जानिए क्या है डीप ओशन मिशन, अर्थव्यवस्था में कैसे करेगा योगदान

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डीप ओशन मिशन : समुद्र की गहराई में छिपे हैं एक नई अर्थव्यवस्था के सूत्र

नई दिल्ली, 08 अप्रैल 2022: भारतीय समुद्री सीमा में गहरे समुद्र का अन्वेषण करने के लिए कुछ समय पूर्व ‘डीप ओशन मिशन’ (Deep Ocean Mission in Hindi ) शुरू किया गया है। ‘डीप ओशन मिशन’ के उद्देश्यों (Objectives of ‘Deep Ocean Mission’) में गहरे समुद्र से संबंधित स्थितियों, जीवन अनुकूल अणुओं, तथा जैविक संघटकों की रचना संबंधी अध्ययन शामिल है, जो पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति पर प्रकाश डालने का प्रयास करेगा।

केंद्रीय राज्य मंत्री डॉ जितेंद्र सिंह ने संसद में दी जानकारी

केंद्रीय राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) विज्ञान और प्रौद्योगिकी; राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) पृथ्वी विज्ञान; राज्य मंत्री पीएमओ, कार्मिक, लोक शिकायत, पेंशन, परमाणु ऊर्जा और अंतरिक्ष; डॉ जितेंद्र सिंह द्वारा यह जानकारी बृहस्पतिवार को संसद में प्रदान की गई है।

गहरे समुद्र में छिपे रहस्यों को उजागर करेगा डीप ओशन मिशन

पृथ्वी का 70 प्रतिशत भाग जल से घिरा है, जिसमें विभिन्न प्रकार के समुद्री जीव-जंतु पाये जाते है। गहरे समुद्र के लगभग 95.8% भाग मनुष्य के लिए आज भी एक रहस्य हैं। गहरे समुद्र में छिपे इन रहस्यों (secrets hidden in the deep sea) को उजागर करने के लिए ‘डीप ओशन मिशन’ शुरू किया गया है। ‘डीप ओशन मिशन’ को आरंभ में पाँच वर्ष के लिए मंजूरी मिली है। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संगठनों के सहयोग से किये जा रहे इस अध्ययन के समन्वय की जिम्मेदारी पृथ्‍वी विज्ञान मंत्रालय को सौंपी गई है।

‘डीप ओशन मिशन’ का मुख्य लक्ष्य समुद्री संसाधनों को चिह्नित कर ब्लू इकोनॉमी को गति प्रदान करना है।

केंद्रीय मंत्री ने बताया कि गहरे समुद्र में बायोफूलिंग (Biofouling – जैविक दूषण) तथा जीवन की उत्पत्ति संबंधी अध्ययन के लिए पाँच वर्ष की अवधि के लिए 58.77 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं। जैविक दूषण; सूक्ष्मजीवों, पौधों, शैवाल, या सूक्ष्मजीवों के जमाव को कहते हैं। जलस्रोतों में ऐसी स्थिति का एक उदाहरण जहाजों और पनडुब्बी पतवारों पर जैविक पदार्थों का जमाव है।

डीप ओशन मिशन के प्रमुख उद्देश्य क्या हैं? | What are the main objectives of Deep Ocean Mission?

इस मिशन के छह प्रमुख उद्देश्य हैं। इनमें गहरे समुद्र में खनन (deep sea mining) और मानव युक्त पनडुब्बी के लिए प्रौद्योगिकियों का विकास, महासागर जलवायु परिवर्तन परामर्श सेवाओं का विकास, गहरे समुद्र में जैव विविधता की खोज (Exploring Biodiversity in the Deep Sea) एवं संरक्षण के लिए तकनीकी नवाचार, गहरे समुद्र में सर्वेक्षण व अन्वेषण, समुद्र से ऊर्जा एवं ताजा पानी प्राप्त करना, और समुद्री जीव-विज्ञान के लिए उन्नत समुद्री स्टेशन विकास शामिल है।

समुद्र में छह हजार मीटर नीचे कई प्रकार के खनिज पाए जाते हैं। इन खनिजों के बारे में अध्ययन नहीं हुआ है। इस मिशन के तहत इन खनिजों के बारे में अध्ययन एवं सर्वेक्षण का काम किया जाएगा, और इसके अलावा जलवायु परिवर्तन एवं समुद्र के जलस्तर के बढ़ने सहित गहरे समुद्र में होने वाले परिवर्तनों के बारे में भी अध्ययन किया जाएगा।

(इंडिया साइंस वायर)

Topics: Deep Ocean Mission, MoES, Origin of Life, Biofouling, microorganisms, plants, algae

ब्रेकिंग : आज भारत की टॉप हेडलाइंस। आज की बड़ी खबरें | 31 मार्च 2022

top 10 headlines this night

सोनिया गांधी का आरोप : केंद्र सरकार ने मनरेगा का 35 फीसदी बजट कम किया

कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने आज लोकसभा में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) पर केंद्र सरकार को जमकर घेरा।

श्रीमती गांधी ने लोकसभा में कहा कि जिस मनरेगा का कुछ लोग मजाक उड़ाते थे, उसने कोरोना और लॉकडाउन के दौरान करोड़ों लोगों की मदद की। उन्होंने कहा कि इस योजना में करोना और बाढ़ प्रभावित इलाकों में करोड़ों गरीब परिवारों की मदद की उनको सहायता प्रदान करने में सरकार के बचाव में अहम भूमिका निभाई। प्रदेश सरकार ने मनरेगा के लिए आवंटित बजट में लगातार कटौती की जिसके कारण लोगों को काम कम में है और मजदूरों के भुगतान में काफी दिक्कतें हैं।

भ्रष्टाचार के आरोप में सोनभद्र के डीएम निलंबित

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक उत्तर प्रदेश सरकार ने सोनभद्र के जिलाधिकारी टी.के. शिबू पर यूपी चुनाव के दौरान खनन और निर्माण कार्यों में भ्रष्टाचार और लापरवाही के आरोप में निलंबित कर दिया है।

आखिर झुकी केंद्र सरकार – नागालैंड, असम और मणिपुर में अफस्पा का क्षेत्र घटाया

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने गुरुवार को घोषणा करते हुए कहा कि केंद्र सरकार ने एक महत्वपूर्ण कदम के तहत दशकों बाद नागालैंड, असम और मणिपुर में सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम (अफस्पा) के तहत अशांत क्षेत्रों को कम करने का फैसला किया है।

श्री शाह ने तीन अलग-अलग ट्वीट्स में बहुप्रतीक्षित निर्णय की घोषणा ऐसे समय पर की है, जब अधिकांश राजनीतिक दल और गैर सरकारी संगठन अफस्पा को निरस्त करने की मांग कर रहे हैं। पिछले साल चार और पांच दिसंबर को नागालैंड के मोन जिले में सुरक्षा बलों द्वारा 14 लोगों के मारे जाने और 30 अन्य के घायल होने के बाद इसे निरस्त करने की मांग और तेज हो गई थी।

आईएमडी ने बताया, अप्रैल में सामान्य से अधिक तापमान जारी रहेगा

 भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) ने कहा है कि उत्तर पश्चिम और मध्य भारत के बड़े हिस्सों में जारी दूसरी गर्मी की लहर के साथ ही अप्रैल में उत्तर पश्चिम के अधिकतर भागों और मध्य भारत और पूर्वोत्तर भारत के कुछ हिस्सों में सामान्य से अधिक तापमान दर्ज होने की संभावना है।

कर्नाटक में बढ़ते धार्मिक विभाजनपर किरण मजूमदार शॉ ने चेताया

 कर्नाटक में दक्षिणपंथी समूहों ने मंदिर परिसर और धार्मिक मेलों के भीतर हलाल मीट और मुस्लिम व्यापारियों के कारोबार का बहिष्कार करने के अपने आह्वान को तेज कर दिया है। इस बीच बायोकॉन की प्रमुख किरण मजूमदार-शॉ ने कर्नाटक के मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई से इस बढ़ते धार्मिक विभाजन को हल करने का आग्रह किया है।

दो वर्ष की कोविड महामारी के बाद, महाराष्ट्र सरकार ने सभी कोविड-19 प्रतिबंध हटाए

एक महत्वपूर्ण निर्णय लेते हुए दो साल बाद महाराष्ट्र सरकार ने आज सभी कोविड-19 प्रतिबंधों को हटाने का फैसला किया है। मीडिया रिपोर्ट्स में अधिकारियों के हवाले से इसकी जानकारी दी गई है।

छापेमारी के बाद ईडी ने देवेंद्र फडणवीस को निशाना बनाने वाले वकील को हिरासत में लिया

मीडिया रिपोर्ट्स में बताया गया है कि प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने गुरुवार तड़के जाने-माने वकील सतीश उके और उनके भाई प्रदीप उके के नागपुर के पार्वती नगर स्थित घरों पर छापेमारी की। बाद में ईडी ने सतीश उके को हिरासत में लिया और पूछताछ के लिए ले गए।

पेट्रोल-डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी के बाद केटीआर का कटाक्ष- अच्छे दिनों के लिए धन्यवाद मोदीजी

तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) के कार्यकारी अध्यक्ष के टी रामाराव ने गुरुवार को ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर तंज कसते हुए कहा, ‘अच्छे दिनों के लिए धन्यवाद मोदीजी’।

हंगाई को लेकर विरोधी दलों का लोक सभा में हंगामा और नारेबाजी के बाद वॉकआउट

 पेट्रोल-डीजल और रसोई गैस की बढ़ी कीमतों को वापस लेने की मांग को लेकर कांग्रेस, टीएमसी, डीएमके और लेफ्ट पार्टियों सहित कई विरोधी दलों के सांसदों ने गुरुवार को लोक सभा में जमकर हंगामा किया। गुरुवार को लोकसभा की कार्यवाही शुरू होते ही कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस और डीएमके सहित कई दलों के सांसदों ने पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस की लगातार बढ़ रही कीमतों के मुद्दा उठाने की कोशिश की। प्रश्नकाल के दौरान ही विरोधी दलों के सांसद पेट्रोलियम पदार्थों की लगातार बढ़ रही कीमत और इससे आम लोगों को होने वाली परेशानियों के पोस्टर-बैनर को लहराते हुए वेल में आकर नारेबाजी करने लगे।

पेट्रोल, डीजल के दाम फिर बढ़े

तेल विपणन कंपनियों ने आज पिछले 10 दिनों में नौवीं बार पेट्रोल और डीजल की कीमतों में वृद्धि की। इन कीमतों को चार महीने से अधिक के अंतराल के बाद पहली बार 22 मार्च को संशोधित किया गया था। नई दिल्ली में कीमतों में फिर से 80 पैसे प्रति लीटर की बढ़ोतरी की गई है।

पंप की कीमतों के अनुसार, राष्ट्रीय राजधानी में पेट्रोल की कीमत अब 101.81 रुपये प्रति लीटर और डीजल 93.07 रुपये प्रति लीटर है।

पावरलिफ्टर्स सुधीर और जयदीप ने नेशनल चैंपियनशिप में छह स्वर्ण पदक जीते

टोक्यो 2020 पैरालिंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व करने वाले एशियाई पैरा खेलों के पदक विजेता सुधीर और जयदीप ने कोलकाता में आयोजित 19वीं सीनियर और 14वीं जूनियर राष्ट्रीय पैरा पावरलिफ्टिंग चैंपियनशिप 2022 में छह स्वर्ण पदक के साथ तालिका में शीर्ष स्थान हासिल किया।

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प्लास्टिक कचरा समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र के लिए बना मुसीबत

marine ecosystem

50% single-use plastic in marine waste

समुद्री कचरे में 50 प्रतिशत एकल उपयोग प्लास्टिक

नई दिल्ली, 31 मार्च 2022: प्लास्टिक कचरा पर्यावरण के लिए अनुकूल नहीं है, और समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र भी प्लास्टिक कचरे के बढ़ते प्रकोप से अछूता नहीं (Plastic waste is a problem for the marine ecosystem) है।

भारतीय शोधकर्ताओं के एक अध्ययन के दौरान समुद्री कचरे में 50 प्रतिशत से अधिक मात्रा एक बार उपयोग होने वाले प्लास्टिक की पायी गई है।

समुद्र तटीय निगरानी से जुड़ी एक देशव्यापी पहल के अंतर्गत पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय से सम्बद्ध राष्ट्रीय तटीय अनुसंधान केंद्र (एनसीसीआर), चेन्नई द्वारा नियमित अंतराल पर देश के विभिन्न समुद्र तटों पर तटीय क्षेत्र की सफाई से जुड़ी गतिविधियां की जा रही हैं। वर्ष 2018 से 2021 के दौरान समुद्री कचरे के आकलन के लिए यह पहल की गई है।

केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार), पृथ्वी विज्ञान राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार), प्रधानमंत्री कार्यालय, कार्मिक, लोक शिकायत, पेंशन, परमाणु ऊर्जा एवं अंतरिक्ष राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह द्वारा यह जानकारी लोकसभा में एक प्रश्न के लिखित उत्तर में प्रदान की गई है।

डॉ सिंह ने बताया कि समुद्र तट पर कचरे के सर्वेक्षण से पता चला है कि सबसे अधिक कूड़े का संचय ज्वारभाटा क्षेत्र की तुलना में पश्च-तट (backshore) में होता है। इसके अलावा, शहरी समुद्र तटों में ग्रामीण समुद्र तटों की तुलना में अधिक संचय दर देखी गई है।

उन्होंने कहा, सूक्ष्म/मेसो/मैक्रो प्लास्टिक प्रदूषण के लिए तटीय जल, तलछट, समुद्र तट और बायोटा के नमूनों का विश्लेषण किया गया है।

मानसून के दौरान भारत के पूर्वी तट पर सूक्ष्म प्लास्टिक (Micro-plastic) कणों की प्रचुरता में वृद्धि देखी गई है। नदी के मुहाने के पास के स्टेशनों में माइक्रो-प्लास्टिक सांद्रता अधिक थी।

केंद्रीय मंत्री ने कहा कि राष्ट्रीय तटीय अनुसन्धान केंद्र (एनसीसीआर ); तटीय जल, तलछट, और वाणिज्यिक मछलियों, बिवाल्व्स और क्रस्टेशिया सहित विभिन्न बायोटा में समुद्र तटों में कचरे का आकलन करने से जुड़ी अनुसंधान गतिविधियां चला रहा है। भारत के पूर्वी तट के लिए सूक्ष्म प्लास्टिक प्रदूषण के स्तर पर डेटा तैयार किया गया है, और पश्चिमी तट का मूल्यांकन शीघ्र ही किया जाना प्रस्तावित है। राष्ट्रीय समुद्री कचरा नीति तैयार करने हेतु रोडमैप तैयार करने के लिए विभिन्न शोध संस्थानों के प्रतिभागियों, हितधारकों, नीति-निर्माताओं, औद्योगिक एवं शैक्षणिक विशेषज्ञों के साथ विमर्श किया जा रहा है।

संयुक्त राष्ट्र स्वच्छ समुद्र कार्यक्रम (UNEP’s Clean Seas Campaign) के अंतर्गत भारतीय तटीय जल में समुद्री कचरे की मात्रा के निर्धारण, और प्लास्टिक प्रवाह को कम करने के लिए राष्ट्रीय कार्ययोजना शुरू कर तत्काल और ठोस कार्रवाई पर जोर दिया गया है।

(इंडिया साइंस वायर)

Topics: MoES, NCCR, Marine Litter, Parliament, Loksabha Plastic Pollution, Environment

गंभीर खतरे में ऑस्ट्रेलिया की ग्रेट बैरियर रीफ, यूएनओ पहुंचा मामला

Climate change Environment Nature

Australia’s Great Barrier Reef in serious danger, matter reached UNO

विश्व की सबसे बड़ी कोरल रीफ़ है द ग्रेट बैरियर रीफ (The Great Barrier Reef is the world’s largest coral reef)

क्या प्रवाल भित्तियों पर मछली समुदाय कम रंगीन होते जा रहे हैं?

नई दिल्ली, 25 मार्च 2022. दुनिया की सबसे बड़ी कोरल रीफ़, द ग्रेट बैरियर रीफ, एक बार फिर खबरों में है। और यह खबर बुरी है। ऑस्ट्रेलियन पर्यावरण समूह क्लाइमेट काउंसिल की ताजा रिपोर्ट (The latest report from the Australian environmental group Climate Council) की मानें तो ऑस्ट्रेलिया के उत्तर-पूर्वी तट के पास समुद्री तापमान इतना बढ़ गया है कि इससे ग्रेट बैरियर रीफ में एक सामूहिक ब्लीचिंग का भी खतरा बढ़ गया है। वैज्ञानिकों कि मानें तो तापमान की यह औसत बढ़ोतरी लगभग दो से चार डिग्री सेल्सियस तक है।

मूँगों की सामूहिक ब्लीचिंग मतलब क्या है? | What does mass bleaching of corals mean?

ब्लीचिंग मतलब रंग उतरना। और मूँगों की ऐसी सामूहिक ब्लीचिंग तब होती है जब उनके अंदर के शैवाल बाहर निकल आते हैं और इस वजह से मूंगों का रंग सफेद हो जाता है। बीते दशक में ऐसी ब्लीचिंग तीन बार हो चुकी है और बढ़ते तापमान से एक बार फिर ऐसा खतरा मंडरा रहा है।

Reef Health update – 25 March 2022 (रीफ स्वास्थ्य अद्यतन – 25 मार्च 2022)

घटनाक्रम की सत्यता पर मुहर लगाते हुए ग्रेट बैरियर रीफ मरीन पार्क अथॉरिटी ने कहा है कि “पूरे मरीन पार्क में ब्लीचिंग का पता चला है। यह व्यापक लेकिन परिवर्तनशील है। कई क्षेत्रों में मामूली से लेकर गंभीर प्रभाव तक कि सूचना मिली है।”

लेकिन ऑस्ट्रेलियन रिसर्च काउंसिल सेंटर ऑफ एक्सीलेंस फॉर कोरल रीफ स्टडीज (Australian Research Council Center of Excellence for Coral Reef Studies) के विशिष्ट प्रोफेसर और ग्रेट बैरियर रीफ के एक प्रमुख विशेषज्ञ, टेरी ह्यूस, का तो कहना है कि रीफ 2016 से ही चौथे बड़े पैमाने के ब्लीचिंग का अनुभव कर रही है।

संयुक्त राष्ट्र के रडार पर

घटनाक्रम की गंभीरता का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि संयुक्त राष्ट्र की एक टीम ने भी इस विश्व धरोहर स्थल की यात्रा शुरू की है। यह टीम इस बात का मूल्यांकन करेगी कि रीफ को “खतरे में” घोषित किया जाए या नहीं।

अभी कुछ दिन पहले ही ऑस्ट्रेलिया सरकार के ग्रेट बैरियर रीफ मरीन पार्क प्राधिकरण ने बताया था कि क्वींसलैंड राज्य के तट के पास तापमान काफी बढ़ गया था। और बढ़ते तापमान का असर न सिर्फ समुद्र में मछलियों और अन्य जीवों पर पड़ रहा है, उसकी वजह से पर्यटन को भी चोट पहुंच सकती है।

अगर जलवायु परिवर्तन कि यही रफ़्तार रही तो, क्लाइमेट काउंसिल की रिपोर्ट के मुताबिक़, साल 2044 के बाद से हर साल ही ऐसी ब्लीचिंग होने की आशंका बन जाएगी। इस दिशा में वैज्ञानिकों के इस समूह ने मांग की है की ऑस्ट्रेलिया अपने कार्बन उत्सर्जन को 2030 तक 2005 के स्तर के मुकाबले 75 प्रतिशत नीचे लाये। ध्यान रहे कि यह सरकार के लक्ष्य से तीन गुना ज्यादा है.

