“क्लिक कल्चर” के प्रतिवाद में पंडित नेहरू

Pt. Jawahar Lal Nehru

‘क्लिक कल्चर’ , ‘क्विक’ कल्चर है

नई डिजिटल कल्चर (new digital culture) ‘क्लिक कल्चर’ है। ‘क्विक’ कल्चर है। इसने ‘पुसबटन’ और इमेज को महान और लोकतांत्रिक मूल्यों और विचारों को खोखला और निरर्थक बनाया है। सम्प्रति टीवी से लेकर फेसबुक तक अनेक संगठन और नेता इसके शैतान खिलाड़ी के रुप में खेल रहे हैं और भारत की मासूम युवा पीढ़ी को इमेजों के जरिए दिग्भ्रमित करने में लगे हैं।

युवाओं के विवेक पर क्लिक कल्चरने सीधे हमला बोला हुआ है..

कहा जा रहा है ‘क्लिक’ इमेज ही सत्य है, विचार तो बकबास होते हैं, बोर करते हैं, कमाना मूल्यवान काम है, सोचना फालतू चीज है, व्यवहारवादी बनो, जनवादी मत बनो, धर्मनिरपेक्षता फालतू चीज़ है, लोकतंत्र में रहो लेकिन लोकतांत्रिक मूल्यों के बिना। लोकतांत्रिक मूल्य तो बोझा हैं, वोट दो, लेकिन विवेकवाद के आधार पर सोचो मत, सार्थक है सिर्फ चुनाव जीतना। इस ‘क्लिक कल्चर’ के नायक इन दिनों पंडित नेहरू का भी ‘क्लिक संस्कार’ करने में मशगूल हैं।

सामान्य प्रधानमंत्री नहीं थे पंडित जवाहरलाल नेहरू

उल्लेखनीय है पंडित जवाहरलाल नेहरू देश के सामान्य प्रधानमंत्री नहीं थे, वे सामान्य राजनेता भी नहीं थे। आमतौर पर लोकतंत्र में नेता आते हैं और जाते हैं। औसत नेता ही लोकतंत्र की संपदा के रुप में नजर आते हैं, भारत में अनेक औसत नेता प्रधानमंत्री बने, लेकिन आधुनिक विचारवान विरल प्रधानमंत्री तो एकमात्र पंडितजी ही थे। वे ऐसे प्रधानमंत्री थे जिनके पास आधुनिक भारत का विज़न था, आधुनिक विचार थे, आधुनिक जीवनशैली थी और इन सबसे बढ़कर अपने विचारों के लिए जोखिम उठाने का साहस था।

नेहरू को पूजना आसान है, उनकी विरासत को समझना और उनके विचारों की दिशा में जोखिम उठाकर चलना बहुत मुश्किल काम है। खासकर वे लोग जो आधुनिक विचारों, वैज्ञानिक सचेतनता, धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र के मर्म से अनभिज्ञ हैं या जो लोग आए दिन इनकी जड़ों में मट्ठा डालने का काम करते हैं, उनके लिए नेहरू को पाना बेहद मुश्किल है।

भारत की संस्कृति की देन थे नेहरू

नेहरू ‘क्लिक कल्चर‘ की देन नहीं थे, वे तो संस्कृति की देन थे। नेहरू को पाने के लिए भारत की संस्कृति के पास जाना होगा। संस्कृति का मार्ग बेहद जटिल और जोखिम भरा है, वह फेसबुक की वॉल पर लिखी ‘क्विक’ इबारत नहीं है। नेहरू कोई किताब नहीं है, कोई कुर्सी नहीं है या मूर्ति नहीं है जिसके साथ खड़े होकर फोटो क्लिक करो और नेहरू की पंक्ति में शामिल हो जाओ!

भारत के प्रधानमंत्री बनने के बावजूद नेहरू की पंक्ति में खड़े होना संभव नहीं है। क्योंकि नेहरू कुर्सी नहीं बल्कि देश का आधुनिक विज़न हैं।

नेहरू के आधुनिक विज़न को सचेत रूप से अर्जित करना होगा, तब ही सही मायने में नेहरू की रूह को स्पर्श किया जा सकता है। महसूस किया जा सकता है।

नेहरू को महान जिस चीज ने बनाया, वह था जीवन के प्रति उनका विवेकवादी नजरिया। नेहरू के लिए साधन और साध्य एक थे। उन्होंने लिखा है ”शुरु में जिंदगी के मसलों की तरफ़ मेरा रुख़ कमोबेश वैज्ञानिक था, और उसमें उन्नीसवीं सदी और बीसवीं सदी के शुरु के विज्ञान के आशावाद की चाशनी भी थी। एक सुरक्षित और आराम के रहन-सहन ने और उस शक्ति और आत्म-विश्वास ने, जो उस समय मुझमें था, आशावाद के इस भाव को और बढ़ा दिया था।”

हमारे नेताओं और राजनीतिक कार्यकर्ताओं में एक बड़ा अंश है जो अंधविश्वासी और धर्म का अंधपूजक है। वे धर्म को आलोचनात्मक विवेक की आंखों से देखते ही नहीं हैं। ऐसे अंधपूजक हमारे देश के प्रधानसेवक भी हैं। जबकि नेहरू में ये चीजें एकदम नहीं थीं।

नेहरू ने लिखा है, ”मजहब में – जिस रूप में मैं विचारशील लोगों को भी उसे बरतते और मानते हुए देखता था,चाहे वह हिन्दू-धर्म, चाहे इस्लाम या बौद्ध-मत या ईसाई-मत-मेरे लिए कोई कशिश न थी। अंध-विश्वास और हठवाद से उनका गहरा ताल्लुक था और जिन्दगी के मसलों पर ग़ौर करने का उनका तरीक़ा यक़ीनी तौर पर विज्ञान का तरीक़ा न था। उनमें एक अंश जादू-टोने का था और बिना समझे-बूझे यकीन कर लेने और चमत्कारों पर भरोसा करने की प्रवृत्ति थी।’

”फिर भी यह एक जाहिर-सी बात है कि मज़हब ने आदमी की प्रकृति की कुछ गहराई के साथ महसूस की हुई जरुरतों को पूरा किया है और सारी दुनिया में, बहुत ज्यादा कसरत में, लोग बिना मज़हबी अकीदे के रह नहीं सकते। इसने बहुत-ऊँचे किस्म के मर्दों और औरतों को पैदा किया है, और साथ ही तंग-नज़र और ज़ालिम लोगों को भी। इसने इन्सानी ज़िन्दगी को कुछ निश्चित आंकें दी हैं और अगरचे इन आंकों में से कुछ आज के ज़माने पर लागू नहीं हैं. बल्कि उसके लिए नुकसानदेह भी हैं, दूसरी ऐसी भी हैं, जो अख़लाक़ और अच्छे व्यवहार लिए बुनियादी हैं।”

नेहरू ने लिखा है ‘ असल में मेरी दिलचस्पी इस दुनिया में और इस जिंदगी में है, किसी दूसरी दुनिया या आने वाली जिंदगी में नहीं।”

पंडितजी पुनर्जन्म की धारणा में यकीन नहीं करते थे, अंधविश्वासों के विरोधी थे। दिमागी अटकलबाजी में यकीन नहीं करते थे। वे चीजों, घटनाओं, व्यक्तियों, समुदाय और वस्तुओं को वैज्ञानिक नजरिए से देखने में विश्वास करते थे। उन्होंने माना ”मार्क्स और लेनिन की रचनाओं के अध्ययन का मुझ पर गहरा असर पड़ा और इसने इतिहास और मौजूदा जमाने के मामलों को एक नई रोशनी में देखने में बड़ी मदद पहुँचाई। इतिहास और समाज के विकास के लंबे सिलसिले में एक मतलब और आपस का रिश्ता जान पड़ा और भविष्य का धुंधलापन कुछ कम हो गया।”

प्रोफेसर जगदीश्वर चतुर्वेदी

पंडित नेहरू : आधुनिकता, राष्ट्रीयता और आधुनिक भारत | नेहरू की भूमिका को यहां से समझें

Pandit Nehru in protest against “click culture”

नेहरूजी के आगे खड़े होने की नाकाम कोशिश

modi at red fort 15 august

आजादी का अमृत महोत्सव पर संपादकीय टिप्पणी (Editorial Comment on Amrit Mahotsav of Azadi)

देशबन्धु में संपादकीय आज (Editorial in Deshbandhu today)

देश में इस वक्त आजादी की 75वीं वर्षगांठ (75th anniversary of India’s independence) का शोर है। देशभक्ति और राष्ट्रवाद से भरे ओजपूर्ण गीत लाउड स्पीकर पर जोर-जोर से बजाए जा रहे हैं। एक तरह की होड़ है कि शहर के किस नुक्कड़, गांव की किस गली से कितने जोर से गाने बज सकते हैं।

तो तिरंगा लहरा कर होगी देशभक्ति साबित?

देशभक्ति साबित करने के लिए अब तिरंगा लहराने का काम भी दे दिया गया है। देश से प्यार, आजादी की खुशी अब मन में मनाने से काम नहीं चलेगा, नए भारत में हर चीज दिखावे की हो गई है। देशभक्ति भी इसी श्रेणी में शुमार है।

1947 में जब देश को आजादी मिली थी, उस वक्त लोगों में नए भारत की, अपने शासन की, लोकतंत्र की ढेर सारी उम्मीदें थीं। कई डर भी थे कि कैसे भारत अपने पैरों पर खड़ा होगा, नयी सरकार किस दिशा में देश को आगे लेकर जाएगी, कैसे गुटों में बंटी हुई दुनिया में भारत अपना स्थान सुरक्षित करेगा, बंटवारे के जख्म से कराहते लोगों को सरकार कैसे संभालेगी, हिंदू-मुसलमान के बीच की खाई कैसे भरी जाएगी, खेती, उद्योग, व्यापार, शिक्षा, स्वास्थ्य, विज्ञान ऐसे तमाम क्षेत्रों में देश किस नजरिए के साथ आगे बढ़ेगा, ऐसे ढेरों सवाल उस वक्त के नेताओं और लोगों के मन में थे। गनीमत थी कि नेहरू जी जैसे दूरदृष्टा नेता के हाथ में भारत की कमान गयी, जिन्होंने उदार सोच और व्यापक नजरिए के साथ देश को संभाला। उनकी बात हिंदू भी सुनते थे और मुसलमान भी। और वे इतने बेखौफ थे कि खुली जीप में घूमते थे, भीड़ के बीच अकेले घुस जाते थे, कोई विरोध करे या नाराज हो तो उसकी बात गौर से सुनते थे।

Pt. Jawahar Lal Nehru
Pt. Jawahar Lal Nehru
देश के प्रिय नेता और दुनिया के लिए शांतिदूत थे पं नेहरू

देश के भीतर वो लोगों के प्रिय नेता थे और दुनिया के लिए वो शांतिदूत थे, जो अंग्रेजों की गुलामी से आजाद हुए देशों के लिए मिसाल थे। 1947 से नेहरूजी ने देश को इस तरह संभाला कि देश कई क्षेत्रों में आत्मनिर्भर बन गया। और उनके बाद भी आने वाली सरकारों ने उनकी नीतियों पर देश को चलाया और आगे बढ़ाया। कई सार्वजनिक निकाय स्थापित हुए, एम्स, आईआईटी, इसरो जैसी संस्थाएं बनीं, देश में स्कूल, कालेज, विश्वविद्यालय। इन सबके साथ लोगों में देशभक्ति की भावना भी विकसित हुई। कारखानों, उद्योगों, बांधों, सड़कों, रेल लाइनों, में लोगों को देश का विकास दिख रहा था और इसके लिए प्यार जाग रहा था। अपने प्यार को दिखाने के लिए लोग 15 अगस्त और 26 जनवरी को बड़े उत्साह के साथ तिरंगा फहराते थे, प्रभात फेरियां निकालते थे, देशभक्ति के गीत गाते थे। तब तिरंगा फहराने की कोई जबरदस्ती नहीं थी। लेकिन अब सरकार अपने ही लोगों से देशभक्ति का सबूत मांग रही है।

स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास बदलने की साजिश!

जब सरकार आपसे कहे कि आपको अपनी आजादी का उत्सव इस ढंग से मनाना है, तो फिर यह सवाल ये उठता है कि क्या हम वाकई आजाद हैं (are we really free)। हमें देशभक्ति साबित करने के लिए तिरंगा फहराकर उसकी फोटो पोस्ट करने की जरूरत क्यों पड़ रही है। अगर हम ईमानदारी से अपना काम करें, संविधान के खिलाफ कोई कदम न उठाएं, समय पर अपने करों का भुगतान करें, रिश्वत, धोखाधड़ी, बैंकों से कर्ज लेकर वापस न करना, ऐसे गलत काम न करें, समाज और देश को तोड़ने वाले काम न करें, सभी धर्मों की इज्जत करें और सौहार्द्र को कायम रखें तो क्या ये सब देशभक्ति नहीं कहलाएगी।

जाहिर है मौजूदा वक्त में देश से प्यार के ये पैमाने बदल गए हैं और अब इसके साथ स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास बदलने की चालाकी भी सरेआम की जा रही है।

खासकर नेहरूजी का नाम किसी भी तरह से धूमिल हो, इसकी कोशिश हो रही है। जैसे कर्नाटक सरकार ने हर घर तिरंगा अभियान को लेकर एक विज्ञापन अखबारों में दिया है, जिसमें गांधीजी से लेकर वी डी सावरकर तक की तस्वीर है, साथ में प्रधानमंत्री मोदी और मुख्यमंत्री बोम्मई की भी तस्वीर है, लेकिन नेहरूजी की तस्वीर इस विज्ञापन में नहीं है।

कर्नाटक सरकार ने स्वाधीनता सेनानियों की तस्वीरों में नेहरूजी का चित्र शामिल करना जरूरी नहीं समझा और देश के सबसे तेज समाचार चैनल की तेज तर्रार एंकर ने आजादी के दौरान के एक वीडियो को अपने कार्यक्रम में दिखाते हुए अपने पीछे नेहरू जी को छिपाने की कोशिश की।

इस वीडियो में एंकर खुद सफेद-काली साड़ी में पुराने जमाने की नायिकाओं की तरह तैयार हुई 15 अगस्त 1947 की उन घड़ियों का वर्णन कर रही हैं, जब देश को आजादी मिली थी। इस वीडियो में तकनीकी के कमाल से एंकर ने इस तरह अपना स्थान बनाया है कि जहां नेहरू जी खड़े होकर उत्साही जनता का अभिवादन स्वीकार कर रहे हैं, ठीक उनके सामने एंकर आ कर खड़ी हो जाती है। ये सरासर नेहरूजी को पार्श्व में धकेलने की नापाक साजिश दिख रही है। वीडियो बनाने वाले चाहते तो एंकर का स्थान कहीं और बना सकते थे, लेकिन नेहरूजी को किन के इशारे पर दबाया जा रहा है, यह समझना कठिन नहीं है।

आजादी के अमृत महोत्सव में निकृष्टता का प्रदर्शन

75 बरस पहले जब आजादी मिली थी, देश में तब भी वैचारिक मतभेद कायम थे और जब तक लोकतंत्र रहेगा, ये मतभेद बने रहेंगे। लेकिन उस वक्त विरोधियों को मात देने के लिए खुद इतना नीचे नहीं गिरा जाता था। अब तो नैतिकता, मर्यादा, शिष्टाचार के तमाम तकाजों को कैद कर आजादी का अमृत महोत्सव मनाया जा रहा है। तय है कि इस अमृत पर उन्हीं लोगों का हक होगा, जिन्होंने खुद को बाकियों से ऊंचा मान लिया है। समाज के आम लोग, निचले पायदान के लोग एक बार फिर अमृत की आस में कटोरा लिए ठगे जाएंगे या अमृत पाने के लिए ऊंची जमात में शामिल होने की कोशिश में दंडित किए जाएंगे।

देशबन्धु में आज का संपादकीय का किंचित् संपादित रूप साभार

मुखर्जी, हेडगेवार और सावरकर द्वारा तिरंगे के अपमान के लिए भाजपा देश से माफी मांगे – शाहनवाज़ आलम

Failed attempt to stand before Nehru

लाल किले से राष्ट्र के 83 मिनट की बर्बादी : “खाया पीया कुछ नहीं, गिलास फोड़ा आठ आने”

modi at red fort 15 august

लाल किले से 83 मिनट के भाषण का सार;

खाया पीया कुछ नहीं, गिलास फोड़ा आठ आने”

सरोज जी – जनकवि मुकुट बिहारी सरोज – की एक कविता की पंक्ति है; “शेष जिसमें कुछ नहीं ऐसी इबारत, ग्रन्थ के आकार में आने लगी है।” आज यदि वे इसे फिर से लिखते तो ग्रन्थ की जगह 83 मिनट के उस भाषण से जोड़ते जिसे 15 अगस्त की सुबह इस देश की जनता को लालकिले की प्राचीर से झिलाया गया है। जब इस तरह की चीजों पर भी लिखना पड़ता है तो बस कबीरदास का दोहा ही सहारा देता है कि “देह धरे का दंड है, सब काहू को होय।” यह सामाजिक राजनीतिक जीवन में होने का दण्ड है कि ऐसे भाषण पर भी लिखो – लिखना चाहिए भी क्योंकि वह किसी व्यक्ति का नहीं उस देश के प्रधानमंत्री का राष्ट्र के नाम संबोधन है जिसके हम और आप नागरिक हैं। इसलिए अनदेखी महँगी पड़ सकती हैं।

इस बार के पूरे भाषण की धुरी हीन ग्रंथि के मवाद का रिसाव थी। वे उस प्राचीर से बोल रहे थे जहां से 1947 को इसी दिन इस महान देश के आजाद होने का एलान किया गया था। उस ऐतिहासिक दिन की 75वीं वर्षगाँठ पर बोलने का अवसर पाने वाले को भलीभाँति मालूम था कि जिस विचार कुनबे के वे हैं उसने भारत की जनता के उस महान संग्राम में अंगुली तो क्या नाखून तक नहीं कटवाए थे। इसके उलट दो राष्ट्र का सिद्धांत देकर देश के टुकड़े करने के अँग्रेजों के नापाक इरादे को हवा दी थी। यह अपराधबोध आज के भाषण में इस कदर हावी था कि वे स्वतन्त्रता सेनानियों की सूची में दनादन ऐसे नाम जोड़े जा रहे थे कि वे लोग आज यदि जीवित होते तो इतने बड़े झूठ पर खुद उनके चेहरे भी झेंप से लाल हो जाते। गांधी के साथ उनकी हत्या के मुकदमे में संदेह का लाभ देकर बरी किए गए, वे सावरकर बिठाये जा रहे थे, जिन्होंने “अत्यंत विनम्रतापूर्वक” इंग्लैंड की महारानी को चिट्ठियां लिखी थीं और आजादी की लड़ाई से अपने आपको बाहर करने और दरबार की सेवा करने की लिखापढ़ी में कसमें खाई थीं। उनके अलावा बाकी जिन जिन के नाम आज जोड़े गए हैं उनने आजादी के लिए क्या क्या किया, यह इतिहास बदलने की लाख कोशिशों के बाद भी अब तक पता नहीं चल पाया है। शायद महामहिम अगले भाषण में कुछ नयी कहानियां लेकर आएं !!

लगता है, मोदी जी और उनके कुनबे – राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ – के मन में भारत की जनता की महान कुर्बानियों से भरे इस विराट इतिहास में अल्पविराम, पूर्णविराम के बराबर भी जगह न होने का अपराध बोध बड़ा गहरा है। विश्व इतिहास में ऐसे हादसों का समाधान निकालने का सभ्य तरीका आत्मालोचना का होता है। चर्च का गैलिलियो से, अब्राहम लिंकन का अपने देश के अश्वेतों से, अमरीका का जापान वगैरा से अपने कुकर्मों के लिए माफी मांगने के कुछ उदाहरण गिनाये भी जा सकते हैं। इसी तर्ज पर रास्ता था कि भाई लोग सीधे सादे तरीके से हाथ जोड़कर देश की जनता से कह देते कि; “भाइयो, बहनों, उस समय की हमारी समझदारी गलत थी, तब के हमारे नेताओं ने स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा न लेकर गलती की…….. अब आगे ऐसी चूक नहीं होगी,” बात ख़तम !! मगर ऐसा इसलिए नहीं कह सकते क्योंकि वे आज भी अंग्रेजों को मुक्तिदाता मानते हैं। इसीलिये हूण, शक, कुषाण, यवन, मंगोल, तुर्क, मुग़ल सबको गरियाते हैं मगर मजाल है कि भारत की रीढ़ तोड़ देने वाले अँग्रेजों के राज के बारे में चूँ तक भी करें।

खुद अंग्रेज इतिहासकार अपनी सरकारों के भारत की जनता के साथ किए पापों पर ग्रन्थ पर ग्रन्थ लिख रहे हैं, मगर यहां भक्तिभाव इत्ता गाढ़ा है कि एक शब्द तक नहीं बोलते। ऐसे कलुषित रिकॉर्ड के बाद भी शहीदों में नाम लिखाने की भी लालसा है सो वही होता है जो माननीय 15 अगस्त को लालकिले से कर रहे थे। उस झंडे को फहरा रहे थे जिसे अशुभ, अपशकुनी और साम्प्रदायिक बताते हुए जिंदगी भर ठुकराते रहे हैं।

नेहरू से संघ परिवार को भय क्यों लगता है?

पूरे भाषण में सबसे ज्यादा हावी था वह नाम – जवाहरलाल नेहरू का नाम – जिसे बोला नहीं गया। इसे लेने में इस कुनबे की रूह कांपती है। इसलिए नहीं कि पंडित जी ने प्रधानमंत्री रहते हुए कोई इनकी भैंस खोल ली थीं। नेहरू से इन्हें भय इसलिए लगता है कि नेहरू ने जिस आधुनिक सभ्य, धर्मनिरपेक्ष और वैज्ञानिक रुझान वाले भारत के निर्माण की आधारशिला रखी थी, ये उसे मिटाकर भारत को मध्ययुगीन आर्यावर्त में बदलना चाहते हैं और जाहिर है कि 58 वर्ष पहले दुनिया छोड़ गए नेहरू आज भी इसमें आड़े आते हैं।

यह दोहराने का कोई अर्थ नहीं कि पूरा भाषण चुनावी भाषण था; क्योंकि सर जी की यूएसपी ही उनका 24 घंटा, सातों दिन, बरसो बरस चुनावी मोड में रहने की है।

हीनता की इस ग्रंथि को सहलाने के अलावा भाषण की दूसरी ख़ास बात यह थी कि इस बार नाम के वास्ते भी कोई लोकलुभावन घोषणा नहीं थी। हर बार के भाषण की तरह इस बार घर तो छोड़िये छत और छप्पर तक का जिक्र नहीं था। देश की बड़ी और जानलेवा समस्याओं पर मौन पूरी तरह मुखर था; आकाश छूती महँगाई, रिकॉर्ड दर रिकॉर्ड बनाती बेरोजगारी, दुनिया भर में शर्मसार करती गरीबी का जिक्र तक नहीं था। जनता के लिए सिर्फ और केवल कर्तव्य थे, नयी बातों में फकत 5 जी था सो वो भी मोटा भाई के लिए था।

जब वे लालकिले से भ्रष्टाचार पर जुमले दाग रहे थे तब आवाज भर की दूरी पर खड़ा सीएजी का दफ्तर पिछली 8 सालों से कुम्भकर्णी ख़र्राटे ले रहा था और मध्यप्रदेश के धार जिले में उन्हीं की पार्टी की सरकार में उन्हीं की पार्टी के नेताओं की ठेकेदारी में बना बाँध दहाड़ें मार मार कर बह रहा था।

पूरा देश देख रहा था कि किस तरह तिरंगे झण्डे के लिए खादी के कपड़े की अनिवार्यता खत्म कर उसे पॉलिस्टर पर बनवाने और पॉलिस्टर से जीएसटी हटाकर मोटाभाई की तिजोरी को कुछ सैकड़ां करोड़ से और मोटा करने का धतकरम किया जा चुका है। बाकी भ्रष्टाचार तो राम नाम की लूट की लूट की तरह हरि अनंत हरि कथा अनंता है ही।

महिलाओं की दशा पर आंसू उस देश की जनता के जनता के सामने बहाये जा रहे थे जहां खुद इन्हीं के कर्मों के चलते श्रमशक्ति में महिलायें घटकर 10 प्रतिशत से भी कम रह गयी हैं। बाकी उनके जो हाल हैं सो हैंइयें सो हैंइयें।

परिवारवाद पर वे कलप रहे थे जिनके परिवार ने देश की नाक में दम कर रखी है। भाई भतीजावाद के आलाप के पीछे क्षेत्रीय दलों को निबटाने का इरादा ज्यादा था। वरना राजनीति और बाकी अन्य संस्थानों में भाई भतीजावाद को कोसते में उन्हें अम्बानी और अडानी जैसे भाईयों और भतीजों की याद अवश्य आनी चाहिए थी जिन्होंने इस देश को अपनी डाइनिंग टेबल पर सजाकर रख दिया है।

परम्परा पर गर्व की बात कहते में भी यह नहीं बताया कि वे किस परम्परा की बात कर रहे हैं ? गांधी की या गोडसे की ? भगत सिंह की या सावरकर की ? जोतिबा फुले और बाबा साहब की या मनु और गौतम की ?

यह सिर्फ उस कहे पर फौरी टिप्पणी हैं जिसे बोलने में 83 मिनट खर्च किए गए। विद्वानों का कहना है कि असली भावार्थ लिखे में पंक्तियों के बीच और कहे में उस अनकहे में होता है, जिसे दरअसल बिना कहे कहा गया होता है। और वह यह है कि यह भाषण आजादी की 75 वीं वर्षगाँठ पर उसके इन 75 वर्षों और उससे पहले के 90 वर्षों के निरंतर संग्राम के हासिल के निषेध और नकार का भाषण है। उपलब्धियों के तिरस्कार का भाषण है।

बादल सरोज

सम्पादक लोकजतन, संयुक्त सचिव अखिल भारतीय किसान सभा

मुखर्जी, हेडगेवार और सावरकर द्वारा तिरंगे के अपमान के लिए भाजपा देश से माफी मांगे – शाहनवाज़ आलम

धर्म और फिदेल कास्त्रो

fidel castro

बेहतरीन धार्मिक समझ वाले व्यक्ति थे फिदेल कास्त्रो

फिदेल कास्त्रो के बारे में यह सब जानते हैं कि वे क्रांतिकारी थे, मार्क्सवादी थे, लेकिन यह बहुत कम लोग जानते हैं कि फिदेल बेहतरीन धार्मिक समझ वाले व्यक्ति भी थे।

फिदेल कास्त्रो ने धर्म को लेकर जिस नजरिए को व्यक्त किया उससे बहुत कुछ सीखने की जरूरत है। यह सच है धर्म का जो रूप हम आज देखते हैं वह बहुत कुछ मूल रूप से भिन्न है। एक बेहतरीन मार्क्सवादी वह है जो धर्म को उसके सही रूप में समझे और धर्म की सही सामाजिक भूमिका पर जोर दे।

हमारे यहां राजसत्ता और उसके संचालक धर्म के प्रचलित रूपों के सामने समर्पण करके रहते हैं, धर्म की विकृतियों के खिलाफ कभी जनता को सचेत नहीं करते, धर्म की गलत मान्यताओं को कभी चुनौती नहीं देते हैं, धर्म का अपने राजनीतिक स्वार्थों के लिए दुरूपयोग करते हैं और इसके लिए सर्वधर्म समभाव की संवैधानिक समझ की आड़ लेते हैं।

संविधान की आड़ लेकर धर्म की ह्रासशील प्रवृत्तियों को संरक्षण देने के कारण ही आज हमारे समाज में धर्म, संत-महंत, पंडे, पुजारी, तांत्रिक, ढोंगी आदि का समाज में तेजी से जनाधार बढ़ा है, इन लोगों के पास अकूत संपत्ति जमा हो गई है। इसके कारण समाज में अ-सामाजिकता बढ़ी है, लोकतंत्र विरोधी ताकतें मजबूत हुई हैं।

यह सच है हम पैदा होते हैं धर्म की छाया में और सारी जिंदगी उसकी छाया में ही पड़े रहते हैं। धर्म की छाया में रहने की बजाय उसके बाहर निकलकर समाज की छाया में रहना ज्यादा सार्थक होता है।

धर्म की छाया यानी झूठ की छाया।

हम सारी जिंदगी झूठ के साथ शादी करके रहते हैं, झूठ में जीवन जीते हैं, झूठ से इस कदर घिरे रहते हैं कि सत्य की आवाज हमको बहुत मुश्किल से सुनाई देती है। झूठ के साथ रहते-रहते झूठ के अभ्यस्त हो जाते हैं और फिर झूठ को ही सच मानने लगते हैं। इसका परिणाम यह निकलता है कि सत्य से हम कोसों दूर चले जाते हैं।

धर्म पर बातें करते समय उसके मूल स्वरूप पर हमेशा बातें करने की जरूरत है। धर्म को झूठ से मुक्त करने की जरूरत है। धर्म को झूठ से मुक्त करने का अर्थ है धर्म को धार्मिक प्रपंचों से बाहर ले जाकर गरीब के मुक्ति प्रयासों से जोड़ना। इन दिनों धर्म को संतों-पंडितों ने अपहृत कर लिया है। अब हम धर्म के मूल स्वरूप और मूल भूमिका के बारे में एकदम नहीं जानते लेकिन उन तमाम किस्म की भूमिकाओं को जरूर जानते हैं जिनको कालांतर में धर्म के धंधेबाजों ने पैदा किया है।

सवाल यह है धर्म यदि गरीब का संबल है तो राजनीति में धर्म को गरीबों की राजनीति से रणनीतिक तौर पर जुड़ना चाहिए। लेकिन होता उलटा है गरीबों की राजनीति करने वालों की बजाय धर्म और धार्मिक संस्थानों का अमीरों की राजनीति करने वालों की राजनीति से गहरा संबंध नजर आता है।

धर्म और मार्क्सवाद में क्या संबंध है?

धर्म गरीब के दुखों की अभिव्यक्ति है। मार्क्सवाद भी गरीबों के दुखों की अभिव्यक्ति है। इसलिए धर्म और मार्क्सवाद में गहरा संबंध बनता है। लेकिन धर्म और मार्क्सवाद के मानने वालों में इसे लेकर विभ्रम सहज ही देख सकते हैं। फिदेल कास्त्रो इस प्रसंग में खासतौर पर उल्लेखनीय हैं।

फिदेल कास्त्रो द्वारा धर्म की व्याख्या

फिदेल कास्त्रो धर्म की व्याख्या करते हुए गरीब को मूलाधार बनाते हैं और कहते हैं कि ईसाईयत और मार्क्सवाद दोनों के मूल में है गरीब की हिमायत करना, गरीब की रक्षा करना, गरीब को गरीबी से मुक्त करना। इसलिए ईसाईयत और मार्क्सवाद में स्थायी रणनीतिक संबंध है। इसी आधार पर वे पुख्ता नैतिक, राजनैतिक और सामाजिक आधार का निर्माण करते हैं।

फिदेल के धर्म संबंधी नजरिए को अभिव्यंजित करने वाली शानदार किताब है ´फिदेल एंड रिलीजन´,यह किताब FREI BETTO ने लिखी है। इसमें फिदेल से उनकी 23 घंटे तक चली बातचीत का विस्तृत लेखा जोखा है। यह किताब मूलतः क्यूबा और लैटिन अमेरिका में धर्म और मार्क्सवाद, धर्म और क्रांतिकारियों के अंतस्संबंधों पर विस्तार से रोशनी डालती है।

इस बातचीत में फिदेल से 9 घंटे तक सिर्फ धर्म संबंधी सवालों को पूछा गया। धर्म और मार्क्सवाद के अंतर्संबंध (The Interrelationship of Religion and Marxism) को समझने के लिए यह पुस्तक मददगार साबित हो सकती है। इस किताब को भारत में पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस ने 1987 में अंग्रेजी में छापा था। इस किताब में लिए गए इंटरव्यू कई बैठकों में संपन्न हुए। ये इंटरव्यू 1985 में लिए गए थे। ये किसी समाजवादी राष्ट्र राष्ट्राध्यक्ष के द्वारा धर्म पर दिए गए पहले विस्तृत साक्षात्कार हैं। आमतौर पर मार्क्सवादी शासकों ने धर्म पर इस तरह के इंटरव्यू नहीं दिए हैं।

– जगदीश्वर चतुर्वेदी

मार्क्सवाद और हिन्दी साहित्य | प्रोफेसर जगदीश्वर चतुर्वेदी का संवाद

Dharma and Fidel Castro

पंडित नेहरू से समझें भारत का मर्म और भारत की आत्मा को

jawahar lal nehru

भारत का मर्म और पंडित नेहरू (Heart of India and Pandit Nehru)

भारत की आत्मा को समझने में पंडित जवाहरलाल नेहरू (Pandit jawaharlal nehru) से बढ़कर और कोई बुद्धिजीवी हमारी मदद नहीं कर सकता। पंडितजी की भारत को लेकर जो समझ रही है, वह काबिलेगौर है। वे भारतीय समाज, धर्म,  संस्कृति, इतिहास आदि को जिस नजरिए से व्यापक फलक पर रखकर देखते हैं वह विरल चीज है।

पंडित नेहरू ने लिखा है ”जो आदर्श और मकसद कल थे, वही आज भी हैं, लेकिन उन पर से मानो एक आब जाता रहा है और उनकी तरफ बढ़ते दिखाई देते हुए भी ऐसा जान पड़ता है कि वे अपनी चमकीली सुंदरता खो बैठे हैं, जिससे दिल में गरमी और जिस्म में ताकत पैदा होती थी। बदी की बहुत अकसर हमेशा जीत होती रही है, लेकिन इससे भी अफसोस की बात यह है कि जो चीजें पहले इतनी ठीक जान पड़ती थीं, उनमें एक भद्दापन और कुरूपता आ गई है।”

चीजें क्रमशः भद्दी और कुरूप हुई हैं, सवाल यह है कि यह भद्दापन और कुरूपता आई कहां से ॽ

क्या इस भद्देपन और कुरूपता से बचा जा सकता था ॽ यदि हां तो उन पहलुओं की ओर पंडितजी ने जब ध्यान खींचा तो सारा देश उस देश में सक्रिय क्यों नहीं हुआ ॽ

पंडित जवाहरलाल नेहरू ने लिखा है “हिंदुस्तान में जिंदगी सस्ती है। इसके साथ ही यहां जिंदगी खोखली है, भद्दी है, उसमें पैबंद लगे हुए हैं और गरीबी का दर्दनाक खोल उसके चारों तरफ है। हिंदुस्तान का वातावरण बहुत कमजोर बनानेवाला हो गया है। उसकी वजहें कुछ बाहर से लादी हुई हैं, और कुछ अंदरूनी हैं, लेकिन वे सब बुनियादी तौर पर गरीबी का नतीजा हैं। हमारे यहां के रहन-सहन का दर्जा बहुत नीचा है और हमारे यहां मौत की रफ्तार बहुत तेज है।”

पंडितजी और उनकी परंपरा ´मौत की रफ्तार´ को रोकने में सफल क्यों नहीं हो पायी ॽ

पंडित जानते थे कि भारत में जहां गरीबी सबसे बड़ी चुनौती है वहीं दूसरी ओर धर्म और धार्मिक चेतना सबसे बड़ी चुनौती है।

पंडित नेहरू ने लिखा है- “अगर यह माना जाये कि ईश्वर है, तो भी यह वांछनीय हो सकता है कि न तो उसकी तरफ ध्यान दिया जाये और न उस पर निर्भर रहा जाये। दैवी शक्तियों में जरूरत से ज्यादा भरोसा करने से अकसर यह हुआ भी है और अब भी हो सकता है कि आदमी का आत्म-विश्वास घट जाए और उसकी सृजनात्मक योग्यता और सामर्थ्य कुचल जाये।”

धर्म के प्रसंग में नेहरूजी ने लिखा- “धर्म का ढंग बिलकुल दूसरा है।प्र त्यक्ष छान-बीन की पहुंच के परे जो प्रदेश है, धर्म का मुख्यतः उसी से संबंध है और वह भावना और अंतर्दृष्टि का सहारा लेता है। संगठित धर्म धर्म-शास्त्रों से मिलकर ज्यादातर निहित स्वार्थों से संबंधित रहता है और उसे प्रेरक भावना का ध्यान नहीं होता। वह एक ऐसे स्वभाव को बढ़ावा देता है, जो विज्ञान के स्वभाव से उलटा है। उससे संकीर्णता, गैर-रवादारी,  भावुकता, अंधविश्वास, सहज-विश्वास और तर्क-हीनता का जन्म होता है। उसमें आदमी के दिमाग को बंद कर देने का सीमित कर देने का, रूझान है। वह ऐसा स्वभाव बनाता है, जो गुलाम आदमी का, दूसरों का सहारा टटोलनेवाले आदमी का,  होता है।”

आम आदमी के दिमाग को खोलने के लिए कौन सी चीज करने की जरूरत है ॽ

क्या तकनीकी वस्तुओं की बाढ़ पैदा करके आदमी के दिमाग को खोल सकते हैं या फिर समस्या की जड़ कहीं और है ॽ

पंडित नेहरू का मानना है – “हिन्दुस्तान को बहुत हद तक बीते हुए जमाने से नाता तोड़ना होगा और वर्तमान पर उसका जो आधिपत्य है, उसे रोकना होगा। इस गुजरे जमाने के बेजान बोझ से हमारी जिंदगी दबी हुई है। जो मुर्दा है और जिसने अपना काम पूरा कर लिया है, उसे जाना होता है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि गुजरे जमाने की उन चीजों से हम नाता तोड़ दें या उनको भूल जाएं, जो जिंदगी देने वाली हैं और जिनकी अहमियत है।”

यह भी लिखा,  

“पिछली बातों के लिए अंधी भक्ति बुरी होती है। साथ ही उनके लिए नफ़रत भी उतनी ही बुरी होती है। उसकी वजह है कि इन दोनों में से किसी पर भविष्य की बुनियाद नहीं रखी जा सकती।”

“गुजरे हुए जमाने का -उसकी अच्छाई और बुराई दोनों का ही-बोझ एक दबा देने वाला और कभी-कभी दम घुटाने वाला बोझ है, खासकर हम लोगों में से उनके लिए, जो ऐसी पुरानी सभ्यता में पले हैं, जैसी चीन या हिन्दुस्तान की है। जैसा कि नीत्शे ने कहा है- “न केवल सदियों का ज्ञान, बल्कि, सदियों का पागलपन भी हममें फूट निकलता है।वारिस होना खतरनाक है।” इसमें सबसे महत्वपूर्ण है ´वारिस´वाला पहलू। इस पर हम सब सोचें। हमें वारिस बनने की मनोदशा से बाहर निकलना होगा।

पंडित नेहरू ने लिखा है- “मार्क्स और लेनिन की रचनाओं के अध्ययन का मुझ पर गहरा असर पड़ा और इसने इतिहास और मौजूदा जमाने के मामलों को नई रोशनी में देखने में मदद पहुँचाई। इतिहास और समाज के विकास के लंबे सिलसिले में एक मतलब और आपस का रिश्ता जान पड़ा और भविष्य का धुंधलापन कुछ कम हो गया।”

भविष्य का धुंधलापन कम तब होता है जब भविष्य में दिलचस्पी हो, सामाजिक मर्म को पकड़ने,  समझने और बदलने की आकांक्षा हो। इसी प्रसंग में पंडित नेहरू ने कहा “असल में मेरी दिलचस्पी इस दुनिया में और इस जिंदगी में है, किसी दूसरी दुनिया या आनेवाली जिंदगी में नहीं। आत्मा जैसी कोई चीज है भी या नहीं मैं नहीं जानता.और अगरचे ये सवाल महत्व के हैं, फिर भी इनकी मुझे कुछ भी चिंता नहीं।”

पंडितजी जानते थे भारत में धर्म सबसे बड़ी वैचारिक चुनौती है।

सवाल यह है धर्म को कैसे देखें ॽ

पंडितजी का मानना है ” ‘धर्म’ शब्द का व्यापक अर्थ लेते हुए हम देखेंगे कि इसका संबंध मनुष्य के अनुभव के उन प्रदेशों से है, जिनकी ठीक-ठीक मांग नहीं हुई है, यानी जो विज्ञान की निश्चित जानकारी की हद में नहीं आए हैं।”

फलश्रुति यह कि जीवन के सभी क्षेत्रों में विज्ञान को पहुँचाएं, विज्ञान को पहुँचाए बिना धर्म की विदाई संभव नहीं है।

जगदीश्वर चतुर्वेदी

पं. जवाहरलाल नेहरू के लोकतांत्रिक विज़न का नया परिप्रेक्ष्य | hastakshep | हस्तक्षेप

Understand the heart of India and the soul of India from Pandit Nehru

स्वतंत्रता दिवस के कर्तव्य : आत्मालोचन का दिन

dr. prem singh

(यह लेख 66वें स्वतंत्रता दिवस पर 2013 में ‘युवा संवाद’ और ‘हस्तक्षेप डॉट कॉम’ में छपा था। स्वतंत्रता दिवस पर शुभकामनाओं के आदान-प्रदान (exchange of wishes on independence day) के साथ हम कुछ आत्मालोचन भी करें, इस उम्मीद पर यह लेख पिछले साल यथावत रूप में फिर से जारी किया गया था। 15 अगस्त 2021 को हमने स्वतंत्रता के 75 वर्ष पूरे किए और सरकार ने पूरे साल ‘आजादी का अमृत महोत्सव’ मनाया। इस महत्वपूर्ण अवसर पर यह करीब 10 साल पुराना लेख फिर से दिया जा रहा है, ताकि नए पाठक पढ़ और विचार कर सकें। पिछली बार मैंने लिखा था, ‘मेरी कई बातें कुछ लिबरल-सेकुलर साथियों को पसंद नहीं आतीं, लिहाजा, वे अनदेखी करने की रणनीति अपनाते हैं। उनकी एकजुट सत्ता की अपनी दुनिया है। देखते हैं उनकी यह रणनीति कब तक काम देती है!’ मैं अपनी इस टिप्पणी को वापस लेता हूं।

साथी प्रोफेसर आनंद कुमार ने लेख पर अपनी महत्वपूर्ण टिप्पणी भेजी थी। वह टिप्पणी इस प्रकार है:

प्रिय प्रेम सिंह जी,

आपका भेजा लेख ध्यान से पढ़ा. मुझे आशा है कि इसी आधार पर आप २०१३ औए २०२१ के बीच के अपने अनुभवों और सोच को जोड़ कर इस लेख को नया रूप देंगे. आत्म आलोचना के अंदाज़ में पेश इस लेख में तीन खूबियां हैं :

आपने हमारी आज़ादी के अधूरेपन की याद दिलाई है.

