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शब्द

दे और दिल उनको जो न दे मुझको ज़बाँ और

Main Ek Karsewak Tha book by Bhanwar Meghwanshi

–राजेश चौधरी, चित्तौड़गढ़ हिन्दी पट्टी में दलित आत्मवृत्त-लेखन महाराष्ट्र की तुलना में देर से शुरू हुआ और अब भी संख्यात्मक दृष्टि से कम है। भँवर मेघवंशी का आत्मवृत्त पिछले दिनों प्रकाशित हुआ है, जो कि इस अभाव की एक हद तक पूर्ति करता है। इसे लेखक का सम्पूर्ण आत्मवृत्त कहने के बजाय एक अंश कहना ज्यादा ठीक होगा; क्योंकि इसमें …

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लाइब्रेरी में लहू बहाती लाठी

Jamia LathiCharge

लाइब्रेरी में लहू बहाती लाठी ——————   लाठी की आँख नहीं होती पुस्तकें नहीं पढ़ती सोचती नहीं लाठी लाठी का रिश्ता जिस्म से है सत्ता का हाथ लाठी लहू बहाती लाठी तन/मन पर जख्म छोड़ती जामिया की लाइब्रेरी में घुसी परंपरा निभाई संविधान की धज्जियाँ उड़ी निहत्थों की जमकर धुनाई अपना धर्म निभाती लाठी ☘️ जसबीर चावला

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इंसान ईमानदार हो तो उसके गाने में तासीर पैदा होती है : यथार्थबोध से उपजी एक जुझारू आवाज़ बेग़म अख़्तर

आबिदा परवीन की दुनियावी भरम से मुक्ति की आवाज़ और किशोरी अमोनकर का कुलीन, पवित्र और स्थिर स्वर.. दोनों छोरों को अतिक्रमित करती यथार्थबोध से उपजी एक जुझारू आवाज़ बेग़म अख़्तर की! बेग़म अख़्तर पर बारहा लिखने का मन हुआ करता था लेकिन ‘और फिर तल्ख़िए एहसास ने दिल तोड़ दिया’ जैसा हाल हो गया। कमउमरी में उन्हें सिर्फ़ उनकी …

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इक चाय वाले के हाथ सत्ता लग गयी..उसने कौमों से क़ौम सुलगाई है..मत भूले देस… आज़ादी की रंगत तो अश्फ़ाक के लहू से आई है

डॉ. कविता अरोरा (Dr. Kavita Arora) कवयित्री हैं, महिला अधिकारों के लिए लड़ने वाली समाजसेविका हैं और लोकगायिका हैं। समाजशास्त्र से परास्नातक और पीएचडी डॉ. कविता अरोरा शिक्षा प्राप्ति के समय से ही छात्र राजनीति से जुड़ी रही हैं।

इक चाय वाले के हाथ सत्ता लग गयी.. चटपटी पाकिस्तानी चटनी पकौड़ियों के साथ हट्टी सज गयी… उसने हिंदू-हिंदू फूँक कर अंगार जलाया, इक काग़ज़ के टुकड़े से असम मेघालय सुलगाया.. अब धीमी-धीमी आँच पर सुलग रहीं है देस की भट्टी.. हौले हौले से चायवाले की चल निकली है हट्टी .. उसकी इस हट्टी पर देस की जलती भट्टी पर.. …

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जितने वजनदार उतने ही विनम्र थे स्वयं प्रकाश

Swayam Prakash

जितने वजनदार उतने ही विनम्र थे स्वयं प्रकाश श्रद्धांजलि/ संस्मरण- स्वयं प्रकाश Tribute / Memoir to Swayam Prakash  मैं लम्बे समय तक कहानियों का नियमित पाठक रहा हूं जिसका शौक कमलेश्वर के सम्पादन के दौर में निकलने वाली सारिका से लगा था। सारिका के समानांतर कथा आन्दोलन के दौर में जो कहानियां लिखी गयीं, उनके बारे में कहा जा सकता है …

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वो बकवास करते हैं काम नहीं करते… वो रोज कहते हैं देश बदल रहा है ..

डॉ. कविता अरोरा (Dr. Kavita Arora) कवयित्री हैं, महिला अधिकारों के लिए लड़ने वाली समाजसेविका हैं और लोकगायिका हैं। समाजशास्त्र से परास्नातक और पीएचडी डॉ. कविता अरोरा शिक्षा प्राप्ति के समय से ही छात्र राजनीति से जुड़ी रही हैं।

वो बकवास करते हैं काम नहीं करते… वो रोज कहते हैं देश बदल रहा है .. वो बकवास करते हैं काम नहीं करते… और करने भी नहीं देते… भाषण देते हैं चिल्ला-चिल्ला कर चीख़ते हैं… व्यवस्था… व्यवस्था… अब देश में है ही क्या मनोरंजन इससे सस्ता… कहीं भी मजमा जोड़ लो .. करो इतिहास पुराण की दो बातें जनभावनाएं मोड़ लो… …

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सुनो लड़कियों .. दमन हो जायेगा तुम्हारा.. तो फिर बलात्कार नहीं होगा

Say no to Sexual Assault and Abuse Against Women

सुनो लड़कियों .. दमन हो जायेगा तुम्हारा.. तो फिर बलात्कार नहीं होगा   ..सुनो लड़कियों सीना पिरोना काढ़ना सीखो… बरस चौदह तक आते-आते ब्याह.. फिर सब ऊँ स्वाहा… बीस बरस तक दो चार बच्चे… घोड़े पे राजकुमार वाले तुम्हारे तमाम ख़्वाब सच्चे… फिर जो होगा घरों में ही होगा… मार कुटाई .. लात घूँसा.. वो भरें तो भरने दो खाल …

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सुन गुड़िया बदक़िस्मत मुल्क है यह… यहाँ तेरी पैदाइश अज़ाब है…  

Say no to Sexual Assault and Abuse Against Women.jpg

……लो मैंने फिर डरा दिया अपनी मासूम बच्ची को लड़कों से.. खुली छतों.. खुली हवाओं.. खुली सड़कों से… तीन बरस की उम्र से एहतियात से रह… बता रही हूँ… मैं मजबूर हूँ.. उसे डर-डर के जी.. सिखा रहीं हूँ… सुन तू ड्राइवरों.. सर्वेंटों… मेल टयूशन टीचरों.. से बच.. सतर्क रह… खोल दे गंदे से गंदा सच… उसे रिश्तेदारों से घुलने-मिलने …

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अदिति गुलेरी और उनकी कविताएं : बात सिर्फ बचपन की नहीं परिवार की भी है….

Dr. Aditi Guleri's first poetry collection, डा. अदिति गुलेरी का प्रथम काव्य संग्रह बात वजूद की

अदिति गुलेरी और उनकी कविताएं : बात सिर्फ बचपन की नहीं परिवार की भी है…. हाल ही में हिमाचल प्रदेश धर्मशाला से सुप्रसिद्ध परिवार की होनहार बिटिया डा. अदिति गुलेरी का प्रथम काव्य संग्रह ‘बात वजूद की‘ मेरे पास आया जिसे स्वयं अदिति ने भेजा और प्रतिक्रिया की उम्मीद भी रखी। किसी भी लेखक की यह मंशा हमेशा रहती है …

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