मस्तिष्क में मिर्गी-क्षेत्र के सटीक निर्धारण के लिए नया उपकरण

research on health

New tool for precise determination of epileptic regions in the brain

दुनिया में चौथा सबसे आम तंत्रिका विकार है मिर्गी

नई दिल्ली, 05 अगस्त: मिर्गी (Epilepsy) को दुनिया में चौथे सबसे आम तंत्रिका विकार (neurological disorder) के रूप में चिन्हित किया जाता है, जो विश्व में हर वर्ष लाखों लोगों को प्रभावित करता है। इसमें शरीर पर आंशिक अथवा संपूर्ण रूप से पड़ने वाले अनैच्छिक प्रभाव देखने को मिलते हैं, जिन्हें आमतौर पर दौरे के रूप में जाना जाता है। इस प्रकार के दौरों का कारण शरीर में अत्यधिक एवं असंतुलित विद्युतीय प्रवाह को माना जाता है, जिससे चेतना (Consciousness) लुप्त हो जाती है, और ऐसी स्थिति बन जाती है कि प्रभावित व्यक्ति का अपनी आंतों (bowel) या मूत्राशय (bladder) के कार्य पर नियंत्रण नहीं रहता है।

कम समय में बिना चीरफाड़ एपिलेप्टोजेनिक ज़ोन की पहचान कर सकेगा नया उपकरण

मिर्गी के लिए जिम्मेदार मस्तिष्क क्षेत्र, जिसे एपिलेप्टोजेनिक ज़ोन (Epileptogenic Zone) के नाम से जाना जाता है, की पहचान के लिए भारतीय शोधकर्ताओं के एक ताजा अध्ययन में एक नये डायनोस्टिक उपकरण की पेशकश की गई है।

शोधकर्ताओं का कहना है कि यह उपकरण प्रचलित विधियों की तुलना में अधिक अनुकूल है, जिसकी मदद से बिना चीरफाड़ कम समय में एपिलेप्टोजेनिक ज़ोन की पहचान (Identification of the epileptogenic zone) की जा सकती है।

यह अध्ययन भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) दिल्ली के शोधकर्ताओं द्वारा किया गया है।  

क्या मिर्गी को नियंत्रित किया जा सकता है?

मिर्गी को आम तौर पर दवाओं से नियंत्रित किया जा सकता है। जब दवाएं मिर्गी के दौरे को नियंत्रित करने में विफल हो जाती हैं, तो इसे दवा-प्रतिरोधी मिर्गी कहा जाता है। मस्तिष्क की संरचनात्मक असामान्यताएं दवा-प्रतिरोधी मिर्गी के लिए संभावित रूप से सबसे अधिक जिम्मेदार होती हैं। इसीलिए, मस्तिष्क सर्जरी ऐसे रोगियों के लिए पूर्ण इलाज प्रदान कर सकती है। लेकिन सर्जिकल मूल्यांकन में सबसे जटिल कार्य विद्युतीय असामान्यता की उत्पत्ति का निर्धारण, और मस्तिष्क की संरचनात्मक असामान्यता के साथ इसके संबंध का पता लगाना है।

मस्तिष्क की संरचनात्मक असामान्यताएं इतनी सूक्ष्म होती हैं कि अकेले एमआरआई की मदद से भी उनकी पहचान कठिन होती है। इसके लिए इलेक्ट्रोएन्सेफलोग्राम (ईईजी) मूल्यांकन के साथ व्याख्या करनी पड़ती है।

न्यूरोसर्जन द्वारा उपयोग किए जाने वाले अन्य तौर-तरीकों में पॉज़िट्रॉन एमिशन टोमोग्राफी (पीईटी) स्कैन और मैग्नेटोएन्सेफलोग्राफी (एमईजी) शामिल हैं। पीईटी स्कैन में रेडियोधर्मी पदार्थ का सेवन शामिल है। वहीं, भारत में एमईजी सुविधा बहुत सीमित है। क्रैनियोटॉमी और रोबोट-असिस्टेड सर्जरी में चीरफाड़ करनी पड़ती है, जिसमें चिकित्सकों को मस्तिष्क पर इलेक्ट्रॉड लगाने के लिए खोपड़ी में छेद करना पड़ता है। एपिलेप्टोजेनिक ज़ोन डिटेक्शन (Epileptogenic Zone) में 2-8 घंटे लगते हैं, और मरीजों के लिए यह बेहद असुविधाजनक होता है।

आईआईटी दिल्ली के प्रोफेसर ललन कुमार के नेतृत्व में शोधकर्ताओं की टीम ने मिर्गी फोकल की पहचान के लिए बिना चीरफाड़ (Non-invasive) ईईजी आधारित ब्रेन सोर्स लोकलाइज़ेशन (BSL) फ्रेमवर्क विकसित किया है, जो कम समय में परिणाम दे सकता है, और रोगी के अनुकूल है। मिर्गी के दौरे से संबंधित ईईजी डेटा के आधार पर आंकड़ों की संरचना के प्रसंस्करण से जुड़ा एल्गोरिदम कुछ मिनटों के भीतर निर्दिष्ट क्षेत्र को इंगित कर सकता है। विशेष रूप से, शोधकर्ताओं ने मिर्गी के दौरे के क्षेत्र का पता लगाने के लिए अभिनव हेड हार्मोनिक्स आधारित एल्गोरिदम की रूपरेखा प्रस्तुत की है।

प्रोफेसर ललन कुमार का कहना है कि “हमने मिर्गी दौरे के क्षेत्र का पता लगाने के लिए गोलाकार हार्मोनिक्स और हेड हार्मोनिक्स आधारित प्रक्रिया के उपयोग का प्रस्ताव पेश किया है। बिना चीरफाड़ और कम समय में मिर्गी क्षेत्र का पता लगाने से जुड़ा यह प्रयास महत्वपूर्ण है।”

शोधकर्ताओं ने एपिलेप्टोजेनिक ज़ोन की पहचान के लिए नैदानिक ईईजी डेटा के आधार पर प्रस्तावित एल्गोरिदम को अपने अध्ययन में प्रामाणिक पाया है। उनका कहना है कि प्रस्तावित ढांचा स्वचालित और समय-कुशल मिर्गी क्षेत्र के निर्धारण में चिकित्सकों को एक प्रभावी समाधान प्रदान कर सकता है।

यह अध्ययन, आईआईटी दिल्ली में इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग विभाग से जुड़ी शोधार्थी डॉ अमिता गिरी के पीएचडी शोध कार्य का एक हिस्सा है।

प्रोफेसर ललन कुमार एवं डॉ अमिता गिरी के अलावा, शोध टीम के सदस्यों में आईआईटी दिल्ली के शोधकर्ता प्रोफेसर तपन के. गांधी, और दीनानाथ मंगेशकर अस्पताल एवं अनुसंधान केंद्र, पुणे के शोधकर्ता डॉ नीलेश कुरवाले शामिल हैं। यह अध्ययन शोध पत्रिका साइंटिफिक रिपोर्ट्स में प्रकाशित किया गया है। (इंडिया साइंस वायर)

क्या आप जानते हैं साही के कांटों से प्रेरित हैं टांके!

porcupine in hindi

हाल के कुछ सालों में विज्ञान और तकनीक में नई एक शाखा शामिल हुई है। इसे जैव-प्रेरित तकनीक (bio-inspired technology) कहा जाता है। इसमें पौधों और जंतुओं के गुणधर्म और व्यवहार, विशेष रूप से उनके रक्षा के तौर-तरीकों से प्रेरित होकर नई तकनीकें विकसित की जाती हैं।

यह लगभग 10 साल पहले की बात थी जब वैज्ञानिक यह समझ पाए थे कि गुरुत्वाकर्षण के बावजूद छिपकली छत पर उल्टी चिपककर कैसे दौड़ पाती है, गिरती नहीं। छिपकली के हाथ-पैर की हथेलियों पर लाखों छोटे-छोटे रोम उपस्थित होते हैं। इससे सतह पर बहुत हल्का आकर्षक बल लगता है जिसे वॉण्डर वॉल्स बल कहते हैं। उंगलियों में स्थित हर रोम और दीवार के बीच लगने वाला बल तो न के बराबर होता है, लेकिन एक साथ हंजारों-लाखों की तादाद में रोम हों, तो कुल बल काफी शक्तिशाली हो जाता है। यदि इन रोमों की हजामत कर दी जाए तो छिपकली चल नहीं पाएगी। इस समझ के आधार पर वैज्ञानिक चिपकने वाली टेप तैयार करने में सक्षम हुए थे।

इसी तरह कोकलेबर (गोखरू) पौधे से प्रेरित होकर स्विस इंजीनियर जॉर्जडी मेस्ट्रल ने वेल्क्रो का अविष्कार किया। भारत में यह पौधा तमिलनांडु के मदुराई क्षेत्र (तमिल में इसे मारूलिमथाई कहा जाता है) में पाया जाता है। इस पौधे में छोटी-छोटी गेंदों जैसे बहुत-से फूल पाए जाते हैं। हर फूल के चारों ओर छोटी पिन के समान संरचना होती है। इन पिननुमा रचनाओं की मदद से ये फूल हमारे कपड़ों और मोंजों पर चिपक जाते हैं। डॉ. मेस्ट्रल ने इस पौधे की संरचना और गुणधर्म का अध्ययन करके वेल्क्रो डिंजाइन किया।

कंटीला सुअर यानी पिर्क स्पिन या मुल्लाम पनरी, येडू पान्डी या साही

इसी क्रम में नई प्रेरणा साही नामक जंतु से मिली। सेही (अंग्रेज़ी:Porcupine in Hindi) अथवा साही के शरीर की पीठ वाली सतह पर 30,000 से ज्यादा कांटे होते हैं। यह नाम शायद फ्रेंच भाषा से आया है। फ्रेंच में इसे पिर्क स्पिन यानी कंटीला सुअर कहते हैं। भारत में तमिल में इसे मुल्लाम पनरी, तेलगू में येडू पान्डी और हिन्दी में साही कहते हैं।

अपने दुश्मन या शिकारी पर हमला करने का सेही का तरीका बहुत घातक है। यह जंतु तेज गति के साथ अपने लक्ष्य पर वार करता है और हमला करते समय यह अपने आपको पीछे की ओर मोड़ लेता है। इसके कारण इसके कांटे शत्रु के शरीर में ज्यादा गहराई तक जाते हैं।

कैसी होती है साही के कांटे की संरचना ?

सेही के कांटे की संरचना (Porcupine thorn structure) बहुत अनोखी होती है, यह त्वचा को आसानी से भेदता है लेकिन वापिस निकलते समय यह बहुत दर्दनाक होता है।

हार्वर्ड के डॉ. जेफ्री कार्प और एमआईटी के राबर्ट लैंगर को साही के कांटों वाले पहलू ने आकर्षित किया था। इससे आकर्षित होकर उन्होंने 26 दिसम्बर 2012 के अंक में एक पर्चा प्रकाशित किया था। सबसे पहले उन्होंने कांटे का सूक्ष्म निरीक्षण किया। इसके लिए एमिशन इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी (emission electron microscope) का इस्तेमाल किया गया।

उन्होंने पाया कि सेही के कांटों की नोक अत्यंत नुकीली, फचर के आकार की होती है। नोक की सतह पर पीछे की ओर मुंडे हुए बारीक कंटक होते हैं। ये कंटक कुछ हद तक एक-दूसरे पर चढ़े होते हैं। कांटे की नोक से जितने दूर जाएंगे ये कंटक बडे होते जाते हैं। कांटे का नुकीला सिरा आसानी से भेदने का काम करता है। मगर जब कांटे को बाहर निकालने की बात आती है, तो हर कंटक गति का प्रतिरोध करता है क्योंकि उल्टी दिशा में चलाने पर ये कंटक खुल जाते हैं और चमड़ी व अंदर के ऊतक से चिपक जाते हैं। ऐसे में जब इन्हें खींचकर बाहर निकाला जाता है तो ये काफी नुकसान पहुंचाते हैं। इस संरचना की वजह से अंदर घुसने की क्रिया आसान और बाहर निकलने की क्रिया दर्दनाक हो जाती है।

एक बार इस दर्द का सामना हो जाने के बाद शत्रु किसी साही के पास फटकने की हिम्मत नहीं करेगा।

शोधकर्ताओं ने कांटे का इस्तेमाल करके मांसपेशीय ऊतकों में कांटे के भेदने और निकालने के बल को मापा। भेदने में 0.3 न्यूटन यूनिट बल की आवश्यकता थी, वहीं निकालने में 0.44 न्यूटन बल लगा था। जबकि इसकी तुलना में कंटकहीन अफ्रीकन साही के कांटों के बल को मापा गया तो पाया कि इसके भेदने में 0.71 न्यूटन बल लगता है। इससे यह पता लगता है कि कांटे का नुकीलापन आसानी से भेदने की क्षमता रखता है। लेकिन अफ्रीकन कंटकहीन साही के कांटे को निकालना ज्यादा आसान था। इसमें मात्र 0.11 न्यूटन बल लगा था बजाय 0.44 न्यूटन के। और जब इन दोनों स्थितियों में ऊतकों की क्षति को मापा, तो पता चला कि कंटकहीन कांटे की बजाय कंटकयुक्त कांटे को अंदर घुसने में कम ऊर्जा की आवश्यकता पड़ी। इसलिए यह ज्यादा अंदर तक जाता है मगर घुसते समय इसके कारण ऊतकों को क्षति कम होती है। दूसरी ओर, जब कंटकयुक्त कांटा निकलता है, तो यह ज्यादा दर्दनाक होता है और काफी क्षति पहुंचाता है।

तो मन में विचार आता है कि क्यों न पॉलीमर्स का इस्तेमाल कर संश्लेषित कांटे (Synthetic forks using polymers) बनाए जाएं (जैसे पॉलीयूरेथेन की मदद से) और इसके प्रभावों की वास्तविक कांटों से तुलना की जाए? इस विचार के साथ शोधकर्ताओं ने कंटकयुक्त औरक पॉलीयूरेथेन कांटे बनाए और एक प्रोटोटाइप हाइपोडमक सुई (Prototype Hypodamp Needle) बनाई।

वास्तविक कांटे की तरह ही, कंटकहीन पॉलीयूरेथेन की अपेक्षा कंटकयुक्त पॉलीयूरेथेन सुई ऊतकों से ज्यादा अच्छी तरह चिपकी।

शोधकर्ताओं का निष्कर्ष यह है कि इस तरह की जैव-प्रेरित पॉलीमर पट्टियां (Bio-inspired polymer bandages) ऊतकों को जोड़ने में मददगार हो सकती है।

सेही का समागम कैसे होता है? | How does the meeting of Sehi take place?

अंत में अक्सर यह सवाल पूछा जाता है कि साही इन कांटों के साथ जोड़ा कैसे बनाते हैं और बच्चे कैसे पैदा करते हैं।

एक स्वीकार करने योग्य जवाब यह है कि नर और मादा दोनों अपने पिछले पैरों से एक-दूसरे तक पहुंचते होंगे। फिर ये दोनों पेट आमने-सामने करके खड़े रहते हैं, इसके बाद मादा अपना पिछला हिस्सा नर की तरफ मोड़ देती है और नर अपनी पूंछ उसके पिछले हिस्से पर फैला देता है। यह समागम कुछ मिनट का ही होता है फिर मादा के गर्भ में बच्चा पलता है और जन्म लेता है।

डॉ. बी बालसुब्रमण्यम

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मूलतः देशबन्धु में प्रकाशित लेख का किंचित् संपादित रूप साभार

Did you know that the stitches are inspired by porcupine thorns!

कोरोना की संक्रमण क्षमता कम करने के लिए भारतीय वैज्ञानिकों ने खोजा नया तंत्र

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Scientists develop novel mechanism to inactivate SARS-CoV-2 by blocking their entry to cells & reducing infection ability

नई दिल्ली, 16 जुलाई: भारतीय शोधकर्ताओं ने सिंथेटिक पेप्टाइड्स (Synthetic Peptides) के एक नये वर्ग की संरचना का खुलासा किया है। यह पेप्टाइड संरचना, कोविड-19 के लिए जिम्मेदार कोरोना वायरस (SARS-CoV-2) के कोशिकाओं में प्रवेश को बाधित करने के साथ-साथ वायरॉन्स (Virions) को जोड़ सकती है, जिससे उनकी संक्रमित करने की क्षमता कम हो सकती है।

वायरॉन या विरिअन क्या होता है?

