अवध विश्‍वविद्यालय के कुलपति ने अयोध्‍या फ‍िल्‍म फेस्टिवल के पोस्‍टर का किया विमोचन

अवाम का सिनेमा – आयोजन की पहली कड़ी ने दी सिनेमा के सरोकार को दिया कैनवास

– आयोजन की तैयारियों ने पकड़ी गति, फिल्मों के प्रदर्शन के लिए चयन शुरू

अयोध्‍या, 12 दिसंबर 2019. डा. राम मनोहर लोहिया अवध विश्‍व विद्यालय के कुलपति आचार्य मनोज दीक्षित (Acharya Manoj Dixit, Vice Chancellor of Dr. Ram Manohar Lohia Awadh University) ने बुधवार की दोपहर 13वां अयोध्‍या फ‍िल्‍म फेस्टिवल (13th Ayodhya Film Festival) के आधिकारिक पोस्‍टर का विमोचन किया।

कुलपति आचार्य मनोज दीक्षित ने इस दौरान कहा कि विश्‍वविद्यालय में अयोध्‍या की पहचान (Identity of Ayodhya) को और सशक्‍त करने वाला आयोजन निश्चित तौर पर विवि के लिए उपलब्धि वाला साबित होगा। इस आयोजन के जरिए देश विदेश में न सिर्फ अयोध्‍या बल्कि अवध विवि की भी पहचान और मजबूत होगी।

विश्‍वविद्यालय में आयोजित होने वाले तीन दिवसीय अयोध्‍या फ‍िल्‍म फेस्टिवल के पोस्‍टर के विमोचन के दौरान विभिन्‍न विभागों के शिक्षक और कर्मचारियों के अलावा अवाम का सिनेमा के सदस्‍य भी मौजूद रहे।

आयोजक मंडल ने बताया कि पोस्‍टर रिलीज होने के साथ ही समारोह की तैयारियां अब शुरू हो गई हैं। आयोजन में देश विदेश से आने वाले सिनेमा और साहित्‍य जगत की हस्तियों के साथ ही फ‍िल्‍मों का मेला भी अब सजने लगा है। इसके लिए फिल्मों को चयनित करने का काम शुरू हो गया है।

कुछ इस तरह शुरू हुआ सिलसिला Awam ka cinema

आयोजक शाह आलम बताते हैं कि अवाम का सिनेमा के 13 साल कुछ कम नहीं होते, इसके सफरनामे की शुरुआत 28 जनवरी 2006 को अयोध्या से हुई थी। तब डॉ. आरबी राम ने तीन सौ रुपये का आर्थिक सहयोग देकर क्रांतिवीरों की यादों को सहेजने की इस पहल का स्वागत किया था। आजादी आंदोलन के योद्धा और कानपुर बम एक्शन के नायक अनंत श्रीवास्तव के सुझाव पर बना इसका संविधान तो प्रसिद्ध और सरोकारी डिजाइनर अरमान अमरोही ने इसका लोगो बनाया। तेरह वर्षों में देश-दुनिया की बहुत सारी शख्सियतें इसकी गवाह बनीं, फिर भी वह दौर आसान नहीं था। बावजूद इसके अयोध्या से लेकर चाहे चंबल का बीहड़ हो, राजस्थान का थार मरुस्थल या फिर सुदूर कारगिल, अवाम का सिनेमा पुरजोर तरीके से अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए राजनीति, समाज सबकी सच्चाइयों को सरोकारी सिनेमा के जरिये समाने लाने की कोशिश में लगातार लगा हुआ है।

आयोजन इस तरह हुआ सफल

13 वर्षों के सफर में देश भर में हुए सफल आयोजनों में देश सहित दुनियां के कई हिस्सों से सरोकारी हस्तियां अपने खर्चे से शामिल होकर हौसला बढ़ाती रही हैं। इसके इलावा क्रांतिकारियों से संबंधित दस्तावेज, फिल्म, डायरी, पत्र, तस्वीरें, तार, मुकदमे की फाइल आदि तमाम सामग्री लोगों से तोहफे में मिली है। गांव, कस्बों से लेकर, महाविद्यालयों, विश्वविद्यालयों सहित अन्य शैक्षणिक संस्थानों ने जहां निशुल्क कार्यक्रम स्थल दिया है। विभिन्न सामाजिक संगठनों ने जमीनी स्तर पर जनसहभागिता बढ़ाकर हौसला बढ़ाया है, तो वहीं जन माध्यमो ने इसे नई पहचान दी है। आयोजन से जुड़े साथियों ने फेसबुक, ट्विटर, पत्र, ईमेल, नुक्कड़ मीटिंग, चर्चा करके आयोजन की सूचना समाज से साझा करते रहे हैं तो वहीं कई ने क्रांतिकारियों पर लगातार लिखकर जागरूकता बढ़ाई है। साथ ही वीडियो, फोटो, दस्तावेजीकरण और प्रकाशन में आर्थिक और श्रम सहयोग देकर इस विरासत को आगे बढ़ाया है। यही आयोजन की सबसे बड़ी सफलता है।

आयोजन के प्रतीक का इतिहास

अयोध्‍या फ‍िल्‍म फेस्टिवल में इस बार प्रतीक के तौर पर यहां के प्राचीन सिक्‍के का प्रयोग किया गया है जो पुरातन अवध के ही हिस्‍से में प्राप्‍त हुआ था। माना जाता है कि प्राचीन काल में जनपद गणतंत्र और राज्य भी होते थे, जो वैदिक काल के दौरान कांस्य और लौह अयस्क से काफी समृद्ध भी थे। भारत और विश्व के इतिहास में पहली बार सिक्कों का चलन यहीं शुरू किया। ये जनपद 1200 ईसा पूर्व और 6वीं शताब्दी ईसा पूर्व के बीच अस्तित्व में रहे और भारतीय उपमहाद्वीप में फैले। इनमें कुल 56 राज्य और 16 महानजपदों में शामिल माने जाते हैं।

शायद भारत के सबसे पुराने ज्ञात सिक्कों में से कुछ यह सिक्‍के पहली बार आधुनिक उत्तर प्रदेश के नरहन शहर में पाए गए थे। शाक्य जनपद (जिसे वज्जि या लिच्छवी जनपद भी पूर्व में कहा जाता था) आधुनिक शहर गोरखपुर के उत्तर में भारत-नेपाल सीमा पर स्थित था। इसकी राजधानी कपिलवस्तु मानी जाती है। जहां से भगवान बुद्ध की जन्मस्थली लुम्बिनी, कपिलवस्तु से दस मील पूर्व में स्थित मानी गई है। राजगोर के अनुसार, बुद्ध के पिता शुद्धोधन शाक्यों के निर्वाचित अध्यक्ष थे। माना जाता है कि इनमें से कुछ सिक्के बुद्ध के जीवन काल के दौरान अच्छे से ढाले गए होंगे। भगवान बुद्ध को ‘शाक्यमुनि’ अर्थात शाक्यों का ऋषि भी कहा जाता था। राजगोर के अनुसार, शाक्य कालीन मुद्रा 100 रत्ती के बराबर तक होता था, जिसे शतमान कहा जाता था। शतमान आठ षण में विभाजित था, जबकि अयोध्या फिल्म फेस्टिवल के लोगो में दर्शाए गए सिक्के में पांच षण शामिल हैं।

क्योंकि माँ बनने का अहसास होता है खास

Dr. Nupur Gupta Consultant Obstruction and Gynecologist Director Well Women's Clinic, Gurugram

क्योंकि माँ बनने का अहसास होता है खास

Because Motherhood is special’ By Dr Nupur Gupta

माँ बनना इस दुनिया का सबसे खूबसूरत अहसास होता है। इस अहसास को सेलिबे्रट करने का मौका देता है मदर्स-डे। मगर जो महिलाएं किसी परेशानी की वजह से मां नहीं बन पाती हैं, उनके लिए भी उम्मीदें बाकी हैं, वो भी मदर्स-डे पर मातृत्व को महसूस कर सकती है। इसमें अत्याधुनिक तकनीकों जैसे आईवीएफ काफी कारगर साबित हो रही है। आईवीएफ के जरिये कई महिलाओं को मां बनने का सुख (The joy of women becoming mothers through IVF) मिला है और उन्होंने भी मनाया है अपनी जिंदगी का पहला मदर्स-डे।

एक मां को अपने मातृत्व का आनंद लेने का, वहीं बच्चों को मौका मिलता है इस खास दिन अपनी मां को खास महसूस कराने का। मां और बच्चे दोनों के लिए ही मदर्स-डे एक बेहद खास दिन होता है। दोनों एक-दूसरे से जुड़े ही इस तरह होते हैं कि उनकी खुशियां भी दोनों के साथ से जुड़ जाती है। मगर मातृत्व का जश्न मनाने वाला ये दिन उन मांओं के लिए बेहद तकलीफदेह साबित होता है, जो किसी कारण से मां नहीं बन पाई है। आखिर मां बनना किसी भी महिला के जीवन का सबसे खूबसूरत पल होता है। इस पल का वो बेसब्री से इंतजार करती है। मगर कुछ कारणों से कुछ महिलाएं सही समय पर मां नहीं बन पाती है। कई कोशिशों के बावजूद भी जब गर्भधारण में सफलता नहीं मिलती है, तो यह स्थिति निराशा और अवसाद का भी कारण बन जाती है। इस दौरान अक्सर महिलाओं की उम्र भी 40 तक पहुंच जाती है। माना जाता है कि इस उम्र के बाद गर्भधारण में समस्या (Problem in pregnancy) होती है। ऐसे में हमेशा के लिए संतानहीनता का सामना भी करना पड़ सकता है।

निस्संतानता के कारण : reasons of childlessness

जानकार बताते हैं कि शादी की बढ़ती उम्र, भाग-दौड़ व तनाव के चलते इन दिनों संतानहीनता की समस्या बढ़ती जा रही है, ऐसे में दंपत्ति नि:संतान रह जाते हैं। इस बात को वे परिवार व समाज के सामने जाहिर करने से भी बचते हैं। आंकड़ों के मुताबिक भारत में हर वर्ष जितनी शादियां होती है, उनमें से 10 से 15 प्रतिशत महिलाएं संतानहीनता से ग्रस्त होती हैं। ऐसे में क्या किया जाए? इस सवाल का जवाब है किसी अच्छे फर्टिलिटी केन्द्र का चुनाव कर चिकित्सकीय मार्गदर्शन में इलाज प्रक्रिया सुनिश्चित करनी चाहिए।

आईवीएफ किनके लिए है उपयोगी ? For whom is IVF useful?

१. बंद ट्यूब व ट्यूब में संक्रमण

किसी भी ट्यूब ब्लॉक का मुख्य कारण है यूट्रस में इन्फेक्शन (Infection in utrus), यह इन्फेक्शन शारीरिक संबंध या यूरिन में इन्फेक्शन (Urine infection) के कारण हो सकता है। ऑपरेशन या ओवरी सिस्ट के कारण भी यह हो सकता है। यूटरस में टी.बी. होने से भी ट्यूबल ब्लॉक (tubal blockage) हो जाता है और फैलोपियन ट्यूब में एक्टोपिक प्रेग्नेंसी होने से भी दिक्कतें और बढ़ सकती है।

Causes of blocked fallopian tubes

फैलोपियन ट्यूब के बंद होने के कई कारण होते हैं – जैसे संक्रमण, टी.बी., बार-बार गर्भपात होना, गर्भधारण को रोकने के विकल्प, ऑपरेशन इत्यादि या माहवारी बंद होने की स्थिति में।

महिलाओं में अण्डों की मात्रा सीमित होती है जो हर महीने कम होती रहती है। 35 वर्ष की उम्र के बाद अण्डों की गुणवत्ता व संख्या में तेजी से गिरावट होती है और जब किसी महिला में अण्डे खत्म हो जाते हैं तब उनकामासिक धर्म बंद हो जाता है। ऐसी महिलाओं का गर्भाशय भी सिकुड़ जाता है। इन महिलाओं को हार्मोन की दवा देकर माहवारी शुरू की जाती है, जिससे गर्भाशय की आकृति पुन: सामान्य हो जाती है तथा आई.वी.एफ. प्रक्रिया केजरिये बाहरी (डोनर) अण्डे की सहायता से पति के शुक्राणु का इस्तमाल कर भ्रूण बना लिया जाता है। इस भ्रूण को भ्रूण प्रत्यारोपण के माध्यम से गर्भाशय के अंदर प्रत्यारोपित कर दिया जाता है।

शुक्राणुओं की कमी Sperm deficiency

शुक्राणुओं में कमी का मतलब है पुरुषों के वीर्य में सामान्य से कम शुक्राणुओं का होना। शुक्राणुओं में कमी होने को ओलिगोस्पर्मिया (Oligospermia in Hindi, अल्पशुक्राणुता) भी कहा जाता है। वीर्य में शुक्राणुओं का पूरी तरह से खत्म होना एजुस्पर्मिया (Azoospermia in Hindi, अशुक्राणुता, शुक्राणुहीनता) कहलाता है। पुरुष के शुक्राणुओं में कमी के कारण महिला के गर्भधारण करने की संभावना बहुत कम हो जाती है। ऐसी स्थिति में भी आईवीएफ तकनीक कारगर है।

कुछ मामलों में देखा गया है कि आईवीएफ तकनीक भी बार-बार असफल होती है। दरअसल कुछ महिलाओं को आईवीएफ के दौरान भी गर्भपात का सामना करना पड़ता है या सफल प्रत्यारोपण के बावजूद भी आईवीएफ फेल हो जाता है, ऐसे मामलों में निराश होने की जरूरत नहीं है, कई बार दूसरे से तीसरे प्रयास में सफलता संभव हो सकती है।

पीसीओडी की समस्या PCOD problem

कई बार गर्भधारण ना कर पाने की वजह पीसीओडी की समस्या के रूप में भी सामने आती है। चिकित्सकीय भाषा में महिलाओं की इस समस्या को पॉलीसिस्टिक ओवरी डिजीज (Polycystic ovary disease) के रूप में जाना जाता है। इससे महिलाओं की ओवरी और प्रजनन क्षमता पर असर तो पड़ता ही है साथ ही, आगे चल कर उच्च रक्तचाप, डायबिटीज और हृदय से जुड़े रोगों के होने का खतरा भी बढ़ जाता है।

