करते हो मोदी से प्यार, तो तिरंगे से क्यों इंकार?

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डोनाल्ड ट्रंप से प्रेरित है मोदी का तिरंगे से प्यार

आप उस कालखंड की ख़बरें पढ़िये, जब डोनाल्ड ट्रंप सत्ता में थे। डोनाल्ड ट्रंप की राजनीति का ब्रह्मास्त्र था, अमेरिकी ध्वज। आर्मी वेटरन से लेकर स्कूली बच्चों तक, अमेरिकी ध्वज वाहक। अमेरिकी वैभव, राष्ट्राभिमान को कुछ ऐसी चालाकी से ट्रंप के रणनीतिकारों ने चिपकाया, उसे ना करने का मतलब देश के प्रति आपकी निष्ठा संदेहास्पद। नये-नवेले अनिवासी, जो अमेरिका में रहने के आकांक्षी थे, उनकी विवशता थी कि अधिक से अधिक अमेरिकी ध्वज के इस्तेमाल को दिखायें। टोपी में, टीशर्ट में, अपने घरों की छत-बाल्कनी में, या फिर कार में, यहां तक कि शरीर पर उकेरे टैटू में, अमेरिकी ध्वज दिखना चाहिए। रोज़गार नहीं है, कारोबार चौपट है, मगर अमेरिकी ध्वज दिखाओ। अमेरिकी राष्ट्रवाद जपो, और बोलो कि ट्रंप की नीतियां सही हैं।

ट्रंप शासन के दसेक साल पहले 17 सितंबर 2008 को यमन की राजधानी सना में अमेरिकी दूतावास पर हमले हुए। अमेरिकी ध्वज को गोलियों से हमलावरों ने छलनी कर दी। यमन में दूतावास बचाने के क्रम में अमेरिकी मरीन ने जो गोलाबारी की उसमें 18 मौतें हुईं, 16 लोग बुरी तरह से घायल हुए। कोर्ट मार्शल हुआ, मगर अमेरिकी ध्वज के अपमान (disgrace of the american flag) के हवाले से वो सैनिक कमांडर बचा लिये गये, जिन्होंने आम नागरिकों, औरतों-बच्चों पर फायरिंग का आदेश दिया था।

यह ट्रंप शासन काल से पहले और बाद की बात है जब यमन की राजधानी सना में 13 सितंबर 2012, 10 नवंबर 2021 को अमेरिकी दूतावास को घेरकर तोड़फोड़ व हिंसा हुई थी।

हजरत मोहम्मद पर फिल्म की वजह से हुआ अमेरिकी ध्वज का अपमान

तीन तारीख़ों को ग़ौर से देखें, तो हमलावरों ने जान-माल की क्षति के साथ-साथ अमेरिकी ध्वज का अपमान भी किया था। वजह, हज़रत मोहम्मद पर फ़िल्म थी। (American flag was insulted because of the film on Hazrat Mohammad)

मघ्यपूर्व में अमेरिकी ध्वज का अपमान होता, और उसकी राजनीति रिपब्लिकन पार्टी अपने देश में करती। ट्रंप से करते हो प्यार, तो झंडे से क्यों इंकार? यहां तक राजनीति का स्तर पहुंचा दिया था रिपब्लिकन पार्टी ने।

डोनाल्ड ट्रंप ने सेना से लेकर सिविलियन तक ध्वजारोहण की जो राजनीति छेड़ रखी थी, उसका सकारात्मक परिणाम दोबारा से सत्ता में वापसी के माइल हो नहीं सका।

क्या भारत में भी ट्रंप की राजनीति कारगर होगी?

मगर, ज़रूरी नहीं कि भारत में भी ट्रंप की राजनीति जैसा अवसान देखने को मिले। अमेरिकी वोटर के तेवर, वहां की चुनावी पारदर्शिता, अदालती आज़ादी से भारत की तुलना नहीं की जा सकती।

आज़ादी के अमृत काल में 20 करोड़ घरों पर तिरंगा फहराने का लक्ष्य रखा गया है। 13 से 15 अगस्त के बीच हर घर तिरंगा कार्यक्रम के तहत यह मान लिया गया है कि इससे मोदी समर्थक निर्धारित हो जाएंगे।

शहर, गांव, मलीन बस्तियों के 20 करोड़ घरों पर तिरंगे का तसव्वुर कर लीजिए, मगर उसका मतलब यह नहीं होता कि ये सारे आपके वोट बैंक हैं। कुछ भय से, तो कुछ प्रीत से झंडे लहराने वाले मिलेंगे। सभी दल-जमात के लोग भी इनमें शामिल होंगे। वो भी होंगे, जो डूबते सूरज से मुंह मोड़ते हैं, और शाहे वक़्त को सलाम करते हैं।

ध्वजारोहण के साथ-साथ ध्वज के अपमान की ख़बरें भी तेज़ी से वायरल हो रही हैं। लेकिन ये ख़बरें अलग-अलग चश्मे के साथ देखी-दिखाई जा रही हैं। बिहार के औराई में अशोक चक्र की जगह चांद-सितारे प्रिंट किये तिरंगे को फहराये जाने को लेकर नीतीश-तेजस्वी सरकार पर हमले तेज़ हो गये हैं। औराई पुलिस ने झंडे को उतरवाया, और प्राथमिकी दर्ज़ की है। कानपुर में किसी धार्मिक कार्यक्रम के दौरान तिरंगे से छेड़छाड़ कर उसमें भारत का नक्शा दिखाने के विरूद्ध बजरंग दल ने प्राथमिकी दर्ज़ कराई। इस कांड के हवाले से यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने धमकाया है कि जिसने भी तिरंगे का अपमान किया, उसकी ख़ैर नहीं।

इसके बरक्स यूपी कांग्रेस, उन भाजपा नेताओं की तस्वीरें ढूंढ-ढूंढ कर वायरल कर रही है, जो उल्टे-पुल्टे तरीक़े से तिरंगे फहरा रहे हैं। 11 अगस्त 2022 को यूपी कांग्रेस के ट्विटर अकाउंट से सैदपुर से भाजपा के सांसद विनोद कुमार सोनकर की तस्वीर वायरल हुई है, जिसमें उन्होंने अपने साथियों के साथ राष्ट्रध्वज उल्टा पकड़ रखा है। मगर, इसके लिए प्रदेश शासन क्या कार्रवाई करता है? यह सवाल भी महत्वपूर्ण है।

राष्ट्रध्वज फहराने की तमीज़ भी होनी चाहिए?

आप बिल्कुल मनाइये तीन दिवसीय तिरंगा दिवस, मगर क्या उस वास्ते लोगों को राष्ट्रध्वज फहराने की तमीज़ नहीं होनी चाहिए? राष्ट्रध्वज के सम्मान को लेकर बने द प्रिवेंशन ऑफ इंसल्ट टू नेशनल ऑनर एक्ट-1970′ (‘The Prevention of Insults to National Honour Act-1970) से कितने लोग वाकिफ हैं? नेहरू काल में जो हुआ सो हुआ, पिछले आठ वर्षों में मंत्री-सांसदों ने तिरंगे का कितनी बार जाने-अनजाने अपमान किया, विस्तार से बताएं, तो उसकी सूची काफी लंबी हो जाएगी। ऐसे महानुभावों में सदी के महानायक अमिताभ बच्चन, शाहरूख खान, सचिन तेंदुलकर, सानिया मिर्ज़ा, तिरंगे की प्रिंट वाली साड़ी धारण करने वाली मंदिरा बेदी तक के नाम शामिल हैं।

5 अगस्त 2022 को हिमाचल सरकार ने केंद्र से शिकायत की, कि साढ़े सत्रह लाख तिरंगे की सप्लाई होनी थी, उसके बदले 10 लाख तिरंगे आये, उनमें भी केसरिया के बदले लाल रंग और अंडाकार अशोक चक्र छपे हुए। राष्ट्रध्वज के कपड़े आड़े-तिरछे कटे हुए। कला-संस्कृति विभाग के सचिव ने केंद्र को भेजे पत्र में लिखा कि 25 रुपये के ये झंडे कोई दो रुपये में भी ख़रीदने को तैयार नहीं है। अधिकांश तिरंगे सूरत में प्रिंट हुए हैं। साउथ गुजरात प्रोसेसिंग हाउस यूनिट एसोसिएशन के अध्यक्ष जीतू वाखड़िया ने 6 जुलाई 2022 को बयान दिया था कि केंद्र सरकार 72 करोड़ तिरंगे सूरत से प्रिंट कराना चाह रही थी, जिसमें से 10 करोड़ झंडे सूरत टेक्सटाइल इंडस्ट्री वालों ने तैयार कर भेज दिये। हिमाचल में जो ख़राब प्रिंट वाले आड़े-तिरछे कटे झंडे भेजे गये, उससे आप दूसरे प्रांतों में भी तिरंगा सप्लाई में हुई गड़बड़ियों का तसव्वुर कर सकते हैं।

कब बनी राष्ट्रध्वज आचार संहिता?

आज से 20 साल पहले 2002 में केंद्रीय गृह मंत्रालय ने ‘राष्ट्रध्वज आचार संहिता‘ (भारतीय झंडा संहिता, 2002) तय किया था। 25 पेज के उस दस्तावेज़ को कोई ध्यान से पढ़े, तो उसका उल्लंघन साफ़ नज़र आयेगा। विभिन्न आकार के नौ तिरंगे के बारे में विस्तार से उस दस्तावेज़ में लिखा गया है। अधिकतम 6300 ग— 4200 मिलीमीटर (पौने तीस फीट ग —पौने चौदह फीट) और सबसे छोटा तिरंगा 150 ग —100 एमएम (5.90 इंच —ग 3.93 इंच)। आठ वर्षों में क्या सचमुच इसी साइज़ के झंडे बनने लगे? अब तो जंबो साइज वाले तिरंगों में प्रतिस्पर्धा है। इसके लिए ‘राष्ट्रध्वज आचार संहिता-2002’ में संशोधन कहीं नज़र नहीं आया।

पॉलिएस्टर वाले राष्ट्रध्वज का विरोध क्यों हुआ?

‘राष्ट्रध्वज आचार संहिता-2002’ में बहुत साफ बताया गया था कि तिरंगा बुल, कॉटन, सिल्क अथवा खादी के हों, और हस्तकरघा पर बुने गये हों। मोदी सरकार ने आचार संहिता में बदलाव कर 30 दिसंबर 2021 को आदेश जारी किया कि मशीन मेड पॉलिएस्टर धागे से तिरंगे बनाये जाएंगे। 20 जुलाई 2022 को एक बार फिर केंद्र से आदेश हुआ कि तिरंगा अब दिन-रात फहराया जा सकेगा।

पॉलिएस्टर वाले राष्ट्रध्वज का विरोध (protest against the polyester national flag) सबसे पहले कर्नाटक खादी ग्रामोद्योग संयुक्त संघ ने किया, जिसे चुप करा दिया गया। सरकार की तरफ़ से यह भी तर्क दिया गया कि कताई वाली सूती खादी झंडे की क़ीमत 2832 रुपये है। खादी भंडार में तिरंगे की यह क़ीमत सचमुच चकित कर देने वाली थी। सूती तिरंगे की अनियंत्रित क़ीमत ने समूचे राष्ट्र को पॉलिएस्टर मेड कृत्रिम झंडे की तरफ मोड़ दिया, यह दास्तां सचमुच दुख देने वाली है।

खादी त्यागिये, पॉलिएस्टर के झंडे पोस्ट ऑफिस में बेचिए। रेल व केंद्रीय कर्मचारी झंडे की मनमानी क़ीमत वसूली से गु़स्से में हैं, मगर परवाह किसे है? कॉरपोरेट के लिए तिरंगा सप्ताह, मालामाल वीकली में बदल दिया। मस्त रहिए।

कई बार मन में सवाल उठता है कि राष्ट्रवाद को प्रज्ज्वलित करने में फ्लैग फाउंडेशन ऑफ इंडिया के चेयरमैन नवीन जिंदल ने क्या सही भूमिका अदा की थी? रायगढ़ की फैक्ट्री में झंडा फहराने से रोके जाने के विरोध में नवीन जिंदल सर्वोच्च न्यायालय तक गये, और 23 जनवरी 2004 को यह आदेश हुआ कि देश का आम आदमी राष्ट्रीय झंडा फ हरा सकता है। इस घटना के 18 साल से अधिक हो चुके। एक बार इसकी समीक्षा होनी चाहिए कि इस देश में तिरंगे का सम्मान और अपमान, सदुपयोग और दुरूपयोग कितना हुआ है?

अब राज्यों में दावेदारी शुरू है कि सबसे ऊंचा राष्ट्रध्वज उसके पास है, चुनांचे टूरिस्ट यहां आयें। 23 जनवरी 2016 को रांची को 293 फीट तिरंगा फहराने का गौरव प्राप्त हुआ है। तब इसे देश का सबसे बड़ा राष्ट्रध्वज बताया गया था। 2018 में बेलगावी (बेलगांव, कर्नाटक) में 361 फीट का तिरंगा फहराकर झारखंड की लकीर छोटी कर दी गई। इन्हें कौन समझाये कि अति सर्वत्र वर्जयेत।

2 जून 2016 को हैदराबाद के हुसैन सागर तट पर 88 मीटर (291 फीट) का तिरंगा लगा। दिल्ली में 207 फीट का राष्ट्रध्वज लहरा रहा है।

आप देश को बुनियादी समस्याओं से भटकाकर, तेरा झंडा-मेरा झंडा खेल रहे हैं। मगर यही झंडा संभाले नहीं संभल रहा है। दिल्ली में 207 फीट का तिरंगा 11 बार फट चुका है। हैदराबाद के हुसैन सागर तट पर 291 फीट का राष्ट्रध्वज तेज़ हवाओं की वजह से तीन बार फट चुका है। रांची में राष्ट्रध्वज का वही हाल हुआ। बेलगाम, रायपुर, लखनऊ, पुणे, गुवाहाटी, फरीदाबाद, विशालकाय तिरंगे लगा दिये, जो तूफानी मौसम में संभाले नहीं संभल रहे। मार्च 2017 में अटारी में 80 गुणा 120 फीट का तिरंगा गिरकर फट गया, उसे अमृतसर के एक टेंट वाले से सिलवाया और दोबारा से फहरा दिया। 14 अगस्त 2017 को बडोदरा में 67 मीटर का राष्ट्रध्वज धराशायी होकर फट गया। यह ध्वज तत्कालीन सीएम विजय रूपाणी को फहराना था। सोचिये, कितनी फजीहत हुई होगी?

आप इन फटे तिरंगों की मरम्मत करते हो, फिर फहराते हो। क्या यह अपमान नहीं है?

राष्ट्रध्वज के प्रति इतना ही समर्पण भाव था, तो चेन्नई के फोर्ट सेंट जार्ज में पड़े देश के सबसे पुराने राष्ट्रध्वज की मरम्मत के बारे में फैसला लेने में बरसों क्यों लगे?

पुष्परंजन

आजादी का अमृत महोत्सव : मध्य वर्ग में फासिज्म क्यों जनप्रिय है? | hastakshep | हस्तक्षेप

Modi’s love for the tricolor is inspired by Donald Trump

कांग्रेस की नई मीडिया टीम ने कैसे एक दिन में बाजी पलट दी !

jairam ramesh

कांग्रेस का मीडिया डिपार्टमेंट 8 साल से कर क्या रहा था?

कांग्रेस की मीडिया डिपार्टमेंट की नई टीम (New team of media department of Congress) ने एक दिन में बाजी पलट दी। अगर जयराम रमेश, पवन खेड़ा और सुप्रिया श्रीनेत्र नहीं आए होते तो राहुल गांधी का यह झूठा वीडियो भी उसी तरह स्थापित हो जाता जैसे आलू से सोना बनाने के झूठे वीडियो को भाजपा और मीडिया ने कर दिया था।

पिछले आठ साल से यह किसी के समझ में नहीं रहा था कि कांग्रेस का यह मीडिया डिपार्टमेंट क्या कर रहा है? राहुल गांधी के खिलाफ लगातार चरित्रहनन का कार्यक्रम चलता रहा और मीडिया डिपार्टमेंट के लोग अपनी राजनीति चमकाने और छवि बनाने में लगे रहे।

किसी भी पार्टी में मीडिया डिपार्टमेंट क्यों होता है?

हर सरकार में भी जनसम्पर्क विभाग होता है। क्या करता है वह? अपने मुख्यमंत्री और अपनी सरकार के कामों को सामने लाता है। अगर कोई उनकी छवि खराब कर रहा है तो उसको काउंटर करता है। सच को सामने लाता है। यही काम होता है ना! या जनसम्पर्क का डायरेक्ट खुद अपनी छवि चमकाने में लग जाता है। रोज टीवी पर आता है। प्रेस कान्फ्रेंसें करता है और अपने मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री को मजाक का विषय बनने देता है?

राजनीतिक दलों के मीडिया डिपार्टमेंट भी यही काम करते हैं। अपनी पार्टी और नेता की छवि बनाना।

भाजपा में कोई सोच सकता है कि वहां मीडिया डिपार्टमेंट का हेड प्रधानमंत्री मोदी, अमित शाह या जेपी नड्डा को किनारे करके केवल खुद अपनी खबरें चलवाता रहे? एक आदमी को रख ले जो चैनल-चैनल जाकर कहे कि बस हमारे बॉस की खबर चलाते रहो। राहुल, प्रियंका से हमें मतलब नहीं।

गजब की पार्टी है कांग्रेस। कभी-कभी तो लगता है यहां सदाव्रत खुलाहुआ है। किसी को किसी से मतलब नहीं। खाओ, पियो, साथ में बांध भी लो और खिसको! पिछले आठ साल से तो यही चल रहा था।

पार्टी विपक्ष में हो तो उसे ज्यादा आक्रामक होकर सत्ता पक्ष की कमियां सामने लाना चाहिए। अपनी पार्टी और नेता द्वारा जनता के हित में उठाई गई आवाज को बल देना चाहिए। मगर यहां तो मैं कितना ज्यादा से ज्यादा टीवी पर आ जाऊं। राज्यसभा मिल जाए। इससे आगे कोई सोच ही नहीं सका। चाहे इसके लिए मीडिया के साथ दुरभिसंधि भी करना पड़ी हो। कि हम तुम्हारे खिलाफ कुछ नहीं बोलेंगे। तुम चाहे जितना राहुल का चरित्र हनन करो। बस हमें टीवी पर दिखाते रहो।

आज क्या हुआ?

सारे एक से एक जहरीले एंकर, एंकरनियां, पत्रकार लाइन से खड़े होकर राहुल की जय-जयकार करने लगे। इसलिए सिर्फ इसलिए कि कांग्रेस की मीडिया डिपार्टमेंट की नई टीम (New team of media department of Congress) ने कहा कि हमारी जय-जयकार नहीं सच की जय-जयकार करो। तुम हमारी चापलूसी करके झूठ को नहीं दिखा सकते। भारत में कानून है, संविधान है और हम कांग्रेस हैं। जिसने अंग्रेजों के सामने कभी घुटने नहीं टेके। उस समय भी मीडिया का बड़ा हिस्सा कांग्रेस के खिलाफ था। मगर कांग्रेस अंग्रेजों के साथ उस मीडिया से भी लड़ी। आज की तरह कोई कांग्रेस का नेता ऐसा नहीं था जो मीडिया से कहता हो कि हमें नेता बना दो कांग्रेस और गांधी, नेहरू के खिलाफ जो लिखना हो लिखो। उन्हीं परिस्थितियों में नेहरू को नेशनल हेराल्ड निकालना पड़ा था। आजादी के आंदोलन की सही तस्वीर पेश करने के लिए। दूसरे अंग्रेजी अख़बार जो अंग्रेज समर्थक थे उनके झूठ का काउंटर करने के लिए।

यहां यह बताना जरूरी होगा कि उस समय हिन्दी और दूसरी भारतीय भाषाओं की पत्रकारिता स्वतंत्रता संग्राम के साथ थी। लेखक और पत्रकार खतरे उठाकर गांधी और नेहरू का साथ दे रहे थे। खुद भगत सिंह पत्र-पत्रिकाओं में लिखते थे और युवाओं से नेहरू का साथ देने की अपील करते थे।

यह सारा इतिहास जयराम रमेश को मालूम है। पढ़े-लिखे आदमी हैं। वैसे कांग्रेस में एक अलग तरह का माहौल बन गया है कि यहां पढ़े- लिखे का मजाक बनाया जाता है। खुद जयराम रमेश इसके शिकार रहे। उनका नाम आते ही कांग्रेस के कुछ नेता हंसने लगते थे। और व्यंग्य से कहते थे कि वे तो बहुत पढ़े-लिखे आदमी हैं।

अब उसी पढ़े-लिखे आदमी ने बताया कि किस तरह सच के लिए, अपने नेता के लिए लड़ा जाता है।

कल्पना कीजिए कि अगर जयराम रमेश और उनकी नई टीम नहीं आई होती और यह वायनाड वाली विडियो जिसे उदयपुर का बनाकर प्रसारित किया गया आ गई होती तो क्या होता? देश विदेश सब जगह राहुल के खिलाफ माहौल बन गया होता। राहुल और कांग्रेस के पुतले फूंके जा रहे होते। और मीडिया डिपार्टमेंट के लोग दफ्तर में बैठकर पत्रकारों से कह रहे होते कि राहुल ने गलत तो कहा है!

कांग्रेस के लोगों ने ही सबसे ज्यादा राहुल गांधी के खिलाफ विष वमन किया है।

भाजपा जब कुछ कहती है तो लोगों की समझ में आता है कि विरोधी पार्टी है। कहेगी ही। मगर जब खुद कांग्रेसी ही और वह भी राहुल गांधी के नजदीकी वाले ऐसी बातें करते हैं तो मीडिया और जनता के लिए उन पर अविश्वास करने का कोई कारण नहीं होता।

एक घटना बताते हैं।

मीडिया डिपार्टमेंट के एक बड़े पदाधिकारी से एक बड़ी एंकर मिलीं। पहले तो उसने राहुल गांधी को दस गालियां दीं। फिर बोलीं कि अगर आप कांग्रेस के अध्यक्ष बनें तो हम आपका समर्थन कर सकते हैं। पदाधिकारी जी खुश। खुशी छिपाए नहीं छिपी। कितना सम्मान है हमारा। राहुल गांधी का अपमान जो उस एंकरनी का मुख्य उद्देश्य था वह उन्हें नहीं दिखा। अपना सुनहरा भविष्य और टीवी का समर्थन दिखने लगा।

आज सभी एंकर और एंकरनियां, कांग्रेस दफ्तर से जाकर उन्हें बताने वाले और वालियां कि वहां राहुल गांधी के खिलाफ कितना माहौल है बढ़ -चढ़कर राहुल के एक विडियो, जिसमें वे सड़क पर एक घायल की मदद करते दिख रहे हैं, की तारीफों में लगे हैं।

यह मीडिया डिपार्टमेंट की नई टीम की धमक का परिणाम है। राहुल गांधी के इस काम में कुछ नया नहीं है। नंबर एक तो बहुत स्वाभाविक है। हर सामान्य आदमी, संवेदनशील इंसान यह करता है। इस हिंसक, क्रूर, नफरती, स्वार्थी बना दिए गए माहौल में भी। दूसरे राहुल और प्रियंका या जिसे यह परिवारवाद कहते हैं वे हमेशा से यह करते रहे हैं। जाने कितने प्रसंग हैं। खुद एक पत्रकार की चप्पल उठाए प्रियंका उसे अस्पताल पहुंचाने की व्यवस्था कर रही हैं, का विडियो भी थोड़ी से देर के लिए आया था। राहुल के भी सड़क पर घायल का मदद करने से लेकर आडवानी तक को सहारा देने के कई हैं।

खुद इन पत्रकारों की मदद के कई वाकये हैं। राहुल गांधी खुद कोरोना में थे। और किसी पत्रकार के परिवार को उस समय नहीं मिल रहे एक जीवनदायी इंजेक्शन की जरूरत थी तो राहुल के लिए आए इंजेक्शन को उठाकर प्रियंका ने वहां पहुंचा दिया। सब पत्रकार पहले भी जानते थे। कोरोना में सबसे ज्यादा मदद ली। मगर कहते नहीं थे।

और राहुल, प्रियंका क्या? परिवारवाद कहते हैं ना! तो परिवार में अगर अच्छाइयां होंगी तो बच्चों में क्यों नहीं आएंगी?

अब सही ट्रैक पर है कांगेस मीडिया की नई टीम

राहुल के पिता राजीव गांधी ने अपने परिवार के घोर विरोधी अटल बिहारी वाजपेयी को इलाज के लिए अमेरिका पहुंचाया ही था और कभी जिक्र तक नहीं किया। लेकिन खुद राजीव गांधी की दर्दनाक हत्या के बाद वाजपेयी खुद पर काबू नहीं रख पाए और बोले कि आज मेरी जो जिन्दगी है वह राजीव गांधी की ही देन है।

कहां तक बताएं!

