को बताते रहे हैं। इसका कोई ब्यौरा नहीं मिल सका। चंद्रशेखर से उनका परिचय तभी हुआ।

1960 में असम में दंगों के मध्य जब शरणार्थी खदेड़े जाने लगे तो पुलिन बाबू ने दंगाग्रस्त कामरूप, ग्वालपाड़ा, नौगांव, करीमगंज से लेकर कछाड़ जिले में सभी शरणार्थी इलाकों में डेरा डालकर महीनों काम किया और असम सरकार और प्रशासन की मदद से शरणार्थियों का बचाव तो किया ही। शरणार्थियों से पुलिन बाबू ने यह भी कहा कि भारत विभाजन के बाद शरणार्थी जहां भी बसे हैं, वही उनकी मातृभूमि हैं और उन्हें स्थानीय समुदायों के साथ मिलकर वहीं रहना है। किसी कीमत पर यह नई मातृभूमि नहीं छोड़नी है।

हमने सत्तर के दशक में मरीचझांपी आंदोलन के दौरान मध्य भारत के दंडकारण्य, महाराष्ट्र और आंध्र तक में शरणार्थियों को बंगाल लौटने के इस आत्मघाती आंदोलन के खिलाफ उनकी यही दलील सुनी है, जिसके तहत असम, उत्तर प्रदेश या उत्तराखंड के शरणार्थियों ने उस आंदोलन का समर्थन नहीं किया और वे मरीचझांपी नरसंहार से बच गये। लेकिन वे मध्य भारत के शरणार्थियों को मरीचझांपी जाने से रोक नहीं पाये, बल्कि उस आंदोलन के वक्त इस आंदोलन की वजह से रायपुर के माना कैंप में उनपर कातिलाना हमला भी हुआ, जिससे वे बेपरवाह थे।

त्रिपुरा के दिवंगत शिक्षा मंत्री और कवि अनिल सरकार के साथ गुवाहाटी से मालेगांव अभयारण्य के रास्ते शरणार्थी इलाकों में रुककर हर गांव में 2003 में पुलिन बाबू की मृत्यु के दो साल बाद उन गांवों की नई पीढ़ियों की स्मृति में उनका वही बयान हमने सुना है। तब लगा कि जनता की स्मृति इतिहास और दस्तावेजों से कही ज्यादा स्थाई चीज है।

तराई में भले ही लोग उन्हें भूल गये हों, असम में लोग उन्हें अब भी याद करते हैं। उनकी वजह से देश भर के शरणार्थी मुझे जानते हैं।

विडंबना यह है कि हमारे पुराने घर में उनका लिखा सब कुछ, उनकी डायरियां तक ऩष्ट हो गया है रखरखाव के अभाव में। इसके लिए काफी हद तक मेरी भी जिम्मेदारी है। उनके पुराने साथी कामरेड पीसी जोशी, कामरेड हरीश ढौंढियाल, कामरेड चौधरी नेपाल सिंह वगैरह का भी ढिमरी ब्लाक पर लिखा कुछ उपलब्ध नहीं है। जेल में सड़कर मर गये बाबा गणेशा सिंह के परिवार के पास भी कुछ नहीं है।

तराई और पहाड़ में पहले भूमि आंदोलन ढिमरी ब्लाक नाकाम जरुर रहा लेकिन इसके बाद बिंदु खत्ता में उसी ढांचे पर भूमिहीनों को जमीन मिल सकी है। ढिमरी ब्लाक की निरंतरता में बिंदु खत्ता और उसके आगे जारी है, जबकि पहाड़ और तराई में अब भी किसानों को सर्वत्र भूमिधारी हक मिला नहीं है और जल जंगल जमीन से बेदखली अभियान जारी है।

जो पहले तराई में हो रहा था, वह अब व्यापक पैमाने में पहाड़ में संक्रामक है। आजीविका, पर्यावरण और जलवायु से भी पहाड़ बेदखल है।

