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चौथा खंभा

भारत का मीडिया भारत के अर्जित लोकतंत्र का हत्यारा है – रवीश कुमार

Ravish Kumar

India’s media is the killer of India’s earned democracy – Ravish Kumar अमित मालवीय। बीजेपी के नैशनल इंफोर्मेशन एंड टेक्नॉलजी के प्रभारी हैं। प्रेस की कथित स्वतंत्रता का सम्मान करने वाले हमारे आदरणीय प्रधानमंत्री मोदी जी की पार्टी के NIT सेल के प्रभारी इंडिया टुडे के पत्रकार राजदीप सरदेसाई को लेकर अपने ट्विटर हैंडल पर एक पोल चला रहे हैं। …

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नागरिकता संशोधन कानून की कवरेज के दौरान पत्रकारों पर हुए हमले के खिलाफ CAAJ का निंदा वक्तव्य

Assault on Media in anti-CAA protests

CAAJ’s Condemnation Statement against Attack on Journalists during Coverage of Citizenship Amendment Act नयी दिल्ली, 28 दिसंबर, 2019. नागरिकता संशोधन कानून की कवरेज के दौरान पत्रकारों पर हुए हमले के खिलाफ पत्रकारों की समिति काज (Committee Against Assault on Journalists (CAAJ)) ने निम्न वक्तव्य जारी किया है – देश भर में जब छात्र और युवा नागरिकता कानून में हुए संशोधन …

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सुनंदा के. दत्ता-रे की यह कैसी अनोखी विमूढ़ता ! ज़मीनी राजनीति से पूरी तरह कटा हुआ एक वरिष्ठ पत्रकार

SUNANDA K. DATTA-RAY ARTICLE INDIAN INEFFICIENCY MAY BE THE SAVING OF INDIA A note of assurance

Comment on SUNANDA K. DATTA-RAY ARTICLE in The telegraph “INDIAN INEFFICIENCY MAY BE THE SAVING OF INDIA : A note of assurance” जब भी किसी विषय को उसके संदर्भ से काट कर पेश किया जाता है, वह विषय अंधों के लिये हाथी के अलग-अलग अंग की तरह हो जाता है ; अर्थात् विषय के ऐसे प्रस्तुतीकरण को द्रष्टा को अंधा …

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क्रांति वीर शाहजहानपुर का पठान वो, सिंह और शायर सपूत अशफाक था

Ashfaqulla Khan

उन्नत सपाट, गौर वर्ण, शाही ठाठ-बाट। भारतीय पौरूष की बेमिसाल धाक था।। अंग्रेजी शासन उखाड़ फेंकने के लिए, जिसका इरादा फौलादी नेक पाक था। फांसी चढ़ने के बाद कफन पे रखवाना, चाहता जो बस मादरे वतन की खाक था। क्रांति वीर शाहजहानपुर का पठान वो, सिंह और शायर सपूत अशफाक था।। -0-0-0-0-0   कोई बीज ऐसा हो देना वतन की …

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रवीश कुमार के भाषणों के प्रभाव में एक सोच — यह भारतीय मीडिया की एक अलग परिघटना है

Ravish Kumar

रवीश कुमार के भाषणों के प्रभाव में एक सोच — यह भारतीय मीडिया की एक अलग परिघटना है रवीश कुमार के भाषणों (Speeches of ravish kumar) को सुनना अच्छा लगता है। इसलिये नहीं कि वे विद्वतापूर्ण होते हैं ; सामाजिक-राजनीतिक यथार्थ के चमत्कृत करने वाले नये सुत्रीकरणों की झलक देते हैं। विद्वानों के शोधपूर्ण भाषण तो श्रोता को भाषा के …

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