पीसीओडी होने पर महिलाओं की पूरी शारीरिक प्रक्रिया ही गड़बड़ा जाती है। महिलाओं के अंडाशय में तरल पदार्थ से भरी कई थैलियां होती है, जिन्हें फॉलिकल्स या फिर सिस्ट कहा जाता है। इन्हीं में अंडे विकसित होते हैं और द्रव्य का निर्माण होता है। एक बार जब अंडाविकसित हो जाता है, तो फॉलिकल टूट जाता है और अंडा बाहर निकल जाता है। फिर अंडा फैलोपियन ट्यूब से होता हुआ गर्भाशय तक जाता है। इसे सामान्य ओव्यूलेशन प्रक्रिया (Normal ovulation process – what is ovulation) कहा जाता है। वहीं, जो महिला पीसीओडी से ग्रस्त होती है, उसमें प्रजनन प्रणाली अंडे को विकसित करने के लिए जरूरी हार्मोन का उत्पादन ही नहीं कर पाती है। ऐसे में, फॉलिकल्स विकसित होने लगते हैं और द्रव्य बनना शुरू हो जाता है, लेकिन ओव्यूलेशन प्रक्रिया शुरू नहीं होती है। परिणामस्वरूप, कई फॉलिकल्स अंडाशय में ही रहते हैं और गांठ का रूप ले लेते हैं। इस स्थिति में प्रोजेस्ट्रोन हार्मोन नहीं बनते और इन हार्मोन्स के बिना मासिक धर्म प्रक्रिया बाधित या फिर अनियमित हो जाती है, जिस कारण गर्भधारण करना मुश्किल हो जाता है।

डा. नुपुर गुप्ता

कंसलेंट ऑब्स्टट्रिशन एंड गाइनोकोलोजिस्ट

निदेशक वेल वुमेन क्लीनिक, गुरुग्राम

नोट – यह समाचार किसी भी हालत में चिकित्सकीय परामर्श नहीं है। यह विज्ञप्ति के आधार पर जागरूकता के उद्देश्य से तैयार की गई अव्यावसायिक रिपोर्ट मात्र है। आप इस समाचार के आधार पर कोई निर्णय कतई नहीं ले सकते। स्वयं डॉक्टर न बनें किसी योग्य चिकित्सक से सलाह लें।)

 

कवि बोले, मैं फाँसी और मौत के इस शोर में आपसे स्वर नहीं मिला सकूँगा

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कवि बोले, मैं फाँसी और मौत के इस शोर में आपसे स्वर नहीं मिला सकूँगा

Reaction on Facebook on Hyderabad encounter

नई दिल्ली, 06 दिसंबर 2019. हैदराबाद में सामूहिक दुष्कर्म के बाद हत्या के आरोपियों की एनकाउंटर में हत्या पर सवाल भी उठना शुरू हो गए हैं। सवाल कानूनी और नैतिक दोनों हैं।

बता दें कि शुक्रवार की सुबह खबर मिली थी कि तेलंगाना पुलिस ने हैदराबाद में सामूहिक दुष्कर्म के बाद हत्या की शिकार हुई पशु चिकित्सक के सभी आरोपियों की उसी स्थान पर गोली मारकर हत्या कर दी, जहां उनकी बेटी की 27 नवंबर को सामूहिक दुष्कर्म व हत्या करने के बाद उसके शव को जला दिया गया था।

इस पर प्रतिक्रियास्वरूप अशोक कुमार पाण्डेय ने अपनी एक फेसबुक पोस्ट (Ashok Kumar Pandey Facebook) में लिखा,

”कठुआ कांड के बाद विरोध प्रदर्शन चल रहा था। सीपी पर प्रदर्शन के बाद हम पुरानी दिल्ली गए। जामा मस्जिद से जुलूस निकलना था। शुरू हुआ। नारे लगने लगे – फाँसी दो, फाँसी दो। मैं चुपचाप निकल आया।

फाँसी गोली माँगती भीड़ मुझे वहशी लगती है। मुझे जूलियस सीज़र का वह दृश्य याद आता है जब भीड़ एक कवि को इसलिए मार देती है कि उसका नाम एक षड्यंत्रकारी का नाम भी था। मैंने कश्मीर ही नहीं दुनिया भर का मध्यकाल पढ़ा है। आँखें निकलवाने, ज़िंदा जला देने, लाश में भूसा भरवा देने और सर चौराहे पर टाँग देने की भयावह और वीभत्स घटनाएँ पढ़ी हैं। मुझे लगता रहा है कि वह वक़्त बीत गया।

लेकिन हत्यारों, बलात्कारियों और अपराधियों ने बार-बार याद दिलाया है कि वह वहशीपना है कहीं न कहीं। उनके लिए सज़ा ज़रूरी है। संविधान ने सिखाया कि सज़ा मतलब बदला नहीं होता।

लेकिन जब ऐसी भीड़ देखता हूँ, फाँसी-फाँसी चिल्लाती, हत्याओं का जश्न मनाती तो लगता है वह वहशीपना सिर्फ़ अपराधियों में नहीं। लगता है यह जो भीड़ है वह उतनी ही वहशी है। इनमें ही छिपे हैं वे लोग जो गर्भ में बेटियों को मार देते हैं। जो किसी पाकेटमार को पीट-पीट कर मार डालते हैं। जो किसी के घर में बीफ़ होने का आरोप लगाकर मार डालते हैं। सोशल पोज़िशनिंग यह करने की इजाज़त न भी दे तो उसे न्यायसंगत ठहराते हैं।

आप मान लीजिए कि कठुआ पर मेरा कन्सर्न फाँसी-फाँसी चिल्लाने वालों से कम था या आज इनकाउंटर का जश्न मना रहे लोगों से कम दुखी था मैं हैदराबाद की घटना के लिए लेकिन मैं फाँसी और मौत के इस शोर में आपसे स्वर नहीं मिला सकूँगा। मैं बदला-बदला चीख़ते हुए मध्यकाल में नहीं जा सकता।

मैं अकेले होने पर भी न्याय -न्याय चीख़ता रहूँगा। कोई मेरी हत्या कर दे तो भी मैं उसके लिए फाँसी नहीं चाहूँगा।“

सर्वोच्च न्यायालय के अवकाशप्राप्त न्यायधीश जस्टिस मार्कण्डेय काटजू ने भी ट्वीट कर इस एनकाउंटर को फर्जी करार दिया है।

लखनऊ की सोशल एक्टिविस्ट सदफ जफर ने फेसबुक (Sadaf Jafar Facebook) पर लिखा,

“सुना है एनकाउंटर करने वाले बहादुर पुलिसकर्मियों पर पुष्पवर्षा की गई…

क्या उनमें वो पुलिस वाले भी शामिल हैं जिन्होंने पीड़िता के परिवार से कहा था कि तुम्हारी लड़की किसी से साथ भाग गई होगी, खुद आ जायेगी।

नहीं पुष्पवर्षा नहीं ये इंसाफ को पुष्पांजलि अर्पित की जा रही है।

#Justice_RIP”

वरिष्ठ पत्रकार उज्ज्वल भट्टाचार्य ने फेसबुक (Ujjwal Bhattacharya Facebook) पर लिखा,

“बलात्कारी बलात्कार करते हैं, पुलिस एनकाउंटर करती है.

लेकिन मुझे सबसे ज़्यादा चिन्ता मध्यवर्ग के उल्लास से है.”

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज ने कहा हैदराबाद ‘एनकाउंटर’ स्पष्ट रूप से फर्जी प्रतीत होता है

यूपी पुलिस ने मायावती को दिया जवाब जंगलराज बीते दिनों की बात तो ट्विटराती बोले उन्नाव वाले दरिंदों को उड़ाओ तब पोस्ट करना श्रीमान जी……

ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जुड़ी सीएसआईआर और केवीआईसी की संयुक्त पहल

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ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जुड़ी सीएसआईआर और केवीआईसी की संयुक्त पहल

 Joint initiative of CSIR and KVIC related to rural economy

नई दिल्ली, 05 दिसंबर 2019 : ग्रामीण उद्योगों और कृषि में नवीनतम तकनीकों के उपयोग से गांवों की अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान करने में मदद मिल सकती है। वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर)Council of Scientific & Industrial Research (CSIR) ने खादी और ग्रामोद्योग आयोग (केवीआईसी) Khadi and Village Industries Commission (KVIC) के साथ मिलकर काम करने को लेकर एक नई पहल की गई है, जो ग्रामीण अर्थव्यस्था को मजबूती देने में मददगार हो सकती है।

एक नए समझौते के अंतर्गत इन दोनों संस्थाओं ने मुख्य रूप से शहद के उत्पादन एवं परीक्षण, हनी (शहद) मिशन, अरोमा मिशन और प्रस्तावित फ्लोरीकल्चर मिशन को बढ़ावा देने के लिए एक साथ मिलकर काम करने पर सहमति जताई है। इस पहल के तहत सीएसआईआर की प्रौद्योगिकियों पर आधारित उत्पादों को प्रमुख केवीआईसी केंद्रों पर प्रदर्शित किए जाने की संभावनाओं पर भी विचार किया जा रहा है। कहा जा रहा है कि ऐसा करने से सीएसआईआर द्वारा विकसित प्रौद्योगिकियों की पहुंच को बड़े पैमाने पर लोगों के बीच बढ़ाया जा सकता है।

सीएसआईआर के महानिदेशक डॉ. शेखर सी. मांडे ने कहा है कि

केवीआईसी के साथ किया गया यह समझौता समाज में व्यापक स्तर पर बदलाव लाने में मददगार हो सकता है।सीएसआईआर लंबे समय से विभिन्न क्षेत्रों में शोध एवं विकास के कार्य में जुटा है और इस दौरान कई महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकियों, उत्पादों और वैज्ञानिक प्रक्रियाओं के विकास में इस संस्थान की भूमिका बेहद अहम रही है। कृषि एवं पोषण के क्षेत्र में सीएसआईआर का कार्य मुख्य रूप से खाद्य प्रसंस्करण, फ्लोरीकल्चर और औषधीय एवं सगंध पौधों पर आधारित उत्पादों के विकास पर केंद्रित रहा है।

 खादी और ग्रामीण उद्योगों के विकास से जुड़ी विभिन्न गतिविधियों के अलावा केवीआईसी गांवों में शहद उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए हनी मिशन संचालित कर रहा है। इसका उद्देश्य किसानों एवं ग्रामीण बेरोजगार युवकों को मधुमक्खी पालन के लिए प्रोत्साहित एवं प्रशिक्षित करना है। इस मिशन के तहत गांवों में मधुमक्खी पालन की आधुनिक तकनीकों को लोकप्रिय बनाने और उन पर अमल करने पर जोर दिया जा रहा है।

उमाशंकर मिश्र

(इंडिया साइंस वायर)

आर्थिक मंदी के कारण बिजली की मांग अपने सबसे कम स्तर पर, तीन राज्य ‘कोई नया कोयला नहीं’ नीति घोषित कर सकते हैं : रिपोर्ट

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Tamil Nadu, Rajasthan, and Karnataka could declare ‘no new coal’ policy: Report

नई दिल्ली, 5 दिसंबर (अमलेन्दु उपाध्याय) : ‘Winds of Change: No New Coal States of India’ या बदलाव की हवा : भारत के कोई कोयला नहीं नीति वाले राज्य” शीर्षक के एक नए विश्लेषण के अनुसार, तीन भारतीय राज्य राजस्थान, तमिलनाडु और कर्नाटक, गुजरात और छत्तीसगढ़ के नक्शेकदम पर चलते हुए ‘कोई नया कोयला नहीं’ नीति घोषित कर सकते हैं। इसका मतलब है कि इन राज्यों को भविष्य में किसी भी नए कोयला बिजली संयंत्र की आवश्यकता नहीं होगी, और उनकी भविष्य की ऊर्जा संबंधी सभी मांगें अक्षय और स्थिति के अनुसार आधारित ऊर्जा के द्वारा प्रभावी ढंग से पूरी की जा सकती हैं।

नई दिल्ली स्थित एक जलवायु संचार संगठन क्लाइमेट ट्रेंड्स (Climate Trends) द्वारा जारी की गई रिपोर्ट, जो कि – वर्तमान आर्थिक सूचकों और निदेशकों, राज्यों की स्थापित बिजली क्षमता, बिजली उत्पादन और नवीकरणीय ऊर्जा (RE) क्षमता के विश्लेषण के साथ-साथ इसके प्रभावों के आधार पर निष्कर्ष निकालती है, साथ ही साथ कोयले की ऊर्जा से होने वाले वायु प्रदूषण का प्रभाव और पानी की समस्या का भी विश्लेषण करती है, में बताया गया है कि

“हमारा विश्लेषण भारत में कोयले के इस्तेमाल के अंत होने की शुरुआत की पुष्टि करता है। गुजरात जो कि देश का सबसे बड़ा औद्योगिक राज्य है और छत्तीसगढ़ जो कि सबसे बड़ा कोयला उत्पादन करने वाला राज्य है इनके द्वारा कोयला शक्ति से बाहर निकलने का निर्णय साफ़ साफ़ जाहिर करता है कि अभी तक इस्तेमाल की जाने वाली fossil  टेक्नोलॉजी जिससे अभी तक दुनिया संचालित होती आई है एक ख़राब अर्थनीति है। साथ ही साथ, यह अक्षय ऊर्जा की विश्वसनीयता और प्रतिस्पर्धात्मकता के लिए विश्वास का एक बहुत बड़ा वोट है, “

 कर्नाटक, राजस्थान, तमिलनाडु देश में उच्चतम RE (नवीकरणीय ऊर्जा) क्षमता वाले राज्य हैं। उनकी स्थापित RE क्षमता कोयले की शक्ति से या तो अधिक है या इससे आगे निकलने के रास्ते पर हैं।

