कवि बोले, मैं फाँसी और मौत के इस शोर में आपसे स्वर नहीं मिला सकूँगा

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कवि बोले, मैं फाँसी और मौत के इस शोर में आपसे स्वर नहीं मिला सकूँगा

Reaction on Facebook on Hyderabad encounter

नई दिल्ली, 06 दिसंबर 2019. हैदराबाद में सामूहिक दुष्कर्म के बाद हत्या के आरोपियों की एनकाउंटर में हत्या पर सवाल भी उठना शुरू हो गए हैं। सवाल कानूनी और नैतिक दोनों हैं।

बता दें कि शुक्रवार की सुबह खबर मिली थी कि तेलंगाना पुलिस ने हैदराबाद में सामूहिक दुष्कर्म के बाद हत्या की शिकार हुई पशु चिकित्सक के सभी आरोपियों की उसी स्थान पर गोली मारकर हत्या कर दी, जहां उनकी बेटी की 27 नवंबर को सामूहिक दुष्कर्म व हत्या करने के बाद उसके शव को जला दिया गया था।

इस पर प्रतिक्रियास्वरूप अशोक कुमार पाण्डेय ने अपनी एक फेसबुक पोस्ट (Ashok Kumar Pandey Facebook) में लिखा,

”कठुआ कांड के बाद विरोध प्रदर्शन चल रहा था। सीपी पर प्रदर्शन के बाद हम पुरानी दिल्ली गए। जामा मस्जिद से जुलूस निकलना था। शुरू हुआ। नारे लगने लगे – फाँसी दो, फाँसी दो। मैं चुपचाप निकल आया।

फाँसी गोली माँगती भीड़ मुझे वहशी लगती है। मुझे जूलियस सीज़र का वह दृश्य याद आता है जब भीड़ एक कवि को इसलिए मार देती है कि उसका नाम एक षड्यंत्रकारी का नाम भी था। मैंने कश्मीर ही नहीं दुनिया भर का मध्यकाल पढ़ा है। आँखें निकलवाने, ज़िंदा जला देने, लाश में भूसा भरवा देने और सर चौराहे पर टाँग देने की भयावह और वीभत्स घटनाएँ पढ़ी हैं। मुझे लगता रहा है कि वह वक़्त बीत गया।

लेकिन हत्यारों, बलात्कारियों और अपराधियों ने बार-बार याद दिलाया है कि वह वहशीपना है कहीं न कहीं। उनके लिए सज़ा ज़रूरी है। संविधान ने सिखाया कि सज़ा मतलब बदला नहीं होता।

लेकिन जब ऐसी भीड़ देखता हूँ, फाँसी-फाँसी चिल्लाती, हत्याओं का जश्न मनाती तो लगता है वह वहशीपना सिर्फ़ अपराधियों में नहीं। लगता है यह जो भीड़ है वह उतनी ही वहशी है। इनमें ही छिपे हैं वे लोग जो गर्भ में बेटियों को मार देते हैं। जो किसी पाकेटमार को पीट-पीट कर मार डालते हैं। जो किसी के घर में बीफ़ होने का आरोप लगाकर मार डालते हैं। सोशल पोज़िशनिंग यह करने की इजाज़त न भी दे तो उसे न्यायसंगत ठहराते हैं।

आप मान लीजिए कि कठुआ पर मेरा कन्सर्न फाँसी-फाँसी चिल्लाने वालों से कम था या आज इनकाउंटर का जश्न मना रहे लोगों से कम दुखी था मैं हैदराबाद की घटना के लिए लेकिन मैं फाँसी और मौत के इस शोर में आपसे स्वर नहीं मिला सकूँगा। मैं बदला-बदला चीख़ते हुए मध्यकाल में नहीं जा सकता।

मैं अकेले होने पर भी न्याय -न्याय चीख़ता रहूँगा। कोई मेरी हत्या कर दे तो भी मैं उसके लिए फाँसी नहीं चाहूँगा।“

सर्वोच्च न्यायालय के अवकाशप्राप्त न्यायधीश जस्टिस मार्कण्डेय काटजू ने भी ट्वीट कर इस एनकाउंटर को फर्जी करार दिया है।

लखनऊ की सोशल एक्टिविस्ट सदफ जफर ने फेसबुक (Sadaf Jafar Facebook) पर लिखा,

“सुना है एनकाउंटर करने वाले बहादुर पुलिसकर्मियों पर पुष्पवर्षा की गई…

क्या उनमें वो पुलिस वाले भी शामिल हैं जिन्होंने पीड़िता के परिवार से कहा था कि तुम्हारी लड़की किसी से साथ भाग गई होगी, खुद आ जायेगी।

नहीं पुष्पवर्षा नहीं ये इंसाफ को पुष्पांजलि अर्पित की जा रही है।

#Justice_RIP”

वरिष्ठ पत्रकार उज्ज्वल भट्टाचार्य ने फेसबुक (Ujjwal Bhattacharya Facebook) पर लिखा,

“बलात्कारी बलात्कार करते हैं, पुलिस एनकाउंटर करती है.

लेकिन मुझे सबसे ज़्यादा चिन्ता मध्यवर्ग के उल्लास से है.”

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज ने कहा हैदराबाद ‘एनकाउंटर’ स्पष्ट रूप से फर्जी प्रतीत होता है

यूपी पुलिस ने मायावती को दिया जवाब जंगलराज बीते दिनों की बात तो ट्विटराती बोले उन्नाव वाले दरिंदों को उड़ाओ तब पोस्ट करना श्रीमान जी……

यूपी पुलिस ने मायावती को दिया जवाब जंगलराज बीते दिनों की बात तो ट्विटराती बोले उन्नाव वाले दरिंदों को उड़ाओ तब पोस्ट करना श्रीमान जी……

Twitter

यूपी पुलिस ने मायावती को दिया जवाब जंगलराज बीते दिनों की बात तो ट्विटराती बोले उन्नाव वाले दरिंदों को उड़ाओ तब पोस्ट करना श्रीमान जी……

लखनऊ, 06 दिसंबर 2019. भाजपा राज में भले ही अपराध और अपराधी बढ़े हों, ए नकाउंटर्स पर सुप्रीम कोर्ट ने सवाल किए हों और यूपी के बारे में सख्त टिप्पणी की हो, पर एक बात जरूर हुई है कि प्रशासनिक मशीनरी का खुलेआम राजनीतिकरण हुआ है और सरकारी महकमे अब भाजपा के आनुषंगिक संगठनों की तरह व्यवहार कर रहे हैं।

दरअसल टाइम्स नाउ चैनल ने बसपा सुप्रीमो मायावती के हैदराबाद एनकाउंटर पर बयान (BSP supremo Mayawati’s statement on Hyderabad encounter) की खबर का वीडियो डालते हुए ट्वीट किया था, “मायावती कहती हैं, ‘यूपी पुलिस को हैदराबाद पुलिस से सीखना चाहिए’।“ (‘U.P police must learn from the Hyderabad police’, says Mayawati.)

इस पर यूपी पुलिस के सत्यापित ट्विटर हैंडल से इस ट्वीट का उत्तर देते हुए ट्वीट किया गया

“आंकड़े खुद लिए बोलते हैं। जंगल राज अतीत की बात है। अब नहीं है।

पिछले 2 वर्षों में 5178 पुलिस की कार्रवाई में 103 अपराधी मारे गए और 1859 घायल हुए।

17745 अपराधियों ने आत्मसमर्पण किया या जेल जाने के लिए अपनी खुद की बेल रद्द करा ली।

मुश्किल से राज्य के मेहमान।“

यूपी पुलिस के ट्वीट (Tweets of UP police) पर ट्विटराती ने ट्रोलिंग शुरू कर दी।

एक यूजर ने ट्वीट किया –

“उन्नाव वाले दरिंदों को उड़ाओ तब पोस्ट करना श्रीमान जी……”

एक अन्य यूजर ने कहा,

“महोदय उन्नाव केस के आरोपियो को भी ऐसे ही जला दो तो सारे पाप धुल जायेंगे हमे पता है आप लोग अच्छा काम कर रहे है लेकिन उन्नाव केस में असमर्थता ने एक बदनुमा दाग लगा दिया है खाकी पर।“

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज ने कहा हैदराबाद ‘एनकाउंटर’ स्पष्ट रूप से फर्जी प्रतीत होता है

 

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज ने कहा हैदराबाद ‘एनकाउंटर’ स्पष्ट रूप से फर्जी प्रतीत होता है

Justice Markandey Katju

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज ने कहा हैदराबाद एनकाउंटरस्पष्ट रूप से फर्जी प्रतीत होता है

नई दिल्ली, 06 दिसंबर 2019. सर्वोच्च न्यायालय के अवकाश प्राप्त न्यायाधीश जस्टिस मार्कंडेय काटजू (Justice Markandey Katju, retired Supreme Court judge) ने कहा है कि हैदराबाद एनकाउंटरस्पष्ट रूप से फर्जी प्रतीत होता है।

बता दें कि शुक्रवार की सुबह खबर मिली थी कि तेलंगाना पुलिस ने हैदराबाद में सामूहिक दुष्कर्म के बाद हत्या की शिकार हुई पशु चिकित्सक के सभी आरोपियों की उसी स्थान पर गोली मारकर हत्या कर दी, जहां उनकी बेटी की 27 नवंबर को सामूहिक दुष्कर्म व हत्या करने के बाद उसके शव को जला दिया गया था।

इस खबर से जुड़े हैश टैग #Encounter #hyderabadpolice #justiceforpriyanakareddy #JusticeForDisha माइक्रो ब्लॉगिंग साइट ट्विटर पर ट्रेंड करने लगे। उधर जस्टिस मार्कण्डेय काट्जू (Justice Markandey Katju) ने ट्वीट किया

“प्रकाश कदम बनाम रामप्रसाद विश्वनाथ गुप्ता (ऑनलाइन देखें) में मेरे सभापतित्व वाली एक सर्वोच्च न्यायालय की पीठ ने यह माना कि फर्जी एनकाउंटर ’के मामलों में संबंधित पुलिसकर्मियों को मृत्युदंड दिया जाना चाहिए। हैदराबाद ‘एनकाउंटर’ स्पष्ट रूप से फर्जी प्रतीत होता है।“

एक अन्य ट्वीट में जस्टिस काटजू ने जस्टिस एएन मुल्ला का सुप्रसिद्ध वक्तव्य ट्वीट करते हुए कहा,

इलाहाबाद उच्च न्यायालय के जज जस्टिस आनंद नारायण मुल्ला ने एक फैसले में कहा था, “मैं  जिम्मेदारी के सभी अर्थों के साथ कहता हूं, पूरे देश में एक भी कानूनविहीन समूह नहीं है जिसका अपराध का रिकॉर्ड अपराधियों के संगठित गिरोह भारतीय पुलिस बल की तुलना में कहीं भी ठहरता हो।”

बता दें जस्टिस आनंद नारायण मुल्ला (ANAND NARAYAN MULLA), इलाहाबाद उच्च न्यायालय के एक प्रमुख न्यायाधीश थे व 4 वीं लोकसभा के सदस्य थे।

मुल्ला लखनऊ में पैदा हुए एक कश्मीरी पंडित थे। उनके पिता जगत नारायण मुल्ला प्रमुख वकील और लखनऊ विश्वविद्यालय के कुलपति थे। 1946 और 1952 के बीच, वह भारत-पाक ट्रिब्यूनल के अध्यक्ष और 1954 और 1961 के बीच इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश थे।

कौन हैं मार्कंडेय काटजू?

अपने ऐतिहासिक फैसलों के लिए प्रसिद्ध रहे जस्टिस मार्कंडेय काटजू 2011 में सुप्रीम कोर्ट से सेवानिवृत्त हुए उसके बाद वह प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के चेयरमैन रहे। आजकल वह अमेरिका प्रवास पर कैलीफोर्निया में समय व्यतीत कर रहे हैं और सोशल मीडिया पर खासे सक्रिय हैं और भारत की समस्याओं पर खुलकर अपने विचार व्यक्त कर रहे हैं।

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पैंथर्स सुप्रीमो की जम्मू-कश्मीर के सभी राजनीतिक दलों से 7 दिसम्बर को ‘जम्मू बंद‘ का समर्थन करने की अपील

Prof. Bhim Singh

पैंथर्स सुप्रीमो की जम्मू-कश्मीर के सभी राजनीतिक दलों से 7 दिसम्बर को ‘जम्मू बंद‘ का समर्थन करने की अपील

Appeal for Jammu Bandh

NPP Supremo’s appeal to all political parties in J&K to support ‘Jammu Bandh’ on Dec.7

नई दिल्ली/जम्मू/श्रीनगर 05 दिसंबर 2019. नेशनल पैंथर्स पार्टी के मुख्य संरक्षक एवं सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के वरिष्ठ कार्यकारी सदस्य प्रो. भीम सिंह ने जम्मू-कश्मीर के सभी सामाजिक, राजनीतिक दलों और गैरसरकार संगठनों से एकता, अखंडता, स्वतंत्रता और भारतीय संविधान के अध्याय के अनुच्छेद 12 से 35 में दिये गये मौलिक अधिकार के फायदे प्राप्त करने के लिए 7 दिसम्बर, 2019 को होने वाले ‘जम्मू बंद‘ का समर्थन करने की अपील की है।

पैंथर्स सुप्रीमो ने कहा कि 1954 में राष्ट्रपति ने अध्यादेश जारी करके अनुच्छेद 35-ए को लागू किया गया था, जिसे अब राष्ट्रपति ने 5 अगस्त, 2019 को वापस ले लिया है, जिसके परिणास्वरूप भारतीय संविधान में दिये गये सभी मौलिक अधिकार पूरे राज्य में लागू हो गये हैं, इसके बावजूद वर्तमान सांसद, कई पूर्व मुख्यमंत्री और मंत्रियों सहित सैकड़ों भारतीय नागरिक गैरकानूनी और असंवैधानिक रूप से जेलों, होटलों और घरों आदि में कैद हैं। इंटरनेट सुविधाएं ठप हैं, विश्वविद्यालय, कालेज, सभी शैक्षणिक संस्थान आज भी इंटरनेट से वंचित हैं और हजारों छात्र और युवा अपनी परीक्षाओं में शामिल नहीं हो पा रहे हैं। इंटरनेट सुविधा न उपलब्ध होने के कारण शिक्षकों और छात्रों की परेशानियों को कोई भी सुनने वाला नहीं हैं, जिससे कारण इनकी परीक्षाओं में शामिल न होने से बड़ा नुकसान हो रहा है।

जम्मू-कश्मीर नेशनल पैंथर्स पार्टी ने 7 दिसम्बर को जम्मू बंद का आह्वान करने से पहले पूरी स्थिति का बारीकी से समीक्षा की है। उन्होंने सभी राजनीतिक, सामाजिक दलों और गैरसरकारी संगठनों से इस बंद में शामिल होने की अपील की है, जिससे यह संदेश जाए कि हर व्यक्ति, हर नागरिक, हर दुकानदार, हर कर्मचारी और हर मजदूर को सम्मान और गौरव के साथ जीने के लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार प्राप्त है।

प्रो.भीमसिंह ने कांग्रेस, पीडीपी, नेशनल कांफ्रेंस, सीपीआई, सीपीआई-एम, छात्र संगठनों, एनपीएसयू सहित सभी राजनीतिक और सामाजिक दलों से एकजुट होकर जम्मू की सड़कों पर आने की अपील की है, जिससे दिल्ली में बैठे शासकों को यह संदेश जाये कि जम्मू-कश्मीर के लोग भी सभी मौलिक अधिकारों और शांति और गौरव के साथ जीने का अधिकार रखते हैं।

