बेरोज़गार भूखी जनता के लिए रोज़ नए दुश्मन पैदा किये जा रहे हैं

पलाश विश्वास जन्म 18 मई 1958 एम ए अंग्रेजी साहित्य, डीएसबी कालेज नैनीताल, कुमाऊं विश्वविद्यालय दैनिक आवाज, प्रभात खबर, अमर उजाला, जागरण के बाद जनसत्ता में 1991 से 2016 तक सम्पादकीय में सेवारत रहने के उपरांत रिटायर होकर उत्तराखण्ड के उधमसिंह नगर में अपने गांव में बस गए और फिलहाल मासिक साहित्यिक पत्रिका प्रेरणा अंशु के कार्यकारी संपादक। उपन्यास अमेरिका से सावधान कहानी संग्रह- अंडे सेंते लोग, ईश्वर की गलती। सम्पादन- अनसुनी आवाज - मास्टर प्रताप सिंह चाहे तो परिचय में यह भी जोड़ सकते हैं- फीचर फिल्मों वसीयत और इमेजिनरी लाइन के लिए संवाद लेखन मणिपुर डायरी और लालगढ़ डायरी हिन्दी के अलावा अंग्रेजी औऱ बंगला में भी नियमित लेखन अंग्रेजी में विश्वभर के अखबारों में लेख प्रकाशित। 2003 से तीनों भाषाओं में ब्लॉग

Everyday new enemies are being created for the unemployed hungry masses.

हम भारत में अंध राष्ट्रवाद का रोना रोते हैं। यकीन मानिए, अमेरिकियों के अमेरिकावाद (Americanism of Americans) ने दुनियाभर में तबाही मचाई है और कोरोना ने बाजी पलट दी है।

यही युद्धक अमेरिकीवाद पलटवार करने वाले हथियार की तरह अमेरिका का ही विध्वंस कर रहा है।

हमारे पश्चिम का यह नेशन और नेशनलिज्म नहीं था कहीं। हमारा तो देश था। रवीन्द्र नाथ ने पश्चिम के इस नेशनालिज़्म और नेशन का पुरजोर विरोध किया था, जिसमे प्रेम भाईचारा संस्कृति मातृभाषा परम्परा विविधता वहुलता और लोकतंत्र की कोई जगह नहीं होती। ज्ञान विज्ञान की भी नहीं।

टॉलस्टाय, रवींद्र, गांधी और आइंस्टीन इस उग्र नेशन और नेशनालिज़्म के खिलाफ थे, जो अपनी ही ही जनता का धर्म, जाति, नस्ल, वर्ग, क्षेत्र के हिसाब से सफाया कर दें।

गांधी इसीलिए केंद्र की मजबूत सत्ता और शहरिकरण के बजाय ग्राम स्वराज की बात करते थे।

न्यूयार्क से डॉ पार्थ बनर्जी के ताजा अपडेट में यही लिखा हैं कि गरीबों और मेहनतकशों के नस्ली नरसंहार में भारत और अमेरिका ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया बजरंगियों के हवाले है।

पूंजीवाद, मुक्तबाजार की साम्राज्यवादी विश्व व्यवस्था को बचाएगी यह बजरंगी पैदल सेना, जो अंधी है।

दुनिया भर में अमेरिका में खासकर टीवी पर भारत की तरह चीखकर एंकर जनता को उत्तेजित करने के लिए नस्ली ध्रुवीकरण के मकसद से हिंसा और घृणा फैलाने के लिए मनगढ़ंत सनसनीखेज खबरें, शोध, पैनल वगैरह के जरिये नरसंहार को जायज ठहराने और इसे राष्ट्र हित में बताने का काम कर रहे हैं।

अखबारों की चीखती सुर्खियां भी लोगों को बजरंगी बना रही है।

कोरोना संक्रमण और मृत्यु के लिए भारत और अमेरिका में भी न सही जानकारी है और न लोगों को बचाने की कोशिश है। बेरोज़गार भूखी जनता के लिए रोज़ नए दुश्मन पैदा किये जा रहे हैं।

यह द एरा आफ़ पोस्ट रीज़न है यानी तर्क विज्ञान यथार्थ मनुष्यता और लोकतंत्र खत्म।

पलाश विश्वास

प्रवासी मजदूरों के खिलाफ मोदी सरकार का युद्ध : असंवेदनशीलता को कृपा मनवाने का अहंकार

PM Modi Speech On Coronavirus

हरेक आपदा कोई न कोई सबक जरूर देती है। कोविड-19 महामारी का एक बड़ा सबक (A big lesson of the COVID-19 epidemic) यह भी है कि मजदूरों और खासतौर पर शहरों के प्रवासी मजदूरों के प्रति मोदी सरकार की संवेदनहीनता (Modi government’s insensitivity towards migrant laborers) का मुकाबला सिर्फ और सिर्फ एक चीज कर सकती है। और यह है इस सरकार का इसका गुमान कि वह कोई भी झूठ, कितना भी बड़ा झूठ, जनता से सच मनवा सकती है। इसलिए, आफत सिर्फ यही नहीं है कि यह सरकार स्वभावत: मजदूर-विरोधी और वास्तव में मेहनतकश खेतिहरों समेत सभी मेहनतकशों की शत्रु है। कोढ़ में खाज यह कि उसे इसका पक्का यकीन है कि वह, जाहिर है कि सभी संवैधानिक संस्थाओं से लेकर, मीडिया तथा हर तरह की सरकारी-निजी संस्थाओं तक के ऊपर अपने अभूतपूर्व नियंत्रण के बल पर और अपने अतुलनीय आर्थिक व सांगठनिक संसाधनों के बल पर, बहुसंख्यक जनता से कुछ भी मनवा सकती है। यानी उसके मजदूरविरोधी स्वभाव पर चुनाव आधारित व्यवस्था समेत, किसी भी संस्था का कोई अंकुश कम से कम फिलहाल तो नहीं ही है।

प्रवासी मजदूरों की ‘‘घर वापसी’’ के लिए ‘श्रमिक ट्रेनों’ के प्रसंग में देखने को मिला इस सरकार का रुख, इसी का जीता-जागता उदाहरण है।

देशव्यापी लॉकडॉउन के पहले विस्तार के आखिर तक आते-आते, जब यह साफ हो गया कि 40 दिन के ‘‘लॉकडॉउन’’ से कोरोना संक्रमण रुकना तो दूर, उसका जोर थमने तक नहीं जा रहा था और कुछ ढीलों के साथ लॉकडॉउन को और आगे बढ़ाना जरूरी होगा, तब मोदी सरकार को किसी भी तरह से अपने गांव/घर जाने के लिए छटपटा रहे, प्रवासी मजदूरों का ध्यान आया।

लॉकडॉउन की शुरूआत से लेकर, उसके पहले विस्तार तक का अनुभव बता रहा था कि लॉकडॉउन के और विस्तार में, इन मजदूरों को अपने घरों से दूर रोककर रखना बहुत मुश्किल होगा।

लॉकडॉउन के पांच हफ्ते से ज्यादा के दौरान लगातार इसकी हैरान करने वाली और कई बार दिल-दहला देने वाली खबरें मीडिया की सारी मुश्कें कसे जाने के बावजूद आती रही थीं कि देश भर में दसियों हजार की संख्या में प्रवासी मजदूर, अपनी सारी गृहस्थी सिर पर उठाए, अपने घरों के लिए सैकड़ों किलोमीटर के सफर पर, अक्सर पैदल ही और खुशनसीब हुए तो साइकिल, साइकिल ठेल वगैरह से ही या फिर टैंकरों, ट्रकों यहां तक कि मिक्सरों तक में छिप-छिपाकर, निकल पड़े थे।

इनमें कामयाबी के साथ घर पहुंच जाने वालों की खबरें उतनी नहीं थीं, जितनी पुलिस द्वारा पकड़कर बीच रास्ते में क्वारेंटीन के नाम पर सुविधाहीन अनौपचारिक जेलों में डाले जाने वालों की और कई मामलों में तो भूख, प्यास, थकान से रास्ते में ही मर-खप जाने वालों की थी।

फिर भी यह सिलसिला लगातार जारी रहा था और लगभग सभी महानगरों से ही नहीं मामूली शहरों से भी पलायन जारी था, क्योंकि मजदूरों का कहना था कि ‘जब मरना ही है तो परदेस में काम के बिना भूखे-प्यासे मरने से अच्छा है, अपने घर जाकर मरें’ और यह भी कि ‘कोरोना तो बाद में मारेगा, लॉकडॉउन में भूख से पहले ही मर जाएंगे।’ फिर भी, दिल्ली में बैठकर इस विशाल महादेश के लिए सख्त फैसले लेने का गरूर पालने वाले शायद इस सब को तो अनदेखा करते भी रहते पर, मुंबई में बांद्रा से लेकर, सूरत तक में बड़ी संख्या में प्रवासी मजदूरों के ‘‘घर जाने’’ की एकमात्र मांग के साथ सडक़ों पर उतरने ने, इस मांग को और अनदेखा करना मुश्किल कर दिया था।

इसके अलावा, लॉकडॉउन की सारी सख्तियों के बावजूद और सारे ताली-थाली बजाने तथा दीया-मोमबत्ती जलाने के बावजूद, कोरोना की आफत का अभी लंबा चलना तय दिखाई देने से, कोचिंग उद्योग के केंद्र राजस्थान के कोटा शहर में फंसे लाखों मध्यवर्गीय व संपन्नतर परिवारों के बच्चों से लेकर, दूसरे देशों में फंसे भारतीयों तक को ‘‘घर लाने’’ की मांग जोर पकड़ रही थी, जिसे सुनना उसी तरह मौजूदा शासकों के स्वभाव का हिस्सा था, जैसे करोड़ों प्रवासी मजदूरों की उसी मांग को नहीं सुनना।

आप पहले क्रोनोलॉजी लीजिए।

पहले, केंद्र सरकार की मूक सहमति से और जाहिर है कि राजस्थान सरकार के कोंचने से, सैकड़ों की संख्या में बसों से, कोटा में फंसे बच्चों को उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, दिल्ली, असम व अन्य पूर्वोत्तर राज्यों आदि-आदि द्वारा बसों से निकाला जाता है। उसके बाद, प्रवासी मजदूरों के लिए भी ऐसा ही किए जाने की सुनगुन शुरू होती है। और लॉकडॉउन के ताजातरीन विस्तार की घोषणा की पूर्व-संध्या में बाकायदा इसका एलान कर दिया जाता है कि लॉकडॉउन के चलते दूसरे राज्यों में फंसे मजदूरों, तीर्थयात्रियों तथा पर्यटकों आदि को निकाला जाएगा।

चूंकि इस बार मामला मजदूरों का था जिनकी संख्या लाखों में होने वाली थी, रेलवे द्वारा श्रमिक ट्रेनों के नाम से विशेष ट्रेनें चलाने का भी एलान किया गया।

बहरहाल, जैसाकि मोदी राज के मजदूरविरोधी स्वभाव का तकाजा था, जिसमें कोरोना के खिलाफ ‘‘युद्ध’’ के सारे एलानों के बावजूद, रत्तीभर फर्क नहीं पड़ा है, रेलवे और उसका संचालन करने वाली केंद्र सरकार, दोनों ही शुरू से इस संबंध में बिल्कुल स्पष्ट थे कि इन मजदूरों को, इस सफर का पूरा पैसा देना होगा।

1 मई को जारी रेलवे की विज्ञप्ति में यह स्पष्ट भी किया गया था कि यह किराया इस प्रकार होगा–मेल/एक्सप्रैस का स्लीपर का किराया+ 30 रु0 सुपर फास्ट चार्ज+ 20 रु0 अतिरिक्त शुल्क।

यानी हरेक यात्री से पूरे 50 रु0 अतिरिक्त वसूल किए जाने थे। इसके साथ ही 1 तथा 2 मई के अपने दिशा-निर्देशों में रेलवे ने यह भी स्पष्ट कर दिया था कि वह स्टेशनों पर टिकट मुहैया नहीं कराएगी। इन विशेष ट्रेनों के पाइंट टू पाइंट टिकट, रेलवे राज्यों को ही मुहैया कराएगी और राज्य ही संबंधित यात्रियों से टिकट का पैसा जमा इकट्ठा करेंगे और रेलवे को देंगे।

ऐसा भी नहीं है कि रेलवे तथा उसे चलाने वाली सरकार तक इसकी बढ़ती आवाज पहुंची ही नहीं हो कि ये मजदूर, जो करीब चालीस दिनों से रोजी-रोटी के साधनों से कटे हुए थे, इस यात्रा के लिए पैसा कहां से लाएंगे?

इंडियन एक्सप्रैस की 3 मई की एक रिपोर्ट में (‘‘माइग्रेंट्स पे टु रिटर्न होम, स्टेट्स ऑस्क सेंटर टु फुट द ट्रेन फेयर बिल’’) रेलवे बोर्ड के चेयरमैन का इस आशय का बयान मौजूद है कि ‘सरकार ने सोच-समझ कर यह तय किया था कि इन ट्रेनों को मुफ्त में नहीं चलाया जाए, ताकि उन्हें ही ले जाया जाए जो वाकई जाने के इच्छुक थे।’

उनके शब्द थे :

‘‘यह सेवा प्रवासी मजदूरों, छात्रों आदि के लिए ही है और उन्हें पूरी स्क्रीनिंग के बाद ही यात्रा करने दिया जाएगा। ये ट्रेनों आम लोगों के लिए नहीं हैं। इसलिए, हम बस नाम-मात्र का किराया ले रहे हैं।’’

यह दूसरी बात है कि यह नाम मात्र का किराया, जैसा हमने पहले ही बताया, सामान्य किराए से 50 रु0 ज्यादा था!

प्रसंगवश यह भी बता दें कि इसी समय पर कर्नाटक की भाजपा सरकार ने, आंध्र प्रदेश जा रहे प्रवासी मजदूरों को बस से ले जाने के लिए, सामान्य चार गुना किराए की मांग की थी, जिसकी गणना यात्री के किराए के साथ बगल की खाली रखी जाने वाली सीट का किराया और वापसी पर दोनों सीटें खाली आने का किराया जोड़कर, की गयी थी। जब इसका ज्यादा शोर मचा तो इस मांग को आधा कर दिया गया और वापसी का किराया छोड़ दिया गया।

इसी तरह गुजरात में कुछ जगहों से तीन-तीन, चार-चार हजार रु. प्रति यात्री के हिसाब से निजी बसों से प्रवासी मजदूरों के राज्य से बाहर निकलने की खबरें आयी हैं।

Epidemic is an excuse to make the laborers bonded.

बहरहाल, इस किराए के बोझ को बहुत ज्यादा पाकर, कुछ प्रवासी मजदूरों के पैदल ही यात्रा करने का तय करने, कई जगहों पर बहुत से मजदूरों के इसी वजह से अपने राज्यों में जा रही ट्रेनों में नहीं चढ़ पाने तथा बहुतों के घर से पैसे मंगवाकर जैसे-तैसे टिकट का इंतजाम करने की बढ़ती खबरों की पृष्ठभूमि में, जब एक ओर कांग्रेस पार्टी ने खुद सभी जरूरतमंद मजदूरों की ट्रेन टिकट के पैसे खुद देने का एलान किया तथा आरजेडी ने बिहार में मजदूरों की 50 ट्रेनें लाने का पैसा देने का एलान दिया और दूसरी ओर महाराष्ट्र जैसी राज्य सरकारों ने केंद्र से यह भार उठाने की मांग की तथा खुद सुब्रमण्यम स्वामी जैसे भाजपा नेताओं ने इस पर सवाल उठाना शुरू कर दिया कि ‘पीएम केयर्स’ के नाम से जो कोष ऐसी ही आपदा में सहायता देने के नाम पर, सरकार के सारे साधन लगाकर जमा किया जा रहा है, उसमें से यह खर्चा क्यों नहीं किया जा सकता है; तो सत्ताधारी भाजपा और सरकार को ख्याल आया कि इससे तो उसके लिए अच्छा संदेश नहीं जाएगा और उसके सुप्रीमो की सूट-बूट की सरकार की छवि, लोगों को फिर याद आ जाएगी।

बस फिर क्या था, मोदी सरकार और भाजपा के प्रवक्ता, सारे सरकारी दिशा-निर्देशों, मजदूरों को दी गयी टिकटों, रेलवे द्वारा राज्यों से लिए गए पैसे तथा पैसा न होने के चलते बहुत से मजदूरों के ट्रेन में नहीं चढ़ पाने जैसी ठोस सचाइयों के बावजूद, यह साबित करने में जुट गए कि मोदी सरकार की रेलवे की ओर से तो मजदूरों की यह यात्रा मुफ्त ही थी। राज्यों से सिर्फ 15 फीसद किराया देने की अपेक्षा की जा रही थी और यह पैसा भी रेलवे इन मजदूरों को खाना और पानी आदि देने पर ही खर्च करने जा रही थी।

वास्तव में यह तक कहा गया कि रेलवे ने बड़ी उदारता से यह तय किया था कि ये यात्री जितना पानी मांगें, उन्हें दिया जाए; एक बोतल की कोई पाबंदी नहीं रखी जाए!