फैसला अब यूनेस्को के हाथ

यूनेस्को के विशेषज्ञों ने बीती 21 मार्च को ही ऑस्ट्रेलिया की 10-दिवसीय यात्रा शुरू कर दी है। इस दौरान वो सरकार की रीफ 2050 योजना की समीक्षा करने के लिए वैज्ञानिकों, नियामकों, नीति निर्माताओं, स्थानीय समुदायों और मूल निवासी के नेताओं से मिलेंगे। यूनेस्को ने एक बयान में कहा कि टीम का मुख्य लक्ष्य यह पता करना है कि योजना “जलवायु परिवर्तन और अन्य कारणों की वजह से ग्रेट बैरियर रीफ के प्रति खतरों का सामना करती है या नहीं और तेजी से कदम बढ़ाने का रास्ता बताती है या नहीं।” इन विशेषज्ञों की रिपोर्ट मई में आने की संभावना है, जिसके बाद विश्व धरोहर समिति में अनुशंसा भेजी जाएगी कि स्थल को “खतरे में” घोषित किया जाए या नहीं। समिति की बैठक जून में होनी है। 2015 और 2021 में ऑस्ट्रेलिया को “खतरे में” की घोषणा बचाने के लिए भारी लॉबिंग करनी पड़ी थी।

Tropical coral reefs at serious risk from climate change

ध्यान रहे कि हाल की IPCC (आईपीसीसी) रिपोर्ट के अनुसार, उष्णकटिबंधीय कोरल रीफ़ को जलवायु परिवर्तन से गंभीर खतरा है। यदि वैश्विक तापमान 1.5 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ जाता है, तो उष्णकटिबंधीय कोरल रीफ़ में 70-90% गिरावट आती है, और यदि वार्मिंग 2 डिग्री सेल्सियस तक जारी रहती है तो इनमें 99% गिरावट देखी जाएगी। वर्तमान उत्सर्जन नीतियों और प्रतिबद्धताओं ने दुनिया को लगभग 2.3-2.7 डिग्री सेल्सियस की वार्मिंग के मार्ग पर डाल दिया है।

क्लाइमेट एक्शन ट्रैकर के अनुसार, ऑस्ट्रेलिया की जलवायु नीतियां वार्मिंग को सीमित करने के लिए बेहद अपर्याप्त’ हैं, और – यदि अन्य देशों द्वारा इन्हे दोहराया जाता है – तो 3-4 डिग्री सेल्सियस वार्मिंग हो जाएगी। ये देश दुनिया में कोयले के शीर्ष दो निर्यातकों में से एक है। ऑस्ट्रेलिया की जलवायु नीतियां और प्रतिबद्धताएं पेरिस समझौते के अनुकूल नहीं हैं और ऑस्ट्रेलिया को उत्सर्जन में कमी के लिए अधिक महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित करने की आवश्यकता है।

क्या विकास की बलि चढ़ जाएगा रेगिस्तान? सौर ऊर्जा के नाम पर प्रकृति का विनाश

thar ka registan

Will the desert have to sacrifice development?

जैसलमेर जिले के गांव कुछड़ी में आलाजी लोक देवता के नाम से छोड़ी गई 10 हजार बीघा ओरण भूमि भू-सैटलमेंट के दौरान राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज नहीं हुई. एक दर्जन गांवों के मवेशी तथा जीव-जंतुओं की प्रजातियां इसी ओरण की शरण में जीवन-यापन करती हैं तथा थार की जैव विविधता एवं पारिस्थितिकी तंत्र के संतुलन (Thar’s biodiversity and ecosystem balance) में योगदान देती है. पूर्वजों ने ओरण में विविध प्रकार के जल स्त्रोत बनाए थे जिनसे पशुओं व जीव-जंतुओं को चारा, पानी मिल सके. कुछड़ी गांव के लोगों ने इस भूमि का एक बड़ा भाग विकास के नाम पर एक निजी कंपनी को आवंटित किए जाने की आशंका जताई. वहीं कुछ लोग गोचर में अवैध तरीके से खेती करने लगे हैं. सीमाज्ञान और अतिक्रमण हटाने की पशुपालकों की मांग को नजरअंदाज किया जा रहा है.

सियांबर गांव के लोग एवं ग्राम पंचायत सदियों से चारागाह के रूप में उपयोग करने वाली भूमि को सौर ऊर्जा उत्पादन कंपनी को आवंटित किए जाने की संभावना का विरोध कर रहे हैं.

प्रकृति का विनाश : गौचर जमीनों को बचाने के लिए किए जा रहे हैं जन आंदोलन

जैसलमेर की देगराया औरण को राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज कराने की मांग निरंतर उठ रही है. बाप क्षेत्र अखाधना गांव के लोग अपने तालाब के आगौर को राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज कराने की मांग कर रहे हैं. गौचर जमीनों को बचाने के लिए किए जा रहे जन आंदोलन इसका उदाहरण है.

विकास के नाम पर सरकार कंपनियों के साथ खड़ी है

रेगिस्तान में जीवन की संभावनाओं (life prospects in the desert) को पूर्वजों ने ओरण, गोचर, तालाबों के विकास में देखा था. प्रत्येक गांव में इसकी शृंखला जीवन का हिस्सा थी. यहां गांव नदियों के किनारे नहीं बसे. ओरण, गोचर और तालाबों के किनारे बसे. सरकार के भू-राजस्व अभिलेखों में यह जमीनें कहीं दर्ज हुई, कहीं नहीं हुई. आज इनकी स्थिति खराब हुई है. लोग चाह कर भी इनकी सुरक्षा और संरक्षण नहीं कर पा रहे हैं. हालांकि रेगिस्तान के लोग अपने शामलात संसाधनों को बचाने के लिए अलग-अलग तरह से संघर्ष कर रहे हैं. जबकि सरकार और प्रशासन विकास की दुहाई देकर कंपनियों के साथ खड़ा है (Government stands with companies in the name of development). वहीं दूसरी तरफ लोग अपने बूते पर संसाधनों को बचाने का प्रयास कर रहे हैं. पूंजी की क्रूरता और जीवन के बीच के युद्ध में जीत किसकी होगी, यह समय ही बताएगा.

इन सामुदायिक संसाधनों, चारागाह, ओरण गौचर, तांडा, तालाब, बेरियां, खड़ीनें, बरसाती नदियां और उनका कैचमेंट ऐरिया राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज नहीं हुआ. भू-सेटलमेंट के दौरान के समय में लोगों की आजीविका का मुख्य साधन पशुपालन था. किसानों की खातेदारी जमीनों के उत्पादन पर टेक्स (बिगोड़ी) लगता था, इस कारण से किसान अपनी व्यक्तिगत भूमि भी रिकॉर्ड में कम दर्ज कराता था. स्थानीय लोगों को लगता था कि इस जटिल भौगोलिक और गर्म व शुष्क जलवायु वाले क्षेत्र में कौन आएगा? रिकॉर्ड में दर्ज हो, या नहीं, जमीन और संसाधन हमारे रहेंगे.

राजस्थान की अधिकांश ओरण, गौचर पर कुछ स्थानीय लोगों ने कब्ज़ा किया हुआ है. कुछ जगहों पर सरकार द्वारा कंपनियों को आवंटित की गयी है और यह सिलसिला जारी है. सरकार भूल सुधार के बजाय मौके का फायदा उठा रही है.

समुदाय की मांग को दरकिनार कर एकतरफा फैसले लिए जा रहे हैं. समुदाय द्वारा जीवन की संभावनाओं को संजो कर रखा गया था, उन जमीनों को विंड एवं सौर ऊर्जा कंपनियों को दे रही है. इससे रेगिस्तान के स्थानीय लोगों की आजीविका के साथ-साथ पर्यावरण, जैव विविधता बर्बाद हो रही है, इस पर किसी का ध्यान अब तक नहीं गया है.

विश्व की सबसे बड़ी कृत्रिम इंदिरा गांधी नहर (world’s largest artificial canal Indira Gandhi Canal) आगमन से रेगिस्तान में बड़ा बदलाव आया. पानी की बूंद-बूंद की हिफाजत करने वाले क्षेत्र में रावी और सतलुज के पानी की धार बहने लगी. शुष्क मरू प्रदेश का सीमांत क्षेत्र नम हुआ. पशुपालन आधारित खेती से चलने वाली आजीविका की जगह आधुनिक कृषि ने जड़ें जमाई. सिंचाई और पेयजल विकास की योजनाएं गतिमान हुईं. पानी की किल्लत दूर होने के साथ-साथ ढांचागत एवं औद्योगिक विकास हुआ और लगातार हो रहा है. इससे पूंजी का प्रवाह बढ़ा है और निवेश के द्वार खुले हैं.

thar biodiversity
thar biodiversity

पूर्वजों द्वारा प्रकृति के साथ तालमेल बनाकर विकसित की गयी टिकाऊ आजीविका घौर अनिश्चितता के दौर में है. नहर और उससे सिंचित भूमि हरियाली, खुशहाली के साथ पानी, मिट्टी, हवा और रगों में जहर का प्रवाह कर रही है. नहर क्षेत्र में भी कभी चारागाह, तालाब, बेरियां व उनके कैचमेंट हुआ करते थे, जिनको कृषि भूमि में बदल कर बेचा गया. बिलायती व देसी बवूल से हरियाली के जंगल खड़े किए गये. नहर निकालने से पहले यहां की भूगर्भीय संरचना को नहीं समझा गया. पूरे क्षेत्र में जिप्सम और मुल्तानी मिट्टी की परत में अथाह पानी उड़ेलने से दलदल और लवण के कारण भूमि बंजर हो रही है. विकास के नए पन्नों पर स्थानीय वनस्पति, जीव-जंतु, पर्यावरण, जैव विविधता, जन और जानवर हाशिये पर हैं.

प्रकृति को नष्ट किया जा रहा है सौर ऊर्जा के नाम पर

पानी, बिजली और यातायात विकास के साथ खनिज संसाधनों का दोहन, औद्योगिक विकास के अवसर खुले हैं. जिप्सम, कोयला, तेल, गैस, लाइमस्टोन, चाइना क्ले का खनन एवं इससे संबंधित उद्योग लगे हैं. पवन और सौर ऊर्जा की संभावनाओं को पहचाना गया है. भले ही यह क्षेत्र के लिए अनुकूल है, अथवा नहीं, लेकिन इसमें मुनाफा भरपूर है. मुनाफे ने बड़ी कंपनियों को आकर्षित किया. अथाह जल, जंगल, जमीन और सरकार का अवसर उपलब्ध कराने में भरपूर सहयोग कंपनियों को पांव पसारने में मददगार साबित हो रहा है. जिन जमीनों का उपयोग खड़ीनों, तालाबों, बेरियों के आगौर और पशुओं की चराई में करते थे, वह राजस्व रिकॉर्ड में आगौर, ओरण, गोचर के नाम से दर्ज नहीं हुई. अब यह जमीनें सरकार खनन, सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा पैदा करने वाली कंपनियों को आवंटित कर रही है.

सौर ऊर्जा गर्म और शुष्क जलवायु वाले क्षेत्र के लिए कितनी अनुकूल है?

कांच के बने सौर ऊर्जा पैनल बिजली के साथ कितनी गर्मी पैदा करेंगे? इसका कोई अध्ययन अभी तक सामने नहीं आया है. जिस भूमि पर सोलर प्लांट लगया जाता है, उसे वनस्पति विहीन किया जाता है. सौर ऊर्जा के नाम पर प्रकृति को नष्ट किया जा रहा है.

दुनिया के रेगिस्तानों में जीवंत है थार का रेगिस्तान

यह सर्वविदित है कि थार के रेगिस्तान में सूखा, अकाल की बारंबारता है. पूर्वजों ने थार में जीवन की संभावनाओं को अकाल जैसी आपदा के सामने अपने आप को टिकाए रखने के लिए तरीके निकाले. लोगों ने बताया लगातार दो-तीन वर्ष सूखा होने पर बेरियों में पानी मिल जाता था. पूरे देश में खाद्यान्न संकट के चलते विदेशों से गेहूं आयात किया जाता था, उस समय जैसलमेर की खड़ीनों में गेहूं का उत्पादन होता था. सरकार का एक विभाग आपदा प्रबंधन एवं जोखिम घटाव का काम करता है. यहां के स्थानीय लोगों ने हजारों वर्ष पहले अकाल से संबंधित आपदा जोखिम घटाव के तरीकों को विकसित कर लिया था. लेकिन अब अंध विकास की गति के सामने यह सब टिकने वाले नहीं है.

कुछ स्थानीय लालची वर्ग और मुनाफा कमाने वाली बड़ी कंपनियों की नजरें थार के रेगिस्तान पर पड़ गई हैं. इससे स्थानीय लोगों की मूल आजीविका और जीने के तरीके बदल जाएंगे. जिनको यह तरीके पसंद नहीं आएंगे वो पलायन कर जाएंगे. अंध विकास तेजी से आगे बढ़ते हुए चंद लोगों को मुनाफा देते हुए उजाड़, बिगाड़ और विरानता के पदचिन्ह छोड़ जाएगा. संभव है कि दुनिया के रेगिस्तानों में जीवंत थार का रेगिस्तान आने वाले समय में जीवन विहीन रेगिस्तान बन जाए. लगता है रेगिस्तान को भी अब विकास की बलि देनी होगी.

दिलीप बीदावत

बीकानेर, राजस्थान

(चरखा फीचर)

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दिलीप बीदावत
बीकानेर, राजस्थान
(चरखा फीचर)

जानिए लवणीय और क्षारीय मिट्टी में उगने वाले लाभकारी पौधों के बारे में

Know Your Nature

Know about the beneficial plants growing in saline and alkaline soil

वृक्षों की अनेक प्रजातियों में भूमि लवणता एवं क्षारीयता को बर्दाश्त करने की क्षमता होती है अत: इन लवणरोधी एवं क्षाररोधी वृक्षों की प्रजातियों (Salt resistant and alkali resistant tree species) से लवणीय एवं क्षारीय भूमियों को आच्छादित कर न सिर्फ उनका पुनरूत्थान किया जा सकता है वरन् इन वृक्षों की प्रजातियों से आर्थिक लाभ भी कमाया जा सकता है।

करंज (Karanj in Hindi)

यह दलहनी कुल फैबेसी की छोटी अथवा मध्य आकार की वृक्ष की प्रजाति है जो लवणीय एवं क्षारीय भूमि पर सफलतापूर्वक उगती है। करंज का वैज्ञानिक नाम पोंगामिया पिन्नाटा (Scientific name of karanj is Pongamia pinnata,) है। करंज की वृद्धि दर काफी तेज होती है। यह अत्यन्त ही महत्वपूर्ण बहुउपयोगी वृक्ष की प्रजाति है। करंज के बीज से प्राप्त तेल गठिया, त्वचा एवं बिमारियों के इलाज में प्रभावी होता है। करंज के बीज के तेल का औद्योगिक उपयोग (Industrial Uses of Karanj Seed Oil) साबुन, मोमबत्ती इत्यादि के निर्माण में होता है। इसके अतिरिक्त तेल का उपयोग जलाने हेतु भी किया जाता है। बीज के तेल को परिसंस्करण के पश्चात् बायोडीजल के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। अत: बीज अथवा बीज के तेल से आर्थिक लाभ की प्राप्ति की जा सकती है।

करंज की पत्तियों में प्रोटीन की अधिकता के कारण इसका उपयोग पालतु पशुओं के चारे हेतु किया जाता है। करंज की पत्तियों का उपयोग हरी खाद के रूप में (Use of karanj leaves as green manure) भी किया जाता है। करंज के बीज की खली का उपयोग कार्बनिक खाद के रूप में मृदा की उर्वरा शक्ति बढ़ाने के लिए किया जाता है। लकड़ी का इस्तेमाल हल तथा बैलगाड़ी की पहिया बनाने एवं ईधन के रूप में किया जा सकता है।

अर्जुन वृक्ष (Arjun tree in Hindi)

अर्जुन एक बहुउपयोगी वृक्ष की प्रजाति है जो पुष्पीय पौधों के काम्बरिटेसी कुल का सदस्य है। अर्जुन का वैज्ञानिक नाम टर्मिनेलिया अर्जुना (Scientific name of Arjuna Terminalia arjuna) है। अर्जुन की छाल में औषधीय गुण (Medicinal properties of Arjuna bark) पाये जाते हैं जिसका उपयोग हृदय सम्बन्धी बीमारियों के उपचार हेतु किया जाता है। अत: अर्जुन की छाल को औषधीय कम्पनियों को बेचकर आर्थिक लाभ कमाया जा सकता है। इसकी पत्तियों को हरे चारे के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। अर्जुन की पत्तियों का उपयोग (uses of arjuna leaves) रेशम कीटों के पालन हेतु भी किया जा सकता है।

बहेड़ा (Scientific name of Bahera Hindi name)

यह एक विशाल वृक्ष की प्रजाति है बहेड़ा का वैज्ञानिक नाम टर्मिनेलिया बेलेरिका (Scientific name of Bahera Terminalia bellirica) है। यह पुष्पीय पौधों के काम्बरिटेसी कुल का सदस्य है। बहेड़ा वनस्पति अपने औषधीय गुणों के लिए विख्यात है।

बहेड़ा वृक्ष के छाल एवं फल में औषधीय गुण पाये जाते हैं। वृक्ष के तने के छाल का उपयोग एनिमिया तथा ल्युकोडरमा के उपचार में किया जाता है।

बहेड़ा फल का उपयोग बदहजमी, कब्ज, जलोदर, बवासीर, डाइरिया, कुष्ठ रोग के उपचार में किया जाता है। फल का उपयोग ‘त्रिफला चूर्ण’ जैसी आयुर्वेदिक औषधि के निर्माण में होता है। अत: फल से आर्थिक लाभ प्राप्त किया जा सकता है। बहेड़ा की पत्तियों को हरे चारे के रूप में पालतू पशुओं हेतु इस्तेमाल किया जा सकता है।

आंवला (Indian gooseberry in Hindi)

आंवला तेज वृद्धि दर वाली छोटे वृक्ष की प्रजाति है जिसमें लवणीय एवं क्षारीय मृदा में उगने की क्षमता होती है। आंवला का वैज्ञानिक नाम फाइलेन्थस एम्बलिका (scientific name of amla Phyllanthus emblica) है। यह पुष्पीय पौधों के फाइलेन्थेसी कुल का सदस्य है। आंवला के फल का उपयोग मुरब्बा, च्यवनप्राश, चटनी, कैंडी, अचार, आदि बनाने में होता है। आंवले का फल विटामिन सी का उत्तम स्रोत होता है। फल की बाजार में मांग होने से इससे आर्थिक लाभ प्राप्त किया जा सकता है। आंवला के सूखे फल के चूर्ण का उपयोग देशी दवा के रूप में कब्ज के उपचार में किया जा सकता है। आंवला की पत्तियों का उपयोग (use of amla leaves) आँख की बिमारियों जैसे आप्थाल्मिया (ophthalmia) तथा अंधेपन के उपचार (treatment of blindness) में किया जाता है। लकड़ी का उपयोग कृषि औजार बनाने में किया जाता है।

इमली (Tamarind in Hindi)

इमली फैबेसी कुल से संबद्ध विशाल वृक्ष की प्रजाति है। इमली का वैज्ञानिक नाम टैमेरिन्डस इंडिका (Scientific name of tamarind is Tamarindus indica) है। इमली के फल में 12 प्रतिशत टारटेरिक अम्ल पाया जाता है। इमली के फल का उपयोग चटनी आदि बनाने में होता है। इमली के बीज जेलोज का स्रोत होती है जिसका उपयोग कपास एवं पटसन उद्योग में होता है। इमली की लकड़ी के टिकाऊ होने के कारण इसका व्यापक उपयोग निर्माण कार्यों में होता है। लकड़ी का इस्तेमाल ईधन रूप में भी किया जा सकता है।

शिरीष (Shirisha in Hindi)

Shirisha Tree Benfits in Hindi,

शिरीष दलहनी कुल फैबेसी से संबद्ध एक विशाल बहुउपयोगी वृक्ष की प्रजाति है। शिरीष का वैज्ञानिक नाम अल्बिजिया लेब्बेक (Scientific name of Shirisha is Albizia lebbeck) है। शिरीष की हरी पत्तियों में प्रोटीन की अधिकता के कारण इसका इस्तेमाल हरे चारे के रूप में किया जाता है। शिरीष की लकड़ी काफी मजबूत एवं टिकाऊ होती है अत: इसका उपयोग निर्माण कार्यों में बड़े पैमाने पर किया जाता है। शिरीष की लकड़ी को सागौन एवं शाखू के विकल्प के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। सूखी पत्तियों के काढ़े का इस्तेमाल श्वास सम्बन्धी बिमारियों जैसे दमा, ब्रान्काइटिस इत्यादि के उपचार में होता है।

सफेद शिरीष

सफेद शिरीष तेज वृद्धि दर वाली विशाल वृक्ष की प्रजाति है जो पुष्पीय पौधों के फैबेसी कुल का सदस्य है। सफेद शिरीष का वैज्ञानिक नाम अल्बिजिया प्रोसेरा (Scientific name of white Shirisha Albizia procera) है। सफेद शिरीष के वृक्ष का तना सफेद रंग का होता है अत: इसे सफेद शिरीष के नाम से सम्बोधित किया जाता है। इसमें लवणता को बर्दाश्त करने की प्रचुर क्षमता होती है। लकड़ी निर्माण कार्यों हेतु अति उत्तम होती है। पत्तियों में प्रोटीन की अधिकता के कारण उन्हें हरे चारे के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।

बेर

यह एक छोटे आकार की कंटीली वृक्ष की प्रजाति है जो पुष्पीय वनस्पतियों के रैमनेसी कुल का सदस्य है। बेर का वैज्ञानिक नाम ज़िज़ीफस मॉरिटियाना (Scientific name of plum is Ziziphus mauritiana) है। बेर की वृद्धि दर काफी तेज होती है। इसका फल खाने योग्य तथा फास्फोरस का प्रमुख स्रोत होता है। फल से आर्थिक लाभ प्राप्त किया जा सकता है। बेर की पत्तियों का उपयोग (use of plum leaves) हरे चारे के रूप में किया जाता है। इसके अतिरिक्त पत्तियों का उपयोग रेशम कीट पालन में भी किया जा सकता है।

शहतूत

यह छोटे आकार की वृक्ष की प्रजाति है जो पुष्पीय पौधों के मोरेसी कुल की सदस्य है। शहतूत का वैज्ञानिक नाम मोरस अल्बा (Scientific name of mulberry is Morus alba) है। शहतूत का फल खाने योग्य होता है। शहतूत के फल में विटामिन सी तथा खनिज पदार्थ पर्याप्त मात्रा में होते हैं। अत: फल की बाजार में मांग से आर्थिक लाभ प्राप्त किया जा सकता है। शहतूत की पत्तियों का उपयोग बड़े पैमाने पर रेशम कीट पालन में किया जाता है। लकड़ी का उपयोग खेल सम्बन्धी उपकरणों जैसे हाकी स्टिक, टेनिस रैकेट, बैडमिन्टन रैकेट, क्रिकेट स्टम्प इत्यादि के निर्माण में होता है।

उपर्युक्त वृक्षों की प्रजातियां लवणीय एवं क्षारीय भूमि में सफलतापूर्वक उगने की क्षमता रखती हैं। यह प्रजातियाँ अपने मृत अवशेषों जैसे पत्तियां, टहनियां, पुष्पों आदि को लवणीय मृदा सतह पर गिराती हैं जिनके विघटन से धीरे-धीरे मृदा के भौतिक एवं रासायनिक गुणों में परिवर्तन होता है परिणामस्वरूप मृदा अपने वास्तविक स्वरूप को प्राप्त करती है जिसका उपयोग पुन: फसल उगाने हेतु किया जा सकता है।

– डॉ. अरविन्द सिंह

(मूलतः देशबन्धु में प्रकाशित लेख का संपादित रूप साभार)

क्या आप जानते हैं मिट्टी की उर्वरता भी बढ़ाते हैं जलीय पक्षी!

