मीडिया संस्थानों के नाम खुला पत्र, आपदा में अवसर न तलाशें, पत्रकारों की सेलरी न मारें

media

मीडिया संस्थान अपने सामाजिक दायित्वों में उपरोक्त मुद्दों को शामिल करते हुए अपने-अपने संस्थान के संपादकीय टीम एवं अन्य सेक्शन के कर्मचारियों के प्रति मानवीय संवेदना दिखाते हुए उचित निर्णय लेंगे।

डिजिटल मीडिया से घबराई सरकार अब कसना चाहती है नकेल !

Social Media

सरकार सुदर्शन चैनल पर कुछ नहीं कह रही है। इसके विपरीत इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को बचाने की कोशिश कर रही है, और चिंताजनक बात यह है कि इसकी आड़ में डिजिटल मीडिया को निशाने पर ले रही है।

रवीश कुमार युनिवर्सिटी के छात्र “मीडिया बिकाऊ है”, यह चालू धारणा दिमाग से निकाल दें!

Ravish Kumar

मीडिया के विषय में आम धारणा (General perception about media) है कि यह बिकी हुई. अब तो लोग मेन स्ट्रीम मीडिया (Main stream media) को गोदी मीडिया भी कहने लगे हैं. लेकिन ऐसा आरोप लगाना क्या उचित है? काबिले गौर है कि विचारों का निर्माण करने वाली मीडिया में सक्रिय लोग काफी पढ़े – लिखे

समयांतर का जून अंक और पंकज बिष्ट का लेख इसका बच्चस, उसका बच्चा?

June issue of Samayantar and article by Pankaj Bisht

June issue of Samayantar and article by Pankaj Bisht साहित्य और पत्रकारिता की क्या भूमिका होनी चाहिये (What should be the role of literature and journalism), इसे समझने के लिए युवाजनों को यह अंक जरूर पढ़ना चाहिए। 2000 से मैं लगातार लिखता रहा हूँ समयांतर में। माननीय प्रभाष जोशी और ओम थानवी की परवाह न

पत्रकारिता की गिरती साख और गरिमा को अगर कोई बचा सकता है तो वे हैं आंचलिक पत्रकार

Press Freedom

आंचलिक पत्रकार और पत्रकारिता की गिरती साख Declining credibility of journalism AND regional journalist आंचलिक पत्रकारों के बिना आप समाचार पत्र एवं न्यूज़ चैनलों की कल्पना नहीं कर सकते। अखबार एवं चैनल में 70 प्रतिशत आंचलिक पत्रकारों की बदौलत ही सुर्खियां बनती हैं। आंचलिक पत्रकार पत्रकारिता की रीढ़ होते हैं जिसके बिना कोई भी समाचार

चरित्र हनन, समाज में वैमनस्य व कटुता उत्पन्न करना ट्रोल आर्मी का प्रारंभिक “युगधर्म” है

Lalit Surjan ललित सुरजन देशबंधु पत्र समूह के प्रधान संपादक हैं. वे 1961 से एक पत्रकार के रूप में कार्यरत हैं. वे एक जाने माने कवि व लेखक हैं. ललित सुरजन स्वयं को एक सामाजिक कार्यकर्ता मानते हैं तथा साहित्य, शिक्षा, पर्यावरण, सांप्रदायिक सद्भाव व विश्व शांति से सम्बंधित विविध कार्यों में उनकी गहरी संलग्नता है. यह आलेख देशबन्धु से साभार लिया गया

देशबन्धु : चौथा खंभा बनने से इनकार अखबार अथवा प्रेस और सत्तातंत्र के जटिल संबंधों (Complex relations of press and power) को समझने की मेरी शुरुआत 1961 में हुई, जब मैं हायर सेकंडरी की परीक्षा देकर ग्वालियर से लौटा और जबलपुर में कॉलेज के प्रथम वर्ष में प्रवेश लेने के साथ-साथ बाबूजी के संचालन-संपादन में

पत्रकारिता दिवस पर डॉ. कमला माहेश्वरी ‘कमल’ के कुछ दोहे

Dr. Kamla Maheshwari 'Kamal'

Some couplets of Dr. Kamla Maheshwari ‘Kamal’ on Journalism Day ?आज पत्रकारिता दिवस पर सभी पत्रकार बन्धुओं को मेरी बहुत -बहुत शुभकामनाएं व शताधिक नमन __?. कुछ दोहे उन्हें समर्पित करती हूँ __   पत्रकारिता क्षेत्र वह, दिखलाता है साँच. कठिन घड़ी कितनी रहे लेता है सब बाँच..   सत्य खोज हित छानता पर्त-पर्त वो

‘सिधपुर की भगतणें’ : प्रमादग्रस्त स्त्रियों की शील कथा

Sidhpur ki Bhagtanen

लगभग तीन साल पहले अपनी एक ट्रेन यात्रा में हमने इस उपन्यास को पढ़ने की कोशिश की थी। उसे इसलिये महज एक कोशिश ही कहेंगे, क्योंकि उपन्यास की तरह की एक रचनात्मक विधा में किये गये किसी भी गंभीर काम को तब तक सही ढंग से नहीं पढ़ा जा सकता है, जब तक आप इतने

कोरोना महामारी के नाम पर मीडिया हाउस का शिकार बन रहे हैं पत्रकार, कांग्रेस शासित राज्यों में भी हो रहे पत्रकारों पर जुल्म

Press Freedom

Journalists are becoming victims of media houses in the name of Corona epidemic, atrocities on journalists also happening in Congress ruled states पिछले सप्ताह तंगदस्ती से तंग आकर हिंदी ख़बर न्यूज चैनल के कैमरामैन पत्रकार सत्येंद्र की आत्महत्या बड़े मीडिया हाउस के लिये सुर्खियां नहीं बन पायीं, क्योंकि इस से मीडिया की साख पर बट्टा

‘अनसुनी आवाज’: एक जरूरी किताब

Ansuni Awaz

एक अच्छा लेखक वही होता है (Who is a good writer) जो अपने वर्तमान समय से आगे की समस्यायों, घटनाओं को न केवल भांप लेता है बल्कि उसे अभिव्यक्त करते हुए पाठक को सजग करता है। मास्टर प्रताप सिंह (Master Pratap Singh) ऐसे ही लेखक व पत्रकार रहे हैं। वे ‘मास्टर साहब’ के नाम से