आपने पूंजीवाद के बीमारों की पहचान बतायी है.

आपने अपने को ठीक करने का निष्कर्ष दिया है.

लेकिन मैं आपके लेख के शुरूआती से चिंतित हूँ – अपने को थोड़े से लोगों की जमात का हिस्सा मानना और इस जमात को उपेक्षित समझना. मुझे लगता है कि आपकी समीक्षा से देश के हर वंचित स्त्री-प्रुरुष के लिए सहमत होने की ढेर सारी वजहें हैं. उनका दुःख उन्हें एकजुटता और सक्रियता के लिए कैसे उत्साहित करे – इस समस्या को सुलझाने की जरूरत है. आप स्वयं पिछले तीन दशकों से बेहद सक्रिय रहते आये हैं. आपसे ऐसे लेख के एक ताज़ा प्रारूप में दो जरूरी सवालों का जवाब चाहिए – अब आगे के कदम कैसे हों और कैसे असरदार हों?

फिर से धन्यवाद.

आनंद कुमार।‘

कुछ साथियों का आग्रह रहा है कि यह लेख अंग्रेजी में उपलब्ध हो तो अच्छा है। इस बार लेख का अंग्रेजी अनुवाद भी जारी करने का विचार है।)

आत्मालोचन का दिन

पिछले स्वतंत्रता दिवस के ‘समय संवाद’ और उसके आगे-पीछे हमने जो लिखा, इस स्वतंत्रता दिवस पर उससे अलग कुछ कहने के लिए नहीं है। कहना एक ही बार ठीक रहता है। भले ही वह स्वतंत्रता जैसे मानव-जीवन और मानव-सभ्यता के संभवतः सर्वोपरि मूल्य के बारे में हो। दोहराव के भय से इस बार का ‘समय संवाद’ हम नहीं लिखना चाहते थे। फिर सोचा कि शासक-वर्ग और उसका प्रस्तोता मीडिया दिन-रात दोहरावों की झड़ी लगाए रहते हैं, तो हमें भी किंचित दोहराव के बावजूद अपनी बात कहनी चाहिए। आइए, भारी सुरक्षा घेरे में गांधी के आखिरी आदमी से बहुत दूर और ऊंचे आयोजित छियासठवें स्वतंत्रता दिवस के मौके पर देश की आजादी के बारे में कुछ चर्चा और सवाल करें। इस आशा के साथ कि सड़सठवें साल में देश की आजादी पर आए संकट को समझा जाएगा और उसका मुकाबला हो पाएगा।

जिस आजादी पर हासिल होने के दिन से ही अधूरी होने का ठप्पा लगा हो, हर स्वतंत्रता दिवस पर यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि वह उत्तरोत्तर पूर्णता और मजबूती की ओर अग्रसर है। अगर किसी वर्ष कोई ऐसी घटना या फैसला सरकार, राजनीति अथवा नागरिक-समाज के स्तर पर हो गया हो, जिससे आजादी का अवमूल्यन हुआ हो और वह खतरे में पड़ी हो, तो स्वतंत्रता दिवस के मौके पर यह सुनिश्चित किया जाए कि वह गलती स्वीकार करके उसे ठीक कर लिया गया है। स्वतंत्रता दिवस यह देखने का भी मौका होता है कि वैचारिक और नीतिगत मतभेदों के बावजूद आजादी को पूर्ण और मजबूत बनाने के दायित्व पर सभी राजनीतिक पार्टियां, संगठन और नागरिक समाज एकमत हैं। भारत जैसे विशाल और बहुलताधर्मी देश में अलग-अलग समूहों की अपने हितों की चिंता वाजिब है, लेकिन इस मौके पर हम यह देखें कि समग्रता में उससे देश की आजादी की काट न हो। यह सुनिश्चित करें कि बुद्धिजीवी खास तौर पर सावधान हैं, ताकि नई पीढ़ी आजादी का मूल्य भली-भांति समझ कर अपना कर्तव्य निर्धारित करती और निभाती चले। स्वतंत्रता दिवस और उसके आगे-पीछे आजादी के तराने गाने, तिरंगा लहराने और शहीदों के गुणगान का तभी कोई अर्थ है। स्वतंत्रता दिवस पर हम यह सुनिश्चित करें कि देश की आजादी को सच्चा प्यार करके ही उसके लिए कुर्बानी देने वालों का सच्चा सम्मान किया जा सकता है।  

सवाल है कि क्या प्रत्येक आने वाले स्वतंत्रता दिवस पर देश की आजादी पूर्णता और मजबूती की तरफ बढ़ती है? गलतियां अगर होती हैं, तो क्या उनसे सीख लेने की कोई नजीर सामने आती है? आजादी के प्रति सभी सरकारों, राजनीतिक पार्टियों और नागरिक-समाज का साझा संकल्प है? अपने हितों की चिंता करने वाले समूह समग्रतः आजादी की रक्षा का ध्यान करके चलते हैं? क्या देश के बुद्धिजीवी अपनी भूमिका में मुस्तैद हैं? क्या नई पीढ़ी आजादी के प्रति अपना कर्तव्य समझती है? क्या हम शहीदों का सच्चा सम्मान करते हैं?

बिना गहरी जांच-पड़ताल के पता चल जाता है कि ऐसा नहीं है। ऐसा नहीं होने की चिंता भी ज्यादातर नेताओं से लेकर नागरिक-समाज तक नहीं दिखाई देती। बल्कि कह सकते हैं कि पिछले 25 स्वतंत्रता दिवसों पर लाल किले से नवसाम्राज्यवादी गुलामी का परचम फहराया जाता रहा है। लाल किले के भाषण में बच्चों से लेकर नौजवानों तक आजादी को पूर्ण और मजबूत बनाने का संदेश नहीं दिया जाता। ज्यादातर मुख्यधारा राजनीतिक पार्टियां, नागरिक-समाज और बुद्धिजीवी आजादी के इस अवमूल्यन में बेहिचक शामिल हैं।

15 अगस्त 1947 को मिली राजनीतिक आजादी को अधूरा माना गया था। कहा गया था कि अभी आर्थिक आजादी हासिल करना है। पिछले करीब तीन दशकों में आर्थिक गुलामी का तौक गले में डाल कर राजनीतिक आजादी को भी लगभग गंवा दिया गया है। हर साल शानो-शौकत से स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस मनाने और देशभक्ति का भारी-भरकम प्रदर्शन करने के बावजूद, लंबे संघर्ष के बाद हासिल की गई आजादी नहीं, नवसाम्राज्यवादी गुलामी पूर्णता और मजबूती की ओर बढ़ती जाती है। नवसाम्राज्यवादी गुलामी का गहरा रंग देखना हो तो कोई भारत आए। यहां कारपारेट पूंजीवाद की गुलामी में पगे नेताओं, खिलाडि़यों, कलाकारों, बुद्धिजीवियों, सिविल सोसायटी एक्टिविस्टों का उत्साह और उमंग देख कर लगता है मानो वे विज्ञापन की दुनिया के मॉडल हों! मनमोहन सिंह-सोनिया गांधी मंडली ही नहीं, एपीजे अब्दुल कलाम और लालकृष्ण अडवाणी भारत के महाशक्ति बनने के गीत गाते नहीं थकते हैं। अधूरी आजादी का पूरा फायदा उठा कर भारत का शासक-वर्ग कंपनियों के मुनाफे की वस्तु बन गया है।

इस उमंग भरे माहौल का दबदबा इतना ज्यादा है कि नवउदारवाद-विरोध की लघु-धारा के कतिपय वरिष्ठ आंदोलनकारी और बुद्धिजीवी भी उसकी चपेट में आ जाते हैं। दोबारा पटरी पर आना उनके लिए कठिन हो जाता है। ऐसे में, नवउदारवादी नीतियों के चलते उच्छिष्ट का ढेर बना दी गई विशाल आबादी की दशा समझी सकती है। वह खटती और मरती भी है, और नकल भी करती है। इस तरह पूंजीवाद अपने शासक-वर्ग के साथ-साथ अपनी (गुलाम) जनता भी तैयार करता चलता है।

इस बीच आरएसएस से लेकर गांधीवादी, समाजवादी, मार्क्‍सवादी आदि सभी राजनीतिक-वैचारिक समूह आजादी पर आने वाले संकट और उसे बचाने की चिंता जता चुके हैं। लेकिन नवसाम्राज्यवाद की ताकत कहिए या आजादी की सच्ची चेतना का अभाव या दोनों, उस चिंता का खोखलापन अथवा कमजोरी जगजाहिर होते देर नहीं लगती। आजादी बचाने की पुकार उठती है और बुलबुले की तरह फूट जाती है। ऐसा नहीं है कि आजादी को बचाने के सच्चे प्रयास नहीं हुए या अभी नहीं हो रहे हैं, लेकिन सच्चाई यही है कि इस मामले में शोर ज्यादा मचाया गया है। आजादी को बचाने के लिए ठोस विचार और रणनीति के तहत दीर्घावधि आंदोलन नहीं खड़ा हो पाया है। आज की हकीकत यह है कि आजादी बचाने की वास्तविक चिंता करने वाले लोग अब बहुत थोड़े और उपेक्षित हैं।

ऐसी स्थिति में स्वतंत्रता दिवस पर सर्वाधिक गंभीरता और प्राथमिकता से देश के पराधीन होते जाने की परिघटना पर विचार होना चाहिए। उसके बगैर न केवल नवउदारीकरण के दौर में भिखारी बना दी गई जनता के लिए हमारी चिंता का कोई हासिल नहीं है, हमारे प्रगतिशील, लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष बौद्धिक कर्म का भी स्वतंत्र अर्थ नहीं रह जाता है। क्रांति के दावों की दयनीयता तो स्वयंसिद्ध है ही।

नवउदारवादी दौर में बने निगम भारत (कारपोरेट इंडिया) की सत्ता पर आरएसएस जब-जब धावा बोलता है, तब-तब सेकुलर खेमे के बुद्धिजीवी उसके ‘देशद्रोही’ चरित्र को उद्घाटित करने में लग जाते हैं। ऐसा करते वक्त वे अपने को देशभक्ति और आजादी का पक्का पैरोकार होने का प्रमाणपत्र देते ही हैं, सोनिया गांधी-मनमोहन सिंह और कांग्रेस को भी वह थमा देते हैं। बार-बार दोहराई जाने वाली इस कवायद का कोई सकारात्मक नतीजा नहीं निकलता। न सांप्रदायिकता कम होती है, न नवउदारवाद थोड़ा भी पीछे हटता है। बल्कि दोनों कट्टर होते और एक-दूसरे में समाते जाते हैं। उस सम्मिलित कट्टरता के प्रहार से समाजवाद, लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता की जमीन धसकती चली जाती है। भारत के संविधान में निहित समाजवाद, लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता के मूल्यों और संकल्प की रक्षा ही आजादी की रक्षा है। हमारी राजनीति, अर्थव्यवस्था और सामाजिकता की यही कसौटी हो सकती है।  

यह सही है कि आरएसएस पूंजीपतियों से सांठ-गांठ रखता है। उसका नया जमूरा नरेंद्र मोदी पूंजीपतियों के आगे नाच रहा है। लेकिन, कांग्रेस पूंजीपतियों की सबसे बड़ी करुणानिधान पार्टी बनी हुई है, इस सच्चाई को सेकुलर खेमा जोर देकर कभी नहीं कहता। वह आरएसएस के ‘रहस्मय चरित्र’ की गहराइयों में काफी नीचे तक धंसता है, लेकिन कांग्रेस के ‘खुला खेल पूंजीवादी’ की तरफ से आंख फेरे रहता है। वह नेहरू-इंदिरा की कांग्रेस का भी सेवक बना रहा और अब सोनिया गांधी की कांग्रेस का सेवक है। नरेंद्र मोदी बुरा है, क्योंकि कारपोरेट घरानों को रिझाने में लगा है। सेकुलर खेमे की शिकायत वाजिब है कि मीडिया उसे पूंजीवाद का नया ब्रांड बना कर समाज के सामने परोस रहा है। लेकिन यही मीडिया नरेंद्र मोदी के पहले मनमोहन सिंह को कारपोरेट पूंजीवाद का पुरोधा बना कर जमा चुका है। सेकुलरवादियों समेत नागरिक-समाज की स्वीकृति दिला चुका है। अटल बिहारी वाजपेयी अपना अलग से पूंजीवाद लेकर नहीं आए थे। उन्होंने अपने ‘स्वदेशी’ पैर मनमोहन सिंह के ‘अमेरिकी’ जूते में ही डाले थे। नरेंद्र मोदी को भी मनमोहन सिंह लेकर आए हैं। उनका सत्ता का आपसी झगड़ा है। अमेरिका और कारपोरेट घराने जिस की तरफ रहेंगे वह जीत जाएगा।

ऐसे में सवाल पूछा जा सकता है कि नरेंद्र मोदी से मनमोहन सिंह किस मायने में बेहतर हैं; सिवाय इसके कि नवउदारवाद को भारत में लाने और जमाने वालों में वे अव्वल नंबर पर हैं। उसी हैसियत के चलते वे तीसरी बार प्रधानमंत्री होने के दावेदार हैं। सांप्रदायिक ताकतों को ठिकाने लगाने की कुछ ताकत अभी भारतीय जनता में बची है। लेकिन नवसाम्राज्यवाद के सामने वह लाचार बना दी गई है। जनता की यह लाचारी आगे बढ़ती जानी है। इसकी सीधी जिम्मेदारी मनमोहन सिंह और उनके सिपहसालारों की है।

पिछले दो सालों से मनमोहन सिंह पर नागरिक-समाज का काफी तेज गुस्सा देखने को मिला। यह गुस्सा तभी आना चाहिए था जब उन्होंने देश के संविधान को दरकिनार कर विश्‍व बैंक के आदेश पर नई आर्थिक नीतियां लागू की थीं, और देश की आजादी को सीधे नवसाम्राज्यवादी शिकंजे में फंसा दिया था। वे राजनीतिक व्यक्ति नहीं थे, न आज हैं। वे ऐसा कर पाए और उस दम पर दो बार देश के प्रधानमंत्री बन गए, यह नागरिक-समाज की सहमति के बिना संभव ही नहीं था। नागरिक-समाज को अब भी जो गुस्सा आ रहा है, वह देश के स्वावलंबन और संप्रभुता को चट कर जाने वाली उन नीतियों के खिलाफ नहीं है। वह नवउदारवाद का साफ-सुथरा चेहरा और अपने लिए और ज्यादा फायदा चाहता है। ऐसे गुस्से का कोई परिणाम देश की आजादी के पक्ष में नहीं निकलना है। भाजपा के पक्ष में भले ही निकले, जिसका स्टार प्रचारक नागरिक-समाज की समस्त लालसाओं को चुटकियों में पूरा करने का ढोल पीट रहा है।

कुमार प्रशांत ने ‘जनसत्ता’ के अपने एक लेख में मनमोहन सिंह को संजीदा इंसान बताया है। यह भी कहा है कि बतौर प्रधानमंत्री उन्होंने हमेशा शालीनता का आचरण किया है, जिससे विदेशों में भारत का मान बढ़ा है। मनमोहन सिंह की यह प्रशंसा उन्होंने नरेंद्र मोदी से तुलना करते हुए की है, जिन्होंने एलान करके 15 अगस्त को प्रधानमंत्री के लालकिले से दिए गए भाषण के मुकाबले अपना भाषण किया।

स्वतंत्रता दिवस नेताओं के व्यक्तित्वों की तुलना करने का अवसर नहीं होता। नरेंद्र मोदी और आरएसएस खुद ही एक्सपोज हो गए कि उनकी नजर में स्वतंत्रता दिवस का सम्मान नहीं है। अडवाणी ने दबी जबान से मोदी के इस कृत्य की आलोचना भी की।  

स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर ‘जनसत्ता’ के पन्ने मनमोहन सिंह और नरेंद्र मोदी की तुलना में रंगने का औचित्य नहीं था। तुलना का तूमार बांधने के लिए खबरी चैनलों की भरमार है। उन्होंने वह काम बखूबी किया भी। हमने दोनों का भाषण नहीं सुना। न ही टीवी चैनलों पर होने वाली वे बहसें सुनी, जिनका जिक्र नाराजगी के साथ कुछ टिप्पणीकारों ने अगले दिन अखबारों में किया। चैनल यह नहीं कर सकते थे, अगर स्वतंत्रता दिवस की गरिमा, संवैधानिक दायित्व, लोकतांत्रिक मूल्य, संघीय ढांचा और देश की अखंडता का हवाला देने वाले ‘विषेषज्ञ’ वहां नहीं जाते। इधर विशेषज्ञ कुछ ज्यादा ही हो गए हैं, और उनमें ज्यादातर ने अपने को ऐसे एंकरों के हाथ बेच दिया है, जो कूपमंडूक और नवउदारवाद व सांप्रदायकिता के निःसंकोच गुण गाने वाले हैं।

गंभीर समझे जाने वाले बुद्धिजीवियों को यह बताना चाहिए था कि प्रधानमंत्री के भाषण में स्वतंत्रता की पूर्णता और मजबूती के लिए क्या कहा गया है; उस लिहाजा से दोनों के भाषणों में कोई फर्क नहीं था। दोनों नवउदारवाद की प्रतिष्ठा को स्वाभाविक कर्म मान कर बोले। संविधान की कसौटी पर दोनों के भाषण अवैध थे। दोनों में अंतर यही है कि मनमोहन सिंह नवउदारवाद की ब्रांडेड मशीन हैं, जो सीधे विश्‍व बैंक से खिंच कर आई है, और मोदी आरएसएस के कारखाने में ढल कर निकली ‘देसी’ मशीन है। दोनों में बाकी सब समान है। मोदी को मुसलमान ‘पिल्ले’ नजर आते हैं, तो मनमोहन को किसान निठल्ले। वे हैरानी से पूछते हैं कि किसान खेती (यानी आत्महत्या) क्यों करते हैं! कोई और काम क्यों नहीं कर लेते; पहले से ही कई करोड़ नौजवानों और अधेड़ों की बेरोजगार सेना जमा होने के बावजूद एक मशीन ही ऐसा कह सकती है, जिसमें संदेश पहले से फीड किया गया हो!

मोदी की भर्त्‍सना का खास मतलब नहीं है। मोदी को लाने वालों में सबसे पहला नाम मनमोहन सिंह का है। आरएसएस बाद में आता है। मोदी जिस संगठन से आते हैं, उसने आजादी के संघर्ष में हिस्सा नहीं लिया। मौका पड़ने पर अंग्रेजों का साथ दिया। वह पुराना किस्सा है। लेकिन मनमेाहन का नया कमाल देखने के लायक है। उन्होंने और सोनिया गांधी ने मिल कर आजादी के संघर्ष की पार्टी को नवसाम्राज्यवादी गुलामी की पार्टी में तब्दील कर दिया है। बेहतर होता कि स्वतंत्रता दिवस पर बुद्धिजीवी यह सच्चाई जनता को बताते।

हमने एक ‘समय संवाद’ में लिखा था, “मिश्रित अर्थव्यवस्था के करीब तीस सालों के दौर में जो साम्राज्यवादी बीज दब गया था उसने अस्सी के दशक में राजीव गांधी की छाया पाकर फूलना शुरू किया। नब्बे के दशक में उसने एक बार फिर से जड़ पकड़ ली और इक्कीसवीं सदी का जयघोष करते हुए उसकी कोपलें खिल उठीं। आज साम्राज्यवाद की संतानें ऐसा जता रही हैं मानो वे सदियों पुराना वटवृक्ष हैं। जैसे 1857 और 1947 हुआ ही नहीं था। अगले पचास साल भी नहीं लगेंगे, जब साम्राज्यवाद की संतानें कहेंगी कि 1947 होना ही नहीं चाहिए था। अगर उसका 1857 की तरह दमन कर दिया जाता तो भारत को महाशक्ति बनने के लिए 2020 का इंतजार नहीं करना पड़ता। जी हां, मनमोहन सिंह उसी साम्राज्यवादी बीज से उत्पन्न हुई संतान हैं। साम्राज्यवाद के सांचे में जो भी समाए हुए हैं, वे मनमोहन सिंह के बच्चे हैं। उनमें छोटे बच्चे भी हैं और बड़े भी।” (‘मिलिए हुकुम के गुलाम से’ 2009) नरेंद्र मोदी मनमोहन सिंह का ही छोटा बच्चा है, जो अब बड़ा बनने के लिए मचल उठा है।

हमने गुजरात-कांड पर ‘गुजरात के सबक’, 2002) और अटल बिहारी वाजपेयी की राजनीतिक विचारधारा और शैली पर ‘जानिए योग्य प्रधानमंत्री को’, 2002) पुस्तिकाएं प्रकाशित की थीं। संकलित अभी लेख अखबारों में छपे हुए थे। सेकुलर साथियों, जिनमें सोनिया के सेकुलर सिपाही भी शामिल थे, ने काफी उत्साह से उन पुस्तिकाओं का स्वागत और प्रचार किया था। पहुंच वाले साथियों ने उन्हें कांग्रेस के प्रचार-प्रकोष्ठ और प्रवक्ताओं तक पहुंचाया था। 2004 में राजग की हार हुई और यूपीए की सरकार बनी। लेकिन 2009 के चुनाव के पहले प्रकाशित हमारी पुस्तिका ‘मिलिए हुकुम के गुलाम से’ के प्रकाशन पर उन सब ने चुप्पी साध ली। उसमें मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी की, विशेष तौर पर भारत-अमेरिका परमाणु करार के हवाले से, साम्राज्यवादपरस्ती का उद्घाटन है। साथियों ने उस पुस्तिका का न स्वागत किया, न प्रचार। इससे स्पष्ट पता चलता है कि सेकुलर खेमे की चिंता केवल सांप्रदायिकता को लेकर है, नवउदारवाद के खिलाफ वह नहीं है। जबकि सांप्रदायिकता की आड़ में नवउदारवाद फलता-फूलता है।

भारतीय राज्य के खिलाफ हिंसक संघर्ष चलाने वाले अतिवामपंथी समूह कहते हैं कि वे भारत के संविधान को नहीं मानते। उन्हें देखना चाहिए कि मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी के नेतृत्व में भारत का शासक-वर्ग भी भारत के संविधान को नहीं मानता है। यह ठीक है कि भारत का शासक-वर्ग कारपोरेट पूंजीवाद की पुरोधा वैश्विक संस्थाओं के आदेश पर काम करता है। लेकिन अपने को माओवादी बताने वाले भी जिन आदेशों को मानते और लागू करना चाहते हैं, वे भारत की जनता के उपनिवेशवाद विरोधी संघर्ष की धारा से नहीं निकले हैं; जिसका कुछ आधार लेकर भारत का संविधान बनाया गया था। बल्कि आजादी के संघर्ष को वे मान्यता ही नहीं देते। उनकी पूर्वज पार्टी सीपीआई ने देश की आजादी को अंतर्राष्ट्रीय घटनाओं का परिणाम माना था, न कि जनता के संघर्ष और बलिदान का। आजादी की पूर्व-संध्या पर उसने भारत छोड़ो आंदोलन और उसके क्रांतिकारियों के खिलाफ ब्रिटिश हुकूमत का समर्थन किया था।

आजादी अधूरी है, यह अंबेडकर ने भी स्वीकार किया था। लेकिन उनके स्वीकार में अवमानना का भाव नहीं था। उनका संवैधानिक प्रावधानों के आधार पर उसे पूर्ण करने का सपना था। कांग्रेस के भरोसे वे भी नहीं थे। समता का लक्ष्य हासिल करने का रास्ता लोकतंत्र को मानते थे। लोकतांत्रिक अहिंसक संघर्ष में अंत तक उनकी आस्था रही। इसका अर्थ यह भी बनता है कि आजादी के बाद, गांधी की तरह, अंबेडकर भी कांग्रेस की उपयोगिता नहीं देखते थे। उन्होंने अपनी पार्टी बनाई और सोशलिस्ट पार्टी के साथ चुनाव लड़ा। भविष्य की राजनीति के लिए सोशलिस्ट पार्टी के साथ तालमेल का प्रयास भी उनके दिवंगत होने के पहले हुआ।

लेकिन कम्युनिस्टों ने अधूरी आजादी का ठीकरा कांग्रेस और उसके नेताओं के सिर फोड़ा। अधूरी आजादी से भी ज्यादा उनकी बड़ी शिकायत यह है कि साम्यवादी क्रांति क्यों नहीं की गई; उनकी नजर में भारत के स्वतंत्रता सेनानियों और उनके साथ जुटने वाली जनता का यह दोष था। आजादी के अधूरेपन में उन्होंने न अपना कोई साझा या दायित्व स्वीकार किया, और, जाहिर है, न उसे पूरा करने के लिए संविधान का रास्ता स्वीकार किया। कम्युनिस्टों की अंतर्राष्ट्रीयता में ‘पिछड़े, दकियानूसी, सामंती, सांप्रदायिक, जातिवादी भारत’ को छोड़ कर सब कुछ हो सकता था। आज के आधिकारिक मार्क्‍सवादियों के लिए भी संविधान और संसदीय लोकतंत्र मजबूरी का सौदा है।

भारतीय राज्य बुरा है, कम्युनिस्टों के लिए बात यहीं तक सीमित नहीं रहती। वह अगर उनके कब्जे में नहीं है, तो उनकी मंशा होती है कि उसे दुनिया में होना ही नहीं चाहिए। भारतीय राज्य पर कब्जा नहीं हो पाने पर उन्होंने कांग्रेस की सरपस्ती में संस्थाओं पर कब्जे की रणनीति अपनाई। इस रणनीति के निष्ठापूर्वक निर्वाह का नतीजा यह है कि वे उस रणनीति के बंदी बन कर रह गए हैं। यह सही है कि इस तरह से कम्युनिस्टों ने काफी ताकत हासिल की, लेकिन नवसाम्राज्यवाद विरोध के लिए उस ताकत का कोई उपयोग नहीं है।

दरअसल, उन्होंने सारी ताकत इस बात में लगा दी कि भारत बेशक कांग्रेस के कब्जे में रहे, भारतीय संदर्भों से जुड़ी समाजवाद या सामाजिक न्याय की कोई धारा जगह नहीं बना पाए। शिक्षा, साहित्य, संस्कृति और शोध संस्थाओं के शीर्ष पर रह कर उन्होंने अपने से अलग विचारों/विचारकों के प्रति संकीर्णता का बर्ताव किया। ऐसे में, जाहिर है, जगह आरएसएस की ही बननी थी, जो अपने स्थापना-काल से ‘भारत माता भारत माता’ चिल्लाता चला आ रहा था और कम्युनिस्टों की तरह कांग्रेस में गहरी घुसपैठ रखता था।

दरअसल, अधूरी आजादी से असंतुष्ट हो पूर्णता हासिल करने के लिए आरएसएस अगर समय में सुदूर स्थित ‘स्वर्णलोक’ की तरफ भागा, तो कम्युनिस्ट स्थान में सुदूर स्थित ‘स्वर्णलोक’ की तरफ। दोनों की आज तक भी कमोबेश वही स्थिति बनी हुई है।

यह स्पष्टीकरण देने की जरूरत नहीं होनी चाहिए कि यह समीक्षा वाद-विवाद के लिए नहीं की जा रही है। बल्कि आजादी का बचाव हो; वह पूर्ण, मजबूत और उच्चतर हो, इस उद्देश्‍य से की जा रही है। देश की आजादी को सीधे नवसाम्राज्यवादी शिकंजे में फंसा दिया गया है। ऐसे में आरएसएस को ठीक करने के पहले अगर अपने को ठीक नहीं किया जाता, तो नवउदारवाद के खिलाफ मोर्चा कभी नहीं जीता जा सकता।   

पूंजीवाद के बीमार

वैश्विक परिदृश्‍य पर मचे हिंसा और मौत के तांडव के बावजूद पूंजीवाद की क्रांतिकारी भूमिका के सिद्धांतकार और पैरोकार आज भी अपनी स्थापना वापस लेने को तैयार नहीं होंगे। तीन-चौथाई दुनिया का उपनिवेशीकरण, संसाधनों की लूट, समूचे समुदायों का सफाया करके उनके भूभागों पर कब्जा, युद्धों, गृहयुद्धों, महायुद्धों के वर्तमान तक जारी अनवरत सिलसिले के समानांतर जीवधारियों और वनस्पतियों की असंख्य प्रजातियों का विनाश करते हुए दुनिया को संकट के मुहाने पर ले आने वाला पूंजीवाद आज भी ‘क्रांतिकारी‘ है! पूंजीवादी व्यवस्था की सर्वाधिक यथार्थपरक (रियलिस्टिक) और तर्कपूर्ण (रेशनल) समीक्षा करने वाला गांधी आज भी भारत में मानव-प्रगति का सबसे बड़ा शत्रु माना जाता है। पूंजीवाद के बीमार दिमाग की इस समझ के साथ यह समझ लें कि आगे मनमोहन सिंह और मोदी ही आएंगे। गांधी, नेहरू, जेपी, लोहिया या अंबेडकर नहीं आने जा रहे हैं।

पूंजीवाद का बीमार दिमाग आज भी भारत की स्वतंत्र हस्ती नहीं स्वीकार कर पाता। इस बीमारी का बीज उपनिवेशवादी दौर में पड़ गया था। इसीके चलते उसके लिए अंग्रेज हमेशा सही और भारतीय लड़ाके, चाहे वे रजवाड़े हों, किसान हों, आदिवासी हों, हमेशा गलत थे। किसी भारतीय शासक ने भारत की जनता पर अंग्रेजों जैसा कहर नहीं बरपाया। 1857 भारत के लोगों ने पहला स्वतंत्रता संग्राम लड़ा। उसके दमन में अंग्रेजों ने जो नृशंसता की, दुनिया के इतिहास में उसका उदाहरण नहीं मिलता। किसी भारतीय शासक के राज्य में वैसे भयंकर अकाल नहीं पड़े, जैसे अंग्रेजों के काल में पड़े। जब भारत में अकाल के चलते एक साथ कई लाख लोग एडि़यां रगड़ कर मरते थे, तो भारत या इंग्लैंड में अंग्रेज का एक निवाला भी कम नहीं होता था। जो अंग्रेज, सिपाही हो या नौकरशाह, भारत आ गया, मालामाल होकर गया। भारत में उसका वैभव और रौब-दाब यहां के किसी भी शासक से ज्यादा था। उनकी अय्याशी के किस्से कम नहीं हैं। लेकिन अंग्रेजी-राज यहां के शासकों से अच्छा था, पूंजीवाद के बीमार दिमाग में यह मान्यता घुट्टी की तरह गई हुई है।

उपनिवेशवादी शोषण ने भारत को आर्थिक रूप से जर्जर कर दिया था। सबसे ज्यादा शोषण किसानों, आदिवासियों, कारीगरों और मजदूरों का हुआ था। गांधी ने उस यथार्थ के मद्देनजर देश की स्वावलंबी श्रम आधारित विकेंद्रित अर्थव्यवस्था बनाने की बात की। अगर अपनी अर्थव्यवस्था नहीं है, तो आप स्वतंत्र भी नहीं हो सकते। उपनिवेशवादी शोषण की प्रक्रिया में पैदा हुए एक छोटे मध्य-वर्ग ने गांधी का यह विचार स्वीकार नहीं किया। केवल राजनीतिक आजादी के आकांक्षी मध्य-वर्ग ने गांधी की इस धारणा को न केवल अस्वीकार किया, पिछड़ा भी बताया। विकास के बने-बनाए पूंजीवादी मॉडल के भरोसे आर्थिक आजादी को वह हथेली पर धरी चीज मानता था। उसके मुताबिक पूरे भारत को मध्य-वर्ग में तब्दील होना था। यानी किसानों, आदिवासियों, कारीगरों, मजदूरों, छोटे-मोटे दुकानदारों को उस विकसित भारत में नहीं रहना था। इसके साथ जो अन्य धारणाएं परोसी गईं, उन्हें फैंटेसी ही कहा जा सकता है। मसलन, इस विकास के साथ वर्ण, जाति, धर्म, क्षेत्र, भाषा आदि की बाधाएं टूट कर दूर हो जाएंगी। फैंटेसी का इंतिहाई सिरा यह था कि पूरा भारत अंग्रेजी पढ़ेगा, समझेगा और बोलेगा।   

मिश्रित अर्थव्यवस्था और नेहरूवादी-समाजवादी लक्ष्य की बाधाओं को पूंजीवादी दिमाग ने पार कर लिया है। उसका नया मरकज अमेरिका है। ‘मैं गुलाम मोहि बेच गुसांई’ की तर्ज पर वह उसके पैरों में बिछा हुआ है। उसके लिए अमेरिका सही ही सही और अमेरिकी गुलामी का विरोध करने वाले गलत ही गलत हैं।

पूंजीवाद के बीमार दिमाग से अगर कहें कि अंग्रेजों की अगुआई में कुछ अन्य यूरोपीयों ने अमेरिका के मूल निवासी रेड इंडियनों का सफाया करके, उनका प्रकृति प्रदत्त भूभाग व संसाधन लूट कर, अश्वेतों को जानवरों की तरह खटा कर यह सोने की लंका बसाई है, तो वे कहेंगे – तो क्या हुआ; जैसा कि वे आदिवासियों, किसानों और खुदरा व्यापारियों की तबाही पर कहते हैं। अगर उनसे कहें कि अमेरिका अन्य देशों की संप्रभुता और नागरिक स्वतंत्रता का किंचित भी सम्मान नहीं करता, बल्कि उनके खिलाफ षड़यंत्र करता है, तख्ता पलट करता है – तो भी वे कहेंगे, तो क्या हुआ? अमेरिका का अंधभक्त यह वही दिमाग है, जो उपनिवेशवादी दौर में अंग्रेजों की सराहना में लगा था।

हमारे मित्र संदीप सपकाले ने स्वतंत्रता दिवस के मौके पर फेसबुक पर नेहरू-अंबेडकर की प्रशंसा की है, जिनके विकास के मॉडल के तहत उनका सशक्तिकरण हुआ है। उनका यह विचार अच्छा है। हालांकि पूंजीवाद के साथ मिल कर सामंती शक्तियों का जो सशक्तिकरण हुआ है, उसके मुकाबले समग्र समाज के रूप में दलितों का सशक्तिकरण नगण्य ही कहा जाएगा। जिन थोड़े-से दलितों का सशक्तिकरण हुआ है, वे भी सामंती तौर-तरीके अपनाते हैं।

हमें साथी श्‍योराज सिंह बेचैन ने हाल में एक दिन बताया कि दलित-समाज में अफसर होना ही कुछ होना माना जाता है। हम लेखक-विचारक अपने में कुछ भी बने रहें, दलित-समाज में सम्मान नहीं मिलता। दलित राजनीति में भी अफसरों की ही पूछ है। मायावती के करीब कई दलित लेखकों-विचारकों ने पहुंचने की कोशिश की, लेकिन उन्हें कामयाबी नहीं मिली।

सपकाले के विचार के साथ दिक्कत यह है कि उन्होंने नेहरू-अंबेडकर की प्रशंसा करने के साथ, समाजवाद की बात करने वालों की भर्त्‍सना भी की है। यानी वे नवउदारवाद, उनके मुताबिक जिसके विरोध में कुछ लोग समाजवाद की वकालत करते हैं, को नेहरू और अंबेडकर की विचारधारा की परिणति मानते हैं। और उस परिणति को सही भी मानते हैं।

नेहरू आजादी के संघर्ष के दौर से समाजवादी विचारों के लिए जाने जाते थे। आजादी के बाद सोशलिस्टों के कांग्रेस से बाहर आ जाने के बाद और उनकी तीखी आलोचना के जवाब में उन्होंने कांग्रेस पार्टी का लक्ष्य समाजवाद निर्धारित किया था।

अंबेडकर नेहरू से अलग कुछ और भी सोच रहे थे, तभी उन्होंने अपनी अलग पार्टी बनाई थी। उनका लक्ष्य भी लोकतांत्रिक रास्ते से समाजवाद लाना था। सपकाले नेहरू और अंबेडकर को पूंजीवाद के समर्थन में खींचते हैं। इस तरह की खींचतान करके पूंजीवाद का समर्थन करने वाले दलित विचारकों की कमी नहीं है।

पूंजीवाद अगर दलितों को सामाजिक-आर्थिक मुक्ति दिला दे तो उसके स्वागत का कम से कम भारत में पूरा औचित्य बनता है। लेकिन ऐसा संभव नहीं है। पूंजीवाद चाहता तो कुछ निर्णायक प्रयास कंपनी राज के दौर में ही कर सकता था। मसलन, अंग्रेज चाहता तो जमींदारी प्रथा लागू करते वक्त कुछ जमींदार दलित समाज से भी बना देता। आदिवासियों के जंगल पर धावा बोलने वाले अंग्रेज को जमींदारी बड़ी बात लगती थी, तो दलितों को खेती अथवा बागवानी के लिए कुछ जमीन दे देता। चाहे चर्म उद्योग का ही, एकमात्र अधिकार दलितों को दे देता। लेकिन उसने ऐसा नहीं किया। उसका सहोदराना सामंती शक्तियों से था – भारत में भी और इंग्लैंड में भी। हमें हैरानी होती है कि अश्‍वेतों के साथ अमेरिकी गोरों ने जो किया, उसके बावजूद दलित विचारक अमेरिका का गुणगान करते हैं!  