राजस्थान में, कुल स्थापित कोयला सयंत्र क्षमता 11.6 GW है, जबकि RE + हाइड्रो 11.1 GW है। कर्नाटक में गैर-जीवाश्म की स्थापित क्षमता 63% है, कोयले की क्षमता 9 GW है, जबकि RE + हाइड्रो 17.9 GW है। इसी तरह, तमिलनाडु में गैर जीवाश्म 2.3 GW अधिक है जीवाश्म से, कोयला 13.5 GW पर है जबकि RE + हाइड्रो 15.6  GW पर है।

कम उप्लब्धता और उच्च परिवहन लागत के कारण वहां कोयला बिजली भी अधिक महंगी है।

दूसरी ओर, सौर और पवन ऊर्जा की लागत नए non-pithead कोयला बिजलीघर (एक विशेष तरीके से बनाया गया सयंत्र) की तुलना में 30-50% कम है। साथ ही पानी की कमी के कारण इन तीनो राज्यों में प्लांट का पूरा उपयोग औसतन 60% से कम है। इसके कारण बिजली बनाने वाले और बिजली का वितरण करने वाले दोनों के लिए वित्तीय खींचतान ज़्यादा बढ़ गया।

सबसे अधिक नवीकरणीय ऊर्जा (RE) क्षमता वाला राज्य राजस्थान में सौर ऊर्जा के लिए प्रति यूनिट मूल्य (` 2.44 / यूनिट या $ 0.034 / यूनिट) सबसे कम है। इसी तरह तमिलनाडु में पवन ऊर्जा की सबसे अधिक स्थापित क्षमता है, साथ ही 1500 MW  में सबसे बड़ा पवन ऊर्जा खेत भी है।

कर्नाटक में 65 मिलियन की आबादी (फ्रांस की जनसंख्या के समान, और कनाडा की जनसंख्या से दोगुनी) के साथ, इस साल जुलाई के महीने में लगातार तीन दिनों के लिए सौर और पवन ऊर्जा परियोजनाओं से अपनी 50% से अधिक बिजली की मांग को पूरा किया।

आंकड़े बताते हैं कि कोयला से बिजली पैदा करने वाले राज्यों से बिजली खरीदने की उच्च लागत और ग्राहकों के लिए भारी सब्सिडी देने के कारण बिजली वितरण कंपनियों पर ऋण का बोझ बढ़ा रहा है। राजस्थान, कर्नाटक और तमिलनाडु का संयुक्त ऋण $ 6bn, या ` 43,562 करोड़ है।

 क्लाइमेट ट्रेंड्स की निदेशक आरती खोसला (Aarti Khosla, Director Climate Trends),  के अनुसार,

“राजस्थान, कर्नाटक और तमिलनाडु राज्यों में देश की DISCOM (विद्युत वितरण कंपनियों) के आधे से अधिक ऋण हैं। फिर भी, तमिलनाडु में भारत में सबसे अधिक नई कोयला बिजली पाइपलाइन है। तमिलनाडु और राजस्थान राज्य सरकारों की निशुल्क बिजली देने की बिलकुल भी क्षमता नहीं है क्योंकि इन राज्यों के DISCOM की आर्थिक हालत बहुत ज़्यादा ख़राब है। उनके लिए अपना बकाया चुकाने का एकमात्र तरीका है सस्ती बिजली खरीदना, जो कि नवीकरणीय ऊर्जा (RE) से हासिल की हो”।

भारत में बिजली की मांग (Electricity demand in India) आर्थिक मंदी के कारण अभी संभवत: अपने सबसे कम स्तर पर है।

मानसून के सीजन में वृद्धि तथा सौर और पवन ऊर्जा की बढ़ती क्षमता के कारण, अक्टूबर 2019 में पारंपरिक स्रोतों से बिजली उत्पादन में 12.9% (वर्ष-दर-वर्ष) की गिरावट आई है। इस बीच, इसी अवधि के दौरान अक्षय ऊर्जा उत्पादन में 9.3% की वृद्धि हुई है। इस वृद्धि को राष्ट्रीय ऊर्जा भंडारण मिशन (NESM) से और बढ़ावा मिलने की उम्मीद है, जो भारत की ऊर्जा भंडारण क्षमता को बढ़ाने तथा सौर और पवन ऊर्जा पर अधिक निर्भरता बढ़ाने का इरादा रखता है।

वर्तमान में आर्थिक और मौसम की स्थिति से बिजली का उत्पादन और खपत पर अनपेक्षित प्रभाव पड़ा है। पनबिजली और नवीकरणीय ऊर्जा से बिजली के उत्पादन में बढ़ोतरी हुई है, जबकि कोयले से बिजली के उत्पादन में कमी आई है। भविष्य के लिए बिजली उत्पादन योजनाओं के पुर्विचार के लिए ये बिलकुल सही स्थिति हैं। RE (नवीकरणीय ऊर्जा) न केवल DISCOM ऋणों को हल करने में मदद कर सकता है, बल्कि एक धीमी अर्थव्यवस्था में नए रोजगार बढ़ाने में भी मदद कर सकता है।

रिपोर्ट के विश्लेषण में आगे बताया गया है कि इन राज्यों के अतिरक्त 12 और भारतीय राज्य हैं जो ‘कोई नया कोयला नहीं’ नीति की आसानी से घोषणा करने की स्थिति में हैं, क्योंकि उन सभी राज्यों की RE (नवीकरणीय ऊर्जा) क्षमता बहुत अधिक है। इनमें से कई राज्य भारत के उत्तर-पूर्व में स्थित हैं और उन सभी राज्यों की कोयले उत्पादन क्षमता भी कम है। उनकी आर्थिक और बिजली मांग की प्रोफाइल उन्हें इस परिवर्तन के लिए अच्छी तरह से अनुकूल बनाती है।

भोपाल 1984, याद है?

bhopal gas kand image

भोपाल 1984, याद है?

सन 1984, 2 और 3 दिसम्बर की रात बारह बजे के बाद भोपाल शहर की हवा ऐसी ज़हरीली हुई कि जिसने हजारों लोगों को काल के गाल में पहुंचा दिया और जाने कितने लोग बेघर, बेदर व अपाहिज हो गए। यूनियन कार्बाइड इण्डिया लिमिटेड (Union Carbide India Limited) के प्लांट से लीक हुई मिथाइल आइसो सायनेट (Methyl isocyanate) नामक ज़हरीली गैस ने रात बीतते हुए पूरे शहर को अपने आगोश में ले लिया। पुलिस रेकोर्ड्स ने तो आंकड़ों को चंद हजार तक सीमित किया मगर बाद में इस पूरी त्रासदी की सच्चाई (bhopal gas kand information in hindi) सामने आती रही और पता चला कि मरने वाले सरकारी आंकड़ों से कहीं आधिक थे। और उसमें अगर ज़ख़्मी लोगों को जोड़ दें तो आँकड़ा लाखों तक पहुंचा। यूनियन कार्बाइड इण्डिया लिमिटेड के पेस्टिसाइड प्लांट से एक घातक गैस मिथाइल आइसो साइनेट का रिसाव हुआ था जिसने भोपाल सहित देश को शोक में डुबो दिया।

जानलेवा लापरवाहियाँ  Lethal negligence

उस रात गैस के रिसाव के कई कारण गिनाए जाते हैं मसलन कर्मचारियों की लापरवाही जिससे पानी का टैंक में पहुंचना, गंदगी व ज़ंग से रिएक्शन पर तेज़ असर पड़ना, टैंक के ताप और दाब का बढ़ना  और स्टोर्ड घातक तरल मिथाइल आइसो साइनेट का गैस में बदलना आदि। मगर इसके साथ ही बहुत से कारण थे जो अनदेखे गए। वे एक नहीं अनगिनत थे, जैसे कि कम्पनी की लापरवाही और उसका कॉस्ट कटिंग के नाम पर सभी सुरक्षा मानदंडों की अनदेखी करना।

सुरूपा मुखर्जी ने अपनी किताब में इस पर जानकारी दी है कि कैसे मिथाइल आइसो साइनेट (bhopal gas kand gas name) को अपेक्षा से अधिक मात्रा के बड़े टैंकों में स्टोर किया गया जो कि 40 टन से ऊपर था। जबकि इतने घातक पदार्थ को इतनी अधिक मात्रा में एक साथ स्टोर करने की परमिशन नहीं थी। इसके अलावा रिसी गैस को कंट्रोल करने वाले छिड़काव यंत्र, फ्लेयर टावर, आदि कुछ काम नहीं कर रहे थे। प्रेशर बताने वाली मशीन भी सही काम नहीं कर रही थी। ये सब असल में इसलिए था क्योंकि कम्पनी में घाटे के दौरान इस प्लांट को बंद करने की तैयारी चल रही थी जिसके कारण सारे खर्चे बचाए जा रहे थे। जबकि इसी कम्पनी के प्लांट्स अलग देशों में सुरक्षा मानदंडों की उतनी अनदेखी नहीं कर पाते थे जितनी की भारत में वे करते थे।

ऐतिहासिक भूलें : Bhopal gas tragedy facts in hindi,

ये तो कुछ कारण हैं जिससे गैस को रोकने के कोई उपाय नहीं बचे थे। मगर और पीछे के कारण पर जाइए तो ज्ञात होता है कि छोटी छोटी भूलों का जानलेवा परिणाम निकला। यूनियन कार्बाइड पेस्टिसाइड प्लांट, यूनियन कार्बाइड इण्डिया लिमिटेड की इकाई था जो मल्टीनेशनल कम्पनी यूनियन कार्बाइड कॉर्पोरशन की भारतीय इकाई था। इसकी स्थापना 1969 में हुई थी। यहाँ से उत्पादित जो कीटनाशक पदार्थ “सेविन” नाम से बिकता था वो असल में कार्बैरिल नामक रसायन था। जो एक असाधारण कीटनाशक के रूप में मार्किट में आया था। इसका ब्रांड नाम सेविन रखा गया था। इसे किसानों का मसीहा और मनुष्यों के लिए अहानिकारक पदार्थ के रूप में प्रचार मिला था। मगर इसके बनने का जो तरीका यूनियन कार्बाइड इंडिया लिमिटेड अपनाता था उसमें बीच में एक इंटरमिडीएट पदार्थ बनता था जो बेहद खतरनाक था। दूसरा तरीका जो बाकी कुछ देशों में इस्तेमाल होता था वह अधिक खर्चीला तरीका था पर उसमें बीच का पदार्थ मिथाइल आइसो साइनेट जैसा बेहद घातक नहीं बनता था। कार्बैरिल बनने के बाद वह इंसानों के लिए सीधे तौर पर तो नुक्सान दायक नहीं ही बताया गया था। इसे किसानों के कीटों पर विजय के रूप में भी दर्शाया जाता था। मतलब प्रॉफिट जो था वो एक बड़ा कारण था इन सब अनदेखियों का।

अब इससे भी पहले के कारणों पर जाते हैं जो यह था कि शहर के बीच में ऐसा प्लांट लगाना। जिसके विरोध में बहुत लोग शुरू से ही थे। पर सरकार इस प्लांट को देश कि प्रगति के उदाहरण के रूप में प्रस्तुत करती थी और यहाँ तक कि मध्य प्रदेश सरकार को इस पर गर्व होता था और इसे मध्य प्रदेश के विकास के कार्यक्रमों से जोड़कर दिखाया जाता था। मध्य प्रदेश स्टेट बोर्ड की किताबों में भी इसका प्रचार टूरिस्ट स्पॉट के रूप में छपा था। इसके बड़े अधिकारियों से कई ब्यूरोक्रेट्स और नेताओं के बढ़िया सम्पर्क थे। नेताओं और ब्यूरोक्रेट्स के लिए उनके गेस्ट हॉउस व अन्य स्थल खुले रहते थे और कई अधिकारियों व नेताओं के सगे सम्बन्धी भी इस फैक्ट्री में अच्छी पोस्ट्स पर थे। कुल मिलाकर विकास की अंधी समझ में सब कुछ मिलीभगत से सही चल रहा था और सुरक्षा इंतजामों की अनदेखी पर कुछ सवाल नहीं थे। जबकि रिसाव आदि की इस तरह की घटनाएँ पहले भी छिटपुट रूप में होती रहती थीं। मगर सन 84 तक आते आते कम्पनी कुछ ख़ास फायदे में नहीं थी और इस प्लांट की सुरक्षा की अनदेखी और ज़्यादा बढ़ गई थी।

कितनी मौतें, कितने बेघर

उस रात असल घटना क्या थी इस पर कोई कुछ बहुत ठोस तथ्य तो कोई नहीं जानता पर यह सच्चाई सब जानते थे कि बचाव के उपाय कुछ नहीं थे। कोहरे की रात ने गैस के प्रकोप को और बढ़ा दिया। मोती सिंह जो उस वक्त एड्मिनिस्ट्रेटर थे वे अपनी किताब में बताते हैं कि किसी को कुछ समझ नहीं आ रहा था। प्रशासन रात एक के बाद ही सक्रिय हुआ पर तब तक त्राहिमाम हो चुका था। अनीस चिश्ती की किताब डेटलाइन भोपाल भी जानकारी देती है कि किस तरह हमीदिया अस्पताल में भीड़ इतनी थी कि मैनेज करना असम्भव था। अन्य जानकारियों से भी यही ज्ञात होता है कि डॉक्टर्स खुद नहीं जानते थे कि क्या करें क्योंकि उनके सामने मिथाइल आइसो साइनेट के असर के यह पहले मामले थे। इस तरह की गैस से बचने के लिए बहुतों ने कुछ गीले तौलिए इस्तेमाल करने जैसे बहुत मामूली उपाय इस्तेमाल किए। इसके अलावा उतना स्टाफ भी नहीं था जो इतनी बड़ी मात्रा में लोगों के उपचार में मदद हो।

Mohammad Zafar मोहम्मद ज़फ़र, शिक्षा के क्षेत्र में कार्यरत
मोहम्मद ज़फ़र, शिक्षा के क्षेत्र में कार्यरत

