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बजट 2021-22 : ये सरकार पूंजीपतियों के पक्ष में लाठी लेकर खड़ी है

बजट 2021-22 : केंद्र व राज्य दोनों बजट गरीबों के बजाय पूंजीपतियों के लिए बनाया गया है

केदारदास श्रम व समाज अध्ययन संस्थान ने किया केंद्र व राज्य की बजट की राजनीतिक दिशापर विमर्श का आयोजन

Budget 2021-22: Both Union and State budgets have been made for the capitalists rather than the poor.

Kedardas Institute of Labor and Social Studies organized discussion on ‘political direction of center and state budget’

पटना, 28 फरवरी। केदारदास श्रम व समाज अध्ययन संस्थान की ओर से केंद्र व राज्य सरकार द्वारा पेश किए गए हालिया बजट 2021-22 पर विमर्श किया गया। प्रख्यात मज़दूर नेता केदारदास की स्मृति में आयोजित इस विमर्श का विषय था “बजट (केंद्र व राज्य) की राजनीतिक दिशा”।

बजट पर आयोजित इस विमर्श में बड़ी संख्या में शहर के बुद्धिजीवी, सामाजिक कार्यकर्ता, विभिन्न दलों के कार्यकर्ता मौजूद थे।

चर्चित सीपीआई नेता मो. जब्बार आलम ने बजट पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा “केंद्रीय बजट पूरी तरह अनुदारवादी है। लगभग 34 लाख करोड़ के इस बजट में फिस्कल डेफिसिट बढ़ गया है। उसका प्रमुख कारण है कि कॉरपोरेट टैक्स में कमी आई है। उम्मीद थी कि लगभग 20 लाख करोड़ होगा लेकिन कॉरपोरेट टैक्स मात्र 15 लाख करोड़ ही रहा है। कॉपोरेट टैक्स में कमी के कारण ही फिस्कल डेफिसिट बढ़ा है। इस बजट को कॉपोरेट बजट कहा जाए तो गलत नहीं होगा।”

एशियन डेवलपमेंट रिसर्च इंस्टीट्यूट (आद्री) से जुड़े वरिष्ठ अर्थशास्त्री पी.पी.घोष ने अपने संबोधन में कहा “मैं पिछले चालीस सालों से बजट का विश्लेषण कर रहा हूं। बजट को 10-12 प्रतिशत का ग्रोथ हासिल करना था। यदि अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाना है तो हाथ कहाँ रखियेगा। डिमांड और सप्लाई का ध्यान रखना पड़ता है। कुछ दिन पहले तक मकान का डिमांड था, लेकिन सप्लाई न था लेकिन बिहार में बहुत बिल्डिंग बनने लगा। सप्लाई का देश में कोई कमी नहीं है सबसे बड़ी कमी डिमांड की है। यदि डिमांड को नहीं बढ़ाएंगे तो कैसे बात आगे बढ़ेगी।”

उन्होंने कहा कि

“इकॉनॉमी में ग्रोथ के लिए इमीडिएट व मीडियम टर्म ग्रोथ को देखना पड़ता है। कहा जाता है कि ब्राजील ने थोड़ा बेहतर किया है उसका कारण है कि वहां बड़े पैमाने ओर आय का ट्रांसफर किया गया है। लेकिन यहां उल्टा किया गया। यहां मनरेगा के माध्यम से किया जा सकता था। यह डिमांड आधारित कार्यक्रम है। इस बजट में मनरेगा में मात्र पचास हजार करोड़ रखा गया। जबकि डिमांड बढ़ाने का यही एक मात्र तरीका था। यदि हेल्थ सर्विसेज के लिए कुछ किया जाता तो फायदा होता। सरकारी स्वास्थ्य सेवा को बेहतर बनाते, प्राथमिक स्वास्थ्य व्यवस्था को बेहतर बनाते तो सीधे फायदा होता। यहां तकनीकी ब्रिटेन में भी पचास प्रतिशत सेवाएं सरकार के माध्यम से पहुंचाई जाती है। लेकिन सरकार का अप्रोच है कि प्राइवेट सेक्टर को फायदा पहुंचे जनता को बाई प्रोडक्ट में कुछ मिल जाये तो हो जाये। सैलरी से जितना टैक्स कलेक्ट करते हैं वो ज्यादा है कौओपोरेट टैक्स के मुकाबले। कोरोना संकट के ऐसे संकट में भी सरकार कॉरपोरेट सेक्टर, प्राइवेट सेक्टर को भी नहीं भूलना चाहती।”

पटना विश्विद्यालय में अर्थशास्त्र के पूर्व विभागाध्यक्ष भगवान प्रसाद सिंह ने बजट पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा,