नागरिकता संशोधन विधेयक के खिलाफ लखनऊ में हुआ प्रदर्शन, पूरे देश में होगा विरोध

Protest in Lucknow against Citizenship Amendment Bill, protest will be held across the country

नागरिकता संशोधन विधेयक के खिलाफ लखनऊ में हुआ प्रदर्शन, पूरे देश में होगा विरोध

Protest in Lucknow against Citizenship Amendment Bill, protest will be held across the country

लखनऊ, 5 दिसंबर 2019। रिहाई मंच, एनएपीएम, नागरिक परिषद, इंसानी बिरादरी, ऑल इंडिया पीपुल्स फ्रंट, हम सफ़र, सामाजिक न्याय मंच, जन मंच, युवा शक्ति संगठन, पसमांदा मुस्लिम महाज, जमात ए इस्लामी हिन्द, खुदाई खिदमतगार, उत्तर प्रदेश छात्र सभा, मुस्लिम यूथ ब्रदर्स उत्तर प्रदेश, जेआईएच, सोशलिस्ट पार्टी (इण्डिया) आदि सामाजिक-राजनीतिक संगठनों ने विवादास्पद नागरिकता संशोधन अधिनियम (Controversial Citizenship Amendment Act) के खिलाफ लखनऊ में अम्बेडकर प्रतिमा, हजरतगंज पर धरना दिया। संविधान के विपरीत जाकर इस विधेयक के जरिए भाजपा सरकार देश का विभाजन करने पर उतारू है। सर्वसम्मति से तय किया गया कि राष्ट्रीय स्तर पर इसका विरोध किया जाएगा। इस बात पर भी सहमति बनी कि तमाम संगठन एकजुट होकर इसके खिलाफ जनता को लामबंद करेंगे।

Citizenship Amendment Bill weakening the federal structure

वक्ताओं ने कहा कि यह नागरिकता संशोधन विधेयक संघीय ढांचे को कमज़ोर करने वाला और महात्मा गांधी और बाबा साहब अम्बेडकर के सपनों को तोड़ने वाला है। यह विधेयक दो राष्ट्र के सिद्धांत वाली विघटनकारी, ब्राह्मणवादी और मनुवादी राजनीति के इसी सिद्धांत पर आधारित है। इससे पहले ऐसे ही षड़यंत्र के तहत बाबा साहब के महापरिनिर्वाण दिवस पर बाबरी मस्जिद को तोड़ा गया, जिसके चलते देश में बड़े पैमाने पर टकराव हुआ और लोग मारे गए। अब उसी दुष्चक्र को दोहराने की साजिश है। इसे संसद में पेश नहीं होना चाहिए। विपक्ष की ज़िम्मेदारी है कि वह इस विधेयक को सदन में किसी भी हालत में पारित न होने दे, वरना देश नए तरह के विभाजन की तरफ बढ़ेगा। जिस तरह लगातार संविधान संशोधन की प्रक्रिया चल रही है उससे न केवल संविधान का मूल रूप बदल रहा है बल्कि उसके कई प्रावधानों की प्रासंगिकता ही खत्म होने की तरफ है। देश की ऐसी विकृत तस्वीर उभर रही है जिसमें सह अस्तित्व और सहिष्णुता के लिए कोई स्थान नहीं।

The Citizenship Amendment Bill will increase the horrific picture of 1947 also

वक्ताओं ने आगाह किया कि इससे 1947 से भी भयावह तस्वीर उभरेगी। जो पीढ़ियों से एक साथ रहे हैं उनको बेदखल किया जाएगा। यह राजनीतिक तौर पर मुसलमानों के लिए तो खतरा है ही लेकिन उससे बड़ा खतरा आदिवासी, ओबीसी, दलित, महिलाओं और बच्चों के लिए होगा। नागरिकता का मतलब केवल किसी रजिस्टर में नाम लिख लेने भर से नहीं है। इसका मतलब होता है प्रत्येक नागरिक को शिक्षा और रोज़गार देना, सुरक्षा और सम्मानजनक जीवन की गारंटी देना, मौलिक अधिकारों को सुनिश्चित करना। सरकार इन बिंदुओं पर पूरी तरह असफल है। यह सरकार न तो देश में धर्म और जाति के नाम पर लिंचिंग को रोक पा रही है और न ही महिलाओं को सुरक्षा दे पा रही है। महिलाओं को डायन बताकर मार डाला जा रहा है। लगातार बलात्कार और महिलाओं के साथ अभद्रता के चलते देश महिला उत्पीड़न के लिए विश्व का सबसे खतरनाक देश बन गया है। ज़रूरत इस बात की थी कि इन दिशाओं में काम किया जाता लेकिन हर मोर्चे पर विफल सरकार नागरिकता विधेयक जैसे विभाजनकारी मुद्दों में शरण ढूंढ रही है। ऐसा नहीं होने दिया जाएगा।

जनजुटाव में रिहाई मंच अध्यक्ष मुहम्मद शुऐब, जन मंच के संयोजक पूर्व आईपीएस एसआर दारापुरी, सृजनयोगी आदियोग, गोपाल राय, जैद अहमद फारूकी, नितिन राज, गोलू यादव, शिवा रजवार, आयुष श्रीवास्तव, मोहमद नफीस, ओम प्रकाश भारती, तन्मय, रुबीना, अजय शर्मा, बांकेलाल, आंनद सिंह, राजीव गुप्ता, राम संजीवन, वीरेंद्र गुप्ता, अयान गाज़ी, अहमद उल्ला, मोहम्मद ज़हीर आलम फलाही, मोहम्मद साबिर खान, नमिता जैन, एफ मुसन्ना, नाहीद अकील, शिवाजी राय, शाह आलम, इमरान अहमद, सचेंद्र प्रताप यादव, अब्दुल हजीज़ गांधी, अभिनव, आलम हुसैन, अब्सर आलम, हाफ़िज़ वारी, केके शुक्ला, प्रदीप पांडेय, अंकुश यादव, एमडी खान, एम राशिद खान, प्रयान शर्मा, जेडए खान, वीरेंद्र त्रिपाठी, नीलम भारती, दुर्गेश रावत, जैनब, आशीष, हफीज किदवई, इरफान अली, रुकैया, एम अनिल, मानस गुप्ता, गौरव सिंह, अहमद खान, सुरजीत रॉय अम्बेडकर आदि शामिल हुए।

 

झारखण्ड विधानसभा चुनाव : दूसरे चरण की 20 सीटें तय करेंगी, किसके सिर सजेगा मुख्यमंत्री का ताज

Politics

झारखण्ड विधानसभा चुनाव : दूसरे चरण की 20 सीटें तय करेंगी, किसके सिर सजेगा मुख्यमंत्री का ताज

रांची से शाहनवाज़ हसन, 05 दिसंबर 2019. झारखंड विधानसभा चुनाव के दूसरे चरण (Second phase of Jharkhand assembly election) में 20 सीटों पर सात दिसंबर को मतदान होना है। दूसरे चरण में विभिन्न दलों के 260 उम्मीदवार चुनाव मैदान में हैं।

दूसरे चरण की 20 सीटें तय करेंगी किसके सिर सजेगा मुख्यमंत्री का ताज

दूसरे चरण के मतदान में देश भर की निगाह कोल्हान प्रमंडल पर टिकी है। दूसरे चरण के चुनाव में जमशेदपुर पूर्वी विधानसभा सीट (Jamshedpur Eastern Assembly Seat) से झारखण्ड के मुख्यमंत्री रघुवर दास को उनके ही काबिना मंत्री रहे सरयू राय से सीधे मुकाबले में कड़ी टक्कर दे रहे हैं, हालांकि कांग्रेस और झाविमो ने भी इस सीट से उम्मीदवार दिया है, फिर भी यह चुनाव सीधे मुकाबले की ओर बढ़ता दिखायी दे रहा है।

जमशेदपुर पश्चिम सीट (Jamshedpur West Seat) पर कांग्रेस के पूर्व मंत्री बन्ना गुप्ता का सीधा मुकाबला भाजपा के देवेंद्र सिंह से है, जमशेदपुर पूर्वी सीट से असद्दुदीन ओवैसी की पार्टी AIMIM एवं आम आदमी पार्टी ने भी उम्मीदवार दिया है।

ईचागढ़ विधानसभा क्षेत्र से इस बार 4 मज़बूत कुर्मी उम्मीदवार के मैदान में होने से पूर्व विधायक अरविंद सिंह मलखान की स्थिति बेहतर नज़र आ रही है।

ईचागढ़ का चुनाव विस्थापितों के मुद्दों को लेकर काफ़ी दिलचस्प हो गया है। निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में अरविंद सिंह मस्तान की सभा मे बिना किसी स्टार प्रचारक एवं नाच गाने के लोगों की भारी भीड़ देखने को मिल रही है।

चाईबासा सीट पर भाजपा पूर्व नौकरशाह प्रदेश प्रवक्ता जे बी तुबिद को पुनः टिकट देकर पहली बार जीत दर्ज करने के लिये प्रयासरत है हालांकि वर्तमान झामुमो विधायक दीपक बिरुवा भी मजबूत स्थिति में हैं।

जुगसलाई विधानसभा सीट पर त्रिकोणीय मुकाबले में झामुमो के मंगल कालिंदी मज़बूत स्थिति में दिखायी दे रहे हैं, वहीं बहरागोड़ा विधानसभा सीट पर झामुमो से भाजपा में शामिल हुये कुणाल सारंगी का मुकाबला समीर महांती से है। दोनों के बीच नज़दीकी मुकाबला देखने को मिल रहा है।

पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा एवं उनकी पत्नी चाईबासा सांसद गीता कोड़ा पश्चिम सिंहभूम की दो सीटों पर कांग्रेस की जीत के लिये दिन रात मेहनत कर रहे हैं हालांकि कांग्रेस के स्टार प्रचारकों ने अब तक इन क्षेत्रों की अब तक कोई सुध नहीं ली है।

घाटशिला विधानसभा सीट से कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष प्रदीप बालमुचू आजसू पार्टी से चुनावी मैदान में हैं। वर्तमान भाजपा विधायक लक्ष्मण टुड्डू का टिकट कटने पर इस सीट पर त्रिकोणीय मुकाबले में झामुमो के पूर्व विधायक रामदास सोरेन मज़बूत स्थिति में दिखाई दे रहे हैं।

कोल्हान में भाजपा और झामुमो के बीच कांटे की टक्कर है, राजनीतिक विशेषज्ञ कोल्हान में झामुमो को मज़बूत बता रहे हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एवं गृहमंत्री अमित शाह की जनसभा में लोगों की कम भीड़ का होना चर्चा का विषय बना हुआ है।

कांग्रेस ने जारी किया भाजपा की केन्द्र सरकार के किसान विरोधी रवैये का सबूत

Shailesh Nitin Trivedi

कांग्रेस ने जारी किया भाजपा की केन्द्र सरकार के किसान विरोधी रवैये का सबूत

भाजपा को किसानों से कोई हमदर्दी नहीं : कांग्रेस

भाजपा को किसानों से हमदर्दी होती तो 2500 रू. में धान खरीदी न रोकने के लिये अपनी केन्द्र सरकार को कहती

Congress released evidence of anti-farmer attitude of the BJP’s central government

रायपुर/04 दिसंबर 2019। भाजपा के किसान विरोधी रवैये (BJP’s anti-farmer attitude) पर कड़ा प्रहार करते हुये प्रदेश कांग्रेस के महामंत्री एवं संचार विभाग के अध्यक्ष शैलेश नितिन त्रिवेदी ने कहा है कि भाजपा को किसानों से कोई हमदर्दी नहीं। भाजपा को हमदर्दी होती तो अपनी केन्द्र सरकार को कहती कि 2500 रू. में धान खरीदी पर रोक न लगायें। हल्ला बोलना है तो रमन सिंह और धरमलाल कौशिक दिल्ली जाकर हल्ला बोलें, जहां भाजपा की केन्द्र सरकार किसानों को 2500 रू. धान का दाम देने से छत्तीसगढ़ की सरकार को रोकने के लिये चिट्ठियां लिख रही है एमओयू कर रही है दबाव डाल रही है।

त्रिवेदी ने कहा है कि रमन सिंह और भाजपा के नेताओं ने किसानों को धान बेचने से रोकने की भरपूर कोशिश की। भाजपा नेताओं ने किसानों के लिये 2500 रू. की मांग की है। भाजपा की केन्द्र सरकार कांग्रेस की राज्य सरकार को चिट्ठी लिखती है कि किसानों को 2500 रू. दाम न दिया जाये। यदि छत्तीसगढ़ सरकार 2500 रू. देगी तो छत्तीसगढ़ के किसानों के धान से बना चावल (Rice made from rice of farmers of Chhattisgarh) सेन्ट्रल पूल (Central pool) में नहीं लिया जायेगा। ये तो सीधे-सीधे भारतीय जनता पार्टी का दोहरा आचरण है। भाजपा की मोदी की केन्द्र सरकार 2500 रू. देने पर रोक लगा रही है और यहां के भाजपा नेता 2500 रू. देने की मांग कर रहे हैं। अगर रमन सिंह जी वाकई किसानों को 2500 रू. दिलाना चाहते है तो रमन सिंह जी को दिल्ली जाकर मांग करना चाहिये।

कांग्रेस नेता ने कहा कि रमन सिंह जी को जंतर-मंतर में मोदी सरकार से अमित शाह, रामविलास पासवान जी से मांग करना चाहिये कि छत्तीसगढ़ की सरकार को 2500 रू. में धान खरीदी करने से न रोका जाये। 2500 रू. में धान खरीदी में कोई रोकटोक भाजपा की केन्द्र सरकार के द्वारा न लगायी जाये।

उन्होंने कहा कि रमन सिंह जी नगपुरा जैसी जगहों में जाकर अपनी मेहनत और ऊर्जा व्यर्थ बर्बाद कर रहे हैं। पूरे छत्तीसगढ़ सहित नगपुरा के किसानों ने भारतीय जनता पार्टी को रमन सिंह जी को रिजेक्ट कर दिया। नगपुरा में 1816 किसानों ने अपना धान उसी दिन बेचा है, जिस दिन रमन सिंह वहां गए थे। प्रदेश के किसानों को भूपेश बघेल जी की सरकार पर पूरा भरोसा है, विश्वास है। ऐसा ही विश्वास पिछले साल भी था, जब 1750 रू. में रमन सिंह सरकार धान खरीदी कर रही थी। कांग्रेस की सरकार बनने के बाद 1750 रू. और 2500 रू. की बीच की अंतर की राशि है वो कांग्रेस की सरकार ने मुख्यमंत्री किसानों को दी है। कर्ज जिन किसानों से पटा लिया गया, ले लिया गया, उनका धान जमा कर लिया गया तो उन किसानों को कर्जमाफी की राशि अलग से भूपेश बघेल की सरकार ने दी। इस बार भी भाजपा सरकार ने 1815 रू. और 1835 रू. और भूपेश बघेल सरकार की 2500 रू. के अंतर की राशि किसानों को उसी तरह निश्चित रूप से दी जायेगी जैसे भूपेश बघेल सरकार ने धान के अंतर की राशि 2018 में और कर्जमाफी की राशि दी थी। कांग्रेस की सरकार किसानों की सरकार और छत्तीसगढ़ की सरकार है।

कांग्रेस के आरोपों और भाजपा के किसान विरोधी रवैये का सबूत जारी करते हुये प्रदेश कांग्रेस के महामंत्री एवं संचार विभाग के अध्यक्ष शैलेश नितिन त्रिवेदी ने कहा है कि 24 अक्टूबर का पत्र रविकांत सचिव भारत सरकार सेंट्रल पूल में राज्य की जरूरतों के मुताबिक ही प्रोक्योरमेंट करती, यानी कोई चावल खरीदी करती ही नहीं, जो रमन सरकार में होती थी। भाजपा के मोदी सरकार द्वारा कारण बता रहे हैं कि चावल के सेंट्रल पूल का स्टाक बंफर से अधिक है। इसी पत्र से खुलासा हो रहा है कि भाजपा की केन्द्र सरकार के मुताबिक किसानों को केन्द्र सरकार द्वारा घोषित समर्थन मूल्य से अधिक राशि देने से अनाज के बाजार मूल्य में वृद्धि होती है और फसल चक्र में दीगर फसलों की उपेक्षा होती है। भाजपा की केन्द्र सरकार जानबूझकर और छत्तीसगढ़ के भाजपा नेता राज्य सरकार की आर्थिक स्थिति खराब करने की साजिश में संलिप्त है। यही कारण है कि राज्य की आर्थिक स्थिति खराब नहीं होने के बावजूद भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रमन सिंह जी बार-बार कह रहे हैं कि राज्य की आर्थिक स्थिति खराब है।

नागरिकता संशोधन विधेयक संविधान की मूल भावना के खिलाफ- रिहाई मंच

Rihai Manch

नागरिकता संशोधन विधेयक संविधान की मूल भावना के खिलाफ- रिहाई मंच

Citizenship Amendment Bill against the basic spirit of the Constitution – Rihai Manch

5 दिसम्बर को 3 बजे अम्बेडकर प्रतिमा हज़रतगंज पर संशोधन विधेयक के खिलाफ जनता की एकजुटता

लखनऊ, 4 दिसम्बर 2019। रिहाई मंच कार्यालय पर हुई बैठक में भाजपा सरकार द्वारा कैबिनेट में पारित नागरिकता संशोधन विधेयक *( Citizenship Amendment Bill) को संविधान विरोधी करार दिया. तय किया गया कि देश के सेकुलर ढांचे और मिजाज़ को रौंदने की गरज से पेश इस विधेयक के खिलाफ 5 दिसंबर 2019, बृहस्पतिवार को शाम 3 बजे से अम्बेडकर प्रतिमा हजरतगंज लखनऊ पर एकजुटता का प्रदर्शन होगा.

