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The Supreme Court of India. (File Photo: IANS)

राजनीति का बढ़ता अपराधीकरण : घर को लग गई आग घर के चराग से

Candidates with criminal background in elections

सर्वोच्च न्यायालय ने राजनीतिक दलों को निर्देश दिया है (Supreme Court has directed political parties) कि वे चुनाव में आपराधिक पृष्ठभूमि के उम्मीदवारों को खड़ा करें तो जनता को बतायें कि आखिर ऐसी कौन-सी मजबूरियां थीं, जिनके फलस्वरूप उन्होंने बेदाग के बजाय आपराधिक पृष्ठभूमि वाले प्रत्याशी (Candidates with criminal background) का विकल्प चुना। न्यायालय ने उनसे कहा है कि वे सम्बन्धित प्रत्याशी का नामांकन स्वीकार किये जाने के 48 घंटों के भीतर अपनी बेबसाइट पर तो इस सम्बन्धी स्थिति स्पष्ट करें ही, एक राष्ट्रीय व एक स्थानीय दैनिक में इसका विज्ञापन भी दें। इसके साथ ही चुनाव आयोग भी इस रिकार्ड को 72 घंटे के अन्दर अपनी वेबसाइट पर अपलोड करे।

Contempt of court action against political party

न्यायालय ने चुनाव आयोग से यह भी कहा है कि कोई राजनीतिक दल ऐसा नहीं करता तो वह उसके बारे में शीर्ष अदालत को बताये, ताकि वह उसके खिलाफ न्यायालय की अवमानना की कार्रवाई करने पर विचार कर या उसको तलब कर सके।

Supreme Court directives with reference to increasing criminalization of politics

राजनीति के बढ़ते अपराधीकरण के संदर्भ में सर्वोच्च न्यायालय के इन निर्देशों पर विचार करें तो कह सकते हैं कि उसकी इस सम्बन्धी चिंता नयी नहीं है। इस क्रम में पहले भी उसने संसद से यह अपेक्षा की थी कि वह ऐसे उम्मीदवारों को चुनाव से परे करने के लिए उपयुक्त विधिक व्यवस्था करे। कारण यह कि जिस जनप्रतिनिधित्व कानून के तहत चुनाव कराए जाते हैं, उसमें प्रत्याशियों की योग्यताओं, अयोग्यताओं व क्षमताओं का निर्धारण करने में संसद ही सक्षम है-सर्वोच्च न्यायालय नहीं। लेकिन संसद ने ऐसा नहीं किया क्योंकि इसके खिलाफ सभी राजनीतिक दल एकजुट हो गये और उन्होंने सम्बन्धित कानून में ऐसे किसी प्रकार के संशोधन से साफ मना कर दिया।

तब उनका तर्क था कि राजनीतिक दलों व उनके विचारों के विरोधी अपने खिलाफ संभावित उम्मीदवारों की छवि खराब करने या उन्हें चुनावी नुकसान पहुंचाने के लिए उनके खिलाफ झूठे मुकदमे दर्ज करा देते हैं। ऐसे झूठे मामलों के आधार पर किसी सक्षम प्रत्याशी को आपराधिक पृष्ठभूमि वाला बताकर चुनाव लड़ने की प्रक्रिया से विरत करना कतई उचित नहीं है।

राजनीतिक दलों द्वारा उम्मीदवारों के चयन में आपराधिक प्रवृत्ति वालों की संख्या उसके बाद भी निरन्तर बढ़ती ही जा रही है। राजनीतिक दल चुनाव दर चुनाव इसे बढ़ाते जाने के लिए इस ‘तर्क’ का इस्तेमाल करते आ रहे हैं कि जब तक किसी व्यक्ति को निर्धारित विधि व साक्ष्य के अनुसार दण्ड न मिले, तब तक उसे दागी मानने की प्रवृत्ति ही दोषपूर्ण है और ऐसा करना राजनीतिक भेदभाव का ही सूचक होगा।

सच कहें तो राजनीतिक दल इस सम्बन्धी असलियत को भलीभांति समझते हैं, इसलिए ऐसे उम्मीदवारों को चुनाव लड़ने के अयोग्य मानने के लिए किसी प्रकार की कोई नयी व्यवस्था करने को तैयार नहीं हैं। उनका यह भी कहना है कि उक्त कानून में दो वर्ष से अधिक सजा पाने वालों को न सिर्फ चुनाव लड़ने के अयोग्य माना गया है बल्कि इससे भी आगे जाकर व्यवस्था की गई है कि यदि वे निर्वाचित होकर किसी सदन के सदस्य बन गये हैं तो भी दण्ड के फैसले के फौरन बाद अयोग्यता अर्जित कर लेंगे और उसके बाद उन्हें अपने पदों से मुक्त मान लिया जायेगा।