Bird world

Water bird or aquatic bird in Hindi (जलीय पक्षी) | पक्षियों का संसार

ठंड के प्रवासी होते हैं अधिकांश जलीय पक्षी (Most of the aquatic birds are cold migrants)

अधिकांश जलीय पक्षी ठंड के प्रवासी होते हैं। अत: उनकी उपस्थिति ठंड के आगमन की सूचना देती है। जलीय पक्षी जलीय क्षेत्रों के कीट पतंगे, मछलियों, मेंढ़क तथा घोंघे जैसे जलीय जन्तुओं का खाकर जैविक नियंत्रण करते हैं। जलीय क्षेत्रों के स्वस्थ वातावरण का अनुमान पक्षियों को देखकर लगाया जा सकता है।

जलीय तंत्र की ऑक्सीजन उपलब्धता बढ़ाते हैं जलीय पक्षी

पक्षी जलीय पौधों की वृद्धि (aquatic plant growth) पर नियंत्रण रख जलीय तंत्र की ऑक्सीजन उपलब्धता (Oxygen availability of the aquatic system) को बढ़ाते है। यह जलीय पौधों की वृद्धि के लिए हानिकारक जलीय जन्तुओं जैसे केंकड़े, घोंघे आदि का भ्रमण करते हैं या खाने योग्य मछलियों के परभक्षी जंतुओं को नष्ट करते हैं। यह अपनी नाइट्रोजन तथा फास्फोरस युक्त विष्ठा के जल में उत्सर्जन से जल तथा मिट्टी की उर्वरता बढ़ाते हैं।

जलीय पक्षी कितनी तरह के होते हैं? | What are the types of aquatic birds?

संसार की कुल 12,000 पक्षियों की प्रजाति में लगभग 1300 प्रजाति भारतीय उपमहाद्वीप में पाई जाती हैं। मध्यप्रदेश की लगभग 250 प्रजातियों में से लगभग 100 प्रकार की पक्षी प्रजाति जलीय है। इन्हें भोजन, आवास, प्रवास तथा शारीरिक संरचना के आधार पर वर्गीकरण दिया गया है।

बत्तख तथा हंस प्रजाति (duck and goose)

यह दो प्रकार के होते हैं, डुबकी लगाने वाले जैसे नीलसिर बत्तख, सींक पर, लाल सिर बत्तख तथा सतह पर भी रहने वाले जैसे गिरी बत्तख, गुगुरल बत्तख, हंस, छोटी सिल्ही, पीलासर बत्तख, तिदारी बत्तख आदि।

जलमुर्गियाँ (Moorhen)

जल मुर्गी क्या है? इनमें वह जलीय पक्षी आते हैं जो बत्तख जैसे दिखते हैं, पर बत्तख नहीं होते। उदाहरण के लिये टिकड़ी, पनडुब्बी, जकाना आदि।

वेडर (Waders or shorebirds)

यह लंबे पैरों वाले पक्षियों का समूह है जो पैरों की लंबाई के अनुसार पानी की गहराई से भोजन ढूँढ़ते हैं, जैसे सारस, बलाक, बुज्जा, हंसावर, चमचा आदि।

जलकाक (Cormorant)

वैज्ञानिक नाम : फालाक्रोकोरैक्स (Phalacrocorax)। इस समूह में मछलीखोर पक्षियों का समूह जैसे पनकौआ, बम्बे आदि हैं।

उभयचर पक्षी (amphibian bird)

इस प्रकार के समूह में पक्षी पानी में नहीं पाए जाते, परन्तु पानी के समीप रहकर जलीय भोजन पर निर्भर करते हैं, जैसे किलकिला, कुरर, बाटन, धोबिन, टिटहरी, धोमरा आदि।

जलीय अनुकूलन हेतु पक्षियों की संरचनात्मक विशेषताएँ (Structural Characteristics of Birds for Aquatic Adaptation)

  • लंबी गर्दन तथा लंबी चोंच – ब्लाक, अंचल, बगुले आदि जलीय पक्षी लंबी मोटी गर्दन तथा चोंच की सहायता से मछली व अन्य जलीय जंतुओं का शिकार करते हैं।
  • लंबे पैर – सारस, बलाक, बुज्जा, हंसावर, चमचा आदि लंबे पैरों की सहायता से पानी में भोजन ढूँढ़ते हैं।
  • लंबी अंगुलियाँ – जसाना, जलमुर्गी आदि की अंगुलियाँ मजबूत तथा लंबी होती हैं जिससे वे जलीय पौधों की पत्तियों पर चल सकते हैं।
  • पंखों पर मोम की परत – बत्तख, पनडुब्बी, टिकड़ी, हवासिल आदि के पंखों में तेल की ग्रंथियाँ होती हैं जो उन्हें जलरोधन बनाती हैं।
  • झिल्ली युक्त पैर – बत्तख, हवासिल, पनकौए आदि पक्षियों के झिल्ली युक्त पैर होते हैं, जो इन्हें तैरने में मदद करते हैं।
  • चोंच की बनावट – जलीय पक्षियों की चोंच की बनावट (beak texture of aquatic birds) उनकी भोजन आदतों के अनुसार होती है जैसे –
  • आगे से चपटी– बत्तख में जलीय वनस्पति को कुतरकर खाने में मदद करते हैं;
  • चम्मच आकार की – पधीरा, धीमरा, कुररी पानी के ऊपर उड़ते हुए मछली का शिकार करने में मदद करती है;
  • लंबी सीधी या मुड़ी हुई– कीचड़ में कीड़े या जलीय जंतु ढूँढ़ने में मदद करती है जैसे – बाटन, गुडेरा;
  • भालेनुमा – बगुले, किलकिला, बाम्बे आदि में मछली पकड़ने में मदद करते हैं;
  • छलनीयुक्त चोंच – हंसावर आदि में कीचड़ छानकर भोजन ढूँढ़ने में मदद करते हैं;
  • थैलीनुमा – हवासिल भोजन की थैली में भोजन एकत्रित कर खाने में मदद करते हैं;
  • दरांतीनुमा चोंच – पनकौआ मछली पकड़ने में मदद करती है;
  • लम्बी तथा आगे से चपटी – चमचार जैसे पक्षियों में पानी छानकर जलीय जंतु ढूंढ़ने में मदद करते हैं।

नीड़न – बत्तख, जलमुर्गी, हंस आदि प्रजाति जलीय पौधों पर तैरते हुए घोंसले बनाते हैं। जबकि बगुले, बुज्जा, ब्लाक, हंसावर, चमचा आदि प्रजातियाँ पेड़ों पर घोसला बनाती हैं। टिटहरी, कुररी, किलकिला, सारस, आदि जमीन पर अंडे देते हैं।

आईपीसीसी रिपोर्ट ने प्रस्तुत की डरावनी तस्‍वीर !

Climate change Environment Nature

IPCC report presented a scary picture!

विशेषज्ञों की राय, रूपांतरणकारी दृष्टिकोण अपनाकर ठोस और तात्‍कालिक कदम उठाये जाएं

नयी दिल्‍ली, 2 मार्च। जलवायु परिवर्तन पर अंतरसरकारी पैनल (आईपीसीसी) की ताजा रिपोर्ट (The latest report of the Intergovernmental Panel on Climate Change (IPCC)) भविष्‍य की एक भयावह तस्‍वीर पेश करती है। रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर कार्बन उत्‍सर्जन (carbon emission) मौजूदा रफ्तार से बढ़ता रहा तो वर्ष 2100 तक लगभग पूरे भारत में वेट बल्‍ब टेंपरेचर (Wet bulb temperature in India) 35 डिग्री सेल्सियस के जानलेवा स्‍तर तक पहुंच जाएगा।

Now there is a need for transformational reforms instead of sectoral ones to tackle climate change.

विशेषज्ञों का मानना है कि आईपीसीसी की यह रिपोर्ट बेहद ठोस, तात्‍कालिक और सार्थक सामूहिक प्रयास किये जाने की जरूरत पर जोर देती है। अब जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिये सेक्‍टोरल के बजाय ट्रांसफॉर्मेशनल सुधार की जरूरत है।

संयुक्त राष्ट्र द्वारा पिछली 28 फरवरी को जारी की गयी नवीनतम असेसमेंट रिपोर्ट वैश्विक स्‍तर पर बढ़ते कार्बन उत्‍सर्जन और उसकी वजह से हो रहे जलवायु परिवर्तन के मानव पर पड़ रहे असर की तस्वीर दर्शाती है।

आईपीसीसी वर्किंग ग्रुप 2 द्वारा जारी इस रिपोर्ट (Report released by IPCC Working Group 2) में भारत से सम्बंधित चिंता के विषय का भी उल्लेख किया गया है।

इन्हीं बातों पर विस्तृत रूप से चर्चा करने के लिए डब्‍ल्‍यू आई आई इंडिया द्वारा मध्‍य प्रदेश सरकार के एप्को, बिहार सरकार के पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग, क्लाइमेट ट्रेंड्स व संयुक्त राष्ट्र एनवायरनमेंट प्रोग्राम के सहयोग से बुधवार को एक ऑनलाइन परिचर्चा का आयोजन किया। इसमें आईपीसीसी रिपोर्ट के प्रमुख भारतीय लेखकों ने खुद भारत में निकट भविष्य में जलवायु परिवर्तन से होने वाले प्रभावों तथा अनुकूलन पर किये जा रहे प्रयासों पर प्रकाश डाला।

भविष्य के खतरों के बारे में हमें आगाह करती है आईपीसीसी की आकलन रिपोर्ट

मध्‍य प्रदेश सरकार के राज्य जलवायु परिवर्तन ज्ञान प्रबंधन केंद्र, पर्यावरण नियोजन एवं समन्वय संगठन, पर्यावरण विभाग में समन्वयक लोकेंद्र ठक्कर ने कहा कि आईपीसीसी की छठी आकलन रिपोर्ट (IPCC’s Sixth Assessment Report) हमें भविष्य के खतरों के बारे में आगाह करती है। यह रिपोर्ट हमें बताती है कि जलवायु परिवर्तन के प्रभाव और भविष्य के जोखिम क्‍या हैं, संसाधनों का कैसा अभाव होगा और उससे खतरों की समस्या की तीव्रता कैसे बढ़ेगी। खास बात यह है कि समाज के हाशिए पर जो लोग हैं उन पर इसका क्या असर होगा, इस बारे में भी यह रिपोर्ट बहुत विस्तार से बताती है। इस रिपोर्ट के बारे में संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव का कहना है कि यह मानवीय त्रासदी का एक एटलस है और यह राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नेतृत्व की विफलता भी है। इससे हमें जाहिर होता है कि अब हमें निश्चित रूप से कुछ करना होगा।

उन्‍होंने कहा कि आईपीसीसी की रिपोर्ट से जाहिर होता है कि जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभाव (effects of climate change) हमारे अनुमानों से कहीं ज्यादा हैं। अगर हमने वायुमंडल के कार्बन को सोख लिया तो भी 2040 तक वायुमंडल में जो हमने कार्बन छोड़ रखा है, उसके दुष्प्रभाव हमें झेलने होंगे।

रिपोर्ट यह भी बताती है कि अगर हमने वैश्विक तापमान में वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित कर लिया तो भी हमारा पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) संरक्षित नहीं रहेगा और पेयजल का भारी संकट हो सकता है। मुझे ऐसा लगता आता है कि जलवायु परिवर्तन का खतरा चक्रवृद्धि ब्याज की तरह बढ़ेगा।

श्री ठक्‍कर ने कहा कि इस रिपोर्ट में जितनी चीजों के बारे में इशारा किया गया है वे हमारे सामने एक किस्म का निराशाजनक और चिंताजनक परिदृश्य रखती हैं, लेकिन सवाल यह है कि कि क्या हमारे पास कोई विकल्प है। रिपोर्ट में अनुकूलन की बात भी की गई है लेकिन रिपोर्ट कहती है कि एक सीमा के बाद हम खुद को अनुकूल नहीं कर पाएंगे। एक वक्त ऐसा आएगा जब स्थितियां इतनी गंभीर हो जाएगी। हम अपने आपको हालात से ढाल नहीं पाएंगे और वह वक्त आने में ज्यादा समय नहीं है। हमें इस रिपोर्ट को बहुत गंभीरता से लेना होगा। आईपीसीसी अपनी पहली ही आकलन रिपोर्ट से जलवायु परिवर्तन के खतरों से दुनिया को आगाह करती आई है लेकिन सवाल यह है कि क्या हम इस दिशा में कुछ कर रहे हैं।

बि‍हार के पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग के प्रधान सचिव दीपक कुमार सिंह ने इस अवसर पर कहा कि आईपीसीसी की रिपोर्ट अपनी तरह की कोई पहली रिपोर्ट नहीं है। इस तरह की कई रिपोर्ट के माध्यम से हमें पहले भी खतरों के बारे में बताया गया है। हम हर बार नए सम्मेलनों में नए-नए वादे करते हैं, नए लक्ष्य तय करते हैं लेकिन कुछ भी सार्थक नहीं हो पाता। यह मात्र कार्बन पर अपनी निर्भरता कम करने की बात नहीं है।

उन्‍होंने कहा कि मूल तौर पर हमें अपनी जीवन शैली में बदलाव लाने की बात करनी होगी। जब तक हम ऐसा नहीं करेंगे तब तक हम ना तो जलवायु परिवर्तन का सामना कर सकते हैं और ना ही हम इसके प्रभावों को कम कर सकते हैं।

बिहार प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अध्यक्ष ए.के. घोष ने कहा कि आईपीसीसी की रिपोर्ट की सबसे महत्‍वपूर्ण बात यह है कि अगर हम अभी नहीं चेते तो कल बहुत देर हो जाएगी। बिहार एक कृषि प्रधान राज्य है। इस रिपोर्ट से हमें यह मार्गदर्शन मिलेगा कि कैसे हम अपनी नीतियों में बदलाव करें और उन्हें जमीन पर उतारें। रिपोर्ट हमें अनुकूलन के लिए निर्देश देती है लेकिन उसे जमीन पर उतारने के लिए काम करना होगा। अगर हम जनसंख्या वृद्धि को नहीं रोकते हैं और अपनी जीवन चर्या में बदलाव नहीं करते हैं तो आने वाले 10-15 वर्षों में हालात बिल्कुल बेकाबू हो जाएंगे। हम अपने राज्य को कार्बन न्यूट्रल बनाने की कोशिश कर रहे हैं। हम चाहते हैं कि बिहार देश में ऐसा पहला राज्य बने जो कार्बन न्यूट्रल हो। इस लिहाज से भी आईपीसीसी की यह रिपोर्ट हमारे लिए बहुत मूल्यवान है।

इंडियन स्कूल ऑफ बिजनेस में शोध निदेशक डॉक्टर अंजल प्रकाश ने आईपीसीसी की रिपोर्ट के विभिन्‍न पहलुओं का विस्‍तार से जिक्र करते हुए कहा कि यह रिपोर्ट 3649 पेज की है। लगभग 200 वैज्ञानिकों ने इसे लिखा है और इसके लिए 34000 प्रकाशनों का आकलन किया गया। रिपोर्ट में जलवायु संबंधी अनुकूलन और उस पर हम क्या कर सकते हैं और लोगों की जिंदगी में इसका क्या प्रभाव पड़ रहा है, इसकी काफी पुरजोर तरीके से व्याख्या की गई है। रिपोर्ट यह कह रही है कि भौतिक जलवायु बहुत तेजी से बदल रही है और लोगों की जीवन पर इसका क्या प्रभाव पड़ता है इसे जानना बहुत आवश्यक है।

उन्‍होंने कहा कि इस रिपोर्ट में दो तीन बातें नयी हैं पहली बात तो यह है कि इसमें स्थानीय स्तर पर क्लाइमेट मेनिफेस्टेशन कैसे हो रहा है, इसे भी आप देख सकते हैं। पहली बार ऐसा हुआ है कि रिपोर्ट में स्‍थानीय ज्ञान के समावेश की बात कही गयी है। रिपोर्ट में महिलाओं और गरीब वर्ग के लोगों पर जलवायु परिवर्तन के क्या प्रभाव पड़ते हैं और उसका क्या समाधान हो सकता है इस पर भी व्यापक चर्चा की गई है।

ग्‍लोबल वार्मिंग का हमारी जिंदगी पर असर (impact of global warming on our lives)

डॉक्‍टर प्रकाश ने कहा अभी तक जो ग्‍लोबल वार्मिंग है, वह 1.1 डिग्री सेल्सियस हो चुकी है और इसका व्यापक असर हमारी जिंदगी पर पड़ रहा है। इस रिपोर्ट में हमारी जिंदगी पर शहरीकरण के प्रभाव के बारे में भी व्यापक चर्चा की गई है। नगरीय इलाकों में आर्थिक गतिविधियां बहुत तेजी से बढ़ रही हैं, रिपोर्ट में उनके प्रभावों पर बात की गई है। इस रिपोर्ट में स्वास्थ्य पर जलवायु परिवर्तन के पड़ने वाले प्रभाव पर भी व्यापक चर्चा हुई है। इसमें एक वेट बल्ब तापमान का जिक्र किया गया है जिसमें गर्मी और उमस को जोड़कर देखा गया है और आम इंसान के लिए इसका 35 डिग्री सेल्सियस बहुत खतरनाक है। अगर यह 32 से 34 डिग्री सेल्सियस पहुंच गया तो यह असहनीय हो जाएगा। लखनऊ और पटना में यह तापमान 35 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाने की आशंका है।

इंडियन इंस्‍टीट्यूट फॉर ह्यूमन सेटलमेंट की डॉक्टर चांदनी सिंह ने कहा कि आईपीसीसी की रिपोर्ट वर्ष 2030, 2007 और सदी के अंत की जो तस्वीर पेश करती है, उससे साफ जाहिर है कि जोखिम बहुत बढ़ रहा है। यह जोखिम सब जगह के लिए एक बराबर नहीं होंगे। जाहिर है कि हमारे समाज में कुछ लोगों पर इसका ज्यादा असर होगा। रिपोर्ट में वेट बल्ब टेंपरेचर के 35 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाने की आशंका व्‍यक्‍त की गयी है। अगर एक स्वस्थ इंसान इस वेट बल्‍ब तापमान पर पेड़ के नीचे छह घंटे बैठ जाए तो उसके मरने की स्थिति हो जाती है। अभी ज्यादातर इलाकों में ऐसी स्थिति नहीं है लेकिन चेन्नई समेत कई इस जिले ऐसी स्थिति में पहुंच रहे हैं और अगर ऐसे ही उत्सर्जन बढ़ता रहा तो वर्ष 2100 तक हम लगभग पूरे भारत में ऐसा ही तापमान देखेंगे।

क्यों अलग है यह रिपोर्ट?

