जेयर बोल्सोनारो के सत्ता में आने के बाद सेअमेज़ॅान जंगल ने बेल्जियम के दोतिहाई हिस्से के बराबर वन खो दिया

Jair Bolsonaro

अमेज़ॅान जंगल  ने बेल्जियम के दो तिहाई हिस्से के बराबर वन खो दिया

Brazilian Amazon forest lost two-thirds of Belgium since Jair Bolsonaro took office

Deforestation more than 30% up for the second consecutive year; fires skyrocket in August

नई दिल्ली, 10 अगस्त 2020.  जेयर बोल्सोनारो के पदभार संभालने के बाद से ब्राजील के अमेज़ॅान वन ने बेल्जियम का दो तिहाई हिस्सा खो दिया है। आज जारी किए गए आधिकारिक डेटा के अनुसार ब्राजील के अमेज़ॅन में वनों की कटाई की दर 9.205 वर्ग किमी, पिछले 12 महीनों में 34% की वृद्धि हुई है।

यह एक नया कीर्तिमान है और पिछले 12 महीनों (अगस्त 2018 और जुलाई 2019 के बीच) में कटाई की दर के समान पहुंच गया, जब अमेज़ॅान वन ने 10,129 किमी² वन खोया था।

अगर जंगल की कटाई का सिलसिला यूंही चलता रहा तो अमेज़ॅान एक टिपिंग पॉइंट 20 से कम वर्षों में पहुंच सकता है, और स्थायी रूप से क्षेत्रीय मौसम के पैटर्न को बदल सकता है, जीवित वर्षावन को सूखे सवाना में बदल सकता है और अरबों टन कार्बन को वायुमंडल में जारी कर सकता है।

Bolsonaro’s government almost doubled the pace of destruction of the Brazilian Amazon forest.

अगस्त 2019 और जुलाई 2020 के बीच पाया गया वनों की कटाई का क्षेत्र दो साल पहले की तुलना में 101% अधिक है, जिसका अर्थ है कि बोल्सनारो की सरकार ने ब्राजील के अमेज़ॅन वन के विनाश की गति लगभग दोगुनी कर दी।

गौरतलब है कि अमेज़न दुनिया का सबसे बड़ा रेनफॉरेस्ट (वर्षावन) है, जो धरती  पर सबसे बड़ी जैव विविधता का घर है और एक विशाल कार्बन सिंक है। पर अगर नष्ट हो गया तो यह ग्रीन हाउस गैसों ( GHG) के उत्सर्जन का एक गंभीर  स्रोत है क्योंकि जब पेड़ों को काटा जाता है, तो ग्लोबल वार्मिंग में तेजी लाते हुए CO2 की एक बड़ी मात्रा वायुमंडल में उत्सर्जित होती है।

ब्राजील में GHG (जीएचजी) उत्सर्जन के 44% के लिए वनों की कटाई ज़िम्मेदार है – यह दुनिया में 6वाँ सबसे बड़ा उत्सर्जक है। 2020 में, वनों की कटाई और कृषिक्रम  के कारण, देश 2018 से सबसे हाल के आंकड़ों की तुलना में 10% -20% अधिक ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन कर सकता है।

ज्ञात हो कि ब्राजील के अमेज़ॅन जंगल में आग (Brazilian Amazon Wildfire) का मौसम शुरू हो चुका है और हम शायद 2019 से भयावह छवियों का दोहराव देखेंगे या स्थिति को और भी ज़्यादा बिगड़ते हुए देखेंगे। अमेज़ॅन वन को कृषि योग्य भूमि में बदलने की प्रक्रिया में आग केवल एक कदम है। आग में जलकर खाली ज़मीन पर या तो सोया की खेती की जाती है और या पशुपालन के काम में लाई जाती है।

अमेज़ॅान एनवायरनमेंटल रिसर्च इंस्टीट्यूटamazon environmental research institute (ipam), (आईपीएएम) के अनुसार, पिछले साल  कब्ज़ा किए गए 87,000 से अधिक हॉट स्पॉट के लिए ऐसी आग लगने की घटनाएं ज़िम्मेदार थीं ।

अगर हम 20 महीने की अवधि पर विचार करते हैं क्योंकि 2019 की पहली जनवरी को Jair Bolsonaro ने पदभार संभाला है, तो अमेज़ॅन वर्षावन ने 20.500 km th खो दिया – जो कि  बेल्जियम के लगभग दो तिहाई, हिस्से या 30689 किमी² के बराबर या फिर आधे  स्विट्जरलैंड (41 285 km²) के बराबर  है।

Related topics – जायर बोल्सनारो, जायर बोल्सनारो अमेज़न वन, जायर बोल्सनारो अमेज़न पॉलिसी, जायर बोल्सनारो अमेज़न वनों की कटाई, ब्राज़ीलियाई अमेज़न में वनों की कटाई, ब्राज़ील में वनों की कटाई के प्रभाव, Jair Bolsonaro,jair bolsonaro amazon forest,jair bolsonaro amazon policy,jair bolsonaro amazon deforestation,deforestation in the brazilian amazon,effects of deforestation in brazil.

मोदी सरकार के देश बेचो अभियान के खिलाफ रायगढ़ में भी हुआ भारत बचाओ सत्याग्रह आंदोलन

National news

Save India Satyagraha movement in Raigad against Modi government’s Sell country campaign

रायगढ़ 09 अगस्त 2020. केंद्रीय ट्रेड यूनियनों राज्य कर्मचारी फेडरेशन एवं किसान संगठनों के संयुक्त आव्हान पर 09 अगस्त 2020 को राष्ट्रव्यापी भारत बचाओ सत्याग्रह आंदोलन पूरे देश भर में सफलता पूर्वक मनाया गया। जबरदस्त विरोध प्रदर्शन किया गया। पूरे देश में केंद्र सरकार की जनविरोधी,किसान विरोधी,कर्मचारी विरोधी तथा कार्पोरेट्स परस्त नीतियों के खिलाफ जनाक्रोश अभिव्यक्त हुआ।

देश के कोने-कोने में इन्कलाब जिंदाबाद, कार्पोरेट्स घरानों के हाथों देश को बेचना बंद करो। किसानों को उनके उत्पाद का उचित मूल्य दो, देश के नवरत्न राष्ट्रीयकृत सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों को कौड़ी के दाम बेचना बंद करो। निजीकरण की नीति बंद करो। शिक्षा व स्वास्थ्य चिकित्सा के ढांचे को मजबूत करो, देश को गुलाम बनाने वाली नीतियां वापस लो, कोरोना की आड़ में देश को बेचना बंद करो। देश को धोखा देना बंद करो। भुखमरी, गरीबी एक त्रासदी है,पूंजीपतियों को लाभ पहुंचाने का अवसर नहीं, रेल देश की धड़कन है इसकी हिफाज़त करो, नई पेंशन योजना वापस लो पुरानी पेंशन योजना लागू करो, खाली हाथों को काम भूखों को रोटी दो, आत्मनिर्भरता के नाम पर राष्ट्रीयकृत संस्थाओं का निजीकरण बंद करो।झूठी घोषणाएं बंद करो, देश की संप्रभुता व अर्थव्यवस्था की रक्षा करो, देश की राष्ट्रीय एकता अखंडता व सांप्रदायिक सद्भाव की रक्षा करो। कार्पोरेट्स परस्त नीतियों वापस लो और देश बचाओ के नारे व पोस्टर प्रदर्शन के साथ बहुत कड़ा विरोध प्रदर्शन किया गया।

यह जानकारी देते हुए ट्रेड यूनियन कौंसिल रायगढ़ के गणेश कछवाहा ने बताया कि चूंकि रायगढ़ जिला प्रशासन द्वारा 09 अगस्त रविवार को कोविड-19 महामारी के बढ़ते खतरे को देखते हुए पूर्ण लॉक डाउन का आदेश जारी किया गया है। अतः कोरोना तथा प्रशासनिक दिशा निर्देश व नियमों का अनुपालन करते हुए राष्ट्रव्यापी भारत बचाओ सत्याग्रह आंदोलन को सफल बनाने के लिए प्रत्येक ट्रेड यूनियन सहयोगी संगठन के सदस्य मजदूर किसान एवं प्रबुद्धजन अपने अपने कार्य स्थलों या घरों के सामने अपनी मांगों व मुद्दों से संबंधित पोस्टर हाथों में लेकर फोटो सोशल मीडिया और संगठन के ग्रुप में पोस्ट कर कार्पोरेट्स की गुलामी से देश को बचाने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया।

उल्लेखनीय है कि केंद्र सरकार द्वारा लगातार देश की नवरत्न राष्ट्रीयकृत सार्वजनिक उपक्रमों को कौड़ी के दाम कार्पोरेट्स घरानों को बेचा जा रहा है। देश की राष्ट्रीय सम्पदा व संस्थानों को निजीकरण की नीति के तहत कॉरपोरेट्स घरानों के हाथों गिरवी रखने की कोशिश की जा रही है। आत्मनिर्भरता के नाम पर देश की आर्थिक संप्रभुता व आत्म निर्भर भारत की बुनियाद को ही खत्म किया जा रहा है। श्रमिक, मजदूर, किसान गरीब आम जनता के अधिकारों की अनदेखी की जा रही है। ब्रिटिश हुकूमत के दमन, अत्याचार, शोषण व गुलामी से मुक्ति के लिए 09 अगस्त 1942 को अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन चलाया गया था। इसी ऐतिहासिक तिथि के अवसर पर सेंट्रल ट्रेड यूनियनों, केंद्रीय राज्य कर्मचारी फेडरेशन एवं किसान संगठनों ने संयुक्त रूप से कॉरपोरेट्स घरानों की गुलामी एवं केंद्र सरकार की जनविरोधी व देश को आर्थिक गुलाम बनाने वाली नीतियों के खिलाफ 09 अगस्त 2020 को भारत बचाओ अभियान सत्याग्रह आंदोलन को सफल बनाने का आव्हान किया था।

भारतीय बिजली वितरण क्षेत्र के 66 बिलियन डॉलर की देनदारी कम करने में पुराने और अकुशल बिजली संयंत्र पहला रोड़ा : आईईईएफए

IEEFA

IEEFA India: Retiring old thermal power first hurdle in reducing discom debt of well over Rs478,000 crore ($63.8bn)

नई दिल्ली, 06 अगस्त 2020. भारत के बिजली वितरण क्षेत्र में फ़िलहाल 66 बिलियन डॉलर की देनदारी है जिसे कम करने में सबसे बड़ा रोड़ा पुराने और अकुशल बिजली संयन्त्र हैं। इन पुराने हो चुके संयंत्रों से मिले नुकसान से मिली इस देनदारी के चलते इस क्षेत्र में वित्तीय और परिचालन अक्षमताओं का बढ़ना जारी है।

यह कहना है इंस्टीट्यूट फॉर एनर्जी इकोनॉमिक्स एंड फाइनेंशियल एनालिसिस (IEEFA) का अपनी ताज़ा रिपोर्ट में।

IEEFA की विभूति गर्ग और कशिश शाह द्वारा लिखित इस रिपोर्ट में,  अन्य रणनीतियों के साथ-साथ, इस बात की सिफारिश की गई है कि बिजली वितरण कम्पनियां बिजली खरीद की अपनी औसत लागत को कम करने के लिए राज्य सरकारों के साथ मिलकर सबसे पहले अपने पुराने अकुशल और महंगे थर्मल पावर प्लांट्स को कम करने पर ध्यान दें।

इस पर प्रतिक्रिया देते हुए विभूति ने कहा,

“कई थर्मल पावर स्टेशन इतने पुराने हैं कि वो आधी क्षमता पर ही काम कर रहे हैं लेकिन अनुबन्ध नियमों की बाध्यता के चलते राज्यों को उनके भारी शुल्क का भुगतान जारी रखना पड़ता है।”

वह आगे कहती हैं,

“हम समझते हैं कि पावर प्लांटों को रिटायर करना आसान नहीं है लेकिन एक स्वच्छ, सस्ती ऊर्जा अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ने और अपने ऋण को कम करने के लिए यह एक ज़रूरी कदम है।

अपने जीवन काल के आख़िरी छोर पर पहुंचे इन अकुशल थर्मल पावर प्लांट्स से किनारा करने से राज्य न सिर्फ़ अपने घाटे कम कर पाएंगे, बल्कि बिजली उत्पादन की नयी और पर्यावरण के लिए बेहतर तकनीक में निवेश करने कि स्थिति में पहुँच पाएंगे। यही वजह रही है है कि पिछले एक दशक में सरकार से कई बेलआउट पैकेज प्राप्त करने के बाद भी डिस्कॉम अपने परिचालन प्रदर्शन में सुधार नहीं कर पाया है।

हालांकि, डिस्कॉम की वित्तीय स्थिरता और व्यवहार्यता में सुधार करने के लिए कोई जादू की छड़ी नहीं है, लेकिन यह रिपोर्ट महाराष्ट्र, राजस्थान और मध्य प्रदेश की केस स्टडीज़ का विश्लेषण कर इन राज्यों के लिए कुछ सिफारिशों के साथ भारत सरकार के लिए भी सुझाव देती है जो कि इस प्रकार हैं:

 

  1. पुराने और अकुशल संयंत्रों को बंद करने से न सिर्फ़ प्रदूषण और कार्बन उत्सर्जन कम होगा, फिक्स्ड चार्ज के भुगतान की भी बचत होगी।

 

  1. प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (डीबीटी), सौर सिंचाई पंप, सौर रूफटॉप सिस्टम जैसी योजनाओं को अनुमति देते हुए स्वस्थ प्रतिस्पर्धा बढ़ाने के लिए क्रॉस-सब्सिडी को कम करना।

 

  1. डिजिटलीकरण के माध्यम से तमाम नुकसान और चोरी को रोकना। डिजिटल और प्रीपेड मीटरों को स्थापित करने से डिस्कॉम अपने लोड को बेहतर ढंग से प्रबंधित कर पाएंगी।

 

  1. सालाना टैरिफ को संशोधित करने से डिस्कॉम को महंगाई के साथ तालमेल रखने में मदद मिलेगी।

 

  1. निजी क्षेत्र से प्रतिस्पर्धा बढ़ाने से उत्पादक, वितरक और बिजली आपूर्ति कंपनियों पर अपनी दक्षता बढ़ाने, लागत कम करने, और आपूर्ति को अधिक विश्वसनीय बनाने का प्रोत्साहन मिलेगा।

 

  1. राष्ट्रीय पूल बाजार में जाना राष्ट्रीय स्तर पर उत्पादन को सुधारेगा।

 

  1. इस तरह से नए टैरिफ ढांचे को लागू करना जिससे सौर और पवन ऊर्जा टैरिफ में शुरूआती 5 सालों में 10-20 प्रतिशत की कमी लायी जा सके और महंगी और अकुशल थर्मल क्षमता से किनारा किया जा सके।

अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कशिश शाह ने कहा,

” राज्य वितरण कम्पनियों को बार-बार बेल आउट करने का कोई मतलब नहीं है। ज़रूरत है एक ऐसी व्यवस्था को लागू करना कि ऐसी स्थितियां बार-बार न बनें।”

उन्होंने आगे कहा,

“भारत सरकार को इन सिफारिशों को लागू करने पर विचार करना चाहिए और अगर राज्य सरकारों को किसी प्रकार की मदद चाहिए भी तो उसे उनकी परफोर्मेंस से जोड़ देना चाहिए।”

आगे, विभूति गर्ग ने कहा कि वितरण क्षेत्र में चरम की वित्तीय गड़बड़ी हैं और अगर एक आर्थिक रूप से स्थायी राष्ट्रीय बिजली व्यवस्था बनानी है तो उसके लिए साहसिक नीति विकल्प और सरकारी खर्च की आवश्यकता है।

भावी अधिवक्ताओं ने रखी ईआईए 2020 मसौदे को वापस लेने की माँग

Environment and climate change

20+ Law college groups and 150+ Law Students Pan-India rise in solidarity with the #WithdrawEIA2020 campaign

नई दिल्ली, 05 अगस्त 2020. एनवायर्नमेंटल इम्पैक्ट असेसमेंट 2020 ड्राफ्ट (Environmental Impact Assessment 2020 Draft) को वापस लेने की माँग रखते हुए देश भर के 15 लॉ कॉलेजों के डेढ़ सौ से अधिक छात्रों ने आज पर्यावरण मंत्रालय (Ministry of Environment) को एक पत्र लिख कर विरोध दर्ज किया है.

छात्रों द्वारा इस महत्वपूर्ण मसौदे के खिलाफ अपनी आपत्तियों के साथ एमओईएफसीसी को 22 पेज का विस्तृत पत्र भेजा है। पत्र को जिंदल ग्लोबल लॉ स्कूल (Jindal Global Law School) के लीगल एड क्लिनिक द्वारा तैयार किया गया है और इसमें ईआईए 2020 ड्राफ्ट के प्रत्येक उप-खंड के लिए विस्तृत सुझाव शामिल हैं, जिनका छात्र विरोध करते हैं।

द यूग्मा नेटवर्क द्वारा समन्वित अभियान में नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी दिल्ली (NLUD), नेशनल लॉ स्कूल ऑफ़ इंडिया यूनिवर्सिटी (NLSIU), NALSAR, DSNLU, NLU’s, एमिटी यूनिवर्सिटी और NUALS जैसे लॉ कॉलेजों के छात्र समूह शामिल हैं।

पत्र के माध्यम से छात्रों ने कहा है,

“हमारे पास निश्चित रूप से अन्य न्यायालयों से सीखने के लिए बहुत कुछ है। यूरोपीय संघ और संयुक्त राज्य अमेरिका के देशों के साथ भारत में ईआईए नियमों के एक तुलनात्मक विश्लेषण पर यह देखा जा सकता है कि भारत में इस प्रक्रिया को जान-बूझकर सार्वजनिक और सरकारी एजेंसियों के प्रारंभिक अवस्था में दखल से दूर रखा है। छात्रों का सुझाव है कि भारत को एक ऐसी पर्यावरण नीति लागू करनी चाहिए जो रियो घोषणा के सिद्धांत 10 का पालन करती हो, जिसके अंतर्गत पर्यावरण की गुणवत्ता और समस्याओं पर स्वतंत्र रूप से जानकारी प्राप्त करने का अधिकार, निर्णय लेने में सार्थक रूप से भाग लेने का अधिकार, और पर्यावरण के प्रवर्तन की तलाश करने का अधिकार शामिल है। साथ ही पर्यावरण कानूनों को लागू करवाने का अधिकार और पर्यावरण को हुए नुकसान के लिए मुआवज़े का प्रावधान शामिल है।”

इसके पहले 25 जून 2020 को युगम नेटवर्क द्वारा समन्वित छात्रों ने ईआईए 2020 के बारे में अपनी चिंताओं के साथ एमओईएफसीसी को एक ईमेल भेजा। इस पत्र पर पूरे भारत के 60+ छात्र यूनियनों ने हस्ताक्षर किए थे। हालांकि, जवाब नहीं मिलने के बाद, उन्होंने 28 जून को 80+ छात्र यूनियनों के हस्ताक्षर के साथ एक और पत्र पीएमओ को भेजा। उन्होंने MyGov पोर्टल पर कई शिकायतें दर्ज कीं, लेकिन इन सभी को खारिज कर दिया गया।

पर्यावरण मंत्रालय और प्रधान मंत्री कार्यालय को पत्र लिखने के बाद अब छात्र इस उम्मीद में हैं कि सरकार उनके भविष्य से समझौता नहीं करेगी और विकास के नाम पर बड़े निजी निवेशकों को उनका भविष्य नहीं बेचा जाएगा। समाज के ज़िम्मेदार सदस्यों के रूप में  भारत के यह युवा भारत में एक ग्रीन रिकवरी का नेतृत्व करने के लिए चर्चा और नीति बनाने में शामिल होना चाहते हैं।

सिकुड़ रहे हैं दुनिया के कोयला बिजली संयंत्र : ग्लोबल एनर्जी मॉनिटर की रिपोर्ट

Coal

The world’s coal power plants are shrinking: Global Energy Monitor reports

नई दिल्ली, 03 अगस्त 2020. कोविड महामारी से जूझते और अप्रत्याशित घटनाओं से भरे इस वर्ष के पहले छह महीनों के लिए दुनिया के कोयला बिजली उत्पादन उद्योग पर ग्लोबल एनर्जी मॉनिटर ने अपना विश्लेषण आज जारी किया है।

ग्लोबल एनर्जी मॉनिटर के कोल पॉवर प्लांट ट्रैकर (Coal power plant tracker of Global Energy Monitor) द्वारा 2020 के पहले छह महीनों के विश्लेषण से निकले नतीजे से न सिर्फ़ दुनिया के ऊर्जा परिप्रेक्ष्य में बदलाव, बल्कि वैश्विक उत्सर्जन के लिए भी महत्वपूर्ण सिद्ध हो सकते हैं। यह रिपोर्ट वैश्विक अवश्य है लेकिन इसमें एशिया क्षेत्र के संदर्भ में बेहद रोचक निष्कर्ष हैं, जो कि इस प्रकार हैं :

पहली बार दुनिया में कोयला बिजली संयंत्रों कम हो रहे हैं।

यह कमी, चीन में इस दिशा में बड़े इज़ाफे के बावजूद देखने को मिली है, जबकि चीन के बाहर संचालित कोयला बिजली की क्षमता 2018 में पहले से ही चरम पर है।

यूरोप के 8.3GW के संयंत्रों को रिटायर करने से भी यह गिरावट आई है और इससे ऊर्जा में बदलाव लाने की प्रक्रिया को बल मिल रहा है।

दक्षिण पूर्व एशिया, जिसे कई वर्षों से कोयला शक्ति के लिए सबसे मजबूत बाजारों में से एक माना जाता है, वहां कोयला बिजली संयंत्र उद्योग को सिकुड़ते देखा जा सकता है।

प्रस्तावित नए थर्मल पॉवर प्लांट और उनके निर्माण वर्ष 2015 के औसत दर की तुलना में 70% कम हो गए हैं।

वैश्विक शुद्ध गिरावट चीन द्वारा इस वर्ष की पहली छमाही में इस प्रवृत्ति का विरोध करने और कोयला बिजली क्षमता का विस्तार करने के बावजूद आती है।

इस वर्ष अब तक चीन की कोयला बिजली संयंत्र पाइपलाइन का विस्तार नव प्रस्तावित क्षमता का 90% (59.4GW में से 53.2) बनाता है, निर्माण का 86% शुरू होता है (15.8GW का 12.8), और कमीशन का 62% (18.3GW का 11.4) ।

बढ़ रही है प्रकृति मित्र राखियों की मांग

Special on Rakshabandhan

Demand for nature friendly rakhis is increasing

हाईटेक और स्वदेशी राखियों का है जमाना

रक्षाबंधन (3 अगस्त) पर विशेष | Special on Rakshabandhan (3 August)

