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ब्रजभूषण शरण सिंह का इस्तीफा : भाजपा में इस्तीफे नहीं होते; सिर्फ काण्ड होते हैं

ब्रजभूषण शरण सिंह का इस्तीफा : भाजपा में इस्तीफे नहीं होते; सिर्फ काण्ड होते हैं

कल सब कुछ हुआ मगर ब्रजभूषण शरण सिंह का इस्तीफा नहीं हुआ

कुश्ती के मुकाबलों में देश और दुनिया में अपने खेल कौशल की धाक बनाने वाले, कई विश्वपदक लाने वाले भारत के महिला पुरुष पहलवान तीन दिन तक दिल्ली में जंतर मंतर पर बैठे रहे। इस धरने के जरिये नामवर महिला पहलवानों ने कुश्ती फेडरेशन के बुढ़ाये अध्यक्ष ब्रजभूषण शरण सिंह की कुंठित वासना और यौन उत्पीड़न की घटनाओं को उजागर किया। पूरा देश शर्मसार भी हुआ क्षुब्ध और आक्रोशित भी हुआ। भाजपा सांसद बृज भूषण शरण सिंह के आचरण के बारे में जिस तरह के आरोप इन पहलवान युवतियों ने लगाए वे विचलित करने वाले थे। इनसे भारतीय कुश्ती फेडरेशन की डर्टी पिकचर पूरे देश के सामने आयी।

कल शनिवार को खेल मंत्री अनुराग ठाकुर के साथ कथित रूप से 7 घंटे तक हुयी चर्चा के बाद धरना उठ गया है, या उठवा दिया गया है। एक कमेटी सरकार ने बनाई है – एक कमेटी इंडियन ओलिंपिक एसोसिएशन ने बनाई है। इन दोनों की जांच की शर्तें – टर्म्स ऑफ़ इन्क्वायरी – क्या होंगी यह सार्वजनिक नहीं हुआ है।

धरना उठ गया है लेकिन लड़कियां संतुष्ट नहीं हैं

लड़कियों का कहना है कि नामजद दोषी के इस्तीफे और उसे जेल भेजे बिना की जाने वाली जांच का कोई मतलब नहीं है। उनका क्षोभ जायज है – उसकी अनुगूंज भी हुयी है। गोंडा – बृजभूषण शरण सिंह के गोंडा – में होने वाली नेशनल चैंपियनशिप में हिस्सा लेने गए दिल्ली, हरियाणा और पंजाब के 200 से ज्यादा पहलवानों ने चैंपियनशिप में भाग लेने से इंकार कर दिया है। बिना खेले लौट आये हैं।

वहीं यौन शोषण के गंभीर आरोपों से घिरे ब्रजभूषण शरण सिंह ने खांटी भाजपा स्टाइल में इस्तीफा देने से न केवल मना कर दिया है, बल्कि धमकाते हुए यहां तक कहा है कि “मैं मुंह खोल दूंगा तो सुनामी आ जाएगी।” अब उनकी यह चेतावनी इसी तरह की लीलाओं में लिप्त अपने नेताओं के लिए है या महिला खिलाड़ियों के लिए, यह अभी साफ़ नही हुआ है। बहरहाल इसमें भी उन्होंने ध्रुवीकरण का पांसा फेंक दिया है। इस बार जाति उनके ध्रुवीकरण का जरिया है। उनका आरोप है कि “जो आरोप लगा रहे हैं, वे ज्यादातर पहलवान एक ही कम्युनिटी – जाट – से हैं।”

इस सबके साथ सबसे महत्वपूर्ण उनका यह एलान है कि “मैं इस्तीफा नहीं दूंगा। पार्टी का जो आदेश मिलेगा, उसी को मानूंगा।”

ब्रजभूषण शरण सिंह को पक्का भरोसा है कि उनकी पार्टी – भाजपा – उनसे कभी इस्तीफा देने को नहीं कहने वाली।

आरोप कैसे भी हो, कितने भी गंभीर या जघन्य, जाहिर उजागर, साबित प्रमाणित हों, भाजपा में इस्तीफे नहीं होते। वर्ष 2015 में ललित मोदी प्रकरण, जिसमे सुषमा स्वराज ही नहीं खुद प्रधानमंत्री तक लिप्त थे, उस वक्त देश भर में मचे शोर पर बोलते हुए सरकार के वरिष्ठ मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा था कि “किसी मंत्री का इस्तीफा नहीं होगा, क्योंकि हमारे मंत्री यूपीए के मंत्रियों की तरह (आरोप लगने पर) इस्तीफा नहीं देंगे। उनकी बात पर हामी भरते हुए तब के केंद्रीय मंत्री बड़बोले रविशंकर प्रसाद ने उलटे पत्रकारों से ही पूछा था कि “आखिर आप वही सब क्यों चाहते हैं जो यूपीए के दौर में हो चुका है।” उन्होंने स्पष्ट किया कि यूपीए सरकार आरोपों और घपलों में “फंसने पर मंत्रियों से इस्तीफे लेती थी, नरेंद्र मोदी की सरकार नहीं लेगी।”