वायरॉन या विरिअन (Virion in Hindi) संपूर्ण वायरस कण को कहते हैं, जिसमें आरएनए या डीएनए कोर होता है। वायरॉन के बाहरी आवरण के साथ प्रोटीन की परत होती है, जो वायरस का बाह्य संक्रामक रूप होता है।

कोरोना वायरस के नये रूपों के तेजी से उभरने से कोविड-19 टीकों द्वारा दी जाने वाली सुरक्षा कम हो जाती है, जिससे वायरस संक्रमण रोकने के नये तरीके खोजना आवश्यक हो जाता है।

शोधकर्ताओं का कहना है कि इस अध्ययन से उभरा नया दृष्टिकोण SARS-CoV-2 जैसे वायरस को निष्क्रिय करने के लिए एक वैकल्पिक तंत्र प्रदान करता है, जिससे पेप्टाइड्स के एक नये वर्ग को एंटीवायरल के रूप में विकसित करने का मार्ग प्रशस्त हो सकता है।

किसी प्रोटीन का दूसरे प्रोटीन की पारस्परिक क्रिया प्रायः कुंजी और ताले के समान होती है। इस परस्पर क्रिया को सिंथेटिक पेप्टाइड द्वारा बाधित किया जा सकता है, जो नकल करता है, प्रतिस्पर्धा करता है, और ‘कुंजी’ को ‘लॉक’ के साथ, या फिर इसके विपरीत बाधित होने से रोकता है।

बेंगलुरु स्थित भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc) के वैज्ञानिकों ने सीएसआईआरमाइक्रोबियल प्रौद्योगिकी संस्थान (CSIR-Institute of Microbial Technology) के शोधकर्ताओं के सहयोग से पेप्टाइड्स को डिजाइन करने के लिए इस दृष्टिकोण का उपयोग किया है, जो SARS-CoV-2 की सतह पर स्पाइक प्रोटीन को बाँध और अवरुद्ध कर सकता है।

इस बंधन को क्रायो-इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी (क्रायो-ईएम) और अन्य बायोफिजिकल विधियों द्वारा बड़े पैमाने पर प्रस्तुत किया गया है।

Coronavirus CDC
Coronavirus. Photo credit- CDC

शोध पत्रिका नेचर केमिकल बायोलॉजी में प्रकाशित यह अध्ययन, भारत सरकार के विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग के वैधानिक निकाय विज्ञान और इंजीनियरी अनुसंधान बोर्ड (SERB) की उच्च प्राथमिकता वाले क्षेत्र में गहन अनुसंधान (IRHPA) नामक पहल पर आधारित है।

विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय द्वारा इस संबंध में जारी एक वक्तव्य में बताया गया है कि विकसित किये गए पेप्टाइड्स सर्पिलाकार (हेलिकल) और हेयरपिन जैसे आकार में हैं, और इनमें प्रत्येक अपनी तरह के दूसरे स्वरूप के साथ जुड़ने में सक्षम हैं, जिसे डाइमर के रूप में जाना जाता है। प्रत्येक डाइमेरिक ‘बंडल’ दो लक्ष्य अणुओं के साथ परस्पर क्रिया के लिए दो सतहों को प्रस्तुत करता है। शोधकर्ताओं का अनुमान था कि ये दोनों सतहें दो अलग-अलग लक्ष्य प्रोटीनों से बंधी हैं, और एक जटिल संजाल में बाँधने के बाद लक्ष्य की कार्रवाई को अवरुद्ध कर सकती हैं।

एंजियोटेंसिन-कन्वर्टिंग एंजाइम-2 क्या है?

अपनी अवधारणा की पुष्टि के लिए शोधकर्ताओं ने एसआईएच-5 नामक पेप्टाइड के उपयोग (Use of a peptide called SIH-5,) से मानव कोशिकाओं में SARS-CoV-2 रिसेप्टर (SARS-CoV-2 receptor in human cells,), जो एंजियोटेंसिन-कन्वर्टिंग एंजाइम-2 (ACE2) नामक प्रोटीन है, के स्पाइक (एस) प्रोटीन के बीच परस्पर क्रिया को लक्षित किया है। ACE2 न केवल एक एंजाइम है, बल्कि कोशिका की सतहों पर एक कार्यात्मक रिसेप्टर भी है, जिसके माध्यम से SARS-CoV-2 मेजबान कोशिकाओं में प्रवेश करता है।

एस प्रोटीन क्या है?

‘एस’ प्रोटीन एक त्रितय (Trimer) अर्थात – तीन समान पॉलीपेप्टाइड्स का एक मिश्रण है। प्रत्येक पॉलीपेप्टाइड में एक रिसेप्टर बाइंडिंग डोमेन (आरबीडी) होता है, जो मेजबान कोशिका की सतह पर ACE2 रिसेप्टर को बांधता है। यह अंतःक्रिया कोशिका में वायरल प्रवेश का मार्ग प्रशस्त करता है। एसआईएच-5 पेप्टाइड को मानव ACE2 के लिए आरबीडी के बंधन को अवरुद्ध करने के लिए डिजाइन किया गया है। जब एक एसआईएच-5 डाइमर को किसी ‘एस’ प्रोटीन का सामना करना पड़ता है, तो उसकी एक सतह ‘एस’ प्रोटीन ट्राइमर पर तीन आरबीडी में से एक से कसकर बंधी होती है, और उसकी दूसरी सतह किसी भिन्न ‘एस’ प्रोटीन आरबीडी से बंधी होती है। यह परस्पर आबद्धता (क्रॉस-लिंकिंग) एसआईएच-5 को एक ही समय में दोनों ‘एस’ प्रोटीन को बाँधने (ब्लॉक करने) की अनुमति देती है। शोधकर्ताओं ने पाया है कि एसआईएच-5 विभिन्न वायरस कणों से स्पाइक प्रोटीन को क्रॉस-लिंक करके उस वायरस को कुशलतापूर्वक निष्क्रिय कर सकता है।

शोधकर्ताओं ने प्रयोगशाला में स्तनधारी कोशिकाओं में विषाक्तता के लिए पेप्टाइड का परीक्षण किया, और इसे सुरक्षित पाया है।

शोधकर्ताओं का मानना है कि मामूली संशोधनों और पेप्टाइड इंजीनियरिंग के साथ यह लैब-निर्मित मिनी-प्रोटीन अन्य प्रकार के प्रोटीन-प्रोटीन के बीच परस्पर अंतःक्रिया (इंटरैक्शन) को भी रोक सकता है।

इस अध्ययन से जुड़े शोधकर्ताओं में भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc) के भवेश खत्री, इशिका प्रमाणिक, एस.के. मल्लादी, आरएस राजमणि, पी. घोष, एन. सेनगुप्ता, आर. वरदराजन, एस. दत्ता एवं जे. चटर्जी के साथ सीएसआईआर-सूक्ष्मजीव प्रौद्योगिकी संस्थान के आर. रहीसुद्दीन, एस. कुमार, एन. कुमार, एस. कुमारन शामिल आर.पी. रिंगे शामिल थे।

(इंडिया साइंस वायर)

Indian scientists discovered a new mechanism to reduce the infection capacity of corona

समझिए बुढ़ापे की जड़ में क्या है

secrets of life

बुढ़ापे की जड़ में है एक एंजाइम

परिवर्तन और बूढ़े होने की प्रक्रियाएं ही हैं जो हमें समय बीतने का एहसास कराती हैं। और समय बीतने का एहसास न हो तो मानव विकास, कला व सभ्यता काफी अलग होंगे।

प्रोसीडिंग्स ऑफ द नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज (Proceedings of the National Academy of Sciences) (पीएनएएस) में ए एंड एम विश्वविद्यालय, एरिज़ोना स्टेट विश्वविद्यालय, चाइना कृषि विश्वविद्यालय और स्कोल्वो विज्ञान व टेक्नॉलॉजी संस्थान के शोधकर्ताओं के एक शोध पत्र में जीवित जीवों में उम्र बढ़ने के तंत्र की समझ (an understanding of the mechanism of aging in living organisms) एक कदम आगे बढ़ी है।

इस कदम का सम्बंध कोशिकाओं में उपस्थित डीएनए के एक अंश से है, जो कोशिकाओं के विभाजन और नवीनीकरण में भूमिका निभाता है। यह घटक सबसे पहले ठहरे हुए पानी की एक शैवाल में खोजा गया था और आगे चलकर पता चला कि यह अधिकांश सजीवों के डीएनए में पाया जाता है।

पृथ्वी पर सबसे लंबा जीवन किसके पास है? दुनिया में सबसे ज्यादा उम्र किसकी होती है? Who has the longest life on earth?

बुढ़ापे की जड़ में क्या है what is at the root of old age
बुढ़ापे की जड़ में क्या है what is at the root of old age?

पीएनएएस के शोध पत्र में टीम ने खुलासा किया है कि यह घटक पौधों में कैसे काम करता है। धरती पर सबसे लंबी उम्र पौधे ही पाते हैं, इसलिए इनमें इस घटक की समझ को आगे चलकर अन्य जीवों और मनुष्यों पर भी लागू किया जा सकेगा।

सजीवों में वृद्धि और प्रजनन (growth and reproduction in living organisms) दरअसल कोशिका विभाजन के ज़रिए होते हैं। विभाजन के दौरान कोई भी कोशिका दो कोशिकाओं में बंट जाती हैं, जो मूल कोशिका के समान होती हैं। यह प्रतिलिपिकरण कोशिका के केंद्रक में उपस्थित डीएनए (DNA present in the nucleus of the cell) की बदौलत होता है।

डीएनए क्या होता है?

डीएनए अर्थात् डीऑक्सीराइबो न्यूक्लिक अम्ल (Deoxyribonucleic acid) एक लंबा अणु होता है जिसमें कोशिका के निर्माण का ब्लूप्रिंट भी होता है और स्वयं की प्रतिलिपि बनाने का साधन भी होता है।

डीएनए की प्रतिलिपि (DNA copy) इसलिए बन पाती है क्योंकि यह दो पूरक शृंखलाओं से मिलकर बना होता है। जब ये दोनों शृंखलाएं अलग-अलग होती हैं, तो दोनों में यह क्षमता होती है कि वे अपने परिवेश से पदार्थ लेकर दूसरी शृंखला बना सकती हैं।

लेकिन इसमें एक समस्या है। प्रतिलिपिकरण के दौरान ये शृंखलाएं लंबी हो सकती हैं या किसी अन्य डीएनए से जुड़ सकती हैं। ऐसा होने पर जो अणु बनेगा वह अकार्यक्षम होगा और इस तरह से बनने वाली कोशिकाएं नाकाम साबित होंगी। लिहाज़ा डीएनए में एक ऐसी व्यवस्था बनी है कि ऐसी गड़बड़ियों को रोका जा सके।

टेलोमेर क्या कार्य करता है? टेलोमेयर से आप क्या समझते हैं?

प्रत्येक डीएनए के सिरों पर कुछ ऐसी रासायनिक रचना होती है जो बताती है कि वह उस अणु का अंतिम हिस्सा है। और डीएनए में यह क्षमता होती है कि वह अपने सिरों पर यह व्यवस्था बना सके।

सिरे पर स्थित इस व्यवस्था को टेलोमेयर (Telomere) कहते हैं। यह वास्तव में उन्हीं इकाइयों से बना होता है जो डीएनए को भी बनाती हैं। और यह टेलोमेयर एक एंज़ाइम की मदद से बनाया जाता है जिसे टेलोमरेज़ कहते हैं। कोशिकाओं में किसी भी रासायनिक क्रिया के संपादन हेतु एंज़ाइम पाए जाते हैं।

बुढ़ाने की प्रक्रिया की प्रकृति को समझने की दिशा में शुरुआती खोज यह हुई थी कि कोई भी कोशिका कितनी बार विभाजित हो सकती है, इसकी एक सीमा होती है। आगे चलकर इसका कारण यह पता चला कि हर बार विभाजन के समय जो नई कोशिकाएं बनती हैं, उनका डीएनए मूल कोशिका के समान नहीं होता। हर विभाजन के बाद टेलोमेयर थोड़ा छोटा हो जाता है। एक संख्या में विभाजन के बाद टेलोमेयर निष्प्रभावी हो जाता है और कोशिका विभाजन रुक जाता है। लिहाज़ा, वृद्धि धीमी पड़ जाती है, सजीव का कामकाज ठप होने लगता है और तब कहा जाता है कि वह जीव बुढ़ा रहा है।

उपरोक्त खोज 1980 में एलिज़ाबेथ ब्लैकबर्न (Elizabeth H. Blackburn – Australian-American Researcher), कैरोल ग्राइडर (Carol W. Greider -American molecular biologist) और जैक ज़ोस्ताक (Jack W. Szostak – Canadian-American biologist) ने की थी और इसके लिए उन्हें 2009 में नोबेल पुरस्कार (Nobel Prize in 2009) से नवाज़ा गया था। अच्छी बात यह थी कि इन शोधकर्ताओं ने एक एंज़ाइम (टेलोमरेज़) की खोज भी की थी जिसमें टेलोमेयर के विघटन को रोकने या धीमा करने और यहां तक कि उसे पलटने की भी क्षमता होती है।

टेलोमेरेज़ आनुवंशिक जानकारी की रक्षा कैसे करता है?

टेलोमरेज़ में वह सांचा मौजूद होता है जो आसपास के परिवेश से पदार्थों को जोड़कर डीएनए का टेलोमरेज़ वाला खंड बना सकता है। इसके अलावा टेलोमरेज़ में यह क्षमता भी होती है कि वह पूरे डीएनए की ऐसी प्रतिलिपि बनवा सकता है, जिसमें अंतिम सिरा नदारद न हो। इस तरह से टेलोमरेज़ विभाजित होती कोशिकाओं को तंदुरुस्त रख सकता है।

टेलोमेयर और टेलोमरेज़ की क्रिया कोशिका मृत्यु और कोशिकाओं की वृद्धि में निर्णायक महत्व रखती है। वैसे किसी भी जीव की अधिकांश कोशिकाएं बहुत बार विभाजित नहीं होतीं, इसलिए अधिकांश कोशिकाओं को टेलोमेयर के घिसाव या संकुचन से कोई फर्क नहीं पड़ता। लेकिन स्टेम कोशिकाओं (stem cells) की बात अलग है।

स्टेम सेल क्या होता है – Stem Cell In Hindi!

स्टेम सेल्स वे कोशिकाएं होती हैं जो क्षति या बीमारी की वजह से नष्ट होने वाली कोशिकाओं की प्रतिपूर्ति करती हैं। उम्र बढ़ने के साथ ये स्टेम कोशिकाएं कम कारगर रह जाती हैं और जीव चोट या बीमारी से उबरने में असमर्थ होता जाता है।

दरअसल, कई सारी ऐसी बीमारियां है जो सीधे-सीधे टेलोमरेज़ की गड़बड़ी की वजह से होती हैं। जैसे एनीमिया, त्वचा व श्वसन सम्बंधी रोग।

इसके आधार पर शायद ऐसा लगेगा कि टेलोमरेज़ को प्रोत्साहित करने के तरीके खोजकर हम वृद्धावस्था से निपट सकते हैं।

लेकिन गौरतलब है कि टेलोमरेज़ का बढ़ा हुआ स्तर कैंसर कोशिकाओं को अनियंत्रित विभाजन में मदद कर नई समस्याएं पैदा कर सकता है। अत: टेलोमरेज़ की क्रियाविधि को समझना आवश्यक है ताकि हम ऐसे उपचार विकसित कर सकें जिनमें ऐसे साइड प्रभाव न हों।

What does telomerase do in humans? | मनुष्यों में टेलोमेरेज़ क्या करता है?