भाई द्वारा बहन की रक्षा का वचन देने के प्रतीक के रूप में मनाए जाने वाले त्यौहार रक्षाबंधन के मायने वर्तमान युग में बदल गए हैं। बदले जमाने के साथ भाई-बहन के अटूट प्यार के इस पर्व पर आधुनिकता का रंग चढ़ चुका है लेकिन साथ ही प्रकृति मित्र राखियां भी लोगों द्वारा पसंद की जाने लगी हैं। इस वर्ष देशवासियों द्वारा चीन की आर्थिक कमर तोड़ने का जो संकल्प लिया गया है, उसके चलते स्वदेशी राखियों की मांग कई गुना बढ़ गई है। माना जा रहा है कि रक्षाबंधन पर ही चीनी राखियों के बहिष्कार से चीन को 4 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा की चपत लगेगी।

दरअसल राखी निर्माण के लिए बड़ी मात्रा में कच्चा माल चीन से आयात किया जाता रहा है लेकिन चीन के साथ तनातनी के दौर में चाइनीज सामान के प्रति विरोध के कारण स्वदेशी राखियों की मांग काफी बढ़ी है। हालांकि कोरोना महामारी का असर इस पर्व पर भी देखा जा रहा है लेकिन स्वदेशी राखियों की डिमांड बढ़ने का सकारात्मक पहलू यह रहा है कि लॉकडाउन के दौरान नौकरी गंवा चुके या काम-धंधे ठप्प होने से बेरोजगार हुए लोगों को कुछ रोजगार मिला। महिलाओं तथा बच्चों का आकर्षण साधारण राखियों के बजाय नए डिजाइनों वाली स्वदेशी डिजाइनर और हाइटैक राखियों की ओर देखा गया है।

हाईटेक राखियों में गैजेट राखियां, 3-डी और एलईडी तथा म्यूजिकल राखियां शामिल हैं जबकि बच्चों के लिए घड़ी और छोटे-छोटे सुंदर खिलौने लगी राखियां भी बाजार में उपलब्ध हैं। पूरी तरह से स्वदेशी स्टोन की रंग-बिरंगी आकर्षक हाईटेक स्वदेशी राखियों की डिमांड भी काफी रही है।

रक्षाबंधन पर्व के बदलते स्वरूप का अंदाजा इसी से लगा सकते हैं कि अब प्रकृति मित्र राखियों की मांग भी बढ़ने लगी है। छत्तीसगढ़ के धमतरी में गोबर तथा बांस का इस्तेमाल कर बनाई गई खूबसूरत राखियों को देश के दूरदराज के हिस्सों में भी राखी विक्रेताओं द्वारा काफी पसंद किया गया है। इनके लिए बांस को बहुत पतली परत में काटकर उसे राखी का रूप दिया जाता है और खूबसूरत प्राकृतिक चटख रंगों से रंगा जाता है। इन पर गाय के गोबर को सुखाकर मनचाहे डिजाइन बनाकर उस पर लंबे समय तक खराब नहीं होने वाले विभिन्न सब्जियों के बीजों से सजावट की जाती है। पर्व के समापन के बाद जब ये राखियां हाथ से उतरती हैं तो ये पर्यावरण को किसी भी प्रकार का नुकसान नहीं पहुंचाती बल्कि गोबर मिट्टी में मिलकर खाद बन जाता है और सब्जियों के बीजों का अंकुरण हो जाता है। इस तरह की राखियों में प्राकृतिक रंगों के इस्तेमाल से ऐसे रंगों से भी पर्यावरण को कोई क्षति नहीं पहुंचती।

            आधुनिकता के इस दौर में राखी बाजार में पिछले साल से पर्यावरण संरक्षण की दृष्टि से ऐसी ही अनूठी और सराहनीय पहल देखने को मिल रही है।

पिछले साल उत्तर प्रदेश के बिजनौर में नगीना स्थित श्रीकृष्ण गौशाला में पहली बार देशी नस्ल की लाल सिंधी गाय के गोबर से राखियों का निर्माण शुरू किया गया था, जिन्हें बहुत पसंद किया गया। ये राखियां बनाने के लिए गोबर को राखी का आकार देकर सुखाया जाता है, फिर उसे सजाकर उसके साथ सूत का धागा बांधा जाता है। अजमेर जिले के केकड़ी कस्बे में भी ऐसे ही अभियान की शुरूआत की गई थी, जिसके तहत गौवंश को बचाने के लिए राखी तथा भगवान की मूर्तियों सहित गाय के गोबर से अब कई तरह की वस्तुएं बनाई जाती हैं। दरअसल पारम्परिक राखियों में जहां पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाले प्लास्टिक और धातु के अलावा पेंट का भी इस्तेमाल होता है, वहीं गाय के गोबर से बनी राखियां पर्यावरण को कोई नुकसान नहीं पहुंचाती। दरअसल ऐसी राखियों को आसानी से मिट्टी में दबाया जा सकता है, जिससे जमीन को नुकसान पहुंचने के बजाय मिट्टी की उर्वरकता बढ़ती है।

रक्षाबंधन पर अब बाजार में हर वर्ष सैंकड़ों तरह की नई राखियां आती हैं। लोगों में नए-नए डिजाइनों वाली महंगी राखियों के प्रति दीवानगी इतनी बढ़ गई है कि अब राखी बनाने वाले बड़े-बड़े निर्माता तो बाकायदा राखियों के नए-नए डिजाइन तैयार कराने के लिए डिजाइनरों की सेवाएं लेने लगे हैं। राखी का पर्व बीतते ही अगले साल के लिए नए डिजाइन तैयार करने की चिंता शुरू हो जाती है क्योंकि राखियों के सैंकड़ों आकर्षक डिजाइनों के बावजूद ग्राहक हर बार ‘मोर डिजाइन्स’ की डिमांड करते हैं। यही कारण है कि एक साल बनाए गए राखी के नए डिजाइन अगले साल ‘आउटडेटेड’ हो जाते हैं। फैंसी राखियों में जो डिजाइन एक साल बिकते हैं, वे अगले साल नहीं बिकते जबकि राखी के जिन डिजाइनों में प्राचीन कलात्मकता का प्रयोग किया जाता है, ऐसी राखियां महंगी होने के बावजूद ज्यादा बिकती हैं। प्रकृति मित्र और परम्परागत राखियों के अलावा बाजार अब इलैक्ट्रॉनिक राखियों तथा हैरी पॉटर, फेंगसुई, स्पाइरडरमैन, मोगली, मिक्की माउस, बाल गणेश, छोटा भीम, बेनटेन, डोरीमॉन, वीडियो गेम, कम्प्यूटर, स्मार्टफोन इत्यादि तरह-तरह के डिजाइनों वाली आकर्षक राखियों से भरे नजर आते हैं।

कई वर्षों से राखियों बेच रहे दुकानदार राजेश कुमार का कहना है कि फैंसी हाईटेक राखियों के इस दौर में हर कोई अब राखियों के नए डिजाइनों की तलाश में रहता है। वह बताते हैं कि एक समय था, जब रेशम के साधारण धागे ही अधिक मात्रा में बिकते थे किन्तु अब राखियों के डिजाइनों में भी इलैक्ट्रॉनिक राखियों की मांग ज्यादा रहती है। हालांकि लौंग, इलायची व सुपारी वाली कलात्मक राखियां अब भी पसंद की जाती हैं। वह बताते हैं कि ग्रामीण महिलाओं का झुकाव अब भी पारम्परिक राखियों की ओर देखने को मिल रहा है लेकिन बड़े लोगों की पसंद अब फैंसी राखियों को छोड़कर सोने-चांदी की राखियों पर टिकी है। चांदी की जंजीरनुमा राखियां तो अब आम हो चली हैं।

एक दुकान पर राखी खरीद रही पूनम शर्मा को परम्परागत गोल राखियों के बजाय नए डिजाइनों वाली इलैक्ट्रॉनिक राखियां ज्यादा पसंद आई जबकि उन्होंने बच्चों के लिए मिक्की माउस, स्पाइडरमैन, मोगली इत्यादि डिजाइनों की राखियां पसंद की। बहरहाल, स्वदेशी राखियों के प्रति लोगों के बढ़ते आकर्षण और धीरे-धीरे प्रकृति मित्र राखियों के बढ़ते चलन से रोजगार और पर्यावरण की दृष्टि से रक्षाबंधन पर्व की एक सुखद भावी तस्वीर नजरों के सामने उभरती है।

योगेश कुमार गोयल

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

आदिवासियों का अस्तित्व बचाने को कॉर्पोरेट लूट के खिलाफ लड़ना जरूरी : पराते

Sanjay Parate संजय पराते, माकपा छत्तीसगढ़ के राज्य सचिव हैं।

The life of tribals is in danger

रायपुर/ भोपाल, 31 जुलाई. छत्तीसगढ़ और पूरे देश में आदिवासियों का अस्तित्व बचाने के लिए कॉर्पोरेट लूट के खिलाफ लड़ना जरूरी है। कॉर्पोरेट युग का बर्बर और आदमखोर पूंजीवादी शोषण वनों, जैव विविधता और वन्य जीवों का विनाश, पर्यावरण और पारिस्थितिकी तंत्र को बर्बाद और आदिवासी सभ्यता व संस्कृति की तबाह कर रहा है। वह समूचे प्राकृतिक संसाधनों पर कब्जा करके अपने मुनाफे को बढ़ाना चाहता है। इसके चलते आदिवासियों का जीवन अस्तित्व खतरे में है

उक्त विचार मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव संजय पराते ने मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ के पाक्षिक लोकजतन द्वारा फेसबुक पर आयोजित एक व्याख्यानमाला को संबोधित करते हुए व्यक्त किये।

यह व्याख्यानमाला मप्र माकपा के पूर्व सचिव शैलेन्द्र शैली की स्मृति में हर वर्ष 24 जुलाई से 7 अगस्त तक आयोजित किया जाता है। पराते इस वैचारिक आयोजन के 7वें दिन “अबूझमाड़ से खोंगपाल तक अस्तित्व के संकट से जूझते आदिवासी” विषय पर बोल रहे थे।

इस आभासीय मंच पर 10000 से ज्यादा लोगों ने उनके व्याख्यान को सुना।

उन्होंने कहा कि जिस प्रदेश में 75% परिवारों की औसत मासिक आय 5000 रुपयों से कम हो और जहां औसतन 65 रुपये दैनिक मजदूरी के साथ सबसे सस्ते मजदूर मिलते हो, उस प्रदेश में सामाजिक-आर्थिक रूप से पिछड़े आदिवासी समुदाय की आर्थिक स्थिति और इस पर टिके मानव विकास सूचकांक की स्थिति का सहज अंदाजा लगाया जा सकता है। यही कारण है कि पूरे प्रदेश के लिए कुपोषण की दर 38% होने के बावजूद आदिवासी समुदायों की दो-तिहाई महिलाएं और बच्चे गंभीर रूप से कुपोषित है। स्पष्ट है कि उन्हें न्यूनतम पोषण आहार 2200 कैलोरी तक उपलब्ध नहीं है। उन्होंने कहा कि राज्य में स्वास्थ्य बीमा योजना पूरी तरह फ्लॉप है और स्वास्थ्य क्षेत्र के निजीकरण के कारण होने वाली लूट से हर साल 10 लाख लोग गरीबी रेखा के नीचे चले जाते हैं और इनमें अधिकांश आदिवासी होते हैं।

Only displacement and destruction have come on the part of tribals

माकपा नेता ने कहा कि आदिवासी क्षेत्रों में विकास के नाम पर जिन परियोजनाओं को थोपा गया है, उससे आदिवासियों के हिस्से में केवल विस्थापन और विनाश ही आया है। पिछले 40 सालों में छत्तीसगढ़ में लगभग 2 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि का अधिग्रहण किया गया है और 2 लाख हेक्टेयर वन भूमि का गैर-वानिकी कार्यों के लिए। वनों पर 70% परियोजनाएं खनिज खनन की है। इस प्रकार, औसत भूमिधारिता को ध्यान में रखें, तो 4 लाख हेक्टेयर भूमि से 10 लाख आदिवासी और गरीब किसान परिवारों का विस्थापन तो हुआ है, लेकिन उनका पुनर्वास नहीं।

उन्होंने कहा कि कॉर्पोरेटों को मुनाफ़ा कमाने का मौका देने के लिए ही वनाधिकार कानून, पेसा और 5वीं अनुसूची के प्रावधानों को धता बताते हुए डिब्बे में बंद बोधघाट परियोजना को बाहर निकाला गया है और सिचाई के फर्जी आंकड़ों को गढ़कर आदिवासियों की सहमति हासिल करने की कोशिश हो रही है। यदि यह परियोजना अमल में आती है, तो कॉरपोरेटों की तिजोरी में तो 3 लाख करोड़ आएंगे, लेकिन 42 गांवों के 35000 आदिवासियों के हिस्से में बर्बादी। इसी प्रकार पोलावरम परियोजना से 25000 से ज्यादा आदिवासी उजड़ेंगे और दोरला जनजाति ही विलुप्ति के कगार पर पहुंच जाएगी।

पराते ने कहा कि भाजपा राज ने जिस सलवा जुडूम अभियान को प्रायोजित किया था, उसका स्पष्ट मकसद था कि कॉरपोरेटों को यहां की प्राकृतिक संपदा को लूटने का मौका दिया जाए। इसके लिए दसियों गांवों में आग लगाकर 700 गांव खाली करवाये गए और हजारों लोगों को कथित शिविरों में कैद कर लिया गया। नक्सलियों के नाम पर आज भी निर्दोष आदिवासियों की हत्याएं की जा रही हैं और उनको जेलों में ठूंसा जा रहा है। आदिवासी क्षेत्रों में कॉर्पोरेट लूट के लिए सरकारें भी उनके साथ में है। इसलिए आप आदिवासियों के साथ खड़े हो सकते है या फिर उनके खिलाफ कार्पोरेटों के साथ। बीच का कोई रास्ता नहीं है और कांग्रेस-भाजपा की सरकारों ने आदिवासियों के खिलाफ और कार्पोरेटों के साथ खड़ा होना तय किया है। यही कारण है कि बोधघाट मामले में भी वे एक हैं।

उन्होंने कहा कि देश के 115 सबसे पिछड़े जिलों में छत्तीसगढ़ 7 आदिवासीबहुल जिलों सहित 10 जिले शामिल हैं। उर्जाधानी कोरबा का भी सबसे पिछड़ा होना चौंकाता है। केंद्र और राज्य सरकारों की जो आदिवासी विरोधी और नव-उदारवादी नीतियां हैं, उसका दुष्परिणाम है कि वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार उनकी जनसंख्या में सवा प्रतिशत की गिरावट आई है और भील, कोरकू, परजा, सहरिया, सौर और सोंर जैसी जनजातियां विलुप्ति की कगार पर है। सुप्रीम कोर्ट ने पिछले वर्ष वनाधिकार से वंचित आदिवासियों की बेदखली का जो आदेश दिया है, वह इस संकट को और बढ़ाता है। इससे हमारे प्रदेश के 12 लाख आदिवासी परिवार प्रभावित होंगे।

प्रदेश में फैल रहे कोरोना महामारी पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि राज्य में अभी तक जितने टेस्ट हुए हैं, उसमें 3% लोग संक्रमित पाए गए हैं।

इस प्रकार 7-8 लोग संक्रमित होंगे और निश्चित ही इसमें एक बहुत बड़ी आबादी आदिवासियों की भी है। आदिवासी इलाकों में स्वास्थ्य सुविधाओं की जो हालत है, उसमें सामान्य बीमारी भी महामारी का रूप ले लेती है और महामारी से होने वाली मौतों को भी सामान्य मौतों में गिना जाता है। इस बात का कोई रिकॉर्ड नहीं मिलेगा कि कितने कोरोना संक्रमित इन क्षेत्रों में रोज मर रहे होंगे। यह एक दुखद स्थिति है।

उन्होंने कहा कि आदिवासियों के पास नगद धन-दौलत नहीं है और वे पूंजीवादी बाजार के लिए किसी काम के नहीं है, क्योंकि वे उनका मुनाफा नहीं बढ़ा सकते। लेकिन उनके पास जो प्राकृतिक संपदा है, उसको लूटकर कॉर्पोरेट अपनी तिजोरियां जरूर भर सकते हैं। इसलिए उनकी सभ्यता, संस्कृति और उनके समूचे जीवन अस्तित्व को मिटाकर वे उनके प्राकृतिक संसाधनों पर कब्जा करना चाहते हैं। इस लूट के खिलाफ सभी शोषित-उत्पीड़ित-दमित लोगों को संगठित करके, एक शोषण विहीन – जाति विहीन समाज की स्थापना में यकीन रखने वाले लोगों की अगुआई में ही इस लड़ाई को लड़ा जा सकता है। वामपंथी आंदोलन की यही दिशा है, जो हमारे देश, संविधान और आदिवासियों के जीवन अस्तित्व की रक्षा कर सकती है और इस देश में मनुवाद के रूप में फासीवाद लादने की हिंदुत्ववादी ताकतों के कुचक्र को विफल कर सकती है।

भारत में दो दशक में 46 प्रतिशत बढ़ा प्रदूषण, पांच साल कम हुई आयु : शिकागो यूनिवर्सिटी के रिसर्च में हुआ खुलासा

air pollution

New Data Reveals Little Progress Globally in Reducing Air Pollution, with Worsening Air Quality in India and Across South Asia

नई दिल्ली, 30 जुलाई 2020. भारत की आबादी का एक चौथाई हिस्सा प्रदूषण को झेलने के लिए मजबूर हैं. दुनिया के किसी भी देश में इतनी बड़ी आबादी इससे प्रभावित नहीं है. वायु गुणवत्ता जीवन सूचकांक (एयर क्वालिटी लाइफ इंडेक्स-एक्यूएलआई) यानी जीवन जीने के लिए जिस गुणवत्ता की हवा चाहिए, उस मामले में भारत विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानकों पर खरा नहीं उतरता है. यही वजह है कि भारत में जीवन प्रत्याशा पांच साल कम हो गई है. यानी एक औसत भारतीय वायु प्रदूषण की वजह से अपने जीवन का पांच साल कम जीने को मजबूर है.

अभी दुनियाभर के देशों में कोरोना वैक्सीन बनाने की होड़ मची हुई है. लेकिन एक और दुश्मन है जो हर दिन अरबों लोगों के जीवन को बुरी तरह प्रभावित कर रहा है, वह है वायु प्रदूषण. शिकागो यूनिवर्सिटी की ओर से जारी नए एक्यूएलआई रिपोर्ट के आंकड़ों के मुताबिक हवा में तैर रहे पार्टीकुलेट मैटर कोविड से पहले इंसानों के स्वास्थ्य को कमजोर कर रहा था. और अगर आनेवाले समय में स्वास्थ्य व्यवस्था बेहतर नहीं की गई, तो कोविड के बाद भी यह मानव जीवन प्रत्याशा को और बुरी तरह प्रभावित करेगा.

रिपोर्ट के अनुसार, पिछले दो दशकों में भारत में पार्टीकुलेट मैटर (कण प्रदूषण) में 42 प्रतिशत की तेजी से बढ़ोत्तरी हुई है. आज भारत में 84 प्रतिशत लोग ऐसे क्षेत्रों में रहते हैं,  जो भारत के स्वयं के वायु गुणवत्ता मानकों से अधिक प्रदूषित हैं. वहीं पूरी आबादी डबल्यूएचओ की ओर से तय मानक से अधिक के स्तर के वायु गुणवत्ता वाले माहौल में जीने को विवश हैं. नतीजतन, औसत भारतीय अपना जीवन पांच साल कम जीते हुए देखे जा सकते हैं. डबल्यूएचओ के मानक के मुताबिक पांच साल आयु कम हो रहे हैं, वहीं राष्ट्रीय मानक के मुताबिक दो साल कम हो रहे हैं.

इस बीच, भारत की जनसंख्या का एक चौथाई हिस्सा जिस प्रदूषण स्तर में जी रहा है, दुनिया के किसी अन्य देश में नहीं देखा गया है. डबल्यूएचओ के मानकों पर खड़ा न उतरने की वजह से उत्तर प्रदेश के 230 मिलियन लोगों का जीवन आठ साल कम हो गया है. वहीं दिल्ली के निवासी भी अपने जीवन में 9 साल अधिक देख सकते थे.

रिपोर्ट में यह भी दिखाया गया है कि प्रदूषण के स्तर को डबल्यूएचओ के मानक के अनुसार रख कर बिहार औऱ पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में भी आम जन के जीवन को सात साल तक बढ़ाया जा सकता है. वहीं हरियाणा के लोगों का जीवन आठ साल तक बढ़ाया जा सकता है.

कोविड के साथ प्रदूषण कम करने पर भी देना होगा खासा ध्यान ग्रीनस्टोन

मिल्टन फ्रीडमैन प्रोफेसर और एनर्जी पॉलिसी इंस्टीट्यूट के निदेशक,  अर्थशास्त्र के प्रोफेसर माइकल ग्रीनस्टोन कहते हैं,”कोरोना वायरस का खतरा काफी है. इसपर गंभीरता से ध्यान देने आवश्यकता है. लेकिन कुछ जगहों पर, इतनी ही गंभीरता से वायु प्रदूषण पर ध्यान देने की जरूरत है. ताकि करोड़ों-अरबों लोगों को अधिक समय तक स्वस्थ जीवन जीने का हक मिले.”

माइकल ग्रीनस्टोन ने ही शिकागो यूनिवर्सिटी में ऊर्जा नीति संस्थान (ईपीआईसी) में अपने सहकर्मियों के साथ मिलकर एक्यूएलआई की स्थापना भी की है.

वह आगे कहते हैं, वास्तविकता यह है कि फिलहाल जो उपाय और संसाधन भारत के पास है, उसमें वायु प्रदूषण के स्तर में खासा सुधार के लिए मजबूत पब्लिक पॉलिसी कारगर उपाय है. एक्यूएलआई रिपोर्ट के माध्यम से आम लोगों और नीति निर्धारकों को बताया जा रहा है कि कैसे वायु प्रदूषण उन्हें प्रभावित कर रहा है. साथ ही, प्रदूषण को कम करने के लिए इस रिपोर्ट का कैसे इस्तेमाल किया जा सकता है.

साल 2019 में केंद्र सरकार ने प्रदूषण से लड़ने के लिए राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (एनकैप) की घोषणा की. इसके माध्यम से साल 2024 तक 20-30 प्रतिशत तक प्रदूषण कम करने का लक्ष्य रखा है. हालांकि ऐसा नहीं है कि भारत इस लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर सकता है. लेकिन  एक्यूएलाई के अनुसार इस लक्ष्य को हासिल करने के साथ स्वास्थ्य व्यवस्था में उल्लेखनीय सुधार की आवश्यकता है.

