पूंजीवादी व्यवस्था और नेपोटिज्म

Sushant Singh Rajput

Capitalist system and nepotism

ग्लैमर की चमचमाती दुनिया बाहर से जितनी आकर्षक लगती है अन्दर से उतनी ही खोखली है, हालांकि इस चमचमाती दुनिया के अन्दर के खोखलेपन को दर्शाती फिल्में समय-समय पर बनती रहती हैं – जैसे 2005 में मधु भंडारकर की फिल्म ‘पेज-3’, 2008 में ‘फैशन’ व  उसके बाद 2015 ‘कलेंडर गर्ल’ आई थीं, जिसमें फिल्म व फैशन जगत की वीभत्स तस्वीर (Gruesome picture of film and fashion world) उभारी गई थी लेकिन हकीकत उससे भी कहीं ज्यादा भयावह है।

चकाचौंध में रहने के आदी कलाकारों की खूबसूरती और महफिल जब साथ छोड़ने लगती है तो एक अविश्वास और अनिश्चितता इतनी गहरी घर कर जाती है कि वो अपने को एक कमरे तक सीमित कर अकेलेपन को अपना साथी बना लेते हैं। धीरे-धीरे यही अकेलापन उनकी जान का दुश्मन बन जाता हैं।

लॉकडाउन के 70 दिनों के दौरान बहुत से टीवी कलाकार और फिल्म से जुड़े कलाकारों के आत्महत्या के मामले आ चुके हैं, इनमें से ज्यादातर कैरियर और भविष्य को लेकर परेशान थे। पर्दे पर हर मुश्किल से जूझने की सीख देने वाले कलाकार असल जिन्दगी की परेशानियों के आगे झुक गए। तमिल एक्टर श्रीधर और उनकी बहन जया कल्याणी ने तंगहाली के चलते खुदकुशी की थी, इसी तरह टीवी एक्टर प्रेक्षा मेहता और मनप्रीत ग्रेवाल, कुशल पंजाबी ने केरियर के रुक जाने के चलते आत्महत्या की। दिशा सालियान और उसके बाद सुशान्त सिंह राजपूत की आत्महत्या (Sushant Singh Rajput’s suicide) के बाद एक शब्द और एक अभियान बहुत जोरों से चलन में आया वो है नेपोटिज्म जिसका अर्थ (Meaning of nepotism) है भाई-भतीजावाद। इस अभियान के तहत ही अब बड़े बैनरों की फिल्में और बड़े बड़े सुपरस्टारर्स की फिल्मों का विरोध करने की भी बात कही जा रही है।

इसी बीच इस अभियान में बहुत से कलाकारों ने भी हिस्सा लिया और अपनी आपबीती बताई जिससे यह जाहिर हुआ कि नये कलाकारों को अपने अभिनय की कीमत किस हद तक चुकानी पड़ती है। दिवंगत अभिनेता इंद्रकुमार की पत्नी ने उनके मौत का कारण नेपोटिज्म को बताया।

What is the source of nepotism?

यहां सवाल यह है कि नेपोटिज्म आया कहां से है? क्या यह केवल फिल्मी दुनिया में (Nepotism in the film world) है या और भी क्षेत्रों में हैं? दरअसल हमारे देश में असमानता की खाई इतनी अधिक बढ़ गई है कि ये असमानता और भविष्य की अनिश्चितता फिल्मी दुनिया ही नहीं, हर क्षेत्र में  स्पष्टदिखाई देती है। 1991 के बाद वैश्वीकरण के आगमन ने गलाकाट प्रतिस्पर्धा ने पूंजी के केन्द्रीयकरण (Centralization of capital) को बढ़ावा दिया है परिणामस्वरुप आमदनी का 73 प्रतिशत धन देश के महज 1 प्रतिशत ऐसे लोगों की तिजोरियों में केंद्रित होता चला गया जो पहले से ही पूंजीपति है जिसके चलते देश की आधी आबादी यानी 67 करोड़ लोगों की आय में केवल 1 प्रतिशत वृद्धि हुई है। एक दशक में अरबपतियों की आय लगभग 10 गुना बढ़ गई और उनकी कुल संपत्ति वित्त वर्ष 2018-19 के पूरे भारत के केन्द्रीय बजट से अधिक है जो कि INR 24422 बिलियन थी आक्सफैम की रिपोर्ट के आधार पर 63 भारतीय अरबपतियों की संयुक्त कुल संपत्ति वित्त वर्ष 2018-19 में भारत के कुल केन्द्रीय बजट (24,42,200 करोड़ रुपये ) से अधिक है। यह स्थिति कोरोना से पहले की थी, कोरोना के बाद की परिस्थिति और भी ज्यादा भयावह है।

पूंजी के केन्द्रीयकरण के कारण निम्न वर्ग ही नहीं मध्यम व उच्च वर्ग  के बीच भी भविष्य में रोजगार और केरियर की अनिश्चितता अधिक बढ़ गई है सभी अपने बेटे-बेटी रिश्तेदार को रोजगार दिलाने के लिए कोशिश करते हैं जहां से नेपोटिज्म शुरु होता है।

ये नेपोटिज्म केवल रिश्तेदारों तक सीमित नहीं रहता, फिर इसका प्रयोग परिवार से आगे बढ़कर जातीय समुदाय को मजबूत करने के साथ अपने धर्म को मजबूत करने के रुप में दिखाई देने लगता है। यही कारण है कि जब पायल तड़वी जैसे लोग निम्न जाति से ऊपर उठकर डॉक्टर बनने की योग्यता हासिल कर लेते हैं या फिर रोहित वोमुला जैसे छात्र प्रोफेसर बनने की योग्यता हासिल कर लेते हैं, एक खास वर्ग में जगह बनाने लगते हैं तो अन्य वर्ग स्वयं को असुरक्षित महसूस करने लगते है।

