खतरे आधुनिक खेती के : जिस डाल पर बैठे हैं, हम उसी को काट रहे हैं

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प्रकृति की अपनी एक व्यवस्था है जिसमें भरपूर उत्पादन होता है, वह भी बिना रासायनिक खाद और कीटनाशक का इस्तेमाल किए हुए, परंतु इस उत्पादन को वही व्यक्ति प्राप्त कर सकता है, जिसके पास प्रकृति के नियम-कायदों, कानूनों को समझने का नजरिया हो। लालच और अंहकार में डूबे व्यक्तियों को यह उत्पादन दिखेगा ही नहीं क्योंकि ये लोग प्रकृति के सहायक हैं ही नहीं। इन लालची व्यक्तियों को प्रकृति के अमूल्य तत्वों का सिर्फ दोहन (Only harnessing the priceless elements of nature) करना आता है, बेहिसाब खर्च करना आता है। इसके चलते जब ये तत्व रीत जाते हैं और प्रकृति का संतुलन (balance of nature) बिगड़ने लगता तो ये लालची लोग इसका ठीकरा किसी और पर फोड़ने लगते हैं।

आधुनिक सुविधाभोगी इंसान के लिए जलवायु परिवर्तन एक बहुत बड़ी चुनौती

वर्तमान में जलवायु परिवर्तन सुविधाभोगी आधुनिक इंसान के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती (Climate change a big challenge for modern convenience man) बनकर सामने आ रहा है। दिन-ब-दिन यह समस्या बढ़ती ही जा रही है, पर मजाल है कि किसी व्यक्ति के कान पर जूं भी रेंग जाए। व्यक्ति तो छोड़िए, सरकारों के कानों पर भी जूं नहीं रेंग रही है, सिर्फ बड़ी-बड़ी घोषणाएं हो रही हैं, पर जमीनी स्तर पर सब निल बटे सन्नाटा ही पसरा हुआ है।

तो किसान होने के नाते हमें क्या करना चाहिए?

यहां हम इस पर बात नहीं करेंगे कि दुनिया भर की सरकारों को क्या करना चाहिए क्योंकि वह हमारे हाथ में नहीं है। हम तो इस पर बात करेंगे कि किसान होने के नाते (being a farmer), भू-स्वामी होने के नाते और एक धरतीवासी होने के नाते हम क्या कर सकते हैं। अव्वल तो हमको अपनी भूलने की आदत सुधारनी होगी, बारम्बार आ रहीं आपदाओं को खतरे की घंटी मानना होगा और भविष्य में इन आपदाओं की तीव्रता और न बढ़े, इसके लिए अपने लालच पर लगाम लगाना सीखना होगा। प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन बंद करते हुए हमें आवश्यक और अनावश्यक में अंतर (difference between necessary and unnecessary) करना सीखना होगा। हमें अपने उपभोग की गति का प्रकृति के पुनर्चक्रण की गति से सामंजस्य बैठाना होगा।

प्रकृति के पुनर्चक्रण में हमें सहयोग करना होगा।

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Farmer File photo

दूसरे हम प्रकृति से जितना ले रहे हैं, उतना ही वापस लौटाने का संकल्प करना पड़ेगा। पहले जमाने में यदि कोई रिश्तेदार या पड़ोसी कोई वस्तु आपको देने घर आता था तो लोग उसको खाली हाथ नहीं जाने देते थे, बल्कि उसी के बर्तन में कुछ-न-कुछ भरकर वापस देते थे। प्रकृति के साथ हमें भी यही करना है। यदि हम प्रकृति से 100 प्रतिशत तत्व ले रहे हैं, तो कम-से-कम 70 प्रतिशत तो उसे लौटाएं, तब जाकर संतुलन बनेगा और तब हम भी खुश रहेंगे और प्रकृति भी खुश रहेगी।

प्रकृति से जो ले रहे हैं हम उसको वापस लौटाना होगा

कृषि उत्पादन के लिए हम प्रकृति से जो दो चीज़ें -पानी और पेड़- सबसे अधिक ले रहे हैं उन्हें प्रकृति को वापस लौटाना होगा। पानी की सबसे ज्यादा खपत खेती में होती है और खेती के लिए साल-दर-साल अधिकाधिक जंगल साफ किए जा रहे हैं। इन दो चीजों की भरपाई कैसे करेंगे? इसके लिए हमें अपने-अपने खेतों में छोटे-छोटे तालाब एवं कुएं बनवाने होंगे और खूब सारे पेड़ लगाने होंगे। किसानों को कुल जमीन के 10 प्रतिशत हिस्से में बागवानी और 10 प्रतिशत हिस्से में तालाब या कुएं की व्यवस्था करनी चाहिए।

तालाब और कुएं बनाने से जहां एक ओर सिंचाई के लिए भरपूर पानी उपलब्ध होगा, वहीं खेत की मिट्टी और हवा में नमी बढ़ने से उत्पादन में वृद्धि होगी। साथ ही भू-जल स्तर भी बढ़ेगा। बागवानी से पेड़ों की संख्या में इजाफा होगा, जिससे तापमान कम होगा, वातावरण में कार्बन का स्तर घटेगा और बारिश बढ़ेगी। मिट्टी का क्षरण रुकेगा, जमीन अधिक उपजाऊ बनेगी। किसानों के मित्र पक्षियों एवं कीटों की संख्या बढ़ने से फसलों का परागण एवं कीट-नियंत्रण अधिक प्रभावी तरीके से होगा।

तीसरे, हमें अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के वैकल्पिक स्रोत तलाशने होंगे, ताकि प्रकृति को नुकसान पहुंचाने वाले काम बंद हो सकें। उदाहरण के लिए, आज बिजली हमारे लिए उतनी ही महत्वपूर्ण हो गई है जितनी कि हवा। अभी अधिकांश बिजली कोयला जलाकर पैदा की जाती है, और कोयले का दहन (combustion of coal) जलवायु परिवर्तन की समस्या का सबसे बड़ा कारण है। इसका दूसरा बड़ा कारण है – जीवाश्म ईंधनों (पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस) का दहन। यदि हम अपनी बिजली और अपना ईंधन किन्हीं और स्रोतों से प्राप्त कर सकें तो हम प्रकृति को प्रदूषित होने से बचा सकते हैं।

हम किसानों को घरों और खेतों में अधिक-से-अधिक सोलर-ऊर्जा का उपयोग करना चाहिए। यदि हर खेत में सोलर पंप लगा दिए जाएं तो कितनी बिजली की बचत होगी। ईंधन के लिए गोबर-गैस या बॉयो-गैस का उपयोग बहुत अच्छा विकल्प है।

तीसरी चीज है- प्राकृतिक खाद का उपयोग।

रासायनिक खाद एवं कीटनाशकों के उत्पादन एवं परिवहन में बड़ी मात्रा में ऊर्जा खर्च होती है तथा जीवाश्म ईंधनों का उपयोग (use of fossil fuels) होता है। ये रासायनिक उर्वरक व कीटनाशक मिट्टी, पानी और हवा को भी बुरी तरह प्रदूषित करते हैं। इनके स्थान पर प्राकृतिक उर्वरकों का उपयोग करें। एकल फसल खेती से मिट्टी में पोषक तत्वों की कमी हो जाती है और जैव-विविधता खतरे में पड़ जाती है, इसलिए हमें चाहिए कि हम बहुफसलीय खेती करें, इससे खेती में हमारा जोखिम भी कम होगा और प्रकृति का संतुलन भी बना रहेगा।

उपरोक्त सुझावों पर ईमानदारी, दृढ़ निश्चय और संकल्पता के साथ कार्य करना अत्यावश्यक है। इसमें सरकार, जनता और किसान सभी की भागीदारी जरूरी है। इस काम में सबसे बड़ा रोड़ा हमारा लालच है, जिसने हमें अंधा कर दिया है। हम देख नहीं पा रहे हैं कि हम उसी डाल को काट रहे हैं जिस पर बैठे हैं। हमें इस लालच को तुरंत छोड़ना होगा और प्रकृति से नाता जोड़ना होगा। तभी जाकर हम पर्यावरण से संबंधित सभी समस्याओं से निजात पा सकेंगे। इससे किसानों की समस्याओं का भी निराकरण हो जाएगा।

पवन नागर

लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। मूलतः देशबन्धु में प्रकाशित लेख

amazing view of nature in India | भारत में प्रकृति का अद्भुत दृश्य | hastakshep | हस्तक्षेप

Dangers of modern farming: We are cutting the branch on which we are sitting

जलवायु आपदा का सबसे तीव्रतम प्रभाव झेलने वाले लोग ही जलवायु नीति-निर्माण से क्यों ग़ायब हैं?

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जलवायु आपदा और जलवायु नीति-निर्माण

कहीं समुद्री जल में विलुप्त न हो जाएँ छोटे द्वीप

Why people who are most-impacted by climate disasters get subtracted from policy making?

पैसिफिक क्षेत्र के द्वीप देश (Pacific sector island country), फ़िजी, की मेनका गौंदन ने कहा है कि पैसिफ़िक महासागर (प्रशांत महासागर) दुनिया का सबसे विशाल सागर है परंतु भीषण जलवायु आपदाएँ भी यहीं पर व्याप्त हैं। पैसिफ़िक क्षेत्र के द्वीप देशों ने जलवायु को सबसे कम क्षति पहुँचायी है परंतु जलवायु आपदा का सबसे भीषण कुप्रभाव इन्हीं को झेलना पड़ रहा है। प्रशांत महासागर का तापमान बढ़ रहा है जिसके कारणवश जल-स्तर में बढ़ोतरी हो रही है और छोटे पैसिफ़िक द्वीप देश जैसे कि नाउरु और तुवालू पर यह ख़तरा मंडरा रहा है कि कहीं वह समुद्री जल में विलुप्त न हो जाएँ।

कौन हैं मेनका गौंदन?

मेनका गौंदन, फ़िजी महिला कोश की अध्यक्ष हैं और २४वें इंटरनेशनल एड्स कॉन्फ़्रेन्स में हिंदी-भाषी प्रकाशन के विमोचन सत्र को सम्बोधित कर रही थीं।

यह हिंदी-भाषी प्रकाशन, “ग्रह ए में जलवायु न्याय”, मलेशिया के एरो (एशियन पैसिफ़िक रिसोर्स एवं रीसर्च सेंटर) ने प्रकाशित किया है और भारत-स्थित सीएनएस (सिटिज़न न्यूज़ सर्विस) ने इसका अनुवाद किया है।

मेनका पूछती हैं, “१९८०-१९९० के दशक में जब पैसिफ़िक क्षेत्र में परमाणु परीक्षण हो रहे थे तब से पैसिफ़िक क्षेत्र की महिलाओं ने जलवायु न्याय का संघर्ष बहादुरी से लड़ा है। जलवायु संवाद हो या पर्यावरण न्याय की मुहम, महिलाओं ने पहली पंक्ति से नेतृत्व प्रदान किया है। पर जलवायु नीति निर्माण में महिलाओं की भागेदारी पर अंकुश क्यों? जो लोग जलवायु परिवर्तन के कारण सबसे भीषण रूप में प्रभावित हुए हैं, जलवायु संवाद और नीति निर्माण में उनकी भागेदारी पर ग्रहण क्यों?”।

एरो की निदेशिका सिवानंथी थानेनथिरन ने कहा कि कोविड-१९ महामारी के पिछले ढाई सालों में अनेक जलवायु आपदाएँ भी घटित हुई हैं। इनके कारण, स्वास्थ्य व्यवस्था और बाक़ी ढाँचागत प्रणाली भी ध्वस्त होती हैं, और यौन और प्रजनन स्वास्थ्य सेवाएँ लोगों की पहुँच से बाहर हो जाती हैं। एचआईवी सम्बंधित सेवाएँ जैसे कि परीक्षण, जीवनरक्षक एंटीरेट्रोवाइरल उपचार, आदि भी बाधित होते हैं।

जलवायु आपदाओं के दौरान पलायन और असुरक्षित यौन सम्बंध का खतरा

जलवायु आपदाओं के दौरान स्थानीय लोग अकसर दूर-दराज़ जाने को मजबूर हो जाते हैं जिससे कि दैनिक ज़रूरतों के लिए पानी, भोजन और ऊर्जा-स्त्रोत लकड़ी आदि मिल सके। इसीलिए लड़कियों और लड़कों पर होने वाली अनेक प्रकार की हिंसा का ख़तरा बढ़ जाता है। अनचाहे गर्भ हो या यौन संक्रमण जिनमें एचआईवी भी शामिल है, इनका अनुपात इस दौरान अकसर बढ़ जाता है। ऐसा भी होता है कि इन आपदाओं के कारण स्थानीय लोगों को विस्थापित होना पड़ा हो। ऐसे में परिवार नियोजन सेवाओं के बाधित होने के कारण, और पलायन के दौरान लोगों की मजबूरी के कारण, असुरक्षित यौन सम्बंध का अनुपात भी बढ़ता है।

सिवानंथी ने कहा कि यह समझने की ज़रूरत है कि आपदा में समाज के हाशिये पर रह रहे लोग सबसे बुरी तरह से प्रभावित होते हैं।

फ़िलिपींस की प्रख्यात जलवायु न्याय कार्यकर्ती तेतेत-नेरा लौरॉन (Philippines’s famous climate justice worker Tetet Nera Lauron) ने कहा कि जलवायु आपदाओं के कारण जो भी प्रगति प्रजनन स्वास्थ्य और महिला अधिकार पर हुई है वह पलट रही है, जैसे कि, प्रजनन और स्वास्थ्य सेवाओं का बाधित या ध्वस्त होना, महिलाओं को बराबरी के साथ वेतन न मिलना आदि। एरो और अन्य शोध यह प्रमाणित करते हैं कि जलवायु आपदाओं में लड़कियों और महिलाओं को अधिक हिंसा झेलनी पड़ती है।

फ़िथरियाह इसकंदर जो युवा चिकित्सक हैं और पर्यावरण पर अनेक वर्षों से कार्य कर रही हैं, ने कहा कि यदि बच्चों और युवाओं को जलवायु परिवर्तन को रोकने की मुहिम में नहीं शामिल किया गया तो यह आने वाले भविष्य में उसी तरह से प्राकृतिक संसाधनों का दोहन कर सकते हैं जैसा कि हमारी पीढ़ी ने किया है। यह हमारी ज़िम्मेदारी है कि हम युवाओं को भागीदार बनाएँ और निर्णय लेने की प्रक्रिया में बराबरी के साथ शामिल करें।

कनाडा में हो रहे इस सत्र का संचालन सीएनएस की संस्थापिका और लारेटो कॉन्वेंट कॉलेज की पूर्व वरिष्ठ शिक्षिका शोभा शुक्ला कर रही थीं।

जब हम जलवायु संवाद में, महिला जागरूकता, सुरक्षा और सहभागिता की बात कर करते हैं तो यह मूल्यांकन करना ज़रूरी है कि क्या सही मायने में पुरुष और महिला सहभागी हैं? जलवायु आपदा न भी हो तब भी ऐसा क्यों है कि अक्सर महिलाओं द्वारा स्वास्थ्य लाभ उठाने में देरी हो जाती है?

नारीवादी शोभा शुक्ला ने जोर देते हुआ कहा कि लैंगिक असमानता कोई सृष्टि द्वारा नहीं रचित है बल्कि दकियानूसी पित्रात्मक सामाजिक ढाँचे से जनित है। यह अनेक घरों का सच है कि लड़की हो या महिला अक्सर घर-घर में वही सबकी देखभाल करती है। जब आपदा आती है तब भी महिलाओं पर सबकी देखभाल करने का अतिरिक्त बोझ आता है- भले ही वह उनको ख़तरे में डाले। जैसे कि जलवायु आपदा में विस्थापित होने के बावजूद वह दूर-दराज़ तक पानी, भोजन, या खाना बनाने के लिए लकड़ी लेने जाती हैं जो उन पर होने वाली हिंसा का ख़तरा बढ़ाता है। शोभा शुक्ला ने सवाल उठाया कि ऐसी कौन सा जीन है जो पुरुष को देखभाल करने नहीं देती?

शोभा शुक्ला का मानना है कि जलवायु परिवर्तन का स्थायी समाधान सिर्फ़ नारीवादी विचारधारा पर आधारित ऐसे विकास ढाँचे के ज़रिए निकलेगा जो सबके सामाजिक न्याय और पर्यावरण संरक्षण को केंद्र में रखता हो।

जलवायु संवाद और नीति निर्माण में समाज के जो लोग सबसे अधिक आपदाओं से प्रभावित होते हैं और हाशिए पर रह रहे हैं, उनको शामिल करना और उनकी महत्वपूर्ण भागेदारी सुनिश्चित करना ज़रूरी है।

बॉबी रमाकांत

सीएनएस (सिटिज़न न्यूज़ सर्विस)

Those who suffer from climate disaster, why are you disappear of climate policy-making?

संकटग्रस्त ‘मैंग्रोव पारिस्थितिक तंत्र’ का संरक्षण वक्त की जरूरत!

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जन-भागीदारी से होगा ‘मैंग्रोव पारिस्थितिक तंत्र’ का संरक्षण

जानिए मैंग्रोव क्या होते हैं?

नई दिल्ली, 27 जुलाई, 2022: मैंग्रोव (Mangroves) उष्णकटिबंधीय वृक्ष और झाड़ियाँ हैं, जो ज्वारीय क्षेत्रों में समुद्र के किनारे, लवणीय दलदल और कीचड़ भरे तटों पर पाये जाते हैं। जलवायु परिवर्तन (Climate change) का सामना करने, जैव विविधता की रक्षा (protect biodiversity), और सुनामी जैसी प्राकृतिक आपदाओं के जोखिम को कम करने में मैंग्रोव अहम् भूमिका निभाते हैं।

समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र की मजबूत कड़ी होने के साथ-साथ  पर्यावरण, अर्थव्यवस्था तथा समुदायों को लाभ पहुँचाने के लिए विख्यात मैंग्रोव विभिन्न मानवीय गतिविधियों के कारण आज स्वयं संकट में हैं।

जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन (UNFCCC) के एक अनुमान के मुताबिक दुनिया भर में करीब 67% मैंग्रोव आवास नष्ट हो चुके हैं, या फिर उनका क्षरण हो रहा है।

सुंदरबन, भितरकनिका, पिचवरम, चोराओ और बाराटांग इत्यादि भारत के कुछ खूबसूरत मैंग्रोव क्षेत्रों के रूप में जाने जाते हैं, जो आज सबसे अधिक संकटग्रस्त मैंग्रोव पट्टियों में शामिल हैं।

जैव-विविधता का एक अनूठा पारिस्थितिकी तंत्र है मैंग्रोव

मैंग्रोव दुनिया में पेड़ों की एकमात्र प्रजाति है, जो खारे पानी को सहन करने में सक्षम है। मैंग्रोव जैव-विविधता का एक अनूठा पारिस्थितिकी तंत्र है, जिसमें सैकड़ों मछलियाँ, सरीसृप, कीट, सूक्ष्मजीव, शैवाल, पक्षी और स्तनपायी प्रजातियाँ पायी जाती हैं। वे ज्वार की लहरों के अवशोषक के रूप में कार्य करते हैं, और अपनी उलझी हुई जड़ प्रणालियों के साथ तलछट को स्थिर करके मिट्टी के कटाव को रोकने में मदद करते हैं।

मैंग्रोव न केवल जीवों एवं पादप प्रजातियों को आवास प्रदान करते हैं, बल्कि उनकी खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए, तटीय समुदाय के लोगों के जीवन का समर्थन करने के साथ-साथ कार्बन सिंक के रूप में भी प्रभावशाली भूमिका निभाते हैं। मैंग्रोव आवास क्षेत्र; उन्हें दुनिया के अधिकांश निम्न और मध्यम आय वाले देशों में विशेष रूप से महत्वपूर्ण बनाते हैं, जहाँ वे पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं और आजीविका की एक विस्तृत श्रृंखला प्रदान करते हैं।

वन सर्वेक्षण रिपोर्ट (forest survey report आईएसएफआर)-2021 के मुताबिक देश में कुल मैंग्रोव क्षेत्र 4,992 वर्ग किलोमीटर है।

वन सर्वेक्षण रिपोर्ट के अनुसार, यह सही है कि वर्ष 2019 के आकलन की तुलना में देश के मैंग्रोव क्षेत्र में 17 वर्ग किलोमीटर की वृद्धि हुई है। लेकिन, नुकसान के अनुपात में यह भरपाई नाकाफी ही कही जाएगी।

मैंग्रोव क्षेत्र में वृद्धि दिखाने वाले शीर्ष तीन राज्य ओडिशा (08 वर्ग किलोमीटर), इसके बाद महाराष्ट्र (04 वर्ग किलोमीटर) और कर्नाटक (03 वर्ग किलोमीटर) हैं। अन्य तटीय राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों को भी इस दिशा में प्रभावी कदम उठाने की जरूरत है, जिससे मैंग्रोव कवर को बढ़ाया जा सके। 

मैंग्रोव के महत्व (importance of mangroves) को देखते हुए इसके संरक्षण की तीव्रता से आवश्यकता महसूस की जा रही है। संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक तथा सांस्कृतिक संगठन (यूनेस्को) मैंग्रोव की निगरानी, वैज्ञानिक अनुसंधान और सतत् उपयोग को सुनिश्चित करने के लिए गहनता से कार्य कर रहा है। यूनेस्को द्वारा निर्दिष्ट साइटों, जैसे बायोस्फीयर रिजर्व, विश्व धरोहर स्थलों और ग्लोबल जियोपार्क में मैंग्रोव को शामिल करने से दुनियाभर में मैंग्रोव पारिस्थितिक तंत्र से संबंधित ज्ञान, प्रबंधन और संरक्षण गतिविधियों में सुधार करने में योगदान मिलता है।

अन्नामलाई विश्वविद्यालय के मानद प्रोफेसर और यूजीसी-बीएसआर फैकल्टी फेलो के. काथिरेसन ने अत्यधिक दोहन, खराब प्रबंधन, बुनियादी ढांचे के उपयोग में वृद्धि, तेजी से बढ़ती जलीय कृषि और चावल की खेती को मैंग्रोव क्षेत्रों के संकटग्रस्त होने के कारणों के रूप में रेखांकित किया है।

प्रोफेसर काथिरेसन मैंग्रोव की मैपिंग, और इस तरह सर्वाधिक उपयुक्त मैंग्रोव प्रजातियों का चयन करके, मैंग्रोव पट्टियों को पुनर्जीवित करने की आवश्यकता पर जोर देते हैं।

भारत में मैंग्रोव संरक्षण एवं संवर्द्धन की पहल सरकारी एवं गैर-सरकारी स्तरों पर की जा रही है। सरकार ने देश में वनों के संरक्षण और संवर्धन के लिए प्रोत्साहन के साथ-साथ नियामक उपायों के माध्यम से कदम उठाए हैं।

मैंग्रोव और प्रवाल भित्तियों के संरक्षण और प्रबंधन पर राष्ट्रीय तटीय मिशन कार्यक्रम के अंतर्गत जागरूकता प्रसार के प्रयास किये जा रहे हैं। इसके तहत, सभी तटीय राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में मैंग्रोव संरक्षण और प्रबंधन के लिए वार्षिक कार्ययोजना कार्यान्वित की जाती है।

हाल में, भारत की जिन पाँच आर्द्रभूमियों को रामसर की अंतरराष्ट्रीय महत्व की आर्द्रभूमि के रूप में मान्यता मिली है, उनमें तमिलनाडु का पिचवरम मैंग्रोव क्षेत्र शामिल है।   

पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय तटीय संसाधनों के संरक्षण के उद्देश्य से तीन राज्यों – गुजरात, ओडिशा और पश्चिम बंगाल के तटीय हिस्सों में एकीकृत तटीय क्षेत्र प्रबंधन परियोजना का संचालन कर रहा है, जिसकी गतिविधियों में मैंग्रोव का रोपण उल्लेखनीय रूप से शामिल है। इसके अलावा, महाराष्ट्र सरकार द्वारा मैंग्रोव संरक्षण के लिए समर्पित एक ‘मैंग्रोव सेल’ की स्थापना की गई है। मैंग्रोव और समुद्री जैव विविधता संरक्षण फाउंडेशन भी मैंग्रोव कवर को बढ़ाने और वन विभाग के तहत अनुसंधान और आजीविका गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए बनाया गया है।

केरल के वेम्बनाड और कन्नूर क्षेत्रों में मैंग्रोव का संरक्षण और प्रबंधन, तटीय क्षेत्रों में रोपण के लिए कैसुरिना के पौधे और मैंग्रोव से जुड़ी प्रजातियों को जनता को वितरित किया जाता है। वर्ल्ड वाइड फंड फॉर नेचर (WWF) द्वारा महाराष्ट्र, गोवा, गुजरात, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, केरल, ओडिशा, पश्चिम बंगाल और कर्नाटक समेत नौ तटीय राज्यों के नागरिकों को ‘मैजिकल मैंग्रोव’ अभियान के माध्यम से मैंग्रोव संरक्षण से जोड़ने की पहल की गई है। यह जानकारी, पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन राज्य मंत्री अश्विनी कुमार चौबे द्वारा कुछ समय पूर्व राज्य सभा में प्रदान की गई है।

मैंग्रोव संरक्षण और प्रबंधन के लिए; सर्वेक्षण एवं सीमांकन, वैकल्पिक एवं पूरक आजीविका, सुरक्षा उपायों और शिक्षा तथा जागरूकता गतिविधियों सहित कार्य-योजनाओं के कार्यान्वयन के लिए केंद्र प्रायोजित योजना के तहत सरकार तटीय राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों को सहायता प्रदान करती है। पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986; वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972; भारतीय वन अधिनियम, 1927; जैव विविधता अधिनियम, 2002; और समय-समय पर संशोधित इन अधिनियमों से जुड़े नियमों के तहत तटीय विनियमन क्षेत्र (सीआरजेड) अधिसूचना (2019) के माध्यम से विभिन्न नियामक उपाय इन प्रयासों को बल प्रदान करते हैं।

जलीय प्रदूषण के अन्य स्रोतों (Other sources of water pollution) के साथ-साथ तटीय क्षेत्रों में प्लास्टिक एवं अन्य कचरा जमा होने से भी मैंग्रोव वनों को नुकसान हुआ है। इस बात को पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय ने समझा है, और 75 दिनों तक चलने वाला अब तक का सबसे व्यापक समुद्र तटीय स्वच्छता अभियान शुरू किया है। 05 जुलाई को शुरू हुए ‘स्वच्छ सागर – सुरक्षित सागर’ नामक इस अभियान का औपचारिक समापन 17 सितंबर, 2022 को ‘अंतरराष्ट्रीय तटीय स्वच्छता दिवस’ के अवसर पर होगा।

स्वतंत्रता के 75वें वर्ष में भारत की 7500 किलोमीटर लंबी समुद्री तटरेखा की सफाई के लिए शुरू किया गया ‘स्वच्छ सागर – सुरक्षित सागर’ अभियान नागरिकों की व्यापक भागीदारी के साथ संचालित किया जा रहा है।

पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के अलावा, पर्यावरण वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, राष्ट्रीय सेवा योजना (NSS), भारतीय तटरक्षक बल, राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण, सीमा जागरण मंच, एसएफडी, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, पर्यावरण संरक्षण गतिविधि, और अन्य सामाजिक संगठनों एवं शैक्षणिक संस्थानों की भागीदारी से यह अभियान संचालित किया जा रहा है। उम्मीद की जानी चाहिए कि जन-भागीदारी से तटीय स्वच्छता सुनिश्चित करने के साथ-साथ मैंग्रोव पारिस्थितिक तंत्र के संरक्षण में मदद मिल सकेगी। (इंडिया साइंस वायर)

Conservation of the endangered ‘mangrove ecosystem’ is the need of the hour!

क्या अमरनाथ में बादल फटना जलवायु परिवर्तन का परिणाम है!

why and how do clouds burst

अमरनाथ में बादल फटना : जानिए बादल कब फटता है?

मानसून के रफ्तार पकड़ने के साथ जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्यों में बादल फटने, चट्टानें खिसकने और अचानक बाढ़ आने की घटनाएं होने लगी हैं। सबसे ताजा घटना अमरनाथ की पवित्र गुफा के नजदीक बादल फटने (Cloudburst in Amarnath) की है, जिसमें अनेक लोग मारे गए और कई अन्य लापता हो गए।

क्यों और कैसे फटते हैं बादल? आखिर क्यों फटता है बादल ? What is Cloud Bursting?

आइए समझते हैं बादल क्यों और कैसे फटता है? इस समय पूरे देश पर मानसून छा रहा है। ऐसे में नमी से भरी पूर्वी हवाएं (moist easterly winds) निचले स्तरों से सफर करती हुई पश्चिमी हिमालय तक पहुंच रही हैं। ये हवाएं ऊपरी स्तरों पर बह रही पश्चिमी हवाओं से टकरा रही हैं। परस्पर विपरीत दिशाओं से बह रही इन हवाओं के संगम से कश्मीर क्षेत्र में भारी मात्रा में पानी से लदे बादलों का निर्माण हो रहा है।

पहाड़ी इलाकों में हवा (wind in hilly terrain) तेजी से गश्त नहीं करती और कभी-कभी किसी इलाके में फंस कर रह जाती हैं, जिसकी वजह से मूसलाधार बारिश होती है और यहां तक कि बादल फटने की घटना भी घटित हो जाती है। अमरनाथ गुफा के पास भी ऐसी ही स्थिति बनी। कुल्लू में भी ऐसी ही मौसमी परिस्थितियों के कारण पिछले हफ्ते बादल फटने की घटना हुई।

बादल फटने की घटना को कैसे समझें

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बादल फटने की घटना (Badal fatna in Hindi) को ऐसे समझा जा सकता है कि जब किसी एक स्थान विशेष पर एक घंटे के अंदर गरज-चमक और तेज हवा के साथ 100 मिलीमीटर या उससे ज्यादा की बहुत भारी बारिश हो। वहीं, बारिश को तब बादल फटने की एक छोटी घटना के तौर पर परिभाषित किया जाता है जब किसी स्थान पर लगातार दो घंटे तक 50 मिलीमीटर से ज्यादा वर्षा हो। ऐसी ज्यादातर घटनाएं खासकर मानसून के मौसम में भारत के उत्तरी इलाकों में स्थित पहाड़ी क्षेत्रों में होती हैं।

भारत में बादल फटने की घटना कब होती है?

भारतीय क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन के आकलन संबंधी एक अध्ययन के मुताबिक “भारत में बादल फटने की घटना (cloudburst in india) तब होती है जब कम दबाव के क्षेत्र से जुड़े मानसूनी बादल बंगाल की खाड़ी से गंगा के मैदानों में उत्तर की तरफ हिमालय क्षेत्र तक बढ़ते हैं और बहुत भारी बारिश के रूप में ‘फट’ जाते हैं।”

बादल फटने का पूर्वानुमान (cloudburst forecast)

कश्मीर क्षेत्र में और अधिक लगातार बारिश के लिए मौसम की स्थितियां अनुकूल बनी रहती हैं। मानसून का पश्चिमी छोर उत्तरी इलाकों में हिमालय की तलहटी की तरफ बढ़ रहा है। इसकी वजह से उत्तराखंड में भारी से बहुत भारी बारिश होने की संभावना है। ऐसे में बादल फटने, अचानक बाढ़ आने और भूस्खलन की घटनाओं की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।

जलवायु परिवर्तन की वजह से बादल फटने की घटनाएं और भी तीव्र तथा बार-बार घटित होने की आशंका है। एक शोध के मुताबिक मानसूनी घटनाओं के विश्लेषण से जाहिर होता है कि भारतीय क्षेत्र में गरज-चमक के साथ बारिश होने के दिनों की संख्या (1950-1980 की अपेक्षा 1981-2010) में 34% की गिरावट आई है वहीं, 1969-2015 की अवधि के दौरान (हाई कॉन्फिडेंस) भारत के पश्चिमी तट तथा पश्चिमी हिमालय की तलहटी वाले इलाकों में कम समय में होने वाली अधिक तीव्र बारिश की घटनाओं (कम अवधि में बादल फटना और मिनी क्लाउडबर्स्ट) में बढ़ोत्तरी हुई है।

ग्लोबल वार्मिंग बढ़ा सकती है बादल फटने की घटनाएं

ग्लोबल वार्मिंग की वजह से ऊंचाई पर स्थित ग्लेशियल झीलों से पानी के अधिक तीव्रता से वाष्पीकरण के कारण पश्चिमी हिमालयी क्षेत्र में बादल फटने की घटनाओं की आवृत्ति (Frequency of cloudburst events in Western Himalayan region) में लगातार इजाफा हो रहा है। इसके अलावा वैश्विक तापमान में वृद्धि के साथ हवाएं पहले के मुकाबले ज्यादा नमी पकड़ रही हैं, लिहाजा यह बढ़ी हुई नमी कम समय में बहुत तेज बारिश की मात्रा को बढ़ा रही है। वैज्ञानिक प्रमाण पहले ही इस बात की पुष्टि कर चुके हैं कि आने वाले समय में अत्यधिक बारिश और भी ज्यादा तीव्र होगी और उसकी आवृत्ति भी बढ़ जाएगी।

ग्लोबल वार्मिंग की वजह से बादल फटने की और ज्यादा घटनाएं हो सकती हैं और उनकी तीव्रता भी पहले से ज्यादा होने के प्रबल आसार हैं।

Cloudburst in Amarnath is the result of climate change?

वायु व जल प्रदूषण लील रहा भारतीयों की आयु!

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प्रदूषण के बारे में आम धारणा

भारतीय समाज में एक आम धारणा व्याप्त है कि वायु, जल, ध्वनि आदि के प्रदूषण से और मोबाइल टावरों से निकलने वाली इलेक्ट्रो मैग्नेटिक किरणों (Electro magnetic rays emanating from mobile towers) से जिसे हम आम बोलचाल की भाषा में रेडिएशन कह देते हैं, से केवल तमाम तरह के परिंदों और वन्यजीवों पर ही दुष्प्रभाव पड़ता है, हम मनुष्य इससे बिल्कुल निरापद हैं। लेकिन यह सोच बिल्कुल भ्रामक और सच से बहुत दूर है।

वायु प्रदूषण से हर वर्ष असमय मर जाते हैं 70 लाख लोग

सच्चाई यह है कि दुनिया के सभी लोगों का हितचिंतक विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार भी इस दुनिया में वायु प्रदूषण से प्रतिवर्ष लगभग 70 लाख लोगों की असमय ही मौत हो जाती है, जिसमें 6 लाख बच्चे भी शामिल हैं।

हर पांचवें हृदयरोगी की मौत प्रदूषित वायु के कारण

कितने दुख की बात है कि हृदय संबन्धित बीमारियों से पीड़ित रोगियों की कुल मौतों में हर पांचवें व्यक्ति की मौत प्रदूषित वायु के कारण होती है।

रिपोर्ट में स्पष्ट है कि दिल की बीमारियों से पीड़ित मरीजों की जिंदगी दवाइयों और इस क्षेत्र में हो रहे शोध के अनुसार इस बात पर भी निर्भर करती है कि उनमें सांस के द्वारा उनके फेफड़ों में कैसी हवा अंदर जा रही है ?

स्पेन के मैड्रिड में यूरोपियन सोसाइटी ऑफ कार्डियोलॉजी की साइंस कांग्रेस या Science Congress of the European Society of Cardiology में पेश एक शोध के अनुसार पीएम 2.5 कणों का प्रदूषण पूरे सप्ताह औसत से एक ग्राम /घनमीटर अधिक रहने पर भी वेंट्रिकुलर एरिथीमिया या Ventricular arrhythmia मतलब असामान्य दिल की धड़कन की समस्या 2.4 प्रतिशत, वहीं पूरे सप्ताह पीएम 10 कणों का प्रदूषण एक ग्राम /घन मीटर अधिक होने पर वेंट्रिकुलर एरिथीमिय का खतरा 2.1 प्रतिशत तक बढ़ जाता है।

हकीकत यह है कि पर्यावरण प्रदूषण सिर्फ जलवायु परिवर्तन के लिए ही खतरा का विषय नहीं है, बल्कि आम लोगों के स्वास्थ्य के लिए भी यह बेहद खतरनाक है।

यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो के एनर्जी पॉलिसी इंस्टीट्यूट या Energy Policy Institute at the University of Chicago ने अपनी रिपोर्ट में भारत खतरनाक ढंग से बढ़ रहे प्रदूषण के संबंध में स्पष्ट तौर पर कहा है कि अगर इसे 25 फीसदी नीचे लाने में कामयाबी मिल गई तो भारतीय लोगों के जीवन प्रत्याशा या Life Expectancyमें राष्ट्रीय स्तर पर 1.4 साल और दिल्ली में 2.6 साल तक की बढ़ोत्तरी हो सकती है। भारत में अत्यधिक वायु प्रदूषण यहां के देशवासियों को स्वस्थ और लंबा जीवन देने की तमाम कोशिशों पर एक तरह से पानी फेर देने का काम करती है।

यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो के एनर्जी पॉलिसी इंस्टीट्यूट ने हाल ही में जो एयर क्वालिटी लाइफ इंडेक्स रिपोर्ट (air quality life index report) जारी की है, वह बताती है कि सिर्फ खराब हवा भारत जैसे देशों के लोगों की आयु औसतन 5 साल तक कम कर देती है।

सबसे बुरा हाल भारत की राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली और एनसीआर का है। यहां तो वायु प्रदूषण लोगों की जिंदगी के 10 साल तक छीन ले रहा है।

दुनिया में प्रदूषण के मामले में भारत की राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली अव्वल

अत्यधिक वायु प्रदूषण से भारत में हो रही बीमारियों और उससे मरने वाली घटना कोई नई या चौंकाने वाली बात नहीं है। वायु प्रदूषण के दुष्प्रभावों की चर्चा इस देश और अंतरराष्ट्रीय मंचों से भी लंबे समय से सुनाई देती आ रही है। प्रदूषण संबंधी हर राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट इस तथ्य को रेखांकित करती है कि दिल्ली की हवा में प्रदूषण का स्तर (Delhi’s air pollution level) हद दर्जे तक बढ़ा हुआ है और यह भी कि भारत के तमाम छोटे-बड़े शहरों में हवा अत्यधिक विषैली होती जा रही है।

इस रिपोर्ट में भी भारत को दुनिया का दूसरा सबसे प्रदूषित देश बताया गया है तो भारत की राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली का तो दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों में गिनती होती रही है।

पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार सिगरेट और बीड़ी पीने से मानव स्वास्थ्य को उतना नुकसान नहीं होता है, जितनी हवा की खराब क्वॉलिटी की वजह से हो रहा है।

भारत के 51 करोड़ लोग प्रदूषण से प्रभावित

भारत में विशेषकर उत्तर भारत में वायु प्रदूषण की हालत (Condition of air pollution in North India) इतनी गंभीर है कि इस देश की कुल जनसंख्या की 40 प्रतिशत आबादी मतलब लगभग 51 करोड़ लोग अपने जीवन के 7.6 साल इसकी भेंट चढ़ाने को मजबूर हैं। भारत सरकार के नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम या National Clean Air Program एनसीएपी का उद्देश्य है कि वर्ष 2024 तक हवा में पर्टिक्युलेट मैटर के स्तर को 2017 के स्तर के मुकाबले 20 से 30 फीसदी नीचे लाना है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर इसे 25 फीसदी तक नीचे लाने में भी कामयाबी मिल गई तो जीवन प्रत्याशा में राष्ट्रीय स्तर पर 1.4 साल और दिल्ली में 2.6 साल तक इजाफा हो जाएगा। लेकिन यह तो भविष्य में 2024 के लिए की गई वादे की बात है। हकीकत इससे ठीक विपरीत है।

वायु प्रदूषण संबंधित जनवरी 2022 में आई एक रिपोर्ट के अनुसार नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम के लागू होने के तीन वर्ष बाद भी दिल्ली की हवा में प्रदूषण का स्तर कम करने में कोई खास सफलता  नहीं मिली है। पिछले दो दशकों में आर्थिक विकास, औद्योगीकरण और ईंधन की खपत में बेहिसाब बढ़ोत्तरी होने से हवा में प्रदूषण का स्तर और बढ़ गया है। मतलब केवल वायदे करने से बात नहीं बनने वाली है, इसके लिए ईमानदारी, प्रतिबद्धता और वास्तविक जमीनी धरातल पर काम करना ही होगा। कोई ऐसा रास्ता निकालना ही होगा, जिससे न्यूनतम आर्थिक नुकसान उठाकर हवा के प्रदूषण को भी कम किया जा सके।

प्रदूषण के क्या दुष्प्रभाव हैं ?

अत्यधिक वायु प्रदूषण से सांस की कई बीमारियों के साथ आंखों में जलन, हाईपरटेंशन, डिप्रेशन, डायबीटीज और हार्ट अटैक जैसी कई गंभीर बीमारियां भी हो सकतीं हैं।

हाल ही में हुए एक शोध के अनुसार, यातायात संबंधी प्रदूषण की वजह से बच्चों के दिमाग पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है और यह उनमें कई तरह के मानसिक विकारों को जन्म देता है।

एक अन्य शोध के अनुसार अत्यधिक प्रदूषण से औरतों में गर्भपात तक का भी खतरा हो जाता है।

पर्यावरण प्रदूषण हमारे स्वास्थ्य के लिए कितना ख़तरनाक होता जा रहा है, इसका अनुमान हम इस प्रकार लगा सकते हैं कि वैज्ञानिकों के अनुसार आज सांस लेने वाली हवा से लेकर पानी, फल, सब्जियां, दूध, मिठाईयां, दवा आदि से लेकर बाजार में बिकने वाली रोजमर्रा की समस्त चीजें ही प्रदूषित हो गई हैं। और कई तरह की बीमारियों का कारण बन गई हैं।

प्रदूषण के कारक तत्व (factors of pollution)

वायु के प्रदूषित होने के कई कारण हैं, जिनमें मुख्य हैं फैक्टरी और कारखानों से निकलने वाला धुआं, एसपीएम यानी सस्पेंडेड पार्टिक्युलेट मैटर, सीसा और नाइट्रोजन ऑक्साइड, प्रदूषण फैलाने में कूड़ा-कचरा भी अहम भूमिका निभा रहा है।

भारत के गांवों, कस्बों और शहरों में अक्सर जगह-जगह कूड़ा जलाए जाने और फेंकने से कई हानिकारक गैसें उत्पन्न होती हैं और स्वच्छ हवा के साथ मिलकर उसे जहरीला बना देती हैं। इसके अतिरिक्त फैक्टरियों और कारखानों से निकलने वाला अति विषाक्त, रासायनिक कचरा भारत की कथित मां कही जाने वाली नदियों में यूं ही बहा दिया जाता है। गंदे नालों से निकलने वाला पानी नदियों में मिलकर उसे प्रदूषित बना देता है। यही प्रदूषित पानी लोगों में डायरिया, टाइफॉइड, पेचिश और हैजा जैसी अनेक जानलेवा बीमारियां फैलाने में अपनी अहम भूमिका निभाता है।

खुद को प्रदूषण से कैसे बचाएं ?      

पर्यावरण को बचाने के लिए सरकार को तो कुछ नीतियां बनानी ही चाहिए, लेकिन इसके अलावा अपने स्तर पर भी हमें कुछ कदम उठाने चाहिएं। जैसे ऐसे सामानों का हमें इस्तेमाल करना चाहिए जो रीयूजेबल हों यानी जिन्हें दोबारा हम  इस्तेमाल कर सकें।

जब भी कमरे या घर से बाहर निकलें तो सभी लाइटें और पंखे बंद कर दें। अगर आसपास ही किसी दुकान या पड़ोस में जाना हो, तो कार या पब्लिक ट्रांसपोर्ट के बजाय साइकिल का इस्तेमाल करें या फिर धीरे-धीरे ही सही पैदल चलकर जाएं।

जब प्रदूषण एक सीमा से भी अधिक हो तो जितना संभव हो हृदय के रोगियों को अपने घर के अंदर ही रहना चाहिए, अगर बाहर जाना बहुत जरूरी हो तो बढ़िया क्वालिटी के मास्क पहनकर ही बाहर निकलना चाहिए।

गाड़ी, घर या अन्य चीजों की साफ-सफाई के लिए खतरनाक केमिकल आधारित उत्पादों की जगह इको-फ्रेंडली उत्पाद इस्तेमाल करें।

निर्मल कुमार शर्मा

Air and water pollution is taking the age of Indians!

