नए कृषि कानूनों का विरोध आखिर इतना क्यों ? काशी के ब्राह्मण ने समझाया

Tractor-trolley trip in Malwa-Nimar in support of farmer movement

Why so much opposition to new agricultural laws? Brahmin of Kashi explained

तीनों नए कृषि कानूनों का विश्लेषण

नए कृषि कानूनों के विरोध में किसान आंदोलन को 56 दिन हो गए, उत्तरोत्तर यह आंदोलन कमजोर होने के बजाय पूरे देश में बढ़ता जा रहा है, आखिर क्यों इन नए कृषि कानूनों इतना विरोध हो रहा है। दो डिग्री से भी कम तापमान में हमारे देश के किसान खुले आसमान में बैठे हैं और लगातार किसानों द्वारा नए कृषि कानूनों को पूर्णतया समाप्त करने की माँग की जा रही है। किसानों के साथ-साथ मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस भी नए कृषि कानूनों को पूर्णतया समाप्त करने की माँग कर रही है। राहुल गाँधी ने 30 सितम्बर 2020 को नए कृषि कानूनों का विरोध करते हुए कहा कि नए कृषि कानून के बाद देश में ईस्ट इंडिया कंपनी की तरह वेस्ट इंडिया कंपनी आ जाएगी।

कांग्रेस द्वारा लगातार नए कृषि कानूनों का विरोध किया जा रहा है और नए कृषि कानून को काला कानून, देश की नींव को कमजोर करने वाला एवं अंग्रेजों वाला कानून कहा जा रहा है।

नए कृषि कानून के विरोध में 19 जनवरी 2021 को राहुल गाँधी द्वारा खेती का खून: तीन काले कानून‘ नामक शीर्षक से उद्धृत एक पुस्तक का अनावरण किया गया, आखिर क्यों कांग्रेस पार्टी नए कृषि कानूनों को खेती का खून कह रही है, यह विषय आज के परिदृश्य में बहुत ही विचारणीय है।

कांग्रेस द्वारा अपने पूर्व के मार्ग दर्शकों के राजनीतिक विचारों को आत्मसात करते हुए नए कृषि कानूनों का विरोध किया जा रहा है जिसके आलोक में महात्मा गाँधी जी के कथन को समझा जा सकता है जो कानून तुम्हारे अधिकारों की रक्षा न कर सके उसकी अवहेलना करना तुम्हारा कर्तव्य है, कांग्रेस पार्टी इसी विचार को आत्मसात करते हुए नए कृषि कानून का विरोध कर रही है।

कांग्रेस पार्टी और किसानों के विरोध को समझने के लिए सरकार द्वारा लाये गए नए कृषि कानूनों के कुछ महत्वपूर्ण तथ्यों को समझाना होगा जिसके अनुसार मोदी सरकार ने आवश्यक वस्तु कानून 1955 में संशोधन कर धारा 3 की उप धारा 1 में अतिरिक्त उप धारा 1(A) को जोड़ते हुए अनाज, दाल, आलू, प्याज और खाद्य तेल जैसी वस्तुओं की असीमित मात्रा में जमाखोरी को छूट दे दी है। इसमें प्रावधान है कि जल्दी नष्ट होने वाली वस्तुएं फल, फूल व सब्जी के दाम जब तक 100 प्रतिशत तक न बढ़ जाते तब तक सरकार भावों को नियंत्रण में करने के लिए जमाखोरी पर कोई रोक नहीं लगाएगी। तात्पर्य यह है कि 100 रूपये कीमत की वस्तु 200 रूपये तक बढ़ने के बाद ही उस पर सरकार द्वारा नियंत्रण का प्रावधान है।

इसी प्रकार जल्द नष्ट न होने वाली फसलों जैसे अनाज आदि के दामों में जब तक 50 प्रतिशत की वृद्धि नही हो जाती तब तक जमाखोरी पर कोई पाबन्दी नही लगाई जाएगी तात्पर्य यह है कि 100 रूपये कीमत की वस्तु 150 रूपये तक बढ़ने के बाद ही उस पर सरकार नियंत्रण लगाएगी।

इस संशोधन में यह भी कहा गया है कि दामों में 50 और 100 प्रतिशत की वृद्धि होने के बावजूद भी मूल्य निर्धारक प्रतिभागियों के उपर कोई भी नियंत्रण नही लगाया जायेगा, जिसका अर्थ यह है कि दामों में बेतहाशा वृद्धि की सूरत में भी चुनिंदा व्यापारियों को जमाखोरी की पूर्णतया छूट रहेगी। इस कानून द्वारा प्रदत्त जमाखोरी में छूट के अधिकार का दुष्परिणाम हमें हाल के महीने में देखने को तब मिला जब सरकार ने दिसंबर 2020 में खाने के तेल के आयात पर रोक लगा दी जिससे सोयाबीन तेल का भाव 80 रुपया लीटर से बढ़कर 145 रूपये लीटर हो गया जिसका लाभ किसानों के इतर चंद तेल व्यापारियों को हुआ।

मोदी सरकार के दूसरे नए कृषि कानून ‘किसान उपज, व्यापार एवं वाणिज्य (संवर्धन एवं सुविधा) कानून 2020’ की धारा 2(M) में ट्रेड एरिया को परिभाषित किया गया है जिसमें फैक्टरी परिसर, उद्योगपतियों के भंडारण के साइलो और किसी भी प्रकार के स्थान और ढाँचे को शामिल किया गया है। धारा 4 के मुताबिक इस ट्रेड एरिया में पूरे देश से व्यापार की छूट होगी। इस ट्रेड एरिया में व्यापार हेतु सरकार द्वारा किसी भी प्रकार का कर या शुल्क अधिरोपित नहीं किया गया है जबकि पूर्व से स्थापित मंडियों में व्यापार हेतु निर्धारित कर देना जरूरी है।

इस प्रकार सरकार अपनी दोहरी नीति के तहत जहाँ ट्रेड एरिया को किसी भी प्रकार के कर से मुक्त रखा है वहीं दूसरी तरफ सरकारी मंडियों पर कर अधिरोपित कर मंडियों में व्यापार की सुगमता को कम कर मंडियों के खात्मे का योजना बना डाली है और इससे किसान अपनी उपज की बिक्री हेतु पूँजीपतियों के जाल में पूर्णतया फँसता चला जायेगा।

मोदी सरकार द्वारा अधिरोपित नए कृषि कानून में अध्याय 3 की धारा 8 में विवादों के निपटारे हेतु एसडीएम उसके बाद कलेक्टर या एडिशनल कलेक्टर के समकक्ष अधिकारी नियुक्त किये गए हैं। विवाद न सुलझने की स्थिति में 60 दिनों के भीतर भारत सरकार के संयुक्त सचिव स्तर के अधिकारी के समक्ष अपील करने का अधिकार होगा। इस कानून के अध्याय 5 की धारा 15 में किसी भी सिविल कोर्ट को संज्ञान लेने तक का अधिकार नहीं दिया गया है।

मोदी सरकार के तीसरे नए कृषि कानून ‘कृषक (सशक्तिकरण व संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार कानून, 2020’ में कहीं भी न्यूनतम समर्थन मूल्य (Minimum Support Price) का जिक्र नही किया गया है।

इस कानून की धारा 4 की उपधारा 4 के अनुसार किसान और पूँजीपतियों के बीच हुए समझौते के तहत किसान अपनी फसल की क़्वालिटी, ग्रेड और स्तर समझौते में लिख कर देंगें और फसल कटाई या वितरण के समय पूँजीपतियों द्वारा नियुक्त योग्य पारखी से फसल की जाँच करवानी होगी जिसमे किसानों को क़्वालिटी, ग्रेड और स्तर के नाम पर पूर्णतया पूँजीपतियों के रहमोकरम पर निर्भर रहना पड़ेगा।

इस कानून की धारा 7 के 1 और 2 में कहा गया है कि इस कानून के तहत किये गए अनुबंध राज्य सरकार के खरीद-फरोख्त कानून के दायरे से बाहर रहेंगें अर्थात इस कानून के माध्यम से भी पूँजीपतियों का किसानों की उपज के खरीद-फरोख्त पर पूर्ण आधिपत्य होगा।

इस प्रकार नए कृषि कानून में प्रदत्त जमाखोरी के अधिकार से जहाँ मुनाफाखोरी, मंहगाई और गरीबी में वृद्धि होगी वहीं खाद्य आपूर्ति में कमी देखने को मिलेगी। ट्रेड एरिया स्थापित होने से सरकारी मंडियों का संचालन धीरे-धीरे समाप्त होगा, किसानों की उपज के न्यूनतम समर्थन मूल्य की अनदेखी के साथ-साथ फसल की क़्वालिटी, ग्रेड और स्तर के नाम पर किसानों को पूँजीपतियों के रहमोकरम पर रहना होगा।

किसान और पूँजीपतियों के बीच मतभेद की स्थिति में सिविल कोर्ट का प्रावधान न होना आदि ऐसे अनेक तथ्य हैं जो नए कृषि कानून के विरोध के लिए उत्तरदायी हैं जिसका दुष्प्रभाव किसानों के साथ-साथ आम जनमानस पर भी पड़ेगा।

डॉ रामेश्वर मिश्र

(वाराणसी)

Dr Rameshwar Mishra Varanasi
Dr Rameshwar Mishra Varanasi

सआदत हसन मंटो : जिसने भारत विभाजन को पागलपन करार देते हुए इसका कड़ा विरोध किया था, जस्टिस काटजू का लेख

Saadat Hasan Manto was a Pakistani writer, playwright and author born in Ludhiana, British India. Writing mainly in the Urdu language, he produced 22 collections of short stories, a novel, five series of radio plays, three collections of essays and two collections of personal sketches.

Saadat Hasan Manto strongly opposed Partition of India calling it madness, writes Justice katju

सआदत हसन मंटो (1912-1955)

तीन दिन पहले, 18 जनवरी को, सआदत हसन मंटो (1912-1955) की पुण्यतिथि थी, जिन्हें मैं दुनिया के महानतम कहानीकारों में से एक मानता हूं, और जिनकी तुलना मोपसां ( Maupassant ), सोमरसेट  मौघम ( Somerset Maugham ), डी एच लॉरेंस ( D.H.Lawrence ) , ओ हेनरी ( O Henry ), प्रेमचंद आदि से की जा सकती है।

Upendra Nath Ashk had been Manto’s colleague in the AIR in Delhi

मुझे मंटो से मिलने का सौभाग्य कभी नहीं मिला, लेकिन सिविल लाइंस, इलाहाबाद के कॉफ़ी हाउस में उनके दोस्त उपेंद्र नाथ अश्क से मैं अक्सर मिलता था, जो स्वयं एक प्रसिद्ध हिंदी कहानी साहित्यकार थे (तब मैं इलाहाबाद उच्च न्यायालय में वकील था)।

1941 और 1942 में अश्कजी दिल्ली स्थित ऑल इंडिया रेडियो में मंटो के सहयोगी रह चुके थे और उन्होंने मुझे मंटो के बारे में बहुत कुछ बताया (उन्होंने उन पर एक किताब भी लिखी, जो ‘मंटो मेरा दुश्मन’ के नाम से प्रसिद्ध है)।

अश्कजी ने मुझे बताया कि मंटो एक भावनात्मक, गुस्सैल, अति संवेदनशील व्यक्ति थे।

मंटो की कहानियाँ जैसे ‘खोल दो’, ‘बू’, ‘काली शलवार’, ‘धुआँ’ आदि को कुछ लोगों द्वारा अश्लील भी कही गई हैं (जैसे कि मोपसां की कहानियाँ) और उन्होंने अक्सर समाज के घिनौने, मलिन, निर्बल और भद्दे पक्ष को ज़ाहिर किया, जो उस समय कोई अन्य लेखक करने की हिम्मत नहीं करता था।

अश्लीलता के जुर्म में 6 बार अदालत में उनके खिलाफ मुक़दमे चले, हालांकि उन्हें कभी भी दोषी नहीं ठहराया गया। उन्होंने खुद कहा “लोग मेरी कहानियों को गंदा कहते हैं, लेकिन ऐसा इसलिए है क्योंकि आपका समाज  गंदा है। मैं केवल सच कहता हूं”।

मंटो ने विभाजन का विरोध किया, इसे पागलपन कहा। उस समय बॉम्बे में रहते हुए जब वे फिल्मों के लिए लेखन कर रहे थे,  फिल्मी दुनिया से जुड़े मुस्लिमों को खतरनाक धमकियां मिलने के कारण उन्हें पाकिस्तान के लिए प्रस्थान करना पड़ा। 

लाहौर में उनकी दोस्ती  फैज़ अहमद फैज़, नासिर काज़मी, अहमद राही, अहमद नदीम कासमी और अन्य लेखकों से हुई, वे अक्सर उनसे  पाकिस्तान टी हाउस में मिलते थे। लेकिन वह पाकिस्तान में कभी खुश नहीं थेI 43 साल की उम्र में ज़्यादा शराब पीने के कारण लिवर   कैंसर की बीमारी से वे चल बसे।

विभाजन के बारे में मंटो की कहानियाँ ‘ठंडा गोश्त’, ‘टिटवाल का कुत्ता’, ‘तोबा टेक सिंह’, आदि मनुष्यों के भयानक पशुवत प्रवृत्ति को उजागर करती हैं, जो केवल सांप्रदायिक घृणा से भरे हुए थे।

वे पत्र जो उन्होँने अंकल सैम ( Uncle Sam i,e. America ) को लिखे थे वह असल में ’पाकिस्तान पर एक व्यंग्य है, जिसमें लिखा था कि वह अमेरिका का एक नव-उपनिवेश बन गया है।

अफ़सोस है कि इतने बड़े लेखक की इतनी जल्दी मौत हो गई।

जस्टिस मार्कंडेय काटजू, पूर्व न्यायाधीश, सुप्रीम कोर्ट ऑफ़ इंडिया

Note – Saadat Hasan Manto was a Pakistani writer, playwright and author born in Ludhiana, British India. Writing mainly in the Urdu language, he produced 22 collections of short stories, a novel, five series of radio plays, three collections of essays and two collections of personal sketches.

मुस्लिम विरोधी आक्रामकता के प्रदर्शन की भाजपा-शासित राज्यों में शर्मनाक होड़

BJP Logo

Embarrassing competition for anti-Muslim aggression in BJP-ruled states

मोदी राज को बहुसंख्यकवादी चेहरा चमकाने का ही सहारा

भाजपा-शासित राज्यों में एक शर्मनाक होड़ लगी हुई है। यह होड़ है मुस्लिम विरोधी आक्रामकता (Anti muslim aggression) के प्रदर्शन के जरिए, अपने बहुसंख्यकवादी समर्थन आधार को मजबूत करने की।

मुस्लिम विरोधी आक्रामता के प्रदर्शन के लिए नित नये-नये बहाने

बेशक, संघ तथा उसके राजनीतिक बाजू यानी पहले जनसंघ तथा अब भाजपा की हमेशा से ही, यही रीति-नीति रही है। यहां तक कि खुद आरएसएस का इतिहास (History of RSS) गवाह है कि उसकी स्थापना ही मुस्लिम विरोधी गोलबंदी के लिए की गयी थी। फिर भी संघ परिवार की इस जांची-परखी कार्यनीति में, नरेंद्र मोदी के शासन में एक नया तत्व जरूर जुड़ा है। यह नया तत्व है, इस मुस्लिम विरोधी आक्रामता के प्रदर्शन या कहना चाहिए कि अभ्यास के लिए, नित नये-नये बहाने खोजना। ये बहाने या मुद्दे चूंकि न सिर्फ सतही बल्कि पूरी तरह से फर्जी होते हैं, लोगों के बीच असर करने के लिहाज से उनकी धार बहुत जल्द कुंद हो जाती है और जल्दी-जल्दी ये बहाने खोजने होते हैं।

          संघ परिवार के दुर्भाग्य से, मोदी राज न सिर्फ आम जनता को कोई वास्तविक राहत देने में विफल रहा है बल्कि आम जनता की तकलीफें ही तरह-तरह से बढ़ाने में लगा है और इसके चलते, न सिर्फ इन बहानों पर उसकी निर्भरता बढ़ गयी है बल्कि इन बहानों की धार के घिसने की रफ्तार भी लगातार बढ़ती जा रही है। इसलिए, हर नये बहाने का उपयोगिता-जीवन पहले वाले से कम हो जाता है और हर बार पहले से भी जल्दी नया बहाना खोजना होता है।

बहरहाल, मोदी राज ने भी इन बहानों की आपूर्ति में कोई कमी नहीं आने दी है। कथित ‘गोहत्या’ से शुरू कर के मोदी राज ने कथित ‘घर-वापसी’ तथा ‘लव जिहाद’ तक, तरह-तरह के पुराने बहानों को नयी धार देकर तो पेश किया ही है, धारा-370 तथा ‘बंगलादेशी घुसपैठिए’ जैसे हथियारों को एनआरसी/सीएए तथा जम्मू-कश्मीर को बांटने तथा उसका दर्जा घटाने जैसे नये तथा कहीं घातक रूप देकर भी पेश किया है और राममंदिर से लेकर, बढ़ती मुस्लिम आबादी जैसे सदाबहार बहाने तो खैर हैं ही।

Chanda campaign for Ram temple

          इसी क्रम में ताजातरीन बहाने के तौर पर, राममंदिर के लिए चंदा अभियान के रूप में विवादास्पद मंदिर के मुद्दे का पुनराविष्कार ही नहीं किया गया है, इस चंदा अभियान के लिए यात्राओं के नाम पर हिंदुत्ववादी हुल्लड़बाजों के उकसावेपूर्ण हिंसक जुलूसों के रूप में, इसको बाकायदा हमले के हथियार में बदला भी गया है।

शिवराज शासित मध्य प्रदेश में इंदौर, उज्जैन, मंदसौर तथा कुछ अन्य स्थानों पर, इन कथित यात्राओं के जरिए न सिर्फ बाकायदा सांप्रदायिक हिंसा भडक़ायी गयी बल्कि पुलिस-प्रशासन की सरासर सांप्रदायिक रूप से पक्षपातपूर्ण कार्रवाइयों के जरिए, बाकायदा यह संदेश भी दिया गया कि शासन खुले तौर पर, इन हुल्लड़बाजों के साथ है।

          लेकिन, बात इकतरफा गिरफ्तारियों आदि पर ही खत्म नहीं हो गयी। संभवत: निकट के ही योगी आदित्यनाथ राज से प्रेरणा लेकर, कम से कम दो स्थानों पर पुलिस व प्रशासन ने मुसलमानों के खिलाफ ऐसी कार्रवाइयां कीं, जो न सिर्फ पूरी तरह से गैरकानूनी थीं बल्कि ब्रिटिश राज के जमाने बाद से जो सुनने में ही नहीं आयी थीं।

एक मामले में, हुल्लड़बाजों की हिंसक भीड़ पर पत्थर फेंकने के शक में, मुसलमानों के घर गिरा दिए, तो एक और जगह पर घटना के दो दिन बाद ‘सड़क चौड़ी’ करने के लिए, एक लाइन से मुसलमानों के घरों का एक हिस्सा तोड़ दिया गया। प्रशासन का कहना था कि बेशक, पहले सड़क बनाने का ही विचार था, लेकिन बाद में सड़क चौड़ी करने का भी निर्णय कर लिया गया!

          खैर! बात इतने पर भी खत्म नहीं हुई। राज्य प्रशासन के शीर्ष पर खुद मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान भी इस मामले में कूद पड़े और उन्होंने पूरे संदर्भ से काटकर ‘‘पथराव’’ को मुद्दा बनाकर उछाल दिया। उन्होंने पथराव को हाथ के हाथ कश्मीर में पथराव की घटनाओं से जोडक़र अतिरिक्त रूप से गंभीर अपराध का रूप देते हुए, एलान किया कि पथराव करने वालों को छोड़ा नहीं जाएगा और उनके खिलाफ कड़ी सजा का प्रावधान करने वाला कानून बनाया जाएगा।

Ordinance on love jihad in Madhya Pradesh

याद रहे कि इससे करीब एक पखवाड़ा पहले ही, शिवराज चौहान की सरकार ने मध्य प्रदेश में लव जिहाद संबंधी अध्यादेश जारी किया था। कांग्रेस के विधायक तोडक़र, दोबारा मध्य प्रदेश में सत्ता में आने के बाद से, शिवराज चौहान हमलावर हिंदुत्व का आइकॉन माने जाने वाले, नजदीकी उत्तर प्रदेश के अपनी ही पार्टी के मुख्यमंत्री, आदित्यनाथ से जो होड़ सी करते नजर आ रहे हैं, उसे अनेक टिप्पणीकारों ने दर्ज किया है। लव जिहाद कानून के मामले में यह होड़ साफ-साफ दिखाई दे रही थी, जिसके अंतर्गत अंतर्धार्मिक विवाहों को ज्यादा से ज्यादा गंभीर रूप से दंडनीय अपराध बनाने की कोशिश की जा रही थी।

इसके चंद हफ्ते में ही, कथित राम मंदिर चंदा अभियान के प्रसंग में शिवराज चौहान को अगर फिर से अपने हिंदुत्ववादी चेहरे को चमकाने की जरूरत पड़ गयी है, तो यह जोड़-तोड़ से बनी इस सरकार के पांव तले की रेत खिसकती महसूस करने का ही इशारा है।

बहरहाल, योगी राज में उत्तर प्रदेश भी राम मंदिर के लिए चंदा अभियान के नाम पर मुस्लिम विरोधी हुल्लड़बाजी की मुहिम में कैसे पीछे रह सकता था।

मध्य प्रदेश में घटनाओं का सिलसिला थमा भी नहीं था, कि उत्तर प्रदेश में यही खेल शुरू हो गया। लेकिन, उत्तर प्रदेश में बुलंदशहर जिले में शिकारपुर में ऐसे दुपहिया सवार जुलूस में शामिल लोगों ने जब बेबात मुसलमानों को गालियां देने और पाकिस्तान जाने को कहने के अपने वीडियो सोशल मीडिया में डाले, वाइरल हो गए। सोशल मीडिया पर ज्यादा शोर मचने के बाद, योगी राज की पुलिस को कम से कम दिखावे के लिए कुछ कार्रवाई करनी पड़ी और कथित रूप से मंदिर के लिए चंदा करने निकले जूलूस में से दो लोगों को गिरफ्तार करना पड़ा।

ऐसा लगता है कि यह दिखावटी कार्रवाई किए जाने के पीछे मकसद राष्ट्रपति से लेकर, मुख्यमंत्रियों तक, सत्ता में बैठे उन संघ-परिवारियों को शर्मिंदगी से बचाना भी था, जिन तक राम मंदिर के लिए देशव्यापी चंदा अभियान के तहत आने वाले कुछ दिनों में, विहिप आदि के शीर्ष नेता पहुंचने जा रहे हैं।

मंदिर के लिए चंदे के नाम पर, पांच लाख गांवों में पहुंचने समेत, देशव्यापी अभियान की जो योजना बनायी गयी है, जाहिर है कि वह भी सबसे बढ़कर मोदी राज के बहुसंख्यकवादी समर्थन आधार को मजबूती देने की ही योजना है।

          इस मुकाम पर मोदी राज को अगर अपने बहुसंख्यकवादी समर्थन की इतने प्रकट रूप से जरूरत पड़ रही है, तो यह कोई इस या उस राज्य के भाजपायी मुख्यमंत्रियों के, अपनी स्थिति कमजोर होती महसूस करने का ही मामला नहीं है। यह तो मोदी के नेतृत्व में समूची हिंदुत्ववादी कतारबंदी के ही अपनी स्थिति कमजोर होती महसूस करने का मामला है।

बेशक, इसमें बढ़ते आर्थिक संकट का भी हाथ है, जिसे कोविड महामारी तथा उससे निपटने के नाम पर अंधाधुंध लॉकडाउन लगाए जाने समेत इस सरकार की विफलताओं ने और उग्र बनाया है। इसका राजनीतिक असर, पिछले ही महीनों हुए बिहार के विधानसभाई चुनावों में देखने को मिला था, जिसमें मोदी राज को अपने चुनाव प्रचार के लिए बेहतर भविष्य के किन्हीं भी आश्वासनों का कोई सहारा ही नहीं था और वह इसी तर्क के सहारे चुनाव लड़ रहा था कि पंद्रह साल पहले तक रहे लालू-राबड़ी राज में हालात अब से भी खराब थे! इसके बावजूद, भाजपा का गठजोड़ चुनाव हारते-हारते बचा।

          इसके ऊपर से, किसान आंदोलन के रूप में मोदी राज के सामने ऐसी चुनौती आ खड़ी हुई है, जैसी चुनौती उसे इससे पहले कभी नहीं मिली थी। महामारी को अवसर बनाकर, श्रम कानूनों की ही तरह, तीन कार्पोरेटपरस्त कृषि कानूनों को धक्के से चलाने के लालच में, मोदी राज फंस गया है। अब उससे न ये कृषि कानून उगलते बन रहे हैं और न निगलते। स्वतंत्र भारत के इस अभूतपूर्व किसान आंदोलन को सिर्फ एक-दो राज्यों के किसानों का आंदोलन, धनी किसानों का आंदोलन, खालिस्तान समर्थकों का आंदोलन, चीन-पाकिस्तान समर्थित आंदोलन आदि, आदि कहकर बदनाम करने की अपनी सारी कोशिशों के विफल हो जाने के बाद और हरियाणा, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड तथा राजस्थान में ही नहीं, अन्य अनेक राज्यों में भी किसानों के बढ़ते पैमाने पर न्यूनतम समर्थन मूल्य जैसे मुद्दों पर हरकत में आने को देखते हुए, मोदी राज को बखूबी समझ में आ रहा है इस आंदोलन के बढ़ते राजनीतिक असर की काट, वह प्रचार के संसाधनों पर अपने सारे नियंत्रण से भी नहीं कर सकता है। इसी एहसास का एक जीता-जागता प्रमाण, हरियाणा के मुख्यमंत्री खट्टर के किसानों को कृषि कानूनों के लाभ समझाने के कार्यक्रम के विरोध प्रदर्शन की भेंट चढ़ जाने के बाद, केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह द्वारा दी गयी यह सलाह है कि अभी किसानों के कोई कार्यक्रम आयोजित नहीं करें।

ठीक इसी संदर्भ में, चाहे लव जिहाद कानून हो या राम मंदिर के लिए चंदे के नाम पर अभियान, अपना बहुसंख्यकवादी चेहरा चमकाने के सहारे, मोदी राज के लिए बहुत महत्वपूर्ण हो गए हैं।                                       

राजेंद्र शर्मा

Rajendra Sharma राजेंद्र शर्मा, लेखक वरिष्ठ पत्रकार व हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं। वह लोकलहर के संपादक हैं।
Rajendra Sharma राजेंद्र शर्मा, लेखक वरिष्ठ पत्रकार व हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं। वह लोकलहर के संपादक हैं।

तो मितरों के लाभ के लिए बिना उचित विचार विमर्श के ही यह कृषि कानून बना दिए गए ?

Farmers Protest

Were these agricultural laws made without proper discussion? : Vijay Shankar Singh

कृषि कानूनों में संवैधानिक अंतर्विरोध

जैसे-जैसे समय बीतता जा रहा है और छन-छनकर नई सूचनाएं आ रही हैं, उनसे यह स्पष्ट होता जा रहा है कि तीनों नए कृषि कानून बिना उचित विचार विमर्श के ही बना दिए गए। एक वेबसाइट में प्रकाशित आरटीआई के उत्तर से प्राप्त सूचनाओं के आधार पर तीनों नए कृषि कानूनों का विश्लेषण कर रहे हैं अवकाशप्राप्त वरिष्ठ आईपीएस अफसर विजय शंकर सिंह।

कृषि कानूनों के बारे में सुप्रीम कोर्ट की सबसे महत्वपूर्ण टिप्पणी (Supreme Court‘s most important comment about agricultural laws) यह है कि यह कानून बिना पर्याप्त विचार विमर्श के ही बना दिए गए। ऐसा इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि अब जब उन कानूनों का अध्ययन किया जा रहा है तो बहुत से संवैधानिक अंतर्विरोध इन कानूनों में (Constitutional contradiction in agricultural laws) दिख रहे हैं। यहां तक कि विचार विमर्श के लिये नीति आयोग द्वारा गठित उच्च स्तरीय कमेटी की रिपोर्ट्स पर भी विचार विमर्श नहीं किया गया।

आखिर इन कानूनों को पारित करने के पीछे कौन सा दबाव ग्रुप काम कर रहा था, जिसके कारण इन कानूनों को जल्दी से जल्दी पारित करने की जिद सरकार ठान बैठी थी ?