इंदिरा गांधी के घोर विरोधी जयप्रकाश नारायण (Jaiprakash Narayan, a staunch opponent of Indira Gandhi) और इंदिरा के पिता के व्यक्तिगत विरोधी डॉ लोहिया ने कहा था कि अगर कुछ हो जाए, जरूरत पड़े तो हमारी सबसे अच्छी देखभाल इन्दिरा ही कर सकती है।

और बताएं? इससे पहले की भी पीढ़ी का? नेहरू का!

पं. नेहरू ने कैसे उन सरदार पटेल को, जिन्हें आज तक उनके प्रतिस्पर्धी के तौर पर पेश किया जाता है परिवार की सहायता की। लड़की मनिबेन पटेल और बेटे दहयाभाई पटेल दोनों को सांसद बनाया।

यह सब मानवीय गुण हैं। सारी राजनीति, आदर्श, सिद्धांत इसी के लिए हैं। मगर इसके लिए प्रेम, सत्य, सद्भाव का माहौल बनाना पड़ता है। लोकतंत्र में यह काम नेता करते हैं। राहुल गांधी कर रहे हैं। वे तो इतने असंपृक्त हैं कि उन पर इस प्रंशसा या निंदा का कोई प्रभाव ही नहीं पड़ता है।

राहुल कर्मण्येवाधिकारस्ते के अनुपम उदाहरण हैं। मगर ऐसे में ही उनके आसपास के लोगों की जिम्मेदारी ज्यादा बढ़ जाती है कि वे देखें कि इतने निष्काम आदमी की छवि कहीं गलत तो नहीं बन रही है। मीडिया की नई टीम अब सही ट्रैक पर है। इससे राहुल गांधी की बाधाएं कम होंगी। और काम करने की गति बढ़ेगी।

शकील अख्तर

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

Web title : How the new media team of Congress turned the tide in a day!

सबकी खबर ले, सबकी खबर दे वाला जनसत्ता अपने ही पत्रकार की मृत्यु की खबर न दे पाया

press freedom

प्रताप सिंह जी ने व्हाट्सएप पर सतीश पेडणेकर के निधन की खबर (news of the death of Satish Pednekar) दी।

हम 1980 से 2016 तक लगातार अखबार का संस्करण निकलते रहे हैं। यह बहुत चुनौतीपूर्ण काम है और इसकी जवाबदेही बड़ी होती है। अखबार कितना ही अच्छा निकले, उसकी तारीफ हो या न हो, कहीं कोई चूक हो जाती है तो खाल उधेड़ दी जाती है। यह बहैसियत एक संपादक हर खबर पर स्टैंड लेने का मामला जितना है, पूरी टीम को साथ लेकर चलने का मामला उससे बड़ा है।

अखबार में बतौर संपादक जिनका नाम छपता है, संपादकीय लिखने और नीतियां तय करने तक उनकी भूमिका सीमित हो जाती है। सारा खेल डेस्क के जिम्मे होता है।

सतीश पेडणेकर जी जनसत्ता को डेस्क से आकार और तेवर देने वाले पत्रकार थे। प्रताप जी की सूचना के बाद कहीं कोई चर्चा नहीं देखी। अब अमित जी का यह पोस्ट।

हमारी बात अलग है कि हर मुद्दे, हर खबर पर मैनेजमेंट से हमारा सीधा टकराव हो जाता था और हम जो सही समझते थे, वही करते थे। मालिक मैनेजर किसी की नहीं सुनते थे। सतीश जी निर्विवाद व्यक्ति थे।

सतीश पेडणेकर जैसे महत्वपूर्ण व्यक्ति के निधन की खबर जनसत्ता में न होना, जिन्होंने जनसत्ता को जनसत्ता बनाया, बताता हैं कि पत्रकारिता का किस हद तक पतन हुआ और इसमें काम करने वाले लोग कितने संवेदनाहीन हो गए हैं।

हमने प्रभाष जी और ओम थानवी के खिलाफ, उनकी नीतियों के खिलाफ हंस और समयांतर समेत समाचार पोर्टल पर तब लिखा, जब वे सर्वेसर्वा थे। देश भर में सामाजिक आंदोलन में शामिल होते रहे। लेकिन तब जनसत्ता में हम सब की स्वतंत्रता और स्वायत्तता का माहौल इतना जबर्दस्त था कि न प्रभाष जी और न थानवी जी ने हमें कभी रोका, टोका। हम लोगों में बरसों तक बोलचाल बन्द रहती थी। सभी अपने स्टैंड से टस से मस नहीं होते थे लेकिन अखबार निकलने में हमेशा एक टीम बने रहे। ऐसे अखबार में अपने पुराने साथियों के प्रतिन ऐसे अमानुषिक बर्ताव से स्तंभित हूं।

चौथाई सदी हमने आखिर इस अखबार में खफा दिए। सतीश जी के शुरू से साथी रहे अमित जी का लिखा दरअसल हिंदी पत्रकारिता की शोक वृत्तांत है। लीजिए, पढ़ लीजिए।

अफसोस कि ‘जनसत्ता’ में तीन दशक खपाने वाले पत्रकार के निधन की खबर तक नहीं अमित प्रकाश सिंह

हिंदी दैनिक “जनसत्ता” वाकई दुर्दिन में है। इस दैनिक में नींव से इमारत तक बनाने वाले पत्रकारों के निधन की खबर भी आज इसके संपादक नहीं छपने देते। सतीश पेंडरेकर जनसत्ता की शुरुआती संपादकीय टीम में थे। वे काबिल थे इसीलिए दिल्ली जनसत्ता में चुने गए। वे योग्य थे तभी वे मुंबई संस्करण शुरू कराने भेजे गए। वे काबिल थे इसी लिए उन्हें संझा संस्करण का संपादक बनाया गया। योग्य वे जरूर थे इसलिए वे नई दिल्ली जनसत्ता में विशेष संवाददाता भी बने।

काम करने की अट्ठावन साल की उम्र आते ही वे सेवा निवृत्त हुए। छह जून 2022 को उन्होंने दिल्ली में ही अंतिम सांस ली। लेकिन उनकी खबर जनसत्ता में छापी नहीं गई।

किसी दैनिक को कामयाब करने में उस टीम की जरूरत होती है जो मुख्य संपादक के इशारों को समझते हुए परिश्रम करे। जब अखबार जम जाता है तो हर आदमी, जो उस अखबार से जुडा होता है खुद को संपादक भी मानता है और खुश होता है।

कोई अखबार सिर्फ चित्र, कार्टून, विचार और खबर के बल पर बाजार में नहीं टिकता। उसका जुड़ाव पेंदीदार बुद्धिजीवियों, लेखकों से होना जरूरी है। प्रभाष जोशी यह गणित जानते थे। इसलिए हर दम्भी लेखक, सामाजिक कार्यकर्ता और पत्रकार को उन्होंने अपने तरीके से चुना।

अखबार यदि धनी-मानी लोग निकाल पाते तो हिन्दी के अखाड़े में दिल्ली शहर में हजार स्तरीय अखबार होते। अखबार निकालना यदि प्रबंधकों के बस में होता तो हर प्रबंधक खुद अपना नाम संपादक के रूप में डालता और बाजार में कामयाब होता। हालांकि आज कुछ अपवाद संभव हैं।

बहरहाल जनसत्ता का झुकाव शुरू से समाज संस्कृति और रचनाकारों के साथ जुडाव का था। इनसे जुडे लोग संपादकीय टीम में भी थे। लेकिन वह परम्परा ‘जनसत्ता ‘के बाजार में कामयाब होने के बाद गड़बड़ाने लगी। इस पर प्रबंधक और मालिक तब हावी हो गए जब रामनाथ गोयनका ने अपनी देह छोड़ी। अखबार के कई संस्करण निकले और प्रबंधकों और मालिकों का दखल खूब बढ़ने लगा। संपादकीय टीम के पुराने लोगों ने प्रतिरोध किया लेकिन उनकी ज्यादा नहीं चली। सब जानते हैं कि कैसे इस अखबार को समाप्त किया गया। और मंजिल दूर भी नहीं।

दिल्ली छोड़ लगभग अन्य शहरों के सारे संस्करण सिमट चुके हैं। दिल्ली को भी सिमटाने में टीम जुटी है। पर सिंधु घाटी का दबा इतिहास खोदने वाले जुटें, इसके पहले यह इच्छा तो होती ही है कि हमारा काम न सही पर मरने पर नाम तो काश उस अखबार में छपा होता जिसमें अपनी जवानी दे दी। लेकिन जनसत्ता के मालिक, प्रबंधक और संपादक इस तथ्य के लिए हमेशा याद किए जाएंगे कि कैसे अपने स्वार्थों के लिए इन्होंने दूसरे परिश्रमी सहयोगियों के नाम और काम को बतौर सूचना भी उनके दिवंगत हो जाने पर छपने नहीं दिए।

सोचिए, जनसत्ता संपादकीय में चाकरी कर रहे उस सहयोगी के अपने बच्चे, युवा और रिश्तेदार और मित्र क्या सोचते होंगे ? अपने, पापा या मम्मी के निधन के बाद जब उनके बारे में उस अख़बार में कोई खबर नहीं मिलती जिसमें काम के लिए भागने की बेचैनी में वे उनके साथ कभी बैठ नहीं पाते थे! क्या यह शर्मनाक नहीं है बंधु । ————————-अमितप्रकाश सिंह———–“

पलाश विश्वास

हिंदी पत्रकारिता दिवस पर पत्रकारिता के छात्रों के लिए एक सन्देश

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A message for journalism students on Hindi Journalism Day

पण्डित युगुल किशोर शुक्ल ने 30 मई 1826 में प्रथम हिन्दी समाचार पत्र उदन्त मार्तण्ड का प्रकाशन (Publication of first Hindi newspaper Udant Martand) आरम्भ किया था. यह अखबार एक साल से ज्यादा नहीं चला पर हिंदी पत्रकारिता के ऐसे बीज बो गया कि हिंदी पत्रकारिता समय के साथ और भी मजबूत होती चली गई.

कोरोना काल में पत्रकारिता

आज से दो साल पहले मई माह में ही मैंने कोरोना काल के दौरान स्वतंत्र पत्रकारिता शुरू की. नैनीताल समाचार के संपादक राजीव लोचन साह (Editor of Nainital Samachar Rajeev Lochan Sah) के मार्गदर्शन में मैं सामाजिक विषयों पर लिखने लगा.

एक स्वतंत्र पत्रकार क्या चाहता है?

एक स्वतंत्र पत्रकार यह चाहता है कि उसका लिखा ज्यादा लोगों तक पहुंचे इसलिए मैं भी कई जगह लिखा भेजने लगा. बहुत से अनुभवी पत्रकारों से सम्पर्क बने और उनसे बहुत कुछ सीखने के लिए मिला.

पत्रकारिता के संस्थानों में शायद कोई छात्र वह सब न सीख सके जो जमीन पर कार्य कर चुके इन अनुभवी पत्रकारों ने अपनी कुछ पंक्तियों से ही मुझे सिखा दिया. इन अनुभवी और महत्वपूर्ण पत्रकारिता संस्थानों में काम कर चुके या कर रहे पत्रकारों के साथ मेरे संवाद हिंदी पत्रकारिता में शामिल होने जा रहे पत्रकारिता के छात्रों के लिए बेहद महत्वपूर्ण हो सकते हैं.

रामदत्त त्रिपाठी का सन्देश क्या है? डिजिटल पत्रकारिता के महत्वपूर्ण नियम | डिजिटल मीडिया को समझें | न्यूज पोर्टल के लिए समाचार या लेख कैसे लिखें ?

बीबीसी में वर्षों काम कर चुके और अब मीडिया स्वराज नामक पोर्टल चला रहे रामदत्त त्रिपाठी का सन्देश सबसे महत्वपूर्ण है.

वह लिखते हैं समाचार संकलन/ विश्लेषण एवं लेखन के मार्गदर्शक सिद्धांत/ नियम.

आप अपने आसपास की सामाजिक ,राजनीतिक, आर्थिक, आध्यात्मिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक, खेल कूद की संक्षिप्त रपट भेज सकते हैं.

इस बात का ध्यान अवश्य रखें कि विषय सम-सामयिक और तात्कालिक महत्व का हो. निबंध में लम्बी भूमिका के बाद सबसे महत्वपूर्ण बात उपसंहार में लिखते हैं.

समाचार पोर्टल में उसका उल्टा है, सबसे पहले हेडलाइन लिखते हैं. फिर नई और महत्वपूर्ण बात सबसे पहले लिखी जाती है और फिर उसी क्रम में, ताकि कोई अगर केवल दो चार पैरा पढ़ना चाहता है तो उसे मुख्य बात पता चल जाए, महत्वपूर्ण बात से वह वंचित न हो.

न्यूज रिपोर्ट तीन चार 400 से छह 600 सौ शब्दों के बीच और फीचर/ लेख अधिकतम 1000 हजार शब्दों तक होना चाहिए. विषय के साथ न्याय के लिए ज्यादा बड़ा लिखना आवश्यक है तो पहले सम्पादक से परामर्श कर लें.

रामदत्त त्रिपाठी Focus Key Phrase की महत्ता समझाते हुए लिखते हैं.

कृपया लेखन प्रारम्भ करने के पहले अधिकतम चार शब्दों का की फ्रेज / थीम चुनें , जिसके आधार पर सर्च इंजिन पहचाने.

फिर इसी की फ्रेज को केंद्र में रखकर हेडलाइन लिखें जो आकर्षक हो.

पहले पैरा में की फ्रेज जरूर शामिल करें और लेख के बीच में भी कई बार इसका प्रयोग करें.

न्यूज रिपोर्ट अनिवार्य रूप से तथ्यों पर आधारित होनी चाहिए और जिसने तथ्य बताए हैं उसको उद्धृत करें.

किसी कारण से कोई नाम न देना चाहे तो भी उसकी पहचान बताए बिना पाठक को संकेत मिलना चाहिए ताकि वह तथ्यों की प्रामाणिकता के बारे में आश्वस्त हो. खबरों में निजी राय न लिखें, जानकार, टीकाकार या विशेषज्ञ का उल्लेख करें.

कृपया वही विषय चुनें जिसके आप विशेषज्ञ हैं अथवा कार्य अनुभव है.

कृपया इस बात का विशेष ध्यान लगभग पिच्यानबे फीसदी लोग स्मार्टफोन पर ही देखते , सुनते और पढ़ते हैं. इनमें बड़ी संख्या युवा लोगों की है इसलिए सामग्री उसके अनुकूल होनी चाहिए.

भाषा एवं लेखन शैली

भाषा ऐसी हो कि नई पीढ़ी के लोग समझ सकें यानि आसान बोलचाल की हो. संस्कृत, हिंदी, अंग्रेज़ी, फारसी और उर्दू के कठिन शब्द न हों. मजबूरी में उद्धरण देना पड़े तो कृपया सरल अनुवाद कर दें.

भाषा संतुलित ,विधि सम्मत एवं मर्यादित हो, न भड़काने वाली हो न अपमानजनक.

वेबसाइट दुनिया भर में कहीं भी पढ़ी जा सकती है, इसलिए ऐसे लोकल शब्द या मुहावरे इस्तेमाल बिल्कुल न करें जो दूसरी जगह के लोग न समझें या अर्थ का अनर्थ हो जाए.

हर नया आइडिया नया पैरा में लिखे, दो लाइनों के बीच डबल स्पेस रखें.

आजकल स्मार्ट फोन पर हिंदी लिखना बहुत आसान है. लैपटॉप या डेस्क्टॉप पर GoogleIndic के जरिए रोमन में लिखकर हिंदी परिवर्तित कर सकते हैं, बोलकर भी लिख सकते हैं।

जन्म तिथि, पुण्य तिथि अथवा पर्व के कारण निश्चित दिन तारीख वाले लेख कृपया एक सप्ताह पहले भेजें.

यदि कोई लेख कई जगह भेज रहें हैं तो तीन दिन का एम्बार्गो लगा दें, एक जगह छप जाने के बाद दूसरी जगह प्रकाशन में हिचक होती है.

स्वयं संपादन

बेहतर होगा कि हड़बड़ी में न भेजें ,लेख/ फीचर लिखने के बाद एक दो दिन के लिए भूल जायें और फिर उसे इस तरह संपादित करें जैसे किसी और ने लिखा है. प्रूफ रीडिंग ठीक से करें, बोलकर पढ़ेंगे तो त्रुटि आसानी से पकड़ में आ जाएगी.

सबसे पहले एक आकर्षक शीर्षक सोचें और फिर पहला पैरा. शीर्षक और पहला पैर देखकर हाई पाठक आगे बढ़ता है.

अमर उजाला के सारंग उपाध्याय एक आलेख भेजने पर बेहद ही महत्वपूर्ण जानकारी देते हुए लिखते हैं कि विकीपीडिया सोर्स नहीं हो सकता. आधिकारिक साइट का हवाला देते तो और अच्छा होता. इसके अतिरिक्त एक लेख की पृष्ठभूमि बेहद अलग होती है, विचार और कही जाने वाली बात का मूल्य होता है.

किसी दृष्टिकोण को सापेक्ष रखते तो और बेहतर होता.

हिंदी क्विंट के संतोष कुमार तात्कालिक महत्व के विषय पर ही लिखने पर जोर देते हैं.

इन सब सीखों से सबसे पहला काम जो मैंने किया वो ये कि अब मैं पहले की तरह दस जगह लिखा नही भेजता, दस जगह भेजने से सबसे पहली समस्या यह है कि उससे समाचार पोर्टल की गरिमा को नुकसान पहुंचता है कि वह कहीं और का छपा हुआ छापते हैं फिर दूसरी समस्या यह कि उस समाचार का लिंक गूगल में भी कॉपी माना जाएगा और गूगल रिजल्ट्स में पीछे के पन्नों में चला जाएगा.

जनता के मुद्दे उठाने वाले लोकप्रिय समाचार वेब पोर्टल ‘जनज्वार’ के सम्पादक अजय प्रकाश भी मुझे लिखने के लिए प्रोत्साहित करते गूगल में सर्च रिजल्ट वाली बात याद रखने के लिए कहते हैं.

अब मैं सम्पादकों के सम्पर्क में रहते आलेख पूरे करता हूं. एक स्वतंत्र पत्रकार को इतनी स्वतंत्रता तो होती ही है कि वह अपने मन मुताबिक विषयों पर लिख सकता है.

लेकिन एक जगह ही आलेख भेजने में एक समस्या यह है कि कई बार मेहनत करके लिखा हुआ छपेगा या नहीं इस पर सम्पादक की तरफ से कोई उत्तर नही मिलता, फिर इंतजार में वह लिखा बासी हो जाता है.

इन सीखों का क्या लाभ?

वरिष्ठ पत्रकारों से मिली सीखों का पालन करते मुझे अपने लिखे पर अपने-अपने क्षेत्रों में पहुंचे हुए लोगों की टिप्पणी मिली. बॉलीवुड के जाने माने अभिनेता मनोज बाजपेयी ने उनकी जीवनी पर मेरी समीक्षा के ट्वीट को रीट्वीट किया. निर्देशक शैफाली भूषण ने अपनी वेब सीरीज गिल्टी माइंड्सपर मेरी लिखी समीक्षा तो लेखक विनोद कापड़ी और अशोक कुमार पाण्डे ने उनकी किताबों पर मेरी लिखी समीक्षाओं को अपने फेसबुक पोस्ट में जगह दी.

उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश के चुनावों पर लिखी एक रिपोर्ट पर पत्रकार साक्षी जोशी ने भी फेसबुक के जन विचार संवाद पेजपर सकारात्मक टिप्पणी दी.

यहां पर मैं पत्रकारों के लिए सम्पर्क बनाने की आवश्यकता पर भी जोर देना चाहूंगा. सोशल मीडिया के विभिन्न मंच से किसी पत्रकार को उसके जैसे विचार रखने वाले लोगों को समझने का मौका मिलता है.

स्वतंत्र पत्रकारों का पारिश्रमिक बड़ा मुद्दा
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स्वतंत्र पत्रकारों के पारिश्रमिक पर भी इन दिनों खूब चर्चा है. मैं स्वतंत्र पत्रकारिता को पारिश्रमिक पाने का जरिया नहीं समझता, यदि आपके अंदर समाज बदलने का कीड़ा है तो उसके लिए पैसे की इच्छा रखना गलत है. अगर आप लिखे का पैसा लेने लगे तो आपको संस्था के अनुसार लिखना होगा.

याद रखें महात्मा गांधी, भगत सिंह भी विभिन्न अखबारों के लिए लिखते थे और उनके लिखने की वज़ह पैसा नहीं बल्कि समाजसुधार था.

यदि आप स्वतंत्र रूप से काम करते पैसा ही कमाना चाहते हैं तो अपने विचारों का विस्तार करते जाइए, व्यक्तित्व विकास करिए. एक साल पहले मैं इंटरनेट रेडियो प्लेटफॉर्म रेडियो प्लेबैक इंडिया (आरपीआई)के साथ फिल्म समीक्षक के तौर पर जुड़ा और बोलने में की गई गलतियों से सीखते आज मैं आरपीआई का महत्वपूर्ण सदस्य हूं. इससे मेहनताने मिलने के द्वार भी खुलने लगे हैं.

एक फिल्म समीक्षक के तौर पर मैं पहली बार किसी वीडियो में भी दिखा. कस्तूरीग्रुप के फेसबुक पेज में मुझे प्रो चन्द्रकला त्रिपाठी के साथ मंच साझा करने का मौका मिला.

वरिष्ठ पत्रकार राजीव नयन बहुगुणा स्वतंत्र पत्रकारिता पर अपनी फेसबुक पोस्ट में लिखते हैं.

स्वतंत्रता एक कठोर विनिमय है , यहां करेंसी नोट स्वीकार नहीं किये जाते

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कल मेरी एक पोस्ट पर बहुत वाजिब सवाल उठाया गया कि स्वतंत्र रह कर एक पत्रकार बेदाग ,बे बाक और बेलौस अवश्य रह सकता है, पर जीविकोपार्जन कैसे हो ? बहुत जेनुइन प्रश्न है.

और इसका जेनुइन उत्तर भी यही है कि पत्रकारिता को मिशन बनाओ , और किसी अन्य कारोबार को प्रोफेशन.

अपनी हैसियत और परिस्थिति के अनुरूप रोजी रोटी के लिए ढाबा खोलो ,फैक्ट्री चलाओ, ट्रांसपोर्ट का धंधा करो ,जूते गांठो, घरों में झाड़ू पोछा करो , खेती करो अथवा ज़मीनों की दलाली करो.

कबीर ने कविता को धंधा नहीं बनाया। रोटी के लिए वह लोई – कम्बल बुनते थे , बकरी पालते थे.

गांधी भी सूत कात कर और बकरी पाल कर अपनी रसोई चलाते थे, भाषण देने के पैसे नहीं लेते थे.

तुलसी दास अपने जीवन काल में ही मोरारी बापू की टक्कर के पॉपुलर कथा वाचक हो गए थे , पर राम कथा बाँचने की कभी किसी से फीस न ली.

तुम भी ऐसा ही करो, कुछ नहीं बन पड़ता तो भोजन गुरुद्वारे में करो.

 लेकिन रहो स्वतंत्र.