पुलिन बाबू को जिंदगी में कुछ हासिल हुआ नहीं है और न हम कुछ खास कर सके हैं। पुलिन बाबू के दिवंगत होने के बाद पंद्रह साल बीत गये हैं और तराई और पहाड़ के लोगों को अब इसका कोई अहसास ही नहीं होगा कि पहाड़ और मैदान के बीच सेतुबंधन का कितना महत्वपूर्ण काम वे कर रहे थे। यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पृथक् उत्तराखंड होने के बाद पहाड़ से तराई का अलगाव हो गया है और यह उत्तराखंड के वर्तमान और भविष्य लिए बेहद खतरनाक है।

पुलिन बाबू के संघर्ष के मूल में तराई के विभिन्न समुदायों के साथ पहाड़ के साझा आंदोलन मेहनतकशों के हकहकूक के लिए सबसे खास है और फिलहाल हम उस विरासत से बेदखल हैं।

पुलिन बाबू की स्मृतियों की साझेदारी, अपनी यादों और देश भर में उनके आंदोलन के साथियों और मित्रों के कहे मुताबिक पुलिन बाबू के जीवन के बारे में जो जानकारियां हमें अब तक मिली हैं,हम उसे साझा कर रहे हैं। इसे लेकर हमारा कोई दावा नहीं है। इस जानकारी को संशोधित करने की गुंजाइश बनी रहेगी।

जो उनके बारे में बेहतर जानते हैं, बहुत संभव है कि हमारा संपर्क उनसे अभी हुआ नहीं है। बहरहाल हमारे पास जो भी जानकारी उपलब्ध है, हम बिंदुवार वही साझा कर रहे हैं।

हमारे पुरखे बुद्धमय बंगाल के उत्तराधिकारी थे जो बाद में नील विद्रोह के मार्फत मतुआ आंदोलन के सिपाही बने, जिसकी निरंतरता तेभागा आंदोलन तक जारी थी।

भारत विभाजन के दौरान मेरे ताऊ दिवंगत अनिल विश्वास और चाचा डॉ सुधीर विश्वास बंगाल पुलिस में थे और कोलकाता में डाइरेक्ट एक्शन के वक्त दोनों ड्यूटी पर थे, लेकिन पुलिन बाबू विभाजन से पहले पूर्वी बंगाल में तेभागा में शामिल थे और उसी सिलसिले में वे विभाजन से पहले भारत आ गये और बारासात के नजदीक दत्तोपुकुर में एक सिनेमा हॉल में वे गेटकीपर बतौर काम कर रहे थे।

हमारा पुश्तैनी घर पूर्वी बंगाल के जैशोर जिले के नड़ाइल सबडिवीजन के लोहागढ़ थाना के कुमोरडांगा गांव रहा है जो मधुमती नदी के किनारे पर बसा है और जिसके उसपार फरीदपुर जिले का गोपालगंज इलाका और मतुआ केंद्र ओड़ाकांदि है।

पुलिन बाबू के पिता का नाम उमेश विश्वास है। दादा पड़दादा का नाम उदय और आदित्य है। जो आदित्य और उदय भी हो सकते हैं। उमेश विश्वास के तीन और भाई थे। उनके बड़े भाई कैलास विश्वास जो मशहूर लड़ाके थे। भूमि आंदोलन के लड़ाके।

उमेश विश्वास के मंझले भाई का नाम याद नहीं है जबकि उन्हीं का पुलिन बाबू पर सबसे ज्यादा असर रहा है। पुलिन बाबू मेरे बचपन में उन्हीं के किस्सा सुनाते रहे हैं, जो पूरे इलाके में हिंदू मुसलमान किसानों के नेता थे। काली पूजा की रात वे काफिला के साथ नाव से किसी पड़ोस के गांव जा रहे थे कि घर से निकलते ही उन्हें जहरीले सांप ने काट लिया। उन्हें बचाया नहीं जा सका और उनके शोक में तीन महीने के भीतर हमारे दादा उमेश विश्वास का भी देहांत हो गया।

