नागरिकता संशोधन विधेयक के खिलाफ लखनऊ में हुआ प्रदर्शन, पूरे देश में होगा विरोध

Protest in Lucknow against Citizenship Amendment Bill, protest will be held across the country

नागरिकता संशोधन विधेयक के खिलाफ लखनऊ में हुआ प्रदर्शन, पूरे देश में होगा विरोध

Protest in Lucknow against Citizenship Amendment Bill, protest will be held across the country

लखनऊ, 5 दिसंबर 2019। रिहाई मंच, एनएपीएम, नागरिक परिषद, इंसानी बिरादरी, ऑल इंडिया पीपुल्स फ्रंट, हम सफ़र, सामाजिक न्याय मंच, जन मंच, युवा शक्ति संगठन, पसमांदा मुस्लिम महाज, जमात ए इस्लामी हिन्द, खुदाई खिदमतगार, उत्तर प्रदेश छात्र सभा, मुस्लिम यूथ ब्रदर्स उत्तर प्रदेश, जेआईएच, सोशलिस्ट पार्टी (इण्डिया) आदि सामाजिक-राजनीतिक संगठनों ने विवादास्पद नागरिकता संशोधन अधिनियम (Controversial Citizenship Amendment Act) के खिलाफ लखनऊ में अम्बेडकर प्रतिमा, हजरतगंज पर धरना दिया। संविधान के विपरीत जाकर इस विधेयक के जरिए भाजपा सरकार देश का विभाजन करने पर उतारू है। सर्वसम्मति से तय किया गया कि राष्ट्रीय स्तर पर इसका विरोध किया जाएगा। इस बात पर भी सहमति बनी कि तमाम संगठन एकजुट होकर इसके खिलाफ जनता को लामबंद करेंगे।

Citizenship Amendment Bill weakening the federal structure

वक्ताओं ने कहा कि यह नागरिकता संशोधन विधेयक संघीय ढांचे को कमज़ोर करने वाला और महात्मा गांधी और बाबा साहब अम्बेडकर के सपनों को तोड़ने वाला है। यह विधेयक दो राष्ट्र के सिद्धांत वाली विघटनकारी, ब्राह्मणवादी और मनुवादी राजनीति के इसी सिद्धांत पर आधारित है। इससे पहले ऐसे ही षड़यंत्र के तहत बाबा साहब के महापरिनिर्वाण दिवस पर बाबरी मस्जिद को तोड़ा गया, जिसके चलते देश में बड़े पैमाने पर टकराव हुआ और लोग मारे गए। अब उसी दुष्चक्र को दोहराने की साजिश है। इसे संसद में पेश नहीं होना चाहिए। विपक्ष की ज़िम्मेदारी है कि वह इस विधेयक को सदन में किसी भी हालत में पारित न होने दे, वरना देश नए तरह के विभाजन की तरफ बढ़ेगा। जिस तरह लगातार संविधान संशोधन की प्रक्रिया चल रही है उससे न केवल संविधान का मूल रूप बदल रहा है बल्कि उसके कई प्रावधानों की प्रासंगिकता ही खत्म होने की तरफ है। देश की ऐसी विकृत तस्वीर उभर रही है जिसमें सह अस्तित्व और सहिष्णुता के लिए कोई स्थान नहीं।

The Citizenship Amendment Bill will increase the horrific picture of 1947 also

वक्ताओं ने आगाह किया कि इससे 1947 से भी भयावह तस्वीर उभरेगी। जो पीढ़ियों से एक साथ रहे हैं उनको बेदखल किया जाएगा। यह राजनीतिक तौर पर मुसलमानों के लिए तो खतरा है ही लेकिन उससे बड़ा खतरा आदिवासी, ओबीसी, दलित, महिलाओं और बच्चों के लिए होगा। नागरिकता का मतलब केवल किसी रजिस्टर में नाम लिख लेने भर से नहीं है। इसका मतलब होता है प्रत्येक नागरिक को शिक्षा और रोज़गार देना, सुरक्षा और सम्मानजनक जीवन की गारंटी देना, मौलिक अधिकारों को सुनिश्चित करना। सरकार इन बिंदुओं पर पूरी तरह असफल है। यह सरकार न तो देश में धर्म और जाति के नाम पर लिंचिंग को रोक पा रही है और न ही महिलाओं को सुरक्षा दे पा रही है। महिलाओं को डायन बताकर मार डाला जा रहा है। लगातार बलात्कार और महिलाओं के साथ अभद्रता के चलते देश महिला उत्पीड़न के लिए विश्व का सबसे खतरनाक देश बन गया है। ज़रूरत इस बात की थी कि इन दिशाओं में काम किया जाता लेकिन हर मोर्चे पर विफल सरकार नागरिकता विधेयक जैसे विभाजनकारी मुद्दों में शरण ढूंढ रही है। ऐसा नहीं होने दिया जाएगा।

जनजुटाव में रिहाई मंच अध्यक्ष मुहम्मद शुऐब, जन मंच के संयोजक पूर्व आईपीएस एसआर दारापुरी, सृजनयोगी आदियोग, गोपाल राय, जैद अहमद फारूकी, नितिन राज, गोलू यादव, शिवा रजवार, आयुष श्रीवास्तव, मोहमद नफीस, ओम प्रकाश भारती, तन्मय, रुबीना, अजय शर्मा, बांकेलाल, आंनद सिंह, राजीव गुप्ता, राम संजीवन, वीरेंद्र गुप्ता, अयान गाज़ी, अहमद उल्ला, मोहम्मद ज़हीर आलम फलाही, मोहम्मद साबिर खान, नमिता जैन, एफ मुसन्ना, नाहीद अकील, शिवाजी राय, शाह आलम, इमरान अहमद, सचेंद्र प्रताप यादव, अब्दुल हजीज़ गांधी, अभिनव, आलम हुसैन, अब्सर आलम, हाफ़िज़ वारी, केके शुक्ला, प्रदीप पांडेय, अंकुश यादव, एमडी खान, एम राशिद खान, प्रयान शर्मा, जेडए खान, वीरेंद्र त्रिपाठी, नीलम भारती, दुर्गेश रावत, जैनब, आशीष, हफीज किदवई, इरफान अली, रुकैया, एम अनिल, मानस गुप्ता, गौरव सिंह, अहमद खान, सुरजीत रॉय अम्बेडकर आदि शामिल हुए।

 

आर्थिक मंदी के कारण बिजली की मांग अपने सबसे कम स्तर पर, तीन राज्य ‘कोई नया कोयला नहीं’ नीति घोषित कर सकते हैं : रिपोर्ट

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Tamil Nadu, Rajasthan, and Karnataka could declare ‘no new coal’ policy: Report

नई दिल्ली, 5 दिसंबर (अमलेन्दु उपाध्याय) : ‘Winds of Change: No New Coal States of India’ या बदलाव की हवा : भारत के कोई कोयला नहीं नीति वाले राज्य” शीर्षक के एक नए विश्लेषण के अनुसार, तीन भारतीय राज्य राजस्थान, तमिलनाडु और कर्नाटक, गुजरात और छत्तीसगढ़ के नक्शेकदम पर चलते हुए ‘कोई नया कोयला नहीं’ नीति घोषित कर सकते हैं। इसका मतलब है कि इन राज्यों को भविष्य में किसी भी नए कोयला बिजली संयंत्र की आवश्यकता नहीं होगी, और उनकी भविष्य की ऊर्जा संबंधी सभी मांगें अक्षय और स्थिति के अनुसार आधारित ऊर्जा के द्वारा प्रभावी ढंग से पूरी की जा सकती हैं।

नई दिल्ली स्थित एक जलवायु संचार संगठन क्लाइमेट ट्रेंड्स (Climate Trends) द्वारा जारी की गई रिपोर्ट, जो कि – वर्तमान आर्थिक सूचकों और निदेशकों, राज्यों की स्थापित बिजली क्षमता, बिजली उत्पादन और नवीकरणीय ऊर्जा (RE) क्षमता के विश्लेषण के साथ-साथ इसके प्रभावों के आधार पर निष्कर्ष निकालती है, साथ ही साथ कोयले की ऊर्जा से होने वाले वायु प्रदूषण का प्रभाव और पानी की समस्या का भी विश्लेषण करती है, में बताया गया है कि

“हमारा विश्लेषण भारत में कोयले के इस्तेमाल के अंत होने की शुरुआत की पुष्टि करता है। गुजरात जो कि देश का सबसे बड़ा औद्योगिक राज्य है और छत्तीसगढ़ जो कि सबसे बड़ा कोयला उत्पादन करने वाला राज्य है इनके द्वारा कोयला शक्ति से बाहर निकलने का निर्णय साफ़ साफ़ जाहिर करता है कि अभी तक इस्तेमाल की जाने वाली fossil  टेक्नोलॉजी जिससे अभी तक दुनिया संचालित होती आई है एक ख़राब अर्थनीति है। साथ ही साथ, यह अक्षय ऊर्जा की विश्वसनीयता और प्रतिस्पर्धात्मकता के लिए विश्वास का एक बहुत बड़ा वोट है, “

 कर्नाटक, राजस्थान, तमिलनाडु देश में उच्चतम RE (नवीकरणीय ऊर्जा) क्षमता वाले राज्य हैं। उनकी स्थापित RE क्षमता कोयले की शक्ति से या तो अधिक है या इससे आगे निकलने के रास्ते पर हैं।

राजस्थान में, कुल स्थापित कोयला सयंत्र क्षमता 11.6 GW है, जबकि RE + हाइड्रो 11.1 GW है। कर्नाटक में गैर-जीवाश्म की स्थापित क्षमता 63% है, कोयले की क्षमता 9 GW है, जबकि RE + हाइड्रो 17.9 GW है। इसी तरह, तमिलनाडु में गैर जीवाश्म 2.3 GW अधिक है जीवाश्म से, कोयला 13.5 GW पर है जबकि RE + हाइड्रो 15.6  GW पर है।

कम उप्लब्धता और उच्च परिवहन लागत के कारण वहां कोयला बिजली भी अधिक महंगी है।

दूसरी ओर, सौर और पवन ऊर्जा की लागत नए non-pithead कोयला बिजलीघर (एक विशेष तरीके से बनाया गया सयंत्र) की तुलना में 30-50% कम है। साथ ही पानी की कमी के कारण इन तीनो राज्यों में प्लांट का पूरा उपयोग औसतन 60% से कम है। इसके कारण बिजली बनाने वाले और बिजली का वितरण करने वाले दोनों के लिए वित्तीय खींचतान ज़्यादा बढ़ गया।

सबसे अधिक नवीकरणीय ऊर्जा (RE) क्षमता वाला राज्य राजस्थान में सौर ऊर्जा के लिए प्रति यूनिट मूल्य (` 2.44 / यूनिट या $ 0.034 / यूनिट) सबसे कम है। इसी तरह तमिलनाडु में पवन ऊर्जा की सबसे अधिक स्थापित क्षमता है, साथ ही 1500 MW  में सबसे बड़ा पवन ऊर्जा खेत भी है।

कर्नाटक में 65 मिलियन की आबादी (फ्रांस की जनसंख्या के समान, और कनाडा की जनसंख्या से दोगुनी) के साथ, इस साल जुलाई के महीने में लगातार तीन दिनों के लिए सौर और पवन ऊर्जा परियोजनाओं से अपनी 50% से अधिक बिजली की मांग को पूरा किया।

आंकड़े बताते हैं कि कोयला से बिजली पैदा करने वाले राज्यों से बिजली खरीदने की उच्च लागत और ग्राहकों के लिए भारी सब्सिडी देने के कारण बिजली वितरण कंपनियों पर ऋण का बोझ बढ़ा रहा है। राजस्थान, कर्नाटक और तमिलनाडु का संयुक्त ऋण $ 6bn, या ` 43,562 करोड़ है।

 क्लाइमेट ट्रेंड्स की निदेशक आरती खोसला (Aarti Khosla, Director Climate Trends),  के अनुसार,

“राजस्थान, कर्नाटक और तमिलनाडु राज्यों में देश की DISCOM (विद्युत वितरण कंपनियों) के आधे से अधिक ऋण हैं। फिर भी, तमिलनाडु में भारत में सबसे अधिक नई कोयला बिजली पाइपलाइन है। तमिलनाडु और राजस्थान राज्य सरकारों की निशुल्क बिजली देने की बिलकुल भी क्षमता नहीं है क्योंकि इन राज्यों के DISCOM की आर्थिक हालत बहुत ज़्यादा ख़राब है। उनके लिए अपना बकाया चुकाने का एकमात्र तरीका है सस्ती बिजली खरीदना, जो कि नवीकरणीय ऊर्जा (RE) से हासिल की हो”।

भारत में बिजली की मांग (Electricity demand in India) आर्थिक मंदी के कारण अभी संभवत: अपने सबसे कम स्तर पर है।

मानसून के सीजन में वृद्धि तथा सौर और पवन ऊर्जा की बढ़ती क्षमता के कारण, अक्टूबर 2019 में पारंपरिक स्रोतों से बिजली उत्पादन में 12.9% (वर्ष-दर-वर्ष) की गिरावट आई है। इस बीच, इसी अवधि के दौरान अक्षय ऊर्जा उत्पादन में 9.3% की वृद्धि हुई है। इस वृद्धि को राष्ट्रीय ऊर्जा भंडारण मिशन (NESM) से और बढ़ावा मिलने की उम्मीद है, जो भारत की ऊर्जा भंडारण क्षमता को बढ़ाने तथा सौर और पवन ऊर्जा पर अधिक निर्भरता बढ़ाने का इरादा रखता है।

वर्तमान में आर्थिक और मौसम की स्थिति से बिजली का उत्पादन और खपत पर अनपेक्षित प्रभाव पड़ा है। पनबिजली और नवीकरणीय ऊर्जा से बिजली के उत्पादन में बढ़ोतरी हुई है, जबकि कोयले से बिजली के उत्पादन में कमी आई है। भविष्य के लिए बिजली उत्पादन योजनाओं के पुर्विचार के लिए ये बिलकुल सही स्थिति हैं। RE (नवीकरणीय ऊर्जा) न केवल DISCOM ऋणों को हल करने में मदद कर सकता है, बल्कि एक धीमी अर्थव्यवस्था में नए रोजगार बढ़ाने में भी मदद कर सकता है।

रिपोर्ट के विश्लेषण में आगे बताया गया है कि इन राज्यों के अतिरक्त 12 और भारतीय राज्य हैं जो ‘कोई नया कोयला नहीं’ नीति की आसानी से घोषणा करने की स्थिति में हैं, क्योंकि उन सभी राज्यों की RE (नवीकरणीय ऊर्जा) क्षमता बहुत अधिक है। इनमें से कई राज्य भारत के उत्तर-पूर्व में स्थित हैं और उन सभी राज्यों की कोयले उत्पादन क्षमता भी कम है। उनकी आर्थिक और बिजली मांग की प्रोफाइल उन्हें इस परिवर्तन के लिए अच्छी तरह से अनुकूल बनाती है।

अपने नमक को कम करें, अपने जोखिम को कम करें

Health news

अपने नमक को कम करें, अपने जोखिम को कम करें

Lower Your Salt, Lower Your Risk

सभी को कार्य करने के लिए कुछ नमक या सोडियम क्लोराइड की आवश्यकता होती है। लेकिन, क्या आप जानते हैं कि आपके शरीर को ठीक से काम करने के लिए थोड़ी मात्रा में ही नमक की आवश्यकता होती है?