A new information about the three agricultural laws

तीनों कृषि कानूनों के बारे में एक नयी जानकारी यह मिली है कि यह तीनों कानून, जो सितंबर 2020 में संसद में पेश किए गए और आनन फानन में राज्यसभा से हंगामे के दौरान पारित कर दिए गए, उन पर तो मुख्यमंत्रियों की उच्च स्तरीय कमेटी (High Level Committee of Chief Ministers) ने कोई विचार विमर्श ही नहीं किया था। जबकि ऐसे विचार विमर्श के लिये सरकार के थिंकटैंक नीति आयोग के गवर्निंग काउंसिल ने परामर्श भी दिया था।

हैरतअंगेज करने वाली यह सूचना आरटीआई द्वारा मांगी गयी एक सूचना के उत्तर में प्राप्त हुई है। द वायर वेबसाइट पर विस्तार से इस पर एक लेख 16 जनवरी को प्रकाशित हुआ है।

खाद्य, रसद एवं उपभोक्ता मामलों के राज्यमंत्री राव साहब दादा साहेब दानवे ने संसद में, बताया था कि इस कमेटी ने तीनों कानूनों में से एक कृषि कानून आवश्यक वस्तु (संशोधन) अधिनियम को अनुमोदित किया था। मुख्यमंत्रियों की यह उच्च स्तरीय कमेटी जुलाई 2019 में गठित की गयी थी।

आरटीआई एक्टिविस्ट अंजली भारद्वाज ने 15 दिसंबर 2020 को, एक आरटीआई डाल कर सरकार से निम्न सूचना मांगी थी। उन्होंने ने पूछा था,

“प्रधानमंत्री ने जुलाई 2019 में भारतीय कृषि की व्यवस्था में सुधार हेतु, मुख्य मंत्रियों की एक कमेटी बनाने की घोषणा की थी। इस कमेटी के अध्यक्ष महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस बनाये गए थे।”

अंजलि भारद्वाज ने उक्त कमेटी के बारे में, निम्न सूचना मांगी थी।

● कमेटी द्वारा सौंपी गयी अंतिम रिपोर्ट

● कमेटी द्वारा सौंपी गयी अंतरिम रिपोर्ट, यदि कमेटी ने ऐसी कोई रिपोर्ट दी हो,

● कमेटी के बैठकों की मिनिट्स

● कमेटी की बैठक में भाग लेने वाले लोगों के नाम।

इस कमेटी की अध्यक्षता देवेंद्र फडणवीस कर रहे थे और तब केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर भी उस कमेटी में एक आमंत्रित सदस्य थे। उनके साथ इस कमेटी में, पंजाब, मध्यप्रदेश, हरियाणा, ओडिशा, अरुणांचल प्रदेश, गुजरात और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री भी सदस्यों के रूप में थे।

यह सूचना, सूचना के अधिकार के अंतर्गत नीति आयोग से मांगी गयी थी, जिसका उत्तर नीति आयोग ने, 13 जनवरी को दिया।

नीति आयोग के मुख्य जन सूचना अधिकारी ने अपने उत्तर में यह बताया कि,

“15 जून 2019 को नीति आयोग के गवर्निंग काउंसिल की पांचवी बैठक के आधार पर प्रधानमंत्री जी के निर्देश पर, नीति आयोग ने 1 जुलाई 2019 को इस प्रकार की एक उच्च स्तरीय कमेटी का गठन किया था। नीति आयोग के गवर्निंग काउंसिल की छठी बैठक के सामने, इस कमेटी द्वारा सौंपी गयी रिपोर्ट, प्रस्तुत की जाएगी। यह रिपोर्ट सबसे पहले नीति आयोग के गवर्निंग काउंसिल के सामने, जिसके सदस्य सभी राज्यों के मुख्यमंत्री होते हैं, के विचार विमर्श हेतु प्रस्तुत की जाएगी। अभी नीति आयोग इस रिपोर्ट को किसी से साझा नहीं कर सकता है, और कमेटी ने किसी भी प्रकार की कोई अंतरिम रिपोर्ट आयोग को नहीं सौंपी है। इस हाई पावर कमेटी की पहली बैठक, 18 जुलाई 2019 को नई दिल्ली, दूसरी, 16 अगस्त 2019 को मुंबई, और तीसरी 3 सितंबर को नई दिल्ली में हुई थी।”

लेकिन मीटिंग के मिनिट्स जो आरटीआई से मांगे गए थे, वे नीति आयोग के सीपीआईओ द्वारा उपलब्ध नहीं कराए गए थे।

नीति आयोग द्वारा दिए गए अंजलि भारद्वाज द्वारा प्रश्नों के उत्तर कि,”पहले यह रिपोर्ट नीति आयोग की छठी गवर्निंग काउंसिल की बैठक में प्रस्तुत की जाएगी और उसके पहले यह किसी को नहीं दी जा सकती है,” से यह स्पष्ट है कि आज तक यह रिपोर्ट नीति आयोग की गवर्निंग काउंसिल के समक्ष रखी ही नहीं गयी। क्योंकि यह आरटीआई 15 दिसंबर 2020 की है। यदि यह रिपोर्ट नीति आयोग के समक्ष रखी गयी होती तो आयोग के मुख्य जनसूचना अधिकारी को उक्त रिपोर्ट को जारी करने में कोई दिक्कत ही नहीं होती।

यह रिपोर्ट नीति आयोग द्वारा गठित हाई पवार कमेटी की रिपोर्ट है तो निश्चय ही उसपर किसी भी प्रकार का विचार विमर्श करने का अधिकार आयोग का ही है। पर नीति आयोग के सीपीआईओ के इस उत्तर से यह स्पष्ट है कि उक्त कमेटी की रिपोर्ट या तो नीति आयोग के समक्ष प्रस्तुत ही नहीं हुई या आयोग ने कोई उस पर कोई विचार विमर्श ही नहीं किया।

नीति आयोग के इस उत्तर से यह भी स्पष्ट है कि आयोग द्वारा गठित इस कमेटी की रिपोर्ट और संस्तुतियों को दरकिनार कर के सरकार ने यह कानून जून 2020 में अध्यादेश के रूप में और फिर संसद में विधेयक के रूप में पारित करवा दिया। जहां तक सूचना के अधिकार के अंतर्गत मांगी गयी सूचनाओं (Information sought under Right to Information) का प्रश्न है, इस प्रकार की सूचनाओं को आरटीआई एक्ट के प्राविधानों के अंतर्गत मांगी गई सूचनाएं, जो मीटिंग की मिनिट्स, भाग लेने वाले सदस्यों के नाम और रिपोर्ट के बारे में है, को, उपलब्ध न कराना भी इस एक्ट के नियमों का भी उल्लंघन है। यह कानून बनाया ही इसलिए गया है कि, सरकार द्वारा गठित कमेटियां पूरी पारदर्शिता से अपना काम करें।

हालांकि केंद्रीय मंत्री ने संसद के पटल पर यह विधेयक रखते हुए कहा था कि मुख्यमंत्रियों की उच्च स्तर कमेटी ने इन पर विचार विमर्श किया है। लेकिन 14 सितंबर 2020 को सदन में दिए गए, केंद्रीय खाद्य रसद और उपभोक्ता मामलों के राज्यमंत्री, रावसाहेब दादाराव दानवे के इस बयान कि, आवश्यक वस्तु अधिनियम के संशोधन के बारे में, नीति आयोग की हाई पावर कमेटी ने इन संशोधनों को अनुमोदित किया था, का खंडन पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने कर दिया था। पंजाब के मुख्यमंत्री खुद भी उसी हाई पावर कमेटी के एक सदस्य थे।

कैप्टन अमरिंदर सिंह के उक्त खंडन को यदि अंजलि भारद्वाज द्वारा मांगी गयी सूचनाओं के उत्तर में, जो नीति आयोग ने बताया है, मिला कर देखें तो यह स्वतः स्पष्ट हो जाएगा कि, लोकसभा में केंद्रीय राज्यमंत्री का कथन, कि इन कानूनों को हाई पावर कमेटी ने अनुमोदित किया था, सत्य से परे है औऱ इसकी पुष्टि किसी दस्तावेज से भी होती नहीं है। यदि उक्त हाई पावर कमेटी का अनुमोदन ईसी एक्ट के संशोधन के पक्ष में था तो उक्त कमेटी की रिपोर्ट और मिनिट्स का उल्लेख सदन में क्यों नहीं किया गया ?

सरकार द्वारा बनाये गए तीनों कृषि कानूनों में सबसे आश्चर्यजनक है ईसी एक्ट का संशोधन। यह एक्ट 1955 में मुनाफाखोरों और जमाखोर व्यापारियों को नियंत्रित करने और आवश्यक वस्तुओं की कोई जमाखोरी कर के उसकी कीमत अपनीं मर्जी से नियंत्रित न कर सके, इस लिये लाया गया था। जब ईसी एक्ट संशोधन संसद में कानून के रूप में पेश हुआ तो, राज्यमंत्री दानवे ने इसे पेश करते हुए सदन में कहा था कि,

“5 जून 2020 को जब यह अध्यादेश लाया गया था तब पूरा देश महामारी से ग्रस्त था और पूरे देश मे लॉक डाउन लगा हुआ था।”

इसके बाद वह जोर देकर कहते हैं कि,

“यह अध्यादेश किसानों का दुःख दर्द दूर करने के लिये लाया गया था।”

दानवे आगे कहते हैं,

” इस अध्यादेश को लाने के पहले मुख्य मंत्रियों की हाई पावर कमेटी ने इससे जुड़े सभी विन्दुओ पर विचार विमर्श किया, और वह हाई पावर कमेटी इस नतीजे पर पहुंची कि इस कानून की आवश्यकता है और ऐसा कानून बनाया जाना चाहिए।

इस बिल के बारे में कानून की तारीफ करते हुए राज्यमंत्री दानवे कहते हैं कि,

“उन्हें यह कहने में ज़रा सा भी संशय नहीं है कि, इस कानून से किसानों का लेश मात्र भी अहित नहीं होगा।”

जब यह सब बातें लोकसभा में कही जा रही थीं, तब विपक्ष ने इस कानून को लेकर सरकार को चेताया भी था कि, यह कानून राज्यों के अधिकार का भी अतिक्रमण करता है।

आवश्यक वस्तुओं का भंडार रखना और कीमतों को नियंत्रित करना राज्य के क्षेत्राधिकार में आता है अतः केंद्र द्वारा ऐसा कानून बिना राज्यों से परामर्श किये बना देना, यह राज्यों के सवैधानिक अधिकारों पर केंद्र का अतिक्रमण भी है। लोकसभा में कांग्रेस के अधीर रंजन चौधरी ने कहा कि,

“कुछ राज्यों में जमाखोरी के बारे में अलग तरह की और अधिक शिकायतें मिलती रहती हैं, इसलिए राज्यों को यह अधिकार दिया जाना चाहिए कि, वे अपनी स्थानीय और राज्यगत समस्याओं के अनुरूप स्टॉक सीमा के बारे में, अपनी तरफ से अगर वे ज़रूरी समझें तो अलग से संशोधित नोटिफिकेशन जारी कर दें। भारत सरकार को संघीय ढांचे की गरिमा का आदर करना चाहिए और यह बिंदु राज्य पर छोड़ना चाहिए।”

ईसी एक्ट, के रूप में लंबे समय तक राज्य सरकारों को एक ऐसी कानूनी शक्ति प्राप्त थी, जिससे वे महंगाई से जूझ सकते थे। आज़ादी के बाद खाद्यान्न का उत्पादन भी कम था और भूमि या कृषि सेक्टर के अतिरिक्त अन्य औद्योगिक या सेवा सेक्टर बहुत अधिक विकसित नहीं थे। ऐसी स्थिति में आवश्यक वस्तु अधिनियम के रूप में, प्राप्त कानूनी शक्तियों से सरकार कीमतें नियंत्रित करती रहती थी। अब इस कानून में संशोधन कर के भंडारण को असीमित मात्रा और असीमित समय तक के वैध बना दिया गया है। इसे दूसरे शब्दों में कहें तो इस नए कानून से जमाखोरी को अपराध से हटा कर वैध बना दिया गया है। अलग-अलग राज्यों की अलग-अलग समस्याएं होती हैं, और सभी राज्यों की अपनी अपनी दाम नीति भी होती है। ऐसी स्थिति में राज्यों से इस कानून द्वारा उनके आवश्यक वस्तु के स्टॉक और समय सीमा को नियंत्रित करने के अधिकार से वंचित कर देना, देश के संघीय ढांचे की अवहेलना करना भी है। और ऐसा करते समय भी राज्यों से न तो परामर्श किया गया और न ही उनकी समस्याओं पर केंद्र ने कोई विचार भी किया। जमाखोरी और मुनाफाखोरी एक बड़ा और सामान्य आर्थिक अपराध है। अक्सर बहुतेरे व्यापारी कभी मुनाफा कमाने के लिये तो कभी बाजार में अपना दबदबा बनाये रखने के लिये स्टॉक जमा कर लेते हैं। ऐसी स्थिति में मांग और आपूर्ति का जब संतुलन बिगड़ जाता है तो इसका सीधा असर उपभोक्ताओं पर पड़ता है। इस कानून में संशोधन से किसान तो पीड़ित होगा ही पर किसानों से अधिक पीड़ित वह उपभोक्ता होगा जो बाजार से अपनी रोजमर्रा की चीजें खरीद कर पेट भरता है। पहले ईसी एक्ट के भय से ज़रूरी चीजों का स्टॉक व्यापारी न तो करता था और यदि करता भी था तो अवैध भंडारण के कारण, जैसे ही सख्ती होती थी, स्टॉक बाहर आ जाता था और उसका असर कीमतों पर पड़ने लगता था। लेकिन अब इस कानून से जमाखोरी को वैध बना दिया गया और अब चाहे, कोई भी व्यक्ति हो, वह फसल या कृषि उत्पाद खरीद कर उसे असीमित समय तक के लिये असीमित मात्रा में रख सकता है। बाजार को अपने ठेंगे पर रख कर उसे नचा सकता है।

जब इन विधेयकों या अध्यादेशों का ड्राफ्ट कैबिनेट में आया होगा तो निश्चय ही इस पर बहस हुई होगी। कृषि से जुड़ा कानून है तो कृषि मंत्रालय ने इस पर विचार भी किया होगा। इस कानून का ड्राफ्ट विधि मंत्रालय में भी गया होगा और अध्यादेश या विधेयक को जारी या संसद में प्रस्तुत करने के पहले जब इसे अंतिम रूप दिया गया होगा तो, इसका हर तरह से परीक्षण कर लिया गया होगा। क्या कैबिनेट में किसी मंत्री ने इस विधेयक में कोई भी कमी नहीं पायी ?

कृषि मंत्री जो खुद कैबिनेट में रहे होंगे, और जिन्हें आज इस कानून में कुछ कमियां दिख रही हैं, जिनके संशोधन के लिए वे आज कह रहे हैं, को कैबिनेट में ही अपनी आपत्ति दर्ज करा देनी चाहिये थी। हो सकता है उन्होंने कहा भी हो और उन्हें अनसुना कर दिया गया हो। जो भी होगा कैबिनेट की मिनिट्स से ही वास्तविकता की जानकारी हो सकेगी।

जब कोई भी सत्ताशीर्ष, या प्रधानमंत्री खुद को इतना महत्वपूर्ण समझ लेता है या उसकी कैबिनेट उसे अपरिहार्य समझ उसके आभामंडल की गिरफ्त में आ जाती है तो, ऐसी होने वाली, अधिकतर कैबिनेट मीटिंग एक औपचारिकता बन कर रह जाती है। तब कानून बनाने की प्रक्रिया केवल पीएमओ में ही सिमट जाती है और विभागीय मंत्री या सचिव बस पीएमओ के ही एक विस्तार की तरह काम करने लगते हैं, तो ऐसे बने कानूनों में मानवीय त्रुटियों का होना कोई आश्चर्यजनक नहीं होता है।

लोकतंत्र का अर्थ (Meaning of democracy) यह नहीं है कि किसी मसले पर, केवल संसद में ही बहस और विचार-विमर्श हो, बल्कि लोकतंत्र का असल अर्थ यह है कि नीतिगत निर्णय लेने के हर अवसर पर जनता के चुने गए प्रतिनिधि उस पर अपनी बात कहें और उस पर विचार विमर्श करें।

संसदीय लोकतंत्र (parliamentary democracy) जिसे अध्यक्षात्मक लोकतंत्र की तुलना में अधिक लोकतांत्रिक माना जाता है, में प्रधानमंत्री कैबिनेट के विचार विमर्श के बाद कोई निर्णय लेता है, ऐसा माना जाता है पर अमूमन ऐसा होता नहीं है। जब प्रधानमंत्री लोकचेतना और लोकतांत्रिक सोच के प्रति सजग और सचेत होता है तो, वह कैबिनेट के राय मशविरे को महत्व देता है, अन्यथा वह पूरी कैबिनेट को ही अपनी मर्जी से हांकने लगता है। यह प्रवृत्ति आज की नहीं है बल्कि पहले से ही चली आ रही है।

आज किसान आक्रोश का एक बड़ा कारण है कि, कॉरपोरेट और उसमे भी विशेषकर अडानी ग्रुप का खेती किसानी के क्षेत्र में घुसपैठ। वैसे तो किसी भी नागरिक को देश में कोई भी व्यापार, व्यवसाय या कार्य करने की छूट है, पर 2016 के बाद जिस तरह से अडानी ग्रुप की रुचि खेती सेक्टर में बढ़ी है, और उसके बाद जिस तरह से जून 2020 में इन तीन कृषि कानूनों को लेकर जो अध्यादेश लाये गए और फिर जिस प्रकार तमाम संवैधानिक मर्यादाओं और नियम कानूनों को दरकिनार कर के राज्यसभा में उन्हें सरकार ने पारित घोषित कर दिया, उससे यही लगता है कि सरकार द्वारा बनाये गए इन कानूनों का लाभ किसानों के बजाय अडानी ग्रुप को ही अधिक मिलेगा।

इन तीनों कृषि कानूनों की समीक्षा में लगभग सभी कृषि अर्थशास्त्री इस मत पर दॄढ हैं कि, यह कानून केवल और केवल कॉरपोरेट को भारतीय कृषि सेक्टर सौंपने के लिये लाये गए हैं। सरकार, दस दौर की वार्ता के बाद भी अब तक देश और किसानों को नहीं समझा पायी कि इन कानूनों से किसानों का कौन सा, कितना और कैसे हित सधेगा। सरकार और किसान संगठनों के बीच अब अगली बातचीत कल 19 जनवरी को होगी, देखना है कि क्या हल निकलता है।

विजय शंकर सिंह

लेखक अवकाशप्राप्त वरिष्ठ आईपीएस अफसर हैं।

विजय शंकर सिंह (Vijay Shanker Singh) लेखक अवकाशप्राप्त आईपीएस अफसर हैं
विजय शंकर सिंह (Vijay Shanker Singh) लेखक अवकाशप्राप्त आईपीएस अफसर हैं

शादी की संस्था औरतों और मर्दों दोनों के ख़िलाफ़ है, लेकिन औरत को ज्यादा भुगतना पड़ता है, इस घर में तो कुत्ता भी मर्द है : किश्वर नाहीद

Shamsul Islam's conversation with Kishwar Naheed in Hindi.

भारतीय उपमहाद्वीप का प्रगतिशील बुद्धिजीवी बहुत बेईमान है

किश्वर नाहीद से शम्सुल इस्लाम की बात-चीत

Shamsul Islam‘s conversation with Kishwar Naheed in Hindi.

[किश्वर नाहीद पाकिस्तान ही नहीं, भारतीय उपमहाद्वीप की एक प्रसिद्ध एक्टिविस्ट लेखक, कवि, नाटककार, आलोचक हैं। किश्वर नाहीद का परिवार मूल रूप से बुलंदशहर (दिल्ली से लगभग 100 किलोमीटर) का रहने वाला था और 1949 में पाकिस्तान जाने का फैसला किया था। किश्वर नाहीद का साक्षात्कार, जो यहाँ पेश है, वह उन से मई 4, 1995 के दिन नई दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में लिया गया था जिस की ज़बान उर्दू थी, जबकि कुछ terms का ज़िक्र अंग्रेज़ी में भी किया गया था । उस समय इस के कुछ अंश हिंदी और अंग्रेज़ी में छपे थे लेकिन सम्पूर्ण साक्षात्कार टेप में सुरक्षित था जिसे अब पाठकों के लिए पेश है। किश्वर नाहीद से यह बात-चीत लगभग 25 साल पुरानी है लेकिन जिन विषयों और सवालों पर चर्चा की गयी है वे आज भी बहुत प्रासंगिक हैं, भारत और पाकिस्तान दोनों जगह। किश्वर नाहीद पाकिस्तान के नेशनल कौंसिल ऑफ़ आर्ट (इस्लामाबाद) की उपाध्यक्ष रही हैं ।]   

सवाल : कुछ ख़ानदान सम्बन्धी तफ़सीलात जानना चाहूँगा।

जवाब : मेरा ख़ानदान बुलंदशहर से पाकिस्तान गया था। मेरी पैदाइश की असली तारीख़ 18 जून, है जबकि दस्तावेज़ों में 3 फ़रवरी दर्ज हो गयी है। मैं सात साल की थी जब पार्टीशन हुआ। हम अप्पर-कोट मुहल्ला क़ानूनगो इलाक़े में रहते थे। और बचपन की धुँधली यादें लिए जब 1984 मैं में आई तो काली नदी पर उतर गई और इस घर और गली तक इन ही धुँधली यादों के तवस्सुत से पहुंच गई। बस ख़राबी यह हो गई कि जब मैंने अपने पुराने घर के दरवाज़े पर दस्तक दी तो उन लोगों ने भी बस इस लिए पहचान लिया कि एक रात पहले मेरा इंटरव्यू टीवी पर आ गया था। मैं बग़ैर शनाख़्त के वहाँ जाना चाहती थी, लेकिन शनाख़्त हो गई तो मज़ा किरकिरा गया। बहरहाल, जैसा दोनों मुल्कों में हाल है कि कुछ भी नहीं तबदील हुआ।

पार्टीशन के बाद 1984 मैं पहली बार हिंदुस्तान आयी थी। पार्टीशन से पहले वालिद साहिब की बसें चलती थीं बुलंदशहर और दिल्ली के दरमियान। हमारी अम्मां ने जो सय्यद ख़ानदान की पहली औरत थीं, जिन्होंने अपनी लड़कियों को पढ़ाना शुरू किया। हमारे नाना और कोई भी उनसे नहीं मिलता था। 1947 में अब्बा को मुस्लिम लीग का लीडर होने की वजह से जेल में रखा गया। 1949 तक जेल में रहे और जब जेल से बाहर आए तो जाने का फ़ैसला हुआ। यह सब मैंने अपनी सवानिह उमरी [आत्म-कथा] ‘बुरी औरत की कथा’ में लिखा है।

सारी पढ़ाई लाहौर में लड़कियों के कॉलेज, गवर्नमेंट कॉलेज लाहौर में (अर्थ-शस्त्र में एमए) हुई। एमए के दरमियान ही शादी की। उसे ख़ुशी या मजबूरी जो भी कहें, यूसुफ़ कामरान जो मेरे क्लास फ़ेलो थे, शायर थे। मशाइरों में आना जाना था, यह रिवायती (परम्परागत) ख़ानदान को पसंद नहीं था और हमने अपने इन्क़िलाबी अंदाज़ में उन्हें बताया कि जब मास्टर्ज़ कर लेंगे तो शादी करेंगे और मुलाज़मत करेंगे, अपना घर ख़ुद बनाएँगे। दहेज़ नहीं लेंगे। शादी में जो लेकर गई, एक बोरी में इनामात थे जो मुझे मिले थे और दूसरी बोरी में मेरी किताबें थीं।

सवाल : औरत और मर्द के रिश्तों की बुनियाद के बारे में क्या सोचती हैं?

जवाब : मैंने बचपन से देखा अपने पूरे ख़ानदान में और ख़ानदान से भी आगे कि औरत के सामने मर्द अपनी हर कोताही या अपनी ग़लती की पशेमानी दूर करने को किसी ज़ेवर, किसी लत्ते, किसी कपड़े के बहाने माज़रत (माफ़ी मांगना) कर देता था। मैंने भी तय किया कि लत्ता मैं नहीं पहनूँगी, ज़ेवर नहीं पहनूँगी, चूड़ियाँ भी नहीं, गोटे के कपड़े नहीं पहनूँगी। यह उस वक़्त तय किया जब मैं बस 7-8 साल की थी। तब मैंने ज़ाहिर है मार्क्स वग़ैरा को नहीं पढ़ा था। यह सब घर का माहौल देखकर ही नहीं हुआ था, बल्कि पार्टीशन में जिस तरह से औरतों के अग़वा (अपहरण) हुए, उन पर मज़ालिम (अत्याचार) हुए, इस ने मेरे बचपन के ज़ेहन को बहुत मुतास्सिर (प्रभावित) किया। औरतों का बुरी तरह मजरूह (ज़ख़्मी) होना देखा, घर में दो भाइयों के बीच की बहन थी। मार मुझे पड़ती थी, कहा मुझे जाता था भाइयों को नहीं, मसाला पीसने को मुझे कहा जाता था, बर्तन धोने को मुझे कहा जाता था। मैं कहती थी उन इन भाईयों को क्यों नहीं कहती हो जो मेरे साथ के हैं। इस पर मुझे मार पड़ती थी तो यह सारे Retaliations (प्रतिशोध) हुए।

सवाल : लेकिन क्या शादी करके आपको बराबर के हुक़ूक़ मिले?

जवाब : यह अलग कहानी है। आप एक ही क़दम में पूरी सीढ़ी चढ़ लेना चाहते हैं। (हँसती हैं)

सवाल : आपको नहीं लगता कि शादी का Institution (संस्था) औरत के ख़िलाफ़ है?

जवाब : Institution of marriage is against both woman and man (शादी की संस्था औरतों और मर्दों दोनों के ख़िलाफ़ है।). मुसावात (समानता) किसी के लिए नहीं है, लेकिन औरत को ज़्यादा भुगतना पड़ता है। यह सच है कि मुझे 35 बरस नौकरी करते हो गए। गुज़िश्ता (बीते) 30 बरस से High position (उच्च-पदों) पर काम कर रही हूँ और Decision Making सतह (निर्णय लेने वाली जगहों) पर काम कर रही हूँ, लेकिन आज भी मज़ाक़ उड़ाते हुए बात करने वाले मेरे सामने आ जाते हैं। आज भी इस बात का मज़ाक़ उड़ाने वाले लोग होते हैं कि औरत ने क्या काम करना है। हाँ, आपके तो आगे पीछे कोई नहीं है इसलिए आप काम कर लेती हैं।

[क्योंकि मेरे दोनों बेटे बड़े हो गए हैं। एक स्पेन में है और दूसरा अमरीका में है। उन्हें इसलिए वहाँ भेजा गया था क्योंकि मार्शल लॉ के दौरान माओं और वालिदैन (माता-पिता) के फ़ैसलों को बदलवाने के लिए, उनके फ़लसफ़े को बदलवाने के लिए, बच्चों को Torture करेंगे (यातनाएं देंगें), उन को गिरफ़्तार करेंगे।]

सवाल : क्या आपको यह लगता है कि कितने भी बराबरी के दावों के साथ शादी की जाए, कितने भी Idealism (आदर्शवाद) के साथ ब्याह हो, औरत को नंबर दो का ही शख़्स हो कर रहना पड़ता है?

जवाब : यह तो रहना पड़ता है। वह तो इसलिए रहना पड़ता है कि हमारी माओं ने और हम माओं ने बेटों को कम से कम बरेसग़ीर (उपमहाद्वीप ) में यह कह के परवरिश नहीं किया कि तुम इस तरह के मर्द हो जैसी कि औरत है। मैंने तो लिखा भी है कि जब बेटा 8-9 साल का था और मैं बातें करती थी तो वह मेरे रवैये को देखकर कहा करता था कि अम्मां, क्या बात करती हो, इस घर में तो कुत्ता भी मर्द है। यह बातें किसी एक शख़्स के बदलने से नहीं बदला करतीं। एक बात जिसमें मैं यक़ीन रखती हूँ, एक मुकम्मल दीवार में से एक ईंट निकालने की कोशिश करें तो दीवार कमज़ोर हो जाती है और ईंटें निकालना आसान हो जाता है, लेकिन वह जो पहली ईंट निकालना है, वह मुश्किल होता है। जैसे एक बूँद के पीछे बहुत सी बूँदें आ जाती हैं, लेकिन पहली बूँद कहाँ से आती है, यह बहुत अहम है।

सवाल : किया मुस्लमानों के नाम पर हुकूमत मिल जाने पर मुस्लमान औरत को हुक़ूक़ हासिल हुए?

जवाब : औरत को ही किया 85 फ़ीसद मुआशरे [society] को कुछ नहीं मिला। ये वो लोग हैं जिन्हें हम बे-इख़्तियार [अधिकारों से वंचित] लोग कहते हैं। औरत के साथ तो दोहरा अज़ाब है। औरत के ख़िलाफ़ तशद्दुद [हिंसा] सिर्फ़ यह नहीं है कि उसको पीटने और धमकाने की इजाज़त देने वाला लिटरेचर हिन्दुस्तान और पाकिस्तान में बिक रहा है, बल्कि जो अदब और Advertisement [विज्ञापन] औरत को कितना ख़ूबसूरत होना चाहिए, यह सब बिक रहा है, दिखाया जा रहा है, वह भी इतना ही ख़तरनाक है। मैंने जब घटिया मज़हबी लिटरेचर के ख़िलाफ़ लिखा जो औरत को मारने की तरफ़दारी करता है, तो लोग मेरे दुश्मन हो गए।

सवाल : क्या यह सच नहीं है कि पाकिस्तान में Fundamentalism [बुनियाद परस्ती] को सभी हुकमरानों ने चाहे, वे मिलिट्री हुक्मराँ रहे हों, दाएं बाज़ू के रहे हों, या भुट्टो साहिब या उनकी बेटी रही हों, बढ़ाया, placate [दिलासा देना] किया?

जवाब : [कुछ सोचते हुए] दुनिया में जहाँ भी Fundamentalism आया, चाहे इस्लाम में, चाहे Judaism में, चाहे हिंदुओं में, वह ख़ुद ही नहीं आया, उसे Promote किया गया। उसे Imperialist [साम्राज्यवादी] ताक़तों ने Promote [प्रोत्साहित] किया।

सवाल : क्या सिर्फ़ Imperialism [साम्राज्यवाद] को ज़िम्मेदार ठहराने से काम चल जाएगा? क़ादियानीयों को ग़ैर-मुस्लिम तो भुट्टो ने क़रार दिया।

जवाब : यह कुछ फ़ोर्सिज़ [ताक़तों], कुछ लोगों को ख़ुश करने के लिए रखा जाता है और वह periphery [परिधि] पर होते हैं, लेकिन इस तरह की मदद से वह centre stage पर आ जाते हैं। यह बताते हुए बड़ा दुख होता है कि हमारे यहाँ एक फ़ौजी आमिर [तानाशाह] था अय्यूब ख़ां, जिसने Family Laws [निजी क़ानून] दिए, जिसने औरत को काफ़ी हुक़ूक़ दिलाए, मौलवियों की मुख़ालफ़त के बावजूद। मुसलमान औरत की मुसावात [समानता] की लड़ाई में इससे बहुत मदद मिली, लेकिन हमारे अपने जो लोग थे (उनका इशारा भुट्टो की तरफ़ है) इन्होंने National assembly [पाकिस्तानी संसद] में औरतों की सीटों का कोई Permanent [स्थायी] इंतिज़ाम न करके एक Ordinance [अध्यादेश] के ज़रिये रखा और जब Ordinance ख़त्म हुआ तो सब ख़त्म हो गया। हमारे बर्रे-सग़ीर [भारतीय उपमहाद्वीप] का प्रोग्रेसिव [प्रगतिशील] दानिश्वर [बुद्धिजीवी] बहुत बेईमान है। हमारे प्रोग्रेसिव मूवमेंट ने किसान की बात की, देहात की बात की, मज़दूर की बात की, उसने जलसों में आने को खद्दर पहना लेकिन ख़ुद इस क्लास में उतरा नहीं। यह सच है और इस में मैं डाक्टर मुबारक अली से इत्तिफ़ाक़ रखती हूँ, कि पाकिस्तान और इस बर्रे-सग़ीर [भारतीय उपमहाद्वीप] के दूसरे मुल्कों के प्रोग्रेसिव लोगों ने अपने अपने मुल्कों में जो भी अवाम के ख़िलाफ़ धाराएँ चलती रहीं, उनका साथ दिया। चाहे वह बाहर कितने भी इन्क़िलाबी बनते हों।

लेकिन हम तारीख़ पर बात न करें, बुत तो टूटा ही करते हैं]

सवाल: मार्क्सइज़्म के मुस्तक़बिल [भविष्य] के बारे में किया सोचती हैं?

जवाब : जो लोग बहुत गुल मचा रहे हैं ख़ुशी से ढोल बजा रहे हैं कि मार्क्सइज़्म ख़त्म हो गया है, वह बेवक़ूफ़ हैं। नज़रिए [विचार/दर्शन] मुल्कों से नहीं जड़े होते हैं। बहुत से मुल्कों में ग़ुर्बत है, जहालत है तो मार्क्सइज़्म रहेगा। ऐसा बेवक़ूफ़ ही कह सकते हैं।

सवाल : पाकिस्तान में उर्दू का मुस्तक़बिल क्या होगा?