वे पूछते हैं कि जब दागियों को विधिक तरीके से सार्थक दण्ड देने की प्रक्रिया विद्यमान है तो सार्वजनिक जीवन में सक्रिय किसी व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक दण्ड प्रक्रिया के तहत थाने में रिपोर्ट दर्ज होने भर को उस पर कार्रवाई के लिए पर्याप्त कैसे मान लिया जाए? खासकर जब उससे नाराज लोगों में ऐसे तमाम लोग होते हैं, जो उसकी कार्रवाइयों व सक्रियताओं से खुन्नस रखने के कारण उसे राजनीति से विरत करना चाहते हैं।

उनके अनुसार किसी को उसके खिलाफ प्रथम सूचना रिपोर्ट लिखाए जाने भर से दागी घोषित करना न्याय के सामान्य सिद्धान्तों के ही विपरीत है और प्रथम सूचना रिपोर्ट तभी सार्थक मानी जानी चाहिए, जब प्रक्रियाजनित ढंग व साक्ष्य से उसके खिलाफ आरोप सिद्ध हो जाए व उसे दोषी करार दिया जाये। यों तो राजनीतिक लोगों के खिलाफ विभिन्न प्रकार के आरोप निरंतर लगाये ही जाते रहते हैं।

साफ है कि सर्वोच्च न्यायालय की चिंता के अनुसार दागियों का निर्धारण होने लगे तो सबसे अधिक नुकसान राजनीतिक दलों को होगा। यह और बात है कि सर्वोच्च न्यायालय की चिंता में कम से कम इस आधार पर कोई दोष नहीं देखा जा सकता कि उम्मीदवारों में अपराधिक प्रवृत्ति जिस स्तर तक बढ़ती जा रही है, वह असंदिग्ध रूप से चिन्ताजनक है ही। लेकिन दागियों या अभियुक्तों से अपराधी जैसे सलूक को भी न्यायसंगत व विधिक दृष्टि से निर्दोष नहीं माना जा सकता।

दरअसल, समस्या की जड़ में यह विडम्बना है कि नेताओं या प्रत्याशियों के खिलाफ जिन मामलों में रिपोर्ट दर्ज होती है, उनमें त्वरित निर्णय की कोई व्यवस्था ही नहीं है। इसका परिणाम यह होता है कि उनके विरुद्ध मुकदमे इकट्ठे होते रहते हैं और पुलिस कोई कार्रवाई करने में सक्षम नहीं दिखती। जल्दी सुनवाई की याचना की जाए तो भी शीघ्र निर्णय की संभावना नहीं बन पाती क्योंकि अभी तक आपराधिक मामलों की बढ़ती संख्या को निपटाने के लिए अपेक्षित संख्या में न्यायाधीशों की नियुक्ति ही नहीं हो पाई है।

Election Commission Rights

चुनाव आयोग के अधिकारों की बात करें तो आमतौर पर संवैधानिक संस्था के रूप में उसके कार्य में बाधाएं नहीं उत्पन्न की जातीं। उसको जो भी अधिकार हैं, उनके उपयोग को लेकर उठाये गये विवादों पर विचार के लिए न्यायालय सक्षम संस्था है। चुनाव आयोग की निष्पक्षता को लेकर सवाल उठते ही रहते हैं और उसके द्वारा गड़बड़ियों की शिकायत होने पर उच्च व सर्वोच्च न्यायालय द्वारा परीक्षण का प्रावधान है लेकिन इन न्यायालयों को भी चुनाव सुधार का कोई अधिकार नहीं है।

साफ है कि जब तक सर्वोच्च न्यायालय की इस चिंता का जनप्रतिनिधित्व कानून के प्रावधानों में समावेश नहीं होगा, तब तक ये उसके ये निर्देश हो-हल्ला मचाने का माध्यम तो हो सकते हैं लेकिन राजनीति के अपराधीकरण की बुराई रोकने का माकूल अस्त्र नहीं बन सकते।

हां, इस अर्थ में इनका प्रचारात्मक महत्व जरूर है कि इनके बाद यह समझना आसान हो जायेगा कि राजनीति के अपराधीकरण का सर्वाधिक दायित्व उन पर ही आता है, जिन्हें इस सम्बन्धी विधि बनाने का अधिकार है।

इसे यों समझ सकते हैं कि, जैसा कि कह आये हैं, चुनावों के मामले में व्यवस्थाएं बनाने का अधिकार संसद को ही है और अभी तक इस आपत्ति का निराकरण नहीं हो पाया है कि जो राजनीति के अपराधीकरण के लाभार्थी हैं, वे ही इस सम्बन्धी कानून के स्वरूप के निर्धारक बन जायें तो उनकी निष्पक्षता को किस निगाह से देखा जाए?

शीतला सिंह

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं व जनमोर्चा के प्रधान संपादक हैं।

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