नमक दो खनिजों का एक संयोजन है – सोडियम और क्लोराइड

भोजन की पैकेजिंग पर दिखाई देने वाले पोषण तथ्यों के लेबल पर भोजन में नमक की मात्रा (amount of salt in a food) को “सोडियम” के रूप में सूचीबद्ध किया जाता है। आहार संबंधी दिशानिर्देश यह सलाह देते हैं कि अधिकांश वयस्क प्रति दिन 2300 मिलीग्राम से कम सोडियम खाना चाहिए। यह एक दिन में लगभग एक चम्मच टेबल सॉल्ट के बराबर होता है।

आपके शरीर को ठीक से काम करने के लिए कुछ सोडियम की आवश्यकता होती है।

सोडियम तंत्रिकाओं और मांसपेशियों के कार्य में मदद करता है। यह आपके शरीर में तरल पदार्थों के सही संतुलन को बनाए रखने में भी मदद करता है। आपके गुर्दे नियंत्रित करते हैं कि आपके शरीर में सोडियम कितना है।

यदि आपने बहुत अधिक नमक का सेवन किया है तो आपके गुर्दे इसे छुटकारा नहीं दे सकते हैं, ऐसी स्थिति में सोडियम आपके रक्त में बनता है। इससे उच्च रक्तचाप हो सकता है। उच्च रक्तचाप अन्य स्वास्थ्य समस्याओं को जन्म दे सकता है।

उच्च रक्तचाप हृदय रोग और स्ट्रोक के लिए आपके जोखिम को बढ़ा सकता है। खाद्य लेबल पढ़ने से आपको हर दिन खाने वाले सोडियम की मात्रा को मॉनिटर करने और कम करने में मदद मिल सकती है।

“Source: MedlinePlus, National Library of Medicine.” (Affiliated with  U.S. Department of Health and Human Services)

झारखण्ड विधानसभा चुनाव : दूसरे चरण की 20 सीटें तय करेंगी, किसके सिर सजेगा मुख्यमंत्री का ताज

Politics

झारखण्ड विधानसभा चुनाव : दूसरे चरण की 20 सीटें तय करेंगी, किसके सिर सजेगा मुख्यमंत्री का ताज

रांची से शाहनवाज़ हसन, 05 दिसंबर 2019. झारखंड विधानसभा चुनाव के दूसरे चरण (Second phase of Jharkhand assembly election) में 20 सीटों पर सात दिसंबर को मतदान होना है। दूसरे चरण में विभिन्न दलों के 260 उम्मीदवार चुनाव मैदान में हैं।

दूसरे चरण की 20 सीटें तय करेंगी किसके सिर सजेगा मुख्यमंत्री का ताज

दूसरे चरण के मतदान में देश भर की निगाह कोल्हान प्रमंडल पर टिकी है। दूसरे चरण के चुनाव में जमशेदपुर पूर्वी विधानसभा सीट (Jamshedpur Eastern Assembly Seat) से झारखण्ड के मुख्यमंत्री रघुवर दास को उनके ही काबिना मंत्री रहे सरयू राय से सीधे मुकाबले में कड़ी टक्कर दे रहे हैं, हालांकि कांग्रेस और झाविमो ने भी इस सीट से उम्मीदवार दिया है, फिर भी यह चुनाव सीधे मुकाबले की ओर बढ़ता दिखायी दे रहा है।

जमशेदपुर पश्चिम सीट (Jamshedpur West Seat) पर कांग्रेस के पूर्व मंत्री बन्ना गुप्ता का सीधा मुकाबला भाजपा के देवेंद्र सिंह से है, जमशेदपुर पूर्वी सीट से असद्दुदीन ओवैसी की पार्टी AIMIM एवं आम आदमी पार्टी ने भी उम्मीदवार दिया है।

ईचागढ़ विधानसभा क्षेत्र से इस बार 4 मज़बूत कुर्मी उम्मीदवार के मैदान में होने से पूर्व विधायक अरविंद सिंह मलखान की स्थिति बेहतर नज़र आ रही है।

ईचागढ़ का चुनाव विस्थापितों के मुद्दों को लेकर काफ़ी दिलचस्प हो गया है। निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में अरविंद सिंह मस्तान की सभा मे बिना किसी स्टार प्रचारक एवं नाच गाने के लोगों की भारी भीड़ देखने को मिल रही है।

चाईबासा सीट पर भाजपा पूर्व नौकरशाह प्रदेश प्रवक्ता जे बी तुबिद को पुनः टिकट देकर पहली बार जीत दर्ज करने के लिये प्रयासरत है हालांकि वर्तमान झामुमो विधायक दीपक बिरुवा भी मजबूत स्थिति में हैं।

जुगसलाई विधानसभा सीट पर त्रिकोणीय मुकाबले में झामुमो के मंगल कालिंदी मज़बूत स्थिति में दिखायी दे रहे हैं, वहीं बहरागोड़ा विधानसभा सीट पर झामुमो से भाजपा में शामिल हुये कुणाल सारंगी का मुकाबला समीर महांती से है। दोनों के बीच नज़दीकी मुकाबला देखने को मिल रहा है।

पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा एवं उनकी पत्नी चाईबासा सांसद गीता कोड़ा पश्चिम सिंहभूम की दो सीटों पर कांग्रेस की जीत के लिये दिन रात मेहनत कर रहे हैं हालांकि कांग्रेस के स्टार प्रचारकों ने अब तक इन क्षेत्रों की अब तक कोई सुध नहीं ली है।

घाटशिला विधानसभा सीट से कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष प्रदीप बालमुचू आजसू पार्टी से चुनावी मैदान में हैं। वर्तमान भाजपा विधायक लक्ष्मण टुड्डू का टिकट कटने पर इस सीट पर त्रिकोणीय मुकाबले में झामुमो के पूर्व विधायक रामदास सोरेन मज़बूत स्थिति में दिखाई दे रहे हैं।

कोल्हान में भाजपा और झामुमो के बीच कांटे की टक्कर है, राजनीतिक विशेषज्ञ कोल्हान में झामुमो को मज़बूत बता रहे हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एवं गृहमंत्री अमित शाह की जनसभा में लोगों की कम भीड़ का होना चर्चा का विषय बना हुआ है।

कांग्रेस ने जारी किया भाजपा की केन्द्र सरकार के किसान विरोधी रवैये का सबूत

Shailesh Nitin Trivedi

कांग्रेस ने जारी किया भाजपा की केन्द्र सरकार के किसान विरोधी रवैये का सबूत

भाजपा को किसानों से कोई हमदर्दी नहीं : कांग्रेस

भाजपा को किसानों से हमदर्दी होती तो 2500 रू. में धान खरीदी न रोकने के लिये अपनी केन्द्र सरकार को कहती

Congress released evidence of anti-farmer attitude of the BJP’s central government

रायपुर/04 दिसंबर 2019। भाजपा के किसान विरोधी रवैये (BJP’s anti-farmer attitude) पर कड़ा प्रहार करते हुये प्रदेश कांग्रेस के महामंत्री एवं संचार विभाग के अध्यक्ष शैलेश नितिन त्रिवेदी ने कहा है कि भाजपा को किसानों से कोई हमदर्दी नहीं। भाजपा को हमदर्दी होती तो अपनी केन्द्र सरकार को कहती कि 2500 रू. में धान खरीदी पर रोक न लगायें। हल्ला बोलना है तो रमन सिंह और धरमलाल कौशिक दिल्ली जाकर हल्ला बोलें, जहां भाजपा की केन्द्र सरकार किसानों को 2500 रू. धान का दाम देने से छत्तीसगढ़ की सरकार को रोकने के लिये चिट्ठियां लिख रही है एमओयू कर रही है दबाव डाल रही है।

त्रिवेदी ने कहा है कि रमन सिंह और भाजपा के नेताओं ने किसानों को धान बेचने से रोकने की भरपूर कोशिश की। भाजपा नेताओं ने किसानों के लिये 2500 रू. की मांग की है। भाजपा की केन्द्र सरकार कांग्रेस की राज्य सरकार को चिट्ठी लिखती है कि किसानों को 2500 रू. दाम न दिया जाये। यदि छत्तीसगढ़ सरकार 2500 रू. देगी तो छत्तीसगढ़ के किसानों के धान से बना चावल (Rice made from rice of farmers of Chhattisgarh) सेन्ट्रल पूल (Central pool) में नहीं लिया जायेगा। ये तो सीधे-सीधे भारतीय जनता पार्टी का दोहरा आचरण है। भाजपा की मोदी की केन्द्र सरकार 2500 रू. देने पर रोक लगा रही है और यहां के भाजपा नेता 2500 रू. देने की मांग कर रहे हैं। अगर रमन सिंह जी वाकई किसानों को 2500 रू. दिलाना चाहते है तो रमन सिंह जी को दिल्ली जाकर मांग करना चाहिये।

कांग्रेस नेता ने कहा कि रमन सिंह जी को जंतर-मंतर में मोदी सरकार से अमित शाह, रामविलास पासवान जी से मांग करना चाहिये कि छत्तीसगढ़ की सरकार को 2500 रू. में धान खरीदी करने से न रोका जाये। 2500 रू. में धान खरीदी में कोई रोकटोक भाजपा की केन्द्र सरकार के द्वारा न लगायी जाये।

उन्होंने कहा कि रमन सिंह जी नगपुरा जैसी जगहों में जाकर अपनी मेहनत और ऊर्जा व्यर्थ बर्बाद कर रहे हैं। पूरे छत्तीसगढ़ सहित नगपुरा के किसानों ने भारतीय जनता पार्टी को रमन सिंह जी को रिजेक्ट कर दिया। नगपुरा में 1816 किसानों ने अपना धान उसी दिन बेचा है, जिस दिन रमन सिंह वहां गए थे। प्रदेश के किसानों को भूपेश बघेल जी की सरकार पर पूरा भरोसा है, विश्वास है। ऐसा ही विश्वास पिछले साल भी था, जब 1750 रू. में रमन सिंह सरकार धान खरीदी कर रही थी। कांग्रेस की सरकार बनने के बाद 1750 रू. और 2500 रू. की बीच की अंतर की राशि है वो कांग्रेस की सरकार ने मुख्यमंत्री किसानों को दी है। कर्ज जिन किसानों से पटा लिया गया, ले लिया गया, उनका धान जमा कर लिया गया तो उन किसानों को कर्जमाफी की राशि अलग से भूपेश बघेल की सरकार ने दी। इस बार भी भाजपा सरकार ने 1815 रू. और 1835 रू. और भूपेश बघेल सरकार की 2500 रू. के अंतर की राशि किसानों को उसी तरह निश्चित रूप से दी जायेगी जैसे भूपेश बघेल सरकार ने धान के अंतर की राशि 2018 में और कर्जमाफी की राशि दी थी। कांग्रेस की सरकार किसानों की सरकार और छत्तीसगढ़ की सरकार है।

कांग्रेस के आरोपों और भाजपा के किसान विरोधी रवैये का सबूत जारी करते हुये प्रदेश कांग्रेस के महामंत्री एवं संचार विभाग के अध्यक्ष शैलेश नितिन त्रिवेदी ने कहा है कि 24 अक्टूबर का पत्र रविकांत सचिव भारत सरकार सेंट्रल पूल में राज्य की जरूरतों के मुताबिक ही प्रोक्योरमेंट करती, यानी कोई चावल खरीदी करती ही नहीं, जो रमन सरकार में होती थी। भाजपा के मोदी सरकार द्वारा कारण बता रहे हैं कि चावल के सेंट्रल पूल का स्टाक बंफर से अधिक है। इसी पत्र से खुलासा हो रहा है कि भाजपा की केन्द्र सरकार के मुताबिक किसानों को केन्द्र सरकार द्वारा घोषित समर्थन मूल्य से अधिक राशि देने से अनाज के बाजार मूल्य में वृद्धि होती है और फसल चक्र में दीगर फसलों की उपेक्षा होती है। भाजपा की केन्द्र सरकार जानबूझकर और छत्तीसगढ़ के भाजपा नेता राज्य सरकार की आर्थिक स्थिति खराब करने की साजिश में संलिप्त है। यही कारण है कि राज्य की आर्थिक स्थिति खराब नहीं होने के बावजूद भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रमन सिंह जी बार-बार कह रहे हैं कि राज्य की आर्थिक स्थिति खराब है।

नागरिकता संशोधन विधेयक संविधान की मूल भावना के खिलाफ- रिहाई मंच

Rihai Manch

नागरिकता संशोधन विधेयक संविधान की मूल भावना के खिलाफ- रिहाई मंच

Citizenship Amendment Bill against the basic spirit of the Constitution – Rihai Manch

5 दिसम्बर को 3 बजे अम्बेडकर प्रतिमा हज़रतगंज पर संशोधन विधेयक के खिलाफ जनता की एकजुटता

लखनऊ, 4 दिसम्बर 2019। रिहाई मंच कार्यालय पर हुई बैठक में भाजपा सरकार द्वारा कैबिनेट में पारित नागरिकता संशोधन विधेयक *( Citizenship Amendment Bill) को संविधान विरोधी करार दिया. तय किया गया कि देश के सेकुलर ढांचे और मिजाज़ को रौंदने की गरज से पेश इस विधेयक के खिलाफ 5 दिसंबर 2019, बृहस्पतिवार को शाम 3 बजे से अम्बेडकर प्रतिमा हजरतगंज लखनऊ पर एकजुटता का प्रदर्शन होगा.

वक्ताओं ने केंद्र सरकार द्वारा विवादित नागरिकता संशोधन अधिनियम 2016 संसद में पेश (Citizenship Amendment Act 2016 introduced in Parliament) किए जाने का कड़ा विरोध करते हुए तमाम विपक्षी दलों से अपील की कि वे सुनिश्चित करें कि यह संशोधन विधेयक राज्य सभा में पारित नहीं होने पाए।

खबरों के अनुसार केंद्र सरकार 10 दिसम्बर से पहले किसी भी दिन इसे राज्य सभा में पेश कर सकती है।

वक्ताओं ने कहा कि यह संशोधन विधेयक जनता की भावनाओं के विपरीत है और देश के तमाम हिस्सों से इसके खिलाफ आवाज़ उठ रही है। यह संशोधन विधेयक साम्प्रदायिक, भेदभावपूर्ण, असंवैधानिक है और जो देश की अधिसंख्य आबादी को नागरिकता से बेदखल करने की साजिश है। इसके निशाने पर हैं मुसलमान, आदिवासी, महिला, भूमिहीन और मज़दूर। इसके प्रावधानों के अनुसार एनआरसी से बाहर रह गए लोगों को नागरिकता के लिए आवेदन करने से पहले लिखित देना होगा कि वे पाकिस्तान, अफग़ानिस्ता या बांग्लादेश के निवासी थे और वहां प्रताड़ित किए जाने के कारण पलायन करके भारत आ गए थे। इस तरह गरीब, मज़दूर, दलित, आदिवासी जो इस देश के मूल निवासी हैं उनको विधिवत विदेशी शराणार्थी घोषित किया जाएगा उसके बाद नागरिकता प्रदान की जाएगी। यह संशोधन विधेयक न केवल मूल निवासी गरीब जनता के लिए अपमानजनक है बल्कि इस तरह से उन्हें आरक्षण, छात्रवृत्ति आदि कई सुविधाओं और अधिकारों से वंचित करने की साजिश है।

वक्ताओं ने आरोप लगाया कि साम्प्रदायिकता के आवरण में यह संशोधन विधेयक वास्तव में देश पर मनुवादी व्यवस्था थोपने का बड़ा षणयंत्र है और इसके खिलाफ अभियान चलाया जाएगा। यह अभियान केवल सरकार की ष[]यंत्रकारी चालों के विरुद्ध ही नहीं बल्कि उन विपक्षी दलों के खिलाफ भी होगा जो इस मनुवादी साज़िश में सरकार के साथ खड़े होंगे।

रिहाई मंच ने राज्य सभा में सदस्यता रखने वाले सभी विपक्षी दलों से अपील की है कि वे विवादित नागरिकता संशोधन विधेयक राज्य सभा में पेश किए जाने के समय डट कर इसका उच्च सदन में विरोध करें और बिना वॉकआउट किए या गैर हाजिर रहे इसे पारित होने से रोकने का अपना संवैधानिक दायित्व निभाएं।

बैठक में जन संगठनों से भी अपील की गई कि वे अपने कार्यक्षेत्र में विवादित विधेयक के खिलाफ जनता में जागरूकता पैदा करें।

बैठक में रिहाई मंच अध्यक्ष मुहम्मद शुऐब, राम कृष्ण, आदियोग, डा. एम डी खान, मुहम्मद शकील कुरैशी, खालिद, नज्मुससाकिब खान, अजय शर्मा, गंगेश, इमरान अहमद, बाके लाल, अयान गाजी, सचेन्द्र यादव, औरंगजेब खान, साजिद खान, गोलू यादव, राजीव यादव, रॉबिन वर्मा, गुफरान सिद्दीकी आदि लोग शामिल रहे.

माले छह दिसंबर को जिला मुख्यालयों पर प्रदर्शन करेगी

CPI ML

माले छह दिसंबर को जिला मुख्यालयों पर प्रदर्शन करेगी

CPI (ML) to demonstrate on 6 Dec at district headquarters

भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के आलोक में बाबरी मस्जिद विध्वंस के दोषियों को अविलंब दण्डित करने की मांग उठाएगी

The Communist Party of India (Marxist-Leninist) will raise the demand for punishing the culprits of Babri Masjid demolition without any delay in the light of the Supreme Court verdict.

लखनऊ, 4 दिसंबर। भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) सर्वोच्च न्यायालय के अयोध्या विवाद पर फैसले के आलोक में बाबरी मस्जिद विध्वंस के दोषियों को बिना और देरी किये दण्डित करने की मांग को लेकर छह दिसंबर को देशव्यापी प्रदर्शन करेगी। यह प्रदर्शन जिला मुख्यालयों पर होगा।

पार्टी के राज्य सचिव सुधाकर यादव ने बुधवार को यह जानकारी देते हुए कहा कि अपने फैसले में उच्चतम न्यायालय ने 1992 में बाबरी मस्जिद के जबरिया विध्वंस को स्पष्ट रूप से गैरकानूनी और आपराधिक कार्रवाई करार दिया है। लिहाजा इसके दोषियों को कठोर सजा मिलनी ही चाहिए। उन्होंने कहा कि लेकिन संघ-भाजपा सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बहाने विध्वंस को वैधता प्रदान करने और केंद्र सरकार फैसले में निहित इस महत्वपूर्ण बात को दबा देने की कोशिश में लगी है।

माले नेता ने कहा कि 27 साल बाद भी बाबरी मस्जिद विध्वंस के अपराधियों को सजा नहीं मिल पायी है। यह बहुत लम्बा अंतराल है। जिन सैकड़ों परिवारों ने बाबरी विध्वंस के बाद हुए अनेकों दंगों में अपने चहेतों को हमेशा के लिए खो दिया और जो लाखों परिवार आज भी उन दंगों के दंश से उबर नहीं पाये हैं, उनके लिए तो यह एक अनंत त्रासदी की तरह है ही। हमारे समाज की गंगा-जमुनी संस्कृति व सामाजिक सौहार्द के लिए भी जरूरी है कि सत्य और न्याय की जीत हो।

राज्य सचिव ने कहा कि विध्वंस के आरोपियों के खिलाफ मुकदमा सीबीआई की लखनऊ की विशेष अदालत में चल रहा है।

उन्होंने न्यायहित में अपील की कि सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के अनुरूप बाबरी मस्जिद विध्वंस के अपराधियों को सजा सुनाने में देरी नहीं करनी चाहिये.

