मनाएंगे दिवाली का त्यौहार लेकिन अर्थव्यवस्था, कोविड-19 और प्रदूषण की फ़िक्र बरकरार : सर्वेक्षण

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Will celebrate Diwali festival but the economy, COVID-19 and pollution continue to worry: Survey

नई दिल्ली 12 नवंबर, 2020: कोविड-19 की मार सबसे ज़्यादा झेलने वाले 10 राज्यों में हुए एक सर्वे से पता चलता है कि इस दीवाली कोरोना और वायु प्रदूषण सबसे बड़ी चिंताएं हैं।

कार्बन कॉपी द्वारा फेसबुक पर आयोजित सर्वे | Survey conducted on Facebook by Carbon Copy

फेसबुक पर हुए इस सर्वे को कोविड-19 के मामलों में शीर्ष 10 राज्यों में किया गया। यह दस राज्य थे महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु, तेलंगाना, केरल, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश और दिल्ली।

पच्चीस से साठ की उम्र के 2218 उत्तरदाताओं के सैंपल साइज़ वाले, इस सर्वे के नतीजों से पता चलता है कि वायु प्रदूषण, कोविड-19 और अर्थव्यवस्था इन दिनों सबसे ज्यादा फ़िक्र का सबब बनी हुई हैं।

सर्वे का हिस्सा बने लोगों में पुरुष और महिला समान रूप से शामिल थे।

कार्बन कॉपी द्वारा आयोजित इस सर्वे में लगभग 43% उत्तरदाताओं ने कहा कि कोविड-19 इस दिवाली सबसे बड़ी चिंता है। वहीं दूसरी सबसे बड़ी चिंता वायु प्रदूषण पायी गयी जिसे 23.2% वोट मिले। उसके बाद 19.5% वोटों के साथ अर्थव्यवस्था तीसरे नम्बर की चिंता बन कर दिखी तो 7.1% वोट पा कर नौकरियां चौथे, और 3.8% वोट के साथ किसानों का मुद्दा पांचवें स्थान पर रहा। चीन से सम्बन्धों को लेकर 3.4% लोग चिंतित दिखे इस दिवाली।

Equally worrisome is the understanding of the damage to both the economy and the environment.

सर्वे के नतीजों पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कार्बनकॉपी की प्रकाशक आरती खोसला कहती हैं,

“यह आश्चर्य की बात नहीं है कि सर्वेक्षण में शामिल सभी 10 राज्यों में महामारी पर सबसे अधिक ध्यान दिया गया है। हालांकि यह ध्यान देने योग्य है कि अर्थव्यवस्था और पर्यावरण दोनों को होने वाले नुकसान की समझ समान रूप से चिंताजनक पाई गई है।”

अपनी बात आगे रखते हुए वो कहती हैं,

“सर्वेक्षण में स्पष्ट रूप से दिखाया गया है कि उत्तरदाताओं ने वायु प्रदूषण और अर्थव्यवस्था को कोविड-19 जितने तत्काल रूप में संबोधित करने पर अधिक ध्यान देने का आह्वान किया है। सौभाग्य से, तीनों को एक साथ ठीक किया जा सकता है। बस उन उद्योगों का प्रोत्साहन और समर्थन करने की ज़रूरत है जो कम प्रदूषण करते हैं, अधिक नौकरियां जोड़ते हैं, और वन और उनके द्वारा समर्थित जैव विविधता के संरक्षण में मदद करते हैं।”

इन दस राज्यों में सिर्फ़ पश्चिम बंगाल से उत्तरदाताओं ने कहा कि सरकार कोविड-19 से निपटने के लिए पर्याप्त काम नहीं कर रही है।

बात अब वायु प्रदूषण की करें तो उत्तर प्रदेश के अलावा बाकी नौ राज्य के अधिकांश उत्तरदाता वायु प्रदूषण को दूर करने के लिए अपनी सरकारों के प्रयासों से संतुष्ट नहीं हैं। उत्तर प्रदेश से मिली प्रतिक्रिया उत्तरदाताओं की अनिश्चितता की ओर इशारा करती है।

वहीं पश्चिम बंगाल, केरल, दिल्ली और कर्नाटक से 70% से अधिक उत्तरदाताओं ने वायु प्रदूषण को इस दिवाली अपनी शीर्ष चिंता के रूप में चुना और वायु प्रदूषण से निपटने में सरकार की प्रतिक्रिया को संतोषजनक नहीं पाया। कर्नाटक में यह संख्या काफी अधिक है, यहाँ कुल उत्तरदाताओं में से 88% ने वायु प्रदूषण को अपनी शीर्ष चिंता के रूप में चुना।

सर्वेक्षण किए गए सभी 10 राज्यों में अधिकांश उत्तरदाता अर्थव्यवस्था से संबंधित समस्याओं को दूर करने के लिए अपनी सरकार के प्रयासों से संतुष्ट नहीं हैं।

पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में लगभग 75% से 88% उत्तरदाता अर्थव्यवस्था के प्रति अपनी सरकार की प्रतिक्रिया से संतुष्ट नहीं थे।

अर्थव्यवस्था और पर्यावरणीय मुद्दे के बारे में चिंताओं के एक समान स्तर पर होने से इस बात के स्पष्ट संकेत मिलते हैं कि हमारे नज़रिये में बदलाव आ रहा है।

सर्वेक्षण से यह भी पता चलता है कि भारतीय जनता में विकास के अस्थिर रूपों और वायु प्रदूषण और जलवायु संकट के साथ इसकी कड़ी के बीच की एक महत्वपूर्ण समझ है।

जिन उत्तरदाताओं ने वायु प्रदूषण को अपनी मुख्य चिंता के रूप में चुना, उनमें से 91.5% इस से भी सहमत थे कि पर्यावरण के लगातार दोहन से भारत में वायु प्रदूषण, वाटर स्ट्रेस (जल तनाव) और जलवायु परिवर्तन बढ़ रहा है। दिलचस्प बात यह है कि जिन लोगों ने चीन को अपनी मुख्य चिंता के रूप में चुना, उनमें से केवल आधे इस बात से सहमत थे।

सर्वेक्षण 27 अक्टूबर 2020 और 7 नवंबर 2020 के बीच फेसबुक के मैसेंजर ऐप के द्वारा किया गया था।

दिल्ली और अन्य शहरों ने अभी ही पटाखों पर बैन की घोषणा की है। बैन से सर्वेक्षण के अंतिम कुछ दिनों में जवाबो के पैटर्न में बदलाव नहीं हुआ, जिससे पता चलता है कि उत्तरदाताओं का यह मानने की संभावना नहीं है कि बैन की घोषणा से वायु प्रदूषण कम होगा।

Banning firecrackers will not solve the problem.

पटाखों पर बैन एक ज़िम्मेदारी भरा कदम लग सकता है लेकिन असल में यह इस बात की ओर इशारा कर रहा है कि प्रदूषण जैसे गम्भीर मुद्दे को कितने हल्के में लिया जा रहा है। पटाखों पर बैन लगा देने से समस्या का हल नहीं निकलेगा। साल भर की दिक़्क़त के लिए इस तरह जल्दबाज़ी से उठाया गया कदम हवा की गुणवत्ता में सुधार करने में मदद नहीं करेगा। असलियत यह है कि भारत में जीवाश्म ईंधन को जलाना और फसल अवशेषों का जलना वायु प्रदूषण का मुख्य कारण है। प्रदूषण को कम करने के लिए हमें स्रोत पर जाने की आवश्यकता है। पटाखे बस पहले से खराब स्थिति को बदतर बनाते हैं, लेकिन यह समस्या का मुख्य स्रोत नहीं है।

कोविड-19 महामारी के बादल अभी भी हमारे आस पास मंडरा रहे हैं और ऐसे में हवा की गुणवत्ता में सुधार की प्रतिक्रिया युद्ध स्तर पर होनी चाहिए।

नोबेल पुरस्कार विजेता के साथ मिलकर ब्रह्मांड के रहस्य उजागर करेंगे भारतीय खगोलविद्

Indian astronomer will unveil the secrets of the universe together with Nobel Prize winner

Indian astronomer will unveil the secrets of the universe together with Nobel Prize winner

नई दिल्ली, 11 नवंबर: ब्रह्मांड के रहस्यों को उजागर करने के लिए असीमित अंतरिक्ष में झांकने के उद्देश्य से अमेरिका के हवाई द्वीप के मोनाकिया में तीस मीटर का विशालकाय टेलीस्कोप लगाया जा रहा है। इस अंतरराष्ट्रीय परियोजना में टेलीस्कोप से जुड़े उपकरणों के संबंध में भौतिक विज्ञान के वर्ष 2020 के नोबेल पुरस्कार विजेता प्रोफेसर एंड्रिया गेज भारतीय खगोलविदों के साथ सक्रिय रूप से काम कर रहे हैं।

हमारी आकाश गंगा के केन्द्र में स्थित एक विशालकाय ठोस वस्तु का पता लगाने के लिए प्रोफेसर गेज को प्रोफेसर रोजर पेनरोस और प्रोफेसर रिनहार्ड गेंजेल के साथ संयुक्त रूप से यह पुरस्कार दिया गया है। प्रोफेसर गेज ने थर्टी मीटर टेलीस्कोप (टीएमटी) परियोजना में उपयोग होने वाले बैक ऐंड उपकरणों और परियोजना की वैज्ञानिक संभावनाओं से जुड़े तकनीकी पहलुओं के विकास में अहम भूमिका निभायी है। 

भारतीय खगोल भौतिकी संस्थान (Indian Institute of Astrophysics) की निदेशक डॉ.अन्नपूर्णी सुब्रमण्यम और आर्यभट्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट ऑफ ऑब्जर्वेशन साइंसेज के वैज्ञानिक डॉ. शशिभूषण पांडे जैसे कई भारतीय खगोलविदों के साथ-साथ कई अन्य लोगों ने प्रोफेसर गेज के साथ इस परियोजना के अनुसंधान और विकासात्मक गतिविधियों में सहयोग किया है।

टीएमटी परियोजना अंतरराष्ट्रीय साझेदारी वाली परियोजना है, जिसमें कैल टेक, कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, कनाडा, जापान, चीन और विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग और परमाणु ऊर्जा विभाग के संग भारत सहयोग कर रहा है।

तीस मीटर का यह विशालकाय टेलीस्कोप एवं इससे जुड़े साझेदार देशों और उनकी जनता को करीब लाने के साथ ही खगोल विज्ञान और भौतिकी के क्षेत्र में कई अनसुलझे प्रश्नों का उत्तर देने में महत्वपूर्ण हो सकता है। इसके लिए प्रोफेसर ऐंड्रिया गेज और भारतीय खगोलविद मिलकर काम कर रहे हैं।

Scientific utility of telescope

कई अध्ययन रिपोर्टों में टेलीस्कोप की वैज्ञानिक उपयोगिता के साथ-साथ अन्य महत्वसपूर्ण विषयों पर भी विस्तार से प्रकाश डाला गया है। इसमें हमारे सौरमंडल से संबंधित डेटा सिम्युलेटर, ऊर्जावान क्षणिक वस्तुओं, आकाशगंगाओं की सक्रिय नाभिक और दूर के गुरुत्वाकर्षण-लेंस वाली आकाशगंगाओं का अध्ययन शामिल है। इसमें हमारी आकाशगंगा के केंद्र में सुपरमैसिव कॉम्पैक्ट ऑब्जेक्ट की प्रकृति और इससे सबंधित कई अज्ञात चीजों की खोज करने के लिए कई और नए पहलुओं को समझने के लिए निकट भविष्य में आईआरआईएस/टीएमटी की क्षमता को दिखाया गया है। (इंडिया साइंस वायर)

जानिए जलीय वनस्पतियां यानी जल में उगने वाली वनस्पतियां क्या हैं

Know Your Nature

Aquatic Plants Facts | About Types of Water Plants

Know what are aquatic flora | जलीय पौधे के बारे में तथ्य | जलीय पौधों के प्रकारों के बारे में

कभी किसी जल स्रोत के किनारे (Edge of water source) खड़े होकर आस-पास नजर दौड़ाइए। सम्भव है अनुकूल परिवेश के कारण बहुत-से हरे-भरे पेड़-पौधों के दीदार हो जाएँ। एक नजर पानी के भीतर भी डाल लीजिए। यहाँ भी आपको छोटे-बड़े पौधे मिल जाएँगे। कुछ हरे-पीले छितरे हुए पत्तों वाले पौधे जल के नीचे उगते (Underwater plants) हैं जैसे हाइड्रा। कुछ फूले हुए तनों और डण्ठलों वाले पौधे जल की सतह पर तैरते हुए मिलेंगे जैसे जलकुम्भी। इसके अलावा आपके परिचित कमल, कुमुदिनी और सिंघाड़े के पौधे भी मिलेंगे जिनका आधा भाग पानी में डूबा हुआ और आधा सतह से ऊपर उठा हुआ रहता है।

Aquatic Plants – Definition Types and Importance | जलीय पौधे – परिभाषा प्रकार और महत्व

यद्यपि जल के अभाव में पेड़-पौधों का फलना-फूलना सम्भव नहीं होता है, जल की अधिकता भी इनके जीवन में कई तरह की बाधाएँ खड़ी करती है। उदाहरण के लिए जल के अन्दर की दलदली सतह पर जड़ों को मज़बूती से टिकाए रखने की समस्या होती है। जल के प्रवाह से पौधे के बह जाने का खतरा होता है। जल के सम्पर्क में तने व पत्तों के सड़ने-गलने की सम्भावना होती है। श्वसन के लिए ऑक्सीजन प्राप्त करने की समस्या तो होती ही है, इसके अतिरिक्त जलनिमग्न पौधे में वंश वृद्धि के लिए परागण (Pollination for offspring growth in waterlogged plants) सम्पन्न कराने की भी समस्या होती है।

पत्तियों का आकार | water chestnut plant in india

उथले जलाशय में उगनेवाला सिंघाड़े का पौधा आपने देखा होगा। पौधे के ऊपरी भाग की पत्तियाँ चौड़ी, गहरे हरे रंग की और जल की सतह पर फैली होती हैं। चौड़ी और हरी पत्तियाँ अधिक सूर्य प्रकाश ग्रहण करती हैं और पौधे के लिए अधिक भोजन का उत्पादन करती हैं, साथ ही पर्याप्त मात्रा में श्वसन भी करती हैं। पत्तियों के डण्ठल फूले हुए गुब्बारों जैसे होते हैं जो पौधे के ऊपरी भाग को जल की सतह पर तैराए रखते हैं। बहाव वाले पानी के भीतर चौड़ी पत्तियों की वजह से पौधे के पैर उखड़ने का खतरा बना रहता है। इससे बचने के लिए कई पौधों में दो तरह की पत्तियाँ विकसित हुई हैं। तने का जो भाग पानी में डूबा रहता है वहाँ आप देखेंगे कि पत्तियाँ हल्के रंग की, छितरी हुई और रेशेनुमा या रिबिननुमा होती हैं। ये पत्तियाँ जल के प्रवाह में रुकावट नहीं डालतीं और पौधे को एक स्थान पर बनाए रखने में सहायक होती हैं। इसका एक अच्छा उदाहरण साजेटेरिया यानी बाणपत्र है, जिसमें पानी के भीतर रिबिननुमा पत्तियाँ होती हैं और पानी के बाहर तीर के शीर्षभाग (एरोहेड) की तरह पत्तियाँ होती हैं।

जलीय वनस्पतियों का श्वसन के लिए जुगाड़ | Aquatic flora respiration

जलीय वनस्पतियों को एक और समस्या से पार पाना होता है, वह है – श्वसन के लिए जड़ों तक ऑक्सीजन को पहुँचाना। ज़मीन पर उगने वाले पेड़-पौधों की जड़ें मिट्टी के कणों के बीच खाली स्थान में फँसी हुई हवा का उपयोग श्वसन के लिए कर लेती हैं परन्तु जलमग्न अथवा दलदली इलाकों में वनस्पतियाँ इस सुविधा से वंचित रहती हैं। क्योंकि यहाँ मिट्टी के कणों के बीच के स्थान में भी जल के अणुओं का कब्ज़ा रहता है। इस समस्या से निपटने के लिए वॉटर लिली परिवार के कमल के पौधे में खोखली नलिकाओं से युक्त डण्ठल और कमलनाल विकसित हुए हैं। इनके ज़रिए पानी की सतह से वायु की आवाजाही पौधे की जड़ों तक सम्भव होती है। इसी समस्या को हल करने के लिए दलदली प्रदेश की मैंग्रोव वनस्पतियों (Mangrove flora of marshland) में साँस लेने वाली विशिष्ट प्रकार की जड़ों का तंत्र विकसित हुआ है। इन जड़ों को तकनीकी भाषा में ‘न्यूमेटोफोअर्स’ कहते हैं।

जलीय वनस्पति का भोजन निर्माण | Aquatic plant food production

जलीय वनस्पति की एक और मुसीबत भोजन उत्पादन के सम्बन्ध में होती है। पानी में भोजन उत्पादन (Food production in water) के लिए कार्बन डाईऑक्साइड उपलब्ध नहीं होती है और यदि जल में गन्दलापन हो तो प्रकाश किरणों का वहाँ पहुँचना भी मुश्किल होता है। ऐसी स्थिति में भोजन का उत्पादन करने वाली हरी पत्तियों का जलमग्न भाग पर उपस्थित होना पौधे के लिए फायदेमन्द नहीं होता है। इसी कारण से कमल तथा वॉटर लिली परिवार के अन्य पौधों में पत्तियाँ उन्हीं हिस्सों में पाई जाती हैं जो जल के बाहर होते हैं। पत्तियाँ संख्या में कम किन्तु आकार में बड़ी होती हैं। पत्तियों का बड़ा आकार अधिक सूर्य प्रकाश ग्रहण करने और अधिक भोजन उत्पादन में सहायक होता है। दक्षिण अमेरिका में पाई जाने वाली अमेज़न लिली के पत्तों (Amazon lily leaves) का फैलाव लगभग सात-आठ फीट तक होता है। पत्ते को सहारा देने के लिए मज़बूत डण्ठल (पर्ण-वृन्त) विकसित हुआ है। पत्ती को जलमग्न होने से बचाने के लिए इसके किनारे थाली के समान ऊपर उठे हुए रहते हैं। ऐसा माना जाता है कि शिरातंत्र और डण्ठल इतना मज़बूत होता है कि पत्ता एक नवजात शिशु का भार आसानी से सम्भाल लेता है।

जलीय वनस्पतियों की परागण क्रिया | How are aquatic plants pollinated? | जलीय पौधों को कैसे परागित किया जाता है?”