एनसीईआरटी द्वारा पर्यावरण पाठ्यक्रम में बदलाव पर टीचर्स अगेंस्ट द क्लाइमेट क्राइसिस नाराज

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नई दिल्ली, 08 जुलाई, 2022. हाल ही में राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (National Council of Educational Research and Training) एनसीईआरटी द्वारा स्कूल पाठ्यक्रम में किए गए कई बदलाव किए गए हैं। इन बदलावों पर टीचर्स अगेंस्ट द क्लाइमेट क्राइसिस (टीएसीसी) पर अपनी अप्रसन्नता व्यक्त की है।

टीएसीसी ने कहा है कि हम एनसीईआरटी द्वारा हाल ही में स्कूल पाठ्यक्रम में किए गए कई बदलावों से बहुत निराश हैं। इनमें से जो बातें सीधे तौर पर हमारी चिंताओं से संबंधित हैं, उनमें कक्षा 11 के भूगोल पाठ्यक्रम से ग्रीनहाउस गैसों के प्रभाव पर आधारित एक संपूर्ण अध्याय को हटाना, कक्षा 7 के पाठ्यक्रम से जलवायु मौसम प्रणाली और पानी पर एक संपूर्ण अध्याय और कक्षा 9 के पाठ्यक्रम से भारतीय मानसून के बारे में सूचनाओं को हटाना शामिल है। कोविड-19 महामारी के परिणामस्वरूप पूरे देश में पढ़ाई के नियमित कार्यक्रम पर व्यापक असर पड़ा है। अपने शिक्षकों और अपने स्कूल पर निर्भर स्कूली बच्चे सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं। शिक्षक और छात्र पिछले दो वर्षों से अधिक समय से नहीं मिल पाए हैं और विभिन्न सामाजिक स्तरों के छात्रों के लिए इंटरनेट तथा अन्य तकनीकी सेवाएं रुक-रुक कर और असमान रूप से उपलब्ध होने के कारण छात्रों को अधिकांश सामग्री को अपने ही माध्यमों से खोजने को मजबूर होना पड़ता है।

टीएसीसी का कहना है कि आगामी “सीखने की कमी” के मामले में यह समझ में आता है कि एनसीईआरटी ऐसी सामग्री को हटाकर छात्रों के पढ़ाई के बोल को कम करने की कोशिश कर रहा है, जैसा कि वह अपनी वेबसाइट पर दावा भी करते हैं, मगर एक ही जैसी सामग्री एक दूसरे को ओवरलैप करती है या फिर वह “वर्तमान संदर्भ में अप्रासंगिक है।” 

एनसीईआरटी की तरह टीएसीसी में भी टीएसीसी मानता है कि छात्रों को पुरानी और दोहराव वाली सूचनाओं पर मेहनत जाया नहीं करनी चाहिए। हालाँकि इनमें से कोई भी चिंता बुनियादी मुद्दों जैसे कि जलवायु परिवर्तन विज्ञान, भारतीय मानसून और अन्य अध्यायों पर लागू नहीं होती है, जिन्हें पाठ्यक्रम से हटा दिया गया है। वास्तव में, प्रासंगिक जलवायु परिवर्तन विज्ञान को हर साल प्रकाशित हजारों सहकर्मी-समीक्षा पत्रों के माध्यम से लगातार अपडेट किया जा रहा है और साथ ही बहुत महत्वपूर्ण संकलन जैसे कि आईपीसीसी की ताजातरीन ‘द सिक्स्थ असेसमेंट रिपोर्ट इस साल की शुरुआत से भारतीय क्षेत्र के लिए जलवायु परिवर्तन से संबंधित पहली रिपोर् है। साथ ही पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के तत्वावधान में 2020 में प्रकाशित आईआईटीएम रिपोर्ट भी इनमें शामिल है। पूरे भारत में वरिष्ठ स्कूली छात्रों को इस तरह की अद्यतन जानकारी के सार को सुलभ और आसानी से समझने योग्य तरीके से अवगत कराया जाए।

टीएसीसी का कहना है कि यह अत्यंत महत्वपूर्ण है कि पूरे भारत में वरिष्ठ स्कूली छात्रों को इस तरह की अद्यतन जानकारी के सार को सुलभ, समझने में आसान तरीके से बताया जाए। भारत सहित, छात्रों को पर्यावरण के क्षरण से होने वाले उन तल्ख परिवर्तनों से गहराई से जोड़ा व गया है, जिसका एक उदाहरण जलवायु परिवर्तन है। इस सबसे बुनियादी चुनौती का सामना करने के लिए युवाओं के कार्य और हस्तक्षेप महत्वपूर्ण हैं। इस कार्रवाई को जलवायु परिवर्तन की वास्तविकता, इसके कारणों और इसकी व्यापक पहुंच के व्यवस्थित ज्ञान पर आधारित करने की आवश्यकता है। छात्रों को जलवायु संकट की जटिलता को समझने की जरूरत है अगर उन्हें इसका जवाब देना है और इसके साथ समझदारी से जुड़ना है। हाल के वर्षों में, यह जुड़ाव आमतौर पर कक्षा में शुरू हुआ है। इसलिए यह जरूरी है कि स्कूल छात्रों को जलवायु परिवर्तन और संबंधित मुद्दों के बारे में जानकारी देते रहें जो सटीक, तर्कसंगत और प्रासंगिक हों।

जलवायु परिवर्तन अब व्यापक रूप से वैश्विक, आर्थिक और औद्योगिक तौर-तरीकों का नतीजा माना जाता है, जिसने जीवन के लिए आवश्यक ग्रहीय प्रणालियों को खतरे में डाल दिया है। इस मुद्दे को अब केवल “पर्यावरण विज्ञान” के चश्मे से नहीं समझा जा सकता है। इसके बजाय इसमें स्कूली पाठ्यक्रम में विभिन्न विषयों को शामिल किया गया है, जिसमें भौतिकी, समकालीन भारत, इतिहास और लोकतांत्रिक राजनीति शामिल हैं।

टीएसीसी का कहना है कि हम भारत में असाधारण रूप से भाग्यशाली रहे हैं कि कई जन आंदोलन हुए जिन्होंने इन संबंधों को समझा है और जिन्होंने अपने संघर्ष को पारिस्थितिकी, समाज, संस्कृति और अर्थशास्त्र के चौराहे पर आधारित किया है। ‘चिपको आंदोलन’ या ‘नर्मदा बचाओ आंदोलन’ जैसे लोकप्रिय जन आंदोलन इस कारण से दुनिया भर के लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत रहे और आगे भी बने रहेंगे। कक्षा 10 के छात्र हालांकि अब अपने “लोकप्रिय संघर्ष और आंदोलन” पाठ में इनसे प्रेरित नहीं हो पाएंगे क्योंकि उन पर अध्याय को उनके “लोकतांत्रिक राजनीति” पाठ्यक्रम से बाहर कर दिया गया है। इसलिए हम एनसीईआरटी से इस पर पुनर्विचार करने का आग्रह करते हैं और हटाए गए पाठ्यक्रम को बहाल करने की मांग करते हैं।

टीएसीसी ने यह भी आग्रह किया है कि जलवायु संकट के विभिन्न पहलुओं को सभी वरिष्ठ स्कूली छात्रों को कई भाषाओं में और विभिन्न विषयों में पढ़ाया जाए क्योंकि यह बहुत सारे लोगों के लिए सरोकार रखता है।

Web title :Teachers Against the Climate Crisis angry over NCERT changes in environmental curriculum

वायु प्रदूषण सर्दियों में ही नहीं, गर्मियों में भी है एक बड़ी समस्या

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नई दिल्ली, 06 जुलाई 2022. जहां आमतौर पर यह माना जाता है कि वायु प्रदूषण सर्दियों के दौरान होने वाली समस्या है, वहीं 10 शहरों के गर्मियों के दौरान जुटाये गए सरकारी डाटा पर नज़र डालें तो पता चलता है कि गर्मियों के महीनों में पीएम2.5 और पीएम10 के प्रति माह स्तर इन ज्यादातर महीनों में क्रमशः 40 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर और 60 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर की सुरक्षित सीमाओं से अधिक रहे हैं।

वायु प्रदूषण का मानव स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है

फिलहाल प्रदूषण को लेकर जो भी नीतिगत निर्णय और कार्य किये जा रहे हैं, वे सभी सर्दियों के कुछ महीनों को ध्यान में रखकर ही हो रहे हैं। हालांकि सच्चाई यह है कि हम साल के ज्यादातर महीनों में वायु प्रदूषण के उच्च स्तरों की जद (high levels of air pollution) में होते हैं जिनका मानव स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है। इसलिए यह ज़रूरी है कि वायु प्रदूषण से निपटने के लिए नीतियां (policies to combat air pollution), सिर्फ सर्दियों को नहीं बल्कि गर्मियों के महीनों को भी ध्यान में रख कर बनाई जाएँ।

वायु प्रदूषण शुष्क मौसम के दौरान क्यों बढ़ जाता है? | Why does air pollution increase during the dry season?

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इस परिस्थिति का विज्ञान समझाते हुए स्काईमेट वेदर में मौसम विज्ञान और जलवायु परिवर्तन विभाग में वाइस प्रेसिडेंट, महेश पलावत, का मानना है कि, “इस साल, मार्च और अप्रैल के दौरान प्री-मानसून बारिश लगभग शून्य थी और मार्च के दूसरे सप्ताह में ही हीटवेव की स्थिति भी शुरू हो गई थी। ऐसे लगातार शुष्क मौसम के दौरान, वायु प्रदूषण बढ़ जाता है क्योंकि बारिश प्रदूषकों को नहीं धोती है और धूल के कण जो पीएम 10 का गठन करते हैं, निचले वातावरण में बने रहते हैं। बलूचिस्तान, मध्य पाकिस्तान और थार रेगिस्तान से पश्चिमी हवाएं भी लंबे समय तक भारत-गंगा के मैदानों और मध्य भारत के कुछ हिस्सों और दक्षिण प्रायद्वीप यानी तेलंगाना, विदर्भ, मराठवाड़ा आदि में बहती रहीं। इसका मतलब है कि गर्मियों के महीनों में प्रदूषण खराब श्रेणी में रहा। आमतौर पर, जून के दूसरे पखवाड़े तक, देश के कई हिस्सों में प्री-मानसून बारिश होती है, जो हवा को साफ करती है, लेकिन इस साल ऐसा नहीं हुआ। इस साल, मध्य पूर्व में धूल भरी आंधी चली और हवाओं ने धूल को मुंबई, मध्य महाराष्ट्र और देश के मध्य भागों जैसे शहरों तक पहुँचाया। जलवायु परिवर्तन के कारण ऐसी घटनाएं बढ़ती रहेंगी और इसलिए वायु प्रदूषण के स्तर को भी प्रभावित करती हैं।”

मौजूदा अध्ययन के लिए देश के 10 नॉन अटेनमेंट शहरों आगरा, बेंगलुरु, चंडीगढ़, चेन्नई, दिल्ली, कोलकाता, जोधपुर, मुंबई, लखनऊ, और पटना को चुना गया और इनमें मार्च, अप्रैल, मई तथा जून के महीनों के दौरान पीएम2.5, पीएम10 और एनओ2 के औसत स्तरों की निगरानी की गई।

हालांकि भारतीय मौसम विभाग जून को मानसून का महीना मानता है, मगर देश के विभिन्न हिस्सों में यह महीना ज्यादातर सूखा ही रहा। इसी वजह से इस महीने को भी इस विश्लेषण का हिस्सा बनाया गया है।

पीएम 2.5, पीएम10 और एनओ2 के लिए सालाना औसत अनुमन्य सीमा

सीपीसीबी ने पीएम 2.5, पीएम10 और एनओ2 के लिए जो सालाना औसत अनुमन्य सीमा तय की हैं, वे क्रमशः 40 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर, 60 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर और 40 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर है।

वहीं, विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा निर्धारित सुरक्षित सीमाओं की बात करें तो यह क्रमशः 5 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर, 15 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर और 10 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर है।

गर्मियों में कैसा रहा इस वर्ष शहरों का हाल?

डाटा के मुताबिक चेन्नई को छोड़कर बाकी सभी शहरों का पीएम2.5 स्तर मार्च 2022 में अनुमन्य सीमा से अधिक रहा जबकि पीएम10 स्तर की बात करें तो यह सभी शहरों में सुरक्षित सीमा से ज्यादा ही रहा। अप्रैल में सिर्फ कोलकाता में इन स्तरों में सुधार हुआ और कोलकाता तथा चेन्नई ने ही पीएम2.5 की सुरक्षित सीमा को पार नहीं किया।

सिर्फ चेन्नई ही ऐसा एकमात्र शहर रहा जहां अप्रैल माह के दौरान पीएम10 के स्तर सुरक्षित सीमाओं के अंदर ही रहे। मई के महीने में भी यही रुख बना रहा और सिर्फ चेन्नई, बेंगलुरु तथा कोलकाता में ही पीएम2.5 के स्तर सुरक्षित सीमाओं के अंदर रहे। वहीं, कोई भी शहर पीएम10 स्तरों के मामले में सुरक्षित मानकों को पूरा नहीं कर सकता। इस साल जून में देश के कुछ हिस्सों में बारिश हुई जिससे आगरा, बेंगलुरु, चेन्नई, कोलकाता और मुंबई शहरों में पीएम2.5 के स्तरों में सुधार हुआ और वह सीपीसीबी द्वारा निर्धारित सुरक्षित सीमाओं के अंदर रहे।

जून के महीने में बेंगलुरु चेन्नई और मुंबई में पीएम10 के स्तर 60 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर की सीमा के अंदर ही रहे।

2021 बनाम 2022

इस साल पूरा देश मार्च के महीने से ही जबरदस्त तपिश की जद में रहा और इस दौरान हर जगह तापमान ने रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिए।

मार्च का महीना पिछले 121 वर्षों के दौरान दर्ज किया गया सबसे गर्म मार्च रहा और इस दौरान पूरे देश का औसत अधिकतम तापमान 33.1 डिग्री सेल्सियस रिकॉर्ड किया गया जो अब तक का सर्वाधिक है जो सामान्य से 1.86 डिग्री सेल्सियस ज्यादा रहा। बाद के महीनों में भी कमोबेश यही हाल बना रहा।

अत्यधिक गर्मी की वजह से बिजली का संकट (power crisis) भी पैदा हुआ, नतीजतन और ज्यादा मात्रा में कोयला जलाया गया जो कि प्रदूषण का एक प्राथमिक स्रोत है। हीटवेव के दौरान अत्यधिक तपिश और ठहरी हुई हवा के कारण न सिर्फ ओजोन प्रदूषण (ozone pollution) बढ़ा बल्कि पार्टिकुलेट प्रदूषण (particulate pollution) में भी वृद्धि हुई। स्थानीय स्तर पर लंबे समय तक सूखी गर्मी पड़ने के कारण हवा में तैरने वाले धूल के कणों की मात्रा में भी वृद्धि हुई।

मानसूनपूर्व बारिश लगभग न के बराबर होने के कारण गर्मी की दुश्वारियां और भी ज्यादा बढ़ गईं। खास तौर पर उत्तर पश्चिमी मैदानी इलाकों में, जिन्हें वायु प्रदूषण के लिहाज से हॉटस्पॉट माना जाता है।

वर्ष 2021 से तुलना करें तो इस अध्ययन में लिए गए महीनों के दौरान ज्यादातर शहर जाहिर तौर पर पीएम2.5 और पीएम 10 के ऊंचे स्तरों से जूझते रहे। मिसाल के तौर पर सिर्फ मार्च के महीने में पीएम10 के स्तरों को छोड़ दें तो दिल्ली में पीएम2.5 और पीएम10 के स्तर 2021 के मुकाबले 2022 के इन 4 महीनों में अधिक रहे। यही हाल पटना का भी रहा।

इन दोनों शहरों में पीएम 2.5 और पीएम10 के स्तर सीपीसीबी के मानकों से 5 गुने से ज्यादा ऊंचे रहे।

गर्मियों के दौरान प्रदूषणकारी तत्वों में हिस्सेदारी (Share of polluting elements during summer)

इस विश्लेषण के दायरे में लिए गए 10 शहरों में जहां पीएम2.5 के स्तर सुरक्षित सीमाओं से ज्यादा रहे, वहीं पीएम10 के स्तर भी उल्लेखनीय रूप से ऊंचे रहे और यह एक प्रमुख प्रदूषणकारी तत्व है।

आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि 10 में से 8 शहरों में पीएम10 के स्तर इन 4 महीनों के दौरान कभी भी सुरक्षित सीमा के अंदर नहीं रहे।

जून 2022 में बेंगलुरु का पीएम10 संकेंद्रण 58.49 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर रिकॉर्ड किया गया और पहले से ही 200 मिलीमीटर वर्षा होने के बावजूद यह सुरक्षित स्तरों को विरले ही हासिल कर पाया।

चेन्नई में भी पीएम10 का संकेंद्रण इस साल अप्रैल और जून के माह में ही सुरक्षित सीमाओं के अंदर रहा।

सर्वे के दायरे में लिए गए इन 10 शहरों में से पटना और दिल्ली में मार्च तथा अप्रैल के महीनों में नाइट्रोजन डाइऑक्साइड (एनओ2) के स्तर वार्षिक सुरक्षित सीमाओं को पार कर गए। वहीं, चंडीगढ़ में अप्रैल से जून तक यही हाल रहा, जबकि आगरा, चेन्नई, जोधपुर और कोलकाता जैसे अनेक शहरों में पिछले वर्ष के मुकाबले इस साल एनओ2 के स्तरों में वृद्धि देखी गई। एनओ2 एक गैस है जिसका अधिक संघनन होने से वायु मार्गों में इन्फ्लेमेशन हो सकता है।

दिन-ब-दिन लंबे वक्त तक संपर्क में रहना

पीएम 2.5 के प्रतिदिन औसत स्तर उपलब्ध कराने वाले एनसीएपी ट्रैकर के हीट मैप कैलेंडर से जाहिर होता है कि अनेक शहर लगातार अत्यधिक प्रदूषित दिनों के लगातार चलते सिलसिले की चपेट में हैं।

अप्रैल 2022 में दिल्ली में कोई भी दिन ऐसा नहीं गुजरा जब पीएम 2.5 के स्तर सीपीसीबी द्वारा निर्धारित 24 घंटे की सुरक्षित सीमा यानी 60 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर के अंदर रहे हों।

इसी तरह मुंबई जैसे तटीय शहरों में सिर्फ नौ दिन ही ऐसे गुजरे जब पीएम 2.5 का संकेंद्रण स्तर सुरक्षित सीमाओं के अंदर रहा। इतने लंबे समय तक इसके संपर्क में रहने से मानव स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ सकता है।

Web title : Air pollution is a big problem not only in winter but also in summer

आश्चर्य किंतु सत्य : अजन्मे बच्चे ने किया अपनी सरकार के खिलाफ मुकदमा

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जलवायु निष्क्रियता के लिए भ्रूण ने अपनी सरकार पर मुकदमा दायर किया (Embryo sues his government for climate inaction)

नई दिल्ली, 25 जून 2022. जहां भारत में बड़े अपने तजुर्बों से नसीहत देते हैं कि कोर्ट-कचहरी और मुकदमेबाज़ी से बचना चाहिए, वहीं कोरिया से, इस नसीहत के ठीक उलट, एक हैरान करने वाली ख़बर आ रही है।

बीस हफ्ते के भ्रूण ने किया अपनी सरकार के खिलाफ मुकदमा

दरअसल कोरिया में एक बीस हफ्ते के भ्रूण (20 week old fetus) ने अपनी सरकार की नीतियों के खिलाफ़ मुकदमा किया है। वादी का कहना है कि कोरिया सरकार की ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन पर लगाम लगाने की नीतियां (policies to control greenhouse gas emissions) नाकाफ़ी हैं और एक लिहाज़ से उससे उसका जीने का संवैधानिक अधिकार छीनती हैं।

वूडपेकर नाम के इस अजन्मे बच्चे के साथ 62 और बच्चे भी इस मुकदमें में शामिल हैं, जिन्होंने कोरिया की एक अदालत में मामला दर्ज किया है।

बेबी क्लाइमेट लिटिगेशन (baby climate litigation)‘ नाम से चर्चित हो रहे इस मुकदमे में इन बच्चों के वकील ने इस आधार पर एक संवैधानिक दावा दायर किया है कि देश के 2030 तक के राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (Nationally Determined Contribution), या NDC, या जलवायु लक्ष्य, वायु प्रदूषण पर लगाम लगाने के लिए नकाफ़ी हैं और बच्चों के जीने के संवैधानिक हक़ का हनन करते हैं।

इन 62 बच्चों में 39 पांच से कम उम्र के हैं, 22 की उम्र 6 से 10 साल के बीच है, और वुडपेकर अभी अपनी मां की कोख में पल रहा है।

ध्यान रहे कि कोरियाई संवैधानिक न्यायालय ने पहले भी एक संवैधानिक याचिका दायर करने के लिए भ्रूण की क्षमता को, यह देखते हुए, स्वीकार किया है कि “सभी मनुष्य जीवन के संवैधानिक अधिकार का विषय हैं, और जीवन के अधिकार को बढ़ते हुए भ्रूण के के लिए भी मान्यता दी जानी चाहिए।”

ली डोंग-ह्यून, जो वुडपेकर नाम के इस भ्रूण से गर्भवती हैं और एक छह साल के, मुक़दमे के  दूसरे दावेदार की मां भी है, कहती हैं,  “जब जब यह भ्रूण मेरी कोख में हिलता डुलता है, मुझे गर्व की अनुभूति होती है। मगर जब मुझे एहसास होता है कि इस अजन्मे बच्चे ने तो एक ग्राम भी कार्बन उत्सर्जित नहीं की लेकिन फिर भी इसे इस जलवायु परिवर्तन और प्रदूषण के दंश को झेलना पड़ता है और पड़ेगा, तो मैं दुखी हो जाती हूँ।

नीदरलैंड के 2019 के एक ऐतिहासिक मुकदमे से प्रेरित है कोरिया का बेबी क्लाइमेट लिटिगेशन 

यह मामला दरअसल नीदरलैंड में 2019 के एक ऐतिहासिक मुकदमे से प्रेरित है जहां मुकदमा करने वाले पक्ष की दलील के आगे कोर्ट ने सरकार को उत्सर्जन कम करने का आदेश दिया और फिर यह मामला एक नज़ीर बना जिसके चलते आयरलैंड से लेकर भारत तक, दुनिया भर में जलवायु संबंधी मुकदमेबाजी की लहर फैला दी।

वैसे कोरियाई नागरिक सरकार के खिलाफ जलवायु मुकदमे लाने में सक्रिय रहे हैं। वहाँ फिलहाल तीन मामलों में देश की जलवायु प्रतिबद्धताओं की संवैधानिकता को चुनौती दी गई है। 

इस ताजा मामले में, दावेदारों का कहना है कि ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को 40% तक कम करने का देश का 2030 का लक्ष्य असंवैधानिक है और भविष्य की पीढ़ियों के लिए बुनियादी अधिकारों की गारंटी नहीं दे सकता है। इनमें जीवन, समानता, संपत्ति और स्वस्थ और सुखद वातावरण में रहने के अधिकार शामिल हैं।

कोरिया में जलवायु प्रभाव तेजी से बढ़ रहा है। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि 1985 के बाद से प्राकृतिक आपदाओं से होने वाले नुकसान में वृद्धि हुई है, जिसके परिणामस्वरूप 2007 और 2016 के बीच 162 लोग हताहत हुए और 7.3 बिलियन पाउंड (£ 4.6 बिलियन) का नुकसान हुआ। रिपोर्टों के अनुसार, देश भविष्य में अधिक बार और भारी बाढ़ और वन आपदाओं का सामना करेगा। , आवासों और लुप्तप्राय प्रजातियों का नुकसान होगा, और चावल जैसे मुख्य खाद्य पदार्थों की कम पैदावार और गुणवत्ता घटने की संभावना है।

इन 62 बच्चों में से एक, 10 वर्षीय हान जे-आह का कहना है, “बड़े कहते तो हैं कि वे हमारे लिए पृथ्वी की रक्षा करेंगे, लेकिन ऐसा लगता नहीं कि उन्हें हमारे भविष्य कि इस दिशा में कोई चिंता है। बच्चों से अपेक्षाएँ करने से अच्छा है कि बड़े फौरन अपना कार्बन उत्सर्जन कम करना शुरू करें।”

विश्व स्तर पर नहीं हो रहा स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण : नवीकरणीय 2022 वैश्विक स्थिति रिपोर्ट (आरईएन21)

Renewable energy

नवीकरणीय ऊर्जा के मामले में पूरे दुनिया में भारत  तीसरे स्थान पर है।

नई दिल्ली, 16 जन 2022. रिन्यूएबल्स 2022 ग्लोबल स्टेटस रिपोर्ट (the Renewables 2022 Global Status Report REN21 in Hindi) की मानें तो वैश्विक स्तर पर क्लीन एनर्जी ट्रांज़िशन नहीं हो रहा है, जिससे यह संभावना भी नहीं बचती है कि दुनिया इस दशक के अंत तक महत्वपूर्ण जलवायु लक्ष्यों को पूरा करने में सक्षम होगी।

नवीकरणीय ऊर्जा (renewable energy) के मामले में पूरे दुनिया में भारत केवल चीन (136 गीगावॉट) और संयुक्त राज्य अमेरिका (43 गीगावॉट) के बाद, 2021 में 15.4 गीगावॉट के साथ कुल अक्षय ऊर्जा क्षमता वृद्धि के लिए विश्व स्तर पर तीसरे स्थान पर है।

एक नज़र में भारत का नवीकरणीय ऊर्जा परिदृश्य :

·        2021 में 15.4 गीगावॉट के साथ कुल रिन्यूएबल ऊर्जा क्षमता वृद्धि के लिए विश्व स्तर पर भारत तीसरे स्थान पर है, केवल चीन (136 गीगावाट) और संयुक्त राज्य अमेरिका (43 गीगावाट) के बाद।

·        भारत ने 2021 में 843 मेगावाट की पनबिजली क्षमता जोड़ी, जिससे कुल क्षमता 45.3 गीगावाट हो गई।

·        नई सौर पीवी क्षमता के लिए भारत एशिया का दूसरा सबसे बड़ा बाज़ार था और विश्व स्तर पर तीसरा (2021 में 13 गीगावाट अतिरिक्त)। यह पहली बार, जर्मनी (59.2 GW) को पछाड़ते हुए, कुल स्थापना (60.4 GW) के लिए चौथे स्थान पर रहा।