तमाम लोगों की ऑंखें गईं, तमाम फेफड़े राख हो गए और बहुतों को सोचने तक का मौक़ा नहीं मिला कि क्या हुआ। मोती सिंह कि किताब भोपाल गैस त्रासदी का सच में वे बताते हैं कि हर तरफ लाशों के ढेर थे। बड़ी मात्रा में जानवरों के शव कैसे ठिकाने लगाए गए और शहर को किस तरह महामारी से भी बचाया गया। खासकर फैक्ट्री के पास वाले क्षेत्र में तो हालत बहुत खराब थी। महीनों बाद धीरे धीरे लोगों ने किसी तरह वापस जीवन का रुख किया। कितनों ने अपने सगे सम्बन्धियों को खो दिया था। उनके पास कुछ नहीं बचा था सिवाय संघर्ष के मगर सरकार की अक्षमता देखिए कि वारेन एंडरसन जो उस वक्त कम्पनी का प्रमुख था उसका सरकार द्वारा कुछ नहीं हुआ और कुछ सालों पहले वह विदेश में अपनी ही मौत खत्म हुआ। साथ ही इस मामले में कई भारतीय उद्योगपतियों के नाम भी शामिल थे। भोपाल गैस पीड़ितों के नाम से कई संस्थाएँ हैं जो आज भी गैस पीड़ितों के लिए इन्साफ की मुहीम में जुटी हुई हैं। जैसे भोपाल की आवाज़, भोपाल पीड़ित महिला उद्योग समिति, भोपाल गैस पीड़ित, निराश्रित पेंशन भोगी मोर्चा, आदि। सतीनाथ सारंगी, रशीदा बी जैसे लोग भोपाल पीड़ितों के संघर्ष को आगे तक ले गए। कई बार संस्थाओं के लोगों पर अलग अलग तरह के आरोप भी लगाए जाते हैं पर वे अब भी इंसाफ की आस में लड़ रहे हैं। हज़ारों बच्चे अधकचरे विकास की अनदेखियों के कारण बेघर हो गए या अपाहिज हो गए। आज फैक्ट्री का पूरा एरिया एक खामोश मरघट सी शांति लिए डरावना सा खड़ा रहता है। बच्चे वहाँ की फिल्ड में खेलते हुए देखे जा सकते हैं मगर उस क्षेत्र को देख कर एक सिहरन सी हो जाती है। सन 2001 में यूनियन कार्बाइड कॉर्पोरेशन को डाऊ केमिकल्स ने अधिग्रहित कर लिया तो लोगों की लड़ाई फिर डाऊ के खिलाफ भी हो गई।

क्या हमने कुछ सबक लिया? Have we taken some lessons from the Bhopal gas tragedy?

वैसे देखा जाए इस पूरे घटनाक्रम (bhopal gas tragedy in hindi) से आज भी हमने कोई ख़ास सबक नहीं लिया है। कहीं ना कहीं कोई ना कोई छुटपुट रिसाव, रसायनों से मजदूरों की मौत आदि की खबरें आती ही रहती हैं। आज भी नेताओं, अधिकारीयों की मिली भगत से बहुत सी कम्पनियों ने लाभ के आगे सुरक्षा मानदंड ताक पर रखे हुए हैं। मगर सब कुछ ठीक ठाक चल रहा है। तब तक चलता रहेगा जब तक हम फिर ऐसी किसी बड़ी जानलेवा घटना के सामने नहीं आ जाएँगे। अगर हम यह सोचते हैं कि भोपाल गैस त्रासदी एक हादसा है तो यह भी हमारी नासमझी है क्योंकि जिस तरह नियम कानून किनारे रखे गए थे और सुरक्षा इंतज़ाम बंद पड़े थे वह एक तरह से आपराधिक कृत्य है जिसमें हमारे अपने अधिकारियों व नेताओं की भूमिका भी रही है। इतने लोगों की कुर्बानी से हमें कम से कम आज तो सबक लेना ही चाहिए ताकि फिर विकास की झूठी समझ, मुनाफाखोरी व भ्रष्टाचार के कारण फिर दूसरा भोपाल कहीं और ना हो।

मोहम्मद जफर Mohammad Zafar

Bhopal gas tragedy 1984 short note in hindi,

नाइट्रोजन युक्त वातावरण में संरक्षित भारत का हस्तलिखित संविधान

Original handwritten copy of the Constitution of India, Handwritten Constitution of India preserved in the Library of Parliament.

नाइट्रोजन युक्त वातावरण में संरक्षित भारत का हस्तलिखित संविधान

Handwritten constitution of India preserved in nitrogen-rich atmosphere

नई दिल्ली, 02 दिसंबर 2019 : करीब 70 साल पहले 26 नवंबर 1949 को स्वतंत्र भारत में भारतीय संविधान को अपनाया गया था और तभी से इस दिन को संविधान दिवस (Constitution Day) के रूप में मनाया जाता है। संविधान को अपनाए जाने के दो महीने बाद 26 जनवरी 1950 को इसे लागू किया गया। वर्ष 1980 में महसूस किया गया कि संसद के पुस्तकालय में रखे अंग्रेजी और हिंदी के मूल हस्तलिखित संविधान की प्रतियों को लंबे समय तक सुरक्षित बनाए रखने के लिए नए सिरे से प्रयास करने की जरूरत है। ऐसे में, इस ऐतिहासिक दस्तावेज के दीर्घकालीन संरक्षण के लिए उपयुक्त वैज्ञानिक विधियों की तलाश की जाने लगी।

Original handwritten copy of the Constitution of India

इसी क्रम में संसद के पुस्तकालय की ओर से नई दिल्ली स्थित वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान की राष्ट्रीय भौतिक प्रयोगशाला (एनपीएल) से संपर्क किया गया और विचार किया गया कि कांच के विशेष बक्सों में रखकर संविधान की प्रतियों को सुरक्षित रखा जा सकता है। एनपीएल के वैज्ञानिकों ने इस चुनौती से निपटने के लिए संविधान की मूल हस्तलिखित प्रतियों को नाइट्रोजन गैस से भरे वायु-रोधी कांच के बक्से में रखने का सुझाव दिया।

संसद पुस्तकालय में संरक्षित भारत का हस्तलिखित संविधान

यह माना जा रहा था कि वायु-रोधी नाइट्रजोन से भरे बक्से में प्रदूषण, धूल कणों और सूक्ष्मजीवों के कारण होने वाले क्षरण से संविधान की हस्तलिखित दोनों प्रतियों को सुरक्षित रखा जा सकता है। जितना आसान इस काम को समझा जा रहा था यह उतना सरल नहीं था, क्योंकि नाइट्रोजन आसानी से लीक हो जाती है। वायुमंडल की गैसों में सर्वाधिक 78 प्रतिशत मात्रा में पायी जाने वाली नाइट्रोजन रंगहीन, गंधहीन और स्वादहीन गैस है। रासायनिक रूप से निष्क्रिय तत्व नाइट्रोजन साधारण ताप पर न तो जलती है और न ही अन्य धातुओं से यौगिक बनाती है।

एनपीएल के वर्तमान निदेशक डॉ डी.के. असवाल ने शोध पत्रिका करंट साइंस में प्रकाशित अपने एक आलेख में बताया है कि

“इस ऐतिहासिक दस्तावेज को संरक्षित रखने के लिए एक ऐसी सीलिंग सामग्री विकसित करने की जरूरत महसूत की गई, जिससे नाइट्रोजन कांच के पारदर्शी बक्से से बाहर न आ सके और बाहरी वातावरण से प्रदूषण, नमी या फिर सूक्ष्मजीव भीतर न प्रवेश कर सकें।”

वर्ष 1988-89 में एनपीएल ने टेम्पर्ड ग्लास और एक खास सीलिंग सामग्री का उपयोग करके इस तरह के बक्से बनाने प्रयास किया। हालांकि, इन बक्सों को स्वीकार्यता नहीं मिल सकी क्योंकि उनमें लगी सीलिंग सामग्री का लंबे समय तक स्थायी बने रहने को लेकर वैज्ञानिक आश्वस्त नहीं थे।

एनपीएल के वैज्ञानिक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के संपर्क में बने रहे ताकि वायु-रोधी बक्सों के लिए सीलिंग सामग्री विकसित की जा सके। एनपीएल के वैज्ञानिक हरि कृष्ण ने वर्ष 1992-93 में फ्रांस की राजधानी पेरिस का दौरा किया, जो अपने अनूठे संग्राहलयों के लिए जाना जाता है। इन संग्रहालयों में ऐतिहासिक महत्व की वस्तुओं को बेहतरीन ढंग से संजोकर रखा गया है। इस दौरान, फ्रांस में कांच बनाने वाली कंपनी सेंट गोबेन से भी बात की गई।

वैज्ञानिकों को आभास हो चुका था कि नाइट्रोजन को रोके रखने के लिए बक्से के मेटल फ्रेम और कांच के बीच लगने वाली सीलिंग सामग्री को बनाना बेहद चुनौतीपूर्ण है। सोल्डरिंग प्रक्रिया और ओ-रिंग्स से सील दो तरह के बक्से हरि कृष्ण बना सकते थे। लेकिन, उन बक्सों से भी टिकाऊ रूप से संविधान के संरक्षण के लिए आश्वस्त नहीं हुआ जा सकता था।

डॉ असवाल ने एक बातचीत में बताया कि

“फ्रांस के विशेषज्ञों ने अमेरिका के गेट्टी कन्जर्वेशन इंस्टीट्यूट से संपर्क करने का सुझाव दिया। इस संस्थान को सैकड़ों वर्ष पुरानी मिस्र की विश्व प्रसिद्ध ममी के संरक्षण के लिए जाना जाता है। पहली नजर में ममी को देखने पर लगता है कि उन्हें कांच के बक्से में संरक्षित किया गया है। पर, भीतर ममीज के ऊपर एक खास तरह की परत होती है, जो उनका क्षरण नहीं होने देती। इस तरह, नाट्रोजन गैस को रोके रकने का प्रावधान ममीज के कांच के बक्सों में भी नहीं था।”

नवंबर 1992 में एनपीएल ने गेट्टी कन्जर्वेशन इंस्टीट्यूट के निदेशक एम.कॉरजो से भारतीय संविधान को संरक्षित रखने के लिए खास वायु-रोधी बक्सों के निर्माण में सहयोग के लिए संपर्क किया। वह इस वायु-रोधी बक्सों के संयुक्त रूप से विकास के लिए तैयार हो गए। वर्ष 1993 में एनपीएल और गेट्टी इंस्टीट्यूट के बीच इससे संबंधित समझौता हो गया। समझौते के अनुसार, 96,250 घन सेंटीमीटर का 55 सेंटीमीटर चौड़े, 70 सेंटीमीटर लंबे और 25 सेंटीमीटर ऊंचे दो बक्से बनाने पर सहमति बनी।

यह भी निर्धारित किया गया कि नाट्रोजन युक्त वातावरण में 40-50 प्रतिशत सापेक्ष आर्द्रता में एक प्रतिशत से भी कम ऑक्सीजन की मात्रा में दस्तावेजों को रखा जाएगा। संसद पुस्तकालय में इन ऐतिहासिक दस्तावेजों को रखने एवं प्रदर्शित करने के लिए एक विशेष रूप से संरक्षित कक्ष बनाना निर्धारित किया गया। यह भी तय किया गया कि इस कक्ष में जलवायु को नियंत्रित रखने के लिए 20 ± 2° सेल्सियस तापमान और 30 ± 5% आर्द्रता पूरे वर्ष बनाए रखी जाएगी।

डॉ असवाल का कहना है कि

“इन बक्सों में नाइट्रोजन दस्तावेजों के कागज को सुरक्षित रखती है। बक्से के भीतर दबाव और तापमान का पता लगाने के लिए सेंसर लगाए गए हैं। बक्सों की क्षमता का एनपीएल और गेट्टी इंस्टीट्यूट में परीक्षण करने पर उन्हें उपयुक्त पाया गया है।”

इन बक्सों को अमेरिका में गेट्टी इंस्टीट्यूट में बनाकर भारत भेजा जाना था। भारत में इन बक्सों की स्थापना और परीक्षण का कार्य दोनों संस्थानों ने संयुक्त रूप से किया गया। अंततः वर्ष 1994 में बक्सों को संसद के पुस्तकालय में स्थापित कर दिया गया। बक्सों को वॉर्निश किए हुए सागौन के केबिनेट में स्टेनलेस स्टील के करीब एक मीटर ऊंचे स्टैंड पर अलग-अलग रखा गया है।

उमाशंकर मिश्र

(इंडिया साइंस वायर)

भारत में 9 दिसंबर को लॉन्च हो सकता है वीवो वी17

Gadgets News

भारत में 9 दिसंबर को लॉन्च हो सकता है वीवो वी17

Vivo V17 – Price in India, Full Specifications & Features

नई दिल्ली, 02 दिसंबर 2019. स्मार्टफोन बनाने वाली चीन की कंपनी वीवो (Vivo, a Chinese company that manufactures smartphones) भारत में 9 दिसंबर को अपना नया स्मार्टफोन वीवो वी 17 (Vivo V17) लॉन्च कर सकती है। इस संबंध में कंपनी ने मीडिया कर्मियों को निमंत्रण भेजना शुरू कर दिया है।

कुछ दिन पहले ही रूस में इस स्मार्टफोन को लॉन्च किया गया है। डिवाइस के बैक में एक डायमंड-शेपड कैमरा मॉड्यूल के साथ ड्य्रूडॉप नॉच प्रदान किया गया है।

Full Specifications & Features of Vivo V17

6.38 इंच फुल एचडी प्लस एमोलेड डिस्प्ले वाले इस डिवाइस में क्वालकॉम स्नैपड्रैगन 665 प्रोसेसर प्रदान करने के साथ-साथ 8जीबी रैम और 128 जीबी का स्टोरेज दिया गया है।

इसमें एक माइक्रो एसडी कार्ड स्लॉट भी दिया गया है, जिसके माध्यम से स्टोरेज को 256 जीबी तक बढ़ाया जा सकता है।

कैमरे की बात करें तो फोन में क्वाड कैमरा सेटअप दिया गया है। 48 एमपी प्राइमरी सेंसर, 8 एमपी अल्ट्रा-वाइड एंगल लेंस के साथ 2 एमपी माइक्रों सेंसर और 2 एमपी डेप्थ सेंसर भी प्रदान किया गया है।

सेल्फी के लिए वीवो वी 17-32 एमपी कैमरे के साथ आता है।

इसमें ड्यूल सिम, 4जी वोलाइट, एनएफसी और ब्लूटूथ 5.0 दिया गया है। फोन में 4500एमएएच की बैटरी यूसीबी टाइप-सी पोर्ट के साथ चार्जिग के लिए प्रदान की गई है।

Performance – स्नैपड्रैगन 665

स्टोरेज – 128 जीबी

कैमरा – 48 + 8 + 2 + 2 एमपी

बैटरी – 4500 एमएएच

डिस्प्ले (Display) – 6.38 “(16.21 सेमी)

रैम – 8 जीबी

भारत में लॉन्च की तारीख – 9 दिसंबर, 2019 (अपेक्षित)

जानिए एक्स-रे, सीटी स्कैन या एमआरआई में क्या अंतर है?

ct scan mri

What is the difference between an x-ray, CT scan, or MRI?

