माधवराव के खिलाफ चुनाव लड़े बादल सरोज ने कुछ यूं याद किया, #कहाँ_माधवराव_और_कहाँ_टटपुँजिया_चिंदीचोर

#असली_सिंधिया_को_याद_करते_हुये

ग्वालियरी होने के नाते पांच दशक के राजनीतिक जीवन में सबसे ज्यादा भिड़ंत किसी से हुयी है तो मिल (बिड़ला मिल्स) के बाद वह ग्वालियर का महल था; माधवराव सिंधिया इसके प्रमुख थे। उनके महल के बगीचे और रसोई, ड्राइवरी, चौकीदारी और रखरखाव, छतरियों के कर्मचारियों की यूनियन से किले और मोतीमहल के सिंधिया स्कूलों के कर्मचारियों की यूनियन बनाने से लेकर राजनीतिक मंच पर उनसे मुकाबले हुए।

1989 में हुए लोकसभा के चुनाव में जब उनके मुकाबले सीपीएम प्रत्याशी बने तो सचमुच में उनकी सभाओं से कहीं ज्यादा बड़ी सभाएं और उनमें दिए अपने कुफ़्र भाषण अभी तक याद हैं।

सारे सामंती तामझाम और लवाजमे के बावजूद माधवराव सिंधिया ने अपने चापलूसों के अलावा और किसी के साथ कभी अहंकार नहीं दिखाया। हमारे साथ तो खैर सवाल ही कहाँ उठता है।

उनके खिलाफ लड़ाई आखिर तक चली किन्तु वह व्यक्ति केंद्रित कभी नहीं हुयी। संवादहीनता की स्थिति तो कभी नहीं आयी।

माधवराव पूरी दृढ़ता के साथ भाजपा और संघ के खिलाफ थे। दर्जनों बार शैली (दिवंगत शैलेन्द्र शैली) और हम लोगों के साथ गए डेलीगेशन से मिलने के बाद हमें रोककर उन्होंने अपनी पीड़ा साझी की। वे कहते थे आधे महल की संपत्ति ड़पने के लिए इन संघियों ने आंग्रे के साथ मिलकर माँ बेटे को अलग कर दिया, ये देश को भी तोड़ेंगे।

ग्वालियर के सीपीएम दफ्तर पर एक सुबह संघियों के हमले के बाद दिल्ली से सबसे पहला फोन उन्हीं का आया था – अगले दिन शाम को वे ग्वालियर आ भी गए थे, हमले की निंदा में बयान जारी करने और हम लोगों के साथ कलेक्टर – एसपी की मीटिंग कराने ।

कुछ वक़्त के लिए कांग्रेस से अलग हुए भी तो अपनी पार्टी बनाई – भेड़ियों की जमात में नहीं गए।

किस्से अनेक हैं, अभी बस इतना।

कहाँ एक कट्टर संघ आलोचक और सच्चे धर्मनिरपेक्ष माधवराव और कहाँ झूठी और बासी चाशनी के लिए शरणागत हुए महल के मौजूदा किरायेदार !!

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बादल सरोज

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उपाध्याय अमलेन्दु:
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