प्रतिकूल परिवेश के साथ तालमेल बिठाकर जीवित रहने की कला को पारिस्थितिक अनुकूलन कहते हैं। शैवाल वेलिसनेरिया स्पाइरालिस एक जलनिमग्न पौधा है और पारिस्थितिक अनुकूलन का अनूठा उदाहरण प्रस्तुत करता है। इस पौधे में जल के प्रवाह का उपयोग करके परागण सम्पन्न कराने की एक रोचक विधि विकसित हुई है। पौधे में नर और मादा पुष्प अलग-अलग विकसित होते हैं। नर पुष्प का डण्ठल तेजी से बढ़ता है और पुष्प को जल की सतह पर ले आता है। तत्पश्चात नर पुष्प स्वतंत्र होकर जल की सतह पर तैरता रहता है। उधर मादा पुष्प का डण्ठल धीरे-धीरे बढ़ता है और पुष्प को जल की सतह तक पहुँचाता है, परन्तु इसे अलग नहीं करता है। मादा पुष्प के हवा में हिलने-डुलने से जल में छोटी-छोटी तरंगें उत्पन्न होती हैं। आस-पास तैरता हुआ कोई नर पुष्प इन तरंगों पर सवार होकर मादा पुष्प के सम्पर्क में आता है और परागण क्रिया सम्पन्न होती है। इस क्रिया के पश्चात डण्ठल सर्पाकार कुण्डली के रूप में मुड़ता जाता है और मादा पुष्प को जल के अन्दर खींच लेता है। बीज जल के अन्दर विकसित होता है और नए पौधे को जन्म देता है।

आमोद कारखानिस

(देशबन्धु में प्रकाशित लेख का संपादित रूप साभार)

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ट्रम्प की हार नहीं, पर्यावरण की जीत हुई है

Donald Trump, Joe Biden

Trump is not defeated, the environment has won

तीन साल पहले जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प (US President Donald Trump) ने पेरिस समझौते (Paris Agreement) से हाथ पीछे खींचे थे तब उन्होंने महज़ एक प्रशासनिक फ़ैसला नहीं लिया था, बल्कि उन्होंने असल में पूरी दुनिया को जलवायु संकट (climate crisis) में झोंका था। ट्रंप के इस कदम का असर कुछ ऐसा हुआ कि दुनिया भर में जलवायु नीति पर काम करने वालों में हताशा, और मायूसी ने घर कर लिया। लेकिन तीन साल बाद, डोनाल्ड ट्रम्प की हार (Defeat of donald trump) के साथ ही आज उन सभी में जीत की ख़ुशी है। और ये ख़ुशी जो बाइडेन की जीत से ज़्यादा इस बात पर है कि अब बाइडेन के नेतृत्व में जलवायु परिवर्तन के ख़िलाफ़ वैश्विक जंग (Global war against climate change) में जीत सम्भावना बढ़ गयी है।

ट्रम्प के जाते ही आखिर अब परिवर्तन की हवा चल पड़ी है

बाइडेन-हैरिस जीत ने अमेरिका में संघीय जलवायु नीति (Federal climate policy in america) के एक नए युग का संकेत दिया है। दरअसल बाइडेन ने शुरू से ही स्वच्छ ऊर्जा और जलवायु-अनुकूल बुनियादी ढांचे को अपने आर्थिक सुधार और नौकरियों के कार्यक्रम के मूल स्तंभ बनाया और इस क्षेत्र में $2 ट्रिलियन के निवेश पर अपना कैंपेन चलाया।

बाइडेन ने चुनावी नतीजों के साफ़ होते ही अमेरिका के लैंडमार्क पेरिस समझौते से वापस जुड़ने के अपने वादे की प्रतिबद्धता फिर से ज़ाहिर भी की।

वैसे पेरिस समझौते से अगर एक बार को बाइडेन न भी जुड़ें तो भी उनके पास तमाम ऐसे विकल्प हैं, जिनकी मदद से वो पर्यावरण के प्रति अपनी प्रतिबद्धता साबित कर सकते हैं।

Biden can restore Obama-era environmentally friendly policies if he wishes

बाइडेन अगर चाहें तो ओबामा-युग की पर्यावरण अनुकूल नीतियां (Obama-era eco-friendly policies) बहाल कर सकते हैं, वो चाहें तो उन्हें मज़बूत भी कर सकते हैं। उन नीतियों में जीवाश्म ईंधन के उत्पादन पर लगाम लगाना और ईंधन उपयोग और उपभोग के सख्त नियम शामिल हैं।

बात विदेश नीति की करें तो बाइडेन प्रशासन के पास विदेशी नीति में जलवायु संबंधी विचारों को शामिल करने की काफी छूट होगी। बाइडेन न सिर्फ़ शिपिंग और एविएशन उत्सर्जन (Shipping and Aviation Emissions) पर लगाम कसने के लिए एक वैश्विक प्रयास का नेतृत्व कर सकते हैं, वो जीवाश्म ईंधन सब्सिडी (Fossil fuel subsidy) और आर्कटिक में अपतटीय ड्रिलिंग पर रोक लगाने के लिए भी वैश्विक प्रयास कर सकते हैं।

जो बाइडेन विश्व स्वास्थ्य संगठन से भी वापस अमेरिका के सम्बन्ध स्थापित कर सकते हैं और जलवायु परिवर्तन की दिशा में अपने कार्यों को पुनर्निर्देशित कर सकते हैं।

एक बहस के दौरान जो बाइडेन ने संकेत भी दिया था कि वो न सिर्फ़ ब्राज़ील के साथ अमेज़न वन को आग से बचाने के लिए बात कर सकते हैं, बल्कि वो यूरोपीय यूनियन के साथ भी इस मुद्दे पर चर्चा करने को तैयार हैं।

यहाँ पर बाइडेन की टीम में होने वाली नियुक्तियों की बात भी ज़रूरी है।

ऐसा माना जा रहा है कि बाइडेन की आमद यह सुनिश्चित करेगी कि बाइडेन प्रशासन अगर एक ओर जलवायु चैंपियन नियुक्त करे तो दूसरी ओर जीवाश्म ईंधन उद्योग से संबंध रखने वालों से दूरी भी बनाए। ट्रेजरी, एनर्जी, इंटीरियर, और ईपीए सभी महत्वपूर्ण चयन होंगे, लेकिन हाउसिंग एंड अर्बन डेवलपमेंट, स्टेट, डिफेंस, और लेबर सभी को जलवायु शासन पर महत्वपूर्ण भूमिका निभानी होगी। फेड द्वारा और वित्त उद्योग विनियमन में निर्धारित नीतियां निजी क्षेत्र को विशेष रूप से प्रभावित कर सकती हैं, खास तौर से इसलिए क्योंकि यह नीतियां बैंकों और जीवाश्म ईंधन कंपनियों की जवाबदेही तय करेंगी।

Joe Biden can appoint a climate leader or even form a climate council

कुछ लोगों का ऐसा मानना है कि बाइडेन एक क्लाइमेट लीडर नियुक्त कर सकते हैं या फिर एक जलवायु परिषद भी बना सकते हैं।

वैसे भी नई नीतियों को बनाने की तुलना में नीतियों को पूर्ववत करना ज़्यादा आसान है खास तौर से तब जब कम संघीय कार्यबल के साथ, जो ट्रम्प प्रशासन के दौरान लगातार आलोचना भी झेलता रहा है और गंभीर रूप से कम मनोबल, समझ और ब्रेन ड्रेन से ग्रस्त है। यह तय है कि EPA (ईपीए) और ऊर्जा विभाग जैसी एजेंसियों के कर्मचारियों को राष्ट्रपति या कांग्रेस द्वारा निर्देशित लेखन, कार्यान्वयन और विनियम लागू करने के साथ और अन्य जलवायु संबंधी कार्यों का काम सौंपा जाएगा। नए प्रशासन के लिए एक महत्वपूर्ण कार्य महत्वाकांक्षी नीतियों को पूरा करने के लिए इन एजेंसियों के भीतर क्षमता को पुनर्जीवित करना होगा।

आगे बात नए कानून बनाने की करें तो सीनेट पर रिपब्लिकन नियंत्रण कुछ मुश्किलें खाड़ी करेगा लेकिन फिर भी पर्यावरण अनुकूल नीतियों को शामिल करने के प्रयासों में बढ़ोतरी अपेक्षित है। सदन में डेमोक्रेटस और सीनेट में उदारवादी रिपब्लिकन के साथ काम करते हुए, नए प्रशासन से स्वच्छ ऊर्जा टैक्स क्रेडिट, रिन्यूएबल जेनेरशन, ऊर्जा भंडारण और कार्बन कैप्चर प्रौद्योगिकियों का विस्तार करने की अपेक्षा है। इमारतों, परिवहन और उद्योग में ऊर्जा दक्षता के उपायों पर भी विचार किए जाने की संभावना है।

अपनी प्रतिक्रिया देते हुए पीपल और प्लेनेट के लिए अधिवक्ता और 350.org की उत्तरी अमेरिका निदेशक, तमारा टोल्स ओ’लॉलिन (Tamara Toles O’Laughlin, Advocate for People & Planet, North America Director 350.org ), का कहना है, “ जो बाइडेन की जीत हमारे लिए एक अवसर है पर्यावरण के लिए कुछ बेहतर करने का।”

उसी तर्ज़ पर क्लाइमेट इक्विटी के लिए वरिष्ठ अभियान रणनीतिकार, एड्रियन सालाज़ार (Adrien Salazar, Senior Campaign Strategist for Climate Equity, Dēmos?) कहते हैं,

“जो बाइडेन और कमला की जीत इस बात का सबूत है कि लोगों ने अपनी आवाज़ उठाई है, और उन्होंने तय किया है कि हम ट्रम्पवाद से उबर चुके हैं, जलवायु परिवर्तन की अनदेखी के दौर से बाहर निकल आये हैं अब जीवाश्म ईंधन निर्माताओं के चंगुल से राजनीतिक व्यवस्था को बाहर निकालने के लिए तैयार हैं। अब हम सब को एक बेहतर भविष्य का इंतजार है।“

एनसीआर में आज से 30 नवंबर के बीच आतिशबाजियों पर लगा पूर्ण प्रतिबंध

Environment, Biodiversity and Nature News

National Green Tribunal pronounces ban on sale or use of all kinds of #firecrackers in #Delhi-NCR from midnight today till November 30

नई दिल्ली, 9 नवंबर 2020. राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण या द नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने सोमवार को राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र सहित देश भर के उन सभी शहरों व इलाकों में सभी प्रकार के पटाखों की बिक्री या इस्तेमाल पर 9 नवंबर की मध्य रात्रि से लेकर 30 नवंबर तक पूर्ण रूप से प्रतिबंध लगाए जाने के आदेश दिए हैं, जहां वायु गुणवत्ता सूचकांक ‘खराब’ व इससे संबंधित सूचियों के अन्तर्गत दर्ज किए गए हैं।

Restrictions imposed due to increasing pollution and double risk of coronavirus infection

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक एनजीटी के चेयरपर्सन आदर्श कुमार गोयल की अध्यक्षता वाली एक पीठ ने बढ़ते प्रदूषण व कोरोनोवायरस संक्रमण के दोहरे खतरे को देखते हुए पटाखों के उपयोग और बिक्री के खिलाफ उपचारात्मक कार्रवाई की मांग करने वाली याचिका पर एक आदेश पारित किया है।

आदेश में कहा गया,

“एनसीआर में 9-10 नवंबर की मध्यरात्रि से लेकर 30 नवंबर से 1 दिसंबर की मध्यरात्रि तक सभी प्रकार के पटाखों की बिक्री और इनके इस्तेमाल के खिलाफ पूर्ण रूप से प्रतिबंध लगाया जा रहा है, ताकि इसके बाद की स्थिति की समीक्षा की जा सके। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में दिल्ली, गुरुग्राम, फरीदाबाद, नोएडा, ग्रेटर नोएडा, गाजियाबाद, मुजफ्फरनगर, भिवानी, करनाल, सोनीपत, मेरठ, हापुड़, चरखी दादरी, पानीपत, रोहतक, जिंद, बागपत और बुलंदशहर शामिल है। हालांकि, हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने रविवार को घोषणा की कि लोगों को दीवाली पर दो घंटे पटाखे बेचने और फोड़ने की अनुमति है।”

ये निर्देश देश के उन सभी शहरों और कस्बों पर भी लागू होंगे, जहां पिछले साल के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार नवंबर के दौरान परिवेशी वायु की गुणवत्ता का औसत ‘खराब’ और इससे संबंधित सूची में आया है।

In cities where air quality falls in the ‘normal’ or below category, only green crackers will be sold.

ग्रीन कोर्ट ने आगे कहा,

“जिन शहरों में वायु की गुणवत्ता ‘सामान्य’ या इससे नीचे की श्रेणी में आया है, वहां सिर्फ ग्रीन पटाखे बेचे जाएंगे, लेकिन दीवाली, छठ, नया साल और क्रिसमस इत्यादि त्यौहारों के मौके पर इन्हें जलाने के लिए दो घंटे का समय निर्धारित किया गया है।”

पीठ में शामिल न्यायिक सदस्य एस. के. सिंह और डॉ. एसएस गब्र्याल और डॉ. नागिन नंदा जैसे विशेषज्ञों ने आदेश में आगे कहा कि अगर राज्य द्वारा किसी मानक का निर्धारण नहीं किया गया है, तो बैन लगने की समयसीमा दीवाली और गुरुपर्व में रात 8 से 10 और छठ में सुबह 6 से 8 और क्रिसमस व नए साल की पूर्व में रात के 11.55 से 12.30 बजे तक निर्धारित है।

आईआईटी ने चेताया कागज के डिस्पोजेबल कप में गर्म पेय सुरक्षित नहीं

IIT Kharagpur researchers studying micro-plastic particles in paper cups

सावधान! गर्म पेय के लिए पूर्ण सुरक्षित नहीं है कागज का डिस्पोजेबल कप

Be careful! The disposable cup of paper is not completely safe for hot drinks

नई दिल्ली, 05 नवंबर 2020: चाय, कॉफी या फिर अन्य पेय पदार्थों के सेवन के लिए प्लास्टिक की जगह पेपर से बने कप का उपयोग आम हो गया है। लेकिन, पेपर कप का उपयोग भी पूर्णतः सुरक्षित नहीं है। भारतीय शोधकर्ताओं ने पाया है कि पेपर कप में परोसे जाने वाले गर्म पेय पदार्थों में प्लास्टिक के सूक्ष्म कण और अन्य हानिकारक तत्व घुल जाते हैं। इन दूषित पेय पदार्थों का सेवन करने पर स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकते हैं। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी), खड़गपुर (Indian Institute of Technology (IIT), Kharagpur) के  एक ताजा अध्ययन में इस बात की पुष्टि हुई है।

पेपर कप में तरल पदार्थों को रोकने के लिए आमतौर पर जल-रोधी परत चढ़ायी जाती है। यह परत प्रायः प्लास्टिक या फिर सह-पॉलिमर्स से बनी होती है। जब कप में गर्म पेय पदार्थ डाले जाते हैं तो कप को बनाने में उपयोग की गई परत से सूक्ष्म प्लास्टिक कणों का क्षरण होता है, जो अंततः उस पेय पदार्थ में घुल जाते हैं।

शोधकर्ताओं का कहना है कि सूक्ष्म प्लास्टिक कण आयन, विषाक्त भारी धातुओं – पैलेडियम, क्रोमियम, कैडमियम और अन्य जैविक तत्वों के वाहक के रूप में कार्य करते हैं।

The study showed that within 15 minutes exposure to hot liquids destroys the layer made of microscopic plastic particles.

इस अध्ययन से पता चला है कि गर्म तरल पदार्थों के संपर्क में आने से 15 मिनट के भीतर सूक्ष्म प्लास्टिक कणों से बनी परत नष्ट हो जाती है।

यह अध्ययन आईआईटी,खड़गपुर के सिविल इंजीनियरिंग विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर, डॉ सुधा गोयल के नेतृत्व में उनके शोध छात्रों वेद प्रकाश रंजन और अनुजा जोसेफ द्वारा किया गया है। यह अध्ययन शोध पत्रिका जर्नल ऑफ हैजार्ड्स मैटेरियल्स में प्रकाशित किया गया है।

डॉ सुधा गोयलने बताया कि

हमारे अध्ययन से पता चला है कि 15 मिनट तक पेपर कप में यदि 100 मिलिलीटर गर्म पेय पदार्थ (85-90 डिग्री सेल्सियस) रखा जाता है तो 25 हजार माइक्रोन (10 माइक्रोमीटर से 1000 माइक्रोमीटर) आकार के सूक्ष्म प्लास्टिक कण उत्सर्जित होते हैं। यदि कोई व्यक्ति दिन भर में पेपर कप में तीन बार गर्म पेय पीता है, तो वह करीब 75 हजार सूक्ष्म प्लास्टिक कणों को निगल रहा है। इन कणों की एक खास बात यह है कि ये नग्न आंखों से दिखाई नहीं देते।

Researchers have studied the conditions both before and after the plastic layer is exposed to hot water.

इस अध्ययन के दौरान शोधकर्ताओं ने प्लास्टिक कप में तरल पेय के उपयोग के कारण होने वाले हानिकारक सूक्ष्म कणों के रिसाव का अध्ययन दो तरीकों से किया है। सर्वप्रथम, 85-90 डिग्री सेल्सियस पर गर्म विशुद्ध पानी को पेपर कपों में डाला गया और फिर उन कपों में सूक्ष्म प्लास्टिक कणों एवं अन्य आयनों के रिसाव का अध्ययन किया गया है। दूसरी प्रक्रिया में, पेपर कपों को गुनगुने पानी (30-40 डिग्री सेल्सियस) में डाला गया और फिर जल-रोधी परत को सावधानीपूर्वक अलग कर लिया गया। अलग की गई प्लास्टिक परत को 85-90 डिग्री सेल्सियस पर गर्म विशुद्ध पानी के संपर्क में 15 मिनट तक रखा गया और फिर उसके भौतिक, रासायनिक एवं यांत्रिक गुणों का अध्ययन किया गया है।

शोधकर्ताओं ने प्लास्टिक परत के गर्म पानी के संपर्क में आने से पहले और बाद, दोनों स्थितियों का अध्ययन किया है।

मिट्टी के बर्तनों के उपयोग को लेकर पूछे गए एक सवाल के जवाब में आईआईटी, खड़गपुर के निदेशक प्रोफेसर वीरेंद्र कुमार तिवारी ने कहा है कि

“जैविक रूप से हानिकारक उत्पादों के स्थान पर अन्य उत्पादों के उपयोग को प्रोत्साहित करने से पहले स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभाव के साथ-साथ उसके पर्यावरणीय पक्ष को ध्यान में रखा जाना आवश्यक है।”

(इंडिया साइंस वायर)

भारतीय विज्ञान के विकास में महिला वैज्ञानिकों का योगदान

Indian Women Scientists अन्ना मणि, असीमा चटर्जी, आनंदीबाई गोपालराव जोशी (ऊपर बाएं से दाएं) और जानकी अम्माल, कमला सोहोनी, दर्शन रंगनाथन एवं कमल रणदिवे (नीचे दाएं से बाएं)

The contribution of women scientists in the development of Indian science

नई दिल्ली, 02 नवंबर : आज जीवन के हर उत्पादक क्षेत्र में महिलाओं की सशक्त भागीदारी है। विज्ञान के क्षेत्र में भी। आज अंतरिक्ष विज्ञान से लेकर रसायन, भौतिकी, जैव प्रौद्योगिकी, जीव विज्ञान, चिकित्सा, नैनो तकनीक, परमाणु अनुसंधान, पृथ्वी एवं पर्यावरण विज्ञान, गणित, इंजीनियरिंग और कृषि विज्ञान जैसे चुनौतीपूर्ण क्षेत्रों में भारतीय महिला वैज्ञानिक अपनी छाप छोड़ रही हैं। हालांकि, विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग एवं गणित (STEM) के क्षेत्र में महिलाओं की संख्या समानुपातिक नहीं है। अपनी सामाजिक एवं पारिवारिक जिम्मेदारियों के चलते महिलाओं के लिए विज्ञान की दुनिया में मुकाम हासिल करना कभी आसान नहीं रहा है।

A few decades ago this situation was more challenging for women than it is today.