क्या आपको कभी एक्स-रे, एमआरआई या अन्य मेडिकल स्कैन करवाना पड़ा है? क्या आप जानते हैं कि इन परीक्षणों में क्या शामिल है? या वे क्या कर सकते हैं? यूएस डिपार्टमेंट ऑफ़ हेल्थ एंड ह्यूमन सर्विसेस से संबद्ध राष्ट्रीय स्वास्थ्य संस्थान (National Institutes of Health affiliated to U.S. Department of Health and Human Services) ने चिकित्सा स्कैन (medical scan) के विषय में विस्तार से बताया है।

Medical Scans Explained : A Look Inside the Body

मेडिकल स्कैन से डॉक्टरों को सिर के आघात से लेकर पैर के दर्द तक सभी चीजों का निदान करने में सहायता मिलती है। इमेजिंग तकनीकों के कई अलग-अलग प्रकार हैं। प्रत्येक अलग तरह से काम करता है।

कुछ प्रकार के इमेजिंग परीक्षण विकिरण का उपयोग करते हैं। अन्य ध्वनि तरंगों, रेडियो तरंगों या चुम्बकों का उपयोग करते हैं। अगर आपको या किसी प्रियजन को एक की आवश्यकता हो तो मेडिकल स्कैन कैसे काम करता है, इसके बारे में जानना आपको और अधिक सुकून दे सकता है। यह आपको यह जानने में भी मदद कर सकता है कि इमेजिंग टेस्ट लेने से पहले अपने स्वास्थ्य सेवा प्रदाता से क्या पूछना चाहिए।

X-Rays एक्स-रे

शरीर में अंदर देखने की पहली क्रांति एक्स-रे के साथ आई। एक्स-रे का उपयोग क्लिनिक में 120 से अधिक वर्षों से किया जा रहा है।

एनआईएच के एक इमेजिंग विशेषज्ञ डॉ. क्रिस कंदर्प (Dr. Kris Kandarpa, an imaging expert at NIH) कहते हैं, “एक्स-रे का उपयोग अभी भी हर दिन किया जाता है, क्योंकि वे बहुत कुछ कर सकते हैं।” वे हड्डियों को देखने और फेफड़ों में निमोनिया जैसे कुछ प्रकार के ऊतकों में समस्याओं को खोजने के लिए उपयोगी हैं।

एक्स-रे कैसे काम करता है How does x-ray work

एक्स-रे इमेजिंग आपके शरीर के एक हिस्से के माध्यम से एक ऊर्जा किरण को पारित करके काम करता है। आपकी हड्डियाँ या शरीर के अन्य अंग एक्स-रे बीम से कुछ को गुजरने से रोकेंगे। इससे बीम पर कब्जा करने के लिए उपयोग किए जाने वाले डिटेक्टरों पर उनकी आकृतियाँ दिखाई देती हैं। डिटेक्टर रेडियोलॉजिस्ट को देखने के लिए एक्स-रे को डिजिटल इमेज में बदल देता है।

एक्स-रे बीम विकिरण का उपयोग करते हैं (X-ray beams use radiation)। विकिरण ऊर्जा है जिसे अदृश्य कणों या तरंगों के रूप में जारी किया जाता है। बहुत बड़ी मात्रा में विकिरण के संपर्क में होने से कोशिकाओं और ऊतकों को नुकसान हो सकता है। यह आपके कैंसर के विकास के जोखिम को भी बढ़ा सकता है।

लेकिन आधुनिक एक्स-रे परीक्षण विकिरण की एक बहुत छोटी मात्रा का उपयोग करते हैं। लोग प्राकृतिक रूप से आकाश, चट्टानों और मिट्टी जैसे कई स्रोतों से विकिरण के संपर्क में आते हैं।

कंदर्प बताते हैं कि “एक छाती एक्स-रे आपको उतनी ही मात्रा में विकिरण देता है जितना कि आप अटलांटिक महासागर को पार करते समय एक विमान की उड़ान में पाते हैं” ।

CT Scans सीटी स्कैन
technology hospital medicine indoors
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सीटी स्कैन भी एक्स-रे बीम का उपयोग करते हैं। लेकिन 3 डी तस्वीर बनाने के लिए आपके पूरे शरीर पर बीम घूमते हैं। इन छवियों में एक नियमित एक्स-रे की तुलना में अधिक जानकारी होती है। स्कैन एक मिनट से भी कम समय में किया जा सकता है। यह आपातकालीन विभाग जैसी जगहों पर विशेष रूप से उपयोगी है। वहां, डॉक्टरों को तुरंत यह जानने की जरूरत होती है कि क्या मरीज की जान को खतरा है।

क्योंकि सीटी स्कैन एक सामान्य एक्स-रे की तुलना में अधिक एक्स-रे बीम का उपयोग करते हैं, वे अक्सर विकिरण की उच्च मात्रा देते हैं। मेयो क्लिनिक में सीटी इमेजिंग शोधकर्ता डॉ. सिंथिया मैककोलॉफ (Dr. Cynthia McCollough, a CT imaging researcher at the Mayo Clinic) बताते हैं कि चिकित्सा विशेषज्ञों के पास आवश्यक छोटी विकिरण मात्रा की गणना करने के तरीके मौजूद हैं।

मैककोलॉफ कहते हैं, “हम रोगी के आकार के लिए मात्रा का अनुकूलन करते हैं, और हम फिर इसका सीटी स्कैन के कारण के लिए दर्जी अनुकूलन करते हैं”। उदाहरण के लिए, छाती के सीटी स्कैन (CT scan of the chest) में पेट क्षेत्र के सीटी स्कैन की तुलना (CT scan of the stomach area) में कम विकिरण की आवश्यकता होती है।

मैककोलॉफ कहते हैं, “हमने पाया है कि जब आप विकिरण की मात्रा का तरीका कम करते हैं, तो छवियां बहुत कम साफ होती हैं, लेकिन वे अक्सर डॉक्टरों को सही जवाब दे देती हैं”।

उनका कहना है कि यदि मानक मात्रा पहले से ही काफी कम है तो विकिरण की कम मात्रा से जोखिम कम होने की आशंका होगी। वह कहती हैं कि “लोगों को यह जानना ज़रूरी है क्योंकि कुछ रोगियों को जिन्हें सीटी स्कैन की ज़रूरत होती है, वे इसे कराने से डरते हैं।”

विकिरण का डर कभी-कभी किसी को सीटीस्कैन कराने से रोक सकता है जबकि यह उनके स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में मदद कर सकता है, या यहां तक कि उनके जीवन को बचा भी सकता है। वे कहती हैं “वर्तमान में सीटी स्कैन में विकिरण की मात्रा एक ऐसी सीमा में हैं जहां जोखिम साबित करना संभव नहीं है। वह कम है ।”

MRI एमआरआई

एमआरआई (Magnetic Resonance Imaging) बहुत अलग तरीके से काम करता है। यह एक्स-रे का उपयोग नहीं करता है। इसके बजाय, यह आपके शरीर के ऊतकों के भीतर पानी के अणुओं में परमाणुओं को प्रभावित करने के लिए मजबूत मैग्नेट और रेडियो तरंगों का उपयोग करता है। जब रेडियो तरंगों को बंद कर दिया जाता है, तो परमाणु ऊर्जा को छोड़ते हैं जिसकी एमआरआई मशीन द्वारा पहचान की जाती है।

विभिन्न ऊतकों में परमाणु अलग-अलग गति से सामान्य हो जाते हैं और विभिन्न मात्रा में ऊर्जा छोड़ते हैं। एमआरआई सॉफ्टवेयर इस जानकारी का उपयोग विभिन्न ऊतक प्रकारों के 3डी चित्र बनाने के लिए करता है।

स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के एमआरआई के शोधकर्ता डॉ. श्रेयस वासनवाला (Dr. Shreyas Vasanawala, an MRI researcher at Stanford University) बताते हैं, “जब आप नरम ऊतकों (soft tissue) की बीमारियों, जैसे मांसपेशियों, कण्डरा और रक्त वाहिकाओं को देखना चाहते हैं, तो एमआरआई सबसे मददगार होता है।”

एमआरआई जानकारी दे सकता है कि वास्तविक समय में शरीर कैसे काम कर रहा है।

वासनवाला कहते हैं, “उदाहरण के लिए, हम माप सकते हैं कि रक्तवाहिकाओं में कितना रक्त बह रहा है, जो डॉक्टरों को हृदय में छोटे ब्लॉकेज या दोष खोजने में मदद कर सकता है।”

क्योंकि एमआरआई एक्स-रे का उपयोग नहीं करता है, इसलिए डॉक्टर बच्चों में इसका अधिक उपयोग करना चाहेते हैं। लेकिन एमआरआई मशीनों के लिए आपको लंबे समय तक गतिहीन पड़ा रहना पड़ता है। वासनवाला कहते हैं, “बच्चों को पकड़कर रखना मुश्किल हो सकता है।” यदि आवश्यक हो, तो सामान्य संज्ञाहरण परीक्षण (general anesthesia) के माध्यम से बच्चों का एमआरआई किया जा सकता है। एनेस्थिसिया बच्चों को बेहोश कर देता है और उन्हें हिलने-डुलने में असमर्थ बना देता है। यह आमतौर पर बहुत सुरक्षित है, लेकिन इसके कुछ जोखिम भी हैं।

अन्य स्कैन Other Scans

x-ray CT scan MRI

एक और आमतौर पर इस्तेमाल की जाने वाली इमेजिंग विधि को अल्ट्रासाउंड (ultrasound) कहा जाता है। यह शरीर में ध्वनि तरंगें भेजता है। विभिन्न प्रकार के ऊतक ध्वनि तरंगों को अलग तरीके से दर्शाते हैं। इन अंतरों को एक अल्ट्रासाउंड मशीन द्वारा उठाया जा सकता है और एक तस्वीर में बदल दिया जा सकता है। दिल और अन्य अंगों, या एक विकासशील बच्चे को देखने के लिए अल्ट्रासाउंड मददगार है।

Doctors also use tests called nuclear imaging.

डॉक्टर न्यूकलियर इमेजिंग नामक परीक्षणों का भी उपयोग करते हैं। ये परीक्षण एक छोटी मात्रा में एक रेडियोधर्मी पदार्थ, या “ट्रेसर” का उपयोग करते हैं। अधिकांश ट्रैसर्स को शरीर में इंजेक्ट किया जाता है, लेकिन कुछ इनहेल या निगल (inhaled or swallowed) लिए जाते हैं। शरीर के अंदर के ट्रैसर्स रेडिएशन छोड़ते हैं जिन्हें शरीर के बाहर डिटेक्टर द्वारा मापा जा सकता है। ट्रेसर का प्रकार अलग-अलग होता है जो डॉक्टर क्या देखना चाहते हैं, इस पर निर्भर करता है।

पीईटी स्कैन – PET scan

एक पॉज़िट्रॉन एमिशन टोमोग्राफी (पीईटी) स्कैन (positron emission tomography (PET) scan), उदाहरण के लिए, अक्सर कैंसर का निदान करने के लिए एक रेडियोधर्मी चीनी (radioactive sugar) का उपयोग करता है। जब कैंसर कोशिकाएं रेडियोधर्मी चीनी लेती हैं, तो उन्हें पीईटी स्कैनर के साथ देखा जा सकता है।

#Breaking : मोदी के सांसद ने कहा, वित्त मंत्री सीतारमण अर्थशास्त्र नहीं जानतीं… दिन की शीर्ष सुर्खियाँ

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वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण पर तीखे हमले में, भाजपा के वरिष्ठ नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने कहा है, “वह अर्थशास्त्र नहीं जानती हैं”।

राहुल गांधी सोमवार को झारखंड में पहली रैली करेंगे

पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी सोमवार को सिमडेगा जिले में एक रैली के साथ, चल रहे झारखंड विधानसभा चुनावों में अपने अभियान की शुरुआत करने के लिए तैयार हैं।

महाराष्ट्र विधानसभा में मी पुनः येईनने हास्य बिखेरा

महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री और विपक्ष के नए नेता देवेंद्र फड़नवीस की प्रसिद्ध पूर्व-चुनाव भविष्यवाणी “Mee punha yaeen, मी पुनः येईन, मी पुनः येईन (मैं लौटूंगा!)” ने विधानसभा के विशेष सत्र में अपनी फजीहत को हवा दी। स्प्लिट्स में ट्रेजरी और विपक्षी बेंच दोनों पर सदस्यों ने मजे लिए।

कांग्रेस ने मोबाइल टैरिफ बढ़ोतरी पर सरकार की खिंचाई की

सेलफोन कंपनियों द्वारा घोषित मोबाइल डेटा और कॉल शुल्क में वृद्धि के लिए कांग्रेस ने सरकार को फटकार लगाई है।