पीएनएएस के शोध पत्र के लेखकों ने बताया है कि वैसे तो टेलोमरेज़ की भूमिका सारे जीवों में एक-सी होती है, लेकिन यह सही नहीं है कि उसका कामकाजी हिस्सा भी सारे सजीवों में एक जैसा हो। कामकाजी हिस्से से आशय टेलोमरेज़ के उस हिस्से से है जो कोशिका विभाजन के दौरान डीएनए को टेलोमेयर के संश्लेषण में मदद देता है। इस घटक को टेलोमरेज़ आरएनए (या संक्षेप में टीआर) कहते हैं।

शोध पत्र में स्पष्ट किया गया है कि टीआर की प्रकृति को समझना काफी चुनौतीपूर्ण रहा है क्योंकि विभिन्न प्रजातियों में टीआर की प्रकृति व संरचना बहुत अलग-अलग होती है।

टीम ने अपना कार्य एरेबिडॉप्सिस थैलियाना नामक पौधे के टेलोमरेज़ के साथ प्रयोग और विश्लेषण के आधार पर किया।

अरबीडोफिसिस थालीआना पादप वैज्ञानिकों के लिए पसंदीदा मॉडल पौधा रहा है।

शोध पत्र के मुताबिक अध्ययन से पता चला कि टीआर अणु में विविधता के बावजूद इस अणु के अंदर दो ऐसी विशिष्ट रचनाएं हैं जो विभिन्न प्रजातियों में एक जैसी बनी रही हैं। पिछले अध्ययनों से आगे बढ़कर वर्तमान अध्ययन में एरेबिडॉप्सिस थैलियाना में टीआर का एक प्रकार पहचाना गया है जो संभवत: टेलोमेयर के रख-रखाव में मदद करता है और टेलोमेयर की एक उप-इकाई के साथ जुड़कर टेलोमरेज़ की गतिविधि का पुनर्गठन करता है।

अध्ययन में पादप कोशिका, तालाब में पाई जाने वाली स्कम और अकशेरुकी जंतुओं के टीआर के तुलनात्मक लक्षण भी उजागर किए हैं। इनसे जैव विकास के उस मार्ग का भान होता है जिसे एक-कोशिकीय प्राणियों से लेकर वनस्पतियों और ज़्यादा जटिल जीवों तक के विकास के दौरान अपनाया गया है। इस मार्ग को समझकर हम यह समझ पाएंगे कि टेलोमेयर के काम को किस तरह बढ़ावा दिया जा सकता है या रोका जा सकता है।

टेलोमेयर घिसाव की प्रक्रिया अनियंत्रित कोशिका विभाजन को रोकने के लिए अनिवार्य है। इसी वजह से जीव बूढ़े होते हैं और मृत्यु को प्राप्त होते हैं। इसीलिए जंतुओं की आयु चंद दशकों तक सीमित होती है।

दूसरी ओर, ब्रिसलकोन चीड़ (Bristlecone pine) और यू वृक्ष हज़ारों साल जीवित रहते हैं। यदि हम यह समझ पाएं कि पादप जगत बुढ़ाने की प्रक्रिया से कैसे निपटता है, तो शायद हमें मनुष्यों की आयु बढ़ाने या कम से कम जीवन की गुणवत्ता बेहतर बनाने का रास्ता मिल जाए।

– एस. अनंतनारायणन

Web title : Understand what is at the root of old age

(देशबन्धु में प्रकाशित लेख का संपादित रूप साभार)

एक क्लिक में आज की बड़ी खबरें । 06 जुलाई 2022 की खास खबर

top 10 headlines

ब्रेकिंग : आज भारत की टॉप हेडलाइंस

Top headlines of India today. Today’s big news 06 July 2022

साजी चेरियन ने मंत्री पद से दिया इस्तीफा, संविधान को लेकर दिया था विवादित बयान

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक केरल के मंत्री साजी चेरियन ने मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया है। उन्होंने संविधान को लेकर विवादित टिप्पणी की थी।

न्यूज एंकर रोहित रंजन की याचिका पर 7 जुलाई को सुनवाई करेगा सर्वोच्च न्यायालय

कांग्रेस सांसद राहुल गांधी के वीडियो को ‘गलत तरीके से दिखाने’ के मामले में घिरे न्यूज एंकर रोहित रंजन की याचिका पर सर्वोच्च न्यायालय बुधवार को सुनवाई के लिए सहमत हो गया है।

मुख्तार अब्बास नकवी ने मंत्री पद से दिया इस्तीफा

केंद्रीय अल्पसंख्यक कार्य मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी ने मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया है।

कोलकाता पुलिस ने नूपुर शर्मा को फिर किया तलब, 30 दिन में तीसरा नोटिस भेजा

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार कोलकाता पुलिस ने आज निलंबित भाजपा प्रवक्ता नूपुर शर्मा को एक और नोटिस जारी कर 11 जुलाई को शहर पुलिस के पूर्वी उपनगरीय डिवीजन के तहत नारकेलडांगा पुलिस स्टेशन में पूछताछ के लिए मौजूद रहने को कहा है।

नूपुर शर्मा की गिरफ्तारी की मांग वाली याचिका पर आपात सुनवाई से सर्वोच्च न्यायालय का इनकार

सर्वोच्च न्यायालय ने भारतीय जनता पार्टी की पूर्व प्रवक्ता नूपुर शर्मा की गिरफ्तारी की मांग करती याचिका को तत्काल या आपात सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने से आज इनकार कर दिया। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक सर्वोच्च न्यायालय में दायर याचिका ने पैगंबर मोहम्मद पर टिप्पणी के मामले में नूपुर शर्मा को गिरफ्तार करने के निर्देश देने की मांग की थी। अधिवक्ता ने तत्काल लिस्टिंग की मांग करते हुए कहा कि पुलिस शिकायत के बावजूद कोई कार्रवाई नहीं कर रही है।

सर्वोच्च न्यायालय ने अधिवक्ता से रजिस्ट्रार के सामने उल्लेख करने को कहा।

पीएम मोदी कल एनईपी के कार्यान्वयन पर शिक्षा समागम का उद्घाटन करेंगे

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कल 7 जुलाई को वाराणसी में तीन दिवसीय अखिल भारतीय शिक्षा समागम का उद्घाटन करेंगे। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के सहयोग से शिक्षा मंत्रालय द्वारा आयोजित इस तीन दिवसीय सम्मेलन में सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के विश्वविद्यालयों के 300 से अधिक कुलपति विचार-विमर्श करेंगे।

बिहार में फिर से बढ़ने लगे कोरोना के मामले

बिहार में कोरोना संक्रमितों की संख्या एक बार फिर से रफ्तार पकड़ने लगी है। बिहार की राजधानी पटना में इसकी रफ्तार और तेज है। राज्य में मंगलवार को 338 नए मामले सामने आए, जिसमे पटना में 182 संक्रमित शामिल हैं। इधर, नए कोरोना संक्रमितों की बढ़ती संख्या के बाद राज्य में कोरोना के सक्रिय मरीजों की संख्या भी बढ़ने लगी है।

महाराष्ट्र में अफगानी सूफी संत की हत्या

अफगानिस्तान के एक सूफी संत की महाराष्ट्र के नासिक जिले में गोली मारकर हत्या कर दी गई। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक पुलिस ने संदेह जताया है कि यह हत्या संपत्ति विवाद में की गई है।

आईआईटी मद्रास ने व्यक्तिगत कैंसर निदान के लिए एआई टूल विकसित किया

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) मद्रास के शोधकर्ताओं ने एक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस-आधारित उपकरण तैयार किया है। शोधकर्ताओं के मुताबिक यह उपकरण किसी व्यक्ति में कैंसर पैदा करने वाले जीन की भविष्यवाणी कर सकता है, और व्यक्तिगत कैंसर उपचार रणनीतियों को तैयार करने का मार्ग प्रशस्त करता है।

हिमाचल के कुल्लू में बादल फटने से 4 लोग बहे

प्राप्त जानकारी के अनुसार हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिले की पार्वती घाटी में बुधवार को बादल फटा, जिसमें कम से कम चार लोग बह गए।

भारत में कोरोना के मामलों में बढ़ोत्तरी, 16,159 नए मामले दर्ज, 28 मौतें

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय मुताबिक भारत में बुधवार को बीते 24 घंटों में कोविड-19 के 16,159 नए मामले दर्ज किए। यह संख्या मंगलवार को सामने आई 13,086 से अधिक है।

घरेलू रसोई गैस सिलेंडर की कीमतों में 50 रुपये की बढ़ोतरी

रसोई गैस सिलेंडर के दाम बढ़े – घरेलू रसोई गैस सिलेंडर की कीमतों में इजाफा हुआ है। इनकी कीमत में 50 रुपये की बढ़ोतरी की गई है। बढ़ी हुई कीमत आज से लागू हो गई है।

तमिलनाडु में 20 सितंबर से होगी अग्निवीर भर्ती

अग्निवीर भर्ती रैली तमिलनाडु के 11 जिलों के लिए तिरुपुर में 20 सितंबर से एक अक्टूबर तक आयोजित की जाएगी।

चिकित्सा विशेषज्ञों ने चेताया, अमेरिका में बढ़ सकता है मंकीपॉक्स का प्रकोप

मीडिया रिपोर्ट्स में कहा गया है कि अमेरिका के चिकित्सा विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि सरकार के सुस्त रवैये के कारण संयुक्त राज्य अमेरिका में मंकीपॉक्स के प्रकोप और बढ़ सकता है।

तृणमूल सांसद महुआ मोइत्रा पर भोपाल में मामला दर्ज

फिल्म काली के पोस्टर को लेकर विवाद के बीच पश्चिम बंगाल से तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा एक बयान के चलते मुसीबत में फंस गई हैं, उनके खिलाफ मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल की अपराध शाखा में धार्मिक भावनाएं भड़काने का प्रकरण दर्ज किया गया है।

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आईआईटी हैदराबाद परिसर में मानव रहित वाहनों के लिए अत्याधुनिक केंद्र स्थापित

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नई दिल्ली, 05 जुलाई, 2022: केंद्रीय राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) विज्ञान और प्रौद्योगिकी, राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) पृथ्वी विज्ञान, पीएमओ, कार्मिक, लोक शिकायत, पेंशन, परमाणु ऊर्जा और अंतरिक्ष राज्य मंत्री डॉ जितेंद्र सिंह ने सोमवार को हैदराबाद में मानव रहित वाहनों के विकास के लिए अत्याधुनिक सुविधा केंद्र का उद्घाटन किया है।

आईआईटी हैदराबाद परिसर में स्वचालित नेविगेशन सुविधा केंद्र

यह एक स्वचालित नेविगेशन सुविधा केंद्र है, जिसे भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी), हैदराबाद परिसर में स्थापित किया गया है।

मानव रहित वाहन विकसित किये जाएंगे

टेक्नॉलॉजी इनोवेशन हब ऑन ऑटोनोमस नेविगेशन (Technology Innovation Hub on Autonomous Navigation – TiHAN) नामक यह केंद्र विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय के 130 करोड़ रुपये के अनुदान पर आधारित है। यह एक बहु-विषयक पहल है, जो भारत को भविष्य और अगली पीढ़ी की ‘स्मार्ट मोबिलिटी’ तकनीक में एक वैश्विक खिलाड़ी बनाने की क्षमता रखती है। अपनी तरह के इस पहले अत्याधुनिक सुविधा केंद्र में मानव रहित हवाई एवं स्थलीय वाहन विकसित किये जाएंगे।

डॉ जितेंद्र सिंह ने बताया कि दुनिया भर में नियंत्रित वातावरण में मानव रहित और इनसे जुड़े वाहनों के संचालन की जांच के लिए सीमित टेस्टबेड या प्रोविंग ग्राउंड (जहाँ परीक्षण होता है) मौजूद हैं। इसमें वास्तविक जीवन के यातायात संचालन में होने वाले विभिन्न परिदृश्यों का अनुकरण किया जाता है। ब्रिटेन में मिलब्रुक प्रोविंग ग्राउंड, अमेरिका में एम-सिटी, सिंगापुर में सेट्रान, दक्षिण कोरिया में के-सिटी, जापान में जरी आदि उदाहरण के तौर पर शामिल हैं। उन्होंने कहा कि भारत में स्वचालित वाहनों का आकलन करने के लिए वर्तमान में ऐसी कोई टेस्टबेड सुविधा नहीं है। इसीलिए, इस टेक्नॉलॉजी इनोवेशन हब ऑन ऑटोनोमस नेविगेशन (TiHAN) टेस्टबेड की आवश्यकता है।

डॉ जितेंद्र सिंह ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के प्रौद्योगिकी दृष्टिकोण को आगे बढ़ाते हुए इस केंद्र ने मोबिलिटी क्षेत्र में नवाचार को बढ़ावा देने के लिए कई पहल की हैं। उन्होंने कहा कि टीआईएचएएन टेस्टबेड राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय दोनों स्तरों पर शिक्षा, उद्योग और अनुसंधान एवं विकास प्रयोगशालाओं के बीच उच्च गुणवत्ता वाले अनुसंधान के लिए एक अनूठा मंच प्रदान करेगा।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि भारत का मोबिलिटी क्षेत्र दुनिया के सबसे बड़े बाजारों में से एक है और टीआईएचएएन – आईआईटीएच स्वायत्त वाहनों के लिए भविष्य की प्रौद्योगिकी सृजन का स्रोत होगा। उन्होंने यह भी बताया कि स्वायत्त नेविगेशन (हवाई और जमीनी) पर टीआईएचएएन-आईआईटीएच टेस्टबेड हमें अगली पीढ़ी की स्वायत्त नेविगेशन प्रौद्योगिकियों का सटीक परीक्षण करने और तेजी से प्रौद्योगिकी विकास और वैश्विक बाजार में प्रवेश के लिए समर्थ बनाएगा।

केंद्रीय मंत्री ने कहा कि टीआईएचएएन विशेष रूप से इस दशक के राष्ट्रीय महत्व के कई अनुप्रयोग क्षेत्रों के लिए स्वायत्त यूएवी और जमीनी/सतह वाहनों का उपयोग करके एक वास्तविक समय सीपीएस प्रणाली विकसित और तैनात कर रहा है। उन्होंने कहा कि इस टेस्टबेड में सिमुलेशन प्लेटफॉर्म शामिल हैं, जिससे एल्गोरिदम और प्रोटोटाइप के नॉन-डिस्ट्रक्टिव परीक्षण संभव होंगे। स्थलीय प्रणालियों में, इन परिदृश्यों के कुछ उदाहरण स्मार्ट सिटी, सिग्नल वाले चौराहे, साइकिल चालकों और पैदल चलने वालों के साथ स्वचालित वाहनों का परस्पर संपर्क, वाहनों और सड़क किनारे इकाइयों के बीच वायरलेस नेटवर्किंग आदि हैं। स्वायत्त वाहन टेस्टबेड में डमी साइनबोर्ड, पैदल यात्री, ओवरपास और बाइक चालक भी होंगे, ताकि सभी तरह की वास्तविक स्थितियों में परीक्षण हो सके।

डॉ जितेंद्र सिंह ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारत को भविष्य की प्रौद्योगिकियों का गंतव्य बनाने के लिए कई कार्यक्रम शुरू किए गए हैं। ऐसी ही एक पहल विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) की ओर से देश भर में बहु-विषयक साइबर भौतिक प्रणालियों (एनएम-आईसीपीएस) पर राष्ट्रीय मिशन के तहत 25 प्रौद्योगिकी नवाचार केंद्रों की स्थापना है। इस मिशन के तहत, आईआईटी हैदराबाद को स्वायत्त नेविगेशन और डेटा अधिग्रहण प्रणाली (यूएवी, आरओवी, आदि) की तकनीकी शाखा में प्रौद्योगिकी नवाचार केंद्र प्रदान किया गया है।

एनएम-आईसीपीएस टेक्नोलॉजी इनोवेशन हब ऑन ऑटोनॉमस नेविगेशन (टीआईएचएएन) एक बहु-विषयक पहल है, जिसमें आईआईटी हैदराबाद में इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग, कंप्यूटर विज्ञान एवं इंजीनियरिंग, मैकेनिकल और एयरोस्पेस इंजीनियरिंग, सिविल इंजीनियरिंग, गणित, डिजाइन, लिबरल आर्ट्स और उद्यमिता के शोधकर्ता शामिल हैं। वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान विभाग से टीआईएचएएन को वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान संगठन (एसआईआरओ- सीरो) के रूप में मान्यता प्राप्त है।

विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के सचिव डॉ श्रीवरी चंद्रशेखर ने बताया कि इस परीक्षण सुविधा में एक हवाई पट्टी, सॉफ्ट लैंडिंग क्षेत्र, ड्रोन रखने के लिए जगह (हैंगर), एक ग्राउंड कंट्रोल स्टेशन (जीसीएस), प्रदर्शन मूल्यांकन के लिए टेलीमेट्री स्टेशन शामिल है। एलआईडीएआर, रडार, कैमरा आदि जैसे पेलोड के प्रदर्शन का मूल्यांकन किया जा रहा है। मैनुअल और स्वायत्त संचालन के बीच नियंत्रण संक्रमण और चालक रहित वाहनों की सार्वजनिक स्वीकृति पर अध्ययन किया जा रहा है। भारतीय परिदृश्य में विभिन्न अनुप्रयोगों के लिए नियमों और संचालन नीतियों को तैयार करने में मानव रहित वाहनों के लिए मानक संचालन प्रक्रियाएं महत्वपूर्ण सहायता करेंगी।

(इंडिया साइंस वायर)

TiHAN: India’s first technology innovation hub on autonomous navigation facility launched at IIT Hyderabad.

