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Budget 2020

बजट 2020 : जलवायु परिवर्तन और प्रदूषण को लेकर चिंताएं बढ़ी ही हैं

Budget 2020: Concerns about climate change and pollution have increased

हर साल की तरह केंद्र सरकार ने वर्ष 2020-21 का आम बजट (General Budget for the year 2020-21) संसद में पेश कर दिया है। लेकिन जलवायु परिवर्तन और प्रदूषण (Climate change and pollution) जैसी दो बड़ी समस्याओं पर यह बजट खामोश है, बल्कि सही कहा जाए तो बजट से जलवायु परिवर्तन और प्रदूषण को लेकर चिंताएं बढ़ी ही हैं। उधर दो अंतर्राष्ट्रीय अध्ययन हाल ही में सामने आए हैं, जिनमें एक बताता है कि बिजली क्षेत्र के उत्सर्जन के में इंग्लैंड सहित पूरे यूरोप में वर्ष 2019 में रिकॉर्ड गिरावट दर्ज की है जिसके पीछे कोयले से बिजली उत्पादन में गिरावट ज़िम्मेदार है। जबकि दूसरा अध्ययन एक नया रोडमैप देता है कि 2050 तक अमेरिका कार्बन-मुक्त कैसे हो सकता है।

वर्ड रिसोर्सेस इंस्टीट्यूट के खाद्य, वन और जल कार्यक्रम में सीनियर एसोसिएट जेम्स मुलिगन, के नेतृत्व में किए गए एक अध्ययन की रिपोर्ट में कहा गया है कि

“जलवायु परिवर्तन के सबसे बुरे प्रभावों से बचने के लिए न केवल उत्सर्जन में भारी कटौती की आवश्यकता होगी, बल्कि बड़े पैमाने पर वायुमंडल से कार्बन डाइऑक्साइड (सीओ 2) को हटाने (उर्फ, कार्बन हटाने) की भी आवश्यकता होगी।

रिपोर्ट में कहा गया है कि संयुक्त राज्य अमेरिका अपने कार्बन फुटप्रिंट को वर्ष 2050 तक शून्य के स्तर पर ला सकता है, लेकिन ऐसा तभी हो सकता है जब देश तेजी से उभरती हुई ऐसी तकनीकों में भारी निवेश करे जो वायुमंडल से कार्बन डाइऑक्साइड को सोख कर बाहर निकालती हैं।

एक अन्य अंतर्राष्ट्रीय अध्ययन में बताया गया है कि 2019 में, यूरोपीय संघ के बिजली क्षेत्र में पिछले वर्ष की तुलना में 12 प्रतिशत कम CO2 उत्सर्जन किया गया और लगभग इसी समय सीमा में एक और नया कीर्तिमान स्थापित किया गया कि यूरोपीय संघ के देशों में अक्षय ऊर्जा की हिस्सेदारी कुल विद्युत उत्पादन में 35 प्रतिशत हो गई।

यह निष्कर्ष हाल ही में अगोरा एनर्जेवेन्डे और सैंडबैग द्वारा यूरोपीय बिजली क्षेत्र की 2019 की समीक्षा से सामने आए हैं।

अगोरा एनर्जेवेन्डे स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण की सफलता को समर्थन करने वाला जर्मनी का एक थिंक टैंक और नीति संस्थान है। “एनर्जेवेन्डे” जर्मनी की ऊर्जा आपूर्ति में मौलिक बदलाव के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला शब्द है। जबकि सैंडबैग यूके स्थित एक गैर लाभकारी थिंक टैंक है, जो पर्यावरण की प्रभावी जलवायु नीतियों के लिए अनुसंधान और अभियान चला रहा है।

अध्ययन बताता है कि यूरोप में अब अक्षय उर्जा की बढ़ोतरी के चलते कोयले से बिजली बनाने के लिए कोई प्रतिस्पर्धा नहीं है। यूरोपीय संघ के 27 में से 21 सदस्य देशों के बिजली उत्पादन योजनाओं में कोयला से बिजली उत्पादित करने की कोई योजना नहीं है।

इन दोनों अध्ययनों को भारत के आम बजट के परिप्रेक्ष्य में देखने की आवश्यकता इसलिए है कि बजट में स्वच्छ ऊर्जा को लेकर जो बंदिशें लगाने का काम किया गया है उसका मकसद जीवाश्म उत्पादित बिजली पर रोक लगाना कतई नहीं है, बल्कि सरकारी क्षेत्र में चल रहे ताप बिजलीघरों की जमीनें हथियाकर उन्हें बेचना है। बजट में कहा गया है कि जो ताप बिजलीघर पर्यावरण मानकों से अधिक फ्लू गैस का उत्सर्जन कर रहे हैं उन्हें बंद कर दिया जाए और इन ताप बिजली घरों की जमीन अन्य उपयोग के लिए इस्तेमाल की जा सकती है।