प्रवक्ताओं ने यह साबित करने में पूरा जोर लगा दिया कि सामान्य से 50 रु0 अतिरिक्त किराया, वास्तव में रेलवे द्वारा 85 फीसद माफी दिए जाने के बाद का नाम मात्र का किराया है! यानी बिना योजना के लॉकडॉउन थोपने के तानाशाहीपूर्ण फैसले के जरिए दाने-दाने को मोहताज कर दिए गए मजदूरों के प्रति घोर असंवेदनशीलता ही नहीं, उसे मोदी सरकार की अतिरिक्त उदारता साबित करने की बेशर्मी भी।

कोरोना से युद्ध के नाम पर प्रवासी मजदूरों के खिलाफ मोदी सरकार का युद्ध | Modi government’s war against migrant laborers in the name of war from Corona
Rajendra Sharma राजेंद्र शर्मा, लेखक वरिष्ठ पत्रकार व हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं। वह लोकलहर के संपादक हैं।
Rajendra Sharma राजेंद्र शर्मा, लेखक वरिष्ठ पत्रकार व हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं। वह लोकलहर के संपादक हैं।

और कोरोना से युद्ध के नाम पर खासतौर पर प्रवासी मजदूरों के खिलाफ मोदी सरकार के युद्ध का अंत इतने पर भी नहीं होने वाला है। प्रवासी मजदूरों को ट्रेनों से घर वापसी की उम्मीद बंधाने के बाद, अपने दिशा-निर्देशों के स्पष्टीकरण मुहैया कराने के नाम पर मोदी सरकार, इस वादे से भी पीछा छुड़ाने की कोशिश कर रही है। केंद्रीय गृह सचिव ने, 3 मई को राज्यों के मुख्य सचिवों को पत्र लिखकर, यह स्पष्ट किया कि ट्रेन, बस आदि से परिवहन की सुविधा सिर्फ ऐसे मुसीबत के मारों के लिए है, ‘जो लॉकडॉउन से पहले अपनी काम करने की जगहों से चलना शुरू कर, बीच में फंस गए थे।’ इस निर्देश का ठीक-ठीक क्या आशय है, इस पर तो नौकरशाह माथापच्ची करते रहेंगे, लेकिन यह स्पष्ट है कि मोदी सरकार चालीस दिन की लॉकडॉउन की कैद के बाद भी, प्रवासी मजदूरों को घर जाने देने के लिए तैयार नहीं है। इस बीच कर्नाटक सरकार ने राज्य से चलने वाली श्रमिक ट्रेनों को इस दलील से रद्द ही कर दिया बताते हैं कि राज्य में इन मजदूरों की जरूरत है! यह तब है जबकि सरकार, न इन मजदूरों की छूटी रोजी-रोटी की भरपाई करने के लिए कोई बोझ उठाने के लिए तैयार है और न इसी सचाई को समझने के लिए तैयार है कि इन गरीबों का शहरों में बिना सुविधाओं की तंग जगहों में कैद कर रखा जाना, कोरोना के संक्रमण को रोकने के लिहाज से भी, उन्हें उनके गांव-घर पहुंचाए जाने के मुकाबले कहीं ज्यादा नुकसानदेह है। लगता है कि महामारी तो बहाना है, मकसद मजदूरों को बंधुआ बनाना है।

0 राजेंद्र शर्मा

साझी विरासत जिसको हिन्दुत्ववादी टोली मटियामेट करने में लगी है

{Dr. Shamsul Islam, Political Science professor at Delhi University (retired).}

1857 स्वतंत्रता संग्राम की 163वीं सालगिरह पर : On the 163rd anniversary of the freedom struggle of 1857

10 मई 1857, दिन रविवार को छिड़े भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में देश के हिंदुओं, मुसलमानों और सिखों ने मिलकर विश्व की सबसे बड़ी साम्राज्यवादी ताक़त को चुनौती दी थी।[i]

इस अभूतपर्व एकता ने अंग्रेज़ शासकों को इस बात का अच्छी तरह अहसास करा दिया था कि अगर भारत पर राज करना है तो हर हालत में देश के सब से बड़े दो धार्मिक समुदायों; हिंदू-मुसलमान के बीच सांप्रदायिक बँटवारे को अमल में लाना होगा और देश के इन दो बड़े धार्मिक संप्रदायों के बीच दूरी पैदा कराने के लिए भरसक प्रयास करने होंगे। यही कारण था कि संग्राम की समाप्ति के बाद इंग्लैंड में बैठे भारतीय मामलों के मंत्री (लॉर्ड  वुड) ने भारत में अंग्रेज़ी राज के मुखिया (लॉर्ड एल्गिन) को यह निर्देश दिया कि अगर भारत पर राज करना है तो हिंदुओं और मुसलमानों को लड़वाना होगा और ‘‘हम लोगों को वैसा सब कुछ करना चाहिए, ताकि उन सब में एक साझी भावना का विकास ना हो।’’[ii]

इस दर्शन को अमल में लाने के लिए गोरे शासकों और उनके भारतीय चाटुकारों ने यह सिद्धांत पेश किया कि हिंदु और मुसलमान हमेशा से ही दो अलग क़ौमें रही हैं।

सच तो यह है कि सांप्रदायिक राजनीति को हवा देना और भारतीय समाज को धर्मों के आधार पर बाँटना अंग्रेज़ो की एक मजबूरी बन गया था। 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में, जिसको अंग्रेज़ शासको ने ‘फ़ौजी बग़ावत’ का नाम दिया था, हिंदुओं-मुसलमानों-सिखों के व्यापक हिस्से एकजुट होकर ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन के खि़लाफ इतनी बहादुरी से लड़े और कुर्बानियां दीं कि फ़िरंगी शासन विनाश के कगार पर पहुंच गया। हालाकि अंग्रेज़ जीत गए लेकिन यह गद्दारों और जासूसों द्वारा रचे गए षड़यंत्रों की वजह से ही संभव हो सका।

इस महान स्वतंत्रता संग्राम की यह सच्चाई किसी से छुपी नहीं हैं कि इसका नेतृत्व नानासाहब, दिल्ली के बहादुरशाह ज़फ़र, मौलवी अहमदशाह, तात्या टोपे, खा़न बहादुरखान, रानी लक्ष्मीबाई, हज़रत महल, अज़ीमुल्लाह खा़न और शहज़ादा फिरोज़शाह ने मिलकर किया।

इस संग्राम में मौलवी, पंडित, ग्रंथी, ज़मींदार, किसान, व्यापारी, वकील, नौकर, महिलाएं, छात्र और सभी जातियों-धर्मों के लोग भी शामिल हुए और जानों की कुर्बानियां दीं।

हिंदू-मुस्लिम सांप्रदायिकता के मौजूदा झंडाबरदारों को इस ऐतिहासिक सच्चाई से अवगत कराना ज़रूरी हैं कि, 11 मई, 1857 को जिस क्रांतिकारी सेना ने मुसलमान बहादुर शाह ज़फ़र को भारत का स्वतंत्र शासक घोषित किया था, उसमें 70 प्रतिशत से भी ज्यादा सैनिक हिंदू थे। बहादुरशाह ज़फ़र को बादशाह बनाने में नाना साहब, तात्या टोपे और लक्ष्मीबाई ने महत्तवपूर्ण भूमिका निभाई थी।

1857 के संग्राम से संबंधित समकालीन दस्तावेज़ देश के चप्पे-चप्पे पर घटी ऐसी दास्तानों से भरे पड़ें हैं, जहां मुसलमान, हिंदू और सिख इस बात की परवाह किए बिना, कि कौन नेतृत्व कर रहा है, और कितनी भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है, एक होकर लड़े और 1857 की जंगे-आज़ादी में एक साथ प्राणों की आहुति दी। उस समय की सच्चाईयां बहुत स्पष्ट रूप से यह बताती हैं कि हिंदू-मुसलमान पृथकतावाद और दोनों संप्रदायों के बीच विद्वेष का अस्तित्व उस समय एक समस्या के रूप में मौजूद नहीं था।

विभिन्न धर्मों के लोगों ने जिस तरह की साझी शहादत की दास्ताने रचीं उसके कुछ उदाहरण जो समकालीन दस्तावेज़ों में उपलब्ध हैं यहाँ पर प्रस्तुत हैं।

दिल्ली

फ़िरंगियों ने दिल्ली (जिसे 11 मई 1857 के दिन इंकलाबियों ने अंग्रेज़ी शासन से मुक्त कराके एक स्वतंत्र भारत की राजधानी घोषित किया था) पर कब्जे को अपनी नाक का सवाल बना लिया था। उनको लगता था कि अगर एक बार दिल्ली हाथ में आ गई तो पूरे देश में भड़के हुए संग्राम को दबाना मुश्किल नहीं होगा। 1857 में जून से लेकर सितम्बर माह तक अंग्रेज़ सेना ने दिल्ली की ज़र्बदस्त घेराबंदी की हुई थी और उनका लगातार यह प्रयास चला था कि दिल्ली में मौजूद इंकलाबी सेना और लोगों को धर्म के नाम पर बँटवाया जाए। लेकिन समकालीन दस्तावेज़ इस सच्चाई को रेखांकित करते हैं कि अंग्रेज़ो के खा़दिमों और जासूसों की तमाम कोशिशों के बावजूद हिंदू-मुसलमान-सिख मिलकर दिल्ली की हिफाज़त करते रहे। दिल्ली की इंक़लाबी सेना की कमान जिन लोगों के हाथों में थी उन लोगों के नाम थे मौहम्मद बख़्त, सिघारी लाल, ग़ौस मोहम्मद, सिरधारा सिंह और हीरा सिंह। इंकलाबी सेना जिसे फ़िरंगी ‘पुरबिया’ सेना कहते थे उसमें भी विशाल बहुमत हिंदुओं का ही था।

हिंदू-मुसलमान एकता किस उत्तम दर्जे की थी उसका अंदाजा उस घटना से लगाया जा सकता है जब अंग्रेज़ों के हमले का मुकाबला करने के लिए शाहजहां के जमाने की एक तोप को ठीक-ठाक करके मोर्चें पर लगाया जा रहा था। इस तोप को पहली बार चलाने से पहले बहादुरशाह ज़फ़र और दूसरे सैनिक अधिकारियों की मौजूदगी में पंडितों ने इसकी आरती उतारी, मालाएं चढ़ाई और आशीर्वाद दिया।[iii] अंग्रेज़ जासूस सांप्रदायिक ज़हर न फैला पाएं इसलिए इंकलाबी सेना ने दिल्ली में भी गौ-वध पर प्रतिबंध की घोषणा करते हुए यह एलान किया की जो भी ऐसा करते हुए पाया जाएगा उसे तोप से उड़ा दिया जायेगा।[iv]

हरियाणा

हांसी (अब हरियाण में) में अंग्रेज़ शासकों के खि़लाफ हुकुमचंद जैन[v] और मुनीर बेग[vi] का साझा महान प्रतिरोध इस सिलसिले का एक जीता जागता उदाहरण है। हुकुमचंद जैन, हांसी और कारनाल के कानूनगो, फ़ारसी और गणित के विद्वान और अपने क्षेत्र के एक बड़े जमींदार थे। 1857 के संग्राम की भनक मिलते ही वे दिल्ली दरबार पहुंचे, जहां तात्या टोपे भी मौजूद थे। उन्होंने अपने क्षेत्र में इंकलाब का बीड़ा उठाया और अपने करीबी साथी मिर्ज़ा मुनीर बेग के साथ, जो खुद भी फ़ारसी और गणित में पारंगत थे, मिलकर सशस्त्र विद्रोह की तैयारियां शुरू की।

इन दोनों ने मिलकर इंक़लाबी सेना के दिल्ली नेतृत्व के साथ मिलकर आज के हरियाणा क्षेत्र (उस दौर में भी यह क्षेत्र हरियाणा के नाम से ही जाना जाता था) को अंग्रेज़ो की दासता से मुक्त कराने की रणनीति बनाई। एक निर्णायक युद्ध में दिल्ली से सहायता न पहुंच पाने और कुछ अंग्रेज़ों के दलाल राजाओं की ग़द्दारी की वजह से इन्हें हार का सामना करना पड़ा ।

सितम्बर के अंत में इंकलाबियों के हाथ से दिल्ली निकल जाने के बाद इन दोनों को हांसी में गिरफ्तार किया गया और मौत की सज़ा सुनाई गई। अंग्रेज़ शासक इन दोनों से इतने खौफ़-ज़दा थे और हिंदू-मुसलमान एकता की इस शानदार मिसाल से इतने परेशान थे कि, उन्होंने 19 जनवरी 1858 को फांसी देने के बाद हुकुमचंद जैन को दफ़नाया जबकि मुनीर बेग को जलाया गया। अंग्रेज़ों द्वारा किए गए इस कुकर्म का एकमात्र उद्देश्य दो धर्मों के अनुयाइयों की एकता का मज़ाक उड़ाना और उन्हें ज़लील करना था।

फ़िरंगियों ने एक और शर्मनाक काम यह किया कि, बहादुर हुकुमचंद जैन के 13 वर्षीय भतीजे फ़कीरचंद जैन को भी हांसी में सार्वजनिक तौर पर फांसी दी क्योंकि इस बच्चे ने उन्हें फांसी देने का विरोध किया था।[vii]

अयोध्या

अयोध्या स्वतंत्र भारत में हिंदू-मुसलमानों के बीच में नफ़रत फैलाने का एक बड़ा मुद्दा बनकर उभरा है। बाबरी मस्जिद-रामजन्म भूमि विवाद ने दोनों संप्रदायों के बीच में अविश्वास और हिंसा के माहौल को निर्मित करने में महत्तवपूर्ण भूमिका निभाई है। लेकिन 1857 में इसी अयोध्या में किस तरह मौलवी और महंत व साधारण हिंदू-मुसलमान-सिख अंग्रेज़ी राज के खि़लाफ़ एक होकर लड़ते हुए फांसी के फंदों पर झूल गए इसकी अनगिनत दास्तानें हैं।

मौलाना अमीर अली[viii] अयोध्या के एक मशहूर मौलवी थे और जब वहां के प्रसिद्ध हनुमानगढ़ी मंदिर के पुजारी बाबा रामचरण दास[ix] ने अंग्रेज़ों के साथ एक युद्ध में दोनोंं को बंदी बनाया गया और अयोध्या में कुबेर टीले पर एक इमली के पेड़ पर एक साथ फांसी पर लटका दिया गया।

अयोध्या ने ही इस संग्राम के दो विभिन्न धर्मों से संबंध रखने वाले दो और ऐसे नायक पैदा किए जिन्होंने अंग्रेज़ फ़ौज को नाकों चने चबवा दिए। अच्छन ख़ान[x] और शम्भुप्रसाद शुक्ला[xi] दो दोस्त थे जिन्होंने ज़िला फै़जा़बाद में राजा देबीबक्श सिंह की क्रांतिकारी सेना की कमान संभाली हुई थी। एक युद्ध के दौरान इनको बंदी बनाया गया, और, समकालीन सरकारी दस्तावेज इस शर्मनाक सच्चाई को उजागर करते हैं कि इन दोनों क्रांतिकारियों की जान लेने से पहले भयानक यातनाएं दी गईं और दोनों के गले सार्वजनिक रूप से रेते गए।

अयोध्या जिसने हिंदू-मुसलमान एकता के पौधे को खून से सींचा था वो स्थली बाद में क्यों अंग्रेज़ शासकों की फूट डालो और राज करो नीति का एक मुख्य मुकाम बनकर उभरी, इसको समझना ज़रा भी मुश्किल नहीं है।

राजस्थान

कोटा रियासत (अब राजस्थान में) पर अंग्रेज़ परस्त महाराव का राज था। यहां के एक राजदरबारी थे, राजा जयदलाल भटनागर जो उर्दू-फ़ारसी और अंग्रेज़ी भाषाओं पर समान महारत रखते थे, इन्होंने महाराव और अंग्रेज़ शासकों के खि़लाफ बग़ावत का झंडा बुलंद किया। इस विद्रोह में इनका साथ देने वालों में प्रमुख थे,  वहां के सेनापति मेहराब ख़ान। इन लोगों ने मिलकर देश भर के अन्य क्रांतिकारी समूहों से संपर्क स्थापित किया और कोटा में अंग्रेज़ अधिकारियों और सैनिकों पर हमला बोला। बाद में ये लोग लक्ष्मीबाई के साथ कई मोर्चों पर अंग्रेज़ सेना से लोहा लेते रहे। लाला जयदलाल 1860 तक अंग्रेज़ो के हाथ नहीं लगे लेकिन उसी साल 15 अप्रैल को जयपूर में गिरफ़्तार किए गए और कोटा में 17 सितंबर 1860 को फांसी पर लटकाए गए।[xii] मेहराब खा़न को भी अंग्रेज़ 1860 में ही गिरफ़्तार कर सके और उन्हें भी कोटा में सार्वजनिक रूप से फांसी दी गई।[xiii] केंद्रीय भारत

मालवा : मध्यप्रदेश के मालवा क्षेत्र में अंग्रेज़ फ़ौज़ों को लगातार छकाने वाली जो इंक़लाबी  सेना सक्रिय रही उसके साझे नायक तात्या टोपे, राव साहब,[xiv] फ़िरोज़शाह और मौलवी फ़ज़ल हक़ थे। इन लोगों ने मिलकर अंग्रेज़ो से जितनी लड़ाईयां जीती उस तरह की मिसालें कम ही मिलती हैं। मौली फ़ज़ल हक़ अपने 480 हिंदू-मुसलमान-सिख साथियों के साथ 17 दिसंबर, 1858 को रानौड़ के युद्ध में शहीद हुए।[xv] तात्या टोपे 1859 तक स्वतंत्रता संग्राम का नेतृत्व करते रहे और 18 अप्रैल, 1859 को ग्वालियर के सिंध्या राजघराने की ग़द्दारी की वजह से बंदी बनाए गए और सिंध्या की रियासत में स्तिथ शिवपुरी में फांसी पर लटकाए गए।[xvi] और फ़िरोज़शाह कभी भी अंग्रेज़ो के हाथ नहीं आए।[xvii]

झांसी : मध्यभारत में रानी लक्ष्मीबाई के इंक़लाबी प्रतिरोध से सभी वाक़िफ़ हैं। लेकिन बहुत लोग यह नहीं जानते हैं कि रानी लक्ष्मीबाई के तोप खाने के मुखिया एक पठान, ग़ुलाम ग़ौस खा़न थे।[xviii] रानी की घुड़सवार सेना के मुखिया भी एक मुसलमान खुदाबख़्श थे।[xix] जब झांसी पर अंग्रेज़ों ने हमला बोला तो झांसी के क़िले में रानी की सेना का नेतृत्व करते हुए दोनों 4 जून, 1858 को शहादत पा गए। इस सच्चाई से भी बहुत कम लोग वाक़िफ़ हैं कि लक्ष्मीबाई की निजी सुरक्षा अधिकारी एक मुसलमान महिला मुंदार [मुंज़र] थीं। उन्होंने रानी का साया बनकर झांसी, कूंच कालपी और ग्वालियर के युद्धों में अंग्रेज़ी सेना का मुकाबला किया। कोटा-की-सराए (ग्वालियर) युद्ध में वे लड़ते हुए रानी के साथ (18 जून, 1858) शहीद हुईं।[xx]

रूहेल खंड

रूहेल खंड के इलाके में खा़न बहादुर खा़न के नेतृत्व में बहादुरशाह ज़फ़र की सरकार की सहमति से स्वतंत्र राज स्थापित कर लिया गया था। बहादुर खा़न के मुख्य सहयोगी खुशीराम थे। इन्होंने मिलकर रूहेल खंड का राजकाज चलाने के लिए आठ सदस्यों वाली हिंदू और मुसलमानों की साझी समिति का गठन किया। अंग्रेज़ दोनों संप्रदायों के बीच दंगा न करा पाएं, इसके लिए एक हुक्मनामे के द्वारा गौ-वध पर प्रतिबंध लगा दिया गया। दिल्ली में इंक़लाबी शासन के पतन के बाद अंग्रेज़ो ने अपना निशाना रूहेल खंड को ही बनाया। खा़नबहादुर खा़न, खुशीराम और उनके 243 सहयोगियों को एक ही दिन (20 मार्च, 1860) को बरेली कमीश्नरी के सामने सामूहिक फांसी दी गई। अंग्रेज़ शासकों ने इन क्रंतिकारियों की अंत्येष्टी करने पर भी प्रतिबंध लगा दिया जिसका परिणाम यह हुआ कि इनके शव बहुत दिनों तक सूलियों पर झूलते रहे।[xxi]

1857 के संग्राम के दौरान हिंदू-मुसलमान-सिख एकता किसी एक क्षेत्र और समूह तक सीमित नहीं थी। इन धर्मों के अनुयायियों के बीच एकता एक ज़मीनी सच्चाई थी जिस से महिलाएं भी अछूती नहीं थीं।

पश्चिमी उत्तरी प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर ज़िले के परगना थाना-भवन में ही 11 महिलाओं को अंग्रेज़ों के खि़लाफ़ बग़ावत करने के जुर्म में एक साथ फांसी पर चढ़ाया गया। इनमें से कुछ नायिकाओं के नाम इस प्रकार हैं; असगरी बेगम, जो अंग्रेज़ों के खि़लाफ़ शस्त्र विद्रोह में नेतृत्वकारी भूमिका निभाती रहीं। अंग्रेजों ने इन्हें बंदी बनाकर ज़िंदा जला दिया।[xxii] इस क्षेत्र की एक अन्य इंकलाबी महिला का नाम आशा देवी था, जो गूजर परिवार में पैदा हुई। इन्हें भी अंग्रेज़ी सरकार के खि़लाफ़ हथियार उठाने के जुर्म में 1857 में फांसी दी गई।[xxiii] एक अन्य इंक़लाबी नौजवान महिला भगवती देवी थीं जो त्यागी परिवार में पैदा हुई थीं जो फांसी पर लटकाई गईं।[xxiv] इसी क्षेत्र से एक और इंक़लाबी  महिला हबीबा थीं जिनका संबंध एक मुसलमान गूजर परिवार से था। हबीबा ने अंग्रेज़ी सेना के खि़लाफ़ मुज़फ़्फ़रनगर के आसपास विभिन्न युद्धों में हिस्सा लिया और आखिरकार गिरफ़्तार करके सूली पर लटकाई गईं।[xxv] इसी क्षेत्र से एक अन्य नौजवान महिला मामकौर,[xxvi] जिनका संबंध चरवाहों के परिवार से था, ने भी 1857 के संग्राम के आरंभिक दौर में ही फांसी के फंदे को चूमा। 1857 के संग्राम में देश का चप्पा-चप्पा इस तरह की दास्तानों से साक्षात करता दिखाता है।