दलित-विमर्श, दलित-अस्मिता, दलित-चेतना की बात करते वक्त यह ध्यान रखना जरूरी है कि दलित-समाज केवल आरक्षण के तहत अथवा अपनी मेधा से संगठित क्षेत्र में आ जाने वाले लोगों तक सीमित नहीं है। दलित-समाज में सम्मान अगर केवल अफसरी से मिलता है, तो पूंजीवाद से लाभान्वित दलित-समाज का दायरा और भी सिकुड़ जाता है। (हालांकि हम संविधान द्वारा प्रदत्त आरक्षण को पूंजीवादी व्यवस्था की देन नहीं मानते। अलबत्ता अब जो निजी क्षेत्र में आरक्षण की मांग की जा रही है, वह पूंजीवादी व्यवस्था की देन होगा।) ध्यान दिया जा सकता है कि आगे बढ़े हुए दलित कभी भी दलितोत्थान के ऐसे प्रयास यानी रचनात्मक कार्य नहीं करते, जिनके चलते बाहर छूटे दलितों में शिक्षा और चेतना का प्रसार हो, उन्हें रोजगार के बारे में जानकारी, उचित निर्देशन और प्रशिक्षण मिल सके। यह रचनात्मक काम बड़े पैमाने पर करके वे खुद पहल कर सकते हैं कि आरक्षण का लाभ लेकर कुछ हद तक सशक्‍त बन चुके परिवारों के पहले अब बाहर छूटे परिवारों को आरक्षण मिले। लेकिन वे रचनात्मक काम नहीं करते। एनजीओ बनाते हैं, जो पूंजीवादी तंत्र का अभिन्न हिस्सा हैं।

यह सच्चाई जानने के लिए बहुत गहराई में जाने की जरूरत नहीं है कि दलित पूंजीवाद की बात करने वाले पूंजीवाद के पहलवानों के प्यादे ही रह सकते हैं। पूंजीवाद ने कितनी गहरी पैठ बनाई है और सवर्ण भारत के कितने लोग यूरोप-अमेरिका तक जमे हैं, उनमें टूटी-फूटी अंग्रेजी और गांठ में चवन्नी लेकर शामिल नहीं हुआ जा सकता। जाति को लेकर जाने पर बड़ी जाति वहां पहले से मौजूद है। जिस जाति को सदियों से छोटा बनाया गया हो, उसे सदियों से बड़ी जाति के मुकाबले कभी भी खड़ा नहीं किया जा सकता। अंबेडकर द्वारा प्रस्तावित जाति निर्मूलन ही उसका उपाय है।

सशक्‍त दलितों द्वारा पूंजीवाद की पूजा, दरअसल, दलित-समाज के नाम पर व्यक्तिगत स्वार्थ की साधना है। यह प्रवृत्ति बाकी जाति समूहों में भी देखी जा सकती है और यह पूंजीवाद की देन है। समता विरोधी ब्राह्मणवाद की जितनी निंदा की जाए, कम है। लेकिन उसके साथ दलित-समाज में ही विषमता बढ़ रही हो तो समझ लेना चाहिए खोट कहीं और भी है। सत्ता पाकर मद में आ जाना केवल सामंतवाद-ब्राह्मणवाद की मूल विशेषता नहीं है। जैसे भारत के अगड़े समाज को हजारों साल गुलाम रहने के कुछ कारण अपने चरित्र में खोजने चाहिए, उसी तरह वर्ण-व्यवस्था के गुलाम बनाए गए पिछड़े और दलित-समाज को भी आत्मालोचन करने की जरूरत स्वीकार करनी चाहिए।

हम फुले-अंबेडकर से लेकर आज तक के दलित विचारकों की ‘अंग्रेज-भक्ति’ का बुरा नहीं मानते। जो मानते हैं उन्हें देख लेना चाहिए कि यह अंग्रेज-भक्त सवर्ण समाज ही था, जिसने 200 साल तक उन्हें यहां काबिज बनाए रखा। कई लाख भारतीयों की हत्या के बाद उन्हें अपनी ‘प्रजा’ का दर्जा देने आईं इंग्लैंड की महारानी विक्टोरिया की शान में पढ़े गए कसीदे देख लेने चाहिए। अंग्रेजों के भारत में आने और उपनिवेश कायम करने में दलितों की कोई भूमिका नहीं थी। लेकिन अगर दलित विचारक पूंजीवाद के पक्के पक्षधर बनते हैं, तो उसके साथ अंबेडकर का नाम ज्यादा दिन नहीं चल सकता है। अंबेडकर पूंजीवाद के पक्षधर नहीं थे। उन्होंने निजी क्षेत्र में आरक्षण की न बात की, न संविधान में प्रावधान किया। वे चाहते थे कि जल्दी ही समता मूलक आर्थिक-सामाजिक व्यवस्था बने और आरक्षण की जरूरत न रहे।

गांधी का कहना था कि अंग्रेजों ने हमें गुलाम नहीं बनाया, हम खुद उनके गुलाम बन गए। आज हम देखते हैं कि गांधी ने जिस समाज को आजादी की होड़ में लगाया था, और आजादी हासिल भी की थी, वह गुलामी की होड़ में दौड़ लगा रहा है। गोया उसे पूर्णता में हासिल करके रहेगा! इसे दुर्भाग्यपूर्ण ही कहा जा सकता है कि गांधी को अब सबसे ज्यादा गाली दलित विचारकों की ओर से पड़ती हैं। लेकिन दलितों द्वारा गांधी को गाली देने का व्यापार भी ज्यादा दिन चलने वाला नहीं है। गांधी को उनका सबसे ज्यादा नाम लेने वाली कांग्रेस ने खत्म कर दिया है।

नरसिम्हा राव से लेकर मनमोहन सिंह तक उन्हें कई बार नवउदारवाद के हमाम में खींच चुके हैं। आपने सुना ही है कि बराक ओबामा भी गांधी का भक्त है! पूंजीवाद के बीमार दिमाग को गांधी की जरूरत क्यों पड़ती है, इस पर हमने अन्यत्र विस्तार से लिखा है। वह दूसरों को धोखा देने से ज्यादा अपने को धोखे में रखने के लिए गांधी का नाम लेता है। वह जानता है उसने इंसानियत के ऊपर बाजार और हथियार का पहाड़ खड़ा किया हुआ है। वह यह भी जानता है कि उसे आगे यही करते जाना है। इस उपक्रम में वह कई करोड़ लोगों सहित असंख्य जीवधारियों की हत्या कर चुका है। गांधी के नाम में वह अपने इंसान होने की तसल्ली पाता है। पूंजीवादी दिमाग अपनी बीमारी की दवा के रूप में भी गांधी को रखता है, तो आने वाली दलित पीढ़ियों को उन्हें गाली देने की जरूरत नहीं रह जाएगी।

स्वदेशी का राग अलापने वाला आरएसएस पूंजीवाद का सबसे बड़ा बीमार है। रोग असाध्य न हो जाए, इसके पहले आरएसएस को गंभीरता से आत्मालोचन करना चाहिए। उसे सचमुच सोचना चाहिए कि इतने लंबे समय में एक भी चिंतक, कलाकार, साहित्यकार वह पैदा नहीं कर पाया है। सत्ता और सुविधाओं के लालच में भले ही कुछ रचनाकार और विचारक उसके साथ नाता बना लेते हों। संघ के बाहर स्वयंसेवक पराया और नकलची बन कर रह जाता है। विचार और कला की दुनिया से बहिष्कृत आरएसएस को अपने अलग ‘बौद्धिक’ और ‘सांस्कृतिक’ चलाने की नहीं, सोच और दृष्टिकोण बदलने की जरूरत है। वरना एक सांस्कृतिक संगठन के रूप में उसकी पहचान आगे भी कभी खड़ी नहीं हो पाएगी। उसके हिंदुत्व की सार्थकता केवल भाजपा को राजनीतिक सत्ता दिलाने तक ही सीमित रही है, और आगे भी रहेगी। सत्ता हथियाने का हथकंडा संस्कृति या जीवन-दर्शन नहीं हो सकता।

इतिहास की सीख

आजादी अगर खोती है तो उसे दोबारा पाना बहुत कठिन होगा। उससे आसान है कि हम पूंजीवाद के बारे में अपनी धारणाओं को निर्णायक रूप से बदलें। भारत और तीसरी दुनिया के लिए आजादी के क्या मायने हैं और क्यों उपनिवेशवादी वर्चस्व से आजादी हासिल करने के बावजूद गुलामी फिर से कायम हो रही है, इस पर लोहिया के बाद सबसे प्रखर राजनीतिक चिंतन किशन पटनायक ने किया है। नब्बे के दशक से नई आर्थिक नीतियों के रूप में शुरू हुए नवसाम्राज्यवादी हमले के मुकाबले की ठोस राजनीति खड़ी करने की लगातार कोशिश भी उन्होंने की। एक माहौल बना भी कि नई आर्थिक नीतियों के खिलाफ सन्नद्ध हुए छोटे, एक मुद्दे पर स्थानीय स्तर पर होने वाले जनांदोलनों को जोड़ कर नवउदारवाद के खिलाफ वैकल्पिक राजनीति का निर्माण किया जाए। दलित, आदिवासी और शूद्र नेतृत्व आगे आए और उसकी अगुआई करे। लेकिन विदेशी धन पर पलने वाले एनजीओपरस्तों, जिनमें कई प्रमुख जनांदोलनकारी भी शामिल हैं, ने उनके प्रयासों को फलीभूत नहीं होने दिया।

चर्चा को समाप्त करने से पहले किशन पटनायक के महत्वपूर्ण और चर्चित निबंध ‘गुलाम दिमाग का छेद’ से एक उद्धरण द्रष्टव्य है, ‘‘हमारे जितने राष्ट्रीय बुद्धिजीवी हैं (जिस तरह से कुछ अंगरेजी अखबारों को राष्ट्रीय अखबार कहा जाता है, उसी तरह कुछ अंगरेजी वाले बुद्धिजीवियों को राष्ट्रीय बुद्धिजीवी कहा जा सकता है) उनमें कुछ अपवादों को छोड़ कर किसी ने यह नहीं माना है कि 1757 के प्लासी-युद्ध में पराजय के कारण भारत बरबाद हो गया, उसकी अपूरणीय क्षति हुई। ‘आजादी खोना बुरी बात तो है ही, लेकिन … ’। ‘लेकिन’ के लहजे में हमारा बुद्धिजीवी ऐसी बातें कहने लगेगा मानो आजादी खोना कोई पछतावे की बात नहीं है, उसकी कीमत पर हमने इतना सारा फायदा हासिल किया है कि हमें अंगरेजों के प्रति कृतज्ञ होना चाहिए कि उन्होंने हमें दास बनाया।

‘‘भारत के कितने अंगरेजी लिखने-बोलने वाले बुद्धिजीवी हैं जो भारत के आधुनिकीकरण के लिए अंगरेजी हुकूमत को श्रेय नहीं देते? जो यह नहीं मानते कि अगर भारत पर ब्रिटिश हुकूमत नहीं होती तो भारत आधुनिक ज्ञान-विज्ञान और अंगरेजी भाषा का उतना फायदा नहीं उठा पाता, जितना वह आज उठा रहा है? अपवाद के तौर पर ही ऐसे लोग मिलेंगे। 1857 की असफल क्रांति के बारे में हमारे कुछ प्रसिद्ध इतिहासकारों ने लिख दिया है कि जो हुआ, वह अच्छा ही हुआ। अगर 1857 की क्रांति सफल हो जाती तो भारत अज्ञान के अंधकार और अंधविश्‍वास के गर्त में डूबा रह जाता ऐसा मानने वालों के मस्तिष्‍क के बारे में सोचना पड़ेगा। प्रश्‍न यह है कि कहीं उनके मस्तिष्‍क में कोई छेद तो नहीं हो गया है, अन्यथा सामने पड़े हुए तथ्यों को वे कैसे नजरअंदाज कर देते हैं। उनके सामने यह तथ्य है कि जापान और चीन यूरोपीय हुकूमत के अधीन नहीं रहे। क्या चीन और जापान का आधुनिकीकरण भारत से कम हुआ है?’’ (‘विकल्पहीन नहीं है दुनिया’, पृ. 22)

जहिर है, हमारी आधुनिकता और आधुनिकीकरण की समझ इस तरह की बनी है कि भारत की स्वतंत्रता या स्वतंत्र भारत की जगह उसमें नहीं बन पाती। यह जटिल समस्या है जिसके समाधान के लिए सभी बौद्धिक समूहों और राजनीतिक पार्टियों के समग्र और गंभीर उद्यम की जरूरत है। इतिहास में हो चुकी गलतियों को अनहुआ नहीं किया जा सकता। लेकिन उनसे शिक्षा कभी भी ली जा सकती है। प्रसिद्ध कथन है, जो इतिहास से सबक नहीं सीखते, वे उसे दोहराने को अभिशप्‍त होते हैं। हमें इतिहास से यह सबक लेना होगा कि उपनिवेशवाद का विरोध किए बगैर नवसाम्राज्यवाद का विरोध नहीं किया जा सकता।

प्रेम सिंह

25 अगस्त 2013

(समाजवादी आंदोलन से जुड़े लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व शिक्षक और भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला के पूर्व फ़ेलो हैं।)

आजादी का अमृत महोत्सव : मध्य वर्ग में फासिज्म क्यों जनप्रिय है? | hastakshep | हस्तक्षेप

Duties of Independence Day: Day of Introspection

आरएसएस की तिरंगे से नफ़रत और इस के प्रचारक प्रधानमंत्री मोदी का तिरंगे से प्यार का राज़!

rss hates tricolor

ख़ुद को हिन्दू राष्ट्रवादी बताया था पीएम मोदी ने

मौजूदा प्रधानमंत्री मोदी ने, जब वे गुजरात के मुख्यमंत्री थे, विश्व की एक नामी समाचार एजेंसी राइटर्स [Reuters] से 12 जुलाई 2013 को एक साक्षात्कार में ख़ुद को हिन्दू राष्ट्रवादी बताया था। उन्होंने यह सच भी साझा किया था कि उन्होंने हिन्दू राष्ट्रवाद के सबक़ आरएसएस में रहकर सीखे और उनको राजनैतिक नेता के तौर पर गढ़ने में आरएसएस के महानतम दार्शनिक और दूसरे सरसंघचालक गोलवलकर की सब से बड़ी भूमिका थी।  

आरएसएस ने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान हर उस चीज से नफ़रत की, जो ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ भारतीय जनता के एकताबद्ध संघर्ष का प्रतीक थी। इसे समझने के लिए तिरंगा, राष्ट्रीय-ध्वज, एक सही मामला है।

तिरंगे का खुला विरोध किया हेडगेवार ने

दिसंबर 1929 में कांग्रेस ने अपने लाहौर अधिवेशन में पूर्ण-स्वराज का राष्ट्रीय लक्ष्य निर्धारित कर दिया और जनता से अपील की कि 26 जनवरी,1930 को तिरंगा फहराकर उसका सम्मान करते हुए स्वतंत्रता दिवस मनायें और ऐसा हर साल करें। तब तक तिरंगे को राष्ट्रीय ध्वज मानने पर आम सहमति हो गयी थी। उस समय तिरंगे के बीच में चरखा होता था। इसकी खुली अवहेलना करते हुए सरसंघचालक डॉ. हेडगेवार ने आरएसएस की सभी शाखा संचालकों के नाम 21 जनवरी 1930 को एक परिपत्र जारी किया जिस में आदेश दिया गया था कि: “आरएसएस की तमाम शाखायें सब स्वयंसेवकों की संघस्थान पर 26 जनवरी 1930 शाम को सभा करें और हमारे राष्ट्रीय-ध्वज अर्थात भगवे झंडे को सलामी दें।”  

[NH PALKAR (ed.), डॉ हेडगेवार पत्र-रूप व्यक्ति दर्शन (हेडगेवार के पत्रों का संकलन), अर्चना प्रकाशन इंदौर, 1989, प्रष्ठ 18]

गोलवलकर ने भी तिरंगे के प्रति नफ़रत का इज़हार किया

तिरंगे के प्रति इस नफ़रत की परिपाटी का गोलवलकर ने भी वफ़ादारी से परिपालन किया। 14 जुलाई,1946 को गुरु पूर्णिमा के अवसर आरएसएस के नागपुर मुख्यालय पर इकट्ठे लोगों को संबोधित करते हुए कहा कि भगवा ध्वज संपूर्णता के साथ हमारी महान संस्कृति का प्रतिनिधित्व करता है। यह ईश्वर का प्रतिरुप हैः हमें पक्का विश्वास है कि अंत में पूरा देश भगवे ध्वज को नमन करेगा। [श्री गुरुजी समग्र दर्शन, vol. 1, p. 98.]

आरएसएस के अंग्रेजी मुखपत्र ‘आर्गेनाइज़र’ ने संविधान सभा की समिति में सभी दलों और सभी समुदायों को मंजूर तिरंगे को राष्ट्रीय-ध्वज के रुप में मान लेने के फ़ैसले की ख़बर पर ज़बर्दस्त ग़ुस्सा ज़ाहिर करते हुए ‘दि नेशनल फ्लैग’ शीर्षक से 17 जुलाई,1947 के अपने संपादकीय में लिखा-

हम इस बात से बिल्कुल सहमत नहीं हैं कि राष्ट्रीय झंडा देश के सभी दलों और समुदायों को स्वीकारिये होना चाहिए। यह शुद्ध बेवक़ूफ़ी है। झंडा राष्ट्र का प्रतीक है और देश में केवल एक राष्ट्र है, हिन्दू राष्ट्र, जिसका लगातार चलने वाला 5000 साल का इतिहास है। हमारा झंडा इसी राष्ट्र और केवल इसी राष्ट्र का प्रतिनिधित्व करना चाहिए। हमारे लिए यह मुमकिन नहीं है कि हम एक ऐसा झंडा चुनें जो कि सभी समुदायों की इच्छाओं और आकाँक्षाओं को संतुष्ट कर सके। यह बिल्कुल ग़ैरज़रूरी, अनुचित है और पूरे मामले को और उलझा देता है।…हम अपने झंडे को उस तरह नहीं चुन सकते हैं, जैसे कि हम एक दर्ज़ी को एक क़मीज़ या कोट तैयार करने लिए कहते हैं…

अगर हिन्दुस्थान के हिन्दुओं की एक साझी सभ्यता, संस्कृति, रीति-रिवाज और शिष्टाचार, एक साझी भाषा और साझी परम्पराएं थीं तो उनका एक झंडा भी था। एक ऐसे झंडा जो सब से पुराना और महान था बिलकुल उसी तरह जैसे कि वे और उनकी सभ्यता है। हमारे राष्ट्रीय झंडे के बारे में किसी भी फ़ैसले से पहले हमें इस ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य का ध्यान रखना चाहिए, ना की उस ग़ैर ज़िम्मेदारी से जैसे हाल ही में किया जा रहा है।

यह सच है कि विदेशी आक्रमणों के कारण जो भयावहता उन के साथ आई, अस्थायी विफलताओं ने हिन्दुओं के राष्ट्रीय ध्वज को अन्धकार में धकेल दिया। लेकिन हम सब इस बात को जानते थे कि एक दिन यह ज़रूर महानता और प्राचीन महिमा को छुएगा और लहरायेगा। इस ध्वज के अद्वितीय रंग में ऐसा कुछ है जो देश के प्राण औऱ आत्मा के लिए अत्यंत प्रिय है और यह रंग भोर का अद्भुत रंग है, जो पूर्व की दिशा में धीरे किंतु राजकीय सूर्योदय के वक्त प्रकट होता है।

इसी तरह हमारे पूर्वजों ने हमें विश्व को जीवनी शक्ति देने वाला यह ध्वज सौंपा है। वे सिर्फ अज्ञानी और दुष्ट हैं जो इस ध्वज के अद्भुत आकर्षण, उसकी महानता और भव्यता को देख नहीं सकते। यह आकर्षण, महानता और भव्यता उतना ही गौरवशाली है जैसा कि स्वयं सूर्य है। यह ध्वज हिंदुस्तान का एकमात्र सच्चा ध्वज बन सकता है। राष्ट्र को यही और एकमात्र यही स्वीकार होगा।

भारत की स्वतंत्रता से मात्र एक दिन पहले आरएसएस के अंग्रेज़ी मुखपत्र आर्गेनाइज़र (14 अगस्त,1947) में तिरंगे को शर्मनाक हद तक अपमानित करते हुए लिखा:

“वे लोग जो किस्मत के दांव से सत्ता तक पहुंचे हैं वे भले ही हमारे हाथों में तिरंगे को थमा दें, लेकिन हिंदुओं द्वारा इसे कभी सम्मानित किया जा सकेगा, अपनाया जा सकेगा। तीन का आंकड़ा अपने आप में अशुभ है और एक ऐसा झण्डा, जिसमें तीन रंग हों बेहद खराब मनोवैज्ञानिक असर डालेगा और देश के लिए नुक़सानदेय होगा

स्वतंत्रता के बाद जब तिरंगा झंडा राष्ट्रीय ध्वज बन गया, तब भी आरएसएस ने इसको स्वीकारने से मना कर दिया। गोलवालकर ने राष्ट्रीय झंडे के मुद्दे पर अपने लेख ‘पतन ही पतन’ [‘विचार नवनीत’ 1966 में आरएसएस द्वारा प्रकाशित प्रकाशित गोलवलकर के लेखों/भाषणों का संग्रह, पृष्ठ 237] में अपने विचार व्यक्त करते हुए लिखा-

उदाहरण स्वरूप, हमारे नेताओं ने हमारे राष्ट्र के लिए एक नया ध्वज निर्धारित किया है। उन्होंने ऐसा क्यों किया? यह पतन की ओर बहने तथा नक़लचीपन का एक स्पष्ट प्रमाण है

श्री गुरूजी आगे चलकर अपने लेख में उस सोच की खिल्ली उड़ाते हैं जिसके अंतर्गत तिरंगे झंडे को भारत की एकता का प्रतीक मानकर राष्ट्रीय ध्वज के रूप में स्वीकारा गया। तिरंगे झंडे को राष्ट्रीय ध्वज के रूप में पसन्द किए जाने पर उनका कहना है-

‘‘कौन कह सकता है कि यह एक शुद्ध तथा स्वस्थ् राष्ट्रीय दृष्टिकोण है? यह तो केवल एक राजनीति की जोड़तोड़ थी, केवल राजनीतिक कामचलाऊ तत्कालिक उपाय था। यह किसी राष्ट्रीय दृष्टिकोण अथवा राष्ट्रीय इतिहास तथा परम्परा पर आधारित किसी सत्य से प्रेरित नहीं था। वही ध्वज आज कुछ छोटे से परिवर्तनों के साथ राज्य ध्वज के रूप में अपना लिया गया है।

हमारा एक प्राचीन तथा महान राष्ट्र है, जिसका गौरवशाली इतिहास है। तब, क्या हमारा अपना कोई ध्वज नहीं था? क्या सहस्त्रों वर्षों में हमारा कोई राष्ट्रीय चिह्न नहीं था? निःसन्देह, वह था। तब हमारे दिमागों में यह शून्यतापूर्ण रिक्तता क्यों?’’

आज़ादी के बाद भी यह सब लिखकर आरएसएस ने उन शहीदों का घोर अपमान किया जो वतन के लिये शहीद हो गए और जिन की लाशें तिरंगे में लपेट कर सम्मानित की गयीं।

तिरंगे के प्रति सावरकर की नफ़रत

आरएसएस की तरह सावरकर भी ब्रिटिशराज के ख़िलाफ़ भारतीय जनता के एक-जुट संघर्ष के सभी प्रतीकों से नफ़रत करते थे।उन्होंने तिरंगे को राष्ट्र-ध्वज या स्वतंत्रता संघर्ष का झण्डा मान ने से मना कर दिया था।हिंदू महासभा के कार्यकर्ताओं के नाम 22 सितंबर 1941 को जारी बयान में उन्होंने घोषणा की –

“जहाँ तक झंडे का सवाल है, हिंदू लोग समग्र हिंदुत्व का प्रतिनिधित्व करने वाले उस झंडे के सिवा और किसी झंडे को नहीं जानते, जो कुंडलिनी कृपाणांकित महासभा का झंडा है, जिस पर ओम् और स्वास्तिक अंकित हैं, जो हिंदू जाति और नीति के प्राचीनतम प्रतीक हैं और हिंदुस्थान में युगों-युगों से सम्मानित हैं। वास्तव में यह हरिद्वार से लेकर रामेश्वरम तक लाखों लाख हिंदुओं के लिएमान्य है और वे उसे फहराते हैं। यह हिंदूमहासभा की हर शाखा पर हज़ारों केन्द्रों पर फहराते हैं। इसलिए जिस स्थान या आयोजन में इस हिंदू झंडे का सम्मान नहीं किया जाता, उसका हिंदू-संगठनवादी हर क़ीमत पर बहिष्कार करें…चरख़े वाला झंडा खादी भंडार का भले प्रतिनिधित्व कर सकता है, लेकिन चरख़ा हिंदुओं की गौरव-पूर्ण भावना और प्राचीन राष्ट्र का कभी प्रतीक नहीं बन सकता। फिर भी जो लोग चाहें, वे इस के साथ खड़े हो सकते हैं, लेकिन हम हिंदू-संगठनवादी अपने प्राचीन हिंदू झंडे के अलावा किसी और झंडे के नीचेन खड़े हो सकते हैं और न उस की रक्षा कर सकते हैं।”

[Bhide, A. S. (ed.), Vinayak Damodar Savarkar’s Whirlwind Propaganda: Extracts from the President’s Diary of his Propagandist Tours Interviews from December 1937 to October 1941, na, Bombay pp. 469, 473.]

फ़िलहाल आरएसएस में सब से शक्तिशाली व्यक्ति, प्रधानमंत्री मोदी ने ज़बरदस्त पलटी खायी है। तिरंगे से जानी दुश्मनी रखने वाली संस्था आरएसएस से जुड़े होने के बावजूद वे तिरंगे पर प्यार उड़ेल रहे हैं। 13 से 15 अगस्त के बीच ‘हर घर तिरंगा’ लहराया जाएगा और उन्होंने अपने सोशल मीडिया ‘हैंडल्स’ पर भी तिरंगा लगा दिया है। अगर यह सब ईमानदारी से किया जा रहा है तो उन्होंने ख़ुद और आरएसएस के पूरे नेतृत्व को पूरे देश से तिरंगे के लगातार किए गए अपमान और भर्त्सना के लिये माफ़ी मंगनी चाहिये।

अगर ऐसा नहीं किया जाता तो आरएसएस से जुड़े लोगों का, प्रधानमंत्री समेत तिरंगे से प्यार एक धोखा और बदचलनी ही माना जाएगा। इस का साफ़ मतलब होगा कि आरएसएस-भाजपा शासक दमनकारी और लूट पर टिके राज पर पर्दा डालने के लिये तिरंगे का इस्तेमाल कर रहे हैं। इस के लिये इतिहास उन्हें कभी माफ़ नहीं करेगा!

शम्सुल इस्लाम

14-08-2022   

syama prasad mukherjee श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने भारत छोड़ो आंदोलन को कुचलने में अंग्रेजों की मदद की

The secret of RSS’s hatred of the tricolor and its campaigner Prime Minister Modi’s love for the tricolor!

सलमान रुश्दी पर जानलेवा हमला : अमरीकी खुफिया निगरानी और सुरक्षा व्यवस्था की पोल खुल गई है

debate

Deadly attack on Salman Rushdie: US intelligence surveillance and security system exposed

न्यूयार्क में विवास्पद कृति सैटेनिक वर्सेज के रचनाकार सलमान रुश्दी पर जानलेवा हमला (The deadly attack on Salman Rushdie, the author of the controversial work Satanic Verses, in New York.)। उनकी गर्दन पर चाकू भोंक दी गई है। स्थिति अभी चिंताजनक है। हम इस हमले की निंदा करते हैं लेकिन पूरे प्रकरण पर हमें सोच विचार जरूर करना चाहिए।

salman rushdie author of “the satanic verses” stabbed on stage in new york at a literary event…his book enraged ayatollah khomeini so much so that he issued a fatwa in 1989 calling for his death…salman has been under the protection of uk’s secret service eversince…a suspect was larer apprehended…

साहित्यिक आयोजन के मंच पर हुए इस हमले से अमेरिकी पुलिस उन्हें नहीं बचा सकी। अमरीकी खुफिया निगरानी और सुरक्षा व्यवस्था की पोल खुल गई है।

न्यूयार्क में twin tower हमले के बाद इराक और अफगान युद्ध और सम्पूर्ण पश्चिम एशिया, लीबिया को ध्वस्त कर देने के आतंकवाद के अमेरिकी युद्ध के बाद हमला बताता है कि कट्टरपंथ और आतंकवाद से निपटने के अमेरिकी दावे कितने खोखले हैं।

1989 में अयातुल्ला खुमैनी ने सैटेनिक वर्सेज की वजह रुश्दी के खिलाफ मौत का फरमान जारी किया था। तब से अब तक दुनिया बदल जाने के बावजूद यह फतवा अभी जारी है। उनके सर पर 30 लाख डॉलर के इनाम का एलान जारी है।

रुश्दी बेनाम कैद की जिंदगी जीते रहे अमेरिकी और पश्चिमी सुरक्षा के घेरे में। मिडनाइट चिल्ड्रन के लेखक अब 75 साल के हैं। उन पर काफी पहले जर्मनी में एक बार कातिलाना हमला हुआ था। सैटेनिक वर्सेज के जर्मन अनुवादक की लेकिन हत्या कर दी गई है।

बोरिस पस्तरनक, soljeletsin और शोलोखोव जैसे सोवियत विरोधी अमेरिकापरस्त लेखकों को नोबेल पुरस्कार मिले, लेकिन उनकी कृतियां साहित्यिक कसौटी पर भी खरी उतरी।

सिर्फ विवादास्पद लेखन से बाजार में बने रहने की जगत के बाद अमेरिकी सुरक्षा भी काफी नहीं होती, यह हमला यह भी साबित करता है।

जनपक्षधर साहित्यकार और कलाकार भगोड़े नहीं होते। अपनी कृति के लिए किसी भी तरह का अंजाम भुगतने को तैयार रहते हैं। उन्हें किसी महाबली के रक्षकवच की जरूरत नहीं होती। खुमैनी के अवसान के बाद 2001 में तेहरान ने रुश्दी के खिलाफ फतवा वापस लेने का एलान जरूर किया था, जो दरअसल वापस नहीं हुआ। लेकिन रुश्दी भूमिगत जीवन से निकलकर अमेरिका में बस गए और पिछले 20 साल से वे न्यूयार्क के बाशिंदे हैं। इसी पनाहगाह में अमेरिकी ईगल की नजर से बचकर घात लगाए इंतजार में थे मौत के सौदागर।

लेखकीय स्वतंत्रता और सुरक्षा का तो कोई सवाल नहीं उठता। सत्ता, धर्म सत्ता और मुक्त बाजार की विश्व व्यवस्था अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के विरुद्ध है। यह चिंता का विषय जरूर है।

राष्ट्र, पूंजीवाद और साम्राज्यवाद लेखकीय स्वतंत्रता की गारंटी नहीं दे सकते। जनता ही रचनाकार की रक्षा कर सकती है। जनता से अलगाव और बाजार के लिए लेखन आत्मघाती होता है।

पलाश विश्वास

अब हाथ में तिरंगा, बगल में भगवा : राष्ट्रीय प्रतीकों को हथियाने की जल्दबाजी

badal saroj

अपराध मनोविज्ञान की एक ख़ास प्रवृत्ति “करें गली में कत्ल बैठ चौराहे पर रोयें” की होती है। हत्या जैसे गंभीर अपराधों में पुलिस जाँच आमतौर से उनकी शिनाख्त से शुरू होती है जो बेवजह कुछ ज्यादा ही शोकाकुल घूमते और विलाप करते दिखते हैं, जो मौका-ए- वारदात पर कुछ ज्यादा ही टहल करते दिखाई देते हैं। जाग्रत असामान्य बर्ताब अमूमन सुप्त ग्लानिभाव की उपज होता है। आरएसएस – भाजपा की तिरंगा मुहिम इसी सिंड्रोम का ताजा नमूना है। वे बड़े जोर-शोर से तिरंगा की खुदरा और थोक बिक्री की दुकानें खोले बैठे हैं, बस्तियों में जा जाकर तिरंगे बेचने और बांटने में लगे हैं। उसी तिरंगे के लिए आकाश पाताल एक किए हैं जिसको जिसे संघ ने कभी भारत का राष्ट्रध्वज ही नहीं माना-इतना ही नहीं उसे “अशुभ और अपशकुनी” तक बताया।

स्वयं आरएसएस के दस्तावेजों में दर्ज है कि तिरंगे झंडे को राष्ट्रीय ध्वज बनाने के बारे में आम राय बनने के बाद संघियों ने बाकायदा इसके खिलाफ देश भर में अभियान चलाया।

आरएसएस के मुखपत्र ‘ऑर्गनाइजर’ के 14 अगस्त 1947 के अंक में ‘भगवा ध्वज के पीछे रहस्य’’ के सनसनीखेज शीर्षक के साथ छपे एक लेख में दिल्ली के लाल किले की प्राचीर पर भगवा ध्वज के फहराए जाने की खुली मांग करते हुए राष्ट्रीय ध्वज के रूप में तिरंगे के चयन पर अपमानजनक टिप्पणियां और राष्ट्रध्वज के रूप में इसे कभी स्वीकार न करने की घोषणाएं तक की गयीं। इस लेख में लिखा है कि;

“जो लोग किस्मत के दांव से सत्ता में आ गए हैं वे हमारे हाथ में तिरंगा दे सकते हैं, लेकिन इसको हिंदुओं द्वारा कभी अपनाया नहीं जाएगा और न ही इसका कभी हिंदुओं द्वारा सम्मान होगा। तीन का अंक और शब्द ही अपने आप में एक बुरा अपशकुन है। इसलिए तीन रंगों वाले झंडे का निश्चित रूप से एक बहुत बुरा मनोवैज्ञानिक प्रभाव होगा और यह देश के लिए हानिकारक साबित होगा।”

गोलवलकर ने तिरंगा को अशुभ बताया था

खुद आरएसएस के दूसरे सरसंघचालक और उस संगठन के अब तक के एकमात्र “विचारक” गोलवलकर ने इसे तीन रंगों वाला और अशुभ बताया था।

गोलवलकर के लिखे-बोले के संग्रह “विचार नवनीत” (बंच ऑफ़ थॉट) में इस बारे में उनका कहा दर्ज है। वे लिखते हैं कि

“हमारे नेताओं ने जो राष्ट्रीय ध्वज दिया है वह नकल का भौंडा नमूना है। इसमें ये तीन रंग कहाँ से आये ? फ्रांसीसी क्रान्ति के दौरान उनके झंडे पर तीन रंग की पट्टियां उनके “समता, भाईचारे और स्वतन्त्रता” के तीन नारों की अभिव्यक्ति थीं। अमरीकी झंडे में भी थोड़े बहुत बदलाव के साथ इन्हें आजादी की लड़ाई में कुर्बानी देने वालों के प्रतीक के रूप में लिया गया था। भारत के झण्डे में ये सिर्फ उनकी नक़ल है।”

वे यहीं तक नहीं रुके उन्होंने इस झंडे को साम्प्रदायिक तक करार दिया और दावा किया कि

“इसमें जो हरा रंग है वह मुसलमानों का है – इसलिए आरएसएस इसे कभी स्वीकार नहीं कर सकता।” जबकि झण्डे की राष्ट्रीय ध्वज के रूप में स्वीकृति के साथ ही यह स्पष्ट किया गया था कि इसका केसरिया रंग कुर्बानी, सफ़ेद पवित्रता तथा हरा उर्वरता और शान्ति का प्रतीक है।

झंडे के बीचो-बीच बने 24 तीलियों वाले अशोक चक्र को अनवरत गति और प्रगति का प्रतीक बताया गया था।

राष्ट्र ध्वज के बारे आरएसएस की धारणा

राष्ट्र ध्वज के बारे आरएसएस की यह धारणा (RSS perception about the national flag) कोई पुरानी पड़ चुकी बात नहीं है। 2018 में आरएसएस के सरसंघचालक डॉ मोहन भागवत ने नई दिल्ली के विज्ञान भवन में एक कार्यक्रम में इसे गोलमोल अंदाज में फिर दोहराया और कहा कि “यह सवाल अक्सर उठता है कि शाखा में भगवा ध्वज क्यों फहराया जाता है, राष्ट्रध्वज क्यों नहीं?” इस बारे में कुछ स्पष्टीकरण देने या सुधारने की बात कहने की बजाय उन्होंने दावा किया कि “…. पर संघ तिरंगे के जन्म से ही उसके सम्मान से जुड़ा हुआ है।” कितना जुड़ा हुआ है यह ऊपर की पंक्तियों – जिनका संघ ने आज तक कभी खंडन नहीं किया – से स्पष्ट हो ही गया है। इसके पहले 2015 में चेन्नई में एक संगोष्ठी में आरएसएस ने कहा था कि “राष्ट्रीय ध्वज पर भगवा ही एकमात्र रंग होना चाहिए था क्योंकि अन्य रंग एक सांप्रदायिक विचार का प्रतिनिधित्व करते हैं।”

ध्यान रहे कि आजादी के बाद भी आरएसएस ने तिरंगे को राष्ट्रीय झंडा महात्मा गांधी की हत्या के बाद लगे प्रतिबंध को हटवाने के लिए सरदार पटेल द्वारा लगाई गयी शर्तों के तहत मजबूरी में ही माना था। इन शर्तों में भारत के ध्वज और संविधान के प्रति वफादार रहने की शपथ लेना, हिंसा और गोपनीयता का त्याग कर संघ का संविधान बनाकर उसे सार्वजनिक करना, अपने संगठन में लोकतांत्रिक ढंग से चुनाव कराना, देश की लोकतांत्रिक प्रणाली में विश्वास रखना और राजनीतिक गतिविधियों से पूरी तरह से दूर रहते हुए सिर्फ सांस्कृतिक गतिविधियों में ही लिप्त रहना, अपनी गतिविधियों तथा शाखाओं में बच्चों को नहीं लाना आदि प्रमुख हैं।

कहने की जरूरत नहीं कि बाद में आरएसएस ने इनमें से एक भी वचन का पालन नहीं किया। देश के राष्ट्रध्वज के बारे में भी उसका नजरिया नहीं बदला।

तिरंगे से असहमति और तिरंगे का विरोध आरएसएस का आचरण

ऐसा नहीं है कि यह सिर्फ कहने भर की बात थी। तिरंगे से असहमति और विरोध को आरएसएस ने अपने आचरण और व्यवहार में भी उतारा।

नागपुर के आरएसएस मुख्यालय पर पांच दशकों तक तिरंगा नहीं फहराया गया। 26 जनवरी 2001 को, राष्ट्रप्रेमी युवा दल के तीन सदस्यों द्वारा संघ मुख्यालय में घुसकर जबरदस्ती तिरंगा फहराया गया था।

14 अगस्त 2013 की प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक, “परिसर के प्रभारी सुनील कथले ने पहले उन्हें परिसर में प्रवेश करने से रोकने की कोशिश की और बाद में उन्हें तिरंगा फहराने से रोकने की कोशिश की।”

इतना ही नहीं उसके बाद इन तीनों युवाओं को गिरफ्तार भी करवा दिया। इन युवाओं पर यह मुकदमा 13 वर्षों तक चला।

बहरहाल इस घटना से कुछ ज्यादा ही छीछालेदर हुयी तो अगली साल 26 जनवरी 2002 को आधी सदी बाद संघ कार्यालय पर राष्ट्र ध्वज फहराया गया। मगर यह भी सिर्फ दिखावा है।

इसी साल मोदी के जर्मनी दौरे के समय उनके स्वागत में ब्रांडेनबर्ग गेट पर हुयी कथित भारतीयों की रैली में राष्ट्रध्वज तिरंगा नहीं भगवा ध्वज लहराया गया था। इसका वीडियो खुद प्रधानमंत्री के आधिकारिक ट्विटर अकाउंट पर पोस्ट किया गया था। यही निरंतरता आज भी जारी है।

इन दिनों जब आजादी की 75वीं सालगिरह पर प्रधानमंत्री मोदी हरेक नागरिक से अपनी प्रोफाइल फोटो पर तिरंगा लगाने को कह रहे हैं किन्तु – इन पंक्तियों के लिखे जाने तक – आरएसएस और इसके सरसंघचालक मोहन भागवत की डीपी पर अभी भी भगवा ही लटका हुआ है।

इस तिरंगा मुहिम में भी यह वितृष्णा दिखाई दे रही है। राष्ट्रध्वज के निर्धारित और वैधानिक प्रावधानों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। देश भर से ऐसी अनेक तस्वीरें सामने आयी हैं, लगातार आ रही हैं, जहां तिरंगे के ऊपर भगवा लहरा रहे हैं, अनेक मामलों में तो भाजपा का झंडा तिरंगे के ऊपर है।

राष्ट्रीय झंडा नियमों के अनुसार झंडा सिर्फ खादी के कपड़े से ही बनना चाहिए, अधिकतम अपवाद रेशमी कपड़ा हो सकता है। मगर “खून में व्यापार” वाले कुनबे ने इसे भी पॉलिस्टर का बनवा कर खुद ही बेचना शुरू कर दिया है।

तिरंगे के प्रति आरएसएस का यह रुख अस्वाभाविक नहीं है। तिरंगा, भले राष्ट्र ध्वज के रूप में भारत की संविधान सभा ने 22 जुलाई 1947 को अपनाया हो, यह उससे कोई चौथाई सदी से भी पहले से, 1921 से भारत के स्वतन्त्रता संग्राम का झंडा था। पहले इसमें केसरिया की जगह लाल रंग था। 1931 में कांग्रेस के कराची अधिवेशन में केसरिया, सफ़ेद और हरे तीन रंगों से बने इस ध्वज को सर्वसम्मति से स्वीकार किया। यह पिंगली वैंकैया की परिकल्पना थी या सुरैया तैय्यबजी की, ये विवादित विषय है जो कि अभी तक नहीं सुलझा, क्योंकि इस संबंध में ठोस ऐतिहासिक दस्तावेज मौजूद नहीं है इसलिए दावे और प्रतिदावे सामने आते रहते हैं। मगर यह सर्वमान्य तथ्य है कि यह आजादी के आंदोलन का झंडा था।

अब जो आरएसएस आजादी की इस पूरी लड़ाई से अलग रहा हो, जिसने और जिसके नायकों ने अंग्रेजों की सेवा की हो, चाकरी के लिए माफीनामे लिख-लिखकर गुहार लगाई हो, इस सबके लिए आज तलक खेद तक नहीं जताया हो (देखें; तमाशा वे कर रहे हैं जो तमाशबीन भी न थे”) उसका इस झंडे के प्रति लगाव हो ही नहीं सकता। असल में तो उसका सिर्फ इस झंडे से ही नहीं स्वतंत्रता संग्राम के हरेक हासिल से दुराव है। संविधान सभा के गठन और संविधान बनाने का संघ ने खुला विरोध किया, संविधान की ड्राफ्टिंग कमेटी के अध्यक्ष डॉ. बी आर आंबेडकर के खिलाफ निम्नतम दर्जे का विषवमन किया। उनके शूद्र जाति से होने को भी मुद्दा बनाया। भारतीय गणराज्य के राज्यों का संघ होने की फैडरल ढाँचे की अवधारणा को कभी नहीं माना। गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर के लिखे राष्ट्रगान के प्रति लगातार झूठे प्रचार की मुहिम छेड़ रखी। इस झण्डा अभियान का असली मकसद भी देरसबेर उसकी जगह पर भगवा को स्थापित करना है। यह उसी का ड्रैस रिहर्सल है।

भारत की आजादी की 75वीं सालगिरह ऐसी ही दुरूह उलट बाँसियों के उत्तरोत्तर तेज होते हुए विपरीत राग के बीच आयी है।  

इस पचहत्तरवीं साल में भले मंजिल उन्हें मिली दिख रही है जो शरीके सफर न थे। मगर देश इसे कबूल करने को तैयार नहीं है। देश के मेहनतकश इसका प्रतिकार और प्रतिवाद कर रहे हैं।

मेहनतकशों के तीन प्रमुख तथा अनेक अन्य संगठनों ने पखवाड़े भर तक आरएसएस और साम्प्रदायिक तत्वों की इस महान लड़ाई के साथ की गयी गद्दारी को जनता के बीच बेनकाब किया है और इस 14 अगस्त की अर्धरात्रि में गाँव-गाँव, शहर-शहर में रतजगा करते हुए स्वतंत्रता संग्राम के वास्तविक मूल्यों की बहाली और आजादी को हर तरह की वास्तविक आजादी में बदलने का मंसूबा बनाया है।  

बादल सरोज

सम्पादक लोकजतन, संयुक्त सचिव अखिल भारतीय किसान सभा

आजादी का अमृत महोत्सव : मध्य वर्ग में फासिज्म क्यों जनप्रिय है? | hastakshep | हस्तक्षेप

Now tricolor in hand, saffron beside: Haste to grab national symbols

करते हो मोदी से प्यार, तो तिरंगे से क्यों इंकार?