6 साल की बच्ची के साथ बलात्कार, उसकी स्कूल बेल्ट से गला दबाकर हत्या

मीडिया रिपोर्ट्स मे पुलिस ने बताया है कि राजथान के टोंक जिले में शनिवार को लापता हुई छह वर्षीय एक छात्रा के साथ कथित रूप से बलात्कार किया गया और उसकी अपने स्कूल बेल्ट से गला दबाकर हत्या कर दी गई।

ट्विटर यूजर्स ने वर्ल्ड एड्स डे मनाया

रविवार को विश्व एड्स दिवस मनाया गया, जिसमें हस्तियों ने ट्वीट करके लोगों को यह याद दिलाने के लिए कहा कि अभी भी क्या करना है।

हैदराबाद रेप-मर्डर को लेकर ट्विटर पर हुआ गुस्सा

हैदराबाद के बाहरी इलाके में एक पशुचिकित्सक की गैंगरेप और हत्या के तीन दिन बाद भी, ट्विटर उपयोगकर्ताओं ने रविवार को अपराध पर अपना गुस्सा निकालना जारी रखा, बलात्कारियों के लिए मौत की मांग करते हुए और पुलिसकर्मियों के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग की।

केरल के पूर्व न्यायाधीश ने ड्रग्स पर टिप्पणी के लिए राज्य मंत्री की खिंचाई की

केरल उच्च न्यायालय के एक पूर्व न्यायाधीश ने रविवार को एक राज्य मंत्री द्वारा दिए गए बयान को मूर्खतापूर्ण बताते हुए कहा कि पुलिस को फिल्म की शूटिंग के स्थानों पर दवाओं की खोज के लिए शिकायत की आवश्यकता है।

कांग्रेस के पटोले महामंत्री के रूप में निर्विरोध चुने गए।

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता नाना एफ. पटोले को रविवार को महाराष्ट्र विधानसभा के 14 वें अध्यक्ष के रूप में निर्विरोध निर्वाचित घोषित किया गया।

रोहित शर्मा लारा के नाबाद 400 रन के रिकॉर्ड को तोड़ सकते हैं: वार्नर

ऑस्ट्रेलियाई सलामी बल्लेबाज डेविड वार्नर को लगता है कि रोहित शर्मा वेस्टइंडीज के दिग्गज ब्रायन लारा के टेस्ट मैच में नाबाद 400 रन के रिकॉर्ड को तोड़ सकते हैं।

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प्रशांत महासागर के गर्म होने के कारण बदला पूरी दुनिया का बारिश पैटर्न !

Water

प्रशांत महासागर के गर्म होने के कारण बदला पूरी दुनिया का बारिश पैटर्न !

पिछले दिनों देश भर में मानसून के विदा होने के वक्त भयंकर बारिश देखने को मिली थी। खासकर बिहार और देश की वित्तीय राजधानी मुंबई में पिछले कई वर्षों के वर्षा के रिकॉर्ड टूट गए। अब भारतीय वैज्ञानिक के नेतृत्व में किए गए एक अध्ययन में दावा किया गया है कि भारतीय-प्रशांत महासागर के गर्म होने के कारण बारिश का भारत का ही नहीं बल्कि वैश्विक पैटर्न भी बदला।

Twofold expansion of the Indo-Pacific warm pool warps the MJO life cycle

शोध पत्रिका नेचर में “इंडो-पैसिफिक वार्म पूल का दो गुना विस्तार एमजेओ जीवन चक्र को प्रभावित करता है” शीर्षक से प्रकाशित इस अध्‍ययन में, शोधकर्ताओं ने पाया है कि भारतीय-प्रशांत महासागर के गर्म हिस्से का आकार दोगुना हो गया है और पृथ्‍वी पर महासागर के तापमान में यह सबसे बड़ी बढ़ोत्तरी है।

इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ ट्रॉपिकल मीटियोरोलॉजी (आईआईटीएम)- Centre for Climate Change Research, Indian Institute of Tropical Meteorology, Pune, India पुणे से जुड़े एम. के. रॉक्सी (M. K. Roxy), के नेतृत्व में किए गए अध्ययन में आईआईटीएम से ही जुड़े पाणिनी दासगुप्ता (Panini Dasgupta), प्रशांत समुद्री पर्यावरण प्रयोगशाला, राष्ट्रीय महासागरीय और वायुमंडलीय प्रशासन, सिएटल, वाशिंगटन, यूएसए (Pacific Marine Environmental Laboratory, National Oceanic and Atmospheric Administration, Seattle, WA, USA) से जुड़े माइकल जे. मैकडेन (Michael J. McPhaden) व चिदोंग झांग (Chidong Zhang), वायुमंडल और महासागर अनुसंधान संस्थान, टोक्यो विश्वविद्यालय, काशीवा, चिबा, जापान (Atmosphere and Ocean Research Institute, The University of Tokyo, Kashiwa, Chiba, Japan) से जुड़े तमकी सुमात्सु (Tamaki Suematsu), और वायुमंडलीय विज्ञान विभाग, वाशिंगटन विश्वविद्यालय, सिएटल, वाशिंगटन, संयुक्त राज्य अमेरिका (Department of Atmospheric Sciences, University of Washington, Seattle, WA, USA) डेह्युन किम (Daehyun Kim) शामिल हैं।

शोधकर्ताओं ने पाया कि प्रशांत महासागर के गर्म हिस्से में हो रही बढ़ोत्तरी ने उस मौसम के उतार-चढ़ाव को बदल दिया है, जिसका स्रोत भूमध्‍य रेखा के ऊपर है। इसे मड्डेन जूलियन ऑस्‍सीलेशन (एमजेओ)- The Madden–Julian Oscillation (MJO) कहते हैं।

अध्ययन में यह बात निकलकर सामने आई कि एमजेओ के व्यवहार में बदलाव के कारण उत्तरी ऑस्‍ट्रेलिया, पश्चिम पैसिफिक, अमेजॉन बेसिन, दक्षिण-पश्चिम अफ्रीका और दक्षिण-पूर्वी एशिया (इंडोनेशिया, फिलीपींस और पापुआ न्यू गीनिया) में बारिश बढ़ गई है। उसी दौरान इन्हीं परिवर्तनों के कारण सेंट्रल पैसिफिक, यूनाइटेड स्टेट्स के पश्चिम और पूर्वी हिस्से में (उदाहरण के लिये कैलीफोर्निया), उत्तर भारत, पूर्वी अफ्रीका और चीन के यांगज़े बेसिन में बारिश में गिरावट दर्ज हुई है।

एमजेओ भूमध्‍यरेखा के ऊपर चक्रवात, मॉनसून, और एल नीनो साइकल को नियंत्रित करता है- और कभी-कभी एशिया, अफ्रीका, यूरोप और अमेरिका में मौसम की विनाशकारी घटनाओं को अंजाम देता है।

भूमध्‍य रेखा के ऊपर महासागर में एमजेओ 12,000 से 20,000 किलोमीटर तक की दूरी तय करता है, खास तौर से भारतीय-प्रशांत महासागर के गर्म हिस्से के ऊपर से, जिसका तापमान आमतौर पर समुद्री तापमान 28°C से अधिक रहता है।

कार्बन उत्सर्जन के कारण (Due to carbon emissions) हाल ही के दशकों में भारतीय-प्रशांत महासागर का गर्म हिस्सा और अधिक गर्म हो रहा है और तेज़ी से इसका विस्तार हुआ है।

1900-1980 तक महासागर के गर्म हिस्से का क्षेत्रफल 2.2 × 107 वर्ग किलोमीटर था। 1981-2018 में इसका आकार बढ़ कर 4 × 105 वर्ग किलोमीटर हो गया, जोकि कैलिफोर्निया के क्षेत्रफल के बराबर है।

अध्ययन में कहा गया है कि यद्यपि सम्पूर्ण भारतीय-प्रशांत महासागर गर्म हो गया है, इसमें सबसे गर्म पानी पश्चिमी प्रशांत महासागर में है, जिससे तापमान में अंतर पैदा होता है, जो भारतीय महासागर से नमी को साथ लेकर पश्चिम प्रशांत समुद्री महाद्वीप (West Pacific Maritime Continent) तक ले आता है, और यहां पर बादल बनते हैं। इसके परिणामस्वरूप एमजेओ का जीवनचक्र बदल गया है। हालांकि, शोधकर्ताओं का कहना है कि एमजेओ जीवन चक्र पर इस वार्मिंग का प्रभाव काफी हद तक अज्ञात है।

भारतीय महासागर पर एमजेओ के बादलों के बने रहने का समय औसतन 19 दिन से करीब 4 दिन घट कर औसतन 15 दिन हो गया है। जबकि पश्चिमी प्रशांत पर यह 5 दिन बढ़ गया है (औसतन 16 दिन से बढ़कर 21 दिन हो गया है)। एमजेओ बादलों के भारतीय महासागर और पश्चिमी प्रशांत सागर पर बने रहने के समय में बदलाव ही है जिसके कारण पूरी दुनिया के मौसम में परिवर्तन हुआ है।

अमलेन्दु उपाध्याय (Amalendu Upadhyaya) लेखक वरिष्ठ पत्रकार, राजनैतिक विश्लेषक व टीवी पैनलिस्ट हैं। वह हस्तक्षेप के संपादक हैं।
अमलेन्दु उपाध्याय (Amalendu Upadhyaya) लेखक वरिष्ठ पत्रकार, राजनैतिक विश्लेषक व टीवी पैनलिस्ट हैं। वह हस्तक्षेप के संपादक हैं।
 माइकल जे. मैकडेन लिखते हैं कि

“मौसम के सटीक अनुमान को लगाने के लिये समन्यवयक अंतर्राष्‍ट्रीय प्रयास चल रहे हैं, जो दो से चार हफ्ते में आगे आयेंगे और इस संस्‍था की सफलता के लिये एमजेओ एक महत्वपूर्ण कुंजी है”। वह कहते हैं कि, “हमारे द्वारा निकाले गये निष्‍कर्ष यह पता लगाने के लिये एक वेचनात्मक मानदंड हैं कि मौसम के विस्तारित भाग के अनुमान के लिये किस कंप्यूटर मॉडल पर भरोसा करें। यह उनकी क्षमता और एमजेओ के बनावटी व्यवहार और बदलते हुए पर्यावरण पर निर्भर करता है”

मुख्य शोधकर्ता एम. के. रॉक्सी ने कहा कि

“क्लाइमेट मॉडल के इस बनावटी रूप से यह पता चलता है कि यह सब भारतीय-प्रशांत महासागर में निरंतर बढ़ती गर्मी है, जो भविष्‍य में पूरी दुनिया में बारिश के पैटर्न में बदलाव करेगा।  इसका मतलब हमें हमारे महासागर पर नज़र रखने वाले निरीक्षण यंत्रों को अत्याधुनिक बनाने की जरूरत है, ताकि मौसम में होने वाले परिवर्तन का सटीक अनुमान लगाया जा सके, और गर्म होती दुनिया के कारण भविष्‍य में आने वाली चुनौतियों का भी कुशलतापूर्वक अनुमान लगाया जा सके।”

अमलेन्दु उपाध्याय

समुद्र संबंधी जानकारी प्रदान करने में मददगार हो सकती हैं समुद्री प्रजातियां : सर्वे

ocean

Marine animals are increasingly instrumented with environmental sensors that provide large volumes of oceanographic data.

नई दिल्ली, 28 नवंबर 2019. एक नए अध्ययन से पता चला है कि शार्क, पेंग्विन, कछुए और अन्य समुद्री प्रजातियां इंसानों को इलेक्ट्रॉनिक टैग से समुद्र संबंधी जानकारी (Electronic tag-related ocean information) प्रदान करने में मदद कर सकती हैं।

ब्रिटेन में एक्सेटर विश्वविद्यालय के नेतृत्व में एक टीम ने कहा कि सेंसर ले जाने वाले जानवर प्राकृतिक व्यवहार जैसे बर्फ के नीचे गोता लगाना, उथले पानी में तैरना या धाराओं के खिलाफ चलना जैसे कई काम कर सकते हैं।

tortoise type in hindi
कछुए

विश्वविद्यालय के प्रमुख लेखक डेविड मार्च (David March) के मुताबिक,

“हम समुद्र के बारे में सिखाने व बताने के लिए पशु-जनित सेंसर (Animal-borne sensors) की विशाल क्षमता को उजागर करना चाहते हैं।”

उन्होंने कहा,

“यह पहले से ही सीमित पैमाने पर हो रहा है, लेकिन इसमें बहुत अधिक गुंजाइश है।”

हजारों समुद्री जानवरों को विभिन्न प्रकार के अनुसंधान और संरक्षण उद्देश्यों के लिए टैग किया गया है। मगर वर्तमान में महासागरों में एकत्रित जानकारी का व्यापक रूप से जलवायु परिवर्तन और अन्य बदलावों को ट्रैक करने के लिए उपयोग नहीं किया जाता है।

इसके बजाए निगरानी ज्यादातर अनुसंधान जहाजों, पानी के नीचे ड्रोन और हजारों फ्लोटिंग सेंसर द्वारा की जाती है।

मार्च ने कहा,

“हमने 183 प्रजातियों को देखा, जिसमें ट्यूना, शार्क, व्हेल और उड़ने वाले समुद्री पक्षी शामिल हैं और वे क्षेत्र जहां वे निवास करते हैं। हमने खराब सेंसर वाले क्षेत्रों में महासागर की सतह (विश्व स्तर का 18.6 फीसदी) की पहचान करने के लिए फ्लोटिंग सेंसर से 15 लाख से अधिक माप संसाधित किए हैं।”

ग्लोबल चेंज बायोलॉजी (global change biology) नामक पत्रिका में प्रकाशित अध्ययन Towards the integration of animal‐borne instruments into global ocean observing systems” से पता चलता है कि कछुए या शार्क द्वारा एकत्र किए गए डेटा वैश्विक जलवायु परिवर्तनशीलता (Global climate variability) और मौसम पर बड़े प्रभाव के साथ अन्य दूरदराज और महत्वपूर्ण क्षेत्रों जैसे उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में भी समुद्र की निगरानी बढ़ा सकते हैं।

डेविड मार्च के अतिरिक्त शोध दल में लार्स बोहमे, जोक्विन टिंटोरे, पेड्रो जोक्विन वेलेज बेलची व ब्रेंडन जे. गोडले भी शामिल हैं।

Topics – Animal‐borne instruments, Argo, global ocean observing system, marine vertebrates, multi‐platform ocean observation, operational oceanography, pinnipeds, satellite tracking, sea turtles.