विलियम रसल लंदन के एक अखबार ‘द टाइम्स’का संवाददाता बनकर ‘बग़ावत’ का आँखों-देखा हाल भेजने के लिए भारत आया था । उसने  मार्च 2, 1858 को भेजी गई अपनी रपट में लिखा कि-

‘‘अवध के तमाम मुख्य सरदार चाहे वे मुसलमान हो या हिंदू, एक हो गए हैं और शपथ ले चुके हैं कि वे अपने नौजवान बादशाह, बिरजिस कदर के लिए अपने खून का आख़री क़तरा भी बहा देंगें।’’[xxvii]

एक अन्य अंग्रेज़ अफ़सर, थामस लो ने मध्य भारत में अंग्रेज़ सेना के अभियानों में लगातार हिस्सेदारी की थी। उस क्षेत्र में ‘बाग़ियो’ की स्थिति का वर्णन करते हुए उसने अपने संस्मरणों में लिखा कि,

‘‘राजपूत, ब्राहमण, मुसलमान और मराठा, खुदा और मौहम्मद को याद करनेवाले और ब्रह्म की स्तुति करनेवाले सब इस जंग में (हमारे खि़लाफ़) थे।’[xxviii]

फ्रेड राबर्टस, एक अंग्रेज़ सेना-नायक था जो लखनऊ पर कब्ज़ा करनेवाले अभियान में शामिल था। यहां भी अंग्रेज सेना, जासूसों और षड़यंत्रों की मदद से लखनऊ में दाखिल हो सकी थी। फ्रेड ने लखनऊ पर आक्रमण की नवम्बर, 1857 की दास्तान एक पत्र में बयान करते हुए लिखा कि जब वे भाहर में दाखिल हुए तो सैकड़ों हिंदू-मुसलमान-सिख ‘बाग़ी’ बुरी तरह जख़्मी होकर सड़कों पर पड़े थे और

‘‘आगे बढ़ने के लिए उनपर चढ़कर गुज़रना होता था। वे मरते हुए भी हमारे प्रति अपनी नफ़रत का इज़हार कर रहे थे और गालियां बकते हुए कह रहे थे ‘हम बस खड़े हो जाएं फिर तुम्हें ज़िंदा नहीं छोड़ेंगें’।’’[xxix]

ख़राब से ख़राब हालात में भी हिंदू-मुसलमान-सिख इस तरह की साझी शहादतों की अनगिनत मिसालें पूरे देश में पेश कर रहे थे। यह एकता का जज़्बा किस दर्जे का था उस का अंदाज़ा 1857 की जंग-ए-आज़ादी के इस उर्दू तराने से लगाया जा सकता है जो इस महान संघर्ष के प्रमुख रणनीतिकारों में से एक अज़ीमुल्लाह ख़ान ने रचा था। यह तराना इंक़लाबी सेना का सलामी गीत भी था और दिल्ली से छपने वाले उर्दू अख़बार ‘पैयाम-ए-आज़ादी’ में 13 मई को छापा था।

 

हम हैं इसके मालिक हिंदुस्तान हमारा

पाक वतन है क़ौम का जन्नत से भी प्यारा।

 

यह हमारी मिल्कियत हिंदुस्तान हमारा

इसकी रूहानियत [आध्यात्मिकता] से रोशन है जग सारा।

 

कितना क़दीम [प्राचीन ], कितना नईम [सुखद] सब दुनिया से न्यारा

करती है ज़रख़ेज़ [उपजाऊ] जिसे गंगोजमन की धारा।

 

ऊपर बर्फ़ीला पर्वत पहरेदार हमारा

नीचे साहिल पर बजता सागर का नक़्क़ारा।

 

इसकी खानें उगल रहीं सोना, हीरा, पन्ना

इसकी शानशौकत का दुनिया में जयकारा।

 

आया फ़िरंगी दूर से, ऐसा मंतर मारा

लूटा दोनों हाथों से प्यारा वतन हमारा।

 

आज शहीदों ने तुमको, अहलेवतन ललकारा

तोड़ो ग़लामी की ज़ंजीरें, बरसाओ अंगारा।

 

हिंदूमुसलमान, सिख हमारा भी प्याराप्यारा

यह है आज़ादी का झंडा इसे सलाम हमारा।

 

{Dr. Shamsul Islam, Political Science professor at Delhi University (retired).}
{Dr. Shamsul Islam, Political Science professor at Delhi University (retired).}

हिंदू-मुसलमानों का एक-दूसरे के लिए मर-मिटने की दास्तानों का यह गौरवशाली इतिहास 162 साल पहले सचमुच में अस्तित्व में था। इसकी आज भी पुष्टि की जा सकती है। ये सच्चाईयां अंग्रेज़ी हुकूमत के अभिलेखागारों, लोगों के निजी संग्रहों और वृतांतों में सुरक्षित हैं। इस देश के हिंदू और मुसलमानों के बीच नफ़रत क्यों पैदा कराई गयी और किन लोगों ने इसको हवा दी इस बात को समझना जरा भी मुश्किल नहीं हैं। फ़िरंगियों का मानना था, जैसा कि उस समय के एक बड़े अंग्रेज़ अफ़सर, चाल्र्स मेटकाफ, ने कहा था कि ‘‘1857 का विद्रोह हिंदुओं और मुसलमानों का साझा काम था।’’

इस तरह स्वाभाविक है कि [highlight color=”green”]1857 के संग्राम में हिंदुओं और मुसलमानों के बीच जर्बदस्त एकजुटता ने विदेशी शासकों की नींद हराम कर दी थी और उनकी हुकूमत खत्म होने का खतरा सर पर मंडरा रहा था। इस खतरे को हमेशा के लिए तभी टाला जा सकता था जब हिंदू और मुसलमान अलग-अलग दिशाएं पकड़ें।[/highlight]

हिंदू और मुसलमान सांप्रदायिकता के झंडाबरदारों ने वास्तविकता में अंग्रेज़ शासकों की मदद करने के अलावा और कोई दूसरा काम नहीं किया है। हमें आज इस सच्चाई को क़तई नजरअंदाज नहीं करना चाहिए कि आज की साम्प्रदायिक राजनीति दरअसल 1857 के दौरान हिंदू-मुसलमान-सिख   एकता से परेशान अंग्रेज़ हाकिमों का पैंतरा था जिसे हिंदुस्तानी चाकरों ने कार्यान्वित किया और मौजूदा हिन्दुत्ववादी सरकार नंगे रूप से कर रही है। इस का मुक़ाबला 1857 की महान साझी शहादतों से उपजी साझी विरासत की यादों को ताज़ा करके ही किया जा सकता है।

शम्सुल इस्लाम

09 मई 2020

[i] इस महान जंग में अन्य धर्मों के लोग भी शामिल थे, जैसा हम इस वृतान्त में जानेंगे, लेकिन समकालीन दस्तावेज़ों में इन्ही तीन समुदायों का ज़िक्र है।

[ii] Pande, BN, The Hindu Muslim Problem, Gandhi Smriti & Darshan Samiti, Delhi, p. vi.

[iii] Tajwar, Darkhashan (ed. & tr.), Sarguzisht-e-Delhi: 1857 ke Andolan ki Kahani Jeewan Lal kee Zabani, Rampur Raza Library, Rampur, 2005, pp. 87-88.

[iv] दिल्ली में मौजूद अंग्रेज़ों के जासूस, रामजी लाल अलीपुरिया का पहाड़ी पर स्तिथ अंग्रेज़ी सेना के कैम्प को जुलाई 19, 1857 को लिखा गया पत्र, देखें, शम्सुल इस्लाम (स.), जासूसों के ख़तूत, फ़ारोस, दिल्ली, 2019, पृ. 86.

[v] Chopra, P. N. (Ed.), Who’s Who of Indian Martyrs 1857, Volume 3, Government of India, Delhi, 1973, p. 56. इस महत्पूर्ण संग्रह में शहीदों का ब्यौरा समकालीन सरकारी दस्तावेज़ों पर आधारित है और यह सब से विश्वसनीय माना जाता है।

[vi] वही, पृ. 102.

[vii] वही, पृ. 102.

[viii] वही, पृ. 9.

[ix] वही, पृ. 120.

[x]  वही, पृ. 3.

[xi] वही, पृ. 139.

[xii] वही, पृ. 62-63.

[xiii] वही, पृ. 91.

[xiv] वही, पृ. 125. वे 1862 तक अंग्रेज़ों के हाथ नहीं आए लेकिन एक मराठा रजवाड़े की जासूसी करने पर जम्मू क्षेत्र से पत्नी और बच्चे के साथ गिरफ़्तार कर लिए गए।  उन्हें कानपूर में अगस्त 20, 1862 को फांसी दी गयी।

[xv]  वही, पृ. 115.

[xvi] [वही, पृ. 116]

[xvii] वही, पृ. 41-42.

[xviii] वही, पृ. 41-42.

[xix] वही, पृ. 75.

[xx] वही, पृ. 102.

[xxi] वही, पृ. 73-74, 76.

[xxii] वही, पृ. 11.

[xxiii] वही, पृ. 11.

[xxiv] वही, पृ. 21.

[xxv] वही, पृ. 49.

[xxvi] वही, पृ. 87.

[xxvii] Russell, William Howard, My Diary in India, in the Year 1858-9, vol. 1, Routledge, London, 1860, p. 244.

[xxviii] Lowe, Thomas, Central India: During the Rebellion of 1857 and 1858, Longman, London, 1860, p. 324.

[xxix] Roberts, Fred., Letters Written During the Mutiny, Macmillan, London, 1924, pp. 103-104.

 

ईद सादगी के साथ कैसे मनाएं ?

Eid celebrated with great simplicity

How to celebrate Eid with simplicity?

ईद निहायत सादगी के साथ लेकिन पुर-वक़ार ढंग से कैसे मनाई जाती है (How is Eid celebrated with great simplicity but in a virtuous manner), यह बात मेरे वालिद हज़रत मौलाना अब्दुस्समद ( रह.) ने बचपन में दो कहानियों के ज़रिया मुझे समझाई थी।

पहली कहानी सुप्रसिद्ध लेखक प्रेमचंद की मशहूर कहानी “ईदगाह“ है जो हिन्दी/उर्दू के कम-ओ-बेश सभी पाठकों ने पढ़ी होगी. इस कहानी में किस तरह एक ग़रीब अनाथ बच्चा, अपनी बूढ़ी नानी का नवासा ‘हामिद’ बिना किसी हीन-भावना में मुब्तला हुए निहायत पुर-वक़ार ढंग से, आत्मसम्मान के साथ निहायत सादगी से ईद की नमाज़ अदा करने के लिए ईदगाह जाता है और अपने दौलतमंद दोस्तों को अपनी पुर-वक़ार सादगी से मरऊब (प्रभावित) कर देता है।

दूसरी कहानी एक तारीख़ी वाक़ेआ है जिस में यह बताया गया है कि किस तरह बादशाह-ए-वक़्त अमीरुल्मोमिनीन हज़रत उमर बिन अब्दुल अज़ीज़ रहमतुल्लाह-अलैह और उनके बच्चे पैवंद लगे हुए पुराने साफ़-सुथरे लिबास पहन कर ईदगाह जा कर ईद की नमाज़ अदा करते हैं।

बचपन में वालिद बुज़ुर्गवार ( पिताश्री) की इस तालीम ने मेरे दिलो-दिमाग़ पर ऐसा प्रभाव छोड़ा कि फिर मेरे नज़दीक ईद के मौक़े पर नए कपड़ों की कोई अहमियत बाक़ी नहीं रही।

दरअसल ईद की सच्ची ख़ुशी (Eid’s true happiness) तो इस बात के अहसास में पोशीदा है कि अल्लाह तआला के बंदे ने अल्लाह तआला की रज़ा के लिए अल्लाह तआला की दी हुई तौफ़ीक़ और रूहानी कु़व्वत से रमज़ान का रोज़ा मुकम्मल किया। ईद की नमाज़ (Eid prayer) के ज़रिया बंदा इसी जज़्बे के तहत अल्लाह-रब्बुल-इज़्ज़त का शुक्रिया अदा करता है और उससे उसकी रहमत और मग़्फ़िरत का तलबगार बनता है।

पैग़म्बर-ए-इस्लाम ﷺ ने फ़रमाया कि, “रोज़ादार के लिए दो खुशियाँ हैं – एक जब वह इफ़्तार करता है दूसरी ख़ुशी उसको उस वक़्त मिलेगी जब वह अपने रब से मिलेगा।” और ईद की ख़ुशी इसी की झलक है.

अब जबकि कोरोना वायरस के ख़तरों के बीच रमज़ान (Ramadan amidst the dangers of corona virus) का दूसरा अशरा गुज़र रहा है, विभिन्न इस्लामी विद्वानों एंव संगठनों के द्वारा यह अपील की जा रही है कि COVID-19 महामारी की रोकथाम के पेश-ए-नज़र लॉक-डाउन और सोशल- डिस्टेंसिंग का पालन करने के लिए इस वर्ष ईद निहायत सादगी से मनाई जाये और अगर ईद की ख़रीदारी के लिए लॉक-डॉन में कुछ ढील भी दी जाती है तो हरगिज़-हरगिज़ ईद की ख़रीदारी के नाम पर बाज़ार में निकलने की कोशिश न की जाये। हर समझदार मुसलमान इस अपील का स्वागत करेगा।

जब CORONA COVID-19 महामारी को फैलने से रोकने के लिए हम अपनी सारी इबादात अपने घरों में ही अदा कर रहे हैं, मस्जिद में नमाज़-बा-जमाअत/तरावीह, जुमे की नमाज़ और ईद की नमाज़ भी हम पर साक़ित हो चुकी है तो फिर ईद भी हम निहायत सादगी के साथ क्यूँ न मनायें ?

नाम :- मोहम्मद खुर्शीद अकरम तख़ल्लुस : सोज़ / सोज़ मुशीरी वल्दियत :- मौलाना अब्दुस्समद ( मरहूम ) जन्म तिथि :- 01/03/1965 जन्म स्थान : - बिहार शरीफ़, ज़िला :- नालंदा (बिहार) शिक्षा :- 1) बी.ए.             2) डिप. इन माइनिंग इंजीनियरिंग     उस्ताद-ए-सुख़न :-( स्व) हज़रत मुशीर झिन्झानवी देहलवी काव्य संकलन : - सोज़-ए-दिल सम्मान :- 1. आदर्श कवि सम्मान, और साहित्य श्री सम्मान संप्रति :- कोल इंडिया की वेस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड में कार्यरत संपर्क :- बी-22, कैलाश नगर, पोस्ट :- साखरा(कोलगाँव), तहसील :- वणी ज़िला :- यवतमाल , पिन:- 445307 (महाराष्ट्र)
मोहम्मद ख़ुर्शीद अकरम सोज़

दरअसल इस्लाम एक निहायत ही सादगी पसंद मज़हब और दीन-ए-फ़ितरत है। यहाँ हर क़िस्म की तक़रीबात और ख़ुशी के मौक़े पर भी सादगी बरतने की तालीम दी गयी है। ख़ुद पैग़म्बर-ए-इस्लाम ﷺ हर मामले में सादगी से ही पेश आते और सादगी को ही पसंद फ़रमाते थे, यही हाल तमाम असहाब-ए-रसूल और बुज़ुर्गान-ए-दीन का रहा।

दीगर मज़ाहिब के सूफ़ी-संतों के यहाँ भी सादगी की बड़ी अहमियत रही है। आज अगर किसी भी सतह पर मुसलामानों की एक बड़ी तादाद इस फ़ितरी सादगी से दूर हो रही है और ईद से लेकर शादी ब्याह तक ग़ैर-ज़रूरी नमूद-ओ-नुमाइश का शिकार हो रही है तो इसकी वजह अपने मज़हब से महज़ रस्मी लगाओ और मज़हब की हक़ीक़ी/वास्तविक तालीमात से दूरी है। चलिए कोरोना वायरस ने कम अज़ कम हमारी ज़िंदगी के रुख़ को फ़ित्री सादगी की तरफ़ मोड़ तो दिया।

अतः ईद मनाने के लिए नये कपड़ों की ख़रीदारी और लम्बे-चौड़े मार्केटिंग की ज़रूरत नहीं है। हमारे पास जो भी लिबास मौजूद है उसमें जो मुझे ज़्यादा पसंद है उसी को पहन लें, ईदगाह तो जाना नहीं है क्यूंकि वक़्त-ओ-हालात को मद्देनज़र रखते हुए लॉक-डॉन और सोशल- डिस्टेंसिंग का पालन ज़रूरी है। इसलिए घर में ही शुक्राने की नमाज़ अदा करें और देश-दुनिया में अमन और शान्ति के लिए दुआ करें ! कोरोना वायरस के ख़ातमे और इसके बीमारों की शफ़ायाबी की दुआ मांगें! ज़्यादा से ज़्यादा बेकस, लाचार, ग़रीब और ज़रूरतमंद लोगों तक अपनी मदद पहुँचाने की कोशिश करें ! इसी से ईद की सच्ची ख़ुशी हासिल होगी !

मोहम्मद ख़ुर्शीद अकरम सोज़

नफरत के ज़हर की नहीं, प्रेम की खुशबू की ज़रूरत है हमें

arnab goswami,

We need the fragrance of love, not the poison of hate

हमारी दुनिया पर कोरोना वायरस के हमले के बाद सभी को उम्मीद थी कि इस अदृश्य शत्रु से लडाई हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता होगी और इस लड़ाई को नस्ल, धर्म आदि की दीवारों से ऊपर उठ कर लड़ा जायेगा. परन्तु यह दुखद है कि भारत में स्थितियां इतनी बदतर हो गईं कि संयुक्त राष्ट्रसंघ तक को यह कहना पड़ा कि इस वैश्विक आपदा से लड़ाई में नस्ल और धर्म की कोई भूमिका नहीं होनी चाहिए. इसके बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा कि कोरोना वायरस धर्म या जाति की दीवारों को नहीं देखता और आरएसएस मुखिया मोहन भगवत ने फरमाया कि कुछ लोगों की गलतियों के लिए पूरे समुदाय को दोषी नहीं ठहराया जाना चाहिए. परन्तु तब तक जो नुकसान होना था वह हो चुका था.

भारत में सबसे पहले तबलीगी जमात पर निशाना साधा गया. इस संस्था की कुछ गंभीर भूलों को कोरोना के प्रसार के लिए ज़िम्मेदार ठहरा दिया गया. यही नहीं, कई तरह की झूठी खबरें भी प्रचारित की गईं. यह कहा गया कि जमात के सदस्य डॉक्टरों और नर्सों के साथ दुर्व्यवहार कर रहे हैं और इस रोग को फैलाने के लिए सब्जियों और फलों पर थूक रहे हैं.