हिमांशु जोशी

himanshu joshi jouranalism हिमांशु जोशी, पत्रकारिता शोध छात्र, उत्तराखंड।
himanshu joshi jouranalism हिमांशु जोशी, पत्रकारिता शोध छात्र, उत्तराखंड।

फिलिस्तीन की शिरीन अबू अक्लेह की हत्या : निशाने पर निर्भीक पत्रकारिता

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Shireen Abu Akleh’s killing: fearless journalism on target

गोलू-मोलू मीडिया से इतर वाली पत्रकारिता से जुड़ी तीन खबरें आयी हैं। 11 मई को फिलिस्तीन के जेनिन शहर में इजरायली फौजों द्वारा की जा रही जबरिया बेदखली को कवर कर रहीं अल जज़ीरा की वरिष्ठ और जानीमानी पत्रकार शिरीन अबू अक्लेह को गोली मार दी गयी (Shireen Abu Akleh: Al Jazeera reporter killed by Israeli forces)

51 वर्षीय इस महिला पत्रकार की जैकेट पर दोनों तरफ बड़े-बड़े शब्दों में प्रेस लिखा हुआ था। इसके बाद भी उन्हें सिर में गोली मारी गयी। उनके साथी अल क़ुद्स के संवाददाता अली समोदी (Ali Samodi from Al-Quds newspaper,) को पीछे से गोली मारी गयी – वे गंभीर हालत में हैं।

1967 से अब तक 86 फिलिस्तीन पत्रकारों को इजराइली फौजों ने मार डाला

शिरीन पहली पत्रकार नहीं हैं जिन्हें अमरीकी साम्राज्यवाद की मदद और शह पर आतंक मचा रही यहूदीवादी इजराइली फौजों ने मार डाला है। वर्ष 1967 से लेकर अब तक 86 फिलिस्तीन पत्रकारों को मारा जा चुका है।

एक अन्य स्रोत के अनुसार अकेले वर्ष 2000 के बाद 50 पत्रकार मारे जा चुके हैं। इनके अलावा वर्ष 2018 से शुरू हुए प्रतिरोध के साप्ताहिक प्रदर्शनों में 144 पत्रकारों को इजराइली फौजों ने रबर बुलेट्स, पथराव और आंसू गैस का निशाना बनाया है।

ध्यान रहे कि इजरायल दुनिया के सबसे दुष्ट देशों – रोग स्टेट्स – में आता है। अपनी इन्हीं आपराधिक करतूतों की वजह से संयुक्त राष्ट्र संघ में एकदम अलग थलग है – लेकिन अमरीकी सैयां भये कोतवाल तो फिर डर काहे का !!

किन चार भारतीय पत्रकारों को मिला पुलित्ज़र पुरुस्कार?

दूसरी खबर इसी सप्ताह पत्रकारिता के लिए दिए जाने वाले सम्मान – पुलित्ज़र पुरुस्कारों – के एलान की है। इसमें भारतीय फोटो पत्रकार दानिश सिद्दीकी (Indian photojournalist Danish Siddiqui) सहित चार भारतीय पत्रकारों अदनान आबिदी, सना इरशाद मट्टू और अनिल दवे के नाम हैं। इनमें दानिश सिद्दीकी को यह दूसरी बार मिला है। उन्हें और बाकी तीन भारतीय पत्रकारों को यह सम्मान कोविड की महामारी के साहसी और खोजी कवरेज और सरकार जिन्हे छुपाना चाहती थीं उन मौतों और मजदूरों के पलायन के दस्तावेजीकरण के लिए मिला है।

ये वे ही युवा दानिश हैं जिन्हें पिछली साल 16 जुलाई को अफगानिस्तान में तालिबानियों ने मार डाला था। दानिश सिद्दीकी सहित 1992 से 2022 के बीच तीस सालों में तालिबानियों ने 55 पत्रकारों की हत्या की। मतलब यह कि हर तरह का कट्टरपंथ, हर झंडे के राजनीतिक गुंडे और तानाशाह स्वतंत्र प्रेस और खोजी पत्रकारों से डरते हैं। भारत इसका अपवाद नहीं है।

मई 2019 से अगस्त 2021 के बीच भारत में 228 पत्रकारों पर 256 बार हमले हुए। हाल के दिनों को ही देखें तो भाजपा शासित प्रदेश योगी के उत्तरप्रदेश में इन हमलों की अगुआई खुद सरकार ने की।

मिर्जापुर के स्कूलों में मध्यान्ह भोजन में नमक और रोटी दिए जाने की सच्ची खबर छापने वाले पत्रकार पवन जायसवाल पर अनेक झूठे मुकदमे लाद दिए गए। अभी हाल ही इन पवन जायसवाल का निधन हुआ है।

बाराबंकी में गैरकानूनी वैक्सीन लगाने की खबर एक्सपोज करने गए पत्रकारों को बुरी तरह पिटवाया गया।

पंचायत चुनाव के दौरान योगी सरकार की धांधलियों को उजागर होने से रोकने के लिए उन्नाव में एक आईएएस अफसर ने पत्रकार को दौड़ा दौड़ा कर पीटा।

हाल ही में उत्तर प्रदेश के बलिया में जब परीक्षा का पेपर लीक हो गया तो लीक होने की खबर लिखने वाले पत्रकार को ही पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया।

भारत में पत्रकारों की हत्या

पत्रकारों की सुरक्षा की देखरेख के लिए बनी अंतर्राष्ट्रीय संस्था – कमेटी फॉर प्रोटेक्शन ऑफ़ जर्नलिस्ट्स (Committee for Protection of Journalists) (सीपीजे) – की रिपोर्ट के अनुसार पत्रकारिता का काम करते हुए प्रतिशोध में मरे जाने वाले पत्रकारों के मामले में भारत दुनिया में सबसे ऊपर है। यहां 2021 की साल में 1 दिसंबर तक 4 पत्रकारों की हत्या (Journalists murdered in India) कर दी गयी। पांचवां मौके पर खबर का अकवरेज करते हुए मारा गया।

भारत में आरएसएस की अगुआई वाली हिंदुत्ववादी साम्प्रदायिकता की बढ़त और मोदी की अगुआई में कारपोरेट निज़ाम के लिए लोकतंत्र सिकोड़ने का दोहरा काम शुरू हुआ – इस बीच पत्रकारों और गोदी में न बैठने वाले मीडिया पर हमले लगातार तेज होते-होते 2022 में सबसे अधिक रिकॉर्ड तोड़ ऊंचाई पर पहुँच गए। 1992 से 22 के बीच 58 पत्रकार मारे गए हैं। ध्यान दें, यह संख्या इसी अवधि में तालिबानी अफगानिस्तान में मरे गए पत्रकारों की संख्या से ज्यादा है।

तालिबानियों के हिन्दुस्तानी संस्करण खुद इन हमलों की अगुआई करते हैं; मशहूर पत्रकार गौरी लंकेश की 2017 में हुई ह्त्या के पीछे यही लोग थे। इसी दौरान प्रति वर्ष 7 के हिसाब से पत्रकार जेलों में भी डाले गए हैं।

जम्मू कश्मीर आमतौर से पत्रकारों के लिए असुविधाजनक रहा है। वे सीमापार आतंक और सेना तथा पुलिस चक्की के दोनों पाटों के बीच पिसते रहे हैं।  

5 अगस्त 2019 को जम्मू-कश्मीर प्रदेश के अस्तित्व को समाप्त किये जाने और धारा 370 के खत्म किये जाने के बाद तो कश्मीर जैसे दोजख में ही तब्दील हो गया है। श्रीनगर का ऐतिहासिक कश्मीर प्रेस क्लब बंद कर दिया गया है। अखबार और दूसरे मीडिया को पहले उनके सरकारी विज्ञापन बंद करके और निजी विज्ञापन बंद करके आर्थिक रूप से तोड़ा गया, उसके साथ उनके वितरण और प्रसारण में बाधाएं खड़ी करके कमर ही तोड़ दी गयी। इसके बाद भी जब निर्भीक पत्रकार चुप नहीं बैठे तो उन्हें सताने और डराने के सीधे दमनात्मक तरीके अपनाये गए। तीन पत्रकारों; फहद शाह, सज्जाद गुल और आसिफ सुलतान को जबरिया यूएपीए के निर्मम क़ानून में पकड़ कर जेल भेज दिया गया। बड़ी अदालतों के हस्तक्षेप से जब वे यूएपीए से रिहा हुए तो जेल के दरवाजे पर ही फिर से पब्लिक सेफ्टी एक्ट में धर लिए गए। उनके साथ अंतर्राष्ट्रीय मीडिया संस्थानों के दो और पत्रकार अभी भी जेल में हैं। इनके अलावा 22 प्रमुख पत्रकार ऐसे हैं जिन्हें “नो फ्लाई लिस्ट” में डालकर उनका आवागमन प्रतिबंधित कर दिया गया है।  

मोदी सरकार और इसके वैचारिक कुनबे की खासियत यह है कि वह एक तरफ हिटलर और मुसोलिनी को अपना आदर्श और परमगुरु मानती है तो दूसरी तरफ यहूदीवादी इजराइल के बर्बरों को कुम्भ के मेले में बिछड़ा अपना उस्ताद समझती है। उनसे नए-नए धतकरम ही नहीं सीखती – उन्हें अंजाम देने के लिए कुख्यात मोसाद को अपना कोच बनाती है और नए नए औजार भी इजराइल से ही लेकर आती है। पेगासस जासूसी उपकरण ऐसा ही उपकरण और तकनीक थी जिसका इस्तेमाल बाकियों के खिलाफ करने के साथ साथ देश के 40 नामी पत्रकारों पर भी किया गया। इतने भर से भी जब दहशत नहीं फैलती तो सुल्ली डील्स और बुल्ली बाई एप्प जैसे दुष्ट तरीके निकाले जाते हैं।

बुल्ली बाई एप्प के जरिये सामाजिक रूप से सक्रिय जिन 100 मुस्लिम महिलाओं को निशाना बनाया गया था उनमे 20 पत्रकार भी थीं। बदले की भावना इस कदर है कि वाशिंगटन पोस्ट की नियमित स्तम्भकार होने के बावजूद राणा अय्यूब को भी नहीं बख्शा जाता क्योंकि उन्होंने 2002 के गुजरात दंगों की असलियत उधेड़ कर रख दी थी और दुनिया भर के सामने मोदी और आरएसएस की भूमिका सामने ला दी थी। अपने हो गिरोह के लोगों से कराई गयी फर्जी शिकायतों के आधार पर राणा अय्यूब के देश छोड़ने पर रोक लगा दी गयी है।

इस सब्जी चलते स्थिति यहां तक आ पहुंची है कि “रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स” नाम के पत्रकारों के वैश्विक संगठन के अनुसार विश्व प्रेस स्वतन्त्रता सूचकांक (वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स) में भारत खिसकते खिसकते 150 वे नंबर पर आ गया है। कुल 180 देशों में प्रेस की आजादी की दशा पर तैयार की जाने वाली इस रिपोर्ट में भारत की यह फिसलन लगातार जारी है – पिछली साल यह 142 वे स्थान पर था। जनता के बीच में गोदी मीडिया के नाम से ख्याति इसी का परिणाम है।

सभ्य समाज में निर्भीक और स्वतंत्र पत्रकारिता एक रोशनी का काम करती है। विवेक को संवारती है, विश्लेषण की क्षमता को निखारती है। अँधेरे के सौदागरों को रोशनी बुरी लगती है इसीलिये उन्हें न खोजी पत्रकार चाहिए न नियंत्रणों और भय से मुक्त मीडिया चाहिए। भारत में इन सौदागरों की एक ही दूकान के दो आउटलेट्स हैं; एक पर कारपोरेट के धनपिशाच बैठे हैं दूसरे पर त्रिपुण्ड त्रिशूल धारे वंचक भगत बैठे हैं। इसीलिए भारतीय पत्रकारों पर हमले भी दो आयामी हैं। इधर कारपोरेट उन्हें ठोकता है उधर बुराड़ी में हुयी हिन्दू महापंचायत में पत्रकारों और मीडियकर्मियों के नामों से उनका धर्म पहचानने वाले साम्प्रदायिक ठग उन्हें रगेदते हैं। त्रिपुरा में इन्होने सरकार में आते ही सबसे पहले वहां की जनता के लोकप्रिय वामपंथ समर्थक अखबार देशेर कथा को निशाने पर लिया। पहले उसका रजिस्ट्रेशन रद्द किया, जब हाईकोर्ट ने उसे बहाल कर दिया तो उसके बाद उसके प्रदेश भर में सर्कुलेशन में हर तरह की बाधाएं खड़ी कीं। बंगाल में इन्हीं की सहोदर जैसी ममता बनर्जी ने भी वहां के लोकप्रिय अखबार गणशक्ति को निशाने पर लिया था।

हालांकि इस मामले में छत्तीसगढ़ की भूपेश बघेल की सरकार भी कम उत्साही नहीं है। बस्तर के आदिवासियों की तरह वहां के पत्रकार भी एक खुले यातनागृह में रहते हैं; एक तरफ माओवादी हैं दूसरी तरफ केंद्रीय सुरक्षाबल और छग की कल्लूरी ब्रांड पुलिस है। पत्रकार दोनों के सहज शिकार हैं और यह सिर्फ बस्तर तक सीमित परिघटना नहीं है; पूरे छत्तीसगढ़ में पत्रकारों की दशा एक जैसी है। जो सरकार के साथ नहीं है उसे तो खिलाफ माना ही जाता है, जो प्राकृतिक सम्पदा से अति समृद्ध इस प्रदेश के जल, जंगल, जमीन और आदिवासियों की अडानी, अम्बानी या टाटा द्वारा की जा रही लूट का विरोध करता है उसे भी शत्रु मान लिया जाता है; और जब शत्रु मान ही लिया तो फिर युद्ध में सब जायज है के कुटिल सूत्र के आधार पर उससे निबटा-सुलझा जाता है। लोकजतन सम्मान 2020 से अभिनंदित पत्रकार कमल शुक्ला इसकी एक मिसाल हैं, जिन पर बार-बार हमले किये जाते रहे हैं। उन जैसे और भी अनेक युवा और उत्साही पत्रकार हैं।

विडंबना यह है कि भूपेश बघेल भाजपा की पूर्ववर्ती सरकार के राज में पत्रकारों की असुरक्षा के चरम को मुद्दा बनाकर जीते थे और वादा किया था कि राज में आने के बाद छत्तीसगढ़ के पत्रकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने वाला क़ानून बनाएंगे। क़ानून तो नहीं बना, क़ानून बनाने की याद दिलाने के लिए आंदोलन करने वाले पत्रकारों पर हमले जरूर शुरू हो गए।

चिंता की बात यह नहीं है कि हर तरह के लोकतांत्रिक स्पेस को संकुचित करने वाली ताकतें मीडिया और पत्रकारों पर अपने हमले दिनोंदिन तीखे कर रही हैं। अफ़सोस की बात यह है कि ठीक इस दौर में मीडिया और खासतौर से श्रमजीवी पत्रकारों के संगठन विभाजित और निष्क्रिय हुए पड़े हैं।

प्रेस का मुंह बंद किये जाने की सत्ता की कोशिशों के खिलाफ भारतीय पत्रकारिता लड़ाई के अग्रिम मोर्चे पर रही है। ब्रिटिश राज को चलाने के लिए अगर अंग्रेज 1910 में इंडियन प्रेस एक्ट और उससे पहले सेंसरशिप ऑफ़ प्रेस एक्ट लेकर आये तो 1857 से लेकर 1947 के 90 सालों में भारत के उस समय के तुलनात्मक रूप से युवा मीडिया और उसके पत्रकारों ने भी प्रतिरोध का मोर्चा कमजोर नहीं पड़ने दिया। बाल गंगाधर तिलक, सुब्रमण्यम अय्यर, स्वदेशभिमानी रामकृष्ण पिल्लई से लेकर गणेश शंकर विद्यार्थी जैसे अनेक दिग्गजों ने प्रेस की आजादी के लिए मोर्चा लिया।

सत्तर के दशक में लगी इमरजेंसी के समय थोपी सेंसरशिप से भी देश के पत्रकार – हिंदी, अंगरेजी और सभी राष्ट्रीय भाषाओं के पत्रकार – जम कर जूझे थे।

1977 की इंदिरा गांधी की पराजय में प्रेस स्वतन्त्रता के संघर्ष की भी एक अहम् भूमिका रहे थी। मौजूदा दौर में भी श्रमजीवी त्रकार मोर्चे पर डटे हैं मगर उनके संगठनों की सक्रियता उतनी नहीं है। यह एक विचलन है, जिसे आने वाला समय दुरुस्त करेगा।

क्योंकि इतिहास ने इस तरह के हालात पहले भी देखे हैं। इतिहास में उनसे उबरने के सबक भी दर्ज हैं। समय उन्हें अमल में लाने का है – लोकतंत्र की पहली शर्त प्रेस स्वतंत्रता की रोशनी को फिलिस्तीन से काबुल होते हुए भारत तक बचाने का है।

बादल सरोज

सम्पादक लोकजतन, संयुक्त सचिव अखिल भारतीय किसान सभा

लघु पत्रिकाएँ : वैकल्पिक पत्रकारिता का स्वप्न

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वैकल्पिक मीडिया की आवश्यकता क्यों है?

Small Magazines: The Dream of Alternative Journalism

दिनेशपुर, उत्तराखंड में अखिल भारतीय लघु पत्र-पत्रिका सम्मेलन (All India Small Paper-Magazine Conference at Dineshpur, Uttarakhand) का आयोजन हो रहा है। कुछ समय पूर्व पलाश विश्वास ने पत्रकारिता और साहित्य के संपादन संबधों की चर्चा की थी जिसमें मूल बात यह थी कि रघुवीर सहाय और सव्यसाची जैसे संपादक नये लोगों की रचनाओं को एकदम रिजेक्ट न करके उनकी कमियां बताते थे, उन्हें ठीक करवाते थे और छापते थे।

एक और संपादक प्रभाष जोशी को भी एक प्रोफेशनल और समूह-नायक के तौर पर याद किया है। यद्यपि उनके विचारों को लेकर कुछ विवाद भी रहे लेकिन उनका योगदान अवश्य अविस्मरणीय है।

अब लेखकों को प्रशिक्षित नहीं कर रहे संपादक

आज विडंबना यह है कि दूरदराज के लेखकों को विकसित करना और प्रशिक्षित करना संपादकों द्वारा अब नहीं हो पा रहा है। यह अब मुश्‍किल है।  अब संपादक, प्रबंधक की भूमिका में आ चुके हैं।

पूरी तरह गरीब विरोधी हो चुकी है अब सरकार भी

दरअसल अब मीडिया का स्वरूप और प्राथमिकताएं बदल गई हैं। मुख्यधारा के मीडिया में कहीं कोई बड़े मूल्य, आदर्श और जनप्रतिबद्धता अब चिराग लेकर ढूंढने पर भी नहीं दिखेगी। इस बारे में एक जागरूक वृद्ध की प्रतिक्रिया थी “आज देश के जो हालत है, उसके बारे में सोचता हूँ तो अफ़सोस होता है। पहले ये हालात नहीं थे। किसी भी ग़रीब आदमी के लिए कहीं कोई ठिकाना नहीं है। कोई भी ग़रीब अगर कहीं एक झोंपड़ी डालकर रह रहा है तो उसे उजाड़ दिया जाता है। अमीरों की आँखों में ग़रीब खटकता रहा है अब सरकार भी पूरी तरह गरीब विरोधी हो चुकी है। वह मध्यवर्ग के विद्वेष का भी शिकार है। हमने नहीं सोचा था कि देश की ऐसी हालत हो जाएगी। आज मीडिया से भी कोई आस नहीं है। आप लोग बड़े लोगों से और नेताओं से तो बात करते हो पर ग़रीब की बात करने वाला और लाचार लोगों को सहारा देने वाला कोई नहीं है। आप जो काम कर सकते हैं, वो भी नहीं कर रहे। लोगों पर ज़ुल्म हो रहा है पर सरकार कुछ नहीं कर रही है। हाँ, जब वोट माँगने की बारी आती है तब नेताओं को याद आता है कि यह ग़रीबों की भी देश है। हम जैसे लोगों का भी देश है। तब उन्हें यह बुजुर्ग दिखाई देता है। पुलिस और अधिकारियों का रवैया भी लोगों के साथ इंसानों वाला नहीं है। उन्हें सामने वाला इंसान नज़र नहीं आता है। यह हमारा देश है और हम इसके लिए काम कर रहे हैं पर देश ही हमें ख़त्म करने पर तुला है।”

असल में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया प्रारूप ने भारतीय मीडिया की अधकचरी संस्कृति को ओढ़ने-बिछाने वाले एक छोटे से तबके को भले ही कुछ ऐसा दे दिया हो जो उन्हें नायाब दिखता होगा, एक आम भारतीय समाज के लिए उसका कोई मूल्य या महत्व नहीं। यह ‘क्लास’ का मीडिया ‘मास’ का मीडिया बन ही नहीं सकता।

संजय कुमार के अनुसार “भारतीय मीडिया में दलित आंदोलन के लिए कोई जगह नहीं है। वह तो, क्रिकेट, सिनेमा, फैशन, तथाकथित बाबाओं, राजनेताओं, सनसनी, सेक्स-अपराध, भूत-प्रेत और सेलिब्रिटीज के आगे-पीछे करने में ही मस्त रहती है। इसके लिए अलग से संवाददाताओं को लगाया जाता हैं जबकि जनसरोकार एवं दलित-पिछड़ों से संबंधित खबरों को कवर करने के लिए अलग से संवाददाता को बीट देने का प्रचलन लगभग खत्म हो चुका है। इसे बाजारवाद का प्रभाव माने या द्विज-सामंती सोच ! मीडिया सत्ता, सेक्स, खान-पान, फैशन, बाजार, महंगे शिक्षण संस्थान के बारे में प्राथमिकता से जगह देने में खास रूचि दिखाती है। ऐसे में दलित आंदोलन के लिए मीडिया में कोई जगह नहीं बचती ? अखबारों में हीरो-हीरोइन या क्रिकेटर पर पूरा पेज छाया रहता है, तो वहीं चैनल पर घण्टों दिखाया जाता है। दलित उत्पीड़न को बस ऐसे दिखाया जाता है जैसे किसी गंदी वस्तु को झाडू से बुहारा जाता हो? समाज के अंदर दूर-दराज के इलाकों में घटने वाली दलित उत्पीड़न की घटनाएं, धीरे-धीरे मीडिया के पटल से गायब होती जा रही है। एक दौर था जब रविवार, दिनमान, जनमत आदि जैसी प्रगतिशील पत्रिकाओं में रिपोर्ट आ जाती थी। खासकर, बिहार व उत्तर प्रदेश में दलितों पर होते अत्याचार को खबर बनाया जाता था। यदि इतिहास में झांकें तो सत्तर के दशक में गरीबी, महंगाई, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों ने राष्ट्रीय मीडिया को बदलाव में धकेलना शुरू कर दिया जो अंततः सत्ता विमर्श का एक हिस्सा बन गया। दबे-कुचले लोगों के ऊपर दबंगो के जुल्म-सितम की खबरें, बस ऐसे आती है जैसे हवा का एक झोंका हो! जिसका असर मात्र क्षणिक भी नहीं होता। साठ-सत्तर के दौर में ऐसा नहीं था। सामाजिक गैर बराबरी को जिस तेवर के साथ उठाया जाता था उसका असर देर सबेर राजनीतिक, सामाजिक और सत्ता के गलियारे में गूंजता रहता था।‘

पिछले कुछ सालों में महिलाएं कई क्षेत्रों में आगे आयी हैं। उनमें नया आत्मविश्वास पैदा हुआ है और वे आज हर काम को चुनौती के रूप में स्वीकार करने लगी हैं। अब महिलाएं सिर्फ चूल्हे-चौके तक ही सीमित नहीं रह गयी हैं, या फिर नर्स, एयर होस्टेस या रिसेप्शनिस्ट नहीं रह गयी हैं, बल्कि हर क्षेत्र में उन्होंने अपनी उपस्थिति दर्ज करा दी है। चाहे डॉक्टरी-इंजीनियरी या प्रशासनिक सेवा का पेशा हो कम्प्यूटर और टेक्नोलॉजी का क्षेत्र हो, विभिन्न प्रकार के खेल हो पुलिस या वकालत का पेशा हो। होटल मैनेजमेंट,बिजनेस मैनेजमेंट या पब्लिक रिलेशन का क्षेत्र हो, पत्रकारिता, फिल्म और विज्ञापन का क्षेत्र हो या फिर बस में कंडक्टरी या पेट्रोल पंप पर तेल भरने का काम हो। या टैक्सी-ऑटो चलाने की ही बात हो, अब हर जगह महिलाएं तल्लीनता से काम करती दिखाई देती हैं। अब हर वैसा क्षेत्र जहां पहले केवल पुरुषों का ही वर्चस्व था, वहां स्त्रियों को काम करते देखकर हमें आश्चर्य नहीं होता है। यह हमारे लिए अब आम बात हो गयी है। महिलाओं में इतना आत्मविश्वास पैदा हो गया है कि वे अब किसी भी विषय पर बेझिझक बात करती हैं। धरना-प्रदर्शन में भी आगे रहती हैं।

कहने का तात्पर्य यह है कि अब कोई भी क्षेत्र महिलाओं से अछूता नहीं रहा है। वे सिर्फ उपभोग की वस्तु नहीं हैं। लेकिन चाहे वह प्रिंट मीडिया हो या फिर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया हो, स्त्रियों के प्रति मीडिया की सोच में कोई खास बदलाव नहीं आया है।