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डोनाल्ड ट्रंप से प्रेरित है मोदी का तिरंगे से प्यार

आप उस कालखंड की ख़बरें पढ़िये, जब डोनाल्ड ट्रंप सत्ता में थे। डोनाल्ड ट्रंप की राजनीति का ब्रह्मास्त्र था, अमेरिकी ध्वज। आर्मी वेटरन से लेकर स्कूली बच्चों तक, अमेरिकी ध्वज वाहक। अमेरिकी वैभव, राष्ट्राभिमान को कुछ ऐसी चालाकी से ट्रंप के रणनीतिकारों ने चिपकाया, उसे ना करने का मतलब देश के प्रति आपकी निष्ठा संदेहास्पद। नये-नवेले अनिवासी, जो अमेरिका में रहने के आकांक्षी थे, उनकी विवशता थी कि अधिक से अधिक अमेरिकी ध्वज के इस्तेमाल को दिखायें। टोपी में, टीशर्ट में, अपने घरों की छत-बाल्कनी में, या फिर कार में, यहां तक कि शरीर पर उकेरे टैटू में, अमेरिकी ध्वज दिखना चाहिए। रोज़गार नहीं है, कारोबार चौपट है, मगर अमेरिकी ध्वज दिखाओ। अमेरिकी राष्ट्रवाद जपो, और बोलो कि ट्रंप की नीतियां सही हैं।

ट्रंप शासन के दसेक साल पहले 17 सितंबर 2008 को यमन की राजधानी सना में अमेरिकी दूतावास पर हमले हुए। अमेरिकी ध्वज को गोलियों से हमलावरों ने छलनी कर दी। यमन में दूतावास बचाने के क्रम में अमेरिकी मरीन ने जो गोलाबारी की उसमें 18 मौतें हुईं, 16 लोग बुरी तरह से घायल हुए। कोर्ट मार्शल हुआ, मगर अमेरिकी ध्वज के अपमान (disgrace of the american flag) के हवाले से वो सैनिक कमांडर बचा लिये गये, जिन्होंने आम नागरिकों, औरतों-बच्चों पर फायरिंग का आदेश दिया था।

यह ट्रंप शासन काल से पहले और बाद की बात है जब यमन की राजधानी सना में 13 सितंबर 2012, 10 नवंबर 2021 को अमेरिकी दूतावास को घेरकर तोड़फोड़ व हिंसा हुई थी।

हजरत मोहम्मद पर फिल्म की वजह से हुआ अमेरिकी ध्वज का अपमान

तीन तारीख़ों को ग़ौर से देखें, तो हमलावरों ने जान-माल की क्षति के साथ-साथ अमेरिकी ध्वज का अपमान भी किया था। वजह, हज़रत मोहम्मद पर फ़िल्म थी। (American flag was insulted because of the film on Hazrat Mohammad)

मघ्यपूर्व में अमेरिकी ध्वज का अपमान होता, और उसकी राजनीति रिपब्लिकन पार्टी अपने देश में करती। ट्रंप से करते हो प्यार, तो झंडे से क्यों इंकार? यहां तक राजनीति का स्तर पहुंचा दिया था रिपब्लिकन पार्टी ने।

डोनाल्ड ट्रंप ने सेना से लेकर सिविलियन तक ध्वजारोहण की जो राजनीति छेड़ रखी थी, उसका सकारात्मक परिणाम दोबारा से सत्ता में वापसी के माइल हो नहीं सका।

क्या भारत में भी ट्रंप की राजनीति कारगर होगी?

मगर, ज़रूरी नहीं कि भारत में भी ट्रंप की राजनीति जैसा अवसान देखने को मिले। अमेरिकी वोटर के तेवर, वहां की चुनावी पारदर्शिता, अदालती आज़ादी से भारत की तुलना नहीं की जा सकती।

आज़ादी के अमृत काल में 20 करोड़ घरों पर तिरंगा फहराने का लक्ष्य रखा गया है। 13 से 15 अगस्त के बीच हर घर तिरंगा कार्यक्रम के तहत यह मान लिया गया है कि इससे मोदी समर्थक निर्धारित हो जाएंगे।

शहर, गांव, मलीन बस्तियों के 20 करोड़ घरों पर तिरंगे का तसव्वुर कर लीजिए, मगर उसका मतलब यह नहीं होता कि ये सारे आपके वोट बैंक हैं। कुछ भय से, तो कुछ प्रीत से झंडे लहराने वाले मिलेंगे। सभी दल-जमात के लोग भी इनमें शामिल होंगे। वो भी होंगे, जो डूबते सूरज से मुंह मोड़ते हैं, और शाहे वक़्त को सलाम करते हैं।

ध्वजारोहण के साथ-साथ ध्वज के अपमान की ख़बरें भी तेज़ी से वायरल हो रही हैं। लेकिन ये ख़बरें अलग-अलग चश्मे के साथ देखी-दिखाई जा रही हैं। बिहार के औराई में अशोक चक्र की जगह चांद-सितारे प्रिंट किये तिरंगे को फहराये जाने को लेकर नीतीश-तेजस्वी सरकार पर हमले तेज़ हो गये हैं। औराई पुलिस ने झंडे को उतरवाया, और प्राथमिकी दर्ज़ की है। कानपुर में किसी धार्मिक कार्यक्रम के दौरान तिरंगे से छेड़छाड़ कर उसमें भारत का नक्शा दिखाने के विरूद्ध बजरंग दल ने प्राथमिकी दर्ज़ कराई। इस कांड के हवाले से यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने धमकाया है कि जिसने भी तिरंगे का अपमान किया, उसकी ख़ैर नहीं।

इसके बरक्स यूपी कांग्रेस, उन भाजपा नेताओं की तस्वीरें ढूंढ-ढूंढ कर वायरल कर रही है, जो उल्टे-पुल्टे तरीक़े से तिरंगे फहरा रहे हैं। 11 अगस्त 2022 को यूपी कांग्रेस के ट्विटर अकाउंट से सैदपुर से भाजपा के सांसद विनोद कुमार सोनकर की तस्वीर वायरल हुई है, जिसमें उन्होंने अपने साथियों के साथ राष्ट्रध्वज उल्टा पकड़ रखा है। मगर, इसके लिए प्रदेश शासन क्या कार्रवाई करता है? यह सवाल भी महत्वपूर्ण है।

राष्ट्रध्वज फहराने की तमीज़ भी होनी चाहिए?

आप बिल्कुल मनाइये तीन दिवसीय तिरंगा दिवस, मगर क्या उस वास्ते लोगों को राष्ट्रध्वज फहराने की तमीज़ नहीं होनी चाहिए? राष्ट्रध्वज के सम्मान को लेकर बने द प्रिवेंशन ऑफ इंसल्ट टू नेशनल ऑनर एक्ट-1970′ (‘The Prevention of Insults to National Honour Act-1970) से कितने लोग वाकिफ हैं? नेहरू काल में जो हुआ सो हुआ, पिछले आठ वर्षों में मंत्री-सांसदों ने तिरंगे का कितनी बार जाने-अनजाने अपमान किया, विस्तार से बताएं, तो उसकी सूची काफी लंबी हो जाएगी। ऐसे महानुभावों में सदी के महानायक अमिताभ बच्चन, शाहरूख खान, सचिन तेंदुलकर, सानिया मिर्ज़ा, तिरंगे की प्रिंट वाली साड़ी धारण करने वाली मंदिरा बेदी तक के नाम शामिल हैं।

5 अगस्त 2022 को हिमाचल सरकार ने केंद्र से शिकायत की, कि साढ़े सत्रह लाख तिरंगे की सप्लाई होनी थी, उसके बदले 10 लाख तिरंगे आये, उनमें भी केसरिया के बदले लाल रंग और अंडाकार अशोक चक्र छपे हुए। राष्ट्रध्वज के कपड़े आड़े-तिरछे कटे हुए। कला-संस्कृति विभाग के सचिव ने केंद्र को भेजे पत्र में लिखा कि 25 रुपये के ये झंडे कोई दो रुपये में भी ख़रीदने को तैयार नहीं है। अधिकांश तिरंगे सूरत में प्रिंट हुए हैं। साउथ गुजरात प्रोसेसिंग हाउस यूनिट एसोसिएशन के अध्यक्ष जीतू वाखड़िया ने 6 जुलाई 2022 को बयान दिया था कि केंद्र सरकार 72 करोड़ तिरंगे सूरत से प्रिंट कराना चाह रही थी, जिसमें से 10 करोड़ झंडे सूरत टेक्सटाइल इंडस्ट्री वालों ने तैयार कर भेज दिये। हिमाचल में जो ख़राब प्रिंट वाले आड़े-तिरछे कटे झंडे भेजे गये, उससे आप दूसरे प्रांतों में भी तिरंगा सप्लाई में हुई गड़बड़ियों का तसव्वुर कर सकते हैं।

कब बनी राष्ट्रध्वज आचार संहिता?

आज से 20 साल पहले 2002 में केंद्रीय गृह मंत्रालय ने ‘राष्ट्रध्वज आचार संहिता‘ (भारतीय झंडा संहिता, 2002) तय किया था। 25 पेज के उस दस्तावेज़ को कोई ध्यान से पढ़े, तो उसका उल्लंघन साफ़ नज़र आयेगा। विभिन्न आकार के नौ तिरंगे के बारे में विस्तार से उस दस्तावेज़ में लिखा गया है। अधिकतम 6300 ग— 4200 मिलीमीटर (पौने तीस फीट ग —पौने चौदह फीट) और सबसे छोटा तिरंगा 150 ग —100 एमएम (5.90 इंच —ग 3.93 इंच)। आठ वर्षों में क्या सचमुच इसी साइज़ के झंडे बनने लगे? अब तो जंबो साइज वाले तिरंगों में प्रतिस्पर्धा है। इसके लिए ‘राष्ट्रध्वज आचार संहिता-2002’ में संशोधन कहीं नज़र नहीं आया।

पॉलिएस्टर वाले राष्ट्रध्वज का विरोध क्यों हुआ?

‘राष्ट्रध्वज आचार संहिता-2002’ में बहुत साफ बताया गया था कि तिरंगा बुल, कॉटन, सिल्क अथवा खादी के हों, और हस्तकरघा पर बुने गये हों। मोदी सरकार ने आचार संहिता में बदलाव कर 30 दिसंबर 2021 को आदेश जारी किया कि मशीन मेड पॉलिएस्टर धागे से तिरंगे बनाये जाएंगे। 20 जुलाई 2022 को एक बार फिर केंद्र से आदेश हुआ कि तिरंगा अब दिन-रात फहराया जा सकेगा।

पॉलिएस्टर वाले राष्ट्रध्वज का विरोध (protest against the polyester national flag) सबसे पहले कर्नाटक खादी ग्रामोद्योग संयुक्त संघ ने किया, जिसे चुप करा दिया गया। सरकार की तरफ़ से यह भी तर्क दिया गया कि कताई वाली सूती खादी झंडे की क़ीमत 2832 रुपये है। खादी भंडार में तिरंगे की यह क़ीमत सचमुच चकित कर देने वाली थी। सूती तिरंगे की अनियंत्रित क़ीमत ने समूचे राष्ट्र को पॉलिएस्टर मेड कृत्रिम झंडे की तरफ मोड़ दिया, यह दास्तां सचमुच दुख देने वाली है।

खादी त्यागिये, पॉलिएस्टर के झंडे पोस्ट ऑफिस में बेचिए। रेल व केंद्रीय कर्मचारी झंडे की मनमानी क़ीमत वसूली से गु़स्से में हैं, मगर परवाह किसे है? कॉरपोरेट के लिए तिरंगा सप्ताह, मालामाल वीकली में बदल दिया। मस्त रहिए।

कई बार मन में सवाल उठता है कि राष्ट्रवाद को प्रज्ज्वलित करने में फ्लैग फाउंडेशन ऑफ इंडिया के चेयरमैन नवीन जिंदल ने क्या सही भूमिका अदा की थी? रायगढ़ की फैक्ट्री में झंडा फहराने से रोके जाने के विरोध में नवीन जिंदल सर्वोच्च न्यायालय तक गये, और 23 जनवरी 2004 को यह आदेश हुआ कि देश का आम आदमी राष्ट्रीय झंडा फ हरा सकता है। इस घटना के 18 साल से अधिक हो चुके। एक बार इसकी समीक्षा होनी चाहिए कि इस देश में तिरंगे का सम्मान और अपमान, सदुपयोग और दुरूपयोग कितना हुआ है?

अब राज्यों में दावेदारी शुरू है कि सबसे ऊंचा राष्ट्रध्वज उसके पास है, चुनांचे टूरिस्ट यहां आयें। 23 जनवरी 2016 को रांची को 293 फीट तिरंगा फहराने का गौरव प्राप्त हुआ है। तब इसे देश का सबसे बड़ा राष्ट्रध्वज बताया गया था। 2018 में बेलगावी (बेलगांव, कर्नाटक) में 361 फीट का तिरंगा फहराकर झारखंड की लकीर छोटी कर दी गई। इन्हें कौन समझाये कि अति सर्वत्र वर्जयेत।

2 जून 2016 को हैदराबाद के हुसैन सागर तट पर 88 मीटर (291 फीट) का तिरंगा लगा। दिल्ली में 207 फीट का राष्ट्रध्वज लहरा रहा है।

आप देश को बुनियादी समस्याओं से भटकाकर, तेरा झंडा-मेरा झंडा खेल रहे हैं। मगर यही झंडा संभाले नहीं संभल रहा है। दिल्ली में 207 फीट का तिरंगा 11 बार फट चुका है। हैदराबाद के हुसैन सागर तट पर 291 फीट का राष्ट्रध्वज तेज़ हवाओं की वजह से तीन बार फट चुका है। रांची में राष्ट्रध्वज का वही हाल हुआ। बेलगाम, रायपुर, लखनऊ, पुणे, गुवाहाटी, फरीदाबाद, विशालकाय तिरंगे लगा दिये, जो तूफानी मौसम में संभाले नहीं संभल रहे। मार्च 2017 में अटारी में 80 गुणा 120 फीट का तिरंगा गिरकर फट गया, उसे अमृतसर के एक टेंट वाले से सिलवाया और दोबारा से फहरा दिया। 14 अगस्त 2017 को बडोदरा में 67 मीटर का राष्ट्रध्वज धराशायी होकर फट गया। यह ध्वज तत्कालीन सीएम विजय रूपाणी को फहराना था। सोचिये, कितनी फजीहत हुई होगी?

आप इन फटे तिरंगों की मरम्मत करते हो, फिर फहराते हो। क्या यह अपमान नहीं है?

राष्ट्रध्वज के प्रति इतना ही समर्पण भाव था, तो चेन्नई के फोर्ट सेंट जार्ज में पड़े देश के सबसे पुराने राष्ट्रध्वज की मरम्मत के बारे में फैसला लेने में बरसों क्यों लगे?

पुष्परंजन

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Modi’s love for the tricolor is inspired by Donald Trump

गालियाँ और कु-संस्कृति : अनुभूति की शक्ति मिटा देती हैं गालियां

jagdishwar chaturvedi

पुनरुत्थानवाद की खूबी है कि वह पुराने असभ्य सामाजिक रूपों, भाषिक प्रयोगों, आदतों या संस्कारों को बनाए रखता है। गालियां उनमें से एक है।

हिन्दीभाषी राज्यों में गालियां पुनरुत्थानवाद के असर के कारण आज भी असभ्यता के बर्बर रूप के तौर पर बची हुई हैं और आम सम्प्रेषण का अंग हैं।

हिन्दी में रैनेसां का शोर मचाने वाले नहीं जानते कि हिन्दी में रैनेसां असफल क्यों हुआ ?

रैनेसां सफल रहता तो हिन्दी समाज गालियों का धड़ल्ले से प्रयोग नहीं करता। बांग्ला, मराठी, तमिल, गुजराती में रैनेसां हुआ था और वहां जीवन और साहित्य से गालियां गायब हो गयीं। लेकिन हिन्दी में गालियां फलफूल रही हैं।

असभ्यता की सूचक हैं गालियां

गालियां असभ्यता की सूचक हैं। जिस साहित्य और समाज में अभिव्यक्ति का औजार गाली हो वह समाज पिछड़ा माना जाएगा। गालियां इस बात का संकेत हैं कि हमारे समाज में सभ्यता का विकास धीमी गति से हो रहा है। यथार्थ की भाषिक चमक यदि गाली के रास्ते होकर आती है तो यह सांस्कृतिक पतन की सूचना है।

अभिव्यक्ति नहीं है गालियां

हिन्दी में अनेक लेखक हैं जो साहित्य में गालियों का प्रयोग करते हैं। अकविता से लेकर काशीनाथ सिंह तक के साहित्य में गालियां सम्मान पा रही हैं। गाली अभिव्यक्ति नहीं है। यथार्थ कभी गालियों के जरिए व्यक्त नहीं होता। अधिकांश बड़े साहित्यकारों ने यथार्थ की अभिव्यक्ति के लिए कभी गालियों का प्रयोग नहीं किया।

किसी भी तर्क के आधार पर गालियों का महिमामंडन करना गलत है।

हिन्दी में कई लेखक हैं जो अपनी साहित्यिक अभिव्यक्ति के लिए गालियों का प्रयोग करना जरूरी समझते हैं। युवाओं में गालियों का सहज प्रयोग मिलता है।

इलैक्ट्रोनिक मीडिया में भी इन दिनों गालियों का प्रयोग बढ़ गया है।

सवाल उठता है हिन्दी समाज इतना गाली क्यों देता है ?

क्या हम गालियों से मुक्त समाज नहीं बना सकते ? वे कौन सी सांस्कृतिक बाधाएं हैं जो हमें गालियों से मुक्त नहीं होने देतीं ?

प्रेमचंद ने लिखा है ‘‘हर जाति का बोलचाल का ढंग उसकी नैतिक स्थिति का पता देता है। अगर इस दृष्टि से देखा जाए तो हिन्दुस्तान सारी दुनिया की तमाम जातियों में सबसे नीचे नजर आएगा। बोलचाल की गंभीरता और सुथरापन जाति की महानता और उसकी नैतिक पवित्रता को व्यक्त करती है और बदजवानी नैतिक अंधकार और जाति के पतन का पक्का प्रमाण है। जितने गन्दे शब्द हमारी जबान से निकलते हैं शायद ही किसी सभ्य जाति की ज़बान से निकलते हों।’’

गालियां क्यों देते हैं लोग?

आम तौर पर हिन्दी में पढ़े लिखे लोगों से लेकर अनपढ़ लोगों तक गालियों का खूब चलन है। कुछ के लिए आदत है। कुछ के लिए धाक जमाने, रौब गांठने का औजार हैं गालियां। पुलिस वाले तो सरेआम गालियों में ही संप्रेषित करते हैं। गालियों के इस असभ्य संसार को हम तरह-तरह से वैध बनाने की कोशिश भी करते हैं।

कायदे से हमें अश्लील भाषा के खिलाफ दृढ़ और अनवरत संघर्ष करना चाहिए। यह काम सौंदर्यबोध के साथ -साथ शैक्षिक दृष्टि से भी जरूरी है। इससे हम भावी पीढ़ी को बचा सकेंगे।

गालियों के प्रयोग के खिलाफ हमें खुली निर्मम बहस चलानी चाहिए। बगैर बहस के गालियां पीछा छोड़ने वाली नहीं हैं। बहस से ही दिमागी परतों की धुलाई होती है।

मिथ्या साहस की अभिव्यक्ति हैं गालियां

गालियां एक सस्ती, घृणित और नीच अश्लीलता है। गालियां महज यांत्रिक आघात नहीं करतीं। इनसे न तो सेक्सी बिम्ब उभरते हैं और न कामुक अनुभूतियां ही पैदा होती हैं। सेक्सी गालियां हमारी अरूचिकर और अस्वास्थ्यकर संवेदनशीलता की अभिव्यक्ति हैं। अश्लील गालियां और अश्लील मजाक के जरिए परपीड़न होता है। गंदे किस्से, चुटकुले,चालू अश्लील शब्द मानवीय सौंदर्य की गरिमा को कम करते हैं।

मानव इतिहास आदिम शरीर क्रियात्मक मानकों को कूड़े के ढ़ेर पर फेंक चुका है। लेकिन अभी भी हमारे अनेक मित्र गालियों की हिमायत कर रहे हैं। इस प्रसंग में प्रसिद्ध रूसी शिक्षाशास्त्री अन्तोन माकारेंको याद आ रहे हैं उन्होंने लिखा है – ‘‘पुराने जमाने में शायद गाली-गलौज की गंदी भाषा कमजोर शब्दावली तथा मूक-निरक्षरता के लिए सहायक की तरह अपने ही ढंग से काम आती थी। स्टैंडर्ड गाली की सहायता से आदिम- भावों को अभिव्यक्त किया जा सकता था, जैसे क्रोध, प्रसन्नता, आश्चर्य, निंदा और ईर्ष्या। लेकिन अधिकांशतः यह किसी भी भावना को व्यक्त नहीं करती थी, बल्कि असम्बद्ध, मुहावरों और विचारों को जोड़ने के साधन का काम देती थी।’’

हमें इस सवाल पर भी सोचना चाहिए कि हिन्दी में गालियां कहां से आ रही हैं?

गालियों के मामले में हम लोकल और ग्लोबल एक ही साथ होते जा रहे हैं। जाने-अनजाने असभ्यता का विनिमय कर रहे हैं। कुछ लोग भाषा को उग्र या आक्रामक बनाने के लिए गालियों का इस्तेमाल करते हैं। ऐसे लोग यह भूल जाते हैं कि हमारी जनता उग्र और आक्रामक भाषा पसंद नहीं करती। वह इसे असभ्यता मानती है।

गालियों से अभिव्यक्ति में पैनापन नहीं आता, बल्कि असभ्यता का संचार होता है। तीक्ष्णता और अभद्रता में हमें अंतर करना चाहिए।

हमें बहस-मुबाहिसों में असभ्यता से बचना चाहिए। बहस मुबाहिसे में यदि असभ्यता आ जाती है तो फिर गालियां स्वतः ही चली आती हैं। हिन्दी में स्थिति इतनी बदतर है कि एक नामी साहित्यिक पत्रिका के संपादक आए दिन अपने संपादकीय तेवरों को आक्रामक बनाने के लिए असभ्य भाषा का प्रयोग करते थे। वे भाषा में तीक्ष्णता पैदा करने के लिए ऐसा करते थेलेकिन यह मूलतः असभ्यता है। हमें अभिव्यक्ति के लिए तीक्ष्णता का इस्तेमाल करना चाहिए, असभ्य भाषिक प्रयोगों का नहीं। इन जनाब के संपादकीय अनेक मामलों में अधकचरी विद्वता और अक्षम तर्कपूर्ण शैली से भरे होते थे।

हमें विचारों की तीक्ष्णता और साहित्यिक अभिव्यंजना की अभद्रता के बीच अंतर करना चाहिए। लेखन में गाली का प्रयोग एक ही साथ गलत और सही दिखता है।

एक जमाने में महान रूसी लेखक पुश्किन ने तीक्ष्णता और अभद्रता के अंतर का विवेचन करते हुए लिखा था, ‘’गाली कभी-कभी, निश्चय ही,बिल्कुल अनुचित है। जैसे कि आपको नहीं लिखना चाहिए : ‘‘यह हांफता हुआ बूढ़ा,चश्मा लगाए हुए एक बकरा है, एक कमीना झूठा है,बदकार है,बदजात है।’’

ये व्यक्ति को दी गयी गालियां हैं। किन्तु अगर आप चाहें, तो लिख और छाप सकते हैं कि ‘‘यह साहित्यिक पुराना उपासक (अपने लेखों में) एक निरर्थक बकवासी है, हमेशा दुर्बल, हमेशा उकताने वाला, कष्टकर और बिल्कुल अहमक़ तक है।’,’’क्योंकि यहां पर कोई व्यक्ति नहीं एक लेखक है।’’

इसी प्रसंग में अन्तोन माकारेंको ने लिखा है, ‘’हमारे देश में गाली-गलौज के शब्दों का ‘‘तकनीकी’’ महत्व खत्म हो गया है, लेकिन भाषा में वे अभी भी मौजूद हैं। अब वे मिथ्या साहस को, ‘‘लौह चरित्र’’ को, निर्णायकत्व, सरलता, सुरूचि के प्रति तिरस्कार को अभिव्यक्त करते हैं। अब वे एक किस्म के ऐसे नखरे हैं, जिनका मकसद सुनने को खुश करना, उनको जीवन के प्रति सुनानेवाले के साहसिक रवैय्ये और पूर्वाग्रहहीनता को दर्शाना है।’’

साहित्य में गाली के पक्षधरों का मानना है पात्र यदि गाली देते हैं तो हमारे लिए उससे बचना संभव नहीं है। इस प्रसंग में यही कहना है कि गालियां साहित्य नहीं हैं। गालियां जीवन का यथार्थ भी नहीं हैं। गालियां महिलाओं का अपमान हैं और बच्चों के लिए हानिकारक हैं। गालियों के प्रति हमें लापरवाह नहीं होना चाहिए। गालियों को साहित्य में रखकर हम उन्हें दीर्घजीवी बना रहे हैं। उन्हें मूल्यबोध प्रदान कर रहे हैं। विरासत के रूप में गालियां हमारे समाज और संस्कृति की गंभीर क्षति कर रही हैं।

प्रेमचंद ने लिखा है ‘‘ गाली हमारा जातीय स्वभाव हो गयी है।’’,’‘गालियों का असर हमारे आचरण पर बहुत खराब पड़ता है। गालियाँ हमारी बुरी भावनाओं को उभारती है और स्वाभिमान व लाज-संकोच की चेतना को दिलों से कम करती हैं जो दूसरी क़ौमों की निगाहों में ऊँचा उठाने के लिए जरूरी है।’’

जब कोई व्यक्ति गालियों का इस्तेमाल करता है तो पढ़ने या सुनने वाला किसी सापेक्ष शब्द को नहीं सुनता बल्कि वह गाली के जरिए उसमें अन्तर्निहित सेक्स के अर्थ तक पहुँचता है। इस दुर्भाग्य का मूल सार यह नहीं है कि सेक्स का राज पाठक या श्रोता के सामने खुल जाता है, बल्कि यह कि वह राज अपने सबसे ज्यादा कुरूप, मानवद्वेषी तथा अनैतिक रूप में उदघाटित होता है। ऐसे शब्दों का बारम्बार होने वाला उच्चारण या लिखित प्रयोग पाठक या श्रोता को सेक्सी मामलों पर अत्यधिक ध्यान देने की, विरूपित दिवास्वप्न देखने की आदत पैदा करता है। इससे लोगों में अस्वास्थ्यकर रूचियों का विकास होता है।

अधिकांश गालियां स्त्रीकेन्द्रित हैं और उनके गुप्तांगों को लेकर हैं या उसके विद्रूपों को लेकर हैं। इससे सामाजिक हिंसा में बढ़ोतरी होती है। साथ ही यह भावना पैदा होती है कि औरत इस्तेमाल की चीज है। अपमानित है। मादा है।

आश्चर्यजनक बात है कि हमारे स्कूली पाठ्यक्रमों से लेकर बड़ी कक्षाओं तक गालियों के खिलाफ कोई पाठ नहीं है। सारे देश के बुद्धिजीवी आराम से आए दिन सिलेबस बनाते हैं और पढ़ाते हैं। लेकिन गालियों के बारे में कभी क्लास नहीं लेते। कभी बोलते नहीं हैं। उलटे यह देखा गया है कि जिस बच्चे को डांटना होता है उस पर गालियों की बौछार कर देते हैं।

गालियों का प्रयोग सत्य को स्थगित कर देता है। हम जब गाली देते हैं या गाली लिखते हैं तो उस समय हमारी नजर गाली पर होती है सत्य पर नहीं,हम गाली में उलझे होते हैं। गालियों के प्रयोग से वर्तमान साफ नजर नहीं आता। गालियों का प्रयोग विचारों और यथार्थ को एक नई भंगिमा में तब्दील कर देता है। एक विलक्षण किस्म के पाठ की सृष्टि करता है। वह अवधारणाओं के अर्थ और यथार्थ के अर्थ को संकुचित करता है। अर्थ संकुचन गालियों की पूर्वशर्त है। यह य़थार्थ को उसके स्रोत से काट देता है। जबकि लेखक यही दावा करता है कि वह वास्तविकता दरशाने के लिए गालियों का प्रयोग कर रहा है। गालियों के साहित्यिक प्रयोग को स्वाभाविक अभिव्यक्ति के रूप में ही पेश किया जाता है। जबकि सच इसके एकदम विपरीत है।गालियों का प्रयोग अर्थविस्तार नहीं करता उलटे अर्थसंकोच करता है। जब कोई लेखक यथार्थ को गालियों में खींच लाता है तो वह यथार्थ के साथ जुड़े बुनियादी तर्कों से उसे अलग कर देता है। यथार्थ के सत्य और असत्य विकल्पों की संभावनाएं खत्म कर देता है। गालियों का प्रयोग यथार्थ की बहस को वर्तमान काल में ले आता है। अब उसके लिए वर्तमान का जीवंत यथार्थ बेमानी होता है। गालियों का प्रयोग वर्तमान यथार्थ को शरणार्थी बना देता है।

वैसे अधिकांश रचनाओं में एकाधिक अर्थ की संभावनाएं होती हैं लेकिन गाली के प्रयोग वाले अंशों में एक ही अर्थ होता है। एकाधिक अर्थ या भिन्न अर्थ की संभावनाओं को गालियां नष्ट कर देती हैं। गालियों का प्रयोग सामाजिक गैर -बराबरी को बनाए रखता है। सामाजिक हायरार्की को आप इसके प्रयोगों के जरिए अपदस्थ नहीं कर सकते। गालियों में परिवर्द्धन और सम्बर्द्धन संभव नहीं है वे जैसी बनी थीं वैसी ही चली आ रही हैं। यह सिलसिला सैंकड़ों सालों से चला आ रहा है। गालियों के जरिए युगीन विचारों को नहीं पकड़ सकते। हिन्दी में जिसे दिल्लगी कहते हैं वह भी गालियाँ है।

गालियों को प्रेमचंद ने ‘जातीय कमीनेपन’ और ‘नामर्दी’ का सबूत कहा

प्रेमचंद ने दिल्लगी को गालियों से कुछ कम घृणित माना है। गालियों को उन्होंने ‘जातीय कमीनेपन’ और ‘नामर्दी’ का सबूत कहा है। साथ ही इसे ‘जातीय पतन की देन’ माना है। उनके ही शब्दों में गालियां ‘’जातीय पतन दिलों की इज़्ज़त और स्वाभिमान की चेतना को मिटाकर लोगों को बेग़ैरत और बेशर्म बना देती है।’’ गालियां अनुभूति की शक्ति मिटा देती हैं।

जगदीश्वर चतुर्वेदी

लोकतंत्र और साहित्य का अंतस्संबंध

हमारे जैसे लोग जिन्होंने अपनी पूरी जवानी जेल और सड़क पर गुज़ारी है, आज कांग्रेस को क्यों चाहते हैं ?

chanchal bhu

यह पोस्ट अपने अग्रज, समाजवादी चिंतक, ITM  विश्वविद्यालय ग्वालियर के कुलाधिपति भाई Rama Shankar Singh के लिए है। कल उन्होंने पूछा था –

“बाक़ी सब ठीकई है जो है सो हइयै पर चंचल जी यह बताया जाये कि ४७ के बाद से लगातार २०१४ तक   कांग्रेस ने अपने उन विपक्षी सत्याग्रहियों के साथ भयानक दुर्व्यवहार क्यों किया जिनकी शानदार भूमिका आज़ादी की लड़ाई में थी।”

यह सवाल अलग-अलग तरीक़ों, अलग-अलग ज़ुबानो में अलग-अलग मौक़ों पर हमसे पूछा जाता रहा है। 

 रमा भाई हमारे शुभेक्षु हैं, उनका प्यार दुलार हम लोंगो को मिलता रहा है, सो उन्होंने बहुत बचाते हुए यह सवाल उठाया। रमा भाई ने यह सवाल प्रियंका गांधी की गिरफ़्तारी पर लिखे गए हमारे पोस्ट पर की है।

रमा भाई की इसी टिप्पणी के नीचे एक साहब और हैं, मनीष जी, उन्होंने सीधे-सीधे हमसे हमारी क़ीमत ही पूछ लिया – कांग्रेस ने कितने में ख़रीदा है ? यह सवाल दो मायने में दुरुस्त है एक – एक तरफ़ जब एक पूरा तंत्र कांग्रेस का इतिहास मिटाने पर तुला है, कांग्रेस के पास कोई जवाब देने वाला नहीं है ? ये कांग्रेसी अपना इतिहास तक नहीं जानता, कमबख़्त सालों साल बैठ कर मलाई खा रहा है और जब ऊँघता है तो पूछता है – कांग्रेस ने हमें दिया क्या ?

2012 से कांग्रेस का बचाव कर  रहे हो, ग़लीज़ गालियों के बीच से गुजरना पड़ रहा है तुम्हें मिला क्या है ?

हमने पहले हिस्से का जवाब नहीं दिया और सच बात है की हमारे पास उसका जवाब  है भी  नहीं, क़ि कांग्रेसी चुप क्यों रहता है ? दूसरे खंड का जवाब दिया है – हाँ हमें मिला है कांग्रेस से। “खुद मुखतारी “। मतलब आज़ादी। आज़ादी का वो मतलब नहीं, जो तुम आसानी से समझ बैठे हो – विदेशी  हुकूमत को हटा कर देसी सरकार बनाना। आज़ादी का मतलब मुकम्मिल आज़ादी। शोषण और दबाव मुक्त माहौल। हम ही उत्पादक हो, हम ही उपभोक्ता हों, बीच में कोई बिचौलिया न हो।

गांधी विचार की लम्बी यात्रा में केवल  निर्गुन आंदोलन नहीं रहा है, क्रांतिकारी रचनात्मक आंदोलन को कांग्रेस ने ढोया है। ( इस कांग्रेस में राजेंद्र प्रसाद, सरदार पटेल या राज गोपालाचारी नहीं  रहे, इसी कांग्रेस में  बाचा खान, पंडित नेहरु, सुभाष चंद बोस   डॉक्टर लोहिया, जय प्रकाश नारायण, डॉक्टर ज़ाकिर हुसैन, सुचेता कृपलानी भी हैं ) अंग्रेजों भारत छोड़ो, के साथ चरखा भी चला है, मैकाले की  कलम घिस्सू शिक्षा नीति का बहिष्कार ही नहीं हुआ है, काशी विद्यापीठ,   जामिया मिल्लिया इसलामिया  जैसे संस्थानों के निर्माण के लिए कांग्रेस ने भीख माँग कर नयी पीढ़ी का निर्माण किया है।

हज़ारों हज़ार साल से अछूत बना कर समाज के एक  बड़े हिस्से को बाहर फेंक दिया गया था, उसे कांग्रेस ने  उसे ऊपर उठाया है। बग़ैर तस्वीर चिपकाए मासूम बच्चों को कलम के साथ तकली भी पकड़ाया है। मित्र ! यह सब हमें मुफ़्त में मिला है, ख़रीदना नहीं पड़ा है, न लड़ना पड़ा है। कांग्रेस ने कोई एहसान भी नहीं  जताया  क़ि “यह मुफ़्त“ में दे रहा हूँ।

यह रही हमारी तस्वीर। उस कांग्रेस को नहीं मालूम था क़ि  “फ़र्ज़ “ और  “कर्तव्य“ को फ़्री फंड बोल कर ग़ुलाम भी बनाया जा सकता है।

जी हाँ कांग्रेस ने ख़रीदा है और हम और क़ीमत की लालच में एक लबार के पीछे भागे जा रहे हैं। और कांग्रेस के साथ वाले से सवाल पूछा जा रहा है, कांग्रेस ने दिया क्या है ? 

