जातीय अस्मिता की राजनीति के जिंदा रहते चुनावी रास्ते से संघ और हिंदुत्व को नहीं हराया जा सकता

जातीय अस्मिता की राजनीति के जिंदा रहते चुनावी रास्ते से संघ और हिंदुत्व को नहीं हराया जा सकता

क्या चुनावी रास्ते से संघ और हिंदुत्व को शिकस्त दी जा सकती है?

जातिगत अस्मिता की राजनीति के जिंदा रहते संघ और हिंदुत्व को चुनावी रास्ते से फिलहाल शिकस्त नहीं दी जा सकती है. इस राजनीति को नकारना ही होगा.

हिंदुत्व की राजनीति अभी और मजबूत होगी

दरअसल, अभी यह दौर भारत में हिंदुत्व राजनीति के और मजबूत होने का है. चूंकि भारत में हिंदुत्व वादी बहुसंख्यक राजनीति चुनावी प्रक्रिया (Electoral way) से मजबूत हुई है, लिहाजा उन वजहों की पड़ताल बहुत आवश्यक है जिनके मार्फत संघ ने भारत में अपनी सियासी पैठ को मजबूत किया.

विपक्षी राजनीतिक दलों का हिंदुत्व के प्रति छिपा प्रेम

इस बात में कोई संदेह नहीं है कि हिंदुत्व राजनीति को देश में मजबूती इसलिए मिली क्योंकि विपक्षी राजनीतिक दलों का हिंदुत्व के प्रति छिपा प्रेम और उनका संशोधन वादी और भ्रष्ट रवैया हिंदुत्व के खिलाफ किसी मजबूत वैचारिक संघर्ष का रास्ता नहीं खोज पाया.

आज जब संघ और उसकी सियासत लगातार मजबूत हो रही है- इस राजनीति से प्रेम करने वाले लोग तकरीबन सभी सियासी दलों में घुसे हुए हैं.

जातीय अस्मिता की राजनीति ने संघ-भाजपा को ताकत दी

यही नहीं, जातीय अस्मिता की राजनीति ने संघ की हिंदू राष्ट्र की विचारधारा के सियासी प्रचार में और बेहतर भूमिका निभाई है. जातीय अस्मिता की राजनीति की सिर्फ एक ही नैतिकता है- सत्ता में आना. वह किसी के साथ भी जा सकते हैं बस उन्हें सत्ता में हिस्सेदारी मिल जाए. लिहाजा अभी इनके जिंदा रहते लोकतांत्रिक रास्ते से संघ/ हिंदुत्व को चुनौती नहीं दी जा सकती है.

एक संकट और है. हिंदी पट्टी के क्षेत्रीय दलों ने जिस तरह अपने अस्मिता वादी, भ्रष्ट जातीय गिरोह को वोट बैंक के बतौर तैयार किया है- उसके पास भी हिंदुत्व और उसके खतरे की समझने की दृष्टि और उससे निपटने की ठोस राजनीतिक दिशा का अभाव है. क्योंकि इन दलों ने अपने मतदाता में ही नागरिक होने की बुनियादी समझ को भी घातक तरीके से तोड़ा है.

मेरे कहने का मतलब यह है कि इन दलों के मतदाता जाति को नागरिकता बोध से ज्यादा महत्वपूर्ण मानते हैं. यही कारण है कि आज जनता के बीच कानून के राज का संघ परिवार द्वारा उल्लंघन किए जाने पर भी किसी इनके बीच से किसी किस्म के प्रतिरोध की गुंजाइश नहीं है.

क्षेत्रीय दलों ने जातिगत अस्मिता के जो गिरोह तैयार किए हैं वह अपने भारतीय होने की समझ को ही नष्ट कर चुका है. ऐसे लोगों से कानून संविधान और भारत की मूल भावना बहुसंस्कृतिवाद पर कोई संकट आने पर उसके खिलाफ सड़क पर उतरने की अपेक्षा कैसे कर सकते हैं?

इसीलिए मेरा मानना है कि अभी संघ परिवार और भाजपा को उसके देश विरोधी संज्ञेय अपराधों के बावजूद कोई बड़ी चुनौती नहीं दी जा सकती है, क्योंकि देश में नागरिकता बोध विकसित होने की राह में बड़ा रोड़ा जातीय अस्मिता है- जिसके संघ और बीजेपी बड़े खिलाड़ी हैं.

कहने का मतलब यह है कि बिना जातीय अस्मिता की राजनीति को नकारे संघ या हिंदुत्व की राजनीति को चुनावी रास्ते से संसदीय जनतंत्र में परास्त नहीं किया जा सकता. यह एक कटु सच्चाई है और इसे स्वीकार करना होगा.

संघ और जातिगत अस्मिता

और हां, संघ जातिगत अस्मिता को अपने हित में जरूर जिंदा रखेगा. जाति अस्मिता के सियासी गिरोहों को खाद पानी देकर अपने हित में तैयार रखेगा. जैसे, बसपा और सपा के खत्म हो जाने का मतलब है संघ को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से सीधा मुकाबला करना पड़ेगा- जिसका भारत के स्वतंत्रता आंदोलन और भारतीय राष्ट्रवाद के निर्माण में एक निर्विवाद योगदान है. राष्ट्रवाद पर जब भी बात होती है संघ को आजादी के आंदोलन से विरोध और गद्दारी करने के लिए बगले झांकना पड़ता है.

इसीलिए संघ कभी नहीं चाहेगा कि जातीय अस्मिता की राजनीति खत्म हो और उसका सीधा मुकाबला कांग्रेस से हो इसीलिए संघ जातीय अस्मिता के गिरोह वालों को जिंदा रखेगा.

हरे राम मिश्र

लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार व राजनीतिक विश्लेषक हैं।

Web title : Can the RSS and Hindutva be defeated by the electoral route?

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