बिना चारफाड़ मस्तिष्क की कनेक्टिविटी बताएगा भारतीय शोधकर्ताओं द्वारा तैयार नया एल्गोरिदम

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भारतीय शोधकर्ताओं द्वारा तैयार किया गया नया एल्गोरिथम बिना चीर-फाड़ के बताएगा मस्तिष्क की कनेक्टिविटी

नई दिल्ली, 28 जून: भारतीय शोधकर्ताओं ने एक नया एल्गोरिदम विकसित किया है, जो मस्तिष्क के विभिन्न क्षेत्रों के बीच कनेक्टिविटी को बेहतर ढंग से समझने और पूर्वानुमान लगाने  में वैज्ञानिकों की मदद कर सकता है। ग्राफिक्स प्रोसेसिंग यूनिट (जीपीयू)-आधारित यह मशीन लर्निंग एल्गोरिदम बेंगलूरू स्थित भारतीय विज्ञान संस्थान (आईआईएससी) के शोधकर्ताओं (Indian Institute of Science, IISc) द्वारा विकसित किया गया है।

मस्तिष्क की कनेक्टिविटी बताने के लिए कैसे काम करेगा ReAl-LiFE एल्गोरिदम

रेगुलराइज्ड, एक्सेलेरेटेड, लीनियर फासिकल इवैल्यूएशन (ReAl-LiFE ) नामक यह एल्गोरिदम मानव मस्तिष्क के डिफ्यूजन मैग्नेटिक रेजोनेंस इमेजिंग (डीएमआरआई) स्कैन {Diffusion Magnetic Resonance Imaging (DMRI) Scan of the Human Brain} से भारी मात्रा में उत्पन्न डेटा का तेजी से विश्लेषण कर सकता है।

शोधकर्ताओं का कहना है कि रियल-लाइफ के उपयोग (ReAl-LiFE) से मौजूदा अत्याधुनिक एल्गोरिदम की तुलना में 150 गुना तेजी से डीएमआरआई डेटा का मूल्यांकन किया जा सकता है।

Researchers at IISc. develop algorithm to study connectivity in brain 

सेंटर फॉर न्यूरोसाइंस (सीएनएस), आईआईएससी के एसोसिएट प्रोफेसर और नेचर कम्प्यूटेशनल साइंस जर्नल Nature Computational Science is a Transformative Journal) में प्रकाशित इस अध्ययनGPU-accelerated connectome discovery at scale” से जुड़े शोधकर्ता देवराजन श्रीधरन कहते हैं, “जिन कार्यों में पहले घंटों से लेकर दिनों तक का समय लगता था, उन्हें अब कुछ सेकेंड से मिनटों की अवधि में पूरा किया जा सकता है।”

मस्तिष्क में हर सेकंड लाखों न्यूरॉन फायर होते हैं और विद्युत तरंग उत्पन्न करते हैं, जो मस्तिष्क में एक बिंदु से दूसरे तक कनेक्टिंग केबल या ‘तंत्रिका फाइबर’ (Axons) के माध्यम से न्यूरोनल नेटवर्क में यात्रा करते हैं। मस्तिष्क द्वारा किए जाने वाली संगणनाओं के लिए ये कनेक्शन आवश्यक हैं।

चीरफाड़ रहित विधि है dMRI स्कैन
Researchers at IISc. develop algorithm to study connectivity in brain.
algorithm to predict brain

आईआईएससी में पीएचडी शोधार्थी और अध्ययन की प्रमुख शोधकर्ता वर्षा श्रीनिवासन कहती हैं, “मस्तिष्क-व्यवहार संबंधों को बड़े पैमाने पर उजागर करने के लिए मस्तिष्क की कनेक्टिविटी को समझना महत्वपूर्ण है।” हालांकि, मस्तिष्क कनेक्टिविटी का अध्ययन करने के लिए पारंपरिक दृष्टिकोण के तहत आमतौर पर पशु मॉडल का उपयोग होता है, जिनमें चीरफाड़ की आवश्यकता होती है। दूसरी ओर, dMRI स्कैन, मनुष्यों में मस्तिष्क की कनेक्टिविटी का अध्ययन करने के लिए एक चीरफाड़ रहित विधि है।

(इंडिया साइंस वायर)

Machine learning: New algorithm prepared by Indian researchers will tell the connectivity of the brain without the desection

जानिए बायोटेक क्षेत्र की प्रगति में महिला उद्यमियों की भूमिका क्या है?

Science news

बायोटेक क्षेत्र की प्रगति में महिला उद्यमियों की भूमिका अहम (Role of women entrepreneurs in the progress of biotech sector)

नई दिल्ली, 13 जून: बायोटेक स्टार्टअप के क्षेत्र में भारत (India in the field of Biotech Startups), महिलाओं के लिए विशिष्ट परियोजनाओं से महिलाओं के नेतृत्व वाली परियोजनाओं की ओर बढ़ रहा है।

भारत अगले 04 वर्षों में बायोटेक क्षेत्र को 70 अरब (बिलियन) अमेरिकी डॉलर से 150 अरब अमेरिकी डॉलर तक बढ़ाने की ओर देख रहा है। इस लक्ष्य को महिलाओं की सक्रिय भागीदारी के बिना पूरा नहीं किया जा सकता।

केंद्रीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार), पृथ्वी विज्ञान राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार), प्रधानमंत्री कार्यालय, कार्मिक, लोक शिकायत, पेंशन, परमाणु ऊर्जा और अंतरिक्ष राज्य मंत्री डॉ जितेंद्र सिंह ने यह बात कही है।

नई दिल्ली में आयोजित बायोटेक स्टार्ट-अप्स प्रदर्शनी (एक्सपो) { Biotech Start-ups Exhibition (Expo)} में “75 महिला बायोटेक उद्यमियों का संग्रह” और “स्वतंत्रता के 75वें वर्ष के दौरान निर्मित 75 बायोटेक उत्पाद” पर आधारित पुस्तिकाओं के विमोचन के अवसर पर डॉ जितेंद्र सिंह ने कहा कि महिला उद्यमी-स्वामित्व वाली बायोटेक कंपनियों की संख्या में तेजी से बढ़ोतरी देखी गई है।

उन्होंने कहा कि महिला वैज्ञानिकों ने अंतरिक्ष, परमाणु विज्ञान, ड्रोन और नैनो-प्रौद्योगिकी में अपनी जगह बनायी है, और वर्ष 2023 में शुरू होने वाले ‘गगनयान’ मिशन सहित कई बड़ी वैज्ञानिक परियोजनाओं का नेतृत्व महिला वैज्ञानिक कर रही हैं।

डॉ जितेंद्र सिंह ने कहा कि केंद्रीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय के विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी ) और जैव प्रौद्योगिकी विभाग (डीबीटी) में महिला वैज्ञानिकों को आकर्षित करने और बेरोजगार महिला वैज्ञानिकों को रोजगार के अवसर प्रदान करने के लिए विशेष योजनाएं (Special schemes to provide employment opportunities to unemployed women scientists) संचालित की जा रही हैं।

केंद्रीय मंत्री ने कहा कि बाजार की स्थिति, विभिन्न व्यावसायिक अवसरों तक पहुँच और व्यवसाय स्वामित्व की दुनिया में महिला उद्यमियों की छलांग लगाने की तत्परता एक विजयी ट्रिफेक्टा बनाती हैं।

डॉ जितेंद्र सिंह ने बताया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में स्टार्टअप्स को सहायता और सक्षम वातावरण प्रदान किया गया है, जिससे पिछले 08 वर्षों के दौरान देश में बायोटेक स्टार्टअप्स की संख्या 50 से बढ़कर 5,000 से अधिक हो गई है। 

उन्होंने आगे कहा कि जैव-प्रौद्योगिकी, जैव-अर्थव्यवस्था को संचालित करने वाली प्रमुख सक्षम तकनीक है, जिसे एक उभरते क्षेत्र के रूप में मान्यता प्राप्त है।

केंद्रीय मंत्री ने बताया कि भारत, जैव प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में पूरे विश्व में 12वाँ, एशिया-प्रशांत क्षेत्र में तीसरा और विश्व का सबसे बड़ा वैक्सीन निर्माता देश है। डॉ सिंह ने कहा कि अगले 25 वर्षों की अमृतकाल अवधि में इस इकोसिस्टम और नवाचार की संस्कृति के निर्माण व इसकी सहायता करने के लिए छोटे व बड़े उद्योग और शिक्षाविदों को एक साथ आना होगा।

डॉ जितेंद्र सिंह ने बताया कि जैव प्रौद्योगिकी विभाग (डीबीटी) ने बायोटेक अनुसंधान में महिला वैज्ञानिकों की भागीदारी बढ़ाने और क्षमता निर्माण के लिए बायोकेयर कार्यक्रम शुरू किया है।

उन्होंने कहा कि बायोटेक उद्यमिता में महिलाओं को पुरस्कृत करने के लिए जैव प्रौद्योगिकी उद्योग अनुसंधान सहायता परिषद (बाइरैक) ने टीआईई, दिल्ली की सहभागिता में विनर अवार्ड (उद्यमी अनुसंधान में महिला) की शुरुआत की है। बाइरैक की यह पहल महिला विशिष्ट बायो-इनक्यूबेटरों के साथ सभी महिला स्टार्टअप्स को उत्कृष्टता प्राप्त करने में सहायता प्रदान करने के लिए महत्वपूर्ण है।

डीबीटी सचिव डॉ राजेश एस. गोखले ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बायोटेक स्टार्टअप एक्स्पो-2022 की अध्यक्षता करने, और देश को ‘आत्मनिर्भर’ बनाने की चुनौती अपनाने के लिए युवा मस्तिष्क को प्रेरित करने के लिए धन्यवाद दिया।

डॉ गोखले ने केंद्रीय मंत्री डॉ जितेंद्र सिंह को उनकी सहायता और नेतृत्व के लिए भी धन्यवाद दिया। उन्होंने कहा कि डीबीटी, इस गति को सही दिशा में आगे बढ़ाने के लिए हर तरह के प्रयास को सुनिश्चित करेगा।

बायोटेक स्टार्टअप एक्स्पो के दूसरे दिन प्रख्यात पैनलिस्टों और कारपोरेट हस्तियों की मौजूदगी में स्टार्टअप पिचिंग सत्र के साथ बी2बी (बिजनेस टू बिजनेस) बैठकें आयोजित की गईं।

इस पिचिंग सत्र में विनिर्माता, निवेशक, व्यवसायिक सलाहकार, एबीएलई, सीआईआई, फिक्की, एफएसआईआई, एआईएमईडी के औद्योगिक प्रतिनिधि, अकादमिक निदेशक व प्रोफेसर और व्यावसायिक सलाहकार (टीआईई) ने हिस्सा लिया।

(इंडिया साइंस वायर)

दाँतों के बेहतर उपचार में मदद करेंगे स्वदेशी नैनो रोबोट

tiny bots

Indigenous nano robots will help in better treatment of teeth

नई दिल्ली, 18 मई (इंडिया साइंस वायर): चुंबकीय क्षेत्र का उपयोग करके विकसित किए गए नैनो-आकार के रोबोट (nano-sized robots) अब दंत नलिकाओं के अंदर बैक्टीरिया (bacteria inside the dental tubules) को मारने में मदद कर सकते हैं, और रूट कैनाल उपचार की सफलता की दर (Root canal treatment success rate) को बढ़ा सकते हैं।

भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc) और इसके द्वारा इनक्यूबेटेड स्टार्टअप – थेरानॉटिलस के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए एक नये अध्ययन में यह बात उभरकर आयी है।

रूट कैनाल ट्रीटमेंट कैसे किया जाता है?

दाँतों के संक्रमण के इलाज के लिए रूट कैनाल प्रक्रिया (root canal procedure) नियमित उपचार का एक अहम हिस्सा है। इस प्रक्रिया में दाँत के भीतर संक्रमित नरम ऊतकों को हटाना, जिसे पल्प कहा जाता है, और संक्रमण का कारण बनने वाले बैक्टीरिया को मारने के लिए एंटीबायोटिक या रसायनों के साथ दाँत को फ्लश किया जाता है। लेकिन, कई बार यह उपचार बैक्टीरिया को पूरी तरह से हटाने में विफल रहता है।

एंटरोकोकस फ़ेकलिस (Enterococcus faecalis) जैसे एंटीबायोटिक-प्रतिरोधी बैक्टीरिया इनमें विशेष रूप से शामिल हैं, जो दाँतों की माइक्रोस्कोपिक कैनाल (दंत नलिकाओं) के भीतर छिपे रहते हैं, जिन्हें डेंटिनल ट्यूबल (dentinal tubules) कहा जाता है।

“दंत नलिकाएं बहुत छोटी होती हैं, और बैक्टीरिया ऊतकों में गहरे छिपे रहते हैं।

आईआईएससी के सेंटर फॉर नैनो साइंस ऐंड इंजीनियरिंग (CeNSE) के रिसर्च एसोसिएट और थेरानॉटिलस के सह-संस्थापक, शनमुख श्रीनिवास बताते हैं – “वर्तमान में प्रचलित तकनीक पूरी तरह से भीतर पहुँचकर बैक्टीरिया को मारने के लिए पर्याप्त कुशल नहीं हैं।”

शोध पत्रिका एडवांस्ड हेल्थकेयर मैटेरियल्स में प्रकाशित इस अध्ययन में, शोधकर्ताओं ने आयरन के साथ लेपित सिलिकॉन डाइऑक्साइड से बने हेलीकल नैनोबोट (Helical nanobots made of silicon dioxide coated with iron) तैयार किए हैं, जिन्हें कम तीव्रता वाले चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न करने वाले डिवाइस का उपयोग करके नियंत्रित किया जा सकता है।

इन नैनोबॉट्स को निकाले गए दाँत नमूनों में इंजेक्ट किया गया है, और शोधकर्ताओं ने माइक्रोस्कोप का उपयोग करके उनके मूवमेंट को ट्रैक किया है।

चुंबकीय क्षेत्र की आवृत्ति को कम करके, शोधकर्ता नैनोबॉट्स को आवश्यकतानुसार स्थानांतरित करने में सक्षम थे, और दाँतों की नलिकाओं के अंदर गहराई से प्रवेश कर सकते थे।

श्रीनिवास कहते हैं, “हमने यह भी दिखाया है कि हम उन्हें पुनः प्राप्त कर सकते हैं, और उन्हें रोगी के दाँतों से वापस खींच सकते हैं।”

महत्वपूर्ण रूप से, शोधकर्ताओं को नैनोबॉट्स के चुंबकीय क्षेत्र में परिवर्तन करके उसकी सतह पर गर्मी उत्पन्न करने में सफलता मिली है, जो आसपास के बैक्टीरिया को मार सकती है।

सेंटर फॉर नैनो साइंस ऐंड इंजीनियरिंग के रिसर्च एसोसिएट और थेरानॉटिलस के एक अन्य सह-संस्थापक देबयान दासगुप्ता कहते हैं, ”बाजार में उपलब्ध कोई अन्य तकनीक अभी ऐसा करने में सक्षम नहीं है।”

पहले वैज्ञानिकों ने रूट कैनाल उपचार की दक्षता में सुधार के उद्देश्य से बैक्टीरिया और ऊतक अपशिष्ट को बाहर निकालने के लिए उपयोग किए जाने वाले तरल पदार्थ में शॉकवेव पैदा करने के लिए अल्ट्रासाउंड या लेजर तरंगों का उपयोग किया है। लेकिन, ये तरंगें केवल 800 माइक्रोमीटर की दूरी तक ही प्रवेश कर सकती हैं, और उनकी ऊर्जा तेजी से नष्ट हो जाती है। जबकि, नैनोबॉट 2,000 माइक्रोमीटर तक तक प्रवेश कर सकते हैं। शोधकर्ताओं का कहना है कि बैक्टीरिया को मारने के लिए गर्मी का उपयोग हानिकारक रसायनों या एंटीबायोटिक दवाओं का एक सुरक्षित विकल्प भी प्रदान करता है।

शोधकर्ताओं ने चूहों के मॉडल में दंत नैनोबॉट्स का परीक्षण किया और उन्हें सुरक्षित और प्रभावी पाया है। वे एक नये प्रकार के चिकित्सा उपकरण को विकसित करने पर भी काम कर रहे हैं, जो आसानी से मुँह के अंदर फिट हो सकते हैं, और दंत चिकित्सक को रूट कैनाल उपचार के दौरान दाँतों के अंदर नैनोबॉट्स को इंजेक्ट और उनमें बदलाव करने में सक्षम बनाते हैं।

सेंटर फॉर नैनो साइंस ऐंड इंजीनियरिंग के प्रोफेसर अंबरीश घोष कहते हैं, “हम इस तकनीक को क्लिनिकल सेटिंग में लागू करने के बहुत करीब हैं, जिसे तीन साल पहले तक भविष्य की प्रौद्योगिकी माना जाता था।” “यह देखना खुशी की बात है कि कैसे एक साधारण वैज्ञानिक जिज्ञासा एक चिकित्सा हस्तक्षेप के रूप में आकार ले रही है, जो सिर्फ भारत में ही लाखों लोगों को प्रभावित कर सकती है।”

(इंडिया साइंस वायर)

Topics: Tiny bots, teeth cleaning, Nano robots, magnetic field, bacteria, Theranautilus, CeNSE