वक्ताओं ने केंद्र सरकार द्वारा विवादित नागरिकता संशोधन अधिनियम 2016 संसद में पेश (Citizenship Amendment Act 2016 introduced in Parliament) किए जाने का कड़ा विरोध करते हुए तमाम विपक्षी दलों से अपील की कि वे सुनिश्चित करें कि यह संशोधन विधेयक राज्य सभा में पारित नहीं होने पाए।

खबरों के अनुसार केंद्र सरकार 10 दिसम्बर से पहले किसी भी दिन इसे राज्य सभा में पेश कर सकती है।

वक्ताओं ने कहा कि यह संशोधन विधेयक जनता की भावनाओं के विपरीत है और देश के तमाम हिस्सों से इसके खिलाफ आवाज़ उठ रही है। यह संशोधन विधेयक साम्प्रदायिक, भेदभावपूर्ण, असंवैधानिक है और जो देश की अधिसंख्य आबादी को नागरिकता से बेदखल करने की साजिश है। इसके निशाने पर हैं मुसलमान, आदिवासी, महिला, भूमिहीन और मज़दूर। इसके प्रावधानों के अनुसार एनआरसी से बाहर रह गए लोगों को नागरिकता के लिए आवेदन करने से पहले लिखित देना होगा कि वे पाकिस्तान, अफग़ानिस्ता या बांग्लादेश के निवासी थे और वहां प्रताड़ित किए जाने के कारण पलायन करके भारत आ गए थे। इस तरह गरीब, मज़दूर, दलित, आदिवासी जो इस देश के मूल निवासी हैं उनको विधिवत विदेशी शराणार्थी घोषित किया जाएगा उसके बाद नागरिकता प्रदान की जाएगी। यह संशोधन विधेयक न केवल मूल निवासी गरीब जनता के लिए अपमानजनक है बल्कि इस तरह से उन्हें आरक्षण, छात्रवृत्ति आदि कई सुविधाओं और अधिकारों से वंचित करने की साजिश है।

वक्ताओं ने आरोप लगाया कि साम्प्रदायिकता के आवरण में यह संशोधन विधेयक वास्तव में देश पर मनुवादी व्यवस्था थोपने का बड़ा षणयंत्र है और इसके खिलाफ अभियान चलाया जाएगा। यह अभियान केवल सरकार की ष[]यंत्रकारी चालों के विरुद्ध ही नहीं बल्कि उन विपक्षी दलों के खिलाफ भी होगा जो इस मनुवादी साज़िश में सरकार के साथ खड़े होंगे।

रिहाई मंच ने राज्य सभा में सदस्यता रखने वाले सभी विपक्षी दलों से अपील की है कि वे विवादित नागरिकता संशोधन विधेयक राज्य सभा में पेश किए जाने के समय डट कर इसका उच्च सदन में विरोध करें और बिना वॉकआउट किए या गैर हाजिर रहे इसे पारित होने से रोकने का अपना संवैधानिक दायित्व निभाएं।

बैठक में जन संगठनों से भी अपील की गई कि वे अपने कार्यक्षेत्र में विवादित विधेयक के खिलाफ जनता में जागरूकता पैदा करें।

बैठक में रिहाई मंच अध्यक्ष मुहम्मद शुऐब, राम कृष्ण, आदियोग, डा. एम डी खान, मुहम्मद शकील कुरैशी, खालिद, नज्मुससाकिब खान, अजय शर्मा, गंगेश, इमरान अहमद, बाके लाल, अयान गाजी, सचेन्द्र यादव, औरंगजेब खान, साजिद खान, गोलू यादव, राजीव यादव, रॉबिन वर्मा, गुफरान सिद्दीकी आदि लोग शामिल रहे.

माले छह दिसंबर को जिला मुख्यालयों पर प्रदर्शन करेगी

CPI ML

माले छह दिसंबर को जिला मुख्यालयों पर प्रदर्शन करेगी

CPI (ML) to demonstrate on 6 Dec at district headquarters

भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के आलोक में बाबरी मस्जिद विध्वंस के दोषियों को अविलंब दण्डित करने की मांग उठाएगी

The Communist Party of India (Marxist-Leninist) will raise the demand for punishing the culprits of Babri Masjid demolition without any delay in the light of the Supreme Court verdict.

लखनऊ, 4 दिसंबर। भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) सर्वोच्च न्यायालय के अयोध्या विवाद पर फैसले के आलोक में बाबरी मस्जिद विध्वंस के दोषियों को बिना और देरी किये दण्डित करने की मांग को लेकर छह दिसंबर को देशव्यापी प्रदर्शन करेगी। यह प्रदर्शन जिला मुख्यालयों पर होगा।

पार्टी के राज्य सचिव सुधाकर यादव ने बुधवार को यह जानकारी देते हुए कहा कि अपने फैसले में उच्चतम न्यायालय ने 1992 में बाबरी मस्जिद के जबरिया विध्वंस को स्पष्ट रूप से गैरकानूनी और आपराधिक कार्रवाई करार दिया है। लिहाजा इसके दोषियों को कठोर सजा मिलनी ही चाहिए। उन्होंने कहा कि लेकिन संघ-भाजपा सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बहाने विध्वंस को वैधता प्रदान करने और केंद्र सरकार फैसले में निहित इस महत्वपूर्ण बात को दबा देने की कोशिश में लगी है।

माले नेता ने कहा कि 27 साल बाद भी बाबरी मस्जिद विध्वंस के अपराधियों को सजा नहीं मिल पायी है। यह बहुत लम्बा अंतराल है। जिन सैकड़ों परिवारों ने बाबरी विध्वंस के बाद हुए अनेकों दंगों में अपने चहेतों को हमेशा के लिए खो दिया और जो लाखों परिवार आज भी उन दंगों के दंश से उबर नहीं पाये हैं, उनके लिए तो यह एक अनंत त्रासदी की तरह है ही। हमारे समाज की गंगा-जमुनी संस्कृति व सामाजिक सौहार्द के लिए भी जरूरी है कि सत्य और न्याय की जीत हो।

राज्य सचिव ने कहा कि विध्वंस के आरोपियों के खिलाफ मुकदमा सीबीआई की लखनऊ की विशेष अदालत में चल रहा है।

उन्होंने न्यायहित में अपील की कि सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के अनुरूप बाबरी मस्जिद विध्वंस के अपराधियों को सजा सुनाने में देरी नहीं करनी चाहिये.

माले नेता ने कहा कि यह पूरा देश जानता है कि बाबरी मस्जिद गिराने के आपराधिक कृत्‍य में कौन-कौन शामिल थे। इस कृत्‍य से भारत के लोकतांत्रिक धर्मनिरपेक्ष स्वरूप पर हमला किया गया। उन्होंने कहा कि ऐसे भी बहुत से नाम हैं जो उक्त मुकदमे की चार्जशीट में शामिल नहीं हैं, लेकिन ऐसे व्यक्ति खुद कर्इ बार स्वयं सार्वजनिक रूप से बता चुके हैं कि वे भी बाबरी मस्जिद गिराने में शामिल थे।

माले नेता ने कहा कि ऐसे सभी व्‍यक्तियों को भी सजा का भागीदार होना चाहिए। जैसे कि भाजपा सांसद साक्षी महाराज इस मुकदमे में नामजद अभियुक्त हैं, वहीं नाथूराम गोडसे की पूजा करने वाली सांसद प्रज्ञा ठाकुर सावर्जनिक रूप से खुद बताती रही हैं कि बाबरी मस्जिद को गिराने में वह शामिल थीं। न्याय के हित में इन दोनों सांसदों को तत्काल संसद से बर्खास्त किया जाना चाहिए।

नाइट्रोजन युक्त वातावरण में संरक्षित भारत का हस्तलिखित संविधान

Original handwritten copy of the Constitution of India, Handwritten Constitution of India preserved in the Library of Parliament.

नाइट्रोजन युक्त वातावरण में संरक्षित भारत का हस्तलिखित संविधान

Handwritten constitution of India preserved in nitrogen-rich atmosphere

नई दिल्ली, 02 दिसंबर 2019 : करीब 70 साल पहले 26 नवंबर 1949 को स्वतंत्र भारत में भारतीय संविधान को अपनाया गया था और तभी से इस दिन को संविधान दिवस (Constitution Day) के रूप में मनाया जाता है। संविधान को अपनाए जाने के दो महीने बाद 26 जनवरी 1950 को इसे लागू किया गया। वर्ष 1980 में महसूस किया गया कि संसद के पुस्तकालय में रखे अंग्रेजी और हिंदी के मूल हस्तलिखित संविधान की प्रतियों को लंबे समय तक सुरक्षित बनाए रखने के लिए नए सिरे से प्रयास करने की जरूरत है। ऐसे में, इस ऐतिहासिक दस्तावेज के दीर्घकालीन संरक्षण के लिए उपयुक्त वैज्ञानिक विधियों की तलाश की जाने लगी।

Original handwritten copy of the Constitution of India

इसी क्रम में संसद के पुस्तकालय की ओर से नई दिल्ली स्थित वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान की राष्ट्रीय भौतिक प्रयोगशाला (एनपीएल) से संपर्क किया गया और विचार किया गया कि कांच के विशेष बक्सों में रखकर संविधान की प्रतियों को सुरक्षित रखा जा सकता है। एनपीएल के वैज्ञानिकों ने इस चुनौती से निपटने के लिए संविधान की मूल हस्तलिखित प्रतियों को नाइट्रोजन गैस से भरे वायु-रोधी कांच के बक्से में रखने का सुझाव दिया।

संसद पुस्तकालय में संरक्षित भारत का हस्तलिखित संविधान

यह माना जा रहा था कि वायु-रोधी नाइट्रजोन से भरे बक्से में प्रदूषण, धूल कणों और सूक्ष्मजीवों के कारण होने वाले क्षरण से संविधान की हस्तलिखित दोनों प्रतियों को सुरक्षित रखा जा सकता है। जितना आसान इस काम को समझा जा रहा था यह उतना सरल नहीं था, क्योंकि नाइट्रोजन आसानी से लीक हो जाती है। वायुमंडल की गैसों में सर्वाधिक 78 प्रतिशत मात्रा में पायी जाने वाली नाइट्रोजन रंगहीन, गंधहीन और स्वादहीन गैस है। रासायनिक रूप से निष्क्रिय तत्व नाइट्रोजन साधारण ताप पर न तो जलती है और न ही अन्य धातुओं से यौगिक बनाती है।

एनपीएल के वर्तमान निदेशक डॉ डी.के. असवाल ने शोध पत्रिका करंट साइंस में प्रकाशित अपने एक आलेख में बताया है कि

“इस ऐतिहासिक दस्तावेज को संरक्षित रखने के लिए एक ऐसी सीलिंग सामग्री विकसित करने की जरूरत महसूत की गई, जिससे नाइट्रोजन कांच के पारदर्शी बक्से से बाहर न आ सके और बाहरी वातावरण से प्रदूषण, नमी या फिर सूक्ष्मजीव भीतर न प्रवेश कर सकें।”

वर्ष 1988-89 में एनपीएल ने टेम्पर्ड ग्लास और एक खास सीलिंग सामग्री का उपयोग करके इस तरह के बक्से बनाने प्रयास किया। हालांकि, इन बक्सों को स्वीकार्यता नहीं मिल सकी क्योंकि उनमें लगी सीलिंग सामग्री का लंबे समय तक स्थायी बने रहने को लेकर वैज्ञानिक आश्वस्त नहीं थे।

एनपीएल के वैज्ञानिक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के संपर्क में बने रहे ताकि वायु-रोधी बक्सों के लिए सीलिंग सामग्री विकसित की जा सके। एनपीएल के वैज्ञानिक हरि कृष्ण ने वर्ष 1992-93 में फ्रांस की राजधानी पेरिस का दौरा किया, जो अपने अनूठे संग्राहलयों के लिए जाना जाता है। इन संग्रहालयों में ऐतिहासिक महत्व की वस्तुओं को बेहतरीन ढंग से संजोकर रखा गया है। इस दौरान, फ्रांस में कांच बनाने वाली कंपनी सेंट गोबेन से भी बात की गई।

वैज्ञानिकों को आभास हो चुका था कि नाइट्रोजन को रोके रखने के लिए बक्से के मेटल फ्रेम और कांच के बीच लगने वाली सीलिंग सामग्री को बनाना बेहद चुनौतीपूर्ण है। सोल्डरिंग प्रक्रिया और ओ-रिंग्स से सील दो तरह के बक्से हरि कृष्ण बना सकते थे। लेकिन, उन बक्सों से भी टिकाऊ रूप से संविधान के संरक्षण के लिए आश्वस्त नहीं हुआ जा सकता था।

डॉ असवाल ने एक बातचीत में बताया कि

“फ्रांस के विशेषज्ञों ने अमेरिका के गेट्टी कन्जर्वेशन इंस्टीट्यूट से संपर्क करने का सुझाव दिया। इस संस्थान को सैकड़ों वर्ष पुरानी मिस्र की विश्व प्रसिद्ध ममी के संरक्षण के लिए जाना जाता है। पहली नजर में ममी को देखने पर लगता है कि उन्हें कांच के बक्से में संरक्षित किया गया है। पर, भीतर ममीज के ऊपर एक खास तरह की परत होती है, जो उनका क्षरण नहीं होने देती। इस तरह, नाट्रोजन गैस को रोके रकने का प्रावधान ममीज के कांच के बक्सों में भी नहीं था।”