उस वक्त पुलिन बाबू कक्षा दो में पढ़ रहे थे तो ताऊ जी कक्षा छह में। जल्दी ही कैलाश विश्वास का भी निधन हो गया और बाकी परिवार वालों ने उन्हें संपत्ति से बेदखल कर दिया, जिससे आगे उनकी पढ़ाई हो नहीं सकी।

पुलिन बाबू के चाचा इंद्र विश्वास विभाजन के वक्त जीवित थे। उन्होंने और बाकी परिवार वालों ने संपत्ति के बदले मालदह, नदिया और उत्तर 24 परगना में जमीन लेकर नई जिंदगी शुरु की।

हमारी दादी अकेली इस पार चली आयी हमारे फुफेरे भाई निताई सरकार के साथ जो बाद में नैहाटी के बस गये। पुलिन बाबू मां के साथ रानाघाट कूपर्स कैंप में चले गये, जहां उनके साथ ताऊ ताई और चाचा जी भी रहे।

रानाघाट में ही वे शरणार्थी आंदोलन में शामिल हो गये।1950 के आसपास शरणार्थियों को कूली कार्ड देकर दार्जिलिंग के चायबागानों में खपाने के लिए जब ले जाया गया, तब सिलिगुड़ी में पुलिन बाबू ने इसके खिलाफ आंदोलन किया तो उन सबको फिर लौटाकर रानाघाट लाया गया। तब कम्युनिस्ट शरणार्थियों को बंगाल से बाहर भेजने के खिलाफ आंदोलन कर रहे थे।पुलिन बाबू भी कम्युनिस्ट थे और उस वक्त कामरेड ज्योति बसु से लेकर तमाम छोटे बड़े कम्युनिस्ट नेता शरणार्थी आंदोलन में थे। शरणार्थी आंदोलन तब कम्युनिस्ट आंदोलन ही था।

पुलिन बाबू ने नई मांग उठा दी कि बेशक शरणार्थियों को बंगाल के बाहर पुनर्वास दिया जाये लेकिन उन सभी को एक ही जगह मसलन अंडमान या दंडकारण्य में बसाया जाये ताकि वे नये सिरे से अपना होमलैंड बसा सकें।

कामरेड ज्योति बसु और बाकी नेता शरणार्थियों को बंगाल के बाहर भेजने के खिलाफ आंदोलन चला रहे थे। जब पुलिन बाबू ने कोलकाता के केवड़ातला महाश्मशान में शरणार्थियों के बंगाल के बाहर होमलैंड बनाने की मांग पर आमरण अनशन पर बैठ गये तो कामरेडों के साथ उनका सीधा टकराव हो गया और वे और उनके तमाम साथी ओड़ीशा में कटक के पास खन्नासी रिफ्युजी कैंप में भेज दिये गये।

1951 में खन्नासी रिफ्युजी कैंप में ताऊजी और चाचाजी उनके साथ थे। खन्नासी कैंप में रहते हुए पुलिन बाबू का विवाह ओड़ीशा के ही बालेश्वर जिले के बारीपदा में व्यावसायिक पुनर्वास के तहत बसे बरिशाल जिले से आये वसंत कुमार कीर्तनिया की बेटी बसंतीदेवी के साथ हो गया।

इसी बीच ताऊजी का पुनर्वास संबलपुर में हो गया। तभी पुलिन बाबू और उनके साथियों को 1953 के आसपास नैनीताल जिले की तराई में दिनेशपुर इलाके में भेज दिया गया। बाद में पुलिन बाबू ने संबलपुर से ताऊजी को भी दिनेशुपर बुला लिया।