क्या आपने भी लंबे समय से लॉगिन नहीं किया है अपना ट्विटर खाता ? तुरंत करें नहीं तो पछताएंगे

Twitter

क्या आपने भी लंबे समय से लॉगिन नहीं किया है अपना ट्विटर खाता ? तुरंत करें नहीं तो पछताएंगे

ट्विटर निष्क्रिय अकाउंट्स हटाएगा : रिपोर्ट

Twitter will delete inactive accounts: report

नई दिल्ली, 28 नवंबर 2019 माइक्रो ब्लागिंग साइट ट्विटर अपने निष्क्रिय अकांउट्स (Inactive accounts of micro-blogging site Twitter) के मालिकों को ईमेल भेज रही है कि या तो 11 दिसंबर तक साइन इन करें या उनका यूजरनेम हटा दिया जाएगा। ट्विटर उपयोगकर्ता, जिन्होंने छह महीने या उससे ज्यादा समय से लॉग इन नहीं किया है, उन्हें कंपनी की ओर से ईमेल अलर्ट मिलेगा।

द वर्ज ने मंगलवार को ट्विटर के प्रवक्ता के हवाले से कहा,

“सार्वजनिक संवाद की सेवा के तहत हमारी प्रतिबद्धता के हिस्से के रूप में, हम निष्क्रिय खातों को हटाने के लिए काम कर रहे हैं, जिससे लोगों को अधिक सटीक, विश्वसनीय जानकारी मिले और वे ट्विटर पर भरोसा कर सकें।”

उन्होंने कहा,

“इस प्रयास का हिस्सा लोगों को ट्विटर पर पंजीकरण करने के बाद सक्रिय रूप से लॉग-इन करने और उसके उपयोग करने के लिए प्रोत्साहित करना है, जैसा कि हमारी निष्क्रिय अकांउट नीति में कहा गया है।”

हालांकि, अकांउट्स को तुरंत नहीं हटाया जाएगा। इस प्रक्रिया में कई महीने लगेंगे।

जानिए क्यों सूखती हैं बारहमासी नदियां?

Ganga

Know why perennial rivers dry up?

बीसवीं सदी के पहले कालखण्ड तक भारत की अधिकांश नदियाँ बारहमासी थीं। हिमालय से निकलने वाली नदियों (rivers originating in the Himalayas) को बर्फ के पिघलने से अतिरिक्त पानी मिलता था। पानी की पूर्ति बनी रहती थी इस कारण उनके सूखने की गति अपेक्षाकृत कम थी। नदी के कछार (river bed) के प्रतिकूल भूगोल तथा भूजल के कम रीचार्ज या विपरीत कुदरती परिस्थितियों के कारण, उस कालखण्ड में भी भारतीय प्रायद्वीप की कुछ छोटी-छोटी नदियाँ सूखती थीं। इस सब के बावजूद भारतीय नदियों का सूखना मुख्य धारा में नहीं था।

लगभग मौसमी बनकर रह गई हैं बहुत सारी नदियाँ

पिछले 50-60 सालों से भारत की सभी नदियों खासकर भारतीय प्रायद्वीप की नदियों के प्रवाह (Rivers of the Indian Peninsula) में गम्भीर कमी आ रही है। हिमालयीन नदियों को छोड़कर भारतीय प्रायद्वीप या जंगलों तथा झरनों से निकलने वाली बहुत सारी नदियाँ लगभग मौसमी बनकर रह गई हैं।

नदियों के सूखने के क्या कारण हो सकते हैं? नदियों की वेदना का क्या कारण है?

हिमालयीन नदियों सहित भारतीय प्रायद्वीप की नदियों के प्रवाह की कमी/सूखने के लिये अलग-अलग कारण हो सकते हैं। उन कारणों को मुख्य प्राकृतिक कारण और मुख्य मानवीय हस्तक्षेप (कृत्रिम कारण) वर्ग में वर्गीकृत किया जा सकता है।

नदियां सूखने के मुख्य प्राकृतिक कारण Main natural causes of rivers drying up

बरसात के मौसम में भारतीय नदियों को रन-आफ के माध्यम से पर्याप्त पानी मिलता है। बरसात के खत्म होने के बाद उन्हें, रन-आफ के माध्यम से पानी का मिलना बन्द हो जाता है। सूखे मौसम में उनके प्रवाह का स्रोत जमीन के नीचे संचित भूजल होता है। अगले पैराग्राफों में नदी के प्रवाह की अविरलता, प्रवाह की घट-बढ़ तथा सूखने के कारणों को समझने का प्रयास किया गया है।

भूजल का पुनर्भरण क्या है?

भूजल स्तर की मौसमी घट-बढ़ से सभी परिचित हैं। यह घट-बढ़ प्राकृतिक है। सभी जानते हैं कि हर साल, वर्षाजल की कुछ मात्रा धरती में रिस कर एक्वीफरों में भूजल का संचय (Ground water accumulation in aquifers) करती है। उसे भूजल का पुनर्भरण या रीचार्ज (ground water recharge in Hindi) कहते हैं। यह पुनर्भरण, भले ही उसकी मात्रा असमान हो, पूरी नदी घाटी में होता है।

भूमिगत जल स्तर के नीचे जाने के कारण | cause of the fall of the ground water level

गौरतलब है कि भूजल के पुनर्भरण के कारण भूजल का स्तर सामान्यत: अपनी पूर्व स्थिति प्राप्त कर लेता है। विदित है कि एक्वीफरों में संचित पानी (water stored in aquifers) स्थिर नहीं होता। वह ऊँचे स्थान से नीचे स्थान की ओर प्रवाहित होता है। इसलिये जैसे ही बरसात खत्म होती है, एक्वीफर को पानी की आपूर्ति बन्द हो जाती है।

एक्वीफर में जल संचय होना रुक जाता है और निचले इलाकों की ओर संचित जल के बहने के कारण भूजल स्तर घटने लगता है। इस कारण सूखे दिन आते ही भूजल स्तर कम होने लगता है। बरसात की वापसी के साथ उसका ऊपर उठना फिर प्रारम्भ हो जाता है।

नदी की अविरलता का क्या कारण है?

भूजल स्तर की घट-बढ़ के सकल अन्तर को भूजल का अधिकतम अन्तर कहते हैं। विदित है कि बरसात के दिनों में रीचार्ज के कारण एक्वीफरों में पानी का संचय होता है। भूजल का स्तर ऊपर उठता है और जब वह स्तर नदी तल के ऊपर आ जाता है तो वह नदी में डिस्चार्ज होने लगता है। उसके डिस्चार्ज होने के कारण नदी को पानी मिलता है और नदी में पानी बहने लगता है। जब तक नदी को डिस्चार्ज मिलना जारी रहता है तब तक नदी प्रवाहमान रहती है। यही नदी की अविरलता का कारण है।

कुदरती डिस्चार्ज के कारण जब भूजल का स्तर नदी तल के नीचे उतर जाता है तो नदी को पानी मिलना मिलना बन्द हो जाता है। नदी का प्रवाह खत्म हो जाता है और नदी सूख जाती है। यह नदी की अविरलता के समाप्त होने या सूखने का कारण है। इसके बावजूद नदी की रेत से पानी का बहना जारी रहता है। जब एक्वीफर पूरी तरह खाली हो जाते हैं तब रेत से होने वाला प्रवाह भी बन्द हो जाता है।

उल्लेखनीय है कि ढाल की अधिकता के कारण भी नदियाँ सूखती हैं। अधिक ढाल वाले इलाकों में ढाल की अधिकता के कारण बरसाती पानी तेजी से नीचे बहता है। इस कारण बरसात समाप्त होते ही रन-आफ खत्म हो जाता है।

बरसात बाद नदी के सूखने का अर्थ क्या है? (What is the meaning of the river drying up after the rain?)

नदियों में नदी के तल पर और नदी के तल के नीचे प्रवाहित पानी प्राकृतिक जलचक्र का अंग होता है।

उल्लेखनीय है कि नदी में बहने वाले पानी की अवधि की तुलना में नदी तल के नीचे बहने वाले पानी की अवधि अधिक होती है। अर्थात नदी तल के नीचे पानी अधिक समय तक बहता है।

संक्षेप में, बरसात के बाद नदी के सूखने का अर्थ पानी खत्म होना नहीं है। उसका अर्थ है भूजल स्तर का नदी तल के नीचे उतर जाना। नदी के फिर से प्रवाहमान होने का मतलब रन-आफ का मिलना है या भूजल स्तर का नदी तल के ऊपर पुन: उठ आना।

ग्लोबल वार्मिंग से भी सूख रही हैं नदियां | Rivers are drying up due to global warming | ग्लोबल वार्मिंग का नदियों पर प्रभाव

नदियों के सूखने का दूसरा प्राकृतिक कारण ग्लोबल वार्मिंग है। उसके कारण (Effects of global warming on rivers) बरसात की मात्रा, वितरण तथा वर्षा दिवसों में बदलाव हो रहा है। औसत वर्षा दिवस कम हो रहे हैं। बरसात की मात्रा और अनियमितता बढ़ रही है। औसत वर्षा दिवस कम होने के कारण रन-आफ बढ़ रहा है। भूजल की प्राकृतिक बहाली (natural restoration of groundwater) के लिये कम समय मिल पा रहा है। समय कम मिलने के कारण अनेक इलाकों में भूजल की कुदरती बहाली घट रही है। उसकी माकूल बहाली नहीं होने के कारण नदी में प्राकृतिक डिस्चार्ज में कमी आ रही है। उसकी अवधि भी घट रही है। प्राकृतिक डिस्चार्ज के कम होने के कारण प्रभावित इलाकों में गर्मी आते-आते अनेक छोटी-छोटी नदियाँ सूख रही हैं।

मिट्टी का कटाव और नदियों के सूखने का संबंध (The relationship between soil erosion and the drying up of rivers) | भूमि कटाव क्या है?

तीसरा प्राकृतिक कारण मिट्टी का कटाव है। विदित है कि मिट्टी का कटाव (Soil erosion मृदा अपरदन) प्राकृतिक प्रक्रिया है। उसे पूरी तरह समाप्त नहीं किया जा सकता। वैज्ञानिकों का मानना है कि कछार की उत्पादकता बढ़ाने के लिये वह आवश्यक भी है।

कैचमेंट के वानस्पतिक आवरण में कमी आने के कारण मिट्टी का कटाव बढ़ रहा है और मिट्टी की परतों की मोटाई घट रही है। मोटाई कम होने के कारण उनकी भूजल संचय क्षमता घट रही है। भूजल संचय क्षमता घटने के कारण उनका योगदान घट रहा है। योगदान के घटने से नदी का प्रवाह कम हो रहा है और अवधि घट रही है। नदियों के सूखने की सम्भावनाएँ बढ़ रही हैं।

नदियों के सूखने का सर्वाधिक महत्वपूर्ण कारण है मानवीय हस्तक्षेप (Human intervention is the most important reason for the drying up of rivers.)

नदियों के सूखने का सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण कारण नदी कछार में भूजल का लगातार बढ़ता दोहन है। उसके प्रभाव से नदी कछार के भूजल स्तर में गिरावट आती है। भूजल का स्तर तेजी से नीचे उतरने लगता है। उसके नदी तल के नीचे उतरने से नदी को पानी मिलना समाप्त हो जाता है और नदी सूख जाती है। यह तीन अलग-अलग परिस्थितियों के कारण होता है। पहली परिस्थिति में कछार में भूजल का दोहन नगण्य है।

भूजल के दोहन के नगण्य होने के कारण भूजल का प्रवाह नदी की ओर अर्थात निचले इलाके की ओर है। नदी को पानी मिल रहा है। नदी में भरपूर प्रवाह है। दूसरी परिस्थिति में कछार गहरे नलकूप खुद गए हैं। उनके द्वारा भूजल को पम्प किया जा रहा है। पानी पम्प किये जाने का भूजल प्रवाह पर असर पड़ा है। इस स्थिति में भूजल की कुछ मात्रा नलकूप को और कुछ मात्रा नदी को मिल रही है।

पानी के विभाजन के कारण नदी का प्रवाह समानुपातिक रूप से प्रभावित हुआ है। तीसरी स्थिति में नदी के करीब नलकूपों द्वारा पानी पम्प किया जा रहा है। नलकूपों के नदी के करीब स्थित होने के कारण उनको पानी की पूर्ति कछार तथा नदी अर्थात दोनों स्रोतों से हो रही है। नदी से पानी की सीधी आपूर्ति के कारण नदी का प्रभाव गम्भीर रूप से प्रभावित हो रहा है। अर्थात प्रवाह घट रहा है।

देश की अनेक नदियों से विभिन्न उपयोगों के लिये पानी पम्प किया जाता है। कई बार नदियों से नहरें निकाल कर बसाहटों की पेयजल आपूर्ति तथा सिंचाई की जाती है। नदी से पानी पम्प करने या नहरों से पानी उठाने के कारण भी नदी के प्रवाह में कमी हो जाती है। यदि इस कमी में भूजल के अति दोहन का कुप्रभाव जुड़ जाता है तो प्रवाह और भी कम हो जाता है। नदियाँ सूखने लगती हैं।

बाँधों के बनने के कारण भी सूख रही हैं नदियां?