जवाब : देखिए, पहली बात तो यह है कि एक वक़्त में यह कोशिश की गई कि हमारे मुल्क में जो इलाक़ाई ज़बानें हैं इनको क़ौमी धारे से निकाल दिया जाए। तो जब भी आप ऐसी कोशिश करोगे तो रद्दे-अमल [प्रतिक्रिया] का शिकार होगे ही। इसलिए जब इस कोशिश के जवाब में जो रद्दे-अमल हुआ वह बहुत ख़राब था। हमें यह समझना चाहिए कि उर्दू एक राबते [संपर्क] की ज़बान है और बाक़ी सारी इलाक़ाई ज़बानों की बराबर एहमीयत है। हमें यह नहीं फ़रामोश करना चाहिए कि वो कौमें जो अपने बच्चों को अपनी मादरी ज़बान [मातृभाषा] में तालीम नहीं देतीं, वो बहुत ख़तरनाक खेल खेल रही होती हैं। अंग्रेज़ों ने भी अपने बच्चों को उर्दू हिन्दी या फ़्रांसीसी में तालीम नहीं दी। अमरीकीयों ने मैक्सीकन में तालीम नहीं दी, फ़्रांसीसियों ने फ़ारसी में अपने बच्चों को तालीम नहीं दी। यह सारी दुनिया में सिर्फ़ हमारे बर्रे-सग़ीर [भारतीय उपमहाद्वीप] में है कि अपनी मादरी ज़बान की जगह दूसरी ज़बान में तालीम देकर बड़े मुतमइन रहते हैं और बड़े मग़रूर भी रहते हैं। उर्दू पाकिस्तान में 12 करोड़ में से 3-4 करोड़ की मादरी ज़बान है। ज़बानें दरबार में पैदा नहीं होतीं, उनका रिश्ता ज़मीन से होता है। उनको कोई ख़त्म नहीं कर सकता।

सवाल : आपने पहला शेअर कब कहा होगा?

जवाब : मैंने 15 साल की उम्र में पहला शेअर [नज़्म की की 2 पंक्तियाँ] कहा था। एक तरही [कविता लिखने का एक नमूना] मुशायरा था, जिसके लिए मैंने ग़ज़ल कही थी और वह शायद मजाज़ [उर्दू के प्रसिद्द क्रांतिकारी कवि असरारुल हक़ मजाज़ लखनवी 1911-1955 ] का मशहूर मिसरा [पंक्ति] था “सब के तो गरीबां सी डाले अपना ही गरीबां भूल गए”। इस दौर में आप शायरी करने के लिए क्लासिकी शायरी से रूशनास [परिचित] हुए बग़ैर कुछ नहीं कर सकते थे।

सवाल : आपके उस्ताद कौन थे?

जवाब : मैंने किसी उस्ताद से शागिर्दी का राबता [सम्बन्ध] नहीं रखा। इस ज़माने में यह हो ही नहीं सकता था । हम तो औरत थे और औरत यह कैसे करती, अलबत्ता कॉलेज के ज़माने में जब मैंने शायरी शुरू की तो तमाम बड़े असातिज़ा [उस्ताद] शायर थे। जैसे आबिद अली ‘आबिद’, फ़ैज़ साहब, सूफ़ी साहब, बुख़ारी साहब, एहसान दानिश साहब। इन सबसे मिलने का मौक़ा मिला। इनकी महफ़िलों में जाकर बैठना, इनसे सीखने का मौक़ा मिला।

सवाल : इन महफ़िलों में जाने की इजाज़त थी?

जवाब : नहीं! छुप कर जाती थी, कोई बहाना बनाकर जाती थी।

सवाल : पुरानी पीढ़ी की उर्दू शायरी में आपके सबसे पसंदीदा शायर कौन हैं?

जवाब : इस सवाल का जवाब बड़ा मुश्किल है। पसंदीदा शायर का होना तो मुश्किल होता है, लेकिन अशआर [काव्य] ज़रूर पसंदीदा होते हैं। वैसे ग़ालिब को जब भी पढ़ो तो ग़ालिब नया ही लगता है। अच्छे शेअर की ख़ुसूसियत यह होती है कि अशआर के मआनी की नई सतह हर-रोज़ दरयाफ़्त होती है और उसकी कोई हद नहीं होती, इस दरयाफ़्त की। और इस मुलाक़ात की जैसे आप नए शेर लिखते हो तो इसलिए लिखते हो कि आपको नए ख़यालात से मिलने का शौक़ होता है। इसी तरीक़े से कहीं कहीं ‘ग़ालिब’, ‘मोमिन’ और ‘मसहफ़ी’ है। मुझे लगता है अगर Sensous [भावमय] शायरी देखनी हो तो मसहफ़ी जैसा शायर कोई नहीं है। दरयाफ़त करने के अमल में जब आप ख़ुद को दरयाफ़त करते हैं तो कई मर्तबा पुराने शायरों को भी आप अपने अंदर दरयाफ़्त कर लेते हैं।

सवाल : आप उर्दू शायरी की अज़ीम विरासत में से किस के क़रीब अपने आपको महसूस करती हैं?

जवाब : असल में आज भी अगर मैं ग़ज़ल लिखती हूँ तो तीन चीज़ों पर ग़ौर करती हूँ। मेरी ग़ज़ल क़तई क्लासिकी होती है क़तई। और ऐसी ग़ज़ल कहना मुझे पसंद है।

सवाल : लोग कहते हैं कि आप ग़ज़ल के ख़िलाफ़ कोई तहरीक चलाए हुए हैं?

जवाब : यह बिलकुल ग़लत है। मैं ग़ज़ल के ख़िलाफ़ किसी तहरीक में शामिल नहीं हूँ। यह तो हो भी नहीं सकता। मैं तो आपको ख़ुद बता रही हूँ कि मैं क्लासिकी ग़ज़ल ही लिखती हूँ, लेकिन अंदाज़ मेरा अपना ही होता है। मसलन अगर में यह कहती हूँ कि

   “’बर्फ़ की मानिंद जीना उम्र-भर

   रेत की सूरत मगर तपना बहुत”

   तो मेरा अपना अंदाज़ है या

   “’घर के धंधे निपटते ही नहीं नाहीद

   मैं निकलना भी अगर शाम को घर से चाहूँ”।

   जब मैं आज़ाद नज़्म पर आती हूँ तो इसमें मेरे साथ दो बड़े लोग हैं जो हमेशा मेरी रहनुमाई करते हैं और मेरे क़रीब हैं। मीम सिद्दीक़ी और नून मीम राशिद। दोनों के लिखने का अंदाज़ मुझे पसंद है, बल्कि मेरी पहली किताब ‘बेनाम मुसाफ़त’ जो नज़्मों का मजमूआ है, इसमें आपको बहुत जगह महसूस होगा कि कहाँ से पढ़ी चल रही हूँ। [ग़ज़लों की पहली किताब ‘लबे-गोया’]

इस के बाद जब मैं आती हूँ अपने तीसरे पड़ाव नस्री [गद्य] नज़्म पर तब मुझे यह पता चलता है कि मैं जिस Sensibility [संवेदनशीलता] मैं ज़िंदा हूँ, जिस Sensibility की शायरी पढ़ रही हूँ, जिस Experience [अनुभूति] से मैं गुज़र रही हूँ, उसकी बहुत सी तहें मुझे आज़ाद नज़्म और ग़ज़ल नहीं कहने देतीं।

सवाल : आज़ाद नज़्म को आप तकनीकी तौर पर नस्री नज़्म से कैसे अलग करती हैं?

जवाब : वहाँ वज़न होता है, लेकिन नस्री नज़्म में वज़न नहीं होता।

सवाल : Feminism [नारीवाद] के बहुत से Trends [धाराएं] हैं, दुनिया में भी और पाकिस्तान में भी, आप किस Trend की हमदर्द हैं?

जवाब : कुछ लोग Feminism से मुराद यह लेते हैं कि जो काम मर्द करता रहा है, जो ज़ुल्म मर्द करता रहा है, वह सब औरत करने लगे। कुछ यह समझते हैं कि औरत का जो रिवायती रोल है उसे ख़त्म कर दिया जाए, तो वह Feminism है। कुछ लोग यह समझते हैं कि सारे इक़्तिदार [राज करने] के रिश्ते औरत को मिल जाएं और साइकिल उलट जाए। मैं सिर्फ़ इतना समझती हूँ कि किसी औरत को इज़हारे-राय [अभिव्यक्ति] का हक़ मिले और इज़्ज़त के साथ जीने का वह हक़ मिले जो मुआशरे [समाज] ने तो उसको कभी नहीं दिया। और तीसरी बात यह कि औरत को अपने नाम से जीने की आज़ादी हो। हमारे मुआशरे ने औरत को रिश्तों के हवालों से याद किया है। वह माँ है, बहन है, बेटी है, बीवी है, वह ख़ुद क्या है उसे कभी नहीं कहा गया। उसे बताया ही नहीं गया। पहले नाम लिखे जाते थे ज़ौजा [पत्नी] मुहम्मद हुसैन, वालिदा [माँ] इफ़्तिख़ार ज़ैदी। आज भी वह मिस्टर फ़लाँ-फ़लाँ, श्रीमती फ़लाँ-फ़लाँ, बेगम फ़लाँ-फ़लाँ है। बड़ी शान से कई बार यह कहा जाता है कि औरत तो घर की मालकिन होती है, लेकिन घर पर जो मिल्कियत की तख़्ती लगी रहती है, वह शौहर ही के नाम की होती है। यही मेरा [नारीवाद] है।

सवाल : पाकिस्तान में औरतों के हुक़ूक़ को लेकर जो तहरीकें चल रही हैं, उनका कुछ नतीजा निकला है या कुछ नया करना पड़ेगा?

जवाब : वैसे तो जो तहरीकें चल रही हैं उन्होंने पहली मंज़िल पूरी की है, Consciousness [चेतना] को फैलाने और बढ़ाने में मदद की है, वह थोड़ी बहुत तो आती है, लेकिन कुछ और करना पड़ेगा, क्योंकि अभी तक हमने यह सोचा कि औरतों को उन के हुक़ूक़ के बारे में आगाही दी जाए और यह भूल गए कि जब तक आप मर्द को बाशुऊर [प्रबुद्ध] नहीं करेंगे और उसको यह नहीं समझाएँगे कि यह मानने का हौसला करो कि औरत की भी एक शख़्सियत है। उसको नौकरानी मत मानो कि शादी करके बीवी के रूप में एक नौकरानी ले आए। उस वक़्त तक हालात सुधरेंगे नहीं ।

सवाल : क्या आपको लगता है कि किसी भी धार्मिक राष्ट्र में औरत को उसके हुक़ूक़ मिल सकते हैं? भारत को लोग धार्मिक राष्ट्र बनाना चाह रहे हैं और पाकिस्तान तो है ही।

जवाब : यह Fallacy [भ्रम] है कि जब सर पर पड़ेगी, तब देखेंगे।

सवाल : क्या पाकिस्तान एक Theocratic State [ धर्मशासित राज्य] है?

जवाब : नहीं, पाकिस्तान एक Theocratic State नहीं है। पाकिस्तान एक इस्लामी जम्हूरी [प्रजातांत्रिक] रियासत है।

सवाल : कैसी जम्हूरी रियासत है? दो औरतें मिलकर एक मर्द नौकर के बराबर होती हैं।

जवाब : यह सारे क़वानीन ख़त्म करने की तहरीक जारी है और मुसलसल है। आठवीं तरमीम [8वां संशोधन] ख़त्म होगी तो यह भी हो जाएगा।

सवाल : पाकिस्तानी उर्दू शायरी और हिन्दुस्तानी उर्दू शायरी में कुछ फ़र्क़ है या एक जैसी ही है?

जवाब : काफ़ी फ़र्क़ है। एक तो यह है कि पाकिस्तान में दो Distinct [अलग] ट्रेंड हैं। एक तो यह कि जो Feminism [नारीवाद] है, इसकी वजह से उर्दू शायरी का लहजा, ज़ाविया [कोण] और मंज़रनामा [परिदृश्य] बदला। इससे परुष कवि भी मुतास्सिर [प्रभावित] हुए और महज़ Romantic [रूमानी] शायरी नहीं रही, बल्कि हक़ीक़त पसंदी की तरफ़ आए। और दूसरी चीज़ जिसने मदद की कि शायरी को और बेहतर कर सकें, वह एक तो हमारे ऊपर हब्स [क़ैद] की जो रात 11 बरस जारी रही, मार्शल लॉ की शक्ल में । दूसरे वह तराजुम [अनुवाद] हमारे यहाँ फ़िलस्तीनी, लातीनी, अफ़्रीक़ी, अमरीकी, शायरों के हुए इस से हमारी शायरी में बड़ी ताज़ा हवा के झोंके आए। इस शायरी को सियासी शायरी तो नहीं कहा जा सकता, लेकिन इसका ज़िंदगी से गहरा ताल्लुक़ है। दूसरी चीज़ यह है कि हिन्दुस्तान में सिवाए चंद शायरों के उर्दू शायरी के साथ यह हुआ कि रिवायती शायरी या तग़ज़्ज़ुल [ग़ज़ल की विशेषता] को बरक़रार रखा। शायद यहाँ मुशायरे ज़्यादा होते हैं, इसलिए ऐसा हुआ । इस रिवायती अंदाज़ की वजह से नज़्म और ग़ज़ल में वह मुख़्तलिफ़ पैराहन [लिबास] नहीं आए जो पाकिस्तान में आए, जबकि उसके मुक़ाबिल पाकिस्तान में तन्क़ीद [आलोचना] में वो सारे लहजे नहीं आए जो हिन्दुस्तान में आ गए। हिन्दुस्तान में तख़लीक़ी तन्क़ीद [सृजनात्मक आलोचना] जिसको Creative criticism कहते हैं, वह हिन्दुस्तान में बहुत अच्छा हुआ, लेकिन पाकिस्तान में ऐसा नहीं हुआ।

सवाल : क्या आपका यह कहना है कि पाकिस्तानी उर्दू शायरी ज़िंदगी के ज़्यादा रूबरू खड़ी रही?

जवाब : खड़ी रही, लेकिन इस का बेहतर तजज़िया [विश्लेषण] हिन्दुस्तान में हुआ। यहाँ तक कि हमारी नस्र निगारी [गद्य लेखन] का भी बेहतर तन्क़ीदी जायज़ा [आलोचनात्मक अध्ययन] हिन्दुस्तान ही में लिया गया। हमारे यहाँ जो अफ़साना लिखा गया उसका बेहतर तजज़िया [विश्लेषण] हिन्दुस्तान में हुआ। पाकिस्तान में निसाबी [किताबी] तन्क़ीद होती रही। वो सारे लेक्चरर जो उर्दू से प्रोफ़ेसर हुए थे, निसाबी अंदाज़ में मज़मून लिखते रहे। शायद क़रीब रह कर तजज़िया करना मुश्किल होता हो कि मारने आ जाएगा। दूर रहने से यह डर नहीं होता होगा। ग़ैर-मुल्की तर्जमों ने हमारी इस दौर में मदद की जब हमपर ज़बरदस्त ज़ोर-ज़बरदस्ती की जा रही थी। मुँह पर ताले थे। उन दिनों में हमने इन तर्जमों के ज़रिये से अपना दुख-दर्द बयान करने की कोशिश की। यह तर्जमे मक़बूल हुए और फिर फ़िलस्तीनी, लातीनी, अफ़्रीक़ी शायरी के अंदाज़ और मिज़ाज उर्दू शायरी ने भी इख़्तियार कर लिया और इस रंग में रंग गई और यह पहली बार हुआ। आज़ादी से पहले उर्दू कहानी का अंदाज़-ओ-लहजा तभी बदला था जब तुर्की कहानियों के तर्जमे उर्दू में हुए या Eliot के उर्दू में छपने से उर्दू की आज़ाद नज़्म का लहजा बदला था।

   इस तरह पाकिस्तानी उर्दू शायरी और तन्क़ीद का यह एक Stream   [धारा] है और दूसरा Stream भुट्टो साहब की फांसी के बाद पनपा। उसने बहुत से Symbols [प्रतीकों] को ज़िंदा किया। कर्बला का Symbol सूली, जल्लाद, यज़ीद [कर्बला के जनसंहार को अंजाम देने वाला] उर्दू शायरी में आए, नए मआनी [अर्थ] के साथ। आप अगर पिछले दस साल की फ़राज़, इफ़्तिख़ार आरिफ़ या परवीन शाकिर की शायरी देखें तो यह सब ख़ूब मिलेगा, या फ़ैज़ साहब की शायरी।

अगर शायरी अपनी ज़मीन से नहीं जुड़ी होगी तो इसका कोई असर नहीं होगा। हमारा एक शायर है सलीम शाहिद, उसने एक शेर लिखा “पर जो घर से निकाले तो मैं बाज़ार में था”। हमारे जो छोटे-छोटे घर हैं और इसका जो मंज़र है इससे बेहतर किसी मिसरे में नहीं आ सकता। या फिर “बाहर जो मैं निकलूँ तो बरहना [नंगा] नज़र आऊँ—बैठा हूँ मैं घर में दरो-दीवार पहन कर”। इनसानी ग़ुर्बत का इस से शानदार अंदाज़े-बयाँ क्या हो सकता है? मीर की ग़ज़ल का अंदाज़, यह शायर लाहौर का ठेठ पंजाबी बोली वाला बंदा है। या एक शायर है जिसने कहा “दीवार क्या गिरी मिरे कच्चे मकान की—लोगों ने मेरे सेहन में रस्ते बना लिए”। या फिर जमाल एहसानी ने कहा : “चिराग़ सामने वाले मकान में भी न था”।

कैफ़ी साहब पाकिस्तानी उर्दू शायरी की जो कैफ़ीयत बयान करते हैं वह ठीक नहीं है, क्योंकि उन्होंने पुराने शायरों को पढ़ा है और आज की शायरी से वाक़िफ़ नहीं । उन्हें मौक़ा ही नहीं मिला है। किताबें भी नहीं जातीं । दोनों मुल्कों के हालात ही कुछ ऐसे हैं।

सवाल : आपके यहाँ मुशायरे नहीं होते?

जवाब : होते हैं। मेला मवेशियान [पशु] में होते हैं। वाक़ई मुशायरे हमारे यहाँ मेला मवेशियान का हिस्सा हैं। मवेशियों के मेले बहुत होते हैं और इसके साथ मुशायरे भी बहुत होते हैं। मुशायरे हैं, शायरों की तहज़ीब है, लेकिन जैसे आपके यहाँ मुशायरे होते हैं। आपके यहाँ तो बला के मुशायरे होते हैं, वहाँ तो गाने वाले चलते हैं, शेर नहीं चलता। लेकिन यह भी सच है कि जो ठीक-ठाक मुशायरे होते हैं वह आपके यहाँ से बेहतर होते हैं। आपके यहाँ तो सिर्फ़ गाना चलता है, शायर नहीं चलता। मैंने 10 बरस पहले एक मुशायरा पढ़ा था यहाँ आ के और तब ही से तौबा कर ली थी कि आइन्दा मुशायरा नहीं पढ़ूँगी, क्योंकि अगर मैंने गाना ही सुनना है तो फिर मैं किसी बड़े गाने वाले से सुनूँगी, उनसे क्यों सुनूँगी? वह शायर भी नहीं हैं और फिर भी गा रहे हैं। वह ज़्यादा अच्छा होगा।

सवाल : ऐसा क्यों हो रहा है?

जवाब : जब दस-दस और पच्चास-पच्चास हज़ार लोग मुशायरे में आएँगे तो वो कलाम थोड़ी सुनने आएँगे, वो तो तमाशा देखने आएँगे। उनको शेअर और शायरी से क्या लेना है।

सवाल : पाकिस्तानी शायरों और गुलूकारों [गायकों] की ग़ज़लें जो हिन्दुस्तान में ख़ूब मक़बूल हो रही हैं। इस की वजह?

जवाब : इस का ज़्यादातर क्रेडिट पाकिस्तान के गाने वालों को जाता है। असल बात यह है कि हिन्दुस्तान में बेगम अख़्तर के बाद ग़ज़ल गायकी पर किसी ने Touch [छुआ] नहीं किया, और किसी के पास आई नहीं। मेहदी हसन और ग़ुलाम अली ने इस रिवायत को आगे बढ़ाया। यही वजह है कि हिन्दुस्तान में जो गा रहे हैं इनको ही नक़ल कर रहे हैं। एक बात और है जो आप ने परवरिश नहीं की, हालाँकि अब फिल्मों के ज़रिये आ रही है। आपने हमारे यहाँ की तरह Folk [लोक संगीत] को बढ़ावा नहीं दिया । हमारे यहाँ अगर रेशमा आई तो Folk के ज़रिये आई। हमारे यहाँ अगर आबिदा परवीन आईं तो ओ Folk के ज़रिये आई। अगर हमारे यहाँ अल्लन फ़क़ीर आया तो Folk के ज़रिये आया। अताउल्लाह भी आया तो Folk के ज़रिये आया, जबकि आपके यहाँ Rich folk [समृद्ध लोक संगीत] होने के बावजूद आपने उसे बढ़ावा नहीं दिया। मुझे पता नहीं वुजूह [कारण का बहुवचन] क्या हैं, हमारे Folk ने कई बार बहुत बहादुरी से अपनी ज़िम्मेदारी निभाई। जब हमारे यहाँ मार्शल लॉ था, उस दौर में जब बहुत सी चीज़ें सेंसर होती थीं, आबिदा परवीन तब सूफ़ियाना कलाम गाती थीं जिसमें मौलवियों के लत्ते [नंगा करना] लिए होते थे, तो उसे कोई ban [पाबंदी] नहीं कर सकता था। यह सब टीवी पर भी आता था। आपके यहाँ इतना बड़ा folk होते हुए भी, इसकी इतनी अज़ीम रिवायत होते हुए भी इसका कुछ इस्तेमाल नहीं हुआ। सिर्फ़ हिन्दी फिल्मों में फ़ुहश [अश्लील] गीत गाने के लिए उस का इस्तेमाल हुआ।

सवाल : फ़ैज़ पंजाबी थे, इक़बाल पंजाबी थे। इन्होंने पंजाबी में शायरी क्यों नहीं की?

जवाब : फ़ैज़ ने तो पंजाबी में भी शायरी की है, लेकिन यह कोई ज़रूरी नहीं होती है। एक बात तो यह थी कि पंजाबी ज़बान लिखने और निसाब [पाठ्यक्रम] में तो ज़्यादा इस्तेमाल नहीं होती थी और इल्म जिस ज़बान में हासिल हो, उसी में तख़य्युल [कल्पना] की परवाज़ होती है।

सवाल : क्या इस्लामी शायरी भी होती है आपके यहाँ?

जवाब : ऐसी कोई चीज़ नहीं होती है। नअत [पैग़म्बर मोहम्मद की शान में लिखा गया काव्य] तो लिखी जाती है, जैसे भजन लिखा जाता है।

सवाल : हिन्दुस्तान कितनी बार आ चुकी हैं?

जवाब : चार-पाँच बार।

सवाल : और मुशायरों में भी रही हैं?

जवाब : सिर्फ़ एक मर्तबा।

सवाल : भारत के Literary और Cultural [सांस्कृतिक, साहित्यिक] सीन पर आप की राय?

जवाब : जैसा कि मैंने कहा था कि आपके यहाँ उर्दू शायरी ने जो Gain [हासिल] नहीं किया, वह यह है कि भारत के इलाक़ाई अदब जैसे कि कन्नड़ अदब, बंगाली अदब, उड़िया अदब हैं। उर्दू अदब ने गुजराती अदब, पंजाबी अदब से रिश्ता नहीं रखा। यह सब बहुत पावरफ़ुल अदब हैं। उर्दू अदब को इससे अपने आप को मुताल्लिक़ [जोड़ना] करना होगा और मुताल्लिक़ करना चाहिए।

सवाल : क्या इसकी वजह उर्दू में लिखने वालों का Superiority complex [श्रेष्ठता का भाव] है?

जवाब : शायद, या उर्दू वाले पढ़ते ही नहीं हैं इन सब अदब को। वो सोचते हैं कि कहीं इससे उन की Originality [मौलिकता] मजरूह न हो जाए।

सवाल : ग़ैर-मुल्की अदब की भरमार से आप परेशान हैं क्या?

जवाब : मुझे लगता है कि दरवाज़े और खिड़कियाँ खुली रखने से अच्छा ही होता है। कहीं के भी अदब से सीखा जा सकता है। यूरोप से आने वाली चीज़ों से भी कोई हरज नहीं। नेरुडा को को पढ़कर फ़ैज़ साहब ने ‘तेरी समुन्दर आँखें’ लिखा। Originality [मौलिकता] कोई मशीनी चीज़ नहीं है। यह सिफ़र से शुरू नहीं होती है। यह आप दूसरों से सीखते हैं और अपने अंदाज़ में बयान करते हैं।

आपके यहाँ बहुत अच्छी कहानियां लिखी गईं। बहुत अच्छी तन्क़ीद [आलोचना] हुई, अलबत्ता शायरी बहुत अच्छी कम हुई। शायद इस वजह से कि यहाँ से ख़वातीन शाएरात [महिला कवि] नहीं मिलती हैं। पाकिस्तान में ख़वातीन शायर एक से एक हैं। हालाँकि इसके लिए बहुत मेहनत करनी पड़ती है। Going through the mill [बहुत मुश्किल हालात से गुज़ारना] हमारे साथ हुआ है। जब आपके पाँव पर दूसरे का पांव पड़ता है तो चीख़ तो निकलती है।

सवाल : उर्दू का मुस्तक़बिल [भविष्य] पाकिस्तान में?

जवाब : किसी भी ज़बान का मुस्तक़बिल तब तक महफ़ूज़ होता है जब तक उसमें अच्छा लिखने वाले मौजूद हों, उसे पढ़ने वाले मौजूद हों, उसके अंदर हालात को बयान करने की सलाहियत हो। जो इलाक़ाई रुजहान चल रहे हैं उनसे उर्दू को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा। किसी भी मुल्क में एक से ज़्यादा ज़बानें हों तो एक-दूसरे को क़ुव्वत देती हैं।

सवाल : और कौन सी शायरा हैं पाकिस्तान में?

जवाब : फ़हमीदा रियाज़, इशरत आफ़रीन, परवीन शाकिर और सारा शगुफ़्ता का तो इंतिक़ाल हो गया। नसीर अंजुम भट्टी। नए लिखने वालों में फ़ातिमा हसन हैं, शाहिदा हसन हैं, अज़्रा अब्बास हैं। लिखने वाले तो उस वक़्त तक आते रहेंगे जब तक ज़बान है और मसाइल [समस्या का बहु-वचन] हैं।

सवाल : बर्रे-सग़ीर [भारतीय उपमहाद्वीप] की तक़सीम से उर्दू अदब का नुक़्सान हुआ क्या?

जवाब : कोई नुक़्सान नहीं हुआ, बल्कि फ़ायदा हुआ, वह इस तरह कि जो अदीब सिर्फ़ बुनियादी तौर पर रोमानियात तक महदूद रहते थे, उनके सामने दूसरे मसाइल [समस्या का बहुवचन] आए। दोबारा दोबारा घर बसाने का, आबाद होने का, नई सक़ाफ़त [संस्कृति] से रूशनास [परिचय] होने का, उन contradictions [विरोधाभासों] को resolve [हल] करने का, जिन से कभी वास्ता नहीं पड़ा था, चैलेंज सामने आया। उर्दू अदब और गहराई तक पहुंचा। अगर यह सब न होता तो ‘परमेश्वर सिंह’ कैसे लिखा जाता? ‘गड़रिया’ कैसे लिखा जाता? आपके यहाँ अमृता प्रीतम कैसे बनतीं, वह बनीं इसी लिए। वह वही रूमानी शायरा रहतीं। आपके यहाँ बलवंत सिंह ने जो लिखा, राजिंदर सिंह बेदी ने जो लिखा वह कहाँ से आया। अज़ीम अदब को बनने के लिए जो कसक दरकार होती है, वह उसने पैदा की।

सवाल : उर्दू अदब को मग़रिबी [पश्चिमी] एशिया की शायरी या अदब ने भी मुतास्सिर किया?

जवाब : जी हाँ, फ़िलस्तीनी मुज़ाहमती [प्रतिरोधी] शायरी ने बहुत मुतास्सिर [प्रभावित] किया। बाक़ी दूसरे अरब ममालिक [मुल्कों] से तो अदब हमारे यहाँ पहुंचा ही नहीं।

सवाल : आपका तस्लीमा नसरीन के बारे में क्या ख़याल है?

जवाब : असल में सहाफ़ीयों [पत्रकारों] की एक बहुत बुरी आदत होती है catchy phrasing [लुभावने शब्द] और catchy नामों को उठाकर बहुत बातें करते हैं। किसी ने पढ़ा नहीं उस को। ‘लज्जा’ बहुत कमतर दर्जे का नॉवेल है। She is too young [वह बहुत छोटी है]। उसके बारे में बात करना फ़ुज़ूल है। वह कुछ काम करे तो उसके बारे में बात करें। उसने अभी कोई काबिले-ज़िक्र काम ही नहीं किया। हम लोग किसी को Sensationalism [सनसनीख़ेज़ियत] पर न लिया करें, बल्कि उस की माहियत पर लिया करें। उसने कोई काम किया नहीं है। काम करेगी तो बात करेंगे। उसकी जो चीज़ें छपी हैं वो अभी इस क़ाबिल नहीं हैं कि उनपर बात की जा सके। उसे सियासी तौर पर बड़ा किया गया। अभी उसे एक अदीब के तौर पर बड़ा होने दें।

सवाल : हमारे यहाँ एक बहुत मज़बूत Stream [धारा] है, जिसे हम दलित शायरी कहते हैं। क्या आपके यहाँ भी ऐसा कुछ है?

जवाब : जी हाँ यक़ीनन आपके यहाँ ऐसा है, लेकिन हमारे यहाँ ऐसा कुछ नहीं है, क्यों कि आपके यहाँ Caste System [जातिवाद] है। बहुत ज़ुल्म है और हमारे यहाँ ऐसा नहीं है। वैसे हमारे यहाँ भी ऐसी शायरी है, किताबें छपी हैं। इस तरह की शायरी के तर्जमे रज़िया आबिदी और डाक्टर मुबारक ने मिलकर किए हैं। उसे हम दलित शायरी नहीं कहते हैं, बल्कि उसे Grass-root [ज़मीन से जुडी] शायरी कहते हैं और यह मुसलसल लिखी जा रही है। यह शायरी उन लोगों की है जो बे-इख़्तियार [अधिकारों से वंचित] हैं, जिनकी कोई नहीं सुनता, वो सब मज़लूम हैं। यह मज़लूम शायरी के नाम से भी मारूफ़ है। सिंधी, पंजाबी, पश्तो और बलूची में तो इस तरह की शायरी बहुत ही लिखी जाती है। हमारे यहाँ का नाटक भी इसी तरह का है। बुनियाद-परस्ती के ख़िलाफ़ है। बचपन की शादी के ख़िलाफ़ है, rape [बलात्कार] के ख़िलाफ़ है।

सवाल : पाकिस्तान में उर्दू अदीब [लेखक], पंजाबी, पश्तो, हिन्दी, बलूची अदीबों के साथ मिलकर बैठते हैं?

जवाब : जी हाँ, बग़ैर तंज़ीम [संगठन] के भी ख़ूब interaction [पारस्परिक सम्बन्ध] हैं। कोई तंज़ीम नहीं है। हमारे यहाँ उर्दू की दादागीरी नहीं चलती, बल्कि वो सब में रह लेते हैं। बलूची और पश्तो में ख़वातीन [महिलाऐं] लिखने वाली न होने के बराबर हैं, जबकि बाक़ी सब ज़बानों में ख़ूब हैं और बड़ी Militant [लड़ाका] ख़वातीन अदीब हैं।

सवाल : पाकिस्तान की नुक्कड़ नाटक तहरीक पर जिस तरह NGO’s हावी हो रही हैं, आपकी इस बारे में क्या राय है?

जवाब : नुक्कड़ नाटक की दिक्कत यह है कि हर Adventure [साहसिक कार्य] की एक हद होती है और फिर पेट तो सामने आता ही है। NGO’s से पैसा लेना ख़राब नहीं है, अगर आपका मक़सद ठीक है। हमारा एक है पंजाब लोक रहस जिसके लिए सब मेंबर अपनी कमाई का 15 फ़ीसद देते हैं। वो कोई मदद नहीं लेते, लेकिन इतने बड़े उसूल रखने वाले बच्चों को सलाम ही कर सकती हूँ।

सवाल : आपकी किताबें?