कुछ दशक पहले महिलाओं के लिए यह स्थिति आज के मुकाबले कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण थी। लेकिन, बीसवीं सदी के उस दौर में भी कुछ महिलाओं ने चुनौतियों को पीछे छोड़कर विज्ञान का दामन थामा और ऐसी लकीर खींच दी, जिसे आज भी दुनिया याद करती है। ऐसे में, उन महिला वैज्ञानिकों का स्मरण आवश्यक है, जिनका कृतित्व और व्यक्तित्व भावी पीढ़ियों के लिए एक मिसाल है, प्रेरणा है।

अन्ना मणि (23 अगस्त 1918 – 16 अगस्त 2001)Anna Modayil Mani (Anna Mani), a Pioneer Who Changed the Way We Gauge Weather

8 साल की उम्र में एक बच्ची ने उपहार में कान के हीरे के बुंदे ठुकराकर अपने लिए एन्साइक्लोपीडिया ब्रिटैनिका मांग लिया था। त्रावणकोर के एक संपन्न परिवार में जन्मीं यही बच्ची आगे चलकर बनी – अन्ना मोदयिल मणि (अन्ना मणि), जो वास्तव में विज्ञान की दुनिया में किसी मणि से कम नहीं थीं। यह एक विडंबना है कि भारत में आम लोग उनके विषय में बहुत अधिक नहीं जानते। वर्ष 1930 में नोबेल पुरस्कार प्राप्त वाले भारतीय वैज्ञानिक सी.वी. रामन के विषय में तो लोग बखूबी जानते हैं, लेकिन, अन्ना मणि को नहीं, जिन्होंने रामन के साथ मिलकर काम किया।

मूल रूप से भौतिकशास्त्री अन्ना मणि एक मौसम वैज्ञानिक थीं। वह भारत के मौसम विभाग के उप-निदेशक के पद पर रहीं और उन्होंने मौसम विज्ञान उपकरणों के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। सौर विकिरण, ओज़ोन और पवन ऊर्जा माप के विषय में उनके अनुसंधान कार्य महत्वपूर्ण हैं। इन विषयों पर उन्होंने कई शोध पत्र प्रकाशित किए हैं।

अन्ना मणि के मार्गदर्शन में ही, उस कार्यक्रम का निर्माण संभव हुआ, जिसके चलते भारत मौसम विज्ञान के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बन सका। भारत जैसे कृषि प्रधान देश में, जहां मानसून को भारत का ‘वित्त मंत्री’ कहा जाता है, वहां फसलों के लिए मौसमी पूर्वानुमान कितना महत्वपूर्ण है, यह अलग से बताने की आवश्यकता नहीं है।

विज्ञान के प्रति लगाव या जिज्ञासु प्रवृत्ति का परिचय अन्ना मणि ने अपने बचपन में ही प्रदर्शित कर दिया था। शुरू में वह चिकित्सा और भौतिकी में से एक विकल्प को चुनने को लेकर दुविधा में थीं, लेकिन अंततः उन्होंने भौतिकी को चुना। वर्ष 1940 उनके जीवन में एक महत्वपूर्ण पड़ाव आया, जब भारतीय विज्ञान संस्थान (आईआईएससी) ने उन्हें शोध छात्रवृत्ति प्रदान की और वह रामन की टीम के साथ काम करने लगीं। उन्हें जीवन में कई पुरस्कार मिले।

Asima Chatterjee (असीमा चटर्जी) (23 सितम्बर 1917- 22 नवंबर 2006)

यदि अन्ना मणि उच्च कोटि की भौतिकशास्त्री थीं, तो यही उपाधि रसायनशास्त्र के क्षेत्र में असीमा चैटर्जी को निर्विवाद रूप से दी जा सकती है।

वर्ष 1917 में कलकत्ता के एक मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मीं असीमा चैटर्जी ने विन्का एल्कोलाइड्स पर उल्लेखनीय काम किया, जिसका उपयोग मौजूदा दौर में कैंसर की दवाएं बनाने में किया जाता है। उनकी तमाम खोजों से वनस्पतियों को भी बहुत लाभ पहुँचा। उन्होंने कार्बनिक रसायन यानी ऑर्गेनिक केमिस्ट्री और फाइटोमेडिसिन के क्षेत्र में शानदार उपलब्धियां हासिल कीं। अपने शोधों के जरिये उन्होंने मिर्गी और मलेरिया जैसी बीमारियों के लिए कारगर नुस्खे विकसित किए, जिन्हें आज भी दवा कंपनियां बेच रही हैं। विज्ञान के क्षेत्र में उनके इस योगदान को उनके जीवनकाल में ही खूब सम्मान भी मिले।

वर्ष 1962 में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने उन्हें सी.वी. रामन पुरस्कार से नवाजा। वहीं, वर्ष 1975 में उन्हें पद्म भूषण से अलंकृत किया गया। वर्ष 1982 से 1990 तक उन्हें राज्य सभा के लिए नामित किया गया था। वर्ष 2006 में 22 नवंबर को उनका निधन हो गया। मिर्गी से लेकर मलेरिया जैसी बीमारियों में उनके फॉर्मूले पर बनी दवाएं आज भी लोगों को राहत पहुंचा रही हैं।

Kamal Ranadive (कमल जयसिंह रणदिवे) (15 दिसंबर 1905 – 11 अगस्त 1970)

जीव वैज्ञानिक कमल रणदिवे को विज्ञान के प्रति लगाव पुणे के विख्यात फर्ग्युसन कॉलेज में अपने प्रोफेसर पिता से विरासत में मिला था। देश में कैंसर के उपचार की व्यवस्था को शुरू करने में उनका अहम योगदान माना जाता है।

अमेरिका के प्रतिष्ठित जॉन हॉपकिंस विश्वविद्यालय से पीएचडी करने के बाद वह भारतीय कैंसर शोध केंद्र से जुड़ गईं, जहां उन्होंने कोशिका कल्चर का अध्ययन किया। चूहों पर प्रयोग से उन्होंने उनकी एक ऐसी कैंसर प्रतिरोधी किस्म विकसित की। इससे उन्हें कुष्ठ रोग का टीका विकसित करने की दिशा में कुछ अहम सुराग मिले।

कुष्ठ रोग निवारण के क्षेत्र में काम के लिए ही उन्हें देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। कमल रणदिवे का मूल नाम कमल समर्थ था और उनका योगदान केवल शोध और अनुसंधान तक ही सीमित नहीं था। उन्होंने भारतीय महिला वैज्ञानिक संघ की स्थापना भी की, जिसने आने वाली पीढ़ी की महिलाओं में वैज्ञानिक चेतना का प्रसार कर उन्हें इस क्षेत्र से जुड़ने के लिए अभिप्रेरित करने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभायी।

कमल रणदिवे ने कोशिका संवर्द्धन के क्षेत्र में अहम योगदान के साथ ही कुष्ठ जैसे रोग के उपचार की दिशा में भी महत्वपूर्ण कार्य किया।

Janaki Ammal (.के. जानकी अम्माल) (4 नवंबर 1897 7 फरवरी 1984)

वर्ष 1897 में केरल के तेल्लिचेरी में जन्मीं एदवालेथ कक्काट जानकी अम्माल एक उच्च कोटि की पादप विज्ञानी थीं। उन्होंने गन्ने की एक विशेष रूप से मीठी किस्म को विकसित किया। उन्होंने साथी वैज्ञानिकों संग गन्ने की ऐसी किस्म भी विकसित की, जो कई तरह की बीमारियों और सूखे की स्थिति में भी पनप सके।

उन्होंने हिमालय क्षेत्र में पेड़-पौधों के संकरण का गहन अध्ययन किया। वास्तव में, जंगली अवस्था में पौधों में संकरण की प्रकिया को समझने में उनके शोध-अध्ययन ने अहम भूमिका निभायी। वर्ष 1945 में उन्होंने सीडी डार्लिंगटन के साथ मिलकर ‘द क्रोमोजोम एटलस ऑफ कल्चर्ड प्लांट्स’ नामक पुस्तक लिखी, जिसमें पौध पोलिप्लाइडी पर अपने अनुभवों और संकरण की प्रक्रिया में उसके गहरे निहितार्थों को बहुत व्यापक रूप में समझाया है। उनका योगदान केवल शोध-अध्ययन तक ही सीमित नहीं रहा, बल्कि आजादी के तुरंत बाद देश से पलायन कर रही वैज्ञानिक प्रतिभाओं को देश में रोकने और स्थानीय प्रतिभाओं को प्रोत्साहन देने के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवारहलाल नेहरू के आग्रह पर उन्होंने भारतीय बोटैनिकल सोसायटी का पुनर्गठन किया। उन्हें 1957 में पद्मश्री पुरस्कार से नवाजा गया। यह सम्मान पाने वालीं वह देश की पहली महिला वैज्ञानिक थीं। उन्हें सम्मान देते हुए मैगनोलिया नाम के पौधे की एक प्रजाति-मैगनोलिया कोबस जानकी अम्माल का नामकरण उनके नाम पर किया गया।

वह बोटानिकल सर्वे ऑफ इंडिया की निदेशक भी रहीं। वर्ष 1984 में, 87 साल की उम्र में उनका निधन हो गया। वनस्पति शास्त्र की फाइटोबायोलॉजी, एथनोबॉटनी, फाइटोजियोग्राफी और क्रम विकास अध्ययन में उनके योगदान को याद किया जाता है, जो आज भी शोधार्थियों का मार्गदर्शन कर रहा है।

Kamala Sohonie (कमला सोहोनी) Indian biochemist (18 जून 1911 – 28 जून 1998)

कमला सोहोनी दिग्गज वैज्ञानिक प्रोफेसर सी.वी. रामन की पहली महिला छात्र थीं। हालांकि, उनके लिए यह आसान नहीं रहा, जिसका उन्होंने अपने संस्मरणों में उल्लेख भी किया।

कमला सोहोनी पहली भारतीय महिला वैज्ञानिक भी थीं, जिन्होंने पीएचडी की डिग्री हासिल की थी।

कमला सोहोनी को उनकी उस खोज के लिए याद किया जाता है, जिसमें उन्होंने प्रत्येक प्लांट टिशू में साइटोक्रोम-सी नाम के एंजाइम का पता लगाया था। उन्होंने नोबेल विजेता फ्रेडरिक हॉपकिंस के साथ भी काम किया।

Anandi Gopal Joshi (आनंदीबाई जोशी) – आनंदीबाई गोपालराव जोशी- Anandibai Gopalrao Joshi was (31 मार्च 1865 – 26 फरवरी 1887)

आनंदीबाई गोपालराव जोशी भारत की पहली महिला फिजीशयन थीं। उस जमाने में उनकी शादी महज 9 साल की उम्र में हो गई थी। वह 14 साल की उम्र में मां भी बन गई थीं, लेकिन, उन्होंने अपनी महत्वाकांक्षाओं को दम तोड़ने नहीं दिया। किसी दवाई की कमी के कारण उनके बेटे की कम उम्र में ही मृत्यु हो गई। इस घटना ने उनके जीवन को बदलकर रख दिया और उन्हें दवाओं पर शोध करने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने वुमंस मेडिकल कॉलेज, पेंसिलवेनिया से पढ़ाई की थी। जीवन में तमाम मुश्किलों के बावजूद उनका हौसला कभी डिगा नहीं और उन्होंने अपने संघर्ष से सफलता की एक नई गाथा लिखी।

डॉ. दर्शन रंगनाथन- Darshan Ranganathan (4 जून 1941 – 4 जून, 2001)

वर्ष 1941 में जन्मीं दर्शन रंगनाथन ने जैव रसायन यानी बायो-केमिस्ट्री क्षेत्र में अहम योगदान दिया। वह दिल्ली विश्वविद्यालय के मिरांडा हाउस कॉलेज में व्याख्याता रहीं और रॉयल कमीशन फॉर द एक्जिबिशन से छात्रवृत्ति मिलने के बाद शोध के लिए अमेरिका गईं। भारत लौटकर उन्होंने सुब्रमण्या रंगनाथन से विवाह किया, जो आईआईटी, कानपुर में पढ़ाते थे।

उन्होंने आईआईटी, कानपुर में ही अपने शोधकार्य को आगे बढ़ाने का प्रयास किया। लेकिन, तमाम गतिरोधों के कारण सफल नहीं हो सकीं। फिर भी, ये गतिरोध उन्हें प्रोटीन फोल्डिंग जैसे महत्वपूर्ण विषय में शोध करने से नहीं रोक सके।

वह ‘करंट हाईलाइट्स इन ऑर्गेनिक केमिस्ट्री’ नामक शोध पत्रिका के संपादन कार्य से भी जुड़ी रहीं। वह राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी की फेलो भी रहीं। साथ ही, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ केमिकल टेक्नोलॉजी, हैदराबाद की निदेशक भी रहीं। वर्ष 2001 में उनका निधन हो गया।

(इंडिया साइंस वायर)

कैसे निपटें वायु प्रदूषण से जब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड खुद हैं बीमार !!!

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राष्‍ट्रीय वायु गुणवत्‍ता मानकों पर खरा उतरने के लिये प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों का मज़बूत होना ज़रूरी : रिपोर्ट

How to deal with air pollution when the pollution control boards themselves are sick !!!

Pollution control boards must be strengthened to meet national air quality standards: report

नयी दिल्‍ली, 2 नवम्‍बर, 2020 : भारत में वायु प्रदूषण के विकराल होते परिणामों के बीच एक ताजा अध्‍ययन में खुलासा हुआ है कि इस पर नियंत्रण के लिये जिम्‍मेदार केन्‍द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) तथा राज्‍यों के प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड बजट और तकनीकी दक्षता के गम्‍भीर अभाव से जूझ रहे हैं। इन इकाइयों के मूल लक्ष्‍यों को हासिल करने के लिये अत्‍यधिक पेशेवर रवैया अपनाने के साथ-साथ हालात की वास्‍तविकता समझने और उसके समाधान निकालने के लिये तकनीक और प्रौद्योगिकी में दक्ष लोगों को जिम्‍मेदारी दिये जाने की जरूरत है।

दिल्‍ली स्थित एक स्वयंसेवी संगठन सेंटर फॉर क्रॉनिक डिसीस कंट्रोलCenter for Chronic Disease Control (सीसीडीसी) ने आज एक नयी रिपोर्ट जारी की।

‘स्‍ट्रेंदेनिंग पॉल्‍यूशन कंट्रोल बोर्ड्स टू अचीव द नेशनल एम्बिएंट एयर क्‍वालिटी स्‍टैंडर्ड्स इन इंडिया’ (भारत में राष्‍ट्रीय वातावरणीय वायु गुणवत्‍ता मानकों पर खरा उतरने के लिये प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों को मजबूत करना) विषय वाली इस रिपोर्ट में पूरे देश में नेशनल एम्बिएंट एयर क्वालिटी स्टैंडर्ड्स (एनएएक्‍यूएस) – National Ambient Air Quality Standards (NAAQS), के लक्ष्यों को हासिल करने में आ रही संस्थागत और सूचनागत बाधाओं को समझने की कोशिश की गई है। साथ ही उन्हें दूर करने के उपाय भी सुझाए गए हैं।

राज्यों के प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के पास न बजट है न कर्मचारी

अध्ययन के मुताबिक राज्यों के प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने पिछले दो दशक के दौरान भले ही अपने दायरे को विस्तृत कर लिया हो और अपने काम को बढ़ा लिया है लेकिन उनके पास इतना बजट और कर्मचारी नहीं है कि वे इसे ठीक से संभाल पाएं।

इस अध्ययन के लिए प्राथमिक अनुसंधान का काम देश के आठ चुनिंदा शहरों में किया गया। इनमें लखनऊ, पटना, रांची, रायपुर, भुवनेश्वर, विजयवाड़ा, गोवा और मुंबई शामिल हैं। इस दौरान केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) और संबंधित राज्यों के प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों के प्रतिनिधियों तथा सदस्यों से गहन बातचीत की गई। इसके अलावा एक व्यापक परिप्रेक्ष्य हासिल करने के लिए अधिकारियों, शिक्षा जगत से जुड़े लोगों, पर्यावरणविदों तथा सिविल सोसायटी के सदस्यों से भी इस सिलसिले में व्यापक चर्चा की गई।

एनवायरमेंटल हेल्थ की प्रमुख और पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया के सेंटर फॉर एनवायरमेंटल हेल्थ की उपनिदेशक डॉक्‍टर पूर्णिमा प्रभाकरण (Dr. Purnima Prabhakaran, Deputy Director of the Center for Environmental Health, Public Health Foundation of India) ने कहा

‘‘वायु प्रदूषण के अत्यधिक संपर्क में रहना भारत में सेहत के लिए जोखिम पैदा करने वाला सबसे बड़ा कारण है। सिर्फ पार्टिकुलेट मैटर (पीएम2.5) और ओजोन के संपर्क में आने से ही हर साल 12 लाख से ज्यादा लोगों की मौत हो जाती है। भारत ने हवा की गुणवत्ता के स्वीकार्य न्यूनतम मानकों को हासिल करने के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा सुझाए गए अंतरिम लक्ष्यों के अनुरूप खुद अपने राष्ट्रीय वातावरणीय वायु गुणवत्ता मानक (एनएनएक्यूएस) तैयार किए हैं। भारत में वायु गुणवत्ता संबंधी मानक वैश्विक मानकों के मुकाबले कम कड़े हैं, मगर इसके बावजूद हिंदुस्तान के ज्यादातर राज्य इन मानकों पर भी खरे नहीं उतर पाते। ऐसे में वायु गुणवत्ता में सुधार की योजनाओं को जमीन पर उतारने में व्याप्त खामियों को समझना बेहद महत्वपूर्ण है।

अध्ययन में अनेक प्रमुख ढांचागत तथा संस्थागत बाधाओं का खुलासा हुआ है, जिनकी वजह से पहले से ही स्थापित नियमों पर प्रभावी अमल नहीं हो पा रहा है और ना ही हवा की गुणवत्ता के मानकों को व्यापक रूप से हासिल किया जा पा रहा है। इनमें से मुख्य बाधाएं इस प्रकार हैं-

संस्थागत क्षमता– राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के दायरे और कार्य में पिछले दो दशकों के दौरान विस्तार देखा गया है लेकिन उनके पास इसे संभालने के लिए न तो बजट है और ना ही पर्याप्त कर्मचारी।

नेतृत्व से जुड़ी चुनौतियां– प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों में नेतृत्व का जिम्मा लोक सेवकों पर होता है, जिनके पास इन बोर्डों में अपने काम को बेहतर ढंग से अंजाम देने के लिए जरूरी विशेषज्ञता की अक्सर कमी होती है और उन्हें आमतौर पर प्रशासनिक पदों पर देखा जाता है।

प्रेरणा और जवाबदेही- राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अधिकारी अक्सर अपनी भूमिका और जिम्मेदारी को लेकर तंग नजरिया रखते हैं। इसलिये उनसे जिस भूमिका की उम्मीद की जाती है, वह नहीं निभाई जा पाती। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनेक अधिकारी संबंधित मौजूदा कानूनों के तहत खुद को मिली जिम्मेदारियों के बारे में पूरी तरह से नहीं जानते।

बहुक्षेत्रीयता और नौकरशाही– केंद्र तथा राज्य स्तरीय विभिन्न सरकारी विभागों के बीच तालमेल की कमी के कारण विभिन्न प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनेक ऐसे निर्देश लागू ही नहीं हो पाते जिन्हें अमलीजामा पहनाने का जिम्मा संबंधित विभागों पर होता है। कुछ राज्यों के प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड का भी यही कहना है कि नौकरशाही संबंधी रुकावटें मौजूद हैं। नौकरशाही प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड में मानव स्‍वास्‍थ्‍य की रक्षा में अपनी महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाने के बजाय सिर्फ फाइलें निपटाने को ही अपना काम मानती है।

चुनौतियों की निगरानी करना– हालांकि पिछले एक दशक के दौरान हवा की गुणवत्ता की निगरानी करने का काम तेजी से विकसित हो रहे क्षेत्रों में शामिल रहा है, मगर प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के पास इतने कर्मचारी और इतनी विशेषज्ञता नहीं है कि वह अपने काम को अपेक्षित मुस्तैदी और गुणवत्‍ता से कर सकें। साथ ही साथ कार्रवाई करने के आधार के तौर पर देखे जाने के बजाए निगरानी को ही अंतिम कार्य मान लिया जाता है।

सेहत पर पड़ने वाले प्रभाव को समझना – देश में बने पर्यावरण संबंधी प्रमुख कानूनों का उद्देश्य मानव स्वास्थ्य की रक्षा करना है लेकिन राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड में वायु प्रदूषण संबंधी तथ्यों की गलत समझ या गलत सूचनाएं महामारी विज्ञान पर हावी हो जाती हैं। अगर प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों को अपने उद्देश्यों में सफल होना है तो इन गलतफहमियों को दूर करना बहुत जरूरी है।

पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया (पीएचएफआई) की इस रिपोर्ट के लेखकों में शामिल भार्गव कृष्णा ने कहा

‘‘हाल के अध्यादेश समेत विधिक ढांचे को मजबूत करने वाले कदम स्वागत योग्य तो हैं मगर उन्हें लागू करने वाली नियामक इकाइयों को जब तक तकनीकी और वित्तीय संसाधनों के जरिए मजबूत नहीं किया जाएगा, तब तक यह सारे प्रयास बेकार साबित होंगे। इंसान की सेहत की सुरक्षा का ही सवाल था कि हमें यह कानून बनाने पड़ी। इनके लक्ष्यों को हासिल करने के लिए स्वास्थ्य को नीति निर्धारण के केंद्र में रखना होगा।’’

एनएएक्‍यूएस को हासिल करने में उत्पन्न प्रमुख ढांचागत बाधाओं को दूर करने के लिए इस रिपोर्ट में निम्नलिखित सिफारिशें की गई हैं :

·    सभी सरकारें मानव संसाधन तथा नेतृत्व संबंधी महत्वपूर्ण जरूरतों को तेजी से पूरा करें (जैसे कि प्रशिक्षण कार्यक्रम और कर्मचारियों के वेतन मानकों का पुनरीक्षण)।

·    राज्य-केंद्र और अंतर विभागीय संवाद को मजबूत किया जाए।

·    अनुपालन और जवाबदेही के लिए आंकड़ों को प्रभावशाली ढंग से इस्तेमाल करने के उद्देश्य से निगरानी की क्षमता का विस्तार किया जाए।

·    प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों में निवेश के लिए उल्लेखनीय वित्तीय संसाधन जुटाए जाएं।

·    स्वास्थ्य के क्षेत्र से जुड़े हितधारकों को शामिल किया जाए।

·    स्थानीय प्रमाण आधार को मजबूत किया जाए।

सेंटर फॉर क्रॉनिक डिजीज कंट्रोल से जुड़ी विदुषी बहुगुणा ने कहा

‘‘अगर वायु प्रदूषण से जुड़े मौजूदा कानूनी और नियामक कार्ययोजना को हवा की गुणवत्ता में सुधार और मानव स्वास्थ्य की सुरक्षा के पूर्व निर्धारित लक्ष्यों को हासिल करना है तो यह कदम उठाना बेहद जरूरी है।’’

मधुमक्खियों के बारे में रोचक तथ्य जिनके बारे में आप नहीं जानते

Honey Bee Facts in Hindi

Interesting facts about bees you don’t know

Bees ‘get’ addition and subtraction, a new study suggests

मधुमक्खियों की कहानी, मधुमक्खियों के बारे में जानकारी

जानें मधुमक्खी से जुड़े रोचक व मजेदार तथ्य / Madhumakhi Honey Bee Facts in Hindi | Madhumakhi Honey Bee Facts in Hindi.

