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himanshu joshi jouranalism हिमांशु जोशी, पत्रकारिता शोध छात्र, उत्तराखंड।

कोरोना डायरी से जन्मदिन डायरी बनने की रोचक कहानी

जन्मदिन की डायरी : पत्रकारिता का एक दस्तावेज़

Birthday Diary: A Journalism Document

पिछले मई जब क़लम को दुनिया की सबसे बड़ी ताकत मानते लिखना शुरू किया था तब यह समझ नहीं आया था कि यह मेरा भ्रम है या विश्वास। तब से आज एक साल पूरा हो गया और कोरोना काल में बहुत बार ऐसा लगा कि यह मेरा भ्रम ही था पर एक साल होते-होते मुझे यह विश्वास हो चला है कि क़लम दुनिया के किसी भी हथियार से बड़ी शक्ति है।

पिछले मई लिखना शुरू किया तो आज मैंने निर्णय ले लिया है कि अपने जन्मदिन के साथ ही हर वर्ष अपनी पत्रकारिता की सालगिरह भी मनाया करूंगा।

सामान्य दिनों से लॉकडाउन के दिनों की ओर गुज़रती, रास्तों में चलते सड़क दुर्घटनाओं के कारण विचारती हुई आगे बढ़ती यह कहानी कभी स्वच्छ भारत की वास्तविक तस्वीर दिखाती है तो कभी धौनी के छक्के-चौके।

कोरोना डायरी से जन्मदिन डायरी बनने की यह कहानी रोचक है और कुछ दिन बाद एक कॉलेज के प्रथम वर्ष के छात्रों को ऑनलाइन पढ़ाना है तो यह जन्मदिन डायरी शायद उनके और उनके जैसे कई अन्य पत्रकारिता छात्रों के लिए एक आवश्यक दस्तावेज़ भी बन सकती है।

पत्रकार दो तरह के होते हैं, पहले आलीशान स्टूडियो में चमक-धमक के साथ बैठे एंकर और ग्राउंड रिपोर्टिंग करते माइक, कैमरा पकड़े उनके सहयोगी।

दूसरे आईआईएमसी के छात्र रहे मनदीप पुनिया की तरह जो किसान आंदोलन में गिरफ्तार होने के बाद जेल में अपनी जांघ पर रिपोर्टिंग कर आते हैं। यही मनदीप प्रतिष्ठित कारवां मैगज़ीन में भी अपना नाम छपवा चुके हैं।

मुझे पता है पत्रकारिता के अधिकतर छात्रों का सपना पहले तरह के पत्रकार बनने का ही होता है। पर मैं मनदीप की तरह वाला पत्रकार, लेखक बनना चाहता हूं।

विधवा पुनर्विवाह को लेकर मैं हमेशा से लिखना चाहता था, विद्यालय के बाद जंग लगी क़लम सालों बाद कोरोना काल में मई 2020 के दौरान चली तो पहला आलेख ही अमर उजाला वेब में प्रकाशित हो गया।

नैनीताल में रहकर नैनीताल समाचार को जो न समझे तो वह पत्रकार कैसा, चला गया 25 मई को नैनीताल समाचार या यूं कहें राजीव लोचन साह से मिलने।

भविष्य की शुभकानाओं सहित नैनीताल समाचार के सफ़र पर छपी एक किताब मुझे उनकी ओर से भेंट पर मिली।

28 मई 2020 में पंजाब केसरी वेब पर ‘हम अपना जन्मदिन क्यों मनाते हैं’ आलेख के बाद हिंदी पत्रकारिता दिवस पर लिखा आलेख नैनीताल समाचार के वेब पोर्टल पर था।

इसके बाद विश्व साइकिल दिवस, आरोग्य सेतु एप की उपयोगिता और अमरीका में चल रहे अश्वेत आंदोलनों पर लिखे आलेख भी अमर उजाला वेब पर थे।

इसके बाद उत्तराखंड के पहले दैनिक अखबार उत्तर उजाला में मेरे आलेखों के छपने की शुरुआत हुई, सड़क दुर्घटनाओं और पलायन के मुद्दों पर आलेख प्रकाशित हुए।

कोरोना काल में उत्तराखंड के हालात पर की गई रिपोर्टिंग को नैनीताल समाचार के साथ रीजनल रिपोर्टर में भी जगह मिली।

विकास दूबे कांड पर पुलिसकर्मियों के शहीद होने की वजह तलाशता आलेख भी उत्तर उजाला और नैनीताल समाचार में था।

कोरोना काल में बुजुर्गों की स्थिति पर लिखा आलेख अमर उजाला वेब में तो राजीव लोचन साह के द्वारा मिलाए गए समाजसेवी बसु राय के जीवन पर लिखा अमर उजाला प्रिंट में प्रकाशित हुआ।