तीसरा महत्वपूर्ण कारण है नदी मार्ग पर बाँधों का बनना (construction of dams on river course)। उल्लेखनीय है कि बाँधों के बनने के कारण नदी का मूल प्रवाह न केवल खण्डित होता है वरन नदी के निचले मार्ग में घट भी जाता है। यदि घटते प्रवाह में भूजल दोहन का कुप्रभाव जुड़ जाता है तो प्रवाह और भी कम हो जाता है। उसके असर से कभी-कभी नदियाँ सूख भी जाती हैं।

नदी में घटते प्रवाह और बढ़ते प्रदूषण के असर को मानव शरीर के उदाहरण से आसानी से समझा जा सकता है।

जैसे पहले तो मानव शरीर में लगातार खून कम हो और घटते खून में खूब सारा जहर मिलाया जाये और उसकी हृदय तक पहुँचने वाली व्यवस्था को पंगु बनाया जाये तो मृत्यु को रोकना लगभग असम्भव हो जाता है। यही नदी के साथ हो रहा है। यही नदियों के सूखने के कारण हैं। यही नदी तंत्र की समस्या है।

कृष्ण गोपाल ‘व्यास’

आप घुमंतू चरवाहों के बारे में क्या जानते हैं?

general knowledge in hindi

Know About Nomadic Shepherds in Hindi | घुमंतू चरवाहों के बारे में जानें

घुमंतू की परिभाषा | घुमंतू किसे कहते हैं | definition of nomad in Hindi

घुमंतू ऐसे लोग होते हैं जो किसी एक जगह टिक कर नहीं रहते बल्कि रोजी-रोटी की जुगाड़ में यहाँ से वहाँ घूमते रहते हैं। भारत के कई हिस्सों में हम घुमंतू चरवाहों को अपने जानवरों के साथ आते-जाते देख सकते हैं। चरवाहों की किसी टोली के पास भेड़-बकरियों का रेवड़ या झुंड होता है तो किसी अन्य टोली के पास ऊँट या अन्य मवेशी रहते हैं।

क्या इन घुमंतू चरवाहों को देखकर आपने कभी यह सोचा है कि वे कहाँ से आए हैं और कहाँ जा रहे हैं?

क्या आप जानते हैं कि ये घुमंतू चरवाहे रहते कैसे हैं, उनकी आमदनी का साधन क्या है और इन घुमंतू चरवाहों का इतिहास क्या है?

इतिहास की पुस्तकों में इन चरवाहों को विरले ही जगह मिल पाती है।

भारत में कितनी तरह के घुमंतू चरवाहे हैं? | How many types of nomadic shepherds are there in India?

भारत में दो तरह के घुमंतू चरवाहे हैं। गूजर चरवाहे और गैर-गूजर चरवाहे। भारत में इनकी आबादी कुल आबादी का छह प्रतिशत तक थी। इधर ज्यादा उल्लेख नहीं मिलता।

बहरहाल भारत में लगभग 200 जातियां मवेशी पालने और चराने का काम करती हैं। ज्यादातर गूजर गाय पालते हैं और उनकी नस्ल सुधारने का काम भी करते हैं।

गूजर चरवाहों की जीवन पद्धति

इनकी जीवन पद्धति (lifestyle of gujjar herders) हजार साल पुरानी बताई जाती है लेकिन केरल एवं उत्तर-पूर्वी राज्यों के चरवाहों की जीवन पद्धति कुछ अलग है, संभवत: इनका प्राकृतिक परिवेश कुछ अलग तरह का है इसीलिये।

गूजरों को पशुपालन में दक्षता हासिल है और माना जाता है कि संसार भर में इस दक्षता में भारत प्रसिद्ध है।

landscape nature people countryside
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इनमें से कई गूजर ऊंट पालते हैं जैसे राजस्थान और गुजरात के गूजर। हिमालय के क्षेत्र में गूजर लोग भेड़, बकरी, भैंस और गाय पालते हैं कुछ गूजर एक ही तरह के पशु पालते हैं तो कुछ मिले-जुले पशुओं को पालते हैं। कुछ गड़रिये पशुपालन के साथ-साथ बुनाई, कढ़ाई का काम भी करते हैं।

घुमंतू होने के कारण इनके पशु प्राकृतिक चारे पर ही पलते हैं। जहां जाते हैं वहीं दूध, घी, शहद, ऊन आदि के द्वारा वहां बसे लोगों की सेवा करते हैं और बदले में अपनी जरूरत भी पूरी कर लेते हैं।

घुमंतू गूजरों की जीवन शैली पर पर्यावरण का असर (The impact of the environment on the lifestyle of the nomadic Gujars)

सीमांत क्षेत्र,  सूखे क्षेत्र अथवा अधसूखे क्षेत्रों का पर्यावरण भिन्न होता है। इसका असर घुमंतू गूजरों की जीवन शैली पर भी पड़ता है। विकास योजनाओं में इनके लिये क्या-क्या प्रावधान हैं यह पूरी तरह जानना अभी बाकी है।

पर्यावरण असंतुलन जिम्मेदार कौन ?

Climate change Environment Nature

पर्यावरण असंतुलन : कारण और समाधान

आज के युग में बढ़ते प्राकृतिक असंतुलन के क्या कारण हैं?

आवश्यकताएं तथा उपभोक्तावृत्ति | needs and consumerism

पर्यावरण के असंतुलन के दो प्रमुख कारण (Two main causes of environmental imbalance) हैं। एक है बढ़ती जनसंख्या और दूसरा बढ़ती मानवीय आवश्यकताएं तथा उपभोक्तावृत्ति। इन दोनों का असर प्राकृतिक संसाधनों पर पड़ता है और उनकी वहनीय क्षमता लगातार कम हो रही है। पेड़ों के कटने, भूमि के खनन, जल के दुरूपयोग और वायुमंडल के प्रदूषण (pollution of the atmosphere) ने पर्यावरण को गभीर खतरा पैदा किया है, इससे प्राकृतिक आपदाएं भी बढ़ी हैं।

पर्यावरण असंतुलन कारण एवं प्रभाव | environmental imbalance cause and effect in Hindi

दुनिया में पर्यावरण को लेकर चेतना में वृद्धि तो हो रही है परन्तु वास्तविक धरातल पर उसकी परिणति होती दिखाई नहीं दे रही है। चारों ओर पर्यावरण सुरक्षा के नाम पर लीपा-पोती हो रही है। पर्यावरण आज एक चर्चित और महत्वपूर्ण विषय है जिस पर पिछले दो-तीन दशकों से काफी बातें हो रहीं हैं। हमारे देश और दुनियाभर में पर्यावरण के असंतुलन और उससे व्यक्ति समाज और राष्ट्र के जीवन पर पड़ने वाले प्रभावों की चर्चा भी बहुत हो रही है और काफी चिंता भी व्यक्त की जा रही है लेकिन पर्यावरण असंतुलन अथवा बिगाड़ को कम करने की कोशिशें उतनी प्रभावपूर्ण नहीं हैं, जितनी अपेक्षित और आवश्यक हैं।

काफी बातें हो चुकी हैं पर्यावरण के पक्ष में

पर्यावरण के पक्ष में काफी बातें कहीं जा चुकी हैं। मैं इसके बिगाड़ से बढ़ रही प्राकृतिक आपदाओं के कारण जन-धन की हानि (Loss of public and money due to natural calamities) के लगातार बढ़ते आंकड़ों पर आपका ध्यान दिलाना चाहूंगा ताकि आप अनुभव कर सकें कि पर्यावरण असंतुलन तथा प्राकृतिक प्रकोपों की कितनी कीमत भारत तथा अन्य देशों को चुकानी पड़ रही है।

पर्यावरण असंतुलन के प्रमुख कारण क्या हैं?

पर्यावरण के असंतुलन के दो प्रमुख कारण हैं। एक है बढ़ती जनसंख्या और दूसरा बढ़ती मानवीय आवश्यकताएं तथा उपभोक्तावृत्ति। इन दोनों का असर प्राकृतिक संसाधनों पर पड़ता है और उनकी वहनीय क्षमता लगातार कम हो रही है। पेड़ों के कटने, भूमि के खनन, जल के दुरूपयोग और वायु मंडल के प्रदूषण ने पर्यावरण को गभीर खतरा पैदा किया है। इससे प्राकृतिक आपदाएं भी बढ़ी हैं।

पेड़ों को काटने के दुष्प्रभाव | पेड़ की कटाई के नुकसान | पेड़ काटने से क्या हानि होती है?

पेड़ों के कटने से धरती नंगी हो रही है और उसकी मिट्टी को बांधे रखने, वर्षा की तीक्ष्ण बूदों में मिट्टी को बचाने, हवा को शुद्ध करने और वर्षा जल को भूमि में रिसाने की शक्ति लगातार क्षीण हो रही है। इसी का परिणाम है कि भूक्षरण, भूस्खलन (landslide) और भूमि का कटाव बढ़ रहा है जिससे मिट्टी अनियंत्रित होकर बह रही है। इससे पहाड़ों ओर ऊँचाई वाले इलाकों की उर्वरता समाप्त् हो रही है तथा मैदानों में यह मिट्टी पा नी का घनत्व बढ़ाकर और नदी तल को ऊपर उठाकर बाढ़ की विभीषिका को बढ़ा रही है।

खनन की वजह से भी मिट्टी का बहाव तेजी से बढ़ रहा है। उद्योगों और उन्नत कृषि ने पानी की खपत को बेतहाशा बढ़ाया है। पानी की बढ़ती जरूरत भूजल के स्तर को लगातार कम कर रही है, वहीं उद्योगों के विषैले घोलों तथा गंदी नालियों के निकास ने नदियों को विकृत करके रख दिया है और उनकी शुद्धिकरण की आत्मशक्ति समाप्त् हो गई है। कारखानों और वाहनों के गंदे धुएं और ग्रीन हाउस गैसों (green house gases) ने वायु मंडल को प्रदूषित कर दिया है। यह स्थिति जिस मात्रा में बिगड़ेगी, पृथ्वी पर प्राणियों का जीवन उसी मात्रा में दूभर होता चला जाएगा।

प्राकृतिक आपदाओं से मरते हैं गरीब

प्राकृतिक आपदा से हो रही जन-धन की हानि के आंकड़े चौंकाने वाले ही नहीं बल्कि गंभीर चिंता का विषय भी हैं।

उल्लेखनीय तथ्य यह रहा कि प्राकृतिक आपदाओं में मरने वाले लोगों में बड़ी संख्या उन निर्बल-निर्धन लोगों की रही, जो अपने लिए सुरक्षित आवास नहीं बना सकते थे अथवा जो स्वयं को सुरक्षित स्थान उपलब्ध नहीं करा सकते थे। फिर वे चाहे समुद्र तटीय मछुआरे हों या वनों-पहाड़ों में रहने वाले गरीब लोग।

तथाकथित विकास बन रहा विनाश की वजह

बीसवीं सदी का अंतिम दशक भूकम्पों का त्रासदी का दशक (decade of earthquakes) भी रहा है। दुनियां में अनेक भागों में भूकम्प के झटकों ने जन-जीवन में भरी तबाही मचाई है। भारत में हिमालय से सह्याद्रि और दण्डकारण्य तथा पूर्वी और पश्चिमी घाटों तक में मिट्टी का कटाव-बहाव तेज होने और उनसे उद्गमित होने वाली नदियों की बौखलाहट बड़ी तेजी से बढ़ी है। हम देख रहे हैं कि हिमालय क्षेत्र में इसके लिए हमारी विकास की अवधारणाएं और क्रियाकलाप भी दोषी हैं। विकास के नाम पर नाजुक क्षेत्रों में भी मोटर मार्ग तथा अन्य निर्माण कार्य किए गए जिनमें भारी विस्फोटकों का उपयोग किया गया। मिट्टी बेतरतीब ढंग से काटी गई और जंगलों का बेतहाशा कटाव किया गया। इस कारण बड़ी संख्या में नए-नए भूस्खलन उभरे ओर नदियों की बौखलाहट बढ़ी। इनमें लाखों टन मिट्टी बह रही है, जिसका दुष्प्रभाव न केवल हिमालयवासियों पर पड़ रहा है, बल्कि मैदानी प्रदेश भी बाढ़ की विभीषिका से बुरी तरह संत्रस्त हैं।

पर्यावरण संतुलन के उपाय (environmental balance measures)

यह सही है कि प्राकृतिक आपदाओं को हम पूरी तरह रोकने में समर्थ नहीं हैं किंतु उन्हें उत्तेजित करने एवं बढ़ाने में निश्चित ही हमारी भागीदारी रही है। इसके लिए हमें तात्कालिक लाभ वाले कार्यक्रमों का मोह छोड़ना होगा। क्षेत्रों में स्थाई विकास की योजनाओं को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। पर्यावरण के विचार केन्द्र में उस आदमी को प्रतिष्ठापित किया जाना चाहिए जिसके चारों और यह घटित हो रहा है और जो बड़ी सीमा तक इसका कारक एवं परिणामभोक्ता दोनों हैं। उस क्षेत्र की धरती, पेड़, वनस्पति, जल एवं जानवरों के साथ उनके अंर्तसंबंधों को विश्लेषित करके ही कार्यम बनाए जाने चाहिए। उनको इसके साथ प्रमुखता से जोड़ जाना चाहिए।

यह भी जरूरी है कि ऐसे नाजुक क्षेत्रों में आपदाओं के बारे में जानकारी (Information about disasters in vulnerable areas) हासिल करने के लिए उपग्रह के आंकड़ों का अंतर्राष्ट्रीय नेटवर्क आपदाओं की सूचना (डिजास्टर फोरकास्ट) के लिए तैयार किया जाए। इन सूचनाओं का बिना रोक-टोक आदान-प्रदान किया जाना चाहिए।

प्राकृतिक आपदाओं से संबंधित संवेदनशील क्षेत्रों को चिन्हित किया जाना चाहिए। ऐसे क्षेत्रों की मॉनिटिरिंग एवं निगाह रखने के लिए स्थाई व्यवस्था हो। साथ ही बाढ़ एवं भूकम्प से प्रभावित क्षेत्रों का विकास कार्यों को शुरू करने से पूर्व विस्तृत अध्ययन किया जाना चाहिए।

चंडीप्रसाद भट्ट

Topics : पर्यावरण असंतुलन पर निबंध, Essay on Environmental Imbalance.