मीडिया अब भी स्त्रियों के प्रति वर्षों पुरानी सोच पर कायम है।

मीडिया आज भी स्त्रियों को घर-परिवार या बनाव-श्रृंगार तक ही सीमित मानता है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, टेलीविजन धारावाहिकों, समाचार चैनलों और टेलीविजन विज्ञापनों ने महिला की दूसरी छवि जो बनाई है उसमें ऐसी महिलाओं को दिखलाया जाता है जो परंपरागत शोषण और उत्पीड़न से तो मुक्त दिखती हैं लेकिन वह स्वयं पुरुषवादी समाज के लिए उपभोग की वस्तु बनकर रह जाती हैं। इन दिनों हमारा इलेक्ट्रॉनिक मीडिया मुक्त-महिला का जो रूप दिखाता है, वह एक उपभोक्ता महिला का ही रूप है जो सिगरेट पीती है, शराब पीती है और जुआ खेलती है। इनमें अधिकतर उच्च मध्य वर्ग की महिलाओं की इसी छवि को दिखाया जाता है।

मीडिया विज्ञापनों, धारावाहिकों और फिल्मों के भीतर महिला का निर्माण करते हुए यह भूल जाता है कि भारत की शोषित, दमित महिला की मुक्ति का लक्ष्य बाजार में साबुन बेचने वाली महिला नहीं हो सकती।

महिलाओं के मामले में समाचार पत्रों का भी हाल कोई जुदा नहीं है।

आप कोई भी अखबार उठा लें, गांव में, खेत-खलिहानों में, परिवार में, नौकरी में,महिलाओं के साथ हो रहे भेदभाव की चर्चा, उससे लड़ने की आवश्यकता पर लेख/रिपोर्ट मिले या नहीं, सुंदरता बढ़ाने के उपायों पर विस्तृत लेख अवश्य मिलेंगे। मेधा पाटकर, अरुंधति राय की चर्चा हो या न हो, दीपिका पादुकोण, ऐश्वर्य राय, कैटरीना कैफ आदि का गुणगान अवश्य मिल जायेगा। प्रगतिशील और आंदोलनी तेवर वाली महिलाओं, आधुनिक विचारधारा वाली, अन्याय और शोषण के खिलाफ आंदोलन करने वाली, सड़कों पर नारे लगाते हुए जुलूस निकालने वाली, धरना देने वाली, सभाएं और रैलियां करने वाली, समाचार-पत्रों में महिला अत्याचार के खिलाफ आवाज बुलंद करने वाली, कल-कारखानों और खेतों में काम करने वाली महिलाओं का चरित्रहनन करना उन्हें देशद्रोही बताने वाला मीडिया महिला विद्वेषी भी है और अपराधी भी। पुलिस, इंजीनियरिंग, चिकित्सा, प्रशासन में ईमानदारी के साथ काम करने वाली महिलाओं की जितनी चर्चा समाचार पत्रों में होती है उससे कई गुणा अधिक चर्चा देह एवं अपने सौंदर्य का प्रदर्शन करने वाली अभिनेत्रियों एवं मॉडलों की होती है। प्रिंट मीडिया में महिलाएं अब भी सिर्फ हाशिये की ही जगह पाती हैं।

यही हाल कृषकों, गांवों और सुदूर जंगलों में रहने वाले मूल निवासियों का है। उनकी मीडिया को कहां चिंता है। उसे तो पूंजी, व्यापार, सत्तासीन नेताओं और चमक दमक की चाकरी करनी है। मुनाफा कमाना है। इसलिए वैकल्पिक मीडिया की महती आवश्यकता है जो सिर्फ सोशल मीडिया न होकर सुनियोजित मूल्यों पर आधारित पत्रकारिता का संरक्षक हो।

शैलेन्द्र चौहान

संपादक-धरती

पत्रकार सुरक्षित रहेंगे, तभी गणतंत्र सुरक्षित रहेगा

press freedom

Journalists will be safe only then the republic will be safe

“पृथ्वी पर मीडिया का सबसे शक्तिशाली अस्तित्व है। उनके पास निर्दोष को अपराधी बनाने और दोषी को निर्दोष बनाने की शक्ति है, क्योंकि वे जनता के दिमाग को नियंत्रित करते हैं “- मैल्कम एक्स

पत्रकारों की सुरक्षा क्यों जरूरी है? पत्रकारों की सुरक्षा कैसे?

आज, पूरे विश्व में मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता है। पहले और सबसे महत्वपूर्ण ब्रिटिश सदस्य संसद लार्ड मैकॉले ने मीडिया को यह दर्जा दिया था। किसी भी प्रजातांत्रिक सरकार प्रणाली में तीन प्रशासनिक निकाय होते हैं   

1 . विधायिका  

2 . कार्यपालिका   

3 . न्यायपालिका                                                     

इन तीनों निकायों में से किसी की अनुपस्थिति में सरकार व्यवस्थित नहीं चल सकती। इन तीनों का एक साथ होना जरूरी है और इन तीनों के कार्य पारदर्शी एवं जनहित में हों, यह कार्य प्रजातंत्र के चौथे स्तंभ मीडिया का है। इसलिये इस चौथी कड़ी का मज़बूत होना बहुत ही ज़रूरी है। प्रजातंत्र के तीनों स्तंभों को संवैधानिक संरक्षण प्राप्त है, वहीं तीनों स्तंभों की निगरानी करने वाला चौथा स्तंभ बिना किसी संवैधानिक सुरक्षा के कार्य करता है। बावजूद इसके मीडिया बिना संवैधानिक सुरक्षा के प्रशासनिक निकायों और आम जनता के बीच एक जानकारीपूर्ण पुल के रूप में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

मीडिया के माध्यम से ही आम जनता को सरकार की नीतियों की जानकारी मिलती है और कई बार मीडिया सरकार की गलत नीतियों का जनहित में विरोध भी करता है जनता की आवाज़ बन कर।

मीडिया नहीं होता, तो लोगों को इस बात की जानकारी कभी नहीं होती कि संसद में किस तरह के बिल और कार्यवाही पारित किये जाते हैं और समाज में सकारात्मक और नकारात्मक प्रभाव उस बिल से क्या होंगे। यदि मीडिया अपनी आंखें बंद कर ले, तो पूरी व्यवस्था निरंकुश हो जायेगी। इसलिए मीडिया सरकारी गतिविधियों और आम जनता के बीच एक बहुत ही महत्वपूर्ण और निष्पक्ष भूमिका निभाता है, इसलिये ऐसा कहा जाता है कि मीडिया की स्वतंत्रता गणतंत्र की सफलता की गारंटी है।

लोकतंत्र की रीढ़ है मीडिया की स्वतंत्रता

स्वस्थ लोकतंत्र को आकार देने में मीडिया महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह लोकतंत्र की रीढ़ है। मीडिया हमें दुनिया भर में होनेवाले विभिन्न सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक गतिविधियों से अवगत कराता है। यह एक दर्पण की तरह है, जो हमें दिखाता है या हमें सच्चाई और कठोर वास्तविकताओं को दिखाने का प्रयास करता है।

मीडिया ने नि:संदेह विकास किया है और हाल के वर्षों में अधिक सक्रिय हो गया है। यह मीडिया ही है, जो राजनेताओं को चुनाव के समय अपने अधूरे वादों के बारे में याद दिलाता है। चुनाव के दौरान न्यूज़ चैनल अत्यधिक कवरेज लोगों तक पहुंचाता है; विशेषकर अशिक्षित व्यक्ति को भी सत्ता के चुनाव में मदद करता है। यह अनुस्मारक सत्ता में बने रहने के लिए राजनेताओं को अपने वादे के लिए मजबूर करता है। टेलीविजन और रेडियो ने ग्रामीण लोगों को अपनी भाषा में सभी घटनाओं के बारे में जागरूक करने में ग्रामीणों को शिक्षित करने में महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। गांव के सिर और धन के शोषणकर्ताओं के शोषण के अपशिष्टों के कवरेज ने सरकार के ध्यान को आकर्षित करके उनके खिलाफ कठोर कार्रवाई करने में मदद की है।

मीडिया भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में कमियों को उजागर करता है, जो आखिरकार सरकारों को कमियों की रिक्तता को भरने और एक प्रणाली को अधिक जवाबदेह, उत्तरदायी और नागरिक-अनुकूल बनाने में मदद करता है।

मीडिया के बिना एक लोकतंत्र पहियों के बिना वाहन की तरह है।

सूचना प्रौद्योगिकी की उम्र में हम जानकारी के साथ बमबारी कर रहे हैं। हम सिर्फ एक माउस के एक क्लिक के साथ विश्व की घटनाओं की नब्ज प्राप्त करते हैं। सूचना के प्रवाह में कई गुना बढ़ गया है। राजनीति और समाज में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार को उजागर करने में प्रौद्योगिकी और मानव संसाधन (पत्रकार) के सही मिश्रण ने एक भी पत्थर नहीं छोड़ा है।                                                                 

पिछले कुछ वर्षों में मीडिया पर लगातार हमले बढ़े हैं। पत्रकारों की देश भर में हो रही लगातार हत्याओं को देश का सबसे बड़ा मीडिया संगठन भारती श्रमजीवी पत्रकार संघ (BSPS) ने गंभीरता से लिया है और लगातार पत्रकार सुरक्षा कानून के लिए देश भर में मज़बूती से आवाज़ उठा रहा है।

वर्ष 2016 में बिहार-झारखण्ड में पत्रकारों की हत्या (murder of journalists) के बाद राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, उप राष्ट्रपति, गृहमंत्री, राज्यपाल एवं मुख्यमंत्री के समक्ष पत्रकार सुरक्षा कानून लागू करने की मांग संगठन ने उठायी है।

देश भर के सभी माननीय जनप्रतिनिधियों, सांसदों एवं विधायकों से भारती श्रमजीवी पत्रकार संघ यह विनम्र आग्रह करता है कि आप लोकसभा, राजसभा एवं विधानसभा में देश के चौथे स्तंभ की रक्षा के लिए संवैधानिक सुरक्षा प्रदान करने के लिए आवाज़ उठायें। पत्रकार सुरक्षित रहेंगे, तब ही गणतंत्र सुरक्षित रहेगा। प्रजातांत्रिक व्यवस्था को मज़बूती प्रदान करने के लिए पत्रकारों की सुरक्षा समय की मांग है।

शाहनवाज हसन

लेखक वरिष्ठ पत्रकार व भारती श्रमजीवी पत्रकार संघ के महासचिव हैं।

शाहनवाज हसन (Shahnawaz Hassan) वरिष्ठ पत्रकार हैं और वे भारतीय श्रमजीवी पत्रकार संघ के राष्ट्रीय संगठन सचिव हैं
शाहनवाज हसन (Shahnawaz Hassan) वरिष्ठ पत्रकार हैं और वे भारतीय श्रमजीवी पत्रकार संघ के राष्ट्रीय संगठन सचिव हैं

दैनिक भास्कर : मसला सेठ का नहीं प्रेस का है

Dainik Bhaskar,issue of press,दैनिक भास्कर पर मोदी-शाह के इनकम टैक्स और सीबीडीटी के छापे,प्रेस और अभिव्यक्ति पर हमले

 Dainik Bhaskar: The issue is of the press, not of Seth

आखिरकार पिछले पखवाड़े देश के प्रमुख हिंदी अखबार दैनिक भास्कर पर मोदी-शाह के इनकम टैक्स और सीबीडीटी के छापे (Modi-Shah’s Income Tax and CBDT raids on leading Hindi newspaper Dainik Bhaskar) पड़ ही गए।

पिछले कुछ महीनो से इस तरह की आशंका जताई जा रही थी। आम तौर से सत्तासमर्थक और खासतौर से भाजपा हमदर्द माने जाने वाले इस अख़बार ने महामारी कोरोना की दूसरी लहर के अपने कवरेज से अपने पाठकों को ही नहीं मीडिया की देखरेख करने वाले सभी को चौंका दिया था। इसकी खबरे हिंदी ही नहीं अंगरेजी के भी बाकी अखबारों से अलग थीं।

महामारी से हुई मौतों को छुपाने की सरकारी कोशिशों का भांडा फोड़ते हुए दैनिक भास्कर ने तथ्यों और आंकड़ों, छवियों गवाहियों के साथ असली संख्या उजागर की थीं। इस तरह के कवरेज की शुरुआत सबसे पहले इस संस्थान के गुजराती संस्करण “दिव्य भास्कर” ने गुजरात की मौतों की तुलनात्मक खबरों से की। बाद में इसके बाकी के संस्करणों ने भी इसी तरह की खोज खबरें छापना शुरू कर दिया। हालांकि यह साहस और खोजीपन मुख्यतः कोविड महामारी की मौतों और उससे जुडी सरकार की असफलताओं एक ही सीमित रहा – बाकी मामलों में यह अख़बार समूह,एकाध अपवाद छोड़कर, मोदी सरकार और उसके एजेंडे के साथ रहा। लेकिन हुक्मरानो की असहिष्णुता जब चरम पर होती है तो दुष्यंत कुमार लागू हो जाते हैं और मसला ; “मत कहो आकाश पर कोहरा घना है/ ये किसी की व्यक्तिगत आलोचना है। ” का हो जाता है।

तानाशाही जब सर पर सवार हो जाती है तो उसे ज़रा सी भी आलोचना नहीं भाती है। यही हुआ – एक दिन रात के अँधेरे में केंद्र सरकार का अमला दैनिक भास्कर के प्रमोटर के भोपाल वाले घर सहित देश के कई दफ्तरों पर पहुँच गया और छापेमारी शुरू हो गयी।

मीडिया को अपने साथ रखना,  2014 से नरेंद्र मोदी की अगुआई में आये राज की लाक्षणिक विशेषता है। इस समस्या को हल करने के लिए पहले उस पर कारपोरेट मालिकों का वर्चस्व स्थापित किया गया। आज देश का सबसे बड़ा मीडिया मालिक मुकेश अम्बानी समूह है। अडानी भी पीछे नहीं है। खुद मोदी और उनका हिन्दुत्व चूंकि कारपोरेट के साथ नत्थी हैं इसलिए कारपोरेट मीडिया का उनके साथ नत्थी होना स्वाभाविक बात थी। बचेखुचे मीडिया के लिए सरकारी और कारपोरेट दोनों तरह के विज्ञापनों को रोकने की छड़ी इस्तेमाल की गयी। याचक बनने के लिए झुकना होता है – मगर यहां कुछ ज्यादा ही हुआ; ज्यादातर मीडिया घुटनो के बल रेंगने लगा। कोरोना के दिनों में मौतों के मामले में जाग्रत हुआ दैनिक भास्कर भी इन्हीं में शामिल था। झुकने या रेंगने में जिसने भी थोड़ी बहुत आंय-ऊँय करने की कोशिश की उसके लिए छड़ी के साथ साथ प्रवर्तन एजेंसियों की लाठी भी इस्तेमाल की गयी। छोटे मंझोले मीडिया हाउस इसके शिकार बने। वेब न्यूज़ पोर्टल द वायर और न्यूज़क्लिक आदि ख़ास निशाना थे – हालांकि किसी बड़े अखबार में दैनिक भास्कर पहला है जिस पर यह गाज़ गिरी है। यह कार्यवाही सिर्फ दैनिक भास्कर तक ही नहीं है। मोदी सरकार इसके जरिये बाकी सभी अखबारों और आलोचनात्मक तेवर दिखाने की मंशा रखने वाले मीडिया और अखबारों को भी चेतावनी देना चाहती है।

इस प्रतिशोधात्मक कार्यवाही का लोकतांत्रिक शक्तियों और व्यक्तियों द्वारा विरोध किया जाना लाजिमी था – हुआ भी।

प्रेस और अभिव्यक्ति पर हमले के समय हर जिम्मेदार नागरिक को क्यों खड़ा होना चाहिए?

प्रेस और अभिव्यक्ति पर हमले के समय हर जिम्मेदार नागरिक को खड़ा होना चाहिए। तब भी खड़ा होना चाहिए जब जिस पर हमला हो रहा हो उसकी भी घिग्गी क्यों न बंध जाए। इसलिए कि मीडिया या अखबार किसी सेठ का उत्पाद भर नहीं होते – छपने और अस्तित्व में आने के बाद वे लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति का विस्तार और औजार दोनों होते हैं।

अपने धंधों और मुनाफे की सलामती के लिए सेठ टिके या घुटने टेके, प्रेस के लिए आवाज उठाने वालों को टिकना चाहिए। क्योंकि प्रेस की आजादी और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देश और उसकी मनुष्यता की बाकी आजादी की पूर्व शर्त होती है। मेघालय को लेकर एक झूठी और उन्मादी खबर छापकर / चलाकर (जिसे सोशल मीडिया पर हुयी आलोचनाओं के बाद आंशिक रूप से हटा लिया गया) दैनिक भास्कर के मालिकों ने हुक्मरानों के साम्प्रदायिक एजेंडे को आगे बढ़ाकर अपनी वफादारी साबित करने की चतुराई और खुद को “सुधार” कर जैकारा वाहिनी में शामिल होने की आतुरता दिखाई है।  

लेकिन इस सबके बावजूद इस मीडिया संस्थान की बांह मरोड़ने की सरकारी पार्टी की हिमाकतों की भर्त्सना करना जारी रखनी चाहिए। क्योंकि यह तानाशाही की पदचाप है – 1975 की इमर्जेन्सी में लगी सेंसरशिप से भी ज्यादा धमकदार है। क्योंकि यहाँ फ़िक्र सेठ की नहीं प्रेस की है ; सेठ जाए तेल लेने और नमक बेचने !! क्योंकि 1975 में जिस इंडियन एक्सप्रेस के लिए लड़े थे उसके सेठ रामनाथ गोयनका भी कोई संत नहीं थे। पत्रकारों की तनखा वनखा दूर रही भाई तो उनका पीएफ भी पचा गए थे। मगर एक्सप्रेस के विरुद्ध हुयी कार्यवाही के विरुद्ध देश एक हुआ था।

क्योंकि वाल्टेयर कह गए हैं कि; “हो सकता है मैं तुम्हारे विचारों से सहमत ना हो पाऊं लेकिन विचार प्रकट करने के तुम्हारे अधिकार की रक्षा जरूर करूंगा।”

क्योंकि फासिस्ट हिटलर के हाथों मारे गए पादरी पास्टर निमोलर अपनी कविता में दुनिया भर को सीख दे गए हैं कि;

“पहले वे कम्युनिस्टों के लिए आए

और मैं कुछ नहीं बोला

क्योंकि मैं कम्युनिस्ट नहीं था

फिर वे आए ट्रेड यूनियन वालों के लिए

और मैं कुछ नहीं बोला

क्योंकि मैं ट्रेड यूनियन में नहीं था

फिर वे यहूदियों के लिए आए

और मैं कुछ नहीं बोला

क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

फिर वे मेरे लिए आए

और तब तक कोई नहीं बचा था”

क्योंकि देश – भारत दैट इज इंडिया – इन दिनों अत्यंत असामान्य समय से गुजर रहा है और यह असाधारण सजगता और विवेकपूर्ण हस्तक्षेप की दरकार रखता है।

बादल सरोज

सम्पादक लोकजतन, संयुक्त सचिव अखिल भारतीय किसान सभा

मीडिया पर हमला लोकतंत्र के लिए अशुभ – आइपीएफ

 Attack on media inauspicious for democracy – IPF

मीडिया को आतंकित करने की निंदा

लवखनऊ 23 जुलाई 2021, दैनिक भास्कर अखबार और भारत समाचार जैसे चैनल पर केन्द्र सरकार के इशारे पर इनकम टैक्स विभाग द्वारा की गई छापेमारी की कड़ी निंदा करते हुए आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट ने इसे लोकतंत्र के लिए अशुभ माना है।

आज प्रेस को जारी अपने बयान में आइपीएफ के राष्ट्रीय प्रवक्ता व पूर्व आईजी एस. आर. दारापुरी ने कहा कि कोरोना महामारी में हुई सरकारी लापरवाही का सच दिखाने के लिए बदले की भावना से इन मीडिया संस्थानों की जांच केन्द्र सरकार करवा रही है। यह दमनात्मक कृत्य सच को दबाने का प्रयास है और प्रेस की स्वतंत्रता व अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला है।

उन्होंने कहा कि अंदर से बेहद डरी हुई सरकार असहमति की हर आवाज को कुचल देने पर आमादा है। इसके लिए वह सरकारी मशीनरी का भारी दुरूपयोग कर रही है। कल भी जंतर मंतर पर ‘किसान संसद’ की मीडिया कवरेज करने से मुख्य धारा की मीडिया तक को रोका गया और भारी प्रतिवाद के बाद ही कवरेज की अनुमति दी गई।

दारापुरी ने हर नागरिक से केन्द्र सरकार की इस तानाशाही का प्रतिवाद करने की अपील की।

वाम लेखक मनोरंजन का साधन कैसे बन गया ?

हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता,साहित्यिक पत्रिकाओं के प्रकाशन परिदृश्य की बुनियादी समस्या,साहित्यिक पत्रिकाएं कैसे फलें-फूलें,हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता का राजनीतिक नजरिया

 एक्टविज्मया प्रतिगामिता – What was the impact of the development of the bourgeois press on left-wing literary journalism?

अव्यवस्थित लोकतंत्र और साहित्यिक पत्रकारिता -2

  साहित्यिक पत्रकारिता और खासकर वामपंथी साहित्यिक पत्रकारिता पर बुर्जुआ प्रेस के विकास का क्या असर हुआ है इस पर भी विचार करने की जरूरत है। मुश्किल यह है कि वाम पत्रिकाएं हस्तक्षेप के औजार की तरह इस्तेमाल होती रही हैं, यही काम इन दिनों दलित पत्रिकाएं भी कर रही हैं। इन पत्रिकाओं में बुर्जुआ अवस्था के स्वाभाविक रुझानों और प्रवृत्तियों को लेकर कोई गंभीर विवेचन नजर नहीं आता। ये असल में एक्टिविज्मकी पत्रिकाएं हैं, इनकी सतह पर दिखने वाली राजनीतिक प्रवृत्ति क्रांतिकारी लगती है लेकिन असल में वो प्रति-क्रांतिकारी भूमिका अदा करती है। मसलन्, दलित साहित्य पर हिन्दी पत्रिकाओं के अनेक विशेषांक आए हैं, तमाम दलित पत्रिकाएं छप रही हैं। इनकी समग्रता में क्या भूमिका उभरकर सामने आ रही है ? इनकी संस्कारगत सहानुभूति दलित के साथ है लेकिन वे इसके आगे उसे देख ही नहीं पा रहे हैं। उनके पास दलितमुक्ति का कोई ब्लू-प्रिंट नहीं है। ये सभी पत्रिकाएं एक्टिविज्मकी केटेगरी में आती हैं। इनमें शाब्दिक जनतंत्र के सहारे दलित के प्रति सहानुभूति पैदा करने की कोशिश की जा रही है। इसी शब्द केन्दिकता (लोगोक्रेसी) के सहारे ही बुद्धिजीवियों का समूचा तंत्र खड़ा है। वे एक्टिविज्मके जरिए साहित्य की द्वंद्वात्मक प्रक्रिया पर पर्दा डाले रखना चाहते हैं। वेंजामिन के शब्दों में कहें तो इस तरह के लेखन की अंतर्वस्तु सामूहिक है लेकिन रूप प्रतिक्रियावादी है। फलतः ऐसी रचनाओं का असर क्रांतिकारी नहीं हो सकता।

अनेक साहित्यिक पत्रिकाओं और लेखकों में सामूहिकताबोध बार-बार व्यक्त हुआ है। लेकिन पत्रिकाएं व्यक्तिगत प्रयासों से ही निकल रही हैं, सामूहिक प्रयासों से निकलने वाली पत्रिकाएं नगण्य हैं। राजनीतिक हालात की पार्टी नीति के अनुरूप व्याख्याएं करना या सत्ताधारी वर्गों के द्वारा प्रक्षेपित मसलों पर लिखना, क्रांतिकारी काम नहीं है, बल्कि प्रति-क्रांतिकारी कार्य है।

कायदे से हमें कल्याणकारी पूंजीवादी राज्य में रूपान्तरण की प्रक्रिया और रूपान्तरण के क्रांतिकारी उपकरणों का पता होना चाहिए। हमें उत्पादक एपरेट्स और रुपान्तरण के रूपों का ज्ञान होना चाहिए। हमें इस बात का पता रहना चाहिए कि बुर्जुआ एपरेटस में क्रांतिकारी कलाओं और साहित्य रूपों को आत्मसात करके रुपान्तरित करने की अद्भुत क्षमता होती। हम सोचें कि हमारे तमाम किस्म के क्रांतिकारी लेखकों-संगीतकारों आदि को फिल्मी दुनिया ने कैसे हजम कर लिया ? वाम लेखक मनोरंजन का साधन कैसे बन गया ?

हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता का राजनीतिक नजरिया- Political Perspective of Hindi Literary Journalism

हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता के प्रसंग में यह सवाल उठाया ही जा सकता है कि साहित्यिक पत्रिका का कोई राजनीतिक नजरिया है या नहीं, पत्रिका की राजनीतिक समझ के साथ उसमें प्रकाशित सामग्री का किस तरह का संबंध है ? सही राजनीति के तहत निकलने वाली पत्रिकाओं की गुणवत्ता और खराब राजनीति या राजनीतिविहीन नजरिए से निकलने वाली साहित्यिक पत्रिकाओं के चरित्र में किस तरह का फर्क होता है।

हिन्दी में तीन तरह की पत्रिकाएं हैं पहली कोटि में वे पत्रिकाएं आती हैं जिनका राजनीतिक नजरिया है, दूसरी कोटि में वे पत्रिकाएं आती है जिनका कोई राजनीतिक नजरिया नहीं है, जबकि तीसरीकोटि में वे पत्रिकाएं आती हैं जिनका तदर्थवादी राजनीतिक सा नजरिया है।

साहित्यिक पत्रिकाओं की कहानी उनके मालिक-संपादक के आर्थिक पहलू के बिना पूरी नहीं होती, हमारे यहां कभी यह ध्यान ही नहीं दिया गया कि पत्रिका का आर्थिक बोझ संपादक कैसे उठाता है ? पत्रिकाओं में संपादक के आर्थिक संकट के विस्तृत ब्यौरे गायब हैं। हमने स्वतंत्र तौर पर भी कभी संपादक की आर्थिक बर्बादी को पत्रिकाओं में विषयवस्तु नहीं बनाया। पत्रिकाओं की आर्थिक बर्बादी की न तो दलों को चिंता है और न सरकार को।

पत्रिकाओं के सर्कुलेशन का एक आयाम वितरण और डाक-व्यवस्था के मूल्य सिस्टम से जुड़ा है। सरकार ने कभी सोचा ही नहीं कि पोस्टल-चार्ज ज्यादा रहेगा तो साहित्य का सर्कुलेशन इससे प्रभावित हो सकता है। हमारे सांसदों, लेखकों और प्रकाशकों ने भी कभी इस ओर ध्यान नहीं दिया।

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साहित्यिक पत्रिकाओं के प्रकाशन परिदृश्य की बुनियादी समस्या यह है कि संपादकों में अधिकतर पेशेवर नजरिया नहीं रखते। पेशेवर नजरिए के आधार पर पत्रिका का प्रकाशन नहीं करते। वे पूंजीवादी प्रकाशन प्रणाली के आदिम रूपों का इस्तेमाल करते हैं और आदिम वितरण प्रणाली पर निर्भर हैं। इसके कारण वे बड़े पैमाने पर अपना विकास नहीं कर पाए हैं। दुखद यह है कि साहित्यिक पत्रिका प्रकाशन की मददगार संरचनाएं समाज में एक सिरे से गायब हैं।

साहित्यिक पत्रिकाएं कैसे फलें-फूलें

साहित्यिक पत्रिकाएं ज्यादा से ज्यादा फलें-फूलें इसके लिए जरूरी है कि उनको सरकारी विज्ञापन प्राथमिकता के आधार पर राज्य और केन्द्र सरकार दे। साथ ही पत्रिकाओं को मिलनेवाले चंदे पर आयकर में राहत दी जाय। डीएवीपी और राज्य सरकारों के सरकारी विज्ञापनों के 25फीसदी विज्ञापन अनिवार्यतः साहित्यिक पत्रिकाओं को दिए जाएं। इसके अलावा विभिन्न मंत्रालयों से प्राथमिकता के आधार 25फीसदी विज्ञापन साहित्यिक पत्रिकाओं को दिए जाएं। पत्रिकाओं के पोस्टल वितरण के लिए सरल कानूनी व्यवस्था की जाय और पत्रिका वितरण को मुफ्त पोस्टल सुविधा दी जाय।

साहित्यिक पत्रिकाएं हमेशा से बड़े के खिलाफ छोटे की जंग रही है। बड़े कम्युनिकेशन या प्रतिष्ठानी कम्युनिकेशन और साहित्यिक कम्युनिकेशन के बीच में अंतर्विरोध रहा है, शासक वर्ग और साहित्यिक पत्रिकाओं के बीच अंतर्विरोध रहा है। इस अंतर्विरोध को विस्तार देने की जरूरत है।  

जगदीश्वर चतुर्वेदी

आपातकाल के बाद साहित्यिक पत्रिकाएं मेनीपुलेशन और प्रमोशन का अस्त्र बन गयीं

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 अव्यवस्थित लोकतंत्र और साहित्यिक पत्रकारिता

आजादी के बाद साहित्यिक पत्रकारिता का परिदृश्य- Scenario of Literary Journalism after Independence.

आजादी के बाद का साहित्यिक पत्रकारिता का परिदृश्य तकरीबन इकसार रहा है। पहले भी पत्रिकाओं का प्रकाशन निजी पहल पर निर्भर करता था, आज भी यही दशा है पहले भी साहित्यिक पत्रिकाएं निकलती और बंद होती थीं, यही सिलसिला आज भी जारी है। अनियतकालीन प्रकाशन इसकी नियति है।

अधिकतर साहित्यिक पत्रिकाएं निजी अर्थव्यवस्था यानी संपादक के निजी निवेश पर निर्भर हैं, ये पत्रिकाएं संपादकीय जुनून का परिणाम हैं। साहित्यिक पत्रिकाएं साहित्य का माहौल बनाती हैं। हिन्दी में पत्रिकाएं मूलतः गुट विशेष का प्रकाशन हैं, वे गुट विशेष के लेखकों को छापती हैं।

आपातकाल के बाद साहित्यिक पत्रिकाएं मेनीपुलेशन और प्रमोशन का अस्त्र बन गयीं

खासकर बुद्धिजीवी वर्ग में सन् 1970-71 के बाद सत्ता सुख का जो मोह पैदा हुआ उसने अधिकांश बड़े लेखकों को सत्ता के करीब पहुँचा दिया और इसका यह परिणाम निकला कि साहित्य और साहित्यकार की नई भूमिका का उदय हुआ। साहित्य अब परिवर्तनकामी कम और सत्ताकामी ज्यादा हो गया। आपातकाल इसका क्लासिक नग्नतम उदाहरण है। आपातकाल के बाद तो स्थितियां लगातार खराब ही हुई हैं। सत्ता के प्रतिष्ठानों के इर्दगिर्द साहित्यकारों को गोलबंद किया गया। कई व्यक्ति और संस्थान सत्ता के केन्द्र बनकर उभरे। इनके हस्तक्षेप के कारण साहित्य का स्वतंत्र विकास बाधित हुआ, साहित्यिक पत्रिकाएं मेनीपुलेशन और प्रमोशन का अस्त्र बन गयीं। चंद व्यक्ति महान बन गए, वे ही तय करने लगे कि कौन लेखक है और कौन लेखक नहीं है ! इस अर्थ में 1970-71 के बाद क्रमशः साहित्य की अवनति हुई।

साहित्यिक विवेकवाद- literary rationalism

आज हमारे बीच में साहित्यिक पत्रिकाएं हैं, साहित्य भी है लेकिन संपादकीय विवेक नदारत है। विचारधारा है और उसके आधार पर धड़ेबंदी है, लेकिन साहित्यिक विवेकवाद गायब है। साहित्यिक पत्रिकाओं से संपादकीय विवेकवाद का नदारत होना बहुत बड़ी त्रासदी है।

नियोजित बहसें हैं, प्रमोशन के लिए आलोचनाएं हैं, मांग-पूर्ति के आधार पर लिखा साहित्य है,किताबें हैं। स्वयं नामवर सिंह कह चुके हैं कि मैं फरमाइशी लेखक हूँ” , वे यह भी रहस्य खोल चुके हैं कि उन्होंने कविता के नए प्रतिमानकिताब को भारत भूषण अग्रवाल के कहने से साहित्य अकादमी पुरस्कार के लिए लिखा था।

साहित्य में इनदिनों लेखन के आधार पर छोटे-बड़े लेखक का फैसला नहीं हो रहा, बल्कि रुतबा, संपदा, ओहदा और सरकारी रसूख के आधार पर फैसले हो रहे हैं। लेखक की स्वतंत्रता महत्वपूर्ण मूल्य नहीं है, लेखक के सत्ता संबंध बड़ा मूल्य हो गया है,इसने साहित्यिक पत्रिकाओं में नए किस्म के नियोजित साहित्य विमर्श को प्रतिष्ठित किया है। जिसकी सत्ता में साख है, वही बड़ा लेखक है। इसका परिणाम यह निकला कि लेखकों में सत्ता से जुड़ने की अंधी दौड़ शुरु हुई है। इसका सबसे बढ़िया केन्द्र बने अकादमिक संस्थान और लेखक संघ। इससे लेखक के कर्म और विचार में गहरी दरार पैदा हुई। लेखन का यथार्थ से संबंध खत्म हो गया।

लेखन यानी शब्दों का उत्पादन इसका लक्ष्य है। आज लेखक है, साहित्यिक पत्रिकाएं हैं, संपादक भी है, लेकिन साहित्य का सामाजिक असर नहीं है, लेखक की कोई सामाजिक साख नहीं है। लेखक ने अपने सत्तासुख के कारण सभी किस्म के विमर्शों को प्रशंसा और प्रमोशन में संकुचित कर दिया, ‘विचार मंथनकोसाहित्यिक इवेंटमें तब्दील कर दिया।

 साहित्य उत्पादक या प्रकाशक –

हिन्दी में साहित्यिक पत्रकारिता (Literary Journalism in Hindi) को अनेक लेखक प्रतिवादी पत्रकारिता मानते हैं, इस तरह की धारणा रखने वालों में सामान्य लेखक, दलित लेखक और स्त्री लेखिकाएं भी हैं।

सामान्य तौर पर देखें तो हिन्दी का साहित्यिक पत्रकारिता का परिदृश्य वैविध्यपूर्ण है और इसमें विधागत समृद्धि भी है। इसका स्वैच्छिक पहलकदमी के आधार पर प्रकाशन होता रहा है।

What is the politics of production of art | वाल्टर बेंजामिन के अनुसार पत्रकारिता के विविध आयाम के प्रश्न उत्तर

वाल्टर बेंजामिन के अनुसार प्रतिवादी या परिवर्तनकामी पत्रकारिता या साहित्य में अंतर्वस्तु महत्वपूर्ण नहीं है, महत्वपूर्ण है इसके उत्पादन की अवस्था। कई बार यह भी देखा गया है कि बेहतरीन क्रांतिकारी अंतर्वस्तु को श्रेष्ठतम –व्यावसायिक कला रूपों में पिरोकर पेश किया जाता है। इससे क्रांतिकारी कला का स्वरूप प्रभावित होता है। इसलिए यह सवाल नहीं करना चाहिए कि पार्टनर तेरी पॉलिटिक्स क्या है ? या साहित्य की राजनीति क्या है, यह सवाल ही गलत है।

सवाल यह होना चाहिए कला के उत्पादन की राजनीति क्या है ? ज्योंही इस सवाल पर विचार करेंगे सही रूप में प्रतिवादी संस्कृति को परिभाषित कर पाएंगे।

बेंजामिन तर्क देते हैं कि  सही अर्थ में प्रतिवादी संस्कृति उत्पादन की विशेषज्ञतापूर्ण प्रक्रिया का अतिक्रमण करती है। दूसरे शब्दों में प्रतिवादी संस्कृति कलाकार और दर्शक, निर्माता और उपभोक्ता के बीच की विभाजन रेखा को कम करती है। छोटे-बड़े या ऊँच-नीच, श्रेष्ठ और निकृष्ट के श्रम विभाजन को खत्म करती है। वह सबको सृजन के लिए प्रेरित करती है। हमें इस समूची बहस को प्रोडक्ट केन्द्रित न बनाकर प्रोडक्शनके न्द्रित बनाना चाहिए।

वस्तुस्थिति यह है कि हिंदी पत्रिका संपादक साहित्य का उत्पादक नहीं बन पाया, लेकिन प्रकाशक बन गया। वह प्रोडक्ट बनाता है।

आधुनिक काल आने के साथ छापे की मशीन आई, लेखक की स्वायत्तता को सार्वजनिक तौर पर वैधता मिली, निजता और सार्वजनिकता के बीच में नए किस्म का वर्गीकरण हुआ जो पुराने वर्गीकरण से भिन्न था। पुराने जमाने में लेखक के अंदर निजी-सार्वजनिक का घल्लुघारा था। लेखक की स्वायत्तता पहली बार नजर आई वह जो उचित समझे लिख सकता है, इस अनुभूति को उसने प्रत्यक्ष वैधरूप में लागू किया। पहली बार दो तथ्य सामने आए, इन दोनों तथ्यों की रोशनी में लेखन की परीक्षा होने लगी। पहला, लेखक का राजनीतिक नजरिया और दूसरा रचना की गुणवत्ता। लेखक के सही राजनीतिक नजरिए और साहित्यिक गुणवत्ता के बीच नए संबंध का जन्म हुआ। यह भी कही गयी कि जब राजनीति सही होगी तो अन्य चीजें भी दुरुस्त होंगी।

वाल्टर बेंजामिन का मानना है सामाजिक परिस्थितियां उत्पादन की अवस्था को तय करती हैं। और जब भौतिकवादी नजरिए से देखना आरंभ करते हैं तो विचार करते हैं कि सामाजिक संबंधों का तत्कालीन समय के साथ क्या संबंध था ? साहित्य के लिए यह महत्वपूर्ण सवाल है।

वेंजामिन ने इसी प्रसंग में दो बहुत ही महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं, पहला सवाल, साहित्य का अपने समय के उत्पादन संबंधों के साथ क्या संबंध है ? क्या वह उनको स्वीकार करता है ? क्या वह प्रतिक्रियावादी है ? अथवा उसका नजरिया परिवर्तनकामी है ? या वह क्रांतिकारी है ? इन सवालों पर विचार करने के पहले हम इस सवाल पर सोचें कि अपने समय के उत्पादन संबंधों के प्रति क्या एटीट्यूट है ? उनका नीतिगत नजरिया क्या है ? यह सवाल असल में सामयिक उत्पादन संबंधों के परिप्रेक्ष्य में साहित्य की भूमिका के जुड़ा है. इसका प्रकारान्तर सेतकनीकके सरोकारों से संबंध है।

वेंजामिन के अनुसार साहित्यिक तकनीककी अवधारणा के आधार पर देखेंगे तो पाएंगे कि साहित्यिक उत्पाद (प्रोडक्ट) सीधे सामाजिक या भौतिक मूल्यांकन के लिए उपलब्ध रहता है। साथ ही साहित्यिक तकनीक की अवधारणा के आधार द्वंद्वात्मक ढंग से विवेचन को आरंभ किया जा सकता है। इसके जरिए साहित्य की रूप और अंतर्वस्तु की निरर्थक बहस से भी बचा जा सकता है। इसके अलावा प्रवृत्ति और गुणवत्ता के निर्धारकों की खोज की जा सकती है।

बेंजामिन के अनुसार कृति की राजनीतिक प्रवृत्ति में साहित्यिक गुणवत्ता और साहित्य प्रवृत्ति शामिल है। साहित्य प्रवृत्ति में साहित्यिक तकनीक की प्रगति या प्रतिगामिता भी समाविष्ट है।

   साहित्य के उत्पादन पर विचार करते समय इसकी अनिवार्य अवस्था पर भी सोचें। साहित्य किस तरह की अनिवार्य परिस्थितियों में पैदा हो रहा है। इससे लेखन की ठोस परिस्थितियों का पता चलेगा, यह भी पता चलेगा कि लेखक के पास व्यवहार में कितनी स्वायत्तता है। इस समूची प्रक्रिया पर नजर रखते हुए सही राजनीति और प्रगतिशील साहित्यिक तकनीक के अन्तस्संबंध को समझने में मदद मिलेगी। मसलन्, साहित्यिक पत्रिकाएं लेखक –पाठक को सूचित कर रही हैं ,विवेचन पेश किया जा रहा है। लेखक परिस्थितियों में हस्तक्षेप कर रहा है या दर्शक मात्र है ? हिन्दी पत्रिकाओं में लिखने वाले अधिकांश लेखक रुढ़िबद्ध नजरिए और रुढ़िबद्ध शैली के शिकार हैं।

सवाल यह है कि क्या रुढ़िबद्ध लेखन के जरिए सामाजिक परिवर्तन संभव है ? इस तरह के लेखन का किस पर और कितना असर होता है ? इस तरह के लेखन ने लेखक और पाठ के बीच में अलगाव पैदा किया।

जगदीश्वर चतुर्वेदी

जानिए जस्टिस काटजू ने क्यों कहा ‘गोदी’ मीडिया और ‘मुक्त’ मीडिया में बहुत अंतर नहीं है

 जस्टिस मार्कंडेय काटजू का मीडिया पर हिंदी में लेख

The pitiable condition of the Indian media: Justice Katju points out there is little difference between the ‘godi’ media and the ‘free’ media’

भारतीय मीडिया अब दो खेमों में बंट गया है

 (1) बहुसंख्यक, जो बेशर्म, बिक चुकी और चापलूस गोदीमीडिया है। इस शिविर के लोग भारत की परिस्थितियों की एक गुलाबी तस्वीर पेश करते हैं ( नाज़ी प्रचार मंत्री डॉ गोएबल्स Dr Goebbels की तरह, जो कहते रहे कि जर्मनी द्वितीय विश्व युद्ध जीत रहा था, जब कि स्पष्ट रूप से हार रहा था)। वे सरकार के आलोचकों को देशद्रोही, माओवादी, ‘टुकड़े-टुकड़ेगैंग आदि के रूप में चित्रित करते हैं, और पाकिस्तान के खिलाफ भावनाओं को भड़काते हैं, जिसे शैतान के रूप में चित्रित किया जाता है, और मुसलमानों को अक्सर देशद्रोही, कट्टर और आतंकवादी के रूप में ब्रैंड करते है।

इस शिविर का नेता एक टीवी एंकर है जिसे मैं लॉर्ड भो भो ( Lord Bhow Bhow ) कहता हूं ( लॉर्ड हौ हौ नाज़ियों के लिए रेडियो प्रसारण देते थे और बाद में उन्हें फांसी दे दी गई )। उसने एक अनुकरणीय शैली विकसित की है, और वह अपने झुंड से बहुत आगे है। एक पत्रकार के रूप में तटस्थ और निष्पक्ष होने के बजाय वह लगातार अपने टीवी शो पर भाजपा सरकार की लाइनों को दोहराता है, चीखता है और पागल की तरह चिल्लाता है उन सभी पर जो शो में उससे असहमत हैं, उन्हें बोलने के लिए बहुत कम समय देता है (वास्तव में वह ज्यादातर समय खुद बोलता है), और अल्पसंख्यकों के खिलाफ सांप्रदायिक भावनाओं और पाकिस्तान के खिलाफ द्वेष और शत्रुता को भड़काता है I सत्य उसके लिए पूरी तरह बेमतलब और अप्रासंगिक है, जैसा कि डॉ गोएबल्स के लिए था, और वह बिना किसी हिचक के तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश करता हैI

शिविर के अन्य लोग भी उसी का अनुसरण करते हैं, जिसमें अंग्रेजी और हिंदी दोनों टीवी चैनलों के कई एंकर शामिल हैं। गुलाम प्रिंट मीडिया भी ज्यादातर इसी खेमे में है।

(2) अल्पसंख्यक, जो प्रत्यक्ष रूप से भाजपा का विरोधी और एक स्वतंत्रमीडिया और ईमानदार होने का दिखावा करता है, वास्तव में भाजपा विरोधी संघर्ष और भाजपा विरोधी ताकतों की एक गुलाबी तस्वीर पेश करके तथ्यों से परे है।

यह शिविर सरकार द्वारा कोविड संकट, बढ़ती बेरोजगारी, किसान आंदोलन, आदि के बारे में गलत तरीके से व्यवहार करने पर जोर देता है, लेकिन जानबूझकर यह नहीं कहता है कि इस सब के बावजूद भारतीय लोगों के बीच मोदी की लोकप्रियता रेटिंग, जैसा कि कई जांच रिपोर्टों में पता चला है, अपरिवर्तित है और अभी भी बहुत ज़्यादा है।

इन लेखों को पढ़ें-

The Badshah of Indian Politics: Why the BJP government’s flops don’t affect Modi’s popularity among India’s young – https://www.edexlive.com

The reason why PM Modi’s popularity doesn’t change – https://www.youtube.com

इस खेमे में एक पत्रकार है, जिसका नाम मैंने मिकी माउस ( Mickey Mouse ) रखा है, जो सालों से एक गोदी मीडियाटीवी चैनल में अग्रणी पद पर था। बाद में वहां से बर्खास्त होने पर जमकर भाजपा विरोधी हो गए। अब वह अपना खुद का YouTube चैनल चलाता है, जिसके बारे में उनका दावा है कि उसके एक साल के भीतर 1.5 मिलियन फॉलोवर्स और 240 मिलियन से अधिक बार देखा गया है।

उनका काम करने का तरीका सरल है : वे एक गर्म विषय को उठाते हैं और फिर लगातार उसके पीछे पड़ जाते हैं, और इस तरह यह धारणा बनाते हैं कि वह ग्राउंड जीरो ( ground zero ) से रिपोर्ट करते हैं, जबकि अन्य पत्रकार शायद ही कभी ऐसा करते हैं।

उदाहरण के लिए, उन्होंने किसानों के आंदोलन का मुद्दा उठाया, और फिर महीनों तक सिंघू, टिकड़ी, या ग़ाज़ीपुर सीमा पर सुबह-सुबह राकेश टिकैत और अन्य लोगों का साक्षात्कार लिए। बाद में वे पश्चिम बंगाल चुनाव को कवर करने के लिए कोलकाता चले गए।

दिल्ली लौटने पर वह किसानों के संघर्ष की प्रशंसा करते रहे, लेकिन जानबूझकर इस सच्चाई की रिपोर्ट नहीं की कि यह काफी हद तक फीकी पड़ गई है, कि दिल्ली की सीमाओं पर भीड़ अब कुछ हज़ार ही है (जबकि पहले यह लाखों की थी)।

एक महिला पत्रकार हैं, जिन्हें मैं मैडम पोम्पडौर ( Madame Pompadour ) कहता हूं, जो राडिया टेपों ( Radia Tapes ) में लिप्त थीं, और उन्हें लगा कि जब कांग्रेस, जिसके वे करीब थीं, सत्ता में थीं, तो वह केंद्रीय सरकार के मंत्रालयों के विभागों को वितरित कर देंगी। जब भाजपा सत्ता में आई तो वह रोने लगी और किकियाने लगी कि अब कोई उससे संपर्क नहीं करता, लेकिन इस हालत की वह खुद दोषी है। क्या एक पत्रकार का काम किसी राजनीतिक दल के साथ तालमेल बिठाना और उसके नेताओं के साथ मित्रता बढ़ाना है?