जो लोग रानाघाट से होकर खन्नासी तक पुलिन बाबू के साथ थे, वे तमाम लोग उनके साथ दिनेशपुर चले आये, जहां पहले ही तैतीस कालोनियों में शरणार्थी बस चुके थे। पुलिन बाबू और उनके साथी विजयनगर कालोनी में तंबुओं में ठहरा दिये गये।

इसी बीच 1952 के आम चुनाव में लखनऊ से वकालत पास करके श्याम लाल वर्मा को हराकर नारायणदत्त तिवारी एमएलए बन गये। वे 1954 में ही दिनेशपुर पहुंच गये और लक्ष्मीपुर बंगाली कालोनी पहुंचकर वे सीधे शरणार्थी आंदोलन में शामिल हो गये। तभी से पुलिन बाबू का उनसे आजीवन मित्रता का रिश्ता रहा है।

तराई उद्वास्तु समिति कब बनी?

1954 में ही तराई उद्वास्तु समिति बनी, जिसके अध्यक्ष थे राधाकांत राय और महासचिव पुलिन बाबू। उद्वास्तु समिति की ओर से दिनेशपुर से लंबा जुलूस निकालकर शरणार्थी स्त्री पुरुष बच्चे बूढ़े रुद्रपुर पहुंचे।

पुलिस की घेराबंदी में उनका आंदोलन जारी रहा। इसी आंदोलन के दौरान स्वतंत्र भारत, पायोनियर और पीटीआी के बरेली संवाददाता एन एम मुखर्जी के मार्फत प्रेस से पुलिन बाबू के ठोस संबंध बन गये और प्रेस से अपने इसी संबंध के आधार पर आजीवन सर्वोच्च सत्ता प्रतिष्ठान से संवाद जारी रखा। रुद्रपुर से शरणार्थियों को जबरन उठाकर ट्रकों में भर कर किलाखेड़ा के घने जंगल में फेंक दिया गया, जहां से वे पैदल दिनेशपुर लौटे। लेकिन इस आंदोलन की सारी मांगे मान ली गयीं। स्कूल, आईटीआई, अस्पताल, सड़क इत्यादि के साथ शरणार्थियों के तीन गांव और बसे।

रानाघाट से ओड़ीशा होकर जो लोग पुलिन बाबू के साथ दिनेशपुर चले आये, उन लोगों ने हमारी मां बसंती देवी के नाम पर बसंतीपुर गांव बसाया। बसंतीपुर के साथ-साथ पंचाननपुर और उदयनगर गांव भी बसे।

1958 में लालकुंआ और गूलरभोज रेलवे स्टेशनों के बीच ढिमरी ब्लॉक के जंगल में किसानसभा की अगुवाई में चालीस गांव बसाये गये। हर परिवार को दस दस एकड़ जमीन दी गयी। इस आंदोलन के नेता पुलिन बाबू के साथ-साथ चौधरी नेपाल सिंह, कामरेड हरीश ढौंढियाल और बाबा गणेशा सिंह थे। तब चौधरी चरण सिंह यूपी के गृहमंत्री थे। पुलिस और सेना ने भारी पैमाने पर आगजनी, लाठीचार्ज करके भूमिहीनों को ढिमरी ब्लाक से हटा दिया। हजारों लोग गिरफ्तार किये गये। पुलिन बाबू का पुलिस हिरासत में पीट-पीटकर हाथ तोड़ दिया गया। उन पर और उनके साथियों के खिलाफ करीब दस साल तक मुकदमा चलता रहा। मुकदमा के दौरान ही जेल में बाबा गणेशा सिंह की मृत्यु हो गयी।