उन्‍होंने कहा कि यह रिपोर्ट एक मायने में सबसे अलग है। इस रिपोर्ट में हमें एक बात बहुत स्पष्ट रूप से बतायी गयी है कि वह वक्त अब चला गया है जब हम प्रत्‍येक क्षेत्र में थोड़ा-थोड़ा कुछ कर सकते थे यानी इंक्रीमेंटल एडेप्टेशन कर सकते थे लेकिन इस रिपोर्ट में ट्रांसफॉरमेशनल एडेप्टेशन की बात कही गई है। यानी हमें विभिन्न क्षेत्रों में एक साथ संचालित करने के लिए कार्यक्रम बनाना पड़ेगा। इसके तहत सारे सेक्टरों और सभी लोगों को साथ लेकर चलना पड़ेगा। अब देखना यह है कि हम कैसे एकजुट होकर इंक्रीमेंटल एडेप्टेशन से निकलकर ट्रांसफॉरमेशनल एडेप्टेशन पर आते हैं।

भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद के डॉक्‍टर राजीव पांडे ने कहा हम लोगों के लिए यह रिपोर्ट इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि हमारा देश एक पिछड़ा हुआ देश है और ज्यादातर जनसंख्या कृषि पर आधारित है। जलवायु परिवर्तन का सीधा सीधा असर कृषि उत्पादकता पर पड़ता है और हमारे गरीब वर्ग के लोग प्राकृतिक संसाधनों पर काफी हद तक निर्भर करते हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि जो नुकसान हो चुका है उसकी भरपाई कैसे की जाए, उसके बारे में इस रिपोर्ट पर काफी चर्चा की गई है। हम लोगों को ट्रांसफॉरमेशनल अप्रोच अपनाना होगा।

उन्‍होंने कहा कि मेरा अपना मानना है कि जलवायु परिवर्तन, उसके प्रभाव और उसके जोखिम से सम्‍बन्धित अध्‍ययनों को स्‍थानीय स्‍तर पर ज्यादा से ज्यादा किया जाना चाहिए। वैश्विक रिपोर्टों को एक संकेत के तौर पर लिया जा सकता है कि किस तरह की समस्याएं आ सकती हैं और उनके कौन-कौन से समाधान हो सकते हैं। बिहार में कोसी की बाढ़ को देखें तो इस पर बात होनी चाहिए कि हम कैसे इस बाढ़ को रोक सकते हैं और हम अनुकूलन के किस स्तर पर बात कर सकते हैं। हमारे पास इसके लिये ठोस विश्लेषण होना चाहिए। अगर हम ऐसे विश्लेषणों को राज्य वैशेषिक स्तर तक ले जाएं तो संभवत: हम जलवायु परिवर्तन को रोकने के लिए जरूरी कदमों को स्थानीय स्तर पर बेहतर तरीके से उठा पाएंगे।

लेखक एवं वरिष्‍ठ पत्रकार हृदयेश जोशी ने इस मौके पर जलवायु परिवर्तन और उसके कारण आने वाली आपदाओं से निपटने के लिये सरकार, समाज और मीडिया में व्‍याप्‍त उदासीनता का जिक्र करते हुए कहा कि पर्यावरण पर बात करने से पहले यह देखना होगा कि पर्यावरण की वजह से हमारे शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ रहा है मगर जो मीडिया रिपोर्टिंग हो रही है उसमें जलवायु परिवर्तन जैसे बहुत महत्वपूर्ण विषय पर बहुत कम बात होती है। उसी पहलू की रिपोर्टिंग होती है जिस पर लोगों का ध्यान खिंचे। अक्टूबर-नवंबर में स्मॉग की चर्चा को होती है। आज सड़क पर पैदल या साइकिल से चलने वालों के लिये जगह नहीं है। हमें नीति निर्धारकों के सामने यह बात रखनी होगी कि उन्‍होंने जो तंत्र और व्‍यवस्‍था बनायी है उसमें पैदल चलने वाले और साइकिल चलाने वालों के लिए कोई जगह नहीं है। जब हम इन चीजों जोड़ेंगे तब एक ऐसा सिस्टम तैयार होता है जो जलवायु परिवर्तन से लड़ सकता है।

उन्‍होंने केदारनाथ में वर्ष 2013 में आयी आपदा और 2021 में धौलीगंगा की घटना का जिक्र करते हुए कहा कि इन दोनों आपदाओं के बीच आठ साल का फासला है। इस दौरान हमने ऐसा कोई पूर्व चेतावनी तंत्र नहीं बनाया जिससे लोगों को आगाह कर उनकी जान बचायी जा सके।

क्या किसान जलवायु परिवर्तन को समझते हैं?

गांव कनेक्शन संस्था में डिप्टी मैनीजिंग एडिटर सुश्री निधि जमवाल ने कहा कि कई बार हम लोग यह सोचते हैं कि गांव के लोग और किसान जलवायु परिवर्तन को नहीं समझते हैं, तो मेरे ख्याल से यह बहुत गलत सोच है। वर्ष 2019 में गांव कनेक्शन ने देश के 19 राज्‍यों में एक सर्वे कराया था जिसमें यह निकल कर आया था कि सर्वे के दायरे में लिया गया हर पांचवां किसान यह बोला कि जलवायु परिवर्तन के कारण उनकी खेती पर सीधा असर पड़ रहा है।

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एनएचआरसी के हस्तक्षेप के बाद यूपी में बिजली करंट से बच्चों की मौत मामले में आर्थिक राहत हुई सुनिश्चित

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग (एनएचआरसी) के हस्तक्षेप के बाद बिजली का करंट लगने से चार बच्चों की मौत के मामले में उत्तर प्रदेश पावर कॉपोर्रेशन लिमिटेड ने प्रत्येक के परिजनों को आर्थिक राहत के रूप में 5 लाख रुपये का भुगतान किया है।

यूक्रेन संकट : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने की भारत को और ज्यादा ताकतवर बनाने की वकालत

यूक्रेन में फंसे भारतीय नागरिकों की सुरक्षित वापसी के लिए कोई कोर-कसर नहीं छोड़ने का दावा करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि बदलते हुए समय में भारत को और ज्यादा ताकतवर बनना ही होगा। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक विरोधी दलों पर निशाना साधते हुए पीएम मोदी ने यह भी कहा कि घोर परिवारवादी भारत को कभी भी ताकतवर नहीं बना सकते हैं।

14 किलोमीटर पैदल चलने के बाद भी नहीं खुल रहे खारकीव रेलवे स्टेशन के दरवाजे : भारतीय छात्र

रूस-यूक्रेन के बीच छिड़ी जंग रुकने का नाम नहीं ले रही है। ऐसे में भारतीय छात्र भी यूक्रेन के कई शहरों में फंसे हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक खारकीव में हुए धमाके के बाद छात्र शहर छोड़ने की कोशिश में हैं, लेकिन कई किलोमीटर पैदल चलने के बाद भी हताशा ही हाथ लग रही है। यूक्रेन में भारतीय दूतावास ने खारकीव में फंसे भारतीयों के लिए एडवाइजारी जारी की है। दूतावास ने सेफ्टी और सिक्योरिटी को ध्यान में रखते हुए भारतीयों को तुरंत खारकीव छोड़ने की सलाह दी है।

नवाब मलिक को पद छोड़ने के लिए मजबूर नहीं किया जाएगा : राकांपा

राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) ने अपने रुख को सख्त करते हुए स्पष्ट किया है कि उसके मंत्री नवाब मलिक को तीन मार्च से शुरू हो रहे महाराष्ट्र विधानमंडल के बजट सत्र के दौरान इस्तीफा देने के लिए मजबूर नहीं किया जाएगा।

तमिलनाडु में दो साल के कोविड ब्रेक के बाद कक्षा 10, 12 की परीक्षाओं की तारीखें घोषित

तमिलनाडु के स्कूल शिक्षा मंत्री अंबिल महेश पोय्यामोझी ने कहा है कि कक्षा 12 के छात्रों के लिए बोर्ड परीक्षा 5 मई से शुरू होगी। साथ ही उन्होंने कहा कि कक्षा 11 के छात्रों के लिए परीक्षा 9 मई से और कक्षा 10 के लिए 6 मई से परीक्षा आयोजित की जाएगी।

भारतीय दूतावास छात्र का पार्थिव शरीर हासिल करें : कर्नाटक के मुख्यमंत्री

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक कर्नाटक के मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई ने कहा है कि उन्होंने युद्धग्रस्त यूक्रेन में भारतीय दूतावास से नवीन शेखरप्पा ज्ञानगौदर का पार्थिव शरीर हासिल करने का अनुरोध किया है, जिनकी यूक्रेन के खारकीव प्रांत में रूसी सेना की गोलाबारी में मौत हो गई है।

दिल्ली विश्वविद्यालय के 60 से अधिक शिक्षकों की कोरोना से मृत्यु : शिक्षक संगठन का दावा

 दिल्ली विश्वविद्यालय के शिक्षकों ने कुलपति से कोरोना व अन्य बीमारी से मरने वाले शिक्षकों के परिजनों को अनुकंपा के आधार पर नौकरी दिए जाने की मांग की है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक शिक्षक संगठनों का कहना है कि दिल्ली विश्वविद्यालय व उससे संबद्ध कॉलेजों में पढ़ाने वाले 60 से अधिक शिक्षकों की अभी तक कोरोना संक्रमण से मृत्यु हो चुकी है। इनमें स्थायी शिक्षक, सेवानिवृत्त शिक्षक व एडहॉक टीचर्स शामिल हैं।

ला नीना की स्थिति जारी रहने की 65 प्रतिशत संभावना : डब्ल्यूएमओ

विश्व मौसम विज्ञान संगठन (डब्लूएमओ) के पूर्वानुमानों ने मार्च-मई 2022 के दौरान मौजूदा ला नीना स्थितियों की एक मध्यम संभावना (लगभग 65 प्रतिशत) और अल नीनो/ दक्षिणी दोलन (ईएनएसओ) तटस्थ स्थितियों के लिए उनके और कमजोर होने की लगभग 35 प्रतिशत संभावना का संकेत दिया है।

ऑस्ट्रेलिया ने टीम फिजियो बीकले को किया बर्खास्त

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक कई ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेटर कथित तौर पर रावलपिंडी में चार मार्च से पाकिस्तान के खिलाफ तीन मैचों की महत्वपूर्ण टेस्ट श्रृंखला शुरू होने से पहले क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया (सीए) द्वारा टीम फिजियो डेविड बीकले को हटाने के फैसले से नाखुश हैं।

वंदे भारत की तीसरी खेप में आएंगी 200 स्लीपर ट्रेन, 24 हजार करोड़ का टेंडर जारी होगा

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक सिटिंग चेयर वाली वंदे भारत ट्रेन के बाद अब रेल मंत्रालय स्लीपर सुविधाओं वाली 200 वंदे भारत ट्रेनों की तीसरी खेप की खरीद की तैयारी में है। इसके लिए रेलवे इसी महीने 24,000 करोड़ रुपये का टेंडर जारी कर सकता है।

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जानिए क्यों विलुप्त हो रहे हैं दरियाई घोड़ा?

Know Your Nature

Know why the hippopotamus is becoming extinct?

दरियाई घोड़ा का घोड़े से क्या संबंध है? दरियाई घोड़े से जुड़े रोचक व दिलचस्प तथ्य | दरियाई घोड़ा कैसे होता है? दरियाई घोड़ा क्या है?

दरियाई घोड़े (hippopotamus in Hindi) को अधिकांश लोगों ने सरकसों और चिड़ियाघरों में देखा होगा। यह विशाल और गोलमटोल प्राणी केवल अफ्रीका में पाया जाता है। हालांकि उसके नाम के साथ घोड़ा शब्द जुड़ गया है, पर उसका घोड़ों से कोई संबंध नहीं है। दरियाई घोड़ा उसके अंग्रेजी नाम हिप्पो (हिप्पोपोटामस का संक्षिप्त रूप) से भी जाना जाता है। हिप्पोपोटामस शब्द का अर्थ (Meaning of the word hippopotamus) भी वाटर होर्स यानी जल का घोड़ा ही है। असल में दरियाई घोड़ा सूअरों का दूर का रिश्तेदार है।

दरियाई घोड़े का वजन कितना होता है? | How much does a hippopotamus weigh?

उसे आसानी से विश्व का दूसरा सबसे भारी स्थलजीवी स्तनी/ स्थलीय स्तनपायी (terrestrial mammal) कहा जा सकता है। वह 14 फुट लंबा, 5 फुट ऊंचा और 4 टन भारी होता है। उसका विशाल शरीर स्तंभ जैसे और ठिंगने पैरों पर टिका होता है। पैरों के सिरे पर हाथी के पैरों के जैसे चौड़े नाखून होते हैं। आंखें सपाट सिर पर ऊपर की ओर उभरी रहती हैं। कान छोटे होते हैं। शरीर पर बाल बहुत कम होते हैं, केवल पूंछ के सिरे पर और होंठों और कान के आसपास बाल होते हैं। चमड़ी के नीचे चर्बी की एक मोटी परत होती है जो चमड़ी पर मौजूद रंध्रों से गुलाबी रंग के वसायुक्त तरल के रूप में चूती रहती है। इससे चमड़ी गीली एवं स्वस्थ रहती है। दरियाई घोड़े की चमड़ी खूब सख्त होती है। पारंपरिक विधियों से उसे कमाने के लिए छह वर्ष लगता है। ठीक प्रकार से तैयार किए जाने पर वह 2 इंच मोटी और चट्टान की तरह मजबूत हो जाती है। हीरा चमकाने में उसका उपयोग होता है।

दरियाई घोड़े का मुंह विशाल एवं गुफानुमा होता है। उसमें खूब लंबे रदनक दंत होते हैं। चूंकि वे उम्र भर बढ़ते रहते हैं, वे आसानी से 2.5 फुट और कभी-कभी 5 फुट लंबे हो जाते हैं। निचले जबड़े के रदनक दंत अधिक लंबे होते हैं। ये दंत हाथीदांत से भी ज्यादा महंगे होते हैं क्योंकि वे पुराने होने पर हाथीदांत के समान पीले नहीं पड़ते।

यद्यपि दरियाई घोड़े का अधिकांश समय पानी में बीतता है, फिर भी उसका शरीर उस हद तक जलजीवन के लिए अनुकूलित नहीं हुआ है जिस हद तक ऊद, सील, ह्वेल आदि स्तनियों का। पानी में अधिक तेजी से तैरना या 5 मिनट से अधिक समय के लिए जलमग्न रहना उसके लिए संभव नहीं है। उसका शरीर तेज तैरने के लिए नहीं वरन गुब्बारे की तरह पानी में बिना डूबे उठे रहने के लिए बना होता है। वह तेज प्रवाह वाले पानी में टिक नहीं पाता और बह जाता है। इसीलिए वह झील-तालाबों और धीमी गति से बहने वाली चौड़ी मैदानी नदियों में रहना पसंद करता है। चार-पांच फुट गहरा पानी उसके लिए सर्वाधिक अनुकूल होता है।

दरियाई घोड़े की उम्र कितनी होती है? | How old is a hippopotamus?

दरियाई घोड़े की सुनने एवं देखने की शक्ति विकसित होती है। उसकी सूंघने की शक्ति भी अच्छी होती है। सुबह और देर शाम को वह खूब जोर से दहाड़ उठता है, जो दूर-दूर तक सुनाई देता है। अफ्रीका के जंगलों की सबसे डरावनी आवाजों (The scariest sounds of the jungles of Africa) में उसके दहाड़ने की आवाज की गिनती होती है। दरियाई घोड़े की आयु 35-50 वर्ष होती है।

हिप्पोपोटामस पानी में क्यों रहते हैं? (Why do hippopotamuses live in water?)

दरियाई घोड़ा अधिकांश समय पानी में ही रहता है, पर घास चरने वह जमीन पर आता है, सामान्यत: रात को। घास की तलाश में वह 20-25 किलोमीटर घूम आता है पर हमेशा पानी के पास ही रहता है। भारी भरकम होते हुए भी वह 45 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से दौड़ सकता है। दिन को वह पानी में पड़े-पड़े सुस्ताता है। ऐसे सुस्ताते समय पानी के बाहर उसकी आंखें, नाक और पीठ का कुछ हिस्सा ही दिखाई देता है।

Hippopotamus is a group animal

दरियाई घोड़ा समूहचारी प्राणी है और 20-200 सदस्यों के झुंडों में रहता है। झुंड का संचालन एक बूढ़ी मादा करती है। हर झुंड का एक निश्चित क्षेत्र होता है, जिसके केंद्रीय हिस्से में मादाएं बच्चों को पैदा कर उन्हें बड़ा करती हैं। उनकी यह बालवाड़ी सामान्यत: नदी के मध्य स्थित छोटे टापुओं में होती है। वहां नरों को प्रवेश करने नहीं दिया जाता। यदि वे घुसने की कोशिश करें तो मादाएं मिलकर उसे बाहर खदेड़ देती हैं। नर इस बालवाड़ी के चारों ओर अपना क्षेत्र बना लेते हैं, शक्तिशाली नर बालवाड़ी के एकदम पास, ताकि वे मादाओं के सतत संपर्क में रह सकें, और कमजोर और छोटे नर बालवाड़ी से दूर।

नवजात बच्चा 3 फुट लंबा, डेढ़ फुट ऊंचा और 25 किलो भारी होता है। जन्म सामान्यत: जमीन पर ही होता है। जन्म से पहले मादा घास को पैरों से रौंदकर बिस्तर सा बना लेती है। पैदा होने के पांच मिनट में ही बच्चा चल-फिर और तैर सकता है। मादा बच्चे को चलने, तैरने, आहार खोजने और नरों से दूर रहने का प्रशिक्षण देती है। बच्चे अपनी मां के साथ साए के समान लगे रहते हैं।

मादा एक कठोर शिक्षक होती है और बच्चा उसकी बात न माने तो उसे वह कड़ी सजा देती है। वह अपने विशाल सिर से उसे ठोकर लगाती है जिससे बच्चा चारों खाने चित्त होकर जमीन पर गिर पड़ता है। कभी-कभी वह अपने रदनक दंतों से बच्चे पर घाव भी करती है। बच्चा जब अपना विरोध भूल कर आत्मसमर्पण कर देता है, तब मां उसे चाटकर और चूमकर प्यार करती है। बच्चों की देखभाल झुंड की सभी मादाएं मिलकर करती हैं।

जब मां चरने जाती है, तब बाकी मादाएं उसके बच्चे को संभाल लेती हैं। बच्चा अन्य हमउम्र बच्चों के साथ खेलता रहता है। नर और मादा बच्चे अलग-अलग खेलते हैं। उनके खेल भी अलग-अलग होते हैं। मादाएं पानी में छिपा-छिपी खेलती हैं, और नर आपस में झूठ-मूठ की लड़ाई लड़ते हैं।

नर बच्चे थोड़े बड़े होने पर बालवाड़ी से बाहर निकाल दिए जाते हैं। वे बालवाड़ी से काफी दूर, अपने झुंड के क्षेत्र की लगभग सीमा में, अपना क्षेत्र स्थापित करते हैं। वे निरंतर मादाओं के निकट आने की कोशिश करते हैं, ताकि वे उनके साथ मैथुन कर सकें, पर बड़े नर उन्हें ऐसा करने नहीं देते। छोटे नरों को मादाओं से समागम करने के लिए बड़े नरों से बार-बार युद्ध करना और उन्हें हराना होता है। इस व्यवस्था के कारण झुंड के सबसे बड़े एवं शक्तिशाली नर ही मादाओं से समागम कर पाते हैं, जिससे इस जीव की नस्ल मजबूत रहती है। पानी में लेटे-लेटे दरियाई घोड़े बार-बार जंभाई लेते हैं और ऐसा करते हुए अपने मुंह को पूरा खोलकर अपने बड़े-बड़े रदनक दंतों का प्रदर्शन करते हैं। यह अन्य नरों को लड़ाई का निमंत्रण होता है।

लड़ते समय दरियाई घोड़े पानी से काफी बाहर उठ आकर अपने विस्फारित मुंह के रदनक दंतों से प्रतिद्वंद्वी पर घातक प्रहार करते हैं। इससे उसके शरीर पर बड़े-बड़े घाव हो जाते हैं और वह दर्द से चीख उठता है। पर ये घाव जल्द ठीक हो जाते हैं। लड़ाई का मकसद प्रतिद्वंद्वी के आगे के एक पैर को तोड़ना होता है जिससे वह शीघ्र मर जाता है क्योंकि लंगड़ा होने पर वह आहार खोजने जमीन पर नहीं जा पाता और भूख से मर जाता है। जब दो नर भिड़ते हैं, उनका युद्ध दो घंटे से भी ज्यादा समय के लिए चलता है। लड़ते हुए वे जोर-जोर से दहाड़ भी उठते हैं। बड़े नरों का शरीर इन लड़ाइयों के निशानों से भरा होता है।

दरियाई घोड़े का सबसे बड़ा शत्रु कौन है? | Who is the biggest enemy of the hippopotamus?