जवाब : 8-9 मजमूए [संकलन] तो शायरी के हैं। 5 मजमूए ख़वातीन पर हैं, उनकी तहरीक पर ‘औरत ख़ाब-ओ-ख़ाक के दरमयान’, ‘औरत ज़बाने-ख़लक़ से ज़बाने-हाल तक’, ‘Woman and reality’, ‘औरत एक नफ़सियात’, ‘औरत दर्द का रिश्ता’, ‘आ जाओ अफ़्रीक़ा’। मैं रज़ाकाराना [स्वैच्छिक] तौर पर औरतों की मदद के लिए एक इदारे में self-employment [खुद-रोज़गार] के लिए काम करती हूँ। उस का नाम है ‘हव्वा असोसिएट’। इसके लिए मैंने किताबें लिखी हैं। शायरी की। 5 किताबें ‘लबे-गोया’, ‘बेनाम मुसाफ़त’, ‘मलामातों के दरमियान’, ‘बे-ख़याल शख़्स से मुक़ाबला’, ‘स्याह शीशे में गुलाबी रंग’।

सवाल : Top [उच्च पद] पर रहते हुए और ईमानदारी से काम करते हुए घुटन नहीं होती?

जवाब : होती है तभी तो शायरी करती हूँ और इसके बाद औरतों के लिए काम करती हूँ, इसलिए घुटन को साफ़ करने के लिए रोज़ झाड़ू साथ रखती हूँ और साफ़ किए जाती हूँ। अपने हिस्से का रास्ता साफ़ कर लेती हूँ। तो जो पीछे आ रहे होते हैं उनको भी कुछ सहूलियात मिल जाती हैं।

सवाल : हिन्दुस्तान में आकर अपनी अदीबी बिरादरी से मुलाक़ात हुई?

जवाब : यक़ीनन। उर्दू, हिन्दी और दूसरी ज़बानों के तमाम अदीबों से ख़ूब मुलाक़ातें, नशिस्तें [अदबी महफ़िलैं] हुयी हैं, बैठकें होंगी, दोस्तों से मिलना अच्छा लगता है।

शम्सुल इस्लाम

{Dr. Shamsul Islam, Political Science professor at Delhi University (retired).}
{Dr. Shamsul Islam, Political Science professor at Delhi University (retired).}

रोहित वेमुलाओं को बचाने के लिए एजुकेशन डाइवर्सिटी!

Rohit Vemula

आज है रोहित वेमुला की पुण्यतिथि

आज 17 जनवरी है. 2016 में आज ही के दिन हैदराबाद विश्वविद्यालय के निलंबित शोध छात्र रोहित वेमुला ने आत्महत्या की थी. किन्तु वह आत्महत्या नहीं, सदियों से शिक्षा से बहिष्कृत समुदाय के एक आधुनिक एकलव्य की सांस्थानिक हत्या थी, ऐसा मानकर वंचित समुदाय के छात्रों ने जो विरोध प्रदर्शन शुरू किया वह देखते ही देखते एक आन्दोलन का रूप अख्तियार कर लिया था. आन्दोलन के दबाव में रोहित के चार साथियों का निलंबन वापस लेने और घटना की जांच के लिए न्यायिक आयोग गठित करने व सभी विश्वविद्यालयों के कुलपतियों को विद्यार्थियों के बीच कोई भेदभाव नहीं करने तथा ऐसी घटनाओं से बचने का आदेश जारी होने के बावजूद तब विरोध की तरंगे विश्वविद्यालयों के कैम्पस और महानगरों को पार कर भारत के छोटे –छोटे कस्बों ही नहीं, सात समंदर पार तक फ़ैल गयीं थीं. विरोध की तीव्रता इतनी थी कि एक विश्वविद्यालय में प्रधामंत्री के संबोधन के दौरान छात्रों ने ‘गो बैक मोदी’ का नारा लगा दिया था.

बहरहाल रोहित वेमुला के दुखद अंत के विरोध में जो लाखों लोग सड़कों पर उतरे; इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में जो ढेरों बहसें हुईं, सोशल मीडिया में जो लाखों पोस्ट तथा अख़बारों में भूरि-भूरि लेख छपे थे, उसका एक ही मकसद था कि कल के रोहित वेमुलाओं को अध्ययन- अध्यापन का उचित माहौल मिले तथा सदियों से शिक्षालयों से बहिष्कृत समुदायों के किसी प्रतिभा का ऐसा दुखद अंत न हो. पर, सवाल पैदा होता है कि क्या रोहित वेमुला की सांस्थानिक हत्या के बाद के वर्षों में ऐसा कुछ हुआ, जिससे आश्वस्त हुआ जा सके कि भविष्य के रोहितों का ऐसा दुखद अंत नहीं होगा!

Today is Rohit Vemula’s death anniversary

तब रोहित वेमुला के दुखद अंत को कई विद्वानों ने जहां इसे दो गुटों के झगड़े की परिणिति माना था, वहीँ कुछ ने भारत की सत्ता पर काबिज हिंदुत्ववादी सरकार को इसके लिए जिम्मेवार ठहरा कर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लिए था. लेकिन विद्वानों का एक तबका ऐसा भी था जिसने इस घटना की गहराई में जाकर इसके निराकरण का उपाय सुझाने का प्रयास किया था. उन्होंने ऐसी घटनाओं पर अतीत में हुए एकाधिक अध्ययनों का हवाला देते हुए इस बात पर जोर दिया था कि रोहित वेमुला जैसे असाधारण छात्रों को आत्महत्या की ओर धकेलने में जातीय भेदभाव ही प्रमुख कारण है.

जातीय भेदभाव को प्रधान कारण चिन्हित हुए उन्होंने इसके खिलाफ रैगिंग जैसे कठोर कानून बनाने व नागरिक शिक्षा के प्रचार-प्रसार को बढ़ावा देने जैसे सुझाव रखे थे.

इसमें कोई शक नहीं कि रोहित वेमुला के पहले भी खुद हैदरबाद विश्वविद्यालय सहित कई अन्य उच्च शिक्षण संस्थाओं में इस किस्म की कई घटनाएं हो चुकी थीं और इससे निजात दिलाले के लिए कई अध्ययन भी हुए. किन्तु उच्च शिक्षा में व्याप्त भेदभाव के कारणों की पहचान व निवारण के लिए जितने भी अध्ययन हुए हैं, उनमें दो बातों की कमी खटकती है. पहला, यह कि इन अध्ययनों से ऐसा लगता है कि भेदभाव सिर्फ एससी/एसटी के छात्रों के उत्पीड़न तक महदूद है. जबकि इसका दायरा तमाम गैर-सवर्ण समूहों के तमाम छात्र –छात्राओं तक प्रसारित है. शिक्षालयों में व्याप्त भेदभाव के कारण एससी/एसटी के साथ ओबीसी,अल्पसंख्यक समुदाय के सिर्फ छात्र-छात्रा ही नहीं, शिक्षक तक अध्ययन-अध्यापन के खुशनुमा माहौल से महरूम हैं. यह बड़ी भूल इसलिए हुई है क्योंकि अध्ययन करने वाले इस बुनियादी सत्य से नावाकिफ रहे हैं कि हजारों साल से ही सारी दुनिया में अध्ययन -अध्यापन में सामाजिक और लैंगिक विविधता का असमान प्रतिबिम्बन करा कर ही शिक्षा जगत में भेदभाव को जन्म दिया जाता रहा है. अर्थात दुनिया के तमाम शासक वर्ग ही शैक्षणिक गतिविधियों में अपने नापसंद के तबकों को न्यायोचित अवसर न देकर ही हजारों साल से शिक्षा जगत में भेदभाव की सृष्टि करते रहे हैं. अगर इस बेसिक सचाई को ध्यान में रखा गया होता तो भारत की शिक्षा, विशेषकर उच्च शिक्षा में भेदभाव की समस्या को बेहतर तरीके से समझ कर, इसके खात्मे का सम्यक उपाय सुझाया जाता, जो न हो सका. 

मानव संसाधन मंत्रालय की कुछ वर्ष पूर्ण की एक रिपोर्ट बताती है कि देश के केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में 1094 प्रोफ़ेसर हैं, जिनमें 1039 सामान्य वर्ग से शेष एससी/एसटी, ओबोसी और विकलांग कोटे से हैं. देश के केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में 2535 एसोसियेट प्रोफ़ेसर हैं. इनमें केवल दो ओबीसी,124 एससी, 28 एसटी से जबकि 2365 सामान्य वर्ग से हैं. इसी तरह इन विश्वविद्यालयों में सहायक प्रोफेसरों के पद पर एससी के 802, एसटी 374 तथा ओबीसी के 859,जबकि 4907 पदों पर सामान्य वर्ग के लोग काबिज हैं. केन्द्रीय विश्वविद्यालयों के शिक्षकों की नियुक्ति में हजारों साल के शिक्षा के बहिष्कृतों की दयनीय उपस्थिति उच्च शिक्षा में भेदभाव की एक बानगी है. यही भेदभाव राज्यों द्वारा चलाये जाने वाले विश्वविद्यालयों में दिखती है. निजी क्षेत्रों द्वारा चलाये जाने वाले मेडिकल-इंजीनियरी कालेजों/विश्वविद्यालयों भेदभाव की भयावहता तो कल्पना से परे है. अगर अध्ययन के दायरे में उपरोक्त क्षेत्रों को भी लाया गया होता तब पता चलता शिक्षा के क्षेत्र में भारत जैसा भेदभाव पूरी दुनिया में कहीं नहीं है; लोगों के विभिन्न तबकों को अध्ययन-अध्यापन का अवसर देने के मामले में यह देश प्राचीन युग में वास कर रहा है.  

उच्च शिक्षा में भेदभाव के व्याप्ति में विविधता की अनदेखी से भी बड़ा ब्लंडर दैविक अधिकारी की भयावह उपस्थिति की अनदेखी करके किया गया है. यदि ऐसा नहीं किया गया होता तो तमाम अध्ययन ही यह चीख-चीख कर बताते कि शिक्षा में हाशिये पर पड़े समूहों के छात्र-गुरुजनों के प्रति भेदभाव के पृष्ठ में जो असफलता, असफल होने का भय, प्रशासनिक उदासीनता, प्रतिकूल नियम-कायदे, अपमान, सामाजिक-अकादमिक निंदा और बहिष्कार इत्यादि कारण क्रियाशील हैं, उसके लिए सिर्फ और सिर्फ जिम्मेवार है शिक्षा का दैविक अधिकारी वर्ग, जो सदियों से ही एकलव्यों की शिक्षा की राह में बाधा-विघ्न सृष्टि करना एक पवित्र कर्तव्य मानता रहा है. शिक्षा का दैविक-अधिकारी कौन? ब्राहमण वर्ग ! इसी के वजह से शैक्षणिक परिसरों में भेदभाव पसरा है, जिसमें सवर्णों की लिस्ट में शामिल क्षत्रिय, विषयों की भूमिका सहयोगी मात्र की है. इसी वर्ग की पूर्वाग्रही मनोवृत्ति के चलते न सिर्फ रोहित वेमुलाओं को आत्महत्या के लिए विवश होना पड़ता है, बल्कि समस्त आरक्षित वर्ग के छात्र-शिक्षकों सहित अल्पसंख्यकों और महिलाओं तक को अध्ययन-अध्यापन के खुशनुमा माहौल के लिए तरस कर रह जाना पड़ता है. इस वर्ग के अपवाद रूप से कुछेक को छोड़कर, प्रायः सभी में ही द्रोणाचार्य क्रियाशील हैं.

सामाजिक मनोवज्ञान का अध्ययन बतलाता है कि दैविक अधिकारी वर्ग में क्रियाशील द्रोणाचार्यों के ख़त्म होने की दूर-दूर तक सम्भावना नहीं है.

ऐसे में राष्ट्र अगर कल के रोहित वेमुलाओं को दुखद अंत से बचाना चाहता है तो उसे शिक्षालयों को दैविक अधिकारी वर्ग के वर्चस्व से निजात दिलाने की दिशा में आगे बढ़ना पड़ेगा, जिसके लिए एकमेव उपाय है ‘एजुकेशन डाइवर्सिटी’. 

वास्तव में शिक्षालयों में व्याप्त भेदभाव को ख़त्म करने में एजुकेशन डाइवर्सिटी से बेहतर कुछ हो ही नहीं सकता. एजुकेशन डाइवर्सिटी का मतलब शिक्षण संस्थानों के प्रवेश, अध्यापन व संचालन में विभिन्न सामाजिक समूहों के स्त्री और पुरुषों का संख्यानुपात में प्रतिनिधित्व.एजुकेशन डाइवर्सिटी के जरिये ही दुनिया के लोकतान्त्रिक रूप से परिपक्व देशों में शिक्षा पर समूह विशेष के वर्चस्व को शेष कर सभी सामाजिक समूहों को अध्ययन-अध्यापन का न्यायोचित अवसर सुलभ कराया गया है. डाइवर्सिटी अर्थात विविधता नीति के जरिये ही तमाम सभ्यतर देशों में शिक्षा का प्रजातान्त्रिकरण मुमकिन हो पाया है. अमेरिका में भूरि-भूरि नोबेल विजेता देने वाले हार्वर्ड विश्वविद्यालय से लेकर नासा जैसे सर्वाधिक हाई प्रोफाइल संस्थान तक सामाजिक और लैंगिक विविधता लागू कर वहां के तमाम वंचित समूहों और महिलाओं को अध्ययन-अध्यापन का अवसर मुहैया कराते रहते है.

इसमें कोई शक नहीं कि डाइवर्सिटी के जरिये ही उच्च शिक्षा में भेदभाव का मुकम्मल खात्मा और दैविक अधिकारी वर्ग का वर्चस्व ध्वस्त किया जा सकता है. लेकिन भारी अफ़सोस की बात है कि कई विद्वानों द्वारा ‘एजुकेशन डाइवर्सिटी’ की राह सुझाये जाने के बावजूद केंद्र या राज्य सरकारें इस दिशा में जरा भी अग्रसर नहीं हुईं. उलटे विगत वर्षों में दैविक अधिकारी वर्ग का दबदबा और बढ़ा ही है.

शिक्षा जगत में दैविक अधिकारी वर्ग के भयावह वर्चस्व के प्रति सरकारों के उदासीन रवैया देखते हुए, जिस तरह रोहित वेमुला के भयावह अंत से बहुजन छात्रों में आक्रोश पनपा था, उसे देखते हुए उनसे कुछ उम्मीद बंधी थी.

किन्तु विगत वर्षों में बहुजन छात्रों में कुछ उद्वेलन तो हुआ है,पर वे एजुकेशन डाइवर्सिटी लागू करवाने की दिशा में प्रयासरत होते नहीं दिखे.चूंकि शैक्षणिक परिसरों में पसरे भेदभाव के खात्मे और दैविक अधिकारी वर्ग के वर्चस्व को ध्वस्त करने का सर्वोत्तम उपाय ‘एजुकेशन डाइवर्सिटी’ है और इसे लागू करवाने के प्रति सरकारें तो उदासीन हैं ही,वंचित वर्ग के छात्र संगठनों में भी इसकी मांग नहीं उठ रही है,इसलिए हम भविष्य के रोहित वेमुलाओं को दुखद अंत से बचाने के प्रति खूब आशावादी नहीं हो सकते।

 –एच.एल.दुसाध

एच.एल. दुसाध (लेखक बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं.)  
लेखक एच एल दुसाध बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। इन्होंने आर्थिक और सामाजिक विषमताओं से जुड़ी गंभीर समस्याओं को संबोधित ‘ज्वलंत समस्याएं श्रृंखला’ की पुस्तकों का संपादन, लेखन और प्रकाशन किया है। सेज, आरक्षण पर संघर्ष, मुद्दाविहीन चुनाव, महिला सशक्तिकरण, मुस्लिम समुदाय की बदहाली, जाति जनगणना, नक्सलवाद, ब्राह्मणवाद, जाति उन्मूलन, दलित उत्पीड़न जैसे विषयों पर डेढ़ दर्जन किताबें प्रकाशित हुई हैं।

सुधार कृषि के नाम पर और लाभ अडानी ग्रुप को !

Gautam Adani (गौतम अदाणी) Chairman of Adani Group

तीनों किसान कानूनों को वापस लेने में सरकार के सामने सबसे बड़ा धर्मसंकट है अडानी ग्रुप द्वारा कृषि सेक्टर में भारी भरकम निवेश (Adani Group invests heavily in agricultural sector) और उनका प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का बेहद करीबी (Very close to Prime Minister Narendra Modi) होना। आज भाजपा सांसद डॉ सुब्रमण्यम स्वामी का एक ट्वीट दिखा, जिंसमें वे कहते हैं कि,

“कलाबाज़ कलाकार अडानी के साढ़े चार लाख करोड़ रुपये की बैंकों की देनदारी एनपीए हो गई है। यदि मैं गलत कह रहा हूँ तो मुझे सच बताईये। इसके बावजूद उनकी संपत्ति 2016 के बाद हर दो साल पर दुगुनी हो रही है। वे बैंकों का ऋण चुका क्यो नहीं देते हैं ? हो सकता है जैसे उन्होंने अभी 6 हवाई अड्डे खरीदे हैं, वैसे ही सारे बैंक वे खरीद लें।”

डॉ सुब्रमण्यम स्वामी ठीक ही तो कह रहे हैं कि, अडानी बैंकों का लोन, जो वे अपने राजनीतिक रसूख से एनपीए करा ले रहे हैं, चुका क्यों नहीं देते। आज किसानों के कर्ज माफी की बात यदि होती है तो, सरकार और उसके अर्थ विशेषज्ञ इस पर सरकार को राय देने लगते हैं कि ऐसे कर्ज़ माफी से न केवल अर्थव्यवस्था पर असर पड़ेगा बल्कि बैंकों की सेहत पर भी बुरा प्रभाव पड़ेगा।

एक सवाल उठता है कि क्या कृषि सुधार की कवायद के बीच नीति आयोग और सरकार ने कभी उन कारणों की पड़ताल करने की कोशिश की है कि, देश में किसानों द्वारा इतनी भारी संख्या में खुदकुशी करने का क्या कारण है ? पहले हम कुछ आंकड़ो को देखते हैं।

साल 2019 में 10,281 कृषि से जुड़े लोगों ने आत्महत्या की है जो देश मे कुल हुई आत्महत्याओं का 7.4% है। 2019 में देश भर में कुल 1,39,516 लोगों ने आत्महत्या की थी। यह आंकड़ा, एनसीआरबी ( नेशलन क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो ) के एक्सिडेंटल डेथ एंड सुसाइड इन इंडिया, अध्य्याय से लिया गया है।

साल 2019 मे हुई आत्महत्याओं की संख्या साल 2018 में हुई आत्महत्याओं की संख्या 10,348 से थोड़ी ही कम है। लेकिन यदि केवल खेती पर ही आश्रित रहने वाले किसानों की आत्महत्या का आंकड़ा देखें तो, 2019 मे कुल 5,957 किसानों ने आत्महत्यायें की हैं जो, साल 2018 के आंकड़े 5,763 से कुल तीन प्रतिशत अधिक है।

अब राज्यवार आंकड़े देखते हैं।

महाराष्ट्र (3,927), कर्नाटक (1992), आंध्र प्रदेश (1,029), मध्य प्रदेश (541), छत्तीसगढ़ (499) और तेलंगाना (499) शीर्ष 6 राज्यों में शामिल हैं, जिनका किसानों की आत्महत्या के आंकड़ों में कुल 83% हिस्सा है। एनसीआरबी के इस अध्याय में किसान जिसे अंग्रेजी में फार्मर्स या कल्टीवेटर यानी खेत जोतने बोने वाले शब्द से वर्गीकृत किया है, की परिभाषा भी दी गई है। उक्त परिभाषा के अनुसार, वह व्यक्ति जो अपने स्वामित्व वाले खेत, या किसी का खेत किराए पर लेकर, या बिना किसी खेतिहर मज़दूर के कृषि कार्य करता है तो उसे फार्मर या कल्टीवेटर कहा जायेगा।

यह भी आश्चर्यजनक तथ्य है कि, आत्महत्या करने वाले किसानों में 86% किसान वे हैं जिनके पास भूमि है और शेष 14% भूमिहीन किसान हैं।

जिन किसानों की आजीविका केवल कृषि पर ही निर्भर है, उनमें से साल 2019 में 4,324 और साल 2018 में, 4,586 किसानों ने आत्महत्या की है। साल 2018 की तुलना में साल 2019 में किसानों की आत्महत्याओं में कुछ कमी भी आयी है।

17 राज्यों के आत्महत्या आंकड़ों से एक और चिंताजनक तथ्य यह निकल रहा है कि, इस 17 राज्यों में खेतिहर मजदूरों द्वारा की जाने वाली आत्महत्या की दर कृषि भूमि रखने वाले किसानों की तुलना में अधिक रही है। पर अन्य 7 राज्यों में भूमि स्वामित्व वाले किसानों ने, खेतिहर मजदूरों की तुलना में, अधिक आत्महत्यायें की हैं। पश्चिम बंगाल, बिहार, ओडिशा, उत्तराखंड, मणिपुर, चंडीगढ़, दमन और दियु, दिल्ली और लक्षदीप से किसान आत्महत्याओं के बारे में आंकड़े शून्य हैं।

Why are people moving towards suicide in Indian society

भारत में आत्महत्याओं की दर (Suicide rate in India) चौंकाने वाली है। धर्म, आस्था और तमाम नियतिवादी दर्शन के बावजूद, भारतीय समाज में आत्महत्या की ओर लोग क्यों बढ़ रहे हैं, यह मनोचिकित्सकों और समाज वैज्ञानिकों के लिये अध्ययन का विषय हो सकता है।

10.4 people committed suicide per 10,000 population

1,39,123 आत्महत्याओं के आंकड़ों के साथ, भारत विश्व में सबसे ऊपर है। साल 2018 की तुलना में साल 2019 में आत्महत्याओं में 3.4% की वृद्धि हुई है। यह सभी सुसाइड आंकड़ों के संदर्भ में है। इसे अगर सांख्यिकी की एक अलग व्याख्या में कहें तो प्रति 10,000 आबादी पर 10.4 लोगों ने आत्महत्या की है।

सरकार ने क्या इस बिंदु पर भी कोई अध्ययन किया है कि इन तीन नए कृषि कानूनों से किसानों की आय, उनकी माली हालत कितनी सुधरेगी ? अगर किया है तो उसे कम से कम जनता और किसानों के समक्ष प्रस्तुत करना चाहिए।

डॉ सुब्रमण्यम स्वामी की यह बात बिल्कुल सही है कि, अडानी को जब वे हर दो साल पर अपनी संपत्ति दूनी कर ले रहे हैं तो उन्हें बैंकों का का ऋण तो वापस कर ही देना चाहिए। लेकिन अडानी ग्रुप ऐसा नहीं करने जा रहा है, क्योंकि वह न केवल सरकार के बेहद करीब है, बल्कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी की उस ग्रुप पर विशेष अनुकम्पा भी है।

कल इंडियन एक्सप्रेस अखबार ने अडानी ग्रुप पर सरकार द्वारा की गई एक विशेष अनुकम्पा का विस्तार से उल्लेख किया है।

प्रकरण इस प्रकार है। साल 2019 में, सरकार के सब कुछ बेचो अभियान जिसे निजीकरण कहा जा रहा है के अंतर्गत, कुछ हवाई अड्डों को निजी क्षेत्र में सौंपने के लिए जो निविदा आमंत्रित की गई थी में, अडानी ग्रुप को अधिकतर हवाई अड्डे सौंप दिए गए हैं। उक्त बोली की प्रक्रिया में वित्त मंत्रालय और नीति आयोग की आपत्तियों के बावजूद अडानी समूह को छह हवाई अड्डे दे दिए गए।

‘द इंडियन एक्सप्रेस’ ने कुछ अहम दस्तावेज़ हासिल किए हैं और इनके आधार पर ही अखबार ने अपनी खबर में यह सनसनीखेज खुलासा किया है।

इंडियन एक्सप्रेस द्वारा हस्तगत किये गए दस्तावेज़ों के अनुसार, अहमदाबाद, लखनऊ, मैंगलुरू, जयपुर, गुवाहाटी और थिरूवनंतपुरम के हवाई अड्डों के निजीकरण के लिए निविदा आमंत्रित की गई थी। इस संबंध में केंद्र सरकार की ओर से बनाई गई पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप अप्रेजल कमेटी ने 11 दिसंबर, 2018 को विमानन मंत्रालय के बोली लगाने के इस प्रस्ताव पर चर्चा की थी। इस चर्चा के जो मिनट्स ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ को मिले हैं, उनके मुताबिक़ वित्त मंत्रालय की ओर से कहा गया था कि बोली लगाने वाली किसी भी एक कंपनी को दो से ज़्यादा हवाई अड्डे नहीं दिए जाने चाहिए।

लेकिन कमेटी की बैठक में वित्त मंत्रालय के इस नोट पर कोई बात नहीं की गई। इसी दिन नीति आयोग की ओर से भी हवाई अड्डों की बोली के संबंध में चिंता जाहिर की गई थी। आयोग की ओर से कहा गया था कि बोली लगाने वाली ऐसी कंपनी जिसके पास पर्याप्त तकनीकी क्षमता न हो वह इस प्रोजेक्ट को ख़तरे में डाल सकती है। इसके जवाब में वित्त मंत्रालय के सचिव एससी गर्ग ने अप्रेजल कमेटी की अध्यक्षता करते हुए कहा था कि सचिवों के समूह की ओर से पहले ही फ़ैसला कर लिया गया है कि हवाई अड्डे चलाने के लिए पहले से अनुभव होने को शर्त नहीं बनाया जाएगा।

टेंडर पा लेने के बाद फ़रवरी, 2020 में अडानी समूह की ओर से समझौतों पर दस्तख़त कर दिए गए। इन हवाई अड्डों के लिए निविदा जीतने के बाद अडानी समूह का एविएशन इंडस्ट्री में भी प्रवेश हो गया था।

लेकिन इसके एक महीने बाद अडानी समूह ने कोरोना आपदा की वजह से एएआई से इन हवाई अड्डों को अपने चार्ज में लेने के लिये फ़रवरी, 2021 तक का समय प्रदान करने का अनुरोध किया। लेकिन, एएआई ( एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया Airport Authority of India ) की ओर से अडानी समूह को यह पत्र लिखा गया कि वे इन हवाई अड्डों को नवंबर, 2020 तक अपने हाथ में ले लें। इसके बाद तीन हवाई अड्डे- जयपुर, गुवाहाटी और तिरूवनंतपुरम सितंबर में जबकि अहमदाबाद, मेंगलुरू और लखनऊ के हवाई अड्डे नवंबर, 2020 में अडानी समूह को दे दिए गए। इन 6 हवाई अड्डों पर अडानी ग्रुप का पचास साल के लिये कब्ज़ा हो गया है।

अखबार आगे लिखता है,

“इस बोली प्रक्रिया के दौरान अडानी समूह ने इस फ़ील्ड के कई अनुभवी खिलाड़ियों जैसे जीएमआर समूह, जूरिक एयरपोर्ट और कोचिन इंटरनेशनल एयरपोर्ट को पीछे छोड़ दिया। अडानी समूह को इन सभी छह हवाई अड्डों का 50 साल तक के लिए संचालन का अधिकार मिल गया है। 2018, नवंबर में केंद्र सरकार ने सभी 6 हवाई अड्डों को पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) मॉडल के आधार पर चलाने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी थी।”

एएआई के अनुसार, पीपीपी मोड में चलाने का फ़ैसला विश्व स्तरीय सुविधाएँ देने के लिए लिया गया था। अडानी समूह के मालिक गौतम अडानी को भाजपा का क़रीबी माना जाता है।

2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान गौतम अडानी की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से क़रीबी को लेकर ख़ूब चर्चा हुई थी। गुजरात में अडानी समूह का काफ़ी बड़ा कारोबार है। लोकसभा चुनाव में प्रचार के दौरान नरेंद्र मोदी को अडानी समूह के हवाई जहाज़ का इस्तेमाल करते देखा गया था। विपक्षी दल यह आरोप लगाते रहे हैं कि मोदी सरकार के समय में गौतम अडानी का कारोबार काफ़ी तेज़ी से बढ़ा है।

इकनॉमिक टाइम्स के मुताबिक़, 2017 में भारत के कारोबारियों में गौतम अडानी की संपत्ति सबसे तेज़ी से बढ़ी थी, तब अडानी ने रिलायंस के चेयरमैन मुकेश अंबानी को भी पीछे छोड़ दिया था। अडानी की संपत्ति में 124.6 फ़ीसदी की वृद्धि हुई थी वहीं, अंबानी की संपत्ति 80 फ़ीसदी बढ़ी थी।

आज किसान आक्रोश का भी एक बड़ा कारण है अडानी ग्रुप का खेती किसानी के क्षेत्र में घुसपैठ।

वैसे तो किसी भी नागरिक को देश में कोई भी व्यापार, व्यवसाय या कार्य करने की छूट है, पर 2016 के बाद जिस तरह से अडानी ग्रुप की रुचि खेती सेक्टर में बढ़ी है, और उसके बाद जिस तरह से जून 2020 में इन तीन कृषि कानूनों को लेकर जो अध्यादेश लाये गए और फिर जिस प्रकार तमाम संवैधानिक मर्यादाओं और नियम कानूनों को दरकिनार कर के राज्यसभा में उन्हें सरकार ने पारित घोषित कर दिया, उससे यही लगता है कि सरकार द्वारा बनाये गए इन कानूनों का लाभ किसानों के बजाय अडानी ग्रुप को ही अधिक मिलेगा।

इन कानूनों की समीक्षा में लगभग सभी कृषि अर्थशास्त्री इस मत पर दॄढ हैं कि, यह कानून केवल और केवल कॉरपोरेट को भारतीय कृषि सेक्टर सौंपने के लिये लाये गए हैं।

सरकार, दस दौर की वार्ता के बाद भी अब तक देश और किसानों को नही समझा पाई कि इन कानूनों से किसानों का कौन सा, कितना और कैसे हित सधेगा। अब अगली बातचीत 19 जनवरी को होगी।

विजय शंकर सिंह

विजय शंकर सिंह (Vijay Shanker Singh) लेखक अवकाशप्राप्त आईपीएस अफसर हैं
विजय शंकर सिंह (Vijay Shanker Singh) लेखक अवकाशप्राप्त आईपीएस अफसर हैं

लव जिहाद, धर्म परिवर्तन और धार्मिक स्वातंत्र्य पर हमला

Dr. Ram Puniyani - राम पुनियानी

Love jihad, conversion and attack on religious freedom 

पिछले दिनों (27 नवंबर 2020) उत्तर प्रदेश सरकार ने ‘‘उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अध्यादेश 2020‘‘ लागू किया। उसके बाद मध्यप्रदेश और हरियाणा सहित कई अन्य भाजपा-शासित प्रदेशों ने भी इसी तर्ज पर कानून बनाए। इस बीच अंतर्धार्मिक विवाह करने वाले दम्पत्तियों की प्रताड़ना का सिलसिला भी शुरू हो गया और कुछ मुस्लिम पुरूषों को जेलों में डाल दिया गया। इस नए कानून के पीछे साम्प्रदायिक सोच है यह इससे साफ है कि अवैधानिक धर्म परिवर्तन पर रोक लगाने वाले कानून पहले से ही हमारे देश में हैं। नए कानूनों का उद्देश्य संदिग्ध है और इनका दुरूपयोग होने की गंभीर आशंका है।

उत्तरप्रदेश के अध्यादेश में ‘लव जिहाद शब्द का प्रयोग कहीं नहीं किया गया है परंतु हिन्दू राष्ट्रवादी समूहों के कार्यकर्तागण इस कानून के नाम पर ऐसे अंतर्धार्मिक दम्पत्तियों को परेशान कर रहे हैं जिनमें पति मुसलमान और पत्नी हिन्दू है। विशेषकर उत्तर भारत के राज्यों में इस तरह के दम्पत्तियों को प्रताड़ित करने और उनके खिलाफ हिंसा की घटनाओं में तेजी से बढ़ोत्तरी हुई है। सबसे दुःखद यह है कि कानून तोड़ने वालों के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं की जा रही है और वे समाज की फिज़ा में साम्प्रदायिक रंग घोलने के अपने कुत्सित लक्ष्य को हासिल करने में कामयाब होते नजर आ रहे हैं। उनकी हिम्मत बढ़ती जा रही है। वे समाज को बांट रहे हैं और अल्पसंख्यक मुस्लिम समुदाय को पीछे धकेलकर उसका हाशियाकरण करने का प्रयास कर रहे हैं। इसके साथ ही वे हिन्दू महिलाओं की स्वतंत्रता को भी गंभीर रूप से बाधित कर रहे हैं।

हिन्दू धर्म छोड़कर अन्य धर्म अपनाने के लिए हिन्दू महिलाओं के मुस्लिम पुरूषों से संबंधों को जिम्मेदार बताया जा रहा है।

किसी भी ऐसे बहुधार्मिक समाज में जिसमें लोग एक-दूसरे के संपर्क में आते हैं, अलग-अलग धर्मों के लोगों का दूसरे से प्रेम हो जाना एवं विवाह कर लेना अत्यंत स्वाभाविक व सामान्य है।

अंतर्धार्मिक विवाहों में धर्म परिवर्तन अनिवार्य है ?

उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सार्वजनिक रूप से स्पष्ट कर चुके हैं कि वे अंतर्धार्मिक विवाहों के खिलाफ हैं। इलाहबाद उच्च न्यायालय के एक हालिया निर्णय, जिसमें यह कहा गया था कि केवल विवाह करने के लिए धर्म परिवर्तन करना उचित नहीं है, का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि ‘‘लव जिहाद करने वालों को सुधर जाना चाहिए अन्यथा उनका राम नाम सत्य हो जाएगा‘‘। उत्तरप्रदेश सरकार की माता-पिता से भी यह अपेक्षा है कि वे अपनी लड़कियों पर ‘नजर‘ रखें।

उत्तर प्रदेश सरकार के अध्यादेश को अदालत में चुनौती दिए जाने की जरूरत है क्योंकि वह संविधान में हम सबको अपने धर्म में आस्था रखने, उसका आचरण करने और उसका प्रचार करने के मूल अधिकार का उल्लंघन है। देश में हर व्यक्ति को अपनी पसंद से अपना जीवनसाथी चुनने का अधिकार भी है। उत्तरप्रदेश सरकार का अध्यादेश और इसी तरह के अन्य कानूनों में यह निहित है कि हिन्दू संस्कृति खतरे में है, हिन्दू महिलाएं इतनी मूर्ख हैं कि वे अपना हित-अहित नहीं समझ सकतीं और इसलिए उन्हें हिन्दू पुरूषों के संरक्षण की आवश्यकता है।

स्पष्टतः इन कानूनों के निशाने पर अंतर्धार्मिक विवाह हैं विशेषकर ऐसे विवाह जिनमें पति मुसलमान और पत्नी हिन्दू हो। आरोप यह है कि मुसलमान पुरूषों से विवाह करने वाली हिन्दू महिलाओं को अपने धर्म का पालन नहीं करने दिया जाता और उन्हें इस्लाम कुबूल करने पर मजबूर किया जाता है।

हमारे देश में वैसे भी अंतर्धार्मिक विवाह (Inter-religious marriage) बहुत कम संख्या में होते हैं। अन्य प्रजातांत्रिक और स्वतंत्र देशों में ऐसे विवाहों की संख्या कहीं अधिक होती है। इनमें भी मुस्लिम महिलाओं और हिन्दू पुरूषों के बीच और कम विवाह होते हैं। कई मामलों में ऐसे संबंध रखने वाले या विवाह करने वाले हिन्दू पुरूषों को भी परेशानियां भुगतनी पड़ती हैं (अंकित सक्सेना)। तृणमूल कांग्रेस की सांसद नुसरत जहां को एक हिन्दू से विवाह करने पर जमकर ट्रोल किया गया था। परंतु कुल मिलाकर अधिकांश मामलों में मुस्लिम पुरूष ही निशाने पर रहते हैं।

महाराष्ट्र में हिन्दू रक्षक समिति नामक एक संस्था को ऐसे विवाह तोड़ने में खासी विशेषज्ञता हासिल है जिनमें पति मुसलमान और पत्नी हिन्दू हो।

लव जिहाद पर मराठी में प्रकाशित एक पुस्तिका के मुखपृष्ठ पर जो चित्र प्रकाशित किया गया है उसमें एक मुस्लिम लड़के को एक हिन्दू महिला को पीछे बैठाकर बाईक चलाते हुए दिखाया गया है। अगर कोई मुस्लिम महिला, हिन्दू पुरूष से शादी करती है तो उससे हिन्दू धर्म के स्वनियुक्त रक्षकों को कोई आपत्ति नहीं होती। वे इसे घरवापसी मानते हैं।

पुलिस की कई जांचों से यह जाहिर हुआ है कि लव जिहाद जैसी कोई चीज नहीं है। परंतु इस मुद्दे पर इतना शोर मचाया गया है कि लोग यह मानने लगे हैं कि देश में सचमुच लव जिहाद हो रहा है।

आखिर अंतर्धार्मिक विवाहों का इतना विरोध क्यों होता है?

क्या यह सही है कि मुस्लिम युवक योजनाबद्ध तरीके से हिन्दू महिलाओं को अपने प्रेमजाल में फंसाकर मात्र इसलिए उनसे विवाह करते हैं ताकि उन्हें मुसलमान बनाया जा सके? दरअसल यह सफेद झूठ है। लोग यह भूल जाते हैं कि जब वे यह कहते हैं कि मुसलमान युवक हिन्दू युवतियों को बहला-फुसलाकर उनसे विवाह कर लेते हैं तो वे न केवल हिन्दू महिलाओं की अपना जीवनसाथी चुनने की स्वतंत्रता समाप्त कर रहे होते हैं, वरन् वे यह भी कह रहे होते हैं कि हिन्दू महिलाएं इतनी मूर्ख हैं कि वे किसी के भी जाल में फंस जाती हैं।

मुस्लिम पुरूषों को हिन्दू धर्म के लिए खतरा बताया जाता है और हिन्दू युवतियों को बेअक्ल सिद्ध दिया जाता है। इसी सिलसिले हिन्दू अभिभावकों को यह सलाह दी जाती है कि वे इस पर कड़ी नजर रखें कि उनकी लड़कियां कहां आ-जा रही हैं, किससे मिल रही हैं और किससे फोन पर बात कर रही हैं। कुल मिलाकर वे यह चाहते हैं कि हिन्दू महिलाओं का जीवन पूरी तरह से उनके अभिभावकों के नियंत्रण में हो।

All communal nationalist ideologies are patriarchal.

सभी साम्प्रदायिक राष्ट्रवादी विचारधाराएं पितृसत्तात्मक होती हैं। उनकी यह मान्यता होती है कि महिलाएं पुरूषों की संपत्ति हैं और उन्हें पुरूषों के अधीन रहना चाहिए। वे सभी पितृसत्तात्मकता को राष्ट्रवाद के रैपर में लपेटकर प्रस्तुत करती हैं। भारत के स्वतंत्र होने और हमारे देश में संविधान लागू होने के बाद से महिलाओं को कई बंधनों से मुक्ति मिली है और वे देश के सामाजिक, राजनैतिक और शैक्षणिक जीवन में महती भूमिका निभाने की ओर बढ़ रही हैं। यह उन लोगों को रास नहीं आ रहा है जो बात तो समानता की करते हैं परंतु दरअसल उन प्राचीन धर्मग्रंथों में श्रद्धा रखते हैं जो महिलाओं को पुरूषों के अधीन मानते हैं।

हम केवल यह उम्मीद कर सकते हैं कि न्यायपालिका इन कानूनों को अमल में नहीं आने देगी। धार्मिक सद्भावना को हर हाल में बढ़ावा दिए जाने की जरूरत है और अंतर्धार्मिक विवाह, साम्प्रदायिक सद्भाव को बढ़ाने का औजार हैं।

राम पुनियानी

(अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया)

डिजिटल इंडिया से “गोडसे ज्ञानशाला” क्या यही न्यू इंडिया है?

NathuRam Godse

Godse Gyanashala” from Digital India Is this New India?

कहां तो बुलेट ट्रेन का सपना दिखाया था, स्मार्ट सिटी का सपना दिखाया था. न्यू इंडिया, मेकिंग इंडिया, डिजिटल इंडिया, (New India, Making India, Digital India) न जाने कितने इंडिया के प्रोग्राम छाए रहे मीडिया से लेकर सरकार के मुखियाओं के मुंह पर. अच्छे दिन और सबका साथ सबका विकास तो जैसे अमृत बरसा रहा था, लेकिन देखते-देखते अब तस्वीर साफ होने लगी है कि भारतीय जनता पार्टी क्या करने जा रही है. इतिहास गवाह है कि जब-जब धर्म और जाति को राजनीति का अंग बनाकर शासन किया गया है, राष्ट्र कमजोर हुआ है, समाज बिखर गए और देश की अखंडता को खतरा हुआ है. विकास की बात करते-करते थक गए, मगर विकास की जगह गड्ढे ही गड्ढे नजर आने लगे हैं. गड्ढे नफरत के, गड्ढे सांप्रदायिता के, गड्ढे जतिवाद के, गड्ढे बेरोजगारी के, गड्ढे हिन्दू मुस्लिम के, गड्ढे हिंदुस्तान पाकिस्तान के और गड्ढे अंधविश्वास और पाखंड के, गड्ढे हत्या और बलात्कार के, गड्ढे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को दफन करने के.

इस देश की धरती पर जो तार्किक, मानवतावादी, पाखण्ड और अंधविश्वास पर चोट करने वाले, कुप्रथाओं पर चोट करने वाले, हिंदुत्व में व्याप्त जातिव्यवस्था और ऊंच नीच, भेदभाव पर चोट करने वाले व्यक्ति पैदा हुए तो उनको या तो समाज विरोधी और धर्म विरोधी, ईश्वर विरोधी या नास्तिक कह कर प्रचारित किया गया, उनकी विचारधारा को आगे नहीं बढ़ने दिया गया. और शंकराचार्य के रूप में नए-नए अवतार लाकर फिर से भारत को अंधविश्वास और जातिव्यवस्था के दल-दल में धकेल दिया गया.

जरा सोचो नरेन्द्र मोदी जी जब भी विदेश की धरती पर गए उन्होंने ये नहीं कहा कि मैं श्री राम की धरती से आया हूँ. पीएम हमेशा यही कहते थे कि मैं बुद्ध की धरती से आया हूँ. इस बात से यह साबित हो जाता है कि भारत की पहचान बुद्ध और बौद्ध धर्म से है, न कि हिन्दू और हिन्दू धर्म से. भारत आते ही मोदी फिर ‘राम’ और हिंदुत्व के मोड में लौट आते हैं.

ये हिंदुत्ववादी सरकार होने का ही नतीजा है कि-गाँधी को दरकिनार कर गोडसे को पूजा जा रहा है.

गांधी को 1948 में मारकर गोडसेवादियों का मन नहीं भर रहा तो वे गांधी के पुतले बनाकर उनपर गोलियां बरपा रहे हैं, वे शायद नए जमाने के गोडसे हैं उन्होंने गांधी का बहता खून नहीं देखा होगा, इसलिए गांधी के पुतले में लाल रंग भर भर कर बेचारे बापू के खून की होली मना रहे हैं.,और हम हैं कि आखों में पट्टी बांधकर गाँधी वाद का वध होते चुपचाप देखते जा रहे हैं.

बात कोई राजनीतिक नहीं है न किसी की बुराई है, एक कहावत है हाथ कंगन को आरसी क्या? मध्यप्रदेश प्रदेश में कांग्रेस की चुनी हुई सरकार को गिराकर भाजपा सत्तासीन हो गयी, और उसका नतीजा देखिये ग्वालियर में हिन्दू महासभा द्वारा गोडसे ज्ञानशाला खोली गई है.

अब इनसे कौन पूछेगा कि गोडसे ज्ञानशाला में कौन सा ज्ञान दिया जाएगा?

इस देश में तुलसीदास को मान्यता दी जाती है महान कवि और रचनाकार की, मनुस्मृति को मान्यता दी जाती है, सावरकर व गोडसे को मान्यता दी जाती है, मगर ई. रामासामी पेरियार को, ज्योतिबाफुले को, डॉ. आंबेडकर को, कबीरदास जी को, वो सम्मान नहीं दिया जाता जो अन्य हिंदूपन की बात करने वाले व्यक्तियों को दिया जाता है.

दो चीजें ध्यान देने वाली हैं, हिंदुत्व में जतिवाद, वर्णव्यवस्था, भेदभाव, असमानता, अंधविश्वास, पाखण्ड का विरोध करने वाले नास्तिक और धर्मविरोधी, समाज विरोधी और परंपरा विरोधी माने गए हैं. और आज की हालत भी कुछ यही बयान करती है- सरकार और मोदी की नीतियों का विरोध करना राष्टद्रोह बन जाता है. रोजगार की बात, न्याय की बात, धर्मनिरपेक्ष देश की बात, संविधान की बात, अधिकारों की बात, समता की बात करने वाले राष्ट्र विरोधी बन गए हैं. लोकतन्त्र है, मगर उस पर धीरे-धीरे आरएसएस का लेप चढ़ना शुरू हो गया है. संविधान भी है मगर उस पर भी धीरे-धीरे आरएसएस द्वारा निर्मित दीमक लगा दिया गया है.

ये बात भी समझना जरूरी है कि नए संसद भवन की इतनी जल्दीबाजी क्या थी?

नए पुल चाहिए थे, नए स्कूल, नए अस्पताल, नए रोजगार, नई सामाजिक क्रांति चाहिए थी, क्या पुराना संसद भवन जीर्ण शीर्ण हो गया था? कहीं किसी साजिश के तहत नए संविधान का तो निर्माण नहीं हो रहा है? क्योंकि जब तक डॉ आंबेडकर का बनाया हुआ संविधान जिंदा है, तब तक हिंदू राष्ट्र की कल्पना साकार नहीं हो सकती इसलिए धीरे-धीरे संसद बदलकर संविधान पर तो चोट करने का इरादा नहीं है?

जब खुलेआम अब गोडसे के नाम पर शिक्षा केन्द्र, जिनको “गोडसे ज्ञानशाला” नाम दिया गया है, खुल सकते हैं तो फिर कुछ भी संभव हो सकता है.

आईपी ह्यूमन

लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।

उर्दू की पहली पत्रिका चूड़ियों के शहर फिरोजाबाद से निकली

Literature news

एक किस्सा नायाब | फिरोजाबाद का साहित्यिक इतिहास | उर्दू साहित्य का इतिहास

उर्दू की पहली पत्रिका फिरोजाबाद से निकली

First Urdu magazine published from Firozabad

फिरोजाबाद को चूड़ियों का शहर कहते हैं लेकिन इस शहर में साहित्य की खनक हमेशा से रही है। बहुत कम लोगों को इस बात का इल्म है कि उर्दू की पहली पत्रिका का प्रकाशन इसी शहर से हुआ। पत्रिका का नाम था -अदीब, साल था १८८९ और सम्पादक थे मीर अकबर अली। यह पत्रिका एक साल ही चली।

फिरोजाबाद में चूड़ी का पहला कारखाना इंडियन ग्लास वर्क्स भी मीर अकबर अली ने खोला

हैरत की बात यह है कि फिरोजाबाद को चूड़ियों का शहर बनाने वाला भी यही उर्दू साहित्यकार था, यानि फिरोजाबाद में चूड़ी का पहला कारखाना भी इसी कलमकार ने खोला था।

मीर अकबर अली की जीवनी | Biography of Mir Akbar Ali in Hindi

मीर अकबर अली के शानदार व्यक्तित्व और कृतित्व के बारे में प्रसिद्ध साहित्यकार श्रीनारायण चतुर्वेदी ने पुराने जमाने की प्रसिद्ध पत्रिका ”सरस्वती” में एक लेख लिखा था।

इस लेख के मुताबिक मीर अकबर अली का जन्म १८४६ में आगरा के गुलाम खाने मोहल्ले में हुआ था, शिक्षा आगरा कालेज में हुई। अरबी फ़ारसी की अच्छी जानकारी के कारण मीर साहब बड़े सरकारी ओहदों पर रहे, अजमेर में एसडीएम रहे, निजाम हैदरावाद के डीएम (तालुकेदार ) बने।

मीर अकबर अली को लेखन का शौक था, सो अपने जमाने के अखबारों में छपते रहते थे। मीर साहब की फिरोजाबाद के रिटायर्ड पुलिस अधिकारी की बेटी से शादी हुई तो १८८९ में फिरोजाबाद आ बसे। आपकी लाइब्रेरी में १५००० पुस्तकों का विपुल भण्डार था।

फिरोजाबाद आते ही उन्होंने ‘अदीब ‘ मासिक पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया, लेकिन एक साल बाद इसे बंद करना पड़ा। देश की स्वाधीनता के लिए काम करने वाले तमाम नामी गिरामी हस्तियों से मीर अकबर का परिचय था। मौलाना अब्दुल कलाम आजाद तो फिरोजाबाद आकर उनके घर में कई दिनों रुके। ऐसे तमाम किस्से उनके जीवन से जुड़े हैं।

मीर साहब  के व्यक्तित्व का उल्लेखनीय पहलू यह था कि वे फिरकापरस्ती से कोसों दूर थे। मीर साहब फिरोजाबाद नगरपालिका के जॉइंट चेयरमेन बने। तब उनके द्वारा किया गया एक काम इतिहास में दर्ज हो गया।

फिरोजाबाद में चंद्रवार मोहल्ले में एक जगह को लेकर दो लोगों में विवाद पैदा हुआ। गफूर नाम के व्यक्ति ने चाल चली और उस विवाद वाली भूमि पर एक मस्जिद बनबाने का एलान ठोंक दिया ताकि मुस्लिम साथी उसके पक्ष में खड़े हो जाएँ। ऐसा ही हुआ।

मामला मीर साहब के पास आया। मीर साहब को जमीन के कागजात आदि सबूत सेठ जी के हक में मिले। उन्होंने फैसला दिया कि यदि इस जमीन पर मुसलमान मस्जिद चाहते हैं तो पहले सेठजी जी से उस जमीन को ख़रीदा जाये। मुसलमान तैयार नहीं हुए तो मीर साहब ने एक चाल चली। उन्होंने सेठजी को अपने पास बुलाकर सुझाव दिया कि वे अपनी जमीन नगरपालिका को जनहित में दान दे दें।

अंग्रेजी ज़माना था। सेठजी ने ऐसा ही किया। तब मीर साहब ने उस स्थान पर नगरपालिका की कीमत पर एक सार्वजनिक कुआं बनवा दिया।

छोटी सी बात सांप्रदायिक रंग में रंगने से बच गई लेकिन मीर साहब को इसकी कीमत चुकानी पड़ी। मुस्लिम लोग मीर साहब से बेहद खफा हो गए, उनका नाम वंशीधर रख दिया और उनसे बोलचाल बंद कर नाराजगी दिखाई।

१९१७ में मीर साहब नगरपालिका का चुनाव लडे तो हार गए। मीर साहब को इस हार का मलाल कभी नहीं रहा। उनके बनबाये कुएं का पानी कई दशकों तक हिन्दू-मुस्लिम सबने पीया।

मीर साहब को फिरोजाबाद की तरक्की में दिलचस्पी थी। आर्थिक रूप से संपन्न थे। उन्होंने फिरोजाबाद में चूड़ी का पहला कारखाना ”इंडियन ग्लास वर्क्स” खोला १९०८ में। इस कारखाने में उनके पार्टनर मुस्लिम न होकर हिन्दू थे और नाम था –नंदराम मूलचंद सैनी और बौहरे मेघराज। ३ जून १९३२ को मीर अकबर अली का देहांत हुआ।

फिरोजाबाद में प्रसिद्ध शिक्षण संस्था एस आर के कालेज जिस स्थान पर है वह जमीन किसी जमाने में मीर साहब का बाग़ था।

बनारसीदास चतुर्वेदी की प्रतिमा

आज भी इस औद्योगिक नगर में उत्पादन चूड़ियों का है, लेकिन खनक साहित्य की है। इस सच्चाई का आभास आपको उस क्षण हो जायेगा जब आप फिरोजाबाद में प्रवेश करेंगे तो चारों तरफ कांच -ग्लास -चूड़ियों से लदे वाहन दिखाई देंगे लेकिन चौराहे पर एक विशाल मूर्ति दिखाई देगी महान साहित्यकार दादा बनारसीदास चतुर्वेदी की

अशोक बंसल

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

अशोक बंसल Ashok Bansal लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।
अशोक बंसल Ashok Bansal
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

जब बहुत से कांग्रेसी खुलकर या दबे-छिपे भाजपा के मददगार बन गए थे

Lalit Surjan

देशबन्धु : चौथा खंभा बनने से इंकार – 31

अविभाजित मध्यप्रदेश में छत्तीसगढ़ ने प्रदेश को चार मुख्यमंत्री दिए- प्रथम मुख्यमंत्री रविशंकर शुक्ल, राजा नरेशचंद्र सिंह, श्यामाचरण शुक्ल और मोतीलाल वोरा। इस लिस्ट में रिकॉर्ड के लिए चाहें तो क्रमश: कसडोल व खरसिया से पद ग्रहण के बाद उपचुनाव जीते द्वारकाप्रसाद मिश्र तथा अर्जुन सिंह के नाम भी जोड़ लें। मुद्दे की बात यह है कि ये सभी कांग्रेसी थे। राजा नरेशचंद्र सिंह एक क्षणिक अपवाद हैं जो संविद से मुख्यमंत्री बने, फिर अपने मातृसंगठन में वापस आ गए। दूसरे ध्रुव पर, जैसा कि मैं पहले भी ज़िक्र कर आया हूं, मालवा ने तीन मुख्यमंत्री दिए- कैलाश जोशी, वीरेंद्र कुमार सकलेचा व सुंदरलाल पटवा। ये सभी जनसंघी अर्थात वर्तमान के भाजपाई थे।

इसके अलावा एक और तथ्य गौरतलब है। कांग्रेस ने 1993 में ही अगली पीढ़ी को कमान सौंप दी थी, जबकि भाजपा के युवा नेता मंच पर अपने जौहर दिखला पाने की प्रतीक्षा में नेपथ्य में ही रुके हुए थे।

सन् 2003 के विधानसभा चुनावों ने यह दृश्य पूरी तरह बदल दिया। मध्यप्रदेश में सुश्री उमा भारती के रूप में बुंदेलखंड को पहली बार प्रदेश का राजनीतिक नेतृत्व करने का मौका मिला, तो वहीं छत्तीसगढ़ में रमन सिंह को यह अवसर प्राप्त हुआ। भारतीय जनता पार्टी के लिए देश के मध्यांचल में यह पार्टी की बढ़ती स्वीकार्यता सिद्ध करने के साथ-साथ अगली पीढ़ी को आगे लाने का भी समय था।

मेरा यह कहना शायद ग़लत नहीं होगा कि रमन सरकार बनने के तुरंत बाद प्रदेश में, ख़ासकर शहरी क्षेत्रों में, सामान्य तौर पर ख़ुशी और किसी हद तक राहत का माहौल देखने में आया था। इसका बड़ा कारण तो यही था कि मुख्यमंत्री बन जाने के बाद भी रमन सिंह हर वर्ग के लोगों से सहज भाव से मिलजुल रहे थे और उसमें किसी प्रकार बनावट नज़र नहीं आती थी।

इसके अलावा मुख्यमंत्री निवास हो या मंत्रालय, खुलापन अभी कायम था। विधानसभा में भी कोई ख़ास चौकसी नहीं थी। यह स्थिति कब बदली उसकी चर्चा हम यथासमय करेंगे। फिर चूंकि भाजपा समर्थकों का मुखर तबका शहरों में ही था तो उसने भी अपनी सरकार के पक्ष में वातावरण बनाने में कोई कसर बाकी नहीं रखी थी।

यहां नोट करना आवश्यक होगा कि छत्तीसगढ़ भाजपा में आपसी मतभेदों की कमी नहीं थी तथा मुख्यमंत्री पद के दूसरे दावेदार भीतर ही भीतर कसमसा रहे थे लेकिन कैडर आधारित पार्टी होने के कारण असंतोष ऊपर नहीं आ सका।

तीन साल पहले विपक्ष का नेता पद न मिलने से गुस्साए तीसरी बार के विधायक बृजमोहन अग्रवाल ने जो खुला विरोध किया था उसका हश्र सबको पता था। इसी कड़ी में भाजपा सरकार के लिए अनुकूल माहौल तैयार करने में कांग्रेसजनों ने जो भूमिका निभाई उसका भी उल्लेख होना चाहिए।

राज्य में नई सरकार ने काम सम्भाला ही था कि लोकसभा चुनाव सिर पर आ गए। ऐसे नाजुक समय में वी सी शुक्ल ने अप्रत्याशित रूप से भाजपा का दामन थाम लिया। इस बीच और भी बहुत से कांग्रेसी खुलकर या दबे-छिपे भाजपा के मददगार बन गए।

मुख्यमंत्री रमन सिंह के नेतृत्व में भाजपा को जल्दी ही एक और बड़ी कामयाबी मिली जब लोकसभा की ग्यारह सीटों में से दस पर उसके उम्मीदवार जीते और कांग्रेस को सिर्फ एक सीट से संतोष करना पड़ा। इसके बावजूद भीतर और बाहर चुनौतियां कम नहीं थीं। इनका सामना करने के लिए उन्होंने धीरे-धीरे खुद को इस नए रोल के अनुरूप ढालना प्रारंभ किया। इस सिलसिले में एक उल्लेख शायद उचित होगा। मैंने रमन सिंह को उनकी पूर्व भूमिकाओं- विधायक, सांसद, केंद्रीय मंत्री, प्रदेश अध्यक्ष- में सदा ऐसे व्यक्ति के रूप में देखा था जिसे बतरस में आनंद आता था।

मुख्यमंत्री बन जाने के बाद उन्होंने जैसे सायास ही अपनी इस आदत को सुधारने की कोशिश की! इसमें सार्वजनिक अवसरों पर तो कोई परिवर्तन दिखाई नहीं दिया, लेकिन उनसे मिलने वालों से अलक्षित नहीं रहा कि मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठते साथ ही गोया वे बदल जाते थे। वे मुलाकातियों की बात सुनते अवश्य थे, लेकिन हाव-भाव में प्रगट अधीरता और जवाब सकारात्मक होने पर भी शब्दों की मितव्ययिता उनकी नई शैली बन गई थी। कहा जा सकता है कि उनकी जिम्मेवारियां कई गुना बढ़ गईं थीं जिसमें पहले की तरह इत्मीनान से मिलना-जुलना, बातचीत करना संभव नहीं रह गया था! इस एक बदलाव के बावजूद मुख्यमंत्री तक पहुंचना दुष्कर नहीं था। अगले साल-डेढ़ साल तक वे आम जनता के लिए लगभग बेरोकटोक उपलब्ध थे।

इन प्रारंभिक दिनों की ही बात है जब मुख्यमंत्री मायाराम सुरजन फाउंडेशन की वार्षिक गृह पत्रिका स्पर्द्धा के पुरस्कार वितरण समारोह में मुख्य अतिथि बनकर आए। इस अवसर पर छत्तीसगढ़ के विकास पर उनका व्याख्यान तथा जैसी कि परिपाटी थी, श्रोताओं के साथ प्रश्नोत्तर का सत्र भी हुआ। यह एक यादगार कार्यक्रम सिद्ध हुआ क्योंकि उपस्थित प्रबुद्धजनों ने डॉ रमन सिंह को एक बिल्कुल नए रूप में देखा।

अपने लगभग चालीस मिनट के वक्तव्य और उसके पश्चात लगभग उतनी ही देर के प्रश्नोत्तर में उन्होंने पूर्ववर्ती सरकार और उसके मुखिया पर जम कर कटाक्ष किए लेकिन एक बार भी न तो कांग्रेस पार्टी का और न ही अजीत जोगी का नाम लिया। उनसे ऐसी वाकपटुता, प्रत्युत्पन्नमति और संयमित भाषा प्रयोग की अपेक्षा किसी ने भी नहीं की थी।

एक और प्रसंग का जिक्र मैं करना चाहूंगा।

रायपुर से कोई चालीस किमी दूर सोमनाथ नामक स्थान पर शिवनाथ और खारून नदी का संगम है। यह एक सुरम्य स्थल है जहां पिकनिक मनाने वालों के कारण गंदगी फैली रहती है। भारतीय सांस्कृतिक निधि (इंटैक) में हमने बुद्धिजीवी नागरिकों, छात्रों व एनसीसी के सहयोग से यहां सफाई का बीड़ा उठाया व अभियान प्रारंभ करने के लिए मुख्यमंत्री को आमंत्रित किया। वे निर्धारित समय पर कुछेक मंत्रियों व सांसदों को साथ लेकर आए और फ़ोटो खिंचवाने की औपचारिकता के बाद भी हाथ में झाड़ू लेकर सफाई करने में जुटे रहे। इस अभियान को वांछित सफलता नहीं मिल सकी तो उसकी वजह कुछ और ही थी जिसकी चर्चा का यह स्थान नहीं है।

मायाराम सुरजन फाउंडेशन के उपरोक्त आयोजन के अलावा एक और प्रसंग स्मरण हो आता है जब मैं डॉ. रमन की वक्तृत्व कला से प्रभावित हुए बिना न रह सका।

साल तो याद नहीं लेकिन तारीख थी 8 सितंबर अर्थात विश्व साक्षरता दिवस। इस कार्यक्रम में वे मुख्य अतिथि थे और मैं अध्यक्षता कर रहा था। प्रदेश के सुप्रसिद्ध रंगकर्मी राजकमल नायक ने साक्षरता पर एक बेहद सुंदर कविता पोस्टर बनाया था जिसका लोकार्पण होना था। रमन सिंह ने मंच पर धीरे से मुझसे पूछा कि उन्हें क्या बोलना है। यह जानकर भी कि वे शिष्टतावश ऐसा पूछ रहे हैं, मैंने उत्तर दिया कि इसी पोस्टर में लिखी कविता का पाठ कर दीजिए। लोकार्पण व भाषण दोनों काम सध जाएंगे।

उनकी बारी आई तो पहले उन्होंने पोस्टर से तीन-चार लाइनें पढ़ीं और फिर अगले पंद्रह मिनट में उसी कविता को आधार बना प्रेमचंद, राहुल सांकृत्यायन आदि को उद्धृत करते हुए अवसर के अनुकूल ऐसा भाषण दिया जिसमें कोई झोल नहीं था।

इन्हीं दिनों एक ऐसा मौका आया जब मुख्यमंत्री ने पुरातत्व के किसी पहलू पर आयोजित एक अखिल भारतीय संगोष्ठी का उद्घाटन करने हेतु सहमति दे दी, लेकिन ऐन वक्त पर उनके बस्तर जाने का प्रोग्राम बन गया। उद्घाटन समय सुबह का था। मुख्यमंत्री के न आने की सूचना पाकर आयोजकगण हताश हो गए थे। उन्होंने मुझसे सहायता चाही। मैंने भी आव देखा न ताव, मुख्यमंत्री निवास जा धमका। सी एम से कहा- अखिल भारतीय स्तर का कार्यक्रम है। आप चलिए, दो शब्द बोल कर दौरे पर निकल जाइए। उन्होंने मेरी बात मान ली। सभा में आए। दूर-दूर से आए प्रतिभागियों से भेंट की, आराम से उद्घाटन भाषण दिया, फिर अगले गंतव्य के लिए विदा ली।

लीक से हटकर अपनी छवि गढ़ने की इच्छा रखते थे डॉ. रमन सिंह

भारतीय जनता पार्टी की कार्यशैली को लेकर कुछ सामान्य धारणाएं बनी हुई हैं। उनमें बड़ी हद तक सच्चाई है, किंतु मेरे अपने अनुभवों पर आधारित उपरोक्त दृष्टांत इस ओर इंगित करते हैं कि डॉ. रमन सिंह लीक से हटकर अपनी छवि गढ़ने की इच्छा रखते थे। पिछले तीन बरसों के दौरान प्रदेश की जनता ने, सही या गलत, जो देखा-समझा उससे अनायास तुलना करने से भी यदि इस छवि निर्माण में सहायता मिली हो तो अचरज की बात नहीं होगी।

कुल मिलाकर प्रदेश के दूसरे मुख्यमंत्री ने अपनी पहली पारी का प्रारंभ प्रकट रूप से सद्भावना तथा सकारात्मकता के साथ किया। इसे वे कितना निभा सके यह आगे अध्ययन का विषय है।

ललित सुरजन

(अगले सप्ताह जारी)

यह आलेख पूर्व लिखित है। अभी कुछ सप्ताह पूर्ववत इस लेखमाला की कड़ियां देशबन्धु में प्रकाशित होंगी।

इन कृषि कानूनों पर क्या कैबिनेट में भी पर्याप्त विचार विमर्श हुआ था ?