·        भारत, पवन ऊर्जा की कुल स्थापित क्षमता (40.1 GW) के मामले में चीन, संयुक्त राज्य अमेरिका और जर्मनी के बाद विश्व स्तर पर तीसरे स्थान पर है।

·        भारत ने अपने राष्ट्रीय INR 18,100 करोड़ (24.3 बिलियन अमरीकी डालर) के सौर उत्पादन कार्यक्रम का विस्तार किया, जो बैटरी निर्माण संयंत्रों की स्थापना के लिए घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय कंपनियों को प्रोत्साहन प्रदान करता है।

·        भारत में, रिन्यूएबल्स में कुल नया निवेश 70% बढ़कर 11.3 बिलियन अमेरिकी डॉलर हो गया।

·        रिन्यूएबल ऊर्जा नीतियां और जीवाश्म ईंधन में कटौती (Renewable energy policies and cutting fossil fuels)– भारत अपनी नेट मीटरिंग योजना के तहत सौर पीवी  बढ़ाने से देश का रूफटॉप पीवी बाजार 2021 में अब तक के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया।

यह रिपोर्ट एक स्पष्ट चेतावनी देती है कि वैश्विक स्तर पर क्लीन एनर्जी ट्रांजिशन नहीं हो रहा है, जिससे यह संभावना भी नहीं बचती है कि दुनिया इस दशक के अंत तक महत्वपूर्ण जलवायु लक्ष्यों को पूरा करने में सक्षम होगी। पिछले साल की दूसरी छमाही में आधुनिक इतिहास के सबसे बड़े ऊर्जा संकट की शुरुआत (The beginning of the biggest energy crisis in history) देखी गई, जो 2022 की शुरुआत में यूक्रेन पर रूसी संघ के आक्रमण और अभूतपूर्व वैश्विक कमोडिटी झटके से और गंभीर हो गयी।

REN21 की कार्यकारी निदेशक राणा आदिब कहती हैं,

“हालांकि कई सरकारों ने 2021 में नेट ज़ीरो एमिशन के लिए प्रतिबद्धता दिखाई मगर सच्चाई यह है कि ऊर्जा संकट के जवाब में अधिकांश देश जीवाश्म ईंधन पर वापस चले गए हैं।”

यह ग्लोबल स्टेटस रिपोर्ट दुनिया भर में रिन्यूएबल ऊर्जा की सालाना स्थिति का जायज़ा लेती है। इस साल की रिपोर्ट इसका 17-वां संस्करण है और इस बात का प्रमाण देती है जिसके बारे में विशेषज्ञ अक्सर चेतावनी देते रहे हैं। और वो बात ये है कि दुनिया की ऊर्जा खपत में रिन्युएब्ल एनेर्जी का कुल हिस्सा स्थिर हो गया है। जहां 2009 में यह 10.6% था, दस साल बाद 2019 में यह मामूली बढ़त के साथ 11.7% पर अटक गया।

बिजली क्षेत्र में, जहां रिन्यूएबल ऊर्जा क्षमता और उत्पादन 2020 से अधिक रहा, फिर भी वो कुल बिजली मांग, जो कि 6 फीसद बढ़ी, के सापेक्ष कम ही रहा। वहीं हीटिंग और कूलिंग में, कुल ऊर्जा खपत में रिन्यूएबल हिस्सेदारी 2009 में जहां 8.9% थी, वो 2019 में बढ़कर 11.2% हो गई।

परिवहन क्षेत्र में, जहां रिन्यूएबल हिस्सेदारी 2009 में 2.4% थी, वो 2019 में बढ़कर 3.7% हो गई। परिवहन क्षेत्र की धीमी प्रगति विशेष रूप से चिंताजनक है क्योंकि यह क्षेत्र वैश्विक ऊर्जा खपत के लगभग एक तिहाई हिस्से के लिए ज़िम्मेदार है।

नवंबर 2021 में संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन (COP26) में, रिकॉर्ड 135 देशों ने 2050 तक नेट ज़ीरो ग्रीनहाउस गैस एमिशन हासिल करने का संकल्प लिया। लेकिन इनमें से केवल 84 देशों के पास रिन्यूएबल ऊर्जा के लिए अर्थव्यवस्था-व्यापी लक्ष्य थे, और केवल 36 के पास 100% रिन्यूएबल ऊर्जा का लक्ष्य था।

संयुक्त राष्ट्र जलवायु शिखर सम्मेलन के इतिहास में पहली बार, COP26 घोषणा ने कोयले के उपयोग को कम करने की आवश्यकता का उल्लेख किया, लेकिन यह कोयले या जीवाश्म ईंधन में लक्षित कटौती का आह्वान करने में विफल रहा।

जीएसआर 2022 स्पष्ट करता है कि देशों की नेट ज़ीरो प्रतिज्ञाओं को पूरा करने के लिए बड़े पैमाने पर प्रयासों की आवश्यकता होगी, और यह कि कोविड-19 से मिला मौका गुज़र गया है।

यह रिपोर्ट बताती है कि जलवायु कार्रवाई के लिए नए सिरे से प्रतिबद्धताओं के बावजूद सरकारों ने ऊर्जा संकट के प्रभावों को कम करने के लिए अपनी पहली पसंद के रूप में जीवाश्म ईंधन उत्पादन और इस्तेमाल के लिए सब्सिडी प्रदान करने के विकल्प को चुना। 2018 और 2020 के बीच, सरकारों ने 18 ट्रिलियन अमरीकी डालर की भरी रक़म – जो 2020 में वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद का 7% था- जीवाश्म ईंधन सब्सिडी पर ख़र्च किया। भारत में तो ऐसा कुछ रिन्यूएबल के समर्थन को कम करते हुए किया गया।

यह प्रवृत्ति महत्वाकांक्षा और कार्रवाई के बीच एक चिंताजनक अंतर का खुलासा करती है।

“रिन्यूएबल ऊर्जा को ठंडे बस्ते में रखने और लोगों के ऊर्जा बिलों को कम करने के लिए जीवाश्म ईंधन सब्सिडी पर निर्भर होने के बजाय, सरकारों को कमज़ोर घर-परिवारों में रिन्यूएबल ऊर्जा प्रौद्योगिकियों की स्थापना को सीधे वित्तपोषित करना चाहिए,” अदीब ने कहा।

Clean energy transition not happening globally: Renewables 2022 Global Status Report (REN21)

बॉन जलवायु सम्मेलन : आगामी COP27 की कर रहा है ज़मीन तैयार

bonn climate conference in hindi

The Bonn climate conference is preparing the ground for the upcoming COP

नई दिल्ली, 14 जून 2022: फिलहाल जब आप और हम भारत में भीषण गर्मी से त्रस्त हैं, जर्मनी के बॉन शहर में दुनिया भर के तमाम देश देश एक बेहतर कल के लिए अपनी जलवायु प्रतिक्रिया पर चर्चा और सुधार (Discussing and improving climate response) करने के लिए एक साथ आए हैं।

दरअसल, ग्लासगो में COP26 के सात महीने बाद, दुनिया भर के देशों ने जलवायु परिवर्तन वार्ता के एक और सेट के लिए जर्मनी के बॉन में अपने प्रतिनिधिमंडल भेजे हैं।

शर्म अल-शेख में होने वाले COP27 के लिए जमीन तैयार करेगा बॉन जलवायु सम्मेलन

ऐसा माना जा रहा है कि 6-16 जून तक होने वाला बॉन जलवायु सम्मेलन (Bonn climate conference in Hindi) इस साल के अंत में मिस्र के शर्म अल-शेख में COP27 के लिए जमीन तैयार करेगा। यह सम्मेलन ग्लासगो में हुई COP से अगल है क्योंकि इसका नेतृत्व COP के दो सहायक निकाय कर रहे हैं।

बॉन जलवायु सम्मेलन का उद्देश्य

इस जलवायु परिवर्तन सम्मेलन का उद्देश्य (Objectives of the Bonn Climate Conference) नवंबर में COP27 से पहले जलवायु परिवर्तन के खिलाफ प्रमुख घटनाक्रमों को चर्चा के केंद्र में लाना है।

जहां एक ओर जलवायु परिवर्तन के वैश्विक मुद्दे के समाधान के लिए अंतर-सरकारी स्तर पर तत्काल कार्रवाई करना समय की मांग है, वहीं फिलहाल इस बैठक में विकासशील देशों ने जलवायु परिवर्तन के कारण हुए विनाश पर चर्चा करने के लिए अधिक समय की मांग की है।

बॉन जलवायु सम्मेलन में चर्चा का केंद्र

बॉन सम्मेलन में चर्चा का केंद्र (Center of discussion at the Bonn climate conference) है कैसे विकासशील देशों को जलवायु परिवर्तन से हो रही हानि और क्षति के संदर्भ में शमन और अनुकूलन के मध्यम से मदद पहुंचाई जाए।

बॉन जलवायु सम्मेलन के एजेंडे में क्या है?

दूरगामी अनुकूलन की आवश्यकता है यह सुनिश्चित करने के लिए कि 1.5 डिग्री सेल्सियस तापमान सीमा से अधिक न हो। इस लक्ष्य तक पहुंचने के लिए बॉन में 2030 तक ग्रीनहाउस गैसों को कम करने के कार्य कार्यक्रम पर बातचीत हो रही है।

एक अन्य महत्वपूर्ण मुद्दा जलवायु से संबंधित नुकसान और क्षति पर बातचीत है। साथ ही, पेरिस समझौते के लक्ष्यों के साथ वैश्विक वित्तीय प्रवाह को संरेखित करने पर बातचीत भी एजेंडे में है। इतना ही नहीं, इस सम्मेनल में शामिल प्रतिनिधिमंडल एक ग्लोबल स्टॉकटेक की तैयारी भी कर रहे हैं, जिसके अंतर्गत 2023 के बाद से, हर पांच साल में एक समीक्षा होगी इस बात का आंकलन करने के लिए कि जलवायु परिवर्तन शमन के संबंध में दुनिया कहां खड़ी है।

बॉन जलवायु सम्मेलन में भारत की विशेष रुचि क्यों है?

भारत जैसे देश विशेष रूप से इस सम्मेलन के उन एजेंडा मदों में रुचि रखते हैं जो अनुकूलन, हानि और क्षति, और जलवायु वित्त पर चर्चा करते हैं। विकसित देशों को 2020 तक जलवायु वित्त में 100 बिलियन डॉलर जुटाना था – एक ऐसा लक्ष्य जिसे हासिल नहीं किया गया है, और 2023 से पहले पूरा होने की संभावना नहीं है। जलवायु वित्त में से केवल 20 प्रतिशत जलवायु अनुकूलन की ओर गया है जबकि 50 प्रतिशत जलवायु न्यूनीकरण की ओर है।

संयुक्त राष्ट्र के एक समूह के अनुमान के अनुसार, जलवायु वित्त की आवश्यकता तब से बढ़कर 5.8-5.9 ट्रिलियन डॉलर हो गई है।

जलवायु परिवर्तन शमन के लिए एक निर्धारित लक्ष्य है – ग्लोबल वार्मिंग को 1.5 डिग्री तक सीमित करना। लेकिन जलवायु अनुकूलन के लिए कोई निर्धारित लक्ष्य नहीं है, और इस पर चर्चा करने की आवश्यकता है। हमें एक नए वित्त लक्ष्य की भी आवश्यकता है क्योंकि वर्तमान प्रतिज्ञाएं पूरी तरह से अपर्याप्त हैं।

प्रयास ज़रूरी हैं

पेरिस समझौते का उद्देश्य (Objectives of the Paris Agreement) वैश्विक औसत तापमान वृद्धि को पूर्व-औद्योगिक स्तरों से 2 डिग्री सेल्सियस नीचे बनाए रखना है। इस सदी में तापमान वृद्धि को 1.5 सेल्सियस तक नियंत्रित करने वाले उपायों का समर्थन करने के उद्देश्य से इस पर हस्ताक्षर किए गए हैं। साथ ही, पेरिस जलवायु समझौते के मुख्य उद्देश्य को जीवित रखने के लिए, कार्बन उत्सर्जन को 2030 तक 50% तक कम करने की आवश्यकता है। इस संदर्भ में जलवायु परिवर्तन पर अंकुश लगाने के लिए सरकारों द्वारा तत्काल कार्रवाई की उम्मीद करते हुए, संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन कार्यकारी सचिव पेट्रीसिया एस्पिनोसा ने बॉन सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में अपने भावनात्मक संबोधन में कहा : “हम सब को देखना चाहिए कि पिछले छह वर्षों में हमने क्या हासिल किया है। देखिये कि हमने पिछले 30 में क्या हासिल किया है। भले ही हम कार्यवाही के नाम पर बहुत पीछे हों मगर यूएनएफसीसीसी के कारण, क्योटो प्रोटोकॉल के कारण, पेरिस समझौते के कारण दुनिया एक बेहतर स्थिति में है। साथ ही, सहयोग के कारण, बहुपक्षवाद के कारण, और आपके कारण हम बेहतर स्थिति में हैं। लेकिन हम बेहतर कर सकते हैं और हमें करना चाहिए। प्रयास ज़रूरी है।”

बॉन में जलवायु परिवर्तन वार्ता

नवंबर 2021 में ग्लासगो में आयोजित संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन COP26 के बाद पहली बार बॉन जलवायु परिवर्तन सम्मेलन ने विभिन्न सरकारों को एक मंच पर लाने का काम किया है। इस कार्यक्रम को दरअसल संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन COP27, जो इस साल के अंत में मिस्र के शर्म अल-शेख में नवंबर में होने वाला है, की तैयारी के क्रम मे आयोजित किया गया है।

जहां सम्मेलन में विकासशील देशों ने जलवायु वित्त से संबंधित विकसित देशों के साथ-साथ जलवायु परिवर्तन से होने वाले नुकसान और क्षति से संबंधित चिंताओं (Concerns about loss and damage caused by climate change) को उठाया वहीं विकसित देशों ने इस बात पर प्रकाश डाला कि बैठक का एजेंडा बातचीत के लिए दायरा सीमित करता है।

विश्व पर्यावरण दिवस : पर्यावरण संतुलन क्यों जरूरी है ?

Climate change Environment Nature

विश्व पर्यावरण दिवस 2022 पर विशेष | पर्यावरण क्या है?

World Environment Day: Why is environmental balance important? What is environment?

पर्यावरण वैज्ञानिकों द्वारा पर्यावरण, प्रकृति तथा समस्त जैवमण्डल के संबंध में जो सारगर्भित बात कही है वह यह है कि ‘पर्यावरण उन सभी भौतिक, रासायनिक एवं जैविक कारकों की एक इकाई है जो किसी जीवधारी अथवा पारितंत्रीय आबादी को प्रभावित करते हैं तथा उनके रूप, जीवन और जीविता को तय करते हैं। पर्यावरण वह है जो कि प्रत्येक जीव के साथ जुड़ा हुआ है हमारे चारों तरफ़ वह हमेशा व्याप्त होता है।’

Basic Concepts of Environment and Ecology in Hindi

‘पर्यावरण के जैविक संघटकों में सूक्ष्म जीवाणु से लेकर कीड़े-मकोड़े,सभी जीव-जंतु और पेड़-पौधे आ जाते हैं और इसके साथ ही उनसे जुड़ी सारी जैव क्रियाएँ और प्रक्रियाएँ भी। अजैविक संघटकों में जीवनरहित तत्व और उनसे जुड़ी प्रक्रियाएँ भी आ जातीं हैं, जैसे : चट्टानें, पर्वत, नदी, हवा और जलवायु के तत्व सहित कई चीजें इत्यादि सभी कुछ इसमें सम्मिलित रहतीं हैं।’

पर्यावरण संतुलन से क्या आशय है?

पर्यावरण संतुलन से हमारा आशय यह है कि इस धरती पर स्थित समस्त जैवमण्डल यथा नदियां स्वच्छ पानी से लबालब साल भर बहतीं रहें। इसके लिए एकदम जरूरी है कि हमारी धरती पर उच्च पर्वत शिखरों पर स्थित शुभ्र धवल ग्लेशियर जो करोड़ों सालों से बर्फ से जमें हुए हैं, वे चिरस्थाई रहें, हरे-भरे-घने जंगल हों, जिनमें लाखों तरह के कीट, पतंगें, तितलियों, भौंरों, रंगविरंगी, मधुर गीत गाते हुए परिंदों, सैकड़ों तरह के सरिसृपों, हिरनों, गौरों, भैंसों, सितारों, भेड़ियों, लकड़बग्घों, चीतों, तेंदुओं, बाघों, शेरों, हाथियों आदि सभी जीवों का एक संतुलित साहचर्य में बसेरा हो। इसके लिए जरूरी है कि वहां पर्याप्त मात्रा में जल की उपलब्धता हो, यथा वहां बिल्कुल प्रदूषण मुक्त प्राकृतिक जल स्रोतों (Absolutely pollution free natural water sources) यथा झरने,तालाब और झीलें हों। इसके लिए स्वाभाविक तौर पर इस धरती पर बारिश के मौसम में और वर्ष के अन्य मौसमों में भी पर्याप्त मात्रा में रिमझिम बारिश होती हो।

पर्यावरण संतुलन का सबसे बेहतरीन नमूना

(One of the best examples of environmental balance)

खुले सपाट मैदानी इलाकों में हरी-भरी घासों से भरा-पूरा स्तेपी और बुग्याल हों, जिसमें पौष्टिकता से भरपूर घासों को चरकर हमारी दुधारू पशुओं यथा बकरियां, गाएं, भैंसें आदि भरपूर खाना खाकर खूब दूध दें। भरपूर बारिश से हमारे खेत हर साल तमाम तरह के अन्न रूपी सोना उगलते हों। पर्याप्त बारिश से हमारी धरती के सीने में भूगर्भीय जल की संतृप्तता हो। हरियाली, पेड़-पौधों और जंगलों की प्रचुरता से हवा में प्राणवायु जिसे हम वैज्ञानिक भाषा में आक्सीजन कहते हैं, वह भरपूर मात्रा सर्वत्र जगह हो।

Farmer

कहने का मतलब इस धरती का हर जीव यथा चींटी से लेकर मानव प्रजाति सहित इस धरती का सबसे बड़ा समुद्री जीव ब्लू ह्वेल तक अपना जीवन आनन्द के साथ बीता रहे हों, तो यह पर्यावरण संतुलन का एक सबसे बेहतरीन नमूना होगा।

लेकिन इस धरती पर मानव प्रजाति के आगमन के बाद उक्त वर्णित सुखद,सम्यक, संतुलित दुनिया नहीं रही है। इस धरती पर मनुष्य प्रजाति जैसे असीमित लोभ वाले कथित सबसे बुद्धिमान प्राणी के आगमन के बाद इस धरती का समस्त वातावरण यथा पेड़-पौधों, वनों, वन्य जीवों नदियों, झीलों, समुद्रों, हरे-भरे मैदानों, पहाड़ों, हवा, पानी आदि सभी कुछ अपना सामान्य संतुलन खो चुके हैं।

मनुष्य प्रजाति के प्रकृति और इसके पर्यावरण के अनियंत्रित अतिदोहन, भयंकरतम् प्रदूषण करने आदि से इस धरती का समस्त जैवमण्डल और पर्यावरण अपना प्राकृतिक और नैसर्गिक संतुलन खोता जा रहा है।

मनुष्य द्वारा अपने जीवन को अत्यधिक विलासितापूर्ण बनाने के लिए प्रयोग किए जाने वाले अरबों की संख्या में वातानूकुलित यंत्रों, पेट्रोल-डीजल-चालित गाड़ियों के अत्यधिक उपयोग करने से पैदा हुए भयावह वायु प्रदूषण से पर्वतों के उतंग शिखरों पर करोड़ों वर्षों से जमें सदानीरा नदियों के उद्गमस्थल ग्लेशियरों तक की विनाशलीला की दु:खद कहानी की पूर्वपीठिका लिखी जा चुकी है।

India recorded highest air pollution exposure globally in 2019
India recorded highest air pollution exposure globally in 2019

आज तथाकथित सर्वश्रेष्ठ मस्तिष्क वाला मनुष्य प्रजाति खुद अपने हाथों अपने भविष्य को सर्वनाश करने पर उतारू है। वह अपने कुकृत्यों यथा समस्त जैवमण्डल का सुरक्षा कवच ओजोन परत (Ozone layer, the protective shield of the entire biosphere) को नष्ट करने पर आमादा है।

आज तथाकथित सर्वश्रेष्ठ मस्तिष्क वाली मनुष्य प्रजाति ओजोन को सर्वनाश कर देनेवाली क्लोरोफ्लोरोकार्बन या सीएफसी और ब्रोमीन जैसी खतरनाक गैसों का अंधाधुंध प्रयोग कर रही है, जिससे ओजोन परत के विनष्टीकरण से इस धरती के अरबों सालों से बना इसका समस्त जैवमण्डल का अस्तित्व ही आसन्न भयावह खतरे में है।

ओजोन परत के खत्म होने के क्या कारण हैं?

What are the causes of depletion of ozone layer?

मनुष्य प्रजाति द्वारा अपने घरों और दफ्तरों को ठंडा और आरामदायक बनाने के लिए प्रयोग किए जाने वाले एयर कंडीशनर, रेफ्रिजरेटर, एयरोसोल के डिब्बे, कंप्यूटर और अस्थमा के रोगियों द्वारा उपयोग किए जाने वाले इनहेलर, तमाम अन्य इलेक्ट्रॉनिक्स के सामान, डैश बोर्ड, इन्सुलेशन फोम, पानी के बॉयलर, सैन्य ठिकानों, हवाई जहाजों में आग से सुरक्षा के लिए बड़े पैमाने पर हेलोजन गैस का इस्तेमाल किया जाना, अधिकांश फलों और सब्जियों में उपस्थित कीटाणुओं को मारने के लिए मिथाइल ब्रोमाइड का प्रयोग, उक्त सभी के लिए सबसे ज्यादा क्लोरोफ्लोरोकार्बन यानी सीएफसी जो सबसे ख़तरनाक ओजोन-क्षयकारी पदार्थ यानी Ozone-Depleting Substances ODS हैं, का बेहिचक प्रयोग किया गया, इससे हमारे प्राणों की रक्षा करने के लिए हमारी धरती के वायुमंडल के सबसे ऊपरी हिस्से में प्रकृति ने बहुत सोच-विचार कर एक ओजोन छतरी का निर्माण किया है, जो सूर्य से आनेवाली समस्त जैवमण्डल की हिफाजत के लिए अत्यंत घातक अल्ट्रावायलेट किरणों या Ultraviolet Rays को अंतरिक्ष में ही 30से 40किलोमीटर ऊपर ही आत्मसात कर लेने का महत्वपूर्ण काम कर देती है, ये उक्त वर्णित क्लोरोफ्लोरोकार्बन यानी सीएफसी गैस ओजोन छतरी का सबसे बड़ा दुश्मन है।

आज के हमारे वैज्ञानिक युग में तीव्र गति से चलने वाले वायुयान से निकलने वाले नाइट्रोजन ऑक्साइड आदि से भी ओजोन परत को भारी नुकसान हो रहा है।

आसान भाषा में समझें तो ओज़ोन परत गैस ही एक नाजुक ढाल की तरह है जो धरती के सभी जीव-जन्तुओं को सूर्य की घातक Ultraviolet Rays या पराबैंगनी किरणों के हानिकारक असर से बचा कर रखती है।

अगर हमारी धरती के चारों तरफ से ओजोन का वाह्यावरण किसी वजह से नष्ट हो जाय तो वे ही सूर्य की किरणें जो हमारे लिए आज जीवनदायिनी हैं, अल्ट्रावायलेट किरणों सहित धरती पर आने की वजह से मनुष्य प्रजाति सहित समस्त जैवमण्डल के लिए ही वे किरणें जबरदस्त विनाशकारी सिद्ध हो जाएंगी।

ओजोन परत मनुष्य प्रजाति और समस्त जैवमंडल के लिए क्यों जरूरी है ?