बजट में जनता के हाथों क्रयशक्ति आना चाहिए था परन्तु वह काम नहीं हुआ। 2022 तक किसानों की आमदनी कैसे दुगनी हो इसका कोई नक्शा नहीं है, कृषि को कैसे विकसित करें? सिंचाई की कैसे व्यवस्था हो? बाजार किए उपलब्ध हो इसका कोई ब्लूप्रिन्ट नहीं प्रस्तुत किया गया। सिर्फ लोन के माध्यम से विकास की बात की गई है जो सही नहीं है। कॉरपोरेट को छूट दे सकते बैन तो किसानों को क्यों नहीं। 64 प्रतिशत लोग कृषि पर निर्भर हैं किसानों की आमदनी कैसे बढ़े इस पर बल दिया होता तो किसानों को प्रत्यक्ष लाभ मिला होता। स्वास्थ्य के लिए सहयोगी इंफ्रास्ट्रक्चर उपलब्ध नहीं है। बिहार में दस हजार की जनसंख्या पर मात्र एक डॉक्टर है जबकि 45 डॉक्टर होना चाहिए, मात्र 2 नर्स हैं। बिहार में सरकार मेडिकल कॉलेज खोलने की बात करती है इससे क्या होगा। इंफ्रास्ट्रक्चर बनाते हैं तो उसका लाँग टर्म फायदा मिल सकता है। सिर्फ कह देने से कि इतना कॉलेज खोल देंगे, हॉस्पीटल बना देंगे इनसे कुछ नहीं होता।“

उन्होंने कहा कि

टैक्स चुराने वाले को सुविधा दे दी है, उनको इनाम दे रहे हैं। मात्र 3-6 साल के पहले का टैक्स का रिकॉर्ड नहीं खोला जाएगा। कहीं भी कीमत पर कन्ट्रोल की कोई बात नहीं जो रही है। डीजल-पेट्रोल बढ़ने से इन्फ्लेशन बढ़ता है यह एक तरह का इनडायरेक्ट टैक्स है। इससे रिलीफ की कोई बात नहीं जो रही है। पब्लिक सेक्टर के बदले प्राइवेट को बढ़ावा दे रही है। विदेशों के लोगों को उस सेक्टर में बुलावा मिल रहा है जबकि आप खुद उसको कर सकते हैं। डायरेक्ट इनकम ट्रांसफर न होगा तो किसान खुद से स्थिति बेहतर नहीं कर सकता है। किसानों की सिंचाई की सुविधा तो सरकार को ही करना होगा लेकिन इन सब चीजों को उपलब्ध कराने का काम नहीं किया गया। 2.7 ट्रिलियन डॉलर की इकॉनॉमी है यदि 9 प्रतिशत के डर से हर साल ग्रोथ हिगा तब जाकर 6 साल में 5 ट्रिलियन डॉलर की इकोनॉमी हो सकता है लेकिन यह होगा कैसे इसका कोई ब्लू प्रिन्ट नहीं है। इस कोरोना संकट में अडानी का साढ़े छह गुना और अंबानी का तीन गुणा बढ़ेगा। रोजगार बढ़ाने के जो उपाय हैं उसमें काफी लंबा वक्त लगेगा। असमानता का हाल तो बहुत बुरा है। बिहार में बंद पड़े उद्योगों को खोलने पर कोई दया नहीं दिया गया है। टूरिज्म पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जा रहा है।”

केदारदास श्रम व समाज अध्ययन संस्थान के महासचिव नवीनचन्द ने कहा

“नियोलिबरल का मतलब ही होता है कि बिजनेस के साथ सरकार इंटरफेयर न करे। इसे ही इक्कसवीं सदी में नियो लिब्रिलजम कहते हैं। नियोलिब्रिलिज्म तब सफल होता है जब डेमोक्रेसी नहीं था, यूनिवर्सल फैंचाइज न था। फ़्री मार्किट इकॉनॉमी डेमोक्रेसी को स्वीकार नहीं कर सकता। पॉलिकटिकल डेमोक्रेसी में एक आदमी एक वोट की बात करता है लेकिन अब एक आदमी का महत्व तभी तक है जब उसके पास पैसा है। चिंदबरम ने डेमोक्रेटिक कनट्रेंट की बात की थी। जो लिबरलाइजेशन करना चाहते हैं वो फासीवादी होगा ही। हम उसी के साथ मोर्चा में जाएं जो लिबरलाइजेशन के ख़िलाफ़ हो। डेमोक्रेटिक फोर्सेज किसान और मज़दूर है। पूंजीवाद के अंदर किसान समस्या का संकट असम्भव है। ये जो संकट है ये स्ट्रक्चरल क्राइसिस है। पूंजीवाद का संकट संरचना के अंदर है अतः इसके बाहर जाना होगा।”