अगर देशभर में 25 प्रतिशत तक प्रदूषण को कम किया जाता है, तो एनकैप के लक्ष्य को हासिल करने से पहले ही राष्ट्रीय जीवन प्रत्याशा में 1.6 साल और दिल्ली के लोगों के जीवन प्रत्याशा में 3.1 साल की बढ़ोत्तरी हो सकती है.

शिकागो यूनिवर्सिटी के साथ गुजरात में चल रहा है शोध

भारत में राज्य सरकारें वायु गुणवत्ता में सुधार लाने की दिशा में पहले से ही प्रयासरत हैं. पार्टिकुलेट मैटर (कण प्रदूषण) के लिए दुनिया का पहला एमिशन ट्रेडिंग सिस्टम (ईटीएस) शिकागो यूनिवर्सिटी के साथ मिलकर गुजरात में चल रहा है. जहां शिकागो यूनिवर्सिटी और गुजरात प्रदूषण कंट्रोल बोर्ड के साथ अन्य लोग मिलकर काम कर रहे हैं. सूरत में चल रहे इस पायलट प्रोजेक्ट के तहत औद्योगिक संयंत्रों से निकलने वाले कण प्रदूषण को कम करने पर शोध चल रहा है. वह भी कम से कम लागत में.

ग्रीनस्टोन एक बार फिर कहते हैं,

“इतिहास उदाहरणों से भरा है कि कैसे मजबूत नीतियां प्रदूषण को कम कर सकती हैं, लोगों के जीवन को लंबा कर सकती हैं.”  उनके मुताबिक, “भारत और दक्षिण एशिया के नेताओं के लिए अगली सफलता की कहानी बुनने का एक बहुत ही शानदार अवसर है. क्योंकि वे आर्थिक विकास और पर्यावरण गुणवत्ता के दोहरे लक्ष्यों को संतुलित करने के लिए काम करते हैं. सूरत ईटीएस की सफलता बताती है कि बाजार-आधारित लचीला दृष्टिकोण से दोनों लक्ष्यों को एक साथ हासिल किया जा सकता है.”

जानिए पैराशूट का इतिहास और कैसे हुआ पैराशूट का आविष्कार

Things you should know

Learn the history of parachute and how the invention of parachute happened

लोगों को पैराशूट से उड़ते देखकर सभी के मन में पैराशूट के आविष्कार और इतिहास को जानने का विचार जरूर आता हैं। पैराशूट के आविष्कार के बाद लोगों के मन से आसमान में जाने और गिरने का डर समाप्त हो गया है।

पैराशूट एक ऐसा वैज्ञानिक उपकरण है, जो आपातकाल में उड़ते हुए वायुयान से सुरक्षापूर्वक धरती पर उतारने के काम आता है। पैराशूट का आविष्कार आंद्रे गार्नेरिन ने किया था

पैराशूट का इतिहास | When was the parachute invented ?

दुनिया में सबसे पहले व्यवहारिक रूप से सफल पैराशूट बनाने का श्रेय एक फ्रांसीसी व्यक्ति ‘लुइ सेबास्तियन लेनोर्मां’ (french inventor of the parachute) को दिया जाता है। जिसने वर्ष 1783 में पहली बार पैराशूट का सार्वजनिक प्रदर्शन किया था। यह पैराशूट लकड़ी के ढांचे पर कपड़ा डालकर बनाया गया था। जबकि 15वीं शताब्दी में ‘लिओनार्दो दा विंची’ ने कल्पना करते हुए सबसे पहले पैराशूट का रेखाचित्र बनाया था।

Parachute Designed by Leonardo Da Vinci

लिओनार्दो दा विंची के पैराशूट की डिजाइन को ध्यान में रखकर ही ‘फॉस्ट ब्रांसिस’ ने एक सख्त फ्रेम वाला होमो वोलंस नाम का पैराशूट बनाया, जिसे पहनकर वर्ष 1617 में ब्रांसिस ने वेनिस टॉवर से छलांग लगाई थी (first parachute jump)। उस समय आकाश से इस तरह छलांग लगाना कोई आसान काम नहीं था।

हालांकि वर्ष 1785 में फ्रांसीसी नागरिक ज्यां पियरे ब्लांचार्ड  ने आपातकाल में पैराशूट का पहला प्रयोग किया था। इन्होंने ऊंचाई पर उड़ रहे एक हॉट एयर बैलून से एक कुत्ते को पैराशूट बंधी टोकरी के द्वारा नीचे उतारा था।

ज्यां पियरे ब्लांचार्ड ने पहली बार उपयोग करने में आसान होने के कारण सिल्क के कपड़े से पैराशूट बनाया था। इसी तरह के पैराशूट द्वारा वर्ष 1797 में फ्रांस के आंद्रे गार्नेरिन ने 3000 फुट की ऊंचाई से एक सफल छलांग लगाई थी और आंद्रे गार्नेरिन ने पैराशूट में कंपन्न को कम करने के लिए कुछ सुधार किये थे जिससे पहला छिद्रित पैराशूट’ अस्तित्व में आया था।

वर्ष 1797 में एंड्रयू नाम के व्यक्ति ने एक हॉट एयर बैलून में पेरिस के ऊपर 3200 फिट की ऊंचाई पर उड़कर पैराशूट के इतिहास में नाम लिखा।

24 जुलाई 1837 को लन्दन के बॉक्स हाल गार्डन में राबर्ट काकिंग ने पैराशूट की उडान का प्रदर्शन किया था। लेकिन पांच हजार फुट की ऊंचाई से गिरते समय पैराशूट का लकड़ी का ढांचा हवा के दबाव से टूटने के कारण राबर्ट की मृत्यु हो गई थी।

शुरुआत में पैराशूट लकड़ी के ढांचे पर कपड़ा डालकर बनाये जाते थे। बाद में फान टासल ने सूती कपडे का एक छतरी के आकार का पैराशूट बनाया था जो काफी लोकप्रिय भी हुआ।

कुछ समय बाद पैराशूट बनाने में सूती कपड़े की जगह रेशमी कपडे (सिल्क) का उपयोग किया जाने लगा जिससे पैराशूट ओर हल्के व मजबूत हो गए। आजकल पैराशूट बनाने के लिए नायलोन का उपयोग किया जाता है।

पैराशूट के उपयोग | Parachute usage

दूसरे विश्व युद्ध के समय अमेरीकी सैनिकों को कहीं पहुँचाने के लिए पैराशूट का काफी उपयोग किया गया था, क्योंकि पैराशूट से जटिल जगहों पर भी जा सकते हैं। लड़ाकू जहाज काफी तेज गति से उड़ते व रनवे पर उतरते हैं और आपातकाल के समय में लम्बा रनवे नहीं मिलने से लड़ाकू जहाज को रोक पाना खतरनाक होता है। लेकिन पैराशूट की मदद से इनकी गति को नियंत्रण में करके विमान को सुरक्षित उतार सकते हैं।

युद्ध के समय में पैराशूट के द्वारा शत्रु के क्षेत्र में सैनिक, गोला बारूद और खाने पीने की सामग्री सेना के लिए गिराए जाते हैं।

अन्तरिक्ष यात्री जिस केप्सूल में बैठकर धरती पर उतरते हैं, उसमें पैराशूट लगा होने के कारण यात्री सुरक्षित उतर पाते हैं।   समुद्र के किनारे सैलानियों के लिए हवा में उड़ने में पैराशूट का उपयोग किया जाता है और जैव वैज्ञानिक और डिस्कवरी चैनल वाले भी जंगलों के ऊपर घूमने के लिए पैराशूट इस्तेमाल करते हैं।

पैराशूट की रोचक जानकारी | Interesting information about parachute

वर्ष 1937 में सबसे पहले रूस ने आर्कटिक पर खोज के दौरान बर्फ पर प्लेन रोकने के लिए प्लेन के पीछे पैराशूट लगाकर उपयोग किया गया था, क्योंकि बर्फ पर फिसलने के कारन प्लेन को रोकना मुश्किल काम था।

वर्ष 1914 में प्रथम विश्वयुद्ध के समय विमानों से बमवर्षा की गई थी। इसके ठीक 12 वर्ष बाद दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान विमान चालकों द्वारा पैराशूट का उपयोग करके हजारों लोगों की जान बचाई गई थी।

आजकल इतने बड़े-बड़े पैराशूट भी बन चुके हैं, जो आपातकाल में उड़ते हुए हवाई जहाज या विमान को भी हवा में लटका कर सुरक्षित नीचे उतार सकते हैं।

मुकेश कुमार माली

Note – André-Jacques Garnerin (31 January, 1769 – 18 August, 1823) was a French balloonist and the inventor of the frameless parachute.

स्रोत – देशबन्धु

प्रतियोगिताओं में बेहतर प्रदर्शन व शांत और सचेत रहने के लिए गहरी सांस

A free brain and spine camp was set up at Yashoda Super Specialty Hospital Kaushambi Ghaziabad.

Deep breath to perform better in competitions and stay calm and alert

प्रतियोगिताओं में प्रतियोगी बेहतर प्रदर्शन कर सकें इसलिए उनके शिक्षक या कोच उन्हें प्रतियोगिता शुरू होने से पहले गहरी सांस लेने की सलाह देते हैं। इजरायल स्थित वाइज़मैन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस के प्रोफेसर नोम सोबेल (Prof. Noam Sobel – Weizmann Institute of Science) और उनके साथियों ने अपने अध्ययन में इस बात की पुष्टि की है कि प्रशिक्षकों की सलाह सही है। उनका यह अध्ययन नेचर ह्यूमन बिहेवियर (Nature Human Behavior) नामक पत्रिका में प्रकाशित हुआ है।

अध्ययन में प्रतिभागियों को संज्ञानात्मक क्षमता (cognitive ability) से जुड़े कुछ कार्य करने को दिए गए। इनमें गणित की पहेलियां, स्थान-चित्रण से जुड़े सवाल (जैसे दिखाया गया त्रि-आयामी चित्र वास्तव में संभव है या नहीं) और कुछ शाब्दिक सवाल (स्क्रीन पर दिखाए शब्द वास्तविक हैं या नहीं) शामिल थे।

शोधकर्ताओं ने इन कार्यों के दौरान प्रतिभागियों के प्रदर्शन की तुलना की और उनके सांस लेने व छोड़ने की क्रिया पर ध्यान दिया।

अध्ययन के दौरान प्रतिभागी इस बात से अनजान थे कि प्रदर्शन के दौरान उनकी सांस पर नज़र रखी जा रही है। इसके अलावा प्रदर्शन के समय ई.ई.जी. की मदद से प्रतिभागियों के मस्तिष्क की विद्युतीय गतिविधियों पर भी नज़र रखी गई।

सूंघतामस्तिष्क | ‘Sniffing’ brain

इस अध्ययन में तीन प्रमुख बातें उभर कर आईं। पहली, शोधकर्ताओं ने पाया कि प्रतिभागियों का प्रदर्शन तब बेहतर था जब उन्होंने सवाल करते समय सांस अंदर ली, बनिस्बत उस स्थिति के जब उन्होंने सवाल हल करते हुए सांस छोड़ी।

दूसरी, इस बात से प्रदर्शन पर कोई फर्क नहीं पड़ता कि सांस मुंह से अंदर खींची जा रही है या नाक से। वैसे आदर्श स्थिति तो वही होगी जब नाक से सांस ली और छोड़ी जाए।

तीसरी बात, ई.ई.जी. के नतीजों से पता चलता है कि श्वसन चक्र के दौरान मस्तिष्क के विभिन्न हिस्सों के बीच संपर्क अलग-अलग तरह से हुआ था।

Is there a role for absorbed oxygen in better performance?

गौरतलब बात है कि जब हम सांस लेते हैं तो हम हवा में से ऑक्सीजन अवशोषित करते हैं। तो क्या बेहतर प्रदर्शन में इस अवशोषित ऑक्सीजन की कोई भूमिका है?

यह सवाल जब प्रो. सोबेल से पूछा गया तो उन्होंने इसके जबाव में कहा कि

“नहीं, समय के अंतराल को देखते हुए यह संभव नहीं लगता। जबाव देने में लगने वाला समय, फेफड़ों से मस्तिष्क तक ऑक्सीजन पहुंचने में लगने वाले समय की तुलना में बहुत कम है।

… सांस लेने और छोड़ने की प्रक्रिया के प्रति सिर्फ गंध संवेदना तंत्र (सूंघने की प्रणाली) संवेदनशील नहीं होता बल्कि पूरा मस्तिष्क इसके प्रति संवेदनशील होता है। हमें तो लगता है कि हम सामान्यीकरण करके कह सकते हैं कि मस्तिष्क अंत:श्वसन (सांस खींचने) के दौरान बेहतर कार्य करता है। हम इसी बात को यों भी कह सकते हैं कि ‘मस्तिष्क सूंघता’ है।

प्राचीनतम संवेदना | Understanding Smell

यह अध्ययन इस बात की ओर भी इशारा करता है कि बिना किसी गंध के, सिर्फ सांस लेना भी तंत्रिका सम्बंधी गतिविधियों के बीच तालमेल बनाता है। यानी यह सुगंध या दुर्गंध का मामला नहीं है।

शोधकर्ताओं की परिकल्पना है कि नासिका अंत:श्वसन (नाक से सांस लेने की क्रिया) ना सिर्फ गंध सम्बंधी सूचनाओं का प्रोसेसिंग करती है बल्कि गंध-संवेदी तंत्र के अलावा अन्य तंत्रों द्वारा बाह्र सूचनाओं को प्रोसेस करने में मदद करती है।

Inhalation conducts brain activity?

इस बात को जैव विकास के इतिहास में भी देखा जा सकता है कि अंत:श्वसन मस्तिष्क की गतिविधियों का संचालन करता है। एक-कोशिकीय जीव और पौधे हवा से वाष्पशील या गैसीय पदार्थ लेते हैं (इसे अंत:श्वसन की शुरुआत के रूप में देखा जा सकता है)।

हम यह जानते हैं कि चूहे फुर्ती से भागते समय और आवाज़ करते समय लंबी-लंबी सांस लेते हैं। और चमगादड़ प्रतिध्वनि (इको) द्वारा स्थान निर्धारण के समय लंबी सांस लेते हैं।

डॉ. ओफेर पर्ल का कहना है कि गंध प्राचीन संवेदना है, इसी के आधार पर अन्य इंद्रियों और मस्तिष्क का विकास हुआ होगा। उक्त अध्ययन के शोधकर्ता ध्यान दिलाते हैं कि ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी में इंस्पाइरेशन’(अंत:श्वसन) शब्द का मतलब (The meaning of the word ‘Inspiration’ (inhalation) in the Oxford Dictionary) सिर्फ सांस खींचना नहीं बल्कि दिमागी रूप से प्रेरित/उत्साहित होने की प्रक्रिया भी है।

योग और ध्यान | Yoga and meditation

वैसे इस अध्ययन के शोधकर्ताओं ने ऐसा नहीं कहा है किंतु कई वैज्ञानिक यह कहते हैं कि योग (नियंत्रित तरीके से सांस लेने) से शांति और चैन मिलता है।

स्टेनफोर्ड युनिवर्सिटी में किए गए प्रयोगों से पता चला है कि चूहों के मस्तिष्क में 175 तंत्रिकाओं का एक समूह सांस की गति के नियंत्रक (पेसमेकर) की तरह कार्य करता है, और नियंत्रित तरीके से सांस लेना जानवरों में दिमागी शांति को बढ़ावा देता है।

मनुष्यों की बात करें, तो ऑस्ट्रेलिया स्थित मोनाश युनिवर्सिटी के डॉ. बैली और उनके साथियों ने 62 लोगों के साथ एक अध्ययन किया, जिनमें से 34 लोग ध्यान करते थे और जबकि 28 लोग नहीं। दोनों समूह उम्र और लिंग के हिसाब से समान थे। तुलना करने पर उन्होंने पाया कि जो लोग ध्यान करते थे उनमें कार्य करने के लिए मस्तिष्क सम्बंधी गतिविधियां अधिक थीं। उनमें उच्चतर स्तर की मानसिक प्रक्रियाएं और संवेदी प्रत्याशा थी।

बीजिंग के शोधकर्ताओं के समूह ने इसी तरह का एक अन्य अध्ययन किया। अध्ययन में 20-20 लोगों के दो समूह लिए। पहले समूह के लोगों को लंबी सांस लेने (योग की तर्ज पर 4 सांस प्रति मिनट) के लिए प्रशिक्षित किया। दूसरा समूह कंट्रोल समूह था जिन्हें सांस सम्बंधी कोई प्रशिक्षण नहीं दिया गया था। तुलना करने पर पाया कि प्रशिक्षित किए गए समूह में कार्टिसोल का स्तर कम था और उनकी एकाग्रता लंबे समय तक बरकरार रही। अंत में, ज़कारो और उनके साथियों ने एक समीक्षा में बताया है कि धीरे-धीरे सांस लेने की तकनीक सह-अनुकंपी (पैरासिम्पेथैटिक) तंत्रिका सम्बंधी गतिविधी को बढ़ाती है, भावनाओं को नियंत्रित करती है और मनोवैज्ञानिक रूप से स्वस्थ रखती है।

डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन

(स्रोत-देशबन्धु)

क्या भारत को 2030 की माँग को पूरा करने के लिए नई कोयला खदानों की वास्तव में आवश्यकता है?

Coal

Does India really need new coal mines to meet the 2030 demand?

पहले से आवंटित कोयला ब्लॉकों की न्यूनतम क्षमता 2030 में अपेक्षित मांग की तुलना में लगभग 15 से 20% अधिक है

– आवश्यकता से ज़्यादा कोयला उत्पादन बढ़ाने से अधिक आपूर्ति के कारण वित्तीय तनाव पैदा होगा और फंसी हुई संपत्ति में बदल जाएगा

– भारत सरकार कोयले के आयात को समाप्त करने के लिए मौजूदा खानों में कोयला का उत्पादन बढ़ा सकती है

नई दिल्ली, 28 जुलाई 2020. कोयले के व्यावसायिक उपयोग के लिए निजी कंपनियों को कोयला ब्लॉक की नीलामी करने की केंद्र सरकार द्वारा हाल ही में की गई घोषणा (कोयले के व्यावसायिक उपयोग के लिए निजी कंपनियों को कोयला ब्लॉक की नीलामी करने की केंद्र सरकार द्वारा हाल ही में की गई घोषणा) ने विभिन्न हितधारकों से मिश्रित प्रतिक्रियाएँ हैं। कुछ ने इसे एक काफी समय से प्रतीक्षित प्रमुख सुधार कहा। परन्तु, झारखंड, छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र की राज्य सरकारों ने पत्र या कानूनी चुनौती के माध्यम से अपनी चिंता दर्ज करके नीलामी का विरोध किया है। कोयला खदान यूनियनों ने कोल इंडिया लिमिटेड (CIL) पर नकारात्मक प्रभाव के डर से निजीकरण का विरोध किया। इसके साथ ही पर्यावरणविदों और मानवाधिकार समूहों ने चिंता व्यक्त की कि कोयला खनन के विस्तार से हजारों हेक्टेयर से अधिक वन भूमि नष्ट हो सकती है और भारत के अंतिम शेष जंगल में स्वदेशी लोगों का विस्थापन हो सकता है।

इन ब्लॉकों की नीलामी का मुख्य कारण “बढ़ती मांग को पूरा करने और देश की आयात निर्भरता को कम करने के लिए घरेलू कोयला खनन क्षमता में विस्तार की आवश्यकता” बताया गया है।

यह देखते हुए कि देश एक वर्ष से अधिक समय से आर्थिक संकट से गुजर रहा है और कोविड-19 की स्थिति ने इसे और कठिन बना दिया है, भारत में कोयले के आयात में कमी आने से राजकोष पर दबाव कम करने में मदद मिलेगी। इसके बावजूद यह समीक्षा करना महत्वपूर्ण है कि क्या वास्तव कोयला खदान का विस्तार अर्थव्यवस्था को जंपस्टार्ट/शुरू करने का सबसे अच्छा तरीका है ?

सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (CREA), जो एक स्वतंत्र अनुसंधान संगठन है और जो वायु प्रदूषण के समाधानों के साथ-साथ प्रवृत्तियों, कारणों और स्वास्थ्य प्रभावों का खुलासा करने पर केंद्रित है, ने तर्क को बेहतर ढंग से समझने के लिए, कोल इंडिया लिमिटेड और सेंट्रल इलेक्ट्रिसिटी अथॉरिटी द्वारा विभिन्न कोयला मांग अनुमानों को देखने का प्रयास किया है।

2017 में CIL द्वारा निर्मित कोल विज़न 2030[1] के अनुसार, 2020 में भारत में कुल कोयले की मांग 900-1,000 MTPA (मिलियन टन प्रति वर्ष) और 2030 तक 1,300-1900 MTPA होने की उम्मीद है। कोयले की मांग के स्पेक्ट्रम का ऊपरी सिरा सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर 8 प्रतिशत[2] से मेल खाता है। कोयले की मांग के स्पेक्ट्रम का निचला छोर एक ऊर्जा कुशल परिदृश्य से मेल खाता है। दस्तावेज में यह भी उल्लेख किया गया है कि 2030 में समग्र थर्मल कोयले की मांग 1,150–1,750 MTPA होने का अनुमान है और शेष राशि कोकिंग कोल की मांग है।

रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि 2017 में आवंटित / नीलामी की गई कुल खदानों की कुल क्षमता (कोल इंडिया लिमिटेड, सिंगारेनि कोलियरीज कंपनी लिमिटेड और नेवेली लिग्नाइट कॉरपोरेशन सहित) मौजूदा रेटेड क्षमता पर लगभग 1,500 MTPA है। संभावित मांग (बेस केस परिदृश्य) के मद्देनजर, पहले से नीलाम / आवंटित किए गए कोयला खदानों के आलावा नई कोयला खदानें शुरू करने की सीमित आवश्यकता है। (

इसके अलावा, वित्त वर्ष 2018-19 के लिए कोयला उत्पादन और आयात 964 मीट्रिक टन और कोयले का उठाव 911 मीट्रिक टन रहा, जिसकी तुलना में पिछले दो दशकों में CIL द्वारा कोयला उत्पादन पहली बार गिर गया है, उम्मीद है कि वित्त वर्ष 2020 के लिए कुल कोयला उठाव सपाट रहा।

सेंट्रल इलेक्ट्रिसिटी अथॉरिटी (CEA) द्वारा जारी एक अन्य रिपोर्ट, ऑप्टिमल जनरेशन कैपेसिटी मिक्स 2029-30[3], ने उल्लेख किया कि, “कोयला बिजली संयंत्रों से सकल उत्पादन वर्ष 2029-30[4] के लिए 1358 BU होने का अनुमान है। वर्ष 2029-30 के लिए कोयले की आवश्यकता को विशिष्ट कोयला 0.65 kg/kWh + 1% परिवहन हानि पर विचार करते हुए लगभग 892 मिलियन टन अनुमानित किया गया है।”

कोल विजन 2030 यह भी नोट करता है कि,

“कुल कोयला मांग के लगभग 70 प्रतिशत के साथ बिजली क्षेत्र प्रमुख उपभोक्ता खंड बना हुआ है।” दस्तावेज़ में आगे कहा गया है, “2030 तक गैर-विनियमित क्षेत्र से कोयले की मांग में अनुमानित वृद्धि ~ 6% CAGR (चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर), विनियमित क्षेत्र में अनुमानित मांग वृद्धि (~ 3% CAGR) से अधिक है। तथापि, विनियमित क्षेत्र दो-तिहाई योगदान के साथ सबसे बड़ा कोयला उपभोक्ता बना रहेगा। “

उपरोक्त संख्याओं के आधार पर यह स्पष्ट है कि वित्त वर्ष 2029-30 में कुल कोयले की आवश्यकता 1188 से 1273 मिलियन टन (MT)[5] की सीमा में होने वाली है।

ऊपर की गणना की गई कोयले की मांग 1300 मीट्रिक टन के नीचे आती है, जो कि CEA द्वारा ऑप्टिमल जनरेशन कैपेसिटी मिक्स 2020-30 के तहत, सबसे व्यवहार्य परिदृश्य के हिसाब से कोयले की मांग के समान है।

कोल इंडिया लिमिटेड, सिंगारेनि कोलियरीज कंपनी लिमिटेड और कैप्टिव (बंदी) कोल ब्लॉक सहित अन्य संस्थाओं को आवंटित कोयला खदानें के हिसाब से भारत में वर्तमान में 1500 मीट्रिक टन से ऊपर की क्षमता है, इसलिए पहले से आवंटित ब्लॉकों की न्यूनतम क्षमता 2030 में अपेक्षित मांग की तुलना में लगभग 15 से 20% अधिक है। यह नए कोयला ब्लॉकों की आवंटित या नीलामी करने की आवश्यकता पर एक प्रश्न उठाता है।

CIL का वर्तमान उत्पादन वित्त वर्ष 2019-20 के लिए लगभग एक बिलियन टन (BT) की खनन क्षमता के मुकाबले 602 मीट्रिक टन पर है, अगर अगले 10 वर्षों में CIL का उत्पादन साल दर साल 5% बढ़ता है, तो भारत में ~ 400 मीट्रिक टन अतिरिक्त कोयला CIL द्वारा होगा और राज्य और निजी संस्थाओं के साथ और 500 मीट्रिक टन क्षमता जो वित्त वर्ष 2019-20 में लगभग 60 मीट्रिक टन है। यह क्वांटम अगले दशक में आयात निर्भरता की जगह लेते हुए भारत में कोयले की मांग में वृद्धि को पूरा करने के लिए पर्याप्त है।

इसलिए उपरोक्त अनुमानों से यह स्पष्ट है कि भारत में पहले से ही 2030 तक खनन के लिए पर्याप्त भंडार है और यदि CIL, अन्य सार्वजनिक उपक्रम (PSU), कैप्टिव (बंदी) निजी और निजी वाणिज्यिक कोयला खनन, सभी अगले तीन से पांच वर्षों में अपने कोयला उत्पादन में वृद्धि करते हैं तो कोयला खनन क्षेत्र बड़े पैमाने पर ओवर सप्लाई (अधिपूर्ति) की स्थिति का सामना करेगा।

CREA के मुताबिक  ऊपर प्रस्तुत अनुमान एक रूढ़िवादी परिदृश्य के तहत हैं क्योंकि वास्तविक बिजली की मांग 19-वीं इलेक्ट्रिक पावर सर्वे (EPS 19) के तहत अपेक्षित बिजली की मांग से कम है, जिसे 2029-30 की कोयले की मांग की गणना के लिए आधार के रूप में उपयोग किया जाता है और पिछले तीन वर्षों के आंकड़े दर्शाते हैं कि वित्त वर्ष 2018-19 और 2019-20 में वास्तविक मांग की तुलना में EPS19 में अनुमानों को ओवर स्टेट किया गया है, जैसे के नीचे दी गई तालिका में दर्शाया गया है। EPS19 में मांग के इस बढ़े हुए प्रक्षेपण से 2029-30 में कोयला की वास्तविक खपत में और कमी आ सकती है।

Title 2017-18 2018-19 2019-20
       
EPS 19 Projections(MU) 1240760 1317962 1399913
       
Actual Energy Demand (MU) 1213240 1274564 1291010
       
Difference Between Projections and -3.2% -3.3% -7.8%
Actual Energy Demand (MU)      
       

 

कोविड 19 के कारण वर्तमान में चल रही अर्थव्यवस्था अनिश्चितताओं और बिजली के क्षेत्र में व्यवधान के साथ सस्ते रिन्यूएबल ऊर्जा में तेजी से वृद्धि को देखते हुए, निजी बिजली क्षेत्र के समान कोयला खनन क्षेत्र में स्ट्रेन्डेड एसेट्स (फंसी संपत्ति) की संभावना है।

 निष्कर्ष

यह देखते हुए कि पूर्ण क्षमता का उत्पादन करने के लिए नीलाम किए गए कोयला ब्लॉकों को तीन से पांच साल लगेंगे, यह अनुमान लगाना ठीक है कि कोल इंडिया लिमिटेड (CIL) भी उसी समय के आसपास एक बिलियन लक्ष्य उत्पादन तक पहुँच जाएगा। इसलिए वर्ष 2025 तक 100-200 मिलियन मीट्रिक टन के दर से कोयले की बड़े पैमाने पर ओवर सप्लाई  की समस्या बनेगे, भले ही राज्य PSU और अन्य निजी कोयला खानों से उत्पादन समान रहे।

यहां तक ​​कि अगर हम मानते हैं कि CIL 2024-25 तक केवल 800 मिलियन मीट्रिक टन तक पहुंच जाएगा, तो देश अतिरिक्त कोयला आवश्यकता के लिए पहले से आवंटित / नीलाम किए गए कोयला ब्लॉकों से उत्पादन आसानी से बढ़ा सकता है।

कोयले की नीलामी का केवल एकमात्र तरीका लाभदायक हो सकता है, अगर यह बात साफ़ हो कि मौजूदा कोयला ब्लॉक निकट भविष्य में पर्याप्त कोयला उत्पादन करने में असमर्थ हैं। यदि यह सच है, तो CIL और अन्य आवंटियों द्वारा यथार्थवादी लक्ष्य निर्धारित करने और यथार्थवादी ईंधन आपूर्ति समझौतों (FSA) पर हस्ताक्षर करने के पक्ष में मामला बनता है। इसके अलावा, आवंटित किए गए ब्लॉक जिन्हें विकसित नहीं किया जा सकता है, उन्हें भी निपटाना होगा।

अन्य बाजारों में कोयले के निर्यात का तर्क भी संदिग्ध है क्योंकि भारतीय कोयला इंडोनेशिया से उच्च गुणवत्ता वाले कोयले का मुकाबला नहीं कर पाएगा। कोयले की वर्तमान कीमत लगभग $50/टन है, जिस औसत लागत के करीब CIL अपना कोयला बेचता है। परन्तु इस तथ्य के कारण कि भारतीय कोयले का ताप मूल्य कम है, उससे आयातित कोयले के मुक़ाबले में ऊर्जा की समान मात्रा का उत्पादन करने के लिए दोगुनी मात्रा की आवश्यकता होगी, जिससे बहुत कम आयातित कोयले से उत्पादित किया जा सकता है। इस वजह से भारतीय कोयले से निवेश पर वापसी पड़ोसी देशों के लिए कम मोह रखती है। इसके अलावा, महामारी के बाद से कोयले की मांग में कमी आ रही है और जापान और उत्तर कोरिया में कोयला फेजआउट नीतियों के कारण इसमें और गिरावट आने की संभावना है। अंतर्राष्ट्रीय कोयले की कीमतों में गिरावट और भारतीय कोयले की कम गुणवत्ता को देखते हुए, भारतीय कोयले के लिए शायद कोई बाजार नहीं हो।

कोयला आयात को कम करना और आत्मनिर्भरता बढ़ाना एक अच्छा उद्देश्य है, लेकिन शायद इन उद्देश्यों को हजारों हेक्टेयर वन भूमि का त्याग किए बिना और स्वदेशी लोगों के विस्थापन के बिना हासिल किया जा सकता है। सरकार के अपने अनुमानों और मौजूदा कोयला खदानों की संचयी क्षमता के अनुसार, भारत को नई कोयला खदानों की आवश्यकता नहीं है।

[1]https://www.coalindia.in/DesktopModules/DocumentList/documents/Coal_Vision_2030_document_for_Coal_Sector_Stakeholde rs_Consultation_27012018.pdf

[2] पिछले 2 वर्षों में सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर 6.1 और 4.2 रही है वित्त वर्ष 2018-19 और 2019-20 के लिए क्रमशः।

[3] http://cea.nic.in/reports/others/planning/irp/Optimal_mix_report_2029-30_FINAL.pdf

[4] 2019-20 में 961 BU की वास्तविक कोयला आधारित बिजली उत्पादन के आधार पर उपयोगिता पैमाने के बिजली क्षेत्र के लिए कोयला खपत लगभग 631 मिलियन टन थी।

[5] यह मानते हुए के उपयोगिता पैमाने की बिजली उत्पादन में कुल कोयला मांग का 75% और 70% योगदान है, जैसा कि कोल इंडिया विजन में अपेक्षित है। पृष्ठ 12, https://www.coalindia.in/DesktopModules/DocumentList/documents/Coal_Vision_2030_document_for_Coal_Sector_Stakeholders_Consultation_27012018.pdf

समझें प्रकृति की मूक भाषा

World Nature Conservation Day in Hindi

विश्व प्रकृति संरक्षण दिवस (28 जुलाई) पर विशेष : Article on World Nature Conservation Day (28 July)

आधुनिकीकरण और औद्योगिकीकरण के चलते विश्वभर में प्रकृति के साथ बड़े पैमाने पर जो खिलवाड़ (frolic with nature) हो रहा है, उसके मद्देनजर आमजन को पर्यावरण संरक्षण (Environment protection) के लिए जागरूक करने की जरूरत अब कई गुना बढ़ गई है। कितना ही अच्छा हो, अगर हम सब प्रकृति संरक्षण (Nature Protection) में अपनी सक्रिय भागीदारी निभाने का संकल्प लेते हुए अपने-अपने स्तर पर उस पर ईमानदारी से अमल भी करें। दरअसल आज प्रदृषित हो रहे पर्यावरण के जो भयावह खतरे हमारे सामने आ रहे हैं, उनसे शायद ही कोई अनभिज्ञ हो और हमें यह स्वीकार करने से भी गुरेज नहीं करना चाहिए कि इस तरह की समस्याओं के लिए कहीं न कहीं जिम्मेदार हम स्वयं भी हैं।

पेड़-पौधों की अनेक प्रजातियों के अलावा बिगड़ते पर्यावरणीय संतुलन और मौसम चक्र में आते बदलाव के कारण जीव-जंतुओं की अनेक प्रजातियों के अस्तित्व पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं और हमें यह भली-भांति जान लेना चाहिए कि इन प्रजातियों के लुप्त होने का सीधा असर समस्त मानव सभ्यता पर पड़ना अवश्वम्भावी है।

What is nature? | World Nature Conservation Day in Hindi,

पहले जान लें कि प्रकृति है क्या? पर्यावरण पर प्रकाशित ‘प्रदूषण मुक्त सांसें’ पुस्तक में बताया गया है कि प्रकृति के तीन प्रमुख तत्व (Three major elements of nature) हैं जल, जंगल और जमीन, जिनके बगैर प्रकृति अधूरी है और यह विड़म्बना ही है प्रकृति के इन तीनों ही तत्वों का इस कदर दोहन किया जा रहा है कि इसका संतुलन डगमगाने लगा है, जिसकी परिणति अक्सर भयावह प्राकृतिक आपदाओं के रूप में सामने भी आने लगी है।

प्राकृतिक साधनों के अंधाधुंध दोहन और प्रकृति के साथ खिलवाड़ का ही नतीजा है कि पर्यावरणीय संतुलन बिगड़ने के कारण मनुष्यों के स्वास्थ्य पर तो प्रतिकूल प्रभाव पड़ ही रहा है, जीव-जंतुओं की अनेक प्रजातियां भी लुप्त हो रही हैं। प्रकृति का संतुलन बनाए रखने के लिए जल, जंगल, वन्य जीव और वनस्पति, इन सभी का संरक्षण अत्यावश्यक है।

We all have to contribute at our own level for the protection of nature.

दुनियाभर में पानी की कमी के गहराते संकट की बात हो या ग्लोबल वार्मिंग के चलते धरती के तपने की अथवा धरती से एक-एक कर वनस्पतियों या जीव-जंतुओं की अनेक प्रजातियों के लुप्त होने की, इस तरह की समस्याओं के लिए केवल सरकारों का मुंह ताकते रहने से ही हमें कुछ हासिल नहीं होगा बल्कि प्रकृति संरक्षण के लिए हम सभी को अपने-अपने स्तर पर अपना योगदान देना होगा।

प्रकृति के साथ हम बड़े पैमाने पर जो छेड़छाड़ कर रहे हैं, उसी का नतीजा है कि पिछले कुछ समय से भयानक तूफानों, बाढ़, सूखा, भूकम्प जैसी प्राकृतिक आपदाओं का सिलसिला तेजी से बढ़ा है।

पर्यावरण का संतुलन डगमगाने के चलते लोग अब तरह-तरह की भयानक बीमारियों के जाल में फंस रहे हैं, उनकी प्रजनन क्षमता पर इसका दुष्प्रभाव पड़ रहा है, उनकी कार्यक्षमता भी इससे प्रभावित हो रही है। लोगों की कमाई का बड़ा हिस्सा बीमारियों के इलाज पर ही खर्च हो जाता है। हमारे जो पर्वतीय स्थान कुछ सालों पहले तक शांत और स्वच्छ हवा के लिए जाने जाते थे, आज वहां भी प्रदूषण तेजी से बढ़ रहा है और ठंडे इलाकों के रूप में विख्यात पहाड़ भी अब तपने लगने हैं, वहां भी जल संकट गहराने लगा है, वहां भी बाढ़ का ताण्डव देखा जाने लगा है। इसका एक बड़ा कारण पहाड़ों में भी विकास के नाम पर जंगलों का सफाया करने के साथ-साथ पहाड़ों में बढ़ती पर्यटकों की भारी भीड़ भी है।

कोई भी बड़ी प्राकृतिक आपदा सामने आने पर हम आदतन प्रकृति को कोसना शुरू कर देते हैं लेकिन हम नहीं समझना चाहते कि प्रकृति तो रह-रहकर अपना रौद्र रूप दिखाकर हमें सचेत करने का प्रयास करती रही है कि अगर हम अभी भी नहीं संभले और हमने प्रकृति से साथ खिलवाड़ बंद नहीं किया तो हमें आने वाले समय में इसके खतरनाक परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहना होगा।

प्रकृति हमारी मां के समान है, जो हमें अपने प्राकृतिक खजाने से ढ़ेरों बहुमूल्य चीजें प्रदान करती है लेकिन अपने स्वार्थों के चलते हम अगर खुद को ही प्रकृति का स्वामी समझने की भूल करने लगे हैं तो फिर भला प्राकृतिक तबाही के लिए प्रकृति को कैसे दोषी ठहरा सकते हैं बल्कि दोषी तो हम स्वयं हैं, जो इतने साधनपरस्त और आलसी हो चुके हैं कि अगर हमें अपने घर से थोड़ी ही दूरी से भी कोई सामान लाना पड़े तो पैदल चलना हमें गवारा नहीं। इस छोटी सी दूरी के लिए भी हम स्कूटर या बाइक का सहारा लेते हैं। छोटे-मोटे कार्यों की पूर्ति के लिए भी निजी यातायात के साधनों का उपयोग कर हम पैट्रोल, डीजल जैसे धरती पर ईंधन के सीमित स्रोतों को तो नष्ट कर ही रहे हैं, पर्यावरण को भी गंभीर नुकसान पहुंचा रहे हैं और पैदल चलना छोड़कर अपने स्वास्थ्य के साथ भी खिलवाड़ रहे हैं।

हमारे क्रियाकलापों के चलते ही वायुमंडल में कार्बन मोनोक्साइड, नाइट्रोजन, ओजोन और पार्टिक्यूलेट मैटर के प्रदूषण का मिश्रण इतना बढ़ गया है कि हमें वातावरण में इन्हीं प्रदूषित तत्वों की मौजूदगी के कारण सांस की बीमारियों के साथ-साथ टीबी, कैंसर जैसी कई और असाध्य बीमारियां जकड़ने लगी हैं।

पैट्रोल, डीजल से पैदा होने वाले धुएं ने वातावरण में कार्बन डाईऑक्साइड और ग्रीन हाउस गैसों की मात्रा को बेहद खतरनाक स्तर तक पहुंचा दिया है।

पेड़-पौधे कार्बन डाईऑक्साइड को अवशोषित कर पर्यावरण संतुलन बनाने में अहम भूमिका निभाते हैं, इसलिए जरूरत है कि हम अपने-अपने स्तर पर वृक्षारोपण में दिलचस्पी लें और पौधारोपण के पश्चात् उन पौधों की अपने बच्चों की भांति ही देखभाल भी करें। पर्यावरणीय असंतुलन के बढ़ते खतरों के मद्देनजर हमें खुद सोचना होगा कि हम अपने स्तर पर प्रकृति संरक्षण के लिए क्या योगदान दे सकते हैं।

Yogesh Kumar Goyal योगेश कुमार गोयल वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं
Yogesh Kumar Goyal योगेश कुमार गोयल वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं

अगर हम वाकई चाहते हैं कि हम और हमारी आने वाली पीढि़यां साफ-सुथरे वातावरण में बीमारी मुक्त जीवन जीएं तो हमें अपनी इस सोच को बदलना होगा कि यदि सामने वाला व्यक्ति कुछ नहीं कर रहा तो मैं ही क्यों करूं? अपनी छोटी-छोटी पहल से हम सब मिलकर प्रकृति संरक्षण के लिए बहुत कुछ कर सकते हैं।

हम प्रयास कर सकते हैं कि हमारे दैनिक क्रियाकलापों से हानिकारक कार्बन डाई ऑक्साइड जैसी गैसों का वातावरण में उत्सर्जन कम से कम हो। पानी की बचत के तरीके अपनाते हुए जमीनी पानी का उपयोग भी हम केवल अपनी आवश्यकतानुसार ही करें।

जहां तक संभव हो, वर्षा के जल को सहेजने के प्रबंध करें। प्लास्टिक की थैलियों को अलविदा कहते हुए कपड़े या जूट के बने थैलों के उपयोग को बढ़ावा दें। बिजली बचाकर ऊर्जा संरक्षण में अपना अमूल्य योगदान दें।

Let us understand this silent language of nature

आज के डिजिटल युग में तमाम बिलों के ऑनलाइन भुगतान की ही व्यवस्था हो ताकि कागज की बचत की जा सके और कागज बनाने के लिए वृक्षों पर कम से कम कुल्हाड़ी चले।

प्रकृति बार-बार अपनी मूक भाषा में चेतावनियां देकर हमें सचेत करती रही है, इसलिए स्वच्छ और बेहतर पर्यावरण के लिए जरूरी है कि हम प्रकृति की इस मूक भाषा को समझें और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में अपना-अपना योगदान दें।

योगेश कुमार गोयल

(लेखक ने पर्यावरण और प्रदूषण पर 190 पृष्ठों की पुस्तक ‘प्रदूषण मुक्त सांसें’ लिखी है)

कोल ऐश रिपोर्ट 2020 : एक दशक में भारत में 76 प्रमुख कोयला दुर्घटनाओं के बावजूद रेगुलेटरी मानदंडों में ढील

Coal

Coal ash report 2020: Relaxation norms relaxed despite 76 major coal accidents in India in a decade

दिल्ली /चेन्नई 27 जुलाई 2020: बीते दस सालों में हर साल 7-8 भीषण फ्लाई ऐश डाइक (कोयले की विषैली राख के तालाब) की दुर्घटनाएँ (Accidents of fly ash dyke (coal ash pond)) हुई हैं जिनमें जान और माल का नुकसान हुआ। इनके टूटने पर खेतों का बंजर हो जाना, नदियों का विषाक्त होना और लोगों का अपनी जान से हाथ धोना सब आम बातें हैं। इन दुर्घटनाओं की अनदेखी और इन्हें नज़रअंदाज़ किये जाने का सिलसिला इन दस सालों में जस का तस आज भी वैसा ही जारी है।

इसका एक जीता जागता उदाहरण है – 10 अप्रैल 2020 को सिंगरौली में रिलायंस का राखड़ का बांध टूटा और गांव में ‘राख की बाढ़’ आ गई, इस हादसे में छह लोगों की मौत हो गई है, कई मकान भी राख के दलदल में समाहित हो गए।

फ्लाई ऐश किसे कहते हैं | What is fly ash called

गौरतलब है कि ऐश डैम (राखड़ बांध) में बिजली संयंत्रों में कोयले के जलने के बाद निकली राख जिसे फ्लाई ऐश भी कहा जाता है, को जमा किया जाता है। जिसे ऐश डाइक कहते हैं। फ्लाई ऐश एक खतरनाक प्रदूषक है जिसमें अम्लीय, विषाक्त और रेडियोधर्मी पदार्थ तक होते हैं। इस राख में न सिर्फ़ सीसा, आर्सेनिक, पारा, और कैडमियम जैसे तत्व होते हैं, इसमें यूरेनियम तक हो सकता है। यह न सिर्फ़ हमारे स्वास्थ्य के लिए घातक है, फ्लाई ऐश धरती को भी प्रदूषित कर देती है, जिससे लम्बे समय में बुरे नतीजे निकलते हैं।

हेल्थी एनर्जी इनीशिएटिव इंडिया (Healthy Energy Initiative India,) और कम्युनिटी एनवायरमेंटल मॉनिटरिंग (Community environmental monitoring) की ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार 2010 से जून 2020 के बीच देशभर में कम से कम 76 प्रमुख फ्लाई ऎश डाईक दुर्घटनाएं हुई।

कोल ऐश इन इंडिया- ए कॉम्पेंडियम ऑफ डिजास्टर एनवायरनमेंट एंड हेल्थ रिस्क” (Coal ash in India – a compendium of disaster environment and health risk) शीर्षक वाली यह रिपोर्ट बताती है कि दुर्घटनाओं में जन-धन की हानि के साथ आसपास के जल स्रोत, वायु और मिट्टी भी प्रदूषित हुई। यह आंकड़ा पिछले एक दशक में हर दूसरे महीने लगभग 1 से अधिक कोयले की राख से जुड़ी बड़ी घटनाओं का संकेत देता है।