सांप्रदायिक तत्वों को इससे भी संतोष नहीं हुआ. मुसलमान व्यापारियों और दुकानदारों का बहिष्कार करने का आव्हान किया गया और आवासीय परिसरों में ठेले पर सामान बेच कर अपने गुज़ारा करने वाले मुसलमानों के प्रवेश पर रोक लगाने की बात कही गई.

एक अन्य घटना में मुंबई के बांद्रा स्टेशन पर हजारों लोगों की भीड़ इकट्ठा हो गई. इसका कारण थी यह अफवाह कि वहां से कुछ ट्रेनें रवाना होंगीं जो प्रवासी मजदूरों को उनके गृह प्रदेशों तक ले जायेंगीं. संयोगवश, यह स्टेशन एक मस्जिद के पास है और इसका लाभ उठाते हुए गोदी मीडिया ने इस घटना का भी साम्प्रदायिकीकरण कर दिया. इससे फिज़ा में घुली नफरत का रंग और गहरा हो गया.

तीसरी बड़ी घटना थी महाराष्ट्र में पालघर के नज़दीक दो साधुओं और उनके ड्राईवर की लिंचिंग.

इन तीनों को इस शक में मार डाला गया कि वे बच्चे चुराने वाली गैंग के सदस्य हैं. इस घटना के बारे में भी कहा गया कि इसे मुसलमानों ने अंजाम दिया है. यह सफ़ेद झूठ था.

इस मामले में रिपब्लिक टीवी के अर्नब गोस्वामी (Arnab Goswami of Republic TV) ने आसमान सिर पर उठा लिया और यहाँ तक कह डाला कि सोनिया गाँधी इस घटना से खुश हुई होंगीं.

गोस्वामी ने सोनिया गाँधी के इतालवी मूल का हवाला भी दिया. गोस्वामी को अपनी इस बेजा टिप्पणी के लिए क़ानूनी कार्यवाही का सामना करना पड़ रहा है. परन्तु यह एक अलग कहानी है.

देश में जिस तरह से मुसलमानों से दूर रहने और उनका बहिष्कार करने की बातें कही जा रही हैं उनसे जर्मनी में यहूदी व्यापारियों के बहिष्कार के आव्हान की याद आना स्वाभाविक है. इस आव्हान के बाद ही जर्मनी में ‘फाइनल सोल्यूशन’ का नारा दिया गया था. हमारे समाज में मुसलमानों, और कुछ हद तक ईसाईयों, के बारे में तरह-तरह के मिथकों और पूर्वाग्रहों का बोलबाला है.

इन समुदायों के खिलाफ नफरत फैलाने वाली एक बहुत बड़ी और ताकतवर मशीनरी देश में सक्रिय है. यह मशीनरी पिछले कुछ सालों में और मज़बूत हुई है. इस सोच की जडें काफी गहरी हैं और इसे सांप्रदायिक तत्वों ने काफी मेहनत से खाद-पानी दिया है. इस सबके बावजूद भी हमारे लिए यह कल्पना करना भी मुश्किल था कि कोविड 19 जैसे मानवीय त्रासदी का उपयोग भी विभाजनकारी रेखाओं को और गहरा करने के लिए किया जा सकता है.

हिन्दू राष्ट्रवाद की विचारधारा में रचे-बसे हजारों प्रशिक्षित लोगों की एक विशाल सेना मुसलमानों की नकारात्मक छवि गढ़ने और उनके बारे में पूर्वाग्रहों का प्रचार-प्रसार करने में जुटी हुई है. इस सेना ने हमारे समाज के सभी वर्गों में अपनी पैठ बना ली है. मोरारजी देसाई के नेतृत्व और जयप्रकाश नारायण के संरक्षण में गठित जनता पार्टी सरकार में भाजपा के पूर्व अवतार जनसंघ के शामिल होने के बाद, बाबरी मस्जिद के विध्वंसक लालकृष्ण आडवाणी को केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री की ज़िम्मेदारी दी गई थी. तभी से मीडिया में सांप्रदायिक तत्वों का बोलबाला बढ़ना शुरू हुआ.

शाहबानो मामले में मुस्लिम नेतृत्व के एक तबके की जिद्द ने इन तत्वों को मसाला दिया. इसके बाद तो फिरकापरस्तों ने मुड़कर नहीं देखा. देश के मध्यकालीन इतिहास को तोड़मरोड़ कर उसका इस्तेमाल आज के मुसलमानों का दानवीकरण करने के लिए किया गया. फिर आए लव जिहाद, घरवापसी और पवित्र गाय जैसे मुद्दे. मुसलमानों को समाज के हाशिये पर धकेल दिया गया और उनके विरुद्ध हिंसा का ग्राफ ऊपर जाने लगा. मुसलमान अपने मोहल्लों में सिमटने लगे और उनमें बढ़ते असुरक्षा के भाव ने उन्हें मौलानाओं की गोदी में बैठा दिया. मौलानाओं ने इस्लाम की शिक्षाओं की संकीर्ण और पुरातनपंथी व्याख्या करनी शुरू कर दी और इससे गोदी मीडिया को पूरे मुस्लिम समुदाय को बदनाम करने का अवसर मिल गया. जो मुसलमान इस्लाम की सच्ची शिक्षाओं की बात करते थे, जो मुसलमान मानवीय मूल्यों के हामी थे, जो मुसलमान उदारवादी थे, उनकी आवाज़ नक्कारखाने में तूती बन कर रह गई.

फिर आया सोशल मीडिया, ट्रोल आर्मी और फेक न्यूज़. आज मुसलमानों के खिलाफ नफरत भड़काना इसलिए आसान हो गया है क्योंकि उनके प्रति पूर्वाग्रह पहले से ही लोगों के दिमागों में भरे हुए हैं.
डॉ. राम पुनियानी (Dr. Ram Puniyani) लेखक आईआईटी, मुंबई में पढ़ाते थे और सन्  2007 के नेशनल कम्यूनल हार्मोनी एवार्ड से सम्मानित हैं
डॉ. राम पुनियानी (Dr. Ram Puniyani) लेखक आईआईटी, मुंबई में पढ़ाते थे और सन्  2007 के नेशनल कम्यूनल हार्मोनी एवार्ड से सम्मानित हैं

इसी पृष्ठभूमि में कुछ मुस्लिम बुद्धिजीवियों ने एक थिंकटैंक का गठन किया है. इसका नाम है ‘इंडियन मुस्लिम्स फॉर प्रोग्रेस एंड रिफॉर्म्स’. वे एक साथ कई स्तरों पर काम करने का इरादा रखते हैं. हम केवल उम्मीद कर सकते हैं कि वे इस समुदाय को सुधार की दिशा में ले जाएंगें और मुस्लिम युवकों के लिए रोज़गार के अवसरों का सृजन करने में मदद करेंगे. इसके साथ ही वे मीडिया द्वारा मुसलमानों का दानवीकरण करने का प्रयासों का मुकाबला भी करेंगे.

हम उनसे यह अनुरोध भी करना चाहेंगे कि वे समाज में व्याप्त नफरत की नींव पर भी प्रहार करें. इस सन्दर्भ में लब्धप्रतिष्ठ अध्येताओं जैसे डॉ. असग़र अली इंजीनियर, के.एन. पणिक्कर और अनेक इतिहासविदों, जिन्हें वामपंथी इतिहासविद कहा जाता है, ने अत्यंत उपयोगी काम किया है. उन्होंने इतिहास के वैज्ञानिक और तार्किक अध्ययन पर जोर दिया है – उस इतिहास पर जो विविधता का उत्सव मनाता है. उन्हें गाँधी के विचारों और कार्यों पर भी ध्यान देने की ज़रुरत है. हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि गांधीजी ने इस देश में अंतरसामुदायिक रिश्तों को प्रेम और सौहार्द पर आधारित बनाने में महती भूमिका अदा की थी. इस काम में जवाहरलाल नेहरु की ‘डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया’ और उस पर आधारित  ‘भारत एक खोज’ नामक टीवी धारावाहिक भी मददगार हो सकता है. कुछ और पीछे जाने पर हम भक्ति (कबीर, तुकाराम, नरसी मेहता आदि) और सूफी (निजामुद्दीन औलिया, गरीब नवाज़ ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती आदि) संतों से प्रेरणा ग्रहण कर सकते हैं, जिन्होंने साँझा धार्मिक परम्पराओं पर जोर दिया था.

थिंक टैंक को देश में काम रहे ऐसे संगठनों की मदद भी लेनी चाहिए जो इस दिशा में विचार और काम कर रहे हैं. बंधुत्व को बढ़ावा दिए बगैर हमारे देश में प्रजातंत्र जिंदा नहीं रह सकेगा. हमें यह भी याद रखना चाहिए कि अगर अल्पसंख्यकों का दानवीकरण रोका नहीं गया तो यह नफरत हमें किसी दिन हिंसा के ऐसे दावानल में झोंक देगी, जिसमें हमारा बुरी तरह से झुलसना अपरिहार्य होगा.

राम पुनियानी

(हिंदी रूपांतरणः अमरीश हरदेनिया) (लेखक आईआईटी, मुंबई में पढ़ाते थे और सन् 2007 के नेशनल कम्यूनल हार्मोनी एवार्ड से सम्मानित हैं)

ARTICLE BY DR RAM PUNIYANI – LOVE, NOT HATE

मोदी ने अशोक गहलोत की प्रशंसा क्यों की ? क्या है मजदूरों के खिलाफ दुरभिसंधि

Modi in Gamchha

कोरोना काल सुधारों के लिये उपयुक्त ‘अवसर’? (1) | Correct ‘opportunity’ for Corona era reforms? (1)

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपने किसी राजनीतिक विरोधी की कभी प्रशंसा भी करें और वह भी कांग्रेसी तो किसी को भी आश्चर्य होगा किन्तु 27 अप्रैल 2020 को ऐसा हुआ। प्रधानमंत्री की प्रशंसा के पात्र थे राजस्थान के कांग्रेस के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत। अवसर था राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ हुई वीडियो कान्फ्रेंसिंग। समाचार पत्रों में आई खबर के अनुसार उन्होंने कहा कि “प्रत्येक राज्य में कोई न कोई पार्टी शासन में है जो महसूस करती है कि उसके पास देश को आगे ले जाने का अवसर है। हमें सुधार भी करना है। यदि सुधार करने कि दिशा में राज्य पहल करता है, आप देखिये इस संकट को हम बहुत बड़े अवसर में पलट सकते हैं। मैं अशोक गहलोत जी को बधाई दूँगा। उन्होंने कई पहल कीं। उन्होंने श्रमिकों के लिये समय सीमा की भी बढ़ोत्तरी की है। ठीक है आलोचना थोड़ी हुई होगी, लेकिन राजस्थान ने दिशा दिखाई है।”

स्पष्टत: प्रधानमंत्री राजस्थान सरकार के उस निर्णय का हवाला दे रहे थे जिसके अनुसार फैक्ट्रियों में काम का समय 8 घंटे से बढ़ाकर 12 घंटे (Working hours in factories increased from 8 hours to 12 hours) किया गया है। उनका आग्रह था कि अन्य राज्यों को भी इसका अनुसरण करना चाहिये।

वास्तविकता यह है कि दूसरे राज्य कार्य के समय बढ़ाने की इस दौड़ में पहले ही शामिल हो चुके थे। गुजरात, मध्यप्रदेश, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और पंजाब, इन पाँचों राज्यों ने तो काम के घंटो को 8 से बढ़ाकर 12 घंटे करने के लिये फैक्ट्रीस एक्ट 1948 में ही परिवर्तन कर डाला और वह भी प्रशासकीय आदेशों से। इन बढ़े हुए अतिरिक्त कार्य के घंटों के लिये बढ़ी हुई दर पर कोई भुगतान भी नहीं किया जाएगा।

This May Day of 2020 has been the darkest or worst May Day in the history of the working class of India.

2020 का यह मई दिवस भारत के मेहनतकश वर्ग के लिये इतिहास का सबसे अंधकारमय अथवा बुरा मई दिवस रहा है भारत के मेहनतकश की आवाज कभी भी इतनी नहीं दबाई गई होगी। देश में लाखों लोग हैं जो अपने परिवारों से दूर जीवित बच पाने के लिये संघर्ष कर रहे हैं। रोजगार से निकाले गए, गाँठ में पैसा नहीं, खाने को कुछ नहीं, कल तक जैसी भी हो इज्जत से कमाकर खाने वाले हाथ फैलाकर कुछ मिल जाये तो पेट भरे की स्थिति में नंगे पाँव बाल-बच्चों के साथ पैदल ही सैकड़ों किलोमीटर की यात्रा पर अपने गाँव-घर जाने के लिये भटक रहे हैं। दुनिया का यह अब तक का सबसे बड़ा “नंगे-पाँव” विस्थापन होगा।

स्वयं सरकार के आकलन के अनुसार जैसा कि क्विंट ने 6 मई को रिपोर्ट किया है, 5 से 6 लाख श्रमिक आज सड़कों पर हैं। वे जो इस आशा में कि सरकारें आश्वासन दे रही हैं तो उनके खाने और रहने की उचित व्यवस्था अवश्य करायेंगी, बदतर हालातों से लाचार होकर, जैसे बने वैसे, पैदल, साईकिल से पुलिस की लाठियाँ खाते या पुलिस वालों के इंतजाम से ही थोड़ा बहुत जो खाने मिले खाते अपने घरों को वापस लौट रहे हैं।

सूरत, हैदराबाद, मुम्बई, दिल्ली में इन फंसे हुए लोगों ने ‘खाने दो या घर जाने दो’ की मांग करते हुए प्रदर्शन जरूर किये लेकिन प्रदर्शन करने वाले हजारों श्रमिकों को उतनी ही तत्परता से पुलिस ने खदेड़ भी दिया। इनके लिये बहुत बातें हुईं, टीव्ही पर बहस हुईं, सरकारों के आश्वासन आये, पर ठोस परिणाम यही है कि इन पंक्तियों के लिखे जाने तक भी वे फंसे हुए ही हैं और एक नई परिस्थिति अब इनके सामने पेश आने जा रही है वह है अपने मन (निर्णय) से अपने शर्म को बेचने का उनका अधिकार भी अब छिनने जा रहा है।

कर्नाटक के मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा ने बेंगलोर से प्रवासी श्रमिकों के लिये चलने वाली सभी ट्रेन राज्य के प्रापर्टी डेवलपर्स के साथ बात करने के बाद केंसिल करवा दीं क्योंकि उन्हें राज्य की अर्थव्यवस्था में सुधार के लिये श्रमिकों की जरूरत है। मत कहिये कि भारत के संविधान में लिखा है कि ‘बंधुआ मजदूर’ रखना अपराध है। आप किसी इंसान को एक अजनबी प्रदेश में जहाँ का वह रहने वाला नहीं है और मुसीबत के वक्त जिसे आपने एक रोटी नहीं दी, केवल इसलिए रोक सकते हैं या मजदूरी करने बाध्य कर सकते हैं क्योंकि वह अपने साधन से वापस नहीं जा सकता।

गिनते रहिये आप लोकतंत्र की गिनती और पढ़ते रहिये संविधान का पहाड़ा, यह कोरोना काल का लोकतंत्र है और कोराना काल का संविधान।

उच्चतम न्यायालय ने भी कहा है कि सरकार लॉक-डाउन और लॉक-डाउन से जुड़े जो भी कदम उठा रही है, देशवासियों के स्वास्थ्य और कल्याण के लिये ही तो उठा रही है। विश्वास करना कठिन हो सकता है पर केंद्र सरकार ने उच्चतम न्यायालय में हलफनामा देकर बताया है कि 14 लाख विस्थापित श्रमिक राहत कैम्प में रखे गए हैं और लगभग 1 करोड़ 34 लाख श्रमिक भोजन केन्द्रों से खाना खा रहे हैं। अब यह खाना तो उन्हें दोनों टाईम ही मिल रहा होगा? इसीलिये, जब मजदूरों को नगद राशि सहायता के रूप में देने की मांग की गई तो न्यायालय ने कहा कि उसकी समझ में जब खाना मिल रहा है तो नगद राशि का वो क्या करेंगे?

दुनिया के मजदूरों को 8 घंटे का कार्यदिवस मालिकों या सरकारों की मेहरबानी से नहीं बल्कि उनके द्वारा किये गए संघर्षों और दी गई शहादतों के परिणाम स्वरूप मिला है। मई दिवस मनाया ही जाता है शिकागो के उन शहीदों की स्मृति में जिन्होंने आज से 134 साल पहले पहली बार 8 घंटे के कार्य दिवस की मांग लेकर मशीनों के पहिये जाम किये थे और बदले में मालिकों के गुंडों और पुलिस न केवल उनके ऊपर गोलियाँ बरसाई थी, बल्कि उनके नेताओं को फांसी के तख्ते पर भी लटका दिया था। यह वह भयावह दौर था जब मजदूर के काम पर जाने का समय सूर्य के प्रकाश के साथ शुरू होता था और सूर्य के अस्त होने पर खत्म होता था। कालान्तर में बिजली के आविष्कार ने इन 12 घंटों की कार्यावधि को 16 और 18 घंटे तक बढ़ा दिया था। आज जिस 8 घंटे के कार्यदिवस का उपभोग दुनिया का मेहनतकश कर रहा है वह फैक्ट्री मालिकों की या सरकारों की मेहरबानी नहीं बल्कि मेहनतकशों के संघर्ष का नतीजा है। जैसा कि मार्क्स ने कहा भी है कि वे सभी कानून जिनसे मजदूरों के काम करने की अवधि सीमित (कम) की गई है “किसी संसदीय चाह या विचार का फल नहीं हैं। इसका नियमन, आधिकारिक मान्यता, और राज्य के द्वारा इसकी घोषणा, सब कुछ मेहनतकश वर्ग के लंबे संघर्ष का परिणाम हैं। एक सामान्य कार्यदिवस, इसलिए, पूंजीपति वर्ग और मेहनतकश वर्ग के बीच चले एक लंबे गृह युद्ध का परिणाम है…।”

भारत के मेहनतकश के लिये तो यह संघर्ष और भी कठिन था क्योंकि देश में ब्रिटिशर्स का राज था। देश में पहला कानून 1922 में बना जिसमें कार्य के घंटों को कम करके सप्ताह में 60 किया गया। फैक्ट्री एक्ट 1934 (Factory act 1934) में इसे घटाकर 54 किया गया जिसे द्वतीय विश्व युद्ध के समय बढ़ाकर फिर से 60 कर दिया गया था। यह अद्भुत नहीं है कि हमारे देश की 6 राज्य सरकारों ने ब्रिटिशर्स के 1934 के फैक्ट्री एक्ट से भी 12 घंटे ज्यादा की कार्यावधि मजदूरों के लिये तय की है। बेशक, बताने की कोशिश यही की जा रही है कि यह एक अस्थायी कदम है जो 3-4 महीने या जब तक कोविड-19 रहेगा, तभी तक के लिये है। पर, जब प्रधानमंत्री इसे एक अहम् सुधार बता रहे हों तो नीयत का अंदाजा लगाना कोई मुश्किल काम नहीं है।

कोरोना काल सुधारों के लिये उपयुक्त ‘अवसर’? (2)

श्रम क़ानूनों पर हमले की हड़बड़ी (Attack on labor laws)