Modi government is Adani, Ambani's servant. Farmers and workers will uproot it - Randhir Singh Suman

Was there enough discussion on these agricultural laws in the cabinet too? – Vijay Shankar Singh

अब जब नौ दौर की बातचीत के बाद भी वार्ताकार मंत्रीगण, किसानों को यह नहीं समझा पा रहे हैं कि यह कानून कैसे किसानों के हित में बना है, तो इससे यह बात भी स्पष्ट होती है कि, या तो मंत्रीगण खुद ही यह नहीं जानते कि, इन कानूनों से किसानों का क्या हित है, या वे अपनी बात समझाना नहीं जानते। यह सम्प्रेषण के क्षमता की भी कमी हो सकती है और कानून की अंदरूनी जानकारी का अभाव भी।

जब इस विधेयक या अध्यादेश का ड्राफ्ट कैबिनेट में आया हुआ होगा तो निश्चय ही इस पर बहस हुयी होगी। कृषि से जुड़ा कानून है तो कृषि मंत्रालय ने इस पर विचार भी किया होगा। इस कानून का ड्राफ्ट विधि मंत्रालय में भी गया होगा और अध्यादेश या विधेयक को जारी या संसद में प्रस्तुत करने के पहले जब इसे अंतिम रूप दिया गया होगा तो, इसका हर तरह से परीक्षण कर लिया गया होगा।

Has any minister in the cabinet not found any deficiency in this bill?

क्या कैबिनेट में किसी मंत्री ने इस विधेयक में कोई भी कमी नहीं पायी ? कृषि मंत्री जो खुद कैबिनेट में रहे होंगे, और जिन्हें आज इस कानून में कुछ कमियां दिख रही हैं, जिनके संशोधन के लिए वे आज कह रहे हैं, को कैबिनेट में ही अपनी आपत्ति दर्ज करा देनी चाहिये थी। हो सकता है उन्होंने कहा भी हो और उन्हें अनसुना कर दिया गया हो। जो भी होगा कैबिनेट की मिनिट्स से ही वास्तविकता की जानकारी हो सकेगी।

जब कोई भी सत्ताशीर्ष, या प्रधानमंत्री खुद को इतना महत्वपूर्ण समझ लेता है या उसकी कैबिनेट उसे अपरिहार्य समझ उसके आभामंडल की गिरफ्त में आ जाती है तो, ऐसी होने वाली, अधिकतर कैबिनेट मीटिंग एक औपचारिकता बन कर रह जाती हैं। तब कानून बनाने की प्रक्रिया केवल पीएमओ में ही सिमट जाती है और विभागीय मंत्री या सचिव बस पीएमओ के ही एक विस्तार की तरह काम करने लगते हैं, तो ऐसे बने कानूनो में मानवीय त्रुटियों का होना कोई आश्चर्यजनक नहीं होता है।

लोकतंत्र का यह अर्थ नहीं है कि किसी मसले पर, केवल संसद में ही बहस और विचार विमर्श हो, बल्कि लोकतंत्र का असल अर्थ (Real meaning of democracy) यह है कि नीतिगत निर्णय लेने के हर अवसर पर जनता के चुने गए प्रतिनिधि उस पर अपनी बात कहें और उस पर विचार विमर्श करें।

संविधान में प्रधानमंत्री की कानूनी हैसियत ‘सभी समान हैं पर वे प्रथम’ या ‘फर्स्ट एमंग इक्वल्स’ होती है। सरकार का फैसला, कैबिनेट का फैसला होता है। प्रधानमंत्री उक्त कैबिनेट का प्रथम यानी मंत्रियों में प्रधान होता है, इसलिए उसे प्रधानमंत्री कहते हैं। लेकिन संविधान में दिया गया यह सिद्धांत व्यावहारिक धरातल पर कम ही उतरता है। यह बात आज नरेन्द्र मोदी के समय से नहीं बल्कि इन्दिरा गांधी या यूं कहिये यह जवाहरलाल नेहरू के समय से ही चल रही है।

संसदीय लोकतंत्र जिसे अध्यक्षात्मक लोकतंत्र की तुलना में अधिक लोकतांत्रिक माना जाता है, में प्रधानमंत्री कैबिनेट के विचार विमर्श के बाद कोई निर्णय लेता है, ऐसा माना जाता है पर अमूमन ऐसा होता नहीं है। जब प्रधानमंत्री लोकचेतना और लोकतांत्रिक सोच के प्रति सजग और सचेत होता है तो, वह कैबिनेट के राय मशविरे को महत्व देता है, अन्यथा वह पूरी कैबिनेट को ही अपनी मर्जी से हांकने लगता है।

प्रधानमंत्री यदि एकाधिकारवाद के वायरस से संक्रमित है तो उसकी इस तानाशाही के शिकार सबसे पहले उसकी कैबिनेट के मंत्री होते हैं। इस संदर्भ में 25 जून 1975 को कैबिनेट द्वारा घोषित आपातकाल के प्रस्ताव का उदाहरण दिया जा सकता है।

2014 के बाद, केंद्रीय कैबिनेट में भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हैसियत कुछ ऐसी ही हो गयी है कि शायद ही कोई कैबिनेट मंत्री अपनी बात कहने या प्रधानमंत्री को उनकी गलती बताने का साहस कर सकता है। नोटबन्दी के निर्णय के बारे में तो यह तक कहा जाता है कि इसकी जानकारी वित्तमंत्री स्वर्गीय अरुण जेटली को भी बहुत बाद में हुई और रिजर्व बैंक के गवर्नर को सरकार के इस निर्णय से बस सूचित किया गया। इसीलिए आरबीआई नोटबन्दी के बाद स्वाभाविक रूप से होने वाली समस्याओं के लिये तैयार नहीं था। नोटबन्दी के कुप्रबंधन का ही कारण था कि उसके उद्देश्य अंत तक स्पष्ट नहीं हो सके और आज भी सरकार यह बताते हुए असहज हो जाती है कि उससे देश की आर्थिकी और बैंकिंग सेक्टर को क्या लाभ मिला।

नरेन्द्र मोदी की सरकार को प्रख्यात पत्रकार औऱ पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण शौरी ढाई आदमी की सरकार कह कर तंज कसते थे। इन ढाई आदमी में वे दो व्यक्ति नरेन्द्र मोदी औऱ अमित शाह को बताते थे और आधा अरुण जेटली को कहते थे। तब अमित शाह मंत्री नहीं बने थे, लेकिन भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे। 2019 के बाद अरुण जेटली मंत्रिमंडल में शामिल नहीं हुए, और अमित शाह केंद्र में गृहमंत्री बने। राजनाथ सिंह का स्तर अब भी नम्बर दो पर कहा जाता है पर व्यावहारिक रूप से अमित शाह, प्रधानमंत्री के बाद सबसे महत्वपूर्ण मंत्री माने जाते हैं।

कैबिनेट के अन्य मंत्री, ज़रूर कैबिनेट हैं, पर क्या वे अपने विभाग से जुड़े कानूनो के ड्राफ्ट करने में प्रधानमंत्री को दृढ़ता से कुछ समझाने की स्थिति में है ?

इन तीन कृषि कानूनों की एक और व्यथा है।

सरकार तो इन्हें किसान हितैषी कानून बता ही रही है, साथ ही, सरकार समर्थक हर मित्र भी यही कह रहा है कि, यह तीनों कृषि कानून, किसान के हित में हैं।

पर आज तक सरकार समर्थक वे मित्र, यह नहीं बता पाए कि,

● एमएसपी की बाध्यता के बिना, अपनी मनमर्जी से तय किये गए दाम पर निजी कॉरपोरेट को, किसानों से फसल खरीदने की कानूनन छूट देने से,

● निजी क्षेत्र, कॉरपोरेट और अन्य किसी भी पैन कार्ड होल्डर को, फसल खरीद कर, असीमित रूप से अनन्तकाल तक जमाखोरी को वैध बनाने के प्राविधान से,

● फिर अपनी मर्जी से जब चाहें, जैसे चाहें, कृषि उपज को बाजार में, उतार और समेट लेने की घोर मुनाफाखोरी वाली वैधानिक छूट दे देने से, जिससे बाजार कुछ पूंजीपतियों या कंपनियों के सिंडिकेट के इशारे पर ही उठे, बैठे या मरे जीये,

● अपनी मर्जी से दाम तय करके किसान से उपज की खरीद, और अपनी मर्जी से ही दाम तय कर के, उस उपज को बाजार में बेच देना, किसानों औऱ उपभोक्ता दोनों के ही शोषण की कानूनी अनुमति है। ऐसे प्राविधान से, और,

● कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग में किसानों को सिविल अदालत में जाने के मौलिक अधिकार से वंचित कर देने से,

किसानों का कौन सा हित सध रहा है ?

आंदोलनकारी किसान ऐश से रहते हुए आंदोलन कर रहे हैं यह न तो ईर्ष्या की बात होनी चाहिए और न ही मज़ाक़ की। बल्कि बिहार के किसान, पंजाब हरियाणा के किसान की तरह सम्पन्न और मस्ती से खूब खाते पीते ढंग से, क्यों नहीं रह पा रहे हैं, यह सरकार, अर्थविशेषज्ञों, और हम सबके लिये भी, चिंता का विषय और चिन्तन का मुद्दा होना चाहिए।

उद्देश्य और प्रयास यह होना चाहिए कि, बिहार के किसान भी, पंजाब, हरियाणा के किसानों की तरह सम्पन्न हो जायं न कि, पंजाब, हरियाणा के किसान भी बिहार के किसानों की तरह बर्बाद होने लगें। 2006 में बिहार में एपीएमसी और एमएसपी न्यूनतम समर्थन मूल्य का सिस्टम खत्म करने के बाद बिहार के किसान, पूरे देश मे कृषि आय के मामले में सबसे विपन्न किसान हैं। एपीएमसी सिस्टम और एमएसपी के प्रति पंजाब और हरियाणा के किसानों की जागरूकता भी उनकी सम्पन्नता का एक कारण है।

वर्तमान कृषि कानून और आगे आने वाले सरकार के फ़र्ज़ी कृषि सुधार के कुछ कानून, भारतीय कृषि और पांच हज़ार साल की ग्रामीण और कृषि सभ्यता और संस्कृति को बरबाद कर के रख देंगे। यह एक साज़िश है, जिसे बेहद खूबसूरती से आर्थिक सुधारों का नाम दिया गया है। यह साज़िश, अमेरिकी थिंकटैंक की है।

वैसे तो, ऐसे बंदिश वाले कानून बनाने के दबाव का सिलसिला 1998 से चल रहा है। लेकिन, इसके पहले की एनडीए, यूपीए की सरकारें, इसे टालती रहीं हैं। पर विडंबना देखिये, खुद को मजबूत कहने वाली मोदी सरकार ने देसी कॉरपोरेट और अमेरिकन पूंजीवादी थिंकटैंक के सामने खुद को अब, लगभग आत्मार्पित कर दिया।

इन कानूनों को ड्राफ्ट करते समय न तो किसान संगठनों से राय ली गयी, और न यह सोचा गया कि भारतीय परिवेश में यह कानून कैसे कृषि का भला कर पायेगा। संसद में भी, इन कानूनों पर, क्लॉज दर क्लॉज़ कोई बहस नहीं हुयी। हालांकि अब सरकार यह ज़रूर कह रही है कि, वह क्लॉज़ दर क्लॉज़ चर्चा करने के लिये तैयार है। राज्यसभा में तो इसे हंगामे के बीच ध्वनिमत से ही, पास घोषित कर दिया गया। सुप्रीम कोर्ट ने भी इस बिन्दु पर अपनी नाराजगी जताई है कि, यह कानून ड्राफ्ट औऱ पास करते समय, पर्याप्त विचार विमर्श नहीं किया गया।

भूपिंदर सिंह मान का आभार कि, उन्होंने खुद को इस कमेटी से अलग कर लिया है। अन्य तीन सदस्यों को भी यह कह कर इस कानून से अलग हो जाना चाहिए कि, वे इस कानून के प्राविधान, दर्शन और विचारधारा से पहले से ही सहमत हैं, और किसान संगठनों ने ऐसी कमेटी का बहिष्कार भी कर दिया है तो, ऐसी स्थिति में उनका इस कमेटी में बने रहने का न तो कोई औचित्य है और न ही अब इस कमेटी की कोई प्रासंगिकता ही बची है।

सरकार अब भी इस गिरोहबंद पूंजीवाद को बढ़ावा देने वाली, इस तथाकथित कृषि सुधार से खुद को अलग करे और इन तीनों विवादित कृषि व्यापार कानूनों को रद्द करे।

साथ ही, किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य मिले, जमाखोरी पर अंकुश लगे, कॉरपोरेट के बेहिसाब मुनाफाखोरी पर लगाम लगे, आदि जो मूल समस्याएं, आज किसानों के समक्ष हैं, उनके परिप्रेक्ष्य में, नए सिरे से, विचार कर नए कानून यदि ज़रूरी हो तो संसद में लाएं और फिर उन पर पर्याप्त विचार विमर्श कर उन्हें बनाये तथा लागू करे।

विजय शंकर सिंह

लेखक अवकाशप्राप्त वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी हैं

विवेकानंद की देशभक्ति और गोडसे ज्ञानशाला

Today's Deshbandhu editorial

गोडसे ज्ञानशाला : गांधी के हत्यारे के विचारों का प्रचार-प्रसार भाजपा राज की पुलिस को ग़लत नहीं लगता।

देशबन्धु में संपादकीय आज : Hindu Mahasabha opened Godse Gyanashala in Gwalior

महात्मा गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे (Nathuram Godse, the killer of Mahatma Gandhi) को महिमामंडित करने की कोशिशें बीते कुछ बरसों में तेज हो गई हैं। कट्टर हिंदुत्व की सीढ़ियों पर चढ़कर जो लोग सत्ता के शिखर पर पहुंचे हैं, उनकी छत्रछाया में यह काम आसानी से हो सकता है, ऐसा गोडसे समर्थकों को लगता है। बीते आम चुनाव में प्रज्ञा ठाकुर ने सरेआम गोडसे को देशभक्त ठहराया था, आज वे लोकसभा सांसद हैं। हाल ही में ग्वालियर में हिंदू महासभा ने गोडसे ज्ञानशाला खोली, जिसका उद्देश्य था गोडसे के विचारों का प्रसार और इस तरह शायद अंतत: गांधी की हत्या को सही ठहराना। आज जैसा माहौल है, उसमें यह साबित भी हो जाए कि गांधी के सीने पर गोलियां दाग कर गोडसे ने सही किया, तो कोई आश्चर्य नहीं, क्योंकि देश में जो बातें कभी लगभग असंभव लगती थीं, जो बातें डरावनी लगती थीं, वे सारे डर एक-एक कर व्यवस्थागत तरीके से सच किए जा रहे हैं।

गोडसे ज्ञानशाला : प्रायोजित तरीके से कट्टर हिंदुत्व की विचारधारा को भारत में फैलाया जा रहा

दरअसल गोडसे तो एक प्रतीक मात्र है कट्टरता और धर्मांधता का। गोडसे के बहाने फिर से इस कट्टरता को परवान चढ़ाने की कोशिशें की जा रही हैं। इस कोशिश में गांधी, पटेल, नेताजी और विवेकानंद सबका इस्तेमाल हो रहा है। बहरहाल, गोडसे ज्ञानशाला पर दो दिनों में ही पुलिस ने ताला लगवा दिया और लाइब्रेरी की किताबें जब्त कर लीं। लेकिन सवाल यही है कि जिस ज्ञानशाला के खुलने का विचार सामने आते ही, उस पर रोक लग जानी चाहिए थी, उसके लिए 48 घंटे का वक़्त कैसे लगा और क्यों लगा।

हिंदू महासभा के उपाध्यक्ष का कहना है कि इसका मक़सद ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक संदेश पहुंचाना था, वह पूरा हो गया। हम किसी कानून का उल्लंघन नहीं करना चाहते थे, इसलिए लाइब्रेरी को बंद कर दिया गया।

इस बयान के बाद संदेह की कोई गुंजाइश नहीं बचती कि प्रायोजित तरीके से गोडसे यानी कट्टर हिंदुत्व की विचारधारा को भारत में फैलाया जा रहा है। दूसरे शब्दों में कहें तो राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के विचारों को तेजी से मिटाने की मुहिम चल पड़ी है। क्योंकि गांधी और गोडसे दोनों एक साथ कैसे हो सकते हैं। किसी एक को तो मरना ही है, और आज के भारत में गांधी को मारने की पैरवी हो रही है। क्या इस भयावह सच को जानने के बाद भी हम विकास, राष्ट्रवाद, आत्मनिर्भरता, जैसे जुमलों पर यकीन कर सकते हैं।

गौरतलब है कि 2017 में हिंदू महासभा ने गोडसे की मूर्ति लगवाई थी, जिसकी पूजा का इरादा व्यक्त किया गया था। हालांकि इस पर भी रोक लगी और बाद में हिंदू महासभा के कुछ लोगों पर एफआईआर दर्ज हुई थी। लेकिन इस बार कोई मामला दर्ज नहीं हुआ। मध्यप्रदेश पुलिस का कहना है कि उस वक्त एमपी फ़्रीडम ऑफ रिलिजन एक्ट के तहत मामला दर्ज किया गया था। इस बार भी मूर्ति लगाने की बात चल रही थी, लेकिन उससे पहले ही लाइब्रेरी को बंद करवा दिया गया। अगर कुछ भी ग़लत किया जाता है तो पुलिस कार्रवाई करेगी।

इस स्पष्टीकरण से यही समझ आता है कि गांधी के हत्यारे के विचारों का प्रचार-प्रसार भाजपा राज की पुलिस को ग़लत नहीं लगता।

कितनी अजीब बात है कि सरकार के विचारों का विरोध करने वाले एक स्टैंडअप कामेडियन को बिना किसी सबूत के कई दिनों तक हिरासत में रखा जाता है, लेकिन खुलकर गोडसे का समर्थन करने वालों पर कार्रवाई के लिए पुलिस गलत होने की कानूनी परिभाषाएं तलाशती है। यही आज के स्वनामधन्य देशभक्तों का असली चेहरा है। जिसमें सरकार की भक्ति ही असल में देशभक्ति है और सरकार से विरोध देशद्रोह है।

दुःख इस बात का है कि ऐसी देशभक्ति की घुट्टियां महापुरुषों का नाम ले लेकर रोज़ देश को पिलाई जा रही हैं। उनके विचारों को अपनी सुविधा के अनुसार पेश किया जा रहा है। स्वामी विवेकानंद भी ऐसे ही एक महापुरुष हैं, जिन्हें आरएसएस हिंदुत्व का प्रतीक बनाने की कोशिश 1960-70 के दशक से करती आई है, जब सरसंघचालक एमएस गोलवलकर हुआ करते थे। 12 जनवरी को स्वामी विवेकानंद की जयंती, अब उनके विचारों के प्रसार से अधिक अपनी राजनीति को साधने का जरिया बन गई है।

इस बार 12 जनवरी को राष्ट्रीय युवा संसद समारोह को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने राजनीतिक वंशवाद को लोकतंत्र का सबसे बड़ा दुश्मन करार दिया और इसे जड़ से उखाड़ फेंकने की जरूरत बताई। लेकिन ऐसा कहते वक्त वे शायद ज्योतिरादित्य सिंधिया, वरुण गांधी, दुष्यंत सिंह, जयंत सिन्हा, और ऐसे दर्जनों नेताओं के नाम भूल गए, जो अपने मां-बाप, चाचा-ताऊ, बुआ-दादी आदि की राजनीतिक बेल को आगे बढ़ा रहे हैं। और इससे भी अधिक आश्चर्य की बात ये है कि विरोध के लिए कम होती गुंजाइश, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन, धर्मांधता, सांप्रदायिकता ऐसी कई बुराइयां जो लोकतंत्र को नुकसान पहुंचा रही हैं, उन्हें छोड़ प्रधानमंत्री ने वंशवाद को सबसे बड़ा दुश्मन बताया। जबकि वंशवाद के कारण कोई पार्टी किसी को उम्मीदवार बनाती भी है तो उसकी जीत या हार तय करने का काम जनता करती है। इस तरह वंशवाद जनता की मंजूरी के बाद ही आगे बढ़ता है।

ख़ैर, प्रधानमंत्री ने इस मौके पर एक बार फिर आध्यात्म, राष्ट्रवाद, राष्ट्रनिर्माण जैसे शब्दों के इर्द-गिर्द विवेकानंद को याद किया। जबकि इन मुद्दों पर स्वामीजी आज भी वही सब कहते तो जो उन्होंने आज से 126 साल पहले शिकागो की धर्मसंसद में कहे थे। 11 सितंबर 1893 को शिकागो के धर्म सम्मेलन में स्वामीजी ने हिंदू धर्म का उदारवादी चेहरा दुनिया के सामने रखा था। अपने प्रसिद्ध व्याख्यान ‘कास्ट, कल्चर एंड सोशलिज़्म’ में उन्होंने कहा था- ‘कुछ लोग देशभक्ति की बातें तो बहुत करते हैं, लेकिन मुख्य बात है- हृदय की भावना। देश पर छाया अज्ञान का अंधकार क्या आपको सचमुच बेचैन करता है? …यह बेचैनी ही आपकी देशभक्ति का पहला प्रमाण है।’

हिंदूधर्म में जाति व्यवस्था की कुरीतियों पर उन्होंने कहा था कि सैकड़ों वर्षों तक अपने सिर पर गहरे अंधविश्वास का बोझ रखकर,  केवल इस बात पर चर्चा में अपनी ताकत लगाकर कि किस भोजन को छूना चाहिए और किसको नहीं, और युगों तक सामाजिक अत्याचारों के तले सारी इंसानियत को कुचलकर आपने क्या हासिल किया और आज आप क्या हैं?… आओ पहले मनुष्य बनो, अपने संकीर्ण संस्कारों की कारा तोड़ो, मनुष्य बनो और बाहर की ओर झांको। देखो कि कैसे दूसरे राष्ट्र आगे बढ़ रहे हैं। स्वामीजी के ये विचार सही अर्थों में धर्म और देशप्रेम की व्याख्या करते हैं, लेकिन गाय, गोडसे राममंदिर, स्त्री और दलित उत्पीड़न पर राजनीति करने वाले इन्हें कभी समझना ही नहीं चाहते।

आज का देशबन्धु का संपादकीय का संपादित रूप साभार

सरकार वैक्सीन के साथ लोकतंत्र का टीका भी लाए, पुराना साल बीते, नया साल आए

Literature, art, music, poetry, story, drama, satire ... and other genres

The government should also bring vaccine for democracy with the vaccine, an old year passed, new year come

दुआ है कि दर्द के लिए मरहम बनके ये साल आए/ सरकार वैक्सीन के साथ लोकतंत्र का टीका भी लाए

पुराना साल बीते, नया साल आए

कोई लोहरी, कोई पोंगल कोई खिचड़ी मनाए

रस्में हैं जो अपने खि़त्तों की, रिवाज़ है जो अपनी बस्ती के

जलीकट्टू, बिहू, ओणम तिलवा सब मनाएं।

दुआ है ये, “दुख का कोई लम्हा ना किसी के पास आए

अल्लाह करे ये नया साल हर किसी को रास आए,

चकरी सी दुनिया, पतंग सी जिंदगी, में सर्द हवाएं

अब और ना उलझे, ना किसी मंझे से कट जाए

ख्वाबों से ऊंची, आसमानों में उड़ती चली जाए

अल्लाह करे ये नया साल हर किसी को रास आए।

बीते साल बहुत दुश्वारी थी, बेबस थे अच्छे-अच्छे,बहुत लाचारी थी

इंसान की दुनियांवी तरक्की, इक नन्हें वायरस से हारी थी

किसी तरह कट जाए बुरा वक्त, यह सोचकर पूरी दुनिया हारी थी

दुआ है यह कि मुफ़लिसी का कोई लम्हा न किसी के पास आए

अल्लाह करे यह नया साल हर किसी को रास आए

अब की तबीयत सभी की बहाल रहे

हर किसी को अपनों का ख्याल रहे

यही तरबियत हम सभी की हो, हर किसी को ये ख़्याल आए

दुआ है कि दर्द के लिए मरहम बनके ये साल आए

सरकार वैक्सीन के साथ लोकतंत्र का टीका भी लाए

अल्लाह करे यह नया साल हर किसी को रास आए।

सारा मलिक

Sara Malik, सारा मलिक, लेखिका स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।
Sara Malik, सारा मलिक, लेखिका स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।

वे छद्म हिन्दू हैं

Literature, art, music, poetry, story, drama, satire ... and other genres

वर्तमान में हिंदुओं को एक ही compartment में रखने की प्रक्रिया चल रही है। विविधता को गायब किया जा रहा है। यदि आप जय श्री राम न कहेंगे, तो आप हिन्दू नहीं हैं? छद्म हिन्दू पर अनिल सोडानी की एक रचना …

हिन्दू

मैं हिन्दू हूँ…

कर्म में , पूजा में

साकार और निराकार में,

विधि में, विधान में,

राम में, कृष्ण में,

कार्तिक में, गणेश में,

दुर्गा में, सीता में,

गीता और रामायण में

वेदों और वर्णों में,

पुनर्जन्म और स्वर्ग-नरक में

और बहुत कुछ में…

विश्वास करता हूँ…

मेरा धर्म मुझे इसकी

इज़ाज़त देता है।

मैं हिन्दू हूँ…

पूजा में नहीं, वेदों में नहीं

किसी मूर्ति में नहीं,

भगवान में भी नहीं,

स्वर्ग और नरक में नहीं

पुनर्जन्म में नहीं

विश्वास करता हूँ…

मेरा धर्म मुझे इसकी

इज़ाज़त देता है.

जगत सत्य और

ब्रह्म मिथ्या मानने की

इज़ाज़त भी देता है।

यह हिन्दू धर्म

एक काफिला है

हर सोच के व्यक्ति

एक साथ चल सकते

बिन किसी टकराव

बिन किसी द्वेष के।

जो हमें धकेले,

उनकी बनाई संकरी गली में,

वे या तो हिन्दू का

अर्थ नहीं जानते

या वे छद्म हिन्दू हैं

या हिन्दू धर्म का

उपयोग कर

वशीकरण का

खेल खेलते हैं।

-अनिल सोडानी

और तब तुम विभीषण बन जाते हो/ और कुर्सी की निष्ठा से बँधे हुए भीष्म/ जहाँ द्रोपदी नंगी हो तो हो जाए/ तो क्या फ़र्क पड़ता है!

Literature, art, music, poetry, story, drama, satire ... and other genres

बहुत अच्छा लगता है,

श्रीमंत के चरणों में लोटकर,

फिर अपनों में जाकर शेखी बघारना।

बहुत अच्छा लगता है,

प्रभु वर्ग के साथ,

सत्ता प्रतिष्ठान में बैठना।

सत्ता के महाभोज में शामिल होना,

सत्ता का चमचा होना,

इनसे नज़दीकियाँ बनाकर,

अपनों में आकर ऐंठना।

बहुत अच्छा लगता है,

छोटे-छोटे स्वार्थों में,

प्रभुवर्ग की चारण वन्दना।

बहुत अच्छा लगता है।

रत्ती भर सुख के लिए,

घुटने बल रेंगना।

बहुत अच्छा लगता है,

लेकिन क्या कर रहे हैं आप ????

क्या गढ़ रहे हैं आप???!

क्या कभी ????

अपनी आने वाली नस्लों के बारे में सोचा है

तुम्हारी इसी छोटे-छोटे स्वार्थ

छोटे-छोटे मतलब के चक्करों में

चक्करघिन्नी बन जाएगी

तुम्हारी आने वाली नस्लें

क्या कभी सोचा है???

कि तुम्हारा आज छोटा सा स्वार्थ,

तुम्हारी छोटी सी ग़ुलामी

एक बड़ी और लम्बी ग़ुलामी को जनेंगी ????

क्या कभी तुमने सोचा है???

कि आज का संघर्ष

तुम्हारी आने वाली नस्लों

का मुस्तकाबिल का सूरज बनकर चमके

क्या तुमने कभी सोचा है

कि तुम्हारे बाद भी दुनिया है

बहुत बड़ी दुनिया है

पीछे आने वाली नस्लों की

बहुत बड़ी शृंखला है

उनको ग़ुलाम बनाने का

उपक्रम रचना छोड़ दो

छोड़ दो छोटे-छोटे स्वार्थ

छोड़ दो छोटी-छोटी बातें।

इतिहास कभी भी वर्तमान नहीं होता,

जब वर्तमान भूत हो जाता है,

तो इतिहास बन जाता है,

और इतिहास उस समय समीक्षा करता है,

तुम्हारे वर्तमान की समीक्षा,

उस समय न तुम होते हो,

न तुम्हारा वक़्त।

न तुम्हारी सत्ता, न आभा मंडल,

न तुम्हारा ताज तख़्त।

और तब तुम विभीषण बन जाते हो,

और कुर्सी की निष्ठा से बँधे हुए भीष्म,

जहाँ द्रोपदी नंगी हो तो हो जाए,

तो क्या फ़र्क पड़ता है!