अगली पीढ़ी के कम्प्यूटर उपकरण डिजाइन करने की नई स्वदेशी तकनीक

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New indigenous technology to design next generation computer equipment

नई दिल्ली, 14 मई 2022: भविष्य की कम्प्यूटिंग आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए वर्तमान में प्रचलित मल्टीकोर प्रोसेसर की कंप्यूटिंग क्षमता (Computing capability of multicore processor) में सुधार की आवश्यकता है। विभिन्न क्षेत्रों में बढ़ती अत्याधुनिक कम्प्यूटेशनल माँग को देखते हुए एप्लिकेशन-विशिष्ट प्रोसेसर के साथ-साथ अधिक कुशल एवं त्वरित रिस्पॉन्स क्षमता से लैस उपकरणों का विकास कम्प्यूटिंग उद्योग की एक प्रमुख जरूरत है।

अगली पीढ़ी की कंप्यूटिंग में उपयोगी हो सकती है नई प्रौद्योगिकी (New technology may be useful in next generation computing)

भारतीय शोधकर्ताओं ने तेज और सुरक्षित एकीकृत सर्किट (ICs) के डिजाइन के लिए नई प्रौद्योगिकी विकसित की है, जो अगली पीढ़ी के उन्नत कम्प्यूटिंग उपकरणों के निर्माण (next-generation computing) में उपयोगी हो सकती हैं। 

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी), गुवाहाटी के शोधकर्ताओं द्वारा किया गया यह अध्ययन स्वचालित इलेक्ट्रॉनिक्स डिजाइन प्रक्रिया में शामिल – संश्लेषण, सत्यापन और सुरक्षा के आयामों पर केंद्रित है।

प्रमुख शोधकर्ता डॉ चंदन कारफा ने बताया है कि “हाई-लेवल सिंथेसिस (HLS) प्रक्रिया को मान्य करने के लिए इस अध्ययन में दो उपकरण विकसित किए गए हैं। इनमें से एक FastSim नामक ‘रजिस्टर ट्रांसफर लेवल (आरटीएल) सिम्युलेटर है, जो मौजूदा वाणिज्यिक सिमुलेटर से 300 गुना तेज चलने में सक्षम है। दूसरा उपकरण डीईईक्यू (DEEQ) है, जो एचएलएस के सत्यापन के लिए उपयोग होने वाला एक विशिष्ट जाँच उपकरण है।”

डॉ कारफा बताते हैं कि बाजार में समान विशेषताओं वाला ऐसा कोई अन्य उपकरण फिलहाल उपलब्ध नहीं है।

नई प्रौद्योगिकी HOST

आईआईटी, गुवाहाटी द्वारा विकसित इन सिमुलेटर्स (Simulators developed by IIT, Guwahati) के अलावा, जिन उपकरणों के प्रोटोटाइप परीक्षण के लिए उपलब्ध हैं, उसमें HOST नामक एक नई प्रौद्योगिकी भी शामिल है, जो डिजाइन चक्र के दौरान एकीकृत सर्किट (Integrated Circuits) से बौद्धिक सम्पदा (Intellectual property) चोरी के खतरे से बचा सकता है।

हार्डवेयर एक्सीलरेटर्स विशिष्टताओं पर आधारित अध्ययन (Study Based on Hardware Accelerators Specifications)

शोधकर्ताओं का कहना है कि यह अध्ययन हार्डवेयर एक्सीलरेटर्स विशिष्टताओं पर आधारित है, जो अक्सर C/C++ जैसी उच्च-स्तरीय कम्प्यूटिंग लैंग्वेज में होती हैं, और हाई-लेवल सिंथेसिस (HLS) प्रक्रिया में हार्डवेयर कोड या रजिस्टर ट्रांसफर लेवल (आरटीएल) कोड में परिवर्तित हो जाती हैं। इस प्रक्रिया के दौरान HLS रूपांतरण डिजाइन में बग आने की आशंका होती है, जिसका पता लगाने के लिए सख्त प्रमाणीकरण की आवश्यकता होती है। यह काम आरटीएल सिमुलेटर करते हैं, और HLS की प्रमाणिकता को परखते हैं। यह प्रक्रिया बेहद धीमी और जटिल होती है। इसलिए, शोधकर्ताओं ने HLS की प्रमाणिकता की जाँच के लिए नये उपकरण विकसित किए हैं, जो न केवल सरल हैं, बल्कि बेहद तेज कार्य करने में सक्षम हैं।

डॉ चंदन करफा ने कहा, “कम्प्यूटेशनल दक्षता में सुधार के लिए एक आशाजनक तकनीक हार्डवेयर एक्सीलेटर्स हैं। हार्डवेयर एक्सीलेरेशन प्रक्रिया में, विशिष्ट कार्यों को सिस्टम के सीपीयू कोर द्वारा निष्पादित किए जाने के बजाय समर्पित हार्डवेयर में लोड किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, विज़ुअलाइज़ेशन प्रक्रियाओं को ग्राफिक्स कार्ड पर लोड किया जा सकता है, जिससे सीपीयू अन्य कार्यों को करने के भार से मुक्त हो जाता है।”

इंटरनेट-ऑफ-थिंग्स (IoT), एम्बेडेड और साइबर-फिजिकल सिस्टम, मशीन लर्निंग और इमेज प्रोसेसिंग एप्लिकेशन (Machine learning and image processing applications) जैसे क्षेत्रों में हार्डवेयर एक्सीलरेटर्स की बढ़ती माँग के कारण इस अध्ययन को महत्वपूर्ण बताया जा रहा है।

हार्डवेयर एक्सीलरेशन क्या होता है? | What is Hardware Acceleration?

हार्डवेयर एक्सीलरेशन से तात्पर्य किसी सामान्य केंद्रीय प्रसंस्करण इकाई (सीपीयू) पर चलने वाले सॉफ्टवेयर की तुलना में विशिष्ट कार्यों को अधिक कुशलता से करने के लिए डिजाइन किए गए कंप्यूटर हार्डवेयर के उपयोग से है। इस प्रकार के कंप्यूटर हार्डवेयर्स को हार्डवेयर एक्सीलरेटर्सके रूप में जाना जाता है।

शोधकर्ताओं का कहना है कि यह अध्ययन भारत में इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करने में प्रभावी भूमिका निभा सकता है। आईआईटी गुवाहाटी के वक्तव्य में दावा किया गया है कि भारत सरकार द्वारा हाल ही में देश में सेमीकंडक्टर निर्माण को बढ़ावा देने के लिए 76,000 करोड़ रुपये की योजना की मंजूरी के साथ, कुशल इलेक्ट्रॉनिक डिजाइन ऑटोमेशन (ईडीए) के क्षेत्र में इस प्रकार के हस्तक्षेप से चिप डिजाइन के क्षेत्र में भारत को आत्मनिर्भर बनाने का मार्ग प्रशस्त हो सकता है।

विभिन्न अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों के सहयोग से यह अध्ययन किया गया है। डॉ चंदन कारफा के अलावा इस अध्ययन में मोहम्मद अब्देरहमान, देबदरा सेनापति, सुरजीत दास, प्रियंका पाणिग्रही और निलोत्पोला सरमा शामिल हैं। इन प्रयासों में योगदान देने वाले कुछ पूर्व छात्रों में रामानुज चौकसे, जय ओझा, योम निगम, अब्दुल खादर और जयप्रकाश पाटीदार शामिल हैं। यह अध्ययन विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग, भारत सरकार के अंतःविषयक साइबर-भौतिक प्रणालियों (आईसीपीएस) के अनुदान और इंटेल (भारत) की शोध फेलोशिप पर आधारित है। इस अध्ययन के निष्कर्ष शोध पत्रिका आईईईई में प्रकाशित किये गए हैं।

(इंडिया साइंस वायर)

Topics: IIT Guwahati, Technology, integrated circuits, ICs, next-generation, computing.

Notes : Hardware acceleration

Hardware acceleration is the use of computer hardware designed to perform specific functions more efficiently when compared to software running on a general-purpose central processing unit. Wikipedia

न्यूक्लिक एसिड स्टेनिंग डाई प्रौद्योगिकी उत्पादन के लिए हस्तांतरित

Science news

Nucleic Acid Staining Dye Technology Transferred to Production

नई दिल्ली, 12 मई: आणविक निदान (मॉलिक्यूलर डायग्नोस्टिक- molecular diagnostics) और जीवन विज्ञान अनुसंधान में न्यूक्लिक एसिड स्टेनिंग डाई के विविध उपयोग (Various Uses of Nucleic Acid Staining Dye) होते हैं।

भारतीय वैज्ञानिकों ने विकसित किया है न्यूक्लिक एसिड स्टेनिंग डाई का किफायती विकल्प

डाई ग्रीनआर नामक इस न्यूक्लिक एसिड स्टेनिंग डाई वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) की लखनऊ स्थित प्रयोगशाला केन्द्रीय औषधि अनुसंधान संस्थान (सीडीआरआई) द्वारा विकसित की गई है।

राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी दिवस के अवसर पर ग्रीनआर की प्रौद्योगिकी व्यावसायिक उत्पादन के लिए उत्तर प्रदेश में पंजीकृत स्टार्ट-अप कंपनी, जीनटूप्रोटीन प्राइवेट लिमिटेड (जीपीपीएल) को हस्तांतरित की गई है।  

डाई ग्रीनआर को सीडीआरआई के वरिष्ठ प्रधान वैज्ञानिक डॉ अतुल गोयल ने संस्थान के एक औद्योगिक भागीदार बायोटेक डेस्क प्राइवेट लिमिटेड (बीडीपीएल), हैदराबाद के संयुक्त सहयोग से विकसित किया है।

डॉ गोयल ने बताया कि ग्रीनआर व्यावसायिक रूप से उपलब्ध डीएनए/आरएनए डाइज़ (रंजकों), जो वर्तमान में विदेशों से आयात किए जाते हैं, के लिए एक किफायती विकल्प है। यह जीनोमिक डीएनए, पीसीआर उत्पादों, प्लास्मिड और आरएनए सहित सभी न्यूक्लिक एसिड के साथ अच्छी तरह बंध सकता है, तथा नीली रोशनी या पराबैंगनी रोशनी के संपर्क में आने पर चमकने लगता है।

शोधकर्ताओं ने रीयल टाइम पीसीआर और डीएनए बाइंडिंग में इसके जैविक अनुप्रयोगों का अध्ययन किया है। डॉ गोयल ने बताया कि ग्रीनआर डाई के आणविक निदान (मोलिक्यूलर डायग्नोस्टिक्स) और जीवन विज्ञान अनुसंधान में विविध अनुप्रयोग हैं।

ग्रीनआर के रासायनिक संश्लेषण को डॉ गोयल की टीम में शामिल शोधकर्ताओं द्वारा मानकीकृत किया गया है, जिनमें शाज़िया परवीन और कुंदन सिंह रावत शामिल हैं।

जीपीपीएल की निदेशक डॉ श्रद्धा गोयनका की योजना ‘गो ग्रीनआर’ अभियान शुरू करने की है, जिसमें वह पूरे भारत के वैज्ञानिकों से उत्परिवर्तन कारक (म्यूटाजेनिक) एथिडियम ब्रोमाइड के उपयोग को ग्रीनआर डाई से बदलने का आग्रह करती है। उनका कहना है कि पारंपरिक डाई का यह विकल्प उपयोग में सुरक्षित है, और इसका निपटान आसानी से हो सकता है।

वह बताती हैं कि कंपनी ने अकादमिक और उद्योग क्षेत्र में शोधकर्ताओं के बीच इस उत्पाद का नमूना लेना शुरू कर दिया है।

डॉ गोयनका ने बताया कि इस उत्पाद को सकारात्मक प्रतिक्रिया मिल रही है।

सीएसआईआर-सीडीआरआई के निदेशक डॉ श्रीनिवास रेड्डी ने बताया कि पिछले पाँच वर्षों में सबसे लोकप्रिय डीएनए डाई – सायबर (एसवाईबीआर) ग्रीन ने इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण हिस्सेदारी दर्ज करायी है।

डॉ रेड्डी ने कहा है कि स्वदेशी डाई ग्रीनआर के विकास से भारतीय शोधकर्ताओं को विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा बनाए गए महँगे आयातित रंजकों का विकल्प मिलेगा, जो देश को ‘आत्मनिर्भर भारत’ का लक्ष्य प्राप्त करने के करीब ले जाएगा।

(इंडिया साइंस वायर)

Topics: Csir-Cdri, Nucleic Acid Staining Dye, GreenR, National Technology Day, Biotechnology, Dna, Rna, Pcr

मधुमेह उपचार में उपयोगी हो सकता है नया ड्रग मॉलिक्यूल

glucagon-like-peptide-1 receptor

New drug molecule may be useful in diabetes treatment

नई दिल्ली, 02 मई 2022: भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) मंडी (Indian Institute of Technology (IIT) Mandi) के शोधकर्ताओं ने एक ऐसे दवा अणु (Drug Molecule) की पहचान की है, जिसका उपयोग मधुमेह के उपचार में किया जा सकता है। PK2 नामक यह अणु अग्न्याशय द्वारा इंसुलिन के स्राव को ट्रिगर करने में सक्षम है, और संभावित रूप से मधुमेह के लिए मौखिक रूप से दी जाने वाली दवा (oral medication for diabetes) में इसका उपयोग किया जा सकता है।

टाइप-1 और टाइप-2 मधुमेह के लिए सस्ती और प्रभावी दवा (Affordable and effective medicine for type 1 and type 2 diabetes)

इस अध्ययन से जुड़े आईआईटी मंडी के प्रमुख शोधकर्ता डॉ. प्रोसेनजीत मंडल का कहना है कि “मधुमेह के लिए उपयोग की जाने वाली एक्सैनाटाइड और लिराग्लूटाइड (exenatide and liraglutide) जैसी मौजूदा दवाएं इंजेक्शन के रूप में दी जाती हैं, जो महंगी होने के साथ-साथ अस्थिर होती हैं। हम ऐसी सरल दवाएं खोजना चाहते हैं, जो टाइप-1 और टाइप-2 मधुमेह दोनों के खिलाफ स्थिर, सस्ता और प्रभावी विकल्प बनने में सक्षम हों।”

मधुमेह रक्त शर्करा स्तर की प्रतिक्रिया में अग्न्याशय की बीटा कोशिकाओं द्वारा अपर्याप्त इंसुलिन रिलीज के साथ जुड़ा है। इंसुलिन रिलीज होने में कई जटिल जैव रासायनिक प्रक्रियाएं होती हैं। ऐसी ही एक प्रक्रिया में कोशिकाओं में मौजूद GLP1R नामक प्रोटीन संरचनाएं शामिल होती हैं। भोजन ग्रहण करने के बाद जारी GLP1 नामक एक हार्मोनल अणु, GLP1R से बंधता है, और इंसुलिन रिलीज को ट्रिगर करता है। एक्सैनाटाइड और लिराग्लूटाइड जैसी दवाएं GLP1 की नकल करती हैं और इंसुलिन रिलीज को ट्रिगर करने के लिए GLP1R से जुड़ती हैं।

इन दवाओं के विकल्प खोजने के लिए संयुक्त अध्ययनकर्ताओं की टीम ने विभिन्न छोटे अणुओं की स्क्रीनिंग के लिए कंप्यूटर सिमुलेशन विधियों का उपयोग किया है, जो GLP1R से जुड़ सकते हैं।

PK2, PK3, और PK4 में GLP1R में बंध बनाने की अच्छी क्षमताएं थीं, लेकिन, शोधकर्ताओं ने सॉल्वैंट्स में बेहतर घुलनशीलता के कारण PK2 को चुना। इसके बाद आगे के परीक्षण के लिए PK2 को प्रयोगशाला में संश्लेषित किया गया है।

अध्ययन से जुड़ी एक अन्य शोधकर्ता डॉ ख्याति गिरधर ने बताया है कि

“हमने पहले मानव कोशिकाओं में GLP1R प्रोटीन पर PK2 के बंधन का परीक्षण किया और पाया कि यह GLP1R प्रोटीन को अच्छी तरह से बांधने में सक्षम है। इससे पता चलता है कि PK2 बीटा कोशिकाओं द्वारा इंसुलिन रिलीज को संभावित रूप से ट्रिगर कर सकता है।”

शोधकर्ताओं ने पाया कि गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल ट्रैक्ट (gastrointestinal tract) द्वारा PK2 तेजी से अवशोषित होता है, जिसका अर्थ है कि इसे इंजेक्शन के बजाय मौखिक दवा के रूप में उपयोग किया जा सकता है। इसके अलावा, दवा देने के दो घंटे के बाद, चूहों के जिगर, गुर्दे और अग्न्याशय में PK2 पाया गया, लेकिन हृदय, फेफड़े और प्लीहा में इसके होने के संकेत नहीं मिले हैं। मस्तिष्क में यह थोड़ी मात्रा में मौजूद था, जिससे पता चलता है कि यह अणु मस्तिष्क में पहुँचने की बाधा को पार करने में सक्षम हो सकता है। हालांकि, उनका कहना यह भी है कि करीब 10 घंटे में यह रक्त प्रवाह से पृथक हो जाता है।