माले नेता ने कहा कि यह पूरा देश जानता है कि बाबरी मस्जिद गिराने के आपराधिक कृत्‍य में कौन-कौन शामिल थे। इस कृत्‍य से भारत के लोकतांत्रिक धर्मनिरपेक्ष स्वरूप पर हमला किया गया। उन्होंने कहा कि ऐसे भी बहुत से नाम हैं जो उक्त मुकदमे की चार्जशीट में शामिल नहीं हैं, लेकिन ऐसे व्यक्ति खुद कर्इ बार स्वयं सार्वजनिक रूप से बता चुके हैं कि वे भी बाबरी मस्जिद गिराने में शामिल थे।

माले नेता ने कहा कि ऐसे सभी व्‍यक्तियों को भी सजा का भागीदार होना चाहिए। जैसे कि भाजपा सांसद साक्षी महाराज इस मुकदमे में नामजद अभियुक्त हैं, वहीं नाथूराम गोडसे की पूजा करने वाली सांसद प्रज्ञा ठाकुर सावर्जनिक रूप से खुद बताती रही हैं कि बाबरी मस्जिद को गिराने में वह शामिल थीं। न्याय के हित में इन दोनों सांसदों को तत्काल संसद से बर्खास्त किया जाना चाहिए।

जाड़ों में रहें ड्राई आई से एलर्ट

eyes

जाड़ों में रहें ड्राई आई से एलर्ट

विंटर में रहें ड्राई आई से एलर्ट Stay alert in winter with dry eye

नई दिल्ली, 04 दिसंबर 2019 : सर्दी का मौसम हर लिहाज से अच्छा माना जाता है फिर चाहे वह स्वास्थ्य के लिहाज से हो या फिर फैशन के लिहाज से। जहां आप बिना डरे हर तरह का खाना खाने से खुद को रोक नहीं पाते, वहीं फैशन करने में भी यह मौसम आड़े नहीं आता। लेकिन कुछ ऐसी समस्याएं हैं जो इस मौसम में परेशान कर सकती है, और वह है आंखों में सूखेपन की समस्या (Eye dryness problem) यानी ड्राई आई की प्रॉब्लम

Dry eye means

जी हां, ड्राई आई का मतलब वैसी आंख से है जब आंख में स्थित आंसू ग्रंथियां पर्याप्त आंसू का निर्माण नहीं कर पाती। यह समस्या सर्दी के मौसम में ज्यादा होती है। यह बीमारी कनेक्टिव टिशू के डिसऑर्डर (Connective tissue disorder) होने से होती है। यह समस्या अधिक होने की स्थीति में आंख की सतह को नुकसान पहुंचा सकती है और जिसके परिणामस्वरूप अंधेपन की समस्या भी हो सकती है। यह समस्या से ग्रसित व्यक्ति में कई तरह के लक्षण दिखाई पड़ते हैं।

ड्राई आई के लक्षण – Symptoms of dry eye

आंखो में सूखेपन जैसा महसूस होना, आंखों में खुजली व जलन का एहसास, हर वक्त आंखों को मलते रहना, ऐसा महसूस होना कि जैसे की आंखों में कंकड़ घुस गया हो, आंखों से बिना कारण पानी का निकलते रहना, बिना कारण आंखों का थक जाना या सूजन के फलस्वरूप सिकुड़ कर छोटा हो जाना।

ड्राई आई के कारण – Causes of dry eye

मौसम के अलावा आंखों के ड्राई होने के और भी कई कारण हो सकते हैं। विटामिन सी की कमी के कारण, महिलाओं में मेनोपॉज के बाद, कुछ दवाओं जैसे सल्फा ग्रुप इत्यादि के एलर्जी रीएक्शन के कारण, एर्लजी की समस्या से ग्रसित होने पर, कुछ बीमारी जैसे कि थायरॉयड जैसी समस्या होने पर, लंबे समय तक बिना पलक झपकाएं कंप्यूटर पर काम करते रहने से, अधिक देर तक टीवी देखने से व उच्च स्तर के प्रदूषण के कारण ।

ड्राई आई का समाधान Dry eye solution

ड्राई आई की बढ़ती समस्याओं को देखते हुए उपचार के तौर पर अभी तक केवल आंखों में चिकनाई उत्पन्न करने वाला ड्राप बना है। लेकिन इस दिशा में और भी कुछ नए संभावित विकल्प के तौर पर उभर कर सामने आएं हैं। अब साइकलो स्पोरिन ड्राप जो कि रोगी के इम्यून सिस्टम के साथ काम करते हैं। रोगियों में कनेकटिव-टिशू डिसआर्डर होने पर उनको वायरायड पैबौलॉजी करनी चाहिए। यह 40- 50 प्रतिशत मामलों में मददगार हो रहा है। यह आंखों में चिकनाई लाने वाली आई ड्राप्स की आवश्यकता को कम करता है । दूसरा विकल्प पंकटल प्लग का है। यह काफी छोटी प्लग होती है, जो आंसू के स्राव को बंद कर देती है। यह मुलायम सिमीकन की बनी होती है तथा इसे आसानी से लगाया जा सकता है। यह आंसूओं को रोकने में मदद करती है जिससे की आंखों में नमी बरकरार रहे।

Keep this attention in dry eye

इसके अलावा इस समस्या से ग्रसित लोगों को निम्न बातों का ध्यान रखना चाहिए।

आंखों को डायरेक्ट हवा के संपर्क में न आने दें।इससे बचने के लिए चश्में का इस्तेमाल करें। कंप्यूटर पर काम करने के दौरान बीच-बीच में पलक झपकाना नहीं भूलें । यदि कॉन्टेक्ट लेंस का इस्तेमाल कर रहे हैं, तो एक बार अपने आंखों के डॉक्टर के पास जाएं। हेयर ड्रायर, कार हीटर, एसी ब्लोअर और पंखे से आंख को दूर रखें। धूप में जाने से पहले आंखों को कवर करना ना भूलें। सर्दी के मौसम में कमरे को गर्म रखने वाले उपकरणों से आंखों को बचाएं। इसके लिए हीटर के पास एक मग पानी रख दें ताकि रूम में नमी बनी रहें। कुछ लोग विशेष प्रकार के डिजायन किए गए ग्लास का उपयोग करते हैं। यह आंखों के लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है। आंखों में जलन या खुजली महसूस होने पर इसे रगड़ने के बजाय आंखों पर ठंडे पानी से छींटे मारे।

डॉ महीपाल सिंह सचदेव, चेयर मैन सेंटर फॉर साइट

नोट – यह समाचार किसी भी हालत में चिकित्सकीय परामर्श नहीं है। यह अव्यावसायिक रिपोर्ट मात्र है। आप इस समाचार के आधार पर कोई निर्णय कतई नहीं ले सकते। स्वयं डॉक्टर न बनें किसी योग्य चिकित्सक से सलाह लें।)

 

लाइफस्टाइल बदलने और डायबिटीज की वजह से बढ़ रहे है किडनी के मरीज

Health news

लाइफस्टाइल बदलने और डायबिटीज की वजह से बढ़ रहे है किडनी के मरीज

रेवाड़ी (हरियाणा), 03 दिसंबर 2019. स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता (Health awareness) बढ़ाने के लक्ष्य से फोर्टिस मेमोरियल रिसर्च इंस्टीट्यूट, गुरुग्राम (Fortis Memorial Research Institute, Gurugram) ने रोटरी क्लब, रेवाड़ी (Rotary Club, Rewari) के सहयोग से हरियाणा के रेवाड़ी में एक दिन के मेगा हेल्थ कैम्प का आयोजन किया जो सबसे बड़े सुपर स्पेशियलीटी हेल्थ कैम्पों में एक है। इसमें 1000 से अधिक लोग आए और 700 लोगों ने निःशुल्क स्वास्थ्य सेवाओं और जांचों का लाभ लिया।

कैम्प में आए लोगों को वरिष्ठ चिकित्सकों ने निःशुल्क चिकित्सा परामर्श दिया।

आयोजन का मुख्य लक्ष्य लोगों को विभिन्न बीमारियों, इनके निदान, इलाज और रोकथाम के बारे में अधिक जागरूक और जानकार बनाना है।

लोगों को नेफ्रोलॉजी, दिल की बीमारियों, पेशाब की बीमारियों और डायबिटीज/ एंडोक्राइनोलॉजी संबंधी बीमारियों के बारे में सलाह (Advice regarding diabetes / endocrinology related diseases) दी गई।

नेफ्रोलॉजी एवं किडनी ट्रांस्प्लांट विभाग के निदेशक डॉ. सलिल जैन, वरिष्ठ सलाहकार, गैस्ट्रोइंटरोलॉजी एवं हेपैटोबिलियरी साइंस डॉ. रिंकेश बंसल, हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. रोहित गोयल, सलाहकार, यूरोलॉजली, कैंसर विज्ञान एवं रोबोटिक सर्जरी डॉ. मयंक भारती ने मूत्र रोगों के बारे में सलाह दी। डॉ. मोना सूद, सलाहकार, इंडोक्राइनोलॉजी ने डायबीटीज की समस्याओं के बारे में सलाह दी।

Kidney patients are increasing due to changing lifestyle and diabetes

डॉ. सलिल जैन का कहना है कि

‘‘रेवाड़ी और आसपास के शहरों में लाइफस्टाइल बदलने और डायबीटीज एवं हाई ब्लड प्रेशर का प्रकोप बढ़ने की वजह से पिछले कुछ वर्षों में किडनी के मरीजों की संख्या बहुत बढ़ी है। डायलिसिस के मामले बढ़ने की यह एक बड़ी वजह है। किडनी के स्वस्थ रहने और सही कार्य करने के लिए इसकी बीमारियों का जल्द पता लगना और रोकथाम के उपाय करना अनिवार्य है। यदि चेहरे या पैर में सूजन दिखे, पेल्सिव (पेड़ू) में दर्द, पेशाब करते हुए दर्द या जलन हो, बार-बार पेशाब आए, पेशाब में झाग बने तो ये नेफ्राइटिस के लक्षण (Symptoms of nephritis) हो सकते हैं। हमारी सभी से अपील है कि इन लक्षणों की अनदेखी नहीं करें और लक्षण नजर आने पर अविलंब चिकित्सा विशेषज्ञ से संपर्क करें।

डॉ. रितू गर्ग का कहना है कि

‘‘चिकित्सा संस्थान होने के नाते हमारा मुख्य लक्ष्य लोगों को स्वस्थ जीवनशैली के बारे में जागरूक करना है। यदि लोगों को बीमारियों के लक्षणों की जानकारी होगी और वे इनका जल्द पता लगने का महत्व समझ जाते हैं तो बीमारियों पर आधी जीत हो जाएगी। इस कैम्प के आयोजन का हमारा मकसद समाज को स्वास्थ्य के बारे में सलाह और निःशुल्क चिकित्सा सेवा देना है।

भोपाल 1984, याद है?

bhopal gas kand image

भोपाल 1984, याद है?

सन 1984, 2 और 3 दिसम्बर की रात बारह बजे के बाद भोपाल शहर की हवा ऐसी ज़हरीली हुई कि जिसने हजारों लोगों को काल के गाल में पहुंचा दिया और जाने कितने लोग बेघर, बेदर व अपाहिज हो गए। यूनियन कार्बाइड इण्डिया लिमिटेड (Union Carbide India Limited) के प्लांट से लीक हुई मिथाइल आइसो सायनेट (Methyl isocyanate) नामक ज़हरीली गैस ने रात बीतते हुए पूरे शहर को अपने आगोश में ले लिया। पुलिस रेकोर्ड्स ने तो आंकड़ों को चंद हजार तक सीमित किया मगर बाद में इस पूरी त्रासदी की सच्चाई (bhopal gas kand information in hindi) सामने आती रही और पता चला कि मरने वाले सरकारी आंकड़ों से कहीं आधिक थे। और उसमें अगर ज़ख़्मी लोगों को जोड़ दें तो आँकड़ा लाखों तक पहुंचा। यूनियन कार्बाइड इण्डिया लिमिटेड के पेस्टिसाइड प्लांट से एक घातक गैस मिथाइल आइसो साइनेट का रिसाव हुआ था जिसने भोपाल सहित देश को शोक में डुबो दिया।

जानलेवा लापरवाहियाँ  Lethal negligence

उस रात गैस के रिसाव के कई कारण गिनाए जाते हैं मसलन कर्मचारियों की लापरवाही जिससे पानी का टैंक में पहुंचना, गंदगी व ज़ंग से रिएक्शन पर तेज़ असर पड़ना, टैंक के ताप और दाब का बढ़ना  और स्टोर्ड घातक तरल मिथाइल आइसो साइनेट का गैस में बदलना आदि। मगर इसके साथ ही बहुत से कारण थे जो अनदेखे गए। वे एक नहीं अनगिनत थे, जैसे कि कम्पनी की लापरवाही और उसका कॉस्ट कटिंग के नाम पर सभी सुरक्षा मानदंडों की अनदेखी करना।

सुरूपा मुखर्जी ने अपनी किताब में इस पर जानकारी दी है कि कैसे मिथाइल आइसो साइनेट (bhopal gas kand gas name) को अपेक्षा से अधिक मात्रा के बड़े टैंकों में स्टोर किया गया जो कि 40 टन से ऊपर था। जबकि इतने घातक पदार्थ को इतनी अधिक मात्रा में एक साथ स्टोर करने की परमिशन नहीं थी। इसके अलावा रिसी गैस को कंट्रोल करने वाले छिड़काव यंत्र, फ्लेयर टावर, आदि कुछ काम नहीं कर रहे थे। प्रेशर बताने वाली मशीन भी सही काम नहीं कर रही थी। ये सब असल में इसलिए था क्योंकि कम्पनी में घाटे के दौरान इस प्लांट को बंद करने की तैयारी चल रही थी जिसके कारण सारे खर्चे बचाए जा रहे थे। जबकि इसी कम्पनी के प्लांट्स अलग देशों में सुरक्षा मानदंडों की उतनी अनदेखी नहीं कर पाते थे जितनी की भारत में वे करते थे।

ऐतिहासिक भूलें : Bhopal gas tragedy facts in hindi,

ये तो कुछ कारण हैं जिससे गैस को रोकने के कोई उपाय नहीं बचे थे। मगर और पीछे के कारण पर जाइए तो ज्ञात होता है कि छोटी छोटी भूलों का जानलेवा परिणाम निकला। यूनियन कार्बाइड पेस्टिसाइड प्लांट, यूनियन कार्बाइड इण्डिया लिमिटेड की इकाई था जो मल्टीनेशनल कम्पनी यूनियन कार्बाइड कॉर्पोरशन की भारतीय इकाई था। इसकी स्थापना 1969 में हुई थी। यहाँ से उत्पादित जो कीटनाशक पदार्थ “सेविन” नाम से बिकता था वो असल में कार्बैरिल नामक रसायन था। जो एक असाधारण कीटनाशक के रूप में मार्किट में आया था। इसका ब्रांड नाम सेविन रखा गया था। इसे किसानों का मसीहा और मनुष्यों के लिए अहानिकारक पदार्थ के रूप में प्रचार मिला था। मगर इसके बनने का जो तरीका यूनियन कार्बाइड इंडिया लिमिटेड अपनाता था उसमें बीच में एक इंटरमिडीएट पदार्थ बनता था जो बेहद खतरनाक था। दूसरा तरीका जो बाकी कुछ देशों में इस्तेमाल होता था वह अधिक खर्चीला तरीका था पर उसमें बीच का पदार्थ मिथाइल आइसो साइनेट जैसा बेहद घातक नहीं बनता था। कार्बैरिल बनने के बाद वह इंसानों के लिए सीधे तौर पर तो नुक्सान दायक नहीं ही बताया गया था। इसे किसानों के कीटों पर विजय के रूप में भी दर्शाया जाता था। मतलब प्रॉफिट जो था वो एक बड़ा कारण था इन सब अनदेखियों का।

अब इससे भी पहले के कारणों पर जाते हैं जो यह था कि शहर के बीच में ऐसा प्लांट लगाना। जिसके विरोध में बहुत लोग शुरू से ही थे। पर सरकार इस प्लांट को देश कि प्रगति के उदाहरण के रूप में प्रस्तुत करती थी और यहाँ तक कि मध्य प्रदेश सरकार को इस पर गर्व होता था और इसे मध्य प्रदेश के विकास के कार्यक्रमों से जोड़कर दिखाया जाता था। मध्य प्रदेश स्टेट बोर्ड की किताबों में भी इसका प्रचार टूरिस्ट स्पॉट के रूप में छपा था। इसके बड़े अधिकारियों से कई ब्यूरोक्रेट्स और नेताओं के बढ़िया सम्पर्क थे। नेताओं और ब्यूरोक्रेट्स के लिए उनके गेस्ट हॉउस व अन्य स्थल खुले रहते थे और कई अधिकारियों व नेताओं के सगे सम्बन्धी भी इस फैक्ट्री में अच्छी पोस्ट्स पर थे। कुल मिलाकर विकास की अंधी समझ में सब कुछ मिलीभगत से सही चल रहा था और सुरक्षा इंतजामों की अनदेखी पर कुछ सवाल नहीं थे। जबकि रिसाव आदि की इस तरह की घटनाएँ पहले भी छिटपुट रूप में होती रहती थीं। मगर सन 84 तक आते आते कम्पनी कुछ ख़ास फायदे में नहीं थी और इस प्लांट की सुरक्षा की अनदेखी और ज़्यादा बढ़ गई थी।