दरियाई घोड़े के कोई प्राकृतिक शत्रु नहीं हैं। कभी-कभी जमीन पर चरते समय सिंह उन पर झपट कर उनकी पीठ पर अपने नाखूनों और दांतों से घाव कर देता है, पर उन्हें मारना सिंह के लिए आसान नहीं है क्योंकि उनकी मोटी खाल और चरबी की परत के कारण सिंह के दांत और नाखून उनके मर्म स्थानों तक पहुंच नहीं सकते हैं। दरियाई घोड़े का सबसे बड़ा शत्रु तो मनुष्य ही है जो उसकी खाल, दांत और मांस के लिए उसे मारता है। मनुष्यों ने अब उसके चरने के सभी स्थानों को भी कृषि के लिए अपना लिया है, जिससे इस प्राणी के रहने योग्य जगह बहुत कम रह गई है। एक समय दरियाई घोड़े समस्त अफ्रीका में पाए जाते थे, पर अब अधिकांश इलाकों से वे विलुप्त हो चुके हैं।

दरियाई घोड़ों की एक अन्य जाति भी हाल ही में खोजी गई है। वह है बौना दरियाई घोड़ा। वह 5 फुट लंबा, 3 फुट ऊंचा और लगभग 250 किलो भारी होता है। वह अकेले या जोड़ों में वनों में रहता है।

बालसुब्रमण्यम लक्ष्मीनारायण

(मूलतः देशबन्धु में प्रकाशित लेख का संपादित रूप साभार)

ब्रेकिंग : आज भारत की टॉप हेडलाइंस। आज की बड़ी खबरें | 14 फरवरी 2022

top 10 headlines this night

विधानसभा चुनाव : यूपी में 61.06, उत्तराखंड में 59.51, गोवा में 77.94 प्रतिशत मतदान

उत्तर प्रदेश में आज विधानसभा चुनाव के दूसरे चरण में कुल 61.06 प्रतिशत मतदान दर्ज किया गया। सके अलावा उत्तराखंड में 59.51 प्रतिशत और गोवा में 77.94 प्रतिशत मतदान हुआ है, जहां एकल-चरण (सिंगल-फेज) में विधानसभा चुनाव हुआ है।

चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक, उत्तरी गोवा में 79.45 प्रतिशत जबकि दक्षिण गोवा में 76.92 प्रतिशत मतदान हुआ है।

उत्तर प्रदेश में, जहां नौ जिलों की 55 सीटों पर मतदान हुआ, सबसे अधिक मतदान सहारनपुर में 67.52 प्रतिशत और सबसे कम शाहजहांपुर में 55.20 प्रतिशत मतदान दर्ज किया गया है।

हिजाब विवाद : सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने की आड़ में मौलिक अधिकारों को प्रतिबंधित नहीं कर सकते

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक हिजाब पहनने की अनुमति मांगने वाली छात्राओं के वकील ने आज कर्नाटक उच्च न्यायालय में कहा कि सरकार सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने की आड़ में मौलिक अधिकारों को प्रतिबंधित नहीं कर सकती है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैली के कारण चरणजीत सिंह चन्नी के हेलीकॉप्टर को नहीं मिली उड़ान की अनुमति

पंजाब के मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी के हेलीकॉप्टर को सोमवार को चंडीगढ़ से उड़ान भरने की अनुमति नहीं दी गई। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि पंजाब में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मूवमेंट के चलते इलाके में ‘नो फ्लाई जोन’ लगाया गया था।

कांग्रेस का आरोप : बैंक ऋण धोखाधड़ी करने वालों और मोदी सरकार के बीच मिलीभगत

कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि पिछले सात वर्षों से अधिक समय में जितने भी आर्थिक घोटाले देश में हुए हैं उन्हें अंजाम देने वालों तथा केन्द्र की नरेन्द्र मोदी सरकार के बीच मिलीभगत है।

कांग्रेस प्रवक्ता गौरव वल्लभ ने आज एक संवाददाता सम्मेलन में कहा कि शहंशाह ने देश को पांच ट्रिलियन डालर की अर्थव्यवस्था का वादा किया था लेकिन पिछले साढ़े सात वर्षों में देश को 5.35 ट्रिलियन डालर बैंक ऋण धोखाधड़ी का उपहार दिया गया है।

गरीब बच्चों को दाखिला दिए जाने संबंधी याचिका पर उच्च न्यायालय ने दिल्ली सरकार को नोटिस जारी किया

गरीब और वंचित तबकों के 44000 हजार से अधिक बच्चों को स्कूलों में दाखिला दिए जाने को सुनिश्चित करने संबंधी एक याचिका पर आज दिल्ली उच्च न्यायालय ने दिल्ली सरकार को नोटिस जारी किया।

डिजिटल लर्निग से डिजिटल डिवाइड नहीं होना चाहिए : नायडू

उपराष्ट्रपति एम. वेंकैया नायडू ने कहा है कि डिजिटल लर्निग से डिजिटल डिवाइड नहीं होना चाहिए। उन्होंने कहा कि यह सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है कि कोई डिजिटल डिवाइड न हो।

चेन्नई में राष्ट्रीय तकनीकी शिक्षक प्रशिक्षण और अनुसंधान संस्थान (एनआईटीटीटीआर) में खेल केंद्र का उद्घाटन करने के बाद एक सभा को संबोधित करते हुए, नायडू ने शिक्षा पर महामारी के प्रभाव के बारे में चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि स्कूल बंद होने से लड़कियां, वंचित पृष्ठभूमि के बच्चे, ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले, विकलांग बच्चे और जातीय अल्पसंख्यकों के बच्चे अपने साथियों की तुलना में अधिक प्रभावित होते हैं।

फूड पार्कों का समूह स्थापित करेगा पंजाब : राहुल गांधी

कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने घोषणा की है कि अगर उनकी पार्टी पंजाब में फिर से सत्ता में आती है तो वह फूड पार्कों का एक समूह स्थापित करेगी और किसानों को उनकी उपज का भुगतान सीधे किया जाएगा।

बंगाल के चार नगर निगमों में तृणमूल कांग्रेस ने दर्ज की बड़ी जीत

पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की जीत का सिलसिला जारी है। पार्टी ने अब राज्य के चार नगर निगमों- सिलीगुड़ी, आसनसोल, बिधाननगर और चंदननगर में भारी बहुमत से जीत हासिल की है।

कोरोना के वैश्विक मामलों में वृद्धि, 41.15 करोड़ से ज्यादा हुए केस

दुनिया भर में कोरोनावायरस के मामले बढ़कर 41.15 करोड़ हो गए हैं। इस महामारी से अब तक कुल 58.1 लाख से ज्यादा लोगों की मौत हुई है जबकि 10.19 अरब से ज्यादा का वैक्सीनेशन हुआ हैं। ये आंकड़े जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी ने साझा किए हैं।

धीमी गति से ओवर कराने को लेकर श्रीलंका पर लगा मैच फीस का 20 प्रतिशत जुर्माना

अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (आईसीसी) ने सिडनी में आयोजित दूसरे टी20 अंतरराष्ट्रीय मैच में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ धीमी ओवर गति को बनाए रखने के लिए श्रीलंका पर मैच फीस का 20 प्रतिशत जुर्माना लगाया। दूसरे टी20आई में, मैच सुपर ओवर में चला गया, जहां जोश हेजलवुड ने अंतत: ऑस्ट्रेलिया को जीत दिलाई।

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जानिए ऐसे पक्षी जो अन्य पक्षियों के घोंसलों में अंडे देते हैं

Bird world

Birds That Lay Eggs in Other Birds’ Nests

अपने बच्चों को पलवाने व अंडे सेने तक के लिए कुछ पक्षी बड़ी चालाकी से दूसरे पक्षियों का इस्तेमाल करते हैं। जानिए ऐसे ही कुछ पक्षियों के बारे में जो अन्य पक्षियों के घोंसलों में अंडे देते हैं

पक्षियों की दुनिया भी बड़ी निराली है। कई पक्षी ऐसे शातिर होते हैं, जो न तो अपना घोंसला बनाते हैं, न अपने बच्चे पालते हैं। उन के अंडे भी दूसरे पक्षियों द्वारा सेए जाते हैं।

ब्रूड परजीवीकरण | Brood Parasitism – an overview in Hindi

वैज्ञानिकों के अनुसार पक्षी वर्ग के पाँच परिवार एनाटिडी (anatidae), कुकुलिड़ि, इंडिकेटोरिडि तथा प्लीसिडि के पक्षी अपने अंडे चोरी छिपे या डरा धमका कर दूसरों के घोंसलों में रख देते हैं और दूसरा पक्षी अनजाने में या भयवश उन के अंडों, बच्चों की देखभाल करता है। इस प्रक्रिया को ब्रूड परजीवीकरण कहते हैं। ऐसा 80 प्रजातियों के पक्षी करते हैं, जिन में 40 प्रजातियां अकेली कोयल की हैं।

मीठा गाने वाली बदमाश चिड़िया कोयल और खुद को चालाक समझने वाला मूर्ख कौआ

कोयल न तो कभी अपना घोंसला बनाती है और न अपने बच्चे पालती है। जनवरी फरवरी से ले कर मई जून तक नर कोयल, बागों में पेड़ों पर बैठा कुहूकुहू करता गाता रहता है। यह प्रवासी पक्षी (migratory Bird) मादा को रिझाने के लिए गाता है और मादा चुपचाप श्रोता बन कर सुनती है। जब जुलाई में मादा कोयल के अंडे देने का समय आता है तो यह अपने अंडे चुपके से कौए के घोंसले में या मैगपाई चिड़िया के घोंसले में रख आती है। अंडों का रंग एक सा होने के कारण मादा कौआ उन्हें पहचान नहीं पाती है। बच्चों का रंग भी कौए के बच्चों से मिलताजुलता होता है, इस कारण जब तक कौए व कोयल के बच्चे बोलने नहीं लगते, अपने को चालाक समझने वाला कौआ उन में भेद नहीं कर पाता।

लड़ाकू पक्षी कोयल डरा धमका कर कौए से कराती है अपने बच्चे का पालन

दूसरी तरफ वैज्ञानिकों का कहना है कि कोयल लड़ाकू पक्षी है वह कौए को डरा धमका कर अपनी मादा के अंडे कौए के घोंसले में रखवा देता है और बेचारा कौआ, कोयल के डर से उस के अंडे सेता है व बच्चे पालता है।

एक ऋतु में कितने अंडे दे सकती है कोयल? | How many eggs can a cuckoo lay in one season?

मादा कोयल एक ऋतु में 16 से 26 अंडे दे सकती है। फिनलैंड में पाई जाने वाली मादा कोयल अपना अंडा छोटा बड़ा कर सकती है। जब यह मादा कोयल रेड स्टार्ट तथा विनचिट पक्षी के घोंसले में अंडा रखती है तो अंडे को छोटा कर देती है तथा अंडे का रंग नीला होता है। अंडे से निकले अधिकांश पक्षियों के बच्चे पहले अंधे जैसे होते हैं और अपने पोषक पक्षी के बच्चों को घोंसले से गिरा देते हैं।

हनी गाइड नाम का पक्षी बार्वेट या कठफोड़वा जैसे तेजतर्रार पक्षियों के घोंसलों में कब्जा कर के अपने अंडे रखता है। जरमनी में पाया जाने वाला ब्रुड वार्बलर (फाइलोस्कापस सिविलेटरिक्सPhylloscopus Civilarix) पक्षी अपने घोंसले में कोयल के अंडे रखे देख, अपने अंडे भी छोड़ कर भाग जाता है।

यूरोप में पाई जाने वाली कोयल (कुकुलस कैनोरस Cuculus canorus?) भी दूसरे पक्षियों के घोंसले में अंडे रख देती है। यह कोयल शाम को पोषक पक्षी के लौटने से पहले ही उस के घोंसले में अपने अंडे रख आती है और उस के अंडे फेंक आती है।

उत्तरी अमेरिका में पाए जाने वाले पक्षी मेलोथर्स की मादा अकसर अपने अंडे ओभन (सी पूरस आरोकैपिलस) चिड़िया के घोंसले में देती है। दक्षिण अमेरिका व अफ्रीका में पाई जाने वाली बतखें (ducks found in south america and africa) भी अपने अंडे दूसरों के घोंसलों में रख आती हैं। हमारे घरों में रहने वाली सीधीसादी गौरैया भी कभीकभार क्लिफ्स्वैलो (पैटेकैनिडान पायरोनोटा) फुदकी चिड़िया के घोंसले में कब्जा कर अपने अंडे रखती व सेती है। ये पक्षी अपना अंडा रखते समय पोषक पक्षी के अंडे बाहर फेंक देते हैं ताकि गिनती की भूलभुलैया में पोषक पक्षी के अंडे गिनती से ज्यादा न निकलें। जंगलों में पिहकने वाला पक्षी पपीहा भी अपने अंडे चिलचिल बैवलर पक्षी के घोंसले में रख आता है। बेचारे चिलचिल पक्षी की मादा कई बार तो कई-कई पक्षियों के अंडे सेती व बच्चे पालती है।

– शिवचरण चौहान

(मूलतः देशबन्धु में प्रकाशित लेख का संपादित रूप साभार)

ब्रेकिंग : आज भारत की टॉप हेडलाइंस। आज की बड़ी खबरें | 03 फरवरी 2022

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895 करोड़ रुपये के धोखाधड़ी मामले में ईडी ने सेथर लिमिटेड, निदेशकों की संपत्ति कुर्क की

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने कहा है कि उसने 895 करोड़ रुपये की बैंक धोखाधड़ी से जुड़े पीएमएलए मामले में सेथर लिमिटेड के निदेशकों और उनके परिवार के सदस्यों की कुल 9.08 करोड़ रुपये की अचल संपत्तियों को अस्थायी रूप से कुर्क किया है।

बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग : तेजस्वी यादव ने फिर नीतीश को घेरा

बिहार को विशेष राज्य के दर्जे की मांग को लेकर राजद नेता तेजस्वी यादव ने फिर से मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को घेरा है। तेजस्वी ने सवालिया लहजे में पूछा कि आखिर वे यह मांग किससे कर रहे हैं?

पहाड़ों की रानी मसूरी में बर्फबारी, मैदानी क्षेत्रों में बारिश से बढ़ी ठंड

उत्तराखंड में बारिश के बीच पहाड़ों की रानी मसूरी में खूब बर्फबारी हुई। मसूरी में बर्फबारी देखने के लिए पहुंचे सैलानियों ने आनंद उठाया। गुरुवार सुबह से ही क्षेत्र में काफी बारिश हुई। दोपहर को दो घंटे तक लगातार हिमपात हुआ। शाम को बर्फबारी रुकी। माल रोड पर तीन से चार इंच, गनहिल पर चार से छह इंच, लालटिब्बा, जार्ज एवरेस्ट, कंपनी बाग, क्लाउड्स एंड में छह इंच से अधिक बर्फ गिरी।

भाजपा 70 साल की बात कर करती है देश बनाने वालों का अपमान : राहुल

कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने भाजपा के 70 साल में देश में कुछ न होने के आरोप का जवाब देते हुए कहा कि भाजपा 70 साल में देश में कुछ न होने की बात कहकर उन लोगों का अपमान करती है जिन्होंने इस देश को बनाया है।

केंद्रीय विश्वविद्यालय बीएचयू ने खोजा बिना चीरफाड़ सर्वाइकल कैंसर पता लगाने का तरीका

बीएचयू के एक अध्ययन में रोगियों में बिना चीरफाड़ के सर्वाइकल कैंसर का पता लगाने का तरीका ढूंढ निकाला है। अध्ययन सर्वाइकल कैंसर का पता लगाने के लिए निदान विकसित करने में बहुत उपयोगी हो सकता है, जो दुनिया भर में महिलाओं की मृत्यु के शीर्ष कारको में से एक है।

यूपी चुनाव : प्रियंका ने बुलंदशहर रेप पीड़िता के परिवार से की मुलाकात

कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा आज एक 16 वर्षीय लड़की के घर गईं, जिसके साथ कथित तौर पर दुष्कर्म किया गया और उसकी हत्या कर दी गई और उसके परिवार की इच्छा के खिलाफ आनन-फानन में उसके शव का अंतिम संस्कार कर दिया गया।

27 फरवरी को होंगे बंगाल में निकाय चुनाव

पश्चिम बंगाल राज्य चुनाव आयोग (एसईसी) ने घोषणा की है कि वह 27 फरवरी को राज्य में नगरपालिका चुनाव कराएंगे।

मूर्ति चोरी मामले में भाजपा नेता और दो पुलिसकर्मी गिरफ्तार

मीडिया रिपोर्ट्स तमिलनाडु पुलिस ने बुधवार को मदुरै में लोगों के एक समूह से बरामद सात मूर्तियों के स्रोत की विस्तृत जांच शुरू कर दी है।

मुख्यमंत्री की भाषा को लेकर सपा ने की चुनाव आयोग से शिकायत

समाजवादी पार्टी ने चुनाव प्रचार के दौरान मुख्यमंत्री योगी की भाषा पर सवाल उठाए और चुनाव आयोग इस पर रोक लगाने की मांग की है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सीबीआई से ऑस्ट्रेलिया में आनंद गिरि की गिरफ्तारी की पुष्टि करने को कहा

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) के वकील को इस तथ्य की पुष्टि करने का निर्देश दिया है कि क्या महंत नरेंद्र गिरि की कथित आत्महत्या मामले के आरोपियों में से एक आनंद गिरि मई 2019 में ऑस्ट्रेलिया का दौरा किया था और क्या उन्हें वहां छेड़छाड़ के एक मामले में गिरफ्तार किया गया था।

8 फरवरी तक जम्मू-कश्मीर, लद्दाख में बर्फबारी की संभावना

जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में बादल छाए रहने के कारण रात के तापमान में और बढ़ोतरी होने के कारण गुरुवार को कश्मीर में हल्की बर्फबारी और जम्मू संभाग में बारिश हुई।

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मानसून पर असर डाल रही है हिंद महासागर की बढ़ती गर्मी

Research News

गर्म होता हिंद महासागर मानसून में होने वाली बारिश में बदलाव ला रहा है

नई दिल्ली, 01 फरवरी 2022. इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ ट्रॉपिकल मीटरोलॉजी (आईआईटीएम), पुणे के वैज्ञानिक रॉक्सी मैथ्यू कोल के नेतृत्व में हुए एक अध्ययन से खुलासा हुआ है कि हिंद महासागर की बढ़ती गर्मी (The rising heat of the Indian Ocean) मॉनसून की बारिश को भी प्रभावित कर रही है। हिन्द महासागर की तेज़ी से गर्मी बढ़ने की वजह एल नीनो नाम का समुद्री करेंट या महासागर धारा है।

जर्नल ऑफ़ जियोफिजिकल रिसर्च ओशन्स में जेनेसिस एंड ट्रेंड्स इन मरीन हीट वेव्स ओवर दा ट्रॉपिकल इंडियन ओशन एंड दिएर रिएक्शन विथ समर मानसून (Genesis and Trends in Marine Heatwaves Over the Tropical Indian Ocean and Their Interaction With the Indian Summer Monsoon) नाम से प्रकाशित अध्ययन में, शोधकर्ताओं ने हिंद महासागर में तेजी से गर्म होने और मजबूत एल नीनो द्वारा प्रभावित समुद्री हीटवेव में उल्लेखनीय वृद्धि की रिपोर्ट की।

इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ ट्रॉपिकल मीटरोलॉजी (आईआईटीएम), पुणे के रॉक्सी मैथ्यू कोल के नेतृत्व में इस अध्ययन की रिपोर्ट में प्रकाश डाला गया है कि हिंद महासागर में समुद्री गर्मी बढ़ रही है और इसका भारतीय मानसून वर्षा पर असर पड़ रहा है।

समुद्री हीटवेव क्या हैं? | What are Marine Heatwaves in Hindi?