दरअसल, कोरोना काल को तथाकथित ‘सुधारों’ के लिये उपयुक्त ‘अवसर’ बताने की शासक वर्ग में होड़ लगी है। नवउदारवाद के बाद के विश्व में सबसे अधिक यदि कुछ बदला है तो वह ‘सुधार’ शब्द का अर्थ है। मेहनतकश के लिये सुधार का मतलब मौजूदा कानूनों में सुधार कर उसके अधिकारों, हितों और कल्याण के लिये और बेहतर कानून बनाना नहीं रह गया है, बल्कि इसके ठीक उलट सुधार का मतलब ऐसे कानून बनाना हो गया है जो मेहनतकश के अधिकारों, हितों और कल्याण में कटौती कर उनका और अधिक शोषण करने का अधिकार मालिकों और सरकार को दें।

कोविड-19 जैसी महामारी को भी जिससे सबसे ज्यादा प्रभावित भारत का मेहनतकश ही हो रहा है ‘अवसर’ में बदलने की यह मुहीम हमारे प्रधानमंत्री की अगुवाई में ही चल रही है जैसा कि उनकी मुख्यमंत्रियों के साथ हुई वीडियो कान्फ्रेंसिंग से पता चलता है। इस सोच को कैसे और कितनी जल्दी अमली जामा पहनाया जाये, आज उनकी चिंता का प्रमुख बिंदु है।

नीति आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष अरविंद पनगढ़िया कहते हैं कि यह अवसर तभी तक उपलब्ध रहेगा जब तक वेक्सीन नहीं खोज ली जाती। उसके बाद केवल पछताना हाथ रहेगा, इसलिए, भूमि अधिगृहण और एसएचआरएम क़ानूनों में वे सारे सुधार तुरंत कर लेना चाहिए जो शांति काल में करना कठिन है।

अरविंद पनगढ़िया अकेले नहीं है। सबके अपने तर्क हैं पर उद्देश्य एक ही है भूअर्जन और श्रम क़ानूनों पूंजी के पक्ष में लचीला बनाना।

‘बिजनेस स्टेंडर्ड’ के सह-मालिक तथा संपादक टी एन निनान का तर्क और ज्यादा अपीलिंग है। उनका कहना है कि नौकरी में सुरक्षा, वेतन, पेंशन आदि यह सब तो भारत की कुल श्रम-शक्ति के मात्र 6% श्रमिकों को उपलब्ध है “बाकी सब तो असंगठित क्षेत्र में हैं, सब के लिये उपलब्ध, और उनमें वो भाग्यवान है जिसे कभी एक नियुक्ति पत्र भी मिल जाये। सरकार और पब्लिक सेक्टर के ‘C’ श्रेणी के कर्मचारियों को श्रम बाजार की तुलना में दो से तीन गुना ज्यादा वेतन दिया जाता है। यह नहीं चल सकता। जब अर्थव्यवस्था में उथल-पुथल चल रही है तो ऐसी अतार्किकता को समाप्त करना ही होगा। कोविड-19 का संकट यदि उसमें कुछ तार्किकता लाने में मदद करता है तो उसमें कुछ भी विनाशकारी नहीं है।

श्री गौतम चिकरमाने, आब्जर्वर रिसर्च फाउन्डेशन, जो रिलाएंस ग्रुप से फंडेड एक थिंक टेंक है, के उपाध्यक्ष हैं। उन्होंने फाउन्डेशन के लिये 10 अप्रैल 2020 को लिखे अपने लेख में सुधारों की वकालत करते हुए कोविड-19 को एक प्रकार से उत्सव के रूप में लेने की सिफारिश की है।

गौतम चिकरमाने के अनुसार;

“संकट सुधारों के अगुआ होते हैं। संकट, पुरानी घाव बन चुकीं, समस्याओं को ठीक करने के लिये अगुआ के रूप में कार्य करते हैं। संकट हमें वैधानिक-कार्यपालिक-प्रशासनिक गफलतों से ऊपर उठाते हैं। संकट बड़े संतुलनों के लिये रास्ता साफ़ करते हैं। और, संकट राष्ट्र को संगठित करते हैं…

कोविड-19 सुधारों को लाने के लिये एक सही तूफ़ान है। अर्थशास्त्रीय दृष्टिकोण से कोविड-19, 1991 के जैसा अवसर है। भूराजनीतिक दृष्टिकोंण से कोविड-19 बालाकोट जैसा अवसर है। संवैधानिक रूप से कोविड-19 आर्टिकल 370 को रद्द करने जैसा अवसर है।

भूमि, श्रम, ढांचागत जैसे साधारण सुधार हमारे सामने हैं। ये तिकड़ी जो अभी तक हमारी आकांक्षा थी, जरूरत है कि कोविड-19 से अब उसकी शुरुआत हो। आज से तीन से छह माह के बाद भारत और दुनिया में इन सुधारों के बारे में भूतकाल की बातें मानकर बात की जायेगी। इन तीनों सुधारों को लागू करने के पीछे का तर्क बहुत सीधा है। भारत को रोजगार चाहिये। रोजगार निजी पूंजी के द्वारा निर्मित किये जाते हैं। निजी पूंजी को ऐसा व्यावसायिक वातावरण चाहिये जो उद्यमियों के लिये मित्रवत हो।

कमेटियां, कमीशन, टास्क-फ़ोर्स बनाकर समय को व्यर्थ करने का समय चला गया है। हम 21वीं सदी के कुरुक्षेत्र में हैं और सारे मोल-तौल-समझौते पीछे छूट चुके हैं। कार्रवाई ही आगे एकमात्र रास्ता है। और, सरकार के मुखिया होने के नाते, भूतकाल के खिलाफ युद्ध और एक नए तथा ‘सुधारे गए’ भारत में ले जाने की घोषणा करने का शंख प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों में ही है। हमें स्वतन्त्र भारत के सामने आई सबसे बड़ी चुनौती कोविड-19 को भारत को उपलब्ध सबसे बड़े अवसर के रूप में बदलना होगा।”

कोविड-19 काल में शासक वर्ग की मेहनतकश वर्ग के ऊपर हमला करने की सारी तैयारियां, मंशाएं और चरित्र खुलकर सामने आ गया है, जो दबे पाँव अन्य अनेक बहानों से लगातार चल रही थीं पर मेहनतकश के विरोध की वजह से पूरी नहीं हो पा रही थी। भूमि सुधार कानून, जिसके जरिये वे किसानों से उनकी ज़मीनें हड़पने का अधिकार चाहते हैं, श्रम क़ानूनों में सुधार, जिसके जरिये वे न केवल वेतन-मजदूरी ठहराने में मनमानी बल्कि मजदूरों को बिना कारण बताए कभी भी हकालने का अधिकार चाहते हैं, उनके लिए इतने जरूरी हैं कि उन सुधारों को लागू करने के लिये उन्हें कोविड-19 जैसी महामारी एक तूफान, बालाकोट जैसा सर्जिकल हमला, नव-उदारवाद का पुनर-आगमन या आर्टिकल 370 को रद्द करने जैसा समय लगता है। आज तक किसी भी देश के शासक वर्ग ने अपने ही देश के बहुसंख्यकों को तूफान से उड़ा दो, देश के दुश्मन (बालाकोट सर्जिकल स्ट्राईक), देश का अस्थायी हिस्सा( आर्टिकल 370) के रूप में नहीं देखा होगा। गौतम चिकरमाने का लेख, लेख नहीं, शर्मनाक वर्गीय घोषणापत्र है जो नग्न भाषा में हमारे सामने आया है।

असल में, किसानों की जमीन पर कब्जा करने के लिये संबंधित क़ानूनों में ढील, मजदूरों के वेतन या रोजंदारी को कम करने वाले कानून बनाने और श्रम क़ानूनों की होली जलाने का, कोविड-19 जैसी महामारी से निपटने के तरीकों के साथ या देश के बदतर होते जा रहे आर्थिक हालात के साथ दूर दूर का कोई संबंध नहीं है। यदि कुछ होगा तो वह यह कि ये सभी कदम आम किसान-मेहनतकश, जो परिवार सहित मिलाकर देश में 80 करोड़ से ज्यादा हैं, का जीवन और दूभर होगा तथा बाजार में मांग और घटेगी क्योंकि तरलता ऊपर से नीचे तभी आती है जब श्रम नीचे से ऊपर जाता है।

अरुण कान्त शुक्ला
अरुण कान्त शुक्ला

सच्चाई तो यही है कि देश की अर्थव्यवस्था कोविड-19 के संकट के पहले से संकट में थी। उसका सबसे बड़ा कारण तो बड़े-बड़े कारपोरेट का पूंजी दबाकर बैठ जाना और ‘पुराने निवेश’ में ही और निवेश करने से या नया निवेश करने से बिदकाव था। 2016 की नोटबंदी के लिए प्रधानमंत्री कितना भी अपनी पीठ खुद थपथपा लें अथवा अपने अनुयायियों से थपथपवा लें पर नोटबंदी में सूक्ष्म-लघु तथा मंझौली औद्योगिक इकाईयों को पहुंचे नुकसान की वजह से बढ़ी बेरोजगारी ने बाजार में मांग को जो धक्का पहुंचाया है, उससे देश अभी तक उबर नहीं पाया है। कोविड-19 की आड़ लेकर मजदूर और किसानों पर जो आक्रमण करने की मुहीम चलाई जा रही है, सरकारें और कारपोरेट जितनी जल्दी उससे तौबा कर लें, उतना बेहतर होगा।

बेशक, मेहनतकश के लिए समय कठिन है। सर्वहारा के वे सभी हिस्से किसान-छात्र-मजदूर-नौजवान आज जैसा कि सामने है, उठकर प्रबल विरोध करने की स्थिति में नहीं हैं। उन्हें पुन: संगठित होने और अपने अधिकारों के लिए लड़ने के लिए समय की दरकार है। पर, शासक वर्ग को यदि कोविड-19 एक अवसर लगता है तो लॉक-डाउन उनके लिए एक सबक भी होना चाहिए कि खेत, खदान, फैक्टरी, भट्टे, रेल, बस, बाजार, अस्पताल, सीवरेज़ सभी में तब ही काम होता है जब इन ‘नंगे-पाँव विस्थापन’ वालों के हाथ लगते हैं। कामगार के श्रम के बिना, पूंजी के मालिक, तथाकथित संपदा उपार्जक (Wealth Creators), एक डबल रोटी से लेकर एक सुई तक नहीं बना सकते हैं। मई दिवस यदि मेहनतकश के लिये अंधकारमय होगा तो शासकवर्ग को याद रखना होगा उनका भविष्य भी उनके लिए ‘अंधकार’ से कुछ कम नहीं होगा।

अरुण कान्त शुक्ला

विदेशी निवेश के नाम पर मजदूरों को बंधुआ बनाने की तैयारी में मोदी सरकार!

Modi in Gamchha

Government preparing to make laborers bonded in the name of foreign investment!

उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश औेर गुजरात श्रम कानून में बदलाव कर निजी संस्थान मालिकानों को थमा दिया गया है शोषण का हथियार

जो लोग प्रधानमंत्री के विदेशों में होने वाले दौरों को भारत में विदेशी निवेश से जोड़कर देख रहे थे। उसके पीछे बड़ा कारण प्रधानमंत्री का विदेशी निवेशकों को भारत में सस्ता श्रम और सस्ती जमीन देने का प्रलोभन माना जाता रहा है। मोदी के पहले कार्यकाल में भूमि अधिग्रहण और श्रम काननू में संशोधन का कवायद भी इसी रणनीति का हिस्सा रही है। इंडिस्ट्रयल रिलेशंस कोड बिल भी इसी रणनीति का बढ़ता कदम ही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के तमाम प्रयास के बावजूद व श्रम कानून मामलों में अपनी मनमानी नहीं कर पा रहे थे। अब कोरोना के संक्रमण काल में जब देश पर रोजी-रोटी का बड़ा संकट आ गया है तो अब मोदी को श्रम कानून में बदलाव करने का अच्छा मौका मिल गया है।

फिलहाल उन्होंने केंद्र सरकार से कुछ नहीं कराया है, अपनी राज्यों सरकारों को यह हथियार जरूरत थमा दिया है। विदेशी निवेश के नाम पर उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और गुजरात में लेबर लॉ में किया गया बदलाव कर दिया गया है। नोएडा और ग्रेटर नोएडा में बड़े स्तर पर विदेशी निवेश की चर्चा सरकार ने बाजार में छोड़ दी है। हालांकि श्रम कानून में किया गया यह बदलाव तीन साल के लिए बताया जा रहा है पर पर इसमें मजदूरों का शोषण और दमन तय है।

उत्तर प्रदेश सरकार ने अध्यादेश लाकर श्रमिकों को शोषण से बचाने वाले कानून नियमों को तीन साल के लिए अस्थाई रूप से स्थगित कर दिया है। हालांकि विपक्ष  में बैठी समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव और कांग्रेस की उत्तर प्रदेश की प्रभारी प्रियंका गांधी ने  इस कानून के बदलाव को मजदूर विरोधी बताते हुए इसका जमकर विरोध किया है पर सरकार के कान पर कोई जूं नहीं रेंगी है।

इस लॉ के अनुसार वर्किंग ओवर 8 घंटे से बढ़ाकर 12 घंटे करने को मंजूरी मिल गई है। हालांकि, सरकार ने कहा है कि सिर्फ वही कर्मचारी या मजदूर 8 घंटे से अधिक काम करेंगे, जो करना चाहेंगे। क्या सरकारें नहीं जानती कि नौकरी जाने का भय दिखाकर निजी संस्थाओं में श्रमिकों का कितना शोषण होता है ? अब तो इन मालिकान को मजदूरों का शोषण ही नहीं बल्कि दमन करने का पूरा मौका मिल गया है।

दरअसल कोरोना कहर के समय जब देश में बड़े स्तर पर बेरोजगारी फैल रही है तो सरकार किसी भी तरह से इस माहौल को दबाना चाहती है।

मोदी सरकार तो मजदूर व किसान को अपना बंधुआ ही समझती है तो इस बारे में उन्हें न विपक्ष और न ही मजदूर संगठनों से कोई सलाह लेने की जरूरत है। लेबर लॉ बदलाव किया जा रहा है, जिससे विदेशी निवेशकों के लिए यहां पर माहौल बनाया जा सके। ज्ञात हो कि चीन में अधिकतर आईटी कंपनियों में 12 घंटे तक भी काम होता है पर भारत में यह नहीं देखा जाएगा कि इन बारह घंटे में 4 घंटे का ओवर टाइम होता है। यानी कि 12 घंटे काम करके श्रमिक डबल वेतन उठाता है। लेबर लॉ में बदलाव भारत में श्रमिकों के शोषण का एक हथियार मिल जाएगा। यहां 12 घंटे ड्यूटी लेकर कोई-कोई ही कंपनी ओवर टाइम देगी। देगी तो सिंगल ही देगी। मतलब श्रमिकों का शोषण और बढ़ेगा, यही वजह है कि ट्रेड यूनियनें इसके खिलाफ हैं।

मौजूदा समय में इतने सख्त नियमों के बावजूद बहुत सारी कंपनियां मजदूरों का शोषण करने से नहीं चूकती हैं तो फिर नियमों में ढील देने के बाद तो कंपनियों को शोषण करने का जैसे अधिकार ही मिल जाएगा। यह तब है जब सख्त कानून होने के बावजूद निजी संस्थाएं जमकर श्रमिकों का शोषण करती हैं।

CHARAN SINGH RAJPUT, चरण सिंह राजपूत, लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।
चरण सिंह राजपूत, लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

उत्तर प्रदेश के साथ ही मध्य प्रदेश में भी बड़े स्तर पर प्रवासी मजदूरों को लाया जा रहा है। गुजरात में प्रवासी मजदूरों को रोकने की कवायद की जा रही है। यही वजह है कि गुजरात में घर जाने के लिए प्रवासी मजदूरों का हंगामा हो रहा है। इस विदेशी निवेश के लालच में मोदी सरकार के साथ ही भाजपा की प्रदेश सरकारों ने मजदूरों की जान पर भी दांव लगा दिया है। यदि उत्तर प्रदेश औेर मध्य प्रदेश को छोड़ दें तो कोई भाजपा शासित प्रदेश प्रवासी मजदूरों को लाने में दिलचस्पी नहीं दिखा रहा है।

एनडीए में शामिल नीतीश सरकार ने तो लॉक डाउन में ही मजदूरों के किराये से मना कर दिया था। हालांकि तमाम बवाल के बाद वह बैकफुट पर आई है। फिर दिल्ली सरकार ने बिहार के मजदूरों को उनके घरों को भेजने के लिए ट्रेन में आये खर्चे का हिस्सा नीतीश सरकार के न देने का आरोप लगाया है। उधर कर्नाटक में येदुयेरप्पा सरकार बिल्डरों के दबाव में प्रवासी मजदूरों  को रोकने पर आमादा है। उसने प्रवासी मजदूरों को उनके घरों को पहुंचाने के लिए चलाई जा रही ट्रेनों को रद्द तक करा दिया। कुल मिलाकर कोरोना का कहर में सबसे अधिक प्रभावित मजदूर हुआ है औेर अब उसको शोषण की भट्ठी में झोंकी की तैयारी भाजपा सरकारों ने कर ली है।

चरण सिंह राजपूत

बिहार में क्वारंटाइन सेंटर में अनियमितता के खिलाफ आवाज उठाने पर मजदूरों की पिटाई, एक मजदूर का टूटा हाथ

Workers beaten, broken hand of a laborer for raising voice against irregularities in quarantine center in Bihar

Workers beaten, broken hand of a laborer for raising voice against irregularities in quarantine center in Bihar

8 मई को एक तरफ बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार (Bihar Chief Minister Nitish Kumar) मुख्य सचिव व वरीय अधिकारियों के साथ उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक (High level review meeting) कर प्रखंड क्वारंटाइन केन्द्रों से संबंधित दिशा-निर्देश (Guidelines related to Quarantine Center) दे रहे थे, तो वहीं दूसरी तरफ 8 मई को ही बांका जिला के कई प्रखंड क्वारंटाइन केन्द्रों पर वहाँ क्वारंटाइन किये गये लोगों द्वारा वहाँ की समस्याओं को लेकर विरोध प्रदर्शन हो रहा था।

मुख्यमंत्री आदेश दे रहे थे कि प्रखंड क्वारंटाइन केन्द्रों में रह रहे लोगों की संख्या के अनुपात में किचेन की संख्या बढ़ायें, ताकि समय पर लोगों को गुणवत्तापूर्ण भोजन मिलता रहे। लेकिन दूसरी तरफ घटिया भोजन की शिकायत करने पर बांका जिला के शंभूगंज थानान्तर्गत द्वारिका अमृत अशर्फी उच्च विद्यालय स्थित क्वारंटाइन केन्द्र (Quarantine Center located at Dwarka Amrit Ashrafi High School under Shambhuganj in Banka District) पर पुलिस क्वारंटाइन किये गये मजदूरों पर लाठियां बरसा रही थी।

मुख्यमंत्री आदेश दे रहे थे कि क्वारंटाइन केन्द्रों पर आवासितों की संख्या के अनुपात में शौचालय एवं स्नानागार की भी पर्याप्त व्यवस्था हो। वहाँ पानी, बिजली एवं साफ-सफाई की पर्याप्त व्यवस्था हो। लेकिन दूसरी तरफ बांका जिला के रजौन, बेलहर व बौंसी प्रखंड के कई क्वारंटाइन केन्द्रों पर पीने के पानी व शौचालय की पर्याप्त व्यवस्था को लेकर वहाँ के लोग अपना विरोध जता रहे थे।

दरअसल प्रवासी मजदूरों की घर वापसी को लेकर बिहार सरकार का काफी ढुलमुल रवैया रहा है।