कितनी मौतें, कितने बेघर

उस रात असल घटना क्या थी इस पर कोई कुछ बहुत ठोस तथ्य तो कोई नहीं जानता पर यह सच्चाई सब जानते थे कि बचाव के उपाय कुछ नहीं थे। कोहरे की रात ने गैस के प्रकोप को और बढ़ा दिया। मोती सिंह जो उस वक्त एड्मिनिस्ट्रेटर थे वे अपनी किताब में बताते हैं कि किसी को कुछ समझ नहीं आ रहा था। प्रशासन रात एक के बाद ही सक्रिय हुआ पर तब तक त्राहिमाम हो चुका था। अनीस चिश्ती की किताब डेटलाइन भोपाल भी जानकारी देती है कि किस तरह हमीदिया अस्पताल में भीड़ इतनी थी कि मैनेज करना असम्भव था। अन्य जानकारियों से भी यही ज्ञात होता है कि डॉक्टर्स खुद नहीं जानते थे कि क्या करें क्योंकि उनके सामने मिथाइल आइसो साइनेट के असर के यह पहले मामले थे। इस तरह की गैस से बचने के लिए बहुतों ने कुछ गीले तौलिए इस्तेमाल करने जैसे बहुत मामूली उपाय इस्तेमाल किए। इसके अलावा उतना स्टाफ भी नहीं था जो इतनी बड़ी मात्रा में लोगों के उपचार में मदद हो।

Mohammad Zafar मोहम्मद ज़फ़र, शिक्षा के क्षेत्र में कार्यरत
मोहम्मद ज़फ़र, शिक्षा के क्षेत्र में कार्यरत

तमाम लोगों की ऑंखें गईं, तमाम फेफड़े राख हो गए और बहुतों को सोचने तक का मौक़ा नहीं मिला कि क्या हुआ। मोती सिंह कि किताब भोपाल गैस त्रासदी का सच में वे बताते हैं कि हर तरफ लाशों के ढेर थे। बड़ी मात्रा में जानवरों के शव कैसे ठिकाने लगाए गए और शहर को किस तरह महामारी से भी बचाया गया। खासकर फैक्ट्री के पास वाले क्षेत्र में तो हालत बहुत खराब थी। महीनों बाद धीरे धीरे लोगों ने किसी तरह वापस जीवन का रुख किया। कितनों ने अपने सगे सम्बन्धियों को खो दिया था। उनके पास कुछ नहीं बचा था सिवाय संघर्ष के मगर सरकार की अक्षमता देखिए कि वारेन एंडरसन जो उस वक्त कम्पनी का प्रमुख था उसका सरकार द्वारा कुछ नहीं हुआ और कुछ सालों पहले वह विदेश में अपनी ही मौत खत्म हुआ। साथ ही इस मामले में कई भारतीय उद्योगपतियों के नाम भी शामिल थे। भोपाल गैस पीड़ितों के नाम से कई संस्थाएँ हैं जो आज भी गैस पीड़ितों के लिए इन्साफ की मुहीम में जुटी हुई हैं। जैसे भोपाल की आवाज़, भोपाल पीड़ित महिला उद्योग समिति, भोपाल गैस पीड़ित, निराश्रित पेंशन भोगी मोर्चा, आदि। सतीनाथ सारंगी, रशीदा बी जैसे लोग भोपाल पीड़ितों के संघर्ष को आगे तक ले गए। कई बार संस्थाओं के लोगों पर अलग अलग तरह के आरोप भी लगाए जाते हैं पर वे अब भी इंसाफ की आस में लड़ रहे हैं। हज़ारों बच्चे अधकचरे विकास की अनदेखियों के कारण बेघर हो गए या अपाहिज हो गए। आज फैक्ट्री का पूरा एरिया एक खामोश मरघट सी शांति लिए डरावना सा खड़ा रहता है। बच्चे वहाँ की फिल्ड में खेलते हुए देखे जा सकते हैं मगर उस क्षेत्र को देख कर एक सिहरन सी हो जाती है। सन 2001 में यूनियन कार्बाइड कॉर्पोरेशन को डाऊ केमिकल्स ने अधिग्रहित कर लिया तो लोगों की लड़ाई फिर डाऊ के खिलाफ भी हो गई।

क्या हमने कुछ सबक लिया? Have we taken some lessons from the Bhopal gas tragedy?

वैसे देखा जाए इस पूरे घटनाक्रम (bhopal gas tragedy in hindi) से आज भी हमने कोई ख़ास सबक नहीं लिया है। कहीं ना कहीं कोई ना कोई छुटपुट रिसाव, रसायनों से मजदूरों की मौत आदि की खबरें आती ही रहती हैं। आज भी नेताओं, अधिकारीयों की मिली भगत से बहुत सी कम्पनियों ने लाभ के आगे सुरक्षा मानदंड ताक पर रखे हुए हैं। मगर सब कुछ ठीक ठाक चल रहा है। तब तक चलता रहेगा जब तक हम फिर ऐसी किसी बड़ी जानलेवा घटना के सामने नहीं आ जाएँगे। अगर हम यह सोचते हैं कि भोपाल गैस त्रासदी एक हादसा है तो यह भी हमारी नासमझी है क्योंकि जिस तरह नियम कानून किनारे रखे गए थे और सुरक्षा इंतज़ाम बंद पड़े थे वह एक तरह से आपराधिक कृत्य है जिसमें हमारे अपने अधिकारियों व नेताओं की भूमिका भी रही है। इतने लोगों की कुर्बानी से हमें कम से कम आज तो सबक लेना ही चाहिए ताकि फिर विकास की झूठी समझ, मुनाफाखोरी व भ्रष्टाचार के कारण फिर दूसरा भोपाल कहीं और ना हो।

मोहम्मद जफर Mohammad Zafar

Bhopal gas tragedy 1984 short note in hindi,

नाइट्रोजन युक्त वातावरण में संरक्षित भारत का हस्तलिखित संविधान

Original handwritten copy of the Constitution of India, Handwritten Constitution of India preserved in the Library of Parliament.

नाइट्रोजन युक्त वातावरण में संरक्षित भारत का हस्तलिखित संविधान

Handwritten constitution of India preserved in nitrogen-rich atmosphere

नई दिल्ली, 02 दिसंबर 2019 : करीब 70 साल पहले 26 नवंबर 1949 को स्वतंत्र भारत में भारतीय संविधान को अपनाया गया था और तभी से इस दिन को संविधान दिवस (Constitution Day) के रूप में मनाया जाता है। संविधान को अपनाए जाने के दो महीने बाद 26 जनवरी 1950 को इसे लागू किया गया। वर्ष 1980 में महसूस किया गया कि संसद के पुस्तकालय में रखे अंग्रेजी और हिंदी के मूल हस्तलिखित संविधान की प्रतियों को लंबे समय तक सुरक्षित बनाए रखने के लिए नए सिरे से प्रयास करने की जरूरत है। ऐसे में, इस ऐतिहासिक दस्तावेज के दीर्घकालीन संरक्षण के लिए उपयुक्त वैज्ञानिक विधियों की तलाश की जाने लगी।

Original handwritten copy of the Constitution of India

इसी क्रम में संसद के पुस्तकालय की ओर से नई दिल्ली स्थित वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान की राष्ट्रीय भौतिक प्रयोगशाला (एनपीएल) से संपर्क किया गया और विचार किया गया कि कांच के विशेष बक्सों में रखकर संविधान की प्रतियों को सुरक्षित रखा जा सकता है। एनपीएल के वैज्ञानिकों ने इस चुनौती से निपटने के लिए संविधान की मूल हस्तलिखित प्रतियों को नाइट्रोजन गैस से भरे वायु-रोधी कांच के बक्से में रखने का सुझाव दिया।

संसद पुस्तकालय में संरक्षित भारत का हस्तलिखित संविधान

यह माना जा रहा था कि वायु-रोधी नाइट्रजोन से भरे बक्से में प्रदूषण, धूल कणों और सूक्ष्मजीवों के कारण होने वाले क्षरण से संविधान की हस्तलिखित दोनों प्रतियों को सुरक्षित रखा जा सकता है। जितना आसान इस काम को समझा जा रहा था यह उतना सरल नहीं था, क्योंकि नाइट्रोजन आसानी से लीक हो जाती है। वायुमंडल की गैसों में सर्वाधिक 78 प्रतिशत मात्रा में पायी जाने वाली नाइट्रोजन रंगहीन, गंधहीन और स्वादहीन गैस है। रासायनिक रूप से निष्क्रिय तत्व नाइट्रोजन साधारण ताप पर न तो जलती है और न ही अन्य धातुओं से यौगिक बनाती है।

एनपीएल के वर्तमान निदेशक डॉ डी.के. असवाल ने शोध पत्रिका करंट साइंस में प्रकाशित अपने एक आलेख में बताया है कि

“इस ऐतिहासिक दस्तावेज को संरक्षित रखने के लिए एक ऐसी सीलिंग सामग्री विकसित करने की जरूरत महसूत की गई, जिससे नाइट्रोजन कांच के पारदर्शी बक्से से बाहर न आ सके और बाहरी वातावरण से प्रदूषण, नमी या फिर सूक्ष्मजीव भीतर न प्रवेश कर सकें।”

वर्ष 1988-89 में एनपीएल ने टेम्पर्ड ग्लास और एक खास सीलिंग सामग्री का उपयोग करके इस तरह के बक्से बनाने प्रयास किया। हालांकि, इन बक्सों को स्वीकार्यता नहीं मिल सकी क्योंकि उनमें लगी सीलिंग सामग्री का लंबे समय तक स्थायी बने रहने को लेकर वैज्ञानिक आश्वस्त नहीं थे।

एनपीएल के वैज्ञानिक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के संपर्क में बने रहे ताकि वायु-रोधी बक्सों के लिए सीलिंग सामग्री विकसित की जा सके। एनपीएल के वैज्ञानिक हरि कृष्ण ने वर्ष 1992-93 में फ्रांस की राजधानी पेरिस का दौरा किया, जो अपने अनूठे संग्राहलयों के लिए जाना जाता है। इन संग्रहालयों में ऐतिहासिक महत्व की वस्तुओं को बेहतरीन ढंग से संजोकर रखा गया है। इस दौरान, फ्रांस में कांच बनाने वाली कंपनी सेंट गोबेन से भी बात की गई।

वैज्ञानिकों को आभास हो चुका था कि नाइट्रोजन को रोके रखने के लिए बक्से के मेटल फ्रेम और कांच के बीच लगने वाली सीलिंग सामग्री को बनाना बेहद चुनौतीपूर्ण है। सोल्डरिंग प्रक्रिया और ओ-रिंग्स से सील दो तरह के बक्से हरि कृष्ण बना सकते थे। लेकिन, उन बक्सों से भी टिकाऊ रूप से संविधान के संरक्षण के लिए आश्वस्त नहीं हुआ जा सकता था।

डॉ असवाल ने एक बातचीत में बताया कि

“फ्रांस के विशेषज्ञों ने अमेरिका के गेट्टी कन्जर्वेशन इंस्टीट्यूट से संपर्क करने का सुझाव दिया। इस संस्थान को सैकड़ों वर्ष पुरानी मिस्र की विश्व प्रसिद्ध ममी के संरक्षण के लिए जाना जाता है। पहली नजर में ममी को देखने पर लगता है कि उन्हें कांच के बक्से में संरक्षित किया गया है। पर, भीतर ममीज के ऊपर एक खास तरह की परत होती है, जो उनका क्षरण नहीं होने देती। इस तरह, नाट्रोजन गैस को रोके रकने का प्रावधान ममीज के कांच के बक्सों में भी नहीं था।”

नवंबर 1992 में एनपीएल ने गेट्टी कन्जर्वेशन इंस्टीट्यूट के निदेशक एम.कॉरजो से भारतीय संविधान को संरक्षित रखने के लिए खास वायु-रोधी बक्सों के निर्माण में सहयोग के लिए संपर्क किया। वह इस वायु-रोधी बक्सों के संयुक्त रूप से विकास के लिए तैयार हो गए। वर्ष 1993 में एनपीएल और गेट्टी इंस्टीट्यूट के बीच इससे संबंधित समझौता हो गया। समझौते के अनुसार, 96,250 घन सेंटीमीटर का 55 सेंटीमीटर चौड़े, 70 सेंटीमीटर लंबे और 25 सेंटीमीटर ऊंचे दो बक्से बनाने पर सहमति बनी।

यह भी निर्धारित किया गया कि नाट्रोजन युक्त वातावरण में 40-50 प्रतिशत सापेक्ष आर्द्रता में एक प्रतिशत से भी कम ऑक्सीजन की मात्रा में दस्तावेजों को रखा जाएगा। संसद पुस्तकालय में इन ऐतिहासिक दस्तावेजों को रखने एवं प्रदर्शित करने के लिए एक विशेष रूप से संरक्षित कक्ष बनाना निर्धारित किया गया। यह भी तय किया गया कि इस कक्ष में जलवायु को नियंत्रित रखने के लिए 20 ± 2° सेल्सियस तापमान और 30 ± 5% आर्द्रता पूरे वर्ष बनाए रखी जाएगी।

डॉ असवाल का कहना है कि

“इन बक्सों में नाइट्रोजन दस्तावेजों के कागज को सुरक्षित रखती है। बक्से के भीतर दबाव और तापमान का पता लगाने के लिए सेंसर लगाए गए हैं। बक्सों की क्षमता का एनपीएल और गेट्टी इंस्टीट्यूट में परीक्षण करने पर उन्हें उपयुक्त पाया गया है।”

इन बक्सों को अमेरिका में गेट्टी इंस्टीट्यूट में बनाकर भारत भेजा जाना था। भारत में इन बक्सों की स्थापना और परीक्षण का कार्य दोनों संस्थानों ने संयुक्त रूप से किया गया। अंततः वर्ष 1994 में बक्सों को संसद के पुस्तकालय में स्थापित कर दिया गया। बक्सों को वॉर्निश किए हुए सागौन के केबिनेट में स्टेनलेस स्टील के करीब एक मीटर ऊंचे स्टैंड पर अलग-अलग रखा गया है।

उमाशंकर मिश्र

(इंडिया साइंस वायर)

भारत में 9 दिसंबर को लॉन्च हो सकता है वीवो वी17

Gadgets News

भारत में 9 दिसंबर को लॉन्च हो सकता है वीवो वी17

Vivo V17 – Price in India, Full Specifications & Features

नई दिल्ली, 02 दिसंबर 2019. स्मार्टफोन बनाने वाली चीन की कंपनी वीवो (Vivo, a Chinese company that manufactures smartphones) भारत में 9 दिसंबर को अपना नया स्मार्टफोन वीवो वी 17 (Vivo V17) लॉन्च कर सकती है। इस संबंध में कंपनी ने मीडिया कर्मियों को निमंत्रण भेजना शुरू कर दिया है।

कुछ दिन पहले ही रूस में इस स्मार्टफोन को लॉन्च किया गया है। डिवाइस के बैक में एक डायमंड-शेपड कैमरा मॉड्यूल के साथ ड्य्रूडॉप नॉच प्रदान किया गया है।

Full Specifications & Features of Vivo V17

6.38 इंच फुल एचडी प्लस एमोलेड डिस्प्ले वाले इस डिवाइस में क्वालकॉम स्नैपड्रैगन 665 प्रोसेसर प्रदान करने के साथ-साथ 8जीबी रैम और 128 जीबी का स्टोरेज दिया गया है।

इसमें एक माइक्रो एसडी कार्ड स्लॉट भी दिया गया है, जिसके माध्यम से स्टोरेज को 256 जीबी तक बढ़ाया जा सकता है।

कैमरे की बात करें तो फोन में क्वाड कैमरा सेटअप दिया गया है। 48 एमपी प्राइमरी सेंसर, 8 एमपी अल्ट्रा-वाइड एंगल लेंस के साथ 2 एमपी माइक्रों सेंसर और 2 एमपी डेप्थ सेंसर भी प्रदान किया गया है।

सेल्फी के लिए वीवो वी 17-32 एमपी कैमरे के साथ आता है।

इसमें ड्यूल सिम, 4जी वोलाइट, एनएफसी और ब्लूटूथ 5.0 दिया गया है। फोन में 4500एमएएच की बैटरी यूसीबी टाइप-सी पोर्ट के साथ चार्जिग के लिए प्रदान की गई है।

Performance – स्नैपड्रैगन 665

स्टोरेज – 128 जीबी

कैमरा – 48 + 8 + 2 + 2 एमपी

बैटरी – 4500 एमएएच

डिस्प्ले (Display) – 6.38 “(16.21 सेमी)

रैम – 8 जीबी

भारत में लॉन्च की तारीख – 9 दिसंबर, 2019 (अपेक्षित)

माकपा ने की मांग : सारकेगुड़ा कांड के दोषियों पर चलाओ हत्या का मुकदमा, भाजपा का असली चेहरा उजागर

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माकपा ने की मांग : सारकेगुड़ा कांड के दोषियों पर चलाओ हत्या का मुकदमा

भाजपा का असली चेहरा उजागर

रायपुर, 02 दिसंबर 2019. मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने वर्ष 2012 के जून में हुए सारकेगुड़ा जनसंहार (Sarkeguda massacre) में प्रत्यक्ष रूप से शामिल सैनिक बलों और पुलिस के जवानों तथा इसके लिए जिम्मेदार उच्च  अधिकारियों को बर्खास्त कर उन पर हत्या का मुकदमा चलाने की मांग की (Sought to prosecute murder) है।

पार्टी ने यह भी मांग की है कि इस हत्याकांड का नक्सली मुठभेड़ (Naxalite encounter) के रूप में फ़र्ज़ीकरण करने के लिए जिम्मेदार केंद्र और राज्य की सरकार छत्तीसगढ़ की जनता विशेषकर बस्तर के आदिवासी समुदाय से माफी मांगे।

आज यहां जारी एक बयान में माकपा राज्य सचिवमंडल ने कहा है कि इस हत्याकांड की न्यायिक जांच की रिपोर्ट सामने आने के बाद भाजपा और उसकी तत्कालीन राज्य सरकार का आदिवासीविरोधी चेहरा खुलकर सामने आ गया है। यह हत्याकांड आदिवासियों के खिलाफ राज्य प्रायोजित दमन और ‘सलवा जुड़ूम’ अभियान की सोची-समझी साजिश का हिस्सा था।

माकपा राज्य सचिव संजय पराते ने पीड़ित आदिवासी परिवारों को 50-50 लाख रुपये मुआवजा देने की मांग करते हुए टिप्पणी की है कि 2012 की घटना की 7 साल बाद रिपोर्ट आना और दोषियों के लिए अब भी सजा का इंतज़ार करना प्राकृतिक संसाधनों की लूट के खिलाफ संघर्ष कर रहे आदिवासी समुदायों के लिए ‘न्याय पाने के लिए अंतहीन इंतजार करना’ है। इस स्थिति को स्वीकार नहीं किया जा सकता।

माकपा नेता ने कहा कि राज्य में सत्ताबदल के बाद भी प्रशासन के आदिवासीविरोधी रवैये में कोई बदलाव नहीं आया है, क्योंकि कांग्रेस सरकार भी भाजपा की कॉरपोरेटपरस्त नीतियों को ही आगे बढ़ा रही है।

उन्होंने कहा है कि यदि कांग्रेस आदिवासियों की समस्याओं के प्रति वास्तव में संवेदनशील हैं, तो वनाधिकार कानून, पेसा एक्ट और 5वीं अनुसूची के प्रावधानों को सही तरीके से लागू करें, ताकि उनके साथ सदियों से जारी ‘ऐतिहासिक अन्याय’ को दूर किया जा सके।

जानिए एक्स-रे, सीटी स्कैन या एमआरआई में क्या अंतर है?

ct scan mri

What is the difference between an x-ray, CT scan, or MRI?