ओजोन गैस से बना वाह्यावरण हम मनुष्य प्रजाति और समस्त जैवमंडल के लिए कितना जरूरी है (How important is the environment made of ozone gas to us humans and the entire biosphere) इसका अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि सूरज से इस धरती पर सूर्य के प्रकाश के साथ आने वाली पराबैगनी किरणों का लगभग 99% भाग तक ओजोन परत द्वारा सोख लिया जाता है, जिससे धरती पर रहने वाले सभी जीव-जन्तु समेत पेड़-पौधे भी तेज तापमान और विकिरण से सुरक्षित बचे हुए हैं। इसीलिए ओज़ोन मंडल या ओजोन परत को धरती का सुरक्षा कवच भी कहते हैं।

ज्यादातर वैज्ञानिकों का मानना हैं कि इस ओज़ोन परत के बिना धरती पर जीवन का अस्तित्व ही समाप्त हो सकता है। यही नहीं ओज़ोन परत के बिना समुद्र में पानी के नीचे 100 मीटर गहरे रहनेवाले जीवों का जीवन भी खत्म हो सकता है।

मानव प्रजाति कैंसर और त्वचा लोगों सहित अनेक अन्य लोगों से ग्रस्त हो जाएगी। ओज़ोन परत की कमी से प्राकृतिक संतुलन तक भी बिगड़ जायेगा। सर्दियों की तुलना में गर्मी ज्यादा लम्बी होने लगेगी, जिसे वैज्ञानिक भाषा में ग्लोबल वार्मिंग भी कहते हैं, होने लगेगी, इसमें पृथ्वी का तापमान सदा के लिए बढ़ जायेगा।

जानिए कैसे बनती है ओजोन परत?

Know how the ozone layer is formed?

वैज्ञानिक भाषा में समझें तो ओजोन परत आक्सीजन अणुओं की ही एक परत है जो हमारी धरती से 20 से 40 किमी ऊपर वायुमंडल के स्ट्रेटोस्फीयर मंडल परत में पाई जाती हैं, जब सूरज से निकलने वाली पराबैंगनी किरणें या Ultraviolet Ray ऑक्सीजन परमाणुओं को तोड़ती हैं और ये ऑक्सीजन परमाणु हमारे वायुमंडल में मौजूद ऑक्सीजन के साथ मिल जाते हैं तब इस बॉन्डिंग से ओज़ोन अणु बनते हैं, यही ओजोन अणु अतिघनीभूत होकर हमारी धरती के वायुमंडल के स्ट्रेटोस्फीयर मंडल परत में ओज़ोन परत वातावरण में बनाते हैं।

ऑक्सीजन के तीनों अपर रूप (allotropes) ओजोन-ऑक्सीजन चक्र (ozone-oxygen cycle) में शामिल हैं, ऑक्सीजन परमाणु O यानी ऑक्सीजन परमाणु, O2 यानी ऑक्सीजन गैस या द्विपरमाण्विक ऑक्सीजन और O3 यानी त्रिपरमाण्विक ऑक्सीजन यानी ओजोन गैस, ओजोन गैस का निर्माण समताप मंडल में तब होता है जब ऑक्सीजन के अणु 240 nm से छोटे तरंग दैर्ध्य के एक पराबैंगनी फोटोन को अवशोषित करके प्रकाश अपघटित या Photodissociate हो जाते हैं। यह ऑक्सीजन के दो परमाणुओं का निर्माण करता है। अब परमाण्विक ऑक्सीजन O2 के साथ संयोजित होकर O3 बनाती है यही ओजोन है अब यही ओजोन अणु 310 और 200 nm के बीच के यूवी प्रकाश को अवशोषित कर लेता है, जिससे ओजोन पुनः विभाजित होकर एक ऑक्सीजन परमाणु और एक O2 अणु बनाता है। अब यही अलग हुआ ऑक्सीजन परमाणु ऑक्सीजन अणु के साथ संयोजित होकर फ़िर से ओजोन अणु मतलब O3 बना देता है।

यह प्रक्रिया सतत चलती रहती है जो तब ख़त्म होती है जब एक ऑक्सीजन परमाणु एक ओजोन अणु के साथ पुनर्संयोजित होकर दो O2 अणु बना लेता है मतलब O + O3 → 2 O2 बना लेता है।

क्लोरोफ्लोरोकार्बन या सीएफसी और ब्रोमीन ओजोन वाह्यावरण के लिए कितने खतरनाक?

How dangerous are chlorofluorocarbons or CFCs and bromine ozone to the environment?

समस्त जैवमण्डल और मानवीय समाज के लिए यह बहुत ही आघातकारी सूचना है कि वैज्ञानिकों के अनुसार मात्र एक क्लोरीन का परमाणु दो साल तक लाखों ओजोन के परमाणुओं को लगातार नष्ट करता रह सकता है। ब्रोमीन क्लोरीन की तुलना में सौ गुना और ज्यादा खतरनाक है। और मात्र एक क्लोरीन परमाणु 100000 ओजोन अणुओं को नष्ट करने की क्षमता रखता है।

फ्रिज में इस्तेमाल की जाने वाली हैलोजन गैस (halogen gas used in refrigerators) में क्लोरीन के बजाए ब्रोमीन गैस होती है। ये गैस क्लोरोफ्लोरोकार्बन या सीएफसी के मुकाबले ओजोन को कहीं ज्यादा नुकसान पहुंचाती है। इस गैस का इस्तेमाल फायर एक्टिंग्युशर यानी अग्निशामक तत्वों के तौर पर किया जाता है। ये क्लोरीन के मुकाबले सौ गुना ज्यादा नुकसान पहुंचाता है। कार्बन टेट्राक्लोराइड सफाई करने में उपयोग में लाया जाता है। ये डेढ़ सौ से ज्यादा उपभोक्ता उत्पादों में कैटालिस्ट के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है। यह भी ओजोन के लिए बेहद ख़तरनाक है।

ग्लोबल वार्मिंग के दुष्प्रभाव

 (effects of global warming)

पृथ्वी के वायुमंडल में ग्रीनहाउस गैसों की अधिकता पृथ्वी पर अधिक गर्मी बढ़ाने के लिए सीधे तौर पर जिम्मेवार है। वैश्विक तापमान में जरा सी वृद्धि से समूची दुनिया में भयंकरतम् तूफान, बाढ़, जंगल की आग, सूखा और लू के खतरे की आशंका एकदम से बढ़ जाती है। एक गर्म जलवायु में, वायुमंडल अधिक पानी एकत्र कर सकता है और भयंकर बारिश हो सकती है।

वैज्ञानिकों के अनुसार पश्चिमी देशों में औद्योगिक क्रांति के बाद ग्लोबल वार्मिंग की वजह से हमारी धरती का औसत वैश्विक तापमान वर्ष 1880 के बाद से लगभग एक डिग्री सेल्सियस की वृद्धि हुई है।

ग्लोबल वार्मिंग एक सतत प्रक्रिया है, वैज्ञानिकों को आशंका है कि वर्ष 2035 तक औसत वैश्विक तापमान अतिरिक्त 0.3 से 0.7 डिग्री सेल्सियस तक और बढ़ जाएगा।

जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग में अंतर

एनवायर्नमेंटल एंड एनर्जी स्टडीज इंस्टीट्यूट ( Environmental and Energy Studies Institute) के अनुसार, जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग का उपयोग अक्सर एक-दूसरे के लिए किया जाता है, लेकिन जलवायु परिवर्तन मोटे तौर पर औसत मौसम जैसे, तापमान, वर्षा, आर्द्रता, हवा, वायुमंडलीय दबाव, समुद्र के तापमान, आदि में लगातार परिवर्तन करने के लिए जाना जाता है जबकि ग्लोबल वार्मिंग पृथ्वी के औसत वैश्विक तापमान में वृद्धि करने के लिए जाना जाता है, वैश्विक तापमान में वृद्धि से तूफान, बाढ़, जंगल की आग, सूखा और लू के खतरे की आशंका बढ़ जाती है। एक गर्म जलवायु में, वायुमंडल अधिक पानी एकत्र कर सकता है और बारिश कर सकता है, जिससे वर्षा के पैटर्न में बदलाव हो सकता है।

ग्लोबल वार्मिंग के कारण समुद्री सतह का तापमान भी बढ़ जाता है क्योंकि पृथ्वी के वातावरण की अधिकांश गर्मी समुद्र द्वारा सोख ली जाती है। गर्म समुद्री सतह के तापमान के कारण तूफान का बनना आसान हो जाता है।

मानव-जनित ग्लोबल वार्मिंग के कारण, यह आशंका जताई जाती है कि तूफान से वर्षा की दर बढ़ेगी, तूफान की तीव्रता बढ़ जाएगी और श्रेणी 4 या 5 के स्तर तक पहुंचने वाले भयंकरतम् तूफानों का अनुपात बढ़ जाएगा।

ग्लोबल वार्मिंग दो मुख्य तरीकों से समुद्र के जल स्तर को बढ़ाने में योगदान देता है। सबसे पहले, गर्म तापमान के कारण ग्लेशियर और भूमि-आधारित बर्फ की चादरें तेजी से पिघलती हैं, जो जमीन से समुद्र तक पानी ले जाती हैं।

दुनिया भर में बर्फ पिघलने वाले क्षेत्रों में यथा ग्रीनलैंड, अंटार्कटिक और हिमालय जैसे पर्वतों के उच्च शिखरों के ग्लेशियर शामिल हैं। भूवैज्ञानिकों के शोधपत्रों के अनुसार मौजूदा रुझानों को देखते हुए वर्ष 3000सदी तक अगर ग्लोबल वार्मिंग की वजह से अंटार्कटिका महाद्वीप की पूरी बर्फ की चादर पिघल जाए तो समुद्र का जलस्तर 5 मीटर यानी 16.4 फीट से भी ज्यादा तक बढ़ सकता है। अगर ऐसा सचमुच हुआ तो दुनिया भर के समुद्रतटीय नगरों में रहनेवाले अरबों लोगों के आवास समुद्र में समा जाएंगे।

ग्लोबल वार्मिंग बढ़ने के कारण

हमारी धरती की कुछ गैसें जैसे कार्बन डाइऑक्साइड और मीथेन आदि पृथ्वी के वातावरण में सूरज की गर्मी को अपने अंदर रोकती हैं। ये ग्रीनहाउस गैस वायुमंडल में प्राकृतिक रूप से भी मौजूद हैं। लेकिन ग्रीनहाउस गैसों की बहुत तेजी से बढ़ोतरी मानवीय गतिविधियों यथा विशेष रूप से बिजली के वाहनों, कारखानों और घरों में जीवाश्म ईंधन यानी, कोयला, प्राकृतिक गैस और तेल को जलाकर उन्हें वायुमंडल में छोड़ने से भी होती है। पेड़ों और जंगलों को काटने सहित पेट्रोल और डीजल चालित वाहनों के अत्यधिक प्रयोग से भी ग्रीनहाउस गैसों की तेजी से अभिवृद्धि होती है।

body of water during dawn. ocean, water
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कथित सर्वश्रेष्ठ मस्तिष्क वाले हम मनुष्य को इस धरती को बचाने के लिए क्या करना चाहिए ?   

मानव प्रजाति द्वारा अपने सुख के लिए वातानुकूलन यंत्रों व फ्रिज में तथा अन्य सैकड़ों उपकरणों और कार्यों में क्लोरोफ्लोरोकार्बन या सीएफसी और ब्रोमीन गैस के अंधाधुंध प्रयोग करने से इस धरती के समस्त जैवमण्डल के लिए सुरक्षाकवच ओजोन वाह्यावरण को गंभीर खतरे को देखते हुए इस मानव व जैवमंडल हंता गैसों की जगह वैज्ञानिकों ने एयरकंडीशन और फ्रिज के लिए हाड्रोक्लोरोफ्लोरो या एचसीएफ गैस का अविष्कार किए हैं। अब इस धरती के सभी कथित उच्च मस्तिष्क वाले हम मानवों का यह परम् और अभीष्ट कर्तव्य बनता है कि हम क्लोरोफ्लोरोकार्बन या सीएफसी और ब्रोमीन गैस के एयरकंडीशन और फ्रिज की जगह हाड्रोक्लोरोफ्लोरो या एचसीएफ गैस भरे उपकरणों का इस्तेमाल करें, पेट्रोल और डीजल चालित निजी वाहनों का प्रयोग कम से कम हो, उसकी जगह उन्नतिशील पश्चिमी देशों की तर्ज पर विद्युत चालित सार्वजनिक वाहनों यथा, स्कूटी, ट्रामों, बसों, मेट्रो और रेलों का अधिकाधिक प्रयोग हो, जंगलों की अवैध कटाई, नदियों में प्रदूषण करना, वायु और भूगर्भीय प्रदूषण दंडनीय अपराध घोषित हो और उसका कठोरता से पालन करना सुनिश्चित हो, रासायनिक किटनाशकों का प्रयोग सीमित मात्रा में हो आदि-आदि बहुत से पवित्र कर्तव्य हैं, जिससे हमारा सुरक्षा कवच ओज़ोन आवरण विनष्ट होने से बचे और ग्लोबल वार्मिंग से भी हमारी शष्य श्यामला, नीली-हरी, अद्भुत, अद्वितीय, अतुलनीय, फिलहाल पूरे ब्रह्माण्ड में अब तक ज्ञात जीवन के स्पंदन से युक्त इकलौती हमारी धरती भी बचे और इस पर रहनेवाले मनुष्यों सहित इसके समस्त जैवमण्डल के सभी जीव भी अभयदान पाकर खुशी से रहें।

निर्मल कुमार शर्मा

‘गौरैया एवम पर्यावरण संरक्षण तथा पत्र-पत्रिकाओं में वैज्ञानिक, सामाजिक, आर्थिक, पर्यावरण तथा राजनैतिक विषयों पर सशक्त व निष्पृह लेखन।

मानसिक स्वास्थ्य और कल्याण के लिए जलवायु परिवर्तन एक गंभीर खतरा

climate change nature

जानिए जलवायु परिवर्तन पर कार्रवाई के लिए मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता क्यों दी जाती है?

नई डब्ल्यूएचओ नीति देशों के लिए कार्यों पर संक्षिप्त प्रकाश डालती है

नई दिल्ली/जिनेवा 3 जून 2022: स्टॉकहोम+50 सम्मेलन में आज लॉन्च की गई एक नई डब्ल्यूएचओ नीति में कहा गया है कि जलवायु परिवर्तन मानसिक स्वास्थ्य और कल्याण के लिए गंभीर जोखिम पैदा करता है।

इसलिए संगठन कुछ अग्रणी देशों, जहां इसे प्रभावी ढंग से लागू किया गया है, के उदाहरणों का हवाला देते हुए देशों से जलवायु संकट के जवाब में मानसिक स्वास्थ्य सहायता को शामिल करने का आग्रह कर रहा है।

आईपीसीसी की रिपोर्ट से क्या पता चला?

निष्कर्ष इस साल फरवरी में प्रकाशित इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (आईपीसीसी) की हालिया रिपोर्ट से सहमत हैं।

आईपीपीसी ने खुलासा किया था कि तेजी से बढ़ता जलवायु परिवर्तन भावनात्मक संकट से लेकर चिंता, अवसाद, शोक और आत्मघाती व्यवहार तक; मानसिक स्वास्थ्य और मनोसामाजिक कल्याण के लिए एक बढ़ता खतरा बन गया है।

डब्ल्यूएचओ के पर्यावरण, जलवायु परिवर्तन और स्वास्थ्य विभाग की निदेशिका डॉ मारिया नीरा ने कहा कि

“जलवायु परिवर्तन के प्रभाव तेजी से हमारे दैनिक जीवन का हिस्सा बन रहे हैं, और जलवायु से संबंधित खतरों और दीर्घकालिक जोखिम से निपटने वाले लोगों और समुदायों के लिए बहुत कम समर्पित मानसिक स्वास्थ्य सहायता उपलब्ध है।”

डब्ल्यूएचओ मानसिक स्वास्थ्य को कैसे परिभाषित करता है? What does WHO define mental health?

डब्ल्यूएचओ मानसिक स्वास्थ्य और मनोसामाजिक समर्थन (एमएचपीएसएस) को “किसी भी प्रकार के स्थानीय या बाहरी समर्थन के रूप में परिभाषित करता है जिसका उद्देश्य मनोसामाजिक कल्याण की रक्षा या बढ़ावा देना और / या मानसिक विकार को रोकना या उसका इलाज करना है”।

डब्ल्यूएचओ मानसिक स्वास्थ्य को “कल्याण की एक ऐसी स्थिति के रूप में परिभाषित करता है जिसमें प्रत्येक व्यक्ति अपनी क्षमता का एहसास करता है, जीवन के तनावों का सामना कर सकता है, उत्पादक और फलदायी रूप से काम कर सकता है और अपने या अपने समुदाय में योगदान करने में सक्षम है”।

जलवायु परिवर्तन के मानसिक स्वास्थ्य प्रभाव क्या हैं?

जलवायु परिवर्तन के मानसिक स्वास्थ्य प्रभाव असमान रूप से कुछ समूहों को प्रभावित करते हैं जो सामाजिक आर्थिक स्थिति, लिंग और उम्र जैसे कारकों के आधार पर असमान रूप से प्रभावित होते हैं। हालांकि, यह स्पष्ट है कि जलवायु परिवर्तन कई सामाजिक निर्धारकों को प्रभावित करता है जो पहले से ही विश्व स्तर पर बड़े पैमाने पर मानसिक स्वास्थ्य बोझ का कारण बन रहे हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2021 में 95 देशों के डब्ल्यूएचओ के सर्वेक्षण में पाया गया कि केवल 9 देशों ने अब तक अपने राष्ट्रीय स्वास्थ्य और जलवायु परिवर्तन योजनाओं में मानसिक स्वास्थ्य और मनोसामाजिक समर्थन को शामिल किया है।

मानसिक स्वास्थ्य और मादक द्रव्यों के सेवन विभाग के डब्ल्यूएचओ निदेशक देवोरा केस्टेल (Dévora Kestel, WHO Director, Department of Mental Health and Substance Abuse) ने कहा, “जलवायु परिवर्तन का प्रभाव वैश्विक स्तर पर मानसिक स्वास्थ्य और मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं के लिए पहले से ही बेहद चुनौतीपूर्ण स्थिति को बढ़ा रहा है। लगभग एक बिलियन लोग मानसिक स्वास्थ्य की स्थिति के साथ जी रहे हैं, फिर भी निम्न और मध्यम आय वाले देशों में, 4 में से 3 लोगों के पास आवश्यक सेवाओं तक पहुंच नहीं है।”

उन्होंने आगे कहा कि आपदा जोखिम में कमी और जलवायु कार्रवाई के भीतर मानसिक स्वास्थ्य और मनोसामाजिक समर्थन को बढ़ाकर, देश सबसे अधिक जोखिम वाले लोगों की रक्षा करने में मदद करने के लिए और अधिक कार्य कर सकते हैं।”

जलवायु परिवर्तन के मानसिक स्वास्थ्य प्रभावों को दूर करने के लिए सरकारों के लिए महत्वपूर्ण दृष्टिकोण क्या हैं?

नई डब्ल्यूएचओ नीति संक्षेप में जलवायु परिवर्तन के मानसिक स्वास्थ्य प्रभावों को दूर करने के लिए सरकारों के लिए पांच महत्वपूर्ण दृष्टिकोणों की सिफारिश करती है, जिसमें शामिल है :

• मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रमों के साथ जलवायु संबंधी विचारों को एकीकृत करें

• मानसिक स्वास्थ्य सहायता को जलवायु कार्रवाई के साथ एकीकृत करें

• वैश्विक प्रतिबद्धताओं पर निर्माण करें

• कमजोरियों को कम करने के लिए समुदाय आधारित दृष्टिकोण विकसित करना और

• मानसिक स्वास्थ्य और मनोसामाजिक समर्थन के लिए मौजूद बड़े फंडिंग अंतर को बंद करें

डब्ल्यूएचओ जलवायु प्रमुख और आईपीसीसी रिपोर्ट के एक प्रमुख लेखक डॉ डायर्मिड कैंपबेल-लेंड्रम (Dr Diarmid Campbell-Lendrum, WHO climate lead, and an IPCC lead author) ने कहा कि, “डब्ल्यूएचओ के सदस्य राज्यों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि मानसिक स्वास्थ्य उनके लिए प्राथमिकता है। हम लोगों के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को जलवायु परिवर्तन के खतरों से बचाने के लिए देशों के साथ मिलकर काम कर रहे हैं।”

सम्मेलन कहता है कि कुछ अच्छे उदाहरण मौजूद हैं कि यह कैसे किया जा सकता है जैसे कि फिलीपींस में, जिसने 2013 में टाइफून हैयान के प्रभाव (impact of Typhoon Haiyan in 2013 ) के बाद अपनी मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं का पुनर्निर्माण और सुधार किया है या फिर भारत में, जहां एक राष्ट्रीय परियोजना ने देश में आपदा जोखिम को कम किया है, जबकि शहरों को जलवायु जोखिमों का जवाब देने और मानसिक स्वास्थ्य और मनोसामाजिक जरूरतों को पूरा करने के लिए तैयार किया है।

स्टॉकहोम सम्मेलन मानव पर्यावरण पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन की 50वीं वर्षगांठ मना रहा है और शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य दोनों के लिए पर्यावरणीय निर्धारकों के महत्व की पहचान कर रहा है।

दक्षिण एशिया में वायु प्रदूषण : इलाकाई देशों का फोरम बनाने की जरूरत पर जोर

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Air pollution in South Asia: emphasis on the need to form a forum of regional countries

नई दिल्‍ली, 30 मई। वायु प्रदूषण खासकर दक्षिण एशियाई देशों के लिये बहुत विकट समस्‍या बन गया है। इस विपत्ति की सबसे ज्‍यादा तपिश दक्षिण एशियाई देशों भारत, पाकिस्‍तान, बांग्‍लादेश और नेपाल को सहन करनी पड़ रही है। वायु प्रदूषण संपूर्ण दक्षिण एशियाई क्षेत्र के लिए बहुत बड़ी समस्या है और इस क्षेत्र में स्थित कोई भी देश इससे अकेला नहीं लड़ सकता। भारत और पाकिस्‍तान के सांसदों ने इन देशों का एक ऐसा मंच तैयार करने की जरूरत बतायी है, जहां पर वायु प्रदूषण से निपटने के लिये विशेषज्ञताओं और अनुभवों का आदान-प्रदान किया जा सके।

The interrelationships between air pollution, public health and fossil fuels

पर्यावरण थिंक टैंक ‘क्‍लाइमेट ट्रेंड्स’ ने वायु प्रदूषण, जन स्‍वास्‍थ्‍य और जीवाश्‍म ईंधन के बीच अंतर्संबंधों को तलाशने और सभी के लिये स्‍वस्‍थ धरती से सम्‍बन्धित एक विजन का खाका खींचने के लिये शनिवार को एक ‘वेबिनार’ का आयोजन किया।

वेबिनार में असम की कलियाबोर सीट से सांसद गौरव गोगोई ने कहा कि वायु प्रदूषण के मामले में पूरी दुनिया की नजर दक्षिण एशिया पर होती है, क्‍योंकि ये विशाल भूभाग प्रदूषण की समस्‍या का सबसे बड़ा शिकार है, लिहाजा हमें अपने मानक और अपने समाधान तय करने होंगे। हमें एक ऐसा मंच और ऐसे मानक तैयार करने होंगे जिनसे इस सवाल के जवाब मिलें कि हमने स्टॉकहोम और ग्लास्गो में जो संकल्प लिए थे उन्हें दिल्ली, लाहौर, ढाका और दिल्ली में कैसे लागू किया जाएगा। यह मंच विभिन्न विचारों के आदान-प्रदान का एक बेहतरीन प्लेटफार्म साबित होगा।