रिपोर्ट के अनुसार फ्लाई ऐश के बिखरने की बहुत सारी दैनिक घटनाएं संज्ञान में ही नहीं आती, और यह आंकड़े तो समस्या की एक झलक भर हैं। सबसे अधिक सांद्रता वाले कोयला आधारित थर्मल पावर प्लांट में मध्य प्रदेश,ओडीशा,झारखंड, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु,छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र जैसे राज्य कोयला राख दुर्घटनाओं की सूची में शीर्ष पर हैं क्योंकि बड़ी संख्या में बिजली संयंत्र नदियों या तट जैसे जल निकायों के करीब स्थित हैं, इसलिए सामान्य राख का निर्वहन तालाबों को दरकिनार करते हुए सीधे उनमें प्रवाहित होता है।

 

हेल्थी एनर्जी इनीशिएटिव इंडिया की समन्वयक श्वेता नारायण कहती हैं-

“खनन और कोयला राख ने अपनी तरफ ध्यान आकृष्ट किया है पर राख और उसके निस्तारण के तरीके पर गौर करना अभी भी शेष है। जनता का गुस्सा कोयला राख प्रदूषण से संबंधित बड़ी दुर्घटनाओं तक ही सीमित है। राख तालाब के निकट बसे समुदायों में घुलता धीमा जहर आज भी संज्ञान में नहीं लिया जाता।यह रिपोर्ट भारत में कोल ऐश प्रबंधन और उसके स्वास्थ्य और पर्यावरण पर पड़ रहे दुष्प्रभाव के बारे में बताती है।”

रिपोर्ट में वर्षों से कोयला राख प्रबंधन के विनियामक ढांचे (Regulatory framework of coal ash management) में आयी ढील को इंगित किया है जिनके चलते बिजली उत्पादकों ने पर्यावरण सुरक्षा उपायों और सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रोटोकॉल का मजाक बनाकर रख दिया है :

रिपोर्ट के मुताबिक –

  • राख सामग्री को कम करने के लिए कोयले की धुलाई अनिवार्य थी और इस आशय की अधिसूचना 1997,1998 और 1999 में पारित की गई। इसके बाद सरकार ने 2 जनवरी 2014 को एक गजट अधिसूचना जारी की जिसमें कोयला खदान की सभी थर्मल इकाइयों को 500 किलोमीटर से अधिक की आपूर्ति के लिए कोयले की धुलाई अनिवार्य हो गई। मई 2020 को पर्यावरण वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ( MoEFCC)ने भारत के नीति आयोग द्वारा पेश किए गए आर्थिक औचित्य के आधार पर बिजली एवं कोयले के मंत्रालयों के लिए एक विवादास्पद संशोधन के माध्यम से कोयले की धुलाई को वैकल्पिक बना दिया।हालांकि यह निर्णय फ्लाई ऐश परम्परा में होने वाली वृद्धि और प्रदूषण के लिए जिम्मेदार नहीं है।
  • वर्ष 2000 में फ्लाई ऐश के वर्गीकरण को “खतरनाक औद्योगिक अपशिष्ट “की श्रेणी से “वेस्ट मटीरियल “की श्रेणी में रख दिया।मं त्रालय ने पुनर्वर्गीकरण के पीछे कोई स्वास्थ्य संबंधी वैज्ञानिक औचित्य नहीं दिया।
  • 1999 की फ्लाई ऐश अधिसूचना सीमेंट, कंक्रीट ब्लॉक, ईंटों, पैनलों जैसी सामग्री या सडकों, तटबंधों और बाँधों के निर्माण के लिए या किसी अन्य निर्माण गतिविधियों के लिए थर्मल पावर स्टेशनों (TPPs) से 300 किलोमीटर के दायरे में फ्लाई ऐश का उपयोग करने का आदेश देती है। मूल अधिसूचना और बाद के संशोधनों और 1994 में लांच किए फ्लाई ऐश मिशन का उद्देश्य भी एक निर्दिष्ट अवधि के भीतर फ्लाई ऐश का 100% उपयोग प्राप्त करना था। इन प्रयासों के बावजूद फ्लाई ऐश का केवल 77% ही 2018-29 में उपयोग किया गया।

रिपोर्ट में कहा गया है कि “उपयोग” शब्द कम निचले क्षेत्र और रिक्त खदान की भराई के संबंध में एक मिथ्या नाम भर है। सरकार की मंजूरी के बावजूद बिजली के संयंत्रों के लिए पर्यावरण क्लीयरेंस(EC) की शर्तों के तहत फ्लाई ऐश का रिक्त खदान तथा निचले क्षेत्र की भराई और कृषि में उपयोग निषिद्ध है। हालांकि रिपोर्ट के अनुसार, “अगस्त 2019 का नवीनतम संशोधन इन शर्तों को पलट देता है।

विद्युत मंत्रालय के केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण के अनुसार भारत में 2018-19 में 217.04 मिलियन मेट्रिक टन राख उत्पन्न हुई। 2032 तक यह 600 मिलियन को पार कर सकती है। कोयला राख में जहरीले रसायन जैसे आर्सेनिक, एल्युमीनियम, सुरमा, बेरियम, कैडमियम,सेलेनियम, निकल, सीसा और मेलिब्डेनम जैसे अन्य कार्सिनोजेंस होते हैं। विषाक्त भारी धातु की वजह से बढ़ते कैंसर के जोखिम के साथ कोयले की राख मानव विकास को प्रभावित कर सकती है। उनमें फेफड़े और हृदय की समस्याएं एवं पेट की बीमारियों का कारण बनने के साथ समय से पहले मृत्यु दर भी बढ़ा सकती है। छत्तीसगढ़ में कोयले की राख के तालाबों के करीब रहने वाले समुदायों पर किए गए स्वास्थ्य अध्ययन से पता चला है कि बालों के झड़ने, जोड़ों का दर्द, शरीर में दर्द, पीठ दर्द, सूखी खुजली, रक्तविहीन सूखी त्वचा, फटी एड़ी, दाद, और सूखी खांसी, किडनी सम्बंधी शिकायतें जैसे रोगों में वृद्धि हुई है। किडनी और गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल शिकायतों के मामले भी सामने आए हैं।

कैंब्रिज (यू के) के हेल्थ केयर सलाहकार डॉक्टर मनन गांगुली ने कहा-

“कुल मिलाकर कोल ऐश नुकसानदेह न दिखते हुए भी एक धीमा ज़हर है आमतौर पर कोयले की राख में अन्य कार्सिनोजेन और न्यूरोटॉक्सिंस के साथ शीशा, पारा, सेलेनियम, हेक्सावेलेंट, क्रोमियम होते हैं। अध्ययन में कर्मियों और जनता के लिए जोखिम में फ्लाई ऐश को भी विकिरण जोखिम के साथ जोड़ा गया है। कोयले को ना जलाना ही सुरक्षित रहने का एकमात्र विकल्प है।”

 

  • भारतीय विनियमों में कोयले की राख को खतरनाक अपशिष्ट के रूप में मान्यता नहीं दी इसलिए बिजली कंपनियां फ्लाई ऐश के वैज्ञानिक निपटान के लिए इंजीनियर्ड लैंडफिल को बनाए रखने की लागत में कटौती करती हैं। नतीजन कोयला फ्लाई ऐश नियमित रूप से बिजली संयंत्रों के करीब खाली भूमि पर असुरक्षित और खुले गड्ढे में फेंक दिया जाता है। एक समय के बाद वहां राख का ढेर तैयार हो जाता है जिस पर बिजली कंपनियां आगे भी उसी पर राख का ढेर तैयार करती जाती हैं। राख से विषाक्त पदार्थ जमीन में रिसते हैं और भूजल को दूषित करते हैं। राख के ये तालाब राख के अत्यधिक वजन के कारण और मानसून के दौरान तटबंधों के रूप में घरों, गांव में कृषि भूमि और जल निकायों सहित आसपास के क्षेत्रों में बड़ी मात्रा में राख का निर्वहन करते हैं। शुष्क मौसम के दौरान यह राख तालाब वायु प्रदूषण का स्रोत बन जाते हैं क्योंकि तूफान राख के विशाल बादलों को पर्यावरण में ले जाते हैं।

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के याचिकाकर्ता जगत नारायण विश्वकर्मा ने कहा पिछले 2 वर्षों में सिंगरौली क्षेत्र में एस्सार एनटीपीसी और रिलायंस पावर जैसे बिजली उत्पादकों के प्लांट ने ऐश बंधों का उल्लंघन किया है। कंपनियों की लापरवाही के कारण हादसे फिर हुए हैं। ग्रामीणों ने लगातार बताया कि इन राख तालाबों की सीमाएं कमजोर है लेकिन कार्यवाही नहीं हुई।इस क्षेत्र में अनियंत्रित औद्योगिक विकास के कारण वायु, जल और मृदा प्रदूषण का वर्षों का अनुभव है जिसके कारण यहां रहने वाले समुदाय संपत्ति के साथ अपने स्वास्थ्य का भी दीर्घकालिक नुकसान उठाते हैं।”

वर्ष 2018-19 में उत्पन्न कुल 2017 मिलियन टन कोयले की राख में से केवल 168 मिलियन टन(77.5%) का उपयोग किया गया।फ्लाई ऐश का उपयोग सबसे ज्यादा 26.8% सीमेंट निर्माण के लिए,जबकि 13.5% निचले इलाकों के पुनर्वसन, 9.96 % ईटों, ब्लॉक और टाइल निर्माण हेतु, 9.94% राख डाइक बढाने में,4.50% राजमार्गों और फ्लाईओवर में एवं 4.65% खदान भरने में प्रयोग किया जाता है। फ्लाई ऐश के संबंध में सुझाए उपायों में निचले क्षेत्रों को भरने,ईंटें आदि उत्पाद बनाने के लिए फ्लाई ऐश का उपयोग करने से इनमें घुले विषाक्त पदार्थों पर प्रश्नचिन्ह उठते हैं। यह निर्णायक वैज्ञानिक सहमति के अभाव में विवादास्पद विषय रहा है। रिपोर्ट में आंकड़े कहते हैं कि पूरे देश में तालाबों और टीलों में 1 अरब टन से अधिक राख रूपी विरासत अनुपयोगी है।

क्या हैं नीति सिफारिशें :
  • जवाबदेही तय करना और यह सुनिश्चित करना कि कोयले को जलाने और कोयले की राख बनाने वाले बिजली संयंत्र सुरक्षित प्रबंधन और उसके उपयोग, निस्तारण और पुनः उपयोग से निकलने वाले पर्यावरणीय स्वास्थ्य प्रभावों की जिम्मेदारी लेते हैं।
  • बिजली संयंत्रों के पास रहने वाले समुदायों को साथ लेकर एक प्रभावशाली निगरानी प्रणाली का निर्माण करना जो उत्पादित राख के संपूर्ण निस्तारण के लिए उत्तरदायी हो, इसके बावजूद अगर पर्यावरण में राख का निर्वहन होता है तो प्रदूषण भुगतान सिद्धांत के तहत स्वास्थ्य और पर्यावरण क्षतिपूर्ति की व्यवस्था हो।
  • भारत को राख तालाब की वैज्ञानिक रोकथाम के लिए नियमों को विकसित करने की तत्काल आवश्यकता है। इसके लिए अभेद्य एच डी पी लाइनर्स के साथ मौजूदा राख के तालाबों को फिर से बनाने और पर्यावरणीय मंजूरी के साथ राख की वैज्ञानिक लैंडफिलिंग की आवश्यकता होगी। यह भूजल के रिसाव और संक्रमण की जांच करने के लिए अप्लाई अप्लाई अप्लाई एस दम के आसपास एक कठोर पर्यावरण निगरानी प्रोटोकॉल भी प्रदान करेगा।
  • सभी राख प्रदूषित स्थलों का निदान राष्ट्रीय कार्यक्रम NPRPS के पुनर्वास कार्यक्रम के तहत MoEFCC द्वारा विकसित मार्गदर्शन दस्तावेज के अनुसार किया जाना चाहिए।

पर्यावरण और स्वास्थ्य के लिए नुकसानदेह कोयला राख प्रदूषण फैलाने वालों पर कठोर दंड शुल्क लगाया जाना चाहिए।

हमारे जीवन, जीवनशैली और रोज़गार से कम-से-कम संसाधनों का दोहन हो

Medha Patkar

हमारे जीवन, जीवनशैली और रोज़गार से कम-से-कम संसाधनों का दोहन हो सबके सतत विकास के लिए यह है ज़रूरी – मेधा पाटकर

Exploit the least resources from our life, lifestyle and employment – It is necessary for the sustainable development of all – Medha Patkar

नई दिल्ली, 25 जुलाई 2020. ग्रेटा थुनबर्ग से प्रेरित हो कर अनेक युवाओं ने एक नया अभियान आरंभ किया – ‘एक बेहतर दुनिया की ओर’. प्रख्यात मानवाधिकार कार्यकर्ता मेधा पाटकर ने इस अभियान को जारी करते हुए देश-विदेश के युवाओं को याद दिलाया कि महात्मा गाँधी ने कहा था कि प्रकृति में इतने संसाधन तो हैं कि हर एक की ज़रूरतें पूरी हो सके परन्तु इतने नहीं कि एक का भी लालच पूरा हो सके. सबके सतत विकास के लिए यह ज़रूरी है कि हमारा जीवन, जीवनशैली और रोज़गार ऐसे हों कि कम-से-कम संसाधनों का दोहन और उपयोग हो.

मेगसेसे पुरूस्कार से सम्मानित कार्यकर्ता और सोशलिस्ट पार्टी (इंडिया) के उपाध्यक्ष डॉ संदीप पाण्डेय ने कहा कि हर एक व्यक्ति को कम-से-कम एक संकल्प लेना होगा जिससे वह दुनिया को बेहतर बनाने के लिए अपना योगदान दे सके. इस कार्यक्रम में ग्रेटा थुनबर्ग के वैश्विक अभियान, फ्राइडेज़ फॉर फ्यूचर, से भी अनेक युवाओं ने भाग लिया.

बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान से स्नातक अभय जैन ने इस अभियान के बारे में बताया कि इसका प्रमुख मकसद है युवाओं को प्रेरित करना कि वह व्यक्तिगत तौर पर अपने जीवन में बदलाव लाने का दृढ़ संकल्प लें जिससे कि यह दुनिया बेहतर बन सके. स्वयं संकल्प लेने से बदलाव का हमारा इरादा पक्का होता है. यह अभियान इसीलिए आरंभ किया जा रहा है.

जाने-माने समाजवादी विचारक और ‘द पब्लिक’ के संस्थापक-संपादक आनंद वर्धन सिंह ने कहा कि कोरोनावायरस महामारी को तो सरकारें खतरा मान रही हैं और उसके नियंत्रण के लिए यथासंभव कदम उठा रही हैं परन्तु जलवायु परिवर्तन की आपदा जो अनेक सालों से मंडरा रही है और अधिक विकराल चुनौती बनती जा रही है, सरकारें उससे अनभिज्ञ प्रतीत होती हैं. उन्होंने महात्मा गाँधी की बात दोहराई कि प्रकृति निरंतर अपने नियमानुसार कार्य करती रहती है परन्तु इंसान इन नियमों का उल्लंघन करता है जिसके कारणवश संतुलन बिगड़ता है.

ग्रीस देश के फ्राइडेज़ फॉर फ्यूचर अभियान से जुड़ीं 16 वर्षीय अरिआद्ने पापाथिओदोरोऊ ने कहा कि युवाओं को इसलिए आगे बढ़ कर अभियान को मज़बूत करना पड़ा क्योंकि बिगड़ते जलवायु परिवर्तन की आपदा के प्रति सरकारें चेत ही नहीं रही हैं. वह और उनके जैसे युवा एक ऐसी दुनिया चाहते हैं जहाँ हर एक के लिए लैंगिक बराबरी हो, मानवाधिकार हों और पर्यावरण का नाश न हो. उन्होंने शरणार्थियों से जुड़े मुद्दों के प्रति भी संवेदनशीलता व्यक्त की.

पाकिस्तान के फ्राइडेज़ फॉर फ्यूचर अभियान (Fridays for future campaign) से जुड़ीं 16 वर्षीय आयेशा इम्तिआज़ ने कहा कि अनेक स्थानीय लोगों को, विशेषकर बच्चों को, प्रदूषण के कारण कुप्रभावित होते देखकर ही उन्होंने पर्यावरण के मुद्दे उठाने का संकल्प लिया. प्रदूषण के कारण अनेक रोग भी होते हैं. हर इंसान बदलाव लाने की शक्ति रखती है और जलवायु परिवर्तन पर हम सब को एकजुट हो कर कार्य करना चाहिए. उन्होंने कहा कि पर्यावरण को बचाने के लिए हमें, देश के भीतर ही नहीं वरन मानवता के नाते वैश्विक रूप से एकजुट होकर कार्य करना होगा.

अफ्रीका के नाइजीरिया देश के फ्राइडेज़ फॉर फ्यूचर अभियान से जुड़े किंग्सले ओदोगवू ने कहा कि सरकार ने फ्राइडेज़ फॉर फ्यूचर की वेबसाइट को बंद करने का आदेश जारी किया था जिसको वापस ले लिया गया है. फ्राइडेज़ फॉर फ्यूचर अभियान हम सबके भविष्य के लिए समर्पित है.

फ्रांस के फ्राइडेज़ फॉर फ्यूचर अभियान से जुड़े जीनो ने कहा कि कोरोनावायरस महामारी से निबटने के बाद जब अर्थव्यवस्था पुन: चालू हो तो उसमें सभी जलवायु परिवर्तन सम्बंधित ठोस कदम शामिल किये जाएँ. उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन के लिए सबसे अधिक जिम्मेदार हैं अमीर और अमीर देश परन्तु वह अपनी जिम्मेदारी लेने से कतरा रहे हैं. इसीलिए युवाओं को हम सबका भविष्य बचाने के लिए एकजुट होना पड़ रहा है.

श्री लंका की युवा शेलानी पालीहवादाना ने कहा कि वह लैंगिक गैर-बराबरी मिटाने के लिए कार्यरत हैं. विकलांगता के कारण अनेक लोगों को विशेषकर युवाओं को काफ़ी मुसीबत का सामना करना पड़ता है जिसके लिए वह समर्पित रही हैं. उन्होंने बताया कि हालाँकि श्री लंका में पॉलिथीन इतनी बनती ही नहीं है परन्तु समुद्र में पॉलिथीन प्रदूषण करने वाले दुनिया के सबसे बड़े देशों में वह एक है.

आत्मनिर्भर भारत के लिए ज़रूरी हैं स्वयं निर्भर गाँव | Self dependent villages are essential for a self-reliant India

मेधा पाटकर ने कहा कि वैश्विक स्तर पर जलवायु परिवर्तन को बड़ा मुद्दा तो माना जाता है और अनेक संधियाँ, उच्च-स्तरीय बैठकें आदि होती हैं परन्तु सरकारें इस आपदा से बचने के लिए ज़रूरी कदम ही नहीं उठा रही हैं. सरकारों की जिम्मेदारी है कि वह पर्यावरण, सामाजिक-संस्कृतिक विविधता, एकता, बराबरी और न्याय के प्रति समर्पित हो कर कार्यरत रहें. यह मूल्य जो हमारे संविधान में भी निहित हैं, हमारे जीवन के लिए और सरकारों के शासन के लिए एक मार्गनिर्देशिका स्वरूप हैं.

एक राजनेता ने संसद में कहा कि लोग पर्यावरण या विकास के बीच एक चुन लें, परन्तु यह सही नहीं है क्योंकि पर्यावरण और विकास दोनों अविभाज्य हैं.

मेधा जी ने कहा कि पर्यावरण का मतलब (Environment means) सिर्फ कोयले या ओजोन से ही नहीं है बल्कि हमारे जीवन, रोज़गार के माध्यम, और जीवनशैली से भी जुड़ा हुआ है – और – पर्यावरण से जीवन पोषित और संचारित भी होता है.

After all, whose natural resources are there?

उन्होंने कहा कि लोग यह विचार करें कि प्राकृतिक संसाधन आखिर किसके हैं? यदि जल, जंगल, जमीन, खनिज, वायु आदि दुनिया के इंसान के हैं तो फिर लोगों को इसकी संरक्षा करने के लिए जिम्मेदारी तो लेनी पड़ेगी ही क्योंकि यह सर्वविदित है कि सिर्फ सरकारों के भरोसे इसको नहीं छोड़ा जा सकता है.

जो पर्यावरण का शोषण, दोहन और विनाश हो रहा है उसकी भरपाई नहीं हो सकती क्योंकि यह क्षति अपूरणीय है.

बड़े पैमाने पर उत्पादन नहीं बल्कि जनता द्वारा उत्पादन से हल होगी रोज़गार की समस्या

मेधा पाटकर ने कहा कि युवाओं को महात्मा गाँधी की बात हमेशा स्मरण रखनी चाहिए कि “मेरा जीवन ही मेरा सन्देश है”.

उन्होंने कहा कि गांधीजी ने सादगी का रास्ता सुझाया था जो एक अलग प्रकार की समृधि लाता है – जो ज़रूरी है यदि हमें, सबके लिए बराबरी, न्यायपूर्ण और सतत विकास की व्यवस्था का सपना पूरा करना है. गाँधीवादी अर्थव्यवस्था ही सही मायने में समाजवादी, सतत, और न्यायपरस्त अर्थव्यवस्था है. उदाहरण के रूप में यदि रोज़गार की चुनौती हल करनी है तो वह बड़े पैमाने के उत्पादन से नहीं होगी बल्कि जनता द्वारा उत्पादन से होगी. हमें इसके लिए अपने जीवन, जीवनशैली और रोज़गार के माध्यम में भी बदलाव लाना होगा क्योंकि प्रकृति में हम सब की ज़रूरत के लिए संसाधन तो हैं परन्तु एक के भी लालच पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं है. इसीलिए यह हमें संकल्प लेना चाहिए कि हमारा जीवन, जीवनशैली और रोज़गार, कम-से-कम संसाधनों के दोहन पर निर्भर रहें.

मेधा पाटकर इस कार्यक्रम में नर्मदा घाटी से ऑनलाइन भाग ले रही थीं.

उन्होंने कहा कि वहां के आदिवासी समुदाय जिस तरह से जीवन जीता है उसमें जल, जंगल और जमीन की रक्षा एवं अन्य जीवित प्राणियों की भी रक्षा निहित है. नर्मदा घाटी के आदिवासी समुदाय ने सिर्फ पुनर्वास के लिए संघर्ष नहीं किया बल्कि नदी और नदी से जुड़े प्राकृतिक संसाधनों को बचाने के लिए भी संघर्ष किया – क्योंकि बिना जंगल के नदी नहीं बहेगी और बिना नर्मदा नदी के बहाव के समुद्र को अन्दर आने से कैसे रोका जा सकेगा? पिछले सालों में नर्मदा नदी में 50-80 किलोमीटर समुद्र अन्दर आ गया है. मेधा पाटकर ने कहा कि जन-आन्दोलन भी एक रचनात्मक कार्य है और जिन मूल्यों में हम आस्था रखते हैं वह उनकी सकारात्मक अभिव्यक्ति है.