क्या आपको कभी एक्स-रे, एमआरआई या अन्य मेडिकल स्कैन करवाना पड़ा है? क्या आप जानते हैं कि इन परीक्षणों में क्या शामिल है? या वे क्या कर सकते हैं? यूएस डिपार्टमेंट ऑफ़ हेल्थ एंड ह्यूमन सर्विसेस से संबद्ध राष्ट्रीय स्वास्थ्य संस्थान (National Institutes of Health affiliated to U.S. Department of Health and Human Services) ने चिकित्सा स्कैन (medical scan) के विषय में विस्तार से बताया है।

Medical Scans Explained : A Look Inside the Body

मेडिकल स्कैन से डॉक्टरों को सिर के आघात से लेकर पैर के दर्द तक सभी चीजों का निदान करने में सहायता मिलती है। इमेजिंग तकनीकों के कई अलग-अलग प्रकार हैं। प्रत्येक अलग तरह से काम करता है।

कुछ प्रकार के इमेजिंग परीक्षण विकिरण का उपयोग करते हैं। अन्य ध्वनि तरंगों, रेडियो तरंगों या चुम्बकों का उपयोग करते हैं। अगर आपको या किसी प्रियजन को एक की आवश्यकता हो तो मेडिकल स्कैन कैसे काम करता है, इसके बारे में जानना आपको और अधिक सुकून दे सकता है। यह आपको यह जानने में भी मदद कर सकता है कि इमेजिंग टेस्ट लेने से पहले अपने स्वास्थ्य सेवा प्रदाता से क्या पूछना चाहिए।

X-Rays एक्स-रे

शरीर में अंदर देखने की पहली क्रांति एक्स-रे के साथ आई। एक्स-रे का उपयोग क्लिनिक में 120 से अधिक वर्षों से किया जा रहा है।

एनआईएच के एक इमेजिंग विशेषज्ञ डॉ. क्रिस कंदर्प (Dr. Kris Kandarpa, an imaging expert at NIH) कहते हैं, “एक्स-रे का उपयोग अभी भी हर दिन किया जाता है, क्योंकि वे बहुत कुछ कर सकते हैं।” वे हड्डियों को देखने और फेफड़ों में निमोनिया जैसे कुछ प्रकार के ऊतकों में समस्याओं को खोजने के लिए उपयोगी हैं।

एक्स-रे कैसे काम करता है How does x-ray work

एक्स-रे इमेजिंग आपके शरीर के एक हिस्से के माध्यम से एक ऊर्जा किरण को पारित करके काम करता है। आपकी हड्डियाँ या शरीर के अन्य अंग एक्स-रे बीम से कुछ को गुजरने से रोकेंगे। इससे बीम पर कब्जा करने के लिए उपयोग किए जाने वाले डिटेक्टरों पर उनकी आकृतियाँ दिखाई देती हैं। डिटेक्टर रेडियोलॉजिस्ट को देखने के लिए एक्स-रे को डिजिटल इमेज में बदल देता है।

एक्स-रे बीम विकिरण का उपयोग करते हैं (X-ray beams use radiation)। विकिरण ऊर्जा है जिसे अदृश्य कणों या तरंगों के रूप में जारी किया जाता है। बहुत बड़ी मात्रा में विकिरण के संपर्क में होने से कोशिकाओं और ऊतकों को नुकसान हो सकता है। यह आपके कैंसर के विकास के जोखिम को भी बढ़ा सकता है।

लेकिन आधुनिक एक्स-रे परीक्षण विकिरण की एक बहुत छोटी मात्रा का उपयोग करते हैं। लोग प्राकृतिक रूप से आकाश, चट्टानों और मिट्टी जैसे कई स्रोतों से विकिरण के संपर्क में आते हैं।

कंदर्प बताते हैं कि “एक छाती एक्स-रे आपको उतनी ही मात्रा में विकिरण देता है जितना कि आप अटलांटिक महासागर को पार करते समय एक विमान की उड़ान में पाते हैं” ।

CT Scans सीटी स्कैन
technology hospital medicine indoors
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सीटी स्कैन भी एक्स-रे बीम का उपयोग करते हैं। लेकिन 3 डी तस्वीर बनाने के लिए आपके पूरे शरीर पर बीम घूमते हैं। इन छवियों में एक नियमित एक्स-रे की तुलना में अधिक जानकारी होती है। स्कैन एक मिनट से भी कम समय में किया जा सकता है। यह आपातकालीन विभाग जैसी जगहों पर विशेष रूप से उपयोगी है। वहां, डॉक्टरों को तुरंत यह जानने की जरूरत होती है कि क्या मरीज की जान को खतरा है।

क्योंकि सीटी स्कैन एक सामान्य एक्स-रे की तुलना में अधिक एक्स-रे बीम का उपयोग करते हैं, वे अक्सर विकिरण की उच्च मात्रा देते हैं। मेयो क्लिनिक में सीटी इमेजिंग शोधकर्ता डॉ. सिंथिया मैककोलॉफ (Dr. Cynthia McCollough, a CT imaging researcher at the Mayo Clinic) बताते हैं कि चिकित्सा विशेषज्ञों के पास आवश्यक छोटी विकिरण मात्रा की गणना करने के तरीके मौजूद हैं।

मैककोलॉफ कहते हैं, “हम रोगी के आकार के लिए मात्रा का अनुकूलन करते हैं, और हम फिर इसका सीटी स्कैन के कारण के लिए दर्जी अनुकूलन करते हैं”। उदाहरण के लिए, छाती के सीटी स्कैन (CT scan of the chest) में पेट क्षेत्र के सीटी स्कैन की तुलना (CT scan of the stomach area) में कम विकिरण की आवश्यकता होती है।

मैककोलॉफ कहते हैं, “हमने पाया है कि जब आप विकिरण की मात्रा का तरीका कम करते हैं, तो छवियां बहुत कम साफ होती हैं, लेकिन वे अक्सर डॉक्टरों को सही जवाब दे देती हैं”।

उनका कहना है कि यदि मानक मात्रा पहले से ही काफी कम है तो विकिरण की कम मात्रा से जोखिम कम होने की आशंका होगी। वह कहती हैं कि “लोगों को यह जानना ज़रूरी है क्योंकि कुछ रोगियों को जिन्हें सीटी स्कैन की ज़रूरत होती है, वे इसे कराने से डरते हैं।”

विकिरण का डर कभी-कभी किसी को सीटीस्कैन कराने से रोक सकता है जबकि यह उनके स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में मदद कर सकता है, या यहां तक कि उनके जीवन को बचा भी सकता है। वे कहती हैं “वर्तमान में सीटी स्कैन में विकिरण की मात्रा एक ऐसी सीमा में हैं जहां जोखिम साबित करना संभव नहीं है। वह कम है ।”

MRI एमआरआई

एमआरआई (Magnetic Resonance Imaging) बहुत अलग तरीके से काम करता है। यह एक्स-रे का उपयोग नहीं करता है। इसके बजाय, यह आपके शरीर के ऊतकों के भीतर पानी के अणुओं में परमाणुओं को प्रभावित करने के लिए मजबूत मैग्नेट और रेडियो तरंगों का उपयोग करता है। जब रेडियो तरंगों को बंद कर दिया जाता है, तो परमाणु ऊर्जा को छोड़ते हैं जिसकी एमआरआई मशीन द्वारा पहचान की जाती है।

विभिन्न ऊतकों में परमाणु अलग-अलग गति से सामान्य हो जाते हैं और विभिन्न मात्रा में ऊर्जा छोड़ते हैं। एमआरआई सॉफ्टवेयर इस जानकारी का उपयोग विभिन्न ऊतक प्रकारों के 3डी चित्र बनाने के लिए करता है।

स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के एमआरआई के शोधकर्ता डॉ. श्रेयस वासनवाला (Dr. Shreyas Vasanawala, an MRI researcher at Stanford University) बताते हैं, “जब आप नरम ऊतकों (soft tissue) की बीमारियों, जैसे मांसपेशियों, कण्डरा और रक्त वाहिकाओं को देखना चाहते हैं, तो एमआरआई सबसे मददगार होता है।”

एमआरआई जानकारी दे सकता है कि वास्तविक समय में शरीर कैसे काम कर रहा है।

वासनवाला कहते हैं, “उदाहरण के लिए, हम माप सकते हैं कि रक्तवाहिकाओं में कितना रक्त बह रहा है, जो डॉक्टरों को हृदय में छोटे ब्लॉकेज या दोष खोजने में मदद कर सकता है।”

क्योंकि एमआरआई एक्स-रे का उपयोग नहीं करता है, इसलिए डॉक्टर बच्चों में इसका अधिक उपयोग करना चाहेते हैं। लेकिन एमआरआई मशीनों के लिए आपको लंबे समय तक गतिहीन पड़ा रहना पड़ता है। वासनवाला कहते हैं, “बच्चों को पकड़कर रखना मुश्किल हो सकता है।” यदि आवश्यक हो, तो सामान्य संज्ञाहरण परीक्षण (general anesthesia) के माध्यम से बच्चों का एमआरआई किया जा सकता है। एनेस्थिसिया बच्चों को बेहोश कर देता है और उन्हें हिलने-डुलने में असमर्थ बना देता है। यह आमतौर पर बहुत सुरक्षित है, लेकिन इसके कुछ जोखिम भी हैं।

अन्य स्कैन Other Scans

x-ray CT scan MRI

एक और आमतौर पर इस्तेमाल की जाने वाली इमेजिंग विधि को अल्ट्रासाउंड (ultrasound) कहा जाता है। यह शरीर में ध्वनि तरंगें भेजता है। विभिन्न प्रकार के ऊतक ध्वनि तरंगों को अलग तरीके से दर्शाते हैं। इन अंतरों को एक अल्ट्रासाउंड मशीन द्वारा उठाया जा सकता है और एक तस्वीर में बदल दिया जा सकता है। दिल और अन्य अंगों, या एक विकासशील बच्चे को देखने के लिए अल्ट्रासाउंड मददगार है।

Doctors also use tests called nuclear imaging.

डॉक्टर न्यूकलियर इमेजिंग नामक परीक्षणों का भी उपयोग करते हैं। ये परीक्षण एक छोटी मात्रा में एक रेडियोधर्मी पदार्थ, या “ट्रेसर” का उपयोग करते हैं। अधिकांश ट्रैसर्स को शरीर में इंजेक्ट किया जाता है, लेकिन कुछ इनहेल या निगल (inhaled or swallowed) लिए जाते हैं। शरीर के अंदर के ट्रैसर्स रेडिएशन छोड़ते हैं जिन्हें शरीर के बाहर डिटेक्टर द्वारा मापा जा सकता है। ट्रेसर का प्रकार अलग-अलग होता है जो डॉक्टर क्या देखना चाहते हैं, इस पर निर्भर करता है।

पीईटी स्कैन – PET scan

एक पॉज़िट्रॉन एमिशन टोमोग्राफी (पीईटी) स्कैन (positron emission tomography (PET) scan), उदाहरण के लिए, अक्सर कैंसर का निदान करने के लिए एक रेडियोधर्मी चीनी (radioactive sugar) का उपयोग करता है। जब कैंसर कोशिकाएं रेडियोधर्मी चीनी लेती हैं, तो उन्हें पीईटी स्कैनर के साथ देखा जा सकता है।

#Breaking : मोदी के सांसद ने कहा, वित्त मंत्री सीतारमण अर्थशास्त्र नहीं जानतीं… दिन की शीर्ष सुर्खियाँ

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मोदी के सांसद ने कहा, वित्त मंत्री सीतारमण अर्थशास्त्र नहीं जानतीं… दिन की शीर्ष सुर्खियाँ

सीतारमण अर्थशास्त्र नहीं जानती हैं : सुब्रमण्यम स्वामी

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण पर तीखे हमले में, भाजपा के वरिष्ठ नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने कहा है, “वह अर्थशास्त्र नहीं जानती हैं”।

राहुल गांधी सोमवार को झारखंड में पहली रैली करेंगे

पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी सोमवार को सिमडेगा जिले में एक रैली के साथ, चल रहे झारखंड विधानसभा चुनावों में अपने अभियान की शुरुआत करने के लिए तैयार हैं।

महाराष्ट्र विधानसभा में मी पुनः येईनने हास्य बिखेरा

महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री और विपक्ष के नए नेता देवेंद्र फड़नवीस की प्रसिद्ध पूर्व-चुनाव भविष्यवाणी “Mee punha yaeen, मी पुनः येईन, मी पुनः येईन (मैं लौटूंगा!)” ने विधानसभा के विशेष सत्र में अपनी फजीहत को हवा दी। स्प्लिट्स में ट्रेजरी और विपक्षी बेंच दोनों पर सदस्यों ने मजे लिए।

कांग्रेस ने मोबाइल टैरिफ बढ़ोतरी पर सरकार की खिंचाई की

सेलफोन कंपनियों द्वारा घोषित मोबाइल डेटा और कॉल शुल्क में वृद्धि के लिए कांग्रेस ने सरकार को फटकार लगाई है।

6 साल की बच्ची के साथ बलात्कार, उसकी स्कूल बेल्ट से गला दबाकर हत्या

मीडिया रिपोर्ट्स मे पुलिस ने बताया है कि राजथान के टोंक जिले में शनिवार को लापता हुई छह वर्षीय एक छात्रा के साथ कथित रूप से बलात्कार किया गया और उसकी अपने स्कूल बेल्ट से गला दबाकर हत्या कर दी गई।

ट्विटर यूजर्स ने वर्ल्ड एड्स डे मनाया

रविवार को विश्व एड्स दिवस मनाया गया, जिसमें हस्तियों ने ट्वीट करके लोगों को यह याद दिलाने के लिए कहा कि अभी भी क्या करना है।

हैदराबाद रेप-मर्डर को लेकर ट्विटर पर हुआ गुस्सा

हैदराबाद के बाहरी इलाके में एक पशुचिकित्सक की गैंगरेप और हत्या के तीन दिन बाद भी, ट्विटर उपयोगकर्ताओं ने रविवार को अपराध पर अपना गुस्सा निकालना जारी रखा, बलात्कारियों के लिए मौत की मांग करते हुए और पुलिसकर्मियों के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग की।

केरल के पूर्व न्यायाधीश ने ड्रग्स पर टिप्पणी के लिए राज्य मंत्री की खिंचाई की

केरल उच्च न्यायालय के एक पूर्व न्यायाधीश ने रविवार को एक राज्य मंत्री द्वारा दिए गए बयान को मूर्खतापूर्ण बताते हुए कहा कि पुलिस को फिल्म की शूटिंग के स्थानों पर दवाओं की खोज के लिए शिकायत की आवश्यकता है।

कांग्रेस के पटोले महामंत्री के रूप में निर्विरोध चुने गए।

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता नाना एफ. पटोले को रविवार को महाराष्ट्र विधानसभा के 14 वें अध्यक्ष के रूप में निर्विरोध निर्वाचित घोषित किया गया।

रोहित शर्मा लारा के नाबाद 400 रन के रिकॉर्ड को तोड़ सकते हैं: वार्नर

ऑस्ट्रेलियाई सलामी बल्लेबाज डेविड वार्नर को लगता है कि रोहित शर्मा वेस्टइंडीज के दिग्गज ब्रायन लारा के टेस्ट मैच में नाबाद 400 रन के रिकॉर्ड को तोड़ सकते हैं।

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बहुसंख्यकवाद से फासीवाद की ओर बढ़ रहा है भारत, यह हमारे प्रजातंत्र के लिए एक बड़ी चुनौती : प्रो. प्रभात पटनायक

Prof. Prabhat Patnaik SPEAKING AT Dr. Asghar Ali Engineer Memorial Lecture ON Democracy versus Majoritarianism

बहुसंख्यकवाद से बहुसंख्यकों को नहीं होता कोई लाभ : प्रो. प्रभात पटनायक

Majoritarianism does not enhance rights or result in material benefits to the members of the majority community: Prof. Prabhat Patnaik

(‘प्रजातंत्र बनाम बहुसंख्यकवाद’ पर 13वें डॉ असग़र अली इंजीनियर स्मृति व्याख्यान पर रपट)

Report of 13th Dr. Asghar Ali Engineer Memorial Lecture: Democracy versus Majoritarianism

“प्रजातन्त्र का आस्तित्व बने रहने के लिए बहुसंख्यकवाद से मुक्ति आवश्यक है” (“The survival of democracy depends upon the getting rid of majoritarianism”).