1960 के आसपास नैनीताल की तराई में ही शक्तिफार्म में फिर शरणार्थियों को बसाया गया तो तब तक रामपुर, बरेली, बिजनौर, लखीमपुर खीरी, बहराइच और पीलीभीत जिलों में भी शरणार्थियों का पुनर्वास हुआ। इसी दौरान रुद्रपुर में ट्रेंजिट कैंप बना। इन तमाम शरणार्थियों की रोजमर्रे की जिंदगी से पुलिन बाबू जुड़े हुए थे और इस वजह से उन्हें गर परिवार की कोई खास परवाह नहीं थी। बाद में मेरठ, बदायूं और कानपुर जिलों में भी शरणार्थी बसाये गये।

Pulin Babu statue at Dineshpur
Pulin Babu statue at Dineshpur

1967 में यूपी में संविद सरकार बनने के बाद दिनेशपुर में बसे शरणार्थियों को भूमिधारी हक मिला तो ढिमरी ब्लाक केस भी वापस हो गया। अब वह ढिमरी ब्लाक आबाद है, जिससे बहुत दूर भी नहीं है बिंदुखत्ता।

1958 के ढिमरी ब्लाक आंदोलन के सिलसिले में जमानत पर रिहा पुलिन बाबू बंगाल चले आये और उन्होंने नदिया के हरीशचंद्रपुर में जोगेन मंडल के साथ एक सभा में शिरकत की। जोगेन्द्र मंडल पाकिस्तान के कानून मंत्री बनने के बाद पूर्वी बंगाल में हो रहे दंगों और दलितों की बेदखली रोक नहीं सके तो वे गुपचुप भारत चले आये। मुस्लिम लीग के साथ गठबंधन की राजनीति की बहुत कड़ी आलोचना के मध्य जोगेन मंडल लगभग खलनायक बन गये थे, जिनके साथ पुलिन बाबू का गहरा नाता था। लेकिन हरीशचंद्रपुर की उस सभा में जोगेन मंडल और उनमें तीखी झड़प हो गयी।

नाराज पुलिन बाबू सीधे ढाका निकल गये और वहां भाषा आंदोलन के साथियों के साथ सड़क पर उतर गये। शुरू से ही वे भाषा आंदोलन के सिलसिले में ढाका आते जाते रहे हैं। लेकिन इस बार वे ढाका में गिरफ्तार लिये गये।

तुषार बाबू की मदद से वे पूर्वी बंगाल की जेल से छूटे तो 1960 में दिनेशपुर में अखिल भारतीय शरणार्थी सम्मेलन का आयोजन किया। इसी बीच असम में दंगे शुरू हो गये तो वे असम चले गये। वहां से लौटे तो चाचा डॉ सुधीर विश्वास को वहां भेज दिया ताकि शरणार्थियों के इलाज का इंतजाम हो सके।

चाचाजी भी लंबे समय तक असम के शरणार्थी इलाकों में रहे।

इस बीच कम्युनिस्टों से उनका पूरा मोहभंग हो गया क्योंकि ढिमरी ब्लाक के आंदोलन से पार्टी ने अपना पल्ला झाड़ लिया और तेलंगाना आंदोलन इससे पहले वापस हो चुका था। बंगाल के कामरेडों से लगातार उनका टकराव होता रहा है।

1964 में पूर्वी बंगाल के दंगों की वजह से जो शरणार्थी सैलाब आया, उसे लेकर पुलिन बाबू ने फिर नये सिरे सेा आंदोलन की शुरुआत कर दी जिसके तहत लखनऊ के चारबाग स्टेशन पर लगातार तीन दिनों तक ट्रेनें रोकी गयीं।

साठ के दशक में ही पुलिन बाबू तराई के सभी समुदायों के नेता के तौर पर स्थापित हो गये थे। वे तराई विकास सहकारिता समिति के उपाध्यक्ष बने सरदार भगत सिंह को हराकर। तो अगली दफा वे निर्विरोध उपाध्यक्ष बने। इस समिति के अध्यक्ष पदेन एसडीएम होते थे। इसी के साथ पूरी तराई के सभी समुदायों को साथ लेकर चलने की इनकी रणनीति मजबूत होती रही।