डॉ. प्रोसेनजीत मंडल अपने अध्ययन में एक और महत्वपूर्ण खोज की ओर संकेत करते हैं। वह कहते हैं, “इंसुलिन रिलीज बढ़ाने के अलावा, PK2 बीटा सेल हानि को रोकने और यहाँ तक ​​कि उसे रिवर्स करने में भी सक्षम था, इंसुलिन उत्पादन के लिए आवश्यक सेल, इसे टाइप-1 और टाइप-2 मधुमेह दोनों के लिए प्रभावी बनाता है।”

इस अध्ययन में, पीके2 के जैविक प्रभावों का परीक्षण करने के लिए यह अणु मधुमेह ग्रस्त चूहों को मौखिक रूप से दिया गया है, और उनमें ग्लूकोज के स्तर और इंसुलिन स्राव को मापा गया है। नियंत्रित समूह की तुलना में PK2 उपचारित चूहों में सीरम इंसुलिन के स्तर में छह गुना वृद्धि देखी गई है।

शोधकर्ताओं का कहना है कि इस अध्ययन के निष्कर्ष मधुमेह रोगियों के लिए सस्ती मौखिक दवाओं के विकास का मार्ग प्रशस्त कर सकते हैं।

इस अध्ययन से जुड़े शोधकर्ताओं में, डॉ. प्रोसेनजीत मंडल एवं डॉ ख्याति गिरधर के अलावा आईआईटी मंडी के शोधकर्ता प्रोफेसर सुब्रत घोष; आईसीएमआर-आरएमआरसी, भुवनेश्वर के शोधकर्ता डॉ बुधेश्वर देहुरी; और आईसीएआर-आईएएसआरआई, पूसा के डॉ. सुनील कुमार शामिल हैं।

आईआईटी मंडी की शोधकर्ता शिल्पा ठाकुर, डॉ अभिनव चौबे, डॉ पंकज गौर, सुरभि डोगरा एवं बिदिशा बिस्वास, और क्षेत्रीय आयुर्वेदिक अनुसंधान संस्थान (आरएआरआई) ग्वालियर के शोधकर्ता डॉ दुर्गेश कुमार द्विवेदी भी अध्ययन में शामिल हैं।

यह अध्ययन शोध पत्रिका जर्नल ऑफ बायोलॉजिकल कैमिस्ट्री में प्रकाशित किया गया है। (इंडिया साइंस वायर)

Topics: Design, synthesis, biological, evaluation, molecule, oral agonist, glucagon-like-peptide-1 receptor, diabetes 

नया सुरक्षित एंटी-कोविड-19 संक्रमण कीटाणुनाशक

covid 19

कोविड-19 संक्रमण-रोधी नया सुरक्षित डिसइन्फेक्टेंट

New safe anti-covid-19 infection disinfectant

प्लाज्मा-आधारित रोगाणुनाशक किया है भारतीय शोधकर्ताओं ने

नई दिल्ली, 20 अप्रैल (इंडिया साइंस वायर): कोविड-19 महामारी ने बेहतर रोगाणुनाशकों की तत्काल आवश्यकता पैदा कर दी है, जो संक्रामक रोगों के प्रसार को रोक सकें। एक नयेअध्ययन में भारतीय शोधकर्ताओं ने शीत वायुमंडलीय दबाव प्लाज्मा (सीएपी) की मदद से प्लाज्मा-आधारित रोगाणुनाशक विकसित किया है, जो कोविड-19 और इसके जैसे अन्य रोगों का संक्रमण रोकने में हरित विकल्प के रूप में कार्य कर सकता है।

हरित कीटाणुनाशक (Green disinfectants)

भारतीय शोधकर्ताओं की यह खोज महत्वपूर्ण है, क्योंकि अधिकांश रोगाणुनाशकों में ऐसे रसायनों का उपयोग होता है, जो पर्यावरण को हानि पहुँचाने के लिए जाने जाते हैं। इसी कारण, दुनियाभर के शोधकर्ता रोगजनक सूक्ष्मजीवों के प्रसार को नियंत्रित करने के लिए हरित विकल्पों की खोज में जुटे हुए हैं।

विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय से सम्बद्ध विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी उच्च अध्ययन संस्थान (आईएएसएसटी), गुवाहाटी के वैज्ञानिक – डॉ कामची शंकरनारायणन, डॉ मोजीबुर आर. खान, और डॉ एच. बाइलुंग की टीम ने दिखाया है कि शीत वायुमंडलीय दबाव (सीएपी) द्वारा उत्पन्न प्लाज्मा में सीओवी-2 स्पाइक प्रोटीन को निष्क्रिय करने की क्षमता है, जो वायरल संक्रमण बढ़ाने के लिए मानव एसीई-2 रिसेप्टर से बंध जाता है।

शीत वायुमंडलीय दबाव प्लाज्मा क्या है? | What is Cold Atmospheric Pressure Plasma?

प्लाज्मा; पदार्थ की चौथी अवस्था है, जो ब्रह्मांड का अधिकांश भाग बनाती है। इसे प्रयोगशाला में नियंत्रित परिस्थितियों में उत्पादित होने पर शीत वायुमंडलीय दबाव प्लाज्मा (सीएपी) कहा जाता है। वैज्ञानिकों ने एक उच्च वोल्टेज विद्युत क्षेत्र के माध्यम से हीलियम, ऑर्गन जैसी प्लाज्मा बनाने वाली गैसों को प्रवाहित किया, जिसके कारण आयनों के मिश्रण के साथ एक स्थिर प्लाज्मा, और अभिक्रिया कक्ष के भीतर सीएपी की एक गुलाबी चमक का उत्सर्जन करने वाले इलेक्ट्रॉनों का निर्माण होता है।

यह अध्ययन आरएससी (रॉयल सोसाइटी ऑफ केमिस्ट्री) एडवांसेस के अंतरराष्ट्रीय जर्नल में हाल ही में प्रकाशित किया गया है।

शोधकर्ताओं का कहना है  कि सीएपी उपचार के दो मिनट के भीतर प्लाज्मा में उत्पन्न अल्पकालिक उच्च प्रतिक्रियाशील ऑक्सीजन एवं नाइट्रोजन प्रजातियों (आरओएस/ आरएनएस) के कारण SARS-CoV-2 स्पाइक प्रोटीन पूरी तरह से निष्क्रिय हो जाता है। आरटी-पीसीआर विश्लेषण से पता चलता है कि सीएपी सार्स-सीओवी-2 वायरस के आरएनए को निष्क्रिय कर सकता है।

शोधकर्ताओं का कहना है कि सीएपी, एक प्लाज्मा-आधारित रोगजनक सूक्ष्मजीवों को नष्ट करने की विधि है, जो पर्यावरण की दृष्टि से खतरनाक रासायन-आधारित परिशोधन विधियों का एक बेहतर विकल्प है। शीत वायुमंडलीय प्लाज्मा (सीएपी) पर्यावरण की दृष्टि से सुरक्षित है, क्योंकि प्लाज्मा उपचार द्वारा पूरी परिशोधन प्रक्रिया के दौरान, कोई रासायनिक अपशिष्ट उत्पन्न नहीं होता।

यह अध्ययन आईएएसएसटी की कोविड-19 परीक्षण और अनुसंधान सुविधा केंद्र में किया गया है। इस संस्थान के निदेशक प्रोफेसर आशीष के. मुखर्जी के अनुसार अब तक 1.54 लाख से अधिक परीक्षण इस सुविधा केंद्र में हो चुके हैं।

इस अध्ययन के प्रमुख शोधकर्ता डॉ कामची शंकरनारायणन, और डॉ एच. बाइलुंग ने कहा कि विभिन्न जीवाणु या कवक संक्रमण को दूर करने के लिए इस विसंक्रमण विधि को आगे बढ़ाया जा सकता है।

(इंडिया साइंस वायर)

Topics: Plasma, Green disinfectants, Infectious diseases, COVID-19, Cold Atmospheric Pressure, Pandemic, Decontaminants, IASST, DST, ACE2 receptor

रेल मार्गों पर जलवायु परिवर्तन का क्या प्रभाव होता है? बताएगा भारत में बना यह यंत्र

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रेल मार्गों पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव का अध्ययन

Studying the impact of climate change on railroads

नई दिल्ली, 20 अप्रैल 2022: रेलमार्गों की आधारभूत संरचना (infrastructure of railways) में ट्रैकबेड बिछाने के लिए सघन मिट्टी से बने तटबंध (Heavy clay embankment for laying trackbed) का उपयोग होता है। यह तटबंध रेलगाड़ियों की आवाजाही के दौरान रेल पटरी से आने वाले भार को संभालने में भूमिका निभाता है। पारंपरिक तटबंध निर्माण प्रक्रिया अपनाये जाने से रेलों के चलने से उत्पन्न भार संभालने के लिए जानकारी तो मिल जाती है, पर मौसमी बदलावों के कारण तटबंध पर पड़ने वाले असर (Impacts on the embankment due to seasonal changes) का पता नहीं चल पाता है।

आईआईटी मंडी और डरहम यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने संयुक्त रूप से किया है शोध

भारतीय शोधकर्ताओं सहित अंतरराष्ट्रीय अध्ययनकर्ताओं की एक टीम ने जलवायु परिवर्तन से रेलमार्गों पर होने वाले प्रतिकूल प्रभावों के अध्ययन के लिए एक नये यंत्र का निर्माण (Creation of a new instrument to study the adverse effects of climate change on railroads) किया है। इस यंत्र का निर्माण इस तरीके से किया गया है, जिससे यह रेलमार्गों को बिछाने में प्रयोग होने वाली सघन मिट्टी के अंदर सक्शन को नाप सके, और यह कार्य मिट्टी के सैंपल पर प्रयोगशाला में उपयोग होने वाले साइक्लिक त्रीआक्सीअल यंत्र के साथ संपन्न किया जा सके।

यह अध्ययन भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी), मंडी और डरहम यूनिवर्सिटी, यूनाइटेड किंगडम के शोधकर्ताओं द्वारा संयुक्त रूप से किया गया है।

शोधकर्ताओं का क्या कहना है?

शोधकर्ताओं का कहना है कि रेलमार्गों की आधारभूत संरचना में ट्रैकबेड बिछाने के लिए सघन मिट्टी से बने तटबंध की मिट्टी में बारिश एवं सूखे के बदलावों की वजह से पानी की मात्रा बदलती रहती है, जिसकी वजह से सक्शन भी बदलता है और मिट्टी की क्षमता पर भी असर पड़ता है।

मिट्टी में बारिश एवं सूखे जैसे मौसमी बदलाव जैसे पहलुओं का पारंपरिक निर्माण प्रक्रिया में ज्यादातर उल्लेख नहीं मिलता है, लेकिन बदलती जलवायु के कारण बारिश और सूखे की प्राकृतिक गतिविधियां गंभीर होती जा रही है, जिसके फलस्वरूप यातायात संरचना के सुचारु कार्यान्यवन के सामने नई चुनौतियाँ उत्पन्न हो गई हैं। इसीलिए, सुचारु रेल यातायात सुनिश्चित करने में इस अध्ययन की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है।

यह अध्ययन आईआईटी, मंडी से जुड़े प्रमुख शोधकर्ता डॉ आशुतोष कुमार और यूनिवर्सिटी ऑफ पोर्ट्समाउथ, यूनाइटेड किंगडम के शोधकर्ता डॉ अर्श अज़ीज़ी एवं डरहम यूनिवर्सिटी, यूनाइटेड किंगडम के इंजीनियरिंग विभाग में कार्यरत प्रोफेसर डेविड ज्यॉफ्री टोल द्वारा किया गया है।

अमेरिकन सोसाइटी ऑफ सिविल इंजीनियरिंग की शोध पत्रिका जर्नल ऑफ जिओटेक्निकल ऐंड जिओएन्वॉयर्नमेंटल इंजीनियरिंग में इस अध्ययन को प्रकाशित किया गया है।

रेलमार्ग बिछाने के लिए कैसी मिट्टी का उपयोग किया जाता है?

सघन मिट्टी का उपयोग रेलमार्ग बिछाने के दौरान तटबंध बनाने में किया जाता है, जो प्रायः असंतृप्त अवस्था में पायी जाती है। वातावरण में होने वाले बदलावों की वजह से इसकी क्षमता कमजोर हो जाती है। बारिश के मौसम में पानी के मिट्टी में प्रवेश करने, एवं सूखे के दौरान मिट्टी से पानी के क्षरण होने की वजह से ऐसा होता है। ऐसी स्थिति में, रेलवे ट्रैक पर निरंतर गुजरने वाले रेल भार से असंतृप्त सघन मिटटी की क्षमता को घटाने वाली प्रक्रिया तेज हो जाती है, जिससे रेल-पथ का प्रदर्शन प्रभावित होता है।

शोधकर्ताओं ने वातावरणीय बदलाव और रेल के गुजरने वाले भार का असंतृप्त सघन मिट्टी की क्षमता पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभावों का अध्ययन किया है। इसी आधार पर साइक्लिक त्रिएक्सियल यंत्र, जो रेल भार से उभरी विकृतियों के मापन के लिए उपयोग होता है, में कुछ जरूरी बदलाव किये गए हैं, ताकि मिट्टी में सक्शन को भी मापा जा सके। इस तरह, वातावरण के प्रतिकूल प्रभावों के असर को रेलमार्गों की आधारभूत सरंचना की डिजाइन प्रक्रिया में सम्मिलित किया जा सकता है।

इस अध्ययन में, मिट्टी के नमूने 650 किलोमीटर लम्बी रेलवे कोल लाइन से प्राप्त किये गए हैं, जो कि लगभग 40 कोयले की खदानों को रिचर्ड्स-बे कोल टर्मिनल, साउथ अफ्रीका से जोड़ती है।

डॉ आशुतोष कुमार कहते हैं कि

“असंतृप्त सघन मिट्टी, जिसका उपयोग रेलवे तटबंध बनाने में किया जाता है, की क्षमता पर रेल भारों के साथ-साथ एन्वॉयरन्मेंटल लोडिंग के प्रभाव को समझने में यह अध्ययन उपयोगी है। इसके लिए जो यंत्र बनाया गया है, उसमें एक उच्च क्षमता वाले टेंसिओमेटेर, जिसको डरहम यूनिवर्सिटी ने निर्मित किया है, का उपयोग किया गया है, जिसका काम सक्शन को मापना है। भार के कारण मिट्टी के नमूनों में होने वाली विकृतियों को मापने के लिए अन्य यंत्र भी लगाए गए हैं। प्रयोगशाला में शोध को व्यावहारिक रूप देने के लिए तीन अलग-अलग प्रारूप  तैयार किये गये थे।”

शोध से यह स्पष्ट हुआ कि असंतृप्त सघन मिट्टी की क्षमता में गिरावट (Decreased capacity of unsaturated compacted soil) और इसका विघटन मिट्टी पर हुए मौसमी बदलावों से गहन संबंध रखता है।

शोधकर्ताओं द्वारा विकसित किए गये यंत्र का उपयोग प्रयोगशाला एवं वास्तविक स्थिति में किसी भी तरह के मिट्टी के नमूने पर शोध करने के लिए किया जा सकता है।

इस शोध पर आधारित निर्माण प्रणाली सतत् एवं टिकाऊ परिवहन की आधारभूत संरचना विकसित करने के लिए जरूरी जानकारी प्रदान कर सकती है, जो कि जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों का सामना करने की जरूरी समझ प्रदान करती है। 

(इंडिया साइंस वायर)

Web title : IIT-Mandi Rail Track Maintenance

Topics: IIT Mandi, Rail Track Maintenance, climate change, railway embankments, Ministry of Railways

चीन इस वर्ष इस साल अंतरिक्ष स्टेशन का निर्माण पूरा करेगा

space

China will complete the construction of the space station this year

नई दिल्ली, 18 अप्रैल 2022. अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी (space technology) में लंबी छलांग लगाते हुए चीन इस वर्ष के अंत तक अंतरिक्ष स्टेशन का निर्माण पूरा करेगा।

चीन राज्य नियंत्रित मीडिया CMG Hindi की फेसबुक पोस्ट के मुताबिक चीनी राज्य परिषद के प्रेस दफ्तर से मिली जानकारी के मुताबिक 2022 में चीन अंतरिक्ष स्टेशन के निर्माण को पूरा करेगा।