नवंबर 1992 में एनपीएल ने गेट्टी कन्जर्वेशन इंस्टीट्यूट के निदेशक एम.कॉरजो से भारतीय संविधान को संरक्षित रखने के लिए खास वायु-रोधी बक्सों के निर्माण में सहयोग के लिए संपर्क किया। वह इस वायु-रोधी बक्सों के संयुक्त रूप से विकास के लिए तैयार हो गए। वर्ष 1993 में एनपीएल और गेट्टी इंस्टीट्यूट के बीच इससे संबंधित समझौता हो गया। समझौते के अनुसार, 96,250 घन सेंटीमीटर का 55 सेंटीमीटर चौड़े, 70 सेंटीमीटर लंबे और 25 सेंटीमीटर ऊंचे दो बक्से बनाने पर सहमति बनी।

यह भी निर्धारित किया गया कि नाट्रोजन युक्त वातावरण में 40-50 प्रतिशत सापेक्ष आर्द्रता में एक प्रतिशत से भी कम ऑक्सीजन की मात्रा में दस्तावेजों को रखा जाएगा। संसद पुस्तकालय में इन ऐतिहासिक दस्तावेजों को रखने एवं प्रदर्शित करने के लिए एक विशेष रूप से संरक्षित कक्ष बनाना निर्धारित किया गया। यह भी तय किया गया कि इस कक्ष में जलवायु को नियंत्रित रखने के लिए 20 ± 2° सेल्सियस तापमान और 30 ± 5% आर्द्रता पूरे वर्ष बनाए रखी जाएगी।

डॉ असवाल का कहना है कि

“इन बक्सों में नाइट्रोजन दस्तावेजों के कागज को सुरक्षित रखती है। बक्से के भीतर दबाव और तापमान का पता लगाने के लिए सेंसर लगाए गए हैं। बक्सों की क्षमता का एनपीएल और गेट्टी इंस्टीट्यूट में परीक्षण करने पर उन्हें उपयुक्त पाया गया है।”

इन बक्सों को अमेरिका में गेट्टी इंस्टीट्यूट में बनाकर भारत भेजा जाना था। भारत में इन बक्सों की स्थापना और परीक्षण का कार्य दोनों संस्थानों ने संयुक्त रूप से किया गया। अंततः वर्ष 1994 में बक्सों को संसद के पुस्तकालय में स्थापित कर दिया गया। बक्सों को वॉर्निश किए हुए सागौन के केबिनेट में स्टेनलेस स्टील के करीब एक मीटर ऊंचे स्टैंड पर अलग-अलग रखा गया है।

उमाशंकर मिश्र

(इंडिया साइंस वायर)

माकपा ने की मांग : सारकेगुड़ा कांड के दोषियों पर चलाओ हत्या का मुकदमा, भाजपा का असली चेहरा उजागर

CPIM

माकपा ने की मांग : सारकेगुड़ा कांड के दोषियों पर चलाओ हत्या का मुकदमा

भाजपा का असली चेहरा उजागर

रायपुर, 02 दिसंबर 2019. मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने वर्ष 2012 के जून में हुए सारकेगुड़ा जनसंहार (Sarkeguda massacre) में प्रत्यक्ष रूप से शामिल सैनिक बलों और पुलिस के जवानों तथा इसके लिए जिम्मेदार उच्च  अधिकारियों को बर्खास्त कर उन पर हत्या का मुकदमा चलाने की मांग की (Sought to prosecute murder) है।

पार्टी ने यह भी मांग की है कि इस हत्याकांड का नक्सली मुठभेड़ (Naxalite encounter) के रूप में फ़र्ज़ीकरण करने के लिए जिम्मेदार केंद्र और राज्य की सरकार छत्तीसगढ़ की जनता विशेषकर बस्तर के आदिवासी समुदाय से माफी मांगे।

आज यहां जारी एक बयान में माकपा राज्य सचिवमंडल ने कहा है कि इस हत्याकांड की न्यायिक जांच की रिपोर्ट सामने आने के बाद भाजपा और उसकी तत्कालीन राज्य सरकार का आदिवासीविरोधी चेहरा खुलकर सामने आ गया है। यह हत्याकांड आदिवासियों के खिलाफ राज्य प्रायोजित दमन और ‘सलवा जुड़ूम’ अभियान की सोची-समझी साजिश का हिस्सा था।

माकपा राज्य सचिव संजय पराते ने पीड़ित आदिवासी परिवारों को 50-50 लाख रुपये मुआवजा देने की मांग करते हुए टिप्पणी की है कि 2012 की घटना की 7 साल बाद रिपोर्ट आना और दोषियों के लिए अब भी सजा का इंतज़ार करना प्राकृतिक संसाधनों की लूट के खिलाफ संघर्ष कर रहे आदिवासी समुदायों के लिए ‘न्याय पाने के लिए अंतहीन इंतजार करना’ है। इस स्थिति को स्वीकार नहीं किया जा सकता।

माकपा नेता ने कहा कि राज्य में सत्ताबदल के बाद भी प्रशासन के आदिवासीविरोधी रवैये में कोई बदलाव नहीं आया है, क्योंकि कांग्रेस सरकार भी भाजपा की कॉरपोरेटपरस्त नीतियों को ही आगे बढ़ा रही है।

उन्होंने कहा है कि यदि कांग्रेस आदिवासियों की समस्याओं के प्रति वास्तव में संवेदनशील हैं, तो वनाधिकार कानून, पेसा एक्ट और 5वीं अनुसूची के प्रावधानों को सही तरीके से लागू करें, ताकि उनके साथ सदियों से जारी ‘ऐतिहासिक अन्याय’ को दूर किया जा सके।

#Breaking : मोदी के सांसद ने कहा, वित्त मंत्री सीतारमण अर्थशास्त्र नहीं जानतीं… दिन की शीर्ष सुर्खियाँ

Breaking news

मोदी के सांसद ने कहा, वित्त मंत्री सीतारमण अर्थशास्त्र नहीं जानतीं… दिन की शीर्ष सुर्खियाँ

सीतारमण अर्थशास्त्र नहीं जानती हैं : सुब्रमण्यम स्वामी

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण पर तीखे हमले में, भाजपा के वरिष्ठ नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने कहा है, “वह अर्थशास्त्र नहीं जानती हैं”।

राहुल गांधी सोमवार को झारखंड में पहली रैली करेंगे

पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी सोमवार को सिमडेगा जिले में एक रैली के साथ, चल रहे झारखंड विधानसभा चुनावों में अपने अभियान की शुरुआत करने के लिए तैयार हैं।

महाराष्ट्र विधानसभा में मी पुनः येईनने हास्य बिखेरा

महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री और विपक्ष के नए नेता देवेंद्र फड़नवीस की प्रसिद्ध पूर्व-चुनाव भविष्यवाणी “Mee punha yaeen, मी पुनः येईन, मी पुनः येईन (मैं लौटूंगा!)” ने विधानसभा के विशेष सत्र में अपनी फजीहत को हवा दी। स्प्लिट्स में ट्रेजरी और विपक्षी बेंच दोनों पर सदस्यों ने मजे लिए।

कांग्रेस ने मोबाइल टैरिफ बढ़ोतरी पर सरकार की खिंचाई की

सेलफोन कंपनियों द्वारा घोषित मोबाइल डेटा और कॉल शुल्क में वृद्धि के लिए कांग्रेस ने सरकार को फटकार लगाई है।

6 साल की बच्ची के साथ बलात्कार, उसकी स्कूल बेल्ट से गला दबाकर हत्या

मीडिया रिपोर्ट्स मे पुलिस ने बताया है कि राजथान के टोंक जिले में शनिवार को लापता हुई छह वर्षीय एक छात्रा के साथ कथित रूप से बलात्कार किया गया और उसकी अपने स्कूल बेल्ट से गला दबाकर हत्या कर दी गई।

ट्विटर यूजर्स ने वर्ल्ड एड्स डे मनाया

रविवार को विश्व एड्स दिवस मनाया गया, जिसमें हस्तियों ने ट्वीट करके लोगों को यह याद दिलाने के लिए कहा कि अभी भी क्या करना है।

हैदराबाद रेप-मर्डर को लेकर ट्विटर पर हुआ गुस्सा

हैदराबाद के बाहरी इलाके में एक पशुचिकित्सक की गैंगरेप और हत्या के तीन दिन बाद भी, ट्विटर उपयोगकर्ताओं ने रविवार को अपराध पर अपना गुस्सा निकालना जारी रखा, बलात्कारियों के लिए मौत की मांग करते हुए और पुलिसकर्मियों के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग की।

केरल के पूर्व न्यायाधीश ने ड्रग्स पर टिप्पणी के लिए राज्य मंत्री की खिंचाई की

केरल उच्च न्यायालय के एक पूर्व न्यायाधीश ने रविवार को एक राज्य मंत्री द्वारा दिए गए बयान को मूर्खतापूर्ण बताते हुए कहा कि पुलिस को फिल्म की शूटिंग के स्थानों पर दवाओं की खोज के लिए शिकायत की आवश्यकता है।

कांग्रेस के पटोले महामंत्री के रूप में निर्विरोध चुने गए।

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता नाना एफ. पटोले को रविवार को महाराष्ट्र विधानसभा के 14 वें अध्यक्ष के रूप में निर्विरोध निर्वाचित घोषित किया गया।

रोहित शर्मा लारा के नाबाद 400 रन के रिकॉर्ड को तोड़ सकते हैं: वार्नर

ऑस्ट्रेलियाई सलामी बल्लेबाज डेविड वार्नर को लगता है कि रोहित शर्मा वेस्टइंडीज के दिग्गज ब्रायन लारा के टेस्ट मैच में नाबाद 400 रन के रिकॉर्ड को तोड़ सकते हैं।

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बहुसंख्यकवाद से फासीवाद की ओर बढ़ रहा है भारत, यह हमारे प्रजातंत्र के लिए एक बड़ी चुनौती : प्रो. प्रभात पटनायक

Prof. Prabhat Patnaik SPEAKING AT Dr. Asghar Ali Engineer Memorial Lecture ON Democracy versus Majoritarianism

बहुसंख्यकवाद से बहुसंख्यकों को नहीं होता कोई लाभ : प्रो. प्रभात पटनायक

Majoritarianism does not enhance rights or result in material benefits to the members of the majority community: Prof. Prabhat Patnaik

(‘प्रजातंत्र बनाम बहुसंख्यकवाद’ पर 13वें डॉ असग़र अली इंजीनियर स्मृति व्याख्यान पर रपट)

Report of 13th Dr. Asghar Ali Engineer Memorial Lecture: Democracy versus Majoritarianism

“प्रजातन्त्र का आस्तित्व बने रहने के लिए बहुसंख्यकवाद से मुक्ति आवश्यक है” (“The survival of democracy depends upon the getting rid of majoritarianism”).

यह बात विख्यात मार्क्सवादी अर्थशास्त्री और लेखक प्रो. प्रभात पटनायक ने 18 नवम्बर 2019 को दिल्ली के जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय में आयोजित 13वें डॉ असग़र अली इंजीनियर स्मृति व्याख्यान में अपने मुख्य वक्तव्य में कही.

विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान विभाग के सहयोग से सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ़ सोसाइटी एंड सेकुलरिज्म (सीएसएसएस) द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम की अध्यक्षता जाने-माने राजनीति विज्ञानी प्रो. राजीव भार्गव ने की. व्याख्यान में लगभग 200 विद्यार्थियों सहित, शिक्षाविद, पत्रकार, अध्येता और नागरिक समाज संगठनों के प्रतिनिधि उपस्थित थे. विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान विभाग के अध्यक्ष प्रो. फुरकान अहमद ने सभी अतिथियों का स्वागत किया. इनमें मणिशंकर अय्यर, प्रो. ज़ोया हसन, नेशत कैसर और विजय प्रताप सिंह शामिल थे.

“प्रजातंत्र बनाम बहुसंख्यकवाद” विषय पर बोलते हुए प्रो. पटनायक ने अत्यंत सहज भाषा में भारत के वर्तमान राजनैतिक आख्यान की सारगर्भित विवेचना की. आज का भारत, बहुसंख्यक बनाम अल्पसंख्यक संघर्ष और उससे उद्भूत विघटनकारी राजनीति से ग्रस्त है.

पटनायक ने विस्तार से बताया कि किसी देश में बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक की परिकल्पना कैसे उपजती है और बहुसंख्यकवाद किस तरह अल्पसंख्यकों के अधिकारों को सीमित करने का प्रयास करता है. उन्होंने यह भी बताया कि बहुसंख्यकवाद के उभरने के पीछे क्या कारण होते हैं, कौन से कारक उसे बढ़ावा देते है, प्रजातंत्र पर उसके क्या दुष्प्रभाव होते हैं और उसका मुकाबला कैसे किया जाना चाहिए व किया जा सकता है. श्रोताओं ने प्रो. पटनायक के व्याख्यान का करतल ध्वनि से स्वागत किया क्योंकि वह न केवल विद्वतापूर्ण था वरन भारत की वर्तमान स्थिति के सन्दर्भ में अत्यंत प्रासंगिक भी था. आज के भारत में हम क्या देख रहे हैं? हम देख रहे हैं कि सामाजिक-राजनैतिक और आर्थिक सन्दर्भों में देश में बहुसंख्यकवाद, असहमति के प्रति असहिष्णुता, हिंसा और कमज़ोर वर्गों के बहिष्करण का बोलबाला है. उन्होंने न केवल बहुसंख्यक, अल्पसंख्यक और बहुसंख्यकवाद जैसे शब्दों के अर्थ की विवेचना की वरन उन्होंने बहुसंख्यकवाद पर लगाम लगाने के तरीको पर भी विस्तार से प्रकाश डाला.

अपने व्याख्यान की शुरुआत में प्रो. पटनायक ने बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक को परिभाषित करते हुए बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक की अनुभवजन्य धारणा और इनके ‘निर्मित किये गए’ अर्थों के बीच अन्तर को स्पष्ट किया.

निर्मित किए गए अर्थ स्वतःस्फूर्त नहीं होते. वे जानते-बूझते और योजनाबद्ध तरीके से गढ़े जाते हैं. अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक का यह राजनैतिक विभाजन इसलिए किया जाता है ताकि अल्पसंख्यकों के अधिकारों को सीमित किया जा सके. अल्पसंख्यकों के अधिकारों को इस आधार पर सीमित किया जाता है या उनका उल्लंघन किया जाता है कि ‘अल्पसंख्यकों’ ने कुछ ऐसे पाप किये हैं या कर रहे हैं, जिनका प्रतिशोध लेना आवश्यक है. प्रो. पटनायक के विश्लेषण का सच इससे स्पष्ट है कि आज देश में अल्पसंख्यकों का दानवीकरण किया जा रहा है और उनके खिलाफ जूनून भड़काया जा रहा है. और इसे इस आधार पर उचित ठहराया जा रहा है कि मुस्लिम शासकों ने तथाकथित रूप से हिन्दुओं पर अत्याचार किये थे और उनके साथ क्रूरतापूर्ण व्यव्हार किया था.

परन्तु क्या अल्पसंख्यकों के खिलाफ जुनून भड़काने और उन्हें नीचा दिखने के अभियानों से बहुसंख्यकों की स्थिति में कोई सुधार आता है?