तुम्हारी निष्ठा तो कुर्सी से है,

तुम्हारे वर्तमान का चकाचौंध,

इतिहास के पन्नों में,

एक काला धब्बा नज़र आएगा।

काला अध्याय नज़र आएगा।

सब कुछ काला काला ही होगा,

तुम्हारा सारा आभा मंडल,

वक़्त के बियाबान में बिखर जाएगा।

और साथ ही साथ तुम काला कर रहे हो,

आने वाली नस्लों का भविष्य।

थूकेगा तुम्हारे इस कृत्य पर इतिहास,

और आने वाली नस्लों की आह।

होगा तुम्हारा वर्तमान स्याह,

और इतिहास भी स्याह।

तपेन्द्र प्रसाद

तपेंद्र प्रसाद, लेखक अवकाश प्राप्त आईएएस अधिकारी व पूर्व कैबिनेट मंत्री व सम्यक पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।
तपेंद्र प्रसाद, लेखक अवकाश प्राप्त आईएएस अधिकारी व पूर्व कैबिनेट मंत्री व सम्यक पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।

गणतंत्र दिवस मनाने से रोकने की याचिका अपने आप में ही, लोकतंत्र विरोधी है

Farmers Protest

सरकार, किसान और गणतंत्र दिवस समारोह

Government, Farmers and Republic Day Celebrations / Vijay Shankar Singh

आगामी 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस का पर्व है। उस दिन तीन कृषि बिलों के विरोध में आंदोलनरत किसानों (Farmers agitating against three agricultural bills) ने तिरंगा फहराने और ट्रेक्टर रैली निकालने का निश्चय किया है। पर सरकार ने बजरिये अटॉर्नी जनरल (Attorney General) सुप्रीम कोर्ट में यह बात रखी है कि इस पर रोक लगायी जाए। इस लेख में अवकाशप्राप्त वरिष्ठ आईपीएस अफसर विजय शंकर सिंह (Retired senior IPS officer Vijay Shankar Singh) प्रश्न कर रहे हैं कि किसान गणतंत्र दिवस का पर्व क्यों नहीं मना सकते ? क्या किसानों के गणतंत्र दिवस मनाने पर रोक लगाने की अदालत से सरकार की मांग उचित है ? पढ़ें और शेयर भी करें….

 हर नागरिक को गणतंत्र दिवस पर तिरंगा फहराने, संविधान की शपथ लेने, जुलूस आयोजित करने और सभा करने का अधिकार है। इस पर रोक लगाने की मांग, अदालत से करना हास्यास्पद है। हर घर, दुकान, प्रतिष्ठान पर तिरंगा फहराया जाता है। अगर शांति व्यवस्था की कोई अग्रिम अभिसूचना हो तो, सरकार को उससे निपटने के लिये पर्याप्त कानूनी अधिकार और शक्तियां प्राप्त भी हैं।

रघुवीर सहाय की एक कविता है,

राष्ट्रगीत में भला कौन वह

भारत-भाग्य-विधाता है

फटा सुथन्ना पहने जिसका

गुन हरचरन गाता है

मखमल टमटम बल्लम तुरही

पगड़ी छत्र चंवर के साथ

तोप छुड़ाकर ढोल बजाकर

जय-जय कौन कराता है

पूरब-पश्चिम से आते हैं

नंगे-बूचे नरकंकाल

सिंहासन पर बैठा

उनके

तमगे कौन लगाता है

कौन-कौन है वह जन-गण-मन

अधिनायक वह महाबली

डरा हुआ मन बेमन जिसका

बाजा रोज बजाता है।

गणतंत्र दिवस के इस महान पर्व पर किसी को इस पर्व को मनाने से रोकने की याचिका अपने आप में ही, लोकतंत्र विरोधी है। सरकार  किसानों द्वारा गणतंत्र दिवस मनाने के लिये वैकल्पिक स्थान सुझा सकती है। शांतिपूर्ण कार्यक्रम सम्पन्न हो, इसके लिए वह उचित आदेश निर्देश भी जारी कर सकती है। मौके पर पुलिस का ज़रूरी  बंदोबस्त कर सकती है पर ऐसे आयोजनों पर रोक नहीं लगायी जा सकती है।

प्रशासनिक मामलों में सुप्रीम कोर्ट के दखल देने की बढ़ती हुयी प्रवृत्ति, न्यायपालिका के लिये शुभ संकेत नहीं

यह भी अजीब विडंबना है कि सरकार अब कानून व्यवस्था के मसले पर भी सुप्रीम कोर्ट से निर्देश लेने लगी है। सुप्रीम कोर्ट की भी प्रशासनिक मामलों में दखल देने की बढ़ती हुयी प्रवृत्ति, न्यायपालिका के लिये शुभ संकेत नहीं है। यह काम सरकार और पुलिस का है कि वह ऐसे समारोह को कैसे रेगुलेट कराये और कैसे शांति बनाए रखे। इसमें अदालतो का कोई दखल होता भी नहीं है।

क्या अदालत ऐसा कोई आदेश पारित कर सकती है कि गणतंत्र दिवस पर किसान कोई समारोह आयोजित न करें ? ऐसा संभव भी नहीं है और मुझे लगता है ऐसा कोई आदेश होगा भी नहीं। अधिक से अधिक, अदालत यह निर्देश जारी कर सकती है कि, जो भी आयोजन हो, वह शांतिपूर्ण हो। यह काम तो पुलिस बिना अदालत गए ही कर सकती है। सुप्रीम कोर्ट या किसी भी अदालत को ऐसे मामलों में दखल देने की ज़रुरत ही नहीं है।

क्या कानून व्यवस्था बनाये रखने के कानूनी प्राविधान अब कमज़ोर पड़ने लगे हैं ? या सरकार कानून व्यवस्था बनाये रखने के मामलों में खुद को अक्षम पाने लगी है ? वर्तमान किसान आंदोलन 2020 के बारे में तमाम मत मतांतर के बावजूद इस एक बात पर सरकार सहित सभी मुतमइन हैं कि यह आंदोलन, 50 दिन बीतने, बेहद ठंड पड़ने, 65 किसानों की अकाल मृत्यु होने, खालिस्तानी, देशद्रोही, विभाजनकारी आदि शब्दों से गोहराये जाने के बाद भी, शांतिपूर्ण, व्यवस्थित और उच्च मनोबल से भरा हुआ है।

दरअसल सरकार जनता से मुंह चुरा रही है और आंदोलन से निपटने की यह कच्छप प्रवृत्ति सरकार को आंदोलनकारियों के विपरीत खड़ा कर रही है।

आंदोलन एक लोकतांत्रिक प्रतिरोध की अभिव्यक्ति है। आंदोलन के दौरान, शांति व्यवस्था बनाये रखने के लिये जिम्मेदार पुलिस की उन आंदोलनकारियों से कोई शत्रुता नहीं रहती है। आंदोलन भी हो, प्रतिरोध की अभिव्यक्ति भी हो जाय और शांति व्यवस्था बनी भी रहे, यही प्रशासन का दायित्व होता है। अगर आंदोलन, हिंसक हो जाता है तो, ऐसी समस्याओं से निपटने के लिये भी कानूनी प्राविधान हैं।

अब सुप्रीम कोर्ट की ऐसे मामलों में दखल लेने और दखल देने की प्रवृत्ति पर वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह ने, कुछ प्रमुख अखबारों की राय अपने फेसबुक वॉल पर संकलित की है। यह राय किसान आंदोलन से निपटने के लिये बनायी गयी चार सदस्यीय कमेटी के बारे में है। मैं संजय जी के उक्त लेख से कुछ अंश प्रस्तुत करता हूँ।

किसानों के साथ सरकार और सुप्रीम कोर्ट ने जो किया वह जानने लायक है। गोदी मीडिया के दौर में यह बेहद मुश्किल है और इससे निपटने का तरीका है कि ज्यादा से ज्यादा अखबार देखे जाएं। शायद कहीं कुछ मिल जाए। आखिर उन्हें भी तो प्रतिस्पर्धा में रहना है। अंग्रेजी के चुनिन्दा मेरे पांच अखबारों में पहले पन्ने पर किसान आंदोलन से संबंधित सुप्रीम कोर्ट के आदेश से जुड़ी खबरें और शीर्षक से बहुत कुछ पता चलता है।

इंडियन एक्सप्रेस

फ्लैग शीर्षक – अंतरिम आदेश, अगली सुनवाई आठ हफ्तों में

सीमा टटोलते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कृषि कानून को स्टे किया, वार्ता के लिए पैनल के नामों की घोषणा की (मुख्य शीर्षक)

पैनल 10 दिनों में सुनवाई शुरू करेगा; एजी ने कहा कि विरोध प्रदर्शन में खालिस्तानियों ने घुसपैठ कर ली है (मुख्य खबर यानी लीड के ये तीन शीर्षक हैं) इसके साथ सिंघु बॉर्डर पर प्रेस कांफ्रेंस करते किसान नेताओं की एक तस्वीर तीन कॉलम में है।

लीड के साथ दो कॉलम की एक खबर है, सुप्रीम कोर्ट की कमेटी में ज्यादातर (सभी या चारों भी लिखा जा सकता था?) ने कृषि कानून का समर्थन किया है, विरोध प्रदर्शन को भ्रमित कहा है।

सिंगल कॉलम की एक और खबर का शीर्षक है, किसान यूनियनों ने स्टे का स्वागत किया पर पैनल को खारिज कर दिया : यह सरकार समर्थक है।

दो कॉलम में एक और खबर है, अदालत ने नए क्षेत्र में कदम रखा आधार, चुनावी बांड (के मामले में) अलग स्टैंड लिया था।

गौरतलब है कि लीड के शीर्षक में अंग्रेजी मुहावरा, ‘पुशिंग द एनवेलप’ का प्रयोग किया गया है। इसका उपयोग अक्सर अतिवादी आईडिया का उपयोग करने के लिए किया जाता है।

इंडियन एक्सप्रेस की इन खबरों के साथ एक और खासियत है कि सब बाईलाइन वाली हैं यानी इतने रिपोर्टर तो अखबार के लिए काम कर ही रहे हैं। अखबार ने पहले पन्ने पर यह भी बताया है कि संपादकीय पन्ने पर प्रताप भानु मेहता का आलेख, अ शेप शिफ्टिंग जस्टिस है। इसमें कहा गया है कि राजनीतिक विवाद में मध्यस्थता करना कोर्ट का काम नहीं है। अदालत का काम असंवैधानिकता या गैर कानूनी होना तय करना है।

एक्सप्रेस के संपादकीय का शीर्षक है, आउट ऑफ कोर्ट (अदालत के बाहर)। इसके साथ हाईलाइट किया हुआ अंश है, नए कृषि कानून को लेकर सरकार और किसानों के बीच चल रहे विवाद को खत्म करने की सुप्रीम कोर्ट की कोशिश अपनी समस्याएं खड़ी करेगी।

● हिन्दुस्तान टाइम्स

सुप्रीम कोर्ट ने कृषि कानूनों को स्टे किया, सभी पक्षों को सुनने के लिए कमेटी बनाई (मुख्य शीर्षक है)। इससे संबंधित खास बातों की शीर्षक है, क्या सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप से टकराव खत्म होगा? खास बातें के तहत चार बिन्दु हैं : (पहला) तीन विवादास्पद कृषि कानूनों का लागू किया जाना अगले आदेश तक स्टे किया गया। (दूसरा) कानून बनाए जाने से पहले मौजूद रही एमएसपी (न्यूनतम समर्थन मूल्य) की व्यवस्था बनी रहेगी। (तीसरा) किसानों की भूमि की रक्षा की जाएगी। (चौथा) चार सदस्यों का एक पैनल किसानों और सरकार को सुनेगा तथा सिफारिशें करेगा।

सरकार का रुख

अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने कहा कि कानून की आलोचना करने वाले किसानों ने एक भी ऐसे प्रावधान का उल्लेख नहीं किया है जो किसानों के लिए नुकसानदेह है। यह भी कहा कि किसानों के विरोध प्रदर्शन में खालिस्तानी घुसपैठ कर गए हैं और वे आईबी से आवश्यक जानकारी लेकर एक शपथपत्र दाखिल करेंगे।

किसान कहते हैं

किसानों ने स्टे का स्वागत किया है पर कानून वापस लिए जाने तक आंदोलन वापस नहीं लेंगे। गणतंत्र दिवस पर रैली – सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में स्टे देने की सरकार की अपील पर सुनवाई करने की सहमति दी। खंडपीठ ने एक नोटिस जारी किया है और निर्देश दिया है कि उसे किसान यूनियनों को दिया जाए। इसके साथ सुप्रीम कोर्ट के हवाले से अखबार ने छापा है, भले ही हम शांति पूर्ण विरोध प्रदर्शन को नहीं रोक रहे हैं, हमारा मानना है कि कृषि कानून को लागू करना रोकने के इस असाधारण आदेश को कम से कम फिलहाल विरोध प्रदर्शन के उद्देश्य की प्राप्ति की तरह देखा जाएगा और कृषि संगठन इस बात के लिए प्रेरित होंगे कि अपने सदस्यों को यह यकीन दिलाएं कि वे वापस अपनी आजीविका चलाने में लगें ….।

टाइम्स ऑफ इंडिया

सुप्रीम कोर्ट ने नए कृषि कानूनों को टाल दिया, टकराव रोकने के लिए पैनल बनाया है (मुख्य शीर्षक)। इंट्रो है, (किसान) यूनियनों ने इस कदम को खारिज किया, सरकार के साथ वार्ता के लिए तैयार। इस मुख्य खबर के साथ तीन कॉलम के एक बॉक्स का शीर्षक है, समिति बनाने से विवाद की शुरुआत। इसमें एक कॉलम से कुछ ज्यादा में गाजीपुर बॉर्डर पर जमे किसानों की तस्वीर है। कैप्शन में लिखा है, सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही थी तब भी किसान गाजीपुर सीमा पर डटे हैं। बॉक्स के शीर्षक के नीचे दो कॉलम से कुछ कम में सुप्रीम कोर्ट का कथन है, कोई भी ताकत हमें कमेटी बनाने से नहीं रोक सकती है। अच्छी समिति के संबंध में हम हर किसी की राय पूरी नहीं कर रहे हैं। अगर किसान अपनी समस्या का हल चाहते हैं तो वे समिति के समक्ष जाएंगे और अपने विचार रखेंगे। यह (कमेटी) न तो कोई आदेश जारी करेगी न आपको (किसानों को) सजा देगी। यह हमें अपनी रिपोर्ट देगी।

इसके साथ इस पर किसानों की प्रतिक्रिया है, किसान सरकार से चर्चा करना चाहते हैं न कि सुप्रीम कोर्ट से जहां किसान गए ही नहीं हैं। कमेटी के सदस्यों पर भरोसा नहीं किया जा सकता है क्योंकि वे लिखते रहे हैं कि कैसे कृषि कानून किसानों के हक में हैं। हम अपना आंदोलन जारी रखेंगे। अखबार ने इसके साथ समिति के चारो सदस्यों का परिचय छापा है और बताया है कि चारो कृषि कानून का समर्थन कर चुके हैं।

टाइम्स ऑफ इंडिया ने मुख्य खबर के साथ सिंगल कॉलम की तीन खबरें छापी हैं और अंदर की खबरों का भी विवरण दिया है। पर शीर्षक सुप्रीम कोर्ट के आदेश से संबंधित नहीं लगता है इसलिए छोड़ रहा हूं।

हिन्दू

मुख्य खबर का शीर्षक है, सुप्रीम कोर्ट ने तीन विवादास्पद कृषि कानूनों को लागू करना रोका। इंट्रो है, एक्सपर्ट पैनल किसानों की शिकायतें सुनेगी। इसके साथ दो कॉलम में एक खबर का शीर्षक है, किसान नेताओं ने सुप्रीम कोर्ट के पैनल को “सरकारी चाल” कहकर नामंजूर किया। अंदर और खबरें होने की सूचना है पर उनका शीर्षक नहीं है। पहले पन्ने की दोनों खबरें बाईलाइन वाली हैं।

टेलीग्राफ

सही या गलत, लोग यही कह रहे हैं, पैनल सरकार का और सरकार के लिए है। अखबार ने इसके साथ दो और खबरें छापी हैं। एक का शीर्षक चार लाइन में है। इसमें कहा गया है सुप्रीम कोर्ट ने खालिस्तानी घुसपैठ के दावे पर केंद्र से शपथपत्र छापा। एक सिंगल कॉलम की खबर का शीर्षक है, फोकस ट्रैक्टर रैली पर केंद्रित हुआ।

द टेलीग्राफ ने पहले पन्ने पर ही अपने नियमित कॉलम, ‘क्वोट’ में एक किसान, बलविन्दर सिंह का बयान छापा है, “कानून (को रोकने, टालने) पर स्टे देने का समय निकल चुका है। यह उसी समय कर दिया जाना चाहिए था जब हमने पंजाब और हरियाणा में अपना विरोध शुरू किया था।” 

आज लोहड़ी का पर्व है। यह पंजाब का सबसे लोकप्रिय पर्व है। आज दिल्ली सीमा पर यह उत्सव आंदोलनकारियों द्वारा उत्साह और धूमधाम से मनाया जा रहा है। जब यह पर्व मनाया जा सकता है तो यही किसान अपना राष्ट्रीय पर्व गणतंत्र दिवस क्यों नहीं उत्साह और शांतिपूर्ण तरह से मना सकते हैं ?

अगर सरकार अपने नागरिकों को राष्ट्रीय पर्व मनाने के लिये उचित और सम्मानजनक व्यवस्था नहीं कर सकती तो ऐसी सरकार और चाहे और कुछ हो, लोकतंत्र के लिये समर्पित और प्रतिबद्ध सरकार तो नहीं ही कही जा सकती है। सरकार को तो चाहिए कि, कृषि कानूनों पर जो भी बातचीत किसान संगठनों से हो रही हो, वह उसे जारी रखे पर 26 जनवरी को किसानों के गणतंत्र दिवस समारोह के लिये अपने वार्ताकार मंत्रियों को भेजे और सरकार कम से कम इस आयोजन में तो गण के साथ नज़र आये।

विजय शंकर सिंह

सर्वोच्च न्यायालय कानूनों की संवैधानिकता के बजाय सरकार की असहजता के प्रति अधिक चिंतित है, न्यायपालिका के लिये दुःखद है यह स्थिति

Farmers Protest

The Supreme Court is more concerned about the discomfort of the government than the constitutionality of the laws, this situation is sad for the judiciary.

अवकाशप्राप्त वरिष्ठ आईपीएस अफसर विजय शंकर सिंह का लेख

यह एक नया ट्रेंड चला है कि जब-जब सरकार निर्विकल्प होने और संकट में धंसने लगती है तो वह सर्वोच्च न्यायालय की ओर देखने लगती है। बिल्कुल ग़ज़ ग्राह वाली स्थिति है। दिल्ली की सीमा पर जब तक लाखों किसान बैठे रहे, सत्तर किसान मौसम और तनाव से जान गंवा बैठे, सरकार बातचीत का सिलसिला बनाये रखे। सरकार के किसी मंत्री या प्रधानमंत्री ने भी दिवंगत किसानों के प्रति औपचारिक शोक तक व्यक्त नहीं किया। सत्तारूढ़ दल के लोग उन्हें खालिस्तानी और विभाजनकारी लगातार बताते रहे। सरकार ने इस पर भी कोई ऐतराज नही किया। पहले ही दिन से किसान अपने स्टैंड पर अडिग हैं कि, वे इन कानूनों के निरस्तीकरण से कम पर राजी नहीं है, फिर भी 9 दौर की बातचीत हो चुकी है और अगली दौर की वार्ता अब 15 जनवरी को तय है।

इसी बीच सर्वोच्च न्यायालय में दायर एक याचिका पर 11 जनवरी को सर्वोच्च न्यायालय ने कृषि कानूनों पर स्टे देने का संकेत दिया और कहा कि वह एक कमेटी का गठन कर सकती है। हालांकि सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार से खुद भी यह कहा कि वह चाहे तो खुद ही इन कानूनों के क्रियान्वयन को रोक दे। पर सरकार ने ऐसा कुछ करने का कोई संकेत नहीं दिया।

12 जनवरी को सर्वोच्च न्यायालय ने तीनों कृषि कानूनों को स्टे कर दिया और एक कमेटी का गठन किया कि वह इन कानूनों की पड़ताल करे। कमेटी के जो सदस्य बनाये गए हैं, एक नज़र उनके प्रोफाइल और पृष्ठभूमि पर भी डाल लेते हैं। जो कमेटी गठित हुयी है उसमें वे ही लोग हैं जो इन कानूनों के लाये जाने की वकालत पहले से ही कर रहे हैं। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गठित कमेटी के सभी सदस्य, कृषि कानूनों के बारे सरकार के पक्ष में पहले से ही हैं, और अब भी वे खुल कर हैं।

कमेटी के सदस्य हैं,

1. भूपिंदर सिंह मान, प्रेसिडेंट,

2. अशोक गुलाटी कृषि अर्थशास्त्री,

3. डॉ. प्रमोद कुमार जोशी, इंटरनेशनल पॉलिसी हेड, और

4. अनिल धनवत, शेतकरी संगठन, महाराष्ट्र को शामिल किया गया है.

कौन हैं भूपिंदर सिंह मान

भूपिंदर सिंह मान राज्यसभा के सदस्य रहे हैं। हाल ही में यह एक शिष्टमंडल के साथ, कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर को इन कानूनों को बनाये रखने के पक्ष में एक ज्ञापन दे चुके हैं। यह भारतीय किसान यूनियन मान गुट से जुड़े हैं। इन्हीं के बारे में सरकार कहती है कि उसे कृषि कानून समर्थक किसानों के बारे में भी सोचना होगा।

कौन हैं अशोक गुलाटी

अशोक गुलाटी, कृषि विशेषज्ञ हैं और कृषि क्षेत्र में कॉरपोरेट के पक्षधर हैं। हाल ही में इंडियन एक्सप्रेस में इन्होंने एक लिखा था, जिसका एक अंश मैं यहां उद्धृत कर रहा हूँ।

 “इन कानूनों से किसानों को अपने उत्पाद बेचने के मामले में और खरीदारों को खरीदने और भंडारण करने के मामले में ज्यादा विकल्प और आजादी हासिल होगी. इस तरह खेतिहर उत्पादों की बाजार-व्यवस्था के भीतर प्रतिस्पर्धा कायम होगी. इस प्रतिस्पर्धा से खेतिहर उत्पादों के मामले में ज्यादा कारगर मूल्य-ऋंखला (वैल्यू चेन) तैयार करने में मदद मिलेगी क्योंकि मार्केटिंग की लागत कम होगी, उपज को बेहतर कीमत पर बेचने के अवसर होंगे, उपज पर किसानों का औसत लाभ बढ़ेगा और साथ ही उपभोक्ता के लिए भी सहूलियत होगी, उसे कम कीमत अदा करनी पड़ेगी. इससे भंडारण के मामले में निजी निवेश को भी बढ़ावा मिलेगा तो कृषि-उपज की बरबादी कम होगी और समय-समय पर कीमतों में जो उतार-चढ़ाव होते रहता है, उसपर अंकुश लगाने में मदद मिलेगी।”

यह अंश इन कानूनों के बारे में इनकी राय स्प्ष्ट रूप से बता दे रहा है। अशोक गुलाटी अपने लेख में यह कह चुके हैं कि नए कृषि कानूनों को लेकर विपक्ष दिग्भ्रमित है। यह सही दिशा में उठाया गया कदम है।

कौन हैं डॉ प्रमोद कुमार जोशी

डॉ प्रमोद कुमार जोशी, सार्क एग्रीकल्चर सेंटर्स गवर्निंग बोर्ड के अध्यक्ष रहे हैं। वे वर्ल्ड बैंक के इंटरनेशनल असेसमेंट ऑफ एग्रीकल्चर साइंस के सदस्य रहे हैं। डॉ जोशी पहले ही यह बता चुके हैं कि नए कानून को अगर कमजोर किया गया तो भारत कृषि क्षेत्र में विश्वशक्ति बनने से रह जाएगा। उनका यह लेख फाइनेंशियल एक्सप्रेस में छप चुका है।

कौन हैं अनिल धनवत

अनिल धनवत, शेतकरी संगठन, महाराष्ट्र से हैं और यह संगठन पहले से ही कृषि कानूनों के पक्ष में हैं। वे इन बिलो को बड़ा सुधार बता चुके ओर कह रहे हैं कि इससे किसानों को वित्तीय आजादी मिलेगी। द हिन्दू बिजनेसलाइन डॉट कॉम में लिखे एक लेख में वे सरकार से खुलकर यह अपील कर चुके हैं कि, सरकार को नए कानून रद्द नहीं करना चाहिए। शेतकरी संगठन आज से नहीं कई दशकों से कृषि क्षेत्र में खुले बाज़ार की वकालत करता रहा है।

अब सवाल उठता है कमेटी की कानूनी स्थिति पर और यह करेगी क्या ?

यदि यह कमेटी मौजूदा तीनों कृषि कानून की खामियों खूबियों की पड़ताल के लिए गठित की गयी है तो, यह कसरत सरकार और कमेटी के बीच है। अब निम्न बिंदुओं को पढ़िये।

यदि यह कमेटी किसान संगठनों को समझाने और कानूनों पर राय बनाने के लिये गठित की गयी है, तो सरकार के तीन मंत्री पिछले 50 दिन से इन कानूनों पर किसानों को समझा ही तो रहे हैं। अभी भी वार्ता की अगली तारीख 15 जनवरी पड़ी ही है।

यह कमेटी सरकारी वार्ताकारों से न तो कानूनी रूप से अधिक सक्षम है और न ही समर्थ।

कानूनी रूप से इस कमेटी की कोई हैसियत नहीं है। कानून को वापस लेने में केवल सरकार ही समर्थ और सक्षम है, और उसकी संवैधानिक स्थिति पर विचार करने के लिये सर्वोच्च न्यायालय खुद शक्ति सम्पन्न है।

यह कमेटी न तो इस कानून में कोई रद्दोबदल करने के लिये अधिकृत है, न ही सरकार को कोई बाध्यकारी सुझाव देने के लिये भी सक्षम है।

यह कमेटी सर्वोच्च न्यायालय का एक प्रयास है जिसके माध्यम से सर्वोच्च न्यायालय क्या जानना चाहता है, यह तो सर्वोच्च न्यायालय जाने, पर ऐसी किसी कमेटी की मांग न तो किसान संगठनों ने किया था, और न ही सरकार ने कोई ऐसा प्रस्ताव दिया था। आंदोलन करने वाले किसान संगठन तो सर्वोच्च न्यायालय में दायर इस याचिका के कोई पार्टी भी नहीं है।

फिलहाल, जो मंत्रीगण, किसान संगठन से बातचीत कर रहे हैं वे इस कमेटी के सदस्यों की तुलना में, इस समस्या के समाधान हेतु अधिक सक्षम, और समर्थ हैं।

अंत में सभी संभावित विचार विमर्श के बाद, यह कमेटी अपनी रिपोर्ट किसे देगी ? सरकार को या सर्वोच्च न्यायालय को ?

क्या कमेटी कानून की संवैधानिक स्थिति पर कोई टिप्पणी करने के लिये सक्षम है ?

बिल्कुल नहीं।

कमेटी फिर कानून के लाभ गिनायेगी, क्योंकि कमेटी में वे ही लोग हैं जो इन कानूनों के पक्ष में लंबे समय से लेख लिख रहे थे, और सरकार के साथ थे। फिर ऐसे लोगों से किसान संगठन क्या उम्मीद करें।

सर्वोच्च न्यायालय ने इन कानूनों को स्टे कर दिया है। इस निषेधाज्ञा पर भी सवाल उठ रहे हैं और यह सवाल सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पिछले कुछ सालों से उसके द्वारा दिये गए फैसलों के काऱण उठ रहे है। अब कुछ महत्वपूर्ण संशयों पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए।

सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट स्टे हुआ, फिर दस दिन में रोक हट गयी।

ऐसे तमाशे यह बताते हैं कि स्टे की क्या मियाद होती है और स्टे कैसे अचानक हटा दिया जाता है। सरकार के दबाव में हटाया गया या विधिसम्मत सुनवाई करके ?

सर्वोच्च न्यायालय को यह नाम किसने दिए हैं ? जाहिर है, किसी ने यह नाम सुझाये ही होंगे। अदालत उभय पक्ष से ही नाम, विकल्प और कानून सुझाने के लिये कहती है। यदि यह नाम सरकार ने सुझाये हैं तो सर्वोच्च न्यायालय ने आंदोलनकारी किसानों से क्यों नही इन पर उनकी राय मांगी ?

ज़ाहिर है, रोक लगाने के साथ एक मनमाफिक कमेटी के गठन के लिये यह सारी कवायद की गयी है। इन सबसे सर्वोच्च न्यायालय के बारे में यह शक और पुख्ता हुआ कि वह कहीं न कहीं से दबाव में है। यह स्थिति न्यायपालिका के लिये दुःखद है।

कमेटी किस एजेंडे पर बात करेगी ?

वह एजेंडा किसने तय किया है, सर्वोच्च न्यायालय ने या सरकार ने ?

तीन मंत्री तो पचास दिन से किसानों से बात कर ही रहे हैं तो फिर अविशेषज्ञों की कमेटी क्या मंत्रीगण से अधिक शक्तिशाली है ?

क्या कमेटी क्या संसद से ऊपर है ?

यह अपनी रिपोर्ट किसे देगी ?

इस कमेटी के रिपोर्ट की क्या वैधानिकता रहेगी।

अगर यह सब स्पष्ट नहीं है तो यह सारी कसरत इस किसान आंदोलन जो येन केन प्रकारेण खत्म कराने की ही है।

कानून यह कह कर लाया जा रहा है कि इससे किसानों की आय बढ़ेगी और वह खुशहाल होंगे। पर कंपनियां कॉरपोरेट की बढ़ रही हैं। खुशहाल कॉरपोरेट हो रहे हैं। कानून एग्रीकल्चर ट्रेड पर बन रहा है। नाम किसानों और कृषि सुधार का लिया जा रहा है ! सरकार कह रही है कि यह आंदोलन, पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड के किसानों का है। कमेटी में आंदोलनरत किसान संगठनों से जुड़े और इन राज्यों से कितने लोग हैं ?

पिछली सुनवाई में सर्वोच्च न्यायालय ने एक नाम सुझाया था, पी साईंनाथ का। क्या इस बार यह नाम सर्वोच्च न्यायालय की प्रस्तावित कमेटी में है ? जी नहीं

ऐसी कमेटी में पी साईनाथ और डॉ देवेंद्र शर्मा का नाम तो कम से कम होना ही चाहिए था। यह दोनों अपने अपने विषय के एक्सपर्ट हैं। उनके नाम का उल्लेख करने के बावजूद पी साईंनाथ का नाम क्यों नहीं कमेटी में रखा गया ?