Patna: Bihar Chief Minister Nitish Kumar addresses during a programme in Patna on Jan 7, 2019. (Photo: IANS)  पहले तो नीतीश कुमार ने प्रवासी मजदूरों को बिहार की सीमा में प्रवेश पर ही रोक लगा दिया था, लेकिन जब देश के अन्य राज्य अपने मजदूरों को दूसरे राज्यों से लाने लगे और नीतीश कुमार पर भी काफी राजनीतिक दबाव बना, तब इन्होंने बिहारी प्रवासी मजदूरों को वापस बिहार लाने पर सहमति दी।

बिहार सरकार ने घोषणा किया कि वे सभी लोग जो बाहर से आएंगे, उन्हें 14 दिन तक क्वारंटाइन केन्द्र में रखा जाएगा। इन्होंने घोषणा तो कर दी, लेकिन ग्रामीण स्तर पर विद्यालयों में बनाये गये क्वारंटाइन केन्द्रों में इन्होंने पर्याप्त व्यवस्था कहीं भी नहीं की।

ग्रामीण स्तर पर बने क्वारंटाइन केन्द्रों में अव्यवस्था चरम पर है। कहीं खाना में कीड़ा मिल रहा है, तो कहीं पीने का पानी नहीं है। कहीं शौचालय का इंतजाम नहीं है, तो कहीं स्नानागार नहीं है। जो मजदूर किसी तरह अपने राज्य पहुंचे हैं, वे यहाँ की बदतर हालत देखकर काफी व्यथित हैं और क्वारंटाइन केन्द्रों पर व्याप्त अनियमितता के खिलाफ आवाज भी उठा रहे हैं।

9 मई को ऑल इंडिया रेडिओ न्यूज के द्वारा किये गये एक ट्वीट के अनुसार अब तक 70 स्पेशल ट्रेनों से 82 हजार 554 लोग दूसरे राज्यों से बिहार वापस आ चुके हैं, जिसमें मजदूर, छात्र और अन्य तबके शामिल हैं।

 

8 मई को बांका जिला के कई प्रखंड क्वारंटाइन केन्द्रों में हुआ विरोध-प्रदर्शन

शंभूगंज प्रखंड के द्वारिका अमृत अशर्फी उच्च विद्यालय स्थित क्वारंटाइन केन्द्र में 88 मजदूरों को रखा गया है।

मजदूरों का कहना है कि भोजन में घटिया चावल व दाल के नाम पर सिर्फ पानी ही दिया जा रहा था। भोजन में लगातार कीड़ा भी निकल रहा था। जिस कारण हम लोगों ने इसका विरोध किया। फलस्वरूप पुलिस ने हमलोगों पर लाठी चार्ज कर दिया, जिससे शंभूगंज प्रखंड के पकड़िया गांव के रहने वाले एक मजदूर का हाथ टूट गया और कई मजदूर के शरीर पर लाठियों के निशान पड़ गये।

मजदूर का हाथ टूटने के बाद आनान-फानन में प्रशासन ने उन्हें भागलपुर के जवाहरलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज अस्पताल में भर्ती कराया और मजदूर से कहा कि पूछने पर बताना कि दीवार से गिरने से उसको चोट लगी है, लेकिन मजदूर ने अस्पताल में पुलिस द्वारा पिटाई से हाथ टूटने की बात ही बतायी। इस मसले पर स्थानीय प्रशासनिक अधिकारी लगातार अपनी बात बदल रहे हैं।

नोडल जिला उपनिर्वाची पदाधिकारी सुरेश प्रसाद व थाना प्रभारी उमेश प्रसाद ने पुलिस द्वारा पिटाई को ही निराधार बता दिया। वहीं शंभूगंज सीओ परमजीत सिरमौर ने कहा कि उक्त व्यक्ति कर्नाटक से आया है, उसे क्वारंटाइन किया गया है। वह घर भाग रहा था, बारिश की वजह से फिसलने से उसका हाथ टूट गया है।

बौंसी के अद्वैत मिशन हाई स्कूल, शिव धाम स्थित क्वारंटाइन केन्द्र में 128 लोगों को रखा गया है। उन लोगों को 7 मई की रात में खाना ही नहीं दिया गया। पीने का स्वच्छ पानी भी नहीं दिया जा रहा था। जिस कारण इन लोगों ने भी विरोध-प्रदर्शन किया। बाद में उच्च पदाधिकारियों के आने के बाद सभी मांगों को पूरा करने के आश्वासन के बाद मामला शांत हुआ।

freelance journalist Rupesh Kumar Singh
रूपेश कुमार सिंह

रजौन प्रखंड के शिव सुभद्रा पब्लिक स्कूल स्थित क्वारंटाइन केन्द्र में 133 व्यक्ति व उच्च विद्यालय, धौनी में 64 व्यक्तियों को रखा गया है। यहाँ भी खाना-पीना व शौचालय-स्नानागार में व्याप्त अनियमितता को लेकर क्वारंटाइन में रह रहे लोगों ने विरोध प्रदर्शन किया है।

बेलहर प्रखंड के जिलेबिया मोड़ क्वारंटाइन केन्द्र पर भी विरोध-प्रदर्शन हुआ। यहाँ क्वारंटाइन में रह रहे लोगों का कहना था कि भेड़-बकरी की तरह हम लोगों को रखा जा रहा है। यहाँ फिजिकल डिस्टेन्सिंग का भी पालन अधिकारियों के द्वारा नहीं किया जा रहा है। सभी को एक ही जगह बैठाकर खाना खिलाया जाता है।

बिहार का पुलिस-प्रशासन क्वारंटाइन केन्द्रों में व्याप्त अनियमितता की सच्चाई को छिपाने की कितनी भी कोशिश क्यों ना करे, लेकिन इन अनियमितताओं का विरोध करने पर मजदूर के टूटे हाथ और शरीर पर लाठियों के निशान की तस्वीर सच बयां कर ही देती है। इस पंक्ति के लेखक ने इस बावत एक ट्वीट कर जब मामले को रखा, तो उसे रिट्वीट कर भाकपा (माले) लिबरेशन के राष्ट्रीय महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य ने लिखा, ‘बेहद दुखद व शर्मनाक। शासन के नाम पर अब सिर्फ क्रूरता रह गई है।’

रूपेश कुमार सिंह

 

कोरोना डायरी : किस्से में बदल जाओगे तुम ‘कोरोना’

Novel Cororna virus

Corona diary: ‘Corona’, you will turn into a story

तुम सिर्फ लोगों की ही नहीं मार रहे हो, तुम देश की अर्थव्यवस्था से लेकर सामाजिक ताने-बाने को भी छिन्न-भिन्न कर रहे हो कोरोना।

आने वाली पीढ़ी के लिए किस्सा बनकर दुनिया में जिन्दा रहोगे तुम ‘कोरोना।’ हमने नहीं देखा स्पैनिश फ्लू, प्लेग, चेचक, हैजा, मलेरिया जैसी विकराल महामारियों को, जिसने लाखों-लाख लोगों को काल के गाल में समां दिया। किस्से पढ़े और सुने जरूर हैं अपने बड़ों से। गाँव के गाँव चंद दिनों में खत्म होने की दास्तां सुनने भर से रुह कांप उठती है। आज कोरोना के चलते वो सब त्रासदी साक्षात होती हुई दिख रही है।

यह महाप्रलय कहाँ जा कर थमेगी, अभी कहना असंभव है। लेकिन जिन्दगी जीतेगी, इसका भरोसा है। किसी चमत्कार से नहीं, बल्कि विज्ञान के बल पर दुनिया फिर से रंगीन और गुलजार होगी। सब कुछ सामान्य होने पर सुनाये जायेंगे नयी पीढ़ी को कोरोना के किस्से।

Rupesh Kumar Singh Dineshpur
रूपेश कुमार सिंह
समाजोत्थान संस्थान
दिनेशपुर, ऊधम सिंह नगर

टूटती जिन्दगी की आह, भूख से उठती पेट की कराह, मासूम को कोख में खोने की पीड़ा, पीठ पर पड़ी एक-एक लाठी का दर्द, निरंकुश होती पुलिस, आपा खोती सरकार, उजड़ती दुनिया, जुगाली करते हुकमरान, बिना उपकरणों और ठोस तैयारी के कोरोना से जंग, सैकड़ों किमी का पैदल सफर, रेंगता समय, नफरत की घिनौनी राजनीति, गाँव को लौटते मजूदर, खाली होते शहर, सुनसान सड़कें, वाहनों के थमे पहिए, स्वच्छ हवा, बेमौसम बरसात, प्रदूषण से दूर खुला आसमान, मदद पहुँचाते लोग, घरों में सिमटे लोग, शराब की दुकान पर चालिस दिन बाद लोगों की सुनामी, एक ही दिन में सबसे सबसे ज्यादा शराब बिकने का रिकार्ड, अच्छे और बुरे न जाने कितने अनुभव बनकर तुम बतलाये जाते रहोगे हमेशा-हमेशा, पीढ़ी दर पीढ़ी। स्वाईन फ्लू, वर्ड फ्लू, सार्स, एन्थ्रेक्स, डेंगू को तो हमने देखा है और देख भी रहे हैं। लेकिन तुम बहुत खतरनाक हो। तुम सिर्फ लोगों की ही नहीं मार रहे हो, तुम देश की अर्थव्यवस्था से लेकर सामाजिक ताने-बाने को भी छिन्न-भिन्न कर रहे हो।

हर व्यक्ति अलग अनुभव कर रहा है कोरोना काल में। सबको अपने अनुभव और गतिविधि साझा करनी चाहिए।

-रूपेश कुमार सिंह

जनता का घर जलाकर अर्थव्यवस्था को मजबूत करना… क्या शराब पर ही भारतीय अर्थव्यवस्था टिकी हुई है ?

Rihai Manch appeals to Kerala's Chief Minister to send 86 laborers from Nizamabad, Azamgarh trapped in remote Mallapuram

Strengthening the economy by burning people’s houses … Is the Indian economy resting on alcohol?

43 दिन की पूर्णबन्दी के बाद रेड जोन से लेकर आरेंज और ग्रीन जोन पूरे भारत में शराब के ठेके का खोले गए। ठेके खुलते ही दिल्ली समेत सभी राज्यों में लॉकडाउन में सोशल डिस्टेंसिंग – Social distancing in lockdown (सामाजिक दूरी) की धज्जियां उड़ाती भारतीय जनता की उमड़ती भीड़ को संभालना मुश्किल हो गया। जैसे-तैसे दुकानों की भीड़ को कम करने के लिए दुकानों को बन्द करना पड़ा, लेकिन अगले ही दिन एक खबर पढ़ने को मिली कि छत्तीसगढ़ के जांजगीर जिले में शराब के नशे में एक बेटे ने अपनी मां को पीट-पीट कर हत्या कर दी, दूसरे दिन छत्तीसगढ़ से ही खबर आई की नशे में बेटा ने बाप की हत्या कर दी।

There is already domestic violence (mental and physical) on women in Indian society, one of the main reasons is alcohol.

भारतीय समाज में महिलाओं के ऊपर पहले से ही घरेलू हिंसा (मानसिक और शारीरिक) होती रही है जिसका एक बड़ा कारण शराब है।

लॉकडाउन में महिला अपने ऊपर होने वाली हिंसा की शिकायत कहीं नहीं कर पाई, यही वजह है कि घर में रहने वाले पुरुष उसके ऊपर हिंसा करते रहे। और अब जब शराब पीने की सरकारी छूट मिल गई तो ये मामले इतने घातक हो गए कि महिला को अपनी जान से हाथ धोना पड़ रहा है। कहना नहीं होगा कि ये तो अभी शुरुआत है महिला और पुरुष जब दोनों की एक घर मे चौबीस घंटे रहते हैं तो उनके बीच छोटी-मोटी नोंकझोक होना स्वाभाविक है, लेकिन अब ऐसी नोकझोंक में पुरुष शराब पीकर महिला पर अपनी कुंठा निकाल सकता है। लेकिन महिला का क्या होगा, वो इसकी हिंसा का शिकार होकर अपनी जान तक गंवा सकती है। इसका कुप्रभाव बच्चों पर भी प्रत्यक्ष रुप से पड़ेगा। इस हिंसा का शिकार महिला के साथ-साथ बच्चे भी हो सकते हैं।

सरकार ने तीसरे लॉकडाउन में जरूरी सामानों की दुकान खोलने व सामान बेचने की बात की ज्ञात हो कि जरूरी सामान वो होते हैं जो हमारे रोजमर्रा की जिन्दगी में काम आते हैं और सभी के लिए समान रूप से उसकी आवश्यकता होती है। जैसे सबसे पहले रोटी, दवा, उसके बाद कपड़े शिक्षा आदि हो सकते हैं। सरकार को शराब जरूरी सामान नजर आई। महिला संगठनों ने इसका विरोध किया है। सरकार का तर्क है कि शराब के उत्पादन से राजस्व की आमदनी बढ़ती है और कोरोना के कारण भारत में आर्थिक मन्दी की मार झेल रहे भारत को शराब बिक्री से थोड़ी राहत जरूर मिल सकती है।

शराब बन्दी हटने से पहले ही दिन से शराब से मिलने वाली आमदनी सौ करोड़ की रही।

आरबीआई की रिपोर्ट के अनुसार 2019-20 के दौरान 29 राज्यों और यूपी, दिल्ली पुदुचेरी ने शराब पर 1,75,501.42 करोड़ रुपये का उत्पादन शुल्क बजट रखा था जो कि 2018-19 के दौरान एकत्र किए गए शुल्क 1,50,657.95 करोड़ रुपये से 16 प्रतिशत अधिक था लेकिन कोविड-19 के कारण अब इस तरह से आने वाला उत्पादन शुल्क एकदम घट गया है।

नशे के कुप्रभाव से सबसे ज्यादा जूझ रहे पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने भी खराब होती वित्तीय स्थिति का हवाला देते हुए शराब के ठेके खोलने की मांग की है। उनका कहना है कि राज्य सरकार को साल भर में 62 करोड़ रुपये की आमदनी शराब के ठेके नीलाम करने से होती है, जो प्रति महीना 521 करोड़ रुपये बनता है, लेकिन इन 43 दिनों से शराब के ठेके बन्द होने के कारण राज्य सरकार को इस आमदनी से हाथ धोना पड़ रहा है, जबकि पंजाब में नशा एक सामाजिक बीमारी बन चुकी है बहुत से युवा नशे की लत के कारण अपनी जान गवां रहे है, जिस पर फिल्म (उड़ता पंजाब) भी बन चुकी है।

राज्य सरकारों के तर्क पर गौर करे तो ऐसा लगता है कि जैसे शराब पर ही भारतीय अर्थव्यवस्था टिकी हुई है। क्या भारत के पास शराब द्वारा राजस्व प्राप्त करने के अलावा अन्य उद्योगो में कोई विकल्प नहीं बचा है जबकि छोटे मंझोले उद्योगों के मालिक बार-बार अपनी फैक्टरी खोलने के लिए कह रहे हैx।

शराब के ठेके खोलने की मांग जनता की मांग नहीं है। ये सरकारें अपने लाभ के लिए खोल रही हैं, जबकि समय-समय पर महिलाओं ने शराब का विरोध किया है, शराब के ठेके जलाये हैं, क्योकि ठेके खुलने व शराब का सबसे ज्यादा कुप्रभाव महिलाओं पर ही देखा जा सकता है।

हमारे अपने मोहल्ले (प्रेम नगर किरारी) में ठेके खुलने पर गली के दो परिवार के आदमी सारा दिन ठेके पर शराब की लाइन में लग कर जब शाम को घर पहुंचे, तब औरतों ने उनका मौखिक विरोध किया और सरकार के इस कदम की आलोचना की, और ऐसी स्थिति कई इलाकों की है जहां पर महिलाएं इस बात से डरी हुई थीं कि लॉकडाउन में शराब (Liquor in lockdown) न मिलने के कारण उनके पति उन पर हाथ नहीं उठाते थे लेकिन शराब पीकर छोटी-छोटी बात पर हाथ उठाना शुरु कर देते हैं।

आज ऐसे समय जब भारतीय जनता दो वक्त की रोटी पाने के लिए सारा दिन लाइन में रही है, मजदूरों की नौकरी छूट जाने के कारण घर में राशन का इंतजाम कर पाने में असमर्थ है, ऐसे में मजदूर या गरीब परिवार के पुरुष शराब पीने के लिए पैसे कहां से खर्च करेगा? जाहिर है वो महिलाओं पर अपना गुस्सा निकालेगा या फिर घर से सामान को बेच पैसे का जुगाड़ करेगा, इससे सीधे महिलाएं प्रभावित होंगी, ऐसे वक्त में शराब के ठेकों का खुलना गरीब के घर में आग लगाकर अपनी प्यास बुझाने जैसा है। छोटे-छोटे बच्चे नशे के शिकार हो रहे हैं उस पर लगाम लगाने के बजाये सरकार इस तरह के फैसले करके नशे को प्रोत्साहन दे रही है। पूरी दुनिया कोरोना के कारण आर्थिक मन्दी का शिकार हो रही है। कोरोना से लड़ने के लिए टेस्टिंग के साथ इम्यूनिटी सिस्टम को मजबूत करने की बात डॉक्टर बार-बार बोल रहे हैं, साथ ही कोरोना संक्रमण के मामले में शराब गुटका तंबाकू आदि नशीले पदार्थ से दूर रहने की बात की गई थी और यह भी कहा गया था कि इन पदार्थों का सेवन करने वालो को कोरोना का खतरा अधिक है, ऐसे में शराब की दुकान खोलना जानबूझ कर लोगों को मौत के करीब ले जाने के लिए उकसाने जैसा है, जहां शराब मिलने की खुशी में लोग सामाजिक दूरी का पालन नहीं पा रहे हैं और शराब के नशे में सामाजिक दूरी का पालन कर पाने की चेतना खो बैठेंगे।

लॉकडाउन की कड़ी परीक्षा के बाद कोरोना के खिलाफ जंग में जो ताकत मिली थी, वह सरकार ने शराब की दुकानें खोल कर दो दिन में गवां दी। शराब की दुकान खुलने से संक्रमण का खतरा बढ़ जायेगा। दिल्ली में मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने तीसरे चरण के लॉकडाउन में ढील देते हुए कहा कि ‘‘दिल्ली के लोगों को अब कोरोना के साथ जीने की आदत डाल लेनी चाहिए’’। मुख्यमंत्री ने कोरोना की समानता भारत में हर साल आती महामारी मलेरियां से कर दी, लेकिन क्या यह सच नहीं कि मलेरिया का टीका आ चुका है और उस पर काबू पाया जा चुका है जबकि कोरोना ऐसा वायरस है जिसने दुनिया को पूर्णबन्दी करने पर मजबूर कर दिया।

भारत में लॉकडाउन रहते आज की तारीख में 56,342 मामले हो गए हैं 1886 मौत हो चुकी है जो कि चिंता का विषय है कल तक और भी बढ़ जायेंगे, अकेले दिल्ली में कोरोना के मामले 5000 मामले हो चुके हैं और इसके साथ ही कोरोना के मरीज दिल्ली में तेजी से बढ़ रहे हैं। ऐसे में देश की सरकार ने लॉकडाउन में जरूरी सामान, उत्पादों पर ढील देते हुए शराब के ठेके खोल दिए। इसका मतलब स्पष्ट है कि लॉकडाउन तक जो कोरोना एक अदृश्य दुश्मन था और हमारे देश का हर नागरिक एक सिपाही था, उसे अब कोरोना के आगे हथियार डाल कर उसके साथ जीने की आदत डाल ले, यह इस बात को साबित करता है कि सरकार अपनी जनता के प्रति कितनी संवेदनहीन है या फिर यह कहे कि भारत सरकार इतनी भी काबिल नहीं भारतीय जनता के एक वर्ग को दो वक्त की रोटी मुहैया करवा सके।

डॉ. अशोक कुमारी

एलजी पॉलीमर्स : उत्पाद की धुन में यह उत्पात कब तक?