क्या इससे बहुसंख्यकों को कोई ठोस लाभ मिलता है? कभी-कभी यह प्रश्न पूछने को जी चाहता है कि नफरत फैलाने के इस अभियान – जिसके कारण कई निर्दोष व्यक्तियों को अपनी जान खोनी पड़ी है और जो सामाजिक तानेबाने को ध्वस्त कर रहा है – का उद्देश्य आखिर क्या है? इस प्रश्न का उत्तर प्रो. पटनायक ने दिया. उनका तर्क था कि अल्पसंख्यकों के अधिकारों को सीमित करने से बहुसंख्यकों को कोई वास्तविक या भौतिक लाभ नहीं होता. इसके दो कारण हैं. पहला, रोज़गार या अन्य भौतिक लाभों से बहुसंख्यकवाद के पैरोकारों का कोई लेनादेना नहीं होता. और दूसरा, जिन अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर डाका डाला जाता है वे तो पहले से ही हाशियाकृत और वंचित होते हैं. अतः, उनके अधिकारों को सीमित करने से बहुसंख्यकों को नए अवसर नहीं मिलते. यह बिंदु इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि जिस आख्यान को आज बढ़ावा देने का प्रयास किया जा रहा  है वह यह है कि बहुसंख्यकों और अल्पसंख्यकों के हित परस्पर विरोधाभासी हैं और हमेशा से रहे हैं. प्रो. पटनायक ने एक अन्य गलतफहमी का खंडन करते हुए कहा कि बहुसंख्यकवाद का उद्देश्य अल्पसंख्यकों के विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग को उसके विशेषाधिकारों से वंचित करना होता है. प्रजातंत्र या सामाजिक न्याय को मजबूती देना बहुसंख्यकवाद के एजेंडे में कतई नहीं होता.

प्रो. पटनायक ने कहा कि यद्यपि बहुसंख्यकवाद, अल्पसंख्यकों के अधिकारों को सीमित करने की उसकी परियोजना को बहुसंख्यकों का समर्थन हासिल होने का दावा करता है परन्तु यथार्थ में उसे आवश्यक रूप से बहुसंख्यकों का समर्थन और सहयोग हासिल नहीं होता. परन्तु हमारी चुनाव प्रणाली में कुछ ऐसी कमियां हैं जो बहुसंख्यकवादी एजेंडे को विस्तार देने में मददगार साबित होतीं हैं. हमारे यहाँ वह पार्टी शासन करती है जिसे सबसे ज्यादा मत मिलते हैं ना कि वह जिसे मतदाताओं के बहुमत का समर्थन हासिल होता है. इसका उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि भाजपा को पिछले चुनाव में 38 प्रतिशत मत हासिल हुए थे परन्तु फिर भी वह सरकार बनाने में कामयाब रही.

इससे एक नया प्रश्न उपजता है. वह यह कि अगर बहुसंख्यकवाद को बहुसंख्यकों का समर्थन हासिल नहीं होता और ना ही मतदाताओं का बहुमत चुनावों में उसका साथ देता है तो फिर आखिर बहुसंख्यकवाद फलता-फूलता कैसे है. प्रो. पटनायक ने इस प्रश्न का उत्तर दो भागों में दिया. उनका कहना था कि बहुसंख्यकवाद, अनुकूल सामाजिक परिस्थितियों से उपजता है. वह परिस्थिति होती है आर्थिक संकट और इसकी जड़ अर्थव्यवस्था में होती है. उन्होंने कहा कि यद्यपि बहुसंख्यकवाद से बहुसंख्यकों को कोई भौतिक लाभ प्राप्त नहीं होता तथापि बेरोज़गारी और आर्थिक संकट उसके उदय के लिए उर्वर भूमि उपलब्ध करवाते हैं, विशेषकर यदि आर्थिक संकट के लिए अल्पसंख्यकों को ज़िम्मेदार ठहरा दिया जाये.

उन्होंने कहा कि कई अन्य चीज़ें भी बहुसंख्यकवाद के पनपने का कारण बनतीं हैं. हमारी चुनाव प्रणाली में कमियों की चर्चा पहले ही की चुकी है. इसके अतिरिक्त, जनता में व्याप्त डर और असुरक्षा का भाव भी बहुसंख्यकवाद को बढ़ावा देता है.

भय और असुरक्षा के भाव को पैदा करने के लिए विधि विरुद्ध क्रियाकलाप (निवारण) अधिनियम (यूएपीए) जैसे सख्त कानूनों का प्रयोग किया जाता है. इन कानूनों का लक्ष्य होता है असहमति को कुचलना और नागरिक और मानव अधिकारों की मांग करने वालों को चुप्पी साधने पर मजबूर करना.

इसका नतीजा यह हुआ है कि आज सार्वजनिक विमर्श में केवल एकपक्षीय आख्यानों का बोलबाला हो गया है. ये आख्यान अति-राष्ट्रवाद और अल्पसंख्यकों के दानवीकरण पर आधारित हैं. देशद्रोह से सम्बंधित कड़े कानूनों के डर से इन आख्यानों के विरुद्ध आवाज़ नहीं उठती. बहुसंख्यकवाद को बढ़ावा देने वाला एक अन्य कारक होता है उसे कॉर्पोरेट-आर्थिक कुलीनतंत्र का समर्थन. इस समर्थन से राजनैतिक दलों को ढेर सारा धन प्राप्त होता है. प्रो. पटनायक ने भाजपा का उदाहरण देते हुए कहा कि ऐसा कहा जाता है कि पिछले आम चुनाव में पार्टी ने लगभग 27,000 करोड़ रुपये खर्च किये, अर्थात हर लोकसभा क्षेत्र में औसतन 50 करोड़ रुपये. राजनैतिक दलों और कॉर्पोरेट घरानों का यह गठबंधन मीडिया पर भी नियंत्रण स्थापित कर लेता है. कुल मिलकर, राज्य पर उनका नियंत्रण स्थापित हो जाता है. इससे बहुसंख्यकवाद के एजेंडे को आगे बढ़ाना और आसान हो जाता है. इससे यह सुनिश्चित होता है कि कोई ऐसी सरकार शासन में आ ही न सके जो राज्य की शक्ति का प्रयोग बहुसंख्यकवाद का अंत करने के लिए करे.

प्रो. पटनायक के व्याख्यान का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा वह था जिसमें उन्होंने उन क़दमों का वर्णन किया जिनके ज़रिये जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में और स्तरों पर बहुसंख्यकवाद को नियंत्रित किया जा सकता है. यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह किसी भी प्रजातंत्र, विशेषकर भारतीय प्रजातंत्र, जो बहुसंख्यकवाद के चुनौती का मुकाबला कर रहा है, को आगे की राह दिखाता है. उनका पहला सुझाव यह था कि विभिन्न राजनैतिक दलों को सावधानीपूर्वक योजना बनाकर ऐसे दलों के साथ गठबंधन करना चाहिए जो प्रजातंत्र की रक्षा करने के लिए इच्छुक और तत्पर हों. इस गठबंधन में उन दलों को शामिल किया जा सकता है जो अप्रजातांत्रिक कार्यवाहियों जैसे सीबीआई और ईडी जैसी संस्थाओं के राजनैतिक उपयोग के विरुद्ध हों, देशद्रोह सम्बन्धी और अन्य ऐसे ही कानूनों को समाप्त करने, लिंचिंग आदि पर नियंत्रण करने के हामी हों. परन्तु उन्होंने चेतावनी देते हुआ कहा कि ये गठबंधन केवल चुनावों में जीत हासिल करने के लिए नहीं किये जाने चाहिए. संघर्ष, दरअसल, उस सोच के खिलाफ होना चाहिए जो बहुसंख्यकवाद को जन्म देती है.

इस सोच से मुकाबला करने के कई तरीके हैं. हमें देश को 1931 में आयोजित कराची कांग्रेस में पारित प्रस्ताव की याद दिलानी होगी. इस प्रस्ताव में नए भारत की परिकल्पना को स्पष्ट किया गया था. यह प्रस्ताव उपनिवेशवाद-विरोधी राष्ट्रवाद के साथ-साथ उस समावेशी राष्ट्रवाद की बात भी करता है, जिस पर स्वतंत्र भारत की नींव रखी जानी थी. यह राष्ट्रवाद इस अर्थ में समावेशी होता कि उसमें समाज के सभी वर्गों के लिए जगह होती, वह साम्राज्यवादी नहीं होता अर्थात उसका लक्ष्य देश के लोगों पर वर्चस्व कायम करना नहीं होता और वह राष्ट्र को लोगों से ऊपर नहीं रखता अर्थात लोगों की भलाई उसकी पहली प्राथमिकता होती. भारत को आज इसी राष्ट्रवाद की ज़रुरत है न कि युद्धोन्मादी राष्ट्रवाद की, जिसका आज देश में बोलबाला है.

बहुसंख्यकवाद की सोच से मुकाबला करने का एक अन्य तरीका है संविधान में प्रदत्त मूल अधिकारों को और व्यापक बनाकर उनमें आर्थिक अधिकारों को भी जगह देना. उन्होंने कहा कि वर्तमान में आर्थिक अधिकार, राज्य के नीति निदेशक तत्वों का हिस्सा हैं और उन्हें लागू करवाने के लिए कोई नागरिक न्यायपालिका की शरण में नहीं जा सकता. अम्बेडकर को उदृत करते हुए प्रो. पटनायक ने कहा कि आर्थिक प्रजातंत्र के बिना राजनैतिक प्रजातंत्र अधूरा है. इस कमी को दूर करने के लिए देश के हर नागरिक को एक न्यूनतम जीवनस्तर की गारंटी दी जानी चाहिए और इस अधिकार को न्यायालय के ज़रिये लागू करवाने का हक़ लोगों को दिया जाना चाहिए. उन्होंने कहा कि अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि आर्थिक अधिकारों को मूल अधिकारों में इसलिए शामिल नहीं किया जा सकता क्योंकि हमारे देश की अर्थव्यस्था इसके लिए ज़रूरी धन जुटाने में सक्षम नहीं है. परन्तु पटनायक का कहना था कि अर्थव्यस्था ऐसी होनी चाहिए जो पूंजीपतियों को लाभ पहुँचाने की बजाय, नागरिकों के कल्याण पर केन्द्रित हो.

प्रो. पटनायक ने कहा कि उन्होंने यह गणना की है कि पांच आर्थिक अधिकारों – भोजन का अधिकार, आजीविका का अधिकार, निशुल्क गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवा का अधिकार, कम से कम उच्चतर माध्यमिक स्तर तक निशुल्क गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का अधिकार और सभी नागरिकों को वृद्धावस्था और शारीरिक अशक्तता पेंशन का अधिकार – देश के सभी नागरिकों को देने के लिए वर्तमान में इन उद्देश्यों के लिए व्यय किये जा रहे धन के अतिरिक्त 11.76 लाख करोड़ रुपयों की ज़रुरत होगी. यह धनराशि देश के सबसे धनी एक प्रतिशत व्यक्तियों पर दो प्रतिशत संपत्ति कर और इन व्यक्तियों को विरासत में प्राप्त होने वाली सम्पति पर 33 प्रतिशत उत्तराधिकार कर लगाकर जुटाई जा सकती है. उनका तर्क था कि पूँजीवादी व्यवस्था में यह अपेक्षा की जाती है कि कोई भी व्यक्ति अपनी मेहनत और योग्यता से मुनाफा कमाएगा न कि विरासत में प्राप्त सम्पति का उपभोग करेगा. इसलिए, उत्तराधिकार पर कर लगाना न्यायोचित है.

अंत में, प्रो. पटनायक ने चेतावनी दी कि भारत, बहुसंख्यकवाद से फासीवाद की ओर बढ़ रहा है और यह हमारे प्रजातंत्र के लिए एक बड़ी चुनौती और खतरा है. भारत में प्रजातंत्र के जीवित रहने और फलने-फूलने के लिए यह ज़रूरी है कि हम समावेशी राष्ट्रवाद को अंगीकार करें ना कि हिन्दुत्वादी अति-राष्ट्रवाद को.

प्रो. राजीव भार्गव ने प्रो. पटनायक के विचारों की सराहना करते हुए कहा कि बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक की दो अवधारणाएं होती हैं – एक प्राथमिकता पर आधारित और दूसरी चुनावी गणित पर. अल्पसंख्यक हमेशा वह वर्ग नहीं होता जिसकी आबादी कम होती है. कभी-कभी अल्पसंख्यक वह वर्ग होता है जिसे राजनैतिक संस्कृति को आकार देने की शक्ति और उसके अधिकारों से वंचित किया जाता है. उन्होंने समतावाद पर आधारित सामुदायिक अधिकारों की स्थापना पर भी जोर दिया.

प्रो. पटनायक के विद्वतापूर्ण और विश्लेषणात्मक व्याख्यान की श्रोताओं ने भूरी-भूरी प्रशंसा की. उन्होंने भारत में बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक के अवधारणा का सूक्ष्म विश्लेषण किया और यह बताया कि बहुसंख्यकवाद किस तरह देश में प्रजातंत्र की जड़ों को कमज़ोर कर रहा है. बहुसंख्यकवाद की जड़ आर्थिक होने के उनके विचार का भी स्वागत हुआ. विशेषकर इसलिए क्योंकि आज भारत की अर्थव्यस्था में आ रही गिरावट लाखों लोगों को गरीबी के चंगुल में धकेल रही है. बहुसंख्यकवाद के खतरे से मुकाबला करने के जो उपाय उन्होंने सुझाये वे अनूठे और एक नए भारत के निर्माण के लिए प्रजातान्त्रिक मूल्यों को मजबूती देने वाले थे.

डॉ असग़र अली इंजीनियर स्मृति व्याख्यानमाला में इसके पहले रोमिला थापर, क्रिस्टोफर जेफ़रलॉ, अकील बिलग्रामी और सुखदेव थोराट जैसे उद्भट विद्वान अपने विचार प्रगट कर चुके हैं.

नेहा दाभाड़े

 (अंग्रेजी से अमरीश हरदेनिया द्वारा अनुदित)

जेएनयू या कश्मीर में नहीं झारखंड में बसते हैं सबसे अधिक देशद्रोही !

Jharkhand has the highest number of sedition cases

Jharkhand has the highest number of sedition cases.