बसु राय का साक्षात्कार लिखते समय मैं खुद पर विश्वास नहीं कर पा रहा था जिस पर राजीव लोचन साह ने मुझसे कहा ‘दिमाग पर कोई दबाव मत रखो और जल्दबाजी तो कतई मत करो। तीन-चार बार साथ बैठो और कम से कम पन्द्रह दिन लगाओ।’

उसका परिणाम ऊपर लिखा है।

अगस्त आते-आते धोनी के रिटायरमेंट पर लिखा आलेख एक पुराने मित्र के समाचार वेब पोर्टल लाइवएसकेजी न्यूज़ पर भी पब्लिश हुआ।

इसके बाद सर्वोदय समाज से मेरे परिचय की शुरुआत फिर से राजीव लोचन साह द्वारा ही मिलाए गए अनिरुद्ध जडेजा के साक्षात्कार के साथ हुई, उन पर लिखा आलेख न्यूज़लॉन्ड्री पर पब्लिश हुआ।

स्वतन्त्र पत्रकारिता करते हुए आप वर्तमान हालात में पैसा कमाने की नहीं सोच सकते पर कर्म करते रहने से फल मिलता ही है तो मुझे भी राजीव लोचन साह के बालसखा के जीवन पर किताब लिखने का अवसर मिला, अपनी किताब छपना शायद किसी किताब पढ़ने वाले का सबसे बड़ा सपना होता है।

एक रिपोर्ट का अंग्रेज़ी से हिंदी अनुवाद ठीक से न कर पाने पर मैं निराश था तो राजीव लोचन साह ने मुझसे कहा कि ‘तुम में बहुत अधिक क्षमता है। मैं तो इस बहाने तुम्हें तरीका सिखाने की कोशिश कर रहा था।’

कुछ समय बाद मैं बिना लक्षणों के कोरोना पॉजिटिव हुआ और वहां राजीव लोचन साह के उन्हीं शब्दों को याद कर रोज़ हिम्मत कर अपने हालातों पर डायरी लिखता रहा जो सत्याग्रह ने प्रकाशित करने के लिए कहा तो पर की नहीं और वह भड़ास4मीडिया पर पब्लिश हुई।

वापस आने पर नैनीताल समाचार के तालों की चाबी हमेशा मेरे लिए उपलब्ध रहने लगी, किसी नए पर उनका इतना भरोसा ही शायद मुझे अच्छा करने के लिए प्रेरित कर रहा था।

नैनीताल समाचार के साथ काम करते मैं पत्रकारिता की अलग विधाओं से परिचित हो रहा था, साक्षात्कार के बाद नैनीताल में स्वच्छता दिवस पर रिपोर्टिंग करना मेरी पत्रकारिता में अब तक का सबसे सुखद अनुभव था जब सामाजिक कार्यकर्ता जय जोशी द्वारा मुझे यह कहा गया कि आपके आलेख ने हमारे अंदर जोश भरा और बेहतर करने के लिए प्रेरित किया।

राजीव लोचन साह ने इस पर मुझे प्रतिभाशाली लिक्खाड़ कहा।

उसके बाद स्वरोज़गार पर कुछ उदाहरण, संजीव भगत की स्वरोज़गार के लिए प्रेरित करती कहानी और उत्तराखंड दिवस पर लिखा आलेख नैनीताल समाचार प्रिंट में प्रकाशित हुए।

कोरोना काल की शुरुआत में प्रवासियों पर जमकर शोर हुआ पर 2020 के अंत में यह शोर ख़त्म हो गया था उस पर ग्राउंड रिपोर्ट लेकर लिखा आलेख उत्तर उजाला में आया और साल का अंत पहली बार प्लाज़्मा दान करने के बाद लिखे आलेख के विभिन्न जगहों पर प्रकाशित होने के साथ हुआ।

2021 में मेरे पास नए कार्य थे पर कोरोना की आने वाली दूसरी लहर से हम सब अंजान थे।

ज्ञानिमा पर अपने 2021 के सपने लिखने का मौका मिला।

पिछले साल अमर उजाला वेब में छपी अपनी कविता पर नज़र पड़ी तो ख़ाकी पर एक कविता लिखी जो उत्तर उजाला में प्रकाशित हुई।

फ़रवरी माह में दूसरी बार प्लाज़्मा दान करने के बाद प्लाज़्मा को गम्भीरता से न लेने पर लिखा आलेख और बाल मज़दूरों पर लिखी कविता उत्तर उजाला पर प्रकाशित हुई।

कोरोना काल में समाचार संस्थान बड़ी मुसीबत में चल रहे हैं, उत्तराखंड में मशरूम गर्ल नाम से मशहूर दिव्या रावत द्वारा आयोजित निबंध प्रतियोगिता में जीती इनाम राशि मैंने कुछ संस्थान को सहयोग के रूप में भी दी। सच्ची पत्रकारिता देखने, पढ़ने के लिए यह आवश्यक है क्योंकि छोटे मीडिया संस्थानों के पास फंडिंग कराने वाला कोई नहीं होता।