उन्‍होंने कहा कि जब हम वायु प्रदूषण के एक आपात स्थिति होने के तौर पर बात करते हैं तो इस बात को भी नोट करना चाहिए कि हम इस मुद्दे पर कितना ध्‍यान केन्द्रित करते हैं। इन मामलों में सांसद बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ऐसे में बहुत जरूरी है कि हम इस क्षेत्र में अपने सांसदों की क्षमता को और बढ़ाएं। उन्हें इस बात की जानकारी होनी चाहिए कि वायु प्रदूषण उनके अपने राज्य को किस तरह प्रभावित कर रहा है ताकि वे अपने क्षेत्र में सर्वे कर सकें और लोगों को जागरूक बना सकें। इससे यह भी पता लगेगा कि वायु प्रदूषण की समस्या को लेकर हमारे स्‍थानीय निकाय कितने तैयार हैं।

पाकिस्‍तान के सांसद रियाज फतयाना ने वायु प्रदूषण को दक्षिण एशिया के लिये खतरे की घंटी बताते हुए महाद्वीप के स्‍तर पर मिलजुलकर काम करने की जरूरत पर जोर दिया।

उन्‍होंने कहा कि दक्षिण एशियाई सांसदों का एक फोरम बनाया जाना चाहिए जहां इन विषयों पर बातचीत हो सके। पाकिस्तान में वायु प्रदूषण की समस्या बहुत ही खतरनाक रूप लेती जा रही है। जहां एक तरफ दुनिया कह रही है कि नए कोयला बिजलीघर न लगाए जाएं लेकिन दक्षिण एशिया के विभिन्न देशों में अब भी इन्‍हें लगाए जाने का सिलसिला जारी है। इनकी वजह से होने वाला वायु प्रदूषण जानलेवा साबित हो रहा है।

उन्‍होंने कहा कि हमें वैकल्पिक ऊर्जा और एनवायरमेंटल एलाइनमेंट दोनों पर ही काम करना होगा। एक दूसरे के अनुभवों का आदान-प्रदान करना भी बहुत महत्वपूर्ण है। हमें और भी ज्यादा प्रभावी कानून बनाने होंगे।

क्‍लाइमेट ट्रेंड्स की निदेशक आरती खोसला ने कहा कि वायु की गुणवत्ता का मसला अब सिर्फ भारत की समस्या नहीं रहा, बल्कि यह पूरे दक्षिण एशिया की भी समस्या बन चुका है। दुनिया वर्ष 1972 में स्टॉकहोम में ह्यूमन एनवॉयरमेंट पर हुई संयुक्‍त राष्‍ट्र की पहली कॉन्फ्रेंस की 50वीं वर्षगांठ अगले महीने मनाने जा रही है। यह इस बात के आकलन के लिए एक महत्वपूर्ण वर्ष है कि किस तरह से जैव विविधता तथा पर्यावरण से जुड़े अन्य तमाम पहलू मौजूदा स्थिति से प्रभावित हो रहे हैं। वायु प्रदूषण एक प्राथमिक सार्वजनिक स्वास्थ्य इमरजेंसी है। दक्षिण एशिया यह मानता है कि जलवायु परिवर्तन सिर्फ राजनीतिक मसला नहीं है बल्कि सामाजिक और आर्थिक समस्या भी बन चुका है।

बांग्लादेश के सांसद साबेर चौधरी ने कहा कि जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिये राजनीतिक इच्‍छाशक्ति की जरूरत बेहद महत्‍वपूर्ण है। हमें पूरी दुनिया में सांसदों की ताकत का सदुपयोग करना चाहिये। वायु प्रदूषण एक पर्यावरणीय आपात स्थिति नहीं बल्कि प्लेनेटरी इमरजेंसी है। इसकी वजह से वॉटर स्ट्रेस और खाद्य असुरक्षा समेत अनेक आपदाएं जन्म ले रही हैं। वायु प्रदूषण दक्षिण एशिया के लिये एक साझा चुनौती है। यह किसी एक देश की सेहत का सवाल नहीं है। यह पूरे दक्षिण एशिया का प्रश्न है। सांसद के रूप में मैं जन स्‍वास्‍थ्‍य पर ध्‍यान केन्द्रित करना चाहता हूं। हमें नये सिरे से विकास की परिकल्पना करनी होगी।

नेपाल की सांसद पुष्पा कुमारी कर्ण ने काठमांडू की दिन-ब-दिन खराब होती पर्यावरणीय स्थिति का विस्‍तार से जिक्र करते हुए कहा कि वायु प्रदूषण दुनिया की सभी जानदार चीजों की सेहत पर प्रभाव डाल रहा है। काठमांडू नेपाल की राजधानी है और यह दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों में से एक है। हर साल सर्दियों के मौसम में काठमांडू में वायु की गुणवत्ता बहुत खराब हो जाती है। ऑटोमोबाइल्स और वाहनों की बढ़ती संख्या की वजह से समस्या दिन-ब-दिन विकट होती जा रही है। काठमांडू में पीएम 2.5 का स्तर डब्ल्यूएचओ के सुरक्षित मानकों के मुकाबले 5 गुना ज्यादा है। हालांकि नेपाल सरकार ने इलेक्ट्रिक मोबिलिटी के लिए एक योजना तैयार की है। इसी तरह की योजनाएं दक्षिण एशिया के अन्य देशों में भी लागू की जानी चाहिए।

वायु प्रदूषण खासकर दक्षिण एशियाई क्षेत्रों के लिये एक स्‍वास्‍थ्‍य सम्‍बन्‍धी आपात स्थिति बन गया है। मेदांता हॉस्पिटल के ट्रस्‍टी डॉक्‍टर अरविंद कुमार ने कहा कि भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश और नेपाल को यह सवाल पूछने की जरूरत है कि जलवायु परिवर्तन कितना प्रभावी है। इन चारों देशों में वायु प्रदूषण के स्तर खतरनाक रूप ले चुके हैं। वायु प्रदूषण सिर्फ पर्यावरणीय और रासायनिक मुद्दा नहीं है बल्कि यह विशुद्ध रूप से स्‍वास्‍थ्‍य से जुड़ा मसला है।

फेफड़े के विशेषज्ञ के तौर पर वह अपने 30 साल के अनुभव से कहते हैं कि फेफड़े के कैंसर के लगभग 50 प्रतिशत मरीज ऐसे आ रहे हैं जो धूम्रपान नहीं करते। इसके अलावा 10 प्रतिशत मरीज 20 से 30 साल के बीच के होते हैं। भारत के 30% बच्चे यानी हर तीसरा बच्‍चा दमा का मरीज है। वायु प्रदूषण सिर्फ हमारे फेफड़ों को ही नुकसान नहीं पहुंचा रहा है बल्कि इसकी वजह से दिल की बीमारियां, तनाव, अवसाद और नपुंसकता समेत अन्य अनेक रोग पैदा हो रहे हैं। गर्भ में पल रहे बच्चे को भी समस्याएं हो रही हैं। यानी पैदाइश से पहले से लेकर मौत तक वायु प्रदूषण हमें प्रभावित कर रहा है। हमारे पास वायु प्रदूषण को समाप्त करने के अलावा और कोई चारा नहीं है। हमें अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी और इस दिशा में काम करने का सबसे सही समय आज ही है।

नेपाली रेस्पिरेटरी सोसाइटी के अध्‍यक्ष डॉक्‍टर रमेश चोखानी ने दक्षिण एशिया के पर्वतीय देश नेपाल में वायु प्रदूषण की चिंताजनक स्थिति का जिक्र करते हुए कहा कि नेपाल जीवाश्म ईंधन का प्रमुख उपयोगकर्ता है और वह ज्यादातर जीवाश्म ईंधन को भारत से आयात करता है। नेपाल में अन्य वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों की कमी की वजह से मजबूरन बायोमास और लकड़ी का इस्तेमाल किया जाता है। नेपाल की ज्यादातर आबादी परंपरागत बायोमास पर निर्भर करती है। नेपाल में बायोमास जलने के कारण उत्‍पन्‍न वायु प्रदूषण की वजह से हर साल तकरीबन 7500 लोगों की मौत होती है।

उन्‍होंने बताया कि वायु प्रदूषण को लेकर आपात स्थिति से गुजरने के बावजूद पिछले पांच सालों में नेपाल में पेट्रोल की खपत लगभग दोगुनी हो गयी है। डीजल का उपयोग भी लगभग 96% बढ़ा है। हाल ही में 69 किलोमीटर की पेट्रोलियम पाइपलाइन बिहार के मोतिहारी से नेपाल के बीच तैयार की गई है। इसका मतलब यह है कि नेपाल सरकार का अक्षय ऊर्जा में रूपांतरण का कोई भी इरादा नहीं है। हालांकि नेपाल के पास अक्षय ऊर्जा स्रोतों से बड़े पैमाने पर ऊर्जा उत्पादन करने की क्षमता है। उसके पास वायु, हाइड्रो और सोलर पावर उत्पन्न करने की काफी संभावना है लेकिन अभी उन पर ज्यादा काम नहीं किया गया है। अगर हाइड्रो पावर की तमाम संभावनाओं का सर्वश्रेष्ठ दोहन किया जाए तो इससे नेपाल की अर्थव्यवस्था को बढ़ाने में काफी मदद मिल सकती है। नेपाल के पास काफी प्राकृतिक संपदा है लेकिन उसका सही उपयोग नहीं हो रहा है।

दुनिया में मानव स्वास्थ्य संबंधी चौथा सबसे बड़ा खतरा है प्रदूषण

बांग्लादेश लंग फाउंडेशन के काजी बेन्नूर ने कहा कि जीवाश्म ईंधन यानी कोयला, तेल और प्राकृतिक गैस की वजह से अनेक पर्यावरणीय तथा स्‍वास्‍थ्‍य सम्‍बन्‍धी नुकसान होते हैं।

इससे जीवाश्म ईंधन की आपूर्ति श्रृंखला के हर चरण में अतिरिक्‍त भार पैदा होता है। जब जीवाश्म ईंधन को जलाया जाता है तो उससे कार्बन डाइऑक्साइड जैसी ग्रीनहाउस गैस उत्पन्न होती है जो जलवायु परिवर्तन को बढ़ावा देती है। जीवाश्म ईंधन से पैदा होने वाली गैसों की वजह से समुद्रों का अम्‍लीकरण, अत्यधिक बारिश और समुद्र के जल स्तर में वृद्धि होती है। जीवाश्म ईंधन जलाने के कारण उत्पन्न वायु प्रदूषण की वजह से दमा, कैंसर, दिल की बीमारी और असामयिक मौत हो सकती है। वैश्विक स्तर पर हर पांच में से एक मौत वायु प्रदूषण की वजह से होती है। वहीं, प्रदूषण दुनिया में चौथा सबसे बड़ा मानव स्वास्थ्य संबंधी खतरा है।

एक अदृश्य हत्यारा है वायु प्रदूषण

उन्‍होंने कुछ आंकड़े देते हुए बताया कि वायु प्रदूषण एक अदृश्य हत्यारा है। दक्षिण एशिया में 29% लोगों की मौत फेफड़े के कैंसर से होती है, 24% लोगों की मौत मस्तिष्क पक्षाघात से, 25% लोगों की मौत दिल के दौरे से और 43 प्रतिशत लोगों की मौत फेफड़े की बीमारी से होती है। दक्षिण पूर्व एशियाई क्षेत्र में वायु प्रदूषण की वजह से 20 लाख से ज्यादा लोगों की मृत्यु होती है।

फॉसिल फ्यूल ट्रीटी के हरजीत सिंह ने वायु प्रदूषण के लिये मौजूदा आर्थिक ढर्रे को काफी हद तक जिम्‍मेदार ठहराया। उन्‍होंने कहा कि हम मौजूदा आर्थिक मॉडल के साथ आगे नहीं बढ़ सकते। हमें एक ऐसे विकास मॉडल की जरूरत है जो हमारे पर्यावरण को संरक्षण देता हो।

कोई भी देश मौजूदा आर्थिक ढर्रे से हटना नहीं चाहता है, लेकिन ऐसा किए बगैर दुनिया को सुरक्षित नहीं बनाया जा सकता। इसके लिए हमें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सहयोग की भी जरूरत होती है क्योंकि इसके बिना कुछ नहीं हो सकता।

जलवायु परिवर्तन : भारत और पाकिस्‍तान में 30 गुना बढ़ा समय से पहले हीटवेव का खतरा

Climate change Environment Nature

WWA Study on India & Pakistan Heat – Scientific Report

Climate change increased the risk of premature heatwaves in India and Pakistan by 30 times

नई दिल्ली, 24 मई 2022: भारत और पाकिस्तान में पिछले लंबे समय से चल रही ताप लहर (हीटवेव) की वजह से इंसानी आबादी को बड़े पैमाने पर मुश्किलों का सामना करना पड़ा है और इसने वैश्विक स्तर पर गेहूं की आपूर्ति पर भी असर डाला है। दुनिया के प्रमुख जलवायु वैज्ञानिकों के एक अंतरराष्ट्रीय दल द्वारा किए गए रैपिड एट्रीब्यूशन विश्लेषण (Rapid Attribution Analysis) के मुताबिक इंसान की नुकसानदेह गतिविधियों के कारण उत्पन्न जलवायु परिवर्तन की वजह से ऐसी भयंकर गर्मी पड़ने की आशंका करीब 30 गुना बढ़ गई है।

इस साल मार्च में शुरू हो गई थी हीट वेब

भारत और पाकिस्तान के अनेक बड़े हिस्सों में इस साल समय से पहले अप्रत्याशित हीटवेव शुरू हो गई। यह मार्च के शुरू में प्रारंभ हुई और काफी हद तक अब भी बरकरार है।

भारत में मार्च का महीना (month of march in india) पिछले 122 सालों में सबसे गर्म माह रहा। वहीं, पाकिस्तान में भी तापमान ने कई रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिए। इसके अलावा अप्रैल में ताप लहर और भी प्रचंड हो गई। मार्च का महीना बेहद सूखा रहा।

इस बीच पाकिस्तान में सामान्य से 62% कम मानसून पूर्व बारिश हुई जबकि भारत में यह आंकड़ा 71% रहा। हीटवेव की वजह से कम से कम 90 लोगों की मौत हुई। अगर मौतों का आंकड़ा ठीक से दर्ज किया जाए तो इस संख्या में निश्चित रूप से बढ़ोत्‍तरी होगी।

भारत में हीटवेव के चलते गेहूं के उत्पादन पर पड़ा बुरा असर

हीटवेव की जल्द आमद और बारिश में कमी की वजह से भारत में गेहूं के उत्पादन पर बुरा असर पड़ा। परिणामस्वरूप सरकार को गेहूं के निर्यात पर पाबंदी का ऐलान करना पड़ा, जिसकी वजह से वैश्विक स्तर पर गेहूं के दामों में तेजी आई। भारत ने इससे पहले रिकॉर्ड एक करोड़ टन गेहूं के निर्यात की उम्मीद लगाई थी जिससे यूक्रेन-रूस युद्ध की वजह से पैदा हुई गेहूं की किल्लत को दूर करने में मदद मिलती।

पूरी दुनिया में आज जिस तरह की ताप लहर चल रही है उसे जलवायु परिवर्तन ने और भी ज्यादा तीव्र और जल्दी-जल्दी आने वाली आपदा में तब्दील कर दिया है। भारत और पाकिस्तान में लंबे वक्त तक अधिक तापमान पर जलवायु परिवर्तन के असर को नापने के लिए वैज्ञानिकों ने पियर रिव्यूड मेथड का इस्तेमाल करके कंप्यूटर सिमुलेशन और मौसम संबंधी डाटा का विश्लेषण किया ताकि मौजूदा जलवायु की तुलना 19वीं सदी के उत्तरार्ध से 1.2 डिग्री सेल्सियस ग्लोबल वार्मिंग पर, पूर्व की जलवायु से की जा सके।

यह अध्ययन मार्च और अप्रैल के दौरान गर्मी से सबसे बुरी तरह प्रभावित हुए उत्तर पश्चिमी भारत तथा दक्षिण पूर्वी पाकिस्तान के औसत अधिकतम दैनिक तापमान पर केंद्रित है। इसके नतीजे दिखाते हैं कि लंबे समय से चल रही मौजूदा हीटवेव की संभावना अभी बहुत कम है, यानी कि इसकी संभावना हर साल मात्र 1% ही है मगर इंसान की गतिविधियों के कारण होने वाले जलवायु परिवर्तन ने इसकी संभावना को 30 गुना बढ़ा दिया है। यानी कि अगर मनुष्य की हरकतों की वजह से उत्पन्न जलवायु परिवर्तन नहीं होता तो यह भीषण हीटवेव का दौर अत्यंत दुर्लभ होता।

जब तक ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन पर पूरी तरह रोक नहीं लगती तब तक वैश्विक तापमान इसी तरह बढ़ता रहेगा और इससे संबंधित चरम मौसमी घटनाएं और भी जल्दी जल्दी होती रहेंगी। वैज्ञानिकों ने पाया है कि अगर वैश्विक तापमान में वृद्धि 2 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाती है तो ऐसी हीटवेव की संभावना हर 5 साल में एक बार होगी। यहां तक कि प्रदूषणकारी तत्वों के उत्सर्जन में कटौती की धीमी प्रक्रिया की वजह से भी ऐसी हीट वेव की संभावनाएं बरकरार रह सकती हैं।

हो सकता है कि इस अध्ययन के नतीजे इस बात को कम करके आंकें कि अब ऐसी हीटवेव कितनी सामान्य बात है और अगर ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन इसी तरह जारी रहा तो यह हीटवेव और कितनी जल्दी जल्दी उत्पन्न होंगी। ऐसा इसलिए है क्योंकि मौसम से संबंधित डाटा रिकॉर्ड उतने विस्तृत रूप में उपलब्ध नहीं है कि शोधकर्ता उनका सांख्यिकीय विश्लेषण कर सकें।

इस अध्ययन को 29 शोधकर्ताओं ने वर्ल्ड वेदर अटरीब्यूशन ग्रुप के तहत अंजाम दिया है। इस समूह में भारत, पाकिस्तान, डेनमार्क, फ्रांस, नीदरलैंड्स, न्यूजीलैंड, स्विटजरलैंड, ब्रिटेन और अमेरिका के विभिन्न विश्वविद्यालयों तथा मौसम विज्ञान संबंधी एजेंसियों से जुड़े वैज्ञानिक शामिल हैं।

अपनी प्रतिक्रिया देते हुए आईआईटी दिल्ली में सेंटर फॉर एटमॉस्फेरिक साइंस के प्रोफेसर कृष्ण अचुता राव ने कहा, ‘‘भारत और पाकिस्तान में तापमान का उच्च स्तर पर पहुंच जाना एक सामान्य सी बात है लेकिन इस बार अप्रत्याशित बात यह रही कि यह सिलसिला बहुत जल्दी शुरू हो गया और लंबे वक्त से जारी है। दोनों देशों के ज्यादातर हिस्सों में लोगों को आखिरी के हफ्तों में भीषण गर्मी से कुछ राहत मिली। भीषण गर्मी से खासतौर पर खुले में काम करने वाले करोड़ों श्रमिकों और मजदूरों को बहुत मुश्किल भरे हालात का सामना करना पड़ा। हम जानते हैं कि आने वाले वक्त में ऐसी स्थितियां बार-बार पैदा होगी क्योंकि तापमान बढ़ रहा है और हमें इससे निपटने के लिए और बेहतर तैयारी करने की जरूरत है।’’

आगे, आईआईटी मुंबई के सिविल इंजीनियरिंग और क्लाइमेट स्टडीज में प्रोफेसर अर्पिता मोंडल ने बताया, “हीटवेव में जंगलों में आग लगने का खतरा बढ़ाने की क्षमता है। यहां तक कि इससे सूखा भी उत्पन्न हो सकता है। क्षेत्र के हजारों लोग, जिनका ग्लोबल वार्मिंग में बहुत थोड़ा सा योगदान है, वे अब इसकी भारी कीमत चुका रहे हैं। उन पर यह आपदा जारी रहेगी, अगर वैश्विक स्तर पर प्रदूषणकारी तत्वों के उत्सर्जन में उल्लेखनीय कटौती नहीं की गई।”

इसी क्रम में इंपीरियल कॉलेज लंदन के ग्रंथम इंस्टीट्यूट के डॉ फ्रेडरिक ओटो ने कहा, “ऐसे देशों में जहां हमारे पास डाटा उपलब्ध है, वहां हीटवेव सबसे जानलेवा चरम मौसमी घटना है। साथ ही साथ तेजी से गर्म होती धरती में यह हीटवेव सबसे मजबूती से बढ़ रही चरम मौसमी घटना भी है। जब तक ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन जारी रहेगा तब तक ऐसी मौसमी आपदाएं और भी ज्यादा आम मुसीबत बनती जाएंगी।”

अपने विचार रखते हुए डेनमार्क की यूनिवर्सिटी ऑफ कोपनहेगन के पब्लिक हेल्थ डिपार्टमेंट के डॉक्टर इमैनुअल राजू ने कहा, “हीटवेव को आपदा कहे जाने पर जोर देना बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि अगर ऐसा नहीं किया गया तो इनके प्रभावों में योगदान देने वाले अनेक कारकों को नजरअंदाज किया जा सकता है। यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि क्षतिपूर्ति और राहत प्रणालियों पर आपदाओं के गंभीर प्रभाव पड़ते हैं।”

पाकिस्तान से इस्लामाबाद से क्लाइमेट एनालिटिक्स के लिए काम कर रहे जलवायु वैज्ञानिक डॉक्टर फहद सईद ने कहा ‘‘सबसे अफसोस की बात यह है कि ग्लोबल वार्मिंग के मौजूदा स्तर पर क्षेत्र की एक बड़ी गरीब आबादी के लिए अनुकूलन की सीमा का उल्लंघन किया जा रहा है। क्या कोई कल्पना कर सकता है कि 2 डिग्री सेल्सियस गर्म दुनिया के लिए भी यह कितना बुरा होगा। एक मजबूत अनुकूलन और शमन वाली कार्रवाई के अभाव में डेढ़ डिग्री सेल्सियस से अधिक की कोई भी वार्मिंग कमजोर आबादी के लिए अस्तित्व का खतरा पैदा कर सकती है।’’

सरबोने यूनिवर्सिटी के इंस्टिट्यूट पियरे सिमोन लाप्लास सीएनआरएस के प्रोफेसर रॉबर्ट वाटार्ड कहते हैं, ‘‘जलवायु परिवर्तन से खाद पानी पाई हीटवेव की वजह से खाद्य पदार्थों के दामों में प्रत्यक्ष बढ़ोत्‍तरी हो रही है। भारत ने इस साल गेहूं का रिकॉर्ड निर्यात करने की योजना बनाई थी ताकि रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण पैदा हुई किल्लत को दूर करने में मदद मिल सके। मगर अब जलवायु परिवर्तन के कारण पड़ी हीटवेव के चलते गेहूं का ज्यादातर निर्यात रद्द कर दिया गया है, जिसकी वजह से वैश्विक स्तर पर गेहूं के दामों में इजाफा हुआ है और पूरी दुनिया में भुखमरी बढ़ी है।”

एक क्लिक में आज की बड़ी खबरें । 24 मई 2022 की खास खबर

top 10 headlines this night

ब्रेकिंग : आज भारत की टॉप हेडलाइंस

Top headlines of India today. Today’s big news 24 May 2022

भ्रष्टाचार के आरोप में पंजाब के स्वास्थ्य मंत्री बर्खास्त

पंजाब के स्वास्थ्य मंत्री विजय सिंगला को दो महीने पुरानी भगवंत मान सरकार के मंत्रिमंडल से आज बर्खास्त कर दिया गया। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक सिंगला को भ्रष्टाचार के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया है।

पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान ने ट्वीट किया,

“आम आदमी पार्टी का जन्म ईमानदार सिस्टम कायम करने के लिए हुआ है… अरविंद केजरीवाल जी ने हमेशा कहा है कि भ्रष्टाचार को बर्दाश्त नहीं करेंगे चाहे कोई अपना हो या बेगाना.