अब यह शक और पुख्ता होता जा रहा है कि, अंतत: सर्वोच्च न्यायालय ने वही किया जो सरकार चाहती है। नए कानूनों के क्रियान्वयन पर रोक लगाने का अर्थ है कि एक न एक दिन रोक हटा ली जाएगी। अदालत ने यह कहा भी है कि, यह रोक अनंतकाल के लिए नहीं है।

सर्वोच्च न्यायालय के हाल के कुछ फैसले जिनसे यह संदेह उपजता है कि अदालत का रुख सरकार की तरफ नरम है।

सेंट्रल विस्टा पर रोक तो लगी, पर भूमिपूजन को अनुमति दी गयी। फिर अचानक, सेंट्रल विस्टा के निर्माण पर भी अनुमति दे दी गयी। हालांकि एक जज ने बेच के अलग डिसेंटिंग दृष्टिकोण दिया था। लेकिन दिल्ली का पर्यावरण, लैंडस्केप, स्वरूप बदलने वाले इस हेरिटेज विरोधी योजना पर न तो पर्याप्त विचार विमर्श किया गया, न स्वरूप के बदलाव पर जनता या अन्य एक्सपर्ट से कोई राय बात की गयी। यह सब पेचीदगियां, सर्वोच्च न्यायालय को या तो दिखी नहीं, या उन्होंने देखा नहीं या इन सब के विस्तार में जाने की उन्होंने ज़रूरत ही नहीं समझी।

नोटबंदी पर याचिका अब तक लंबित है। लगभग 150 लोग मर गए। उनके खून के छींटे किनके दामन पर चस्पा किए जाएं, यह सब अभी तय नहीं।

नागरिकता सीएए कानून की संवैधानिकता पर भी अभी तक सर्वोच्च न्यायालय ने कोई निर्णय नहीं दिया। अब तक कितनी मंथर गति से सुनवाई चल रही है यह कभी-कभी अखबारों में आ जाता है तो लगता है, अरे यह भी एक मुकदमा है।

अनुच्छेद 370 पर हुए संविधान संशोधन को भी अदालत में चुनौती दी गयी है। उसकी संवैधानिकता पर भी सवाल उठा है। सुनवाई अभी भी लंबित है।

जम्मू कश्मीर में नेट सुविधा, लगातार कर्फ्यू और निषेधाज्ञा के चलते महत्वपूर्ण अखबार भी सर्वोच्च न्यायालय में अपनी बात लेकर गए। अभिव्यक्ति की आज़ादी की बात भी उठी। पर आज तक कई मौसम बदल गए पर सुनवाई में कोई प्रगति नहीं। आज भी जम्मू कश्मीर में 2 जी नेट की सुविधा ही है।

लंबे समय तक वहां के नेता जेलों में निरूद्ध रहे। उनकी भी याचिकायें लंबित रही। अर्णब गोस्वामी के मामले में निजी आज़ादी के प्रति सचेत और सजगता पर सुभषित सुनाने वाली सुप्रीम अदालत ने इन याचिकाओं पर खामोशी अख्तियार कर रखा है।

सुबूत के बावजूद, जज लोया की संदिग्ध मृत्यु की जांच का आदेश न देना और बिना किसी जांच पड़ताल या विवेचना के ही केवल कुछ साथी जजों के बयान पर यह कह देना कि, जज झूठ नहीं बोल सकते हैं और किसी जांच की आवश्यकता नहीं है, यह अब तक का सबसे अनोखा फैसला होगा। बिना जांच के ही अपराध के निष्कर्ष पर पहुंच जाना एक घातक नजीर भी हो सकती है।

राफेल घोटाला में, सौदे की शर्तों को बदलने, ऑफसेट ठेके में फेरबदल करने, एचएएल को बाहर करने, अनिल अम्बानी जो लन्दन में दिवालिया और एसबीआई के रिकॉर्ड में फ्रॉड घोषित हैं को ठेका दिलाने, राफेल सौदे में सॉवरेन गारंटी का उल्लेख तक नहीं करने, 128 जहाज से 32 जहाज पर आ जाने, और इन सब सुबूतों को जब सीबीआई प्रमुख को सौंपा गया तो आनन फानन में सीबीआई प्रमुख को ही बदल देने के तमाम पुष्ट अपुष्ट आरोपों के बावजूद किसी भी तरह की जांच से इनकार कर देने से यह संदेह स्वाभाविक रूप से सर्वोच्च न्यायालय की तरफ उठता है कि आखिर वह इन सब की प्रारंभिक जांच तक कराने के लिये अदालत राजी क्यों नहीं हुयी ?

लॉक डाउन में सड़क पर घिसटते प्रवासी मज़दूर सर्वोच्च न्यायालय को तब दिखे, जब सोशल मीडिया पर शोर मचा।

सरकार ने कहा कि, सड़क पर कोई नहीं है और अदालत ने इसे मान भी लिया। इस दुःखद कुप्रबंधन पर न तो सरकार ने कुछ किया और न ही सर्वोच्च न्यायालय ने।

उपरोक्त सारे उदाहरण आज जब किसान आंदोलन के इस मोड़ पर जब सर्वोच्च न्यायालय ने एक कमेटी के गठन का निर्णय दिया है तो बरबस याद आ जाते हैं। संस्थाएं अपने स्थापत्य की उत्तुंगता के प्रभुत्व और फैसले के शब्दजाल या संस्थान में बैठे हुए महानुभावों के बौद्धिक क्षमता से महान नहीं बनती हैं। संस्थाएं, महान बनती हैं जनहित में उनके द्वारा उठाये गए कदमों से और किसी भी विवाद पर न्यायपूर्ण आदेश से। सरकार की मजबूरी हो सकती है कि वह कुछ फैसलों को अपनी राजनीतिक विचारधारा से प्रेरित होकर ले ले, क्योंकि पर एक विचारधारा की वाहक होती है, पर संविधान के अनुच्छेद 142 में प्रदत्त अधिकारों से असीम शक्ति सम्पन्न सर्वोच्च न्यायालय की ऐसी कोई मजबूरी नहीं होती है। मानवीय कमज़ोरियों की बात मैं नहीं कर रहा हूँ।

सरकार को चाहिए कि सरकार एक अध्यादेश ला कर यह कानून निरस्त करे। कृषि सुधार के लिये अलग से कानून लाये और किसान संगठन तथा आम जनता और कृषि विशेषज्ञों से राय मांगे और फिर स्टैंडिंग कमेटी में उसके परीक्षण के बाद संसद में बहस हो और तब कानून बने।

सरकार को चाहिए था कि सर्वदलीय बैठक, राज्यो के मुख्यमंत्री और किसान संगठन के नेताओं से बात कर के इस जटिल समस्या को हल करे।

विजय शंकर सिंह (Vijay Shanker Singh) लेखक अवकाशप्राप्त आईपीएस अफसर हैं
विजय शंकर सिंह (Vijay Shanker Singh) लेखक अवकाशप्राप्त आईपीएस अफसर हैं

कृषि कानूनों पर सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी सरकार की अक्षमता का प्रतीक

Supreme court of India

कृषि कानूनों पर सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी का विश्लेषण (Supreme Court’s comment on agricultural laws) करते हुए इस लेख में अवकाशप्राप्त वरिष्ठ आईपीएस अफसर विजय शंकर सिंह (Vijay Shankar Singh) विश्लेषण कर रहे हैं कि किस तरह सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी सरकार की अक्षमता का प्रतीक (inefficiency of government) है और किस तरह ये सरकार नीतिगत विकलांगता का शिकार है।… पूरा पढ़ें और शेयर भी करें…

सर्वोच्च न्यायालय में सीजेआई ने कल सुनवाई करते हुए कहा कि,

“हमें अफसोस के साथ कहना पड़ रहा है कि आपने ( सरकार ने ) बिना पर्याप्त विचार विमर्श किए एक कानून बना दिया है, जिसके कारण हड़ताल हो गयी है। अब इस आंदोलन से आप ही को निपटना है।”

कृषि कानूनों पर सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि सरकार को इन कानूनों के क्रियान्वयन पर रोक लगाने के लिए विचार करना चाहिए, जिससे आंदोलनकारियों और सरकार के बीच जो विवाद है वह सुलझ सके।

सीजेआई एसए बोबड़े ने कहा कि, जिस तरह से सरकार ने इस मामले को हैंडल किया है उससे वे बहुत निराश हैं।

अदालत ने यह भी कहा कि, जिस तरह से सरकार और किसान संगठनों के बीच वार्ता चल रही है उससे कोई हल नहीं निकल रहा है। अब इस मामले का समाधान कोई कमेटी ही करे।

सीजेआई ने कहा कि, हमें यह समझ में आ रहा है कि सरकार क्लॉज दर क्लॉज बातचीत करना चाहती है और  किसान चाहते हैं कि तीनों ही कृषि कानून ही हो। हम इन कानूनों के क्रियान्वयन को तब तक के लिए स्थगित कर देंगे, जब तक एक सक्षम कमेटी, उभय पक्षों से बात कर के इसे हल न कर दे।”

सर्वोच्च न्यायालय ने एक कमेटी के गठन का प्रस्ताव दिया है। और दोनो पक्षों से कहा है कि वे अपने-अपने प्रतिनिधियों के नाम सुझायें।

कृषि कानूनों पर सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी से यह स्पष्ट है कि तीनों नए कृषि कानून बिना किसी गम्भीर विचार विमर्श के, आगा पीछा सोचे सरकार ने कुछ छंटे हुए पूंजीपति घरानों के हित के लिए बना दिये गए हैं।

राज्यसभा में रविवार के दिन, जिस तरह से आनन-फानन में उपसभापति हरिवंश जी द्वारा हंगामे के बावजूद बिना मतविभाजन के यह कानून पास घोषित कर दिया गया, उससे सर्वोच्च न्यायालय के कथन और दृष्टिकोण की ही पुष्टि होती है।

इस तरह के वीडियो सोशल मीडिया और परंपरागत मीडिया पर बहुत दिखते हैं जिनमें पत्रकार किसान नेताओं से पूछते हैं कि

● सरकार जब बिल वापस लेने से इनकार कर रही है तो, वे बार-बार सरकार से बात क्या करने जा रहे हैं ?

● सरकार जब संशोधन करने को राजी है तो किसान संगठन क्यों सहमत नहीं हैं ?

● कब तक यह धरना प्रदर्शन चलता रहेगा।

पर आज तक किसी पत्रकार ने, चाहे वह सरकार समर्थक पत्रकार हों या सरकार विरोधी, की इतनी हिम्मत नहीं हुई कि, वह सरकार से, ( प्रधानमंत्री तो खैर प्रेस वार्ता का साहस 6 साल से नहीं जुटा पाए हैं ), पर कृषि मंत्री या उद्योग मंत्री से ही, जो सरकारी वार्ताकार हैं, से यह पूछ लें कि,

● जब किसान कानून वापस लेने पर और सरकार कानून वापस न लेने पर अड़ी है तो फिर सरकार के पास इस समस्या के समाधान का और क्या उपाय हैं?

● सरकार, जिन संशोधनों की बात कर रही है, वे संशोधन किस किस धाराओं में हैं और उन संशोधनों से किसानों को क्या लाभ होगा ?

● सरकार समर्थक किसानों ने भी अपनी कुछ मांगें रखी हैं, तो वे कौन सी मांगे हैं?

● क्या सरकार वे मांगें, जो सरकार समर्थक किसान संगठनों ने रखी हैं, को सरकार मानने जा रही है ?

कम से कम जनता को यह तो पता चले कि गतिरोध कहाँ है।

सरकार जो संशोधन सुझा रही है उन्हें वह एक प्रेस वक्तव्य के द्वारा कम से कम सार्वजनिक तो करे और सरकार समर्थक किसानों की ही मांगों को स्वीकार करने की कार्यवाही करे।

This is a type of policy disability

अब तक 9 दौर की, यदि गृहमंत्री के साथ हुई वार्ता को भी इसमें जोड़ लें तो, सरकार किसान वार्ता हो चुकी है और अब 15 जनवरी की तारीख निर्धारित है। सरकार के जो मंत्री वार्ता में आते हैं वे तब तक इन किसान संगठनों और सरकार समर्थक किसान संगठनों की भी मांगों पर कोई विचार करने वाले नहीं हैं और न ही वे कोई स्पष्ट वादा करने वाले हैं। इसका कारण है वे उतने सशक्त नहीं हैं कि प्रधानमंत्री की स्थापित गिरोही पूंजीपति केंद्रित नीति को बदल दें। जब तक प्रधानमंत्री की तरफ से कोई स्पष्ट आदेश या निर्देश नहीं मिलता है, यह तमाशा चलता रहेगा।

यह एक प्रकार की नीतिगत विकलांगता की स्थिति है। आज के संचार और परिवहन क्रांति के युग में किसी भी जन आंदोलन को न तो अलग-थलग किया जा सकता है और न ही उसे थका कर कुंठित किया जा सकता है।

पहले से ही संकट में है सरकार की विश्वसनीयता

अभी हरियाणा में करनाल में मुख्यमंत्री हरियाणा को आना था और वहां उनका विरोध हुआ, पुलिस ने आंसू गैस, वाटर कैनन और लाठी चार्ज किया और यह सब गोदी मीडिया भले ही सेंसर कर दे, पर हम सबके हाथों में पड़े मोबाइल की स्क्रीन पर जो कुछ करनाल में हुआ है, वह लाइव दिख रहा है।

बल प्रयोग कितना भी औचित्यपूर्ण हो, उसकी सदैव विपरीत प्रतिक्रिया होती है, फिर यह विरोध प्रदर्शन तो एक व्यापक जन आंदोलन का ही एक भाग है। भाजपा औऱ संघ के लोगों ने एक तो पहले ही इस आंदोलन को खालिस्तानी, विभाजनकारी आदि शब्दों से नवाज़ कर जनता और किसानों के प्रति अपनी शत्रुता पूर्ण मनोवृत्ति उजागर कर दी है, दूसरी ओर सरकार के वादाखिलाफी, झूठ बोलने, और जुमलेबाजी के इतिहास को देखते हुए सरकार की विश्वसनीयता पहले से ही संकट में है।

सरकार को चाहिए कि, खेती सेक्टर में कॉरपोरेट के प्रवेश को नियंत्रित रखा जाय, सरकार उनकी सर्वग्रासी मनोवृत्ति पर अंकुश लगाए, असीमित भंडारण, जमाखोरी पर रोक लगाए, एमएसपी से कम कीमत पर फसल बेचने को दंडनीय अपराध बनाये, किसानों के साथ कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग में कोई धोखा न हो इसके लिए सक्षम कानून बनाये और सरकार किसान की तरफ न केवल खड़ा नज़र आये बल्कि खड़ा हो भी।

कृषि कानून पर किसानों से होने वाली बातचीत में, सरकार ने कहा कि किसान सर्वोच्च न्यायालय जायं। इससे गैरजिम्मेदाराना वक्तव्य नहीं हो सकता है।

कुछ दिन पहले सरकार ने कहा कि कानून वापस लेना सम्भव नहीं है पर कुछ संशोधन किए जा सकते हैं। इन संशोधनों पर सरकार ने कोई लिखित प्रस्ताव रखा या नहीं यह तो नहीं पता पर यह संकेत मीडिया से मिला कि सरकार,

● निजी मंडियों पर टैक्स लगा सकती है।

● निजी खरीददारी करने वाले लोगों के लिए रजिस्ट्रेशन का प्राविधान कर सकती है।

● कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग में एसडीएम के बजाए सिविल अदालत का विकल्प दे सकती है।

● जमाखोरी तब तक कानूनन वैध रहेगी जब तक कीमतें दुगुनी न हो जायं। जब कीमतें दुगुनी पहुंच जाय तब सरकार महंगाई पर सचेत होगी और कोई कार्यवाही करेगी।

● असीमित, अनियंत्रित और अनैतिक जमाखोरी जमाखोरों का वैध कानून बना रहेगा।

भारतीय संविधान में कृषि राज्य सूची में दर्ज है तो केन्द्र  सरकार ने उसपर क़ानून कैसे बना दिया ?

यह तो राज्य सरकारों का अधिकार क्षेत्र है । क्या यह एक  असंवैधानिक कानून है ? दरअसल, यह कानून बना तो, संविधान के दायरे में ही है, लेकिन यह कानून ट्रेड एंड कॉमर्स जिंसमें संघीय सरकार क़ानून बना सकती है, बनाया गया है । लेकिन इस संवैधनिकता पर सर्वोच्च न्यायालय बाद में विस्तार से चर्चा करेगी।

सरकार ने हाल में जितने भी कानून बनाये हैं लगभग सभी में कमियां हैं और अधिकतर बनाये कानून संसदीय समिति से परीक्षण कराये बिना बनाये गए हैं। यह सरकार के कानून बनाने की जिम्मेदारी की अक्षमता है।

सरकार इन तीनों कानूनों को रद्द करे और कृषि सुधार के लिए एक एक्सपर्ट कमेटी जिसमें किसान संगठन के भी कुछ प्रतिनिधि रहें, के साथ विचार विमर्श कर के तब यदि ज़रूरत हो तो क़ानून लाये या इसे राज्यों पर छोड़ दे। वैसे भी यह कानून ट्रेड एंड कॉमर्स विषय के अंतर्गत लाये गए हैं, और कॉरपोरेट का भला करने की नीयत से बने हैं।

विजय शंकर सिंह

विजय शंकर सिंह (Vijay Shanker Singh) लेखक अवकाशप्राप्त आईपीएस अफसर हैं
विजय शंकर सिंह (Vijay Shanker Singh) लेखक अवकाशप्राप्त आईपीएस अफसर हैं

नवउदारवादी/वित्त पूंजीवादी व्यवस्था के घोड़े की गर्दन पर किसानों की गिरफ्त!

Farmers Protest

Peasants’ neo-liberal / finance capitalist gripped on horse neck!

प्रत्येक व्यवस्था की अपनी अन्तर्निहित गतिकी (डाइनामिक्स) होती है, जिसके सहारे वह अपना बचाव और मजबूती करते हुए आगे बढ़ती है। भारत में निजीकरण-निगमीकरण (Privatization-corporatisation in india) के ज़रिये आगे बढ़ने वाली नवउदारवादी/ वित्त पूंजीवादी व्यवस्था, जिसे व-साम्राज्यवाद की परिघटना (The phenomenon of neo-imperialism) से जोड़ा जाता है, भी इसका अपवाद नहीं है। देश की स्वतंत्रता के बाद शुरू हुई संवैधानिक व्यवस्था, जैसी भी भली-बुरी वह थी, के बरक्स 1991 के बाद से देश की नीतियों के केंद्र में नवउदारवादी/वित्त पूंजीवादी व्यवस्था रही है।

पिछले तीन दशकों के दौरान अधिकांश ‘राष्ट्रीय’ उद्यम उत्तरोत्तर इसी व्यवस्था की मजबूती की दिशा में उन्मुख रहा है। शुरुआत के 10 से 15 साल नवउदारवादी/वित्त पूंजीवादी विचारधारा के दबदबे के बावजूद उसका एक सशक्त विपक्ष मौजूद था। बल्कि, दरपेश नवसाम्राज्यवादी गुलामी के खतरे के बरक्स वैकल्पिक राजनीति के विचार और उसके मुताबिक राजनीतिक संगठन की जरूरत भी शिद्दत रेखांकित की गई थी। इसके साथ वैकल्पिक राजनीति के विचार की  रचना और राजनीतिक संगठन के निर्माण के प्रयास भी किए गए थे। लेकिन वैश्विक परिस्थितियों/कारकों सहित नवउदारवादी/वित्त पूंजीवादी विचारधारा/व्यवस्था के प्रछन्न समर्थकों के देश में बड़ी संख्या में मौजूद प्रकट समर्थकों के साथ मिल जाने के चलते वह विपक्ष/विकल्प धराशायी हो गया। इंडिया अगेन्सट करप्शन (आईएसी) के तत्वावधान में आयोजित ‘भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन’ में प्रकट और प्रछन्न समर्थकों का यह एका अपने प्रखरतम रूप में सामने आया था।

हर पाँसा नवउदारवादी/वित्त पूंजीवादी व्यवस्था के पक्ष में जाकर क्यों पड़ता है

पिछले 15-20 साल मुख्यधारा राजनीति और बौद्धिक विमर्श में इस व्यवस्था का सच्चा और टिकाऊ विपक्ष/विकल्प नहीं रहने की स्थिति में नवउदारवादी/वित्त पूंजीवादी व्यवस्था की अपनी स्वतंत्र गतिकी विकसित हो चुकी है। नतीजतन, हर पाँसा नवउदारवादी/वित्त पूंजीवादी व्यवस्था के पक्ष में जाकर पड़ता है। जो मुट्ठी-भर राजनीतिक संगठन और व्यक्ति इस व्यवस्था का वास्तविक  विरोध करते हैं, वे हाशिये पर रहते हैं।

पूंजीवादी अश्वमेध का बेलगाम घोड़ा राष्ट्रीय संसाधनों/संपत्तियों/श्रम को लूटता हुआ, सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों/संस्थानों को अपने मुनाफे की झोली में समेटता हुआ सरपट दौड़ रहा है। उसके पीछे घिसटती संवैधानिक लोकतांत्रिक संस्थाएं न केवल अपनी ताकत खोती जा रही हैं, उनका रूप भी विकृत होता जा रहा है।

कोई भी प्रतिरोध पूंजीवाद के बेलगाम घोड़े की गर्दन पर हाथ नहीं डाल पाया है। यह परिघटना केवल ज्यादातर आबादी की आर्थिक बदहाली और एक छोटे हिस्से की मालामाली तक सीमित नहीं है। प्राय: समस्त आयामों में हमारा राष्ट्रीय जीवन राष्ट्रीय नेतृत्व के तहत पाखंडी, झूठा, कुतर्की, अंधविश्वासी और कलही होता जा रहा है।

यह दोहराने की जरूरत नहीं है कि नवउदारवादी/वित्त पूंजीवादी व्यवस्था देश की स्वतंत्रता के साथ हासिल की गई संवैधानिक संप्रभुता और, आजकल बुरी तरह बदनाम, संवैधानिक समाजवाद का प्रतिलोम है। शासक-वर्ग यह जानता है। वह स्वतंत्रता एवं संविधान के मूल्यों के साथ की जाने वाली खुली दगाबाजी को ढंकने के लिए शाइनिंग इंडिया’, ‘सबका विकास’, ‘अच्छे दिन’ ‘नया भारत’ ‘विश्वगुरु भारत’ जैसे जुमले उछालता है, और उग्र राष्ट्रवादी फुफकारें मारता है। निस्संदेह, इस सबसे अपने को अलग और ऊपर मानने वालों की देश में एक सशक्त जमात है। लेकिन परिस्थितियों की वास्तविकता की कसौटी पर इस प्रबुद्ध जमात की प्रामाणिकता/ईमानदारी संदिग्ध है। कह सकते हैं कि उसकी संदिग्धता के चलते ही देश की यह दशा बनी है।

The peasants have put their hands tightly on the neck of the horse of capitalism.

इस पृष्ठभूमि में तीन नए कृषि कानूनों के खिलाफ पिछले 6 महीनों से जारी किसान आंदोलन को देखें तो प्रतीत होता है कि किसानों ने पूंजीवाद के दुर्निवार घोड़े की गर्दन पर कस कर हाथ डाल दिया है। आंदोलन में निजीकरण-निगमीकरण के विरोध में वैचारिक स्पष्टता, और अपनी मांग के प्रति दृढ़ता है। इसका प्रमाण किसी भी किसान संगठन के नेता अथवा आंदोलन में शामिल किसानों/खेत-मजदूरों के वक्तव्यों, और सरकार के साथ होने वाली कई दौर की वार्ताओं से जग-जाहिर है।

आंदोलन का स्वरूप लोकतांत्रिक है, जिसमें अलग-अलग विचारधारात्मक अथवा राजनीतिक प्रतिबद्धता वाले किसान संगठनों की समवेत भागीदारी है। वे सब कृषि कानूनों को रद्द कराने के संकल्प के साथ संयुक्त किसान मोर्चा में शामिल हैं। हद दर्जे की प्रतिकूल परिस्थितियों और माहौल के बावजूद आंदोलनकारियों का संयम, अनुशासन और शालीनता भरोसा पैदा करते हैं कि भारत की सबसे बड़ी आबादी ने आधुनिक सभ्यता से प्राय: बहिष्कृत रहने के बावजूद अपना विवेक नहीं खोया है।

कृषि कानूनों के खिलाफ आंदोलन का बीड़ा भले ही मुख्यत: पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और कुछ हद तक राजस्थान के किसानों की तरफ से उठाया गया हो, उसका चरित्र अखिल भारतीय बन गया है।

दिल्ली की सीमाओं पर पिछले 45 से ज्यादा दिनों से, कोरोना महामारी के भयावह साये में दिन-रात कड़ी ठंड का मुकाबला करते हुए, किसान परिवारों की महिलाएं और बच्चे भी बड़ी संख्या में आंदोलन में हिस्सेदारी कर रहे हैं। आंदोलन को प्रशासन, व्यापार, खेल, कला आदि से जुड़े नागरिकों सहित राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय समर्थन और सहयोग मिला है। ज्यादातर लोगों की भागीदारी और समर्थन स्वत:स्फूर्त है। यह तभी संभव हुआ है जब विभिन्न किसान यूनियन के नेताओं ने समुचित समझदारी और एका बना कर आंदोलन को मजबूत और टिकाऊ बनाए रखा है। 

Punjab has set an example.

पंजाब ने सचमुच मिसाल कायम की है। आंदोलन ने पंजाब के बारे में प्रचलित सभी रूढ़िबद्ध धारणाएं – नशे की लत में डूबे पंजाब से लेकर अलगाववादी पंजाब तक – तोड़ दी हैं। गांव-गांव, घर-घर से बच्चे, जवान, बुजुर्ग आंदोलन में अपनी पारी देने के लिए ट्रैक्टरों, टेम्पुओं, बसों, कारों, तिपहिया-दोपहिया वाहनों में दिल्ली की सीमा पर आ-जा रहे हैं। रास्ते में अथवा धरना-स्थल पर कोई हंगामा या ड्रामा किए बगैर।

तीन जनवरी को मैं चंडीगढ़ से दिल्ली आने वाली सड़क पर सफर कर रहा था। एक छोटे टेम्पु में परिवार के साथ तीन बच्चे – करीब 8 और 11 साल के दो लड़के और करीब 14 साल की एक लड़की – धरने में शामिल होने के लिए दिल्ली आ रहे थे। बच्चों की सुरक्षा के लिए टेम्पु के पिछले हिस्से में मजबूती से रस्सियां बांधी गई थीं। रस्सियों के जाल के पीछे बैठे वे देहाती बच्चे अपनी खेती को कारपोरेटीकरण से मुक्त कराने दिल्ली जा रहे थे!

किसान आंदोलन से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती, नहीं की जानी चाहिए कि वह कृषि क्षेत्र के बाहर निजीकरण-निगमीकरण के खिलाफ झण्डा बुलंद करे। कृषि क्षेत्र अपने में अन्य सभी क्षेत्रों से बड़ा है। कारपोरेट घराने उसमें अकूत मुनाफे की संभावना से बेखबर नहीं हैं। इसीलिए उदारीकरण की शुरुआत से कृषि क्षेत्र पर उनकी नजर गड़ी है।

उदारीकरण के पहले चरण में कई लाख किसानों ने आत्महत्या की थी। भारत का शासक-वर्ग इतने बड़े पैमाने पर होने वाली आत्महत्याओं से जरा भी विचलित नहीं हुआ था। नए कृषि कानूनों के चलते किसान आत्महत्याओं का एक और दौर आ सकता है। शासक-वर्ग को उसकी भी परवाह नहीं होगी। मौजूद आंदोलन के दौरान धरना स्थलों पर चार किसान आत्महत्या कर चुके हैं।

इस आंदोलन के चलते यह आशा करनी चाहिए कि उसके समर्थन में आने वाले विभिन्न क्षेत्रों के नागरिक नैतिक समर्थन से आगे बढ़ कर करपोरेटपरस्त नीतियों के निहितार्थों को समझने की दिशा में आगे बढ़ेंगे।

अंबानी-अदानी के कुछ उत्पादों का बहिष्कार रणनीतिक दृष्टि से सही हो सकता है, परंतु इसे बाजारवादी-उपभोक्तावादी अपसंस्कृती के बहिष्कार से जोड़ने पर आंदोलन की चेतना का प्रसार होगा। बेहतर होगा कि आंदोलन के समर्थक जनांदोलनकारी और नागरिक समाज ऐक्टिविस्ट आंदोलन को किसानों का ही रहने दें; और उसे फासीवाद-ब्राह्मणवाद ताथा संघवाद से मुक्ति का मंच बनाने का आह्वान न करें।

किसानों को ही सुप्रीम कोर्ट सहित सभी पक्षों को यह समझाने देना चाहिए कि ये कानून संविधान सम्मत संघीय ढांचे के ही खिलाफ नहीं हैं, संविधान की मूल संकल्पना के ही खिलाफ हैं। समझदारी से ही बात आगे बढ़ेगी। बहस आंदोलन से जुड़े विषय पर केंद्रित रहेगी तो ज्यादा से ज्यादा नागरिकों का समर्थन बढ़ेगा। आंदोलन को लेकर सरकार और कारपोरेट की नीति/रणनीति का मुकाबला भी किसानों को ही करने देना चाहिए।  

पंजाब के किसानों ने शुरू में ही यह स्पष्ट कर दिया था कि वे लंबे संघर्ष की तैयारी के साथ दिल्ली आए हैं; और शांतिपूर्ण आंदोलन के लिए प्रतिबद्ध हैं। आइए इसे समझते हैं।

किसान  सरकार के साथ बातचीत भी चला रहे हैं और सरकार पर दबाव बनाने के लिए संघर्ष के विविध कार्यक्रम भी आयोजित कर रहे हैं।

7 जनवरी को किसानों ने गणतंत्र दिवस पर दिल्ली के अंदर ट्रैक्टर परेड निकालने की रिहर्सल की। संघर्ष लंबा चलना है तो और भी कार्यक्रम उनकी सूची में होंगे। किसान नेता राकेश टिकैत ने कहा है कि आंदोलन मई 2024 तक चलेगा। जाहिर है, इस वक्तव्य के राजनीतिक निहितार्थ हैं।

मैंने किसान आंदोलन पर अपनी पिछली टिप्पणी में एक सुझाव दिया था कि आंदोलनकारियों को सरकार के साथ विपक्ष पर भी दबाव बनाना चाहिए : विपक्षी पार्टियां/नेता वचन दें कि सत्ता में होने पर वे कृषि क्षेत्र का कारपोरेटीकरण नहीं करेंगे। ऐसा होने पर वर्तमान सरकार दबाव में आएगी, और विपक्ष सत्ता-स्वार्थ के लिए आंदोलन का इस्तेमाल नहीं कर पाएगा। तब निश्चित ही निजीकरण-निगमीकरण की स्वतंत्र गतिकी में अवरोध पैदा होगा। संघर्ष के नए मोर्चे और रास्ते खुलेंगे। 

प्रेम सिंह

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में हिंदी के शिक्षक हैं)  

जस्टिस काटजू का जी क्यों चाहता है कि या तो वो अपना सर फोड़ लें, या उन लोगों का

Justice Markandey Katju

Why does Justice Markandey Katju want to break his head or …

उर्दू तलफ़्फ़ुज़ ( उच्चारण या प्रोनन्सिएशन )

–  जस्टिस मार्कंडेय काटजू

जी चाहता है कि या मैं अपना सर फोड़ लूँ, या उन लोगों का जो ज़िन्दगी को जिंदगी, ज़बरदस्त को जबरदस्त, ज़मानत को  जमानत, ज़रा को जरा, ख़बर को खबर, ग़ालिब को गालिब, ग़म को गम, ग़ज़ल को गजल, ग़रीब को गरीब, आज़ादी को आजादी, ज़िला को जिला, ज़रुरत को जरूरत, ख़ास को खास,  शायरी को सायरी, क़रीब को करीब, क़ातिल को कातिल, मज़ा को मजा, फ़िराक़ को प्हिराक, और फ़ुर्सत को प्हुरसत कहते हैं।

मैंने मेरे पत्रकार मित्र अजित अंजुम को उसके वीडियो शो पर खबर को  ‘ख़बर’  बोलने के लिए कहा, पर कई बार प्रयत्न करने के बावजूद वे ऐसा नहीं कर पाए, और उन्होंने इसकी वजह उनका बिहारी होना बताया।