अवसर की कम उपलब्धता के कारण प्रत्येक वर्ग व जाति समुदाय के लोगों को असुरक्षा महसूस होने लगती है, उन्हें लगता है कि डॉक्टर या प्रोफेसर के लिए सुरक्षित सीट पर अब किसी और का कब्जा हो जायेगा। उच्च वर्ग के पास बहुत से साधन और विकल्प मौजूद रहते है लेकिन पूंजीवादी व्यवस्था में ये विकल्प कम होते जा रहे हैं इस कारण उनमें इतनी अधिक अनिश्चितता बढ़ने लगी है कि अपने प्रभावी क्षेत्र में लोगों को प्रभावित कर अपने रिश्तेदार के लिए रोजगार सुनिश्चित करते है अब अगर इस क्षेत्र में कोई बाहरी अपनी मेहनत के दम पर एक मुकाम बनाने में कामयाब हो जाता है तो प्रभावी लोगों को उससे असुरक्षा महसूस होने लगती है और वे उसे लगातार उपेक्षित करते रहते हैं। जैसे कि सुशान्त के केस में देखा जा सकता है जो कि एक मिडिल क्लास घर का होनहार लड़का था जिसने दिल्ली कालेज ऑफ इंजिनियरिंग से पढ़ाई की, लेकिन फिल्मों मे आने के बाद उसे उपेक्षा का शिकार होना पड़ा।

अक्सर कहा जाता है कि हमें अपनी पसन्द के अनुरूप व्यवसाय व केरियर बनाना चाहिए लेकिन दिनोंदिन बढ़ती बेरोजगारी में हम किस तरह अपने पसन्द का व्यवसाय चुन सकते है?

नेशनल सेंपल सर्वे (एनएसएसओ) की रिपोर्ट बताती है कि भारत में बेरोजगारी दर (Unemployment rate in india) 45 साल में सबसे अधिक 6.1 प्रतिशत हो गई है जबकि कुछ शोध बेरोजगारी की दर 8 प्रतिशत से भी अधिक बता रहे हैं। खुद रिजर्व बैंक के गर्वनर 3-6 जून 2019 की मौद्रिक नीति समिति बैठक में कह चुके हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था स्पश्ट तौर पर अपनी रफ्तार खो रही है।

7 अगस्त 2019 की मौद्रिक नीति समिति की बैठक में रिजर्व बैंक के गवर्नर ने कहा है कि ‘‘ जून 2019 के बाद आर्थिक गतिविधियों से ऐसे संकेत मिल रहे है कि भारतीय अर्थव्यवस्था में मंदी और बढ़ रही है’’।

कोरोना काल में यह मंदी वैश्विक स्तर पर बढ़ रही है, कारोबार-उद्योग जगत में नकदी की किल्लत होने लगी है ऐसे में लोगों की वेतन कटौती, छंटनी शुरु हो गई है।

फिल्म उद्योग जगत जहां हमेशा से इंडस्ट्रीज मे काम करने वाले कलाकारों को कभी भी रोजगार की गारन्टी नहीं होती थी, फिल्म जगत में जब तक काम मिलता है तब तक ही पैसा और शोहरत है लेकिन काम न मिलने पर नाम पैसा और शोहरत सब गायब हो जाता है और कलाकार गुमनामी के अंधेरे में खो जाता है कोरोना काल में पूरा फिल्म उद्योग जगत ठप्प पड़ गया है हमेशा कैमरे की चकम-धमक में जीने वाला कलाकार अकेले पड़ गया है आज उसके पास काम मिल पाने और अपने कैरियर को बढ़ा पाने की उम्मीद कम हो रही है जिसके कारण वह आत्महत्या का सहारा ले रहा है।

मनोचिकित्सकों और मानसिक स्वास्थ्य विशषज्ञों का कहना है कि कोविड-19 महामारी के चलते भारतीयों में नौकरी खोने के डर से पैनिक अटैक का मामला बढ़ा है। मौजूदा संकट के चलते लोगों को संक्रमण और मौत के डर के साथ-साथ आर्थिक अनिश्चितता और नौकरी खोने का डर सता रहा है। इस डर के कारण निम्न वर्ग हो या उच्च वर्ग सभी को अपने परिवार, समुदाय और जाति के भविष्य पर खतरा मंडराता दिख रहा है।

ये डर केवल कोरोना के समय का उत्पन्न हुआ डर नहीं है, यह डर उस पूंजीवादी व्यवस्था से उत्पन्न हुआ है जिसमें गरीब मेहनतकश मजदूर हो या मध्यम वर्ग, सभी के हक की पूंजी कुछ गिनेचुने लोगों की तिजारी में बन्द है। पूंजी के इस केन्द्रीयकरण के कारण ही आज वंचित वर्ग में अनिश्चितता, असुरक्षा की भावना बनी हुई है और जब तक पूंजीकरण का केन्द्रीयकरण होता रहेगा तब तक नेपोटिज्म, आत्महत्या, धार्मिक उन्माद जैसी समस्या बढ़ती रहेगी।

डॉ. अशोक कुमारी

पाठकों सेअपील - “हस्तक्षेप” जन सुनवाई का मंच है जहां मेहनतकश अवाम की हर चीख दर्ज करनी है। जहां मानवाधिकार और नागरिक अधिकार के मुद्दे हैं तो प्रकृति, पर्यावरण, मौसम और जलवायु के मुद्दे भी हैं। ये यात्रा जारी रहे इसके लिए मदद करें। 9312873760 नंबर पर पेटीएम करें या नीचे दिए लिंक पर क्लिक करके ऑनलाइन भुगतान करें