बाद में वह अपनी टीम के साथ कोविड पीड़ितों के बारे में रिपोर्ट करने के लिए देश भर में गईं, जिनके लिए उनके दिल से खून बह रहा था (उनका दिल बहुत आसानी से और बार-बार छल्ली हो जाता है ) लेकिन उन्होंने अभी तक यह खुलासा नहीं किया है कि इसके लिए उनकी टीम को किसने फंड किया।

एक हिंदी पत्रकार हैं, जिसे मैं हम्प्टी डम्प्टी ( Humpty Dumpty ) कहता हूं (क्योंकि हम्प्टी की तरह वह गिर पड़े थे ), जो एक टीवी चैनल के प्रमुख एंकर थे, लेकिन जब अंदेशा हुआ कि वह बर्ख़ास्त कर दिए जाएंगे, तो उन्होंने जल्दी से इस्तीफा दे एक नए राजनीतिक दल में शामिल हो गए, यह सोचकर कि वह राजनीति में आगे जायेँगे। लेकिन जब उन्हें राज्यसभा टिकट नहीं मिला तो वे खिन्न हो गए, और अब दूसरों के साथ मिलकर एक हिंदी वेबसाइट शुरू कर दी है, जिस पर वे हमेशा भाजपा की आलोचना करते हैं। पत्रकारिता, राजनीति की तरह, अजीबोगरीब बेडफेलो बनाती है ( journalism, like politics, makes strange bedfellows ) I

एक अंग्रेजी मीडिया पत्रकार हैं जो सरकार की आलोचना करते हैं, कुछ अन्य लोगों के साथ एक वेबसाइट चलाते हैंI वह हमेशा प्रेस की स्वतंत्रता की वकालत करते हैं, लेकिन इसका अमल करने में विश्वास नहीं करते, क्योंकि वह कभी भी अपने विचारों से अलग विचारों को अपने पोर्टल में प्रकाशित करने की अनुमति नहीं देते (उदाहरण के लिए यह विचार कि भारत की विशाल समस्याओं का समाधान संवैधानिक ढांचे के बाहर है, या मुसलमानों को शरिया, बुर्का और मदरसों को छोड़ना होगा यदि वे प्रगति करना चाहते हैं), यहां तक कि इस अस्वीकरण ( disclaimer ) के साथ भी नहीं कि प्रकाशित विचार प्रकाशकों के नहीं हैं। मैंने उसका उपनाम पीडीपी (PDP) रखा है (प्रचार करें लेकिन अभ्यास न करें‘ – Preach but don’t practice)

फिर भी, इस मुक्तमाध्यम को जीवित रखने के लिए जनता से एक सप्ताह में कई लाख रुपये दान करने की भीख माँगने वाले उनके पोर्टल से रोजाना कई बार ट्वीट आते रहते हैं।

तो वास्तव में गोदीमीडिया और मुक्तमीडिया में बहुत अंतर नहीं है।

जस्टिस मार्कंडेय काटजू , पूर्व न्यायाधीश सुप्रीम कोर्ट ऑफ़ इंडिया

जस्टिस काटजू ने बताया भारतीय मीडिया का मानसिक स्तर कितना नीचा है

Ajit Anjum Ashutosh Justice Katju

भारतीय मीडिया का मानसिक स्तर

हमारी मीडिया का मानसिक स्तर कितना नीचा है वह इस वीडियो से मालूम हो जाता हैI

हर राजनैतिक व्यवस्था या राजनैतिक कार्य का एक ही परख और कसौटी है : क्या उससे आम लोगों का जीवन स्तर बढ़ रहा है कि नहीं ? क्या उससे लोगों को बेहतर ज़िन्दगी मिल रही है कि नहीं ? क्या उससे लोगों को ग़रीबी, बेरोज़गारी, कुपोषण, स्वास्थ लाभ और अच्छी शिक्षा के अभाव से निजात मिल रहा है कि नहीं ?

इस नज़रिये से देखा जाए तो स्पष्ट है कि कांग्रेस पार्टी रहे या बिखर जाए, का कोई महत्त्व नहीं है, क्योंकि वह रहे या बिखर जाए इससे आम आदमी के जीवन पर कोई असर नहीं पड़ेगाI

इसलिए ऐसे सवाल पूछना ही मूर्खता और फ़िज़ूल हैI

महत्वपूर्ण सवाल सिर्फ एक ही है कि हम कैसे ऐसी राजनैतिक और सामाजिक व्यवस्था का निर्माण कर सकते हैं जिसके अंतर्गत हमारी जनता का जीवन स्तर तेज़ी से बढ़े और लोगों को खुशहाल जीवन मिले ?

एक अन्य वीडियो का अवलोकन करें

सुशांत सिंह राजपूत ने आत्म हत्या की या उसका क़त्ल हुआ इस सब से आम आदमी के जीवन का क्या सरोकार ? पर हमारी महान मीडिया इस विषय को रात दिन चलाती हैI

हमारी मीडिया आजकल बड़े अटकले लगा रही है कि फरवरी २०२२ के उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में बीजेपी का क्या हाल होगा ? पर इसका क्या महत्त्व ? बीजेपी जीते या हारे, आम आदमी का जीवन स्तर वैसा का वैसा बना रहेगा, चाहे सपा बसपा या कांग्रेस, या उनकी साझा सरकार, सत्ता में आयेI यानी ग़ुरबत बेरोज़गारी, कुपोषण आदि में कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा

अब यह वीडियो देखियेI इसका शीर्षक है क्या प्रियंका की सक्रियता से खड़ी होगी कांग्रेसI

यह सवाल ही पूछने वाले की मूर्खता और निम्न समझ दर्शाता हैI

कांग्रेस का उत्तर प्रदेश में वोट बैंक था दलित + उच्च जाति + मुस्लिमI इनमें से दलित चले गए बसपा में, उच्च जाति चले गए भाजपा में, और मुस्लिम चले गए सपा मेंI यानी कांग्रेस के वोट बैंक का तो सफाया हो गयाI

इसके अलावा, यदि कांग्रेस सत्ता में आ भी जाए ( जिसकी संभावना नगण्य है ) तो भी आम आदमी के जीवन पर क्या फ़र्क़ पड़ेगा ? क्या ग़रीबी, बेरोज़गारी, कुपोषण आदि ख़त्म या कम हो जाएगा ? बिलकुल नहींI कहा जाता है कि कांग्रेस शासनकाल में तो भ्रष्टाचार अपनी चरम सीमा पर था,  सोनिया गाँधी अरबों रुपये विदेश ले गयीं, और प्रियंका गांधी के पति रोबर्ट वढेरा ने खूब लूट मचाईI तो फिर प्रियंका क्या उखाड़ेंगी ?

अब यह वीडियो देखियेI इससे जनता के जीवन या जनता की समस्याओं से कोई सरोकार दिखाई देता है ?

अब इस परमज्ञानी की आकाश वाणी सुनिएI यह महानुभाव ने राहुल गाँधी जैसे महत्वहीन व्यक्ति के बारे में क्या कहा आप ही समझिये

या इन महाशय को सुनिए जो गोदी मीडिया के एक टीवी चैनल में कई वर्ष बड़ी पद पर थे, पर अब ‘स्वतंत्र’ हो गए हैं

वास्तव में हमारी अधिकाँश मीडिया का जनता की समस्याओं में कोई रूचि नहीं हैI लोग ग़रीब रहें, बेरोज़गार और भूखे रहें, इस सब से उनका कोई सरोकार नहींI उनकी रूचि है टी आर पी ( TRP ) बढ़ाना, फॉलोवर्स बढ़ाना और माल कमाना,  जनता जिए या मरेI

जस्टिस मार्कंडेय काटजू

लेखक प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के पूर्व चेयरमैन और सर्वोच्च न्यायालय के अवकाशप्राप्त न्यायाधीश हैं।

जस्टिस काटजू ने पत्रकारों को जनरल वी के सिंह द्वारा प्रेस्टिट्यूट्स कहने को अब सही क्यों ठहराया ?

Justice Markandey Katju

कहाँ वोल्टेयर और रूसो और कहाँ भारतीय पत्रकार ? कहाँ राजा भोज और कहाँ गंगू तेली ?

आजकल कई समाचारपत्रों, वेबसाइट और टीवी चैनल पर पत्रकारों द्वारा यही चर्चा चल रही है कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद से योगी आदित्यनाथ हटाए जाएंगे कि नहीं, अरविन्द कुमार शर्मा, जो मोदीजी के बहुत क़रीबी माने जाते हैं, को योगी आदित्यनाथ उत्तर प्रदेश में किसी बड़े पद पर आने देंगे कि नहीं, २०२२ के उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में बीजेपी जीतेगी कि हारेगी, आदि ?

यह सब भारतीय पत्रकारों की अल्पबुद्धि और सतही ज्ञान को प्रदर्शित करती हैI

हर राजनैतिक व्यवस्था और हर राजनैतिक कार्य की एक ही परख और कसौटी होती है, और वह है कि क्या उससे आम आदमी का जीवन स्तर बढ़ रहा कि नहीं, क्या उससे आम आदमी को बेहतर ज़िन्दगी मिल रही है कि नहीं, क्या ग़ुरबत बेरोज़गारी महंगाई, कुपोषण, स्वास्थ्य लाभ और अच्छी शिक्षा की कमी, दूर हो रही है कि नहीं ?

इस दृष्टिकोण से देखा जाए तो क्या फर्क पड़ेगा यदि योगी आदित्यनाथ मुख्य मंत्री पद पर बने रहें या हटाएँ जाएँ, अरविन्द कुमार शर्मा उत्तर प्रदेश के किसी बड़े पद पर आएं या न आएं, बीजेपी चुनाव में हारे या जीते ?ऐसा परिवर्तन हो भी जाए तो भी आम आदमी की ज़िन्दगी पर इसका क्या असर होगा ? कुछ भी नहीं I

ग़रीबी, बेरोज़गारी, महंगाई, कुपोषण, किसानों पर संकट, आदि वैसे के वैसे ही बने रहेंगेI तो फिर जिन बातों पर हमारे ‘बुद्दिजीवी’ पत्रकार हो हल्ला मचा रहे हैं उनका क्या महत्त्व ? जनता के असल मुद्दों और असल समस्याओं पर चर्चा करने के बजाये इन हलकी और तुच्छ विषयों पर क्यों कर रहे हैं जिनके आम आदमी के जीवन से कोई सरोकार नहीं ?

वास्तव में हमारे पत्रकार सतही और अल्प बुद्धि के हैं परन्तु वह दिखावा करते हैं कि वह ब्रह्मा जैसे परमज्ञानी हैंI दुर्भाग्यवश हमारी जनता का मानसिक स्तर इतना पिछड़ा है कि वह इन ढोंगियों के चक्कर में आ जाते हैं और उनके वेबसाइट या यूट्यूब चैनल के फॉलोवर्स बन जाते हैं ( एक पत्रकार ने हाल में कहा कि उसके १० लाख यूट्यूब चैनल के फॉलोवर्स हैं ) I इन पत्रकारों को वास्तव में इतिहास, अर्थशास्त्र, विज्ञान आदि का सतही और छिछोरा ज्ञान है, पर वह पाखण्ड करते हैं कि वह सर्वज्ञ हैं और दुनिया भर के हर विषय पर अपने ज्ञान का बखान करते हैंI

गोदी मीडिया की तो बात करना ही फ़िज़ूल है, पर तथाकथित ‘स्वतंत्र’ मीडिया का क्या हाल है ? इनमें कई  पत्रकार तो कई वर्ष गोदी मीडिया में ही उच्च पद पर थे, पर जब किन्हीं कारणवश वहाँ से निकाले गए एकाएक ‘स्वतंत्र’ और ‘ईमानदार’ हो गएI

एक साहेब मीडिया के जगत से राजनीति में कूद पड़े, शायद यह सोच कर कि शीघ्र ही संसद सदस्य या मंत्री बनेंगे, पर जब दाल नहीं गली और उनको राज्य सभा का टिकट नहीं मिला तो पुनः कूद के मीडिया के जगत में आ गएI

एक महिला पत्रकार हैं, जो कांग्रेस पार्टी की बड़ी क़रीब मानी जाती थींI वह नीरा राडिया काण्ड में लिप्त थीं और केंद्र सरकार के मंत्रालय बांटती थीं, और कई वारदातों में उनकी भूमिका संदेहात्मक थीI जब कांग्रेस का पलटा पलट गया वह विलाप करने लगीं, पर अब बड़ी ज़ोर शोर से अपनी वेबसाइट शुरू करके फिर पत्रकारिता जगत में कूद पड़ींI

हकीकत यह है कि भारत के पत्रकारों का काम है जनता का ध्यान असल मुद्दों से भटकाकर नगण्य तुच्छ मुद्दों ( जैसे फ़िल्मी कलाकारों का जीवन और उनके घोटाले, क्रिकेट, हमारी घटिया राजनीति,आदि ) की और मोड़ देना, ताकि जनता बेवक़ूफ़ बनी रहे और अपनी वास्तविक आज़ादी ( जो आर्थिक सामाजिक आज़ादी होती है ) के लिए ऐतिहासिक जनसंघर्ष और जनक्रांति न कर सकेI

इन पत्रकारों को जनरल वी के सिंह ने सही ही प्रेस्टिट्यूट्स  ( presstitutes ) कहा I

जस्टिस मार्कंडेय काटजू

लेखक प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के पूर्व चेयरमैन और सर्वोच्च न्यायालय के अवकाशप्राप्त न्यायाधीश हैं।

बीजेपी का भविष्य : स्वघोषित बुद्धिजीवी पत्रकारों के उतावलेपन पर जस्टिस काटजू की दो टूक

Ajit Anjum Ashutosh Justice Katju

बीजेपी का भविष्य

कई पत्रकार, वेबसाइट और टीवी चैनल कह रहे हैं कि बीजेपी की जनप्रियता गिर रही है और इसलिए उसका भविष्य अंधकारमय हैI (संदर्भ के लिए लेख के अंत में यूट्यूब लिंक देखें)

यह स्वघोषित बुद्धिजीवी पत्रकार फरवरी 2022 के उत्तर प्रदेश विधान सभा के आगामी चुनाव के बारे में अटकलें लगा रहे हैं कि इसमें बीजेपी की दुर्दशा होगी, जिसका संकेत हाल के उत्तर प्रदेश पंचायत चुनाव से मिलता है।

यह सही है कि इस वक़्त बढ़ती बेरोज़गारी, कोरोना महामारी आदि से बीजेपी की जनप्रियता घटी हैI पर यह तथाकथित बुद्धिजीवी पत्रकार एक बात भूल जाते हैं : जनता की याददाश्त कमज़ोर और अल्पदृष्टि से युक्त होती है ( public memory is short ) I

अभी भी उत्तर प्रदेश के चुनाव आने में आठ महीने हैंI इस बीच कई घटनाएं हो सकती हैं, उदाहरणस्वरूप वाराणसी का ज्ञानव्यापी मस्जिद और मथुरा का शाही मस्जिद कुछ तत्वों द्वारा गिराया जा सकता है, जैसा कि बाबरी मस्जिद का हाल हुआ, और सांप्रदायिक दंगे बड़े पैमाने पर आयोजित करवाए जा सकते हैं, जैसे गुजरात में 2002 में हुए या 2013 में मुज़फ्फरनगर मेंI यह सब चुनाव आने के एक दो महीने पहले करवाए जा सकते हैं, और इन पर उत्तर प्रदेश पुलिस आँख मूंदे रहेगी क्योंकि उत्तर प्रदेश में बीजेपी की सरकार हैI

अपनी गिरती लोकप्रियता देखते हुए ऐसी घटनाएं निश्चित होंगी जैसे 2019 के लोकसभा चुनाव के पूर्व बालाकोट पर हमला, जिसके बाद कहा गया “हमने घर में घुस कर मारा है”, और भारत के नागरिकों ने खूब तालियां बजायींI

मैंने कई बार कहा है कि भारत के 90% लोग बेवक़ूफ़ और भावुक होते हैं, न कि समझदारI वोट डालते समय जाति-बिरादरी देखते हैं न कि असल मुद्दे जैसे गरीबी, बेरोजगारी, महंगाई, भुखमरी और स्वास्थ्य लाभ का अभाव आदि। इसलिए उन्हें आसानी से झांसा दिया जा सकता हैI इंदिरा गाँधी ने ग़रीबी हटाओ का नारा दिया और जनता ने समझा अब तो ग़रीबी निश्चित हटेगीI मोदी ने विकास का नारा दिया और लोग समझे अब अवश्य विकास होगाI

हमारे संविधान में लिखा है कि भारत धर्मनिरपेक्ष देश है पर वास्तविकता कुछ और ही हैI भारत में अधिकांश हिन्दू सांप्रादायिक होते हैं और अधिकांश मुसलमान भीI साम्प्रदायिक भावनाएं आसानी से भड़कायी जा सकती हैं और चुनाव जब निकट होंगे तो ऐसा अवश्य होगाI क्योंकि हमारी 80% आबादी हिन्दू है इसलिए बीजेपी फिर चुनाव जीतेगी और सत्ता में आएगीI

जस्टिस मार्कंडेय काटजू

(लेखक प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के पूर्व चेयरमैन और सर्वोच्च न्यायालय के अवकाशप्राप्त न्यायाधीश हैं।)

भारत के ‘स्वतंत्र’ पत्रकारों के विचित्र कारनामे

Justice Markandey Katju

The bizarre exploits of India’s ‘independent’ journalists

भारत में ‘गोदी’ मीडिया की तो बहुत निंदा हुई है, मगर हमारे तथाकथित ‘स्वतंत्र’ पत्रकारों की हरकतें, हथकंडे और अनोखे कार्य भी आश्चर्यजनक और टिप्पणी योग्य हैंI

उदाहरण के लिए एक महिला पत्रकार हैं, जो राडिया टेप्स के स्कैंडल में लिप्त थींI 1999 की कारगिल युद्ध और 2008 के मुंबई आतंकी हमले में भी उनकी कवरेज विवादों में घिरी थीI 2014 में बीजेपी के सत्ता में आने के बाद शायद कांग्रेस पार्टी नेताओं से क़रीबी के कारणवश उनको अपने टीवी चैनल से त्यागपत्र देने पर मजबूर किया गयाI इस बात पर वह बहुत दिन विलाप करती रहीं कि उनको अकेला कर दिया गया हैI बाद में उन्होंने अपना वेबसाइट बनायाI

अप्रैल 2020 के लॉकडाउन के बाद वह देश के कई भागों में अपनी टीम के साथ भ्रमण करती रहीं और प्रवासी मज़दूरों की आपदा पर कवरेज करती रहीं जो लगातार ट्विटर आदि पर दिखाया गया, शायद यह दिखाने के लिए कि उनके सीने में कितना दर्द है इन पीड़ित ग़रीबों के लिएI उन्होंने यह कभी नहीं बताया कि इस देश भर के उनके और उनके साथियों के भ्रमण का पैसा कहाँ से आया ?

एक अन्य पत्रकार हैं जो कई वर्ष तक ‘गोदी’ मीडिया के एक टीवी चैनल में उच्च पद पर थेI वहाँ से मजबूरन त्यागपत्र देने के बाद अब उन्होंने अपना यूट्यूब चैनल शुरू कर दिया है, जिसमें वह अक्सर मोदी और बीजेपी पर प्रहार करते हैंI किसान आंदोलन के दौरान वह प्रायः सुबह से शाम तक सिंघू, टिकरी या ग़ाज़ीपुर सीमा पर जमे रहते थे और विशेषकर किसान नेता राकेश टिकैत का साक्षात्कार लेते रहेI बाद में वह बंगाल के चुनाव को कवर करने बंगाल पहुँच गएI अब देखते हैं और क्या-क्या आगे कलाबाज़ी करेंगे और पेंगें लेंगे I

एक अन्य पत्रकार हैं जो एक टीवी चैनल के उच्च पद पर थेI जब उस चैनल को एक बड़े उद्योगपति ने खरीद लिया और उन्हें लगा उनकी छंटनी होने जा रही है कूदकर एक राजनैतिक दल में दल शामिल हो गए, संभवतः यह सोचकर कि राजनीति में वह ऊंचे पद पर पहुंचेंगेI जब उन्हें राज्य सभा का टिकट नहीं मिला तो खिन्न होकर वह राजनैतिक पार्टी छोड़कर पुनः पत्रकारिता के जगत में आ गए और कुछ लोगों के साथ अपना वेबसाइट शुरू कर दिया जो प्रायः मोदीजी और बीजेपी की आलोचना करता हैI

यही वेबसाइट में ऊंचे पद पर एक अन्य पत्रकार हैं जो कई वर्ष ‘गोदी’ मीडिया के एक टीवी चैनल में उच्च पद पर थे, पर अब गिरगिट जैसे अपना रंग बदल लियाI

संभवतः इन महारथियों की सोच यह है कु शीघ्र मोदीजी और बीजेपी का अंत होने वाला है, तो क्यों न डूबते सूरज की आलोचना करें और लोकप्रिय हो जाएँ ?

पर यदि यह सूरज नहीं डूबा तो फिर क्या होगा ? इसे भी इन महानुभावों को सोचना चाहिएI

जस्टिस मार्कंडेय काटजू

लेखक प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के पूर्व चेयरमैन और सर्वोच्च न्यायालय के अवकाशप्राप्त न्यायाधीश हैं।   

जस्टिस काटजू का लेख : मीडिया की भूमिका

Justice Markandey Katju

मीडिया की भूमिका

मीडिया की मुख्य भूमिका होती है जनता को वारदातों की सही जानकारी देना। पर इसके अलावा उसकी यह भी ज़िम्मेदारी होती है कि जनता को उज्ज्वल जीवन पाने की दिशा दिखाना और वैचारिक क्षेत्र में जनता को सही नेतृत्व प्रदान करना।

ऐतिहासिक दृष्टिकोण से मीडिया का उदय पश्चिमी यूरोप में १८वीं सदी में हुआ। उस समय सारे सत्ता के उपकरण सामंती शासकों ( राजा, जमींदार और उनके नुमाइंदों ) के हाथों में थी।

इसलिए जनता को ऐसे उपकरणों का निर्माण करना पड़ा जो उनकी नुमाइंदगी कर सकें और उनकी हितों की रक्षा कर सके। इन उपकरणों में मीडिया एक शक्तिशाली उपकरण था जिसका बहुत प्रयोग यूरोप में हुआ।

महान लेखक जैसे वोल्तेयर ( Voltaire ), रूसो ( Rousseau ), थॉमस पैन ( Thomas Paine ), आदि ने मीडिया द्वारा ( जो उस समय पर्चों, लघुपत्रों आदि के रूप में थी न कि दैनिक समाचार पत्रिकाओं के रूप में ) सामंती व्यवस्था पर करारा प्रहार किया, और आधुनिक समाज के निर्माण में बड़ा योगदान दिया।

आज भारत बड़े संकट में है- भीषण ग़ुरबत, बेरोज़गारी, कुपोषण, स्वास्थ लाभ और अच्छी शिक्षा का अभाव के शिकंजे में। इन समस्याओं से निजात पाने के लिए मीडिया भी बड़ा योगदान कर सकता है और खुशहाल भारत के निर्माण में बड़ी मदद कर सकता है, जैसा कि १८वीं सदी के यूरोपीय मीडिया ने किया। पर क्या वह ऐसा कर रहा है ?

अधिकाँश मीडिया तो बिकाऊ, बेशर्म, चाटुकार,  गोदी मीडिया हो गयी है, उसकी तो बात करना ही फ़िज़ूल है। मगर उस मीडिया के बारे में क्या कहा जाए जो अपने को स्वतंत्र कहती है ? क्या वह भारत की जनता को वैचारिक नेतृत्व दे रही है, जो उसकी ज़िम्मेदारी है, ताकि एक उज्ज्वल भारत का निर्माण हो सके ? क़तई नहीं।

अधिक से अधिक वह सत्तारूढ़ बीजेपी की आलोचना करती है, पर जनता को यह नहीं बताती कि मौलिक परिवर्तन के लिए राजनैतिक दल बदलने से कुछ न होगा बल्कि सारी व्यवस्था ही बदलनी होगी।

ऐसा करने के लिए एक महान एकजुट ऐतिहासिक क्रांतिकारी जनसंघर्ष करना होगा, जाति और धर्म की दीवारों को तोड़कर,  जिसमें बड़ी क़ुर्बानियां देनी होंगी, और ऐसी राजनैतिक व्यवस्था का निर्माण करना होगा जिसके अंतर्गत तेज़ी से औद्योगीकरण हो और जनता को अच्छा जीवन मिले।

परन्तु हमारी तथाकथित ‘स्वतंत्र’ मीडिया ऐसा कभी नहीं करती, बल्कि जो लोग इन विचारों को व्यक्त करना चाहते हैं उनके भी लेखों को कभी प्रकाशित नहीं करती। तो यह मीडिया क्या वास्तव में स्वतंत्र है ? और क्या यह जनता के प्रति अपना दायित्व निभा रही है ?

हकीकत यह है कि हमारे पत्रकारों की समझ सतही अल्पज्ञ और छिछोरी है और उनकी मोटी बुद्धि है। शायद ही उन्होंने इतिहास, अर्थशास्त्र आदि का गहरा अध्ययन किया है। तो ऐसे पत्रकारों से क्या उम्मीद की जा सकती है ?

जस्टिस मार्कंडेय काटजू

लेखक प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के पूर्व चेयरमैन व सर्वोच्च न्यायालय के अवकाशप्राप्त न्यायाधीश हैं।

जस्टिस काटजू ने कहा “सत्यहिंदी.कॉम” की मोटी बुद्धि सिर्फ मोदी विरोध तक सीमित है

Justice Markandey Katju

Justice Katju said that the idea of “Satyahindi.com” is limited only to the Modi opposition.

एक हिंदी वेबसाइट है सत्यहिंदी.कॉम जो लगातार मोदी और बीजेपी की निंदा कर रहा है।

मैं कोई बीजेपी या मोदी का समर्थक नहीं हूँ, मगर मैं इस वेबसाइट के संस्थापकों और चालकों से एक सवाल पूछना चाहता हूँ। यदि मोदी और बीजेपी अगले चुनाव में हार गए तो कौन उनकी जगह देश की बागडोर और सत्ता संभालेगा ?