समुद्री हीटवेव समुद्र में अत्यधिक उच्च तापमान (90 परसेंटाइल से ऊपर) की अवधि होती हैं। इन घटनाओं के कारण कोरल ब्लीचिंग, समुद्री घास के नुक्सान और केल्प वनों के नुकसान के कारण हैबिटैट का विनाश भी होता है, जिससे मत्स्य क्षेत्र पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

समुद्र के नीचे के एक सर्वेक्षण से पता चला है कि तमिलनाडु तट के पास मन्नार की खाड़ी में 85% कोरल, मई 2020 में समुद्री हीटवेव के बाद ब्लीच हो जाते हैं। हालांकि हाल के अध्ययनों ने वैश्विक महासागरों में उनकी घटना और प्रभावों की सूचना दी है, उन्हें उष्णकटिबंधीय हिंद महासागर में कम से कम समझा जाता है।

तेजी से समुद्र के गर्म होने की प्रतिक्रिया में हिंद महासागर में समुद्री हीटवेव में वृद्धि (Increase in ocean heatwaves in the Indian Ocean in response to rapid ocean warming)

ये हीटवेव उष्णकटिबंधीय हिंद महासागर में दुर्लभ हुआ करते थे, लेकिन अब ये एक वार्षिक मामला बन गए हैं। पश्चिमी हिंद महासागर क्षेत्र ने प्रति दशक लगभग डेढ़ गुना घटनाओं की दर से समुद्री हीटवेव में सबसे बड़ी वृद्धि का अनुभव किया, इसके बाद प्रति दशक 0.5 घटनाओं की दर से बंगाल की उत्तरी खाड़ी का स्थान है। 1982-2018 के दौरान, पश्चिमी हिंद महासागर में कुल 66 घटनाएं हुईं जबकि बंगाल की खाड़ी में 94 घटनाएं हुईं।

समुद्री हीट वेव का मानसून पर प्रभाव (Effect of ocean heat wave on monsoon)

पश्चिमी हिंद महासागर और बंगाल की खाड़ी में गर्म समुद्री लहरों का परिणाम मध्य भारतीय उपमहाद्वीप में शुष्कता की स्थिति में पाया जाता है। इसी समय, उत्तरी बंगाल की खाड़ी में गर्म हवाओं की प्रतिक्रिया में दक्षिण प्रायद्वीपीय भारत में वर्षा में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। ये परिवर्तन हीटवेव द्वारा मानसूनी हवाओं के उतार चढ़ाव के उत्तर में हैं।

यह पहली बार है कि एक अध्ययन ने समुद्री हीटवेव और वायुमंडलीय संचालन और वर्षा के बीच घनिष्ठ संबंध का प्रदर्शन किया है।

भविष्य की चुनौतियां

कॉल ने कहा कि जलवायु मॉडल के अनुमान भविष्य में हिंद महासागर के और अधिक गर्म होने का सुझाव देते हैं, जो बहुत अधिक संभावना है कि समुद्री हीटवेव और मानसून वर्षा पर उनके प्रभाव को तेज करेंगे।

उन्होंने ये भी कहा कि चूंकि समुद्री हीटवेव द्वारा कवर की गई आवृत्ति, तीव्रता और क्षेत्र बढ़ रहे हैं, इसलिए हमें इन घटनाओं की सटीक निगरानी करने के लिए अपने महासागर अवलोकन सरणियों को बढ़ाने की जरूरत है, और एक गर्म दुनिया द्वारा प्रस्तुत चुनौतियों की कुशलता से भविष्यवाणी करने के लिए हमारे मौसम मॉडल को अपडेट करना होगा।

ब्रेकिंग : आज भारत की टॉप हेडलाइंस। आज की बड़ी खबरें | 27 जनवरी 2022

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चंडीगढ़ में हटाया गया कोविड-19 प्रतिबंध

चंडीगढ़ प्रशासन ने आज दैनिक पॉजिटिव रोगियों की संख्या में गिरावट को देखते हुए कोविड-19 प्रतिबंध हटाने का फैसला किया है।

सपा ने जारी की 56 प्रत्याशियों की सूची, भाजपा बसपा से आये नेताओं को मिला टिकट

उत्तर प्रदेश विधानसभा के लिए समाजवादी पार्टी ने एक और लिस्ट जारी कर दी है। इस सूची में 56 उम्मीदवारों को चुनाव मैदान में उतारा गया है। लिस्ट में भाजपा और बसपा से आए नेताओं को टिकट दिया है।

दिल्ली : वीकेंड कर्फ्यू, ऑड ईवन समाप्त, 50 फीसदी क्षमता पर सिनेमा और रेस्टोरेंट खुलेंगे

दिल्ली में कोरोना संक्रमण के कारण लगाए गए व्यावसायिक प्रतिबंधों में बड़ी ढील दी गई है। प्राप्त जानकारी के मुताबिक आज लिए गए अहम एक फैसले में दिल्ली से वीकेंड कर्फ्यू हटाने का फैसला लिया गया है। इसके साथ ही व्यवसायिक प्रतिष्ठानों को एक और बड़ी राहत देते हुए ऑड ईवन का नियम भी समाप्त कर दिया गया है। 50 फीसदी क्षमता के साथ में सिनेमा हॉल भी खुलेंगे। शादी विवाह जैसे समारोह में 200 व्यक्तियों अनुमति की होगी। हालांकि दिल्ली में रात्रि कर्फ्यू अभी भी जारी रहेगा।

दिल्ली में प्रतिबंधो में ढील के बाद खुश व्यापारी बोले : बाजारों में फिर लौट सकेगी रौनक

दिल्ली में कोरोना संक्रमण के कारण लगाए गए व्यावसायिक प्रतिबंधों में बड़ी ढील देने और दिल्ली से सप्ताहांत कर्फ्यू हटाने के फैसले के बाद बाजारों के व्यापारियों ने इस फैसले का स्वागत किया है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक कंफेडरेशन ऑफ आल इंडिया ट्रेडर्स (कैट) ने कोविड प्रतिबंध हटाने के लिए दिल्ली के उपराज्यपाल अनिल बैजल की सराहना की है।

बिहार, यूपी के प्रदर्शनकारी छात्रों को एनएसयूआई का समर्थन

कांग्रेस की छात्र इकाई नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया (एनएसयूआई) ने बिहार और उत्तर प्रदेश में आंदोलन कर रहे छात्रों के समर्थन में एक विरोध मार्च निकाला और केंद्रीय रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव का पुतला फूंका।

उत्तराखंड में नहीं थम रहा सियासी भूचाल, धन सिंह नेगी हुए कांग्रेस में शामिल

उत्तराखंड भाजपा और कांग्रेस में प्रत्याशियों की सूची जारी होने के बाद असंतोष थमने का नाम नहीं ले रहा है। आज भाजपा के दो विधायकों ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया है। इसमें टिहरी और रुद्रपुर के विधायक शामिल हैं। टिहरी से विधायक धन सिंह नेगी ने गुरुवार को कांग्रेस ज्वाइन कर ली है। वहीं रुद्रपुर से टिकट कटने से नाराज विधायक राजकुमार ठुकराल ने भाजपा से इस्तीफा दे दिया है।

सर्वोच्च न्यायालय ने नितेश राणे को सरेंडर करने को कहा, गिरफ्तारी से 10 दिनों की राहत

सर्वोच्च न्यायालय ने आज भारतीय जनता पार्टी के महाराष्ट्र के विधायक और केंद्रीय मंत्री नारायण राणे के बेटे नितेश राणे को निचली अदालत के सामने आत्मसमर्पण करने और उनके खिलाफ दर्ज हत्या के प्रयास के मामले में नियमित जमानत मांगने का निर्देश दिया। उन्हें पिछले महीने सिंधुदुर्ग जिले में गिरफ्तार किया गया था और उन्हें गिरफ्तारी से दस दिन की राहत भी दी।

तमिलनाडु में फरवरी से खुल सकते है दसवीं से बारहवीं कक्षा के लिए स्कूल

तमिलनाडु स्कूल शिक्षा विभाग फरवरी से दसवीं से बारहवीं कक्षा के लिए स्कूलों को फिर से खोलने पर विचार कर रहा है क्योंकि बोर्ड परीक्षा मई के लिए निर्धारित है।

यूपी के स्कूल 15 फरवरी तक बंद, ऑनलाइन कक्षाएं जारी रहेंगी

उत्तर प्रदेश में स्कूल 15 फरवरी तक बंद रहेंगे, हालांकि ऑनलाइन कक्षाएं जारी रहेंगी। यह फैसला कोविड के बढ़ते मामलों को देखते हुए लिया गया है।

यूट्यूब ने अपने 2022 ब्लैक वॉयस फंड में 135 क्रिएटर्स की घोषणा की

गूगल के स्वामित्व वाली वीडियो स्ट्रीमिंग कंपनी यूट्यूब ने 135 क्रिएटर्स की घोषणा की है, जो हैशटैग यूट्यूब ब्लैक वॉयस में हिस्सा लेंगे। इसमें यूएस और कनाडा के 40 सदस्य शामिल हैं।

पहला वैश्विक मीडिया सृजन मंच पेइचिंग में आयोजित

26 जनवरी को पहला वैश्विक मीडिया सृजन मंच पेइचिंग में आयोजित हुआ, जिसका मुख्य विषय था वैज्ञानिक व तकनीकी शीतकालीन ओलंपिक साझा करें। चाइना मीडिया ग्रुप इस मंच का मुख्य आयोजक है । 78 देशों व क्षेत्रों के 145 मीडिया तथा अंतरराष्ट्रीय संगठनों के प्रमुखों ने वीडियो कांफ्रेसिंग के जरिये इस में भाग लिया।

मोजाम्बिक में उष्णकटिबंधीय तूफान एना में 18 की मौत

राष्ट्रीय आपदा जोखिम प्रबंधन और न्यूनीकरण संस्थान (आईएनजीडी) के प्रवक्ता पाउलो टॉमस ने घोषणा की है कि उष्णकटिबंधीय तूफान एना के कारण कम से कम 18 लोगों की मौत हो गई। तूफान ने मोजाम्बिक के मध्य और उत्तरी क्षेत्र को तबाह कर दिया।

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शीतकालीन ओलंपिक 2022: पर्यावरण के लिए नकली बर्फ बनेगी असली खतरा

winter

Winter Olympics 2022: Fake snow will be a real threat to the environment

The Beijing Olympic Games in February are set to be the first Winter Games on virtually 100 per cent artificial snow

100% कृत्रिम बर्फ की मदद से होगा शीतकालीन ओलंपिक का आयोजन | Slippery Slopes’ report shows how climate change is threatening Winter Olympics 2022

फरवरी में बीजिंग ओलंपिक खेलों (Beijing Olympic Games) में कुछ अभूतपूर्व होगा। दरअसल ऐसा पहली बार होगा जब शीतकालीन ओलंपिक का आयोजन 100 प्रतिशत कृत्रिम बर्फ की मदद से होगा। और ऐसा संभव होगा 100 बर्फ जनरेटर मशीनों और 300 बर्फ बनाने वाली बंदूकों की मदद से।

लेकिन वैज्ञानिकों की मानें तो ऐसा करना पर्यावरण के लिए खतरनाक साबित हो सकता है।

वैज्ञानिकों का मानना है कि, शैमॉनिक्स में 1924 में हुए शीतकालीन खेलों के आयोजन के बाद से उपयोग किए जाने वाले 21 स्थानों में से केवल 10 में 2050 तक ऐसे किसी आयोजन की मेज़बानी के लिए ‘जलवायु उपयुक्तता’ और प्राकृतिक बर्फबारी का स्तर उपलब्ध होगा।

दरअसल, स्लिपिरी स्लोप्स: हाउ क्लाइमेट चेंज इज़ थ्रीटेनिंग द 2022 विंटर ओलंपिक्स, नाम की एक नई रिपोर्ट बताती है कि एथलीटों और प्रतिभागियों के लिए परिस्थितियों को और अधिक खतरनाक बनाकर जलवायु परिवर्तन शीतकालीन ओलंपिक और स्नो स्पोर्ट्स के भविष्य को खतरे में डाल रहा है।

इस रिपोर्ट में दुनिया के प्रमुख स्कीयर्स, स्नोबोर्डर्स और बोबस्लेडर्स से हमारे जलवायु के बदलते हुए स्नो स्पोर्ट्स के भविष्य के बारे में उनके डर को जानने का मौका भी मिलता है।

यह रिपोर्ट लॉफबोरो विश्वविद्यालय के स्पोर्ट इकोलॉजी ग्रुप और प्रोटेक्ट अवर विंटर्स द्वारा तैयार की गयी है।

4 फरवरी से शुरू होने वाले खेलों से पहले 2022 शीतकालीन ओलंपिक के स्की ढलानों को कवर करने के लिए 100 से अधिक स्नो जनरेटर (snow generator) और 300 बर्फ बनाने वाली बंदूकें (ice maker guns) अधिकतम प्रयास कर रही हैं। इस बर्फ के पिघलने की गति को धीमा करने के लिए अक्सर रसायनों का उपयोग किया जाता है, जो कि न केवल ऊर्जा और पानी-गहन गतिविधि है बल्कि यह एक ऐसी सतह भी प्रदान करता है जो, कई प्रतियोगियों के अनुसार, अप्रत्याशित और संभावित रूप से खतरनाक है।

स्कॉटिश फ़्रीस्टाइल स्कीयर लौरा डोनाल्डसन (Scottish freestyle skier Laura Donaldson) ने चेतावनी दी है कि यदि “खराब मौसम में बर्फ बनाने वाली मशीनों से फ़्रीस्टाइल सुपर पाइप बनते हैं, तो पाइप की दीवारें ठोस, ऊर्ध्वाधर बर्फ होती हैं और पाइप का फर्श ठोस बर्फ होता है। यह एथलीटों के लिए खतरनाक है और इससे कुछ की मौत भी हो चुकी है।”

दो बार के कनाडाई ओलंपियन और प्रमुख फ्रीस्टाइल स्कीयर फिलिप मार्क्विस (Two-time Canadian Olympian and leading freestyle skier, Philippe Marquis) हमें हाल के वर्षों में “बर्फ के निर्माण की बुनियादी संरचना और ग्लेशियरों के परिदृश्य में डरावने बदलाव” के बारे में बताते हैं। वह “बर्फ पर अभ्यास की कमी के कारण” चोटों में वृद्धि का विवरण देते हैं। वह बताते हैं कि कैसे “परिस्थितियां निश्चित रूप से पहले की तुलना में अधिक खतरनाक हैं” और एथलीटों की सुरक्षा के लिए उनकी चिंता की एक कड़ी चेतावनी जारी करते हैं।

2006-2018 से लगातार चार ओलंपिक में टीम GB (जीबी) स्नोबोर्डर ज़ोई गिलिंग्स-ब्रायर हमें बर्फ प्रभाव प्रशिक्षण कार्यक्रम की कमी के बारे में बताती हैं और कुछ एथलीटों के डर को रेखांकित करती हैं कि कृत्रिम बर्फ के उपयोग से अधिक चोट लग सकती है : “यदि आप गिरते हैं तो कृत्रिम बर्फ कम क्षमाशील है”, वह कहती हैं।

चेक बाइएथलीट जेसिका जिस्लोवा अस्थिर सर्दियों के मौसम की निरंतर प्रवृत्ति और साथ में बर्फ की स्थिति में गिरावट से चिंतित एक और प्रतियोगी है, जो इस पर ज़ोर देती हैं कि “अत्यधिक मौसम परिवर्तन एथलीटों के लिए खतरनाक हो सकते हैं।”

अनियमित हिमपात के मौसम में और तेजी से पिघलने के निम्न स्तर के रिसॉर्ट्स का सामना करना अब कई प्रतियोगियों के लिए आम है। जोखिम स्पष्ट है : मानव निर्मित वार्मिंग शीतकालीन खेलों के दीर्घकालिक भविष्य के लिए खतरा है।

रिपोर्ट के विवरण के अनुसार, यह शीतकालीन ओलंपियाड के लिए जलवायु के अनुकूल मेजबान स्थानों की संख्या को भी कम कर रहा है।

शीतकालीन ओलंपियाड जलवायु के लिए खतरा

वैज्ञानिकों का मानना है कि 2050 तक शैमॉनिक्स { Chamonix (शामोनि) } 1924 के बाद से शीतकालीन खेलों के लिए उपयोग किए जाने वाले 21 स्थानों में से केवल 10 में ही किसी आयोजन की मेजबानी के लिए ‘जलवायु उपयुक्तता’ और प्राकृतिक बर्फबारी का स्तर होगा। शैमॉनिक्स को अब नॉर्वे, फ्रांस और ऑस्ट्रिया के स्थानों के साथ ‘उच्च जोखिम’ का दर्जा दिया गया है, जबकि वैंकूवर, सोची और अमेरिका में स्क्वॉ वैली को ‘अविश्वसनीय’ माना जाता है।

लेस्ली मैककेना, स्नोबोर्ड हाफपाइप में तीन बार GB (जीबी) ओलंपियन (2002, 2006 और 2010 विंटर गेम्स), प्रोटेक्ट अवर विंटर्स यूके एंबेसडर कहती हैं, “मैंने सर्दियों में स्की रिसॉर्ट में स्नोपैक में भारी बदलाव देखा है और विशेष रूप से उन 30 वर्षों में ग्लेशियर कवर / स्थिति में और परिवर्तन कई स्तरों पर बेहद चिंताजनक हैं।”

“मैंने पिछले तीन दशकों को स्नो स्पोर्ट्स (snow sports) में संजोया है। लेकिन मुझे इस बात का बढ़ता डर सताता है कि हम अगले 30 वर्षों में कहां हो सकते हैं।”

Notes : “Slippery Slopes: How Climate Change is Threatening the Winter Olympics”, was produced by the Sport Ecology Group at Britain’s Loughborough University and the Protect Our Winters campaign group.

Laura Donaldson (born 12 January 1972) is a British freestyle skier. She competed in the women’s moguls event at the 2002 Winter Olympics.

Topics : Climate Change, environment, Winter Olympics 2022,

ब्रेकिंग : आज भारत की टॉप हेडलाइंस। आज की बड़ी खबरें | 18 जनवरी 2022

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बीएचयू में एमए इन हिन्दू स्टडीज, हिन्दू अध्ययन पाठ्यक्रम की शुरूआत

बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय (बीएचयू) में एमए इन हिन्दू स्टडीज, हिन्दू अध्ययन पाठ्यक्रम शुरू किया गया है। यह कार्यक्रम आज 18 जनवरी को ही प्रारंभ किया गया है। बीएचयू ने इसे महामना पं. मदनमोहन मालवीय की संकल्पना के अनुरूप बताया है। इसका सूत्र 18वीं सदी के विद्वान पं. गंगानाथ झा से प्रारम्भ होते हुए महामना मालवीय जी की संकल्पना में रूपांतरित होता है।

अर्चना गौतम के बचाव में उतरीं प्रियंका गांधी, कहा, ‘पीएम मोदी से क्यों नहीं पूछे जाते सवाल‘!

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक कांग्रेस की राष्ट्रीय महासचिव प्रियंका गांधी ने उत्तर प्रदेश में हस्तिनापुर विधानसभा क्षेत्र से कांग्रेस की उम्मीदवार अर्चना गौतम पर हुए विवाद और कीचड़ उछालने वाले मामले में कहा कि सिर्फ महिलाओं से ही क्यों शादी से जड़े सवाल पूछे जाते हैं ? पीएम नरेंद्र मोदी से ऐसे सवाल क्यों नहीं पूछे जाते?

राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों से केंद्र ने कोविड टेस्टिंग में तेजी लाने को कहा

केंद्र सरकार ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से महामारी के प्रसार को ट्रैक करने के लिए रणनीतिक तरीके से कोविड-19 परीक्षण को बढ़ाने के लिए कहा है।

दो से तीन हफ्ते में देश में आ सकती है कोविड पीक : एसबीआई रिसर्च

महाराष्ट्र की आर्थिक राजधानी मुंबई में कोविड के नए मामले स्थिर होते दिख रहे हैं, लेकिन बेंगलुरु और पुणे जैसे अन्य स्थानों में संक्रमण बढ़ रहा है। एसबीआई रिसर्च ने एक रिपोर्ट में यह दावा किया है।

चन्नी के परिजनों पर छापे के बाद कांग्रेस बोली, ईडी है भाजपा का चुनाव विभाग

पंजाब के मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी के करीबी रिश्तेदारों पर ईडी की छापेमारी पर कांग्रेस ने अप्रसन्नता जाहिर करते हुए भाजपा पर सरकारी एजेंसी के दुरुपयोग का आरोप लगाया है। कांग्रेस का कहना है कि वह पंजाब में लड़ाई लड़ने के लिए तैयार है और लोगों को बताएगी कि भाजपा देश के एकमात्र दलित मुख्यमंत्री को कैसे परेशान करने की कोशिश कर रही है।

सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र से मांगा जवाब – एनडीए में 400 में से महज 19 महिला उम्मीदवार ही क्यों?

सर्वोच्च न्यायालय ने मंगलवार को केंद्र से जवाब मांगते हुए कहा कि वह स्पष्ट करे कि राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (एनडीए) में 2023 में 400 सीटों में से महिला उम्मीदवारों की सीट 19 ही क्यों सीमित की गई?