A honey bee is a eusocial flying insect within the genus Apis of the bee clade, all native to Eurasia but spread to four other continents by human beings. ( Wikipedia)

Bees ‘get’ addition and subtraction, new study suggests

वैज्ञानिक यह तो पता कर चुके हैं कि मधुमक्खियां 4 तक गिन सकती हैं और शून्य को समझती हैं। लेकिन हाल ही में साइंस एडवांसेस पत्रिका में प्रकाशित अध्ययन “Numerical cognition in honeybees enables addition and subtraction” बताता है कि मधुमक्खियां जोड़ना-घटाना भी कर सकती हैं। अंतर इतना है कि इसके लिए वे धन-ऋण के चिंहों की जगह अलग-अलग रंगों का उपयोग करती हैं।

यह अध्ययन स्कारलेट आर. हॉवर्ड, औरोर एवरगुएट्स-वेबर, जेयर ई. गार्सिया, एंड्रयू डी. ग्रीनट्री और एड्रियन जी. डायर (Scarlett R. Howard, Aurore Avarguès-Weber, Jair E. Garcia, Andrew D. Greentree, and Adrian G. Dyer) द्वारा किया गया।

जीव-जगत में गिनना या अलग-अलग मात्राओं की पहचान करना कोई अनसुनी बात नहीं है। ये क्षमता मेंढकों, मकड़ियों और यहां तक कि मछलियों में भी देखने को मिलती है। लेकिन प्रतीकों की मदद से समीकरण को हल कर पाने की क्षमता दुर्लभ है। अब तक ये क्षमता सिर्फ चिम्पैंज़ी और अफ्रिकन भूरे तोते में देखी गई है।

शोधकर्ता जानना चाहते थे कि मधुमक्खियों  का छोटा-सा दिमाग गिनने के अलावा और क्या-क्या कर सकता है।

शोघकर्ताओं ने पहले तो मधुमक्खियों को नीले और पीले रंग का सम्बंध जोड़ने और घटाने की क्रिया से बनाने के लिए प्रशिक्षित किया। उन्होंने 14 मधुमक्खियों को आकृति की भूलभुलैया में प्रवेश यानी -आकृति की निचली भुजा (जहां से दो में से एक रास्ते का चुनाव करना होता था) में रखा और वहां उन्हें नीले और पीले रंग की वस्तुएं दिखाई गइंर्। जब उन्हें नीले रंग की कुछ वस्तुएं दिखाई जातीं और मधुमक्खियां उस ओर जातीं जहां दिखाई गई वस्तु से एक अधिक वस्तु है तो उन्हें इनाम मिलता था।

आकार की दूसरी भुजा के अंत में एक कम वस्तु होती थी। पीले रंग की वस्तुएं दिखाने पर यदि मक्खियां एक कम वस्तु वाली भुजा की तरफ जातीं तो उन्हें इनाम मिलता था। इसके बाद उन्हें जांचा गया। मधुमक्खियों ने 63-72 प्रतिशत मामलों में सही जवाब दिए।

पीला रंग दिखाने पर उन्होंने एक वस्तु ‘घटाई’ या नीला रंग दिखाने पर एक वस्तु ‘जोड़ी’ तब माना गया कि उन्होंने सही जवाब दिया है।

यह प्रयोग मात्र 14 मधुमक्खियों पर किया गया है किंतु शोधकर्ताओं का मत है कि मनुष्य की तुलना में बीस हज़ार गुना छोटे दिमाग के लिए यह एक बड़ी उपलब्धि है।

जानिए क्या है बिल्ली की सफाई का रहस्य

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Know what is the secret of cleaning the cat

आप रोज़ नहाते हैं और बिल्लियाँ कभी भी नहीं नहातीं, फिर भी वे इतनी साफ़ सुथरी कैसे दिखती हैं? इस रहस्य से पर्दा उठाया है देशबन्धु अखबार में पिछले दिनों प्रकाशित अरविंद गुप्ते के लेख में। इस लेख का संपादित अंश हम यहां साभार दे रहे हैं।

बिल्ली परिवार में शामिल जन्तु | Animals in the cat family

बिल्ली परिवार में घरेलू बिल्ली से ले कर बाघ, तेंदुए और सिंह जैसे जंतु शामिल हैं। ये सभी जंतु अपने शरीर को लगातार चाट कर साफ रखते हैं। इस प्रक्रिया के सबसे विस्तृत अध्ययन घरेलू बिल्ली पर किए गए हैं। बिल्ली एक दिन में औसतन 10 घंटे तक जागी रहती है और इस समय का लगभग एक-चौथाई भाग वह अपने शरीर को चाटने में गुजार देती है। चाटने की इस प्रक्रिया से बिल्ली के शरीर से पिस्सू जैसे परजीवी, धूल के कण, रक्त के थक्के आदि हट जाते हैं। इसके अलावा, लार में कुछ एंटीबायोटिक गुण होते हैं जिनके कारण घाव जल्दी भर जाते हैं।

बिल्ली के चाटने की प्रक्रिया में क्या होता है | What happens in the pussy licking process

यह जानकारी तो थी कि बिल्ली की जीभ पर नुकीले उभार होते हैं जिनकी नोंकें पीछे की ओर मुड़ी होती हैं। किंतु ये उभार किस प्रकार काम करते हैं इसकी ठीक-ठीक जानकारी नहीं थी।

अमेरिका के अटलांटा स्थित जॉर्जिया इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलॉजी (Georgia Institute of Technology, Atlanta, USA) में कार्यरत दो इंजीनियर्स डेविड हू और एलेक्सिस नोएल ने बिल्ली परिवार की छह प्रजातियों की जीभों का अध्ययन करके यह पता लगाने का प्रयास किया कि चाटने की प्रक्रिया में क्या होता है। उन्होंने मृत जंतुओं की जीभें प्राप्त कीं और उनका सीटी स्कैन से अध्ययन किया। घरेलू बिल्ली द्वारा खुद को चाटे जाने की प्रक्रिया का अध्ययन उन्होंने उच्च गति के कैमरों की सहायता से किया।

उन्होंने पाया कि इन सभी जंतुओं की जीभ पर उपस्थित उभार ठोस नहीं होते (जैसा माना जाता था), किंतु उनमें एक खांच होती है जिसके कारण उभार का आकार चम्मच के समान हो जाता है। किंतु यह चम्मच इस बात में अनोखा है कि वह कोशिका क्रिया से मुंह में उपस्थित लार को अपने अंदर खींच लेती है और इस प्रकार सफाई के लिए अधिक लार प्राप्त हो जाती है जो बिल्ली के बालों के नरम स्तर तक पहुंच जाती है।

There are two types of hair on a cat’s skin.

बिल्ली की त्वचा पर दो प्रकार के बाल होते हैं – त्वचा के ठीक ऊपर नरम बालों का एक स्तर होता है और इसके बाहर कड़े बालों का स्तर। चम्मच के समान आकार का एक और फायदा यह होता है कि बाहर आते समय उसमें गंदगी आसानी से भर जाती है और उसे बाहर निकालना आसान होता है। इस प्रकार, जीभ के उभार लार को बालों के अंदर तक पहुंचाने और गंदगी को बाहर निकालने का दोहरा काम सफलतापूर्वक करते हैं।

त्वचा के ऊपर लार के पहुंचने का एक और फायदा यह होता है कि लार के भाप बन कर उड़ जाने से बिल्ली की त्वचा का तापमान (Cat skin temperature) काफी कम हो जाता है और उसे गर्मी से राहत मिलती है।

हू और नोएल का अनुमान है कि बिल्ली की त्वचा और बालों के बाहरी आवरण के बीच 17 डिग्री सेल्सियस तक का अंतर हो सकता है।  

राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (एनसीएपी) की प्रगति पर सवालिया निशान

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Question mark on the progress of the National Clean Air Program (NCAP)

नेशनल एयर क्वालिटी मॉनिटरिंग प्रोग्राम का डैशबोर्ड हुआ लांच

National Air Quality Monitoring Program Dashboard Launched

नई दिल्ली, 28 अक्तूबर 2020. दिल्ली सहित उत्तर भारत के कुछ हिस्सों में वायु प्रदूषण का स्तर (Air pollution level) एक बार फिर संकट के स्तर पर पहुंच चुका है और बीते सालों की तरह इस साल भी यह जनता और नीति निर्माताओं के चिंता का विषय बन चुका है। और यह स्थिति भारत के राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (एनसीएपी) की प्रगति पर सवाल खड़ी करती है।

नया डैशबोर्ड 122 नॉन-अटेंन्मेंट शहरों के लिए PM2.5 और PM10 की तुलनात्मक तस्वीर

इसी क्रम में कार्बन कॉपी और रेस्पायरर लिविंग साइंसेज़ ने एक नया डैशबोर्ड तैयार किया है जो 2016 के बाद से NCAP के तहत सूचीबद्ध सभी 122 नॉन-अटेंन्मेंट शहरों के लिए PM2.5 और PM10 की तुलनात्मक तस्वीर प्रस्तुत करता है। यह डैशबोर्ड भारत के नेशनल एम्बिएंट एयर क्वालिटी स्टैंडर्ड्स (NAAQS) की एक व्यापक तस्वीर प्रदान करता है जो कि खुद नेशनल एयर क्वालिटी मोनिटरिंग प्रोग्राम (NAMP) के अंतर्गत है।

What is NCAP

पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (एमओईएफसीसी) ने 10 जनवरी 2019 को एनसीएपी को अधिसूचित किया, जिसका उद्देश्य 2024 तक 122 गैर-प्राप्ति शहरों में 20-30% पीएम स्तर को कम करना है, 2017 को आधार वर्ष के रूप में स्तर लेना। ये वे शहर थे जो 2011-2015 की अवधि के लिए NAAQS मानकों को पूरा करने में विफल रहे। कार्बनकॉपी का एनएएमपी डैशबोर्ड 2016 से 2018 तक सभी 122 शहरों में पीएम 2.5 और पीएम 10 के स्तर के लिए तीन साल की रोलिंग औसत प्रवृत्ति स्थापित करता है।

Means of tracking annual average concentrations

इस प्रगति पर अपनी राय देते हुए सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च के फेलो, डॉक्टर संतोष हरीश, एनपीएम डेटा का उपयोग करने के लाभों के बारे में बात करते हुए कहा,

“वार्षिक औसत सांद्रता पर नज़र रखना यह सत्यापित करने का एक उद्देश्य प्रदान करता है कि वायु गुणवत्ता के स्तर में सुधार हुआ है या नहीं। प्रदूषण के स्तर को समझने के लिए कई मेट्रिक्स हैं, जैसे कि अच्छे या बुरे वायु दिनों की संख्या आदि, लेकिन वार्षिक औसत से बेहतर है कि वे लंबी अवधि के एक्सपोज़र में बेहतर बोलें क्योंकि एपिसोड हाई और लॉज़ के विपरीत और मौसम विज्ञान के सवालों के खिलाफ अधिक मजबूत हैं। जब हम अगले वर्ष की तुलना 1 वर्ष के लिए करते हैं, तो हम मौसम विज्ञान जैसे कारकों को ध्यान में रखते हैं, इसलिए अमेरिकी पर्यावरण संरक्षण एजेंसी (USEPA) 3 वर्ष के रोलिंग औसत पर निर्भर करती है।”

When did the National Air Quality Monitoring Programme (NAMP) begin

एनएएमपी निगरानी कार्यक्रम 1984 से चल रहा है (जिसे पहले राष्ट्रीय परिवेश वायु गुणवत्ता नेटवर्क कहा जाता है) हालांकि सीपीसीबी वेबसाइट पर सार्वजनिक रूप से रिपोर्ट किए गए आंकड़े 2016 से अक्टूबर 2019 तक ही उपलब्ध हैं। भारत में 344 शहरों या कस्बों को कवर करते हुए 793 NAAQS स्टेशनों का नेटवर्क है। 29 राज्य और 6 केंद्र शासित प्रदेश। एनएएमपी के तहत, चार प्रदूषकों – सल्फर डाइऑक्साइड (So2), नाइट्रोजन डाइऑक्साइड (No2), सस्पेंडेड पार्टिकुलेट मैटर (SPM), और रेस्पिरेब्ल सस्पेंडेड पार्टिकुलेट मैटर (RSPM) को नियमित निगरानी के लिए प्रमुख प्रदूषकों के रूप में पहचाना गया है। निगरानी राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और राष्ट्रीय पर्यावरण इंजीनियरिंग अनुसंधान संस्थान (एनईईआरआई), नागपुर और प्रदूषण नियंत्रण समितियों, सीपीसीबी और अब राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (एनसीएपी) के तहत केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय द्वारा की जा रही है।

आगे, रेस्पायरर लिविंग साइंसेज़ के रोनक सुतारिया ने कहा,

“डेटा का विश्लेषण करते समय, प्रत्येक शहर में उपलब्ध मॉनिटरों की संख्या, निगरानी क्षमता में वृद्धि या कमी और प्रति वर्ष मॉनिटर पर उपलब्ध रीडिंग की संख्या को देखना महत्वपूर्ण है। डैशबोर्ड से स्पष्ट पता चलता है कि किन शहरों में कितने मॉनिटर थे, उनका अपटाइम क्या था और उस डेटा में क्या विश्वास है। इस डेटा में उतार-चढ़ाव और असंगति किसी विशेष शहर के लिए पीएम के रुझानों को बेहद प्रभावित करेगी और सही स्थिति को प्रकट करेगी। उदाहरण के लिए, यह समझने के लिए कि क्या कोई शहर बेहतर प्रदर्शन करता है या डैशबोर्ड पर देखे गए स्वीकार्य मानकों का समर्थन करने के लिए अपर्याप्त डेटा है या नहीं, यह समझने के लिए निगरानी की संरचना में देखना महत्वपूर्ण है।”

कैप्चर किए गए और सार्वजनिक किए गए डेटा का मानकीकरण क्यों महत्वपूर्ण है

वहीँ क्लाइमेट ट्रेंड्स की निदेशक और कार्बन कॉपी की प्रकाशक, आरती खोसला, ने कहा,

“ऐसे समय में जब केंद्र सरकार राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में वायु प्रदूषण को दूर करने के लिए एक नया कानून लाने की इच्छा रखती है, प्रभावी संकट प्रबंधन की दिशा में पहले कदम के रूप में हमारे मौजूदा नियमों का मूल्यांकन करना महत्वपूर्ण है। एनएएमपी डैशबोर्ड हमें वापस देखने और आगे की योजना बनाने की अनुमति देता है।” इस तथ्य पर ध्यान नहीं देते हुए कि एनएएमपी कार्यक्रम ने 2019 के लिए पीएम के स्तर को समग्र AQI स्तरों पर रिकॉर्ड करने से 2018 के बाद अपने डेटा कैप्चरिंग पद्धति को बदल दिया, खोसला ने कहा,

“कैप्चर किए गए और सार्वजनिक किए गए डेटा का मानकीकरण अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह आधारभूत सुविधा प्रदान करेगा” 2024 तक की जा रही प्रगति की तुलना करने के लिए। हम आशा करते हैं कि CPCB PM2.5 और 10 डेटा को 2019 और उसके बाद के वर्षों के लिए उपलब्ध कराएगा। “

हाल की मीडिया रिपोर्टों में गुरुग्राम, नोएडा और गाजियाबाद जैसे एनसीआर शहरों में कोविड से बरामद मरीजों में श्वसन संबंधी जटिलताओं के उभरने पर प्रकाश डाला गया। जबकि विशेषज्ञों का मानना है कि COVID के बरामद रोगियों पर वायु प्रदूषण के भार का विश्लेषण करना जल्द ही संभव है, इस बात पर आम सहमति है कि भारत में वायु प्रदूषण को एक महत्वपूर्ण जोखिम कारक के रूप में लेने के लिए स्वास्थ्य डेटा को बेहतर ढंग से पकड़ने की आवश्यकता है।

यूसीएमएस, दिल्ली विश्वविद्यालय में सामुदायिक चिकित्सा के निदेशक-प्रोफेसर डॉ अरुण शर्मा ने कहा,

“भारतीय संदर्भ में उपलब्ध स्वास्थ्य आंकड़ों की कमी के कारण वायु प्रदूषण और सार्वजनिक स्वास्थ्य के बीच संबंध स्थापित करने वाले अधिकांश स्वास्थ्य मॉडल पश्चिमी मॉडल पर आधारित हैं। जब इस डेटा को उपलब्ध कराया जा सकता है, तो यह भौगोलिक वितरण द्वारा भारत में श्वसन रोगों के बोझ का सही अर्थ देगा। भारत प्रत्येक व्यवहार पैरामीटर में एक विषम देश है जो मानव स्वास्थ्य को प्रभावित करता है। इस मंच पर किए गए वायु प्रदूषण के आंकड़ों के साथ स्वास्थ्य डेटा तक पहुंच के साथ, हम एक समुदाय में बीमारियों की सीमा में योगदान करने वाले विभिन्न कारकों के जोखिम का आकलन करने में सक्षम होंगे, यह सीओपीडी, ब्रोन्कियल अस्थमा, मधुमेह मेलेटस या उच्च रक्तचाप हो सकता है। इस तरह वायु प्रदूषण के आंकड़ों की पहुंच बहुत अच्छा संकेत है और मैं सरकार और स्वास्थ्य निकायों को स्वास्थ्य डेटा को पारदर्शी और आसानी से सुलभ बनाने के लिए प्रोत्साहित करूंगा।”

राष्ट्रीय हाइलाइट्स

1. NCAP (राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम) में non-attainment cities (वो सभी शहर जिनका प्रदूषण मानक मूल्यों से ज़्यादा है) में सूचीबद्ध 23 राज्यों में से केवल 3 राज्य – हिमाचल प्रदेश, चंडीगढ़ और पंजाब ही 3 वर्षों की पीएम 10 की निगरानी की औसत रीडिंग से ऊपर रहे हैं, इस बीच पश्चिम बंगाल और असम मार्जिन पर रहे। झारखंड इस सूची में सबसे नीचे 64 औसत रीडिंग प्रति मॉनिटर रहा, 3 मॉनिटर इस राज्य की रीडिंग के लिए जिम्मेदार है।

2. दिल्ली को 3 साल की औसत रीडिंग के आधार पर दर्ज किये गए पीएम 10 के आंकड़ों के हिसाब से सबसे अधिक प्रदूषित राज्य का दर्जा हासिल हुआ है, इसके बाद झारखंड राज्य है जिसका मॉनिटरिंग डाटा ठीक से हासिल नहीं हो सका और उत्तर प्रदेश इस पायदान पर तीसरे नंबर पर रहा है।

3. केवल 15 राज्यों के PM 2.5 के NAMP (नेटवर्क मैपर) मॉनिटरिंग सिस्टम किसी भी वर्ष के लिए उपलब्ध हुए है, जिसमें केवल पश्चिम बंगाल की औसत रीडिंग प्रत्येक 5 मॉनिटर में 110 के लगभग रही। दिल्ली सभी 3 सालों की पीएम 2.5 की औसत रीडिंग के हिसाब से सबसे अधिक प्रदूषित रही इसमें दूसरे स्थान पर उत्तर प्रदेश और तीसरे पर बिहार राज्य रहे।

4. पीएम नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र, वाराणसी, पीएम 10 स्तरों की डेटा / रीडिंग की 3 वर्ष की मॉनिटरिंग के आधार पर पांचवे स्थान पर रहा, जबकि कांग्रेस अध्यक्ष, सोनिया गांधी के संसदीय क्षेत्र, रायबरेली की बात की जाये तो वो 10 वें निम्नतम स्थान पर रहा। सबसे खराब प्रदर्शन देहरादून का रहा, उसके बाद श्रीनगर का स्थान रहा।