हम रमा भाई के गम्भीर सवाल पर आते हैं।

रमा भाई का इशारा है कांग्रेस और समाजवादियों के बीच का रिश्ता वह भी 1947 से 2014 के बीच। कांग्रेस का सत्याग्रहियों के साथ भयानक दुर्व्यवहार क्यों किया, जिनकी आज़ादी की लड़ाई में शानदार भूमिका थी ? “

रमा भाई के बहाने से हम अपने उन तमाम शुभेक्षुओं से मुख़ातिब हैं जो अक्सर हमसे पूछते हैं ताउम्र ( वही आप वाली सीमा रेखा, रमा भाई !) 2014 तक तुम कांग्रेस के विरोध में रहे, मार खाते रहे, जेल जाते रहे अचानक कांग्रेस के समर्थन में कैसे आ गये ? यानी कांग्रेस और समाजवादियों के बीच का रिश्ता ? इस सवाल को हल करने के लिए हम इसी भारतीय ज़मीन से निकली, सबसे पुरानी और सबसे ज़्यादा प्रचलित कहानी का तीनों मशहूर हिस्सा दे  रहे हैं। 

मूल कहानी है- कछुआ और ख़रगोश के बीच दौड़ की प्रतियोगिता में ख़रगोश अपनी जीत पर आश्वस्त है, रास्ते में सो जाता है, जीतता कछुआ है।    

पाकिस्तान के मशहूर  व्यंग्यकार इब्ने इंशा लिखते हैं – कछुआ जब गंतव्य तक पहुँचा तो उसने देखा – पत्थर के एक टीले पर एक ख़रगोश का बच्चा बैठा, टुकुर-टुकुर ताक रहा है। कछुए ने ख़रगोश से पूछा – बच्चे ! तुमने किसी ख़रगोश को इधर आते देखा है ? हमसे दौड़ने की बाज़ी लगा रखा है। ख़रगोश का बच्चा मुस्कुराया –  वो मेरे दादा थे, पिता जी को जो समझा के गये, मरते  समय पिता जी ने वही बताया  कि  –  एक दिन एक ख़रगोश यहाँ आएगा, उसका कान काट लेना और बता देना कि तुम हार गये हो। इतना सुनते ही ख़रगोश ने अपनी गरदन  खोल में डाल ली और आज तक अपने खोल में छिपा बैठा है।

तीसरा  वर्जन डॉक्टर ज़ाकिर हुसैन का है – लिखते हैं – नदी के किनारे एक वृद्ध कछुआ मुद्दतों से वही एक जगह पड़ा कराहता रहता है। गरदन  निकालता है, नदी के किनारे की झाड़ी को देखता है। दो बूँद आंसू गिरा कर फिर अपनी खोल में चला जाता है। रोने और चुप पड़े रहने का सबब पूछने पर उसने बताया – कछुआ और ख़रगोश में बाज़ी लग गई और दौड़ शुरू हुई।  ख़रगोश ने कुलाँच भरा ही था कि एक झबरा  कुत्ता झपट्टा मारा और ख़रगोश की गरदन मरोड़ कर, लहूलुहान कर दिया और  जबड़े  में फँसाए उसे लेकर अपने मालिक के पास  चला गया। आज भी वह कछुआ वहीं है। ख़रगोश का नाती-कभी कभी उस झाड़ी में दिख जाता है।

रमा भाई ! कांग्रेस और समाजवादी के बीच यही रिश्ता रहा। अलग-अलग भाष्य, अलग-अलग तेवर। आज देखें तो तीनों वर्जन सही लगते हैं। दोनों के बीच मात्र “गति“ की प्रतिस्पर्धा रही।

पहला समाजवादी सुभाष चंद बोस और बापू के बीच। केवल गति को लेकर जिच है। उद्देश्य दोनों का एक है। सुभाष चंद बोस ने हिंसक क्रांति को ज़्यादा गतिशील समझा, गांधी जी ने अहिंसक क्रांति के ज़रिए आने वाली सत्ता में  मज़बूती और स्थायित्व देखा। कालांतर में नेता जी ने स्वीकारा भी। 

समाजवादी निकले, अपना बड़ा हिस्सा वही, छोड़ कर। कांग्रस और समाजवादी  सिद्धांत या नीतियों में कोई फ़र्क़ नहीं है अगर कोई जिच रही तो गति को लेकर। 

बहरहाल हम या हमारे जैसे लोग जिन्होंने अपनी पूरी जवानी जेल और सड़क पर गुज़ारी है, कांग्रेस के कार्यकाल में, आज वे कांग्रेस को क्यों चाहते हैं ? केवल एक बड़ी  वजह है –  सवाल उठना बंद हो जाएगा। राजनीति तिजोरी के हवाले हो जाएगी। मुल्क बंदूक़ के साये में हाँफेगा।

कांग्रेस केवल सत्ता नहीं थी, पीढ़ियों को राजनीति के दायरे में खड़ा किया।

रमा भाई ! 77 के बाद एक माम नहीं उठा, जिसे  राजनीति ने उठाया हो। कांग्रेस के साथ तो हम अपने स्वार्थ के लिए हैं और हमारा स्वार्थ है – कल कांग्रेस सत्ता में आ जाय, हम फिर सड़क पर तखती लिए खड़े मिलेंगे – “जो सरकार निकम्मी है वो सरकार बदलनी है।“ एवज़ में लाठी चार्ज होगा, पानी के फव्वारे फेंके जाएंगे, आंसू गैस के गोले फेंके जाएंगे, जेल की तनहाई मिलेगी। सरकार बताएगी नहीं क़ि ये देशद्रोही हैं, ये टुकड़े-टुकड़े गैंग हैं, आंदोलनजीवी हैं, अर्बन नक्सल हैं। इसकी जगह सरकार पूछेगी – कौन हैं ये लोग ? इनकी माँग क्या है ? इन्हें रिहा किया जाय, बात चीत का न्योता दो।

बुलडोज़र नहीं रमा भाई !

हम ख़ौफ़ में हैं, हमारी एक पीढ़ी बधिया हो चुकी है। “न“ बोलना बंद हो गया है। बाक़ी कल 

Chanchal BHu

वरिष्ठ पत्रकार, समाजवादी चिंतक और बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष चंचल जी की फेसबुक टिप्पणी साभार

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एक बड़ी चुनौती प्लास्टिक कचरे और पॉलिथीन पर नियंत्रण

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स्वतंत्र टिप्पणीकार निर्मल रानी का लेख “पॉलिथीन व प्लास्टिक कचरे पर नियंत्रण : एक बड़ी चुनौती” लगभग ग्यारह वर्ष पूर्व हस्तक्षेप पर जनवरी 9, 2011 को प्रकाशित हुआ था। इन ग्यारह वर्षों में प्लास्टिक कचरे पर नियंत्रण पर नियंत्रण तो नहीं हुआ, हां इतना अवश्य हुआ कि सिंगल यूज प्लास्टिक पर प्रतिबंध, फोटो सेशन और प्रचार का जरिया बन गया। पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय द्वारा अब तक का सबसे लंबा समुद्र तटीय स्वच्छता अभियान ‘स्वच्छ सागर, सुरक्षित सागर’ अभियान (Swachh Sagar Surakshit Sagar) बीती 03 जुलाई को शुरू हुआ। 75 दिन तक चलने वाले इस अभियान का समापन आगामी 17 सितंबर, 2022 को ‘अंतरराष्ट्रीय तटीय स्वच्छता दिवस’ (International Coastal Cleanup Day 2022) के अवसर पर होगा। इस अवसर पर निर्मल रानी का पुराना लेख कुछ संपादन के साथ पुनर्प्रकाशित…

पॉलिथीन व प्लास्टिक पर प्रतिबंध की कागज़ी घोषणा

देश के कई राज्यों में पॉलिथीन व प्लास्टिक के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाने की कागज़ी घोषणा (Paper announcement of ban on polythene and plastic) की जा चुकी है। इन में हरियाणा तथा हिमाचल प्रदेश जैसे राज्य और चंडीगढ़ जैसे केंद्र शासित प्रदेश भी शामिल हैं। सरकार द्वारा इस लिए पॉलिथीन तथा प्लास्टिक आदि के सार्वजनिक प्रयोग पर प्रतिबंध (Ban on public use of polythene and plastic etc.) लगाए जाने के प्रयास किए जा रहे हैं क्योंकि इनके कचरों का समूल नाश नहीं हो पाता। और यह मिट्टी की उर्वरक क्षमता को अत्यधिक प्रभावित करते हैं। इसके  कारण हमारे पर्यावरण पर दुष्प्रभाव पड़ता है।

इसके अतिरिक्त शहरों व क़स्बों में बहने वाले नालों व नालियों में भी यही अनाश्य कचरा इनके जाम होने का कारण बनता है। परिणामस्वरूप बरसात के दिनों में यही कचरा शहरों में बाढ़ जैसे हालात पैदा कर देता है। इन्हीं हालात से बचने के लिए सरकार प्राय: इस विषय पर विचार करती रहती है कि क्यों न पॉलिथीन व प्लास्टिक के सार्वजनिक रूप से होने वाले बेतहाशा प्रयोग को प्रतिबंधित कर दिया जाए।

देश के जिन जिन राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों में पॉलिथीन पर प्रतिबंध (Ban on polythene in the states) लगाने की बात होती है, वहां पहले रेहड़ी, ठेलों तथा रोज़मर्रा के प्रयोग में आने वाले सामानों की दुकानों पर आम ग्राहकों को प्राप्त होने वाले पॉलिथीन कैरी बैग पर सर्वप्रथम प्रतिबंध (ban on polythene carry bags) लगा दिया जाता है।

क्या केवल कैरी बैग को प्रतिबंधित करने से कचरे को फैलने से रोका जा सकता है?

ऐसी ख़बरें भी आती हैं कि पॉलिथीन प्रतिबंध राज्यों में पॉलिथीन बैग का इस्तेमाल करने वाले ग्राहकों को भारी जुर्माना भुगतना पड़ता है तथा वह दुकानदार जिसने कि ग्राहक को उक्त बैग मुहैया कराया है उसे और भी अधिक जुर्माने का भुगतान करना पड़ता है।

इसमें कोई दो राय नहीं कि पॉलिथीन व प्लास्टिक का कचरा हमारी धरती, पर्यावरण, स्वास्थ्य आदि सभी के लिए अत्यंत हानिकारक है। परंतु क्या मात्र कैरी बैग अथवा आम लोगों के हाथों में लटकने वाले प्लास्टिक थैलों को प्रतिबंधित करने मात्र से ऐसे अनाश्य कचरे को फैलने से रोका जा सकता है?

क्या हमारे देश में पॉलिथीन तथा प्लास्टिक पैक के बदले में किसी ऐसी वस्तु की खोज की जा चुकी है जो हमें पूरी तरह से अनाश्य कचरों से मुक्ति दिलवा सके?

दरअसल हमारे देश में पॉलिथीन व प्लास्टिक पैक में आने वाले सामानों की सूची इतनी लंबी है कि उसे गिन पाना शायद संभव ही नहीं है। खासतौर पर आम लोगों के दैनिक जीवन में प्रयोग होने वाली तमाम वस्तुएं ऐसी हैं जो केवल प्लास्टिक या पॉलिथीन पैक में ही बाज़ार में उपलब्ध होती हैं। उदाहरण के तौर पर ब्रेड, दूध, दही, पनीर, लस्सी, मिनरल वॉटर की बोतलें, लगभग सारे ही ब्रांड के शीतल पेय पदार्थ, शराब की बोतलें, चिप्स, नमकीन, बिस्कुट, बीड़ी के बंडल, गुटखा, शैंपू, साबुन, चाय की पत्ती के पैकेट, वाशिंग पाऊडर, टुथपेस्ट, क्रीम, रिफिल, बॉलपेन, दवाईयों की पैकिंग, इंजेक्शन, सिरिंज, फ्लेक्स, कंप्यूटर कचरा जैसे सीडी, डीवाडी  लॉपी आदि, मोबाईल का कचरा, बैटरी का कचरा, सीमेंट बैग, आटा व बेसन बैग, यूरिया बैग आदि ऐसी न जाने कितनी वस्तुएं हैं जो अनाश्य अवशिष्ट के रूप में हमारे पर्यावरण को अत्यधिक प्रभावित करती हैं।

सवाल यह है कि क्या देश की कोई भी सरकार इन पर भी पूर्ण प्रतिबंध लगाने की बात कभी सोच सकती है? और यदि उपरोक्त वस्तुओं के कचरे को नियंत्रित करने या उन्हें प्रतिबंधित करने के समुचित उपाय नहीं किये जाते तो क्या मात्र साधारण व गरीब आदमी द्वारा प्रयोग में लाए जाने वाले कैरी बैग पर प्रतिबंध लगने मात्र से इस समस्या पर काबू पाया जा सकता है?

हमारे देश में प्राय: आम आदमी यह कहता सुनाई देता है कि देश के कानून व कानूनी बंदिशें संपन्न व अमीर लोगों के लिए नहीं बल्कि साधारण व गरीब लोगों के लिए हैं। पॉलीथिन को प्रतिबंधित किए जाने वाले कानून को लेकर भी आम लोगों द्वारा कुछ ऐसी ही व्या या की जा रही है।

आज आम आदमी यह सवाल कर रहा है कि पॉलिथीन व प्लास्टिक कचरा फैलाने की शुरुआत सूर्योदय होने से पूर्व ही हज़ारों करोड़ थैलियों को आम लोगों के घरों तक पहुंचाने का कारण देश का डेयरी मिल्क व्यापार ही बनता है। अब आखिर इस पर नियंत्रण पाने के क्या उपाए हो सकते हैं और कौन सी सरकार इन्हें प्रतिबंधित कर सकती है। क्योंकि  इस कारोबार में अधिकांशत: देश की तमाम राज्य सरकारें भी सांझीदार बनी हुई हैं।

इसी प्रकार गुटखा व्यापार भी देश के अति संपन्न व उद्योगपति घरानों के हाथों में है, जिनके हितों की अनदेखी कर पाना आसान बात नहीं है।

पाठकों को याद होगा कि देश के एक केंदीय स्वास्थ्य मंत्री ने जब देश के युवाओं के स्वास्थ्य के मद्देनज़र गुटखा जैसी नुकसानदेह वस्तु पर प्रतिबंध लगाने तथा इसके उत्पादन को बंद करने की बात सोची थी तथा इस सिलसिले में अपने विचार व्यक्त किए थे, बताया जाता है कि उस समय देश की ताकतवर गुटखा उत्पादक लॉबी ने उस मंत्री का मंत्रालय तक बदलवा दिया था।

लगभग यही हाल शराब तथा चाय की पत्ती व डिटर्जेंट पाऊडर एवं शैंपू आदि के पाऊच उत्पादन को लेकर है।

संक्षेप में यह समझा जा सकता है कि आम लोगों के दैनिक जीवन में प्रयोग में आने वाली रोज़मर्रा की चीज़ों के उत्पादन से जुड़े लोग तथा औद्योगिक घराने कोई साधारण लोग बिल्कुल नहीं हैं। लिहाज़ा हो न हो देश की सरकारें इन बड़े घरानों के हितों को भी ध्यान में रखकर ही कोई कानून बनाती हैं या निर्देश जारी करती है। ऐसे में प्रश्र यह है कि आखिरकार हमें इन समस्याओं से निजात कैसे मिल सकती है और हम अपने पर्यावरण व स्वास्थ्य को इन प्रदूषित व अनाश्य कचरों से होने वाले नुकसान से कैसे बचा सकते हैं। इसके लिए हमें हिमाचल प्रदेश जैसे छोटे से पहाड़ी राज्य से बहुत कुछ सीखने की ज़रूरत है।

हिमाचल प्रदेश देश के उन राज्यों में शामिल है जिसने पॉलिथीन व प्लास्टिक के इस्तेमाल पर पूर्ण प्रतिबंध लगा रखा है। इसके बावजूद भी वहां पाए जाने वाले प्लास्टिक कचरे, जो कि मजबूरीवश अथवा पर्यटकों के कारण पाए जाते हैं, उन्हें भी समाप्त करने का माकूल प्रबंध सरकार द्वारा किया गया है।

सर्वप्रथम तो यह कि हिमाचल प्रदेश की आम जनता ने यह स्वीकार व महसूस कर लिया है कि अनाश्य कचरे उनके पहाड़ी सौंदर्य, पर्यावरण तथा स्वास्थ्य के लिए अत्यंत हानिकारक हैं। अपनी इसी जागरुकता के चलते वहां के आम लोग यह कोशिश करते हैं कि पॉलिथीन व प्लास्टिक जैसे अनाश्य कचरे को स्वयं इधर-उधर फेंकने से परहेज़ करें। उधर प्रदेश सरकार द्वारा 3 रुपये प्रति किलो की दर से ऐसे कचरे को खरीदने की व्यवस्था की गई है। इसके अतिरिक्त वहां कई जगहों पर ऐसे प्लांट लगाए गए हैं जहां इन कचरों को रिसाईकल किया जाता है। इन कचरों का इस्तेमाल हिमाचल प्रदेश में सड़कों के निर्माण में किया जाता है। ऐसे कचरे को गलाकर सड़कों के निर्माण में इस्तेमाल करने से सड़कें मज़बूत बनती हैं। इन सब के अतिरिक्त सरकार की ओर से सख्ती भी बरती जाती है कि कोई व्यक्ति ऐसी अनाश्य पैकिंग का प्रयोग न करने पाए।

वैसे तो पिछले दिनों सर्वोच्च न्यायालय ने भी इस विषय को गंभीरता से लेते हुए गुटका पैकिंग पॉलिथीन व प्लास्टिक के पाऊच में न किए जाने के आदेश जारी किए थे। परंतु सर्वोच्च न्यायालय के इस आदेश के बावजूद आज भी बाज़ार में प्लास्टिक पाऊच में ही गुटखा बिकते देखा जा रहा है। ज़ाहिर है उच्चतम न्यायालय के आदेश का पालन करना तथा इसको अमल में लाना शासन व प्रशासन का ही काम है।

ऐसी विरोधाभासी परिस्थितियों में हमें साफ नज़र आता है कि किसी ऐसे विषय को लेकर दोहरे मापदंड अपनाया जाना ही हमारे व हमारे समाज के लिए, हमारे स्वास्थ्य तथा पर्यावरण के लिए घातक साबित होता है।

इन हालात में हम इसी निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि ऐसे अनाश्य कचरे को लेकर हम स्वयं सचेत व जागरूक बनें। अनाश्य कचरे से होने वाले नुकसान (damage caused by waste) तथा इनके दूरगामी परिणामों को खुद अच्छी तरह समझें तथा इनके समूल नाश का स्वयं पुख्ता उपाय ढंूढें। हमारी लापरवाही तथा अज्ञानता ही हमारे लिए पर्यावरण असुंतलन,बाढ़,बीमारी तथा अन्य कई प्रकार की तबाही का कारण बनती है।

जहां तक हो सके हम अपने घरों में ऐसे अनाश्य कचरों को एकत्रित कर उन्हें स्वयं या तो समाप्त करें या रिसाईकल होने हेतु उसे किसी कबाड़ी की दुकान तक पहुंचाने के उपाय करें। नाली, नालों व सड़कों पर न तो स्वयं ऐसे कचरे फेंके न ही दूसरों को फेंकने दें। हम इस बात की प्रतीक्षा कतई न करें कि सरकार इन अनाश्य कचरों पर स्वयं प्रतिबंध लगाएगी। हमें स्वयं जागरुक होना होगा तथा ऐसी नकारात्मक परिस्थितियों से स्वयं ही जूझना होगा।

A big challenge is the control of plastic waste and polythene

आजादी का अमृत महोत्सव : भाजपा का दायरा सिकुड़ गया है, विपक्ष खिल उठा है

nitish kumar tejashwi yadav

आजादी का अमृत महोत्सव : बिहार में फासीवाद के विकल्प का नया संधान

Arun Maheshwari on Nitish Phenomenon

आजादी की 75वीं सालगिरह का सप्ताह और 9 अगस्त, अर्थात् अगस्त क्रांति का दिन‘भारत छोड़ो’ का नारा तो गांधीजी ने दिया था, पर बिहार की धरती पर इस आंदोलन को एक ऐतिहासिक क्रांति का रूप दिया था कांग्रेस सोशिलिस्ट पार्टी के नेता जयप्रकाश नारायण, राम मनोहर लोहिया ने। उसी बिहार में इस बार 9 अगस्त के दिन ही जो घटा है, आज के भारत की राजनीतिक परिस्थिति में इसका इसका कितना भारी महत्व है, इसे बहुत सहज ही समझा जा सकता है।

दायरा सिकुड़ गया है भाजपा का, विपक्ष खिल उठा है

अभी पंद्रह दिन पहले ही ‘इंडियन एक्सप्रेस’ में प्रताप भानु मेहता ने एक लेख में कहा था कि भारत में विपक्ष की नगण्यता (littleness) भाजपा को विशाल (big) बना देती है। अब नीतीश कुमार के फैसले के बारे में ‘टेलिग्राफ’ की खबर की एक सुर्खी है, — ‘भाजपा का दायरा सिकुड़ गया है, विपक्ष खिल उठा है’।

राजनीति में असंभव शब्द का सचमुच कोई स्थान नहीं

सचमुच राजनीति में असंभव शब्द का कोई स्थान नहीं होता है। जैसे आदमी की फितरत है कि वह चीजों को बार-बार बनाने, बिगाड़ने के जरिये ही उन पर अपना अधिकार कायम करता है। वैसे ही राजनीति संभावनाओं का खेल है, जिसमें विकल्पों की तलाश की प्रक्रिया में अनोखे ढंग से उपस्थित विकल्पों के साथ ही अनुपस्थित, अर्थात् न दिखाई देने वाले विकल्पों की भी भूमिका होती है।

राजनीति में विचारों का अंत नहीं, हमेशा समय के साथ एक प्रवाह होता है, अर्थात् लंबे अंतरालों के बाद भी विचारधाराएं नए रूप में, नई भूमिका के साथ सामने आती हैं। विचार आवर्त्तित होते हैं, पर निश्चित तौर पर नए रूप में। इस प्रवाह के कारण ही अनिवार्य तौर पर नया रूप पुराने से अलग होता है।

राजनीति का सत्य यही है कि इसमें कभी भी कोई चीज खुद को हूबहू नहीं दोहरा सकती है।

बिहार की सन् ’42 की प्रबल समाजवादी धारा लगभग पचास साल के अंतराल के बाद मंडलवाद के रूप में आवर्त्तित हुई थी। उसे ही अब फिर लगभग अढ़ाई दशक के बाद के तमाम घात-प्रतिघातों के उपरांत आज के भारत में जनतंत्र और संघीय ढांचे की रक्षा की लड़ाई के रूप में उतने ही प्रबल रूप में उभरते हुए देखना किसी को भी अतिरंजना लग सकता है।

पर सच्चाई यह है कि विकल्पहीन मान लिये जा रहे राजनीतिक विश्वासों के इस काल में विकल्प के किसी भी संकेत को चमत्कारी, और इसीलिए अविश्वसनीय मानना ही स्वाभाविक है। आज के विपक्ष की तुच्छता के समय में, बिहार में नीतीश की सरकार 242 सदस्यों की विधान सभा में भाजपा के 77 सदस्यों के मुकाबले 164 सदस्यों के साथ एक प्रतिरोध के ऐसे मजबूत गढ़ के रूप में सामने आना, जिसे न मोदी के पास मौजूद अनाप-शनाप धन की ताकत और न अमित शाह की ईडी की करतूतें ही डिगा सकती है, कैसे कोई इस पर यकीन कर सकता है !

अभी एक हफ्ता भी नहीं बीता था जब पटना में भारी अहंकार के साथ भाजपा के अध्यक्ष नड्डा ने भारत में सभी क्षेत्रीय दलों के अस्तित्व को खत्म करके देश में जनतंत्र और संघीय ढांचे के सामने एक नग्न चुनौती पेश की थी। हमारी राजनीति ने उनका उत्तर खोज निकालने में जैसे जरा भी देर नहीं की। ऐसा लगता है जैसे नड्डा के झटके ने अपने-अपने आहत अहम् से विक्षिप्त कटे हुए समाजवादियों को एक झटके में उनके अस्तित्व के यथार्थ से जोड़ दिया। जो यह राजनीति और विचारधारा के संबंध को नहीं समझते, वे कभी इस घटना को भी नहीं समझ सकते हैं।

राजनीतिक दलों का अस्तित्व मूलतः विचारधाराओं पर आधारित होता है। राजनीति को शुद्ध व्यक्तिगत स्वार्थों को साधने की अवसरवादी कला मानने वाले इसे कभी नहीं समझ सकते हैं। वे समाजवादी-मंडलवादी राजनीति के इस आवर्त्तन के पीछे काम कर रही आज की राजनीतिक जरूरतों को नजरंदाज करते हैं। वे ही आज अतीत के अनुभवों के हवाले से नीतीश, राजद और कांग्रेस के गठबंधन को क्षणभंगुर बताते हैं।

बिहार के इस घटनाक्रम ने न सिर्फ विपक्ष की ‘नगण्यता’ की स्थिति को ही खत्म किया है, बल्कि 2024 के आम चुनाव में सांप्रदायिक फासीवाद की पराजय की संभावना की एक नई जमीन तैयार कर दी है।

इसने कांग्रेस, वाम और समाजवादियों के साथ ही किसान-मजदूर आंदोलन की उस धुरी का साफ संकेत दिया है, जो मोदी की हिटलरशाही को परास्त करने में हर लिहाज से सक्षम होगी।

जो भी बिहार के राजनीतिक यथार्थ से परिचित हैं, वे जानते हैं कि बिहार में नीतीश को वामपंथियों के समर्थन का क्या मायने है। यह अंबेडकरवाद के साथ जैविक संपर्क की तलाश में लगे वामपंथ के लिए एक ऐसी नई भूमिका की जमीन तैयार करता है, जिसमें वह फासीवाद के खिलाफ लड़ाई में सामाजिक जनवादियों की पुरानी अवसरवादी भूमिका से उत्पन्न पूर्वाग्रहों की आत्म-बाधा से मुक्त हो सकता है।  

भाजपा आज बिहार में तो सबसे कटी हुई एक अकेली पार्टी है ही, पूरे उत्तर भारत में उसके पास कहीं भी कोई सहयोगी दल नहीं बचा है। आने वाले दिनों में इसका अलगाव और बढ़ेगा, बिहार में नीतीश के कदम से यह उम्मीद पैदा हुई है।

—अरुण माहेश्वरी

arun maheshwari
Arun Maheshwari – अरुण माहेश्वरी, लेखक सुप्रसिद्ध मार्क्सवादी आलोचक, सामाजिक-आर्थिक विषयों के टिप्पणीकार एवं पत्रकार हैं। छात्र जीवन से ही मार्क्सवादी राजनीति और साहित्य-आन्दोलन से जुड़ाव और सी.पी.आई.(एम.) के मुखपत्र ‘स्वाधीनता’ से सम्बद्ध। साहित्यिक पत्रिका ‘कलम’ का सम्पादन। जनवादी लेखक संघ के केन्द्रीय सचिव एवं पश्चिम बंगाल के राज्य सचिव। वह हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं।

Amrit Mahotsav of Independence: New research on alternative to fascism in Bihar  

बिहार में भाजपा को ज़ोर का झटका धीरे से. BJPको बिहार मेंचोट का दर्द 2024 में भी कष्ट देगा! hastakshep

‘आजादी का अमृत महोत्सव’ में कहाँ है खेतिहर मज़दूर

opinion debate

आज़ादी का ख्याल ही बहुत खूबसूरत है। हालांकि यह बात अलग है कि हमारे देश में आज़ादी के 75 वर्ष तक पहुंचते-पहुंचते ‘आज़ाद ख्याल’ नाक़ाबिल-ए- बर्दाश्त हो गया है।

अगस्त महीने में हमारे देश में आज़ादी का उत्सव शुरू हो जाता है। सभी तरफ तिरंगें लहराते नज़र आते हैं। हो भी क्यों न। हमने देश की आज़ादी ब्रिटानिया साम्राज्यवाद के खिलाफ लम्बे संघर्षों और अनेकों बलिदानों के बाद हासिल की है। हमें आज़ादी खैरात में नहीं मिली। देश की बहादुर जनता ने एकजुट होकर इसे साम्राज्यवादी हुकूमत से छीना है। इसके लिए पूरे देश ने बड़ी कीमत चुकाई है। इसलिए हमारे देश में आज़ादी के पर्व को जोश से मनाना ही चाहिए, ताकि हमारी वर्तमान और आने वाली पीढ़ियां इसका महत्व समझते हुए इसकी रक्षा की जिम्मेवारी लें।

आज़ादी का अर्थ क्या है?

आज़ादी के लिए सबके अपने मायने हैं। आम नागरिक के लिए आज़ादी के मायने यही थे कि ब्रिटानिया हुकूमत की जगह लोग आज़ाद देश में अपनी सरकार बनाएंगे। देश में सब समान होंगे। हर वर्ष आज़ादी का दिन मनाने के साथ हमारी जिम्मेवारी है, इस पर चर्चा करने की क्या आज़ादी का हासिल सब तक पहुंचा है?

विडम्बना है कि वर्तमान समय में ऐसी चर्चा करते ही आपको एक अलग दृष्टि से देखा जायेगा। यह सामान्य है कि आपको देश हितैषी न समझा जाये। जो समझ सरकारी कार्यालयों में बैठे भाजपा के नेता फैला रहे हैं- वह आपको देशद्रोही ही करार देगी। इनकी समझ के अनुसार आज़ादी का मतलब केवल तिरंगा फहराना ही है।

यह सही है कि इस तिरंगे को फहराने के लिए देश की जनता ने अनेकों कुर्बानियां दी हैं। लेकिन जिन लोगों ने तिरंगे को राष्ट्रीय झंडा न मानने के साथ इसके रंगों में शामिल, देश की विविधता की अवधारणा को न केवल नकारा बल्कि इसके खिलाफ लगातार संघर्ष किया, वह आज तिरंगे की राजनीति कर रहे हैं। हालाँकि तिरंगे को मज़बूरी में उनके द्वारा अपनाना (चाहे राजनीति के लिए ही हो) भी उनके विचार की हार ही है।

चलिए इस मुद्दे को छोड़ते हैं, क्योंकि इस लेख का मकसद इस पक्ष पर चर्चा नहीं है, बल्कि चिंता तो यह है कि अगर आज़ादी के इस अमृत महोत्सव पर सरकार के हर घर तिरंगा फहराने के अभियान का हिस्सा कोई बेघर बनना चाहे भी तो कैसे बने, क्योंकि उसके पास तो अपनी छत ही नहीं है जिस पर वह तिरंगा झण्डा लगा सके।

देश का बड़ा हिस्सा है जो आज़ादी की परिधि से बाहर छूट गया है अपनी स्थितियों का गुलाम है। बेशक 14.5 करोड़ से ज्यादा खेत मज़दूरों की भी यही हालत है। खेत मज़दूर आज़ाद देश में भी अपनी परिस्थितियों के गुलाम हैं। हाँ वह आज़ाद हैं- उन पर कानूनी तौर पर कोई बंदिश नहीं परन्तु उनकी आर्थिक और सामाजिक हालात उनकी बेड़ियां हैं।

खेत मज़दूरों के लिए काम नहीं

पिछले 75 वर्षों में ग्रामीण भारत के इस उत्पादक वर्ग के लिए कृषि में काम कम होता गया है। एक तरफ कृषि संकट के चलते किसान मज़बूरी में अपनी ज़मीन बेच रहे हैं और खेत मज़दूरों की फ़ौज में इज़ाफ़ा कर रहें हैं। दूसरी तरफ श्रम विस्थापन प्रौद्योगिकी के प्रयोग से कृषि में खेत मज़दूरों के लिए काम के दिन कम होते जा रहे हैं।

आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2001 से 2011 के बीच काश्तकारों की संख्या में 90 लाख की कमी हुई है, जबकि खेत मज़दूरों की संख्या में 3 करोड़ की वृद्धि हुई है। लेकिन खेत में मिलने वाले काम के दिनों में कमी आई है। वर्ष 1990 में कृषि में एक वर्ष में 100 दिनों का काम मज़दूरों को मिलता था लेकिन अब यह घटकर 38 से 52 दिन ही रह गया है।

यहाँ शिकायत यह नहीं है कि कृषि में मशीनों का प्रयोग क्यों हो रहा है, लेकिन प्रश्न यह है कि जो करोड़ों खेत मजदूर बेरोजगार हो रहे हैं, जिन्हें वर्ष में केवल कुछ दिन ही खेतों में काम मिल रहा है वह अपना और परिवार का पेट कैसे भरेंगे? ग्रामीण भारत से इन्हीं खेत मज़दूरों का एक बड़ा हिस्सा शहरों और देश के दूसरे ग्रामीण हिस्सों में काम की तलाश में पलायन करने के लिए मज़बूर होता है। ऐसे प्रवासी मज़दूरों की संख्या करोड़ों में है परन्तु सरकार की फाइलों में कोई पक्का आंकड़ा नहीं है। शहरो में मज़दूरों के रूप में तो सबको इनकी ज़रूरत है लेकिन नागरिकों के रूप में यह गैरजरुरी लोग हैं। कोविड महामारी के समय हम इनकी हालत देख चुके हैं।

यह आज़ादी की ही देन थी कि खेत मज़दूरों की बेरोजगारी और ग्रामीण भारत से लोगों के पलायन को देखते हुए काम का अधिकार देने के लिए मनरेगा को लाना पड़ा। यह एक बड़ा कदम था जिसमे मज़दूरों और किसानों की राजनीतिक ताकत का संसद में मज़बूती ही मुख्य कारण था। तमाम कमजोरियों के बावजूद यह मांग पर आधारित एक कानून है जिसमें सैद्धांतिक तौर पर ही सही मजदूरों द्वारा काम की मांग ही इसका आधार है। यही बात इसे सामान्य कल्याणकारी योजनाओं से अलग करती है। इसके वावजूद इसे सही से लागू करने की राजनीतिक इच्छा शक्ति देश की सरकारों ने कभी नहीं दिखाई। लेकिन हाल के वर्षो में तो भाजपा सरकार ने इसे किसी आम योजना में ही तब्दील कर दिया है।

है तो मनरेगा डिमांड ड्रिवेन परन्तु इसके लिए फण्ड की कमी हमेशा बनी रहती है। जब यह देश में लागू किया गया था तो इस पर कुल केंद्रीय बजट का दो प्रतिशत से ऊपर का आंबटन किया जाता था जो 2022 तक पहुंचते-पहुंचते 1.85 प्रतिशत रह गया।

गौरतलब है कि काम की मांग और काम मांगने वालों की संख्या तो बढ़ी है परन्तु बजट नहीं बढ़ा। इसका मतलब है की मज़दूरों का एक बड़ा हिस्सा आवेदन करने पर भी काम से महरूम रह जाता है।

कम मज़दूरी पर काम करने को मज़बूर

यह सामान्य बात है कि जब बेरोजगारी की दर ऊँची होती है तो मज़दूरी पर मोलभाव करना मज़दूरों के लिए संभव नहीं होता है। अभी तो हालत यह है कि खेत मज़दूरों को सरकार द्वारा घोषित न्यूनतम मज़दूरी से भी कम पर दिहाड़ी करनी पड़ती है। यह बताने की ज़रूरत नहीं कि खेत मज़दूरों की न्यूनतम मज़दूरी बहुत ही कम है। मज़दूरों और उनके परिवारों को केवल ज़िंदा रखने के लिए भी कम है। अब हालत और भी बदतर होते जा रहे हैं, पिछले दो वर्षों से पंजाब और हरियाणा में चुनी हुई पंचायतें सामंतों की तरह पेश आ रही हैं और धान की रोपाई के लिए मज़दूरी की मनमानी दरों के लिए फतवे जारी कर रही हैं। केवल फतवे ही ज़ारी नहीं कर रहीं, बल्कि इनको न मानने वाले मज़दूरों और किसानों दोनों के लिए जुर्माने और सामाजिक बहिष्कार का प्रावधान कर रहीं है। जी हाँ यह हमारे आज़ाद देश में हो रहा है जहाँ आशा की गई थी कि मज़दूरों के लिए न्यूनतम मज़दूरी का कानून होगा और उसको लागू करवाना सरकार की जिमेवारी होगी। कानून तो बनते हैं परन्तु लागू कौन करवाए। खेत मज़दूरों के लिए तो कानून भी नहीं बनते।

खेत मज़दूरों की उपेक्षा और सरकारों की उदासीनता का आसानी से अंदाजा लगाया जा सकता है, क्योंकि आजादी के 75 साल बाद भी भारत सरकार खेत मज़दूरों के लिए वेतन, काम करने की स्थिति और सामाजिक सुरक्षा लाभों को सुनिश्चित करने के लिए एक अलग व्यापक केंद्रीय कानून लाने में विफल रही है।

आज़ाद देश में आत्महत्या करते खेत मज़दूर

ऐसी हालात में जब खेत मज़दूरों को काम नहीं मिल रहा और उनकी आमदनी घटती जा रही है, जिसके चलते परिवार का खर्च चला पाना मुश्किल होता जा रहा है। परिणामस्वरूप ज्यादातर खेत मज़दूर परिवार संकट में जी रहे हैं और खेत मज़दूरों में भी आत्महत्या के मामले बढ़ रहे हैं। हर साल खेत मज़दूरों में आत्महत्या की घटनाएं हो रही हैं, परन्तु यह कभी खबर नहीं बनती। वैसे लोगों को पता ही नहीं है कि खेत मज़दूर भी आत्महत्या के लिए मज़बूर हो रहे हैं। नीति निर्धारक भी इसके प्रति आंखें मूंदे बैठे हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2020 में आत्महत्या से मरने वाले खेतिहर मजदूरों की संख्या में पिछले वर्ष की तुलना में 18% प्रतिशत की बढ़ौतरी हुई है । 2020 में 5,098 खेतिहर मजदूरों की आत्महत्या से मृत्यु हुई जबकि 2019 में यह आंकड़ा 4,324 था।

दुखद तो यह है कि सरकार अपने नागरिकों की आत्महत्या से बिलकुल भी विचलित नहीं होती इसलिए तो इन आत्महत्याओं के कारणों को समझने की कोशिश है और इसे रोकने के लिए किसी रणनीति पर काम करने का। इसका सरल सा कारण जो दीखता है वह यह है कि शायद खेत मज़दूर राजनीतिक समीकरणों को प्रभावित नहीं करते हैं।

भूमिहीन और बेघर जीवन

जैसा कि ऊपर भी चर्चा की गई है, जब हमारे देश ने आजादी हासिल की, तो अलग-अलग लोगों के लिए इसका अलग-अलग अर्थ था, लेकिन खेतिहर मजदूरों का एक ही सपना था कि उनके पास अपनी खुद की जमीन का एक टुकड़ा खेती के लिए हो और उनके सिर पर अपनी छत हो। उनका यह सपना एक गरिमामय जीवन से जुड़ा था। लेकिन असंख्य लोग आज भी अपने हिस्से की भूमि की आस लगाए बैठे है। केरल, बंगाल, त्रिपुरा और जम्मू कश्मीर जैसे कुछ राज्यों को छोड़कर देश में भूमि सुधार का काम आज भी अधूरा है। लेकिन अभी तो भूमि सुधार की बात होना भी बंद हो गई है। उल्टा नवउदारवाद के पिछले 30 वर्षों में इस पहलू पर जो छोटा-मोटा काम हुआ था उसे भी पलटा जा रहा है।