अखिलेश यादव बोले, ‘पार्टी तीन सौ यूनिट फ्री बिजली का चलाएगी अभियान’

 समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने एक बड़े अभियान की शुरूआत करते हुए कहा है कि सपा ‘300 यूनिट बिजली पाओ, नाम लिखाओ, छूट ना जाओ’ अभियान चलाएगी। सपा कार्यकर्ता इस अभियान के तहत घर-घर पहुंचेंगे।

सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र से कहा, ‘भुखमरी से होने वाली मौतों पर डेटा प्रदान करें’

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक  सर्वोच्च न्यायालय ने मंगलवार को केंद्र सरकार से भूख से किसी की मौत की सूचना नहीं देने को लेकर सवाल किया। शीर्ष अदालत ने कहा कि इससे यह समझा जा सकता है कि देश में भूख से कोई मौत नहीं होती है। शीर्ष अदालत ने सरकार से कहा कि वह भुखमरी से होने वाली मौतों पर नवीनतम डेटा प्रस्तुत करे और राज्य सरकारों को भूख और कुपोषण को दूर करने के लिए सामुदायिक रसोई पर लागू करने के लिए एक मॉडल योजना तैयार करे।

लाइलाज घावों का उपचार, डायबिटीज रोगियों को बड़ा फायदा – बीएचयू का शोध

पुराने व लाइलाज समझे जाने वाले घावों के उपचार की दिशा में बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने महत्वपूर्ण शोध किया है। शोध में सामने आया है कि जो घाव महीनों से नहीं भरे थे वो चंद दिनों में ठीक हो गए। इस रिसर्च से मधुमेह रोगियों को खासतौर से होगा फायदा होगा। यह रिसर्च हाल ही अमेरिका में प्रकाशित हुई है।

मां के दूध से नहीं होता कोविड का संक्रमण, वैक्सीन मजबूत सुरक्षा कवच है

 कोरोना के नए वैरिएंट ओमिक्रॉन के मामले लगातार देश में बढ़ते जा रहे हैं। इसकी चपेट में गर्भवती महिलाएं न आएं, वह अपने जच्चा बच्चा कैसे सुरक्षित रखें, इसे लेकर डाक्टरों ने कई सुझाव दिए हैं। विशेषज्ञों की मानें तो कोरोना की वैक्सीन कई तरह के इंफेक्शन को कम कर सकती है इसी के साथ कोरोना से होनी वाले कॉम्पलिकेशन को भी कम कर सकता है। यह अपने आप में मजबूत सुरक्षा कवच है।

मॉडर्ना की कोविड और फ्लू के लिए असरदार वैक्सीन अगले साल तक उपलब्ध हो जाएगी

अमेरिकी दवा निमार्ता मॉडर्ना एक संयुक्त कोविड-19 और फ्लू बूस्टर शॉट पर काम कर रही है, जो कुछ देशों में 2023 तक जल्द ही उपलब्ध हो सकती है। कंपनी के सीईओ स्टीफन बैंसेल ने यह जानकारी दी।

अफगानिस्तान में भूकंप से मरने वालों की संख्या 22 हुई

अफगानिस्तान के पश्चिमी प्रांत बड़गीस में 5.6 तीव्रता के आए भूकंप से मरने वालों की संख्या बढ़कर 22 हो गई है।

क्या ओमिक्रोन कोरोना महामारी को खत्म कर देगा ? जानिए क्या बोले अमेरिका के महामारी संक्रामक रोग विशेषज्ञ फौसी

अमेरिका के महामारी संक्रामक रोग विशेषज्ञ एंथनी फौसी ने कहा है कि ऐसा कहना बहुत जल्दबाजी होगी कि ओमिक्रोन से कोविड महामारी का अंत हो जाएगा क्योंकि टीकों को चकमा देने की क्षमता रखने वाले इसी तरह के अन्य वेरिएंट भी सामने आ सकते हैं।

बीबीएल में खेलने वाले पहले भारतीय क्रिकेटर बने उन्मुक्त चंद

पूर्व अंडर-19 विश्व कप विजेता कप्तान उन्मुक्त चंद मंगलवार को ऑस्ट्रेलिया की बिग बैश लीग (बीबीएल) में खेलने वाले पहले भारतीय क्रिकेटर बन गए।

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ब्रेकिंग : आज भारत की टॉप हेडलाइंस। आज की बड़ी खबरें | 13 जनवरी 2022

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यूपी चुनाव : उन्नाव रेप पीड़िता की मां बनी कांग्रेस प्रत्याशी

कांग्रेस ने आज उन 50 महिला उम्मीदवारों के नामों की घोषणा की, जो अपने मुद्दों पर सबसे आगे रहीं। इनमें उन्नाव रेप पीड़िता की मां आशा सिंह और ब्लॉक प्रमुख के लिए समाजवादी पार्टी (सपा) की पूर्व उम्मीदवार रितु सिंह शामिल हैं, जिनके साथ कथित तौर पर मारपीट की गई थी और भाजपा कार्यकर्ताओं ने उन्हें नामांकन दाखिल करने से रोका था, शामिल हैं।

एक भी दिन ऐसा नहीं गुजरता जब भाजपा का कोई नेता पार्टी नहीं छोड़ता : शरद पवार

राष्ट्रवादी कांग्रेस (एनसीपी ) के प्रमुख शरद पवार ने उत्तर प्रदेश में चुनाव से ठीक पहले भाजपा विधायकों के पार्टी छोड़ने के सिलसिले पर कहा एक भी दिन ऐसा नहीं गुजरता जब भाजपा का कोई नेता पार्टी नहीं छोड़ता।

कोरोना वायरस : वर्क फ्रॉम होमके बढ़ते चलन के मद्देनजर कैट ने पॉलिसी बनाने का पीएम से किया आग्रह

कोरोना महामारी के शुरूआत से ही वर्क फ्रॉम होम का चलन बड़ा तेजी से चला है, अब प्रधानमंत्री से इसी चलन पर एक पॉलिसी बनाने का आग्रह किया गया है। कन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स कैट के मुताबिक, वर्क फ्रॉम होम संस्कृति पिछले दो कोविड वर्षों में तेजी से विकसित हुई है और इस मॉड्यूल को सुचारू रूप से चलाने के लिए ठोस और संरचनात्मक नियमों और नीतियों की आवश्यकता है।

संसद के 300 से ज्यादा कर्मचारी कोरोना पॉजिटिव, कुल 708 संक्रमित

9 से 12 जनवरी के बीच संसद के 300 से अधिक कर्मचारी कोविड-19 से संक्रमित पाए गए हैं।

मछुआरों पर हमला करने के खिलाफ भारत को श्रीलंका को चेतावनी देनी चाहिए : पीएमके नेता

पट्टाली मक्कल कच्छी (पीएमके) के संस्थापक एस. रामदास ने कहा कि श्रीलंका को वित्तीय और सैन्य सहायता मुहैया कराने वाली भारत सरकार को श्रीलंका को मछुआरों पर हमला नहीं करने की चेतावनी देनी चाहिए।

तमिलनाडु सरकार ने मजदूरों को सहायता प्रदान करने का दिया आश्वासन

देश भर में फैली कोरोना की तीसरी लहर के साथ, तमिलनाडु सरकार ने राज्य में प्रवासी मजदूरों को सहायता प्रदान करने के लिए एक नियंत्रण कक्ष स्थापित किया है।

मप्र में ऑनलाइन गेम पर रोक लगाने के लिए आएगा कानून

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में ऑन लाइन फ्री फायर गेम खेलने की लत में एक बच्चे ने फांसी के फंदे से लटककर जान दे दी। इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिए राज्य सरकार ऑन गेम पर रोक लगाने एक कानून बनाने जा रही है।

छत्तीसगढ़ में सरकारी अमला घर से ही कर सकेगा काम

देश के अन्य हिस्सों के साथ छत्तीसगढ़ में भी कोरोना की तीसरी लहर का असर नजर आ रहा है और यहां मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। यही कारण है कि यहां इस बीमारी के संक्रमण को रोकने की दिशा में जरूरी कदम उठाए जा रहे हैं, इसी क्रम में अधिकारियों और कर्मचारियों को घर से काम ( वर्क फ्रॉम होम ) करने का विकल्प दिया गया है।

बुजुर्ग आबादी के लिए नर्सिंग सेवाएं उपलब्ध कराने पर ध्यान देगा चीन

चीन में बुजुर्गों की बढ़ती आबादी प्रमुख चिंता का विषय है। समय-समय पर सरकार द्वारा आबादी के बीच संतुलन बनाने और बुजुर्गों की देखभाल आदि के लिए योजनाएं जारी की जाती हैं। इसी कड़ी में चीन बूढ़ी होती जनसंख्या की जरूरतों को पूरा करने और उनके जीवन की गुणवत्ता में सुधार करने के लिए कदम उठाने वाला है।

शीतकालीन ओलंपिक के दौरान सभी स्थानों में 100 फीसदी हरित बिजली का उपयोग होगा

चीनी राज्य परिषद द्वारा 13 जनवरी को आयोजित न्यूज ब्रीफिंग में पेइचिंग शीतकालीन ओलंपिक और पेइचिंग शीतकालीन पैरालंपिक के ग्रीन शीतकालीन ओलंपिक और सतत विकास कार्य की स्थिति का परिचय दिया गया।

ट्यूनीशिया में लगाया गया दो सप्ताह का कर्फ्यू

ट्यूनीशियाई सरकार ने कोविड -19 महामारी की नवीनतम लहर के प्रसार को रोकने के लिए देश भर में गुरुवार दो सप्ताह का नया कर्फ्यू लागू करेगी।

नाइजीरिया ने सात महीने बाद ट्विटर से हटाया प्रतिबंध

नाइजीरियाई सरकार ने पिछले साल जून में ट्विटर पर लगाए गए प्रतिबंध (ban on twitter) को हटाते हुए कहा कि माइक्रो-ब्लॉगिंग प्लेटफॉर्म इस साल की पहली तिमाही के दौरान पश्चिम अफ्रीकी राष्ट्र में ‘एक कानूनी इकाई’ स्थापित करने के लिए सहमत हो गया है।

तीसरे टेस्ट में भारत ने दक्षिण अफ्रीका को दिया 212 रनों का लक्ष्य

ऋषभ पंत (100) की शानदार नाबाद पारी की बदौलत न्यूलैंड्स में तीसरे और निर्णायक मुकाबले में तीसरे दिन के चाय तक भारत ने 67.3 ओवरों में 10 विकेट के नुकसान पर 198 रन बनाए, जिसके बाद दक्षिण अफ्रीका पर 211 रनों की बढ़त बना ली। भारत की और से पंत और कप्तान कोहली ने 94 रनों की बेहतरीन साझेदारी की। अफ्रीकी तेज गेंदबाज मार्को जेनसेन ने सबसे ज्यादा चार विकेट अपने नाम किए। अब साउथ अफ्रीका को जीतने के लिए 212 रन बनाने होंगे।

हैदराबाद के उस्मानिया और गांधी अस्पताल में कोविड विस्फोट

तेलंगाना सरकार द्वारा यहां संचालित उस्मानिया जनरल हॉस्पिटल (ओजीएच) और गांधी अस्पताल कोविड-19 से बुरी तरह प्रभावित हुए हैं, जहां 100 से अधिक डॉक्टर, मेडिकल छात्र और अन्य स्टाफ सदस्य पॉजिटिव पाए गए हैं।

दिल्ली में कोविड-19 के बढ़ने के बावजूद अस्पताल में भर्ती होने की स्थिति स्थिर : दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन

दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन ने गुरुवार को कहा कि राष्ट्रीय राजधानी में कोविड-19 के मामले (COVID-19 cases in the national capital) तेजी से बढ़ रहे हैं, लेकिन संक्रमण के कारण अस्पताल में भर्ती होने की दर स्थिर बनी हुई है।

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स्पिटिंग कोबरा : काटता नहीं जहर की बौछार करता है ये साँप

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Spitting cobra facts in Hindi | स्पिटिंग कोबरा फैक्ट्स हिंदी में | Snake Facts in Hindi

हमने साँप के बारे में कई बातें सुनी हैं। अलग-अलग प्रजाति के साँपों के अलग-अलग व्यवहार। स्पिटिंग कोबरा भी उनमें से एक है। कोबरा की विभिन्न प्रजातियों में से यह एक ऐसा साँप है जो अपने विषदन्त के जरिए जहर को आगे यानी सामने की ओर फेंकता है। इसीलिए इन्हें स्पिटिंग कोबरा कहा जाता है, मतलब जहर को स्प्रे या जहर की बौछार करने वाला साँप।

अफ्रीका में स्पिटिंग कोबरा की प्रमुख प्रजातियाँ | Major Species of Spitting Cobra in Africa

अधिकांश स्पिटिंग कोबरा नाजा प्रजाति के होते हैं। ये अधिकतर दक्षिण अफ्रीका (Snakes of Africa) और दक्षिणपूर्वीय एशिया के घास के मैदानों, खेतों और जंगलों में पाए जाते हैं। अफ्रीका में स्पिटिंग कोबरा की सात प्रमुख प्रजातियाँ पाई जाती हैं जिनमें रेड स्पिटिंग कोबरा (Red spitting cobra), मोजाम्बिक स्पिटिंग कोबरा (Mozambique Spitting Cobra), ब्लैक-नेक्ड स्पिटिंग कोबरा (black-necked spitting cobra) और जब्रा स्पिटिंग कोबरा (Jabra Spitting Cobra) उल्लेखनीय हैं।

एशिया में स्पिटिंग कोबरा की प्रजातियाँ | Species of Spitting Cobra in Asia

इसी तरह एशिया में भी स्पिटिंग कोबरा (Reptiles of Asia) की 7 विभिन्न प्रजातियाँ पाई जाती हैं जिनमें इक्वेटोरियल स्पिटिंग कोबरा, फिलीपिन स्पिटिंग कोबरा, इंडोचाइनीज स्पिटिंग कोबरा व इंडोनेशियन स्पिटिंग कोबरा उल्लेखनीय हैं।

स्पिटिंग कोबरा विष कैसे स्प्रे करते हैं? | How do you spray spitting cobra venom?

अब यह समझते हैं कि स्पिटिंग कोबरा जहर को किस तरह बाहर निकालते हैं। इसके लिए स्पिटिंग कोबरा अपनी विष ग्रन्थि (venom gland) को बस सिकोड़ते हैं जिससे जहर उनके विषदन्त में आ जाता है और फिर विषदन्त (venomous) में सामने की तरफ बने छिद्रों से जहर तेजी-से बाहर निकल जाता है। वैसे सभी साँपों में ऐसा होता है। स्पिटिंग कोबरा में स्प्रे करने की प्रवृत्ति, उनके विषदन्तों के आकार में परिवर्तन और सिर की मांसलता में परिवर्तन के प्रति अनुकूलन का परिणाम है।

अन्य साँपों से स्पिटिंग कोबरा में क्या फर्क होता है ? | What differentiates a spitting cobra from other snakes?

अन्य साँपों से इतना फर्क होता है कि स्पिटिंग कोबरा के विषदन्त ऐसी खास जगह पर होते हैं कि जहर महज बाहर निकलने की बजाय तेज धार के रूप में बाहर निकलता है। विषदन्त के छिद्र जितने छोटे और गोल होंगे, जहर उतनी ही तेजी-से बाहर निकलेगा। इस पिचकारी की गति इतनी तेज होती है कि आप समझ ही नहीं पाते कि अचानक आपसे क्या आकर टकराया।

कितनी होती है स्पिटिंग कोबरा की लम्बाई

स्पिटिंग कोबरा लम्बाई में 3 से 9 फीट तक बढ़ सकते हैं। स्प्रे करने के समय ये अपने फन को फैलाकर उठ जाते हैं। ये न सिर्फ 6.6 फीट तक अपने जहर को स्प्रे कर सकते हैं बल्कि लगातार 40 बार अपने जहर की जल्दी-जल्दी बौछार भी कर सकते हैं। स्पिटिंग कोबरा का दूर का निशाना दस में से कम-से-कम आठ बार अचूक होता है।

स्पिटिंग कोबरा के जहर की घातकता (The lethality of spitting cobra venom) | Is the venom of a spitting cobra different from that of other snakes?

क्या स्पिटिंग कोबरा का जहर अन्य साँपों के जहर से अलग होता है? हाँ, ऐसा माना जाता है कि स्पिटिंग कोबरा का जहर अन्य कई साँपों के जहर से ज़्यादा दर्दनाक होता है। कोबरा साँपों का विष (cobra snake venom) कई यौगिकों का एक मिश्रण है। लेकिन स्पिटिंग कोबरा के विष में कोशिकाओं के लिए काफी खतरनाक माने जाने वाले सायटोटॉक्सिन (cytotoxin), अन्य साँपों की तुलना में ज़्यादा होते हैं। इस वजह से जहर की बौछार जब ऊतकों पर पड़ती है तो उनको काफी नुकसान पहुँचा सकती है। स्पिटिंग कोबरा, किंग कोबरा (जो इन कोबरा का दूर का रिश्तेदार है) जितने जहरीले तो नहीं होते लेकिन इनके सायटोटॉक्सिन काफी खतरनाक हो सकते हैं।

काटने की बजाय स्पिटिंग कोबरा जहर स्प्रे क्यों करते हैं? | Why do spitting cobras spray venom?

इसके दो कारण हैं। पहला और प्रमुख कारण है आत्मरक्षा जो सभी जीवों की स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है। खुद को बचाने के लिए हम सभी कोई-न-कोई तरीका अपनाते ही हैं। उसी तरह स्पिटिंग कोबरा भी आत्मरक्षा के लिए जहर की बौछार करते हैं। स्पष्ट रूप से यह उनकी बेहद प्राकृतिक और स्वाभाविक प्रतिक्रिया होती है। अण्डे से बाहर निकलने के तुरन्द बाद से ही स्पिटिंग कोबरा ज़हर स्प्रे करने में सक्षम हो जाते हैं। हालाँकि इनके बच्चे तुलनात्मक रूप से छोटे आकार व छोटे विषदन्त और कम दूरी तक ही ज़हर की बौछार कर पाने की क्षमता की वजह से बहुत ज़्यादा असुरक्षित होते हैं। पर ये काटने की बजाय शिकारी पर ज़हर स्प्रे क्यों करते हैं? इसका जवाब तो पता नहीं। लेकिन ये साँप कुछ डेढ़ करोड़ साल पहले विकसित हुए, लगभग उसी समय जब अफ्रीका और एशिया में वानर (एप्स) का जैव-विकास हो रहा था।

ये कोबरा विष की एक धार न थूककर, बौछार करते हैं। चूँकि ज़्यादातर शिकारियों की ऊँचाई और स्पिटिंग कोबरा द्वारा फन उठाकर फैलाने पर इनकी ऊँचाई लगभग एक बराबर हो जाती है, इस वजह से शिकारी की आँखें ज़्यादातर इनका निशाना बन जाती हैं जो कि शरीर का एक अत्यन्त नाज़ुक अंग हैं।

अगर एक बार स्पिटिंग कोबरा का जहर आँखों में चला गया तो ज़हर में मौजूद सायटोटॉक्सिन और न्यूरोटॉक्सिन शिकार की आँखों में अत्यन्त तेज़ दर्द तो पैदा करेंगे ही, साथ ही शिकार को स्थाई या अस्थाई रूप से अन्धा भी कर देंगे। इस वजह से शिकार को स्पिटिंग कोबरा से दूर हटना ही पड़ेगा।

मनुष्य के सन्दर्भ में भी स्पिटिंग कोबरा द्वारा जहर की बौछार करने के बाद यदि तुरन्त इसका इलाज न करवाया जाए तो मनुष्य भी हमेशा के लिए अंधा हो सकता है। इससे ही अन्दाजा लगाया जा सकता है कि स्पिटिंग कोबरा का जहर कितना तेज़ और खतरनाक होता है। वैसे इसका जहर त्वचा के लिए हानिकारक नहीं होता पर ये आँख के अलावा नाक या कटी हुई त्वचा में चला जाए तो भी काफी नुकसानदेह माना जाता है। अगर इनके सामने कोई बड़ा शिकारी आ जाए तो इनको भागने के लिए पर्याप्त समय चाहिए होगा। तब वे शिकारी पर ज़हर की बौछार करके उसे अस्थाई रूप से अंधा कर देते हैं और वहाँ से भाग निकलते हैं। इस काउंटर अटैक की वजह से शिकारी से खुद को बचाने का पर्याप्त मौका मिल जाता है।

एशियाई स्पिटिंग कोबरा के प्रमुख शिकारी नेवले होते हैं, वहीं अफ्रीकी देशों में पाए जाने वाले स्पिटिंग कोबरा के मुख्य शिकारी सिक्रेटरी बर्ड (अफ्रीका में पाया जाने वाला एक बहुत बड़ा पक्षी जो अक्सर खुले घास के मैदानों में पाया जाता है) और मॉनिटर लिज़र्ड होते हैं।

स्पिटिंग कोबरा द्वारा शेर पर ज़हर की बौछार करके, शेर से खुद को बचाते हुए भी देखा गया है। विष थूकने का दूसरा कारण है शिकार करना। स्पिटिंग कोबरा मेंढक, छिपकली, पक्षी, पक्षियों के अण्डे, चूहे, अन्य साँप और कीड़े खाते हैं। दरअसल, ये इतने शक्तिशाली नहीं होते कि शिकार के गले को दबोचकर और उसकी साँसें रोककर उसे मार डालें। इनके विषदन्त भी छोटे होते हैं और अगर ये अपने शिकार को काटते हैं तो इन्हें अपने शिकार को बहुत मज़बूती से पकड़ना होगा, तब तक जब तक कि शिकार मर न जाए। इस संघर्ष के दौरान अगर शिकार को थोड़ी-सी भी ढील मिल गई तो वो स्पिटिंग कोबरा पर ही पलट वार करके उसे मार सकता है। भले ही फिर शिकार उसके ज़हर से बाद में खुद मर जाए, पर तब साँप को उससे क्या फायदा होगा! इसलिए स्पिटिंग कोबरा के लिए यह जरूरी होता है कि वह अपने शिकार को जल्द-से-जल्द निष्क्रिय कर दे और ऐसा वह उसे अन्धा करके करता है। तो इस तरह स्पिटिंग कोबरा के जहर के दो उपयोग होते हैं – शिकार को मारने के लिए और खुद को बचाने के लिए।

वैसे तो कोबरा की सभी प्रजातियों के साँप प्रतिरक्षा के लिए जहर की बौछार नहीं कर सकते, लेकिन वैज्ञानिकों का मानना है कि एशिया में पाए जाने वाले कोबरा (जो स्पिटिंग कोबरा नहीं माने जाते) की कुछ प्रजातियाँ भी संकट की घड़ी में कभी-कभी स्पिटिंग कोबरा जैसा व्यवहार प्रदर्शित करती हैं। यानी ये साँप अपना बचाव करने के लिए दूर से ही ज़हर की बौछार कर देते हैं। इनके अलावा चीन में पाए जाने वाले काफी जहरीले मेंग्शन पिटवाइपर सटीकता से ज़हर स्प्रे करने के लिए विशिष्ट रूप से जाने जाते हैं।

पारुल सोनी

(मूलतः देशबन्धु में 27 मार्च 2018 को प्रकाशित)

विश्व गौरैया दिवस : तिथि, थीम और इतिहास.. आंगन में लौट आओ गौरैया!