5. पीएम 10 की अधिकतम संख्या की रीडिंग के साथ नासिक शीर्ष पर रहा जबकि कानपुर ने पीएम 2.5 की अधिकतम रीडिंग के लिए पहला स्थान हासिल किया।

6. NAMP (नेटवर्क मैपर) मॉनिटरिंग सिस्टम में बदलाव 2019 में हुआ जिसके फलस्वरूप सिर्फ AQI डेटा ही दर्ज किया जाता है, न कि PM 2.5 / PM 10, जिसकी वजह से अब पिछले वर्षों के डेटा से तुलना करना मुश्किल हो गया है।

7 दिल्ली, उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, पंजाब, पश्चिम बंगाल, गुजरात, असम, महाराष्ट्र, चंडीगढ़, हिमाचल प्रदेश, छत्तीसगढ़, ओडिशा, मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में 2019 के लिए कोई NAMP (नेटवर्क मैपर) मॉनिटरिंग डेटा नहीं है। ऑनलाइन CAAQMS (Continuous Ambient Air Quality Monitoring Station) डेटा और मैनुअल मॉनिटरिंग स्टेशन डेटा में तुलना करना मुश्किल होगा, क्योंकि शहर में मॉनिटर और मॉनिटरिंग स्थानों की संख्या अलग-अलग होगी। 2018 के बाद अधिकांश स्थानों पर NAMP (नेटवर्क मैपर) मॉनिटरिंग बंद कर दी गई है और पिछले 2 वर्षों में CAAQMS (Continuous Ambient Air Quality Monitoring Station) को स्थापित किया जा रहा है, जिससे राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम के अनुसार 2017 को आधार वर्ष के साथ तुलना करना मुश्किल हो गया है।

उत्तर प्रदेश हाइलाइट्स

1. 2016 में लखनऊ में PM 10 214 दर्ज किया गया था जबकि 2017 में यह 244 था और 2018 में यह 217 पर दर्ज किया गया था।

2. PM 2.5 मॉनिटरिंग 2017 से उत्तर प्रदेश के केवल 5 शहरों में शुरू हुई, जिसमें लखनऊ, नोएडा और कानपुर में एक- एक मॉनिटरिंग केंद्र, गाजियाबाद में 2 मॉनिटरिंग केंद्र और आगरा में 4 मॉनिटरिंग केंद्र हैं।

3. राज्य की राजधानी लखनऊ में PM 2.5 का स्तर 2017 में 102 और 2018 में 108 रहा। इस तरह से लखनऊ में PM 2.5 का स्तर 6% बढ़ा।

4. आगरा जहाँ राज्य के अधिकतम PM 2.5 मॉनिटर हैं वहां 2018 में PM 2.5 का स्तर 105 माइक्रोग्राम / घन मीटर रहा और 2017 में 124 मापा गया जिसके अनुसार शहर में PM 2.5 के स्तर में 15% सुधार हुआ।

दिल्ली हाइलाइट्स

1. दिल्ली के अपने बड़े पैमाने पर निगरानी नेटवर्क के बावजूद 2016 से 2018 तक पीएम 2.5 की मॉनिटरिंग प्रति स्थान औसतन 69.3 रीडिंग है, जबकि पीएम 10 रीडिंग कहीं बेहतर रही जो कि प्रति मॉनिटर लगभग 96.5 कि रीडिंग दर्ज कि गई।

2. हालाँकि दिल्ली में पीएम 10 के स्तर में 2016 से साल दर साल 274 के साथ कमी दिखी, जो कि 2018 में 225 घट गया, लेकिन पीएम 2.5 का स्तर इतना अच्छा नहीं था।

3. 2016 में सात PM. 2.5 मॉनिटरों में से, दिल्ली में आगामी दो वर्षों में 6 थे, जिसमें साल दर साल रीडिंग की संख्या में कमी देखी गई।

4. दिल्ली में PM 2.5 में 2016 के स्तर की तुलना में 2017 में 14% सुधार हुआ, लेकिन 2018 में PM 2.5 का स्तर, वर्ष के लिए 121 के सभी स्थानों के गिने जाने वाले रीडिंग की कम संख्या के बावजूद 21% बढ़कर उस समय के उच्च स्तर पर पहुंच गया।

महाराष्ट्र हाइलाइट्स

1. महाराष्ट्र जहाँ पर non-attainment cities (वो सभी शहर जिनका प्रदूषण मानक मूल्यों से ज़्यादा है) की सबसे अधिकतम संख्या (18) है वहां पर PM 2.5 की मॉनिटरिंग के 2 NACs वर्ष 2018 में स्थापित किये गए, जिसमे एक मॉनिटर मुंबई में और दूसरा नागपुर में है।

2. नागपुर, चंद्रपुर और नासिक के अलावा राज्य के अन्य सभी non-attainment cities में मैनुअल मॉनिटरिंग की 3 साल की औसत रीडिंग निर्धारित स्तर से कम या मध्यम स्तर पर रही है।

3. राज्य की राजधानी मुंबई में साल दर साल का लेखा-जोखा देखा जाये तो, 2016 में पीएम 10 का स्तर 119 रहा जो 2017 में बढ़कर 151 और 2018 में 165 के स्तर पर रहा।

4. चंद्रपुर जो कि देश के गंभीर रूप से प्रदूषित समूहों में से एक रहा है वहां पर 2017 में पीएम 10 के स्तर में अस्पष्ट कमी देखी गई जो कि 4 रही, जबकि 2016 में यह 111 थी और 2018 में 149 तक पहुंच गई।

5.  लातूर, नागपुर, नासिक, पुणे, सांगली और सोलापुर जैसे अधिकांश शहरों में 2017 के स्तरों की तुलना में 2018 में पीएम 10 के स्तर में वृद्धि देखी गई।

छत्तीसगढ़ हाइलाइट्स

1. छत्तीसगढ़ राज्य में 3 non-attainment cities में – भिलाई, कोरबा और रायपुर में से सिर्फ कोरबा में 2 PM 2.5 मॉनिटर वर्ष 2018 में स्थापित किए गए हैं। इससे पहले राज्य के मैनुअल मॉनिटरिंग नेटवर्क में PM 2.5 स्तरों के लिए कोई पिछला डेटा उपलब्ध नहीं है। कोरबा को देश के शीर्ष 10 गंभीर रूप से प्रदूषित क्षेत्रों में भी स्थान दिया गया है।

2.राज्य स्वास्थ्य संसाधन केंद्र के एक हाल ही में किये गए स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभाव के मूल्यांकन के अनुसार, छत्तीसगढ़ राज्य के कोरबा में रहने वाले नागरिकों, जो कि प्रदूषणकारी बिजली संयंत्रों के नजदीक रहते हैं, और वहां से 20 किलोमीटर दूर एक शहर कटघोरा के विभिन्न समुदायों पर पड़ने वाले बुरे स्वास्थ्य प्रभावों के कारण उन लोगों में श्वसन और हृदय रोग जैसी बिमारियों का खतरा अधिक है।

3 इससे पहले एक आरटीआई दायर की गई थी इसमें NCAP ट्रैकर के बजट डैशबोर्ड को शामिल किया गया था, जिससे पता लगा कि भिलाई और रायपुर को 20 करोड़ रुपये का बजट प्राप्त हुआ था, जिसमें से 7.6 करोड़ रूपये प्रदूषण कम करने के उपायों के लिए आवंटित किए गए थे जिसमें हरित पट्टी जैसी गतिविधियाँ भी शामिल थीं। इसके अतिरिक्त 6.3 करोड़ रूपये साफ़ सफाई के उपायों जैसे पानी के छिड़काव, मैकेनिकल स्ट्रीट स्वीपर और मोबाइल enforcement units को सौंपा गया, और 5.6 करोड़ रूपये को CAAQMS मॉनिटरिंग स्टेशन और 1 सोर्स अपोर्श्न्मेंट स्टडी के लिए आवंटित किये गए है।

तमिलनाडु हाइलाइट्स

1. तमिलनाडु के तूतीकोरिन में 2016 के स्तर की तुलना में 2017 में 24% की दर से पीएम 10 के स्तर में सुधार हुआ और पिछले वर्ष की तुलना में 2018 में और 23% का सुधार हुआ।

2. इस बीच, त्रिची में पीएम 10 का स्तर 2016 में 95 माइक्रोग्राम / क्यूबिक मीटर से बढ़कर 2018 में 110 हो गया।

3. राज्य में हाल ही में 2018 में PM 2.5 मॉनिटरिंग स्थापित की गई है, इसलिए पिछले डाटा उपलब्ध न होने कि वजह से तुलना का कोई खाका नहीं खींचा जा सकता।

बिहार हाइलाइट्स

1. जैसा कि हमें मालूम है कि बिहार में चुनाव कि तैयारियां जोरों पर है, राज्य के 3 NACs में से केवल मुजफ्फरपुर में 2016 से 2018 के दौरान की पीएम 2.5 की मॉनिटरिंग उपलब्ध है। राज्य की राजधानी पटना और गया केवल पीएम 10 NAMP मॉनिटरिंग नेटवर्क रजिस्टर करते हैं।

2. केवल पटना के लिए बजट व्यय आरटीआई प्रतिक्रियाओं के माध्यम से उपलब्ध कराया गया था। CAAQMS मॉनिटरिंग स्टेशनों की स्थापना के लिए INR 3.6 करोड़ आवंटित किए गए हैं। बिहार राज्य में किसी अन्य प्रदूषण प्रबंधन हस्तक्षेप के लिए बजट योजनाओं के लिए कोई विवरण उपलब्ध नहीं है।

भारत के दो बैंक भी जैव-विविधता को नुकसान पहुंचाने के लिए

Environment, Biodiversity and Nature News

Two banks in India also responsible for damage to biodiversity

Bank loans scrutinized for harm to wildlife as well as climate

The financial sector is bankrolling the mass extinction crisis while undermining human rights and indigenous sovereignty

बैंकरोलिंग एक्‍सटिंक्‍शन(bankrolling extinction) नामक जारी एक ताज़ा रिपोर्ट की मानें तो भारत के दो सबसे बड़े बैंक, स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया (state Bank of India) और एचडीऍफ़सी, लगभग 6984 मिलियन डॉलर ऐसे क्षेत्र में निवेश कर चुके हैं जिनसे जैव विविधता को नुकसान (Damage to biodiversity) हो रहा है। इनमें खनन, कोयला उत्पादन और ऐसे इन्फ्रास्ट्रक्चर का निर्माण जिससे जैव विविधता को नुकसान हो जैसे कार्यों को क़र्ज़ देना शामिल है।

हालाँकि रिपोर्ट में उल्लेख के बावजूद स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया शीर्ष 10 वित्तपोषण बैंकों में नहीं है। जो बैंक कटघरे में हैं, उनमें ज्यादातर अमेरिकी हैं, और चीनी हैं। बैंकों द्वारा जैव विविधता प्रभाव और उसकी  लागत को वित्तपोषण के लिए नहीं शामिल किया जाना इसका एक सबब है।

इन क्षेत्रों में भारत के अपेक्षाकृत कम मद में निवेश की वजह से एसबीआई का अन्य देशों के बैंकों की तुलना में बहुत कम योगदान है।

दरअसल पोर्टफोलियो अर्थ नामक संस्था द्वारा इस अपनी तरह की इस पहली रिपोर्ट में दुनिया के 50 सबसे बड़े बैंकों और उनके द्वारा उन निवेशों पर गौर किया गया है, जिन्‍हें सरकारें और वैज्ञानिक जैव-विविधता को हो रहे नुकसान के लिये बड़ा जिम्‍मेदार ठहराते हैं।

In 2019, the world’s largest banks invested more than USD 2.6 trillion (c. entire GDP of Canada) in sectors which governments and scientists agree are the primary drivers of biodiversity destruction.

साल 2019 में इन सभी बैंकों ने कुल मिलाकर 2.6 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर ऐसे क्षेत्रों में निवेश किये हैं जो पृथ्वी की जैवविविधता को भरी नुकसान पहुंचा रहे हैं। इन सभी बैंकों में जैव विविधता को सबसे ज़्यादा नुकसान पहुंचाने के लिए ज़िम्मेदार जो दस बैक हैं, वो हैं बैंक ऑफ अमेरिका, सिटीग्रुप, जेपी मॉर्गन चेज़, मिज़ूओ फाइनेंशियल, वेल्स फ़ार्गो, बीएनपी पारिबा, मित्सुबिशी यूएफजे फाइनेंशियल, एचएसबीसी, एसएमबीसी ग्रुप, और बार्कलेज़।

भारत से हालाँकि बस दो ही बैंक इन 50 बैंकों की लिस्ट में शामिल हैं लेकिन भारत जैसी अर्थव्यवस्था और जैव विविधता वाले देश के लिए यह एक चिंता की बात है। 

बात एशिया की करें तो नीचे दिए टेबल से स्थिति साफ़ दिखती है

देश              बैंक             

 भारत          स्‍टेट बैंक ऑफ इंडिया, एचडीएफसी

सिंगापुर      डीबीएस

चीन             ओसीबीसी, चाइना कंस्‍ट्रक्‍शन बैंक, बैंक ऑफ चाइना, एग्रीकल्‍चरल बैंक ऑफ चाइना, इं‍डस्ट्रियल एण्‍ड कॉमर्शियल बैंक ऑफ चाइना

ऑस्‍ट्रेलिया नेशनल ऑस्‍ट्रेलिया बैंक्‍स, कॉमनवेल्‍थ बैंक ऑफ ऑस्‍ट्रेलिया

मलेशिया     सीआईएमबी बैंक, मलेशियन बैंकिंग

दक्षिण कोरिया     शिंहान फाइनेंशियल ग्रुप

इंडोनेशिया बैंक मंदीरी

जापान         एसएमबीसी, मिजुहो, फाइनेंशियल, नोरिंचुकिन बैंक, मितसुबिशी फाइनेंशियल

None of the banks assessed has chosen to put sufficient systems in place to monitor or measure the impact of their loans on biodiversity, nor do they have comprehensive policies to halt it.

जैव विविधता को नुकसान पहुँचाने वाले क्षेत्रों का वित्तपोषण करने से पहले इनमें से किसी भी बैंक ने न तो कोई ऐसी निगरानी व्यवस्था बनाईजो इस बात पर नज़र रखती कि यह निवेश जैव विविधता को कितना नुकसान पहुंचा रहे हैं, और न ही इस नुकसान को रोकने की कोई व्यवस्था बनाई।

पोर्टफोलियो अर्थ (Portfolio earth) के लिज़ गलाहर ने अपनी बात रखते हुए कहा,

“आधी दुनिया की जीडीपी प्रकृति और इसके द्वारा प्रदान की जाने वाली सेवाओं के लिए ऋणी है। अब वक़्त है कि हम वित्तीय प्रणाली को रीसेट करें जिससे इसके प्रभावों के लिए इसे पूरी तरह से जवाबदेह ठहराया जा सके।”

लिज़ की संस्था ने रैंकिंग तैयार करने की प्रक्रिया के लिये इस बात पर भी गौर किया है कि बैंकों ने अपनी नीतियों में प्रकृति के लिए अपनी जवाबदेही को तरजीह दी है। जो बात इस रिपोर्ट को ख़ास बनाती है वो यह है कि यह हमें मौका देती है कि हम देख पायें कि वित्‍तीय क्षेत्र किस तरह से जैव-विविधता को रहे नुकसान में तेज़ी लाने में भूमिका निभा रहा है।

जो तीन मुख्य माँग इस रिपोर्ट के ज़रिये सामने रखी गयीं हैं वो हैं कि

• बैंकों को अपने निवेशों का न सिर्फ़ खुलासा करना चाहिए बल्कि प्रकृति पर उन निवेशों के प्रभाव को कम भी करना चाहिए। साथ ही बैंकों को नए जीवाश्म ईंधन, वनों की कटाई, अतिवृष्टि और पारिस्थितिकी तंत्र के विनाश को अपने स्तर से रोकना चाहिए।

• सरकारों को जैव विविधता विनाश में बैंकों की भूमिका की रक्षा करना बंद कर देना चाहिए और उनके दिए ऋण से होने वाले नुकसान के लिए बैंकों को उत्तरदायी ठहराने के लिए नियमों को फिर से लिखना चाहिए।

• खाताधारकों का इस बात पर नियंत्रण होना चाहिए कि उनका पैसा कैसे निवेश किया जाता है। उनके पास बैंकों को पृथ्वी को गंभीर नुकसान पहुंचाने से रोकने का अधिकार भी होना चाहिए।

रिपोर्ट पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए यूनिवर्सिटी ऑफ ब्रिटिश कोलम्बिया में प्रोफेसर और आईपीबीईएस ग्‍लोबल असेसमेंट रिपोर्ट के मुख्‍य लेखक काई चैन (Kai Chan, an environmental scientist at the University of British Columbia, and a leading author of a global study published last year) कहते हैं,

“एक ऐसी दुनिया की कल्‍पना करिये जिसमें परियोजनाओं के लिये तभी पूंजी दी जाए, जब यह जाहिर किया जाए कि वे सभी के लिये धरती की पूर्णता और सुरक्षित जलवायु को बहाल करने की दिशा में सार्थक और सकारात्‍मक योगदान करेंगे। यह रिपोर्ट एक ऐसे ही भविष्‍य की परिकल्‍पना करती और उस दिशा में रास्‍ता बताती है। वैश्विक सतत अर्थव्‍यवस्‍था दरअसल जलवायु तथा पारिस्थितिकीय संकट से निपटने के लिये मानवता के बहुप्रतीक्षित रूपांतरण का केन्‍द्र होती है, और उसके केन्‍द्र में वे बैंक और वित्‍तीय संस्‍थान होते हैं जिनके निवेश से पूरी दुनिया में विकास को ताकत मिलती है।

काई चैन की बात का दूसरा पहलू दिखाते हुए अमेजॉन वाच की क्‍लाइमेट एवं फिनांस डायरेक्‍टर मोइरा बिर्स कहती हैं,

“अगर अमेजॉन के वर्षावनों को बचाना है और हमें धरती पर अपना भविष्‍य बरकरार रखना है तो वित्‍तीय संस्‍थाओं को जैव विविधता को बेरोकटोक नुकसान पहुंचा रहे उद्योगों पर ट्रिलियन डॉलर खर्च करने से रोकना होगा। अमेजॉन के वर्षावनों में इस वक्‍त कृषि कारोबार, खनन और जीवाश्‍म ईंधन जैसे उद्योग स्‍थानीय लोगों के अधिकारों को रौंद रहे हैं। बड़े बैंकों से कर्ज और जोखिम अंकन (अंडरराइटिंग) प्राप्‍त ये उद्योग बेरहमी से वनों को काट रहे हैं।”

Banks play a key role in a financial system that free rides on biodiversity, and the regulators and rules which govern banks currently protect them from any consequences.