रांची से आलोका कुजूर

2017 से 2019 तक झारखंड में सबसे अधिक देशद्रोह के मामले दर्ज हैं। यहां प्रशासन और सरकार से बात करने से मीडिया भी डरता है। लगातार दमन का दौर जारी है।

खूंटी का इलाका कभी कांग्रेस का गढ़ रहा। बिरसा मुण्डा के जल जंगल जमीन की लम्बी लड़ाई का जहां संघर्ष अब तक जीवित है, कोयलकारो नदी पर बिजली उत्पादन को लेकर बहुचर्चित आंदोलन भारत में विजय वाला आंदोलन माना जाता रहा है। साइंस सिटी, तजना डैम, छाता नदी के अलावा वहां माओवादियों का लम्बा संघर्ष का इतिहास रहा है।

मुण्डा समुदाय की घनी आबादी वाले इलाके में मुण्डा समुदाय लगातार चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार रहते हैं। भारत की आजादी से लेकर राजनीति संघर्ष में यह इलाका कभी पीछे नहीं रहा।

उधर सरकार ने इस आंदोलन को लेकर लगभग 30 हजार लोगों पर केस दर्ज किया है। सबसे गम्भीर बात यह है कि एक एफआईआर 99/18 में खूंटी थाना में केस हुआ है, जिसमें 10 गांव और एक अन्य एफआईआर में एक गांव के ऊपर कुल 11 गांवों के ऊपर देशद्रोह के दर्ज हैं। इसी एफआईआर में 37 मोटरसाइकिल के ऊपर भी देशद्रोह का केस दर्ज है।

खूंटी जिला के अन्तर्गत 3 थाना अडानी थाना, खूंटी थाना, मूरूहू थाना में कुल 23 केस हुए हैं। जिसमें हमने 14 एफआईआर की स्टडी कर पाया कि अज्ञात लगभग 10,015 लोगों के ऊपर केस है।

अनुमान लगा सकते हैं कि 11 गांव की आबादी यदि 1000 भी माने तब 11 हजार और अज्ञात 10015 को जोड़ दे 21 हजार 15 लोगों पर केस हैं जिसमें नामजद 193 लोगों के ऊपर देशद्रोह का केस है। ऐसे में 14 एफआईआर 2207+37 मोटरसाइकिल= 22,44 लोगों के ऊपर केस का प्रमाण है। यदि 23 एफआईआर की स्टडी की जाए तब यह आंकड़ा 30 हजार से अधिक होगा।।

हर दौर के दमन के लिए सरकार ने तरह-तरह के हथकण्डे अपनाए। पीएलएफआई, जीएलटी जैसे सरकार संरक्षित संगठनों को दमन को कुचलने के लिए बनाया गया।

2018 में मुण्डा आदिवासी अपनी परम्परागत संस्कृति का एक हिस्सा पत्थलगड़ी कार्यक्रम कर रहे थे। यह कार्यक्रम वहाँ गाँव गाँव में चलता रहता है। जिसमें अपने गांव की सीमा पर 5-6 फीट से बड़ा पत्थर लगा कर गांव के संविधान, पांचवीं अनुसूची जो संविधान में दिए अधिकार को लिखते हैं। गांव की कितनी दूर सीमा है वह लिखा होता है। पंचायत के अंदर कितने गांव हैं, कितने आबादी है अंकित होता हैं। हर मुण्डा गांव में हर जगह लगा होता है।

2017 के पहले पत्थलगड़ी का क्रार्यक्रम चला जिसे रोकने के लिए सरकार ने दमन शुरू किया विरबांकी का इस इलाका में ग्रामसभा बहुत मजबूर है गांव में ग्रामसभा के अनुमति से योजना और अन्य काम होते हैं। लेकिन माओवादी को खोजने के नाम पर हजारों प्रशासन के लोग गांव में लगे बैरीकेटिंग तोड़कर गांव में प्रवेश कर गये। प्रशासन के वापस आने पर रास्ते में गोंव वाल ने प्रशासन को सम्मान पूर्व बैठा लिया और बताया कि गांव में ग्रामसभा के अनुमति के बगैर नहीं आते हैं। चेतावनी देकर छोड़ दिया।

प्रशासन ने वापस आ कर गांव के लोगों पर देशद्रोह का केस दर्ज किया। इससे पूरा विरबांकी के मुण्डा समुदाय भड़क गये।

देशद्रोह के इस मामले को लेकर मुण्डा समुदाय बैठक कर रहे थे। प्रशासन ने फिर से बैठक स्थल को घेर रखा था। बैठक खुली जगह हो रही थी। लोग अपनी बात कहने से कतरा रहे थे। ऐसी स्थिति में वहाँ प्रशासन को जनता ने घेर लिया।

गोदी मीडिया इस खबर को बड़ी प्रमुखता से प्रशासन और सरकार पक्ष में एक तरफा लिखने लगा। पत्थलगड़ी को प्रशासन केस में घसीट नहीं पा रहा था। तब प्रशासन अफीम के खेती होने की चर्चा कर गांव में छापा मारी करने लगे। वन भूमि पर अफीम खेती होने की बात कहकर अफीम की नष्ट करने चर्चा किया गया। यह खबर प्रशासन ने मिडिया को दी। केस दर्ज नहीं हुआ। इस मामले पर भी पत्थलगड़ी कर रहे लोगों पर केस दर्ज नहीं कर पाने पर अचानक गैंगरेप जैसी घटना होती है। इस रेप की घटना में पत्थलगड़ी से जुड़े लोगों को नामजद रेप में शामिल कर दिया।

जब पत्थलगड़ी चल रही थी उसमें गांव वालों को रोकने के लिए प्रशासन दमन कर रहा था, तब सोशलमीडिया में अनेकों लोगों ने पत्थलगड़ी का समर्थन और गैंगरेप की घटना को निंदा की थी। सरकार ने ऐसे 19 लोगों पर देशद्रोह का केस दर्ज किया है।

इस मामले को लेकर स्टेन स्वामी, विनोद कुमार, राकेश रौशन किंड़ो, आलोका ने हाई कोर्ट में क्वैश यनि केस समाप्त करने के लिए फाइल किया है। जैसे ही हाईकोर्ट में रिट दायर हुई वैसे ही एक महिने के अंदर इन लोगों के खिलाफ वारंट जारी होता है और फिर एक महिना के बाद स्टेन स्वामी का कुर्की जब्त का वारंट जारी होता है और तुरंत ही कुर्की कर ली गयी। कोर्ट में आदेश का इंतजार है, उधर खूंटी कोर्ट में जमानत के लिए कुछ लोगों ने आवेदन किया है ,वह भी जो सुरक्षित रखा गया है।

दूसरी ओर पत्थलगड़ी में शामिल उन आदिवासी के नाम देशद्रोह में डाले गये हैं, जिनकी भूमिका बहुत नहीं। कुछ लोग अलग-अलग जिला गांव राज्य के लोग हैं, जो वहाँ पत्थलगड़ी जैसे कार्यक्रम को चला रहे हैं। अभी भी यह जारी हैं।

यह लेख 14 एफआईआर के आधार पर लिखा गया है।

Most of the traitors reside in Jharkhand, not in JNU or Kashmir

किसान सभा ने किया 8 जनवरी को ग्रामीण भारत बंद’ का आह्वान

Kisan Sabha

किसान सभा ने किया 8 जनवरी को ग्रामीण भारत बंद’ का आह्वान

रायपुर, 30 नवंबर 2019. अखिल भारतीय किसान सभा और आदिवासी अधिकार राष्ट्रीय मंच ने देश में बढ़ते कृषि संकट, ऋणग्रस्तता के कारण बढ़ती किसान आत्महत्याओं, वनाधिकारों पर हमले, प्राकृतिक संसाधनों की लूट, मंदी के कारण ग्रामीण अर्थव्यवस्था की बदहाली, बेरोजगारी और लाभकारी समर्थन मूल्य न दिए जाने के खिलाफ आगामी 8 जनवरी 2020 को ग्रामीण भारत बंद (Rural india Bandh) का आह्वान किया है। इस दिन गांवों के रास्ते और ट्रेनों को रोका जाएगा, दुकानें और व्यवसाय बंद रखे जाएंगे और सरकारी कार्यालयों पर प्रदर्शन आयोजित किये जायेंगे।

उल्लेखनीय है कि 8 जनवरी को ही सीटू और इंटक सहित देश के प्रमुख ट्रेड यूनियनों ने भी देशव्यापी मजदूर हड़ताल आयोजित करने का फैसला किया है।

यहां जारी एक बयान में छत्तीसगढ़ किसान सभा के अध्यक्ष संजय पराते और महासचिव ऋषि गुप्ता ने बताया कि देश मे पसरती मंदी का सबसे ज्यादा प्रभाव किसान समुदाय और आदिवासियों पर पड़ रहा है। लेकिन ग्रामीणों को मनरेगा के जरिये काम देने और स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों के अनुसार लाभकारी समर्थन मूल्य पर फसल खरीदी करने से मोदी सरकार इंकार कर रही है। छत्तीसगढ़ इसका ज्वलंत उदाहरण है कि किस तरह मोदी सरकार किसानों को धान के बोनस से वंचित करने का खेल खेल रही है।

किसान सभा नेताओं ने कहा है कि आदिवासियों को एक ओर तो वनाधिकारों से वंचित किया जा रहा है, दूसरी ओर कॉर्पोरेट मुनाफे के लिए जल, जंगल, जमीन और खनिज की लूट के लिए उन्हें बड़े पैमाने पर विस्थापित करने की नीतियां बनाई जा रही है। उन्होंने कहा कि इन आदिवासी-किसान विरोधी नीतियों का नतीजा यह है कि बैंकों तक किसानों की पहुंच घट गई है और महाजनी कर्ज के फंदे में फंसकर किसान आत्महत्याएं कर रहे हैं।

इन नीतियों के खिलाफ पूरे देश के किसान और आदिवासी 8 जनवरी को अपनी आवाज बुलंद करेंगे और गांव बंद का आयोजन करेंगे।

माल्या-अडानी के लिए पैसा है, किसान के लिए नहीं- पी साईनाथ

P Sainath at Varanasi

माल्या-अडानी के लिए पैसा है, किसान के लिए नहीं- पी साईनाथ

वाराणसी, 29 नवंबर 2019। देश के जाने-माने पत्रकार पी.साईंनाथ ने इस बात पर चिंता जताई है कि भारत में किसानों की आमदनी तेज़ी से कम हो रही है। किसान अपने ही खेतों में मज़दूर की तरह हो गए हैं जो कॉरपोरेट के फ़ायदे के लिए काम कर रहे हैं।

श्री साईनाथ शुक्रवार को पराड़कर भवन में पत्रकारों पर होने वाले हमलों के खिलाफ गठित समिति काज की उत्तर प्रदेश इकाई की ओर से आयोजित संवाद कार्यक्रम में बोल रहे थे। ग्रामीण इलाकों में पत्रकारिता के बुनियादी सवालों (Basic questions of journalism in rural areas) को उठाते हुए आंचलिक इलाकों के पत्रकारों की समस्याओं को रेखांकित कर रहे थे।

उन्होंने कहा कि ग्रामीण इलाकों में काम करने वाले पत्रकार सही मायने में काम कर रहे हैं। हमले भी इन्हीं पत्रकारों पर हो रहे हैं। हाल के सालों में जितने में पत्रकारों की हत्याएं (Killing journalists) हुईं उनमें सभी ग्रामीण पत्रकार थे और वो क्षेत्रीय भाषाओं में काम करते थे। अंग्रेजी अखबारों में काम करने वाले पत्रकारों पर हमले होते ही नहीं। देश में ऐसा कोई भी आंकड़ा मौजूद नहीं है। सियासी दल और माफिया गिरोह अंचलों में काम करने वाले पत्रकारों को ही निशाना बनाते रहे है। यह स्थिति बेहद चिंताजनक है।

उन्होंने पत्रकारों को सतर्क रहने की बात कहते हुए कहा कि ग्रामीण पत्रकारों पर हमले की घटनाएं बढ़ सकती हैं।

The agricultural crisis is not just a crisis in rural India, it will have a huge impact on the entire country.

साईनाथ ने किसानों के मुद्दों को भी जोरदार ढंग से उठाया। कहा कि कृषि की लागत बढ़ रही है और सरकार अपनी ज़िम्मेदारियों से बच रही है। कृषि को किसानों के लिए घाटे का सौदा बनाया जा रहा है ताकि किसान खेतीबाड़ी छोड़ दें और फिर कृषि कॉर्पोरेट के लिए बेतहाशा फ़ायदे का सौदा हो जाए। देश में बीज, उर्वरक, कीटनाशक और साथ ही कृषि यंत्रों की कीमत उदारीकरण के बाद तेजी से बढ़ी है। पिछले तीन सालों में कृषि से जुड़ी आय में भारी कमी आई है जबकि लागत तेजी से बढ़ी है। पिछले दो दशकों से लागत लगातार बढ़ रही है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 4-5 लोगों वाले किसान परिवार की एक महीने की आय लगभग छह हज़ार रुपये है। कृषि संकट सिर्फ़ ग्रामीण भारत का संकट नहीं है, इसका समूचे देश पर व्यापक असर होगा।

किसान आंदोलन ऐसे स्थानों से शुरू हुए हैं, जहां सामान्यतः पिछले एक-दो दशकों में इनकी शुरुआत नहीं हुई है। सिर्फ़ किसानों के जीवन, कृषि पर निर्भर लोगों के जीवन और कृषि मज़दूरों के जीवन में झांककर ही समझा जा सकता है। आंकड़े झूठ बोलते हैं। कर्ज़ माफ़ी किसानों को राहत तो देती है, लेकिन ये उनकी समस्याओं का हल नहीं है।

साल 2008 में यूपीए सरकार ने कर्ज़ माफ़ी का ऐलान किया था, लेकिन इसके फ़ायदे ज़्यादातर किसानों तक नहीं पहुंच पाए। ज़्यादातर किसानों ने निजी कर्ज़ लिया है। ऐसे में कर्ज़ माफ़ी का फ़ायदा वो नहीं उठा पाते हैं। लेकिन यही सरकारें हर साल लाखों-करोड़ का कॉर्पोरेट क़र्ज़ माफ़ करती हैं।

After the ban on animals, the rural economy is collapsing

पी साईनाथ का कहना है कि पशुओं पर लगे प्रतिबंधों के बाद ग्रामीण अर्थव्यवस्था चरमरा रही है। साईनाथ ने कहा कि न ही बीती सरकार पशु संकट को लेकर चिंतित थी और न ही मौजूदा सरकार। उन्होंने कहा कि मौजूदा सरकार में ये संकट और गहरा रहा है। मवेशियों की बिक्री पर प्रतिबंधों के बाद ये संकट और गंभीर हो गया है। इससे न सिर्फ़ कसाइयों का व्यवसाय ख़त्म हुआ है, बल्कि ग़रीब लोगों की डाइट पर भी असर हुआ है। यदि ग्रामीण क्षेत्र में पशुओं की क़ीमत गिर रही है या बिक्री कम हो रही है तो इसका सीधा मतलब ये है कि उस क्षेत्र में संकट गहरा रहा है।”

Suicides are not the cause of the agrarian crisis but are the result of it

श्री साईनाथ ने कहा कि देश भर में किसानों की कुल आत्महत्याओं में से आधी से ज़्यादा छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश में होती हैं। एनसीआरबी के 2015 के डाटा के मुताबिक देश में हुए कुल किसान आत्महत्याओं में से 68 फ़ीसदी इन तीनों प्रदेशों में थी। इससे ये पता चलता है कि यहां गहरा कृषि संकट है। आत्महत्याएं कृषि संकट की वजह नहीं है बल्कि इसका परीणाम हैं। पिछले दो सालों में वास्तविकता में किसान आत्महत्याएं बढ़ी हैं, लेकिन डाटा कलेक्शन में फ़र्ज़ीवाड़े के कारण ये संख्या कम दिखेगी।

इस मौके पर यूपी जर्नलिस्ट एसोसिएशन के अध्यक्ष रतन दीक्षित ने कहा कि ग्रामीण पत्रकारों की चुनौतियां बढ़ती जा रही हैं। इसके लिए अब लंबी लड़ाई लड़नी होगी। ग्रामीण पत्रकार एसोसिएशन के प्रदेश अधध्यक्ष सौरभ श्रीवास्तव ने कहा कि ग्रामीण पत्रकारों के दम पर भारत में पत्रकारिता जिंदा है। सच लिखते हैं इसीलिए उन पर हमले ज्यादा होते हैं। पत्रकार प्रेस क्लब के प्रदेश अध्यक्ष घनश्याम पाठक ने कहा कि पत्रकारों पर होने वाले हमलों के खिलाफ उनका संगठन लंबी लड़ाई लड़ने के लिए तैयार है। अगर सत्ता जानबूझकर पत्रकारों की आवाज दबाएगी तो उसके खिलाफ आर-पार की लड़ाई लड़ी जाएगी।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए जाने-माने पत्रकार-लेखक सुभाष राय ने कहा कि ग्रामीण पत्रकारों के समक्ष चुनौतियां बढ़ी हैं जिनका मुकाबला करने के लिए सभी पत्रकार संगठनों को एक मंच पर आना होगा। उन्होंने कहा कि आंचलिक इलाकों में ही पत्रकारिता जिंदा है। शहरों में कुछ घरानों और कारपोरेटरों के लिए पत्रकारिता की जा रही है। यह स्थिति ठीक नहीं है।