CMG Hindi ने चीनी मानवयुक्त अंतरिक्ष कार्यक्रम कार्यालय के प्रमुख हाओ छ्वन के हवाले से इस पोस्ट में बताया है कि चीनी अंतरिक्ष स्टेशन का निर्माण कुंजीभूत तकनीक परीक्षण और निर्माण दो चरणों में किया जाएगा। अहम तकनीक परीक्षण के चरण में अंतरिक्ष स्टेशन के निर्माण और प्रचलन की संबंधित अहम तकनीक की व्यापक जानकारी हासिल करना प्रमुख मिशन है। 2020 से चीन ने लांग मार्च-5बी वाहन रॉकेट को पहली बार लांच किया। फिर अंतरिक्ष स्टेशन के थ्येन ह मुख्य मॉड्यूल, शनचो-12 और शनचो-13 मानव अंतरिक्ष यान थ्येनचो-2 और थ्येनचो-3 मालवाहक अंतरिक्ष यान की उड़ानें पूरी हुईं। इन सभी ने अंतरिक्ष स्टेशन के निर्माण के लिए कुंजीभूत तकनीक परीक्षण के लक्ष्य को पूरा किया है।

पूरे वर्ष चीन अंतरिक्ष में छह उड़ानें पूरी करेगा

हाओ छ्वन ने कहा कि इस साल चीन अंतरिक्ष स्टेशन के निर्माण को अच्छी तरह पूरा करेगा। पूरे साल चीन छह उड़ानें पूरी करेगा, जिनमें थ्येनचो-4 और थ्येनचो-5 मालवाहक अंतरिक्ष यान, शनचो-14 और शनचो-15 मानव अंतरिक्ष यान, वनथ्येन प्रायोगिक केबिन और मंगथ्येन प्रायोगिक केबिन का लांच शामिल है।

चीनी अंतरिक्ष स्टेशन विदेशी अंतरिक्ष यात्रियों का स्वागत करता है

एक अन्य फेसबुक पोस्ट में बताया गया है कि अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष सहयोग के प्रति चीन के रवैये के बारे में सवालों के जवाब में चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता वांग वनपिन ने 18 अप्रैल को आयोजित एक नियमित प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि अंतर्राष्ट्रीय सहयोग अंतरिक्ष विकास की प्रवृत्ति है, और चीनी अंतरिक्ष स्टेशन (chinese space station) विदेशी अंतरिक्ष यात्रियों का स्वागत करता है।

उन्होंने कहा कि चीन की मानवयुक्त अंतरिक्ष परियोजना (manned space project) के शुभारंभ के बाद से उसने शांतिपूर्ण उपयोग, समानता और पारस्परिक लाभ, और समान विकास के सिद्धांतों का पालन किया है, फ्रांस, जर्मनी, इटली, रूस, पाकिस्तान, अंतरिक्ष मामलों पर संयुक्त राष्ट्र कार्यालय (United Nations Office on Space Affairs), यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी और अन्य अंतरिक्ष एजेंसियों व संगठनों के साथ सहयोग समझौतों पर हस्ताक्षर किए हैं, सहयोग परियोजनाओं के विभिन्न रूपों को लागू किया है, और उपयोगी सहयोग परिणाम प्राप्त किए हैं।

प्रवक्ता वांग वनपिन ने कहा कि चीन वर्तमान में अंतरिक्ष मामलों पर संयुक्त राष्ट्र कार्यालय के सहयोग से चीनी अंतरिक्ष स्टेशन के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग परियोजनाओं के पहले बैच के कार्यान्वयन का आयोजन कर रहा है, और उम्मीद है कि इस साल के अंत में प्रायोगिक अनुसंधान किया जाएगा।

ब्रेकिंग : दिन भर की टॉप हेडलाइंस। आज की बड़ी खबरें | 17 अप्रैल 2022

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कांग्रेस ने टीआरएस के साथ चुनावी गठबंधन से इनकार किया

कांग्रेस ने स्पष्ट कर दिया है कि वह तेलंगाना में तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) के साथ गठबंधन नहीं करेगी।

महात्मा गांधी के स्वच्छ भारत के सपने को पूरा करने के लिए पंचायतों का आह्वान

केन्द्र सरकार ने महात्मा गांधी के साफ और स्वच्छ भारत के सपने को पूरा करने के लिए पंचायतों का आह्वान किया है। पंचायती राज मंत्रालय ने लोगों से स्वच्छता अभियान को राष्ट्र के प्रति जिम्मेदारी की भावना के साथ आगे बढ़ाने की बात कही है। मंत्रालय का मानना है कि स्वच्छता को लेकर जागरूकता बहुत महत्वपूर्ण है और इसे समुदायों के बीच परिपूर्ण रूप में जारी रखा जाना चाहिए।

एक स्टेशन एक उत्पाद योजना : 1000 रेलवे स्टेशन जुड़ेंगे, डाकघरों पर मिलेंगे रेल टिकट

अब देश भर के डाकघरों से रेल टिकट प्राप्त किया जा सकता है। इसके अलावा एक स्टेशन एक उत्पाद योजना का विस्तार किया जा रहा है जिससे कि स्टेशनों के माध्यम से स्थानीय स्तर के उत्पादों को बाजार में उपलब्ध कराया जा सके। इस योजना के तहत 1000 स्टेशनों को शामिल किया जाएगा।

मुसलमानों की संपत्ति पर बुलडोजर चलाने के खिलाफ जमीअत उलमा-ए-हिन्द सर्वोच्च न्यायालय पहुंची

देश के मौजूदा हालात पर चिंता व्यक्त करते हुए जमीअत उलमा-ए-हिंद ने कई जगहों पर बुल्डोजर की मदद से घरों को गिराए जाने के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटऱटाया है। जमीयत के मुताबिक, भाजपा शासन वाले राज्यों में अपराध की रोकथाम की आड़ में अल्पसंख्यकों विशेषकर मुसलमानों को तबाह करने के उद्देश्य से बुलडोजर की खतरनाक राजनीति शुरू हुई है।

कोरोना से मौत का सही आंकड़ा छुपा रही मोदी सरकार : राहुल गांधी

कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने केंद्र सरकार पर आरोप लगाया है कि वह कोरोना संक्रमण के कारण जान गंवाने वाले लोगों का सही आंकड़ा छुपा रही है। उन्होंने साथ ही दावा किया कि देश में कोरोना संक्रमण की चपेट में आकर 40 लाख लोगों की मौत हुई है।

गृह युद्ध की ओर बढ़ रहा पाकिस्तान : पीटीआई

पाकिस्तान तहरीक ए इंसाफ (पीटीआई) के नेता एवं इमरान खान की सरकार में केंद्रीय मंत्री रहे फवाद चौधरी ने मौजूदा हालात को देखते हुये देश के गृह युद्ध की ओर बढ़ने की आशंका जाहिर की है।

इंडोनेशिया में भूकंप के झटके, सुनामी की चेतावनी नहीं

इंडोनेशिया के पूर्वी प्रांत पापुआ में रविवार को 5.8 तीव्रता का भूकंप आया, हालांकि सुनामी की कोई चेतावनी जारी नहीं की गई है।

ब्रिटेन के प्रधानमंत्री जॉनसन 21 अप्रैल को भारत का दौरा करेंगे

ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन 21-22 अप्रैल तक भारत के आधिकारिक दौरे पर रहेंगे। विदेश मंत्रालय ने रविवार को कहा कि प्रधानमंत्री के रूप में यह उनकी पहली भारत यात्रा होगी।

मेहुली और अनीश ने राष्ट्रीय निशानेबाजी ट्रायल में स्वर्ण पदक जीता

पश्चिम बंगाल की मेहुली घोष ने रविवार को डॉ कर्णी सिंह शूटिंग रेंज में महिलाओं की 10 मीटर एयर राइफल टी 4 प्रतियोगिता में पहला स्थान हासिल किया, जिससे राष्ट्रीय चयन ट्रायल 3 और 4 में इस प्रतियोगिता में जीत हासिल हुई।

कोविड -19 से जुड़ा खतरा, दुनिया में बेतहाशा बढ़ जाएगी मधुमेह रोगियों की संख्या : शोध

research on health

कोविड -19 के हल्के संक्रमण से भी मधुमेह का खतरा 40% तक बढ़ जाता है

हाल ही में एक शोध में पाया गया है कि मोटे लोगों में कोविड-19 संक्रमण के बाद मधुमेह होने का खतरा अधिक होता है। (A research has recently found that obese people have a higher risk of developing diabetes after a Covid-19 infection.)

Even Mild COVID-19 Infection Increases Diabetes Risk by 40%

कोविड-19 संक्रमण से मधुमेह ( Diabetes) का खतरा बढ़ जाता है और एक साल बाद भी यह बीमारी को ट्रिगर कर सकता है। SARS-CoV-2, जो वायरस कोविड-19 का कारण बनता है, के हल्के संक्रमण के बाद भी, उन लोगों की तुलना में मधुमेह विकसित होने की आशंका अधिक होती है जो कभी संक्रमित नहीं थे। इस संबंध में हाल ही में लैंसेट में हाल ही में खोज की गई थी।

अध्ययन, जिसमें लगभग 200,000 लोगों का एक विशाल समूह शामिल था, एक कोविड-19 संक्रमण के बाद मधुमेह होने की संभावना (Chances of getting diabetes after COVID-19 infection) में वृद्धि दिखाते हुए अनुसंधान की बढ़ती संख्या के अतिरिक्त था।

अध्ययन के सह-लेखक और वीए सेंट लुइस हेल्थ केयर सिस्टम, यूएसए के मुख्य शोधकर्ता ज़ियाद अल-एली ने कहा, “जब महामारी कम हो जाती है, तो हम इस महामारी की विरासत के साथ रह जाएंगे – एक विरासत पुरानी बीमारी जिसके लिए स्वास्थ्य देखभाल प्रणालियाँ तैयार नहीं हैं।”

लगभग दो लाख लोगों पर किया गया शोध

अल-एली और उनकी टीम ने संक्रमित होने के एक महीने से अधिक समय तक 180,000 से अधिक लोगों के मेडिकल रिकॉर्ड का विश्लेषण किया और उनकी तुलना गैर-संक्रमित लोगों के दो समूहों के रिकॉर्ड से की, जिनमें लगभग चार मिलियन लोग शामिल थे और जिन्होंने महामारी से पहले या उसके दौरान वीए सिस्टम का प्रयोग किया था।

विश्लेषणों से पता चला कि COVID-19 वाले लोगों में एक वर्ष तक मधुमेह विकसित होने की आशंका, उन लोगों की तुलना में जो कभी संक्रमित नहीं थे, 40% अधिक थी । विशेष रूप से, पाए गए लगभग सभी मामले टाइप 2 मधुमेह के थे।

मधुमेह क्या है?

मधुमेह एक ऐसी स्थिति की ओर ले जाता है जहां शरीर इंसुलिन के लिए प्रतिरोधी हो जाता है या पर्याप्त मात्रा में इसका उत्पादन बंद कर देता है।

इंसुलिन एक हार्मोन है जो रक्त शर्करा के स्तर को नियंत्रित करने पर गहरा प्रभाव डालता है। इस हार्मोन (एक प्रोटीन अणु) के विघटन से रक्त में शर्करा का स्तर अनिवार्य रूप से बढ़ जाता है, जो मधुमेह की पहचान है।

नवीनतम अध्ययन में यह भी पाया गया कि COVID-19 की गंभीरता के साथ मधुमेह के विकास में वृद्धि हुई।

अध्ययन के लेखकों के अनुसार, जिन रोगियों को अस्पताल में या आईसीयू में भर्ती किया गया था, उनमें मधुमेह विकसित होने का जोखिम उन लोगों की तुलना में तीन गुना अधिक था, जो कभी संक्रमित नहीं हुए थे।

उच्च बॉडी मास इंडेक्स वाले लोग, जो टाइप 2 मधुमेह के लिए भी एक जोखिम कारक है, संक्रमण के बाद इसके विकसित होने की संभावना दोगुनी होती है।

इससे पहले की रिपोर्टों ने भी SARS-CoV-2 की वास्तविक रिपोर्टों के आधार पर मधुमेह के बारे में चिंतित किया था, जो अग्नाशयी कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाते थे, जो टाइप 1 मधुमेह को प्रेरित कर सकते थे। दोनों प्रकार अलग-अलग हैं, टाइप 1 की जड़ें आनुवंशिकी में होती हैं और जीवन में जल्दी विकसित होती हैं जबकि टाइप 2 जीवनशैली के कारण होती है और धीरे-धीरे विकसित होती है। हालाँकि, टाइप 1 मधुमेह का विकास COVID-19 रोगियों में विवादास्पद बना हुआ है।

यदि देखे गए रुझान सही हैं, तो दुनिया भर में मधुमेह के निदान वाले लोगों की संख्या में भारी वृद्धि होगी, यहां तक ​​​​कि मधुमेह के जोखिम में मामूली वृद्धि के परिदृश्य में भी क्योंकि दुनिया में COVID-19 के 480 मिलियन पुष्ट मामले हैं।

हालांकि, अध्ययन में देखा गया रुझान अलग-अलग जातीयता के लोगों के लिए सही नहीं हो सकता है।

अध्ययन में वृद्ध श्वेत पुरुषों पर ध्यान केंद्रित किया गया, जिनमें से अधिकांश में उच्च रक्तचाप और अधिक वजन था। इसलिए, एक अन्य लेखक मेयरोविट्ज-काट्ज़ जी के अनुसार, उन्हें मधुमेह विकसित होने का अधिक खतरा है।

उन्होंने कहा कि बच्चों में मधुमेह के विकास का जोखिम कम है, लेकिन कुछ अन्य जातीय समूहों में अधिक है।

संदीपन तालुकदार (न्यूजक्लिक)

Anti-Tank Guided Missile HELINA : एक झटके में दुश्मन का टैंक तबाह कर सकती है भारत में बनी मिसाइल

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टैंक-रोधी गाइडेड मिसाइल ‘हेलीना’ का सफल परीक्षण

India carries out successful test firing of HELINA anti-tank missile

नई दिल्ली, 14 अप्रैल 2022: स्वदेश में ही विकसित हेलीकॉप्टर से लॉन्च की जाने वाली टैंक-रोधी गाइडेड मिसाइल ‘हेलीना’ (Indigenously developed helicopter-launched anti-tank guided missile ‘Helina’) का सोमवार को ऊंचाई वाले क्षेत्रों में सफल परीक्षण किया गया है।

क्या है एटीजीएम प्रणाली?

हेलिना यानी हेलीकॉप्टर आधारित नाग (NAG) तीसरी पीढ़ी की फायर ऐंड फॉरगेट क्लास एंटी टैंक गाइडेड मिसाइल (एटीजीएम) प्रणाली (Third Generation Fire and Forget Class Anti Tank Guided Missile (ATGM) system,) है, जो एडवांस्ड लाइट हेलीकॉप्टर (एएलएच) पर लगायी जा सकती है।

यह प्रणाली दिन-रात हर प्रकार की मौसमी परिस्थितियों में प्रभावकारी प्रहार करने में सक्षम है। यह पारंपरिक आर्मर के साथ-साथ विस्फोटक प्रतिक्रियाशील आर्मर के साथ युद्धक टैंकों को भी परास्त कर सकता है।

Features of Helina Anti-Tank Guided Missile | टैंक-रोधी गाइडेड मिसाइल हेलीना की खासियत

हेलिना मिसाइल सीधे हिट मोड के साथ-साथ टॉप अटैक मोड दोनों में लक्ष्य को भेद सकती है। हेलिना वेपन सिस्टम्स को भारतीय सेना में शामिल किया जा रहा है। ‘ध्रुवास्त्र’ नामक हेलीना हथियार प्रणाली का एक प्रकार भारतीय वायु सेना में शामिल किया जा रहा है।

‘हेलीना’ मिसाइल को एक इन्फ्रारेड इमेजिंग सीकर (आईआईआर) द्वारा निर्देशित किया जाता है, जो लॉन्च से पहले लॉक ऑन मोड में काम करता है। यह दुनिया के सबसे उन्नत टैंक-रोधी हथियारों में से एक है।

रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ), भारतीय सेना और भारतीय वायुसेना के वैज्ञानिकों की टीमों द्वारा यह परीक्षण उपयोगकर्ता प्रमाणीकरण ट्रायल्स के हिस्से के रूप में संयुक्त रूप से आयोजित किया गया था। यह परीक्षण एक उन्नत हल्के हेलीकॉप्टर (एएलएच) से किए गए थे, और मिसाइल को टैंक प्रतिकृति लक्ष्य पर सफलतापूर्वक दागा गया।

रक्षा मंत्रालय ने दी जानकारी

रक्षा मंत्रालय द्वारा जारी वक्तव्य में बताया गया है कि राजस्थान के पोखरण में किए गए प्रमाणीकरण परीक्षण, और अत्यधिक ऊंचाई पर इस मिसाइल की क्षमता प्रमाणित होने से उन्नत हल्के हेलीकॉप्टर के साथ इसे एकीकृत किए जाने का मार्ग प्रशस्त हुआ है। इन परीक्षणों को सेना के वरिष्ठ कमांडरों और डीआरडीओ के वरिष्ठ वैज्ञानिकों की मौजूदगी में किया गया है।

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने संयुक्त रूप से यह उपलब्धि हासिल करने के लिए डीआरडीओ और भारतीय सेना को बधाई दी है। रक्षा अनुसंधान एवं विकास विभाग के सचिव और डीआरडीओ के अध्यक्ष डॉ जी. सतीश रेड्डी ने कठिन परिस्थितियों में किए गए सराहनीय प्रयास के लिए टीमों को बधाई दी है।

(इंडिया साइंस वायर)

Topics: DRDO, Anti-Tank, Guided Missile, HELINA, Indigenous, High-altitude, Trials, Defence Research, DRDO, Indian Army, Indian Air Force

अब नई वैकल्पिक तकनीक से सस्ते में बनेगा धातु पाउडर

science research news in hindi

Science research news in Hindi : Developed alternative technology for making metal powder

Using 3D Printing Technology to Manufacture Three Dimensional Objects

नई दिल्ली, 12 अप्रैल 2022: त्रिविमीय (Three Dimensional) वस्तुओं के निर्माण के लिए 3डी प्रिंटिंग तकनीक का उपयोग बढ़ रहा है।

विज्ञान अनुसंधान समाचार : क्या है एडिटिव मैन्युफैक्चरिंग? क्या है एडिटिव मैन्युफैक्चरिंग का प्रमुख स्रोत?