चर्चा का एक अलग आयाम बताते हुए स्‍टैंड.अर्थ के एग्जिक्‍यूटिव डायरेक्‍टर टॉड पगलिया ने कहा,

“आज के दौर में वे ही वित्‍तीय संस्‍थाएं दूरदर्शी कही जाएंगी जो हमारे महासागरों, वनों और जलवायु के पुनरुद्धार सम्‍बन्‍धी परियोजनाओं में निवेश कर रही हैं। हमें अनेक सदियों के दौरान बैंकों द्वारा पृथ्‍वी के दिल, फेफड़ों और अन्‍य अंगों को नुकसान पहुंचाने वाली गतिविधियों में निवेश किये जाने से हुई क्षति की भरपाई करनी होगी। वह भी बहुत कम समय में।”

टॉड की बात को आगे ले जाते हुए कार्बन ट्रैकर इनीशियेटिव के संस्‍थापक और अधिशासी अध्‍यक्ष मार्क कैम्‍पोनाले कहते हैं,

“एक ऐसी जटिल दुनिया में जहां उपभोक्‍ता की बढ़ रही ताकत वैश्विक जीवन स्‍तर में उठान से जुड़ी है, हम कुदरत के दुर्लभ संसाधनों की अपरिवर्तित मांग को देख रहे हैं। सुधार के कदम उठाने में सरकारों की सामूहिक नाकामी और मुनाफे के लक्ष्‍य के कारण आयी तेजी के मद्देनजर बुरे कॉरपोरेट पक्षों को दुनिया के महासागरों, वातावरण और जंगलों का शोषण करने से रोकने के लिये अब कोई खास बाधा बाकी नहीं रह गयी है। मगर फिर भी बैंकिंग प्रणाली के रूप में एक ताकतवर चीज अब भी मौजूद है जो कॉरपोरेट के लालच के इस अंत‍हीन सिलसिले पर रोक लगा सकती है।”

मार्क आगे कहते हैं कि,

“यह रिपोर्ट हमें बताती है कि सरकारों और वित्‍तीय नियामकों के पास एक ऐसा नियम-आधारित समुचित तंत्र विकसित करने के लिये ज्‍यादा समय नहीं है, जो हालात की निगरानी करने के साथ-साथ यह भी सुनिश्चित करे कि बैंक इस कॉरपोरेट लूट को अब बेरोकटोक तरीके से आर्थिक खाद-पानी नहीं दे सकते।”

मार्क की बात से सहमत अर्थ एडवोकेसी यूथ की हाना बेगोविच कहती हैं,

“पारिस्थितिकी सम्‍बन्‍धी संकट को बढ़ावा देने में अपनी भागीदारी को लेकर अब बैंकों को अपनी आंखें खोलनी होंगी और अपने उन फैसलों और कदमों की जिम्‍मेदारी लेनी होगी, जिनकी पारिस्थितिकी तंत्रों के बड़े पैमाने पर विध्‍वंस में भागीदारी साफ जाहिर होती है।

हमारी मांग है कि बैंक जिम्‍मेदारी लें और अपने उन तौर-तरीकों को बदलें, जिनके जरिये इस वक्‍त पुरानी व्‍यवस्‍था को बरकरार रखने की कोशिश की जा रही है। इस रिपोर्ट को पढ़ते हुए यह लगातार स्‍पष्‍ट होता जा रहा है कि आज का वैश्विक तंत्र मानवता को धरती की पुनरुत्‍पादक क्षमता की सीमाओं को लगातार तोड़ने और धरती पर जीवन को चलाने वाले नैसर्गिक कानून के उल्‍लंघन की न सिर्फ इजाजत दे रहा है, बल्कि कई तरीकों से उसे प्रोत्‍साहित भी कर रहा है। मूलरूप से अनंत आर्थिक विकास और प्राकृतिक संसाधनों के कभी न खत्‍म होने वाले शोषण पर आधारित वैश्विक तंत्र को बरकरार रखने से हम इस धरती पर जीवन को इंसान के मालिकाना हक वाली सम्‍पत्ति बना डालेंगे, जिसके वजूद का औचित्‍य इस बात से तय होगा कि इंसान के फायदे और आर्थिक लाभ के लिये उसका शोषण किस हद तक किया जा सकता है।

और अंततः, विविड इकॉनमिक्‍स के निदेशक रॉबिन स्‍मेल ने कहा,

“बैंक हमारी जैव-विविधता को बर्बाद करने वाले तंत्र का प्रमुख हिस्‍सा हैं। वे आपूर्ति श्रंखला को पूंजी मुहैया कराते हैं। मौजूदा कानूनी प्रणाली उन्‍हें जिम्‍मेदारी और जवाबदेही से बचा रही है। यही वजह है कि नुकसानदेह गतिविधियों के समाधान में मदद की सम्‍भावनाएं भी कमजोर पड़ जाती हैं। बच निकलने के इन कानूनी रास्‍तों को बंद किये जाने से बैंकों को अपने द्वारा वित्‍तपोषित परियोजनाओं के जैव-विविधता पर पड़ने वाले असर का अधिक सुव्‍यवस्थित तरीके से समाधान निकालने और प्रमुख आपूर्ति श्रंखलाओं में व्‍याप्‍त गतिविधियों को रूपांतरित करने के लिये मजबूर होना पड़ेगा।”

हो सकती है बड़ी आपदा : 1.3 मिलियन बैरल कच्चे तेल का समुद्र में रिसाव का खतरा

Climate change Environment Nature

Caribbean NGO calls for the red alert on stranded oil ship and warns there are currently “insufficient measures” to contain a spill

पर्यावरणीय आपदा के मुहाने पर दुनिया | World at the mouth of environmental disaster

एक ताज़ा मिली जानकारी के मुताबिक़ वेनेजुएला और त्रिनिदाद के बीच, पारिया की खाड़ी में, एक ख़राब और लगभग डूबते तेल टैंकर से 1.3 मिलियन बैरल के करीब कच्चे तेल के समुद्र में गिरने का ख़तरा बन गया है।

अगर इस मात्रा में कच्चा तेल समुद्र में गिरता है तो यह मात्रा 1989 के बहुचर्चित एक्सॉन वाल्डेज़ स्पिल के लगभग पांच गुना के बराबर है। टैंकर पेट्रोसुक्रे नामक कंपनी के स्वामित्व में है, जिसका मालिकाना हक वेनेजुएला की राष्ट्रीय तेल कंपनी पेट्रोलिओस डी वेनेजुएला (PDVSA ) के पास है, जिसकी 74% हिस्सेदारी है, और इटली की ईनी बाकी 25% की मालिक है।

त्रिनिदाद और टोबैगो की एनजीओ फिशरमेन एैंड फ्रेंड्स ऑफ द सी (The Trinidad and Tobago NGO Fishermen and Friends of the Sea (FFOS)) पिछले कुछ महीनों से इस स्थिति की निंदा करते हुए इस स्थिति के निपटान की मांग कर रही है। अगस्त की शुरुआत में ही इस एनजीओ ने चेतावनी दी थी कि जहाज़ “खतरनाक तरीके से झुक रहा है और इसके पलटने का खतरा बढ़ रहा है”।

कैरेबियन एनजीओ के मुताबिक समाचार एजेंसी रायटर्स के मुताबिक़ मंगलवार 20 अक्टूबर को PDVSA  ने ICARO नामक एक टैंकर को बैरल के आधे हिस्से को ऑफलोड करने के लिए भेजा है लेकिन यह एक बेहद खतरनाक प्रक्रिया है। उसी दिन, त्रिनिदाद और टोबैगो के ऊर्जा और उद्योग मंत्रालय ने भी स्थिति को जांचने के लिए एक विशेषज्ञ दल को टैंकर के पास भेजा।

फिशरमेन एैंड फ्रेंड्स ऑफ द सी के कॉर्पोरेट सचिव गैरी अबाउद (Gary Aboud -Corporate Secretary, Fishermen and Friends of the Sea) के मुताबिक स्थिति इतनी संवेदनशील है कि फिशरमेन एैंड फ्रेंड्स ऑफ द सी, बाकी दुनिया की तरह, आशंकित हो कर इस पूरे घटनाक्रम पर नज़र बनाए हुए है। स्काईट्रूथ से प्राप्त चित्रों और वैश्विक मीडिया में प्रसारित होने वाली रिपोर्टों से ऐसा प्रतीत होता है कि वेनेजुएला के एक तेल टैंकर, ICARO/आईसीएआरओ ने एफएसओ नाबारिमा से संपर्क किया है और भीतर कुछ तेल स्थानांतरित कर भी रहा है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि कैरिबियन सी का वो हिस्सा खतरे से बाहर है।

उन्होंने कहा कि फ़िलहाल हम राहत की सांस नहीं ले सकते क्योंकि इस प्रक्रिया में मिली जानकारी के मुताबिक़ किसी भी तरह के रिसाव को रोकने के लिए उपाय अपर्याप्त हैं।

किसी भी स्थिति से निपटने के लिये  PDVSA के पास जहाज के चारों ओर आवश्यक रोकथाम उपकरण होने चाहिए। साथ ही PDVSA को स्पिल/रिसाव जैसी आपदा के लिए आपदा प्रबंधन योजनाएँ बनानी चाहिए।  सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस स्थिति ने 1989 के त्रिनिदाद और टोबैगो और वेनेजुएला के बीच हुए तेल रिसाव प्रबंधन योजना पर पुनर्विचार करने की ज़रूरत को फिर उजागर किया है।

All affected and related countries should meet immediately to discuss the implementation of the regional action plan to deal with environmental disasters.

मौजूदा समझौते के बावजूद, जहाज़ का निरीक्षण करने के लिए विशेषज्ञों की एक टीम को भेजने के लिए स्वीकृति प्राप्त करने में ही त्रिनिदाद और टोबैगो सरकार को एक महीने से अधिक समय लग गया। नियमों के चलते इतना समय लगना घातक सिद्ध हो सकता है। यही नहीं, इस समुद्रीय क्षेत्र पर तमाम देश निर्भर हैं और सभी को ऐसी किसी पर्यावरणीय आपदा से निपटने की तैयारी रखनी चाहिए। बल्कि ऐसी पर्यावरणीय आपदाओं से निपटने के लिए क्षेत्रीय कार्ययोजना के कार्यान्वयन पर चर्चा करने के लिए सभी प्रभावित और सम्बंधित देशों को तत्काल मिलना चाहिए।

जानिए क्यों है पृथ्वी पर वायुमंडल?

Science news

The atmosphere is an integral part of the biological system.

पृथ्वी का वायुमंडल (Earth‘s atmosphere) हमारे लिए जीवन है जिसके बिना हमारा अस्तित्व नहीं है। जेरेमी फ्रे के अनुसार जीवन के पनपने के लिए पृथ्वी पर सही वातावरण होना आवश्यक था। जब यह वातावरण अस्तित्व में आया तब जीवन के लिए परिस्थितियां निर्मित हुईं। वायुमंडल जैविक प्रणाली का अभिन्न अंग है।

वायुमंडल का अर्थ | Meaning of atmosphere | वायुमंडल की परिभाषा | Definition of atmosphere

हमारी पृथ्वी का वायुमंडल काफी विशाल है। यह इतना बड़ा है कि इसके कारण अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन का मार्ग भी प्रभावित हो जाता है। लेकिन यह विशाल गैसीय आवरण कैसे बना? यानी सवाल यह है कि पृथ्वी पर वायुमंडल क्यों है?

वायुमंडल की उपस्थिति गुरुत्वाकर्षण की वजह से है। आज से लगभग 4.5 अरब वर्ष पहले जब पृथ्वी का निर्माण हुआ तब हमारा ग्रह तरल अवस्था में था और वायुमंडल न के बराबर था। स्मिथसोनियन एनवायरमेंटल रिसर्च सेंटर (Smithsonian Environmental Research Center) के मुताबिक जैसे-जैसे पृथ्वी ठंडी होती गई, ज्वालामुखियों से निकलने वाली गैसों (Gases from volcanoes) से इसका वायुमंडल बनता गया। यह वायुमंडल आज के वायुमंडल से काफी अलग था। उस समय के वायुमंडल में हाइड्रोजन सल्फाइड, मीथेन और आज की तुलना में 10 से 200 गुना अधिक कार्बन डाईऑक्साइड थी।

युनाइटेड किंगडम के साउथेम्प्टन विश्वविद्यालय के भौतिक रसायन विज्ञानी प्रोफेसर जेरेमी फ्रे (Jeremy Frey is Professor of Physical Chemistry and head of the Computational Systems Chemistry Group at the University of Southampton) के अनुसार पृथ्वी का वायुमंडल पहले कुछ-कुछ शुक्र ग्रह जैसा था जिसमें नाइट्रोजन, कार्बन डाईऑक्साइड और मीथेन मौजूद थी। इसके बाद जीवन अस्तित्व में आया।

लगभग यकीन से कहा जा सकता है कि यह किसी समुद्र के पेंदे में हुआ। फिर लगभग 3 अरब वर्षों बाद, प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis) विकसित होने के बाद से एक-कोशिकीय जीवों ने सूर्य की ऊर्जा का उपयोग करके कार्बन डाईऑक्साइड और पानी के अणुओं को शर्करा और ऑक्सीजन गैस में परिवर्तित किया। इसी के साथ ऑक्सीजन का स्तर बढ़ता गया।

वायुमंडल में कौन कौन सी गैस पाई जाती है | What gas is found in the atmosphere

पृथ्वी के वायुमंडल में आज लगभग 80 प्रतिशत नाइट्रोजन और 20 प्रतिशत ऑक्सीजन है। इसके साथ ही यहां आर्गन, कार्बन डाईऑक्साइड, जल वाष्प और कई अन्य गैसें भी मौजूद हैं। वायुमंडल में उपस्थित ये गैसें पृथ्वी को सूरज की तीक्ष्ण किरणों से बचाती हैं। प्रमुख ग्रीन हाउस गैसें (Major greenhouse gases) हैं कार्बन डाईऑक्साइड, जल वाष्प, मीथेन और नाइट्रस ऑक्साइड। इनका होना भी आवश्यक है वरना पृथ्वी का तापमान शून्य से भी नीचे जा सकता है। हालांकि, आज ग्रीनहाउस गैसें नियंत्रण से बाहर हैं।

No other planet in the Solar System has an Earth-like atmosphere

जैसे-जैसे हम अधिक कार्बन डाईऑक्साइड वायुमंडल में छोड़ रहे है, पृथ्वी का ग्रीनहाउस प्रभाव और अधिक मज़बूत हो रहा है और धरती गर्म हो रही है। देखा जाए तो सौर मंडल के किसी भी अन्य ग्रह पर पृथ्वी जैसा वायुमंडल नहीं है। शुक्र का वायुमंडल सल्फ्यूरिक एसिड और कार्बन डाईऑक्साइड से भरा हुआ है, हवा इतनी गर्म है कि कोई भी इंसान वहां सांस नहीं ले सकता। शुक्र की सतह का तापमान इतना अधिक है कि सीसे जैसी धातु को पिघला दे और वायुमंडलीय दबाव तो पृथ्वी से लगभग 90 गुना अधिक है।  

जीवन के लिए वायुमंडल क्यों आवश्यक है | Why the atmosphere is necessary for life

पृथ्वी का वायुमंडल हमारे लिए जीवन है जिसके बिना हमारा अस्तित्व नहीं है।

जेरेमी फ्रे के अनुसार जीवन के पनपने के लिए पृथ्वी पर सही वातावरण होना आवश्यक था। जब यह वातावरण अस्तित्व में आया तब जीवन के लिए परिस्थितियां निर्मित हुईं। वायुमंडल जैविक प्रणाली का अभिन्न अंग है।

(देशबन्धु में प्रकाशित खबर का संपादित रूप)

वायु मंडल से संबंधित कुछ सामान्य प्रश्न – वायुमंडल किसे कहते हैं, वायुमंडल की परतें, वायुमंडल क्या है, वायुमंडल की संरचना, वायुमंडल का अर्थ, वायुमंडल में सबसे अधिक कौन सी गैस पाई जाती है, वायुमंडल में जल, वायुमंडल इन हिंदी, वायुमंडल से आप क्या समझते हैं, वायुमंडल का अर्थ क्या है, वायुमंडल का संगठन, वायुमंडल में गैसों की मात्रा, पृथ्वी के वायुमंडल, पृथ्वी के वायुमंडल की परतें, वायुमंडल के बारे में जानकारी, वायुमंडल में नाइट्रोजन कितने प्रतिशत है, वायुमंडल में ऑक्सीजन की मात्रा कितनी है, वायुमंडल में कौन कौन सी गैस पाई जाती है.

जानिए हमारे दैनिक जीवन में विज्ञान की उपयोगिता क्या है

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विज्ञान के बिना दुनिया की कल्पना | Imagine a world without science and technology

वर्तमान समय में हम चाहते हुए भी विज्ञान को अपने जीवन से निकल नहीं सकते। यदि विज्ञान के बिना दुनिया की कल्पना करें तो हमें एक गहरा शून्य ही दिखाई देता है। एक सामान्य उदाहरण के माध्यम से इस बात को साबित किया जा सकता है। कल्पना कीजिये कि अब तक एडिसन ने विद्युत् बल्ब का अविष्कार न किया होता तो (Edison would not have invented the electric bulb) शायद पूरी दुनिया अँधेरे में डूबी रहती। हियरिंग ऐड (Hearing aid) के आविष्कार ने बहरों को सुनने में मदद की है और कृत्रिम अंगों के उपयोग से अपंग व्यक्ति भी चलने-फिरने लायक बन गए हैं। यहाँ विज्ञान वरदान के समान साबित हुआ है (Science has proved to be a boon)।

The emergence of science is the biggest achievement of man in the development of human civilization.

हमारे चारों और विज्ञान है। हम सोच दुनिया  रहे हैं, भोजन कर रहे हैं, दौड़ रहे हैं या साँस ले रहे हैं; इन सभी जैविक क्रियाओं के पीछे कहीं न कहीं विज्ञान के सिद्धांत कार्य कर रहे हैं। मानव सभ्यता के विकास में विज्ञान का उद्भव मनुष्य की सबसे बड़ी उपलब्धि है। विज्ञान ने मनुष्यों को तमाम रोग-व्याधियों से मुक्ति दी है और असंख्य दैनिक सुविधाओं से लैश भी किया है। विज्ञान को मनुष्य का वफादार नौकर की संज्ञा दिया जा सकता है (Science can be described as a faithful servant of man) जो जीवन भर हमारे आदेशों का पालन करता रहता है।

विज्ञान वरदान या अभिशाप Essay in Hindi | दैनिक जीवन में विज्ञान और प्रौद्योगिकी का कार्यान्वयन

वहीं दूसरी तरफ यदि विज्ञान रूपी शक्ति का हम दुरुपयोग करें तो यह क्षण भर में विनाश का मंजर भी ला सकता है। परमाणु की शक्ति जहाँ एक तरफ लाखों घरों में बिजली का उजाला फैला सकती है, वहीँ दूसरी और परमाणु बम बनने पर जीवन में अँधेरा भी ला सकती है। विज्ञान ने हमारे जीवन के हर एक क्षेत्र में आमूल-चूल परिवर्तन लाये हैं और यह सब विज्ञान के सिद्धांतों के उपयोग से बने उन उपकरणों के कारण संभव हुआ है जिन्होंने हमारे जीवन को सरल बनाया है। आज जहाँ भी अपनी नजर दौड़ाएंगे तो यही पाएंगे कि विज्ञान के सिद्धांतों (Principles of science) के हमारे जीवन के हर क्षेत्र में व्यावहारिक उपयोग पर आज समूची दुनिया निर्भर हो चुकी है।

हम यहाँ पर विज्ञान के कुछ सिद्धांतों की चर्चा करेंगे जिनके व्यावहारिक उपयोग से बने उपकरणों और मशीनों ने हमारे जीवन को आरामदायक तथा सुविधासंपन्न बना दिया है।

If it were not the force of gravity

सबसे पहले हम गुरुत्वाकर्षण बल की बात करते हैं। पृथ्वी अपने भीतर मौजूद इस बल से सभी पदार्थों को अपनी ओर आकर्षित करती है जिसके परिणामस्वरूप पृथ्वी पर हम मनुष्यों सहित सभी जीव और अन्य पदार्थ स्थिर बने रहते हैं। यदि यह गुरुत्वाकर्षण बल न होता जैसा कि अंतरिक्ष में यह बल नगण्य होता है, तो पृथ्वी पर कोई भी वस्तु नहीं टिकती और हम सभी हवा में तैर रहे होते। इस बल की वैज्ञानिक व्याख्या सबसे पहले आईजक न्यूटन (Isaac Newton discoveries) ने दी थी जब बगीचे में एक पेड़ के नीचे बैठे हुए उन्होंने देखा कि पेड़ से सेब के टूटने पर वह जमीन पर ही गिरता है। वह सोच में पद गए कि सेब जमीन पर ही क्यों गिरा ? यह हवा में तैरने क्यों नहीं लगा ? मन में उठे इन सवालों के जवाब न्यूटन ढूंढने लगे और गुरुत्वाकर्षण बल का अपना महत्वपूर्ण वैज्ञानिक निष्कर्ष दुनिया के सामने रखा।

जानिए प्रकाश संश्लेषण का महत्व | Know the importance of photosynthesis

सूर्य के प्रकाश में असीम ऊर्जा छिपी होती है। ऊर्जा काम करने की शक्ति प्रदान करती है। हरे पौधे सूर्य के प्रकाश, वातावरण में मौजूद कार्बन डाई आक्साइड, हरी पत्तियों में स्थित क्लोरोफिल और जड़ों से मिले जल के संयोग से प्रकाश संश्लेषण नामक एक रासायनिक क्रिया पत्तियों के अन्दर करते हैं। इस रासायनिक क्रिया के परिणामस्वरूप जीवनदायी आक्सीजन गैस और कार्बोहाईड्रेट के रूप में भोजन का निर्माण होता है।