स्वास्थ्य मंत्री के खिलाफ भ्रष्टाचार के सबूत मिलते ही तुरंत बर्खास्त किया…साथ ही FIR के आदेश दिए”

वाम दलों की मांग, सरकार पेट्रोलियम उत्पादों पर सभी अधिभार, उपकर वापस ले

देश में बढ़ती बेरोजगारी और पेट्रोलियम पदार्थों की आसमान छूती कीमतों के खिलाफ वाम दलों के राष्ट्रव्यापी आह्वान पर बिहार में 25 से 31 मई तक सघन आंदोलन अभियान चलेगा और 31 मई को जिला मुख्यालयों पर प्रदर्शन, धरना कार्यक्रम होंगे।

केजरीवाल ने 150 इलेक्ट्रिक बसों को दिखाई हरी झंडी, तीन दिन की मुफ्त सवारी की घोषणा

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने आज इंद्रप्रस्थ डिपो से 150 इलेक्ट्रिक बसों को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया और अगले तीन दिनों के लिए इन बसों में मुफ्त यात्रा की भी घोषणा की।

प्रधानमंत्री के दौरे से पहले आईएसबी के छात्र जांच के घेरे में : भाकपा

भाकपा के राष्ट्रीय सचिव के. नारायण ने आरोप लगाया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 26 मई को इंडियन स्कूल ऑफ बिजनेस (आईएसबी) हैदराबाद के दौरे से पहले अधिकारी आईएसबी के छात्रों पर निगाह रख रहे हैं।

दिल्ली-एनसीआर में बारिश के बाद मौसम हुआ सुहाना

रविवार से दिल्ली-एनसीआर में शुरू हुई बारिश का सिलसिला मंगलवार शाम तक जारी रहा जिससे राजधानीवासियों को भीषण गर्मी से राहत मिली।

जलवायु परिवर्तन से भारत, पाकिस्तान में समय से पहले विनाशकारी गर्मी की ’30 गुना अधिक आशंका

उत्तर-पश्चिम भारत और दक्षिण-पूर्वी पाकिस्तान में हाल की गर्मी की लहर पर विशेष रूप से नजर रखने वाले और जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को मापने वाले एक एट्रिब्यूशन अध्ययन में कहा गया है कि लंबे समय तक लू चलने की संभावना 30 गुना अधिक है।

भारत में कोविड के 1,675 नए मामले मिले, 31 की मौत

भारत में मंगलवार को 1,675 ताजा कोविड मामले दर्ज किए गए, जो पिछले दिन दर्ज किए गए 2,022 संक्रमणों के मुकाबले कम थे। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा जारी किए गए आंकड़ों से इसकी जानकारी मिली है।

न्यायमूर्ति सबीना बनीं हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायाधीश

भारत के संविधान के अनुच्छेद 223 द्वारा प्रदत्त अधिकारों का उपयोग करते हुये राष्ट्रपति ने हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय की वरिष्ठतम न्यायाधीश श्रीमती न्यायमूर्ति सबीना को उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया है। विधि एवं न्‍याय मंत्रालय की एक प्रेस विज्ञप्ति में बताया गया है कि उनका कार्यकाल हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश श्री न्यायमूर्ति मोहम्मद रफीक के 25 मई, 2022 को अवकाश ग्रहण करने के फलस्वरूप प्रभावी हो जायेगा।

आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन : स्वास्थ्य रिकॉर्डों के रखरखाव के लिये संशोधित ‘आभा’ मोबाइल एप्लीकेशन लाँच

अपनी प्रमुख योजना आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन (एबीडीएएम) के अंतर्गत राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्राधिकरण (एनएचए) ने आयुष्मान भारत हेल्थ अकाउंट (आभा) मोबाइल एप्लीकेशन के संशोधित संस्करण को लॉन्च करने की घोषणा की है।

आभा एप्प को पहले एनडीएचएम हेल्थ रिकॉर्ड्स एप्प के नाम से जाना जाता था, जो गूगल प्ले स्टोर पर उपलब्ध है। इसे चार लाख से अधिक बार डाउनलोड किया जा चुका है।

नवीन पटनायक ने स्कूलों में शुरू किया ओलंपिक वैल्यू शिक्षाकार्यक्रम

ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने आज 90 स्कूलों में ओलंपिक वैल्यू शिक्षा कार्यक्रम की वर्चुअल शुरुआत की। यह कार्यक्रम राउरकेला और भुवनेश्वर के स्कूलों में पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर शुरू किया गया है।

ऑस्ट्रेलिया : न्यू साउथ वेल्स सिंगल यूज प्लास्टिक बैग पर बैन लगाएगा

ऑस्ट्रेलिया का न्यू साउथ वेल्स (एनएसडब्ल्यू) सिंगल-यूज प्लास्टिक बैग पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की तैयारी कर रहा है।

न्यूयॉर्क शहर में आपातकाल की घोषणा

अमेरिका में शिशु फामूर्ला आपूर्ति की कमी के कारण न्यूयॉर्क शहर ने आपातकाल की स्थिति घोषित कर दी है।

जापान के पूर्व प्रधानमंत्री सुगा ने पीएम मोदी से की मुलाकात

जापान के पूर्व प्रधानमंत्री योशीहिदा सुगा ने मंगलवार को टोक्यो में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की।

फ्रेंच ओपन : चोट से वापसी कर मेदवेदेव ने बैगनिस को हराया

दुनिया के दूसरे नंबर के खिलाड़ी डेनियल मेदवेदेव ने मंगलवार को पेरिस में फ्रेंच ओपन के शुरुआती दौर में अर्जेंटीना के फेसुंडो बैगनिस को 6-2, 6-2, 6-2 से शिकस्त दी।

जलवायु परिवर्तन : हम लाभ के लिए अपना जीवन कुर्बान कर रहे हैं

Climate Change

As Planet Warms, Let’s Be Clear : We Are Sacrificing Lives for Profits

मौसम परिवर्तन (weather change) एक जानलेवा ग़लत गणना का परिणाम है : वैश्विक कॉर्पोरेट कंपनियों के मुनाफे (global corporate profits) के लिए लोगों के जीवन को जोख़िम में डाला जा सकता है, यहां तक कि उन्हें गंवाया भी जा सकता है।

विश्व मौसम विज्ञान संगठन (world meteorological organization WMO) ने हाल में हाल में एक ऐसी धमाकेदार बात का खुलासा किया था, जिसे अमेरिका और अन्य जगह के मीडिया में प्रमुखता से जगह मिलनी थी, लेकिन नहीं मिली।

डब्ल्यूएमओ का नया शोध कहता है, “इस बात की 50 फ़ीसदी संभावना है कि अगले पांच सालों में से कम से कम एक साल, औसत वार्षिक वैश्विक तापमान, पूर्व-औद्योगिक युग से पूर्व के तापमान की तुलना में 1.5 डिग्री सेल्सियस अधिक के तात्कालिक स्तर पर पहुंचेगा।

संगठन के महासचिव प्रोफ़ेसर पेटेरी तालास ने बताया, “1.5 डिग्री सेल्सियस का आंकड़ा कोई मनमुताबिक नहीं है। बल्कि यह मौसम के उस स्तर को बता रहा है, जहां जलवायु परिवर्तन लोगों के लिे बहुत ज़्यादा हानिकारक हो जाएगा, बल्कि यह पूरे ग्रह के लिए हानिकारक होगा।”

2015 में पांच साल में इस आंकड़े तक पहुंचने की संभावना बिल्कुल शून्य थी। 2017 में यह 10 फ़ीसदी थी, आज यह 50 फ़ीसदी है। आज हम प्रचुर मात्रा में वातावरण में ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन कर रहे हैं, इसलिए हर गुजरते साल के साथ यह दर बढ़ रही है औऱ जल्द ही हम 100 फ़ीसदी के स्तर पर पहुंच जाएंगे।  

जब औसत वैश्विक तापमान बढ़े हुए डेढ़ डिग्री सेल्सियस के स्तर को छुएगा, मौसम वैज्ञानिकों का दावा है कि तब पृथ्वी की ज़्यादातर प्रवाल शैल खत्म हो जाएंगी। 2 डिग्री सेल्सियस बढ़ने पर सभी प्रवाल शैल खत्म हो जाएँगी। इसलिए 2021 में आखिरी वैश्विक मौसम बैठक में संयुक्त राष्ट्रसंघ के सभी सदस्यों ने वैश्विक औसत तापमान को 1.5 डिग्री सेल्सियस बढ़ने से रोकने पर सहमति जताई थी।

पृथ्वी 1.1 डिग्री सेल्सियस ज़्यादा गर्म हो चुकी है, जिसके ख़तरनाक प्रभाव हर जगह दिखाई दे रहे हैं।

भारत पिछले 122 सालों में सबसे भयावह ताप-लहर (most frightening heat wave) का सामना कर रहा है और पड़ोसी पाकिस्तान में सबसे उच्च तापमान का पिछले 61 साल का रिकॉ़र्ड टूट गया है। बहुत तेज गर्मी के चलते कई दर्जन लोग अपनी जान गंवा चुके हैं।

फ्रांस में हर दिन फट रही है धरती

फ्रांस में हर दिन किसान “पृथ्वी में दरारें आते देख रहे हैं”, क्योंकि वहां रिकॉर्ड तोड़ स्तर का सूखा पड़ा है, जिसने फ्रांस के कृषि उद्योग को संकट में डाल दिया है। यहां अमेरिका में देश के केंद्रीय और उत्तरपूर्वी हिस्सों में इतनी तेज ताप लहर इतनी तेज है कि लोग टेक्सास से मैन तक लोगों ने मई में तीन अंकों का तापमान महसूस किया।

यहां तक कि दक्षिणी कैलिफोर्निया की ऑरेंज काउंटी में लागुना निगेल के संपन्न रहवासी इलाकों में आग लगने की घटनाएँ हुईं और कई घर तबाह हो गए। लेकिन बाकी लोगों की तुलना में अमीर लोगों के पास मौसम परिवर्तन के प्रभावों को झेलने और उनसे सुरक्षित रहने के लिए बहुत बड़ी मात्रा में संसाधन हैं। इससे पता चलता है कि अब भयावह तरीके से गर्म होती पृथ्वी पर कोई भी जगह सुरक्षित नहीं है। 

विडंबना है कि अब वैश्विक तापन के साथ ताप-लहर जितनी तेज हो रही हैं, इंसान उतनी ही ज़्यादा मात्रा में हवा को एसी के ज़रिए ठंडा करने के लिए जीवाश्म ईंधन जलाएगा, ताकि वे जिंदा रह सकें, इससे और भी ज़्यादा तापमान बढ़ेगा।

भयावह तरीके से गर्म होती पृथ्वी पर कौन सी जगह सुरक्षित है?

ऐसी स्थिति में दुनिया को बिना ज़्यादा सोच-विचार में पड़कर, तुरंत नवीकरणीय ऊर्जा की तरफ रुख करना चाहिए। लेकिन इसके बजाए, राष्ट्रपति जो बाइडेन ने अप्रैल में तेल और प्राकृतिक गैस कंपनियों के लिए सरकारी ज़मीन पर नई लीज़ की घोषणा कर दी और इस तरह वे अपने चुनाव अभियान के दौरान किए हुए वायदे से पलट गए।

बाइडेन ने ऐसा घरेलू ऊर्जा आपूर्ति को बढ़ाने और गैस कीमतों को कम करने के लिए किया है। उन्होंने कंपनियों द्वारा संघीय सरकार को दी जाने वाले शुल्क को साढ़े बारह फ़ीसदी से बढ़ाकर 18.75 फ़ीसदी भी कर दिया है। लेकिन ग्राहक चाहे गैसे पर कितना ही पैसा बचा लें या संघीय सरकार कितना ही कमा ले, यह भौतिकशास्त्र के नियमों को बदल नहीं सकता और मौसम को सुरक्षित नहीं कर सकता।

चीन के बाद दुनिया का सबसे बड़ा प्रदूषक है अमेरिका

न्यूयॉर्क टाइम्स की लीसा फ्रीडमैन कहती हैं, “सरकारी ज़मीन और संघीय सरकार के जल से निकला जीवाश्म ईंधन अमेरिका द्वारा उत्सर्जित ग्रीनहाउस गैसों में से 25 फ़ीसदी का उत्सर्जन करता है, ध्यान रहे चीन के बाद अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा प्रदूषक है।” यह वह एक इलाका है, जहां संघीय प्रशासन का नियंत्रण है, लेकिन यहां भी आर्थिक पहलू फ़ैसले करवा रहे हैं, ना कि अस्तित्व के सवाल से प्रेरित होकर कुछ किया जा रहा है।

जब पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने इस कदम की कड़ी आलोचना की, तो बाइडेन आखिरकरा अलास्का और मैक्सिको की खाड़ी की लीज़ रद्द कर दी। गृह मंत्रालय ने इसके लिए कार्यकर्ताओं के दबाव के बजाए, “उद्योग जगत की कम दिलचस्पी” और “विरोधाभासी कोर्ट फ़ैसलों” को लीज़ रद्द करने की वजह बताई। खैर, जलकर खाक होने के मुहाने पर खड़े ग्रह के लिए यह राहत की एक छोटी कोशिश है।

जहां बाइडेन और दूसरे सांसद कहते हैं कि उनके फ़ैसले मतदाताओं की जेब पर बढ़ती महंगाई और गैस की ऊंची कीमतों के प्रभाव से प्रेरित हैं, लेकिन ऐसा समझ आता है कि जनता इन कीमतों को कम करने के लिए बड़ी मात्रा में तेल और गैस का आगे उत्सर्जन नहीं चाहती है।

ऊर्जा और पर्यावरण पर राष्ट्रीय सर्वेक्षण के एक नए पोल से पता चला है कि जनता में मौसम परिवर्तन के प्रभावों को लेकर अब कोई संदेह नहीं है, पोल में 76 फ़ीसदी लोगों का विश्वास है कि “इस बात के पुख़्ता सबूत मौजूद हैं कि पृथ्वी पर पिछले चार दशकों में तापमान में बहुत बढ़ोत्तरी हुई है।” 

पोल में यह भी कहा गया कि “मौसम परिवर्तन के बुरे प्रभावों को खत्म करने के लिए अमेरिकी लोग अब भी ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने पर जोर देते हैं।” और वे “जियो-एनजीनियरिंग या सब-टेरेनियन कॉर्बन सैबोटॉज या फिर अनुकूलन जैसी तकनीकों को प्राथमिकता देने वाली जलवायु नीतियों से कोई राहत मिलने पर संदेह रखते हैं।”

इसलिए मौसम परिवर्तन के प्रभाव को कम करने या इसके अनुकूल होने के बजाए (जिसे बाज़ार से चलने वाली अर्थव्यवस्था प्राथमिकता पर रखती हैं), लोग अब भी प्राथमिक उपाय के तौर पर ग्रह को गर्म होने से रोकने को ही पहली जरूरी कार्रवाई मानते हैं।

लेकिन अब मौसम वैज्ञानिकों में यह चिंता बढ़ रही है कि शायद हमने नवीकरणीय ऊर्जा संसाधनों की तरफ जाने में देर कर दी है।

एक अध्ययन के मुताबिक़, सौर और पवन ऊर्जा के तुलनात्मक तौर पर ज़्यादा सस्ते और ज़्यादा पहुंच में होने के बावजूद, कुल विद्युत खपत बेहद तेजी से बढ़ रही है।

अध्ययन के लेखक मार्क डाइसेनडॉर्फ के मुताबिक़,

“नवीकरणीय ऊर्जा के लिए अब पिछड़ते लक्ष्य को पाना नामुमकिन है। इसमें नवीकरणीय ऊर्जा का कोई दोष भी नहीं है। यह खपत बढ़ने और देरी से कदम उठाने का नुकसान है।

चूंकि कॉरपोरेट मुनाफ़े से निर्देशित चीजों ने हमारी ऊर्जा खपत और जलवायु नीतियों को हमेशा से प्रभावित किया है, इसलिए हम प्रभावी तौर पर मान चुके हैं कि ऊर्जा के लिए जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता की कीमत हम जिंदगियों की कुर्बानी, खासतौर पर अश्वेत गरीबों की, देकर चुकाएंगे।

कोविड महामारी से एक तुलना देखने को मिलती है। जिस तरह महीनों तक वैज्ञानिक वायरस को रोकने के लिए निवारण, लॉकडाउन लगाने, मास्क और वैक्सीन की वकालत करते रहे थे, उसी तरह मौसम वैज्ञानिक भी दशकों से वैश्विक तापमान के खिलाफ़ चेतावनियां देते आ रहे हैं। विज्ञान आधारित दोनों ही अभियानों को कड़े संघर्ष का सामना करना पड़ा। वित्तीय बलिदान के बावजूद जनता की सुरक्षा को बढ़ाने के लिए तार्किक दिशानिर्देश जारी करने की अपनी चुनौतियां थीं ( कोविड महामारी के तहत ज़्यादातर उद्यमों, रेस्त्रां को बंद करना पड़ा, खेलों और मनोरंजन के कार्यक्रमों को रोकना पड़ा। जबकि मौसम संकट में सौर ऊर्जा सब्सिडी को प्रोत्साहन दिया गया, पवन ऊर्जा की तरफ झुकाव बनाया गया और हाइब्रिड व इलेक्ट्रिक गाड़ियों की तरफ ध्यान बढ़ाया गया)।

इस बीच कॉरपोरेट हित और दक्षिणपंथी राजनीतिक अवसरवादी सत्ता के गलियारों में अपना एजेंडा बढ़ाते हुए कहते रहे कि आर्थिक विकास ही सबसे बड़ा सवाल है।

आज, जब कोविड महामारी की संक्रमण दर फिर से तेजी के साथ बढ़ रही है, पिछले दो हफ़्तों में 58 फ़ीसदी की बढ़ोतरी हुई है, तब सभी देशों में मास्क अनिवार्यता को खत्म किया जा रहा है और कोविड-19 से जुड़े प्रतिबंधों को रद्द किया जा रहा है। ऐसा इसलिए नहीं है कि यह वायरस नियंत्रण में आ चुका है, बल्कि अब कॉरपोरेट अमेरिका जिंदगियां बचाने के लिए मुनाफ़े को दांव पर लगाना नहीं चाहता। यही चीज जलवायु संकट के साथ है।

यह जरूरी है कि हम इस समीकरण को खुलकर बोलें, ताकि हमें पता हो कि हम किस तरफ जा रहे हैं।

जैसे-जैसे मौसम बदलेगा, हमें पता चलेगा कि शवों को कहां दफनाया गया था। नेवादा की लेक मीड झील में पानी का स्तर इतना नीचे चला गया कि इंसानों के दो शवों के अवशेष सतह पर पाए गए। पता नहीं आगे हमें क्या-क्या परेशान करने वाली चीजें देखना बाकी है?

सोनाली कोल्हाटकर “राइज़िंग अप विद् सोनाली” की संस्थापक, प्रस्तोता और कार्यकारी निर्माता हैं, जो एक टेलीविजन और रेडियो शो है। इसका प्रसारण फ्री स्पीच टीवी और पैसिफिका स्टेशंस पर किया जाता है। वे इंडिपेंडेंट मीडिया इंस्टीट्यूट के प्रोजेक्त “इक्नॉमी फॉर ऑल” के लिए राइटिंग फैलो भी हैं।

यह लेख इंडिपेंडेंट मीडिया इंस्टीट्यूट के प्रोजेक्ट “इक्नॉमी फॉर ऑल” द्वारा प्रकाशित किया गया था, जिसे हमने न्यूजक्लिक से किंचित् संपादन के साथ साभार लिया है।

एक क्लिक में आज की बड़ी खबरें । 09 मई 2022 की खास खबर

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ब्रेकिंग : आज भारत की टॉप हेडलाइंस

Top headlines of India today. Today’s big news 09 May 2022

केंद्र सरकार देशद्रोह कानून पर पुनर्विचार को तैयार, SC में कहा- तब तक इससे जुड़े मामलों की सुनवाई लंबित रखी जाए

केंद्र ने सरकार ने आईपीसी की धारा 124A (#sedition) की फिर से जांच करने और उस पर फिर से विचार करने का फैसला किया है. केंद्र ने सर्वोच्च न्यायलय से सरकार द्वारा किए जाने वाले पुनर्विचार की कवायद का इंतजार करने का आग्रह किया।

जेईई मेंस और एडवांस की परीक्षाओं के लिए शिक्षा मंत्रालय ने गठित किया नया बोर्ड

केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय ने जेईई मेंस और जेईई एडवांस के लिए एक 19 सदस्यीय बोर्ड गठित किया है। आईआईटी व इंजीनियरिंग के अन्य संस्थानों में दाखिले के लिए होने वाले एग्जाम ‘जेईई’ के आयोजन के लिए बोर्ड गठन है। बोर्ड के चेयरमैन आइआइटी मद्रास के पूर्व निदेशक प्रोफेसर भास्कर रामामूर्ति हैं। शिक्षा मंत्रालय के मुताबिक जेईई मेंस व जेईई एडवांस की प्रक्रिया और बेहतर एवं पारदर्शी बनाने के लिए जेईई बोर्ड का गठन किया गया है। जेईई के इस शीर्ष बोर्ड में कुल 19 सदस्य होंगे।

पश्चिम रेलवे के ओवरहेड तार टूटे, ट्रेनें ठप

बोरीवली स्टेशन के पास सोमवार सुबह एक ओवरहेड इलेक्ट्रिक (ओएचई) तार टूट जाने के बाद उपनगरीय और लंबी दूरी की ट्रेन सेवाएं ठप हो गईं।

जस्टिस धूलिया, जस्टिस परदीवाला ने सुप्रीम कोर्ट के जजों के रूप में शपथ ली

गुवाहाटी उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया और गुजरात उच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति जमशेद बी परदीवाला ने सोमवार को शीर्ष न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में शपथ ली।

गंभीर चक्रवाती तूफानमें तब्दील हुआ असानी, इन राज्यों में अगले 4 दिन बारिश के आसार, अलर्ट पर तीन राज्य

बंगाल की खाड़ी में आया तूफान असानी रविवार को तेज होकर चक्रवात में बदल गया है। इस तूफान की रफ्तार 75 किलोमीटर प्रति घंटे से अधिक है। मौसम विज्ञान विभाग ने रविवार को कहा कि चक्रवाती तूफान ‘असानी’ के अगले 24 घंटों में और तेज होने की आशंका है। हालांकि, चक्रवात के तटीय क्षेत्र से टकराए बिना अगले हफ्ते तक कमजोर पड़ने की भी संभावना है।

गैंगस्टर विकास दुबे की संपत्ति कुर्क

उत्तर प्रदेश सरकार ने मारे गए गैंगस्टर विकास दुबे और उनके रिश्तेदारों की 67 करोड़ रुपये की संपत्ति जब्त की है।

हिमाचल विधानसभा के गेट पर खालिस्तानी झंडा लगाने का मामला, पन्नू के खिलाफ केस दर्ज