1971 में मुजीब इंदिरा समझौते के तहत पूर्वी बंगाल से आने वाले शरणार्थियों का पंजीकरण रुक गया। शरणार्थी पुनर्वास का काम अधूरा था और पुनर्वास मंत्रालय खत्म हो गया। तजिंदगी वे इसके खिलाफ लड़ते रहे।

1971 के बांग्लादेश स्वतंत्रता युद्ध के बाद वे फिर ढाका में थे और शरणार्थी समस्या के समाधान के लिए दोनों बंगाल के एकीकरण की मांग कर रहे थे। वे फिर गिरफ्तार कर लिये गये और वहां से रिहा होकर लौटे तो 1971 के मध्यावधि चुनाव में इंदिरा गांधी के समर्थन में बंगालियों को एकजुट करने के लिए सभी दलों के झंडे छोड़ दिये। इसी चुनाव में नैनीताल से केसी पंत भारी मतों से जीते और तबसे लेकर केसी पंत से उनके बहुत गहरे संबंध रहे।

1974 में इंदिरा जी की पहल पर उन्होंने भारत भर में शरणार्थी इलाकों का दौरा किया और उनके बारे में विस्तृत रपट इंदिरा जी को सौंपी। वे शरणार्थियों को सर्वत्र मातृभाषा और संवैधानिक आरक्षण देने की मांग कर रहे थे और भारत भर में बसे शरणार्थियों का पंजीकरण भारतीय नागरिक की हैसियत से करने की मांग कर रहे थे। आपातकाल में भी शरणार्थी समस्याओं को सुलझाने की गरज से वे इंदिरा गांधी के साथ थे। जबकि हम इंदिरा की तानाशाही के खिलाफ जारी लड़ाई से सीधे जुड़े हुए थे। इसी के तहत 1977 के चुनाव में जब वे कांग्रेस के साथ थे, तब हम कांग्रेस के खिलाफ छात्रों और युवाओं का नेतृत्व कर रहे थे। तभी उनके और हमारे रास्ते अलग हो गये थे।

उस चुनाव में बुरी तरह हारने के बाद इंदिरा जी के साथ पुलिन बाबू के सीधे संवाद का सिलसिला बना और इंदिरा गांधी 1980 में सत्ता में वापसी से पहले दिनेशपुर भी आयीं। लेकिन पुलिन बाबू की मांगें मानने के सिलिसिले में उन्होंने क्या किया, हमें मालूम नहीं है। जबकि 1974 से लगातार शरणार्थियों की नागरिकता, उनकी मातृभाषा के अधिकार और संवैधानिक आरक्षण की मांग लेकर वे बार बार भारत भर के शरणार्थी इलाकों में भटकते रहे थे। इंदिराजी के संपर्क में होने के बावजूद कांग्रेस ने तब से लेकर आज तक शरणार्थियों की बुनियादी समस्याओं को सुलझाने में कोई पहल नहीं की। फिर भी वे तिवारी और पंत के भरोसे थे, यह हमारे लिए अबूझ पहेली रही है।

31 अक्तूबर 1984 को इंदिरा गांधी की हत्या के बाद उन्हें देखने पुलिन बाबू अस्पताल भी पहुंचे थे। वे दिल्ली में ही थे उस वक्त। तब तक दिल्ली में दंगा शुरु हो चुका था। नारायण दत्त तिवारी उन्हें अस्पताल से सुरक्षित अपने निवास तक ले गये थे।

इस मित्रता को झटका तब लगा, जब 1984 में केसी पंत को टिकट नहीं मिला तो पुलिन बाबू तिवारी की ओर से पंत के खिलाफ खड़े सत्येंद्र गुड़िया के खिलाफ लोकसभा चुनाव में खड़े हो गये तो उन्हें महज दो हजार वोट ही मिले। लेकिन पुलिन बाबू को आखिरी वक्त देखने वाले वे ही तिवारी थे।