क़लम निखरती गई तो सबलोग, हस्तक्षेप, मीडिया स्वराज, हिंदी क्विंट, जनज्वार, ऑपइंडिया जैसी वेबसाइट पर भी आलेख आने लगे।

मार्च में उत्तराखंड की राजनीति, भाषा पर आलेख लिखे तो विनोद कापड़ी की फ़िल्म पर समीक्षा भी।

‘फिर से भगत सिंह’ कविता उत्तर उजाला में प्रकाशित हुई।

अप्रैल माह में उत्तराखंड के जंगलों की आग पर दिल्ली की नुपुर के साथ लिखा आलेख, मीडिया की दुर्दशा और कोरोना से समुदाय की जंग पर आलेख प्रकाशित हुए।

इसके साथ ही ‘मुझे लगा अब उठना चाहिए’ कविता भी लिखी। गांधीवादी अमरनाथ भाई और राजीव लोचन साह के सुझाने पर मातृ सदन के लोगों से भी मिलना हुआ।

मई माह पत्रकारिता में अब तक के सबसे व्यस्त महीनों में रहा है, ज्यादा लिखा तो हिलांश, हिंदी क्विंट जैसे प्रयोगात्मक मीडिया संस्थानों से भी परिचय हुआ है। डॉक्टरों और पुलिसकर्मियों पर लिखी वायरल कविताओं सहित पांच कविताएं अलग-अलग जगह प्रकाशित हुई, डेलीहंट पर जन ख़बर नाम से अपना पेज़ भी बनाया है।

सरदाना के जाने पर लिखे आलेख से शुरूआत होने के बाद soulify, पर्यावरण प्रदूषण, सब चलता है ने देश का यह हाल किया, उत्तराखंड में कोरोना के ताज़ा हालात नाम से आलेख प्रकाशित हुए।

प्रोफेसर लाल बहादुर वर्मा और सुंदर लाल बहुगुणा को श्रद्धांजलि देने वाले आलेख भी लिखे।

कुछ आलेखों ने लोगों को जागरूक करने का कार्य किया है तो कुछ ने शिक्षित।

यही तो पत्रकारिता का उद्देश्य है।

मोबाइल टॉवर से मर रही गौरैयों, यूट्यूब पर चौबीस घण्टे विज्ञान की क्लास चला गरीबों के लिए धन जुटाने वाले लड़के और ऐसे बहुत से आलेख अभी मुझे लिखने हैं जो समाज में कुछ बदलाव तो ला ही सकते हैं।

स्वतन्त्र तौर पर लगातार एक साल लिखने के बाद इसी महीने एक- दो जगह लिखने के बदले पैसा मिलने की बात भी हुई पर उसके लिए मैंने अभी हामी नहीं भरी है क्योंकि जब तक हो सकेगा मैं बिना भुगतान लिए ही लिखना चाहूंगा।(अन्य युवाओं को मैं यह सुझाव नहीं दूंगा)

ख़बर हमारे चारों ओर है।

पढ़ने के बाद उन पर विश्वास करने से पहले उन्हें समझना और परखना जरूरी है। यही सावधानी हमें कुछ लिखने से पहले भी बरतनी चाहिए। आप पर किसी एक विचारधारा से जुड़ने के आरोप भी लगते हैं, यह कहा जाता है कि यह निष्पक्ष पत्रकारिता नहीं है। यही आरोप मुझ पर भी लगे पर जो आपको सत्य लगता है वही लिखना और बोलना चाहिए क्योंकि वही आत्मसंतुष्टि देता है।

इस साल के अंत तक गांधी को पढ़ने के साथ बहुत सी अन्य पुस्तकें भी पढ़ना चाहता हूं ताकि अपनी आने वाली किताब पाठकों के पढ़ने लायक लिख सकूं।

पत्रकारिता में कोई सुझाव चाहने पर मेरी एक कॉल पर किसी भी समय सुझाव देने तैयार रहने वाले अपने सारे हितैषियों और अपने प्रिय समीक्षकों से सीखते रहूं (एक-एक का नाम लिखना उचित नहीं है) यही कोशिश रहेगी।

अंत में यह कि अब मैं यह समझ गया हूं कि किसी बड़े संस्थान में आलेख प्रकाशित होना बड़ी बात नहीं है, मेरे लिए ‘जन ख़बर’ में आलेख छपना भी उतनी बड़ी बात है जितनी ‘हिंदी क्विंट’ में।

परिवर्तन बिना किसी संस्थान के नाम लिखे एक सादे कागज़ में लिख कर भी आ सकता है।

हिमांशु जोशी, उत्तराखंड।

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