यह बात विख्यात मार्क्सवादी अर्थशास्त्री और लेखक प्रो. प्रभात पटनायक ने 18 नवम्बर 2019 को दिल्ली के जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय में आयोजित 13वें डॉ असग़र अली इंजीनियर स्मृति व्याख्यान में अपने मुख्य वक्तव्य में कही.

विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान विभाग के सहयोग से सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ़ सोसाइटी एंड सेकुलरिज्म (सीएसएसएस) द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम की अध्यक्षता जाने-माने राजनीति विज्ञानी प्रो. राजीव भार्गव ने की. व्याख्यान में लगभग 200 विद्यार्थियों सहित, शिक्षाविद, पत्रकार, अध्येता और नागरिक समाज संगठनों के प्रतिनिधि उपस्थित थे. विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान विभाग के अध्यक्ष प्रो. फुरकान अहमद ने सभी अतिथियों का स्वागत किया. इनमें मणिशंकर अय्यर, प्रो. ज़ोया हसन, नेशत कैसर और विजय प्रताप सिंह शामिल थे.

“प्रजातंत्र बनाम बहुसंख्यकवाद” विषय पर बोलते हुए प्रो. पटनायक ने अत्यंत सहज भाषा में भारत के वर्तमान राजनैतिक आख्यान की सारगर्भित विवेचना की. आज का भारत, बहुसंख्यक बनाम अल्पसंख्यक संघर्ष और उससे उद्भूत विघटनकारी राजनीति से ग्रस्त है.

पटनायक ने विस्तार से बताया कि किसी देश में बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक की परिकल्पना कैसे उपजती है और बहुसंख्यकवाद किस तरह अल्पसंख्यकों के अधिकारों को सीमित करने का प्रयास करता है. उन्होंने यह भी बताया कि बहुसंख्यकवाद के उभरने के पीछे क्या कारण होते हैं, कौन से कारक उसे बढ़ावा देते है, प्रजातंत्र पर उसके क्या दुष्प्रभाव होते हैं और उसका मुकाबला कैसे किया जाना चाहिए व किया जा सकता है. श्रोताओं ने प्रो. पटनायक के व्याख्यान का करतल ध्वनि से स्वागत किया क्योंकि वह न केवल विद्वतापूर्ण था वरन भारत की वर्तमान स्थिति के सन्दर्भ में अत्यंत प्रासंगिक भी था. आज के भारत में हम क्या देख रहे हैं? हम देख रहे हैं कि सामाजिक-राजनैतिक और आर्थिक सन्दर्भों में देश में बहुसंख्यकवाद, असहमति के प्रति असहिष्णुता, हिंसा और कमज़ोर वर्गों के बहिष्करण का बोलबाला है. उन्होंने न केवल बहुसंख्यक, अल्पसंख्यक और बहुसंख्यकवाद जैसे शब्दों के अर्थ की विवेचना की वरन उन्होंने बहुसंख्यकवाद पर लगाम लगाने के तरीको पर भी विस्तार से प्रकाश डाला.

अपने व्याख्यान की शुरुआत में प्रो. पटनायक ने बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक को परिभाषित करते हुए बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक की अनुभवजन्य धारणा और इनके ‘निर्मित किये गए’ अर्थों के बीच अन्तर को स्पष्ट किया.

निर्मित किए गए अर्थ स्वतःस्फूर्त नहीं होते. वे जानते-बूझते और योजनाबद्ध तरीके से गढ़े जाते हैं. अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक का यह राजनैतिक विभाजन इसलिए किया जाता है ताकि अल्पसंख्यकों के अधिकारों को सीमित किया जा सके. अल्पसंख्यकों के अधिकारों को इस आधार पर सीमित किया जाता है या उनका उल्लंघन किया जाता है कि ‘अल्पसंख्यकों’ ने कुछ ऐसे पाप किये हैं या कर रहे हैं, जिनका प्रतिशोध लेना आवश्यक है. प्रो. पटनायक के विश्लेषण का सच इससे स्पष्ट है कि आज देश में अल्पसंख्यकों का दानवीकरण किया जा रहा है और उनके खिलाफ जूनून भड़काया जा रहा है. और इसे इस आधार पर उचित ठहराया जा रहा है कि मुस्लिम शासकों ने तथाकथित रूप से हिन्दुओं पर अत्याचार किये थे और उनके साथ क्रूरतापूर्ण व्यव्हार किया था.

परन्तु क्या अल्पसंख्यकों के खिलाफ जुनून भड़काने और उन्हें नीचा दिखने के अभियानों से बहुसंख्यकों की स्थिति में कोई सुधार आता है?

क्या इससे बहुसंख्यकों को कोई ठोस लाभ मिलता है? कभी-कभी यह प्रश्न पूछने को जी चाहता है कि नफरत फैलाने के इस अभियान – जिसके कारण कई निर्दोष व्यक्तियों को अपनी जान खोनी पड़ी है और जो सामाजिक तानेबाने को ध्वस्त कर रहा है – का उद्देश्य आखिर क्या है? इस प्रश्न का उत्तर प्रो. पटनायक ने दिया. उनका तर्क था कि अल्पसंख्यकों के अधिकारों को सीमित करने से बहुसंख्यकों को कोई वास्तविक या भौतिक लाभ नहीं होता. इसके दो कारण हैं. पहला, रोज़गार या अन्य भौतिक लाभों से बहुसंख्यकवाद के पैरोकारों का कोई लेनादेना नहीं होता. और दूसरा, जिन अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर डाका डाला जाता है वे तो पहले से ही हाशियाकृत और वंचित होते हैं. अतः, उनके अधिकारों को सीमित करने से बहुसंख्यकों को नए अवसर नहीं मिलते. यह बिंदु इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि जिस आख्यान को आज बढ़ावा देने का प्रयास किया जा रहा  है वह यह है कि बहुसंख्यकों और अल्पसंख्यकों के हित परस्पर विरोधाभासी हैं और हमेशा से रहे हैं. प्रो. पटनायक ने एक अन्य गलतफहमी का खंडन करते हुए कहा कि बहुसंख्यकवाद का उद्देश्य अल्पसंख्यकों के विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग को उसके विशेषाधिकारों से वंचित करना होता है. प्रजातंत्र या सामाजिक न्याय को मजबूती देना बहुसंख्यकवाद के एजेंडे में कतई नहीं होता.

प्रो. पटनायक ने कहा कि यद्यपि बहुसंख्यकवाद, अल्पसंख्यकों के अधिकारों को सीमित करने की उसकी परियोजना को बहुसंख्यकों का समर्थन हासिल होने का दावा करता है परन्तु यथार्थ में उसे आवश्यक रूप से बहुसंख्यकों का समर्थन और सहयोग हासिल नहीं होता. परन्तु हमारी चुनाव प्रणाली में कुछ ऐसी कमियां हैं जो बहुसंख्यकवादी एजेंडे को विस्तार देने में मददगार साबित होतीं हैं. हमारे यहाँ वह पार्टी शासन करती है जिसे सबसे ज्यादा मत मिलते हैं ना कि वह जिसे मतदाताओं के बहुमत का समर्थन हासिल होता है. इसका उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि भाजपा को पिछले चुनाव में 38 प्रतिशत मत हासिल हुए थे परन्तु फिर भी वह सरकार बनाने में कामयाब रही.

इससे एक नया प्रश्न उपजता है. वह यह कि अगर बहुसंख्यकवाद को बहुसंख्यकों का समर्थन हासिल नहीं होता और ना ही मतदाताओं का बहुमत चुनावों में उसका साथ देता है तो फिर आखिर बहुसंख्यकवाद फलता-फूलता कैसे है. प्रो. पटनायक ने इस प्रश्न का उत्तर दो भागों में दिया. उनका कहना था कि बहुसंख्यकवाद, अनुकूल सामाजिक परिस्थितियों से उपजता है. वह परिस्थिति होती है आर्थिक संकट और इसकी जड़ अर्थव्यवस्था में होती है. उन्होंने कहा कि यद्यपि बहुसंख्यकवाद से बहुसंख्यकों को कोई भौतिक लाभ प्राप्त नहीं होता तथापि बेरोज़गारी और आर्थिक संकट उसके उदय के लिए उर्वर भूमि उपलब्ध करवाते हैं, विशेषकर यदि आर्थिक संकट के लिए अल्पसंख्यकों को ज़िम्मेदार ठहरा दिया जाये.

उन्होंने कहा कि कई अन्य चीज़ें भी बहुसंख्यकवाद के पनपने का कारण बनतीं हैं. हमारी चुनाव प्रणाली में कमियों की चर्चा पहले ही की चुकी है. इसके अतिरिक्त, जनता में व्याप्त डर और असुरक्षा का भाव भी बहुसंख्यकवाद को बढ़ावा देता है.

भय और असुरक्षा के भाव को पैदा करने के लिए विधि विरुद्ध क्रियाकलाप (निवारण) अधिनियम (यूएपीए) जैसे सख्त कानूनों का प्रयोग किया जाता है. इन कानूनों का लक्ष्य होता है असहमति को कुचलना और नागरिक और मानव अधिकारों की मांग करने वालों को चुप्पी साधने पर मजबूर करना.

इसका नतीजा यह हुआ है कि आज सार्वजनिक विमर्श में केवल एकपक्षीय आख्यानों का बोलबाला हो गया है. ये आख्यान अति-राष्ट्रवाद और अल्पसंख्यकों के दानवीकरण पर आधारित हैं. देशद्रोह से सम्बंधित कड़े कानूनों के डर से इन आख्यानों के विरुद्ध आवाज़ नहीं उठती. बहुसंख्यकवाद को बढ़ावा देने वाला एक अन्य कारक होता है उसे कॉर्पोरेट-आर्थिक कुलीनतंत्र का समर्थन. इस समर्थन से राजनैतिक दलों को ढेर सारा धन प्राप्त होता है. प्रो. पटनायक ने भाजपा का उदाहरण देते हुए कहा कि ऐसा कहा जाता है कि पिछले आम चुनाव में पार्टी ने लगभग 27,000 करोड़ रुपये खर्च किये, अर्थात हर लोकसभा क्षेत्र में औसतन 50 करोड़ रुपये. राजनैतिक दलों और कॉर्पोरेट घरानों का यह गठबंधन मीडिया पर भी नियंत्रण स्थापित कर लेता है. कुल मिलकर, राज्य पर उनका नियंत्रण स्थापित हो जाता है. इससे बहुसंख्यकवाद के एजेंडे को आगे बढ़ाना और आसान हो जाता है. इससे यह सुनिश्चित होता है कि कोई ऐसी सरकार शासन में आ ही न सके जो राज्य की शक्ति का प्रयोग बहुसंख्यकवाद का अंत करने के लिए करे.

प्रो. पटनायक के व्याख्यान का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा वह था जिसमें उन्होंने उन क़दमों का वर्णन किया जिनके ज़रिये जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में और स्तरों पर बहुसंख्यकवाद को नियंत्रित किया जा सकता है. यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह किसी भी प्रजातंत्र, विशेषकर भारतीय प्रजातंत्र, जो बहुसंख्यकवाद के चुनौती का मुकाबला कर रहा है, को आगे की राह दिखाता है. उनका पहला सुझाव यह था कि विभिन्न राजनैतिक दलों को सावधानीपूर्वक योजना बनाकर ऐसे दलों के साथ गठबंधन करना चाहिए जो प्रजातंत्र की रक्षा करने के लिए इच्छुक और तत्पर हों. इस गठबंधन में उन दलों को शामिल किया जा सकता है जो अप्रजातांत्रिक कार्यवाहियों जैसे सीबीआई और ईडी जैसी संस्थाओं के राजनैतिक उपयोग के विरुद्ध हों, देशद्रोह सम्बन्धी और अन्य ऐसे ही कानूनों को समाप्त करने, लिंचिंग आदि पर नियंत्रण करने के हामी हों. परन्तु उन्होंने चेतावनी देते हुआ कहा कि ये गठबंधन केवल चुनावों में जीत हासिल करने के लिए नहीं किये जाने चाहिए. संघर्ष, दरअसल, उस सोच के खिलाफ होना चाहिए जो बहुसंख्यकवाद को जन्म देती है.

इस सोच से मुकाबला करने के कई तरीके हैं. हमें देश को 1931 में आयोजित कराची कांग्रेस में पारित प्रस्ताव की याद दिलानी होगी. इस प्रस्ताव में नए भारत की परिकल्पना को स्पष्ट किया गया था. यह प्रस्ताव उपनिवेशवाद-विरोधी राष्ट्रवाद के साथ-साथ उस समावेशी राष्ट्रवाद की बात भी करता है, जिस पर स्वतंत्र भारत की नींव रखी जानी थी. यह राष्ट्रवाद इस अर्थ में समावेशी होता कि उसमें समाज के सभी वर्गों के लिए जगह होती, वह साम्राज्यवादी नहीं होता अर्थात उसका लक्ष्य देश के लोगों पर वर्चस्व कायम करना नहीं होता और वह राष्ट्र को लोगों से ऊपर नहीं रखता अर्थात लोगों की भलाई उसकी पहली प्राथमिकता होती. भारत को आज इसी राष्ट्रवाद की ज़रुरत है न कि युद्धोन्मादी राष्ट्रवाद की, जिसका आज देश में बोलबाला है.

बहुसंख्यकवाद की सोच से मुकाबला करने का एक अन्य तरीका है संविधान में प्रदत्त मूल अधिकारों को और व्यापक बनाकर उनमें आर्थिक अधिकारों को भी जगह देना. उन्होंने कहा कि वर्तमान में आर्थिक अधिकार, राज्य के नीति निदेशक तत्वों का हिस्सा हैं और उन्हें लागू करवाने के लिए कोई नागरिक न्यायपालिका की शरण में नहीं जा सकता. अम्बेडकर को उदृत करते हुए प्रो. पटनायक ने कहा कि आर्थिक प्रजातंत्र के बिना राजनैतिक प्रजातंत्र अधूरा है. इस कमी को दूर करने के लिए देश के हर नागरिक को एक न्यूनतम जीवनस्तर की गारंटी दी जानी चाहिए और इस अधिकार को न्यायालय के ज़रिये लागू करवाने का हक़ लोगों को दिया जाना चाहिए. उन्होंने कहा कि अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि आर्थिक अधिकारों को मूल अधिकारों में इसलिए शामिल नहीं किया जा सकता क्योंकि हमारे देश की अर्थव्यस्था इसके लिए ज़रूरी धन जुटाने में सक्षम नहीं है. परन्तु पटनायक का कहना था कि अर्थव्यस्था ऐसी होनी चाहिए जो पूंजीपतियों को लाभ पहुँचाने की बजाय, नागरिकों के कल्याण पर केन्द्रित हो.

प्रो. पटनायक ने कहा कि उन्होंने यह गणना की है कि पांच आर्थिक अधिकारों – भोजन का अधिकार, आजीविका का अधिकार, निशुल्क गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवा का अधिकार, कम से कम उच्चतर माध्यमिक स्तर तक निशुल्क गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का अधिकार और सभी नागरिकों को वृद्धावस्था और शारीरिक अशक्तता पेंशन का अधिकार – देश के सभी नागरिकों को देने के लिए वर्तमान में इन उद्देश्यों के लिए व्यय किये जा रहे धन के अतिरिक्त 11.76 लाख करोड़ रुपयों की ज़रुरत होगी. यह धनराशि देश के सबसे धनी एक प्रतिशत व्यक्तियों पर दो प्रतिशत संपत्ति कर और इन व्यक्तियों को विरासत में प्राप्त होने वाली सम्पति पर 33 प्रतिशत उत्तराधिकार कर लगाकर जुटाई जा सकती है. उनका तर्क था कि पूँजीवादी व्यवस्था में यह अपेक्षा की जाती है कि कोई भी व्यक्ति अपनी मेहनत और योग्यता से मुनाफा कमाएगा न कि विरासत में प्राप्त सम्पति का उपभोग करेगा. इसलिए, उत्तराधिकार पर कर लगाना न्यायोचित है.