प्रसिद्ध पर्यावरणविद और अर्थशास्त्री डॉ लुबना सर्वथ जो तेलंगाना में सोशलिस्ट पार्टी (इंडिया) की महासचिव भी हैं, ने कहा कि युवाओं की अपेक्षा है कि सरकारें पर्यावरण-आपदा को संज्ञान में ले कर कार्यसाधकता के साथ कार्यरत हों पर ऐसा हो नहीं रहा है. उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि वह अपने पास के जल-स्त्रोत को प्रदूषित होने से रोकें. जल ही जीवन है और यह जिम्मेदारी हम सबको लेनी होगी कि सभी जल स्रोत प्रदूषित न हो पायें.

बॉबी रमाकांत – सीएनएस (सिटिज़न न्यूज़ सर्विस)

क्या आपदा को विपदा बनने का अवसर दे रहे हैं विश्व के कोविड रिकवरी पैकेज ?

Environment and climate change

नई दिल्ली, 24 जुलाई 2020. पूरी दुनिया में आपदा को अवसर बनाने की बात हो रही है। लेकिन बात अगर पर्यावरण की हो तो यह आपदा अब विपदा बनती दिख रही है। कम-से-कम विविड इकोनॉमिक्स (UK consultancy Vivid Economics,) की इस ताज़ा रिपोर्ट से तो ये ही समझ आता है।

ग्रीन स्टिम्युलस इंडेक्स (Green Stimulus Index) नाम की इस रिपोर्ट की मानें तो दुनिया भर में कोविड महामारी के बाद जनता की सेहत और पर्यावरण को बचाने के इरादे से दिए कुल 11.8 ट्रिलियन डॉलर के आर्थिक पैकेज (Recovery Packages) का अधिकांश हिस्सा ऐसे क्षेत्रों में निवेश किया गया है जो लम्बे समय में पर्यावरण के लिए बेहद बुरे साबित होंगे। और तब, स्थिति को संभालना और भी मुश्किल हो चुका होगा।

इन आर्थिक पैकेजों की ऐसी प्राथमिकतायें तब हैं, जब अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष, संयुक्त राष्ट्र संघ, और अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी जैसी तमाम संस्थाएं सभी देशों को इस विषय में जागरूक करती आयी हैं।

विविड इकोनोमिक्स ने पहले विश्व की 17 अर्थव्यवस्थाओं के कोविड रिकवरी पैकेजों को उनके द्वारा जीवाश्म ईंधन, अक्षय ऊर्जा, और प्रदूषण फ़ैलाने वाले उद्योगों को दिए जाने वाले सहयोग और प्राथमिकताओं के आधार पर समझा। उसके बाद इन देशों की एक रैंकिंग तैयार की गयी जिसे ग्रीन स्टिम्युलस इंडेक्स का नाम दिया गया।

दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि भारत इस इंडेक्स में नेगेटिव स्कोर ले कर, चीन और रूस जैसे देशों के साथ खड़ा है।

भारत के साथ जो सोलह और देश हैं, वो हैं, चीन, इंडोनेशिया, अमरीका, रूस, मेक्सिको, दक्षिण अफ्रीका, ब्राज़ील, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, इटली, जापान, स्पेन, कोरिया, जर्मनी, यूके, फ़्रांस, और युरोपियन यूनियन।

बात भारत की करें को जो कुछ एहम बातें सामने आती हैं, वो हैं :

  1. भारत ने COVID के जवाब में 266 बिलियन अमेरिकी डॉलर का राजकोषीय प्रोत्साहन पैकेज पारित किया है।
  2. प्रोत्साहन पैकेज की संरचना : भारत का प्रारंभिक पैकेज स्वास्थ्य सेवा और कल्याण के लिए समर्थन पर केंद्रित है, लेकिन आगे के फैसलों में व्यवसायों के लिए पर्याप्त समर्थन और कृषि क्षेत्र के लिए लक्षित समर्थन शामिल है।
  3. भारत का नकारात्मक सूचकांक स्कोर खराब अंतर्निहित पर्यावरण प्रदर्शन और विशिष्ट हानिकारक उपायों से प्रेरित है जिसमें कोयले के लिए महत्वपूर्ण समर्थन शामिल है। हालाँकि, सरकार ने पर्यावरण के अनुकूल उपायों की कुछ घोषणाएँ की हैं।
  4. भारत की राज्य की खानों से बाजार में कोयला लाने में मदद करने के लिए कोयला बुनियादी ढांचे के लिए भारत का US $ 6.6 मिलियन का वित्तपोषण।
  5. आवश्यक पारिस्थितिकी तंत्र लाभ प्रदान करते हुए ग्रामीण और अर्ध-शहरी अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहित करने के लिए डिज़ाइन किए गए वनीकरण कार्यक्रम की दिशा में यूएस $ 780 मिलियन। यह धनराशि क्षतिपूरक वनीकरण प्रबंधन और योजना प्राधिकरण (CAMPA) कोष के माध्यम से प्रदान की जाती है।
  6. भारत अपने व्यापारिक भागीदारों से तेल भंडार की एक रणनीतिक राशि हासिल करने के लिए प्रतिबद्ध है

अपनी प्रतिक्रिया देते हुए विविड एक्नौमिक्स के वरिष्ठ अर्थशास्त्री, मटो सलाज़ार कहते हैं,

“कोविड की शक्ल में पूरी दुनिया अपनी तरह का ऐसा कुछ पहली बार अनुभव कर रही है। यह बड़ी नाज़ुक स्थिति है। मानव गतिविधियों ने पहले ही पर्यावरण और प्रकृति को नुकसान पहुँचाया हुआ है। और अब इन आर्थिक पैकेजों की प्राथमिकताओं को देख लगता है जलवायु संकट के लिए मार्ग प्रशस्त किया जा रहा है।”

आगे और देशों के पैकेजों की बात करें तो पड़ोसी मुल्क चीन का रिकवरी पैकेज भी ख़ासा आलोचनीय है और अच्छे बुरे का मिश्रण है जहाँ कुल मिलाकर पैकेज पर्यावरण के लिए बुरा ही साबित होता दिखता है। चीन ने राजकोषीय प्रोत्साहन में कुल यूएस $ 592 बिलियन पारित किया है। स्वास्थ्य देखभाल और कल्याणकारी उपायों के साथ, प्रोत्साहन पैकेज में चीन के बड़े और पर्यावरणीय रूप से गहन औद्योगिक क्षेत्र के लिए पर्याप्त समर्थन शामिल है। साथ ही, इस पैकेज में कोयला परमिट स्वीकृतियों की गति बढाने की बात है, जो कि 2020 तक कोयले को राष्ट्रीय ऊर्जा खपत के 58 प्रतिशत तक सीमित रखने की सरकार की प्रतिबद्धता के विपरीत है।

अब बात विश्वशक्ति अमेरिका की करें तो वहां भी हालात बुरे ही हैं। अमरीका ने 2.98 ट्रिलियन डॉलर का कुल पैकेज पास किया है। उसका नकारात्मक स्कोर काफी हद तक अपर्याप्त अंतर्निहित पर्यावरण प्रदर्शन, पर्यावरण मानकों के व्यापक प्रसार और बड़े बिना शर्त एयरलाइन खैरात के कारण है। वहां एकमात्र सकारात्मक घोषणा अनुसंधान और विकास के लिए सब्सिडी है।

अब बात पर्यावरण अनुकूल आर्थिक पैकेजों की करें तो यूरोपीय यूनियन, जर्मनी और यूनाइटेड किंगडम उम्मीद जगाते हैं।

यूरोपीय यूनियन का पैकेज सबसे लुभावना और पर्यावरण अनुकूल है। 830 बिलियन डॉलर के इस पैकेज का 30 प्रतिशत सीधे तौर पर पर्यावरण अनुकूल गतिविधियों के लिए आवंटित है। सबसे अच्छी बात है कि रिकवरी के लिए सस्द्य देशों को दी जाने वाली राशि इस शर्त के साथ दी जाएगी कि उनके द्वारा उस राशि से पर्यावरण को कोई हानि नहीं पहुंचाई जाएगी।

जर्मनी की बात करें तो उन्होंने अपने रिकवरी पैकेज में अभी 45 बिलियन डॉलर का इज़ाफ़ा किया और उसे नाम दिया भविष्य का पैकेज। ये हालाँकि उनके कुल पैकेज का एक छोटा हिस्सा है, लेकिन इसे पर्यावरण अनुकूल गतिविधियों के लिए रखा गया है।

अब तक अमेरिका, रूस, मैक्सिको और दक्षिण अफ्रीका ने कोई पर्यावरणीय रूप से सकारात्मक पैकेज नहीं दिया है। जबकि चीन और इंडोनेशिया में विशाल कार्बन-गहन क्षेत्रों के लिए समर्थन उनके सकारात्मक उपायों से आगे निकल जाता है। वहीँ यूरोपियन यूनियन, दक्षिण कोरिया, फ्रांस, जर्मनी और यूके ऐसे देशों में से हैं जिन्होंने कई पर्यावरण अनुकूल उपायों के साथ जवाब दिया है। ब्रसेल्स रिकवरी पैकेज संभवतः आज तक का सबसे पर्यावरण के अनुकूल प्रोत्साहन पैकेज है।

इस पूरे इंडेक्स पर विविड एक्नौमिक्स के मटो सलाज़ार बताते हैं,

“घोषित प्रोत्साहन पैकेज सीधे उन क्षेत्रों में खरबों या डॉलर को पंप करेंगे जिनका प्रकृति पर बड़ा और स्थायी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। असलियत यह है कि ग्रीन स्टिमुलस नौकरियों को बचाने और स्थायी विकास सुनिश्चित करने की एक कुंजी है। इस कुंजी का सही प्रयोग होना चाहिए। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुसार 2020 में 300 मिलियन से अधिक नौकरियों के नष्ट होने की आशंका है। ऊर्जा दक्षता या नवीकरणीय क्षेत्रों में निवेश किए गए प्रति डॉलर जीवाश्म ईंधन क्षेत्रों की तुलना में कई गुना अधिक नौकरियां पैदा होती हैं।”

अब देखना यह है कि इन प्राथमिकताओं के साथ पूरी दुनिया कैसे इन्सान की सेहत, जलवायु परिवर्तन से उसकी सुरक्षा, और आर्थिक विकास में तालमेल बना पाती है।

थर्मल इंजीनियर दिवस : प्रदूषण के लिए उत्तरदायी हों थर्मल पावर प्लांट

Coal

Thermal power plants should be responsible for pollution

थर्मल इंजीनियर दिवस (24 जुलाई) पर विशेष | Article on Thermal Engineer Day (24 July)

Thermal power plants basic information | What is thermal engineering?

थर्मल पावर स्टेशन’, जिन्हें ऊष्मीय शक्ति संयंत्र या ताप विद्युत केन्द्र के नाम से भी जाना जाता है, ऐसे विद्युत उत्पादन संयंत्र होते हैं, जिनमें प्रमुख टरबाइनें भाप से चलाई जाती हैं और यह भाप कोयला, गैस इत्यादि को जलाकर पानी को गर्म करके प्राप्त की जाती है। पानी गर्म करने के लिए ईंधन का प्रयोग किया जाता है, जिससे उच्च दाब पर भाप बनती है और बिजली पैदा करने के लिए इसी भाप से टरबाइनें चलाई जाती हैं।

हमारे जीवन में थर्मल इंजीनियरिंग के महत्व (Importance of thermal engineering in our lives) को समझाने के लिए प्रतिवर्ष 24 जुलाई को ‘राष्ट्रीय थर्मल इंजीनियरिंग दिवस’ मनाया जाता है। यह भी जान लें कि थर्मल इंजीनियरिंग आखिर है क्या? यह मैकेनिकल इंजीनियरिंग का ही एक ऐसा हिस्सा है, जिसमें ऊष्मीय ऊर्जा का इस्तेमाल किया जाता है। घरों तथा गाड़ियों में इस्तेमाल होने वाले एयरकंडीशनर तथा रेफ्रिजरेटरों में इसी इंजीनियरिंग का इस्तेमाल होता है। थर्मल इंजीनियरिंग के जरिये इंजीनियर ऊष्मा को अलग-अलग माध्यमों में उपयोग करने के अलावा ऊष्मीय ऊर्जा को दूसरी ऊर्जा में भी परिवर्तित कर सकते हैं। थर्मल इंजीनियरिंग वास्तव में बंद या खुले वातावरण में वस्तुओं को गर्म या ठंडा रखने की प्रक्रिया है और थर्मल इंजीनियर ऊष्मीय ऊर्जा को केमिकल, मैकेनिकल या विद्युतीय ऊर्जा में परिवर्तित करने के लिए विभिन्न प्रकार की मशीनें तैयार करते हैं, जिनके जरिये वे ऊष्मा को नियंत्रित करते हैं। हमारे घरों या दफ्तरों में इस्तेमाल होने वाली बिजली इसी ऊष्मीय ऊर्जा से बनती है और यह बिजली बनाने का काम करते हैं थर्मल पावर स्टेशन।

कैसे एक ताप विद्युत संयंत्र काम करता है? | How does a Thermal Power Plant Work?

थर्मल पावर स्टेशनों में ऊष्मीय ऊर्जा को बिजली में परिवर्तित किया जाता है और इसके लिए भाप से चलने वाली टरबाइनों का इस्तेमाल किया जाता है। भाप बनाने के लिए पानी को उच्च तापमान पर गर्म किया जाता है, जिसके लिए कोयला, सोलर हीट, न्यूक्लियर हीट, कचरा तथा बायो ईंधन उपयोग किया जाता है।

दुनिया के कई देशों में अभी भी बिजली पैदा करने के लिए भाप से चलने वाली टरबाइनों का उपयोग किया जाता है किन्तु पर्यावरणीय खतरों को देखते हुए अब धीरे-धीरे बिजली पैदा करने के लिए सौर ऊर्जा तथा पवन ऊर्जा जैसे अक्षय ऊर्जा के अन्य स्रोतों को ही महत्व दिया जाने लगा है। भारत में इस दिशा में तेजी से कदम बढ़ाए जा रहे हैं।

पिछले दिनों रीवा में 750 मेगावाट क्षमता की अत्याधुनिक मेगा सौर ऊर्जा परियोजना का उद्घाटन भी किया गया। इसके अलावा पहले से ही हजारों मेगावाट के कुछ सोलर प्लांट पहले से ही ऊर्जा उत्पादन में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं।

दरअसल थर्मल पावर स्टेशनों में भाप पैदा करने के लिए कोयला जलाने से पर्यावरण को अपूरणीय क्षति पहुंचती है क्योंकि इस प्रक्रिया में निकलने वाली हानिकारक गैसें हवा में मिलकर पर्यावरण को बुरी तरह प्रदूषित करती हैं, साथ ही कोयला या अपशिष्ट जलाने के बाद बचने वाले अवशेषों के निबटारे की भी बड़ी चुनौती मौजूद रहती है।

हालांकि भारत में थर्मल पावर स्टेशनों में बिजली पैदा करने के लिए कोयले के अलावा ऊर्जा के अन्य स्रोतों का भी इस्तेमाल किया जाता है किन्तु अधिकांश बिजली कोयले के इस्तेमाल से ही पैदा होती है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार कोयले को जलाया जाना और इससे होने वाली गर्मी, पारे के प्रदूषण का मुख्य कारण है। हिन्दी अकादमी दिल्ली के आर्थिक सहयोग से इसी वर्ष पर्यावरण एवं प्रदूषण पर प्रकाशित हुई पुस्तक ‘प्रदूषण मुक्त सांसें’ में बताया गया है कि विश्वभर में करीब 40 फीसदी बिजली कोयले से ही प्राप्त होती है जबकि देश में करीब 60 फीसदी बिजली कोयले से, 16.1 फीसदी अक्षय ऊर्जा के विभिन्न स्रोतों जैसे सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा तथा बायो गैस से, 14 फीसदी पानी से, 8 फीसदी गैस से, 1.8 फीसदी न्यूक्लियर ऊर्जा से तथा 0.3 फीसदी डीजल से पैदा होती है।

वैसे बिजली पैदा करने के लिए भले ही ऊर्जा के किसी भी स्रोत का इस्तेमाल किया जाए, हरेक थर्मल पावर प्लांट में इसके लिए बॉयलर का इस्तेमाल होता है, जिसमें ईंधन को जलाकर ऊष्मीय ऊर्जा पैदा की जाती है, जिससे पानी को गर्म कर भाप बनाई जाती है, जो टरबाइनों को चलाने में इस्तेमाल होती है।

आज दुनियाभर में वायु प्रदूषण एक बड़े स्वास्थ्य संकट के रूप में उभर रहा है और इस समस्या के लिए थर्मल पावर प्लांटों से निकलने वाला उत्सर्जन भी एक बड़ा कारण है। इस समस्या से निपटने के लिए एक दशक से भी अधिक समय से उत्सर्जन मानकों को पूरा करने और नए कोयला आधारित बिजली संयंत्रों को रोककर अक्षय ऊर्जा की तरफ कदम बढ़ाने की जरूरत पर जोर दिया जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट भी इन उत्सर्जन मानकों को पूरा करने के लिए समय सीमा निर्धारित करता रहा है किन्तु थर्मल पावर प्लांट के लिए उत्सर्जन मानकों को लागू करने का मामला वर्षों से अधर में लटका है।

पर्यावरण पर कार्यरत कुछ संस्थाओं द्वारा मांग की जा रही है कि पर्यावरण मंत्रालय उत्सर्जन मानकों का पालन कराते हुए थर्मल पावर प्लांटों को प्रदूषण के लिए उत्तरदायी बनाए और अक्षय ऊर्जा के लक्ष्य को हासिल करने के लिए नए थर्मल पावर प्लांटों का निर्माण रोका जाए।

         माना जा रहा है कि उत्सर्जन मानकों का पालन करने में देरी के चलते सालभर में 70 हजार से ज्यादा मौतें समय पूर्व हो रही हैं।

पर्यावरण संरक्षण के लिए कार्यरत संस्था ग्रीनपीस के अनुसार अगर उत्सर्जन मानकों को समय से लागू किया जाता तो सल्फर डाई ऑक्साइड में 48 फीसदी, नाइट्रोडन डाई ऑक्साइड में 48 फीसदी और पीएम उत्सर्जन में 40 फीसदी तक की कमी की जा सकती थी, जिससे समय पूर्व हो रही इन मौतों से बचा जा सकता था। थर्मल पावर प्लांटों में बिजली बनाए जाने के लिए कोयला जलाने के दौरान उससे बनी राख का 10 फीसदी से भी अधिक हिस्सा चिमनियों के जरिये धुएं के साथ ही वातावरण में घुल जाता है, जो गंभीर पर्यावरणीय समस्याओं का कारण बनता है।

Yogesh Kumar Goyal योगेश कुमार गोयल वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं
Yogesh Kumar Goyal योगेश कुमार गोयल वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं

बहरहाल, आज जिस प्रकार दुनियाभर में पर्यावरणीय खतरों के मद्देनजर थर्मल पावर प्लांटों में कोयले के इस्तेमाल पर रोक लगाते हुए सौर ऊर्जा तथा पवन ऊर्जा जैसे अक्षय ऊर्जा के महत्वपूर्ण स्रोतों का उपयोग किया जा रहा है, ऐसे में भारत को भी कोयला आधारित थर्मल पावर प्लांट के बजाय क्लीन और ग्रीन एनर्जी को प्रोत्साहन देना चाहिए।

समय के साथ अब जरूरत इसी बात की है कि दूसरे देशों की भांति हम भी अक्षय ऊर्जा की ओर कदम बढ़ाएं और बिजली बनाने के लिए चरणबद्ध तरीके से ऊर्जा के इन्हीं सुरक्षित स्रोतों के इस्तेमाल को बढ़ावा दें।

योगेश कुमार गोयल

(लेखक ने इसी वर्ष पर्यावरण पर 190 पृष्ठों की पुस्तक ‘प्रदूषण मुक्त सांसें’ लिखी है)

वायु प्रदूषण पर प्रशासन नहीं विज्ञान लगा सकता है लगाम

Environment and climate change

एक माइक्रो ग्राम पीएम 2.5 की बढ़ोत्तरी 8 फीसद की दर से बढ़ाती है कोविड मृत्यु दर

Air pollution has a direct relationship with the COVID-19 mortality.

Science based approach to air quality policymaking in India

नई दिल्ली, 23 जुलाई: वायु प्रदूषण का कोविड-19 की मृत्यु दर से सीधा रिश्ता है. वैज्ञानिकों की मानें तो प्रदूषित करने वाले कणिक तत्वों में हर एक माइक्रो ग्राम प्रति घन मीटर की वृद्धि के साथ कोविड 19 की मृत्यु दर में 8 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी होती है.

ऐसी तमाम जानकारियों और डेटा का ख़ुलासा हुआ क्लाइमेट ट्रेंड्स द्वारा आयोजित एक सार्थक वेबिनार में, जहाँ चर्चा का विषय था भारत में वायु गुणवत्ता सुनिश्चित करने वाली नीति निर्धारण में विज्ञान की भूमिका को सबके सामने रखना.

वेबिनार के मुख्य प्रतिभागियों में थे लंग केयर फाउंडेशन के डॉ अरविन्द कुमार, महाराष्ट्र प्रदूषण कण्ट्रोल बोर्ड के जॉइंट डायरेक्टर( वायु) डॉ वी एम् मोठ्घरे और इंडिया क्लाइमेट कोलैब्रेटिव की श्लोका नाथ. इन सभी ने देश में वायु गुणवत्ता नीति निर्धारण को विज्ञान के चश्मे से देखने की ज़रुरत और एहमियत को सामने रखा.

श्लोका नाथ ने प्रदूषण डेटा की कमी को उजागर करते हुए बताया,

“देश में वायु प्रदूषण के डेटा की कमी को दूर करने के लिए 4000 मोनिटरिंग स्टेशन चाहिए. और इसको पूरा करने में 10000 करोड़ रुपये का खर्च आयेगा.” आगे, इस खर्चे की प्रासंगिकता को एक लिहाज़ से साबित करते हुए श्लोका ने कहा, “शुरूआती शोध के मुताबिक़ पीएम 2.5 का सीधा रिश्ता है कोविड 19 की मृत्यु दर से. इसलिए पीएम 2.5 की विस्तृत जानकारी बेहद ज़रूरी है.”

उनकी इस बात पर मोहर लगाते हुए डॉ अरविन्द कुमार ने बताया कि,

“विश्व के तमाम देशों में इस बात को सिद्ध करते शोध हुए हैं, लेकिन इटली में हुआ शोध फ़िलहाल सबसे विश्वसनीय प्रतीत होता है. इसके अनुसार पीएम 2.5 में हर एक माइक्रो ग्राम प्रति घन मीटर की वृद्धि के साथ कोविड 19 की मृत्यु दर में 8 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी होती है.”