प्राप्त जानकारी के मुताबिक हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में रविवार को विधानसभा के गेट पर खालिस्तानी झंडे लटके मिलने के मामले में पुलिस ने इस मामले में सिख फॉर जस्टिस के नेता गुरपतवंत सिंह पन्नू के खिलाफ आतंकवाद विरोधी कानून (यूएपीए) के तहत मामला दर्ज किया है।

शाहीन बाग विध्वंस ड्राइव

कथित अवैध निर्माण ढहाने के लिए पुलिस साथ लेकर पहुंचे एमसीडी अधिकारी। बुलडोजर के सामने बैठे लोग।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने लखीमपुर हिंसा कांड में 4 आरोपियों को बेल देने से इनकार किया

प्राप्त जानकारी के अनुसार उच्च न्यायालय की लखनऊ बेंच ने अक्टूबर 2021 के लखीमपुर हिंसा कांड में चार आरोपियों को जमानत देने से इनकार कर दिया।

यूजीसी का सुझाव, विश्वविद्यालय चाहें तो पीएचडी वायवा टेस्ट ऑनलाइन माध्यमों से ले सकते हैं

कोरोना का कहर कुछ कम होने पर देश भर के विश्वविद्यालय ऑफलाइन कक्षाएं शुरू कर चुके हैं। हालांकि कुछ क्रियाकलापों के लिए ऑनलाइन माध्यमों का भी इस्तेमाल किया जा रहा है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग यानी यूजीसी ने उच्च शैक्षणिक संस्थानों को आवश्यक सुझाव दिए हैं कि उच्च शिक्षा में एमफिल और पीएचडी का वायवा भी ऑनलाइन लिया जा सकता है।

न्यूयॉर्क की गवर्नर कोरोना पॉजिटिव

अमेरिका में न्यूयॉर्क प्रांत की गवर्नर कैथी होचुल ने कहा कि वह कोरोना से संक्रमित पाई गई हैं।

एक क्लिक में आज की बड़ी खबरें | 08 मई 2022 की खास खबर

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ब्रेकिंग : आज भारत की टॉप हेडलाइंस

Top headlines of India today. Today’s big news 08 May 2022

शिक्षण संस्थान वे स्थान हैं जो हम में से प्रत्येक की आंतरिक और कभी-कभी छिपी प्रतिभा को निखारते हैं: राष्ट्रपति

राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने कहा है कि शिक्षण संस्थान केवल अध्ययन के स्थान नहीं हैं; बल्कि ये वे स्थान हैं जो हम में से प्रत्येक की आंतरिक और कभी-कभी छिपी प्रतिभा को निखारते हैं।

श्री कोविंद आज (8 मई, 2022) नागपुर के एमआईएचए के दहेगांव मौजा स्थित भारतीय प्रबंधन संस्थान के स्थायी परिसर के उद्घाटन के अवसर पर संबोधित कर रहे थे।

राष्ट्रपति ने कहा कि पाठ्यक्रम हमें अपने भीतर के उद्देश्य, महत्वाकांक्षा का आत्मनिरीक्षण करने और अपने सपनों को पूरा करने का अवसर प्रदान करता है।

एनके सिंह गुवाहाटी उच्च न्यायालय के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश बने

प्राप्त जानकारी के अनुसार राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद ने गुवाहाटी उच्च न्यायालय के वरिष्ठतम न्यायाधीश न्यायमूर्ति नोंगमीकापम कोटिस्वर सिंह को कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया है। गुवाहाटी उच्च न्यायालय के मौजूदा मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया की सुप्रीम कोर्ट में पदोन्नति के बाद ऐसा किया गया है।

असम : 13 उग्रवादियों ने आत्मसमर्पण किया, हथियार डाले

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक प्रतिबंधित ऑल आदिवासी नेशनल लिबरेशन आर्मी (एएनएलए) के 13 उग्रवादियों ने रविवार को असम के कार्बी आंगलोंग जिले के बोकाजन पुलिस थाने में आत्मसमर्पण कर दिया।

लता मंगेशकर के नाम पर अयोध्या में होगा चौराहा

अयोध्या में एक प्रमुख क्रॉसिंग विकसित की जाएगी और इसका नाम प्रसिद्ध गायिका भारत रत्न दिवंगत लता मंगेशकर के नाम पर रखा जाएगा।

जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए उपराष्ट्रपति ने सामूहिक कार्रवाई का आह्वान किया

 उपराष्ट्रपति एम. वेंकैया नायडू ने बीते शनिवार को जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को सीमित करने के लिए नीतियों के साथ-साथ लोगों से ‘सामूहिक कार्रवाई’ करने का आह्वान किया है।

तुर्की 10 लाख सीरियाई शरणार्थियों को वापस भेजेगा

सीरियाई शरणार्थियों के खिलाफ व्यापक जनविरोध को देखते हुए तुर्की 10 लाख शरणार्थियों को उनके देश वापस भेजने की योजना बना रहा है।

21 मई से भुवनेश्वर में होगा इंडियन ग्रां प्री का आयोजन

इंडियन ग्रां प्री 3 और 4 का आयोजन क्रमश: 21 और 24 मई को भुवनेश्वर में किया जाएगा।

ब्रेकिंग : आज भारत की टॉप हेडलाइंस। आज की बड़ी खबरें | 02 मई 2022

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Top headlines of India today. Today’s big news 02 May 2022

दिन भर की खबर | दिन की खबर | भारत समाचार |शीर्ष समाचार| चुनाव | हस्तक्षेप समाचार

सीबीआई ने 8 स्थानों पर छापेमारी के बाद मेहुल चोकसी के खिलाफ ताजा मामले में दस्तावेज जब्त किए

केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) ने सोमवार को कहा कि उसने भगोड़े व्यवसायी मेहुल चोकसी और उसकी कंपनी गीतांजलि जेम्स के खिलाफ 2014-18 के बीच भारतीय औद्योगिक वित्त निगम लिमिटेड से 22 करोड़ रुपये की कथित धोखाधड़ी के लिए एक नया मामला दर्ज किया है।

इंडोनेशिया द्वारा प्रतिबंध के बावजूद भारत की खाद्य तेल की स्थिति आरामदायक है; भारत सरकार का दावा

उपभोक्ता मामले, खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्रालय ने कहा, “भारत के पास सभी खाद्य तेलों का इष्टतम भंडार है। उद्योग के सूत्रों के अनुसार, देश में सभी खाद्य तेलों का वर्तमान स्टॉक 21 एलएमटी लगभग है और लगभग 12 एलएमटी मई, 2022 में आने वाला है।”

तेल और गैस कंपनियों में निवेश का समर्थन करने पर कॉप26 के अध्यक्ष की कड़ी आलोचना

कुछ विकसित देश रूस से निरंतर तेल आयात को लेकर भारत को नीचा दिखाने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे में COP26 के अध्यक्ष आलोक शर्मा के उस कदम की कड़ी आचोचना हो रही है जिसमें उन्होंने क्वासी क्वार्टेंग (यूके के सचिव, व्यापार, ऊर्जा और औद्योगिक रणनीति) के पत्र का समर्थन किया जिसमें वो जीवाश्म ईंधन को प्रोत्साहित कर रहे हैं।

छत्तीसगढ़ के कर्मचारियों का महंगाई भत्ता पांच प्रतिशत बढ़ा

 छत्तीसगढ़ के कर्मचारियों के लिए पुरानी पेंशन व्यवस्था बहाल करने के बाद अब राज्य सरकार ने कर्मचारियों के महंगाई भत्ते में पांच प्रतिशत की बढ़ोत्तरी कर दी है।

सर्वोच्च न्यायालय का महत्वपूर्ण निर्णय : किसी को भी टीकाकरण के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता

सर्वोच्च न्यायालय ने आज एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा कि किसी भी व्यक्ति को टीका लगाने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। मीडिया रिपोर्ट्स में बताया गया है कि न्यायमूर्ति एल. नागेश्वर राव और न्यायमूर्ति बी.आर. गवई ने कहा कि विभिन्न संगठनों, संस्थानों और सरकारों द्वारा बिना टीकाकरण वाले लोगों पर लगाए गए प्रतिबंध आनुपातिक नहीं हैं। पीठ ने सुझाव दिया कि जब तक संख्या कम न हो, राज्य सरकारों को इस तरह के प्रतिबंधों को हटाना चाहिए।

पीठ ने कहा कि शारीरिक स्वायत्तता/शारीरिक अखंडता एक संवैधानिक अधिकार है, इसलिए किसी भी व्यक्ति को टीकाकरण के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। हालांकि शीर्ष अदैलत ने यह भी कहा कि सरकार की मौजूदा कोविड-19 नीति मनमानी नहीं है।

मोदी बतौर पीएम 8 साल का कुशासनअर्थव्यवस्था को कैसे बर्बाद किया जाए, इस पर केस स्टडी : राहुल

कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधते हुए कहा है कि उनका आठ साल का ‘कुशासन’ अर्थव्यवस्था को कैसे बर्बाद किया जाए, इस पर एक केस स्टडी है।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति देश के शिक्षा के परिदृश्य में व्यापक बदलाव लाएगी : नायडु

उपराष्ट्रपति श्री एम.वेंकैया नायडु ने उच्च शिक्षा को ग्रामीण क्षेत्रों तक पहुंचाने तथा इसे और अधिक समावेशी व न्यायसंगत बनाने का आह्वान किया है।

उपराष्ट्रपति ने जोर देकर कहा कि ग्रामीण युवाओं की शिक्षा तक समावेशी और न्यायसंगत पहुंच महत्वपूर्ण है क्योंकि शिक्षा मानव विकास, राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है और एक समृद्ध व टिकाऊ वैश्विक भविष्य बनाती है।

श्री नायडु ने दिल्ली विश्वविद्यालय के शताब्दी समारोह में इस बात पर जोर दिया कि विश्वविद्यालयों को समाज की गंभीर समस्याओं का समाधान करने के लिए अभिनव और नए विचारों को सामने लाने का काम करना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि शोध का मुख्य उद्देश्य लोगों के जीवन को अधिक आरामदायक और खुशहाल बनाना होना चाहिए।

राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों को गर्मी संबंधी बीमारी पर योजना को लेकर केंद्र सरकार ने पत्र लिखा

बढ़ती गर्मी और कई स्थानों पर तापमान 46 डिग्री सेल्सियस को छूने के बीच केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को गर्मी से संबंधित बीमारियों पर राष्ट्रीय कार्य योजना के बारे में एक पत्र लिखा है।

122 साल का गर्मी का रिकॉर्ड टूटा, मई में भी रुलाएगी गर्मी

weather conditions

नई दिल्ली, 30 अप्रैल 2022. लगातार गर्म हवाओं के कारण, उत्तर पश्चिम और मध्य भारत में अधिकतम तापमान पिछले 122 वर्षों में अप्रैल महीने में सबसे अधिक रहा। 28 अप्रैल, 2022 तक दर्ज किया गया तापमान (अधिकतम और औसत) पिछले 122 वर्षों में 35.05 डिग्री सेल्सियस के साथ चौथा उच्चतम है।

इससे पहले मार्च 2022 देश के साथ-साथ उत्तर पश्चिम भारत के लिए 122 वर्षों में सबसे गर्म था।

भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) ने शनिवार को घोषणा की कि अप्रैल 2022 के लिए उत्तर पश्चिम और मध्य भारत के लिए औसत अधिकतम तापमान 35.90 डिग्री सेल्सियस और 37.78 डिग्री सेल्सियस था।

आईएमडी के मुताबिक मई में भी तापमान सामान्य से ऊपर ही बना रहेगा।

मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) के महानिदेशक मृत्युंजय महापात्र ने आज यहां एक संवाददाता सम्मेलन में बताया, “मई के दौरान, पश्चिम-मध्य और उत्तर-पश्चिम भारत के अधिकांश हिस्सों और पूर्वोत्तर भारत के उत्तरी हिस्सों में सामान्य से अधिकतम तापमान रहने की संभावना है। देश के शेष हिस्सों में सामान्य से कम अधिकतम तापमान होने का संभावना है।”

https://twitter.com/Indiametdept/status/1520341991586136064

आईएमडी महानिदेशक ने कहा कि “दक्षिण प्रायद्वीपीय भारत और चरम उत्तर पश्चिम भारत के कुछ हिस्सों में सामान्य से न्यूनतम तापमान की संभावना है।”

इस बीच, देश भर में मई में औसत बारिश सामान्य से अधिक होने की संभावना है (लंबी अवधि के औसत का 109 प्रतिशत से अधिक)।

महापात्र ने कहा, “उत्तर पश्चिमी भारत के कुछ हिस्सों और पूर्वोत्तर भारत के कुछ हिस्सों के साथ-साथ चरम दक्षिणपूर्व प्रायद्वीप को छोड़कर भारत के अधिकांश हिस्सों में सामान्य या सामान्य से अधिक बारिश होने की संभावना है।”

Web title : 122 year heat record broken

हीटवेव : भारत-पाकिस्तान में जानलेवा ताप लहर, जरूरी न हो तो घर में रहें

deadly heat wave in india pakistan

Heatwave: Deadly heat wave in India-Pakistan

घर के अंदर बैठे रहने पर भी हो सकता है हीट स्ट्रोक का असर

नई दिल्ली, 30 अप्रैल 2022. भारत और पाकिस्तान भर में जानलेवा ताप लहर यानी हीटवेव तैयार हो रही है। इस क्षेत्र में दुनिया के हर पांच में से एक व्यक्ति गुजर—बसर करता है। पर्यावरण वैज्ञानिकों के एक ताजा विश्लेषण (A recent analysis by environmental scientists) में हीटवेव का सीधा सम्बन्ध जलवायु परिवर्तन से (Heatwave directly related to climate change) बताया गया है।

पाकिस्तान के जैकबाबाद में 50 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच सकता है तापमान

पाकिस्तान के जैकबाबाद में तापमान 50 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाने का अनुमान है। यह धरती के सबसे गर्म स्थानों में से एक (one of the hottest places on earth) माने जाने वाले इस शहर में गर्मी के सर्वकालिक उच्चतम स्तर के नजदीक पहुंच रहा है।

भारत की राजधानी दिल्ली भी 44—45 डिग्री सेल्सियस की तपिश से बेहाल है और यह अब तक के सबसे गर्म अप्रैल के आसपास ही है। वहीं, भारत के उत्तरी इलाकों के कुछ हिस्सों में पारा 46 डिग्री तक पहुंच सकता है।

बेहद खतरनाक है वर्ष के शुरुआती महीनों में इतनी प्रचंड गर्मी

हीटवेव से जुड़ी चेतावनियां जारी की जा रही हैं। जन स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने आगाह किया है कि साल के शुरुआती महीनों में ही इतनी प्रचंड गर्मी खासतौर पर खतरनाक है।

इंपीरियल कॉलेज लंदन की डॉक्टर मरियम जकरिया और डॉक्टर फ्रेडरिक ओटो ने पाया कि इस महीने के शुरू से ही भारत में जिस तरह की तपिश पड़ रही है, वह पहले ही एक आम बात हो चुकी है, क्योंकि इंसान की गतिविधियों की वजह से वैश्विक तापमान लगातार बढ़ रहा है।

इंपीरियल कॉलेज लंदन के ग्रंथम इंस्टीट्यूट में रिसर्च एसोसिएट डॉक्टर मरियम ने कहा “भारत में हाल के महीनों में तापमान में हुई बढ़ोत्तरी का बड़ा कारण जलवायु परिवर्तन है। वैश्विक तापमान में वृद्धि में इंसान की गतिविधियों की भूमिका बढ़ने से पहले हम भारत में 50 वर्ष में कहीं एक बार ऐसी गर्मी महसूस करते थे, जैसे कि इस महीने के शुरू से ही पड़ रही है लेकिन अब यह एक सामान्य सी बात हो गई है। अब हम हर 4 साल में एक बार ऐसी भयंकर तपिश की उम्मीद कर सकते हैं और जब तक प्रदूषणकारी तत्वों के उत्सर्जन पर रोक नहीं लगाई जाएगी तब तक यह और भी आम होती जाएगी।”

इंपीरियल कॉलेज लंदन के ग्रंथम इंस्टिट्यूट में जलवायु विज्ञान के सीनियर लेक्चरर डॉक्टर फ्रेडरिक ओटो ने कहा “भारत में मौजूदा हीटवेव जलवायु परिवर्तन की वजह से और भी गर्म हो गई है। ऐसा इंसान की नुकसानदेह गतिविधियों की वजह से हुआ है। इनमें कोयला तथा अन्य जीवाश्म ईंधन का जलाया जाना भी शामिल है। अब दुनिया में हर जगह हर हीटवेव के लिए यही मामला होता जा रहा है। जब तक ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन बंद नहीं होगा, तब तक भारत तथा अन्य स्थानों पर हीटवेव और भी ज्यादा गर्म तथा और अधिक खतरनाक होती जाएगी।”

डॉक्टर फ्रेडरिक ओटो वर्ल्ड वेदर एट्रिब्यूशन ग्रुप के नेतृत्वकर्ता हैं और टाइम मैगजीन ने वर्ष 2021 के सर्वाधिक प्रभावशाली लोगों में उन्हें नामित किया था।

जिन तापमानों का पूर्वानुमान लगाया गया है वह मई-जून 2015 में भारत और पाकिस्तान में बड़ी जानलेवा हीटवेव के जैसे ही हैं, जिनमें कम से कम 4500 लोगों की मौत हुई थी। जून 2015 की जानलेवा हीटवेव के दौरान नई दिल्ली हवाई अड्डे पर अधिकतम तापमान 44.6 डिग्री सेल्सियस पहुंच गया था। वहीं उड़ीसा के झाड़सुगुड़ा में पारा 49.4 डिग्री सेल्सियस के सर्वोच्च स्तर पर जा पहुंचा था। पाकिस्तान के कराची में 45 डिग्री सेल्सियस तापमान रिकॉर्ड किया गया था। वहीं, बलूचिस्तान और सिंध प्रांतों के अन्य कुछ शहरों में पारा 49 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया था।

भारत में गुजरा मार्च का महीना पिछले 122 सालों के दौरान सबसे गर्म मार्च रहा। इस अप्रत्याशित गर्मी की वजह से देश के विभिन्न हिस्सों में गेहूं के उत्पादन में 10 से 35 प्रतिशत तक की गिरावट देखी गई।

भारत के कुछ विशेषज्ञ जलवायु परिवर्तन के कारण उत्पन्न भीषण गर्मी (extreme heat caused by climate change) से लोगों को राहत दिलाने के लिए कदम उठाए जाने की जरूरत पर भी जोर दे रहे हैं।

गुजरात इंस्टिट्यूट ऑफ डिजास्टर मैनेजमेंट में असिस्टेंट प्रोफेसर और कार्यक्रम प्रबंधक डॉक्टर अभियंत तिवारी ने कहा

“न्यूनीकरण संबंधी कदम उठाते वक्त भविष्य की वार्मिंग को सीमित करना बहुत आवश्यक है। तपिश के चरम, बार-बार और लंबे वक्त तक चलने वाले दौर अब भविष्य के खतरे नहीं रह गए हैं, बल्कि वे एक नियमित आपदा बन चुके हैं और अब उन्हें टाला नहीं जा सकता।”

“गर्मी से निपटने की हमारी कार्य योजनाओं में अनुकूलन के उपायों को भी सुनिश्चित करना आवश्यक होगा। जैसे कि जन अवशीतलन क्षेत्र, निर्बाध बिजली आपूर्ति की सुनिश्चितता, सुरक्षित पेयजल की उपलब्धता और सर्वाधिक जोखिम वाले वर्ग में आने वाले श्रमिकों के काम के घंटों में विशेषकर अत्यधिक तपिश वाले दिनों में बदलाव किया जाना चाहिए।”

इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक हेल्थ गांधीनगर के निदेशक डॉक्टर दिलीप मावलंकर ने कहा :

“भारतीय मौसम विभाग भारत के 1000 शहरों के लिए अगले 5 वर्षों तक की अवधि में पूर्वानुमान परामर्श जारी कर रहा है। अहमदाबाद ऑरेंज अलर्ट वाले जोन में है और यहां तापमान 43-44 डिग्री सेल्सियस रहने की संभावना है और इसमें वृद्धि भी हो सकती है।”

उन्होंने कहा “लोगों को इन परामर्श पर गौर करने की जरूरत है। घर के अंदर रहें, खुद को जल संतृप्त रखें और गर्मी से संबंधित बीमारी के सामान्य लक्षण महसूस करने पर नजदीकी स्वास्थ्य केंद्र पर जाएं। खास तौर पर बुजुर्गों और कमजोर वर्गों का ध्यान रखें, जैसा कि हमने कोविड-19 महामारी के दौरान रखा था, क्योंकि इन लोगों को घर के अंदर बैठे रहने पर भी हीट स्ट्रोक का असर हो सकता है।”

नगरों को रोजाना विभिन्न कारणों से होने वाली मौतों के आंकड़ों पर नजर रखनी चाहिए। खासकर अस्पतालों में दाखिल किए जाने वाले मरीज और एंबुलेंस को की जाने वाली कॉल के डाटा पर ध्यान देना चाहिए ताकि पिछले 5 वर्षों के डाटा से उसका मिलान किया जा सके और मृत्यु दर पर गर्मी के असर के वास्तविक संकेत को देखा जा सके।

बहुत ही जल्दी आई हीटवेव बढ़ाएगी मौतों का आंकड़ा

“यह बहुत ही जल्दी आई हीटवेव है और इनकी वजह से मृत्यु दर भी आमतौर पर ज्यादा होती है क्योंकि मार्च और अप्रैल के महीनों में लोगों का गर्मी के प्रति अनुकूलन कम होता है और वे एकाएक तपिश को सहन करने के लिए तैयार नहीं होते। केंद्र और राज्य तथा नगरों की सरकारों को भी इस पर ध्यान देना चाहिए। खासतौर पर जब मौसम विभाग के अलर्ट ऑरेंज और रेड जोन की घोषणा करें तो उन्हें इस बारे में अखबारों में विज्ञापन के तौर पर चेतावनी प्रकाशित करानी चाहिए। इसके अलावा टेलीविजन और रेडियो के माध्यम से भी जनता को आगाह किया जाना चाहिए। यह एक चेतावनी भरा संकेत है कि आगामी मई और जून में क्या होने वाला है। अगर हम अभी से प्रभावी कदम उठाते हैं तो हम बड़ी संख्या में लोगों को बीमार होने और मरने से बचा सकते हैं।”

पश्चिम बंगाल में स्थानीय सरकार ने स्कूलों को यह सलाह दी है कि वे जल्द सुबह कक्षाएं शुरू करें और रिहाइड्रेशन साल्ट्स की व्यवस्था करें ताकि अगर कोई बच्चा बीमार हो जाए तो उसका समुचित उपचार हो सके। राज्य के कुछ स्कूलों ने तो ऑनलाइन क्लास शुरु कर दी है ताकि बच्चों को भयंकर तपिश में स्कूल ना आना पड़े। इसी बीच, उड़ीसा में उच्च शिक्षा की कक्षाओं को पूरी तरह से बंद कर दिया गया है ।

जहां दक्षिण एशिया में इस हफ्ते तापमान के सर्वाधिक चरम पर पहुंच जाने की आशंका है, वही यह भी सत्य है कि सिर्फ यह उपमहाद्वीप ही इस वक्त ऐसी भयंकर गर्मी से नहीं जूझ रहा है। अर्जेंटीना और पराग्वे में भी तपिश अप्रत्याशित रूप से बढ़ी है। पराग्वे में आज तापमान 40 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचने की आशंका है। वहीं, चीन में 38 डिग्री और तुर्की तथा साइप्रस में 36 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाने की संभावना है। जैसे-जैसे प्रदूषणकारी तत्वों के उत्सर्जन की वजह से तापमान और भी ज्यादा बढ़ेगा, खतरनाक तपिश और भी ज्यादा सामान्य बात होती जाएगी।