कांग्रेस पार्टी ? वह तो माँ बेटे के अलावा कुछ नहीं है। और इस माँ बेटे की जोड़ी ने देश को खूब लूटा। विपक्षी पार्टियों की साझा सरकार ? मगर ऐसी सरकार बनने पर ( या उससे भी पहले ) यह झगड़ा शुरू हो जाएगा कि धनदायक मंत्रालय किस पार्टी को मिलेंगे, विशेषकर वित्त, वाणिज्य, और उद्योग मंत्रालयI यानी कि इस बात पर झगड़े होंगे कि कौन लूट का बड़ा भागीदार होगाI सरकार बनने के बाद भी यही झगड़े होते चलेंगेI

१९७७ में आपातकाल ख़त्म होने के बाद जनता पार्टी केंद्र में सत्ता में आयी। यह वास्तव में कई पार्टियों की मिली जुली साझा सरकार थी। शीघ्र ही इस सरकार में आपसी झगड़े शुरू हो गए और अंततोगत्वा इसका १९८० में पतन हो गया।

यही हश्र होगा अगर फिर से साझा सरकार बनेगी। पर इस विषय पर सत्यहिंदी.कॉम के चालक कभी विचार विमर्श नहीं करते और केवल मोदी और बीजेपी की भरसक आलोचना करने में मगन रहते हैं।

ज़ाहिर है कि सत्यहिंदी.कॉम के संस्थापकों और चालकों के पास केवल नकारात्मक सोच है, सकारात्मक नहीं। मैं नहीं मानता कि मोदीजी या बीजेपी देश की विराट और भीषण समस्याओं का समाधान निकाल सकेंगे। परन्तु विकल्प क्या है ? इसपर सत्यहिंदी.कॉम के चालक गहराई से विचार नहीं करते। क्या मौजूदा संवैधानिक व्यवस्था के अंतर्गत इन समस्याओं का समाधान है भी ? अगर नहीं, तो क्या विकल्प है ?

इसपर सत्यहिंदी.कॉम के तथाकथित बुद्धजीवी कभी विचार नहीं करते और शायद न किसी को अपने वेबसाइट पर करने देंगे। इनकी मोटी बुद्धि यहीं तक सीमित है।

जस्टिस मार्कंडेय काटजू

लेखक प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के पूर्व चेयरमैन व भारत के सर्वोच्च न्यायालय के अवकाशप्राप्त न्यायाधीश है।

हिंदी पत्रकारिता दिवस : उत्तराखंड के जनांदलनों का प्रतिबिंब रहा है ‘नैनीताल समाचार’

nainital samachar

उत्तराखंड नैनीताल समाचार | Uttarakhand Nainital Samaachaar

पण्डित युगुल किशोर शुक्ल ने 30 मई 1826 को हिन्दी समाचार पत्र उदन्त मार्तण्ड का प्रकाशन आरम्भ किया था ।

उसी ऐतिहासिक दिन की याद में और हिंदी पत्रकारिता को बढ़ावा देने के लिए हर वर्ष 30 मई को हिंदी पत्रकारिता दिवस मनाया जाता है।

उदन्त मार्तण्ड के बाद से सैंकड़ों हिंदी समाचार पत्र- पत्रिकाएं आयी, उनमें से कुछ अब भी हैं और कुछ भारतीय जनमानस के मन में अपनी अमिट छाप छोड़कर चली गयी। स्वतंत्रता पूर्व जहां समाचार पत्रों का मुख्य कार्य देश को आज़ादी दिलाने में सहयोग कराते हुए अंग्रेज़ी शासन के विरुद्ध देश को एकजुट करना था तो स्वतन्त्र बाद उनके कार्यों में सामाजिक कुरूतियों को दूर करना भी शामिल हो गया।

आज़ाद भारत के तंत्र में भी कई खामियां सामने आते रही और बहुत से हिंदी व अन्य भाषाओं के समाचार पत्र उनके खिलाफ़ आवाज़ उठाते हुए जनता के साथ खड़े रहे।

एक आंदोलनकारी अख़बार का जन्म

नैनीताल के तीन युवाओं राजीव लोचन साह, हरीश पन्त और राकेश लाम्बा ने भी लोकतंत्र के इस चौथे स्तम्भ को मजबूत करने के लिए वर्ष 1977 के स्वतंत्रता दिवस को ‘नैनीताल समाचार’ की शुरुआत करने के लिए चुना। यह एक पाक्षिक अखबार के रुप में शुरू हुआ जिसको अपनी शुरुआत से ही गांधीवादी चंडी प्रसाद भट्ट और सुंदर लाल बहुगुणा का मार्गदर्शन मिला।

लेखकों, पत्रकारों की बात की जाए तो वर्तमान समय के प्रसिद्ध इतिहासकार पद्मश्री शेखर पाठक के साथ नवीन जोशी, गोविंद पन्त जैसे भविष्य के नामी पत्रकारों के साथ इस अखबार की शुरआत हुई।

उत्तराखंड की मुख्य समस्या प्रवास पर इस अख़बार के दूसरे अंक से ही ‘प्रवास की डायरी’ छपी जो अगले सात साल तक जारी रही और तीसरे अंक में तवाघाट दुर्घटना पर एक रपट प्रकाशित हुई जिसमें पत्रकार के नाम की जगह लिखा तो विशेष प्रतिनिधि गया था पर वह ख़बर सुंदर लाल बहुगुणा ने लिखी थी।

मई 1982 में समाचार पत्र का कार्य पूरा समझकर इसके कर्ताधर्ताओं ने इसे बंद करने की ठानी और इसको लेकर अख़बार में एक छोटा सा सन्देश भी लिख दिया पर उसके बाद पत्रों से पाठकों के इसे बंद न करने की गुज़ारिश पर अख़बार चलता रहा।

वर्ष 1983 में ‘उत्तराखंड की बाढ़, भूस्खलन और तबाही’ शीर्षक से छपा आलेख उत्तराखंड के इतिहास में हुई प्राकृतिक आपदाओं को दिखाता है।

इतिहास पर नित्यानन्द मिश्रा की लिखी श्रृंखला पर तो ‘कुर्मांचल गौरव गाथा’ नाम से पुस्तक भी छप गई है।

जनांदोलनों का प्रतिबिंब

उत्तराखंड से उत्तरांचल और फिर उत्तराखंड बनने का पूरा सफ़र हम नैनीताल समाचार में पढ़ सकते हैं, यह यात्रा भी नैनीताल समाचार के साथ ही चलती प्रतीत होती है। प्रदेश में होने वाले हर प्रकार के जनांदोलनों की यह आवाज़ बनते गया।

वर्ष 1984 में प्रदेश के अंदर शराब विरोध में चल रहे आंदोलन को ख़बर को समाचार पत्र ने ‘नशा नही रोज़गार दो’ शीर्षक से छापा।

‘अल्मोड़ा मैग्नेसाइट लिमिटेड’ को लेकर यह कहा जाता था कि उसकी वज़ह से स्थानीय लोगों को नुक़सान और उद्योगपतियों को फ़ायदा हो रहा है तो वर्ष 1988 में अख़बार ने जनता की आवाज़ बन एक आलेख छापा जिसका शीर्षक था ‘ईस्ट इंडिया कम्पनी उत्तराखंड में उग गई है’।

वर्ष 1994 में उत्तराखंड राज्य आंदोलन के बीच हुए मसूरी हत्याकांड पर अख़बार ने ख़बर छापी ‘मसूरी : लाशों को बो कर उत्तराखंड के फूल उगाओ’।

नया राज्य बनने के बाद भी नैनीताल समाचार ने जन की ख़बरों को छापना नही छोड़ा और अपना पत्रकारिता धर्म निभाते हुए समाचार पत्र जन की आवाज़ बना रहा। अगस्त 2011 में प्रदेश में बन रहे बांधों से पर्यावरण को होने वाले नुक़सान पर ‘बांध के लिए वन कानून आड़े नही आते’ नाम से ख़बर छपी।

वर्ष 2020 में समाचार पत्र में प्रकाशित दो खबरों के शीर्षक थे ‘देश को सुलगा गया अमित शाह का नागरिकता कानून’ और ‘अफ़सोस कि सरकार भूमाफियाओं के साथ खड़ी है’।

अख़बार सिर्फ़ उत्तराखंड ही नही राष्ट्रीय स्तर की महत्वपूर्ण घटनाओं पर भी अपनी राय मज़बूती के साथ रखता रहा।

नैनीताल समाचार में विशेष

आज जब उत्तराखंड के दूरस्थ क्षेत्रों में पहुंचना आसान है तब भी बहुत से क्षेत्रीय व राष्ट्रीय समाचार पत्र, वेब पोर्टल्स वहां घटित कोई घटना पर किसी अन्य की ली तस्वीरों, वीडियो के माध्यम से अपनी ख़बर देते हैं पर जब उत्तराखंड के दूरस्थ क्षेत्रों में पहुंचना आसान नही था तब वहां घटित किसी आपदा में नैनीताल समाचार के संवाददाता पहुंच जाते थे।

नैनीताल समाचार अपने पाठकों के साथ जुड़ने के लिए नए-नए प्रयोग करता रहा है।

1990 में चल रहे आरक्षण आंदोलन के दौरान दो पृष्ठ के परिशिष्ट छाप सड़कों पर बेचे गए थे।

वर्ष 1993 में राकेश लाम्बा द्वारा शुरू गई निबंध प्रतियोगिता का छात्रों को इंतज़ार रहता था।

साल 1994 के राज्य आन्दोलन के दौरान नैनीताल समाचार का ‘सांध्यकालीन उत्तराखंड बुलेटिन’ बेहद लोकप्रिय हुआ। 3 सितंबर से 25 अक्टूबर तक नैनीताल के दो स्थानों पर रेडियो बुलेटिन की तर्ज़ पर बुलेटिन पढ़ा गया। जिसका प्रयोग बाद में देश के अन्य हिस्सों दिल्ली के जंतरमंतर, उत्तराखंड के गोपेश्वर और उत्तरकाशी में भी किया गया।

अंटार्कटिक की धरती पर पहली बार गए पत्रकार गोविंद पन्त राजू की डायरी भी बहुत लोकप्रिय हुई।

समाचार पत्र में चिट्ठी पत्र और आशल कुशल भाग अपने आप में अनोखे हैं। ‘आशल कुशल’ उत्तराखंड की जिलावार ख़बरों से एकसाथ रूबरू करवाता है।

साहित्य अंक, पर्यावरण अंक, होली अंक, हरेला अंक एक नया प्रयोग थे। होली अंक में होली के गीत रंगीन पृष्ठों पर प्रकाशित हो उत्तराखंड की होली का अहसास कराते अलग ही आनन्द देते हैं।

उत्तराखंड के लोकपर्व हरेला के लिए हर साल एक विशेष हरेला अंक आता है, अंक के साथ पाठकों के लिए हरेले का तिनका भी भेजा जाता है।

डिजिटल, कोरोना काल में नैनीताल समाचार

मोबाइल इंटरनेट लोकप्रिय होने के बाद बहुत से समाचार पत्रों, टीवी चैनलों ने अपने संस्थान के वेब पोर्टल बनाए तो कुछ समाचार संस्थानों ने वेब पोर्टल पर ही जन्म लिया। समय की मांग को देखते हुए नैनीताल समाचार भी वेब पर उपलब्ध है।

कोरोना काल में लगभग सभी समाचार पत्र विज्ञापन न मिलने की वज़ह से बुरी स्थिति से गुज़र रहे हैं, नैनीताल समाचार भी इससे अछूता नही रहा फिर भी अपने पाठकों के सहयोग से यह अब भी निरंतर प्रकाशित हो रहा है।

समाचार पत्र में सितंबर 2020 के अंक में प्रकाशित आलेख ‘खुद तलाशनी होगी राह रोज़गार की’ उत्तराखंड की जनता को कोरोना काल में स्वरोज़गार के कई उपायों से परिचित कराता है।

नैनीताल समाचार वेब में 17 सितंबर 2020 को प्रकाशित आलेख ‘ 18 सितंबर नैनीताल क्लीनअप डे : क्या देश कुछ अनोखा देखेगा’ पढ़ने के बाद नैनीताल में स्वच्छता अभियान से जुड़ी संस्था ‘ग्रीन आर्मी’ के जय जोशी कहते हैं कि यह आलेख पढ़ने के बाद उनमें कुछ करने का जोश भर गया।

वर्ष 2021 के अप्रैल अंक की ख़बर ‘ये आग तो बुझ जाएगी, मगर सवाल तो सुलगते रहेंगे’ के साथ उत्तराखंड की वनाग्नि पर सवाल उठाते नैनीताल समाचार भारतीय हिंदी पत्रकारिता में अपना काम करते जा रहा है।

आजकल दो-तीन वर्ष चलने के बाद ही बंद होते समाचार पत्रों और समाचार वेब पॉर्टलों के लिए नैनीताल समाचार एक उदाहरण है कि कैसे जन की खबरों से वर्षों पत्रकारिता कर सकते हैं।

हिमांशु जोशी, उत्तराखंड।

कोरोना डायरी से जन्मदिन डायरी बनने की रोचक कहानी

himanshu joshi jouranalism हिमांशु जोशी, पत्रकारिता शोध छात्र, उत्तराखंड।

जन्मदिन की डायरी : पत्रकारिता का एक दस्तावेज़

Birthday Diary: A Journalism Document

पिछले मई जब क़लम को दुनिया की सबसे बड़ी ताकत मानते लिखना शुरू किया था तब यह समझ नहीं आया था कि यह मेरा भ्रम है या विश्वास। तब से आज एक साल पूरा हो गया और कोरोना काल में बहुत बार ऐसा लगा कि यह मेरा भ्रम ही था पर एक साल होते-होते मुझे यह विश्वास हो चला है कि क़लम दुनिया के किसी भी हथियार से बड़ी शक्ति है।

पिछले मई लिखना शुरू किया तो आज मैंने निर्णय ले लिया है कि अपने जन्मदिन के साथ ही हर वर्ष अपनी पत्रकारिता की सालगिरह भी मनाया करूंगा।

सामान्य दिनों से लॉकडाउन के दिनों की ओर गुज़रती, रास्तों में चलते सड़क दुर्घटनाओं के कारण विचारती हुई आगे बढ़ती यह कहानी कभी स्वच्छ भारत की वास्तविक तस्वीर दिखाती है तो कभी धौनी के छक्के-चौके।

कोरोना डायरी से जन्मदिन डायरी बनने की यह कहानी रोचक है और कुछ दिन बाद एक कॉलेज के प्रथम वर्ष के छात्रों को ऑनलाइन पढ़ाना है तो यह जन्मदिन डायरी शायद उनके और उनके जैसे कई अन्य पत्रकारिता छात्रों के लिए एक आवश्यक दस्तावेज़ भी बन सकती है।

पत्रकार दो तरह के होते हैं, पहले आलीशान स्टूडियो में चमक-धमक के साथ बैठे एंकर और ग्राउंड रिपोर्टिंग करते माइक, कैमरा पकड़े उनके सहयोगी।

दूसरे आईआईएमसी के छात्र रहे मनदीप पुनिया की तरह जो किसान आंदोलन में गिरफ्तार होने के बाद जेल में अपनी जांघ पर रिपोर्टिंग कर आते हैं। यही मनदीप प्रतिष्ठित कारवां मैगज़ीन में भी अपना नाम छपवा चुके हैं।

मुझे पता है पत्रकारिता के अधिकतर छात्रों का सपना पहले तरह के पत्रकार बनने का ही होता है। पर मैं मनदीप की तरह वाला पत्रकार, लेखक बनना चाहता हूं।

विधवा पुनर्विवाह को लेकर मैं हमेशा से लिखना चाहता था, विद्यालय के बाद जंग लगी क़लम सालों बाद कोरोना काल में मई 2020 के दौरान चली तो पहला आलेख ही अमर उजाला वेब में प्रकाशित हो गया।

नैनीताल में रहकर नैनीताल समाचार को जो न समझे तो वह पत्रकार कैसा, चला गया 25 मई को नैनीताल समाचार या यूं कहें राजीव लोचन साह से मिलने।

भविष्य की शुभकानाओं सहित नैनीताल समाचार के सफ़र पर छपी एक किताब मुझे उनकी ओर से भेंट पर मिली।

28 मई 2020 में पंजाब केसरी वेब पर ‘हम अपना जन्मदिन क्यों मनाते हैं’ आलेख के बाद हिंदी पत्रकारिता दिवस पर लिखा आलेख नैनीताल समाचार के वेब पोर्टल पर था।

इसके बाद विश्व साइकिल दिवस, आरोग्य सेतु एप की उपयोगिता और अमरीका में चल रहे अश्वेत आंदोलनों पर लिखे आलेख भी अमर उजाला वेब पर थे।

इसके बाद उत्तराखंड के पहले दैनिक अखबार उत्तर उजाला में मेरे आलेखों के छपने की शुरुआत हुई, सड़क दुर्घटनाओं और पलायन के मुद्दों पर आलेख प्रकाशित हुए।

कोरोना काल में उत्तराखंड के हालात पर की गई रिपोर्टिंग को नैनीताल समाचार के साथ रीजनल रिपोर्टर में भी जगह मिली।

विकास दूबे कांड पर पुलिसकर्मियों के शहीद होने की वजह तलाशता आलेख भी उत्तर उजाला और नैनीताल समाचार में था।

कोरोना काल में बुजुर्गों की स्थिति पर लिखा आलेख अमर उजाला वेब में तो राजीव लोचन साह के द्वारा मिलाए गए समाजसेवी बसु राय के जीवन पर लिखा अमर उजाला प्रिंट में प्रकाशित हुआ।

बसु राय का साक्षात्कार लिखते समय मैं खुद पर विश्वास नहीं कर पा रहा था जिस पर राजीव लोचन साह ने मुझसे कहा ‘दिमाग पर कोई दबाव मत रखो और जल्दबाजी तो कतई मत करो। तीन-चार बार साथ बैठो और कम से कम पन्द्रह दिन लगाओ।’

उसका परिणाम ऊपर लिखा है।

अगस्त आते-आते धोनी के रिटायरमेंट पर लिखा आलेख एक पुराने मित्र के समाचार वेब पोर्टल लाइवएसकेजी न्यूज़ पर भी पब्लिश हुआ।

इसके बाद सर्वोदय समाज से मेरे परिचय की शुरुआत फिर से राजीव लोचन साह द्वारा ही मिलाए गए अनिरुद्ध जडेजा के साक्षात्कार के साथ हुई, उन पर लिखा आलेख न्यूज़लॉन्ड्री पर पब्लिश हुआ।

स्वतन्त्र पत्रकारिता करते हुए आप वर्तमान हालात में पैसा कमाने की नहीं सोच सकते पर कर्म करते रहने से फल मिलता ही है तो मुझे भी राजीव लोचन साह के बालसखा के जीवन पर किताब लिखने का अवसर मिला, अपनी किताब छपना शायद किसी किताब पढ़ने वाले का सबसे बड़ा सपना होता है।

एक रिपोर्ट का अंग्रेज़ी से हिंदी अनुवाद ठीक से न कर पाने पर मैं निराश था तो राजीव लोचन साह ने मुझसे कहा कि ‘तुम में बहुत अधिक क्षमता है। मैं तो इस बहाने तुम्हें तरीका सिखाने की कोशिश कर रहा था।’

कुछ समय बाद मैं बिना लक्षणों के कोरोना पॉजिटिव हुआ और वहां राजीव लोचन साह के उन्हीं शब्दों को याद कर रोज़ हिम्मत कर अपने हालातों पर डायरी लिखता रहा जो सत्याग्रह ने प्रकाशित करने के लिए कहा तो पर की नहीं और वह भड़ास4मीडिया पर पब्लिश हुई।

वापस आने पर नैनीताल समाचार के तालों की चाबी हमेशा मेरे लिए उपलब्ध रहने लगी, किसी नए पर उनका इतना भरोसा ही शायद मुझे अच्छा करने के लिए प्रेरित कर रहा था।

नैनीताल समाचार के साथ काम करते मैं पत्रकारिता की अलग विधाओं से परिचित हो रहा था, साक्षात्कार के बाद नैनीताल में स्वच्छता दिवस पर रिपोर्टिंग करना मेरी पत्रकारिता में अब तक का सबसे सुखद अनुभव था जब सामाजिक कार्यकर्ता जय जोशी द्वारा मुझे यह कहा गया कि आपके आलेख ने हमारे अंदर जोश भरा और बेहतर करने के लिए प्रेरित किया।

राजीव लोचन साह ने इस पर मुझे प्रतिभाशाली लिक्खाड़ कहा।

उसके बाद स्वरोज़गार पर कुछ उदाहरण, संजीव भगत की स्वरोज़गार के लिए प्रेरित करती कहानी और उत्तराखंड दिवस पर लिखा आलेख नैनीताल समाचार प्रिंट में प्रकाशित हुए।

कोरोना काल की शुरुआत में प्रवासियों पर जमकर शोर हुआ पर 2020 के अंत में यह शोर ख़त्म हो गया था उस पर ग्राउंड रिपोर्ट लेकर लिखा आलेख उत्तर उजाला में आया और साल का अंत पहली बार प्लाज़्मा दान करने के बाद लिखे आलेख के विभिन्न जगहों पर प्रकाशित होने के साथ हुआ।

2021 में मेरे पास नए कार्य थे पर कोरोना की आने वाली दूसरी लहर से हम सब अंजान थे।

ज्ञानिमा पर अपने 2021 के सपने लिखने का मौका मिला।

पिछले साल अमर उजाला वेब में छपी अपनी कविता पर नज़र पड़ी तो ख़ाकी पर एक कविता लिखी जो उत्तर उजाला में प्रकाशित हुई।

फ़रवरी माह में दूसरी बार प्लाज़्मा दान करने के बाद प्लाज़्मा को गम्भीरता से न लेने पर लिखा आलेख और बाल मज़दूरों पर लिखी कविता उत्तर उजाला पर प्रकाशित हुई।

कोरोना काल में समाचार संस्थान बड़ी मुसीबत में चल रहे हैं, उत्तराखंड में मशरूम गर्ल नाम से मशहूर दिव्या रावत द्वारा आयोजित निबंध प्रतियोगिता में जीती इनाम राशि मैंने कुछ संस्थान को सहयोग के रूप में भी दी। सच्ची पत्रकारिता देखने, पढ़ने के लिए यह आवश्यक है क्योंकि छोटे मीडिया संस्थानों के पास फंडिंग कराने वाला कोई नहीं होता।

क़लम निखरती गई तो सबलोग, हस्तक्षेप, मीडिया स्वराज, हिंदी क्विंट, जनज्वार, ऑपइंडिया जैसी वेबसाइट पर भी आलेख आने लगे।

मार्च में उत्तराखंड की राजनीति, भाषा पर आलेख लिखे तो विनोद कापड़ी की फ़िल्म पर समीक्षा भी।

‘फिर से भगत सिंह’ कविता उत्तर उजाला में प्रकाशित हुई।

अप्रैल माह में उत्तराखंड के जंगलों की आग पर दिल्ली की नुपुर के साथ लिखा आलेख, मीडिया की दुर्दशा और कोरोना से समुदाय की जंग पर आलेख प्रकाशित हुए।

इसके साथ ही ‘मुझे लगा अब उठना चाहिए’ कविता भी लिखी। गांधीवादी अमरनाथ भाई और राजीव लोचन साह के सुझाने पर मातृ सदन के लोगों से भी मिलना हुआ।

मई माह पत्रकारिता में अब तक के सबसे व्यस्त महीनों में रहा है, ज्यादा लिखा तो हिलांश, हिंदी क्विंट जैसे प्रयोगात्मक मीडिया संस्थानों से भी परिचय हुआ है। डॉक्टरों और पुलिसकर्मियों पर लिखी वायरल कविताओं सहित पांच कविताएं अलग-अलग जगह प्रकाशित हुई, डेलीहंट पर जन ख़बर नाम से अपना पेज़ भी बनाया है।

सरदाना के जाने पर लिखे आलेख से शुरूआत होने के बाद soulify, पर्यावरण प्रदूषण, सब चलता है ने देश का यह हाल किया, उत्तराखंड में कोरोना के ताज़ा हालात नाम से आलेख प्रकाशित हुए।

प्रोफेसर लाल बहादुर वर्मा और सुंदर लाल बहुगुणा को श्रद्धांजलि देने वाले आलेख भी लिखे।

कुछ आलेखों ने लोगों को जागरूक करने का कार्य किया है तो कुछ ने शिक्षित।

यही तो पत्रकारिता का उद्देश्य है।

मोबाइल टॉवर से मर रही गौरैयों, यूट्यूब पर चौबीस घण्टे विज्ञान की क्लास चला गरीबों के लिए धन जुटाने वाले लड़के और ऐसे बहुत से आलेख अभी मुझे लिखने हैं जो समाज में कुछ बदलाव तो ला ही सकते हैं।

स्वतन्त्र तौर पर लगातार एक साल लिखने के बाद इसी महीने एक- दो जगह लिखने के बदले पैसा मिलने की बात भी हुई पर उसके लिए मैंने अभी हामी नहीं भरी है क्योंकि जब तक हो सकेगा मैं बिना भुगतान लिए ही लिखना चाहूंगा।(अन्य युवाओं को मैं यह सुझाव नहीं दूंगा)

ख़बर हमारे चारों ओर है।

पढ़ने के बाद उन पर विश्वास करने से पहले उन्हें समझना और परखना जरूरी है। यही सावधानी हमें कुछ लिखने से पहले भी बरतनी चाहिए। आप पर किसी एक विचारधारा से जुड़ने के आरोप भी लगते हैं, यह कहा जाता है कि यह निष्पक्ष पत्रकारिता नहीं है। यही आरोप मुझ पर भी लगे पर जो आपको सत्य लगता है वही लिखना और बोलना चाहिए क्योंकि वही आत्मसंतुष्टि देता है।

इस साल के अंत तक गांधी को पढ़ने के साथ बहुत सी अन्य पुस्तकें भी पढ़ना चाहता हूं ताकि अपनी आने वाली किताब पाठकों के पढ़ने लायक लिख सकूं।

पत्रकारिता में कोई सुझाव चाहने पर मेरी एक कॉल पर किसी भी समय सुझाव देने तैयार रहने वाले अपने सारे हितैषियों और अपने प्रिय समीक्षकों से सीखते रहूं (एक-एक का नाम लिखना उचित नहीं है) यही कोशिश रहेगी।

अंत में यह कि अब मैं यह समझ गया हूं कि किसी बड़े संस्थान में आलेख प्रकाशित होना बड़ी बात नहीं है, मेरे लिए ‘जन ख़बर’ में आलेख छपना भी उतनी बड़ी बात है जितनी ‘हिंदी क्विंट’ में।

परिवर्तन बिना किसी संस्थान के नाम लिखे एक सादे कागज़ में लिख कर भी आ सकता है।

हिमांशु जोशी, उत्तराखंड।

अखिलेश कृष्ण मोहन : बहुजन पत्रकारिता के विरल रत्न

akhilesh krishna mohan

अखिलेश कृष्ण मोहन के निधन पर श्रद्धांजलि! | Tribute to the demise of Akhilesh Krishna Mohan!