LG Polymers

आजकल सोशल मीडिया पर सरकार के पक्ष में एक अपुष्ट खबर लोग खूब प्रचारित कर रहे हैं, इसके अनुसार अमेरिका अपनी लगभग एक हजार औद्योगिक इकाइयां भारत में स्थानांतरित करने पर विचार कर रहा है. इसे इस तरह प्रचारित किया जा रहा है मानो यह सरकार की एक बहुत बड़ी उपलब्धि है. इससे पहले उत्तर प्रदेश के नोएडा में जब सैमसंग नामक चर्चित कंपनी ने स्मार्टफोन की इकाई को स्थापित किया था तब प्रधानमंत्री ने भी कहा था कि अब बहुत सारी अंतर्राष्ट्रीय कम्पनियां भारत में आने वाली हैं, और इससे रोजगार के बेहतर अवसर उपलब्ध होंगे. देश में रोजगार की क्या स्थिति है, यह सरकार और उनके भक्तों को छोड़कर सबको पता है.

भारत में बहुराष्ट्रीय कंपनियां क्यों आती हैं ? | Why do multinationals come to India?

दरअसल, भारत में कम्पनियां इसलिए नहीं आतीं कि यहाँ बेहतर माहौल है बल्कि इसलिए आतीं हैं कि दुनिया के किसी भी बड़े देश में प्रदूषण फैलाने वाली इकाइयों को अपनी मर्जी से प्रदूषण फैलाने की सुविधा नहीं मिलती. हमारे देश में यह सुविधा भरपूर है और यदि कुछ हो भी जाता है, लोग मर भी जाते हैं तो सरकारें लाशों पर मुवावजा फेंक देती हैं और हत्यारी कंपनियों पर कोई आंच नहीं आने देती. ऐसी सुविधा दुनिया में कहीं नहीं है.

पहले चीन में कंपनियों की खूब आवभगत होती थी, पर अब बढ़ते प्रदूषण ने वहां की कंपनियों को भी दूसरे देश में स्थापित करने पर मजबूर कर दिया है. चीन इन दिनों अपने अधिकतर प्रदूषणकारी उद्योगों को दक्षिणी अमेरिकी देशों में या फिर अफ्रीका में स्थापित कर रहा है.

History of industrial accidents in India

हमारे देश में औद्योगिक दुर्घटनाओं का एक लम्बा इतिहास रहा है और किसी उद्योग को आजतक दोषी नहीं ठहराया गया है. भोपाल के यूनियन कार्बाइड की घटना (Union Carbide incident in Bhopal) तो दुनिया के सबसे भयानक औद्योगिक दुर्घटना (The world’s most terrible industrial accident,) के तौर पर जानी जाती है, पर हजारों जानों की बलि लेने के बाद भी यूनियन कार्बाइड की कोई जिम्मेदारी नहीं तय की गई और ना ही किसी को दंड मिला. हाँ, उद्योगों को इतना स्पष्ट हो गया कि भारत में कितनी भी दुर्घटना हो या फिर प्रदूषण हो, सरकारें उन्हें बचा ही लेंगीं और सरकारी अधिकारी रिश्वत लेकर किसी को भी बचा लेंगे, और तो और यहाँ की न्यायापालिका भी हमेशा उद्योगों का ही पक्ष समझ पाती हैं.

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तमिलनाडु के स्टरलाइट कॉपर (Sterlite Copper of Tamil Nadu) का हाल भी लोग देश चुके हैं, जिसने प्रदूषण फैलाकर लोगों को खूब प्रभावित किया, विरोध करते 13 लोगों को गोलियों से भून डाला. पर, कंपनी का कोई अधिकारी दोषी नहीं ठहराया गया. तमिलनाडु प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (Tamil Nadu Pollution Control Board) ने जब इस कंपनी से फ़ैलाने वाले प्रदूषण की चर्चा की और इसे दोषी ठहराया तो केन्द्रीय पर्यावरण मंत्रालय, केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और राष्ट्रीय हरित न्यायालय ने एकजुट होकर कंपनी को सारे आरोपों से बरी कर दिया.

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विशाखापत्तनम स्थित साउथ कोरियाई कंपनी, एलजी पोलीमर्स, से गैस लीक होने की खबर (News of gas leaks from Visakhapatnam-based South Korean company, LG Polymers) भी सभी समाचार माध्यमों पर 7 अप्रैल को दिनभर दिखाई देती रही, गिरते पड़ते लोग भी दिखते रहे, राहत पैकेज की बात भी की गई और फिर मामला ओझल कर दिया गया. गैस किसी उद्योग से रिसी, यह साबित करने में कोई महीनों का समय नहीं लगता है फिर भी राहत की बात राज्य सरकार क्यों करती है यह समझ से परे है, सीधे उद्योग को ही क्यों नहीं यह राहत का काम करने के लिए बाध्य किया जाता है.

जिस रात यह घटना हुई, उसी रात छत्तीसगढ़ के रायगढ़ में भी पेपर मिल से गैस रिसाव हुआ और तमिलनाडु के कडलूर में नैवेली लिग्नाईट कारपोरेशन के प्लांट में धमाका हुआ.

उद्योगों में धमाके, विस्फोट, गैस का रिसाव, आग, प्रदूषण – यह सब हमारे देश की सामान्य अवस्था है.

इस देश में उद्योगों से सम्बंधित अधिकतर सरकारी विभागों का काम कोई नहीं है, उन्हें सिर्फ रिश्वत वसूलने का वेतन सरकार देती है. जाहिर है, न तो सरकारी अधिकारी और न ही उद्योग किसी भी दुर्घटना के लिए जिम्मेदार होते हैं. दुर्घटना होती है, एक दिन अफरातफरी मचाती है, समाचार बनता है और फिर अगले दिन से कुछ प्रभावित परिवारों को छोड़कर सबकुछ सामान्य हो जाता है. इस बीच सरकार मुवावजे का ऐलान कर देती है, जिससे लोग खुश हो जाते है और सबकुछ भूल जाते हैं.

एलजी पोलीमर्स से गैस रिसाव (Gas leak from LG Polymers) के बाद यूनियन कार्बाइड दुर्घटना को भी लोगों ने एक दिन के लिए याद किया. इन दोनों दुर्घटनाओं का पैमाना तो अलग है, प्रभाव भी अलग है, फिर भी बहुत समानताएं हैं. दोनों बहुराष्ट्रीय कम्पनियां हैं, दोनों से गैस का रिसाव देर रात में हुआ, दोनों उद्योग पहले बंद थे और फिर वापस खोलने की तैयारी कर रहे थे, दोनों उद्योगों से गैस का रिसाव द्रव से हुआ जो टैंक में रखा था.

No one has the number of industrial accidents in the country
महेंद्र पाण्डेय Mahendra pandey लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।
महेंद्र पाण्डेय Mahendra pandey
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

  देश में कितनी औद्योगिक दुर्घटनाएं होती हैं, इसका आंकड़ा किसी के पास नहीं है. अधिकतर दुर्घटनाओं की जानकारी भी किसी के पास नहीं होती और सम्बंधित उद्योग कर्मचारियों को डरा धमकाकर उनका मुंह बंद कर देते हैं. फिर भी सरकारी आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2014 से 2016 के बीच देश में औद्योगिक दुर्घटनाओं में लगभग 54000 लोगों ने अपनी जान गवाई. पर, इस सम्बन्ध में काम करने वाले गैर-सरकारी संस्थाओं के अनुसार यह आंकड़ा बहुत कम है, वास्तविक आंकड़ा इससे 15 गुना अधिक होगा.

जाहिर है कि प्रदूषण और दुर्घटनाओं को जो देश सरकारी स्तर पर बढावा देता हो, वहां आखिर दुनिया भर से भगाए जा रहे प्रदूषणकारी उद्योग क्यों नहीं जायेंगे? हमारी सरकारें तो ऐसे उद्योगों का स्वागत करती हैं और सरकारी समर्थक इसे सरकार की जीत मानते हैं. आखिर, मरती तो जनता है जिसका कोई मोल नहीं है.

महेंद्र पाण्डेय

 

“अमिट संबंध” : आत्मा-परमात्मा

Samiksha Thakur समीक्षा ठाकुर

अमिट संबंध” : आत्मा-परमात्मा | “Indelible relation”: soul-divine

 

वसु बहती नद्य-नीलिमा मैं,

तुम अम्ब धवल विस्तार प्रिय |

शीशोद्गम श्यामल उर्मि मैं,

तुम नीलकंठ कामारि प्रिय ||

तुम अम्ब धवल विस्तार प्रिय ||

 

मैं बहुल वर्ण खग-मृग विचरित,

तुम अमिट सकल संसार प्रिय |

मैं श्वेत-छवि द्वि-ध्रुव-ध्वनि हूँ ,

तुम महाखण्ड आकार प्रिय ||

तुम अम्ब धवल विस्तार प्रिय ||

 

Samiksha Thakur समीक्षा ठाकुर
समीक्षा ठाकुर

प्रति अक्षि-हृय हिमनद सम है,

तुम उदयित पारावार प्रिय |

मैं कुमुद बनी,तुम मधुप बनो,

ज्यों अंजन-दृग श्रंगार प्रिय ||

तुम अम्ब धवल विस्तार प्रिय ||

 

समीक्षा ठाकुर

नाथ-नगरी, बरेली, उत्तर-प्रदेश, भारतवर्ष

अमेरिका में अब तक 76,928 लोग मारे गए। उनकी लाशें कहाँ गयी? अंत्येष्टि कैसे हुई?

Corona virus

76,928 people have died in the US so far. Where did their dead bodies go? How was the funeral?

अमेरिका में अबतक 76,928 लोग मारे गए। उनकी लाशें कहाँ गयी? अंत्येष्टि कैसे हुई?

ये हालात भारत में भी बन रहे हैं।

हमें चुप कराने की संस्थागत कोशिश में लगे मित्र भविष्य और वर्तमान का सामना करें।

पूंजीवादी मुक्तबाजारी विश्वव्यवस्था ने इतिहास के तमाम निर्मम नरसंहार की कथा को इस योजनाबद्ध नरसंहार से धूमिल कर दिया है।

आधुनिक ज्ञान विज्ञान, तकनीक मनुष्य को बहाने में फेल हैं।

साहित्य, कला, संस्कृति के रथ महारथी इस नरसंहार के गौरव गान में लगे बजरंगियों के आगे अपनी जान, नौकरी, हैसियत और मखमली खाल बचने के लिए बेबस हैं। गोबर से बेहतर नहीं है उनकी कुलीन प्रतिभा।

न्यूयार्क से डॉ. पार्थ बनर्जी का ताजा अपडेट। जरूर पढ़ लें।

पलाश विश्वास

इस तरह चुपचाप निकल गया शशिभूषण द्विवेदी

Shashi Bhooshan Dwivedi

शशिभूषण द्विवेदी के असामयिक निधन (Untimely demise of Shashibhushan Dwivedi) से स्तब्ध हूँ। गम्भीर सिंह पालनो, ज्ञानेंद्र पांडेय और अवधेश प्रीत हमारी पीढ़ी के लेखक रहे हैं, जो एक साथ पले, पढ़े बढ़े और साथ ही बिखर गए।

शशि हमसे जूनियर था।

जब मेरे पिता पुलिनबाबू कैंसर से मरणासन्न थे तब वह उन्हें देखने रुद्रपुर से किसी के साथ आया था। कोलकाता में होने की वजह से इससे पहले उससे मुलाकात नहीं हुई थी। तब भी मैं कविता कहानी लिख रहा था और मेरा उपन्यास अमेरिका से सावधान छप रहा था। इसलिए पत्र पत्रिकाओं पर नज़र रहती थी। वह तभी से बहुत अच्छा लिख रहा था। हंस और शायद कथादेश में भी उसकी कहानियां छप चुकी थीं।

दूसरी मुलाकात उससे तब हुई जब पिताजी के निधन के बाद 2001 में ट्रेन से रामपुर उतरकर बस से देर रात रुद्रपुर पहुंचा। वह बस अड्डे पहुंचकर स्टेट बैंक के पीछे आवासीय कालोनी में अपने घर मुझे ले गया। उसकी मां और पिताजी से मुलाकात हुई।

उसके घर जाने का सिलसिला बना तो पता चला कि वह बेरोज़गार था। मैंने कहा कि पत्रकारिता करोगे तो नौकरी मिल जाएगी। वह राजी नहीं था, लेकिन मां के कहने पर किसी तरह राजी हुए वह।

मैंने दैनिक जागरण के प्रबंधक चंद्रकांत त्रिपाठी और अमर उजाला के लिए वीरेन दा डंगवाल को पत्र लिखकर उसे बरेली भेज दिया।

वह पत्रकार बन गया और बाद में सुना कि दिल्ली निकल गया है। फिर उससे कोई मुलाकात न हो सकी। उसने सम्पर्क भी नहीं किया।

बहुत प्रतिभाशाली था। पत्रकार खोजने में कभी मेरी खूब साख थी। मैंनं देखते ही उसकी सम्भावनाओं को पहचान कर लिया था। लेकिन उसके लिखे का मूल्यांकन करने की नौबत नहीं आई। न उससे कोई ज्यादा सम्वाद बना।

वह मेरे इलाके का है और लिखता पड़ता है, इसलिए दिलो दिमाग में वह हमेशा बना हुआ था।

आज फेसबुक से जानकारी मिली तो अमलेंदु को फोन लगाकर खबर कन्फर्म की।

कहने को कुछ है नहीं। उसे ठीक से जान भी नहीं सका कि वह इस तरह निकल गया।

बहुत दुख हो रहा है।

विनम्र श्रद्धांजलि

पलाश विश्वास

ट्रेन से कुचल गए 14 : महामारी के पर्दे में ग़ुलाम बनाये जाने के खिलाफ लड़ते हुए मारे गये

Ghar Se Door Bharat Ka Majdoor

8 मई को 14 प्रवासी कामगार ट्रेन से कुचल गए | 14 migrant workers crushed by train on 8 May

प्रवासी मजबूर महामारी के पर्दे में ग़ुलाम बनाये जाने के खिलाफ लड़ते हुए मारे गये

वे थकावट से मर गए, अपने घरों में वापस चले गए, तयशुदा भूख से दूर, यह जानते हुए कि उन्हें कोई वेतन नहीं मिलने वाला है और न घर से दूर 10 फुट वर्ग कमरे के कमरे में वायरस से बचना संभव था। वे यह जानते हुए भी चले कि वे सरकारों के लिए सिर्फ आँकड़े हैं, इस बात को चुपचाप स्वीकार करते हुए कि परिवहन सुविधाओं की व्यवस्था तो अमीरों के लिए की जाती है, न कि अनगिनत बेनामी मज़दूरों के लिए। वे संगरोध घरों (क्वारंटाइन) में भर दिये गए, औपनिवेशिक अवशेष- महामारी अधिनियम के तहत जेलों में वापस भरे गये अपनी बस्तियों में वापस छोड़ दिये गये।

पुलिस द्वारा रास्ते से पीटा जाना उनके जोखिम का हिस्सा था। उन्हें शासकों से न्याय की कोई उम्मीद नहीं रही; वे उस परिवहन के तरीके का इस्तेमाल करते हैं जो पूरी तरह से निजी है- उनके पैर।

राजमार्गों पर, उनकी टक्कर कभी-कभी ट्रकों और उन वीआईपी वाहनों से हुई जो लॉकडाउन में चल रहे हैं। पुलिस टोका-टोकी से बचने के लिए, अब पूरे देश में वे रेलवे लाइनों के किनारे चल रहे हैं, क्योंकि ट्रेनें तो उनके लिए चलेगी नहीं। उन्हें अपने ही देश के भीतर कैदी घोषित किया गया है, अगर अँग्रेज़ चले गए तो क्या? इसलिए वे रेल की पटरियों पर सोते हुए मर जाते हैं, जैसा कि आज सुबह महाराष्ट्र के 14 मज़दूरों की मौत हुई।

वे महाराष्ट्र से घर पैदल लौट रहे थे। कर्नाटक सरकार खुले आम आदेश करती है कि प्रवासी घर नहीं जा सकते- बिल्डर्स को उनकी जरूरत है।

केंद्रीय श्रम मंत्री ट्रेड यूनियनों से कहते हैं कि वे मज़दूरों को ‘रहने’ के लिए तैयार करें ताकि उद्योग खुल सके! दिल्ली सरकार ट्रेनों की मांग करने में टालमटोल करती है। ओडिशा उच्च न्यायालय का फैसला है कि ट्रेनों को रद्द कर दिया जाए ताकि प्रवासियों का अपने घर में कदम रखने से पहले जांचा जा सके; वे खुद ओडिशा में जांच क्यों नहीं कर सकते? क्योंकि वे कोई नहीं हैं, बस जब जरूरत होती है तब इस्तेमाल की चीज हैं।

क्या किसी ने ‘ग़ुलाम श्रम’ कहा? – लेकिन यूपी सरकार भी बंधुआ श्रम अधिनियम को निलंबित करने के लिए नहीं जा रहा है, जबकि यह अन्य सभी को निलंबित कर रहा है।

घूमने वाले प्रवासी भारत के मजबूर वर्ग को दर्शाते हैं। वे अब गावों से होकर घर जा रहे हैं, जहां भोजन के लिए स्थानीय किसानों पर निर्भर हैं और जहां हो पा रहा है, उन्हें यह मदद भी मिल रही है। हाँ, वे मर रहे हैं, लेकिन घर जाने के उनके आग्रह के सामने, शासक हार रहे हैं। उनकी ही वह ताकत है जो देश का निर्माण, उत्पादन, सेवा करती है।

पैदल चलने वाले प्रवासी कामगार को जिंदाबाद, को इस प्रयास में मरने वाले बहादुरों को जोहार। चलने वाले ये प्रवासी मजबूर शासकों को अपनी नजर के दायरे के बाहर नहीं फेंकने देंगे।

आवाज उठाओ! महामारी के नाम पर हत्या और मज़दूरों को बांधने पर रोक लगाने की मांग करो। सभी प्रवासी मज़दूरों के लिए सभी सावधानियों और सुरक्षा उपायों के साथ उनके घरों तक परिवहन के अधिकार मांग करो।

अपर्णा

अध्यक्ष, IFTU

8 मई, 2020 (Aparna
National President
Indian Federation Of Trade Unions (IFTU))

सारा मलिक की कहानी – राशन कार्ड

Sara Malik, सारा मलिक, लेखिका स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।

Story of Sarah Malik – Ration Card

राशन कार्ड

उर्मिला, अपना सामान बांध रही थी, उसे गांव जाना है, होली के 7 दिन बाद उसने कुछ दिन की छुट्टी ले रखी है. उर्मिला आसपास के घरों में काम करती है, और उसी कमाई से वह अपना घर चलाती है, और अपने तीन बच्चों के लिए एक अच्छे कल के सपने बुनती है।

एक दिन वह मुझसे बोली दीदी कहां अच्छा लगता है, “दूसरों के घर जाकर काम करना, उनके झूठे बर्तन साफ करना।”