अस्सी के दशक में शरणार्थियों के खिलाफ असम और त्रिपुरा में हुए खूनखराबा के विदेशी हटाओ आंदोलन से पुलिन बाबू शरणार्थियों की नागरिकता को लेकर बेहद परेशान हो गये और वे देश भर में शरणार्थियों को एकजुट करने में लगे रहे। उन्हें यूपी में दूसरे लोगों का समर्थन मिल गया लेकिन असम की समस्या से बाकी देश के शरणार्थी बेपरवाह रहे 2003 के नागरिकता संशोधन कानून के तहत उनकी नागरिकता छीन जाने तक।

आखिरी दिनों में पुलिन बाबू एकदम अकेले हो गये थे।

दूसरों की क्या कहें, हम भी उनके साथ नहीं थे। हमने भी 2003 से पहले शरणार्थियों की नागरिकता को कोई समस्या नहीं माना। हम सभी पुलिन बाबू की चिंता बेवजह मान रहे थे।

बहरहाल साठ के दशक में अखिल भारतीय उद्वास्तु समिति बनी, जिसके पुलिन बाबू अध्यक्ष थे। लेकिन वे राष्ट्रव्यापी संगठन बना नहीं सके।

इसी के मध्य साठ के दशक में वे चौधरी चरण सिंह के किसान समाज की राष्ट्रीय कार्यकारिणी समिति में थे तो 1969 में अटल बिहारी वाजपेयी की पहल पर वे भारतीय जनसंघ में शामिल हो गये, लेकिन जनसंघ के राष्ट्रीय मंच पर उन्हें अटल जी के वायदे के मुताबिक शरणार्थी समस्या पर कुछ कहने की इजाजत नहीं दी गयी तो साल भर में उन्होंने जनसंघ छोड़ दिया।

1971 में दस गावों के विजयनगर ग्रामसभा के सभापति वे निर्विरोध चुने गये। लेकिन फिर उसे भी तौबा कर लिया।

1973 में मेरे नैनीताल जीआईसी मार्फत डीएसबी कालेज परिसर में दाखिले के बाद मैं उनके किसी आंदोलन में शामिल नहीं हो पाया, पर चिपको आंदोलन और उत्तराखंड संघर्ष वाहिनी के हर आंदोलन में वे हमारे साथ थे। हमारे विरोध के बावजूद वे पृथक उत्तराखंड का समर्थन करने लगे थे।

नारायण दत्त तिवारी के मुख्यमंत्री बनने के बाद बंगाली शरणार्थियों की जमीन से बेदखली के मामलों की जांच के लिए एक तीन सदस्यीय आयोग बना, जिसके सदस्य थे, पुलिन बाबू, सरदार भगत सिंह और हरिपद विश्वास।

असम आंदोलन के मद्देनजर देश भर में बंगाली शरणार्थियों की नागरिकता छिनने की आशंका से पुलिन बाबू ने 1983 में दिनेशपुर में अखिल भारतीय शरणार्थी सम्मेलन का आयोजन किया तो सत्तर के दशक से मृत्युपर्यंत भारत के कोने-कोने में शरणार्थी आंदोलनों में निरंतर सक्रिय रहे।

1993 में वे फिर किसी को कुछ बताये बिना बांग्लादेश गये। वे चाहते थे कि किसी तरह से बांग्लादेश से आने वाला शरणार्थी सैलाब बंद हो। लेकिन शरणार्थियों का राष्ट्रीय संगठन बनाने के अपने प्रयासों में उन्हें कभी कामयाबी नहीं मिली। जिसकी वजह से शरणार्थी जहां के तहां रह गये। बांग्लादेश तक उनका संदेश कभी नहीं पहुंचा।

2001 में पता चला कि उन्हें कैंसर है और 12 जून 2001 को कैंसर की वजह से उनकी मृत्यु हो गयी।

पलाश विश्वास

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