कल सुबह एक खास लेख लिखने में व्यस्त था. उसका अंतिम वाक्य लिखना शुरू ही किया था कि मोबाइल बज उठा. वह डॉ. कौलेश्वर प्रियदर्शी का कॉल था. अंतिम वाक्य पूरा करना इतना जरूरी लगा कि कॉल रिजेक्ट कर दिया. ज्यों ही लेख पूरा हुआ, मेरे दामाद राजीव रंजन का फोन आ गया. उन्होंने बिना कोई भूमिका बांधे बताया, ’पत्रकार अखिलेश कृष्ण मोहन नहीं रहे! ’

सुनकर स्तब्ध रह गया. मैंने उन्हें कहा कि थोड़ी देर पहले डॉ. प्रियदर्शी का फोन आया था, शायद वह भी यही सूचना देना चाहते थे. इतना कहकर मैं फोन काट दिया. फोन काटने के बाद मैंने रुधे गले से अपने मिसेज को सूचना दी. सुनकर उन्हें भी भारी आघात लगा और ऑंखें भर आयीं. बहू खाना बनाने जा रही थी. मैंने अपने हिस्से का खाना बनाने के लिए मना कर दिया.

उसके बाद अखिलेश के बेहद खास डॉ. प्रियदर्शी को फोन लगाया. प्रायः 5 मिनट बात हुई. डॉ. कौलेश्वर ने रुधे गलें से कहा कि हमने सामाजिक न्याय की दुनिया का एक बड़ा नायक खो दिया. अखिलेश के नहीं रहने पर ऐसा लगता है बहुजन समाज का कोई अंग ख़त्म हो गया. उनके नहीं रहने पर हमारा फर्ज बनता है कि अब उनके परिवार के विषय में सोचें.

डॉ. कौलेश्वर से बात करने के बाद लखनऊ में अखिलेश के अभिभावक की भूमिका में दिखने वाले डॉ. लालजी निर्मल को फोन लगाया. उन्होंने जब मेरी कॉल उठाई, मेरे धैर्य का बाँध टूट गया और मैं जोर से रो पड़ा. उन्होंने भरे गले से बताया कि जो ही सुन रहा है, वही रो रहा है. अभी विद्या गौतम का फोन आया था, वह भी बेतहाशा रोये जा रही थी. विद्या और अखिलेश ने शुरुआती दौर में साथ-साथ एक चैनल में काम किया था.

जब मैंने उनसे आगे के प्रोग्राम के विषय में पूछा तो उन्होंने बताया कि लाश गाँव जाएगी. वहीं उनका शेष कार्य किया जायेगा. लाश गाँव जाना इसलिए जरूरी क्योंकि उनकी मां को कल ही ऐसा कुछ होने आभास हो गया था. अगर लाश गाँव नहीं गयी तो घर वालों का दुःख और बढ़ जायेगा.

आखिर में उन्होंने कहा कि हमने अपने जीवन के एक महत्वपूर्ण साथी को खो दिया. उनकी भरपाई होनी मुश्किल है.

डॉ. निर्मल से बात करने के बाद जब मैंने फेसबुक खोला, देखा अखिलेश के प्रति श्रद्धांजलि की बाढ़ आई हुई है. सब कुछ देख कर दिमाग और सुन्न हो गया और मैंने छोटा सा यह पोस्ट लिखा, ‘अखिलेश कृष्ण मोहन का जाना मेरे लिए कोरोना के दूसरे वेभ की सबसे बड़ी घटनाओं में एक है. मुझे तो ऐसा लगता है मेरा एक अंग ही ख़त्म हो गया. मुश्किल है एक और अखिलेश कृष्ण मोहन का होना. उनके जाने से बहुजन पत्रकारिता की एक विराट संभावना का अंत हो गया.’

उपरोक्त अंश लिखने के बाद मैं इस लेख को पूरा करने में जुट गया, पर दिमाग सुन्न हो गया था, जिससे कंसेन्ट्रेशन ही नहीं बन पा रहा था. दिन में कुछ खाया नहीं था. इसलिए शाम को जल्दी से खा कर यह सोच कर सो गया कि सुबह तरोताजा होकर लेख पूरा करूँगा. सुबह उठा भी, किन्तु जब फेसबुक पर नजर दौड़ाया मनस्थिति और ख़राब हो गयी. फेसबुक अखिलेश की माँ के निधन की खबरों से भरा पड़ा था. वह अपने प्यारे बेटे की मौत के सदमे को झेल नहीं पायीं और शाम होते ही अखिलेश के साथ अनंत यात्रा पर निकल पड़ीं.

उनकी मां के जाने की खबर सुनकर एक बार फिर मैं आंसुओं में डूब गया. उसके बाद भी लेख को पूरा करने के लिए प्रयास किया, पर बिलकुल ही सफल नहीं हुआ. शब्द- शक्ति एकदम से ख़तम सी हो गयी. अंत में फेसबुक पर यह पोस्ट डालकर मैं सरेंडर कर गया –

‘महान पत्रकार अखिलेश कृष्ण मोहन पर आयेगी किताब!

मैं कल शाम से ही बहुजन पत्रकारिता के कोहिनूर अखिलेश कृष्ण मोहन पर एक लेख लिखने का प्रयास कर रहा हूँ, किंतु अब तक लिख नहीं पाया. दरअसल उनका व्यक्तित्व और कृतित्व इतना व्यापक है कि लेख के जरिये उनके साथ न्याय करने में खुद को अक्षम पा रहा हूँ. ऐसे में उनपर एक किताब लाने का निर्णय लिया हूँ. अगर कोरोना काल में बचा रहा और प्रेस इत्यादि खुले रहे तो आगामी 6 दिसम्बर: बाबा साहेब डॉ अम्बेडकर के परिनिर्वाण दिवस पर वह किताब लोगों के हाथों में होगी!’

इसमें कोई शक नहीं कि अखिलेश कृष्ण मोहन जितने बड़े पत्रकार थे, उतने ही बड़े इन्सान. इसलिए उनके नहीं रहने पर लोगों ने उनके प्रति जो श्रद्धा उड़ेली, वह विरले ही किसी को नसीब होती है. योगेश योगेश्वर ने विस्मित होकर यूँ नहीं फेसबुक पर लिखा- ‘गज़ब हो गया! इस व्यक्ति के लिए फेसबुक पर इतना लिखा गया है. क्या कमाई की है. नमन श्रद्धांजलि!’

अब जबकि मेरी शब्द-शक्ति जवाब दे चुकी है, मैं फेसबुक पर सैकड़ों-हजारों की संख्या में आये लोगों के उदगार के मध्य मैं कुछेक ऐसे लोगों की राय से अपने लेख की कमी को पूरा करना चाहता हूँ, जिन्होंने उन्हें ज्यादे करीब से देखा-सुना है. शुरुआत प्रख्यात बहुजन चिन्तक चन्द्रभूषण सिंह यादव से करता हूँ, जिन्होंने उनकी तुलना कोहिनूर हीरे से की है. उन्होंने लिखा है-‘ अब तो स्मृतियां ही शेष हैं. “फर्क इंडिया” के सम्पादक साथी अखिलेश कृष्णमोहन जी का न होना बहुजन पत्रकारिता की अपूरणीय क्षति…..

मैं लिखूं क्या अपने इस पत्रकारिता जगत के कोहिनूर हीरे के बारे में, क्योंकि जब से यह खबर मिली है कि “फर्क इंडिया” के सम्पादक अखिलेश कृष्णमोहन जी हम सबके बीच नहीं रहे, मन उदास है, कुछ कह पाना मुश्किल है क्योंकि लखनऊ रहने पर मिलना, मुद्दों पर बहस करना, नई-नई चीजें बताना, मोटरसाइकिल पर बैठकर एकसाथ भिन्न-भिन्न मिशनरी साथियों से मिलना आदि अब किसके साथ होगा?

मेरे लखनऊ पहुंचने की सूचना मिलते ही अखिलेश कृष्णमोहन जी का फोन जरूर आ जाता था कि कब मुलाकात होगी, कब साथ चाय पीया जाएगा? कभी दारुल शफा का “यादव शक्ति” कार्यालय, तो कभी समाजवादी पार्टी का विक्रमादित्य कार्यालय, तो कभी अखिलेश कृष्णमोहन जी का पुराना वाला या नया वाला कार्यालय हम सबकी बैठकी का अड्डा होता था।

अखिलेश कृष्णमोहन जी कभी भी बहुजन मुद्दों से डिगने वाले कलमकार साथी नही थे, जिसके कारण चापलूसी पसन्द लोग उन्हें उचित तवज्जो नही देते थे जिसका उन्होंने अपने छोटे से पत्रकारिता जीवन में कभी मलाल नहीं रखा। वे बोलते थे बेलाग, लिखते थे बेलाग क्योंकि संघर्ष व सच्चाई उनके नस-नस में दौड़ती थी ।

अखिलेश कृष्णमोहन जी को चाहे कोई जो समझे लेकिन वे विधानसभा चुनाव हो या लोकसभा चुनाव बिना किसी समुचित संसाधन के बहुजन हितों के लिए पूरे प्रदेश में घूम-घूमकर रिपोर्टिंग करते थे। वर्तमान दौर की त्रासदी ने ऐसे लड़ाकू, जांबाज, होनहार पत्रकार साथी को हम सबसे छीन लिया है जिसमें बहुजन मिशन के लिए असीमित काम करने की संभावनाएं थीं।

मैं अखिलेश कृष्णमोहन जी की मौत से निःशब्द हूँ। अब तो उनसे जुड़ी स्मृतियां ही जीवन मे शेष रहेंगी। नमन साथी अखिलेश कृष्णमोहन जी!’

मशहूर पत्रकार उर्मिलेश ने लिखा है,’ लखनऊ से फिर एक बहुत स्तब्धकारी सूचना! सोशल मीडिया से ही पता चला कि ‘फ़र्क इंडिया’ के संपादक अखिलेश कृष्ण मोहन नहीं रहे. लखनऊ स्थित एक बड़े शासकीय अस्पताल में उनका इलाज़ चल रहा था. बेहद सक्रिय इस उत्साही और जनपक्षधर युवा पत्रकार के असामयिक निधन की सूचना से आज मन बहुत खिन्न और उदास है.

कुछ साल पहले वाराणसी में आयोजित एक सम्मेलन में मेरी अखिलेश कृष्ण मोहन से मुलाकात हुई थी. पहली ही मुलाकात में वह काफी समझदार और जुझारू लगे. उनसे एक बार और ऐसे ही किसी आयोजन में मुलाकात हुई. उन्होंने अपनी पत्रिका या अपने न्यूज़ पोर्टल के लिए  मुझसे औपचारिक बातचीत भी रिकॉर्ड की. जमीनी सच्चाइयों से लगातार रुबरू होने के चलते उनके पास उत्तर प्रदेश की सामाजिक और राजनीतिक गतिविधियों की हमेशा अद्यतन जानकारी होती थी. उनका दायरा सिर्फ सूचना तक ही सीमित नहीं था, वह उन सूचनाओं की रोशनी में प्रदेश और देश की सामाजिक-राजनीतिक स्थितियों की संतुलित व्याख्या करने मे भी सक्षम थे. वह बहुत मेहनती और गतिशील पत्रकार थे. जब भी मुलाकात हुई, उनके पास अच्छी टीम भी नजर आई. अपनी पत्रकारिता के जरिये वह समाज़ के उत्पीड़ित और वंचित लोगों की आवाज बुलंद करने में आगे रहते थे. सामाजिक-राजनीतिक विषयों पर अध्ययन भी करते थे. उनकी असमय मृत्यु से उनके परिवार के अलावा हिंदी पत्रकारिता और समाज के उत्पीड़ित व वंचित हिस्सों की बड़ी क्षति हुई है.’

उनके गृह जनपद बस्ती के वीरेंद्र कुमार दहिया का उद्गार है ,’कुछ लोगों का जाना सिर्फ एक व्यक्ति का जाना नहीं होता, उनके साथ साथ मिशन, नेकी, अच्छाई, न्याय की लड़ाई के साथ साथ और भी बहुत सी चीजों का जाना होता है। अखिलेश कृष्ण मोहन भैया, हमारे गृह जनपद बस्ती के मूल निवासी, फर्क इंडिया के संपादक, सामाजिक न्याय की लड़ाई को अपने जीवन का लक्ष्य बना कर जीने वाले, हँसते खिलखिलाते दो मासूम बच्चों के बाप, एक संजीदा पत्नी के पति, हमारे लिए अभिभावक स्वरूप बड़े भाई का यूँ असमय जाना व्यक्तिगत तकलीफ़ दे रहा।आपकी पवित्र आत्मा को अंतर्मन से कोटि कोटि प्रणाम, विनम्र श्रद्धांजलि।

आपके जाने से उपजी रिक्तता को कभी पूरा नहीं किया जा सकता भैया.’ सच को सच और झूठ को झूठ कहने का अदम्य साहस रखने वाले,”फर्क इंडिया”के संपादक-पत्रकार अखिलेश कृष्ण मोहन का इस तरह चले जाना अखर गया, ऐसा प्रकांड शिक्षाविद चौथीराम यादव ने लिखा है.

चर्चित आलोचक वीरेंद्र यादव ने कहा है, ’लखनऊ के युवा उत्साही पत्रकार अखिलेश कृष्ण मोहन अखिलेश कृष्ण मोहन   के न रहने की सूचना अत्यंत व्यथित करने वाली है. कोरोना ने एक युवा जीवन को असमय छीन लिया. अखिलेश ‘फर्क इन्डिया’ पत्रिका और पोर्टल का संपादन संचालन करते थे. सामाजिक न्याय के प्रति समर्पित इस स्वाभिमानी -आत्मनिर्भर युवा के परिवार के लिए यह असह्य दुख का पहाड़ है. संतप्त परिवार के दुख मे शामिल हूँ. अखिलेश कृष्ण मोहन मेरे निकट संपर्क में थे. मेरी शोक संवेदना’.

‘शानदार पत्रकारिता करने वाले शानदार इंसान और हमारे मित्र, फर्क इंडिया के संपादक अखिलेश कृष्ण मोहन कोरोना से लड़ते लड़ते जिंदगी की जंग हार गए। एक युवा और उत्साह से भरपूर साथी का इस तरह से जाना बेहद दुखद है।‘ यह कहना है विख्यात पत्रकार महेंद्र यादव का. 

एक्टिविस्ट पत्रकार सोबरन कबीर ने बहुत भावुक होकर लिखा है,’ भैया…. आप भी हम लोगों को छोड़कर चले गए…।। निशब्द हूं। कुछ भी कह पाने की स्थिति में नहीं हूं.’

अखिलेश कृष्ण मोहन जहाँ हास्पिटल में रहकर कोरोना के खिलाफ जंग लड़ रहे थे, वहीं हास्पिटल से बाहर उनकी ओर से लड़ाई कर रहे थे जुझारू पत्रकार नीरज भाई पटेल. अखिलेश के संघर्ष की विस्तृत जानकारी पटेल के जरिये ही मिली है. उनके पोस्ट को पढ़कर भावुक हुए बिना रहा नहीं जा सकता. उन्होंने लिखा है- ‘एक बार सोचिएगा जरूर इस शख्स के बारे में इतना क्यों लिखा जा रहा है वजह सिर्फ इतनी है इस इंसान ने संपत्ति नहीं इंसान कमाए हैं….सुबह से सोशल मीडिया पर बहुत कुछ लिखा और कहा जा चुका है… अब ज्यादा कुछ कहने की स्थिति में नहीं हूं… बस ऐसा लग रहा है जैसे बीतों कुछ दिनों से लड़ी जा रही एक लड़ाई आज सुबह 5 बजकर 15 मिनट पर मैं हार गया…इतना कहूंगा कि मैंने अपना एक खुशमिजाज दोस्त, साथी, मित्र, सहयोगी, बड़ा भाई हमेशा के लिए खो दिया…सोचिए बस्ती जिले के छोटे से गांव परसांव से निकलकर लखनऊ में बिना प्रपंच जाने हुए घाघों के बीच सीमित संसाधनों में स्थापित होकर न सिर्फ जिंदगी भर दबे-कुचले, शोषित तबके की बात करना बल्कि पत्नी, दो बच्चों की जिम्मेदारी उठाकर आत्म सम्मान-स्वाभिमान के साथ जिंदगी जीना व ईमानदारी व बेबाकी से पत्रकारिता करना उनके लिए कितना मुश्किल रहा होगा….

सोचा न था कि अखिलेश कृष्ण मोहन भाई ऐसे चले जाएंगे कि दिन में कई-कई बार फोन पर नीरज भाई नमस्ते अब कभी सुन ही नहीं पाउंगा…जलन-कुढ़न, टांग खींचने के इस माहौल में ऐसा साफ दिल इंसान जो खुद की फर्क इंडिया मैगजीन और यूट्यूब चैनल होने के बाद भी हमेशा ‘नेशनल जनमत’ चैनल और मिशन जनमत पत्रिका को आगे बढ़ाने और प्रचार-प्रसार के लिए एक आवाज पर खड़े नजर आते थे। इसमें कोई दो राय नही कि मिशन जनमत पत्रिका को शुरूआत कराने में अखिलेश भाई का सबसे बड़ा योगदान है। इसलिए संपादक होने के नाते भारी मन से ये घोषणा करता हूं कि अगले माह के अंक से जिंदगी भर अखिलेश कृष्ण मोहन जी का नाम मिशन जनमत पत्रिका की प्रिंट लाइन में संस्थापक सदस्य के बतौर लिखा जाएगा…

30 अप्रैल की रात SGPGI में एडमिट होने के बाद से लगातार डॉक्टरों से बात करना, अच्छे इलाज के लिए तमाम प्रोफेसर्स से निवेदन करना। हाल पता करके भाभी से बात करना समझाना, हिम्मत बंधाना, झूठा दिलासा देना जैसे दिनचर्या में शामिल हो गया था…

ऐसा लगने लगा था कि अखिलेश भाई का संघर्ष अब मेरा संघर्ष है वो जीतकर बाहर आएंगे तो उनके साथ भाभी-बच्चों को देखने में ही मेरी जीत है। अहसास तो 3-4 दिन से होने लगा था कि किसी भी दिन बुरी खबर आ सकती है लेकिन फिर भी झूठी उम्मीद का दिलासा देने के लिए भाभी और उनके छोटे भाई से माफी भी चाहता हूं।

2 मई तक अखिलेश भाई को BI-PAP पर रखा गया। 4-5 मई की देर रात को किसी तरह कोशिश के बाद ICU में शिफ्ट कर दिए गए। इसके बाद उनको वेंटिलेटर पर भेज दिया गया।

धीरे-धीरे मल्टीआर्गन फेल्योर, सेप्टिक शॉक, सेपसिस की खबर सुनने को मिल रही थी। भाभी को क्या समझाता बस कह देता था स्थिति अच्छी नहीं है बस उम्मीद बनाए रखिए। दो दिन बाद ही स्थिति ये थी कि उनको कंपलीट वेंटिलेटर सपोर्ट देने के अलावा डायलिसिस भी करना पड़ा लंग्स 70 प्रतिशत तक इंफेक्टिड हो चुके थे लेकिन मन मानने को कतई तैयार नहीं था। डॉक्टर्स अपनी पूरी कोशिश में लगे थे… हालांकि 2-3 दिनों से वहां से भी अच्छी खबरें मिलना बंद हो गई थीं।

आखिरकार 13 मई को सुबह संघर्ष विराम की खबर आ गई… ईश्वर नाम के अदृश्य जीव से न पहले प्रार्थना की थी न अब करूंगा….मेडिकल साइंस, अच्छे डॉक्टर्स, अच्छे मेडिकल संस्थान पर पहले भी भरोसा था आज भी है…हां इस पोस्ट को पढ़ने वाले मानवों से जरूर अपील करूंगा कि अखिलेश भाई के कामों को लेकर अगर वाकई चिंतित हो तो आगे उनके परिवार व बच्चों के लिए बुरे वक्त में काम आ जाना यही उस नेक दिल के इंसान के लिए सच्ची श्रद्धांजलि होगी….

उनकी पत्नी रीता कृष्ण मोहन Rita Krishna Mohan का अकाउंट नंबर-

SBI BANK- 55148830004

IFSC- SBIN0050826

BRANCH- ALIGANJ LUCKNOW

इस बुरे वक्त में जो भी साथ खड़ा रहा सभी साथियों व भाईयों का शुक्रिया।।।

आप बहुत याद आओगे अखिलेश भाई…’

नीरज भाई पटेल ने अखिलेश के परिवार के मदद की जो अपील की है, उसमें उनके चाहने वाले तमाम लोगों की भावना का प्रतिबिम्बन हुआ है. उनके परिवार को मदद मिले, यही उनके चाहने वालों की अंतिम इच्छा है, जिसे सही तरीके से शब्द दिया है चौधरी संदीप यादव ने. उन्होंने मुख्यमंत्री को अपील करते हुए लिखा है- ‘सीनियर पत्रकार जिंदादिल इंसान अखिलेश कृष्ण मोहन आज कोरोना से जंग हार गए ! उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री से मेरी माँग है पीड़ित परिवार को 5 करोड़ की आर्थिक सहायता दी जाएं !’

यह भारी संतोष का विषय है कि अखिलेश कृष्ण मोहन के हजारों कद्रदानों की भांति प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने उनके आत्मा की शांति की कामना करते हुए उनके शोक संतप्त परिजनों के प्रति गहरी संवेदना व्यक्त की है. वंचित वर्ग के एक लेखक-पत्रकार के प्रति योगी द्वारा इस तरह संवेदना व्यक्त करना एक विरल बात है. कारण, दलित– पिछड़े समुदायों के लेखक-पत्रकारों के प्रति खुद इन वर्गों के नेता आर्थिक मदद करना तो दूर, सामान्यतया शोक-संवेदना प्रकट करने तक की जहमत नहीं उठाते. ऐसे में सीएम योगी द्वारा अखिलेश कृष्ण मोहन के परिजनों के प्रति गहरी संवेदना प्रकट करना मायने रखता है. इसे देखते हुए बहुजन बुद्धिजीवियों के मन में कौतूहल है कि क्या योगी आदित्यनाथ अखिलेश यादव के परिजनों को पर्याप्त आर्थिक मदद करके एक लम्बी लकीर खींचने की पहल कदमी करेंगे ?

एच.एल.दुसाध

दिनांक : 14 मई, 2021

(लेखक बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं. )