इस क्रिया में सूर्य के प्रकाश ऊर्जा का महत्वपूर्ण स्थान होता है। यदि सूर्य का प्रकाश न हो तो पौधों में प्रकाश संश्लेषण नामक क्रिया के नहीं होने से हमें तमाम प्रकार की हरी सब्जियां और अन्य खाद्यान्न नहीं मिल सकेगा। इसलिए हम कह सकते हैं कि प्रकाश ऊर्जा हमारे जीवन को सुचारू रूप से गतिशील बनाने में बेहद मददगार होता है।

जानिए लीवर के बारे में

माना जाता है कि प्राचीन मिश्र में भवन निर्माता लीवर की मदद से 100 तन से भी अधिक वजन को ऊपर उठा लेते थे। जब दो परस्पर जुड़े हुए सिरों के बीच में अधिक दूरी हो और एक सिरे पर अधिक वजन रख दें तथा विपरीत सिरे से थोडा बल लगाने पर ही दूसरे सिरे वाला आसानी से ऊपर उठ जाता है। इस प्रकार के उपकरण को लीवर कहते हैं।

लकड़ी, कोयले या तेल के दहन से रासायनिक ऊर्जा उत्पन्न होती है और इस ऊर्जा के उपयोग पर हमारे अनेक उद्योग निर्भर हैं। विद्युत ऊर्जा को उष्मीय ऊर्जा में परिवर्तित करके इसका उपयोग हम सर्दियों में हीटर, ब्लोवर, गीजर या एयर कंडिशनिंग मशीन में करते हैं। जब ऊर्जा अनुप्रस्थ तरंगों के रूप में किसी स्रोत से निकलकर लक्ष्य पदार्थ तक पहुंचकर उसमें कम्पन्न उत्पन्न करती है तो उसे ध्वनि ऊर्जा कहते हैं। विज्ञान के इस ध्वनि ऊर्जा के कारण हम टीवी, रडियो आदि अनेक इलेक्ट्रोनिक उपकरणों से निकल रही ऊर्जा को ध्वनि के रूप में अपने कानों द्वारा सुन पाने में समर्थ होते हैं।

आज के जीवन में जितने भी उपकरणों का हम प्रयोग कर रहे हैं जैसे वाशिंग मशीन, मिक्सर, स्कूटर, कार आदि ये सभी यांत्रिक ऊर्जा (Mechanical energy) से संचालित होते हैं। किसी उपकरण की गति के कारण जो ऊर्जा उत्पन्न होती है उसे वैज्ञानिक शब्दों में यांत्रिक ऊर्जा कहते हैं। यह यांत्रिक ऊर्जा किसी पदार्थ को दूसरे पदार्थ पर एक बल उत्पन्न करने में समर्थ बनती है। इस बल के कारण दूसरा पदार्थ अपनी स्थिति बदल देता है और विभिन्न उपकरणों में इससे अनेक उद्देश्य पूरे होते हैं। 

सूर्य की गर्मी से समुद्र और वायुमंडल में गर्मी उत्पन्न होती है। वायुमंडल के इस ऊष्मन के परिणामस्वरूप पवन ऊर्जा (Wind power) उत्पन्न होती है। पृथ्वी में चारों और वायु की गति से जो ऊर्जा बनती है उसे ही वास्तविक अर्थों में पवन ऊर्जा कहते हैं। यह ऊर्जा हम मनुष्यों और प्रकृति के अन्य जीवधारियों में जीवद्रव्य के निर्माण और श्वसन क्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

सौर ऊर्जा का हमारे जीवन में महत्व | Importance of solar energy in our life

सूर्य के प्रकाश की ऊर्जा (Sunlight energy) हम तक विकिरणों के माध्यम से पहुँचती है। इस ऊर्जा को सौर ऊर्जा कहते हैं। इस ऊर्जा का हमारे जीवन में बहुत अधिक महत्व है। सूर्य की ऊर्जा के बिना पृथ्वी पर जीवन कि कल्पना ही नहीं की जा सकती है। पेड़-पौधों की वृद्धि और विकास के अलावा सौर ऊर्जा को संचित करके सौर कुकर, सौर बिजली तथा अन्य सौर ऊर्जा चालित उपकरणों का निर्माण किया जा रहा है। सौर ऊर्जा पर्यावरण-प्रेम युक्ति है और इससे प्रदूषण उत्पन्न नहीं होता है। परमाणु के नाभिक से उत्पन्न ऊर्जा को नाभिकीय ऊर्जा कहते हैं। नाभिकीय विखंडन, नाभिकीय संलयन या रेडियोधर्मी क्षय से मिली अपर ऊर्जा के उपयोग से बिजली उत्पन्न की जाती है।

– डॉ. प्रशांत आर्य

(देशबन्धु में प्रकाशित लेख का संपादित रूप साभार)

मनुष्य से कई लाख साल पहले धरती पर आए बैक्टीरिया

Facts about bacteria

पृथ्वी पर बैक्टीरिया कब आए | Things You Didn’t Know About Bacteria

पृथ्वी पर बैक्टीरिया लगभग 3.8 से 4 अरब वर्ष पूर्व अस्तित्व में आए थे। पर्यावरण ने जीवित रहने और प्रजनन करने के लिए जो कुछ भी उपलब्ध कराया, वे उसी से काम चलाते रहे हैं। उनकी तुलना में मनुष्य पृथ्वी पर बहुत बाद में अस्तित्व में आए, कुछ लाख साल पहले। वर्तमान में पृथ्वी पर मनुष्य की कुल आबादी (Total human population on Earth) लगभग 7 अरब है। जबकि पृथ्वी पर बैक्टीरिया की कुल आबादी (Total population of bacteria on Earth) लगभग 50 लाख खरब है। ब्राहृांड में जितने तारे हैं उससे भी कहीं ज़्यादा बैक्टीरिया पृथ्वी पर हैं।

Facts about bacteria in the human body

कई बैक्टीरिया मनुष्यों से अपना पोषण प्राप्त करते हैं। इनमें से कई बैक्टीरिया मनुष्यों के लिए निरापद ही नहीं बल्कि फायदेमंद भी हैं। मनुष्य की आंत में लगभग 100 खरब बैक्टीरिया पाए जाते हैं जो हमारी वृद्धि और विकास में मदद करते हैं। लेकिन कुछ बैक्टीरिया हमें बीमार कर देते हैं और यहां तक कि जान भी ले लेते हैं। प्राचीन काल से ही मनुष्य ने जड़ी-बूटियों और औषधियों की मदद से इनके संक्रमण से निपटने के तमाम तरीके अपनाए हैं।

इसी संदर्भ में डॉ. रुस्तम एमिनोव ने फ्रंटियर इन माइक्रोबायोलॉजी (Frontiers in microbiology) में प्रकाशित अपने शोघ पत्र (एंटीबायोटिक युग का संक्षिप्त इतिहास : सबक और भविष्य की चुनौतियां) में बताया है कि प्राचीन काल में मिरुा के लोग संक्रमण से निपटने के लिए फफूंद लगी ब्रोड की पुल्टिस लगाते थे।

एक हालिया रास्ता | बैक्टीरिया में प्रजनन के प्रकार | What is penicillin | Penicillin in hindi meaning,

आधुनिक चिकित्सा आधारित उपचार कुछ ही वर्ष पुराना है। सन 1909 में डॉ. हारा ने सिफलिस संक्रमण से लड़ने के लिए आर्सफेनामाइन यौगिक (Arsphenamine, also known as Salvarsan or compound 606, compounds to fight syphilis infection) खोजा था। फिर सन 1910 में डॉ. बर्थाइम ने इसका संश्लेषण किया और सेलवार्सन नाम दिया। इसके बाद 1928 में एलेक्ज़ेंडर फ्लेमिंग ने पेनिसिलीन की खोज की थी। पेनिसिलीन कई सारे संक्रामक बैक्टीरिया को मार सकती थी।

धरती पर जीवन की कहानी | बैक्टीरिया परिचय

बैक्टीरिया से लड़ने के लिए हम जितनी नई दवाएं और रसायन खोजते हैं, उत्परिवर्तन (म्यूटेशन) के ज़रिए उतनी ही तेज़ी से बैक्टीरिया की जेनेटिक संरचना (Genetic structure of bacteria) बदल जाती है और बैक्टीरिया उस दवा के खिलाफ प्रतिरोध हासिल कर लेते हैं। इस तरह वैज्ञानिक और बैक्टीरिया के बीच यह रस्साकशी चलती ही रहती है। अब हम यह समझ गए हैं कि जब तक हम बैक्टीरिया संक्रमण फैलने में शामिल बुनियादी जीव वैज्ञानिक चरणों को नहीं समझ नहीं लेते तब तक हम बैक्टीरिया पर विजय नहीं पा सकेंगे।

बैक्टीरिया के जीव विज्ञान को समझने की दिशा में सूक्ष्मजीव विज्ञानी एशरीशिया कोली (ई. कोली) नामक बैक्टीरिया पर अध्ययन कर रहे हैं। अब हम जानते हैं कि बैक्टीरिया की कोशिका (Bacterial cells) एक रक्षात्मक कोशिका भित्ती से घिरी होती है। यह कोशिका भित्ती एक बड़ी थैली-नुमा संरचना से बनी होती है जिसे पेप्टीडोग्लायकेन (Peptidoglycan) या क्कत्र कहते हैं। जिस पेप्टीडोग्लायकेन का उपयोग बैक्टीरिया करते हैं, वह सिर्फ बैक्टीरिया में पाया जाता है, अन्यत्र कहीं नहीं।

Peptidoglycan structure

पेप्टीडोग्लायकेन थैलीनुमा संरचना होती है जो दो शर्करा अणुओं की शृंखलाओं से निर्मित कई परतों से मिलकर बनी होती हैं। ये परतें आपस में एक-दूसरे से जुड़ी होती हैं और बैक्टीरिया की कोशिका के इर्द-गिर्द एक निरंतर परत का निर्माण करती हैं। अर्थात जब बैक्टीरिया का आकार बढ़ता है तो ज़रूरी होता है कि यह पेप्टीडोग्लायकेनथैली भी फैलती जाए। पेप्टीडोग्लायकेन थैली फैलने के लिए पहले परतों के बीच की कड़ियां खुलेंगी, फिर नए पदार्थ जुड़ेंगे और एक बार फिर ये परतें आपस में कड़ियों के माध्यम से जुड़ जाएंगी। तभी तो बैक्टीरिया की वृद्धि हो पाएगी।

बैक्टीरिया पर काबू पाने की दिशा में निर्णायक चरण | Decisive steps towards overcoming bacteria

बैक्टीरिया पर काबू पाने की दिशा में हैदराबाद स्थित कोशिकीय व आणविक जीव विज्ञान केंद्र की डॉ. मंजुला रेड्डी और उनके साथियों ने महत्वपूर्ण कदम उठाया है। उन्होंने इस बात का बारीकी से अध्ययन किया है कि बैक्टीरिया कैसे कोशिका भित्ती बनाता है और वृद्धि को संभव बनाने के लिए कैसे पेप्टीडोग्लायकेन थैली खोलता है, और इस थैली को खोलने में कौन से रसायन मदद करते हैं।

अध्ययन में उन्होंने पेप्टीडोग्लायकेन थैली खुलने के लिए एंज़ाइम्स के खास समूह को ज़िम्मेदार पाया है। उनके अनुसार, यदि जेनेटिक इंजीनियरिंग (genetic engineering) की मदद से बैक्टीरिया में से इनमें से किसी एक या सभी एंज़ाइम को हटा दिया जाए तो पेप्टीडोग्लायकेन थैली नहीं खुलेगी, और बैक्टीरिया भूखा मर जाएगा।

इसका क्या मतलब है? इसका मतलब है कि यदि हम ऐसे कोई अणु या तरीके ढूंढ लेते हैं जिनकी मदद से हम इन एंज़ाइम्स को रोकने में सफल हो जाते हैं तो हम जीवाणुओं को उनके सुरक्षा कवच यानी कोशिका भित्ती को बनाने से रोक पाएंगे। इस तरह से संक्रमण पर काबू पा सकेंगे और सुरक्षित हो सकेंगे।

अन्य तरीके

प्रसंगवश, एंटीबायोटिक पेनिसिलीन (Antibiotic penicillin) भी उन्हीं एंज़ाइम्स को रोकती है जो कोशिका भित्ती खुलने के बाद उसे बंद करने के लिए ज़िम्मेदार होते हैं। भित्ती बंद ना हो पाने के कारण जीवाणु कमज़ोर हो जाता है और उसकी मृत्यु हो जाती है। तो यह तरीका हुआ भित्ती बंद ना होने देना। के शोधकर्ताओं द्वारा सुझाया तरीका है कोशिका भित्ती हमेशा बंद रहे, कभी ना खुले।

वर्तमान में लोकप्रिय एंटीबायोटिक औषधियां जिन्हें फ्लोरोक्विनोलॉन्स कहते हैं-Popular antibiotics called fluoroquinolones (Fluoroquinolone Antibiotics) (जैसे सिप्रॉफ्लॉक्सेसिन) कोशिका भित्ती पर सीधे असर नहीं करती लेकिन उन एंज़ाइम्स को रोकती हैं जो बैक्टीरिया के डीएनए (DNA of bacteria) को खुलने और प्रतियां बनाने में मदद करता है। इस तरह की औषधियां संक्रमण फैलाने वाले बैक्टीरिया को अपनी प्रतियां बनाकर संख्यावृद्धि करने और अपने जीन्स की मरम्मत करने से रोकती हैं।

डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन

(देशबन्धु में प्रकाशित लेख का संपादित रूप साभार )

ट्रंप बोले – भारत में बहुत गंदगी है, जस्टिस मार्कंडेय काटजू बोले क्या गलत कहा

Trump said - there is a lot of dirt in India, Justice Markandey Katju said what was wrong

Trump said – there is a lot of dirt in India, Justice Markandey Katju said what was wrong

नई दिल्ली, 24 अक्तूबर 2020. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और डेमोक्रैटिक प्रतिद्वंदी जो बिडेन मतदाताओं को लुभाने की हर संभव प्रयास में लगे हैं। दोनों के बीच राष्ट्रपति चुनाव से पहले अंतिम बहस हुई। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और डेमोक्रैटिक प्रतिद्वंदी जो बाइडेन मतदाताओं को लुभाने की हर संभव प्रयास में लगे हैं। इस बहस में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अभिन्न मित्र राष्ट्रपति ट्रंप ने भारत को लेकर आपत्तिजनक बात कह दी। उन्होंने कहा कि भारत में बहुत गंदगी है। लेकिन ट्रंप के इस वक्तव्य को मोदी विरोधी समझे जाने वाले भारत के सर्वोच्च न्यायालय के अवकाशप्राप्त न्यायाधीश जस्टिस मार्कंडेय काटजू का समर्थन मिल गया।

बता दें जो बाइडेन ने हर बार की तरह इस बार भी ट्रंप को कोरोना वायरस पर घेरा लेकिन ट्रंप ने कहा कि वह आशावाद और अवसर प्रदान करेंगे जबकि उनके प्रतिद्वंद्वी जो बाइडेन देश में निराशावाद, गरीबी और पतन लेकर आएंगे।

बाइडेन ने ट्रंप पर हमला करते हुए कहा कि कोरोना से लोग मर रहे हैं और ट्रंप इसकी ज़िम्मेदारी नहीं ले रहे। इस पर ट्रंप ने कहा कि मैं जिम्मेदारी लेता हूं लेकिन ये वायरस चीन से आया है। डिबेट के दौरान ट्रंप ने भारत का जिक्र करते हु कहा कि जलवायु परिवर्तन को लेकर लड़ाई में भारत, रूस और चीन का रिकॉर्ड खराब रहा है।

ट्रंप ने अमेरिका की तुलना अन्य देशों से करते हुए कहा, चीन, रूस, भारत को देखो, यहां कितनी गंदगी है, हवा गंदी है।

ट्रम्प ने कहा, हमारे पास सबसे स्वच्छ हवा, सबसे साफ पानी और सबसे अच्छा कार्बन उत्सर्जन है।

ट्रंप के कथन को लेकर हस्तक्षेप डॉट कॉम के संपादक अमलेन्दु उपाध्याय के साथ एक साक्षात्कार में जस्टिस मार्कंडेय काटजू ने ट्रंप का समर्थन करते हुए कहा कि ट्रंप ने जो कहा है उससे आंखें चुराने के बजाय सत्यता स्वीकार करनी चाहिए। हमारे यहां नदियां भयंकर रूप से प्रदूषित हो चुकी हैं, स्वच्छ भारत मिशन का कोई प्रभाव जमीन पर कहीं नजर नहीं आया।

बिहार विधानसभा चुनाव पर टिप्पणी करते हुए जस्टिस काटजू ने कहा कि वह इस चुनाव को गंभीरत से नहीं ले रहे हैं क्योंकि कोई भी जीते, इससे आम बिहारी के जनजीवन पर कोई असर नहीं पड़ेगा। बिहार के चुनाव में रोजगार, स्वास्थ्य जैसे बुनियादी मुद्दे गायब हैं, जबकि जातिगत समीकरणों का बोलबाला है।

आप भी हस्तक्षेप डॉट कॉम के यूट्यूब चैनल पर इस साक्षात्कार को सुन सकते हैं। चैनल सब्सक्राब भी करें।

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ऑस्ट्रेलिया में अडानी की बढ़ी मुश्किलें, कोयला खदान की मंजूरी हो सकती है रद्द

Gautam Adani (गौतम अदाणी) Chairman of Adani Group

Adani’s problems increase in Australia, coal mine approval may be canceled

ऑस्ट्रेलिया में अडानी की विवादास्पद कारमाइकल कोयला खदान की मंजूरी हो सकती है रद्द, खनन से क्षेत्रीय जलवायु और ग्रेट बैरियर रीफ को ख़तरा

New evidence suggests Great Barrier Reef World Heritage at risk from Adani coal mine emissions

नई दिल्ली, 22 अक्तूबर 2020. आज, ऑस्ट्रेलिया के दो युवाओं ने अपनी सरकार से अडानी समूह को कारमाइकल कोयला खदान में खनन के लिए मिली पर्यावरणीय अनुमतियों को निरस्त करने की माँग रखी है। इन युवाओं का दावा है कि नए सबूतों से पता चलता है कि अडानी कोयला खदान उत्सर्जन से ग्रेट बैरियर रीफ, जो कि एक वर्ल्ड हेरिटेज है, उसे भी ख़तरा है।

टाउनसविल से सत्रह वर्षीय ब्रुकलिन ओ’हर्न और केर्न्स से उन्नीस वर्षीय क्लेयर गैल्विन के लिए पैरवी करने वाले एनवीरोंमेंटल जस्टिस ऑस्ट्रेलिया (Acting for the teenagers — Brooklyn O’Hearn, 17, from Townsville; and Claire Galvin, 19, from Cairns — lawyers at Environmental Justice Australia) के वकीलों ने कहा कि तीन स्वतंत्र विशेषज्ञ रिपोर्ट पर्याप्त रूप से नए साक्ष्य प्रदान करती हैं जिनके आधार पर पर्यावरण मंत्री, सुसैन ले, निश्चिन्त हो कर अपनी शक्तियों का उपयोग कर अडानी को मिली पर्यावरणीय स्वीकृतियों को रद्द कर सकती हैं।

इस संदर्भ में ब्रुकलिन ओ’हर्न और क्लेयर गैल्विन ने कहा,

“जब से अदानी की खदान को मंजूरी मिली थी, हम ग्रेट बैरियर रीफ को जलवायु परिवर्तन के कारण कई बड़े पैमाइने की कोरल ब्लीचिंग (प्रवाल विरंजन) घटनाओं से पीड़ित होता देखते हुए बड़े हुए हैं। हम जानते हैं कि अगर अडानी की विशाल कारमाइकल कोयला खदान आगे बढ़ती है, तो यह दशकों के कार्बन उत्सर्जन को लॉक इन कर देगी और हमारे शानदार रीफ को नुकसान होगा।”

अपने वकीलों के माध्यम से, इन युवा महिलाओं ने जलवायु विशेषज्ञों और अर्थशात्रियों से सबूत प्राप्त किए हैं जिनसे यह पता चलता है कि प्रस्तावित खदान से वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में वृद्धि होगी और ग्रेट बैरियर रीफ पर एक महत्वपूर्ण नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा, जिससे इसका वर्ल्ड हेरिटेज (विश्व धरोहर) का दर्जा भी जोखिम में पड़ सकता है।