इससे पहले वरिष्ठ पत्रकार अभिषेक श्रीवास्तव की पुस्तक देशगांव का पी साईनाथ ने लोकार्पण किया।

कार्यक्रम में वरिष्ठ पत्रकार जितेंद्र कुमार, अनिल चौधरी, रामजी यादव, प्रभाशंकर मिश्र, जगन्नाथ कुशवाहा, बल्लभाचार्य, विकास दत्त मिश्र, मिथिलेश कुशवाहा, प्रदीप श्रीवास्तव, अंकुर जायसवाल, अमन कुमार, मंदीप सिंह, नित्यानंद, रिजवाना तबस्सुम, दीपक सिंह, अनिल अग्रवाल एके लारी, शिवदास समेत समूचे पूर्वांचल के पत्रकार उपस्थित थे।

कार्यक्रम के अंत में काज के यूपी के कोआर्डिनेटर विजय विनीत ने अतिथियों और पत्रकारों का आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम में 400  से अधिक पत्रकारों ने भाग लिया।

पवित्र भाजपाई भ्रष्टाचार, एक लीटर दूध 80 छात्रों को परोस दिया

CPI ML

योगी सरकार के दावों की पोल खुली : माले

लखनऊ, 29 नवंबर। भाकपा (माले) की राज्य इकाई ने कहा है कि मिड-डे-मील में मिर्जापुर में नमक-रोटी परोसे जाने (Salt-bread served at Mirzapur in mid-day-meal) के बाद सोनभद्र के एक स्कूल में एक लीटर दूध में पानी मिलाकर 80 छात्रों को परोसने की घटना (Incident of serving 80 students by mixing water in one liter of milk in a school in Sonbhadra) योगी सरकार के दावों की पोल खोलती है।

पार्टी के राज्य सचिव सुधाकर यादव ने शुक्रवार को जारी बयान में कहा कि भ्रष्टाचार के प्रति ‘जीरो टॉलरेंस’ का ढिंढोरा पीटने वाली योगी सरकार के दावे हवा-हवाई हैं। स्कूली बच्चों के मिड-डे-मील में भ्रष्टाचार से लेकर कर्मचारियों का पीएफ घोटाला, होमगार्ड घोटाला, बुंदेलखंड में वृक्षारोपण घोटाला, गोवंश संरक्षण घोटाला जैसे कई उदाहरण इस बात के गवाह हैं कि इस सरकार में भ्रष्टाचार सर्वत्र पसरा हुआ है। लेकिन सरकार विज्ञापनबाजी में लगी है कि भ्रष्टाचार बर्दाश्त नहीं है। इससे बड़ा झूठ नहीं हो सकता।

Yogi government stands exposed: CPI (ML)

केन्द्र सरकार के ‘आदेशपाल’ की भूमिका निभाते राज्यपाल

Ajit Pawar after oath as Deputy CM

केन्द्र सरकार के ‘आदेशपाल’ की भूमिका निभाते राज्यपाल

राज्यपालों की भूमिका पर मंथन जरूरी It is important to churn on the role of governors

An article based on the questions raised on the role of governors once again After the Maharashtra episode

अगर महाराष्ट्र के राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी (Maharashtra Governor Bhagat Singh Koshyari) ने संविधान-सम्मत, नियम-कायदों को दरकिनार कर चुपके-चुपके फडणवीस को मुख्यमंत्री पद की शपथ नहीं दिलाई होती तो सर्वोच्च अदालत को राज्यपाल को निर्देशित करने पर विवश नहीं होना पड़ता। स्वतंत्र भारत के इतिहास में यह पहला अवसर रहा, जब बगैर किसी आपात स्थिति के इस प्रकार रातों-रात राज्यपाल से लेकर राष्ट्रपति तक सारी सरकारी मशीनरी सक्रिय हुई और राष्ट्रपति से सुबह 5.45 बजे राष्ट्रपति शासन हटाए जाने संबंधी आदेश पर हस्ताक्षर कराते हुए सुबह आठ बजे राज्यपाल द्वारा फडणवीस को मुख्यमंत्री पद की शपथ भी दिला दी गई हो।

Allegations of misuse of power on BJP

आज अगर भाजपा पर सत्ता के दुरूपयोग के आरोप लग रहे हैं तो लंबे अरसे तक कांग्रेस के शासनकाल में उस पर भी राज्यपाल पद का इसी प्रकार दुरूपयोग करने के आरोप लगते रहे थे। हालांकि मौजूदा सरकार की गलतियों को यह कहकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि अगर पिछली सरकारों ने यही सब बार-बार किया तो अगर इस सरकार ने भी कर दिया तो कौन-सा गुनाह किया।

No political party now believes in democratic values

भारतीय लोकतंत्र के लिए यह अत्यंत विडम्बनापूर्ण और दुखदायी स्थिति है कि लोकतांत्रिक मूल्यों में अब किसी भी राजनीतिक दल का विश्वास नजर नहीं आता। हर कोई जोड़-तोड़ के सहारे सत्ता बनाने या सत्ता बचाने की जुगत में जुटा दिखता है। महाराष्ट्र में अजित पवार कुछ दिनों पहले तक फडणवीस को महाभ्रष्ट लगते थे। वह कहते भी थे कि अजित पवार जल्दी ही जेल में होंगे। फिर एकाएक 22 नवम्बर को वही अजित पवार फडणवीस के लिए इतने पाक-साफ कैसे हो गए? उन्हें क्यों लगने लगा कि भले ही अजित पवार पर हजारों करोड़ के घोटालों के आरोप हों पर उनसे बेहतर उपमुख्यमंत्री महाराष्ट्र के लिए और कोई नहीं हो सकता? दूसरी ओर, एक-दूसरे की धुर विरोधी विचारधाराओं वाली शिवसेना, एनसीपी और कांग्रेस ने सत्ता हथियाने के लिए जिस प्रकार की राजनीति की, उसे भी ठीक नहीं कहा जा सकता।

अब बात करें राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी की।

कोश्यारी की भूमिका इस सारे परिदृश्य में बेहद महत्वपूर्ण थी। उनकी ओर देश का हर नागरिक तटस्थ, आदर्श और ईमानदारीपूर्वक फैसला लेने की आस लगाए टकटकी बांधे देख रहा था। उनकी भूमिका से अगर सभी को निराशा हुई तो उसके महत्वपूर्ण पहलुओं पर नजर डालना जरूरी है। आखिर उन्होंने रातों-रात राष्ट्रपति शासन हटाने की सिफारिश किस आधार पर की? लोकतांत्रिक व्यवस्था में इसके बारे में किसी को बताना जरूरी क्यों नहीं समझा? जब कहीं भी राष्ट्रपति शासन लगाया या हटाया जाता है तो उसकी एक संवैधानिक प्रक्रिया होती है। सबसे पहले राज्यपाल राष्ट्रपति को सिफारिश भेजते हैं। उसके बाद राष्ट्रपति उसे प्रधानमंत्री के पास भेजते हैं। प्रधानमंत्री कैबिनेट की बैठक बुलाने के बाद राष्ट्रपति को कैबिनेट की राय से अवगत कराते हैं। इस प्रक्रिया के बाद ही राष्ट्रपति द्वारा किसी भी राज्य में राष्ट्रपति शासन को लगाने अथवा हटाए जाने के आदेश पर मुहर लगाई जाती है। महाराष्ट्र में आधी रात के बाद यह सब कब और कैसे संभव हुआ, कोई नहीं जानता।

आखिर राज्यपाल को ऐसी क्या हड़बड़ी थी कि महज दो-ढाई घंटे के अंदर ही गुपचुप तरीके से राष्ट्रपति शासन हटाने तथा मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाने की संवैधानिक प्रक्रिया रहस्यमयी तरीके से पूरी करनी पड़ी।

इस बात पर कोई विश्वास नहीं कर सकता कि राज्यपाल को मालूम नहीं होगा कि विधानसभा में शक्ति परीक्षण से पहले बहुमत का आंकड़ा जुटाने के लिए साम, दाम, दंड, भेद सभी तरह के हथकंडे अपनाए जाएंगे।

सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश पी.वी. सावंत का कहना है कि महाराष्ट्र में राज्यपाल ने जो कुछ भी किया, वह असंवैधानिक है। उनके मुताबिक राज्यपाल को सबसे पहले विधानसभा का गठन करना चाहिए था। विधायकों को शपथ दिलानी चाहिए थी। उसके बाद विधायक विधानसभा के अध्यक्ष व उपाध्यक्ष का चुनाव करते, ताकि विधानसभा का कामकाज सुचारू रूप से चलाया जा सके। फिर राज्यपाल सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करते।

हालांकि ऐसा करने वाले महाराष्ट्र के राज्यपाल कोश्यारी कोई पहले राज्यपाल नहीं हैं। दर्जनों ऐसे उदाहरणों से देश का इतिहास भरा पड़ा है। जब तमाम नियम-कानूनों को ताक पर रखते हुए राज्यपालों ने अपने कर्त्तव्यों का ईमानदारीपूर्वक निर्वहन करने की बजाय केन्द्र में सत्तारूढ़ सरकार के आदेशपाल की ही भूमिका निभाई।

Question on the role of the governor

दिसम्बर 2014 में अरूणाचल प्रदेश में दलबदल के जरिये राज्य सरकार को अस्थिर कर राष्ट्रपति शासन लगाए जाने पर मामला सुप्रीम कोर्ट में जाने पर अदालत की संविधान पीठ ने राज्यपाल के रवैये पर सख्त टिप्पणियां करते हुए राज्यपाल की सिफारिश को असंवैधानिक करार देकर कांग्रेस सरकार को पुनः बहाल करने का आदेश दिया था।

मार्च 2016 में उत्तराखण्ड में भी अदालत ने वहां राष्ट्रपति शासन लगाए जाने को असंवैधानिक करार दिया था और हरीश रावत सरकार फिर बहाल हुई थी।

मई 2018 में कर्नाटक में भी ऐसे ही मामले को लेकर राज्यपाल की भूमिका पर सवाल उठे थे।

पिछले कई दशकों से यही सिलसिला चला आ रहा है। इस सिलसिले की शुरूआत उस वक्त हुई थी, जब देश में विभिन्न राज्यों में गैर-कांग्रेसी सरकारों के बनने का दौर शुरू हुआ। उसके बाद से केन्द्र में जो भी सरकारें बनी, लगभग सभी ने दूसरे दल की राज्य सरकारों को परेशान करने के लिए राज्यपालों का अपने मोहरे के रूप में इस्तेमाल किया। यह आज भी जारी है। राज्यपालों ने खुद पर केन्द्र की कृपादृष्टि बनाए रखने के लिए समय-समय पर राज्य सरकारों को परेशान और अस्थिर करने का खेल खेला। राज्यपाल रूपी संवैधानिक संस्था से उम्मीद की जाती है कि वह किसी दल विशेष का पक्षधर बनने की बजाय संविधान-सम्मत व्यवस्था के अनुरूप कार्य करे। दुर्भाग्य है कि ऐसे मामलों में अक्सर राज्यपालों पर राजनीतिक वफादारी और केन्द्र सरकार के एजेंट के रूप में कार्य करने के गंभीर आरोप लगते रहे हैं। राजभवन केन्द्र में सत्तारूढ़ दल की जागीर बन गए हैं। 2002 में जम्मू कश्मीर, 2005 में झारखण्ड, 2013 में दिल्ली और 2018 में गोवा में सरकार गठन में राज्यपाल की भूमिका पर सवाल उठे थे।

राज्यपालों की भूमिका पर सवाल उठने का सिलसिला आजादी के महज 7 साल बाद 1954 में ही शुरू हो गया था। तब मद्रास के राज्यपाल ने कम्युनिस्ट सरकार न बनने देने और कांग्रेस की सरकार बनवाने में अहम भूमिका निभाई थी। उसके बाद 1958 में धारा 356 का दुरूपयोग कर प्रदेश की कम्युनिस्ट सरकार को बर्खास्त कर दिया गया। तब से लेकर आज तक राज्यपालों की भूमिका पर लगातार सवाल उठते रहे हैं।

अक्टूबर 2005 में बिहार में तो ऐसा अनोखा इतिहास रच दिया गया था, जब देश के इतिहास में पहली बार बिना शपथ लिए किसी विधानसभा को भंग कर वहां राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया। तब जनवरी 2006 में सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश योगेश कुमार सब्बरवाल, न्यायमूर्ति बी.एन. अग्रवाल तथा न्यायमूर्ति अशोक भान ने राज्यपाल बूटा सिंह द्वारा बिहार विधानसभा भंग करने की सिफारिश को संविधान की आत्मा तथा लोकतांत्रिक प्रक्रिया के विपरीत आचरण बताते हुए कहा था कि राज्यपाल ने असंवैधानिक निर्णय लेते हुए केन्द्रीय मंत्रिमंडल को गुमराह किया। राज्यपाल के पास कोई प्रासंगिक सामग्री नहीं थी, जिसके आधार पर विधानसभा भंग करने की अतिवादी कार्रवाई की जाए, बल्कि राज्यपाल का उद्देश्य किसी राजनीतिक दल को सरकार बनाने का दावा पेश करने से रोकने का था।

केन्द्र में भले ही किसी भी दल की सरकार बने, वह सदैव अपने चहेतों को ही राज्यपाल के पद पर आसीन करती है। यही कारण है कि राज्यपाल का पद विवादों से घिरा रहता है।

Governors have often been in controversy over the misuse of section 356.