अगर हम एनएसएसओ के 43वें दौर के सर्वेक्षण (1987-88) के दौरान भूमिहीन परिवारों के प्रतिशत की तुलना 68वें दौर (2011-12) एनएसएसओ सर्वेक्षण से करें तो पाएंगे कि भूमिहीनों की संख्या में इज़ाफ़ा हुआ है। इस अवधि के दौरान ग्रामीण इलाकों में भूमिहीन परिवार (0.01 हेक्टेयर से कम भूमि वाले) 35% से बढ़कर 49% हो गए ।

दलितों में अधिक है भूमिहीनता

ज़मीन तो छोड़िये देश में एक बड़ा हिस्सा है जिनके पास रहने के लिए अपना घर नहीं है, जिसे विभिन्न अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों द्वारा मानवाधिकार के रूप में मान्यता दी गई है।

2011 की जनगणना के अनुसार भारत के बेघरों का अंतिम आधिकारिक अनुमान 1.77 मिलियन था। यह संख्या निस्संदेह पिछले दशक में बढ़ी है क्योंकि अनगिनत लोग कई कारणों से विस्थापित हुए हैं। इस विस्थापन के लिए मुख्य रूप से जिम्मेवार कॉर्पोरेट या सरकार द्वारा उनकी ओर से भूमि हड़पना ही है।

बोलने के लिए तो सरकार घर बनाने के लिए कई योजनाएं चलाती है, परन्तु उनका क्या जिनके पास घर बनाने के लिए अपने नाम पर ज़मीन ही नहीं है। ऐसे लाखों परिवार गांव में मिल जाएंगे जो सहमे रहते हैं कि पता नहीं कब उनको घर से निकाल दिया जायेगा, क्योंकि जिस चारदीवारी में वह रहते हैं वहां की ज़मीन का टुकड़ा उनके नाम नहीं है।

आदिवासियों के बड़े तबके को उनके मूल स्थानों से भगाया जा रहा है। यह सब खेत मज़दूर वर्ग से आते हैं। यह भी आज़ाद हैं और सबसे मज़बूती के साथ तिरंगा उठाने वालों में हैं, बस चिंता है कि स्वतंत्रता दिवस के उत्सव मनाने के बाद रात को अगर बारिश आ गई तो सर कहाँ छुपाएंगे।

यह आज़ादी का आंदोलन ही था जिसके प्रभाव में देश की सरकार ने एक कल्याणकारी राज्य का ढांचा विकसित किया था, जिसमे, नागरिकों की तमाम जरूरतें पूरी करने की क्षमता थी। लगातार कम होते काम, कम मज़दूरी, बिना ज़मीन और घर के, कल्याणकारी राज्य का ढांचा ही खेत मज़दूरों और ग्रामीण मज़दूरों के लिए मददगार था। उनके बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ कर जीवन में आगे बढ़ने के सपने पूरे कर सकते थे, बीमारी में सरकारी डॉक्टर और हस्पताल था, सरकारी डिपो में सस्ता राशन मिल रहा था, हालाँकि खेत मज़दूरों के लिए सेवनिवृत्ति और पेंशन जैसी किसी चीज़ की कल्पना भी देश के हुक़्मरानों ने कभी नहीं की, फिर भी बुढ़ापा पेंशन और विधवा पेंशन एक बड़ी मदद थी। लेकिन अब तो आज़ादी का दूसरा दौर शुरू हो गया है जहाँ सर्वोपरि है बाजार की आज़ादी। और बाजार की आज़ादी के इस दौर (जिसे हम नवउदारवाद के दौर से जानते हैं) में कल्याणकारी राज्य और उसकी संस्थाएं गैरजरूरी ही नहीं, बल्कि देश की तरक्की में एक बड़ी रूकावट के रूप में देखी जाती है। सही भी देश की सरकार के लिए तरक्की का मतलब केवल कॉर्पोरेट और पूँजी की तरक्की है। पूँजी देशी और विदेशी के लिए तो कल्याणकारी राज्य बड़ी बाधा है। इसलिए सरकारों ने विशेष तौर पर मोदी जी की सरकार ने देश के नागरिकों को इस बंधन से आज़ाद ही कर दिया। मतलब सरकारी तंत्र ख़त्म। शिक्षा निजी, स्वास्थ्य निजी और नौकरी भी प्राइवेट। शिक्षा हो या स्वास्थ्य बिना पैसे के कुछ नहीं। मतलब कि अगर मज़दूरों की दिहाड़ी में कुछ बढ़ोत्तरी की भी तो बच्चों की शिक्षा और स्वास्थ्य के खर्चे के जरिये मज़दूरों जेब से सब निकाल लिया।

जी हाँ अब मज़दूर आज़ाद है अपने बच्चों को अनपढ़ रखने के लिए। सारभौमिक और अनिवार्य शिक्षा के शब्दार्थ को भी आज के नीति निर्धारक नहीं समझते। कुल मिलाकर आज़ाद देश की सरकार भी आज़ाद है अपनी जिम्मेवारियों से और ग्रामीण गरीब और खेत मज़दूर भी आज़ाद हैं अपनी हालात में मरने के लिए। आज़ादी नहीं है तो केवल सवाल पूछने की।  

बहुस्तरीय शोषण का शिकार महिला खेत मज़दूर

महिला खेत मज़दूरों की हालत तो इससे भी बदतर है। ज़ाहिर है समान काम के लिए समान वेतन के दायरे में महिला खेत मज़दूर नहीं आती और उनको तो दिहाड़ी पुरुषों से क़म ही मिलेगी । जब नियमित काम ही नहीं तो मैटरनिटी बेनिफिट का सवाल ही नहीं। यहां तो आफत है गर्भधारण। नतीजतन, महिलाओं को गर्भावस्था के अंतिम चरण तक काम करना पड़ता है और बच्चे को जन्म देने के कुछ दिनों के भीतर काम फिर से शुरू करना पड़ता है। उनके पास क्रैच की कोई सुविधा नहीं है।

महिला खेत मज़दूरों के लिए तो माहवारी भी एक अभिशाप बन जाती है क्योंकि उन दिनों उनको काम नहीं मिलता।

महाराष्ट्र के बीड जिले में हज़ारों महिला मज़दूर मिल जाएँगी जो गन्ना तोड़ने का काम करती हैं और उन्होंने अपना गर्भाशय ही निकलवा दिया है ताकि उनको सीजन के समय काम न छोड़ना पड़े। जिन ठेकेदारों के तहत यह मज़दूर काम करती हैं, वह भी माहवारी के दिनों में महिलाओं को किसी भी तरह की रियायत देने को तैयार नहीं हैं, इसलिए गर्भाशय निकलवाने पर जोर देते हैं।

महिला खेत मज़दूर श्रम के शोषण के अलावा भी कई अन्य अत्याचारों जैसे यौन शोषण का शिकार होती हैं जिसकी शिकायत तक कहीं दर्ज नहीं होती। जब एक खेतिहर मजदूर महिला दलित या आदिवासी पृष्ठभूमि से आती है तो शोषण का स्तर बहुस्तरीय हो जाता है। मज़दूर के रूप में उसका शोषण किया जाता है और उसे अपनी निचली जाति के कारण सामाजिक भेदभाव का सामना करना पड़ता है और अंत में महिला होने के कारण उसका शोषण किया जाता है।

आज़ाद देश में मनुवाद की बेड़ियों के जकड़े खेत मज़दूर

खेत मज़दूर अपनी आर्थिक स्थितियों से तो बंधे ही हैं, जहाँ उनकी चुनी हुई सरकार ने उनका साथ छोड़ दिया परन्तु वह सामाजिक भेदभाव के भी गुलाम हैं।

खेत मज़दूरों की आबादी का बड़ा हिस्सा दलितों, आदिवासियों और अन्य उत्पीड़ित जातियों से आता है। जहां पढ़ा लिखा तबका भी अपने को जाति के बेड़ियों से मुक्त नहीं करवा पाया, नौकरियों और विश्वविद्यालयों में पहुँचाने पर भी दलित और आदिवासी आज़ाद भारत में मनु महाराज के ब्रह्मवाद के सामाजिक ढांचे में कैद हैं तो ग्रामीण खेतिहर मज़दूरों की तो क्या बिसात। ऐसा कौन सा दिन होगा जब यह अपनी जाति की पहचान से मुक्त होकर एक इंसान का जीवन जिए होंगे।

आज़ाद भारत का विधान तो संविधान ही है लेकिन दलितों और आदिवसियों का जीवन तो आज भी जातिवाद के सामाजिक ढांचे से ही बंधा हुआ है। वर्तमान भाजपा सरकार में वैसे भी देश के लिए आज़ादी की सबसे बड़ी उपलब्धि संविधान को ताक में ही सजा कर रख दिया गया है। कभी कभार उसे याद कीजिये लेकिन धरातल में तो मनु जी की संहिता चलेगी। संविधान सभा में उनका विचार हार गया, तो क्या अभी तो सरकार उनकी है। वह लोकतंत्र के बंधनो को क्यों माने। उनके लिए यही आज़ादी है कि दलितों पर हमला करने वाले अपराधियों के पक्ष में तिरंगे के साथ रैलिया, करें और उनको फूल मालाएं पहनायें। आज़ादी के 75वें वर्ष में कोई दलित खेत मज़दूर जातीय अत्याचार के बाद पुलिस थाने में जाने की नहीं सोचता। सोचे भी कैसे जब पुलिस की उपस्थिति में दलित दूल्हे के घोड़ी चढ़ने पर पूरी दलित बस्ती को जलाकर सबक सिखा दिया जाता हो, तो यह इस सबक के खिलाफ कैसे जाएं।  

देश की आज़ादी को मुक्कमल करने के लिए लड़ना होगा

आज़ादी के संघर्ष में मात्र 18 साल की उम्र में मुज़फ्फरपुर केस में फांसी का फंदा चूमने वाले खुदीराम बोस और चटगांव में सशस्त्र आंदोलन में मास्टर सूर्यसेन के साथ हथियार उठाने वाले 14 साल के सुबोध रॉय तथा 17 साल की कल्पना दत्त के सपनों का भारत सब नागरिकों का था।

जिला कलेक्टर कार्यालय पर झंडा फहराने पर जज के सामने निर्भय होकर अपना नाम लंदन तोड़ सिंह बताकर सजा मांगने वाले हरकिशन सिंह सुरजीत का सपना आज़ाद भारत में तिरंगा उठाने वाले नागिरकों की खुशहाली थी।

फांसी की जगह जंग में कैदियों के समान गोली से मरने की इच्छा रखने वाले और 23 साल की ऊपर में अमर हो जाने वाले शहीद भगत सिंह ने अपने प्राण देश के मज़दूरों और किसानों के लिए ही न्यौछावर किये थे।

आज देश की सरकार चिंतित है केवल तिरंगे के लिए परन्तु तिरंगा उठाने वाले हाथों के जीवन और उनकी आज़ादी से बेपरवाह है।

शहीदों ने कुर्बानियां कॉर्पोरेट के द्वारा देश के संसाधनों और देशवासियों की लूट की आज़ादी के लिए नहीं दी थीं। आज़ादी का पर्व मनाइये इस प्रण के साथ कि इस आज़ादी में सब शामिल होंगे। देश का ग्रामीण सर्वहारा अगर आज भी अपनी आर्थिक और सामाजिक स्थितियो का गुलाम है तो देश की आज़ादी भी अधूरी है।

हमारी जिम्मेवारी है कि देश की आज़ादी को मुक्कमल करें और आज़ाद देश में ग्रामीण मेहनतकशों में भी सबसे हाशिये पर खड़े खेत मजदूरों की आज़ादी के लिए संघर्ष को आगे बढ़ाये।

विक्रम सिंह

विक्रम सिंह (Dr. Vikram Singh Joint Secretary All India Agriculture Workers Union)
विक्रम सिंह
(Dr. Vikram Singh
Joint Secretary
All India Agriculture Workers Union)
क्या हम अमृत महोत्सव अंधकार में मनाएंगे? बिजली हो जाएगी 12 रुपए यूनिट?hastakshep | हस्तक्षेप

Where are the agricultural laborers in the ‘Azadi Ka Amrit Mahotsav’

भारत छोड़ो आंदोलन : अगस्त क्रांति और भारत का शासक-वर्ग

dr. prem singh

भारत छोड़ो आंदोलन की 80वीं सालगिरह के अवसर पर (On the occasion of 80th anniversary of Quit India Movement)

(यह विशेष लेख 2012 में भारत छोड़ो आंदोलन अथवा अगस्त क्रांति की 70वीं सालगिरह (70th anniversary of the august revolution) के अवसर पर लिखा गया था, और ‘युवा संवाद’ एवं ‘हस्तक्षेप डॉट कॉम’ में प्रकाशित हुआ था। इसमें भारत छोड़ो आंदोलन की वास्तविक प्रेरणा, तथ्यों और उसमें हिस्सेदारी करने वाली भारतीय जनता और नेताओं का समुचित उल्लेख करने की कोशिश की गई थी।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अगस्त क्रांति की 75वीं सालगिरह पर ‘मन की बात’ कार्यक्रम (‘Mann Ki Baat’ program on 75th anniversary of August Revolution) में और भाजपा सरकार ने अपने ‘संकल्प से सिद्धि’ अभियान में भारत छोड़ो आंदोलन का खोखला हवाला दिया था। राम पुनियानी ने इस विषय पर जवाबी लेख – ‘हाउ टू रिवाइव द स्पिरिट ऑफ़ क्विट इंडिया मूवमेंट’ (पीपल्स वोइस, 21 अगस्त 2017) लिखा था, जिसका हिंदी अनुवाद भी छपा था। हालांकि पुनियानी जी ने भी अपने लेख में भारत छोड़ो आंदोलन की वास्तविक प्रेरणा, चरित्र और तथ्यों का समुचित उल्लेख नहीं किया।

आरएसएस आधुनिक भारत के राष्ट्रीय इतिहास की धारा के बाहर पड़ी रह जाने वाली मानसिकता से परिचालित होता है। लिहाज़ा, उसका राष्ट्रीय महत्व की विभूतियों, विचारों, घटनाओं के साथ सार्थक रिश्ता नहीं जुड़ पाता। यह उसकी मौलिक अक्षमता बनी हुई है, जिससे उबरने की इच्छा-शक्ति राजनीतिक सत्ता पाने के बाद भी दिखाई नहीं देती। इसीलिए आरएसएस राष्ट्रीय इतिहास, भारतीय संविधान और महत्वपूर्ण हस्तियों के साथ बेहूदा किस्म का बर्ताव और तोड़-मरोड़ करता है। लेकिन आरएसएस का विरोधी पक्ष जब राष्ट्रीय इतिहास के तथ्यों को नज़रंदाज़ करता है, तो उससे आरएसएस की मदद होती है।

अगस्त क्रांति की 80वीं सालगिरह के मौके पर लेख मामूली संपादन के साथ फिर से जारी किया गया है। आशा है युवा साथी समय निकाल कर लेख पढ़ेंगे और शासक-वर्ग द्वारा लादी जा रही नव-साम्राज्यवादी गुलामी के प्रश्न पर विचार करेंगे। पहली बार लेख का अंग्रेजी अनुवाद भी जारी किया गया है।)

आजादी की इच्छा का विस्फोट

‘‘यह एक छोटा-सा मंत्र मैं आपको देता हूं। आप इसे हृदयपटल पर अंकित कर लीजिए और हर श्वास के साथ उसका जाप कीजिए। वह मंत्र है – ‘करो या मरो’। या तो हम भारत को आजाद करेंगे या आजादी की कोशिश में प्राण दे देंगे। हम अपनी आंखों से अपने देश का सदा गुलाम और परतंत्र बना रहना नहीं देखेंगे। प्रत्येक सच्चा कांग्रेसी, चाहे वह पुरुष हो या स्त्री, इस दृढ़ निश्चय से संघर्ष में शामिल होगा कि वह देश को बंधन और दासता में बने रहने को देखने के लिए जिंदा नहीं रहेगा। ऐसी आपकी प्रतिज्ञा होनी चाहिए।’’ (अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की बैठक में दिए गए गांधीजी के भाषण का अंश)

डॉ. राममनोहर लोहिया ने 2 मार्च 1946 को भारत के वायसराय लार्ड लिनलिथगो को एक लंबा पत्र लिखा था। वह पत्र महत्वपूर्ण है, और गांधीजी ने उसकी सराहना की थी। पत्र ब्रिटिश साम्राज्यवाद के क्रूर और षड़यंत्रकारी चरित्र को सामने लाता है। लोहिया ने वह पत्र जेल से लिखा था। भारत छोड़ो आंदोलन में इक्कीस महीने तक भूमिगत भूमिका निभाने के बाद लोहिया को बंबई में 10 मई 1944 को गिरफ्तार किया गया। पहले लाहौर किले में, और फिर आगरा में उन्हें कैद रखा गया। लाहौर जेल में ब्रिटिश पुलिस ने उन्हें अमानुषिक यंत्रणाएं दीं। दो साल कैद रखने के बाद जून 1946 में लोहिया को छोड़ा गया। इस बीच उनके पिता का निधन हुआ, लेकिन लोहिया ने छुट्टी पर जेल से बाहर आना गवारा नहीं किया। उनकी अनुपस्थिति में ही पिता की अंत्येष्टि हुई।

वायसराय महोदय ने कांग्रेस नेताओं पर भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान सशस्त्र बगावत की योजना बनाने, और आंदोलन में बड़े पैमाने पर हिस्सा लेने वाली जनता पर हिंसक गतिविधियों में शामिल होने का आरोप लगाया था। उस समय के तीव्र वैश्विक घटनाक्रम और बहस के बीच वायसराय यह दिखाने की कोशिश कर रहे थे कि ब्रिटिश शासन अत्यंत न्यायप्रिय व्यवस्था है, और उसका विरोध करने वाली कांग्रेस व भारतीय जनता हिंसक और निरंकुश। आजादी मिलने में केवल साल-दो साल बचा था, लेकिन ब्रिटिश वायसराय ऐसा जता रहे थे, मानो भारत पर हमेशा के लिए शासन करने का उनका जन्मसिद्ध अधिकार बना हुआ है!

पत्र में लोहिया ने वायसराय के आरोपों का खंडन करते हुए निहत्थी जनता पर ब्रिटिश हुकूमत के भीषण अत्याचारों को सामने रखा। उन्होंने कहा कि आंदोलन का दमन करते वक्त देश में कई जलियांवाला बाग घटित हुए, लेकिन भारत की जनता ने दैवीय साहस का परिचय देते हुए अपनी आजादी का अहिंसक संघर्ष किया।

लोहिया ने वायसराय के उस बयान को भी गलत बताया जिसमें उन्होंने भारत छोड़ो आंदोलन में एक हजार से भी कम लोगों के मारे जाने की बात कही।

लोहिया ने वायसराय को कहा कि उन्होंने असलियत में पचास हजार देशभक्तों को मारा है। उन्होंने कहा कि यदि उन्हें देश में स्वतंत्र घूमने की छूट मिले, तो वे इसका प्रमाण सरकार को दे सकते हैं।

लोहिया ने पत्र में लिखा, ‘‘श्रीमान लिनलिथगो, मैं आपको विश्वास दिलाता हूं कि यदि हमने सशस्त्र बगावत की योजना बनाई होती, लोगों से हिंसा अपनाने के लिए कहा होता, तो आज गांधीजी स्वतंत्र जनता और उसकी सरकार से आपके प्राणदंड को रुकवाने के लिए कोशिश कर रहे होते।’’

लोहिया ने वायसराय को उनका बर्बर चेहरा दिखाते हुए लिखा, ‘‘आपके आदमियों ने भारतीय माताओं को नंगा कर, पेड़ों से बांध, उनके अंगों से छेड़छाड़ कर जान से मारा। आपके आदमियों ने उन्हें जबरदस्ती सड़कों पर लिटा-लिटा कर उनके साथ बलात्कार किए और जानें लीं। आप फासिस्ट प्रतिशोध की बात करते हैं, जबकि आपके आदमियों ने पकड़ में न आ पाने वाले देशभक्तों की औरतों के साथ बलात्कार किए और उन्हें जान से मारा। वह समय शीघ्र ही आने वाला है जब आप और आपके आदमियों को इसका जवाब देना होगा।’’

कुर्बानियों की कीमत रहती है, इस आशा से भरे हुए लोहिया ने अलबत्ता व्यथित करने वाले उन क्षणों में वायसराय को आगे लिखा, ‘‘लेकिन मैं नाखुश नहीं हूं। दूसरों के लिए दुख भोगना और मनुष्य को गलत रास्ते से हटा कर सही रास्ते पर लाना तो भारत की नियति रही है। निहत्थे आम आदमी के इतिहास की शुरुआत 9 अगस्त की भारतीय क्रांति से होती है।’’

हालांकि स्वंय कांग्रेस के कई बड़े नेता ‘फासिस्ट’ शक्तियों के खिलाफ युद्ध में फंसे ‘लोकतंत्रवादी’ इंग्लैंड को परेशानी में डालने पर अंत तक दुविधाग्रस्त बने रहे। उनका जिक्र लोहिया ने अपने पत्र में किया है। लेकिन खुद लोहिया को अंग्रजों को बाहर खदेड़ने के फैसले पर कोई दुविधा नहीं थी। उन ‘आधुनिकतावादियों’ जैसी दुविधा उनमें भी होती, तो वे साम्राज्यवादी सत्ता के खिलाफ जनता के संघर्ष में पूरी निष्ठा और शक्ति से नहीं रम पाते।

उन्होंने स्पष्ट किया, ‘‘हम भविष्य के प्रति जिज्ञासु हैं। चाहे जीत आपकी हो या धुरी शक्ति की, उदासी और अंधकार चारों ओर बना रहेगा। आशा की मात्र एक ही टिमटिमाहट है। स्वतंत्र भारत इस लड़ाई को प्रजातांत्रिक समापन की ओर ले जा सकता है।’’ (देखें, ‘कलेक्टेड वर्क्स ऑफ़ डॉ. राममनोहर लोहिया’ खंड 9, संपा. मस्तराम कपूर, पृ. 176-181)

दरअसल, लोहिया दुनिया में स्थायी शांति कायम करने की दिशा में चार-सूत्री योजना का सुझाव रखते हुए 1939 में ही युद्ध के विरोध में गांधी जी से सत्याग्रह आंदोलन शुरू करने का आग्रह कर चुके थे। ये चार सूत्र थे : सभी पराधीन देशों की स्वाधीनता और उनमें वयस्क मताधिकार द्वारा स्वराज पंचायतों द्वारा संविधान निर्माण, किसी भी देश को कोई विशेषाधिकार न रहे और हर व्यक्ति को बिना पूर्व अनुमति के मनचाहे देश में निवास करने की स्वतंत्रता, किसी भी देश द्वारा अन्य देश में संपत्ति अर्जित करने अथवा पूंजी लगाने की मनाही और संपूर्ण निरस्त्रीकरण। गांधीजी ने लोहिया की योजना को तुरंत स्वीकृति दी, लेकिन तत्काल सत्याग्रह आंदोलन शुरू करने का आग्रह स्वीकार नहीं किया।

लोहिया की जीवनीकार इंदुमति केलकर ने लिखा है, ‘‘मार्च 1939 में, युद्ध के विरोध में लिखे अपने एक लेख में लोहिया ने अपनी भूमिका स्पष्ट करते हुए लिखा था, ‘गुलाम भारत की दृष्टि में जितनी पापी ब्रिटिश साम्राज्यशाही है, उतनी पापी जर्मनी की हिटलरशाही और जापान की साम्राज्यशाही है। बिना साम्राज्यशाही को समाप्त किए संसार सुरक्षित नहीं हो पाएगा। ब्रिटिश साम्राज्यशाही ने ही फासिज्म को पाल-पोस कर बड़ा किया है। इसलिए भारत को चाहिए कि वह फासिज्म और साम्राज्यशाही, दोनों के विरोध में लड़े, तभी संसार के पराधीन देशों का वह सहायक बनेगा।’ इसी समय लोहिया ने युद्ध कर, युद्ध कर्ज और सैनिक भरती जैसे उपक्रमों का विरोध करने का उपाय भी सुझाया था।’’ (‘राममनोहर लोहिया’ (संक्षिप्त संस्करण), इंदुमति केलकर, पृ. 32)

भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में अगस्त क्रांति के नाम से मशहूर भारत छोड़ो आंदोलन का करीब तीन-चार साल का दौर अत्यंत महत्वपूर्ण होने के साथ पेचीदा भी है। यह आंदोलन देश-व्यापी था, जिसमें बड़े पैमाने पर भारत की जनता ने हिस्सेदारी की और अभूतपूर्व साहस और सहनशीलता का परिचय दिया। लोहिया ने रूसी क्रांतिकारी चिंतक लियों ट्राटस्की के हवाले से लिखा है कि रूस की क्रांति में वहां की एक प्रतिशत जनता ने हिस्सा लिया, जबकि भारत की अगस्त क्रांति में देश के 20 प्रतिशत लोगों ने हिस्सेदारी की। (देखें, ‘कलेक्टेड वर्क्स ऑफ़ डॉ. राममनोहर लोहिया’ खंड 9, संपा. मस्तराम कपूर, पृ. 129)

हालांकि जनता का विद्रोह पहले तीन-चार महीनों तक ही तेजी से हुआ। नेतृत्व व दूरगामी योजना के अभाव तथा अंग्रेज सरकार के दमन ने विद्रोह को दबा दिया। 8 अगस्त 1942 को ‘भारत छोड़ो’ प्रस्ताव पारित हुआ; अरुणा आसफ अली ने गोवालिया टैंक मैदान पर तिरंगा फहराया; और 9 अगस्त की रात को कांग्रेस के बड़े नेता गिरफ्तार कर लिए गए। नेताओं की गिरफ्तारी के चलते आंदोलन की सुनिश्चित कार्य-योजना नहीं बन पाई थी। कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी का अपेक्षाकृत युवा नेतृत्व सक्रिय था, लेकिन उसे भूमिगत रह कर काम करना पड़ रहा था। जयप्रकाश नारायण (जेपी) ने क्रांतिकारियों का मार्गदर्शन और हौसला अफजायी करने तथा आंदोलन का चरित्र और तरीका स्पष्ट करने वाले दो लंबे पत्र अज्ञात स्थानों से लिखे। भारत छोड़ो आंदोलन के महत्व का एक पक्ष यह भी है कि आंदोलन के दौरान जनता खुद अपनी नेता थी।  

भारत छोड़ो आंदोलन की कई विशेषताएं हैं। कई चरणों और नेतृत्व से गुजरे भूमिगत क्रांतिकारी आंदोलन और गांधी के नेतृत्व में चले जनता के अहिंसक आंदोलन का मिलन भारत छोड़ो आंदोलन में होता है। दोनों की समानता और फर्क के बिंदुओं को लेकर 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के साथ भी भारत छोड़ो आंदोलन के सूत्र जोड़े जा सकते हैं। भारत छोड़ो आंदोलन हिंसक था या अहिंसक, इस सवाल को लेकर काफी बहस हुई है। गांधी, जिन्होंने ‘करो या मरो’ का नारा दिया, और जिन्हें उसी रात गिरफ्तार कर लिया गया, ने जनता से अहिंसक आंदोलन का आह्वान किया था। जब दुनिया दूसरे विश्वयुद्ध की हिंसा में फंसी थी, गांधीजी का यह एक अनूठा अहिंसक आह्वान था।

जेपी ने गुप्त स्थानों से ‘आजादी के सैनिकों के नाम’ दो पत्र क्रमश: दिसंबर 1942 और सितंबर 1943 में लिखे। अपने दोनों पत्रों में, विशेषकर पहले में, उन्होंने हिंसा-अहिंसा के सवाल को विस्तार से उठाया। हिंसा-अहिंसा के मसले पर गांधी और कांग्रेस का मत अलग-अलग है, यह उन्होंने अपने पत्र में कहा। उन्होंने अंग्रेज सरकार को लताड़ लगाई कि उसे यह बताने का हक नहीं है कि भारत की जनता अपनी आजादी की लड़ाई का क्या तरीका अपनाती है। उन्होंने कहा कि भारत छोड़ो आंदोलन के मूल में हत्या नहीं करने और चोट नहीं पहुंचाने का संकल्प है।

उन्होंने लिखा, ‘‘अगर हिंदुस्तान में हत्याएं हुईं – और बेशक हुईं – तो उनमें से 99 फीसदी ब्रिटिश फासिस्ट गुंडों द्वारा और केवल एक फीसदी क्रोधित और क्षुब्ध जनता के द्वारा। हर अहिंसात्मक तरीके से अंग्रेजी राज के लिए जिच पैदा करना, उसे पंगु बना कर उखाड़ फेंकना ही उस प्रोग्राम का मूल मंत्र है और ‘अहिंसा के दायरे में सब कुछ कर सकते हो’ यही है हमारा ध्रुवतारा। इसमें शक की कोई गुंजाइश नहीं कि जिस प्रोग्राम पर 1942 के अगस्त से अब तक कांग्रेस संस्थाओं ने अमल किया है उसका बौद्धिक आधार अहिंसा है – उस अर्थ में अहिंसा, जैसा उसके अधिकारी पुरुषों ने इस अर्से में बताया है।’’ (‘नया संघर्ष’, अगस्त क्रांति विशेषांक, अगस्त-सितंबर 1991, पृ. 31)

भारत छोड़ो आंदोलन में अहिंसा-हिंसा के सवाल पर जनता से लेकर नेताओं तक जो विमर्श उस दौरान हुआ, उसका विश्लेषण होना बाकी है। हिंसा के पर्याय और उसकी पराकाष्ठा पर समाप्त होने वाले दूसरे विश्वयुद्ध के बीच एक अहिंसक आंदोलन का संभव होना निश्चित ही गंभीर विश्लेषण की मांग करता है। यह विश्लेषण इसलिए जरूरी है कि भारत का अधिकांश बौद्धिक वर्ग 1857 और 1942 की हिंसा का केवल भारतीय पक्ष देखता है, और उसकी निंदा करने में कभी नहीं चूकता। केवल और हर तरह की हिंसा के बल पर तीन-चौथाई दुनिया को गुलाम बनाने वाले उपनिवेशवादियों को ‘सभ्य’ और ‘प्रगतिशील’ मानता है।   

भारत छोड़ो आंदोलन दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान हुआ। लिहाजा, उसका एक अंतरराष्ट्रीय आयाम भी था। आंदोलन के अंतरराष्ट्रीय पहलू का इतना दबदबा था कि विश्वयुद्ध में अंग्रेजों का साथ देने के औचित्य और भारत की आजादी को विश्वयुद्ध में हुए अंग्रेजों के नुकसान का नतीजा बताने के तर्क भारत में आज तक चलते हैं। ऐसे अंतर्राष्ट्रीयतावादियों के लिए आजादी के लिए स्थानीय भारतीय जनता का संघर्ष ज्यादा मायने नहीं रखता। आज जो भारतीय जनता की खस्ता हालत है, उसमें आजादी के इस तरह के मूल्यांकनों का बड़ा हाथ है। हालांकि, इसकी जड़ें और गहरी जाती हैं।

नेताजी सुभाष चंद्र बोस का आजाद हिंद फौज बना कर अंग्रेजों को बाहर करने के लिए किया गया संघर्ष भी भारत छोड़ो आंदोलन के पेटे में आता है। अंग्रेजों और स्थानीय विभाजक शक्तियों द्वारा देश के विभाजन की बिसात बिछाई जाने का काम भी इसी दौरान पूरा हुआ। जेपी ने इन सब पहलुओं पर अपने पत्रों में रोशनी डाली है। उन पत्रों को एक बार फिर से देखा जाना चाहिए।  

भारत छोड़ो आंदोलन देश की आजादी के लिए चले समग्र आंदोलन, जैसा भी भला-बुरा वह रहा हो, का निर्णायक निचोड़ था; भारत की आजादी का प्रवेशद्वार था। विभिन्न स्रोतों से आजादी की जो इच्छा, और उसे हासिल करने की जो ताकत भारत में बनी थी, उसका अंतिम प्रदर्शन भारत छोड़ो आंदोलन में हुआ। भारत छोड़ो आंदोलन ने यह निर्णय किया कि आजादी की इच्छा में भले ही नेताओं का भी साझा रहा हो, उसे हासिल करने की ताकत निर्णायक रूप से जनता की थी। हालांकि अंग्रेजी शासन को नियामत मानने वाले और अपना स्वार्थ साधने वाले तत्व भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान भी पूरी तरह सक्रिय थे। वे कौन थे, इसकी जानकारी जेपी के पत्रों से मिलती है।

syama prasad mukherjee श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने भारत छोड़ो आंदोलन को कुचलने में अंग्रेजों की मदद की

यह ध्यान देने की बात है कि गांधीजी ने आंदोलन को समावेशी बनाने के लिए अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की बैठक में दिए अपने भाषण में समाज के सभी तबकों को संबोधित किया था – जनता, पत्रकार, नरेश, सरकारी अमला, सैनिक, विद्यार्थी। उन्होंने अंग्रेजों, यूरोपीय देशों, एशियाई देशों, मित्र राष्ट्रों के नेतृत्व और यूएन को भी अपने उस भाषण में संबोधित किया था। किसी देश की जनता और विश्व को संबोधित वह दुनिया का संभवत: सर्वश्रेष्ठ भाषण कहा जा सकता है। सभी तबकों और समूहों से देश की आजादी के लिए ‘करो या मरो’ के व्यापक आह्वान का आधार उनका पिछले 25 सालों के संघर्ष का अनुभव था। भारत छोड़ो आंदोलन का गांधी का निर्णय भारत और विश्व के स्तर पर एक सम्पूर्ण दृष्टि पर आधारित था। जबकि जिन नेताओं/संगठनों ने भारत छोड़ो आंदोलन का विरोध किया, वे सभी खंडित दृष्टि का प्रतिनिधित्व करने वाले थे।

किसी समाज एवं सभ्यता की बड़ी घटना का प्रभाव साहित्य रचना पर पड़ता है। 1857 का पहला स्वतंत्रता संग्राम भारत की एक बड़ी घटना थी। अंग्रेजों का डर कह लीजिए या भक्ति, 1857 का संघर्ष लंबे समय तक साहित्यकारों की कल्पना से बाहर बना रहा। जबकि भारत छोड़ो आंदोलन ने रचनात्मक कल्पना (क्रियेटिव इमेजिनेशन) को तत्काल और बड़े पैमाने पर आकर्षित किया। विभाजन साहित्य (पार्टीशन लिटरेचर) के बाद भारतीय साहित्य में सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक घटना के रूप में भारत छोड़ो आंदोलन का चित्रण रहा है। इसका कारण लगता है कि गांधी के राजनैतिक कर्म और विचारों ने पूंजीवाद के आकर्षण को भारतीय भद्रलोक के मानस से कुछ हद तक काटा था; और जनता के संघर्ष की बदौलत आजादी लगभग आ चुकी थी।

मार्क्सवादी लेखकों ने भी भारत छोड़ो आंदोलन को विषय बना कर उपन्यास लिखे। हिंदी में यशपाल, जो अपने साहित्य को मार्क्सवादी विचारधारा के प्रचार का माध्यम मानते थे, ने आंदोलन के दौरान ही दो उपन्यास – ‘देशद्रोही’ (1943) और ‘गीता पार्टी कामरेड’ (1946) – लिखे। यह ध्यान देने की बात है कि भारत छोड़ो आंदोलन अपने ढंग के विशिष्ट राजनीतिक उपन्यासकार यशपाल का देर तक पीछा करता है। यशपाल सशस्त्र क्रांतिकारी आंदोलन में सक्रिय रहे थे। उन्होंने अपने अंतिम महाकाय उपन्यास ‘मेरी तेरी उसकी बात’ (1979) में एक बार फिर भारत छोड़ो आंदोलन का विस्तार से चित्रण किया।

सोवियत रूस के दूसरे विश्वयुद्ध में शामिल होने पर भारत के मार्क्सवादी नेतृत्व ने भारत छोड़ो आंदोलन का विरोध और अंग्रेजों का साथ देने का फैसला किया। वह कांग्रेस समाजवादियों और मार्क्सवादियों के बीच कटु टकराहट का कारण तो बना ही, उस निर्णय के चलते मार्क्सवादी कार्यकर्ता देशभक्ति और देशद्रोह की परिभाषा व कसौटी को लेकर भ्रमित हुए।

यशपाल ने अपने तीनों उपन्यासों में मार्क्सवादी कथानायकों को ‘देशभक्त’ सिद्ध किया है। सतीनाथ भादुड़ी का ‘जागरी’ (1945), बीरेंद्र कुमार भट्टाचार्य का ‘मृत्युंजय’ (1970), समरेश बसु का ‘जुग जुग जियो’ (चार खंड, 1977) जैसे अत्यंत महत्वपूर्ण उपन्यासों के अलावा भारतीय भाषाओं में, भारतीय अंग्रेजी उपन्यास सहित, कई उपन्यास भारत छोड़ो आंदोलन की घटना पर लिखे गए, या उनमें उस घटना का जिक्र आया है। फणीश्वरनाथ रेणु के उपन्यास ‘मैला आंचल’ (1954) का समय करीब आजादी के एक साल पहले और एक साल बाद का है। उनके इस कालजयी उपन्यास पर भारत छोड़ो आंदोलन की गहरी छाया व्याप्त है।

भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान भूमिगत अवस्था के अंतिम महीनों में लोहिया ने अपना लंबा लेख ‘इकोनॉमिक्स आफ्टर मार्क्स‘ – मार्क्सोत्तर अर्थशास्त्र – लिखा।

इंदुमति केलकर लिखती हैं, ‘‘भूमिगत जीवन की अस्थिरता, लगातार पीछे पड़ी पुलिस, आंदोलन के भविष्य की चिंता, संदर्भ साहित्य की कमी के बावजूद लोहिया का लिखा प्रस्तुत प्रबंध विश्व भर के आर्थिक विचार और समाजवादी आंदोलन को दी गई बहुत बड़ी देन समझी जाती रही है। अपने प्रबंध में लोहिया ने मार्क्स के अर्थशास्त्र और उसके निष्कर्षों की बहुत ही मौलिक और बिल्कुल नए सिरे से व्याख्या प्रस्तुत की है।’’ (‘राममनोहर लोहिया’ (संक्षिप्त संस्करण), इंदुमति केलकर, पृ. 45)

इंदुमति केलकर ने इस लेख के उद्देश्य के बारे में लोहिया को उद्धृत किया है: ‘‘1942-43 की अवधि में ब्रिटिश सत्ता के विरोध में जो क्रांति आंदोलन चला उस समय समाजवादी जन या तो जेल में बंद थे या पुलिस पीछे पड़ी हुई थी। यह वह समय भी है जब कम्युनिस्टों ने अपने विदेशी मालिकों की हां में हां मिलाते हुए ‘लोक-युद्ध’ का ऐलान किया था। परस्पर विरोधी पड़ने वाली कई असंगतियों से ओतप्रोत मार्क्सवाद के प्रत्यक्ष अनुभवों और दर्शनों से मैं चकरा गया और इसी समय मैंने तय किया कि मार्क्सवाद के सत्यांश की तलाश करूंगा, असत्य को मार्क्सवाद से अलग करूंगा। अर्थशास्त्र, राज्यशास्त्र, इतिहास और दर्शनशास्त्र, मार्क्सवाद के चार प्रमुख आयाम रहे हैं। इनका विश्लेषण करना भी मैंने आवश्यक समझा। परंतु अर्थशास्त्र का विश्लेषण जारी ही था कि मुझे पुलिस पकड़ कर ले गई।’’ (‘राममनोहर लोहिया’ (संक्षिप्त संस्करण), इंदुमति केलकर, पृ. 45)

जाहिर है, मार्क्सवाद को अटल सार्वभौमिक जीवन-दर्शन मानने वाले भारत के पार्टी कम्युनिस्टों को लोहिया की ये टिप्पणी और ‘इकोनॉमिक्स आफ्टर मार्क्स’ निबंध उस समय नागवार गुजरे होंगे। इसकी एक झलक दूधनाथ सिंह के महत्वपूर्ण उपन्यास ‘आखिरी कलाम’ (2006) में देखने को मिलती है। उपन्यास में बाबरी मस्जिद ध्वंस की परिस्थितियों का सजीव चित्रण हुआ है। लेकिन उपन्यास का समय चालीस के दशक, यानी भारत छोड़ो आंदोलन तक पीछे लौटता है। कथानायक कम्युनिस्ट पार्टी का सिद्धांतकार एक प्रोफेसर है। उसके हवाले से लेख पर कम्युनिस्ट प्रतिक्रिया का यह ब्योरा आया है कि लोहिया ने ऐसा लेख लिखने की हिमाकत कैसे की! बहरहाल, घटना से लेकर अभी तक उपन्यासों में भारत छोड़ो आंदोलन के चित्रण या प्रभाव की परिघटना दर्शाती है कि भारत छोड़ो आंदोलन राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण होने के साथ हमारी जातीय स्मृति का हिस्सा भी है।

भारत छोड़ो आंदोलन का जो भी घटनाक्रम, प्रभाव और विवाद रहे हों, मूल बात थी भारत की जनता की लंबे समय से पल रही आजादी की इच्छा – will to freedom – का विस्फोट।

भारत छोड़ो आंदोलन के दबाव में भारत के आधुनिकतावादी मध्य-वर्ग से लेकर सामंती नरेशों तक को यह लग गया था कि अंग्रेजों को अब भारत छोड़ना होगा। अतः अपने वर्ग-स्वार्थ को बचाने और मजबूत करने की फिक्र उन्हें लगी। नौकरशाही/प्रशासन का लौह-शिकंजा और उसे चलाने वाली भाषा तो अंग्रेजों की बनी ही रही; विकास का मॉडल भी वही रखा गया।

भारत का ‘लोकतांत्रिक, समाजवादी व धर्मनिरपेक्ष’ संविधान भी पूंजीवाद और सामंतवाद के गठजोड़ की छाया से पूरी तरह नहीं बच पाया। अंग्रेजों के वैभव और रौब-दाब की विरासत, जिससे भारत की जनता के दिलों में भय बैठाया जाता था, भारत के शासक-वर्ग ने अपनाए रखी। वह उसे उत्तरोत्तर मजबूत भी करता चला गया।

गरीबी, मंहगाई, बीमारी, बेरोजगारी, शोषण, कुपोषण, विस्थापन और आत्महत्याओं का मलबा बने हिंदुस्तान में शासक-वर्ग का वैभव अश्लील ही कहा जा सकता है।

भारत छोड़ो आंदोलन कुचलने में अंग्रेज़ों का साथ देने के लिए सावरकर को भारत रत्न ! | #hastakshep

भारत छोड़ो आंदोलन का एक सबक यह भी है कि सेवाग्राम और साबरमती आश्रम के छोटे और कच्चे कक्षों में बैठ कर गांधी को दुनिया की सबसे बड़ी साम्राज्यशाही से राजनीतिक-कूटनीतिक संवाद करने में असुविधा नहीं हुई। अपना चिंतन/लेखन/आंदोलन करने में भी नहीं। गांधी का आदर्श यदि सही नहीं था, तो शासक-वर्ग सादगी का कोई और आदर्श सामने रख सकता था। बशर्ते वैसी इच्छा होती। पिछले दो दशकों से जो अश्लील पूंजीवाद देश में चल रहा है, उसके तहत एक के बाद एक विलासिता के टापू खड़े करने का शासक-वर्ग पर जैसे खब्त सवार हो चुका है।   

वायसराय के आदमी 

लोहिया ने आजाद भारत के शासक-वर्ग और शासन-तंत्र की सतत और विस्तृत आलोचना की है। वे उसे कमोबेश अंग्रेजी राज का विस्तार बताते थे। लोहिया को लगता रहा होगा कि उनकी आलोचना से शासक-वर्ग का चरित्र बदलेगा; तद्नुरूप शासन-तंत्र में परिवर्तन आएगा; और भारत की अवरुद्ध क्रांति आगे बढ़ेगी। हालांकि, संसद और उसके बाहर जनता के पक्ष में उनका संघर्ष शासक-वर्ग की ‘प्रतिष्ठा’ को नहीं हिला पाया। आज जब हम अगस्त क्रांति की सत्तरवीं सालगिरह मनाने जा रहे हैं, तो सोचें – किस लिए? क्या हम जनता का पक्ष मजबूत करना चाहते हैं? या स्वतंत्रता आंदोलन के प्रेरणा प्रतीकों, प्रसंगों और विभूतियों का उत्सव मना कर, उनके सार-तत्व को नष्ट कर देना चाहते हैं?