जलवायु वैज्ञानिक बिल हैर, निदेशक, जलवायु विश्लेषिकी और सहायक प्रोफेसर, मर्डोक विश्वविद्यालय द्वारा एक विशेषज्ञ रिपोर्ट अडानी के कारमाइकल कोयला खदान और हाइड पार्क और चाइना स्टोन कोयला खदानों से निर्यात किए गए उत्सर्जन के परिणामस्वरूप ग्रेट बैरियर रीफ को भारी नुकसान का अनुमान लगाती है जिसकी मूल अनुमोदन में पहचान नहीं की गई थी।

रिपोर्ट में पाया गया है कि –

• कारमाइकल कोल माइन और रेल इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट 60 वर्षों के लिए प्रति वर्ष 60 मिलियन टन CO2 उत्सर्जन कर सकता है, 10,230 वर्ग किलोमीटर की रीफ को नष्ट करना या क्षति पहुंचाते हुए–न्यूयॉर्क शहर के तेरह गुना से अधिक क्षेत्र।

• 2020 में ग्रेट बैरियर रीफ ने सबसे व्यापक कोरल ब्लीचिंग (प्रवाल विरंजन) रिकॉर्ड की गयी, और पहली बार गंभीर ब्लीचिंग (विरंजन) ने ग्रेट बैरियर रीफ के सभी तीन क्षेत्रों को प्रभावित किया।

• आज तक की पूर्व-औद्योगिक (1850-1900) के ऊपर 1°C के करीब ग्लोबल वार्मिंग से ग्रेट बैरियर रीफ को पहले से ही काफी नुकसान हो चुका है और इससे काफी नकारात्मक रूप से उसकी आउटस्टैंडिंग यूनिवर्सल वैल्यू (उत्कृष्ट सार्वभौमिक मूल्य) प्रभावित हुआ है, जिससे इसकी अखंडता और अक्षुण्णता में समझौता हुआ है।

• 1.5 डिग्री सेल्सियस की ग्लोबल वार्मिंग से कम से कम ग्रेट बैरियर रीफ की आउटस्टैंडिंग यूनिवर्सल वैल्यू (उत्कृष्ट सार्वभौमिक मूल्य) को गंभीर नुकसान होगा और 2° C की ग्लोबल वार्मिंग संभवतः इसे नष्ट कर देगा।

“हमारे उत्तर क्वींसलैंड समुदाय जीवित रहने के लिए एक स्वस्थ रीफ पर निर्भर हैं। हम रीफ पर, ऐसे समुदाय जिनके व्यवसाय और रोजगार इस पर निर्भर हैं, और आने वाली पीढ़ियों को जो एक स्वस्थ रीफ का आनंद लेने का मौका कभी नहीं पा सकती हैं, जलवायु परिवर्तन के विनाशकारी प्रभावों के बारे में गहराई से चिंतित हैं।”

“हमारे मित्र पर्यटन में और गोता लगाने वाली नावों में काम करते हैं। तीनों खानों से कोयला जलाने से होने वाले प्रभाव पर्यटन और आतिथ्य उद्योगों पर भारी पड़ेगें। यदि यह खदान आगे बढ़ती है तो केयर्न्स जैसे भरोसेमंद समुदाय लगातार कोरल ब्लीचिंग (प्रवाल विरंजन) से उबरने के लिए संघर्ष करेंगे, विशेष रूप से कोरोनावायरस महामारी के अतिरिक्त प्रभावों के साथ।”

यह दोनों युवा आगे कहती हैं,

“ऑस्ट्रेलिया के राष्ट्रीय पर्यावरण कानून के तहत आने वाली पीढ़ियों के लिए हमारे शानदार ग्रेट बैरियर रीफ की रक्षा करना संघीय सरकार का दायित्व है।”

नीतीश कुमार मुख्य ‘मौका’ मंत्री और मोदी उप मुख्य ‘धोखा’ मंत्री !

Lalu Prasad Yadav

Nitish Kumar chief ‘chance’ minister and Modi deputy chief ‘cheat’ minister!

नई दिल्ली, 22 अक्टूबर2020. राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव भले ही सजा काट रहे हों, लेकिन अपने ट्विटर हैंडल से वे बिहार विधानसभा चुनाव (Bihar Assembly Elections) में लगातार अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं। लालू यादव के ट्विटर हैंडल (lalu prasad yadav twitter,) से लगातार विरोधियों पर निशाना साधा जा रहा है। इसी क्रम में गुरुवार को लालू के ट्विटर हैंडल से किए गए ट्वीट (lalu yadav tweet) से बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को मुख्य ‘मौका’ मंत्री और उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी को उप मुख्य ‘धोखा’ मंत्री बताया गया है।

लालू के ट्विटर हैंडल से एक कार्टून भी पोस्ट किया गया है, जिसमें नीतीश, सुशील मोदी को मौका मांगते दिखाया गया है, जबकि जनता उनसे कितना मौका देने की बात कह रही है।

लालू ने कार्टून के साथ ट्वीट करते हुए लिखा,

 ”मुख्य-मौका मंत्री जी और उप मुख्य-धोखा मंत्री जी, जनता ने बहुत दिया आपको मौका और आप ने दिया जनता को धोखा।”

उल्लेखनीय है कि लालू ट्विटर के जरिए लगातार विरोधियों पर निशाना साध रही है। लालू चारा घोटाला के मामले में जेल में बंद हैं। फिलहाल स्वास्थ्य कारणों से वे रांची के रिम्स में भर्ती हैं।

भारत में बीते वर्ष हर मिनट तीन लोग वायु प्रदूषण से मरे!

India recorded highest air pollution exposure globally in 2019

India recorded the highest air pollution exposure globally in 2019

India recorded the highest annual average PM 2.5 concentration exposure in the world last year, according to the State of Global Air 2020 (SOGA 2020) report released on Wednesday.

नई दिल्ली, 21 अक्तूबर 2020. आज जारी एक वैश्विक रिपोर्ट के अनुसार भारत में पिछले साल 16,70,000 हज़ार मौतों का सीधा सम्बन्ध वायु प्रदूषण से था। रिपोर्ट के अनुसार घरेलू वायु प्रदूषण में तो कमी आई है, मगर बाहर पीएम2.5 का चिंताजनक स्तर बरकरार है। अब वायु प्रदूषण देश में सेहत के लिये सबसे बड़ा खतरा बन गया है।

पिछले साल, वायु प्रदूषण के चलते हर मिनट, औसत, तीन लोगों ने अपनी जान गँवा दी।

बात बच्चों की करें तो साल 2019 में हर पन्द्रह मिनट पर तीन नवजात अपने जन्म के पहले महीने ही इन ज़हरीली हवाओं की भेंट चढ़ गए।

इन हैरान करने वाले तथ्यों का ख़ुलासा स्टेट ऑफ ग्लोबल एयर 2020 (SOGA 2020) नाम से आज जारी हुई एक वैश्विक रिपोर्ट से हुआ।

नवजात बच्चों पर वायु प्रदूषण के वैश्विक प्रभाव को लेकर किये गये अपनी तरह के पहले अध्ययन के मुताबिक वर्ष 2019 में भारत में जन्में 116000 से ज्यादा नवजात बच्चे घर के अंदर और बाहर फैले वायु प्रदूषण की भेंट चढ़ गये।

स्टे‍ट ऑफ ग्लोबल एयर 2020 (एसओजीए 2020) शीर्षक वाले इस वैश्विक अध्ययन के मुताबिक इनमें से आधी से ज्यादा मौतों के लिये बाहरी वातावरण में फैले पीएम 2.5 के खतरनाक स्तर जिम्मेदार हैं। बाकी मौतों का सम्बध खाना बनाने के लिये कोयला, लकड़ी और उपले जलाये जाने से फैले घरेलू प्रदूषण से है।

लम्बे समय तक घरेलू और बाहरी प्रदूषण के सम्पर्क में रहने के परिणामस्वरूप वर्ष 2019 में भारत में लकवा, दिल का दौरा, डायबिटीज, फेफड़े के कैंसर, फेफड़ों की गम्भीर बीमारी और नवजातों की बीमारियों से 16 लाख 70 हजार मौतें हुईं। मतलब हर दिन औसतन 4500 लोगों की जान गयी इसके चलते।

वहीं बात नवजात बच्चों की करें तो 1,16,000 मौतों का मतलब हुआ इस प्रदूषण के असर के चलते हर पन्द्रह मिनट पर लगभग तीन बच्चे जान से हाथ धो बैठे।

इन बच्चों में से ज्यादातर की मौत जन्म के वक्त वजन कम होने और समय से पहले पैदा होने के कारण हुई और इसके पीछे असल वजह थी वायु प्रदूषण।

For the first time, the State of Global Air 2020 includes statistics on how pollution affects babies in their first month of life.

एसओजीए 2020 की रिपोर्ट के मुताबिक कुल मिलाकर वायु प्रदूषण सभी तरह के स्वास्थ्य जोखिमों में से सबसे बड़ा खतरा बन गया है। हेल्थ इफेक्ट्सी इंस्टीट्यूट (एचईआई) द्वारा www.stateofglobalair.org वेबसाइट पर आज प्रकाशित की गयी रिपोर्ट Air Pollution and Newborns में भी यही बात कही गयी है।

इस रिपोर्ट में बाह्य वायु प्रदूषण के उच्च स्तर की मौजूदा चुनौती का खास तौर पर जिक्र किया गया है। भारत, बांग्लादेश, पाकिस्तान और नेपाल समेत दक्षिण एशियाई देश वर्ष 2019 में पीएम2.5 के उच्चतम स्तर के मामले में शीर्ष 10 देशों में रहे। इन सभी देशों में वर्ष 2010 से 2019 के बीच आउटडोर पीएम 2.5 के स्तरों में बढ़ोत्तरी देखी गई है। खाना पकाने के लिए ठोस ईंधन का इस्तेमाल हालांकि कुछ कम हुआ है। वर्ष 2010 से अब तक घरेलू वायु प्रदूषण के संपर्क में आने वाले लोगों की संख्या में 5 करोड़ से ज्यादा की कमी आई है। प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना तथा अन्य कार्यक्रमों की वजह से स्वच्छ ऊर्जा तक पहुंच बनाने में नाटकीय ढंग से विस्तार हुआ है। खासतौर से ग्रामीण इलाकों में इसका खासा असर देखा जा रहा है। अभी हाल ही में नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम ने विभिन्न शहरों और देश के अनेक राज्यों में वायु प्रदूषण के स्रोतों के खिलाफ कड़े कदम उठाए हैं।

Relationship between air pollution and COVID-19 | How Has COVID-19 Affected Air Quality?

यह रिपोर्ट ऐसे वक्त आई है जब दुनिया में कोविड-19 महामारी का जोर है। इस वायरस के कारण दिल और फेफड़ों के रोगों से जूझ रहे लोगों में संक्रमण और मौत का खतरा और भी बढ़ गया है। भारत में इस वायरस से अब तक 110000 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है। हालांकि वायु प्रदूषण और कोविड-19 के बीच संबंध की मुकम्मल जानकारी उपलब्ध नहीं है लेकिन वायु प्रदूषण और दिल तथा फेफड़े के रोगों के बीच संबंध जगजाहिर है। इसकी वजह से दक्षिण एशियाई तथा पश्चिम एशिया के देशों में लोगों के सर्दियों के दौरान वायु प्रदूषण के उच्च स्तर के संपर्क में आने से कोविड-19 के प्रभाव और भी ज्यादा नुकसानदेह होने की आशंका बढ़ रही है।

एचईआई के अध्यक्ष डैन ग्रीनबॉम ने कहा कि किसी भी नवजात शिशु की सेहत उस समाज के भविष्य के लिए बेहद महत्वपूर्ण होती है और इस रिपोर्ट से मिले ताजा सबूतों से यह पता चलता है कि खासकर दक्षिण एशिया और उप सहारा अफ्रीका के देशों में नवजात बच्चों पर खतरा बहुत बढ़ गया है। हालांकि घरों में खराब गुणवत्ता का ईंधन जलाए जाने के चलन में धीमी रफ्तार से, मगर निरंतर गिरावट दर्ज की जा रही है। हालांकि ऐसे ईंधन से फैलने वाला वायु प्रदूषण अब भी नवजात बच्चों की मौत की प्रमुख वजह बना हुआ है।

नवजात बच्चों का पहला महीना उनकी जिंदगी का सबसे जोखिम भरा दौर होता है, मगर भारत में आईसीएमआर के हालिया अध्ययनों समेत दुनिया के विभिन्न देशों से प्राप्त वैज्ञानिक प्रमाण यह संकेत देते हैं कि गर्भावस्था के दौरान वायु प्रदूषण के संपर्क में आने से बच्चे का वजन कम होता है और समय से पहले जन्म लेने की घटनाएं भी होती हैं। यह दोनों ही स्थितियां गंभीर गड़बड़ियों से जुड़ी हैं, जिनकी वजह से शैशवावस्था में ज्यादातर बच्चों की मौत होती है (वर्ष 2019 में 455000)।

‘स्टेट ऑफ ग्लोबल एयर’ में इस साल प्रकाशित नए विश्लेषण में अनुमान लगाया गया है कि विभिन्न कारणों से होने वाली नवजात बच्चों की मौत की कुल घटनाओं में से करीब 21% के लिए वातावरणीय और घरेलू वायु प्रदूषण जिम्मेदार है।

वायु प्रदूषण एवं स्वास्थ्य विशेषज्ञ डॉक्टर कल्पना बालाकृष्णन ने कहा

‘‘निम्न तथा मध्यम आय वाले देशों के लिए गर्भावस्था से जुड़े प्रतिकूल परिणामों और नवजात बच्चों की सेहत पर वायु प्रदूषण के नुकसानदेह प्रभावों से निपटना बेहद जरूरी है। यह न सिर्फ कम वजन के बच्चों के पैदा होने बल्कि समय से पहले जन्म लेने और उनका ठीक से विकास ना होने के लिहाज से ही महत्वपूर्ण नहीं है। यह जोखिम वाले समूहों पर मंडराते खतरे को टालने के लिए रणनीतिक समाधान तैयार करने के लिहाज से भी जरूरी है।

द स्टेट ऑफ ग्लोबल ईयर 2020 की वार्षिक रिपोर्ट और उसकी संवादात्मक वेबसाइट को हेल्थ इफैक्ट्स इंस्टीट्यूट ने डिजाइन करने के साथ-साथ जारी भी किया है। इस काम में वाशिंगटन यूनिवर्सिटी में इंस्टीट्यूट फॉर हेल्थ मेट्रिक्स एंड इवैल्यूएशन (Institute for Health Metrics and Evaluation at Washington University) (आईएचएमई2)और यूनिवर्सिटी ऑफ ब्रिटिश कोलंबिया (University of British Columbia) ने भी सहयोग किया है। इसमें बताए गए निष्कर्ष ग्लोबल बर्डन ऑफ़ डिजीजGlobal Burden of Disease (जीबीडी3) के बिल्कुल ताजा अध्ययन पर आधारित हैं।

इस अध्ययन को अंतर्राष्ट्रीय मेडिकल जर्नल द लांसेट ने 15 अक्टूबर 2020 को प्रकाशित किया है।

एचईआई, जीबीडी के वायु प्रदूषण से जुड़े हिस्से का नेतृत्व करता है। एचईआई की रिपोर्ट और वेबसाइट अपनी तरह के पहले दस्तावेज और वेबसाइट हैं, जहां वायु प्रदूषण के संपर्क और उनके कारण उत्पन्न बीमारियों के बोझ के अनुमानों को जीबीडी वायु प्रदूषण विश्लेषण में शामिल करके इसे सभी के लिए पूरी तरह उपलब्ध कराया गया है।

अगर कोविड की आर्थिक मार से निबटने में पर्यावरण अनुकूल कदम उठाए भारत तो जीडीपी स्थायी रूप से बढ़ सकती है

Climate change Environment Nature

भारत अगर कोविड की आर्थिक मार से निबटने और उबरने के प्रयासों में पर्यावरण अनुकूल कदम लेगा तो उसकी जीडीपी स्थायी रूप से बढ़ सकती है।

A report to be published on Monday shows that green recovery measures in response to the COVID crisis have better economic returns than a standard consumer stimulus approach that seeks to get “back to normal”.

जी हाँ, केम्ब्रिज युनिवर्सिटी से जुड़े तीन संस्थानों ने साझा प्रयास से एक रिपोर्ट जारी कर न सिर्फ़ यह कहा है कि पर्यावरण अनुकूल आर्थिक सुधार कदम एक आम रिकवरी स्टिमम्युल्स से बेहतर होते हैं, बल्कि भारत के केस में तो ग्रीन रिकवरी हमेशा के लिए भारत की जीडीपी को बढ़ा सकती है।

इस रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया है कि भारत में तो यह असर ऐसे होंगे कि 2030 तक कोविड के सभी बुरे असर हमारी अर्थव्यवस्था से हट जायेंगे।

The report, modelled by Cambridge Econometrics and published by We Mean Business and Cambridge University’s Corporate Leaders Group

कैंब्रिज इकोनोमेट्रिक्स द्वारा बनाई गयी और वी मीन बिज़नेस और कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के कॉर्पोरेट लीडर्स ग्रुप द्वारा साझा रूप से प्रकाशित इस रिपोर्ट में कहा गया है कि जहाँ आम रिकवरी स्टिमम्युल्स पैकिज कोविड से पहले की स्थिति पर वापस ले जाने की बात करते हैं, वहीँ ग्रीन रिकवरी हमेशा के लिए सकारात्मक बदलाव का वादा करती है।

आर्थिक रिकवरी के लिए इस रिपोर्ट में दो रास्ते बताये गए हैं। पहला है टैक्स में कटौती कर उपभोक्ता को अधिक खर्च करने के लिए प्रेरित करना और दूसरा है टैक्स कटौती के साथ पाँच पर्यावरण अनुकूल कदम। यह पांच कदम हैं एनेर्जी एफिशिएंसी, बिजली की ग्रेड में सुधार, सौर और पवन ऊर्जा पर सब्सिडी, बैट्री वाहनों पर सब्सिडी और पुरानी पेट्रोल-डीजल गाड़ियों के निस्तारण की स्कीम, और पौधारोपण का वृहद् कार्यक्रम।

रिपोर्ट से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि ग्रीन रिकवरी के कदम न सिर्फ़ लम्बे समय में फायदा देते हैं, उनके सकारात्मक असर तत्काल भी देखने को मिलेंगे।

भारत पर विशेष टिप्पणी करते हुए इस रिपोर्ट में बताया गया है कि बिक्री कर में कटौती वाला तरीका हो या उस कटौती के साथ पर्यावरण अनुकूल कदम लेना हो, दोनों ही सूरत में तत्काल प्रभाव अगले साल देखने को मिलेंगे, लेकिन ग्रीन रिकवरी का रास्ता अगर अपनाया जाता है तो जीडीपी में 2030 तक स्थायी बढ़ोतरी दर्ज की जाएगी और यह कोविड के असर को हमेशा के लिए मिटा देगी।

रिपोर्ट में आगे बताया गया है कि जीडीपी (79%) और रोजगार (64%) दोनों में सबसे बड़ा योगदान बैट्री वाहनों को बढ़ावा देने और पुराने वाहनों के निस्तारण से होगा। वहीँ वृक्षारोपण कार्यक्रम अतिरिक्त जीडीपी में 10% और रोजगार में 27% की बढ़ोतरी करेगा। अब क्योंकि भारत में कोयले पर निर्भरता काफ़ी है इसलिए इलेक्ट्रिक वाहनों का उतना असर नहीं होगा जितना एनर्जी एफिशिएंसी और रिन्यूबल एनर्जी सब्सिडी (Energy Efficiency and Renewable Energy Subsidies) से हो सकता है।

निष्कर्षों पर टिप्पणी करते हुए, द एनर्जी एंड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट (TERI) के महानिदेशक डॉ. अजय माथुर -Dr Ajay Mathur, Director General, The Energy and Resources Institute (TERI) ने कहा,

“इस रिपोर्ट के निष्कर्षों से यह स्पष्ट होता है कि ऊर्जा के विकास में तेजी लाने वाली हरित वित्त समर्थक नीतियां भारत के विकास के लिए अच्छी हैं। इलेक्ट्रिक वाहन क्षेत्र के बुनियादी ढांचे और पुनर्वितरण का समर्थन स्पष्ट रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्र हैं। शुक्र है कि भारत सरकार पहले ही कदम उठा रही है। हालांकि, सीमित और ख़त्म होते घरेलू राजकोषीय भंडार को देखते हुए, सवाल अब यह होना चाहिए कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय इस तरह की ग्रीन रिकवरी को संभव करने के लिए कैसे मदद कर सकता है।”

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