धारा 356 के दुरुपयोग को लेकर तो राज्यपाल अक्सर विवादों में रहे हैं, जिसका उपयोग केन्द्र सरकारें राज्यपाल के माध्यम से विरोधी दल की सरकार को धराशाई करने के लिए करती रही हैं। उप्र के तत्कालीन राज्यपाल रोमेश भंडारी, आंध्र प्रदेश के रामलाल, बिहार के विनोद चंद्र पांडे, बूटा सिंह सहित ऐसे दर्जनों राज्यपाल रहे हैं जिन्होंने पद की गरिमा को तार-तार किया। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश आर. एस. सरकारिया ने 1988 में राज्यपालों की नियुक्ति को लेकर अपनी रिपोर्ट में कई अहम सिफारिशें की थी लेकिन विडम्बना है कि इन सिफारिशों को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।

(लेखक योगेश कुमार गोयल राजनीतिक विश्लेषक एवं वरिष्ठ पत्रकार हैं)

 

राष्ट्रीय दिवस पर फिलिस्तीन के लोगों के प्रति भारत से एकता संदेश

Prof. Bhim Singh

फिलिस्तीन के साथ एकजुटता Solidarity with Palestine

राष्ट्रीय दिवस पर फिलिस्तीन के लोगों के प्रति भारत से एकता संदेश

जम्मू/कश्मीर/कोलकाता/मुंबई 29 नवंबर, 2019. नेशनल पैंथर्स पार्टी और अन्य क्रांतिकारी संगठनों के सहयोग से भारत-फिलिस्तीन मैत्री समिति (Indo-Palestine Friendship Committee) ने फिलस्तीन के लोगों के साथ एक एकता दिवस का आयोजन करके उनको राष्ट्रीय दिवस पर बधाई दी, जो भारत-फिलस्तीन मैत्री समिति व नेशनल पैंथर्स पार्टी के तत्वावधान में भारत के कई स्थानों पर 15 नवंबर, 2019 को मनाया गया था।

United Nations resolution number 181 that partitioned Palestine in 1948 to create Israel

अधिवक्ता, मीडियाकर्मियों, पूर्व सैनिकों और राजनीतिक कार्यकर्ताओं की एक बैठक को संबोधित करते हुए भारत-फिलस्तीन मैत्री समिति के चेयरमैन प्रो.भीम सिंह ने फिलिस्तीन के संघर्षरत लोगों के साथ पूर्ण एकजुटता और समर्थन व्यक्त किया, जो 1948 से संयुक्त राष्ट्रसंघ प्रस्ताव स.181 के खिलाफ संघर्ष कर रहे हैं, जिसने फिलिस्तीन का 1948 में विभाजन कर इजरायल बनाया, जिसे आज भी एक राज्य के रूप में परिभाषित नहीं किया जा सकता है, जिसका न तो कोई परिभाषित क्षेत्र है, न ही भूगोल और यहां तक कि इसकी आबादी पूरी दुनिया में बिखरी है।

Pt. Nehru, Nasir and President Tito started the Non-Aligned Movement in 1956

प्रो. भीम सिंह ने पं. नेहरू, नासिर और राष्ट्रपति टीटो को बधाई दी, जिन्होंने 1956 में गुटनिरपेक्ष आंदोलन की शुरूआत की, फिलस्तीन के विभाजन से असहमत थे और तथाकथित इजरायल राज्य को मान्यता देने से इनकार कर दिया था। यह भारत था, जिसने संयुक्त राष्ट्र द्वारा पारित किए गए 242, 338 और अन्य प्रस्तावों में इजरायल को फिलस्तीनी क्षेत्र और अन्य अरब क्षेत्रों से खाली करने को कहा गया था, को लागू करने के लिए यासिर अराफात के नेतृत्व में फिलस्तीनी आंदोलन (पीएलओ) का शुरू से ही समर्थन किया था।

स्टेट लीगल एड कमेटी के कार्यकारी चेयरमैन एवं नेशनल पैंथर्स पार्टी के मुख्य संरक्षक प्रो.भीमसिंह ने ‘लीगलिटी आफ स्टेट आफ इजराइल‘ विषय पर एक पुस्तक भी लिखी थी, जिसका प्रकाशन 1970 में कुवैत ने किया था और बड़ी शक्तियों द्वारा स्पष्ट रूप से संयुक्त राष्ट्र प्रस्तावों के कार्यान्वयन के लिए जोर दिया गया था। उन्होंने एंग्लो-अमेरिकन धड़े की भी आलोचना की, जिसने अंतर्राष्ट्रीय कानून की अवहेलना करके इजरायल को उकसा कर फिलिस्तीन को ध्वस्त करने का प्रयास किया।

Unity message from India to the people of Palestine on National Day

प्रो. भीम सिंह ने फिलस्तीन का समर्थन करने वाले विश्व के लोगों की ओर से आभार व्यक्त किया और फिलस्तीन को पूर्ण राज्य का दर्जा देने के लिए 1967 और 1968 के संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों को लागू करने की भी मांग की। उन्होंने भारत सरकार और उसके नेतृत्व में पंडित जवाहरलाल नेहरू और अन्य सभी को बधाई दी, जिन्होंने फिलस्तीन को फिलिस्तीन के समर्थन में पूरे गुटनिरपेक्ष आंदोलन को एकजुट करने का समर्थन किया था।

कल दोपहर जम्मू में प्रतिष्ठित सभा को संबोधित करते हुए प्रो. भीम सिंह ने संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद की विफलता के बारे में दुनिया को याद दिलाया कि वह अपने स्वयं के फिलस्तीन के निर्णय को लागू करने में विफल क्यों है।

उन्होंने यह भी खेद प्रकट किया कि वर्तमान भारत सरकार फिलस्तीन के लोगों के समर्थन में फिलस्तीन पर भारत के मिशन को पूरा करने में विफल रहा है। यह दुर्भाग्य से भाजपा की ही सरकार थी, जिसने भारत के लिए इजरायल से मिसाइलें खरीदीं और वह भारत के पहले प्रधानमंत्री थे, जिन्होंने भारत के सबसे पुराने दोस्त फिलस्तीन की अनदेखी करते हुए इजरायल का दौरा किया।

अनेक अधिवक्ताओं, मीडियाकर्मियों और राजनीतिक कार्यकर्ताओं ने संवाददाता सम्मेलन को सम्बोधित किया, जिनमें हर्षदेव सिंह, सुश्री अनीता ठाकुर, मसूद अहमद अंद्राबी, श्री पी.के. गंजू, सुश्री अप्पू सिंह आदि अन्य शामिल थे।

सांड चर रहे हैं खेत, मोदी बेच रहे हैं देश, आरएसएस जरा भी नैतिक नहीं है : रणधीर सिंह एडवोकेट

Randhir Singh Suman CPI

सांड चर रहे हैं खेत, मोदी बेच रहे हैं देश, आरएसएस जरा भी नैतिक नहीं है : रणधीर सिंह एडवोकेट

बाराबंकी, 28 नवंबर 2019. भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राष्ट्रीय परिषद सदस्य रणधीर सिंह सुमन ने कहा है कि महाराष्ट्र में सत्तारूढ़ दल द्वारा राष्ट्रपति शासन हटाने व अल्पमत की सरकार का गठन कराने व विधायकों को खरीदने का षड़यंत्र करने में मुख्य रूप से दोषी अमित शाह को अविलम्ब गृहमंत्री पद से इस्तीफा देना चाहिए, नैतिकता की बात करने वाले संघ के लोग कर्नाटक व महाराष्ट्र में जिस तरह से कार्य किया है वह उनके असली चेहरे को उजागर करता है।

श्री सुमन भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा गांधी भवन में आयोजित एक दिवसीय धरने को सम्बोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि ‘‘सांड चर रहे हैं खेत, मोदी बेच रहे हैं देश’’ का नारा देश में चरितार्थ हो रहा है।

धरना सभा को सम्बोधित करते हुए जिला सचिव बृजमोहन वर्मा ने कहा कि सांड़ों की वजह से प्रदेश में किसान मर रहे हैं, एक सांड के अजगना में किसान बाबू लाल को मार देने से मृत्यु हो गई। किन्तु सरकार इस तरह की घटनाओं में भी मृतकों की कोई मदद नहीं कर रही है।

धरना सभा को सह सचिव डॉ. कौशल हुसैन ने कहा कि सरकार पूर्व में जारी सुविधाओं को भी जनता से छीन रही है। जैसे बाराबंकी से चारबाग तथा चारबाग से माती होते हुए फतेहपुर जाने वाली बसों को बंद कर दिया है। जनता परेशान है सरकार चुप है।

किसान सभा के उपाध्यक्ष प्रवीण कुमार ने कहा कि योगी सरकार में बिजली के गलत बिल भेजकर ग्रामीण जनता का उत्पीड़न किया जा रहा है।

किसान सभा के अध्यक्ष विनय कुमार सिंह ने कहा कि नहरों की सफाई नहीं हुई है, टेल तक पानी नहीं जा रहा है। भाजपा सरकार में किसानों की दुर्दशा बहुत ही दयनीय है।

धरना सभा को पार्टी के सह सचिव शिव दर्शन वर्मा ने सम्बोधित करते हुए कहा कि सरकार किसानों को लाभकारी मूल्य न देकर छोटे किसानों का धान भी नहीं खरीद रही, गन्ना किसानों का भुगतान नहीं हो रहा है।

धरना सभा को मो. कदीर, दीपक, विष्णु त्रिपाठी, मुनेश्वर बख्श आदि नेताओं ने सम्बोधित किया। धरने में दल सिंगार, गिरीश चन्द्र, अमर सिंह प्रधान, वीरेन्द्र कुमार, रामनरेश वर्मा, काशीराम आदि प्रमुख कम्युनिस्ट नेता व कार्यकर्ता मौजूद रहे।

अगला “महाराष्ट्र” कौन सा राज्य बनेगा या मोदी की भाजपा खुद ही महाराष्ट्र बन जाएगी?

narendra modi amit shah

कौन सा राज्य बनेगा अगला “महाराष्ट्र” या मोदी की भाजपा खुद ही महाराष्ट्र बन जाएगी?

लखनऊ से तौसीफ़ क़ुरैशी। महाराष्ट्र के सियासी शह और मात के खेल में मोदी की भाजपा बहुत ही बुरी तरह हारी है जिसका अंदाज़ा शायद मोदी की भाजपा की चाणक्य मंडली को नहीं था। राजनीतिक विशेषज्ञों ने क़यास लगाने शुरू कर दिए हैं कि ये तो बानगी भर है, आगे-आगे देखिए क्या-क्या होता है।

एक के बाद एक मोदी की भाजपा राज्य गँवाती जाएगी। हालाँकि मोदी की भाजपा के रणनीतिकार यह बात मान नहीं रहे हैं, उनका कहना है कि ये कुछ नहीं है, हमारे ग्राफ में कोई गिरावट नहीं आई है। दरअसल यही ग़लतफ़हमी नुक़सानदायक साबित होती है।

महाराष्ट्र के सियासी खेल में हुई उथल-पुथल से ये संदेश साफ़ है कि अब मोदी की भाजपा का ग्राफ़ लगातार नीचे गिरता जाएगा, इसका अंदाज़ा सत्तारूढ़ नेतृत्व को भी हो रहा है, मगर स्वीकार नहीं कर रहा है और करना भी नहीं चाहिए।

Which state will become the next “Maharashtra” or will Modi’s BJP itself become Maharashtra?

मोदी की भाजपा की जीत का सिलसिला 2014 से शुरू हुआ था, जब इन्होंने हिन्दू मुसलमान कर देश को बाँटने का काम किया था। धार्मिक भावनाओं की नाव को बहुत दूर तक नहीं ले ज़ाया जा सकता है। मार्च 2018 तक मोदी की भाजपा और उसके सहयोगियों की सरकारें देश के ज़्यादातर हिस्सों में थीं, लेकिन अब यह सिर्फ़ कुछ ही हिस्से में सिमट गई।

महाराष्ट्र में हुई सियासी हार ने मोदी की भाजपा को दोहरी चोट दी है क्योंकि वहाँ सम्पन्न हुए विधानसभा चुनावों में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरने के बाद भी सरकार बनाने की तमाम कोशिशें नाकाम साबित हुईं, बल्कि उसने अपना सबसे पुराना साथी भी खो दिया।

वरिष्ठ पत्रकारों से चर्चा करने पर यह निष्कर्ष निकलता है कि संघ परिवार को चिंतित होने का समय आ गया है, क्योंकि मोदी की भाजपा के पतन का सिलसिला झारखंड और दिल्ली में भी देखने को मिलेगा।

झारखंड में अगले ही महीने चुनाव परिणाम आने हैं।

इसके बाद दिल्ली विधानसभा चुनाव होंगे वहाँ भी परिणाम मोदी की भाजपा के ख़िलाफ़ आने की संभावना है। केंद्र में सरकार होने की वजह से राज्यपाल की मदद से सत्ता में बने रहने का मकड़जाल जो बुना गया था, वो फेल हो गया है उसकी हर सियासी चाल नाकाम रही। अब क्या अन्य राज्यों में छोटे-छोटे दल अपनी त्योरी चढ़ाकर मोदी और अमित से बात करेंगे।

जैसा राजनीतिक पंडितों का मानना है कि अब इस जोड़ी की पकड़ न केवल एनडीए बल्कि राज्यों की सियासत पर ठण्डी पड़ती जाएगी।

The possibilities of a new political polarization in the country cannot be ruled out.

सियासी पंडितों का मानना है कि देश में एक नए सियासी ध्रुवीकरण की संभावनाओं से इंकार नहीं किया जा सकता है। पिछले महीने जब महाराष्ट्र और हरियाणा के चुनावी नतीजे आए थे, तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सियासी पंडितों से कहा भी था कि क़यास लगाने शुरू न कर देना। उनको पता था कि आगे क्या होने वाला है।

इन परिस्थितियों से साफ़ ज्ञात हो रहा कि मोदी की भाजपा की विरोधी पार्टियाँ आगे की रणनीति सब कुछ भूल कर तय नहीं करेंगी उनके सामने पूरा सियासी परिदृश्य होगा कि उन्हें अब क्या फ़ैसला करना चाहिए।
BJP Logo

जहाँ तक सियासी पंडितों को लगता है कि जनता को मोदी की भाजपा का विकल्प देने का काम किया जाएगा, जिससे मोदी की भाजपा को सियासी नुक़सान होने से कोई नहीं रोक पाएगा। अब जनता हिन्दू मुसलमान की सियासत से तंग आ चुकी है, उसे रोज़गार चाहिए, अच्छी शिक्षा, सड़कें व अच्छी क़ानून-व्यवस्था चाहिए जो मोदी की भाजपा की सरकारें देने में नाकाम साबित हो रही है, गिरती अर्थव्यवस्था से लोग बेरोज़गार हो रहे हैं, बड़े उद्योगपतियों को सर्दी में भी पसीने छूट रहे हैं और मोदी की भाजपा व उसकी सियासी रीढ़ आरएसएस के चीफ कहते हैं कि गिरती अर्थव्यवस्था पर बात ही नहीं करनी चाहिए।

ये सब हालात मोदी की भाजपा के विरुद्ध देश हित में विपक्षी पार्टियों के नेताओं को एक साथ बैठने पर मजबूर करेंगे, जिसके बाद एक राष्ट्रीय विकल्प खड़ा होने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है। इसमें कांग्रेस की भूमिका आने वाले दिनों में एक बार फिर अहम होने जा रही है।

साम दाम दंड भेद अपना कर राज्यों में सत्ता बनाए रखने की कोशिश मोदी की भाजपा को छोटे दलों से दूर कर रही है, जिनकी बैसाखियों के सहारे मोदी की भाजपा 2 से 303 तक पहुँची है और केन्द्र में सत्तारूढ़ हुई है, अब वह उन्हें ही निगलने पर उतारूँ हो गई है जिसका उनको अहसास हो गया है। शिवसेना के साथ जो हुआ वह तो मात्र एक मिसाल भर है।

महाराष्ट्र में संविधान की परवाह किए बिना राष्ट्रपति शासन हटाना और रातोंरात सरकार बना लेना बिना गुणाभाग के ये क्या दर्शाता है ये भी सब समझ रहे हैं।

परिणाम आने के बाद 18 दिन किस तरह लगा दिए गए, किसी तरह मोदी की भाजपा की सरकार बन जाए फिर भी कुछ नहीं हुआ। संयुक्त मोर्चा सरकार ने तत्कालीन कल्याण सिंह सरकार को इसी तरह के फ़ार्मूलों का प्रयोग करते हुए हटा दिया था तब भाजपा के शीर्ष नेता स्व. अटल बिहारी वाजपेयी को दिल्ली में आमरण अनशन पर बैठना पड़ा था। आज की मोदी की भाजपा ने उससे ज़रा भी सबक़ नहीं लिया, अगर लिया होता तो शायद वह महाराष्ट्र में ये सब नहीं करते जो उन्होंने किया है।

संवैधानिक मामलों के जानकारों से बात करने पर पता चलता है कि इसमें कोई शक नहीं है कि समर्थन के पत्रों का सत्यापन किए बग़ैर ही राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने देवेंद्र को सरकार बनाने का मौक़ा दिया जिसे संवैधानिक नहीं कहा जा सकता है। ख़ैर महाराष्ट्र के बाद अब अगला महाराष्ट्र किस राज्य को बनाया जाएगा या मोदी की भाजपा खुद ही महाराष्ट्र बन जाएगी इस बात पर भी सियासी गलियारों में चर्चा का दौर शुरू हो चुका है।