नवउदारवाद के विरोध की किसी भी प्रेरणा को नष्ट/विकृत करने की प्रवृत्ति भारत में जोर-शोर से चल रही है। 1857 के डेढ़ सौवें साल पर कांग्रेस ने दिल्ली से मेरठ और मेरठ से दिल्ली के बीच क्रांति यात्रा का आयोजन किया था। धूमधाम से किए गए उस बडे सरकारी आयोजन में कई नवउदारवाद विरोधी बुद्धिजीवियों और एक्टिविस्टों ने शिरकत की। देश की संवैधानिक संप्रभुता समेत उसके समस्त संसाधनों और श्रमशक्ति को नवसाम्राज्यवादी ताकतों का ग्रास बना देने वाले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने मेरठ से लौटे क्रांति यात्रियों का लाल किले पर स्वागत किया था। यह कटूक्ति है, लेकिन इससे कम कुछ नहीं कहा जा सकता कि 1857 के शहीदों का इससे बड़ा अपमान नहीं हो सकता था!

डेढ़ सौवीं वर्षगांठ के अवसर पर दो वर्षों तक सरकार ने पैसा भी खूब बांटा। पैसा देखते ही बुद्धिजीवियों में भी जोश आ जाता है। जिन्होंने 1857 पर कभी एक पंक्ति न पढ़ी थी, न लिखी थी, ऐसे बहुत-से विद्वान सभा-सेमिनारों में सक्रिय हो गए।

मार्क्सवादियों ने इस बार कुछ ज्यादा जोर-शोर से 1857 का जश्न मनाया। लेकिन साथ ही उनके नेतृत्व ने यह भी कह दिया कि पूंजीवाद के अलावा विकास का कोई रास्ता नहीं है। यानी मान्यता वही पुरानी रही – अपनी आजादी के लिए लड़ने वाले पिछड़ी/सामंती शक्तियां थे, और उन्हें गुलाम बनाने वाले अंग्रेज आगे बढ़ी हुई। ऐसे में पिछड़ी और सामंती शक्तियों का हारना तय था।

आज तक भारत का मार्क्सवादी और आधुनिकतावादी दिमाग, 1857 का उत्सव चाहे जितना मना ले, आजादी की इच्छा में अपने प्राणों पर खेल जाने वालों की हिमाकत को माफ नहीं करता है। उनके हिसाब से यह देश अंधकूप था और अंग्रेज न आते तो अंधकूप ही रह जाता। यह अकेले नब्बे के दशक का फैसला नहीं है कि भारत की राजनीति के सारे रास्ते कॉरपोरेट पूंजीवाद की ओर जाते हैं!

लोहिया ने भारत छोड़ो आंदोलन की पच्चीसवीं वर्षगांठ पर लिखा, ‘‘नौ अगस्त का दिन जनता की महान घटना है और हमेशा बनी रहेगी। पंद्रह अगस्त राज्य की महान घटना थी। लेकिन अभी तक हम 15 अगस्त को धूमधाम से मनाते हैं क्योंकि उस दिन ब्रिटिश वायसराय माउंटबैटन ने भारत के प्रधानमंत्री के साथ हाथ मिलाया था और क्षतिग्रस्त आजादी क्षतिग्रस्त देश को दी थी। नौ अगस्त जनता की इस इच्छा की अभिव्यक्ति थी – हमें आजादी चाहिए और हम आजादी लेंगे। हमारे लंबे इतिहास में पहली बार करोड़ों लोगों ने आजादी की अपनी इच्छा जाहिर की। कुछ जगहों पर इसे जोरदार ढंग से प्रकट किया गया।’’

पच्चीस साल की दूरी से देखने पर लोहिया ने उस आंदोलन की कमजोरी – सतत दृढ़ता की कमी – पर अंगुली रखी। वे लिखते हैं, ‘‘लेकिन यह इच्छा थोड़े समय तक ही रही, लेकिन मजबूत रही। उसमें दीर्घकालिक तीव्रता नहीं थी। जिस दिन हमारा देश दृढ़ इच्छा प्राप्त कर लेगा उस दिन हम विश्व का सामना कर सकेंगे। बहरहाल, यह 9 अगस्त 1942 की पच्चीसवीं वर्षगांठ है। इसे अच्छे तरीके से मनाया जाना चाहिए। इसकी पचासवीं वर्षगांठ इस प्रकार मनाई जाएगी कि 15 अगस्त भूल जाए, बल्कि 26 जनवरी भी पृष्ठभूमि में चला जाए या उसकी समानता में आए। 26 जनवरी और 9 अगस्त एक ही श्रेणी की घटनाएं हैं। एक ने आजादी की इच्छा की अभिव्यक्ति की और दूसरी ने आजादी के लिए लड़ने का संकल्प दिखाया।’’ (देखें, ‘राममनोहर लोहिया रचनावली’ खंड 9, संपा. मस्तराम कपूर, पृ. 413)

अगस्त क्रांति की पचासवीं वर्षगांठ देखने के लिए लोहिया जिंदा नहीं रहे। लोग मरने के बाद उनकी बात सुनेंगे, उनकी यह धारणा अभी तक मुगालता ही साबित हुई है। अगस्त क्रांति की पचासवीं वर्षगांठ 1992 में पड़ी। कहां लोहिया की इच्छा और कहां 1992 का साल! यह वह साल है जब नई आर्थिक नीतियों के तहत देश के दरवाजे बहुराष्ट्रीय कंपनियों की लूट के लिए खोल दिए गए और एक पांच सौ साल पुरानी मस्जिद को ‘राममंदिर आंदोलन’ चला कर ध्वस्त कर दिया गया। तब से लेकर नवउदारवाद और संप्रदायवाद की गिरोहबंदी के बूते भारत का शासक-वर्ग उस जनता का जानी दुश्मन बन गया है, जिसने भारत छोड़ो आंदोलन में साम्राज्यवादी शासकों के दमन का सामना करते हुए आजादी का रास्ता प्रशस्त किया था। जो हालात हैं, उन्हें देख कर कह सकते हैं कि नब्बे के दशक के बाद उपनिवेशवादी दौर के मुकाबले ज्यादा भयानक तरीके से जनता के दमन को अंजाम दिया जा रहा है।

अगस्त क्रांति दिवस के मौके पर हम यह विचार कर सकते हैं कि भारत छोड़ो आंदोलन की तर्ज पर ‘बहुराष्ट्रीय कंपनियां भारत छोड़ो’ के नारे क्यों कारगर नहीं होते, और क्यों कॉरपोरेट पूंजीवाद का कब्जा उत्तरोत्तर मजबूत होता जाता है? क्यों सारे देश को स्मार्ट नगर और सारी आबादी को उपभोक्ता (कंज्यूमर) बनाने का दुःस्वप्न धड़ल्ले से बेचा जा रहा है? कारण स्पष्ट है, भारत का शासक-वर्ग पूरी तरह से कॉरपोरेट पूंजीवाद का पक्षधर बन चुका है।

देश के नेता, उद्योगपति, बुद्धिजीवी, लेखक, कलाकार, फिल्मी सितारे, पत्रकार, खिलाड़ी, जनांदोलनकारी, नौकरशाह, तरह-तरह के सिविल सोसायटी एक्टिविस्ट कॉरपोरेट पूंजीवाद के समर्थन और मजबूती की मुहिम में जुटे हैं। इनमें जो शामिल नहीं हैं, उनके बारे में माना जाता है उनकी प्रतिभा में जरूर कोई खोट या कमी है। नवउदारवाद और उसके पक्षधरों की स्थिति इतनी मजबूत है कि अब उनकी आलोचना भी उनके गुणों का बखान हो जाती है, और उनका पक्ष और मजबूत करती है।

जैसा कि हमने पहले भी कई बार बताया है, नवउदारवादियों के साथ प्रच्छन्न (छिपे हुए) नवउदारवादियों की एक बड़ी और मजबूत टीम तैयार हो चुकी है। वह शासक-वर्ग के साथ नाभिनाल-बद्ध है, और नवउदारवाद विरोध की राजनैतिक संभावनाओं को नष्ट करने में तत्पर रहती है। दरअसल, सीधे नवउदारवादियों के मुकाबले प्रच्छन्न नवउदारवादी जनता और समाजवाद के बड़े दुश्मन बने हुए हैं। नवउदारवाद के मुकाबले में उभरे सच्चे जनांदोलनों और समाजवादी राजनीति के प्रयासों को प्रच्छन्न नवउदारवादियों ने बार-बार भ्रष्ट किया हैा। इन्होंने एक बड़ा हल्ला, अंतर्राष्ट्रीय स्तर का, वर्ल्ड सोशल फोरम (डब्ल्यूएसएफ) के तत्वावधान में बोला था, और उससे बड़ा हमला, राष्ट्रीय स्तर पर, इंडिया अगेंस्ट करप्शन (आईएसी) के तत्वावधान में बोला हुआ है।

प्रछन्न नवउदारवादियों के लिए सब कुछ अच्छा हो सकता है; बुरी है तो केवल राजनीति। हालांकि उनकी अपनी राजनीतिक ऐषणाएं शायद ही कभी एक पल के लिए सोती हों!

डब्ल्यूएसएफ के समय कम से कम सांप्रदायिकता से बचाव था। गैर-राजनीतिक रूप में ही सही, ‘दूसरी दुनिया संभव है’ का नारा था। आईएसी के आंदोलन में संप्रदायवादी और धर्मनिरपेक्षतावादी आपस में मिल गए हैं और वे एक ‘जन लोकपाल’ के बदले नवउदारवादी व्यवस्था और नेतृत्व को अभयदान देते हैं।

आईएसी के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन का शुरुआती नारा था – ‘मनमोहन सिंह वोट चाहिए तो जन लोकपाल कानून लाओ’। अब बाबा रामदेव कहते घूम रहे हैं, ‘राहुल गांधी काला धन वापस लाओ, प्रधानमंत्री बन जाओ’। सुना है नवउदारवाद के उत्पाद इन बाबा ने विदेशों में जमा काला धन वापस लाने का आंदोलन फिर से छेड़ने के लिए अगस्त क्रांति दिवस को चुना है!

मुख्यधारा मीडिया पूरी तरह नवउदारवादियों और प्रच्छन्न नवउदारवादियों के साथ है, जिसमें नेता और मुद्दे कंपनियों के उत्पाद की तरह प्रचारित किए जाते हैं। नतीजा यह है कि भारतीय मानस संपूर्णता में शासक-अभिमुख यानी नवउदारवादी रुझान का बनता जा रहा है। नवउदारवादी नीतियों से प्रताड़ित जनता भी इस मुहिम की गिरफ्त में है। यह प्रक्रिया जब मुकम्मल हो जाएगी, कोई भी बदलाव संभव नहीं होगा। केवल फालतू लोगों का सफाया होगा। हम प्रच्छन्न नवउदारवादियों के इस तर्क के कायल नहीं हैं कि वे सरकार पर दबाव डाल कर गरीबों के लिए जनकल्याणकारी योजनाएं बनवाते हैं। उनकी यह मदद गरीबों को नहीं, कॉरपोरेट घरानों को सुरक्षित करती है।

हम हाल का एक वाकया बताना चाहते हैं। 8 जुलाई 2012 को पूना में समाजवादी नेता और लेखक/पत्रकार पन्नालाल सुराणा के सम्मान में एक कार्यक्रम आयोजित किया गया। अवसर उनके अस्सीवें साल में प्रवेश करने का था। कार्यक्रम के आयोजन में राष्ट्र सेवा दल की प्रमुख भूमिका थी, जिसके वे अध्यक्ष रह चुके हैं। महाराष्ट्र के हर जिले से आए करीब पांच सौ लोगों ने साने गुरुजी स्मारक पहुंच कर पन्न्नालाल जी को बधाई दी। व्यक्तिगत चंदा करके उगाहे गए ग्यारह लाख रुपयों का चेक भी उन्हें भेंट किया गया। सत्ता की राजनीति से बाहर किए गए राजनीतिक संघर्ष के लिए उत्तर भारत में ऐसा शालीन कार्यक्रम होना असंभव है। हमने अपनी आंखों से देखा कि एक व्यक्ति नंगे पैर आया और स्वागत कक्ष में चंदा देकर रसीद ली।

कार्यक्रम हालांकि पन्नालाल जी के अभिनंदन का था, लेकिन चर्चा ज्यादातर राजनीतिक हो गई। स्वागत समिति के अध्यक्ष भाई वैद्य ने पन्नालाल जी के व्यक्तित्व और लेखकीय कृतित्व के साथ समाजवादी आंदोलन में उनके राजनीतिक संघर्ष पर भी प्रकाश डाला। मुख्य अतिथि जस्टिस राजेंद्र सच्चर ने अपने वक्तव्य में अवसरोपयुक्त टिप्पणी करने के साथ कार्यक्रम की अध्यक्ष अरुणा राय को संबोधित करते हुए कहा कि वे एक बार फिर उन्हें सक्रिय राजनीति में आने की अपील करके उलझन में डालना चाहते हैं। वे शायद पहले भी कतिपय अवसरों पर उनसे वैसी अपील कर चुके होंगे। उन्होंने दूसरे मुख्य अतिथि ऊर्जा मंत्री सुशील कुमार शिंदे को भी नवउदारवादी नीतियों के दुष्परिणामों की चर्चा करके उलझन में डाला।

शिंदे साहब, जो कार्यक्रम में शुरू से अंत तक मौजूद रहे, का भाषण काफी लंबा था। वे नवउदारवादी नीतियों की जरूरत और उनसे होने वाले फायदों पर बोले। पन्नालाल जी को हालांकि आयोजकों और वहां आने वाले शुभेच्छुकों का धन्यवाद ही करना था, लेकिन समाजवादी प्रतिबद्धता और राजनीतिक संघर्ष के तहत उन्होंने अपने भाषण में शिंदे साहब की धारणाओं का जोरदार ढंग से खंडन किया।

हमें अच्छा लगा कि एक नागरिक अभिनंदन के कार्यक्रम में अच्छी-खासी राजनीतिक बहस सुनने को मिली। लेकिन आश्चर्य भी हुआ कि राष्ट्रीय सलाहकार समिति की सदस्य अरुणा राय ने अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में सक्रिय राजनीति की बात करने वालों पर बिना झिझक तानाकशी की। उनका निशाना स्पष्टत: कॉरपोरेट पूंजीवाद के खिलाफ समाजवाद की राजनीति करने वालों पर था। गोया सक्रिय राजनीति करने का अधिकार उस पार्टी और सरकार के लिए सुरक्षित है, जिसकी वे सलाहकार हैं! उन्होंने कहा कि वे राजनीति को ज्यादा अच्छी तरह समझती हैं, और जो कर रही हैं, वही सच्ची राजनीति है। उनके मुताबिक, यह उसी राजनीतिक चेतना का असर है कि लोग अब सवाल पूछ रहे हैं। उन्होंने वैसी ही सच्ची राजनीतिक चेतना फैलाने में नर्मदा बचाओ आंदोलन का हवाला भी दिया। अनुमान लगाया जा सकता है कि मनरेगा को वे अपने विचारों की राजनीतिक चेतना की देशव्यापी पाठशाला मानती ही होंगी।

काफी ऊंचे ओटले से ऊंची आवाज में बोलते हुए उन्होंने घोषणा की कि असली आजादी तो अब आई है, जब उन जैसे सिविल सोसायटी एक्टिविस्टों ने लोगों को जागरूक करना शुरू किया है।

अरुणा राय अपने वक्तव्य को लेकर इस कदर आत्मव्यामोहित थीं कि अपनी मान्यता और भूमिका पर रंच मात्र भी आलोचनात्मक निगाह डालने को तैयार नहीं दिखीं।

दरअसल, एनजीओ वालों का राजनीतिक संघर्ष से कोई वास्ता नहीं रहा होता। वे उसके बारे में वाकफियत भी नहीं रखना चाहते। वे गरीबों को साल में सौ दिन सौ रुपया का काम देने को बहुत बड़ी क्रांति मान कर अपनी पीठ ठोंकते हैं, और इस सच्चाई से आंखें फेरे रहते हैं कि देश में कॉरपोरेट क्रांति हो चुकी है। अगस्त क्रांति के दिन यह समझना जरूरी है इन लोगों का स्वार्थ शासक-वर्ग के साथ नाभिनाल-बद्ध है। वरना सीधी बात है, यदि आप किसी सरकार या पार्टी की विचारधारा से सहमत नहीं हैं, तो उसके सलाहकार नहीं बन सकते; सामाजिक काम करने के लिए उस सरकार के प्रोजेक्ट नहीं ले सकते।

सोनिया गांधी की सलाहकार समिति, जिसका सदस्य बनने के लिए मारामारी होती है, द्वारा जो भी काम संपादित होता है, सरकार के लिए होता है; और कांग्रेसनीत यूपीए सरकार कॉरपोरेट पूंजीवाद की पैरोकार सरकार है।

मजेदारी यह है कि जनता को धोखा देने का यह खेल खुले आम और बिना किसी ग्लानि के चलता है। अपने वायसराय को लिखे खत में लोहिया ने जिन्हें ‘आपके आदमी’ बताया है, सरकारों के सलाहकार बने प्रच्छन्न नवउदारवादी उसी श्रेणी में आते हैं।

सोनिया गांधी के इन सलाहकारों से पूछा जा सकता है कि आप भारत की करोड़ों माताओं की दुर्दशा में शामिल हैं; उन माताओं के करोड़ों बच्चों के कुपोषण, बीमारी, असमय मृत्यु, अशिक्षा की जिम्मेदारी आप पर आयद होती है; बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा देश के संसाधनों की लूट, लोगों का विस्थापन और लाखों किसानों की आत्महत्या किसी दैवीय प्रकोप की नहीं, आपकी देन हैं; क्योंकि आप सरकार के सलाहकार हैं; और उस सरकार की राजनीति से अलग राजनीति के धुर विरोधी!

सीधे राजनीति ही रास्ता

भारत पर आए नवउदारवादी गुलामी के खतरे को सबसे पहले देख पाने वाले समाजवादी नेता और चिंतक किशन पटनायक ने यह माना था कि नवउदारवाद के विरोध और विकल्प के लिए जनांदोलनों का राजनीतिकरण और एकीकरण होना चाहिए। वह निश्चित ही एक प्रासंगिक और स्फूर्तिदायक विचार था। किशन पटनायक की साख भी थी, और समस्या की सम्यक समझ भी। इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए उन्होंने कई वरिष्ठ और युवा समाजवादी साथियों के साथ मिलकर पहल की। 1995 में एक नई राजनीतिक पार्टी समाजवादी जन परिषद (सजप) का गठन हुआ, जिसके तहत वैकल्पिक राजनीति और वैकल्पिक विकास का विचार लोगों के सामने रखा गया। हालांकि किशन पटनायक की आशा फलीभूत नहीं हो पाई। भारत सहित दुनिया के सभी देशों में एनजीओ का तंत्र नवउदारवाद विरोधी किसी भी राजनीतिक पहल को निष्क्रिय करने के लिए स्वाभाविक तौर पर सक्रिय रहता है। उसी तंत्र में फंस कर किशन पटनायक की मौत हो गई।

नवउदारवाद के खिलाफ सजप के अलावा और भी कई राजनैतिक प्रयास हुए हैं।

उदारीकरण के पहले 10 सालों में मुख्यधारा राजनीति की तरफ से भी उसके विरोध में कुछ न कुछ स्वर उठते रहे। देश पर देश के शासक-वर्ग द्वारा नवउदारवादी हमले के बाद उसका मुकाबला करने की प्रेरणा से चुनाव आयोग में बड़ी संख्या में राजनीतिक पार्टियों का पंजीकरण हुआ है। लेकिन कोई प्रयास कामयाब नहीं हो पा रहा है। बल्कि ऐसे प्रयासों को नवउदारवाद समर्थकों द्वारा लोकतंत्र को कमजोर करने वाला प्रचारित किया जाता है। इस गतिरोध के कई कारण हैं, लेकिन शासक-अभिमुख प्रछन्न नवउदारवादियों, जो कभी जनांदोलनकारियों के और कभी सिविल सोसायटी एक्टिविस्टों की सूरत में होते हैं, की नकारात्मक भूमिका उनमें प्रमुख है।

अगस्त क्रांति की सत्तरवीं सालगिरह पर हम यह समझ लें, कि एनजीओ आधारित जनांदोलनकारी राजनैतिक प्रयासों पर पानी फेरने का काम करते हैं, तो आगे का रास्ता बनेगा। कहने को ये गैर-सरकारी संस्थाएं हैं, लेकिन उनसे ज्यादा सरकारी सरकारों के अपने विभाग भी नहीं होते। इन्होंने जेनुइन प्रतिरोध आंदोलनों – चाहे वे किसानों के हों, आदिवासियों के हों, मजदूरों के हों, छोटे व्यापारियों के हों, निचले दरजे के सरकारी कर्मचारियों के हों या छात्रों के – आगे नहीं बढ़ने दिया। वैश्विक कॉरपोरेट पूंजीवाद की हमसफर फोर्ड फाउंडेशन, राकफेलर जैसी दान-दाता संस्थाओं और उसी तरह की बहुत-सी ईनाम-दाता संस्थाओं के धन ने समाजवादी राजनीति के रास्ते को अवरुद्ध किया हुआ है। जैसे बड़े नेता और पार्टियां अपने यहां स्वतंत्र राजनीतिक सोच के कार्यकर्ताओं को नहीं पनपने देते, वैसे ही प्रच्छन्न नवउदारवादी समाज में राजनीतिक पहल और प्रक्रिया को नहीं संभव होने देते। इनका मानना है कि हर कार्यकर्ता की कीमत होती है, उसे चुकाने वाला एनजीओ अथवा ईनाम-दाता संस्था होनी चाहिए। कहना न होगा कि कीमत और मुनाफे से जुड़ी यह सोच पूंजीवाद की पैदाइश है। इन्हें सुरक्षा का दोहरा कवच प्राप्त है – भारत के शासक-वर्ग का, और वैश्विक आर्थिक संस्थाओं का। इन्हें कारेपोरेट पूंजीवाद के ‘सिविल सुरक्षा बल’ कहा जा सकता है।

एक और बात गौर की जा सकती है, अंग्रेजी नहीं जानने वाले लोग इनकी दुनिया के सदस्य नहीं बन सकते; उन्हें साम्राज्यवादी चाल के इन प्यादों का प्यादा बन कर रहना होता है। जनता की स्वतंत्र राजनीति भला ये कैसे बर्दाश्त कर सकते हैं?

अगस्त क्रांति दिवस की सही प्रेरणा यही हो सकती है कि नव-साम्राज्यवादी गुलामी और उसे लादने वाले शासक-वर्ग के खिलाफ संघर्ष की राजनीति संगठित और मजबूत हो। बाकी सारे सामाजिक-संस्कृतिक प्रयास उस राजनीति को पुष्ट और बहुआयामी बनाने में लगें। हालांकि पूंजीवाद की चौतरफा गिरफ्त और कठिनाइयों में जीने की मजबूरियों ने देश की जनता को राजनीतिक रूप से लगभग अचेत कर दिया है।

दरअसल, नवउदारवाद समाज में अराजनीतिकरण की प्रक्रिया को तेज करता है। इसलिए नई राजनीतिक पहल को जनता का समर्थन नहीं मिल पाता। मध्य-वर्ग राजनीति-द्वेषी बन गया है और दिन-रात उसका प्रचार करता है। इस तरह वह मौजूदा राजनीति को ही मजबूत करता है, जो धनबल, बाहुबल, संप्रदायवाद, जातिवाद, व्यक्तिवाद , परिवारवाद, वंशवाद, क्षेत्रवाद आदि के बल पर चलती है। ऐसे कठिन परिदृश्य में जो राजनीतिक संगठन जनता के पक्ष को मजबूत बनाने के लिए पारदर्शी और सतत राजनीतिक संघर्ष करेगा, एक दिन उसे सफलता मिलेगी।   

हालांकि प्रच्छन्न नवउदारवादियों को दूर रखना बहुत मुश्किल होगा, लेकिन दूर रखे बगैर नवउदारवाद विरोध की राजनीति खड़ी नहीं हो सकती।

20-22 साल के अनुभव के बाद यह स्वीकार करना चाहिए कि अगर भारत में समाजवादी राजनीतिक ताकत खड़ी हो पाएगी, तो प्रछन्न नवउदारवादियों से बच कर ही हो पाएगी।

प्रेम सिंह

25 जुलाई 2012

(समाजवादी आंदोलन से जुड़े लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व शिक्षक और भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला के पूर्व फ़ेलो हैं।) 

August Revolution and India’s ruling class

मनोहरा देवी निराला की प्रेरक थीं

suryakant tripathi nirala

निराला की प्रेरक कौन थीं?

हिन्दी में सूर्यकान्त त्रिपाठी ´निराला´ पर जब भी बातें होती हैं तो उनकी पत्नी की भूमिका का कभी जिक्र नहीं होता। सच यह है निराला को हिन्दीसेवा के लिए प्रेरित उनकी पत्नी ने किया।

निराला की ´कुल्लीभाट´ रचना बेहद दिलचस्प है। रामविलास शर्मा ने ´निराला की साहित्य साधना´में बहुत ही रोचक ढ़ंग से समूचे प्रसंग को उद्घाटित किया है।

निराला की पत्नी के कथासूत्र को ´कुल्लीभाट´ में देखें तो चीजों को बेहतर ढ़ंग से समझ सकते हैं।

मनोहरा देवी की समझ में निराला उस समय हिन्दी के पूरे गँवार थे, ´बिलकुल ठोस मूर्ख´। हिन्दी को लेकर पति-पत्नी की बातचीत इस प्रकार हुई है-

पति- तुम हिन्दी- हिन्दी करती हो, हिन्दी में क्या है ॽ

पत्नी- जब तुम्हें आती ही नहीं, तब कुछ नहीं है।

पति- मुझे हिन्दी नहीं आती ॽ

पत्नी- वह तो तुम्हारी ज़बान बतलाती है। बैसवाड़ी बोल लेते हो, तुलसीकृत रामायण पढ़ी है, बस तुम खड़ी बोली का तुम क्या जानते हो ॽ

संवाद के बाद पूरी बात बतलाते हुए निराला ने लिखा है कि उनकी पत्नी ने खड़ी बोली के बहुत-से महारथियों के नाम गिना दिये। पर मनोहरा देवी ने भजन गाया तो तुलसीदास का।

उस समय मनोहरादेवी की उम्र 13-14 साल रही होगी। उपरोक्त संवाद में यह देखें कि निराला की पत्नी की कितनी विकसित चेतना थी कि वह खड़ी बोली हिन्दी के पक्ष में बोल रही थीं, लेकिन उस समय निराला के पास वह चेतना नहीं थी।

निराला की पत्नी गांव में रहते हुए भी खड़ी बोली हिन्दी के नए कवियों से वाकिफ थीं, निराला नहीं।

निराला ने जब अपनी पत्नी से यह सवाल किया कि हिन्दी में क्या है ॽ तो वे नहीं जानते थे कि उनको सटीक उत्तर भी मिलेगा। यह संवाद जिस समय हो रहा था निराला 16साल के रहे होंगे। निराला का मुँह बंद करने के लिए मनोहरा देवी ने उसी समय निराला को खड़ी बोली हिन्दी के दो  गीत गाकर  सुनाए। यह उस समय गांव में रहने वाली 13-14 साल की लड़की की चेतना थी।

निराला के अनुसार जो दो गीत सुनाए वे हैं-

पहला- अगर है चाह मिलने की तो हरदम लौ लगाता जा।

दूसरा- सासुजी का छोकड़ा, मेरी ठोड़ी पर रख दिया हाथ।

बहुत गम खा गई नहीं चाँटे लगाती दो-चार।।

रामविलास शर्मा ने इस समूचे प्रसंग पर लिखा है ´निराला को जिस बात ने प्रभावित किया,वह था मनोहरा देवी का मधुर कण्ठ-स्वर।

श्री रामचन्द्र कृपालु भजु मन-सुनकर पहलीबार निराला के ज्ञान नेत्र खुले; उन्हें संगीत के साथ काव्य के अमित प्रकाश का ज्ञान हुआ। यह भजन निराला जीवन भर गाते रहे; इससे अधिक उनके हृदय को प्रभावित करने वाला दूसरा गीत संसार में न था।

मनोहरा देवी गढ़ाकोला में रामायण पढ़ा करती थीं। निराला के चाचा दरवाजे पर बैठे सुनते थे। मनोहरा देवी ने निराला का परिचय खड़ी बोली से नहीं, तुलसीदास से कराया। तुलसीदास को ज्ञान मिला,पत्नी के उपदेश से; निराला को हिन्दीसेवा के लिए प्रवृत्त किया मनोहरादेवी ने !´

प्रोफेसर जगदीश्वर चतुर्वेदी

सुगम जी के बहाने : हे राम! अब वे कविता पर बुलडोजर चलाएंगे !

badal saroj

सुगम जी के बहाने अब कविता पर बुलडोजर

लोकप्रिय जनकवि महेश कटारे सुगम का घर तोड़ने का नोटिस

देश के प्रतिष्ठित लोकप्रिय जनकवि महेश कटारे सुगम की कविताओं से हुक्मरान इतना भयभीत हो गए हैं कि अब उन्हें डराने धमकाने की साजिश रचने लगे हैं। मध्य प्रदेश के बीना शहर में चंद्रशेखर वार्ड नंबर 7 की माथुर कॉलोनी के एक दशक से ज्यादा पुराने घर को तोड़ने का नोटिस स्थानीय नगरपालिका के जरिये दे दिया गया है। जिस कालोनी में सुगम जी रहते हैं उसमें सिर्फ उनका मकान ही नहीं है – लेकिन नोटिस उन्हीं के घर के लिए दिया गया है।

यह पूरी कार्यवाही किस कदर दुर्भावनापूर्ण है यह इन तीन बातों से साफ़ हो जाता है।

एक; 26 मार्च 2011 में नजूल ने अनापत्ति प्रमाणपत्र दिया और नगर पालिका ने इस मकान को बनाने का नक्शा पास करते हुए बाकायदा फीस लेकर अनुमति दी।

दो; मकान बना भी उसी के मुताबिक़ मगर अचानक 2 अगस्त 2022 को नगर पालिका उन्हें नोटिस थमाकर “माथुर कालोनी में मकान बनाने को” ही अवैध ठहराने का नोटिस थमा देती है और उसे नगर पालिका अधिनियम 1961 की धारा 187 (8) के अंतर्गत दण्डनीय अपराध करार देते हुए पेश होने का हुकुम जारी करती है।

तीन ; मकान श्रीमती मीरा कटारे जी के नाम है जबकि नोटिस उन प्रभात कटारे के नाम से दिया गया है जिनका कोई मकान ही नहीं है।

फिर निशाने पर कवि साहित्यकार सुगम जी का मकान ही क्यों है ?

वजह यह है कि हाल के दिनों में जिस धार और निरंतरता के साथ सुगम जी की कविताओं ने अंधियारे पर जो वार पर वार किये हैं वह बेमिसाल है। सुगम जी ने जनता की अनुभूतियों और अहसास को स्वर दिए हैं, बुंदेली, हिंदी की अपनी कविताओं, ग़ज़लों, गीतों, रुबाई, मुक्तक, दोहों और सानेटों, कहानियों तथा उपन्यास के जरिये सन्नाटे को तोड़ा है, “अब कुछ नहीं हो सकता” के गढ़े गए कुहासे को चूर चूर करते हुए खुद को मजबूर समझने वाले देशवासियों के आत्मविश्वास को जगाते हुए, इरादों को मजबूती देते हुए, जो राह दिखाई है उसने ठगों के चवन्नी भर के दिलों में दहशत पैदा कर दी है।

सुगम जी बेहद उर्वर और बहुआयामी रचनाकार हैं। अभी तक उनके 31 संग्रह आ चुके हैं। इनमें 12 ग़ज़ल संग्रह, 6 बुंदेली ग़ज़ल संग्रह, 6 कविता संग्रह, 1 नवगीत संग्रह, 1 समकालीन कविता पर किताब, 1 बालगीत संग्रह के साथ एक उपन्यास और 2 कथा संग्रह भी हैं। उनकी दो लम्बी कविताओं सीता के त्यागे जाने पर केंद्रित कविता “वैदेही विषाद” और द्रौपदी के चीरहरण पर लिखी “प्रश्न व्यूह” भी हैं। इनके अलावा 6 संग्रह आने वाले हैं।

सुगम अनाम या अनजाने कवि रचनाकार नहीं हैं। उन्हें जनकवि मुकुट बिहारी सरोज स्मृति सम्मान ग्वालियर, सहभाषा सम्मान दिल्ली, दुष्यंत कुमार सम्मान भोपाल, नागार्जुन – आलोक स्मृति सम्मान गया बिहार, विश्वंभर नाथ चतुर्वेदी सम्मान मथुरा, आर्य स्मृति सम्मान किताबघर दिल्ली, स्पेनिन साहित्य गौरव सम्मान रांची झारखंड, कमलेश्वर कथा स्मृति सम्मान मुम्बई, लोक साहित्य अलंकरण जबलपुर, मान बहादुर लहक सम्मान आदि अनेकों सम्मानों से सम्मानित किया जा चुका है।

कुल मिलाकर यह कि बिना किसी अतिशयोक्ति और अतिरंजना के महेश कटारे सुगम वर्तमान कालखंड के सबसे उर्वर जनकवि हैं; जनभाषा के कवि हैं। बुंदेली को उन्होंने कमाल की ऊंचाई और देशव्यापी लोकप्रियता दिलाई है। कविता को उन्होंने जन भावनाओं की अभिव्यक्ति का जरिया और प्रतिरोध का औजार बनाया है। लिहाजा यह साफ़ समझना होगा कि उनके विरुद्ध साजिश सिर्फ बीना नाम के शहर के चंद्रशेखर वार्ड नंबर 7 में रहने वाले एक सेवानिवृत्त शासकीय कर्मचारी महेश कटारे के विरूद्ध नहीं है; यह कवि साहित्यकार महेश कटारे ‘सुगम’ के साहित्य और सृजन पर हमला है और इसे यही माना जाएगा।

mahesh katare sugam ji
महेश कटारे सुगम (mahesh katare sugam ji)

नगर पालिका के इस घर गिराऊ नोटिस की खबर सार्वजनिक होने के बाद देश भर के वरिष्ठ कवियों और रचनाकारों ने इसकी निंदा और भर्त्सना की है।

अब तक विष्णु नागर, राजेश जोशी, कुमार अम्बुज, मनमोहन, शुभा, मणि मोहन, देवेंद्र आर्य, लीलाधर मंडलोई, शंहशाह आलम, जीवन सिंह, संदीप मील, मोहन श्रोत्रिय, रामप्रकाश त्रिपाठी, सुधा अरोड़ा, श्रुति कुशवाहा, मालिनी गौतम, अली अब्बास उम्मीद, नंदलाल जी, राम सेंगर, वीरेंद्र जैन, अनवारे इस्लाम, मनोज कुलकर्णी, सुरेंद्र रघुवंशी, नरेंद्र कुमार मौर्य, जाहिद खान, कवि जनेश्वर, बालेन्द्र कुमार परसाई, हर्ष देव, सत्यम सागर, डॉ राकेश पाठक, वसंत सकरगाए, केशव तिवारी, डॉ महेंद्र प्रताप सिंह, डॉ राम विद्रोही, जवरीमल्ल पारख, अरबाज खान, नलिन रंजन सिंह, कवि अनिल दीक्षित,  जीवेश प्रभाकर, शेफाली शर्मा, गोपाल राठी, राकेश दीक्षित, अभिषेक अंशु, सुधीर सिंह, संजय पराते, कुमार इलाहाबादी, सरोज स्मृति न्यास की सचिव मान्यता सरोज सहित सैकड़ों साहित्यिक सामाजिक कार्यकर्ता अपनी प्रतिक्रिया दे चुके हैं।

इन सभी ने मांग की है कि इस बेहूदगी को तत्काल रोका जाना चाहिए; इस तरह की साजिश करने वालों तथा सत्ता में बैठे लोगों को सुगम जी से माफी मांगनी चाहिए। उन्होंने प्रतिरोध और जनोन्मुखी सकारात्मक सृजन और साहित्य के सर्जकों, श्रोताओं, पाठकों और नागरिकों से इसके विरुद्ध आवाज उठाने की भी अपील की है !!