एडिटिव मैन्युफैक्चरिंग (additive manufacturing) एक ऐसी तकनीक है, जिसे मेटल 3डी प्रिंटिंग (metal 3d printing) के रूप में जाना जाता है। 3डी प्रिंटिंग की इस तकनीक में मेटल प्रिंटिंग सामग्री की परत बनाकार वस्तुओं का निर्माण किया जाता है। एडिटिव मैन्युफैक्चरिंग की एक प्रमुख स्रोत सामग्री धातु पाउडर है, जिसे मुख्य रूप से परमाणुकरण (Atomization) तकनीक द्वारा उत्पादित किया जाता है। इस प्रविधि में पिघली धातु हवा या पानी के द्रुत प्रवाह में टूटकर पहले तरल सूक्ष्म बूंदों में रूपांतरित होती है, जो अंत में ठोस होकर पाउडर बन जाती है।

मेटल 3डी प्रिंटिंग में प्रयुक्त परमाणुकरण तकनीक की सीमा क्या है?

मेटल 3डी प्रिंटिंग में आमतौर पर उपयोग होने वाली परमाणुकरण तकनीक की एक सीमा यह है कि इससे बेहतर परिणाम नहीं मिलते, यह महंगी पड़ती है, और विभिन्न सामग्री प्रकारों के उपयोग में इसमें लचीलापन भी नहीं है।

भारतीय शोधकर्ताओं ने 3डी प्रिंटिंग में उपयोग होने वाले धातु पाउडर बनाने के लिए अब एक वैकल्पिक तकनीक की पहचान की है, जो इन समस्याओं को दूर कर सकती है।

यह अध्ययन, भारतीय विज्ञान संस्थान (आईआईएससी), बेंगलूरु के प्रमुख शोधकर्ता प्रोफेसर कौशिक विश्वनाथन के नेतृत्व में किया गया है।

शोधकर्ताओं का कहना है कि बायोमेडिकल इम्प्लांट्स के निर्माण जैसे क्षेत्रों सहित सामान्य एडिटिव मैन्युफैक्चरिंग प्रक्रियाओं में इसका व्यापक असर पड़ सकता है।

स्वार्फ क्या होता है?

मेटल ग्राइंडिंग उद्योग से निकले अपशिष्ट उत्पाद, जिसे स्वार्फ कहते हैं, को फेंक दिया जाता है। आमतौर पर ये धातु चिप्स आकार में रेशेदार, और कभी-कभी पूरी तरह गोलाकार कण जैसे होते हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार ये पिंड गोलाकार आकार लेने के लिए पिघलने की प्रक्रिया से गुजरते हैं, जिससे कुछ दिलचस्प सवाल उठते हैं, जैसे – क्या ग्राइंडिंग की गर्मी पिघलने का कारण बनती है?

शोधकर्ताओं ने दिखाया है कि ये पाउडर धातु-पिंड सतह की परत पर ऑक्सीकरण से निकली उच्च गर्मी, जो एक्ज़ोथिर्मिक प्रतिक्रिया है, के कारण पिघलने से बनते हैं। उन्होंने बड़े पैमाने पर गोलाकार कण युक्त पाउडर बनाने के लिए इस प्रक्रिया को परिष्कृत किया है, जिसे एडिटिव मैन्युफैक्चरिंग में स्टॉक सामग्री के रूप में उपयोग करने के लिए संसाधित किया जाता है। इस अध्ययन से पता चला है कि ये कण धातु एडिटिव मैन्युफैक्चरिंग में कमर्शियल गैस से विखंडित पाउडर के समान ही कार्य करते हैं।

आईआईएससी के सेंटर फॉर प्रोडक्ट डिजाइन ऐंड मैन्युफैक्चरिंग में पीएचडी शोधार्थी और अध्ययनकर्ताओं में शामिल प्रीति रंजन पांडा कहती हैं,

“हमारे पास धातु पाउडर बनाने के लिए एक वैकल्पिक, अधिक किफायती, और स्वाभाविक रूप से बड़े पैमाने पर उपयोग करने योग्य पद्धति है, जो अंततः पाउडर की गुणवत्ता बनाए रखने में सक्षम है।”

आईआईएससी के मैकेनिकल इंजीनियरिंग विभाग में पीएचडी शोधार्थी हरीश सिंह धामी कहते हैं,

“एडिटिव मैन्युफैक्चरिंग प्रक्रिया की लागत कम करने से (किफायती पाउडर के माध्यम से) बायोमेडिकल इम्प्लांट के निर्माण जैसी स्थितियों में सामग्री की सीमा को विस्तारित किया जा सकता है। इससे बायोमेडिकल इम्प्लांट सस्ता और अधिक सुलभ हो सकता है।”

शोधकर्ताओं का कहना है कि घर्षण का उपयोग करके बने धातु पाउडर का अन्य अनुप्रयोगों, जैसे – विमान के इंजन में भी उपयोग हो सकता है, जहाँ उच्च स्तर की विशिष्टता एवं परिष्कार की आवश्यकता होती है।

(इंडिया साइंस वायर)

Notes : What is swarf? What is swarf used for?

Swarf, also known as chips or by other process-specific names, are pieces of metal, wood, or plastic that are the debris or waste resulting from machining, woodworking, or similar subtractive manufacturing processes. (Wikipedia)

Topics: Low-cost Technique, Metal powder, 3D printing, Additive manufacturing, Atomisation, Indian Institute of Science, IISc, biomedical implants.

जानिए क्या है डीप ओशन मिशन, अर्थव्यवस्था में कैसे करेगा योगदान

Water

डीप ओशन मिशन : समुद्र की गहराई में छिपे हैं एक नई अर्थव्यवस्था के सूत्र

नई दिल्ली, 08 अप्रैल 2022: भारतीय समुद्री सीमा में गहरे समुद्र का अन्वेषण करने के लिए कुछ समय पूर्व ‘डीप ओशन मिशन’ (Deep Ocean Mission in Hindi ) शुरू किया गया है। ‘डीप ओशन मिशन’ के उद्देश्यों (Objectives of ‘Deep Ocean Mission’) में गहरे समुद्र से संबंधित स्थितियों, जीवन अनुकूल अणुओं, तथा जैविक संघटकों की रचना संबंधी अध्ययन शामिल है, जो पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति पर प्रकाश डालने का प्रयास करेगा।

केंद्रीय राज्य मंत्री डॉ जितेंद्र सिंह ने संसद में दी जानकारी

केंद्रीय राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) विज्ञान और प्रौद्योगिकी; राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) पृथ्वी विज्ञान; राज्य मंत्री पीएमओ, कार्मिक, लोक शिकायत, पेंशन, परमाणु ऊर्जा और अंतरिक्ष; डॉ जितेंद्र सिंह द्वारा यह जानकारी बृहस्पतिवार को संसद में प्रदान की गई है।

गहरे समुद्र में छिपे रहस्यों को उजागर करेगा डीप ओशन मिशन

पृथ्वी का 70 प्रतिशत भाग जल से घिरा है, जिसमें विभिन्न प्रकार के समुद्री जीव-जंतु पाये जाते है। गहरे समुद्र के लगभग 95.8% भाग मनुष्य के लिए आज भी एक रहस्य हैं। गहरे समुद्र में छिपे इन रहस्यों (secrets hidden in the deep sea) को उजागर करने के लिए ‘डीप ओशन मिशन’ शुरू किया गया है। ‘डीप ओशन मिशन’ को आरंभ में पाँच वर्ष के लिए मंजूरी मिली है। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संगठनों के सहयोग से किये जा रहे इस अध्ययन के समन्वय की जिम्मेदारी पृथ्‍वी विज्ञान मंत्रालय को सौंपी गई है।

‘डीप ओशन मिशन’ का मुख्य लक्ष्य समुद्री संसाधनों को चिह्नित कर ब्लू इकोनॉमी को गति प्रदान करना है।

केंद्रीय मंत्री ने बताया कि गहरे समुद्र में बायोफूलिंग (Biofouling – जैविक दूषण) तथा जीवन की उत्पत्ति संबंधी अध्ययन के लिए पाँच वर्ष की अवधि के लिए 58.77 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं। जैविक दूषण; सूक्ष्मजीवों, पौधों, शैवाल, या सूक्ष्मजीवों के जमाव को कहते हैं। जलस्रोतों में ऐसी स्थिति का एक उदाहरण जहाजों और पनडुब्बी पतवारों पर जैविक पदार्थों का जमाव है।

डीप ओशन मिशन के प्रमुख उद्देश्य क्या हैं? | What are the main objectives of Deep Ocean Mission?

इस मिशन के छह प्रमुख उद्देश्य हैं। इनमें गहरे समुद्र में खनन (deep sea mining) और मानव युक्त पनडुब्बी के लिए प्रौद्योगिकियों का विकास, महासागर जलवायु परिवर्तन परामर्श सेवाओं का विकास, गहरे समुद्र में जैव विविधता की खोज (Exploring Biodiversity in the Deep Sea) एवं संरक्षण के लिए तकनीकी नवाचार, गहरे समुद्र में सर्वेक्षण व अन्वेषण, समुद्र से ऊर्जा एवं ताजा पानी प्राप्त करना, और समुद्री जीव-विज्ञान के लिए उन्नत समुद्री स्टेशन विकास शामिल है।

समुद्र में छह हजार मीटर नीचे कई प्रकार के खनिज पाए जाते हैं। इन खनिजों के बारे में अध्ययन नहीं हुआ है। इस मिशन के तहत इन खनिजों के बारे में अध्ययन एवं सर्वेक्षण का काम किया जाएगा, और इसके अलावा जलवायु परिवर्तन एवं समुद्र के जलस्तर के बढ़ने सहित गहरे समुद्र में होने वाले परिवर्तनों के बारे में भी अध्ययन किया जाएगा।

(इंडिया साइंस वायर)

Topics: Deep Ocean Mission, MoES, Origin of Life, Biofouling, microorganisms, plants, algae

ब्रेकिंग : आज सुबह की टॉप हेडलाइंस। आज की बड़ी खबरें | 8 अप्रैल 2022

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नवरात्र में माँस की दुकानें बंद करने का आदेश : दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग ने निगमों के मेयर व निगमायुक्त को भेजा नोटिस

 नवरात्रि पर दिल्ली में माँस पर पाबन्दियों पर दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग ने तीनों नगर निगमों के मेयर्स और एमसीडी कमिश्नर को नोटिस भेजा दिया है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक इस नोटिस में एमसीडी मेयर और एमसीडी कमिश्नर से पूछा गया है कि किन नियमों के तहत नवरात्रों के दौरान मीट की दुकानों पर बैन लगाने के आदेश/निर्देश जारी किए हैं।

पीएमएलए मामले में उमर अब्दुल्ला से ईडी ने की पूछताछ

 प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने कल जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला से जम्मू-कश्मीर बैंक द्वारा ऋण स्वीकृत करने में कथित अनियमितताओं से संबंधित धनशोधन रोकथाम मामले में पूछताछ की।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक नेशनल कॉन्फ्रेंस ने उमर अब्दुल्ला से प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) द्वारा पूछताछ के लिए तलब किए जाने के बाद केंद्र पर निशाना साधा है।

विश्व स्वास्थ्य दिवस : लोकसभा अध्यक्ष, केंद्रीय मंत्रियों ने लाल किले पर किया योग

विश्व स्वास्थ्य दिवस के मौके पर लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला, केंद्रीय मंत्री सर्बानंद सोनोवाल, मीनाक्षी लेखी, जी किशन रेड्डी और भूपेंद्र यादव ने गुरुवार को लाल किले में एक कार्यक्रम में योग के महत्व को बताया और आसन भी किए।

बजट सत्र का समापन – लोक सभा में 129 प्रतिशत हुआ कामकाज

संसद के बजट सत्र का समय पूर्व समापन हो गया है। लोक सभा अध्यक्ष ओम बिरला ने गुरुवार को अनिश्चितकाल के लिए लोक सभा की कार्यवाही स्थगित कर दी। जैसे ही गुरुवार को संसद अनिश्चित काल के लिए स्थगित की गई, कांग्रेस ने आरोप लगाया कि सरकार बजट सत्र के दौरान मूल्य वृद्धि, किसानों और बेरोजगारी के मुद्दों पर बहस से भाग गई।

मद्रास हाईकोर्ट ने सरकारी स्कूली छात्रों के लिए 7.5 प्रतिशत आरक्षण को बरकरार रखा, स्टालिन ने निर्णय को बताया ऐतिहासिक

मद्रास उच्च न्यायालय ने तमिलनाडु सरकार के उस कानून को बरकरार रखा, जिसमें मेडिकल कॉलेज में दाखिले में सरकारी स्कूलों के छात्रों के लिए 7.5 फीसदी सीटें आरक्षित की गई थीं।

कांग्रेस ने विवादित बयान देने पर कर्नाटक के गृह मंत्री को गिरफ्तार करने की मांग की

कर्नाटक कांग्रेस ने शिकायत दर्ज कराते हुए कहा कि राज्य के गृह मंत्री अरागा जनानेंद्र और भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव सी.टी. रवि को बेंगलुरु में एक युवक की हत्या मामले में भड़काऊ बयान देने के आरोप में गिरफ्तार किया जाए।

ऑस्ट्रिया चार रूसी राजनयिकों को निष्कासित करेगा

ऑस्ट्रिया ने चार रूसी राजनयिकों को गलत गतिविधियों के चलते उन्हें निष्कासित करने के अपने फैसले की घोषणा की।

अविश्वास प्रस्ताव को खारिज करने का फैसला गलत था : पाक सुप्रीम कोर्ट

पाकिस्तान के प्रधान न्यायाधीश (सीजेपी) उमर अता बंदियाल ने गुरुवार को कहा कि यह स्पष्ट है कि नेशनल असेंबली के डिप्टी स्पीकर कासिम खान सूरी का तीन अप्रैल का फैसला, जिसने प्रधानमंत्री इमरान खान के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव को खारिज कर दिया था, गलत था।

बीमा कंपनियों की सुरक्षा चिंता के बाद एयर इंडिया ने मास्को के लिए उड़ान रद्द की

द इंडियन एक्सप्रेस ने एक सूत्र के हवाले से खबर दी है कि, टाटा समूह के स्वामित्व वाली एयरलाइन ने रूसी राजधानी के लिए उड़ानें फिर से शुरू करने के लिए भारत सरकार के हस्तक्षेप की मांग की है।

मोदी सरकार में हिंदी का प्रयोग बढ़ा : डॉ. महेंद्र नाथ पांडेय

भारी उद्योग मंत्री डॉ. महेंद्र नाथ पांडेय ने कहा है कि मोदी सरकार में सरकारी कामकाज में हिंदी का उपयोग काफी बढ़ा है। भारी उद्योग मंत्रालय में वर्ष 2021 के हिंदी पखवाड़े के पुरस्कार विजेताओं को सम्मानित करते हुए उन्होंने कहा कि बढ़ते कारोबार के साथ दक्षिण के लोग भी अब हिंदी के महत्व को समझ रहे हैं।

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