भारत में सबसे बड़े जल प्रवाह ब्रह्मपुत्र को जानिए

भारत में सबसे बड़े जल प्रवाह ब्रह्मपुत्र को जानिए

ब्रह्मपुत्र नदी का इतिहास

ब्रह्मपुत्र के बिना पूर्वोत्तर भारत की कल्पना अधूरी है

जैसे पूर्वोत्तर भारत के सात राज्यों के बिना भारत के बाजूदार नक्शे की कल्पना अधूरी है, वैसे ही ब्रह्मपुत्र (Brahmaputra in Hindi) के बिना पूर्वोत्तर भारत का कल्पनालोक भी अधूरा ही रहने वाला है। ब्रह्मपुत्र, पूर्वोत्तर भारत की संस्कृति भी है, सभ्यता भी और अस्मिता भी।

ब्रह्मपुत्र बर्मी भी है, द्रविड़ भी, मंगोल भी, तिब्बती भी, आर्य भी, अनार्य भी, अहोम भी और मुगल भी। उसने खुद अपनी आँखों से इन तमाम संस्कृतियों को आपस में लड़ते, मिलते, बिछुड़ते और बढ़ते देखा है। तमाम बसवाटों को बसते-उजड़ते देखने का सुख व दर्द। दोनों का एहसास ब्रह्मपुत्र में आज भी जिंदा है।

ब्रह्मपुत्र, पूर्वोत्तर भारत की लोकास्थाओं में भी है, लोकगीतों में भी और लोकगाथाओं में भी।

ब्रह्मपुत्र, भूपेन दा का संगीत भी है और प्रकृति का स्वर प्रतिनिधि भी। पूर्वोत्तर की रमणियों का सौंदर्य भी ब्रह्मपुत्र में प्रतिबिम्बित होता है और आदिवासियों का प्रकृति प्रेम भी और गौरवनाद भी।

आस्थावानों के लिये ब्रह्मपुत्र, ब्रह्म का पुत्र भी है और बूढ़ा लुइत भी। लुइत यानी लोहित यानी रक्तिम।

भारत में ब्रह्म के प्रति आस्था का प्रतीक मंदिर भी एकमेव है और ब्रह्म का पुत्र कहलाने वाला प्रवाह भी एकमेव। भौतिक विकास की धारा बहाने वालों की योजना में भी ब्रह्मपुत्र एक जरूरत की तरह विद्यमान है, चूँकि एक नद के रूप में ब्रह्मपुत्र एक भौतिकी भी है, भूगोल भी, जैविकी भी, रोजग़ार भी, जीवन भी, आजीविका भी, संस्कृति और सभ्यता भी। ब्रह्मपुत्र का यात्रा मार्ग इसका जीता-जागता प्रमाण है।

कालिका पुराण के कथानक में ब्रह्मपुत्र

कालिका पुराण में कथानक है कि ब्रह्मपुत्र ने खुद रक्तिम होकर ब्रह्मर्षि परशुराम को पापमुक्त किया। पिता जमदग्नि को ब्रह्मर्षि परशुराम की माता रेणुका (Renuka, mother of Brahmarishi Parashurama) के चरित्र पर संदेह हुआ। पिता की आदेश पालना के लिये ब्रह्मर्षि परशुराम ने माँ रेणुका का वध तो कर दिया, किंतु पाप का एहसास दिलाने के लिये कठोर कुठार परशुराम के हाथ से चिपक गया।

अब पापमुक्ति कैसे हो ? इसके लिये परशुराम, ब्रह्मपुत्र की शरण में आये।

ब्रह्मपुत्र के प्रवाह में कुठार धोने से ब्रह्मपुत्र खुद रक्तिम ज़रूर हो गया, लेकिन ब्रह्मर्षि परशुराम को पापमुक्त कर गया।

यह कथानक प्रमाण है, ब्रह्मपुत्र की पापनाशिनी शक्ति का, जोकि किसी भी प्रवाह को यूँ ही हासिल नहीं होती। अरबों सूक्ष्म जीव, वनस्पतियाँ मिट्टी, पत्थर, वायु और प्रकाश की संयुक्त शक्तियाँ मिलकर किसी प्रवाह को पापनाशक बना पाती हैं। इस नाते इस कथानक को हम परशुराम काल में ब्रह्मपुत्र की समृद्ध पारिस्थितिकी का प्रमाण कह सकते हैं।

कीर्ति विजेता ब्रह्मपुत्र (Glory Winner Brahmaputra)

नद के रूप में भी ब्रह्मपुत्र के सीने पर कई कीर्तिपदक आज भी सुसज्जित हैं। चार हज़ार फीट की ऊँचाई पर बहने वाला दुनिया का एकमात्र प्रवाह है ब्रह्मपुत्र। जल की मात्रा के आधार पर देखें, तो भारत में सबसे बड़ा जल प्रवाह (largest water flow in india) ही है।