मूर्खत्व के अभिषेक और तर्क तथा विवेक के तिरस्कार के इस दौर के महा-खलनायकों के साथ दिक्कत यह है कि वे कविता के मुकाबले कविता, ग़ज़ल के मुकाबले ग़ज़ल तो लिख नहीं सकते – वे सिर्फ पत्थर फेंक सकते हैं। उनके पूरे कुल कुटुंब ने इतिहास से वर्तमान तक आज तक कोई निर्माण किया ही नहीं है , सिर्फ ध्वंस और विनाश किया है। वही तिकड़म वे सुगम जी के साथ आजमाना चाहते है; उन्हें नहीं तोड़ पाए तो अब उनका छोटा सा आशियाना तोड़ना चाहते हैं।

अपढ़, कुपढ़, बर्बर और चिढ़ोकरे बौने तानाशाह सोचते हैं कि ऐसा करने से कवि डर जाएगा, अपनी छत बचाने के लिए अपनी जुबान और कलम को किसी चिरकुट राजा के यहां गिरवी रख आएगा। उसका भांड़ और दरबारी बन जाएगा। न हुआ तो कमसेकम खामोश तो हो ही जाएगा। ऐसा ही कुछ शेखचिल्ली ख्वाब देखकर बीना (मप्र) की नगर पालिका ने जनकवि महेश कटारे सुगम जी के घर को तोड़ने का नोटिस दे मारा है।

मगर वे भूल जाते हैं कि कविता का घर तो जनमानस के दिल और दिमाग में होता है इसलिए उसका वे कुछ बिगाड़ नहीं सकते। हद से हद कवि को बेघर कर सकते हैं, मगर ऐसा करते में भी भूल जाते हैं कि बेघर कवि में ज्यादा शक्ति होती है – इतनी कि अक्सर उसने सत्तासीनों को दर दर की ठोकरें खिलवाई हैं।

बादल सरोज

सम्पादक लोकजतन,

संयुक्त सचिव अखिल भारतीय किसान सभा

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On the pretext of Sugam ji: Oh Ram! Now they will bulldozer on Kavita!

अंधविश्वास और दैवी शक्ति की सत्ता का प्रौपेगंडा और हिटलर के अंधविश्वास

adolf hitler

हिटलर के अंधविश्वास

हिटलर ने जर्मनी में अपनी सत्ता प्रतिष्ठित करने के लिए अंधविश्वास और दैवी शक्ति की सत्ता के प्रौपेगैंडा का जमकर इस्तेमाल किया। उसका मानना था शैतान को परास्त करने, पाप से मुक्ति और जीवन की समस्याओं से मुक्ति का उपाय है दैवी शक्ति में विश्वास करो।

हिटलर ने कितने समय शासन किया?

हिटलर ने बारह साल शासन किया लेकिन जनता से वह सबसे अधिक दूर रहा। वह जनता में मिथ बना रहा। उसे मिथ बनाने में उसके प्रचारकों ने मदद की। हिटलर सत्ता में रहते हुए जितना अपील करता था, सत्ता से जाने के बाद वह खलनायक बन गया। उससे आम जनता नफ़रत करने लगी, वह नफ़रत का सबसे बड़ा प्रतीक बन गया। हिटलर राक्षस और नृशंसता का प्रतीक बन गया।

चर्चित किताब ‘दि नाजी ऑकल्ट वार : हिटलर इंपेक्ट विद् दि फोर्सेज ऑफ इविल’(The Nazi Occult War: Hitler Impact with the Forces of Evil By Barrington Barber and Michael Fitzgerald in 2013) में मिशेल फिट्जगेरल्ड ने इस पहलू का विस्तार से विश्लेषण किया है।

हिटलर ने अपने कल्ट या नायकत्व के निर्माण के लिए विभिन्न गिरजाघरों पर जमकर लाइट की व्यवस्था कराई। उसकी न्यूरेमबर्ग की 1936 की रैली की रोशनी और चमक-दमक का गिरिजाघरों पर कराई की रोशनी से गहरा संबंध है।

हिटलर की रणनीति (Hitler’s Strategy) थी गिरिजाघरों को सजाओ, जनता में धर्म का प्रचार करो और नायक पदवी पाओ।

हिटलर जब आया था तो उसका लक्ष्य था पूँजीपतियों की सेवा करना। सत्ता उसके लिए राजनीति न होकर एक तरह से बड़ा बिज़नेस थी। बड़ी संख्या में बेकारी थी, जिसने हिटलर को सत्ता में आने का मौका दिया। बेकारी और पूँजीवादी राजनीतिक असफलताओं से ध्यान हटाने के लिए हिटलर ने सामूहिक स्व-शासन,  राष्ट्र पर गर्व करो, जर्मन समुदाय की अनुभूति में रहो, सामुदायिक भावोन्माद में रहो, स्वयं पर गर्व करो, यह महसूस करो कि तुम महान हिटलर के समर्थक हो, जर्मनी के स्वामी हो और औरतों को आकर्षित करने के लिए उसने सेक्स अपील का दुरुपयोग किया।

भाषणकला के ज़रिए जर्मनी की जनता की सामूहिक और राष्ट्रीय भावनाओं का जमकर दोहन किया। वह जनता की कमियों और शक्ति का नाजी प्रचार अभियान में जमकर इस्तेमाल करता था।

हिटलर के अंधविश्वासों का व्यापकर स्तर पर मनोवैज्ञानिक विश्लेषण मिलता है।

हिटलर ने दूसरा अंध विश्वास यह पैदा किया कि वह राष्ट्रपिता है। संरक्षक है। तारणहार है। वह जो कह रहा है वही भविष्य है। इस अंधविश्वास को पैदा करने के लिए उसने पहले जनता में ‘राष्ट्र के अपमान’ का खूब प्रचार किया।

प्रथम विश्वयुद्ध में जर्मनी की पराजय (Germany’s defeat in World War I) और उसके बाद हुए समझौते को हिटलर ने राष्ट्रीय अपमान कहा।जर्मनों के राष्ट्रीय अपमान को दूर करने के लिए अपने को नायक और राष्ट्रपिता के रूप में पेश किया। इसके बहाने उसने जीवन के हरेक क्षेत्र में अविवेकवाद का प्रसार किया और साधारण जनता को अविवेकवाद के नशे में डुबो दिया।

हिटलर ने यह भी कहा कि विज्ञान में तरक़्क़ी करके जर्मनी अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा हासिल नहीं कर सकता। उसने पूर्वाग्रहों के दायरे के परे जाकर नस्लीय नफ़रत का जमकर प्रचार किया।

क्या हिटलर की स्टालिन-माओ से तुलना उचित है?

अनेक लोग हैं जो हिटलर की स्टालिन-माओ से तुलना (Comparison of Hitler with Stalin-Mao) करते हैं। लेकिन वे यह भूल जाते हैं कि हिटलर की स्टालिन-माओ से तुलना करना सही नहीं है। क्योंकि इन नेताओं ने नस्लीय नफ़रत का अपने देश की जनता में प्रचार नहीं किया। दूसरा यह कि अपने राजनीतिक सत्ता विस्तार के लिए कभी किसी देश पर हमला नहीं किया। तीसरा बड़ा कारण है विज्ञान और विवेकवाद के प्रति अपमानजनक आचरण नहीं किया, जबकि हिटलर तो विज्ञान और विवेकवाद को एकसिरे से अस्वीकार करता था। उनका अपमान करता था।

हिटलर को जर्मनी के राष्ट्र पिता बनाने में मेनीपुलेटेड प्रौपेगैंडा की महत्वपूर्ण भूमिका थी। नरसंहार और युद्ध उसके प्रमुख कार्यक्षेत्र थे।

हिटलर का भाग्यवाद और उससे जुड़े भाग्यवाद में गहरा विश्वास था। इसे जर्मनी में ‘हॉरविगेर ग्लेसिकल कॉस्मोगोनी’ कहते हैं।

हिटलर के विचारों पर अविवेकवाद की गहरी छाप है। उसका सत्ता में आना और नस्लवाद के प्रति अतिरिक्त आग्रह सबसे ख़तरनाक चीज थी। भाग्यवाद की पराकाष्ठा यह थी कि गोयबेल्स ने एक ज्योतिषी से जर्मनी की जन्मकुंडली को भी दिखाया था। खासकर जब वह सोवियत संघ से हार रहा था तब उसने जर्मनी  की जन्मकुंडली दिखाई थी। आम तौर पर इतिहासकार इन पक्षों की अवहेलना करते हैं या कम करके आँकते हैं। कुंडली दिखाने और अविवेकवाद का सहारा लेने से जर्मनी की जनता के दुख दूर होने वाले नहीं हैं। भाग्यवाद और अंधविश्वास से जुड़े कारकों का हिटलर और नाजियों पर गहरा असर था।

जर्मनी में बारह साल के नाजी शासन ने जो मॉडल दिया जिसे अविवेकवादी शासन प्रणाली कहते हैं, इसमें आम लोगों में हिटलर के जादुई शासन की बातें खूब की गईं। जादुई शासन असल में दैवी भावना और अंधविश्वास से प्रेरित अवधारणा है।

हिटलर और उनकी शासक मंडली यह मानती थी कि वे जिस तरह शासन कर रहे हैं उस तरह का शासन अनंतकाल तक जर्मनी में चलेगा और यूरोप में भी चलेगा। इस क्रम में दैवीय शक्तियों के प्रचार प्रसार पर सबसे अधिक ज़ोर दिया गया।

सवाल यह है जर्मनी जैसे देश में, ज़ो विवेकवाद और प्रबोधनयुगीन चेतना से भरा हुआ देश था, वहाँ दैवीय चमत्कार और अंधविश्वासों पर विश्वास की चेतना कैसे आई? देश ऐसे लोगों के हाथ में कैसे चला गया जो विवेकवाद और प्रबोधनयुगीन मूल्यों को एकदम नहीं मानते थे। ये ही लोग नस्ल की कृत्रिम धारणा में विश्वास करते थे। महामानव में विश्वास करते थे। जर्मनी को शुद्ध करने के लिए नरसंहार में विश्वास करते थे। उनका मानना था घटिया नस्ल भ्रष्टाचार की देन है।

हिटलर अंधविश्वासी कैसे बना

हिटलर का अंधविश्वास से पहली बार परिचय तब हुआ जब वह विएना में रहता था और उसके पास रहने की जगह नहीं था निराश्रितों के लिए बने शेल्टर होम में उसने शरण ली थी। उसमें ही उसने यह बात सीखी कि अंधविश्वास वर्तमान यथार्थ से पलायन की शिक्षा देते हैं।

उसी समय जोजेफ ग्रिनेर नामक व्यक्ति ने हिटलर को अनेक जादू-टोने सिखाए। इनके ज़रिए ही हिटलर ने साधारण लोगों में शक्ति पाने का मंत्र सीखा। यह सीखा कि जादू किस तरह साधारण लोगों को नियंत्रण में लाने में मदद करते हैं। जादू के ज़रिए वर्तमान परिस्थितियों में अति काल्पनिक विजन और विचार बनाया जा सकता है। यह सब कुछ उसने अपने मित्र जोजेफ ग्रिनेर से सीखा। वहीं पर उसने सम्मोहन और योग भी सीखा। इसके अलावा उन तमाम चीजों को सीखा जो इच्छाशक्ति को मज़बूत बनाते हैं।

हिटलर ने ज्योतिषशास्त्र का अध्ययन किया। वह जन्मपत्री बनाना, अंक फलित ज्योतिष, हस्तलेखन  से भविष्य फल कथन, चेहरा और शरीर देखकर फलादेश करना जानता था। इसकी पुष्टि उसके उसके मित्रों ने भी की है। उनमें से एक हैं रेनहोल्ड हनीष, वे ग्रिनेर की तरह ही हिटलर के मित्र थे, उसके घर आते-जाते थे।

सन् 1909 में 20 साल की उम्र में हिटलर की मुलाक़ात एडोल्फ लंज से होती है। ये सज्जन विएना में जादू-टोने वालों का एक सम्प्रदाय चलाते थे। लंज एक न्यूजलेटर ओस्त्रा के नाम से प्रकाशित करते थे (Adolf Lanz, the head of an occult group based in Vienna. Lanz also published a newsletter called Ostara)। हिटलर इस न्यूजलेटर को नियमित एक तम्बाकू के दुकानदार से माँगकर लाकर पढ़ता था। उनकी लंज से अनेक मुलाक़ातें हुईं। उससे उन्होंने जादू -टोना-मंत्र आदि सीखे, उनकी ट्रेनिंग ली।

लंज के जादू-टोना और न्यूजलेटर ने पहली बार हिटलर के मन में यहूदी विरोधी भावबोध निर्मित किया। यहूदी विरोधी पूर्वाग्रहों (anti-Semitism) का पहली बार निर्माण किया।

लंज ने अपना जीवन एक सिस्टीरशियन संयासी के रुप में शुरू किया। बाद में २५ साल की उम्र में उनको सिस्टीरशियन मठ से निष्कासित कर दिया गया। उन पर अंट-शंट विचारों के प्रचार का आरोप भी लगा।

लंज ने मठ से निकलने के बाद सीधे जर्मन राष्ट्रवादी का मुखौटा धारण कर लिया। वह घनघोर यहूदी विरोधी था। वह आए दिन ईसा मसीह पर हमले किया करता था। बाद में उसने अपना मंदिर खोल लिया और वह कैथोलिक चर्च की तरह उपासना आदि करने लगा।

लंज ने आर्यन हीरोज़ के नाम से अपना सेंटर बनाया। जर्मनी और हंगरी में आर्यन हीरोज़ के नाम से उसने केन्द्र खोले। उसका मानना था इस पृथ्वी पर आर्य एकमात्र हैं जो भगवान के असली उपासक हैं, उनमें दैवीय ऊर्जा है।

लंज ने लोकतंत्र, पूंजीवाद और भौतिकवाद का घनघोर विरोध किया। उसका मानना था उसके रक्त में आर्यों का रक्त मिला हुआ है। इस सम्मिश्रण के कारण उसका ह्रास हुआ है। उत्थान के लिए शुद्ध आर्य नस्ल का होना जरूरी है। शुद्ध नस्ल का निर्माण शुद्ध रक्त के बिना संभव नहीं है। उसके कल्ट की सदस्यता के नस्लवादी नियम थे। उसका मानना था शुद्ध रक्त वालों के घुंघराले बाल, नीली आँखें और चौड़ा माथा होता है, छोटे हाथ और छोटे पैर होते हैं। लोगों को नस्लीय शुद्धता बनाए रखने के लिए शुद्ध नस्ल की औरतों से शादी करनी चाहिए। औरतों के ज़रिए ही इस दुनिया में पाप आता है। औरतें निकृष्ट होती हैं जैसे पशु निकृष्ट होते हैं।

एडोल्फ लंज की स्वर्ग की कल्पना

एडोल्फ लंज को नग्नता को लेकर ऑब्शेसन था। उसने ओस्त्रा न्यूजलेटर के कई अंक नग्नता पर ही निकाले। वह उस स्वर्ग की कल्पना करता था जहां आर्य नंगे नृत्य किया करते थे। वह आर्य औरतों को शुद्ध मानता था। वह अंतर्नस्लीय शादी के ख़िलाफ़ था। यदि पड़ोसी आर्य है तो उससे प्यार कर सकते हो, अन्य नस्ल का है तो प्रेम नहीं कर सकते। जो इस नियम को न माने उनको भूखा रखकर मार दिया जाय। उससे ज़बरदस्ती काम लिया जाय। चुनकर गर्भाधान किया जाय। नसबंदी की जाय। जबरिया काम लिया जाय। जंगल में छोड़ दिया जाय, यहां तक कि उनकी हत्या की जाय।

सन् १९३२ में अपने एक प्राइवेट पत्र में लंज ने लिखा हिटलर उसका एक छात्र है जो हमारे विचारों में निपुण है।

सन् १९३४ में लिखा राष्ट्रीय समाजवाद हमारे चिंतन की पहली अभिव्यक्ति है।

लंज से प्रेरणा लेकर ही हिटलर ने फ़ाइनल सोल्युशन नामक नरसंहार की धारणा लागू की थी।

हिटलर के ऊपर एडोल्फ लंज के विचारों का गहरा प्रभाव था। उसके विचारों से प्रभावित होकर ही हिटलर ने छह साल बाद सन् १९१३ में म्यूनिख के स्वाविंग क्षेत्र में हिटलर एक बोहेमियन के क्वार्टर में रहता था। साथ ही कलाकारों के साथ घुलने मिलने लगा। वहीं पर हिटलर ने अल्फ्रेड शुलेर और लुडविंग डेरलिथ के विचारों को जाना। उनके विचारों से सहमत होकर ही उसने शुद्ध रक्त की धारणा पर ज़ोर दिया।

शुद्ध रक्त माने यहूदी विरोधी। ये दोनों व्यक्ति उस व्यक्ति से प्रभावित थे जिसने म्यूनिख में कॉस्मिक कंशसनेस के नाम से केन्द्र खोल रखा था। इनका लक्ष्य था विश्व के मौजूदा राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक सिस्टम को उखाड़ फेंका जाय। ये दोनों विवेकवादी चिन्तन की बजाय सहजजात चिन्तन पर ज़ोर देते थे। वे अचेतन मन पर ज़ोर देते थे। वे नेचुरल आदिम समाज की ओर लौटने की बात करते थे। शुलेर ने ही सबसे पहले स्वस्तिक को चिह्न के रुप में चुना था। वह उसका व्यक्तिगत सिम्बल था। वह पवित्रता और शुद्ध रक्त पर ज़ोर देता था। हिटलर ने विएना में शुलेर के अनेक व्याख्यान सुने थे। बचपन में हिटलर पर स्वस्तिक का असर उतना नहीं था जितना नस्लवादी विचारों का था। तुलनात्मक तौर पर शुलेर के विचारों का बाद में हिटलर पर गहरा असर देखा गया। खासकर नस्लवादी विचारों से हिटलर गहरे प्रभावित था, इन्हीं नस्लवादी विचारों को उसने नाजी पार्टी का अस्त्र बनाया। साथ स्वस्तिक को उसने नाजी पार्टी का चिन्ह बनाया।

शुलेर के साथी लुडविंग डेरलिथ के विचार और शुलेर से भी अधिक कट्टर और नस्लवादी थे।वह काला जादू का मास्टर था। वह मानता था कि यदि पृथ्वी को बचाना है तो काले जादू के नरबलि देनी होगी। इन दोनों के विचारों से हिटलर परिचित था और उनको मानता भी था। इन दोनों के विचारों से प्रभावित होकर हिटलर ने एसएस नामक हत्यारे गिरोह का निर्माण किया। इनके विचारों के आधार पर ही शाकाहारवाद, आध्यात्मिकता और व्यवस्था के आधार पर गोल्डन सोसायटी का निर्माण करने का लक्ष्य रखा।

इस गोल्डन सोसायटी की अवधारणा पर हिटलर की विश्व की अवधारणा का गहरा असर था।

हिटलर के विचारों पर किन व्यक्तियों का प्रभाव पड़ा?

हिटलर के विचारों पर जिन व्यक्तियों का सन् १९१९ में निर्णायक प्रभाव पड़ा वे हैं म्यूनिख निवासी गोटफ्रीड फ़ेडर,डाइड्रिच इकर्ट और अल्फ्रेड रोजेनबर्ग, इन तीनों के विचारों ने हिटलर को निर्णायक तौर पर प्रभावित किया। ये तीनों जादू-टोना के मास्टर थे। इनके प्रभाव के कारण ही जर्मनी में निर्णायक परिवर्तन आए।

१२ सितम्बर १९१९ को म्यूनिख में जर्मन वर्कर्स पार्टी की एक गोष्ठी में हिटलर जब सुन रहे थे, उसमें मुख्य वक्ता था गोटफ्रीट फेडर, वे पूंजीवाद और उसकी बुराइयों पर बोल रहे थे। उस गोष्ठी में ५४ पार्टी सदस्य श्रोता थे। हिटलर यह भाषण सुन रहे थे और प्रभावित थे। उसी गोष्ठी में श्रोताओं के सवाल भी उठे जिनमें यह सुझाव दिया गया कि बावेरिया राज्य को जर्मनी से अलग कर दिया जाय और जर्मनी को राजवंश को सौंप दिया जाय।

हिटलर का आध्यात्मिक गुरु कौन था?

हिटलर के आध्यात्मिक गुरु के रुप में डिट्रिच इकर्ट को जाना जाता है। इकर्ट का मानना था  सही नेता के अभाव में जर्मन वर्कर्स पार्टी आंदोलन खड़ा नहीं कर सकती, सही नेता के लक्षण उनको  हिटलर में नज़र आए।

सन्१९१९ के पहले इकर्ट ने कहा कि हमें ऐसे व्यक्ति की ज़रूरत है जो मशीनगन की आवाज़ के सामने सीना तानकर खड़ा रह सके। बेहतर आदमी वह है जो यह जानता हो कि उसे अपने काम के बारे में कैसे बोलना है।

इकर्ट का मानना था कि हमें ऐसा नेता चाहिए जो महान जर्मन राष्ट्र को सारी दुनिया में शक्तिशाली राष्ट्र के रtप में प्रतिष्ठित करे। उसने जब पहली बार भूतपूर्व ऑस्ट्रियाई सैनिक हिटलर को देखा तो उसमें जर्मनी का मसीहा नज़र आया, जिसका जर्मनी की जनता लंबे समय से इंतज़ार कर रही थी।

हिटलर की भाषण कला पर सब मुग्ध थे। इकर्ट का मानना था कि हिटलर को जर्मनी को बचाने वाले भावी नेता के रtप में पेश किया जाना चाहिए।

इकर्ट ने हिटलर को बेहतर ढंग से शिक्षित किया। उसे जादू-टोने के विचारों की जमकर दीक्षा दी।

हिटलर के तीन विचार स्रोत हैं—

१.थुलि ऑर्डर.

२.अर्मानिन ऑर्डर, और

३.व्रिल सोसायटी।

इन तीन के ज़रिए हिटलर ने जादू-टोना आदि सीखे। इससे एकाग्रता, सत्ता की परिकल्पना और प्रत्यक्ष प्रभावित करने की कला सीखी।

इकर्ट ने  कहा हिटलर गुप्त महाशक्ति के संपर्क में है, यह हवा में उड़कर तिब्बत से आई है और हिटलर के अंदर प्रवेश कर गई है।

इकर्ट ने कहा कि हिटलर उस महाशक्ति के प्रतिनिधि के रूप में जर्मनी में काम करेगा।

कुर्ट लुडिस्के एक ज़माने में हिटलर के करीबी मित्र थे। उनका मानना है कि इकर्ट जीनियस है। वह हिटलर के आध्यात्मिक गुरू हैं। और वे नाजी मूवमेंट के ग्रांडफादर (बाबा) हैं।

इकर्ट ने जोसेनबर्ग से कहा कि हमें हिटलर पर विश्वास करना चाहिए। उसे नेता बनाना चाहिए, उसके ऊपर सिर्फ़ सितारे ही होंगे।

यहूदी हैं पूंजीवाद के जनक ?

फिदेर की तरह इकर्ट भी पूंजीवाद का घनघोर विरोधी था। फिदेर का मानना था ज़रूरी नहीं है कि पूंजीवाद विरोध और यहूदी विरोधी नजरिया एक ही साथ चले। लेकिन इकर्ट का मानना था पूंजीवाद विरोध और यहूदी विरोध एक दूसरे से जुड़े हैं। यहूदी जनक हैं पूंजीवाद के

हिटलर ने अपने यहूदी विरोधी लेखन (Adolf Hitler’s Anti-Semitic Writings,) में आर्यों के श्रेष्ठत्व का प्रतिपादन (Presentation of the superiority of the Aryans) करते हुए जादू-टोने की हिमायत की।

प्रोफेसर जगदीश्वर चतुर्वेदी

गुमनाम हिटलर और जर्मनी का अराजक लोकतंत्र | Why don’t we know Hitler? hastakshep | हस्तक्षेप

Superstition and propaganda of divine power and superstitions of Hitler

रवीन्द्रनाथ टैगोर जितने बड़े कवि थे, उससे बड़े विचारक भी थे

rabindranath tagore

आज रवीन्द्रनाथ टैगोर की पुण्यतिथि है (Today is the death anniversary of Rabindranath Tagore) | Rabindranath Tagore punyatithi

रवीन्द्रनाथ टैगोर से क्या सीखें?

सात अगस्त 1941 को रवीन्द्रनाथ टैगोर की मृत्यु हुई, यानी आज का दिन हम भारतवासियों के लिए स्मरणीय दिन है। इस दिन हमारा एक महान लेखक इस धरती पर अजस्र सुंदर सपने देकर चला गया। मनुष्य की सत्ता, स्वतंत्रता और इच्छा के महान प्रवक्ता थे टैगोर।

रवीन्द्रनाथ टैगोर आज भारत के जनमानस की शक्ति हैं।

आमतौर पर टैगोर को कवि के रूप में ही देखने की आदत है, लेकिन वे जितने बड़े कवि थे,उससे बड़े विचारक भी थे।

रवीन्द्रनाथ टैगोर से सीखने लायक कुछ विचार। 

रवीन्द्रनाथ टैगोर ने लिखा है “फूल जब खिल उठता है तब मन में यही आता है कि जैसे फूल ही पेड़ का एक-मात्र लक्ष्य हो-उसका सौंदर्य, उसकी सुगन्ध ऐसी होती है कि लगता है जैसे वनलक्ष्मी की साधना चरम धन हो। लेकिन यह बात छिपी रह जाती है कि वह फूल लगने का केवल एक उपलक्ष्य है-वह वर्तमान के गौरव में ही प्रसन्न रहता है, भविष्य उसे अभिभूत नहीं करता।” 

रवीन्द्रनाथ टैगोर ने अपनी आत्मकथा में लिखा है-

‘मैं क्षुद्र व्यक्ति जब अपनी एक क्षुद्र बात कहने के लिए चंचल हो उठा था तब न जाने किसने मेरा हौसला बढ़ाकर कहा, ”कहो-कहो, अपनी बात ही कहो। उसी बात के लिए लोग टकटकी लगाए देख रहे हैं।” ‘ आज यही सबक है कि हम अपनी बात बेधड़क कहें। ´हमारे बचपन में भोग-विलास का सरंजाम नहीं था। इतना कहना काफी होगा। मोटे रूप में तब की जीवन-यात्रा आज की तुलना में कहीं ज्यादा सीधी-सादी थी। …हमारे घर में तो विशेष रूप से लड़कों की देख-रेख या ले- लपक करना एकदम नहीं था।…ले-लपक वाली बात अभिभावकों के अपने सन्तोष के लिए उनकी तृप्ति के लिए होती है…बच्चों के लिए नहीं।´

´मैं पहले ही कह आया हूँ कि उन दिनों छोटे-बड़े के बीच आवा-जाही के लिए पुल न था, लेकिन इन सब पुराने कायदों की भीड़ में ज्योति दा बिलकुल विशुद्ध नया मन लेकर आये थे। मैं उनसे बारह बरस छोटा था। मुझे इसी का आश्चर्य है कि उम्र की इतनी बड़ी दूरी के बावजूद मुझ पर उनकी नजर कैसे पड़ी। और भी आश्चर्य की बात यह है कि बातचीत में उन्होंने कभी अपने बड़प्पन के मारे मेरा मुँह बन्द करने की कोशिश नहीं की। इसीलिए कोई भी बात सोचने में मुझे साहस का अभाव न होता। आज बच्चों के बीच ही में रहता हूँ। पाँच तरह की बातें कहता हूँ और उनका मुँह बन्द देखता हूँ। बात पूछने में डर लगता है। मैं समझ सकता हूँ, यह लोग सब उन्हीं बूढ़ों के जमाने के बच्चे हैं जिस जमाने के बड़े लोग बात कहते थे और छोटे लोग गूंगों की तरह बैठे रहते थे। बात पूछने का साहस नये जमाने के बच्चों का है और बूढ़ों के जमाने के बच्चे सब कुछ सिर झुकाकर मान लेते थे।”

सबक यह कि हम अपने बच्चों को निर्भय होकर बोलने दें।

हमारे बीच अनेक ऐसे लोग हैं जो बेकार की बातें करना पसंद नहीं करते और हमेशा ज्ञान चर्चा में डूबे रहते हैं। वे यही चाहते हैं कि पढ़े लिखे लोगों को हमेशा गंभीर रहना चाहिए। बेकार की बातों पर समय खर्च करने को वे फिजूल में समय की बर्बादी समझते हैं। इस तरह के लोगों को और इनके तर्कों को ध्यान में ऱखकर रवीन्द्रनाथ टैगोर ने लिखा, ‘आदमी की असली पहचान दूसरे खर्चों से ज्यादा उसके बेकार के खर्चों से होती है, क्योंकि आदमी खर्च करता है बँधे हुए नियमों के अनुसार ,फिजूलखर्ची करता है अपने मन से। जैसे बेकार खर्चा होता है वैसे ही बेकार बात भी होती है।बेकार बात में ही आदमी पकड़ में आता है। उपदेश की बात जिस रास्ते से चलती है वह मनु के समय से बँधा हुआ है; काम की बात जिस रास्ते से अपनी बैलगाड़ी ठेलकर ले जाती है वह रास्ता कामकाजी लोगों के पैंरों से रौंदा जाकर तृण-पुष्प-शून्य हो गया है। बेकार बात अपने ढ़ंग से कहनी ही पड़ती है।’

टैगोर ने लिखा ‘जो आदमी कहने के लिए कोई खास बात न रहने पर कुछ कह ही नहीं सकता, बोलेगा तो वेदवाक्य; नहीं तो चुप बैठा रहेगा, हे चतुरानन, उसकी कुटुम्बिता, उसका साहचर्य, उसका पड़ोस ‘शिरसि मा लिख मा लिख मा लिख ‍!’

प्रोफेसर जगदीश्वर चतुर्वेदी

रवीन्द्र नाथ टैगोर और साहित्य की अवधारणा

हिरोशिमा दिवस : पृथ्वी पर जीवन को बचाना है तो परमाणु हथियारों से दूर रहना ही होगा हमें

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कब मनाया जाता है हिरोशिमा दिवस?

क्यों मनाया जता है हिरोशिमा दिवस?

Hiroshima marks 77th anniversary of atomic bombing. Hiroshima Day 2022: History, importance and significance of the day

हिरोशिमा दिवस 2022 (Hiroshima Day 2022) हत्याओं की 77वीं वर्षगांठ है। पूरे विश्व में हर साल 6 अगस्त को परमाणु बम के भयावह प्रभावों के बारे में जागरूकता फैलाने (Spreading awareness about the horrific effects of the atomic bomb) और शांति की राजनीति (politics of peace) को बढ़ावा देने के लिए हिरोशिमा दिवस मनाया जाता है।

हिरोशिमा दिवस का इतिहास | History of Hiroshima Day in Hindi

इस दिन 1945 में, संयुक्त राज्य अमेरिका ने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान एक जापानी शहर हिरोशिमा पर एक परमाणु बम गिराया था। परमाणु विस्फोट बड़े पैमाने पर हुआ और शहर के 90 प्रतिशत हिस्से को नष्ट कर दिया और हजारों लोग मारे गए। इसने लगभग 20,000 सैनिकों और 90,000 से 125,000 नागरिकों को मार डाला। तीन दिन बाद, 9 अगस्त 1945 को जापान के एक और शहर, नागासाकी पर दूसरा परमाणु बम गिराया गया, जिसमें 80,000 से अधिक लोग लोग मारे गए।

हिरोशिमा दिवस को हम उन हत्याओं की वर्षगांठ भी कह सकते हैं, जो विश्व युद्ध के लगभग समाप्त होने की कगार पर परमाणु बमों के द्वारा की गईं।

आज परमाणु बमों का इतना जखीरा दुनिया के बड़े और शक्तिशाली से लेकर विकासशील देशों के पास जमा है कि विश्व के प्रत्येक शांतिकामी नागरिक को ये व्याकुलता स्वाभाविक रूप से होती है कि कहीं किसी भी देश का सत्तानशीं, चाहे वह लोकतांत्रिक देश का हो अथवा अधिनायकवादी देश का, सनक में आकर मानवता पर फिर वही वहशी अत्याचार को न कर बैठे, जो द्वितीय विश्वयुद्ध की लगभग समाप्ति पर अमेरिका के 33वें राष्ट्रपति हैरी एस ट्रूमेन ने किया था।

द्वितीय विश्व युद्ध (second World War) के बाद दुनिया के देशों के बीच अनगिनत युद्ध हो चुके हैं और शांतिकामी लोगों के मध्य परमाणु बम के इस्तेमाल को लेकर होने वाली व्याकुलता कभी कम नहीं रही।   

अभी शायद हम बड़े देशों के बीच बढ़ती हुई अदावत और तनाव के मामले में सबसे खतरनाक दौर से गुजर रहे हैं।

अमेरिका और चीन के बीच अब नया मोहरा ताइवान (Taiwan is now the new pawn between America and China)

यह किसी से छिपा नहीं है कि रूस और यूक्रेन के मध्य चल रहे युद्ध में यूक्रेन एक छद्म है और वास्तविक संघर्ष संयुक्त राज्य अमेरिका और रूस के बीच है। सबसे ज्यादा त्रासदीपूर्ण बात यह है कि पांच महीने से अधिक के अत्यधिक विनाशकारी युद्ध के बाद भी कोई दिलासा देने वाली शांति प्रक्रिया किसी भी देश के द्वारा शुरू नहीं की गयी है और यह हो भी कैसे जब दो विश्व महाशक्ति युद्ध पर ही आमादा हों तो शान्ति की पहल होगी ही कैसे? रही सही कसर हाल के घटना विकास ने पूरा कर दिया है।

ऐसा लग रहा है मानो संयुक्त राज्य अमेरिका और चीन के बीच अब ताइवान मोहरा बन रहा है। अभी की परिस्थिति में शामिल तीनों देश परमाणु संपन्न हैं| आज परमाणु संपन्न देशों के पास 13000 से अधिक न्यूक्लियर हथियार हैं और इनमें से अधिकाँश की मारक क्षमता हिरोशिमा या नागासाकी पर गिराए गए बमों से कई गुना अधिक है।

जापान हमारे सामने परमाणु बम के विनाश के उदाहरण के रूप में मौजूद है, जहाँ न केवल दो लाख से अधिक लोग फौरी तौर पर मारे गए बल्कि उसके बाद वर्षों तक जलने-झुलसने और विकिरण के फलस्वरूप हजारों की संख्या में लोगों की मौत हुई। यहाँ तक कि उसके बाद के लगभग चार दशकों तक पैदा हुए बच्चे भी परमाणु विकिरण के शिकार रहे।

आज जब फेट मेन और लिटिल ब्वाय, उन परमाणु बमों के नाम जो नागासाकी और हिरोशिमा पर गिराए गए थे, से ज्यादा शक्तिशाली न्यूक्लियर हथियार परमाणु संपन्न देशों के पास हैं, हम कल्पना कर सकते हैं कि लाखों लोगों को तुरंत मारने के अलावा, परमाणु हथियारों के युद्ध से अभूतपूर्व पर्यावरणीय तबाही भी हो सकती है, जो जापान में मारे गए लोगों से भी बड़ी संख्या में लोगों को मार सकती है। इतना ही नहीं इसका विनाशकारी परिणाम जीव जगत के अन्य जीवन-रूपों को भी भोगना पडेगा और प्रकृति का विनाश होगा।

आज परमाणु हथियारों का प्रयोग अकेले दो देशों के बीच का मामला हो ही नहीं सकता है, इसके दुष्परिणाम बिना किसी विवाद में शामिल हुए पड़ोसी देशों के लोगों को भी भुगतने होंगे।

यह कोरा मुगालता ही है कि सामरिक परमाणु हथियारों के रूप में परमाणु हथियारों की कम विनाशकारी भूमिका हो सकती है। यह किसी युद्धोन्मादी का ही दृष्टिकोण हो सकता है। यदि युद्धरत देशों के पास परमाणु हथियार हैं तो सामरिक हथियारों से शुरू हुआ परमाणु युद्ध आसानी से कभी भी एक पूर्ण परमाणु युद्ध में बदल सकता है। फिर, परमाणु हथियार सामरिक हों तो भी उनका उपयोग बहुत विनाशकारी हो सकता है, यहां तक कि उपयोग करने वाले देश के लिए भी उनका उपयोग विनाशकारी ही होगा!

इसके अलावा, जैसा कि न्यूक्लियर हथियारों के बारे में आम धारणा है कि इनके इस्तेमाल का अधिकार केवल राष्ट्र प्रमुखों के पास ही होता है| पर, यही बात छोटे स्तर के सामरिक न्युक्लियर हथियारों के बारे में नहीं कही जा सकती| क्योंकि, जब सामरिक परमाणु हथियारों को उपयोग के लिए तैयार करना होता है तो उनके नियंत्रण के अधिकार का अनेक लोगों के पास पहुंचना साधारण सी बात ही होगी। इससे यह संभावना बढ़ जाती है कि कट्टर या कट्टरपंथी झुकाव या आतंकवाद फैलाने वाले व्यक्ति या समूह भी इसके नियंत्रण तक पहुँच हासिल कर सकते हैं या उन हथियारों को ही हासिल कर सकते हैं।

इसलिए इस भ्रम में रहना एकदम गलत है कि छोटे स्तर के सामरिक न्युक्लियर हथियार परमाणु हथियारों का कोई सुरक्षित विकल्प प्रदान करते हैं। क्योंकि, ऐसा भ्रम लाखों-करोड़ों लोगों के लिए अत्यंत विनाशकारी हो सकता है।

हमारी प्यारी धरती, उस पर बसे जीवन और उस पर्यावरण तथा प्रकृति के लिए सबसे अच्छी बात यही है कि परमाणु हथियारों का इस्तेमाल कभी नहीं होना चाहिए।

वास्तव में, परमाणु हथियारों का उपयोग तो विनाशकारी है ही, परमाणु हथियारों से संबंधित दुर्घटनाएं भी बहुत विनाशकारी हो सकती हैं। इसलिए यदि हम पृथ्वी पर जीवन की परवाह करते हैं तो अंततः एकमात्र सुरक्षित विकल्प यही है कि हम सभी परमाणु हथियारों और सामूहिक विनाश के सभी हथियारों को हमेशा के लिए छोड़ दें।

दुर्भाग्यवश, एक समय शुरू हुआ निशस्त्रीकरण अभियान अपने उद्देश्य में सफल तो नहीं ही हो पाया, अब उस तरफ प्रयास भी बंद हो गए हैं। बड़े देश जो शस्त्रों के निर्माता हैं, वे न केवल अपने देशों के हथियार निर्माताओं के माफियाओं के चंगुल में फंसे हैं, उनकी अर्थव्यवस्था बहुत कुछ अपने से छोटे देशों को हथियारों को बेचने और उनके बीच के युद्ध पर ही टिकी है।

हिरोशिमा दिवस हमें प्रेरित करता है कि हम इस विषय पर ईमानदारी से विचार करें, हम किसी भी पक्ष के हों, हमारा एकमात्र ईमानदार निष्कर्ष यही होना चाहिए कि यदि पृथ्वी पर जीवन को बचाना है तो हमें परमाणु हथियारों से दूर रहना ही होगा, उन्हें नष्ट करना ही होगा और इसके लिए विश्व की शांतिकामी जमात को एक स्वर में आवाज उठानी ही होगी।

अरुण कान्त शुक्ला

अरुण कान्त शुक्ला
अरुण कान्त शुक्ला, लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।

Hiroshima Day: If we want to save life on earth, then we have to stay away from nuclear weapons

कोरोना के कहर ने बना दी तीसरे विश्वयुद्ध की भूमिका, जैविक हथियारों के इस्तेमाल होने की पूरी आशंका ?