राजनीतिक शुचिता और पारदर्शिता के मामले में यह मोदी की भाजपा का मौलिक योगदान है।
brijbhushan sharan singh will not resign
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संसदीय लोकतंत्र में आरोप लगने पर, जब तक कोई निष्पक्ष जांच के बाद दोषमुक्त साबित नहीं हो जाता तब तक, इस्तीफा देकर इन्तजार करने की मान्य परंपरा है। यह परम्परा भी कोई आधुनिक परम्परा नहीं है 2064 वर्ष पहले जूलियस सीजर रोमन सम्राट थे, यह तब से चली आ रही है । उनके जमाने की पुरानी रोमन कहावत है कि (Caesar’s wife must be above suspicion) “सीजर की पत्नी को संदेहों से परे होना ही चाहिए।” मतलब यह कि जो सत्ता और सार्वजनिक जीवन में हैं उन्हें हर तरह के कदाचरण और अपराधों, बेईमानियों और हलकेपन से दूर रहना चाहिए। जाहिर सी बात है; शासक सार्वजनिक जीवन के नायक होते हैं, उन्हें ऐसा होना ही नहीं चाहिए दिखना भी चाहिए। उनका आचरण जनता में विश्वास पैदा करने वाला होना ही चाहिए। मगर मोदी की भाजपा घोषित रूप से इस पर अमल करने से इंकार करने वाली भारत की ही नहीं विश्व की भी अकेली पार्टी है।

भाजपा से कैसे अलग है मोदी की भाजपा?

यहां “मोदी की भाजपा” इसलिए कहा गया क्योंकि मोदी से पहले की भाजपा संसदीय लोकतंत्र की इस मान्य परम्परा के इतना खिलाफ नहीं थी। भाजपा में 2014 में आधुनिक ब्रूटस के रंगमंच पर पदार्पण के पहले इसके जो जूलियस सीजर हुआ करते थे उन लालकृष्ण आडवाणी ने हवाला डायरियों में घूस लेने के मामले में अपना नाम आने के बाद 1996 में लोकसभा से इस्तीफा दे दिया था। ललित मोदी घोटाले और सुषमा स्वराज तथा वसुंधरा राजे की उसमे लिप्तता के वक़्त आनंद बाजार पत्रिका को अपने इस इस्तीफे की याद दिलाते हुए आडवाणी ने कहा था कि ‘‘एक नेता के लिए जनता का भरोसा बनाये रखना सबसे बड़ी जिम्मेदारी है। नैतिकता जो मांग करती है वह ‘राजधर्म’ है और सार्वजनिक जीवन में सत्यनिष्ठा कायम रखने की जरूरत है।’’

आडवाणी को ताक पर रखने के साथ ही मोदी की भाजपा ने शर्म, हया, जनता के प्रति उत्तरदायित्व और संवैधानिक मान मर्यादाओं सब कुछ ताक पर रख दिया है। अब भाजपा में इस्तीफे नहीं होते, सिर्फ काण्ड होते हैं। पिछली आठ वर्षों में केंद्र से लेकर प्रदेशों तक भाजपा की सरकारों ने व्यापम से लेकर नोटबंदी, सीमा से लेकर घर के चूल्हे तक जनता और राष्ट्र के प्रति ऐसा कोई अपराध नहीं जो इन्होने किया नहीं – मगर इस्तीफा एक का भी नहीं हुआ। यह सिर्फ संसदीय लोकतंत्र की विश्व द्वारा स्वीकृत परम्पराओं का ही उल्लंघन नहीं है। इसके पीछे मोदी की भाजपा की वह वैचारिक धारणा है जो आरएसएस से उसे मिली है। जिसका संसदीय ढाँचे और सार्वजनिक जीवन में शुचिता के स्वीकृत आधारों के साथ कोई रिश्ता नहीं है। यह वैचारिक धारणा उन्हें आसारामो, राम रहीमो, चिन्मयानन्दों के बीच ज्यादा सहज महसूस कराती है। ब्रजभूषण शरण सिंहों के आचरण को सामान्य बताती है।

ठीक यही वजह है कि बेहिसाब ठण्ड के दौरान भारत की शान कही जाने वाली लड़कियां जब जंतर मंतर पर बैठती हैं तब वे सिर्फ अपने लिए नहीं बैठी होती हैं; सार्वजनिक जीवन से खत्म की जा रही शुचिता और उत्तरदायित्व को बचाने और इस प्रकार समाज को सभ्य और सुसंस्कृत बनाने की लड़ाई भी लड़ रही होती हैं।

बादल सरोज

सम्पादक लोकजतन, संयुक्त सचिव अखिल भारतीय किसान सभा

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