वेग की तीव्रता (19,800 क्युबिक मीटर प्रति सेकेण्ड) के आधार पर देखें, तो ब्रह्मपुत्र दुनिया का पाँचवाँ सबसे शक्तिशाली जलप्रवाह है। बाढ़ की स्थिति में यह ब्रह्मपुत्र के वेग की तीव्रता (intensity of velocity of Brahmaputra in case of flood) एक लाख क्युबिक मीटर प्रति सेकेण्ड तक जाते देखा गया है। यह वेग की तीव्रता ही है कि ब्रह्मपुत्र एक ऐसे अनोखे प्रवाह के रूप में भी चिन्हित है, जो धारा के विपरीत ज्वार पैदा करने की शक्ति रखता है।

ब्रह्मपुत्र की औसत गहराई 124 फीट और अधिकतम गहराई 380 फीट आंकी गई है।

ब्रह्मपुत्र : दुनिया का पाँचवाँ सबसे शक्तिशाली जलप्रवाह

2906 किलोमीटर लंबी यात्रा करने के कारण ब्रह्मपुत्र, दुनिया के सबसे लंबे प्रवाहों में से एक माना गया है। ब्रह्मपुत्र, जहाँ एक ओर दुनिया के सबसे बड़े बसावटयुक्त नदद्वीप – माजुली की रचना करने का गौरव रखता है, वहीं एशिया के सबसे छोटे बसवाटयुक्त नदद्वीप उमानंद की रचना का गौरव भी ब्रह्मपुत्र के हिस्से में ही है।

सुंदरवन के निर्माण में ब्रह्मपुत्र का योगदान

सुंदरवन, दुनिया का सबसे बड़ा डेल्टा क्षेत्र है। सच्ची बात यह है कि इतना बड़ा डेल्टा क्षेत्र निर्मित करना अकेले गंगा के बस का भी नहीं था। ब्रह्मपुत्र ने गंगा के साथ मिलकर सुंदरवन का निर्माण किया।

इतना गौरव ! इतने सारे कीर्तिमान !! इससे यह तो स्पष्ट है कि ब्रह्मपुत्र, सिर्फ एक नद तो नहीं ही है; यह कुछ और भी है।

जिज्ञासायें कई होंगी, चूँकि इतनी सारी खूबियों के बावजूद ब्रह्मपुत्र एक ऐसा प्रवाह है, जिसके बारे में दुनिया को जानकारी आज भी काफी कम है।

भारत की सत्ता और मीडिया का केन्द्र असम, सिक्किम, नगालैण्ड, मिजोरम में न होकर सदैव दिल्ली में रहा; इस नाते पूर्वोत्तर के बारे में शेष भारतवासी यूँ भी कम जानते हैं। लिहाजा, इस श्रृंखला में हम ब्रह्मपुत्र को जानने की ज्यादा से ज्यादा कोशिश करेंगे।

आपके पास कोई जानकारी हो, तो आप भी साझा करें; हमें भेजें; हमारी कोशिश को अंजाम तक पहुँचायें। फिलहाल, हम यह जानने की कोशिश करते हैं कि ब्रह्मपुत्र आता कहाँ से है और जाता कहाँ है?

समान क्षेत्र से उपजा ब्रह्मपुत्र और प्रथम मानव

परिमण्डलेर्मध्ये मेरुरुत्तम पर्वत:।

तत: सर्व: समुत्पन्ना वृत्तयो द्विजसत्तम:।।

हिमालयाधरनोऽम ख्यातो लोकेषु पावक:।

अर्धयोजन विस्तार: पंच योजन मायत:।।

चरक संहिता का उक्त सूत्र, मेरु पर्वत स्थित आधा योजन यानी चार मील चौड़े और पाँच योजन यानी चालीस मील लंबे क्षेत्र को आदिमानव की उत्पत्ति का क्षेत्र मानती है।

महर्षि दयानंद रचित सत्यार्थ प्रकाश के आठवें समुल्लास में सृष्टि की रचना त्रिविष्टप यानी तिब्बत पर्वत बताया गया है।

महाभारत कथा भी देविका नदी के पश्चिम मानसरोवर क्षेत्र को मानव जीवन की नर्सरी मानती है। इस क्षेत्र में देविका के अलावा ऐरावती, वितस्ता, विशाला आदि नदियों का उल्लेख किया गया है।

वैज्ञानिक, जिस समशीतोष्ण जलवायु को मानव उत्पत्ति का क्षेत्र मानते हैं, तिब्बत के दक्षिण-पश्चिमी हिस्से में स्थित मानसरोवर ऐसा ही क्षेत्र है।