ऑल इण्डिया पॉवर इन्जीनियर्स फेडरेशन के चेयरमैन शैलेन्द्र दुबे कहते हैं कि यदि इस घोषणा पर अमल हुआ तो उत्तर प्रदेश के अनपारा ए बिजली घर की 210-210-210  मेगावाट की तीनों इकाइयां और अनपारा बी की 500-500 मेगावाट की दोनों इकाइयां बंद हो जाएंगी, जो प्रदेश में सबसे सस्ती बिजली दे रही हैं। इसके अतिरिक्त ओबरा की 200-200 मेगावाट की पांच इकाइयां, पारीछा की 110 -110 मेगावाट की दो इकाइयां और हरदुआगंज की 110 मेगावाट की एक इकाई पूरी तरह बंद करनी होगी। उन्होंने बताया कि पिछले बजट में कहा गया था कि इन बिजली घरों में प्रदूषण रोकने हेतु फ्यूल गैस डिसलफराइजड सिस्टम और सेलेक्टिव कैटालिटिक रिड्यूसर लगाए जाएँ जिसकी योजना भी बन रही थी, किन्तु अब इन्हें बंद करने को कहा गया है जो अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है। उन्होंने इस बात पर भी आपत्ति की है कि इन बिजली घरों की जमीन के अन्य इस्तेमाल की बात कही गई है, जो नियम विरुद्ध है क्योंकि जब जमीन का अधिग्रहण किया गया था तब यह अधिग्रहण बिजली उत्पादन के लिए किया गया था, अब इसे बदलना नियम विरुद्ध है।

श्री दुबे की बातों से सहमत हुआ जा सकता है कि सरकार का मकसद स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन और कार्बन उत्सर्जन पर रोक लगाना कतई नहीं है, क्योंकि बजट प्रस्तुत करने से ठीक पहले ही सरकार ने देश के कोयला खनन क्षेत्र को गैर कोयला कंपनियों के लिए खोलने के लिए एक अध्यादेश जारी करने की मंजूरी दे दी है। इसके साथ ही सरकार ने कोयले के अंतिम इस्तेमाल पर अंकुश को हटाने का भी फैसला किया है।

अमलेन्दु उपाध्याय (Amalendu Upadhyaya) लेखक वरिष्ठ पत्रकार, राजनैतिक विश्लेषक व टीवी पैनलिस्ट हैं। वह हस्तक्षेप के संपादक हैं।
अमलेन्दु उपाध्याय (Amalendu Upadhyaya) लेखक वरिष्ठ पत्रकार, राजनैतिक विश्लेषक व टीवी पैनलिस्ट हैं। वह हस्तक्षेप के संपादक हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक बजट से ऐन पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में 31 मार्च को मौजूदा खनन पट्टा समाप्त होने से पहले लौह अयस्क और अन्य खनिज खानों की नीलामी को भी मंजूरी दे दी है, जिससे उत्पादन प्रभावित नहीं हो। सरकार ने कोयला क्षेत्र को 100% प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के लिये ही नहीं खोला बल्कि इस पाबंदी को भी हटा लिया है कि निजी कंपनियां अगर खनन करेंगी तो सिर्फ अपने उद्योग (सीमेंट, स्टील, पावर) के लिये ही उसका इस्तेमाल करेंगी। सरकार के इस कदम से निजी कंपनियां बड़ी मात्रा में कोयला खनन और कोयला व्यापार करती दिखेंगी।

उधर बजट में जो पाबंदी लगाने की घोषणा की गई है, उसके परिणामस्वरूप सार्वजनिक क्षेत्र के ताप बिजलीघर बंद हो जाएंगे, क्योंकि उनकी तकनीक उन्नत करने के लिए वह सरकार इन बिजलीघरों में निवेश कैसे करेगी जो तमाम सरकारी उपक्रमों को बेच रही है। जाहिर है कोयले का कारोबार निर्बाध गति से चलता रहेगा और सिंगल यूज प्लास्टिक पर प्रतिबंध लगाने का नारा देने वाले प्रधानमंत्री यह नारा लगाते रहेंगे।

यदि सरकार वास्तव में स्वच्छ ऊर्जा को लेकर गंभीर है तो उसे कोयला क्षेत्र में 100% प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को तत्काल वापिस लेना चाहिए और विद्युत उत्पादन की तकनीक के उच्चीकरण पर निवेश (Investment on up-gradation of power generation technology) करके यूरोपीय यूनियन के देशों की तरह आदर्श प्रस्तुत करना चाहिए।

अमलेन्दु उपाध्याय

 

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