भारत की कम्युनिस्ट पार्टी ( मार्क्सवादी ) के सेन्ट्रल कमिटी के सदस्य “यह बजट एक क्लास बजट है। कोरोना संकट के दौरान निजी क्षेत्र फेल कर गया जबकि सरकारी स्वास्थ्य सुविधा ने ही इस संकट आए बचाया। अब तो पूंजीवादी अर्थशास्त्री ही कह रहे हैं कि मांग बढाने की जरूरत है।  यह तो पुराना केंसियन इकॉनॉमिक्स ही है । लेकिन यह सरकार तो यह सुझाव भी मानने को तैयार नहीं है। कहा जा रहा है कि दक्षिण पूर्व एशिया में 70 मिलियन लोग और गरीब हुए हैं जिसमें सबसे ज्यादा हिस्सा भारत का है। 13 लाख करोड़ 100 पूंजीपतियों के हाथों में गया है।यदि हर नागरिक को दिया जाता तो यह चौरानवे हजार रुपया मिलता। 9 लाख करोड़ रुपया तो सिर्फ पूंजीपतियों को छूट दी गई है। प्रधानमंत्री खुलेआम संसद में कह रहे है। अब तथाकथित लिबरल लोग सरकार का गुणगान कर रहे हैं। वेल्थ क्रिएटर्स कौन है? वह है अंबानी, अडानी। मज़दूर, किसान वेल्थ क्रियेर्टर्स नहीं है। इस बजट के क्लास अंतर्वस्तु को समझने की जरूरत है। ये सरकार पूंजी के पक्ष में लाठी लेकर खड़ा है। अब आपको तय करना है कि आप उससे कैसे संघर्ष करेंगे।”

‘मज़दूर’ पत्रिका के पार्थ सरकार ने कहा

“यह बजट एक वर्ग चुनौती है वर्ग संघर्ष के लिए। इस सरकार ने नँगा होकर पूंजीपतियों का साथ दिया है। जिस बोल्डनेस के साथ खड़ी है यह सरकार वह बताती है कि अब जनता कहीं नहीं है। पहले कहा जाता था कि स्वास्थ्य, शिक्षा पब्लिक गुड है लेकिन उसे पूरी तरह छोड़ दिया गया है। हर चीज को पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी मोड) पर देने की बात की जा रही है। हेल्थ में 137 प्रतिशत की वृद्धि दिखा रही है लेकिन वह गलत है। सरकार चंद कॉरपोरेट के हाथों में सिमटा चुकी है। इन सरकार ने दक्षिणपंथी अर्थशास्त्रियों की बात भी नहीं सुनती है। रिजर्व आर्मी ऑफ लेवर को इस्तेमाल करने के लिए लेबर लॉ को खत्म कर लेबर कोड ला रही है। 50 इनकम टैक्स के ऑफिसर कहते रहे गए कि ऊपर सेक्शन को टैक्स करिए, वेल्थ टैक्स लगाइए लेकिन उल्टे उन्हीं लोगों पर कार्रवाई की गई। इन बजट ने मजबूत इच्छाशक्ति दिखाई है इससे लड़ने के लिए कमजोर इच्छाशक्ति आए नहीं लड़ सकते हैं।”

छोटे उत्पादकों को नष्ट करना चाहती है भाजपा सरकार

पटना विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के छात्र सचिन ने बजट पर आयोजित परिचर्चा में अपनी राय प्रकट करते हुए कहा

“बजट छोटे उत्पादकों को बर्बाद करना चाहता है। इफेसिएंसी को बढ़ाने के लिए छीटे उत्पादकों को उजाड़ना चाहता है। आप इनकम नहीं बढाते हैं और केवल गांव से शहर में लाते हैं तब तो उनको सिर्फ कंज्यूमर बनाना चाहते हैं। भाजपा सरकार छोटे उत्पादकों को नष्ट करना चाहती हैं। इकॉनॉमिक्स में सड़कों का रोल सिर्फ माल को कंज्यूमर तक पहुंचाना होता है।”

 विमर्श के दौरान उपस्थित लोगों ने वक्ताओं से सवाल भी पूछे।

संचालन केदारदास श्रम व समाज अध्ययन संस्थान के अशोक कुमार सिन्हा ने किया जबकि धन्यवाद ज्ञापन संस्थाननके सचिव अजय कुमार ने किया।

प्रमुख लोगों में थे केदार दास श्रम व समाज अध्ययन संस्थान के अजय कुमार,  विश्वविद्याल व महाविद्यालय कर्मचारियों के नेता अरुण कुमार, सीपीआई के पटना जिला सचिव रामलला सिंह, एटक के उपमहासचिव ग़ज़नफ़र नवाब, ए. आई.एस. एफ के पूर्व महासचिव विश्वजीत कुमार, शिक्षाविद अनिल कुमार राय, अक्षय कुमार, कुलभूषण कुमार, रँगकर्मी जयप्रकाश, अनीश अंकुर, मदन प्रसाद सिंह, कपिलदेव वर्तमा, सुनील सिंह, जीतेन्द्र कुमार, सतीश कुमार, कौशलेंद्र कुमार, रामजीवन सिंह, भोला पासवान, उमा, मंगल पासवान, आनन्द कुमार, कारू प्रसाद आदि।

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