अभी तक मिले साक्ष्यों के आधार पर सृष्टि में मानव उत्पत्ति का मूल स्थान तिब्बत ही है। मान्यता है कि सृष्टि की रचना ब्रह्म ने की। इस नाते मानव, ब्रह्म का पुत्र ही तो हुआ। संभवत: इसी नाते हमारे ज्ञानी पूर्वजों ने मानव उत्पत्ति के मूल स्थान से निकलने वाले प्रवाह का नाम ब्रह्मपुत्र रखा।

वैसे कथानक यह भी है कि अमोघा ने जिस संतान को जन्म दिया, उसे ब्रह्मपुत्र कहा गया। दूसरे कथानक के अनुसार ऋषि शान्तनु आश्रम के निकट कुण्ड का नाम ब्रह्मकुण्ड था। उससे संबंध होने के कारण इसका नाम ब्रह्मपुत्र हुआ।

गौर कीजिए कि लंबे समय तक यही मान्यता रही कि ब्रह्मपुत्र का मूल स्रोत 100 किलोमीटर लंबा चेमयंगडंग ग्लेशियर है। चेमयंगडंग ग्लेशियर, मानसरोवर झील के उत्तर पूर्वी इलाके में स्थित है।

बाद में पता चला कि ब्रह्मपुत्र का मूल स्रोत, आंगसी ग्लेशियर है। हिंदी भाषा में इसे आप आंगसी हिमनद कह सकते हैं। आंगसी हिमनद, हिमालय के उत्तरी भू-भाग में स्थित बुरांग में स्थित है। बुरांग भी तिब्बत का ही एक हिस्सा है। इस प्रकार दोनों ही जानकारियों के आधार पर ब्रह्मपुत्र की उत्पत्ति का मूल क्षेत्र वही है, जो मानव का यानी तिब्बत। ब्रह्मपुत्र के हिस्से में दर्ज एक कीर्तिगौरव यह भी है।

क्षेत्र बदला, नाम बदला

Aerial view of cloudscape
Aerial view of cloudscape : Photo by Pixabay on Pexels.com

भारत- नेपाल सीमा का पूर्वी क्षेत्र, गंगा बेसिन के ऊपर तिब्बत का दक्षिणी-मध्य भूभाग, पटकेई-बूम की पहाडिय़ाँ, उत्तरी ढाल, असम का मैदान और फिर बांग्लादेश का उत्तरी हिस्सा ब्रह्मपुत्र का यात्रा मार्ग है।

तिब्बत में 1625 किलोमीटर, भारत में 918 किलोमीटर और बांग्ला देश में 363 किलोमीटर लंबा है ब्रह्मपुत्र का यात्रा मार्ग (itinerary of brahmaputra)

अपने मूल स्थान पर यह पूर्व में प्रवाहित होने वाला प्रवाह है। फिर थोड़ा उत्तर की ओर उठता हुआ, फिर दक्षिण की ओर गिरता हुआ। नक्शे में देखें। इसी तरह थोड़ी-थोड़ी दूरी पर दिशा बदलते हुए यह भारत में प्रवेश करता है।

भारत में प्रवेश करते ही ब्रह्मपुत्र एकदम से दक्षिण की ओर नीचे उतरता और फिर पूर्व से पश्चिमी ओर बहता प्रवाह हो जाता है। बांग्ला देश में प्रवेश करने पर यह पुन: दक्षिण की ओर सीधे उतरता दिखता है। समुद्र में मिलने से पहले एक बार फिर दिशा बदलता है; तब यह दक्षिण-पूर्वी प्रवाह हो जाता है।

दुनिया में बहुत कम प्रवाह ऐसे होंगे, क्षेत्र के साथ जिनका नाम इतनी बार बदलता हो, जितना कि ब्रह्मपुत्र का। गौर कीजिए कि ब्रह्मपुत्र नद को प्राचीन चीनी में पिनयिन और तिब्बती में ‘यारलंग सांगपो के नाम से पुकारा जाता है।

अरुणाचल प्रदेश में दिहांग और सियांग, असम घाटी में लुइत और ब्रह्मपुत्र तथा बांग्लादेश में प्रवेश के बाद इसे यमुना नाम मिलता है। बोडो लोग इसे बुरलंग-बुथुर कहकर भी पुकारते हैं।

बांग्लादेश में पद्मा नदी से मिलने के साथ ही ब्रह्मपुत्र, नये रूप-स्वरूप और नाम के साथ नया स्वांग रचता है  यह नद से नदी हो जाता है। नाम रखा जाता है – देवी पद्मा। मन नहीं मानता, तो मेघना नाम धारणकर फिर निकल पड़ता है आगे समुद्र की गहराइयों को अपना सर्वस्व सौंपने। अनुचित न होगा यदि मैं कहूँ कि नये-नये रूप और नये-नये नाम धरने वाला स्वांग कलाकार है, अपना ब्रह्मपुत्र।

-अरुण तिवारी

Know about the largest water flow in India, the Brahmaputra

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