Bird world

विश्व गौरैया दिवस (20 मार्च) पर विशेष| World sparrow day in Hindi

नई दिल्ली, 19 मार्च 2021 : मानव जीवन प्रकृति के सह-अस्तित्व पर ही निर्भर है। प्रकृति सभी जीवों एवं वनस्पतियों के जीवन का आधार है। मानव, पशु-पक्षी,  सागर-सरिताएं, गिरि-कानन आदि सभी से मिलकर एक जैव-पारिस्थितिकी तंत्र निर्माण होता है। इस पारिस्थितिकी तंत्र में संतुलन (Balance in the ecosystem) बनाये रखने के लिए जैव विविधता (Biodiversity) का होना अति-आवश्यक है। लेकिन, आधुनिक मानवीय क्रियाकलापों द्वारा जैव विविधता का निरंतर क्षय हो रहा है, जिसके कारण जीवों की अनेक प्रजातियां विलुप्त हो रही हैं। गौरेया भी इसी तरह के संकट का शिकार है।

मनुष्य के साथ लगभग 10 हजार वर्षों से अधिक समय से रह रही है गौरैया

गौरैया अब शहरों में दुर्लभ हो गया है। हालांकि, गाँव के लोगों को अभी भी इसकी चहचहाहट सुनने को मिल जाती है। अनुमान है कि गौरैया मनुष्य के साथ लगभग 10 हजार वर्षों से अधिक समय से रह रही है। लेकिन, हमारी आधुनिक जीवनशैली गौरैया के लिए घातक सिद्ध हो रही है।

गौरैया की घटती आबादी के प्रमुख कारण | The main causes of sparrow’s declining population

शहरों में बढ़ता ध्वनि प्रदूषण भी गौरैया की घटती आबादी के प्रमुख कारणों में से एक है। गौरैया की घटती आबादी को देखते हुए इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर ने वर्ष 2002 में इसे ऐसी प्रजातियों में शामिल कर दिया, जिनकी संख्या कम है, और वे विलुप्त होने की कगार पर हैं। इसी क्रम में 20 मार्च को विश्व गौरैया दिवस के रूप में घोषित किया गया, ताकि गौरैया के बारे में जागरूकता को बढ़ाया जा सके।

विश्व गौरैया दिवस 2021 की थीम | Theme of World Sparrow Day 2021

इस वर्ष विश्व गौरैया दिवस की थीम ‘आई लव स्पैरो’ है।

Sparrow, घरेलू गौरैया, Domestic sparrow,House sparrow,

गौरैया एक बहुत ही छोटा पक्षी है, जिसकी लंबाई औसतन 16 सेंटीमीटर होती है। इसका वजन महज 20 से 40 ग्राम तक का होता है। वैज्ञानिकों के अनुसार पृथ्वी पर गौरैया की लगभग 43 प्रजातियां उपलब्ध हैं। लेकिन, पिछले कुछ सालों में इसकी संख्या में 60 से 80 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है। इसकी आयु आमतौर पर 04 से 07 वर्षों की होती है।

गौरैया क्या क्या खाती है?

गौरेया दिखने में भी काफी आकर्षक होते हैं, और आमतौर पर यह पक्षी अपने भोजन की तलाश में कई किलोमीटर दूर तक जा सकते हैं। गौरैया आमतौर पर 38 किलोमीटर प्रति घंटे की गति से उड़ सकते हैं। अगर गौरैया पक्षी के रंग की बात जाए तो यह हल्के भूरे और सफेद रंग का होता है। इसकी चोंच पीले रंग की होती है। गौरैया की आवाज बहुत ही मधुर और सुरीली होती है।

गौरैया गायब क्यों हो रही है?

यह पक्षी अब बेहद कम दिखाई देते हैं, जिसके पीछे सबसे बड़ा कारण मानव का पारिस्थितिक तंत्र में हस्तक्षेप करना है। गौरैया अपना घोसला बनाने के लिए छोटे पेड़ों या झाड़ियों को पसंद करती है। लेकिन, मनुष्य उन्हें काटता जा रहा है। शहरों और गाँवों में बड़ी तादाद में लगे मोबाइल फोन के टावरों को भी गौरैया समेत दूसरे पक्षियों के लिए खतरा बताया जाता है। इनसे निकलने वाली इलेक्ट्रो-मैग्नेटिक तरंगें इन पक्षियों पर प्रभाव डालती हैं।

गौरैया पक्षी पारिस्थितिकी तंत्र के एक हिस्से के रूप में हमारे पर्यावरण को बेहतर बनाने की दिशा में अपना महत्वपूर्ण योगदान देती है। गौरैया अल्फा और कटवर्म नामक कीड़े खाती है, जो फसलों के लिए बेहद हानिकारक होते हैं। इसके साथ-साथ गौरेया बाजरा, धान, चावल के दाने भी खाती है।

close up photo of sparrow
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वर्तमान समय में विश्व स्तर पर इसके संरक्षण के लिए अनेक महत्वपूर्ण कदम उठाए गए हैं। भारत सरकार भी इस दिशा में निरंतर प्रयास कर रही है। राजधानी दिल्ली और बिहार ने गौरैया को अपना राजकीय पक्षी घोषित किया है। इसके साथ ही, दिल्ली में ‘सेव स्पैरो’ के नाम से इसके संरक्षण की मुहिम भी चलाई गई है। एनएफएस द्वारा गुजरात के अहमदाबाद में ‘गौरैया पुरस्कार’ की घोषणा की गई है, जिसका मुख्य उद्देश्य ऐसे लोगों की सराहना करना है, जो पर्यावरण और गौरेया संरक्षण में अपना योगदान दे रहें हैं।

मानव द्वारा पर्यावरण का जो विनाश हो रहा है, उससे कई प्रजातियां विलुप्त होने की स्थिति में हैं, जिसमें गौरेया पक्षी की भी गिनती की जा सकती है।

विलुप्त हो रही गौरेया मानव को यह संकेत देना चाहती है कि बहुत हो चुका पर्यावरण का विनाश (Environmental destruction), अब इसका और विनाश मत करो! मानव को समझना होगा कि गौरेया पक्षी की हमारे जीवन और पारिस्थितिकी तंत्र में अहम भूमिका है और इसका संरक्षण भी जरूरी है।

(इंडिया साइंस वायर)

World Sparrow Day : Date, theme, history

17 जून को मरुस्थलीकरण और सूखे से लड़ने का दिवस

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विश्व मरुस्थलीकरण रोकथाम दिवस | World Day to Combat Desertification and Drought | Global Observance: Desertification and Drought Day 2020

मरुस्थलीकरण व सूखा से मुकाबला करने के लिए विश्व मरुस्थलीकरण रोकथाम दिवस (Desertification and Drought Day in Hindi ), वैश्विक स्तर पर जन-जागरूकता फैलाने का ऐसा प्रयास है जिसमें अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सहयोग की अपेक्षा की जाती है।

मरुस्थलीकरण और सूखा : दुनिया के समक्ष बड़ी चुनौती

मरुस्थलीकरण जमीन के खराब होकर अनुपजाऊ हो जाने की ऐसी प्रक्रिया होती है, जिसमें जलवायु परिवर्तन (Climate change) तथा मानवीय गतिविधियों समेत अन्य कई कारणों से शुष्क, अर्द्ध-शुष्क और निर्जल अर्द्ध-नम इलाकों की जमीन रेगिस्तान में बदल जाती है। अतः जमीन की उत्पादन क्षमता में कमी और ह्रास होता है।

संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेश ने विश्व मरुस्थलीकरण रोकथाम दिवस‘ पर अपने वीडियो संदेश में सचेत किया है कि दुनिया हर साल 24 अरब टन उपजाऊ भूमि खो देती है। उन्होंने कहा कि भूमि की गुणवत्ता ख़राब होने से राष्ट्रीय घरेलू उत्पाद में हर साल आठ प्रतिशत तक की गिरावट आ सकती है। भूमि क्षरण और उसके दुष्प्रभावों से मानवता पर मंडराते जलवायु संकट के और गहराने की आशंका है।

मरुस्थलीकरण की चुनौतीDesertification challenge

मरुस्थलीकरण, भूमि क्षरण और सूखा बड़े ख़तरे हैं जिनसे दुनिया भर में लाखों लोग, विशेषकर महिलाएं और बच्चे, प्रभावित हो रहे हैं. इस तरह के रुझानों को “तत्काल” बदलने की आवश्यकता है क्योंकि इस से मजबूरी में होने वाले विस्थापन में कमी आ सकती है, खाद्य सुरक्षा सुधर सकती है और आर्थिक विकास को बढ़ावा मिल सकता है. साथ ही यह “वैश्विक जलवायु इमरजेंसी” को दूर करने में भी मदद कर सकती है।

International efforts to tackle the challenge of desertification

मरुस्थलीकरण की चुनौती से निपटने के लिए अंतरराष्ट्रीय प्रयासों के बारे में जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से इस दिवस को 25 साल पहले शुरू किया गया था जो हर साल 17 जून को मनाया जाता है। मरुस्थलीकरण से निपटने के लिए संयुक्त राष्ट्र संधि क़ानूनी रूप से बाध्यकारी एकमात्र अंतरराष्ट्रीय समझौता है जो पर्यावरण और विकास को स्थायी भूमि प्रबंधन से जोड़ता है।

विश्व मरुस्थलीकरण रोकथाम दिवस का महत्व | Importance of World Desertification and Drought Day

2019 में इस विश्व दिवस पर ‘लेट्स ग्रो द फ़्यूचर टुगेदर’ का नारा दिया गया है और इसमें तीन प्रमुख मुद्दों पर ध्यान केंद्रित किया गया सूखा, मानव सुरक्षा और जलवायु।

संयुक्त राष्ट्र के अनुमान के मुताबिक़ 2025 तक दुनिया के दो-तिहाई लोग जल संकट की परिस्थितियों में रहने को मजबूर होंगे। उन्हें कुछ ऐसे दिनों का भी सामना करना पड़ेगा जब जल की मांग और आपूर्ति में भारी अंतर होगा। ऐसे में मरुस्थलीकरण के परिणामस्वरूप विस्थापन बढ़ने की संभावना है और 2045 तक करीब 13 करोड़ से ज़्यादा लोगों को अपना घर छोड़ना पड़ सकता है।

उल्लेखनीय है कि भारत में 29.3 प्रतिशत भूमि क्षरण से प्रभावित है। मरुस्थलीकरण व सूखे की बढ़ती भयावहता को देखते हुए इससे मुकाबला करने के लिए वैश्विक स्तर पर जागरूकता के प्रसार की आवश्यकता महसूस की गई।

संयुक्त राष्ट्र संघ की आम सभा में 1994 में मरुस्थलीकरण रोकथाम का प्रस्ताव रखा गया जिसका अनुमोदन दिसम्बर 1996 में किया गया। वहीं 14 अक्टूबर 1994 को भारत ने मरुस्थलीकरण को रोकने के लिए संयुक्त राष्ट्र अभिसमय (यूएनसीसीडी) पर हस्ताक्षर किये। जिसके पश्चात् वर्ष 1995 से मरुस्थलीकरण का मुकाबला करने के लिए यह दिवस मनाया जाने लगा।

मरुस्थलीकरण के क्या कारण हैं | What are the causes of desertification

मानव निर्मित कारणों में घास-फूस की अधिक चराई, उत्पादकता और जैव-विविधता को कम करता है। 2005 और 2015 के बीच भारत ने 31% घास के मैदान खो दिये। वनों की कटाई से ग्रीनहाउस गैसों के प्रभाव में वृद्धि तो होती है साथ ही धरती अपना परिधान लूटा देती है, काटो और जलाओ’ कृषि पद्धति मिट्टी के कटाव के खतरे को बढ़ाती है। उर्वरकों का अतिप्रयोग और अतिवृष्टि मिट्टी की खनिज संरचना को असंतुलित करते हैं। जलवायु परिवर्तन तापमान, वर्षा, मरुस्थलीकरण को बढ़ा सकता है। प्राकृतिक आपदाएँ जैसे- बाढ़, सूखा, भूस्खलन,पानी का क्षरण,पानी का कटाव उपजाऊ मिट्टी का विस्थापन कर सकता है। हवा द्वारा रेत का अतिक्रमण भूमि की उर्वरता को कम करता है जिससे भूमि मरुस्थलीकरण के लिये अतिसंवेदनशील हो जाती है।

मरुस्थलीकरण में भारत की वर्तमान स्थिति | Current status of India in desertification

वर्तमान परिप्रेक्ष्य में मरुस्थलीकरण भारत की प्रमुख समस्या बनती जा रही है। दरअसल इसकी वजह करीब 30 फीसदी जमीन का मरुस्थल में बदल जाना है। उल्लेखनीय है कि इसमें से 82 प्रतिशत हिस्सा केवल आठ राज्यों राजस्थान, महाराष्ट्र, गुजरात, जम्मू एवं कश्मीर, कर्नाटक, झारखंड, ओडिशा, मध्य प्रदेश और तेलंगाना में है। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई) द्वारा जारी “स्टेट ऑफ एनवायरमेंट इन फिगर्स 2019” की रिपोर्ट के मुताबिक 2003-05 से 2011-13 के बीच भारत में मरुस्थलीकरण 18.7 हेक्टेयर तक बढ़ चुका है। वहीं सूखा प्रभावित 78 में से 21 जिले ऐसे हैं, जिनका 50 फीसदी से अधिक क्षेत्र मरुस्थलीकरण में बदल चुका है।

भारत का 29.32 फीसदी क्षेत्र मरुस्थलीकरण से प्रभावित है। इसमें 0.56 फीसदी का बदलाव देखा गया है।

गौरतलब है कि गुजरात में चार जिले ऐसे हैं, जहाँ मरुस्थलीकरण का प्रभाव देखा जा रहा है, इसके अलावा महाराष्ट्र में 3 जिले, तमिलनाडु में 5 जिले, पंजाब में 2 जिले, हरियाणा में 2 जिले, राजस्थान में 4 जिले, मध्य प्रदेश में 4 जिले, गोवा में 1 जिला, कर्नाटक में 2 जिले, केरल में 2 जिले, जम्मू कश्मीर में 5 जिले और हिमाचल प्रदेश में 3 जिलों में मरुस्थलीकरण का प्रभाव है।

Here is why improved forecasts are not helping prevent floods and droughts

2019 में विश्व मरुस्थलीकरण और सूखा रोकथाम दिवस के अवसर पर आयोजित समारोह के दौरान भारत ने पहली बार ‘संयुक्‍त राष्‍ट्र मरुस्‍थलीकरण रोकथाम कन्‍वेंशन’ से संबंधित पक्षकारों के सम्मेलन के 14वें सत्र की मेज़बानी की। इस बैठक का आयोजन 29 अगस्त से 14 सितंबर, 2019 के बीच और दिल्ली में किया गया।

Land degradation in India is affecting 30 percent of the total geographical area of the country.

भारत में भूमि के क्षरण से देश के कुल भौगोलिक क्षेत्र का 30 प्रतिशत प्रभावित हो रहा है। भारत लक्ष्यों को प्राप्त करने के साथ-साथ इस समझौते के प्रति संकल्‍पबद्ध है। मिट्टी के क्षरण को रोकने में प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना , मृदा स्‍वास्‍थ्‍य कार्ड योजना, मृदा स्‍वास्‍थ्‍य प्रबंधन योजना,प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना, प्रति बूंद अधिक फसल जैसी भारत सरकार की विभिन्‍न योजनाएँ काम कर रही हैं।

मरुस्थलीकरण निवारण के उपाय | Desertification prevention measures | Methods of preventing desertification and recovering drought

वनीकरण को प्रोत्साहन इस समस्या से निपटने में सहायक हो सकता है, कृषि में रासायनिक उर्वरकों के स्थान पर जैविक उर्वरकों का प्रयोग सूखे को कम करता है। फसल चक्र को प्रभावी रूप से अपनाना और सिंचाई के नवीन और वैज्ञानिक तरीकों को अपनाना जैसे बूँद-बूँद सिंचाई, स्प्रिंकलर सिंचाई आदि।

मरुस्थलीकरण के बारे में जागरूकता (Awareness of desertification) बढ़ाएँ और वृक्षारोपण को बढ़ाया जाना चाहिये। धरती पर वन सम्पदा के संरक्षण (Conservation of forest wealth) के लिए वृक्षों को काटने से रोका जाना चाहिए इसके लिए सख्त कानून का प्रावधान किया जाना चाहिए। साथ ही रिक्त भूमि पर, पार्कों में सड़कों के किनारे व खेतों की मेड़ों पर वृक्षारोपण कार्यक्रम को व्यापक स्तर पर चलाया जाए।

जरूरत इस बात की भी है कि इन स्थानों पर जलवायु अनुकूल पौधों-वृक्षों को उगाया जाए। मरुस्थलीकरण से बचाव के लिए जल संसाधनों का संरक्षण तथा समुचित मात्र में विवेकपूर्ण उपयोग काफी कारगर भूमिका अदा कर सकती है। इसके लिए कृषि में शुष्क कृषि प्रणालियों को प्रयोग में लाने को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। मरुभूमि की लवणता व क्षारीयता को कम करने में वैज्ञानिक उपाय को महत्व दिया जाना चाहिए।ग्रामीण क्षेत्रों में स्वतः उत्पन्न होने वाली अनियोजित वनस्पति के कटाई को नियंत्रित करने के साथ ही पशु चरागाहों पर उचित मानवीय नियंत्रण स्थापित करना चाहिए।

आगे की राह

जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को स्थिर करने, वन्यजीव प्रजातियों को बचाने और समस्त मानव जाति की रक्षा के लिये मरुस्थलीकरण को समाप्त करना होगा।

जंगल की रक्षा करना हम सबकी ज़िम्मेदारी है और दुनिया भर के लोगों और सरकारों को इसे निभाना चाहिये।

Private: The coming water war between Africa and Europe-100% of American rice is poisoned with Arsenic !

प्रियंका सौरभ Priyanka Saurabh रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस, कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार.
प्रियंका सौरभ Priyanka Saurabh
रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस,
कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार.

मरुस्थलीकरण, भूमि क्षरण और सूखा बड़े खतरे हैं, जिससे दुनिया भर में लाखों लोग, विशेषकर महिलाएँ और बच्चे प्रभावित हो रहे हैं। ऐसे में इस समस्या का तत्काल समाधान आज वक्त की माँग हो गई है। चूँकि इस समाधान से जहाँ भूमि संरक्षण और उसकी गुणवत्ता बहाल होगी, वहीं विस्थापन में कमी आयेगी, खाद्य सुरक्षा सुधरेगी और आर्थिक विकास को बढ़ावा मिलने के साथ वैश्विक जलवायु परिवर्तन से संबंधित समस्याओं से निजात मिल सकेगा।

मरुस्थलीकरण व सूखा से मुकाबला करने के लिए विश्व मरुस्थलीकरण रोकथाम दिवस, वैश्विक स्तर पर जन-जागरूकता फैलाने का ऐसा प्रयास है जिसमें अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सहयोग की अपेक्षा की जाती है। विश्व बंधुत्व की भावना के साथ इसमें भागीदारी सुनिश्चित करना धरती तथा पर्यावरण को बचाने में सार्थक प्रयास साबित हो सकता है।

प्रियंका सौरभ

रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस,

कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार,

Notes –

2020 Desertification and Drought Day will focus on links between consumption and land

This year’s global observance event, hosted by Korea Forest Service, will take place online, with a full-day program featuring a variety of exciting events and international talent.