अंत में, प्रो. पटनायक ने चेतावनी दी कि भारत, बहुसंख्यकवाद से फासीवाद की ओर बढ़ रहा है और यह हमारे प्रजातंत्र के लिए एक बड़ी चुनौती और खतरा है. भारत में प्रजातंत्र के जीवित रहने और फलने-फूलने के लिए यह ज़रूरी है कि हम समावेशी राष्ट्रवाद को अंगीकार करें ना कि हिन्दुत्वादी अति-राष्ट्रवाद को.

प्रो. राजीव भार्गव ने प्रो. पटनायक के विचारों की सराहना करते हुए कहा कि बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक की दो अवधारणाएं होती हैं – एक प्राथमिकता पर आधारित और दूसरी चुनावी गणित पर. अल्पसंख्यक हमेशा वह वर्ग नहीं होता जिसकी आबादी कम होती है. कभी-कभी अल्पसंख्यक वह वर्ग होता है जिसे राजनैतिक संस्कृति को आकार देने की शक्ति और उसके अधिकारों से वंचित किया जाता है. उन्होंने समतावाद पर आधारित सामुदायिक अधिकारों की स्थापना पर भी जोर दिया.

प्रो. पटनायक के विद्वतापूर्ण और विश्लेषणात्मक व्याख्यान की श्रोताओं ने भूरी-भूरी प्रशंसा की. उन्होंने भारत में बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक के अवधारणा का सूक्ष्म विश्लेषण किया और यह बताया कि बहुसंख्यकवाद किस तरह देश में प्रजातंत्र की जड़ों को कमज़ोर कर रहा है. बहुसंख्यकवाद की जड़ आर्थिक होने के उनके विचार का भी स्वागत हुआ. विशेषकर इसलिए क्योंकि आज भारत की अर्थव्यस्था में आ रही गिरावट लाखों लोगों को गरीबी के चंगुल में धकेल रही है. बहुसंख्यकवाद के खतरे से मुकाबला करने के जो उपाय उन्होंने सुझाये वे अनूठे और एक नए भारत के निर्माण के लिए प्रजातान्त्रिक मूल्यों को मजबूती देने वाले थे.

डॉ असग़र अली इंजीनियर स्मृति व्याख्यानमाला में इसके पहले रोमिला थापर, क्रिस्टोफर जेफ़रलॉ, अकील बिलग्रामी और सुखदेव थोराट जैसे उद्भट विद्वान अपने विचार प्रगट कर चुके हैं.

नेहा दाभाड़े

 (अंग्रेजी से अमरीश हरदेनिया द्वारा अनुदित)

एड्स के प्रति जागरूकता की जरूरत

hiv infographic

विश्व एड्स दिवस (1 दिसम्बर) पर विशेष Special on World AIDS Day in Hindi (1 December)

एड्स को लेकर स्थापित तथ्य यही है कि एचआईवी (ह्यूमन इम्यूनो डिफिशिएंसी वायरस – Human immunodeficiency virus) के एक बार शरीर में प्रवेश कर जाने के बाद इसे किसी भी तरीके से बाहर निकालना असंभव है और यही वायरस धीरे-धीरे एड्स में परिवर्तित हो जाता है।

AIDS is not really a disease in itself

हालांकि एड्स वास्तव में अपने आप में कोई बीमारी नहीं है बल्कि एचआईवी के संक्रमण के बाद जब रोगी व्यक्ति छोटी-छोटी बीमारियों से लड़ने की शारीरिक क्षमता भी खो देता है और शारीरिक शक्ति का विनाश हो जाता है, तब जो भयावह स्थिति पनपती है, वही एड्स है। एचआईवी संक्रमण को एड्स की स्थिति तक पहुंचने में 10-12 साल और कभी-कभी तो इससे भी ज्यादा समय लग सकता है।

यह बीमारी कितनी भयावह है, यह इसी से समझा जा सकता है कि एड्स की वजह से दुनियाभर में हर साल लाखों लोग काल का ग्रास बन जाते हैं। हालांकि विश्वभर में एड्स के खात्मे के लिए निरन्तर प्रयास किए जा रहे हैं किन्तु अभी तक किसी ऐसे इलाज की खोज नहीं हो सकी है, जिससे एड्स के पूर्ण रूप से सफल इलाज का दावा किया जा सके।

यही कारण है कि एड्स तथा एचआईवी के बारे में हर व्यक्ति को पर्याप्त जानकारी होना अनिवार्य माना जाता है क्योंकि अभी तक केवल जन जागरूकता के जरिये ही इस बीमारी से बचा और बचाया जा सकता है।

विश्व एड्स दिवस का महत्व Importance of World AIDS Day

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ऐसे में प्रतिवर्ष मनाए जाने वाले विश्व एड्स दिवस के महत्व को आसानी से समझा जा सकता है, जो सन् 1988 के बाद से प्रतिवर्ष 1 दिसम्बर को मनाया जा रहा है, जिसका उद्देश्य (Objective of World AIDS Day) एचआईवी संक्रमण के प्रसार की वजह से ‘एड्स’ की महामारी के प्रति जागरूकता बढ़ाना है।

यह दिवस मनाए जाने की कल्पना पहली बार अगस्त 1987 में थॉमस नेट्टर और जेम्स डब्ल्यू बन्न द्वारा की गई थी। ये दोनों विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) जेनेवा तथा स्विट्जरलैंड के ‘एड्स ग्लोबल कार्यक्रम’ (AIDS Global Program) के लिए सार्वजनिक सूचना अधिकारी थे, जिन्होंने ‘एड्स दिवस’ का अपना विचार ‘एड्स ग्लोबल कार्यक्रम’ के निदेशक डा. जॉननाथन मन्न के साथ साझा किया।

डा. मन्न द्वारा दोनों के उस विचार को स्वीकृति दिए जाने के बाद 1 दिसम्बर 1988 से इसी दिन ‘विश्व एड्स दिवस’ मनाए जाने का निर्णय लिया गया।

सन् 2007 के बाद से विश्व एड्स दिवस को अमेरिका के ‘व्हाइट हाउस’ द्वारा लाल रंग के एड्स रिबन का एक प्रतिष्ठित प्रतीक देकर शुरू किया गया। एचआईवी-एड्स पर ‘यूएन एड्स’ के नाम से जाना जाने वाला संयुक्त राष्ट्र कार्यक्रम सन् 1996 में प्रभाव में आया और उसके बाद ही दुनियाभर में इसे बढ़ावा देना शुरू किया गया। एक दिन के बजाय सालभर एड्स कार्यक्रमों पर ध्यान केन्द्रित करने के लिए इस कार्यक्रम की शुरूआत बेहतर संचार, इस बीमारी की रोकथाम और रोग के प्रति जागरूकता पैदा करने उद्देश्य से की गई।

सन् 1981 में अमेरिका में लॉस एंजिल्स के अस्पतालों में न्यूमोसिस्टिस न्यूमोनिया, कपोसी सार्कोमा तथा चमड़ी रोग जैसी असाधारण बीमारी का इलाज करा रहे पांच समलैंगिक युवकों में एड्स के लक्षण पहली बार मिले थे। उसके बाद ही यह बीमारी दुनिया भर में तेजी से फैलती गई। भारत में भी बीते वर्षों में एड्स के बहुत सारे मामले सामने आए हैं।

1986 में भारत में एड्स का पहला रोगी तमिलनाडु के वेल्लूर में मिला थाIn 1986, the first AIDS patient in India was found in Vellore, Tamil Nadu.

भारत में एचआईवी के मामलों में लगातार होती वृद्धि के मद्देनजर देश में एचआईवी तथा एड्स की रोकथाम व नियंत्रण संबंधी नीतियां तैयार करने और उनका कार्यान्वयन करने के लिए भारत सरकार ने सन् 1992 में राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन की स्थापना (Establishment of National AIDS Control Organization) की थी।

यूनीसेफ की एक रिपोर्ट के अनुसार दुनियाभर में एड्स पीडि़त सर्वाधिक संख्या किशोरों की है, जिनमें से दस लाख से भी अधिक किशोर दुनिया के छह देशों दक्षिण अफ्रीका, नाइजीरिया, केन्या, मोजांबिक, तंजानिया तथा भारत में हैं।

अगर एड्स के कारणों (cause of AIDS) पर नजर डालें तो मानव शरीर में एचआईवी का वायरस फैलने का मुख्य कारण हालांकि असुरक्षित सेक्स तथा अधिक पार्टनरों के साथ शारीरिक संबंध बनाना ही है लेकिन कई बार कुछ अन्य कारण भी एचआईवी संक्रमण के लिए जिम्मेदार होते हैं। शारीरिक संबंधों द्वारा 70-80 फीसदी, संक्रमित इंजेक्शन या सुईयों द्वारा 5-10 फीसदी, संक्रमित रक्त उत्पादों के आदान-प्रदान की प्रक्रिया के जरिये 3-5 फीसदी तथा गर्भवती मां के जरिये बच्चे को 5-10 फीसदी तक एचआईवी संक्रमण की संभावना रहती है।

Symptoms of hiv infection

बात करें एचआईवी संक्रमण के बाद सामने आने वाले लक्षणों की तो शरीर में इस खतरनाक वायरस के प्रवेश कर जाने के 15-20 दिनों बाद तक ऐसे व्यक्ति को बुखार, गले में सूजन, सिरदर्द व शरीर दर्द, शरीर पर छोटे-छोटे लाल रंग के धब्बे, शरीर में सामान्य-सी खुजली, ठंड लगना, रात के दौरान पसीना आना, बढ़ी हुई ग्रंथियां, वजन घटना, थकान, दुर्बलता, ज्यादा दस्त इत्यादि जैसे कुछ सामान्य लक्षण देखने को मिलते हैं। इस प्रकार के लक्षणों को प्रायः कोई सामान्य संक्रमण समझकर नजरअंदाज कर दिया जाता है और आमतौर पर एचआईवी टेस्ट (HIV test) करवाने के बजाय बहुत से चिकित्सक भी सामान्य फ्लू या बुखार की ही दवाई मरीज को दे देते हैं। चिकित्सकों का कहना है कि इस प्रकार के लक्षण 10-12 दिनों से ज्यादा समय तक लगातार बरकरार रहने पर अगर पहले ही चरण में परीक्षण के जरिये एचआईवी संक्रमण का पता लग जाए तो इस वायरस को आगे बढ़ने और भविष्य में एड्स के रूप में परिवर्तित हो जाने से रोका जा सकता है।

Yogesh Kumar Goyal योगेश कुमार गोयल वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं
योगेश कुमार गोयल वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं

हालांकि पिछले कई वर्षों से एड्स और एचआईवी को लेकर लोगों में जागरूकता पैदा करने के प्रयास किए जा रहे हैं लेकिन फिर भी विड़म्बना ही है कि बहुत से लोग इसे आज भी छूआछूत से फैलने वाला संक्रामक रोग मानते हैं। एड्स तथा एचआईवी के संबंध में यह जान लेना बेहद जरूरी है कि इस संक्रमण के शिकार व्यक्ति के साथ हाथ मिलाने, उसके साथ भोजन करने, स्नान करने या उसके पसीने के सम्पर्क में आने से यह रोग नहीं फैलता। इसलिए एड्स के प्रति जागरूकता पैदा किए जाने की आवश्यकता तो है ही, समाज में ऐसे मरीजों के प्रति हमदर्दी और प्यार का भाव होना तथा ऐसे रोगियों का हौसला बढ़ाए जाने की भी जरूरत है। ऐसे बहुत से मामलों में आज भी जब यह देखा जाता है कि इस तरह के मरीज न केवल अपने आस-पड़ोस के लोगों के बल्कि अपने ही परिजनों के भेदभाव का भी शिकार होते हैं तो चिंता की स्थिति उत्पन्न होती है। इसलिए इस बीमारी का कारगर इलाज खोजे जाने के प्रयासों के साथ-साथ ऐसे मरीजों के प्रति समाज और परिजनों की सोच को बदलने के लिए अपेक्षित कदम उठाए जाने की भी सख्त जरूरत है।

Anti-retroviral treatment method

सुखद तथ्य यह है कि एंटी-रेट्रोवायरल उपचार पद्धति को अपनाए जाने के बाद एड्स से जुड़ी मौतों का आंकड़ा साल दर साल कम होने लगा है। इसलिए लोगों को इस दिशा में जागरूक किए जाने की भी जरूरत है कि एड्स भले ही अब तक एक लाइलाज बीमारी ही है लेकिन फिर भी एड्स पीड़ित व्यक्ति सामान्य जीवन जी सकता है और एचआईवी संक्रमित हो जाने का अर्थ बहुत जल्द मृत्यु कदापि नहीं है बल्कि उचित दवाओं और निरन्तर चिकित्सीय परामर्श से ऐसा मरीज काफी लंबा और स्वस्थ जीवन जी सकता है।

योगेश कुमार गोयल

(लेखक योगेश कुमार गोयल वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं)

‘एक्स रे – द इनर इमेज’ – एक साइकोलॉजिकल थ्रिलर

X Ray – The Inner Image Poster Image

एक्स रे इनर इमेएक साइकोलॉजिकल थ्रिलर

‘X Ray – The Inner Image’: a psychological thriller

Rajiv Ruia And Pradeep Sharma Hits A Hat-trick with X Ray – The Inner Image

मुंबई, 30 नवंबर 2019 (न्यूज़ हेल्पलाइन). एक बार फिर राजीव रुइया और प्रदीप शर्मा दर्शको के लिए एक हिट फिल्म ले कर हाज़िर है, “एक्स रे – द इनर इमेज” जो की एक साइकोलॉजिकल  थ्रिलर है।

डायरेक्टर राजीव एस रुइया और प्रोड्यूसर प्रदीप के शर्मा की जोड़ी ने एक से एक हिट फ़िल्में दी हैं। और अब दोनों एक बार फिर साइकोलॉजिकल थ्रिलर फिल्म “एक्स रे – द इनर इमेज” के साथ वापसी कर रहें हैं। फिल्म की  ओपनिंग डे बुकिंग्स काफी अच्छी है ।

राजीव एस रुइया के डायरेक्शन में बनी फिल्म “एक्स रे – द इनर इमेज” से राहुल शर्मा और याशी कपूर डेब्यू करने वाले है। फिल्म एक डार्क साइकोलॉजिकल थ्रिलर है, जिसे बाबा मोशन पिक्चर्स प्राइवेट लिमिटेड के बैनर तले प्रदीप के शर्मा द्वारा प्रोड्यूस किया जा रहा है।

Story of the film ‘X Ray – The Inner Image’

फिल्म एक्स रे इनर इमे की कहानी प्रोफेशनल राहुल शर्मा और एक खूबसूरत अजनबी याशी कपूर के इर्द-गिर्द घूमती है। फिल्म की कहानी बहुत ही रहस्यमयी है।

इससे पहले भी राजीव एस रुइया और प्रदीप के शर्मा रीजनल प्रोजेक्ट्स पर काम कर चुके है और इस फिल्म को भी बहोत डेडिकेशन से  से बनाया गया है और स्क्रिप्ट भी शानदार है। फिल्म सिनेमाघरों में अच्छी चलेगी, लेकिन इसके साथ ही डिजिटल प्लेटफॉर्म पर भी अपनी एक खास जगह बना लेगी।

इस साइकोलॉजिकल थ्रिलर फिल्म को अच्छी तरह से डायरेक्ट किया गया है। फिल्ममेकर्स ने इसकी कहानी को लास्ट तक रहस्यमय और रोमांचित बनाए रखने में कोई कसर नही छोड़ी है।

इंडियन सिनेमा में पहली बार, डायरेक्टर ने हर सीन के लिए सात कैमरा सेट-उप  ट्राई किया है , जो फिल्म के विजुअल को और भी स्टनिंग और टेक्निकल तौर पर साउंड को थ्रिलिंग  बनाता है। राजीव ब्लड और मिरर तोड़ने वाले सीन्स के एक्सपर्ट हैं, जो किसी भी साइकोलॉजीकल थ्रिलर फिल्म का एक अहम् हिस्सा होते हैं।

इतनी खूबियों के बावजूद फिल्म के कई सीन्स और एलिमेंट ऐसे हैं जो अपने आप में जस्टिस नहीं करते।

फिल्म में एक आइटम सॉन्ग भी है, लेकिन साइकोलॉजिकल थ्रिलर में आइटम ट्रैक की जरूरत नहीं थी। डेब्यूटेंट एक्टर्स राहुल शर्मा और याशी कपूर ने काफी मेहनत की है लेकिन कहीं ना कहीं दोनों ही अपने इमोशन्स से चूक  जाते हैं।

“फिल्म एक्स रे – द इनर इमेज” की सफलता के बाद फैंस को राजीव और प्रदीप से एक और हिट फिल्म की उम्मीद होगी, क्योंकि दोनों इस समय अपनी चौथी फिल्म ‘जाको राखे साईंया’ की शूटिंग में व्यस्त हैं।

“एक्स रे – द इनर इमेज” की ओपनिंग अच्छे रिव्यू के साथ हुई है।

(न्यूज़ हेल्पलाइन रिव्यु –  रेटिंग 3.5 )  

(News Helpline Review Rating: 3.5)

दुनिया भर में अब तक 21 लाख से अधिक लोगों को प्रभावित कर चुका है फेफड़ों का कैंसर

Cancer

दुनिया भर में अब तक 21 लाख से अधिक लोगों को प्रभावित कर चुका है फेफड़ों का कैंसर

नवम्बर लंग कैंसर जागरूकता माह

नोएडा 30 नवंबर 2019 : नवंबर को लंग कैंसर जागरूकता माह (Lung Cancer Awareness Month) घोषित किया गया है, जिसका उद्देश्य जनता के बीच फेफड़ों के कैंसर के बारे में जागरूकता (Awareness of lung cancer) फैलाना है। इसका मुख्य उद्देश्य धूम्रपान के हानिकारक प्रभावों (Harmful effects of smoking) के बारे में लोगों को जागरूक करना एवं ऐसे लोगों को शिक्षित करना है जो फेफड़ों के कैंसर के अधिक जोखिम में हैं।