डॉ कुमार ने आगे एक हौसला देती जानकारी देते हुए कहा,

“कोविड की वजह से हुई तालाबंदी का असर पर्यावरण पर साफ़ है. ख़ास तौर से इसलिए क्योंकि इन दौरान फेफड़ों की बीमारी से जूझते तमाम मरीज़ों की हालत में सुधार हुआ है. लेकिन ये स्थिति हमेशा ऐसी नहीं रहेगी क्योंकि जैसे-जैसे प्रदूषण बढ़ेगा, वैसे-वैसे इन मरीज़ों की स्थिति बिगड़ सकती है.”

महामरी के इस दौर में वायु प्रदूषण को जन स्वास्थ्य से जोड़ते हुए आईआईटी कानपुर के सिविल इंजीनियरिंग विभाग के अध्यक्ष, प्रोफ़ेसर एस एन त्रिपाठी ने बेहद महत्वपूर्ण जानकारियां साझा कीं. उन्होंने दिल्ली की हवाओं पर केंद्रित पांच रिसर्च पेपर्स की मदद से इस बात को साबित किया कि क्योंकि वायु प्रदूषण एक बड़ी जन स्वास्थ्य समस्या का कारण है, उसको नियंत्रित करने वाली नीतियों का आधार प्रशासनिक की जगह वैज्ञानिक होना चाहिए.

स्थिति की गंभीरता और ऐसे शोध की प्रासंगिकता बताते हुए महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के डॉ. वी एम् मोठ्घरे ने कहा,

“महाराष्ट्र देश की अर्थ व्यवस्था में बड़ा योगदान देता है. लेकिन इसके साथ ही प्रदूषण में भी उसका योगदान रहता है. प्रदूषण पर सटीक जानकारी नीति निर्धारण में मदद करती है इसलिए हमने आईआईटी कानपुर के साथ एक समझौता किया है जिसके अंतर्गत कम लागत के सेंसर आधारित मॉनिटरिंग उपकरण मुम्बई में लगाये जायेंगे. ये काम इस साल एक नवम्बर से शुरू होगा और इसके पूरा होने का लक्ष्य अगले साल 31 मई तक है. साथ ही, हमने अमेरिका की पर्यावरण संरक्षण की शीर्ष संस्था US EPA, और जापान और MIT जैसी संस्थाओं के साथ भी समझौते किये हैं. इस तकनीकी नवाचार की मदद से हम प्रदूषण के छोटे-से-छोटे कारक की संरचना से ले कर उसका स्रोत, और उसका हमारे स्वास्थ्य पर पड़ने वाले असर तक, सब जान पाएंगे.”

पूरे मुद्दे पर क्लाइमेट टट्रेंड्स की डायरेक्टर, आरती खोसला, ने कहा,

“वायु प्रदूषण के संदर्भ में आइआइटी कानपुर की ये नयी रिसर्च अपनी तरह की पहली वैज्ञानिक पहल है. इसमें वाहनों से लेकर निर्माण कार्य तक से होने वाले प्रदूषण के हर स्रोत की विस्तृत जानकारी है. देश में जन स्वास्थ्य पर प्रदूषण के असर को समझने के लिए ऐसी बारीक जानकारी बेहद ज़रूरी है. नीति निर्माताओं के पास इस जानकारी को नकारने या उसे नीति निर्धारण में प्रयोग न करने की कोई वजह नहीं होनी चाहिए. अब जब इस शोध से हमें ये पता चलता है कि दिल्ली की हवा में लेड, क्लोरीन, निकल जैसे तत्व हैं, तब स्मोग टावर और स्मोग गन्स जैसे समाधान न सिर्फ़ संसाधनों की बर्बादी से लगते हैं, दिशाहीन भी सिद्ध होते हैं.”

आरती कोविड महामारी का संदर्भ देते हुए कहती हैं,

“लॉकडाउन ने हमें रास्ता दिखाया कि प्रदूषण के स्रोत अगर बंद कर दिए जाएँ तो वातावरण कितना बेहतर हो सकता है. लेकिन लॉकडाउन कोई समाधान नहीं और न इसके साथ आगे बढ़ा जा सकता है. इसलिए अब केंद्र और राज्य सरकारों को बड़े उत्सर्जकों पर नकेल कसते हुए धीरे-धीरे इन उत्सर्जनों को कम करने के लिए म्युनिसिपल स्तर के विकल्प तलाशने होंगे.”

अपने शोध पर विस्तार से जानकारी देते हुए प्रोफ़ेसर त्रिपाठी कहते हैं,

“ हमने बीते कुछ समय में पाँच पेपर प्रकाशित किये हैं. पहला पेपर बात करता है पीएम 2.5 के ओक्सिडेटिव पोटेंशियल और उसके हमारी सेहत पर असर के बारे में. ओक्सिडेटिव पोटेंशियल मतलब किसी प्रदूषक कण की वो ताकत जिसकी मदद से हो हमारे शरीर में जा कर हमारे लिए ज़रूरी एंटी ओक्सिडेंट को बर्बाद कर देता है. इस पेपर की मदद से ये साबित होता है कि सिर्फ़ पीएम2.5 की कुल मात्रा का ज़िक्र और फ़िक्र काफ़ी नहीं. उनकी केमिकल कम्पोजीशन समझना बेहद ज़रूरी है.”

प्रोफ़ेसर त्रिपाठी की मानें तो भारत में पीएम 2.5 का ओक्सिडेटिव पोटेंशियल अमेरिका में पाए जाने वाले पीएम 2.5 से कहीं ज़्यादा है.

वो आगे बताते हैं,

“दूसरे और तीसरे रिसर्च पेपर में दिल्ली की हवा में पायी जाने वाली टोक्सिक गैसों के स्रोत को पहचानने की बात की गयी है. इन पेपर्स में तो हमने एक लिहाज़ से इन टोक्सिक गैसों के स्रोत, मात्रा, संरचना वगैरह के फिंगरप्रिंट निकाल कर रखे हैं. दिल्ली में प्रदूषण के जानलेवा स्तर होने के बावजूद वहां प्रदूषण के स्रोत और उसकी संरचना को लेकर ऐसी कोई जानकारी उपलब्ध नहीं.”

बाकी के दो पेपर्स के बारे में बताते हुए प्रोफ़ेसर त्रिपाठी कहते हैं,

“चौथे पेपर में सामने आया कि पीएम कणों में सबसे ज़्यादा मात्रा में क्लोरीन और सिलिकोन थे और ये सभी कण दिल्ली के बाहर से तीन वायु मार्गों से पहुंचे थे. क्लोरीन, ब्रोमीन, और सेलेनियम अगर पंजाब और हरियाणा से आये, तो सल्फ़र, क्रोमियम, निकल, मैंगनीज़ उत्तर प्रदेश से आये. साथ ही कॉपर कैडमियम और लेड नेपाल की हवाओं से यहाँ पहुंचे. वहीँ लेड, टिन और सेलेनियम के कण हरयाणा, पंजाब, और पाकिस्तान की हवाओं से भारत में यहाँ तक पहुंचे.”

पांचवी और आख़िरी पेपर के बारे में बताते हुए प्रोफ़ेसर त्रिपाठी बताते हैं,

“इसमें ये बात सामने आयी कि मानसून के बाद की हवाएं प्रदूषण के लिहाज़ से बेहद संवेदनशील होती हैं. बीते दस सालों में ये देखा गया है कि लगातार मानसून के बाद वायु प्रदूषण बद से बद्तर होता जा रहा है. इस रिपोर्ट से ये साफ़ होता है कि अब वक़्त का तकाज़ा है कि किसानों को पराली जलाने या उसके निस्तारण के लिए बेहतर विकल्प देने की ज़रूरत है.”

अंततः सभी विशेषज्ञों की एक राय रही कि वायु प्रदूषण पर लगाम लगाने के लिए विज्ञान की मदद से जितना अधिक बारीकी से डेटा जुटाया जायेगा, उतने ही प्रभावी तरीके से प्रदूषण पर लगाम लगाई जा सकती है. प्रोफ़ेसर त्रिपाठी के शोध की तारीफ़ करते हुए सभी ने माना कि बेहतर नीति बिर्धर्ण के लिए ऐसे शोध अतिअवाश्यक है.

भारत में डेल ने 2020 गेमिंग लैपटॉप लाँच किए

Dell unveils 2020 gaming laptop portfolio in India

Dell unveils 2020 gaming laptop portfolio in India

नई दिल्ली, 23 जुलाई 2020. डेल टेक्नोलॉजीज (Dell Technologies) और इसकी सहयोगी कंपनी-एलाइनवेयर (Alienware) ने गुरुवार को भारतीय बाजार के लिए नवीनतम 2020 गेमिंग लैपटॉप (Latest 2020 gaming laptop) का अनावरण किया। एलाइनवेयर एम15 आर3 की कीमत (alienware m15 r3 price in india) 199,990 रुपये से शुरू होती है, डेल जी5 एसई (dell g5 se price in india 2020) को 74,990 रुपये में उपलब्ध कराया जा रहा है, डेल जी5 15 की कीमत (dell g5 15 price in india) 82,590 है और डेल जी3 15 की कीमत (Dell G3 15 Price in india) 73,990 से शुरू होगी।

डेल टेक्नोलॉजीज इंडिया में कंज्यूमर एंड स्मॉल बिजनेस के लिए प्रबंध निदेशक और उपाध्यक्ष राज कुमार ऋषि (Raj Kumar Rishi, Managing Director and Vice President, Consumer and Small Business at Dell Technologies India) ने कहा, अगर आप पीसी गेमिंग (Pc gaming) के मामले में नए हैं या मोबाइल से अब पीसी की ओर मूव कर रहे हैं तो डेल जी सीरीज पोर्टफोलियो शुरूआत करने के लिए बेहतरीन है।

एलाइनवेयर एम15 आर3 क्रायो-टेक थर्मल टेक्नोलॉजी द्वारा संचालित है जो न्यू वैपर कूलिंग सिस्टम के साथ आता है।

सीईएस 2020 में पहले पेश किए गए डेल जी5 15 एसई, डेल के जी सीरीज पोर्टफोलियो में नवीनतम है।

यह डेल का पहला जी सीरीज लैपटॉप (Dell’s G Series Laptop) है जिसमें एएमडी राइजेन 4000 एच-सीरीज मोबाइल प्रोसेसर (8-कोर, 16-थ्रेड तक) की सुविधा है जिसे नए एएमडी रेडॉन आरएक्स 5600एम जीपीयू के साथ डेस्कटॉप ग्रेड परफॉर्मेंस देने के लिए जोड़ा गया है।

चिप्स एएमडी स्मार्टशिफ्ट तकनीक का उपयोग जरूरत के हिसाब से परफॉर्मेंस को अनुकूलित करने के लिए समझदारीपूर्वक राइजेन प्रोसेसर और रेडॉन जीपीयू के बीच पावर को शिफ्ट करके करते हैं।

डेल जी5 15 टेंथ जेनरेशन इंटेल कोर आई7 प्रोसेसर के साथ आता है। गेमिंग सेशन के दौरान गर्मी को फैलने से रोकने के लिए इसमें बड़े कूलिंग वेंट्स और एक डुअल-फैन कूलिंग तकनीक है।

कंपनी के मुताबिक, डेल जी5 उन गेमर्स के लिए है जिन्हें खासतौर पर गेमिंग के लिए एक पीसी की तलाश है। यह 1650 टीआई ग्राफिक्स के साथ आता है ताकि परफॉर्मेंस के साथ कोई समझौता न करना पड़े।

Related topics – latest gaming laptop 2020 in India, best budget gaming laptop India 2020, best gaming laptop in India under 1 lakh, best laptop under 1 lakh, best gaming laptop under 1 5 lakh 2020, best laptop under 1 lakh 2020, best gaming laptop under 1 lakh quora, best laptop under 13 lakh, best gaming laptop under 80000, best programming laptop under 1 lakh, best laptop under 1.25 lakh.

स्वास्थ्य का मुद्दा अस्पतालों और डॉक्टरों का ही नहीं, राजनीति का मुद्दा है

Webinar on Health.... A webinar on the topic "Nationalization of Health Services in India",

कोविड 19 के सन्दर्भ में स्वास्थ्य सेवाओं के राष्ट्रीयकरण पर हुई वेबिनार

भोपाल, 19 जुलाई 2020. (राहुल भाईजी). भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की मध्यप्रदेश इकाई द्वारा “भारत में स्वास्थ्य सेवाओं के राष्ट्रीयकरण” विषय पर एक वेबिनार (A webinar on the topic “Nationalization of Health Services in India”) का आयोजन किया गया। वेबिनार का संयोजन जोशी अधिकारी इंस्टीट्यूट आफ सोशल स्टडीज द्वारा किया गया।

वेबिनार में डॉ अभय शुक्ला (पुणे) राष्ट्रीय सहसंयोजक, जन स्वास्थ्य अभियान, ने अपनी बात रखते हुए कहा कि वर्ष 1986-87 में भारत की सरकारी स्वास्थ्य सेवाएं निजी क्षेत्र की तुलना में ज्यादा थीं, और 1000 मरीज में 400 मरीज ही निजी स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ लेते थे। तब से 2020 तक स्थितियां बिल्कुल विपरीत हो गई हैं। अब बमुश्किल 40 फ़ीसदी लोग सार्वजानिक स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ उठाते हैं और शेष 60 फ़ीसदी को निजी क्षेत्र के अस्पतालों की शरण लेना पड़ती है।

डॉ. अभय शुक्ल ने कहा कि स्वास्थ्य पर खर्च के मामले में भारत दुनिया के कई मुल्कों के मुक़ाबले में सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया है।

उन्होंने कहा कि भारत में प्रति व्यक्ति स्वास्थ्य पर शासन द्वारा खर्च 19 अमेरिकी डॉलर प्रति वर्ष किया जाता है जो फिलीपींस, इंडोनेशिया और अफ्रीका जैसे देशों की तुलना में 3 से 4 गुना कम है, वहीं दूसरी ओर समाजवादी देश क्यूबा प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष 883 अमेरिकी डॉलर का खर्च अपने नागरिकों के स्वास्थ्य पर करके सबसे ऊंचे स्तर पर है। वर्ष 2019-20 में भारत में रूपये 1765 प्रति व्यक्ति स्वास्थ्य पर औसतन खर्च किया जा रहा था, यानि मात्र रूपये 3.50 प्रति व्यक्ति प्रतिदिन का खर्च। उन्होंने कहा कि सरकार ने जैसे-जैसे सरकारी स्वास्थ्य खर्चों में कटौती करने के साथ ही स्वास्थ्य सेवाओं के निजीकरण को नीतिगत बढ़ावा दिया।

उन्होंने कहा कि देश के कुछ राज्य तो सिर्फ निजी स्वास्थ्य सेवाओं के हवाले कर दिए गए हैं। जिसके चलते सामान्य स्वास्थ्य सेवाएं खुले बाजार की व्यवस्था में लूट का माध्यम बन गई हैं। स्वास्थ्य सेवाओं पर बढ़ गए लोगों के निजी खर्च का नतीजा ये हुआ है कि देश में प्रतिवर्ष लगभग 5.5 करोड़ लोग गरीबी की खाई में गिरते जा रहे हैं। वर्ष 2005 से 2015 के बीच निजी स्वास्थ्य सेवाओं का व्यापार औसतन तीन गुना बढ़ गया। देश के शीर्ष 78 डॉक्टर्स ने एक सर्वे में बताया कि मुनाफाखोरी की चाहत ने निजी संस्थाओं को गैर तार्किक और अनुचित तरीके अपनाने की छूट भी ली जिससे निजी क्षेत्र में स्वास्थ्य सेवाएं बेहद मॅहगी हुई हैं। बहुराष्ट्रीय पूंजी भी इस क्षेत्र में अपनी भागीदारी बढ़ाकर देश की जनता को लूटने तेजी से पांव पसार रही हैं। इस तरह सामान्य स्वास्थ्य सेवाएं सरकार द्वारा कारपोरेट घरानों को सौंप दी गईं और चुनी हुई लोकतान्त्रिक सरकारों ने ही देश की जनता को लुटाने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

उन्होंने कहा कि निजी स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र को दवा, उपकरण और स्वास्थ्य बीमा के माध्यम से देशवासियों को दोनों हाथों से लूटने की आजादी दे दी गई। हाल ही के कोविड महामारी के रोगियों से बड़ी निजी अस्पतालों द्वारा प्रतिदिन का रुपये 1 लाख से 4-5 लाख तक का खर्च वसूला जा रहा है। देश के लगभग सभी प्रदेशों में जिला और विकासखंड स्तर पर मौजूद अस्पताल संसाधन विहीन हैं, पर्याप्त स्टाफ, डॉक्टर्स नहीं हैं, जिससे कोरोना से मरने वालों की संख्या बढ़ रही है। सरकार को निजी क्षेत्रों के अस्पतालों में इलाज की कीमतों पर नियंत्रण के लिए सही तरीका इस्तेमाल करना चाहिए ताकि सभी को जीने के अधिकार से वंचित न किया जा सके। साथ ही सरकारी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों को सुविधा युक्त बनाने प्रति व्यक्ति का खर्च बढ़ाने चाहिए तो कोरोना महामारी से लड़ा जाना संभव होगा। ताकि उनकी रोजमर्रा की आम स्वास्थ्य से जुड़ी जरूरत पूरी हो सके। इसे मैं राष्ट्रीयकरण नहीं बल्कि सामाजिकीकरण कहना चाहूँगा।

Health and education is our constitutional right which should be readily available to every citizen of the country.

इंडियन डॉक्टर फॉर पीस एंड डेमोक्रेसी- Indian Doctor for Peace and Democracy (आइडीपीडी) के वरिष्ठ उपाध्यक्ष डॉक्टर अरुण मित्रा (लुधियाना) ने कहा कि स्वास्थ्य और शिक्षा हमारा संवैधानिक अधिकार है जिसे देश प्रत्येक देशवासी को सहजता से उपलब्ध होना चाहिए। देश की सरकार ने आवश्यक स्वास्थ्य सुविधाएं, जन स्वास्थ्य विभाग बनाने के बजाय मुनाफा कमाने वाली कंपनियों को खुली छूट दे रही हैं। सरकार को देश में विकेन्द्रित स्वास्थ्य सेवाएँ सहज रूप से उपलब्ध कराना चाहिए एवं साथ ही निजी क्षेत्र की स्वास्थ्य सेवाओं का राष्ट्रीयकरण बेहद आवश्यक हो गया है। जैसा कि बैंकों का राष्ट्रीयकरण (Nationalization of banks) किया गया था जो आज भी देश की अर्थव्यवस्था के लिए जीवनदायिनी बनकर उभरे हैं, उतना ही महत्वपूर्ण देश के नागरिकों का स्वास्थ्य है। समय की आवश्यकता है कि सभी निजी स्वास्थ्य सेवाओं का राष्ट्रीयकरण हो।

उन्होंने बताया कि किस तरह उनके संगठन द्वारा राज्य में स्वास्थ्य सेवाओं का मुआयना करते हुए पाया गया कि सरकारी नीतियों की खामी के चलते निजी अस्पतालों में एक बहुत बड़े तबके के इलाज ना कर पाने से उन्हें मौत का सामना करना पड़ता है। देश के राजनीतिक दलों द्वारा स्वास्थ्य एवं शिक्षा पर कोई ध्यान ना देने से देश की शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं चरमरा गई है।

वेबीनार को भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा आयोजित किये जाने पर उन्होंने खुशी जाहिर की और कहा कि यह बहुत अच्छी बात है कि किसी राजनीतिक दल ने स्वाथ्य सेवाओं को राजनीतिक मुद्दे की तरह देखा है। स्वास्थ्य सेवाएँ कैसी हों, यह एक राजनीतिक सवाल है और जैसी राजनीती देश पर शासन करेगी, वैसा ही हाल स्वास्थ्य सेवाओं का होगा। उन्होंने यह भी कहा कि स्वास्थ्य का सवाल केवल अस्पतालों और डॉक्टरों से जुड़ा हुआ नहीं है. इसमें बड़ी भूमिका दवा कंपनियों की भी है। आपको हैरत होगी कि उदारीकरण के दौर में सरकारी क्षेत्र की दवा निर्माण करने वाली कम्पनियाँ बंद कर दी गईं। स्वास्थ्य का सवाल बुनियादी रूप से साफ़ पानी मुहैया करने, उचित सीवेरज व्यवस्था उपलब्ध कराने और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने से जुड़ा है। हमें समाज ऐसा बनाना चाहिए जहाँ लोग ावाल तो बीमार पड़ें ही नहीं और अगर किसी वजह से कोई बीमार पड़े तो उसे ये फ़िक्र न हो कि पैसे कहाँ से आएंगे या डॉक्टर सही इलाज कर रहा है या लूट रहा है। इसके लिए हम सरकार से आइडीपीडी की ओर से राष्ट्रीय स्वास्थ्य आयोग बनाने की मांग करते आ रहे हैं।

डॉक्टर माया वालेचा गुजरात के भरूच में एक सामाजिक एवं राजनीतिक कार्यकर्ता हैं और समाज के गिरते मानवीय मूल्यों और सामाजिक संबंधों को बेहतर बनाने के लिए काम कर रही हैं।

वेबिनार में अपना वक्तव्य रखते हुए उन्होंने कहा कि आज देश की जो स्थिति है उसके पीछे एक वजह राजनीतिक दलों की राजनीतिक इच्छाशक्ति का बेहद कमजोर होना भी है। कोविड महामारी में देश की गरीब जनता, मेहनत करने वाले श्रमिक केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा उपेक्षित हुए हैं। प्रवासी मजदूरों को हजारों किलोमीटर पैदल चलना पड़ा, परंतु रास्ते में स्वास्थ्य केंद्रों के अभाव के चलते कईयों को अपनी जान गंवानी पड़ी, जिनमें महिलाओं की दुर्गति किसी से छिपी नहीं है। नीति निर्माताओं ने ऐसे हालात में निजी स्वास्थ्य सेवाओं की कोई जवाबदारी तय नहीं की। देश की बहुमत आबादी को सरकार द्वारा प्रदत्त स्वास्थ्य सेवाओं का कोई लाभ नहीं मिल पा रहा है। कोरोना से बचाव कराने वाले स्वास्थ्य कर्मी, स्वयं की सुरक्षा सामग्री के अभाव में काम करने को मजबूर किए गए। सफाईकर्मियों को जान जोखिम में डालकर काम करने को मजबूर किया गया, स्वास्थ्य कर्मियों को समय पर उनकी तनख्वाह नहीं मिल पाई जिसके चलते कोरोना मरीज उपेक्षा का शिकार होते रहे, परंतु सरकार उनकी समस्याओं की अनदेखी करती रही है।

वे कहती हैं कि देश में स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति भयावह है। जिसे एक चेतनशील राजनीति समाधान से बेहतर किया जा सकता है।

उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कोविड-19 को अपने व्यापारिक उद्देश्य के लिए इस्तेमाल करने में बिल गेट्स और मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन, जो दुनिया में वैक्सीन के क्षेत्र में काम करने वाला सबसे बड़ा कॉर्पोरेट है, कोविड की वैक्सीन बनाकर मुनाफे की होड़ में हैं। स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का राष्ट्रीयकरण किये बिना, या जिसे सामाजिकीकरण भी कहा जा सकता है, इन सेवाओं को उन्नत नहीं किया जा सकता लेकिन साथ ही राजनीतिक हल की भी बेहद आवश्यकता है।

कार्यक्रम के संयोजक विनीत तिवारी ने कहा कि बेशक स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे सवाल राजनीतिक सवाल हैं इसीलिए हम देख सकते हैं कि जहाँ भी सरकारें जनता के लिए फिक्रमंद हैं, वहाँ कोविड 19 का कहर कम टूटा है। क्यूबा और वेनेज़ुएला जैसे देशों की स्वास्थ्य सुविधाएँ दुनिया में श्रेष्ठ मानी जाती हैं।

उन्होंने यह भी कहा कि बिल गेट्स और मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन जब अपने बनाये वैक्सीन का प्रयोग करेगी तब भी गरीब एशियाई और अफ़्रीकी देशों की जनता को ही उनके कहर का शिकार होना पड़ेगा।

उन्होंने यह भी कहा कि भारत और अमेरिका में एक स्वास्थ्य सम्बन्धी आपदा का इस्तेमाल अपनी राजनीतिक स्थित्ति को मजबूत करने और आपदा का डर दिखाकर लोगों से विरोध और प्रतिरोध के सभी तरीकों को छीनने में किया जा रहा है।

वरवर राव के सन्दर्भ से उन्होंने कोविड-19 की आड़ में सरकार द्वारा किये जा रहे राजनीतिक दमन को रेखांकित किया और कहा कि राजनीतिक दलों को अनेक मोर्चों पर लड़ना होगा।

सभी वक्ताओं का आभार मानते हुए कहा कि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी शिक्षा एवं स्वास्थ्य के सवालों पर सही मायनों में एक ऐसा राजनीतिक दल है जो शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं के निजीकरण के खिलाफ शुरू से ही रहा है और अपना विरोध दर्ज कराया है। यही वजह है कि आज इस वेबिनार का आयोजन किया गया।

मप्र इकाई के पार्टी राज्य सचिव कामरेड अरविंद श्रीवास्तव ने स्वास्थ्य सेवाओं का संज्ञान लेते हुए वक्ताओं के प्रभावशाली वक्तव्य और प्रस्तुति के लिए धन्यवाद दिया और कहा कि स्वास्थ्य सेवाओं के राष्ट्रीयकरण के मसले पर प्रदेश के अन्य संगठनों से बात करने के बाद आंदोलनात्मक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे और स्वास्थ्यकर्मियों को संगठित करके प्रदेश ही नही बल्कि देश की जनता के सामने इस लड़ाई को मजबूत करने का आव्हान किया जाएगा।

वेबिनार हिंदी में था अतः मध्य प्रदेश के साथ ही दिल्ली, गुजरात, बंगाल, पंजाब एवं अन्य हिंदीभाषी राज्यों के उत्सुक और रुचिवान लोग शरीक हुए और सवाल जवाब का दौर भी हुआ।

यहां क्लिक करके हमारा यूट्यूब चैनल सब्सक्राइब करें

गलत है उत्सर्जन मानकों के अनुपालन के लिए मोहलत माँगना : विशेषज्ञ

Environment and climate change

Extension for emission compliance unjustified : Experts

नई दिल्ली, जुलाई 17, 2020: उत्सर्जन मानकों के कार्यान्वयन के लिए मोहलत मांगने पर ऊर्जा क्षेत्र के विशेषज्ञों ने आज, एक वेबिनर के दौरान, एसोसिएशन ऑफ पावर प्रोड्यूसर्स Association of Power Producers (APP) की कठोर आलोचना की है।

कोयला बिजली संयंत्रों के लिए उत्सर्जन मानकों के अनुपालन पर आयोजित इस वेबिनार का आयोजन क्लाइमेट ट्रेंड्स और सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (CREA) (Climate Trends and Center for Research on Energy and Clean Air) द्वारा किया गया था।

CREA के अनुसार, मौजूदा चरणबद्ध योजना के तहत जितनी क्षमता के लिए बिजली उत्पादन संयंत्रों को उत्सर्जन मानकों का पालन करना है, उनमें से कुल एक प्रतिशत के लिए ही फ्ल्यू-गैस डिसल्फ्रिफिकेशन (एफजीडी) का सामर्थ्य स्थापित किया गया है। साथ ही, एफजीडी कार्यान्वयन के लिए 169.7 गिगा वाट की कुल कोयला बिजली क्षमता  में से मात्र 27 प्रतिशत क्षमता के लिए ही ठेके दिए गए हैं।

इस तथ्य के सापेक्ष, बिजली उत्पादकों का यह कहना कि चीन से आयात पर बंदी उनके लिए एफजीडी लक्ष्य पूरे करने में मुश्किल पैदा करेगी, सरासर गलत है। अभी तो एफडीजी कार्यान्वयन के लिए अधिकांश ठेके दिए ही नहीं गए हैं। और भारत के पास बिना चीन पर आयात के लिए निर्भर हुए एफडीजी का कार्यान्वयन संभव है।

इस पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए CREA के विश्लेषक सुनील दहिया कहते हैं,

“यह न सिर्फ़ एक अनुचित तर्क है, यह हास्यास्पद भी है।”

सुनील आगे कहते हैं,

“जब अधिकांश क्षमता के लिए बोलियाँ ही नहीं लगीं हैं, तो देरी के लिए चीन से आयात को आधार बनाने का सवाल ही नहीं उठता।”

ज्ञात हो कि 122857 मेगावाट (72%) क्षमता के लिए अभी तक ठेके प्रदान नहीं किये गए हैं।

आगे, एसोसिएशन ऑफ पावर प्रोड्यूसर्स (APP) द्वारा उत्सर्जन मानक अनुपालन समय सीमा पर एक और विस्तार की मांग के जवाब में, सुनील कहते हैं,

“बी.एच.ई.एल जैसी कंपनियों के पास तकनीक है और वे हमारी जरूरतों के लिए उन्हें अनुकूलित कर सकते हैं। और वैसे भी चीन अकेला आपूर्तिकर्ता नहीं है। बल्कि आत्मनिर्भर भारत की पहल के अंतर्गत तो स्थानीय उत्पादन को ही ज़ोर देना है। असल में यहाँ मुद्दा धन का अभाव या तकनीक की आपूर्ति के लिए आयात न कर पाना नहीं, असल मुद्दा तो इच्छाशक्ति की कमी है।”

Role of coal power plant in air pollution

चर्चा को आगे ले जाते हुए वायु प्रदूषण में कोयला बिजली संयंत्र की भूमिका और राष्ट्रीय राजधानी में हवा की हवा में सल्फेट की मात्रा पर टिप्पणी करते हुए, NCAP संचालन समिति के सदस्य और IIT कानपुर में सिविल इंजीनियरिंग के विभागाध्यक्ष, प्रोफेसर एसएन त्रिपाठी कहते हैं,

” हमारे शोध के अंतर्गत हमने लॉकडाउन के पहले और दौरान दिल्ली की हवा का विश्लेष्ण किया था। हमने शोध के लिए सल्फर, लेड, सेलेनियम, और आर्सेनिक जैसे तत्वों का चयन इसलिए किया क्योंकि इनकी मदद से सही अंदाज़ मिलता है यह जानने में कि PM 2.5 में बिजली संयंत्रों का कितना योगदान है। दिल्ली की हवा में कुल PM2.5 में बिजली संयंत्रों का योगदान 8 प्रतिशत की सीमा में रहा। इसमें एक महत्वपूर्ण गिरावट दर्ज की गयी लेकिन लॉकडाउन के अंत तक ये वापस अपने स्तरों के करीब आ गया।”

कोयला प्रदूषण संयंत्र संचालकों द्वारा 2020 की समयसीमा का पालन नहीं करे जाने के बाद केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने उन पर भारी जुर्माना लगाने को कहा है। लेकिन जिस हिसाब से ये संयंत्र बिजली उत्पादित करते हैं, उसके मुकाबले यह जुर्माना न के बराबर है। ऊर्जा लागत का 0.12 प्रतिशत से – 3.28 प्रतिशत का जुर्माना नगण्य है। इस तथ्य पर मज़बूती से अपनी प्रतिक्रिया देते हुए काउंसिल एट एनर्जी एनवायरनमेंट एंड वाटर (सीईईडब्ल्यू) के फेलो, कार्थिक गणेसन कहते हैं, “अनुपालन न करने के लिए कोई ख़ास जुर्माना नहीं लगाया जा रहा है। बस नाम मात्र का जुर्माना है। जब तक केंद्र से स्पष्ट नीति निर्देश नहीं आता, तब तक बिजली उत्पादकों को गंभीरता से अनुपालन कराना मुश्किल है।”

जारी किए गए नए निविदाओं के आधार पर CEEW के संशोधित अनुमानों के अनुसार, FGD की लागत, बिजली संयंत्र में रेट्रोफिट होने की सम्भावना के आधार पर 40 से 80 लाख / MW के बीच होती है। इस रेट्रोफिटिंग के चलते, बिजली की दरों में 0.34 रूपये प्रति kWh से 1.36  रूपये प्रति kWh के बीच होती है।

यदि केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण के राष्ट्रीय बिजली योजना 2018 के अंतर्गत पहचाने गए सभी बिजली संयंत्रों को प्रदूषण नियंत्रण के लिए रेट्रोफिट किया जाए तो लागत आयेगी 94,267 करोड़ रूपये। और यदि इनमें से सिर्फ़ उन संयंत्रो को शामिल किया जाये जो अच्छी अवस्था में क्रियाशील हैं, तो इसकी लागत 80,587 करोड़ रुपये होगी।

कार्यान्वयन की देरी के कारण 2018 की लागत अनुमानों की तुलना में सीईईडब्ल्यू के संशोधित लागत अनुमान 10 प्रतिशत से बढ़ गए हैं। इस पर कार्तिक कहते हैं, “हम जितनी अधिक देरी करेंगे, उतना ही अधिक खर्च होगा।”

एफ़जीडी को स्थापित करने की आवश्यकता को स्वीकार करते हुए, दूसान पावर सिस्टम्स से प्रभात वर्मा ने कहा,

“स्वच्छ प्रौद्योगिकी की आवश्यकता है, लेकिन उच्च उपयोग वाले संयंत्रों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।”

कम मांग के बीच निजी खनन के लिए कोयला ब्लॉकों की नीलामी के लिए केंद्र सरकार की हालिया घोषणा और भविष्य की आवश्यकताओं का आकलन करते हुए अधिक कोयला खदानों को आवंटित करने की आवश्यकता पर सवाल उठाया गया, जबकि देश मौजूदा लोगों की वजह से होने वाली गंदगी को साफ करने के लिए संघर्ष कर रहा है।

सामाजिक नियंत्रण के साथ प्रदूषण नियंत्रण तकनीक की लागत के बीच एक तुलनात्मक विश्लेषण, जैसा कि सीईईडब्ल्यू अर्बन एमिशन्स द्वारा एक अध्ययन में किया गया है, ने गणना की कि एफजीडी स्थापना की पूंजी लागत क्षमता के आधार पर 30-72 पैसे / केडब्ल्यूएच तक पहुंच जाती है, जिस पर संयंत्र परिचालन कर रहा है, संयंत्र लोड कारक और पौधे का जीवन। यदि कोयला संयंत्र मानकों पर खरे उतरते हैं तो स्वास्थ्य और सामाजिक लागत 8.58 रुपये / केडब्ल्यूएच से घटकर 0.73 पैसे / किलोवाट हो जाती है।

बिजली निर्माता कार्यान्वयन में देरी के लिए कानूनी फीस में लाखों खर्च कर रहे हैं।

पर्यावरण के वकील रितविक दत्ता का तर्क है कि यह एक MoEFCC आदेश का आपराधिक उल्लंघन है और इरादे की स्पष्ट कमी है।

“2022 के लक्ष्यों में देरी के लिए कोविड और 2020 को सिर्फ़ बहाने के रूप में लिया जाएगा। एनटीपीसी ने 4 दिन पहले सुप्रीम कोर्ट से तिरपाल के साथ कोयला ले जाने वाले ट्रकों को कवर करने के एनजीटी के आदेश को चुनौती दी थी। यदि तिरपाल जैसे एक साधारण से प्रदूषण नियंत्रण उपदान के प्रयोग पर आपत्ति हो सकती है तो इरादों की कमी साफ़ स्पष्ट है।”

मानव जनित जलवायु परिवर्तन से ठंडे साइबेरिया में बढ़ रही गर्मी

Environment and climate change

साइबेरिया में बढ़ती गर्मी की वजह मानव जनित जलवायु परिवर्तन ही है : वैज्ञानिक | Prolonged Siberian heat almost impossible without climate change – attribution study

दुनिया के कुछ सबसे बेहतरीन क्लाइमेट वैज्ञानिकों की एक टीम द्वारा किये गए एक ताज़ा एट्रिब्यूशन (विश्लेषण) के अनुसार, , साइबेरिया में बीती जनवरी से जून 2020 के बीच पड़ने वाली जबर्दस्त गर्मी की वजह जलवायु परिवर्तन है और इस जलवायु परिवर्तन के लिए इंसानी गतिविधियाँ ज़िम्मेदार हैं।

पी.पी. शिर्शोव इंस्टिट्यूट ऑफ़ ओसियनोलॉजी (समुद्र विज्ञान), और रूसी विज्ञान अकादमी सहित अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालयों और मौसम विज्ञान सेवाओं के शोधकर्ताओं ने यह भी पाया अगर मानवों ने ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन कर जलवायु को प्रभावित नहीं किया होता तो वहां का औसत तापमान 2°C से न बढ़ा होता।

350 से अधिक अध्ययन, रैपिड और साथ ही सहकर्मी की समीक्षा, ने जांच की है कि क्या जलवायु परिवर्तन ने विशेष रूप से मौसम की घटनाओं को अधिक संभावित बना दिया है। वर्ल्ड वेदर एट्रीब्यूशन ग्रुप के पिछले अध्ययनों में पाया गया कि जलवायु परिवर्तन ने इस साल की ऑस्ट्रेलियाई आग और पिछले जून में फ्रांस में रिकॉर्ड तोड़ हीटवेट की संभावना को और अधिक बढ़ा दिया। यह भी पाया गया कि ट्रॉपिकल स्टॉर्म इमेल्डा में सितंबर में टेक्सास में हुई बारिश को जलवायु परिवर्तन से अधिक संभावित और तीव्र बना दिया गया था।

वर्ष की शुरुआत से साइबेरिया में तापमान औसत से ऊपर रहा है। आर्कटिक के लिए 38° C का एक नया रिकॉर्ड तापमान 20 जून को रूसी शहर वेरखोयान्स्क में दर्ज किया गया था, जबकि साइबेरिया का कुल तापमान जनवरी से जून तक औसत से 5°C अधिक था।

इन उच्च तापमानों पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को मापने के लिए, वैज्ञानिकों ने कंप्यूटर सिमुलेशन चलाए, जिसमें आज के जलवायु के मिजाज़ जिसमे लगभग 1 °C ग्लोबल वार्मिंग शामिल है, की तुलना मानन प्रभाव के बिना जैसे जलवायु होता उसके साथ करने के लिए, अतीत की तरह ही रैपिड और पीयर रिव्यूड स्टडीज़ के तरीकों का उपयोग करके।

इस अध्ययन के लेखक हैं

  • यूके मेट ऑफिस: एंड्रयू सियावरेला, डैनियल कॉटरिल, पीटर स्टॉट
  • केएनएमआई (KNMI): सारा केव, सोजूकी फिलिप, गीर्ट जान वैन ओल्डेनबोर्ग
  • डीडब्लूडी (DWD): अमालि स्केलेवग, फिलिप लोरेंज
  • मेटेओ फ्रांस: योआन रॉबिन
  • पर्यावरण परिवर्तन संस्थान, ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय: फ्रेडेरिक ओटो
  • ईटीएच(ETH) ज्यूरिख: माथियास हाउसर, सोनिया आई सेनिविरत्ने, फ्लावियो लेहनेर
  • शिर्शोव इंस्टिट्यूट ऑफ़ ओसियनोलॉजी: ओल्गा ज़ोलिना

उनके विश्लेषण से पता चला है कि जैसी लंबी गर्मी साइबेरिया में इस साल जनवरी से जून तक अनुभव की गई थी, वैसी गर्मी बिना मानव-प्रेरित जलवायु परिवर्तन के 80,000 वर्षों में केवल एक बार से भी कम होगी – मतलब ऐसी स्थिति बिना मानव जनित जलवायु परिवर्तन में लगभग असंभव है। बिना ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन से पैदा हुई गर्मी के ऐसा नहीं हो सकता था। जलवायु परिवर्तन ने लंबे समय तक गर्मी की संभावना को कम से कम 600 के कारक से बढ़ा दिया। यह अब तक किए गए किसी भी एट्रिब्यूशन अध्ययन के सबसे मजबूत परिणामों में से है।

वैज्ञानिकों ने कहा कि वर्तमान जलवायु में भी लंबे समय तक ऐसी गर्मी की संभावना बहुत कम थी। ऐसी चरम स्थितियों की संभावना हर 130 साल में एक बार से भी कम होती है। लेकिन ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में तेजी से कटौती के बिना सदी के अंत तक उनके ज़्यादा फ्रिक्वेंसी से होने का जोखिम हैं।

साइबेरिया में गर्मी ने व्यापक आग भड़का दी है, जून के अंत में 1.15 मिलियन हेक्टेयर भूक्षेत्र जल चुके थे। यह लगभग 56 मिलियन टन कार्बन डाइऑक्साइड की रिहाई के साथ जुड़ा हुआ है – स्विट्जरलैंड और नॉर्वे जैसे कुछ औद्योगिक देशों के वार्षिक उत्सर्जन से अधिक। इसने पारमाफ्रॉस्ट के पिघलने को भी तेज कर दिया – मई में जमी हुई मिट्टी पर बना एक तेल टैंक ढह गया, जिससे इस क्षेत्र में अब तक के सबसे खराब तेल रिसाव में से एक हुआ। ग्रीनहाउस गैसें आग और पिघलाव के द्वारा रिहा होती है – साथ ही साथ बर्फ और बर्फ के नुकसान से ग्रह की परावर्तन में कमी – ग्रह को और अधिक गर्मी देगा। साथ ही बर्फ के नुकसान से ग्रह और गर्म होगा और ग्रह की परावर्तन क्षमता में भी कमी आती है। गर्मी को रेशम कीटों के प्रकोप से भी जोड़ा गया है, जिनके लार्वा शंकुधारी पेड़ खाते हैं।

प्रोफेसर ओल्गा ज़ोलिना, पी.पी. शिर्शोव इंस्टिट्यूट ऑफ़ ओसियनोलॉजी (समुद्र विज्ञान), आरएएस (RAS), मॉस्को, और सीएनआरएस (CNRS) इंस्टीट्यूट डेस जिओसाइंसेज डे ल’एनवीरोमेंट, ग्रेनोबल (Institut des Géosciences de l’Environnement, Grenoble), प्रमुख लेखक आईपीसीसी एआर 6 (IPCC AR6) के मुताबिक

“इस अध्ययन से न केवल यह पता चलता है कि तापमान की परिमाण मात्रा अत्यंत दुर्लभ है, वह मौसम के पैटर्न भी दुर्लभ हैं जो इसका कारण बने। हम यह अध्ययन करना जारी रख रहे हैं कि हजारों हेक्टेयर में फैले जंगल कैसे आग की लपटों को प्रभावित कर सकते हैं क्योंकि आग की लपटें धुएं और वायुमंडल में राख भर देती हैं।”

शोध के प्रमुख लेखक और मेट ऑफिस में सीनियर डिटेक्शन एंड एट्रिब्यूशन साइंटिस्ट, एंड्रयू सियावरेला के मुताबिक

“इस रैपिड रिसर्च के निष्कर्ष – के जलवायु परिवर्तन ने साइबेरिया में प्रोलोंगड (लंबे समय तक) गर्मी की संभावना को कम से कम 600 गुना बढ़ा दिया – वास्तव में चौंका देने वाला है। यह शोध चरम तापमान का और सबूत है जिसे हम दुनिया भर में एक गर्म वैश्विक जलवायु में अधिक बार देखने की उम्मीद कर सकते हैं। महत्वपूर्ण रूप से, इन अत्यधिक गर्मी की घटनाओं की बढ़ती आवृत्ति को ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करके नियंत्रित किया जा सकता है।”

How much of a game changer climate change is with respect to heatwaves.

ऑक्सफोर्ड के पर्यावरण परिवर्तन संस्थान के कार्यवाहक निदेशक, और विश्व मौसम विशेषता पहल की सह-लीड डॉ फ्रेडेरिक ओटो के मुताबिक

“यह अध्ययन फिर से दिखाता है कि हीटवेव के संबंध में जलवायु परिवर्तन का कितना बड़ा गेम चेंजर हिस्सा है। यह देखते हुए कि दुनिया के अधिकांश हिस्सों में हीटवेव अब तक के सबसे घातक चरम मौसम की घटनाएँ हैं, उन्हें बहुत गंभीरता से लिया जाना चाहिए। चूंकि उत्सर्जन में वृद्धि जारी है, हमें दुनिया भर में अत्यधिक गर्मी का सामना करने में लचीलापन बनाने के बारे में सोचने की जरूरत है, आर्कटिक समुदायों में भी – जो थोड़े ही समय पहले निरर्थक लगता।”

ईटीएच (ETH) ज्यूरिख (डी-यूएसवाईएस D-USYS) में पर्यावरण प्रणाली विज्ञान विभाग, और कई आईपीसीसी (IPCC) रिपोर्टों की प्रमुख लेखक प्रोफेसर सोनिया सेनिविरत्ने के मुताबिक

“इन परिणामों से पता चलता है कि हम चरम घटनाओं का अनुभव करना शुरू कर रहे हैं जिनके जलवायु प्रणाली पर मानव पदचिह्न के बिना होने का लगभग कोई भी मौका नहीं होता। हमारे पास ग्लोबल वार्मिंग को उन स्तरों पर स्थिर करने जो के लिए बहुत कम समय बचा है जो के जलवायु परिवर्तन पेरिस समझौते की सीमा में हो। ग्लोबल वार्मिंग के 1.5 डिग्री सेल्सियस पर स्थिरीकरण के लिए, जो अभी भी इस तरह के चरम गर्मी की घटनाओं के अधिक जोखिम का कारण होगा, हमें 2030 तक अपने CO2 उत्सर्जन को कम से कम आधा करने की आवश्यकता है। “