शब्द

एक अप्रतिम महानायक : नामदेव ढसाल

Namdev dhasal

15 January: Today is the death anniversary of Namdev Dhasal 15 जनवरी : आज है नामदेव ढसाल की पुण्यतिथि आज 15 जनवरी है। पहले से ही मायस्थेनिया जैसी गंभीर बीमारी शिकार विश्वकवि नामदेव ढसाल तीन महीनों से आंत के कैंसर (Bowel cancer) से जूझते हुए 2014 में आज ही के दिन मुंबई के बॉम्बे हास्पिटल में आखिरी साँस लिए थे। …

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छपाक का विरोध : औरतों से डरे हुए लोग कितना शोर कर रहे हैं

Deepika Paducone Chhapak

…….जो राजनीति के तहत …छपाक …फ़िल्म के विरोध में शामिल हैं, अब वो लोग… महिलाओं के प्रति होने वाले किसी भी अपराध में मोमबत्तियाँ ना थामें ……🙏🙏 ज़ुल्म हुआ है बस इतना ही तो कहा ख़िलाफ़त में फ़ैसले तो नहीं दिये .. मगर उफ़्फ़ यह औरतों से डरे हुए लोग कितना शोर कर रहे हैं… छपाक …से घबराए.. झुंड के …

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संस्मरण : श्रीकृष्ण सरल ने हास्य कविताएं भी लिखीं

Shri Krishn Saral

Memoir: Shri Krishna Saral also wrote humour poems यह श्रीकृष्ण सरल का जन्म शताब्दी वर्ष है। ठेठ बचपन में जिन लोगों की कविताओं ने रस पैदा किया था उनमें श्री चतुर्भुज चतुरेश, श्री वासुदेव गोस्वामी और श्रीकृष्ण सरल का नाम याद आता है। आज जिन सरल जी को लोग राष्ट्रवादी कविताओं के लिए जानते हैं, उनमें से कम ही लोगों …

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रात भर आज रात का जश्न चलेगा.. सुरूर भरी आँखों वाली शब जब देखेगी उजाला

Welcome New Year 2020

उफ़्फ़ दिसम्बर की बहती नदी से बदन पर लोटे उड़ेलने की उलैहतें .. इकतीस है हर साल की तरह फिर रीस है .. घाट पर ख़ाली होगा ग्यारह माह के कबाड़ का झोला .. साल फिर उतार फेंकेगा पुराने साल का चोला .. जश्न के वास्ते सब घरों से छूट भागेंगे .. रात के पहर रात भर जागेंगे .. दिसम्बरी …

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कपड़ों से पहचान : पहचान का संकट

Jasbir Chawla

कपड़ों से पहचान : पहचान का संकट —————————————   ‘दाढ़ी धारी हिंदू’ बछड़े के साथ था, मुसलमान समझा, मार दिया. भीड़ भरी बस में अकेला ‘मोना सिख’, हिंदू समझ कर मार दिया. पगड़ीधारी सिख था, गले में टायर डाला, जला दिया, विदेश में मुसलमान समझ कर मार दिया. दलित मरे ढोर की खाल उतार रहा था, गौ हत्यारा कह कर …

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बेड़ा गर्क है.. सस्ता नेटवर्क है.. इकोनॉमी पस्त है.. पर सब चंगा सी

डॉ. कविता अरोरा (Dr. Kavita Arora) कवयित्री हैं, महिला अधिकारों के लिए लड़ने वाली समाजसेविका हैं और लोकगायिका हैं। समाजशास्त्र से परास्नातक और पीएचडी डॉ. कविता अरोरा शिक्षा प्राप्ति के समय से ही छात्र राजनीति से जुड़ी रही हैं।

रोज दिखती हैं मुझे अखबार सी शक्लें…. गली मुहल्ले चौराहों पर इश्तेहार सी शक्लें… शिकन दर शिकन क़िस्सा ग़ज़ब लिखा है.. हिन्दू है कि मुस्लिम माथे पे ही मज़हब लिखा है…. पल भर में फूँक दो हस्ती ये मुश्त-ए-ग़ुबार है.. इंसानियत को चढ़ गया ये कैसा बुखार है.. खेल नफ़रतों का उसने ऐसा शुरू किया .. अमन पसंद चमन का …

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दे और दिल उनको जो न दे मुझको ज़बाँ और

Main Ek Karsewak Tha book by Bhanwar Meghwanshi

–राजेश चौधरी, चित्तौड़गढ़ हिन्दी पट्टी में दलित आत्मवृत्त-लेखन महाराष्ट्र की तुलना में देर से शुरू हुआ और अब भी संख्यात्मक दृष्टि से कम है। भँवर मेघवंशी का आत्मवृत्त पिछले दिनों प्रकाशित हुआ है, जो कि इस अभाव की एक हद तक पूर्ति करता है। इसे लेखक का सम्पूर्ण आत्मवृत्त कहने के बजाय एक अंश कहना ज्यादा ठीक होगा; क्योंकि इसमें …

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लाइब्रेरी में लहू बहाती लाठी

Jamia LathiCharge

लाइब्रेरी में लहू बहाती लाठी ——————   लाठी की आँख नहीं होती पुस्तकें नहीं पढ़ती सोचती नहीं लाठी लाठी का रिश्ता जिस्म से है सत्ता का हाथ लाठी लहू बहाती लाठी तन/मन पर जख्म छोड़ती जामिया की लाइब्रेरी में घुसी परंपरा निभाई संविधान की धज्जियाँ उड़ी निहत्थों की जमकर धुनाई अपना धर्म निभाती लाठी ☘️ जसबीर चावला

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इंसान ईमानदार हो तो उसके गाने में तासीर पैदा होती है : यथार्थबोध से उपजी एक जुझारू आवाज़ बेग़म अख़्तर

आबिदा परवीन की दुनियावी भरम से मुक्ति की आवाज़ और किशोरी अमोनकर का कुलीन, पवित्र और स्थिर स्वर.. दोनों छोरों को अतिक्रमित करती यथार्थबोध से उपजी एक जुझारू आवाज़ बेग़म अख़्तर की! बेग़म अख़्तर पर बारहा लिखने का मन हुआ करता था लेकिन ‘और फिर तल्ख़िए एहसास ने दिल तोड़ दिया’ जैसा हाल हो गया। कमउमरी में उन्हें सिर्फ़ उनकी …

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इक चाय वाले के हाथ सत्ता लग गयी..उसने कौमों से क़ौम सुलगाई है..मत भूले देस… आज़ादी की रंगत तो अश्फ़ाक के लहू से आई है

डॉ. कविता अरोरा (Dr. Kavita Arora) कवयित्री हैं, महिला अधिकारों के लिए लड़ने वाली समाजसेविका हैं और लोकगायिका हैं। समाजशास्त्र से परास्नातक और पीएचडी डॉ. कविता अरोरा शिक्षा प्राप्ति के समय से ही छात्र राजनीति से जुड़ी रही हैं।

इक चाय वाले के हाथ सत्ता लग गयी.. चटपटी पाकिस्तानी चटनी पकौड़ियों के साथ हट्टी सज गयी… उसने हिंदू-हिंदू फूँक कर अंगार जलाया, इक काग़ज़ के टुकड़े से असम मेघालय सुलगाया.. अब धीमी-धीमी आँच पर सुलग रहीं है देस की भट्टी.. हौले हौले से चायवाले की चल निकली है हट्टी .. उसकी इस हट्टी पर देस की जलती भट्टी पर.. …

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