गौरतलब है कि फेफडों के कैंसर से होने वाली 80 प्रतिशत मौतों का मुख्य कारण धूम्रपान होता है।

फेफड़े का कैंसर सबसे आम कैंसर है जो कि दुनिया भर में अब तक 21 लाख से अधिक लोगों को प्रभावित कर चुका है।

लंग कैंसर फाउंडेशन ऑफ़ अमेरिका एवं अन्य कई संगठन और भी हैं जो फेफडों के कैंसर के बारे में जागरूकता फ़ैलाने की दिशा में काम कर रहे हैं।

हालांकि अगर लोग अतिशीघ्र धूम्रपान छोड़ देते हैं और अपनी दिनचर्या में फाइबर और दही का अधिक सेवन शुरू करते हैं, तो वे फेफड़ों के कैंसर के खतरे को 33 प्रतिशत तक कम कर सकते हैं।

Dr. Ashish Jaiswal, senior oncologist at Bhardwaj Hospital Noida gave information about cancer

यह जानकारी देते हुए भारद्वाज अस्पताल नोएडा के वरिष्ठ ऑन्कोलॉजिस्ट डॉ आशीष जायसवाल ने एक विज्ञप्ति में बताया कि अज्ञानता की वजह से लोग हमारे पास तब आते हैं जब उनका कैंसर उच्च अवस्था तक पंहुच चुका होता है। यदि कैंसर का पता प्रारंभिक अवस्था में लग जाता है तो इसके उन्मूलन की संभावना 5 गुना बढ़ जाती है।

Inconsistent routines are also a cause of cancer

डॉ आशीष जायसवाल ने बताया कि असंगत दिनचर्या भी कैंसर का एक कारण है जो लोग प्राप्त कर रहे हैं। प्रदूषित वायु में मौजूद सूक्ष्म कण श्वास के माध्यम से आसानी से हमारे श्वसन एवं परिसंचरण तंत्र में प्रवेश कर हमारे फेफड़ों, हृदय एवं मस्तिष्क जैसे महत्वपूर्ण अंगों को नुकसान पंहुचते हैं। अगर हम अपने आस-पास जागरूकता पैदा करना शुरू करते हैं और लोगों को धूम्रपान छोड़ने के लिए प्रेरित करते हैं तो निश्चित रूप से फेफड़ों के कैंसर से पीड़ित लोगों की संख्या में भारी गिरावट आएगी।

डॉ जायसवाल ने आगे बताया कि आज के दौर में पुरुष और महिलाएं दोनों धूम्रपान के आदी हैं, कुछ लोग इसकी लत का कारण तनाव कम करना तो कुछ इसे अपना दिन शुरू करने के पुश बटन के रूप में इस्तेमाल करते हैं, लेकिन हम सभी को यह पता होना चाहिए कि सिगरेट पीने से फेफड़ों के कैंसर की संभावना 15 से 30 प्रतिशत तक बढ़ जाती है।

सड़क दुर्घटनाओं में 64 प्रतिशत मौतों का कारण तेज रफ्तार

National News

सड़क दुर्घटनाओं में 64 प्रतिशत मौतों का कारण तेज रफ्तार

Breaking traffic rules on the road is by no means correct.

नई दिल्ली, 30 नवंबर (इंडिया साइंस वायर): सड़क पर यातायात नियमों को तोड़ना किसी भी तरह से सही नहीं है। लेकिन, नियमों को ताक पर रखकर अधिक रफ्तार में गाड़ी चलाना सबसे अधिक जानलेवा साबित हो रहा है। वर्ष 2018 में सड़क दुर्घटनाओं में 64 प्रतिशत मौतें अधिक रफ्तार में गाड़ी चलाने कारण हुई हैं।

Report of the Ministry of Road Transport and Highways based on road accidents

वर्ष 2018 में सड़क दुर्घटनाओं पर आधारित सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार पिछले साल भारत में कुल 4.67 लाख सड़क दुर्घटनाएं हुई थीं, जिनमें गाड़ियों की तेज रफ्तार 3.11 लाख हादसों का कारण बनकर उभरी है। तेज रफ्तार के कारण हुए सड़क हादसों में बीते वर्ष 97,588 लोगों को अपनी जान गवांनी पड़ी थी।

Statistics of deaths in road accidents due to violation of traffic rules

वर्ष 2018 में यातायात नियमों के उल्लंघन से सड़क दुर्घटनाओं में हुई मौतों के ये आंकड़े राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों के पुलिस विभाग से प्राप्त आंकड़ों के विश्लेषण पर आधारित हैं। सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय द्वारा लोकसभा में बृहस्पतिवार को एक प्रश्न के उत्तर में इन आंकड़ों को पेश किया गया है।

गलत दिशा में गाड़ी चलाने के दौरान दुर्घटनाओं में 5.8 प्रतिशत मौतें होती हैं। वहीं, सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली मौतों में 2.8 प्रतिशत मौतें शराब पीकर गाड़ी चलाने वाले लोगों की हुई हैं। ड्राइविंग करते समय मोबाइल फोन का उपयोग भी सड़क दुर्घटनाओं का एक प्रमुख कारण बनकर उभर रहा है। पिछले वर्ष सड़क दुर्घटनाओं में 2.4 प्रतिशत मौतों का कारण गाड़ी चलाते हुए मोबाइल फोन के उपयोग को माना गया है।

नई दिल्ली स्थित सीएसआईआर-सड़क अनुसंधान संस्थान में ट्रैफिक इंजीनियरिंग ऐंड सेफ्टी डिविजन के प्रमुख सुभाष चंद ने इंडिया साइंस वायर को बताया कि “निर्धारित सीमा से अधिक गाड़ियों की रफ्तार सड़क दुर्घटनाओं का एक प्रमुख कारण हैं। हालांकि, गाड़ियों की अधिक रफ्तार के आंकड़े मूल रूप से पुलिस एफआईआर पर केंद्रित होते हैं, जिसे प्रायः प्रत्यक्षदर्शियों के बयान के आधार पर दर्ज किया जाता है। इसलिए इन आंकड़ों को पूरी तरह सही नहीं कहा जा सकता।”

उन्होंने कहा कि “गाड़ियों की रफ्तार की निगरानी के लिए राष्ट्रीय एवं राज्यों के राजमार्गों पर कैमरे लगाया जाना उपयोगी हो सकता है। ऐसा करने से गाड़ियों की रफ्तार के साथ-साथ यातायात नियमों को तोड़ने वाले लोगों पर नजर रखी जा सकेगी। दिल्ली, लखनऊ और चेन्नई जैसे शहरों में इस तरह की पहल की जा चुकी है, जिसके सकारात्मक परिणाण देखने को मिले हैं। कुछ समय बाद गाजियाबाद में भी सड़कों पर यातायात नियम तोड़ने वालों की निगरानी कैमरों के जरिये शुरू हो जाएगी।”

करीब 78 प्रतिशत सड़क दुर्घटनाओं के लिए आमतौर पर ड्राइवर की लापरवाही को जिम्मेदार ठहराया जाता है। यातायात नियमों के उल्लंघन में सड़क पर चलते हुए लेन तोड़ना, गलत दिशा में गाड़ी चलाना, शराब पीकर या ड्रग्स का सेवन करके ड्राइविंग, मोबाइल फोन का उपयोग करते हुए गाड़ी चलाना, रेड लाइट नजअंदाज करना और दूसरे मामले शामिल हैं।

सड़क दुर्घटनाओं के लिए कई अन्य कारण भी जिम्मेदार हो सकते हैं। इनमें साइकिल सवारों, पैदल यात्रियों और दूसरे वाहन चालकों की गलती (7.1 प्रतिशत), सार्वजनिक निकायों की लापरवाही (2.8 प्रतिशत), गाड़ियों की बनावट संबंधी खामियां (2.3 प्रतिशत) और खराब मौसम (1.7 प्रतिशत) शामिल हैं।

सड़क दुर्घटनाओं में जख्मी होने के मामले वर्ष 2018 में भारत में होने वाली मौतों का आठवां सबसे बड़ा कारक बनकर उभरे हैं। सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक भारत में हर दिन होने वाले औसतन 1,280 सड़क हादसों में करीब 415 लोगों को अपनी जान गवांनी पड़ती है। वर्ष 2018 में 1.5 लाख से अधिक लोगों को सड़क दुर्घटनाओं में अपनी जान गवांनी पड़ी थी। यह संख्या वर्ष 2017 के दौरान सड़क दुर्घटनाओं में हुई करीब 1.48 लाख मौतों की तुलना में 2.4 प्रतिशत अधिक है।

Most road accidents occur in Tamil Nadu

राज्यों के स्तर देखें तो सबसे अधिक 13.7 प्रतिशत सड़क दुर्घटनाएं तमिलनाडु में होती हैं। मध्य प्रदेश मे 11 प्रतिशत और उत्तर प्रदेश में 9.1 प्रतिशत सड़क हादसे होते हैं। हालांकि, सड़क हादसों में सर्वाधिक 22 हजार से अधिक मौतें उत्तर प्रदेश में होती हैं। इसके बाद महाराष्ट्र में 13,261 और तमिलनाडु में 12,216 मौतों के लिए सड़क दुर्घटनाओं को जिम्मेदार पाया गया है।

About 28.8 percent of the total deaths in road accidents last year were due to not wearing helmets.

हेलमेट न पहनना या फिर सीट बेल्ट न लगाना दुर्घटनाओं का कारण भले ही न हो, पर गंभीर चोटों से बचाव में इनकी भूमिका अहम होती है। पिछले साल सड़क दुर्घटनाओं में हुई कुल मौतों में करीब 28.8 प्रतिशत मौतें हेलमेट न पहनने के कारण हुई हैं। जबकि, सड़क हादसों में होने वाली 16.1 प्रतिशत मौतों के लिए सीट बेल्ट न लगाने को जिम्मेदार पाया गया है।

उमाशंकर मिश्र

(इंडिया साइंस वायर)

जेएनयू या कश्मीर में नहीं झारखंड में बसते हैं सबसे अधिक देशद्रोही !

Jharkhand has the highest number of sedition cases

Jharkhand has the highest number of sedition cases.

रांची से आलोका कुजूर

2017 से 2019 तक झारखंड में सबसे अधिक देशद्रोह के मामले दर्ज हैं। यहां प्रशासन और सरकार से बात करने से मीडिया भी डरता है। लगातार दमन का दौर जारी है।

खूंटी का इलाका कभी कांग्रेस का गढ़ रहा। बिरसा मुण्डा के जल जंगल जमीन की लम्बी लड़ाई का जहां संघर्ष अब तक जीवित है, कोयलकारो नदी पर बिजली उत्पादन को लेकर बहुचर्चित आंदोलन भारत में विजय वाला आंदोलन माना जाता रहा है। साइंस सिटी, तजना डैम, छाता नदी के अलावा वहां माओवादियों का लम्बा संघर्ष का इतिहास रहा है।

मुण्डा समुदाय की घनी आबादी वाले इलाके में मुण्डा समुदाय लगातार चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार रहते हैं। भारत की आजादी से लेकर राजनीति संघर्ष में यह इलाका कभी पीछे नहीं रहा।

उधर सरकार ने इस आंदोलन को लेकर लगभग 30 हजार लोगों पर केस दर्ज किया है। सबसे गम्भीर बात यह है कि एक एफआईआर 99/18 में खूंटी थाना में केस हुआ है, जिसमें 10 गांव और एक अन्य एफआईआर में एक गांव के ऊपर कुल 11 गांवों के ऊपर देशद्रोह के दर्ज हैं। इसी एफआईआर में 37 मोटरसाइकिल के ऊपर भी देशद्रोह का केस दर्ज है।

खूंटी जिला के अन्तर्गत 3 थाना अडानी थाना, खूंटी थाना, मूरूहू थाना में कुल 23 केस हुए हैं। जिसमें हमने 14 एफआईआर की स्टडी कर पाया कि अज्ञात लगभग 10,015 लोगों के ऊपर केस है।

अनुमान लगा सकते हैं कि 11 गांव की आबादी यदि 1000 भी माने तब 11 हजार और अज्ञात 10015 को जोड़ दे 21 हजार 15 लोगों पर केस हैं जिसमें नामजद 193 लोगों के ऊपर देशद्रोह का केस है। ऐसे में 14 एफआईआर 2207+37 मोटरसाइकिल= 22,44 लोगों के ऊपर केस का प्रमाण है। यदि 23 एफआईआर की स्टडी की जाए तब यह आंकड़ा 30 हजार से अधिक होगा।।

हर दौर के दमन के लिए सरकार ने तरह-तरह के हथकण्डे अपनाए। पीएलएफआई, जीएलटी जैसे सरकार संरक्षित संगठनों को दमन को कुचलने के लिए बनाया गया।

2018 में मुण्डा आदिवासी अपनी परम्परागत संस्कृति का एक हिस्सा पत्थलगड़ी कार्यक्रम कर रहे थे। यह कार्यक्रम वहाँ गाँव गाँव में चलता रहता है। जिसमें अपने गांव की सीमा पर 5-6 फीट से बड़ा पत्थर लगा कर गांव के संविधान, पांचवीं अनुसूची जो संविधान में दिए अधिकार को लिखते हैं। गांव की कितनी दूर सीमा है वह लिखा होता है। पंचायत के अंदर कितने गांव हैं, कितने आबादी है अंकित होता हैं। हर मुण्डा गांव में हर जगह लगा होता है।

2017 के पहले पत्थलगड़ी का क्रार्यक्रम चला जिसे रोकने के लिए सरकार ने दमन शुरू किया विरबांकी का इस इलाका में ग्रामसभा बहुत मजबूर है गांव में ग्रामसभा के अनुमति से योजना और अन्य काम होते हैं। लेकिन माओवादी को खोजने के नाम पर हजारों प्रशासन के लोग गांव में लगे बैरीकेटिंग तोड़कर गांव में प्रवेश कर गये। प्रशासन के वापस आने पर रास्ते में गोंव वाल ने प्रशासन को सम्मान पूर्व बैठा लिया और बताया कि गांव में ग्रामसभा के अनुमति के बगैर नहीं आते हैं। चेतावनी देकर छोड़ दिया।

प्रशासन ने वापस आ कर गांव के लोगों पर देशद्रोह का केस दर्ज किया। इससे पूरा विरबांकी के मुण्डा समुदाय भड़क गये।

देशद्रोह के इस मामले को लेकर मुण्डा समुदाय बैठक कर रहे थे। प्रशासन ने फिर से बैठक स्थल को घेर रखा था। बैठक खुली जगह हो रही थी। लोग अपनी बात कहने से कतरा रहे थे। ऐसी स्थिति में वहाँ प्रशासन को जनता ने घेर लिया।

गोदी मीडिया इस खबर को बड़ी प्रमुखता से प्रशासन और सरकार पक्ष में एक तरफा लिखने लगा। पत्थलगड़ी को प्रशासन केस में घसीट नहीं पा रहा था। तब प्रशासन अफीम के खेती होने की चर्चा कर गांव में छापा मारी करने लगे। वन भूमि पर अफीम खेती होने की बात कहकर अफीम की नष्ट करने चर्चा किया गया। यह खबर प्रशासन ने मिडिया को दी। केस दर्ज नहीं हुआ। इस मामले पर भी पत्थलगड़ी कर रहे लोगों पर केस दर्ज नहीं कर पाने पर अचानक गैंगरेप जैसी घटना होती है। इस रेप की घटना में पत्थलगड़ी से जुड़े लोगों को नामजद रेप में शामिल कर दिया।

जब पत्थलगड़ी चल रही थी उसमें गांव वालों को रोकने के लिए प्रशासन दमन कर रहा था, तब सोशलमीडिया में अनेकों लोगों ने पत्थलगड़ी का समर्थन और गैंगरेप की घटना को निंदा की थी। सरकार ने ऐसे 19 लोगों पर देशद्रोह का केस दर्ज किया है।

इस मामले को लेकर स्टेन स्वामी, विनोद कुमार, राकेश रौशन किंड़ो, आलोका ने हाई कोर्ट में क्वैश यनि केस समाप्त करने के लिए फाइल किया है। जैसे ही हाईकोर्ट में रिट दायर हुई वैसे ही एक महिने के अंदर इन लोगों के खिलाफ वारंट जारी होता है और फिर एक महिना के बाद स्टेन स्वामी का कुर्की जब्त का वारंट जारी होता है और तुरंत ही कुर्की कर ली गयी। कोर्ट में आदेश का इंतजार है, उधर खूंटी कोर्ट में जमानत के लिए कुछ लोगों ने आवेदन किया है ,वह भी जो सुरक्षित रखा गया है।

दूसरी ओर पत्थलगड़ी में शामिल उन आदिवासी के नाम देशद्रोह में डाले गये हैं, जिनकी भूमिका बहुत नहीं। कुछ लोग अलग-अलग जिला गांव राज्य के लोग हैं, जो वहाँ पत्थलगड़ी जैसे कार्यक्रम को चला रहे हैं। अभी भी यह जारी हैं।

यह लेख 14 एफआईआर के आधार पर लिखा गया है।

Most of the traitors reside in Jharkhand, not in JNU or Kashmir