“मेरी बच्चियां कल को मेरी तरह ना रह जाए”, इसलिए उनको पढ़ाना चाहती हूं। गांव से शहर इसीलिए आई, कि “मेरी बच्चियां कल को कुछ पढ़ लिख जाए, और उनकी जिंदगी मुझसे कुछ बेहतर हो जाए”।

उर्मिला होगी कोई, 38 – 40 साल के लगभग, देखने में ठीक लगती है, रंग सांवला सा ही है, इकहरा बदन, खुद को थोड़ा रखती भी साफ, अक्सर देखती हूं कि कपड़े साफ़ ही पहनती है। ज़िंदगी की ऐसी जद्दोजहद में भी, उसकी आंखें खुशगवार सी हैं, चलने के ढंग में फुर्ती, और हौसला जो उसके सपनों को उड़ान देता हो।

वह अपनी जिंदगी की जंग लड़ रही है चुनौतियों को झेलते हुए।

अजीब नहीं लगता होगा दूसरों के झूठे बर्तन साफ करना, और लोगों के ताने सुनना, “यह कोई टाइम है तुम्हारे आने का “इस वक्त आई हो ? अब मैं तुम्हारा क्या करूं, जाओ मैंने खुद अपना काम निपटा लिया है, फिर भी वह डटी रहती है। जिल्लत बर्दाश्त करते हुए, मुस्कुराते हुए “आज गलती हो गई कल से टाइम पर आऊंगी”।

हम आपस में बात करते वक्त यही कहते हैं इन लोगों का तो यही है, “रोज नए बहाने, रोज इनके यहां कोई बीमार हो जाता है, कोई मर जाता है, यह इनका रोज का नाटक है।” कभी हम यह नहीं सोच पाते कि इनकी भी तकलीफॆ हो सकती हैं।

इनको समाज से कभी इज्जतदार इंसान होने का हक मिलता है या मौके बे मौकॆ, यह महज वोट ही होते हैं। हमारे लिए तो यह सिर्फ नौकर होते हैं जो हमें टाइम पर चाहिए, क्योंकि हमने उनको पैसे दे रखे हैं।

खैर, वह गांव जा रही है, इस बार उसे गांव में थोड़ा सा काम करवाना है, एक छोटा सा जमीन का टुकड़ा है जिस पर पुराने टाइम की दो कोठरी बनी हुई उसे चहारदीवारी खिंचवानी है, और उसके पति रामखेलावन ने कुछ पैसों का इंतजाम कर लिया है। रामखेलावन शहर में मिस्त्री के साथ हेल्पर, का काम करता है कभी-कभी उसका काम लग जाता है कभी-कभी वह खाली भी रहता है, असल में उर्मिला की कमाई से ही घर चलता है।

उसकी दो बेटियां हैं, बड़ी बेटी, “गौरी” 12-13 साल की, पड़ोस में कम्लेश भाभी के यहां बच्चे की देखभाल के लिए जाती है। तंदुरुस्त लंबी, मां की तरह रंग साफ आंखें गोल-गोल।

कमलेश भाभी,  जिनकी शहर में मशीनरी पार्ट्स की बड़ी सी दुकान है, उर्मिला उनके यहां काम करती है और कमलेश भाभी से जो मदद हो सकती है, कर देती हैं।

उर्मिला के काफी रिश्तेदार अभी भी झुग्गियों में रहते हैं, लेकिन उर्मिला का रहन-सहन कमलेश भाभी की वजह से कुछ बदल गया है, वह उनके बच्चों के लिए बहुत दुआएं करती है।

अपनी बेटियों को कुछ दिन के लिए अपनी ननद के घर में छोड़ रही हूं। उसकी बेटी के साथ मेरी बच्चियां सेफ हैं। मुझे गांव जाने में और काम कराने में 15.से 20 दिन का टाइम लग जाएगा, लेकिन मुझे कोई फिक्र नहीं है। उर्मिला ने बताया कल सुबह ही चले जाएंगे हम।

लेकिन कुछ दिन बाद अचानक से आई यह महामारी, जो कि छूत की बीमारी, वजह से जनता कर्फ़्यू हो गया और फिर लॉक डाउन। उर्मिला गांव में परेशान हो गई। इधर बच्चियां भी बहुत हैरान परेशान हो गईं, मां से दूर अकेले में वह लोग घबरा रही थीं। अब यह बच्चियां क्या करतीं स्कूल भी बंद था, पेपर कैंसिल हो चुके थे।

बच्चे यहाँ अब क्या करेंगे। बीमारी की दहशत अलग से।

पता चला कि एक सब्जी वाली गाड़ी उनके गांव सब्जी के लिए जाएगी तो उनकी बुआ ने उस गाड़ी वाले से पहचान निकालकर बच्चियों को गांव भेजने का इंतजाम कर दिया. एक सब्जी की गाड़ी “डाला” कहलाती है, वह जा रही थी, वह लोग थोड़ा बहुत सामान लेकर उससे गांव चले गए।

इस बीमारी के फैलने के डर से हालात बिल्कुल मुख्तलिफ हो गए। अब यह शहर। वह पुराना शहर न मालूम दे रहा था। लोग दरवाजा खोलने से डर रहे थे, सब तरफ बन्द। और चारों तरफ फैला हुआ सन्नाटा ना गाड़ी मोटर की आवाज, ना ही कोई शोरगुल।

अरे तुम आ गईं ? मैंने उर्मिला से कहा!

उसे लगा शायद मैं उससे बात नहीं करूंगी, तो मैंने पास जाकर उससे पूछा कैसी हो, और बच्चे कैसे हैं।

हां दीदी मैं आ गई।

बोली दीदी यहां तो सब लोग डरे हुए हैं, बोल रहे हैं कोरोनावायरस। कोई काम नहीं लेना चाहता, अब तक बच्चे गांव में बहुत परेशान हो रहे थे। और वैसे भी वहां खाने को कुछ था नहीं इसलिए हम लोग वापस आ गए।

मैंने कहा कोई बात नहीं।

प्रशासन के आदेश से गरीबों को राशन दिया जा रहा है, और सुना है कि राशन किट भी दी जा रही है, जिसमें खाने-पीने का सामान होगा। लोगों की मदद हो रही है। वहां छोटे स्कूल के पास कोटेदार राशन बांट रहे हैं ऐसा सुनने में आया है, तुम वहां चली जाओ, तुम्हारा कुछ काम बन जाएगा। और अगर काम ना बने तो मुझे बताना मैं देखती हूं, मैं तुम्हारी क्या मदद कर सकती हूँ i

दीदी आप मेरी मदद कर दें। बहुत-बहुत मेहरबानी होगी। मैं पढ़ी लिखी नहीं हूं। मुझे तो कुछ मालूम भी नहीं है, बस इतना पता है कि “मैं बहुत परेशान हूं, और कुछ समझ में नहीं आ रहा”।

मैंने उसको तसल्ली देते हुए कहा, कोई बात नहीं तुम परेशान ना हो। मैं तुम्हारे साथ चल दूंगी पहले तुम पता करके आओ ?

थोड़ी देर बाद वो मेरे पास आई, और बोली कि उन लोगों ने कहा कि कुछ नहीं हो पाएगा क्योंकि तुम्हारे पास राशन कार्ड तो है नहीं, सिर्फ आधार से कुछ नहीं होगा। जाओ यहां से।

पूछ रहे थे वोटर कार्ड है? बिजली का बिल ? किसको वोट देती हो ?, वोट शहर में देती हो या गांव में?

राशन किसी पार्टी के लोग बांट रहे थे।

मैंने कहा “देखती हूं, कल मैं बात करती हूं वह बोली ठीक है! “

मैंने मुख्यमंत्री हेल्पलाइन पर फोन लगाया 1076. उधर से ऑपरेटर ने जवाब दिया “जहां पर राशन मिलता होगा, आपके इलाके में वहां पर जाकर पता करिए, और रही बात पैकेट की या किट की तो वह तो नहीं।”

यहां मोहल्ले में जब पता किया, तो लोगों ने बताया पार्टी के लोग बैठे हैं, और वह राशन बांट चुके हैं, उर्मिला परेशान हो उठी।

हम लोग राशन की दुकान पर गए, डीलर ने पूछा राशन कार्ड है ?

” नहीं” लेकिन बताया गया “कि आधार कार्ड पर भी मिल सकता है” सरकार का आदेश हैl

वह बोला राशन तो पहले हफ्ते में ही बंट गया. पहले राशन कार्ड बनवाना होगा तब कहीं अगले महीने से राशन मिल सकता है।

हमने कहा कैसे बनेगा ?उसने कहा आधार कार्ड, गैस की किताब, और बैंक का खाता बुक, फोटो, बत्ती का बिल, यह सब चाहिए होगा। और साथ में डेढ़ सौ रुपए। अभी तक वह अपने आपको काम में काफी मशगूल दिखा रहा था, लेकिन अब उसने अपना ध्यान हमारी तरफ किया बड़े गौर से देखा। फिर जाने कैसे उसकी आंखों में एक अजीब सी चमक आ गई। “दोनों को बनवाना है” ?

“नहीं” मैंने कहा! सिर्फ इनका.

उसकी कुटिल सी मुस्कुराहट मुझे बिल्कुल अच्छी नहीं लगी, उसका इस तरह बात करना बेहद नागवार गुजर रहा था।

अब उसने थोड़ा बदले हुए लहजे में कहा कागज के साथ भेज दीजिएगा इनको। टेंपरेरी कार्ड बन जाएगा मैं इनके लिए कोशिश कर दूंगा अगर यह चाहेंगी। अगले महीने से राशन मिलने लगेगा।

मैंने कोटेदार से पूछा, अगले महीने से राशन मिलने लगेगा। क्या राशन फ्री में मिलेगा!

नहीं ₹3 किलो गेहूँ और ₹3 किलो चावल वह भी अगले महीने से ही मिल पाएगा।

उर्मिला को कुछ तो तसल्ली हुई इस महीने ना सही अगले महीने से सही कुछ तो मिलेगा।i

एक आसरा सा है, “कि शायद अगले महीने से राशन मिल जाए”।

Migrants On The Road  उसने मुझसे पूछा यह आधार कार्ड क्या किसी काम का नहीं है ? मेरे जैसे जाने कितने लोग हैं, जिनके पास राशन कार्ड नहीं है, तो क्या वह भूखे मर जाए, गांव में भी बहुत बुरे हालात हैं। बाहर से बहुत सारे लोग लौट-लौट के गांव आ रहे हैं, पर गांव में बहुत कुछ है नहीं, “कितने दिन तक गांव उनको संभाल पाएगा” बड़ा मारा कोई अधिकार नहीं है, इन शहरों में क्या हम यहां के लोग नहीं, क्या यह शहर हमारा नहीं। मेरे पति ने यहां जाने कितनी बिल्डिंग बनाई! क्या हमारा कुछ भी नहीं है, इतना भी नहीं,” कि हमें कुछ खाने के लिए मिल जाए”।

सरकार और यह समाज ऐसे लोगों को क्या दे पा रहा है यह सोच कर मैं परेशान हो गई, उसकी सारी बातें जायज थी, और वाजिब भी।

उसके सवालों पर कोई सरकारी योजना बनी है क्या ? बनी तो अमल क्यों नहीं होता या “आंखों की चमक” योजना और हकों को निगल जाती है ? बड़ा सवाल है, मौजूदा सवाल है, पर जवाब ??

क्या जरूरत है, याद रखने की, क्या फर्क पड़ता है ? वोट फिर मिल जाएंगे। यह पूरा समाज बहुत बेफिक्रा है।

मैं यह सोच रही हूं कि जाने कितनी मुश्किलों में हैं लोग, कितनी बेबस हैं ये औरतें, बदहाली में बच्चे।

यह राशन कार्ड।! और क्या औरत का वजूद, उसकी अस्मत, उसकी जद्दोजहद या उसकी पूरी जिंदगी कि तमाम मसलों में आज का सबसे अहम मसला।

सारा मलिक

रवीन्द्र नाथ टैगोर ने मनुष्यता में कभी अपना विश्वास नहीं खोया

rabindranath tagore

रवीन्द्रनाथ : मनुष्य की अक्षय और अपराजित आत्मा के महागायक |  Rabindra Nath Tagore never lost his faith in humanity

हजारी प्रसाद द्विवेदी की दृष्टि में बड़ा आदमी कौन होता है ? | In the opinion of Hazari Prasad Dwivedi, Who is the big man?

‘‘बड़ा आदमी वह होता है जिसके सम्पर्क में आने वाले का अपना देवत्व जाग उठता है। रवीन्द्रनाथ ऐसे ही महान पुरुष थे। … वे उन महापुरुषों में थे जिनकी वाणी किसी विशेष देश या सम्प्रदाय के लिए नहीं होती, बल्कि जो समूची मनुष्यता के उत्कर्ष के लिए सबको मार्ग बताती हुई दीपक की भांति जलती रहती है।‘‘ (हजारी प्रसाद द्विवेदी)

The threat of imperialist domination at the global level

आज हमारा देश एक अभूतपूर्व दौर से गुजर रहा है। सीधे तौर पर फासीवाद का खतरा (Threat of fascism) हमारे सर पर मंडरा रहा है। दूसरी ओर, वैश्विक स्तर पर साम्राज्यवादी प्रभुत्व का खतरा

लगता है जैसे आदमी ने अपने अथक और अनवरत प्रयासों से जिस सृष्टि की रचना की उसे वह अपने ही हाथों मटियामेट करने पर तुल गया है। लाभ और लोभ की कोख से जन्मी पूंजी और उसपर टिका पूरा तंत्र, एक समग्र पूंजीवादी दर्शन, उसका विकराल पैशाचिक रूप, साम्राज्यवादी वैश्वीकरण आज समूची मानवता को अपने नागपाश में जकड़कर लहूलुहान कर रहा है। जल, जमीन, जंगल और यह पूरा जगत आज उसके जहर से विषाक्त अजीबोगरीब ढंग से विरूपित दिखाई देता है। सभ्यता के ऐसे संकट की काली छाया को उस भविष्य द्रष्टा कवि, चिंतक ने देख लिया था और अपनी मौत से कुछ दिन पहले उनकी आत्मा उनसे सवाल कर रही थी-

‘‘भगवान्, तुमने युग-युग में बार-बार इस दयाहीन संसार में अपने दूत भेजे हैं।

वे कह गये हैं-क्षमा करो,

कह गये हैं- प्रेम करो, अंतर से विद्वेष का विष नष्ट कर दो।

वरणीय हैं वे, स्मरणीय हैं वे,

तो भी आज दुर्दिन के समय उन्हें निरर्थक नमस्कार के साथ बाहर के द्वार से ही लौटा दे रहा हूं।

मैंने देखा है-गोपन हिंसा ने

कपट-रात्रि की छाया में निस्सहाय को चोट पहुंचाई है,

मैंने देखा है-प्रतीकारविहीन जबर्दस्त के अत्याचार से विचार की वाणी

चुपचाप एकांत में रो रही है,

मैंने देखा है-तरुण बालक उन्मत्त होकर दौड़ पड़ा है, बेकार ही पत्थर पर

सिर पटककर मर गया है

कैसी घोर यंत्रणा है उसकी !

आज मेरा गला रुंध गया है, मेरी बांसुरी का संगीत खो गया है, अमावस्या

की कारा ने मेरे संसार को दु:स्वप्नों के नीचे लुप्त कर दिया है,

इसीलिए तो आंसू भरी आंखों से तुमसे पूछ रहा हूं-

जो लोग तुम्हारी हवा को विषाक्त बना रहे हैं,

उन्हें क्या तुमने क्षमा कर दिया है?

उन्हें क्या तुमने प्यार किया है?‘‘

रवीन्द्रनाथ क्या ये प्रश्न किसी अदृश्य, अमूर्त शक्ति से कर रहे थे ?

नहीं, उसे तो उन्होंने निरर्थक नमस्कार के साथ बाहर के द्वार से ही लौटा दिया था। वे यह सवाल उस मनुष्य से कर रहे थे, उसकी मनुष्यता से कर रहे थे जो दिन-प्रतिदिन अपनी प्राण शक्ति खो रही थी। और इसलिये वे उसकी प्राण शक्ति को, उसके विवेक को ललकार करके कह रहे थे कि तुम इन्हें कैसे माफ कर सकते हो, तुम इन्हें कैसे प्यार कर सकते हो?

Rabindra Nath Tagore never lost his faith in humanity

रवीन्द्रनाथ का जीवन, उनका पूरा साहित्य, उनका चिंतन इस बात की गवाही देता है कि इस महान मानव ने मनुष्यता में कभी अपना विश्वास नहीं खोया। भारत की सामासिक संस्कृति के जीवंत प्रतीक ठाकुर परिवार में जन्मे रवीन्द्रनाथ का परिवार एक ऐसा परिवार था जिसके बारे में खुद कविगुरु ने लिखा था कि उनका परिवार हिंदू सभ्यता, मुस्लिम सभ्यता और ब्रिटिश सभ्यताओं की त्रिवेणी था। दादा द्वारकानाथ अरबी और फारसी भाषा के प्रख्यात विद्वान थे। उन्होंने उस समय समुद्र की यात्राएं की जब समुद्र यात्रा किसी हिंदू के लिये वर्जित थी और उसके लिये कठोर दंड का विधान था। उनकी मृत्यु पर लंदन के ‘द टाइम्स‘ ( 3 अगस्त 1946) ने लिखा- संभवतया भारत में उनकी टक्कर का कोई नहीं है, भले ही वह किसी भी पद या प्रतिष्ठा पर हो, जिसने अपने आस-पास खड़े लोगों की प्रगति और बेहतरी को इतनी उदारता से संरक्षण प्रदान किया हो। और हम यह भी विश्वास कर सकते हैं कि भारत और इंग्लैंड में भी ऐसे लोगों की कमी नहीं जो अपनी वर्तमान सफलता और स्वतंत्रता के लिए द्वारकानाथ ठाकुर के अनुग्रह के प्रति कृतज्ञ न हों।‘‘

रवीन्द्र नाथ टैगोर का जीवन परिचय | Biography of Rabindranath Tagore in Hindi

रवीन्द्रनाथ के पिता देवेन्द्रनाथ इन्हीं द्वारकानाथ ठाकुर के सबसे बड़े पुत्र थे। लोग इन्हें महर्षि के नाम से पुकारते थे। मात्र 18 वर्ष की वय में इस तरुण ने गंगा के किनारे तीन दिनों तक अपनी मौत की प्रतीक्षा कर रही प्रिय दादी के पास रहते हुए जीवन के एक नये सत्य को खोज लिया था। अब वह एकदम बदल गया था।

उन्होंने लिखा –

‘‘मैं ठीक पहले जैसा आदमी नहीं रहा। संपत्ति के प्रति मेरा लगाव उदासीन सा हो गया। वह फटी-पुरानी बांस की चटाई जिस पर मैं बैठा था- मुझे अपने लिये उपयुक्त जान पड़ी। कालीन और कीमती दिखावे मुझे घृणास्पद प्रतीत होने लगे और मेरा मानस उस आनंद से परिपूर्ण हो उठा, जिसका अनुभव मैंने पहले कभी नहीं किया।‘‘ इस प्रकार यह युवक धन की माया से दूर मनुष्य की अंतरआत्मा के गहन संसार में डूब गया। प्राचीन वैदिक साहित्य के साथ ही पाश्चात्य दर्शन का भी अघ्ययन किया।

इसी महर्षि की चौदहवीं कृति संतान के रूप में 7 मई 1861 को रवीन्द्रनाथ का जन्म हुआ था। बड़ी बहन ने ‘होनहार बिरवा के चिकने-चिकने पात‘ की झलक बचपन में ही देख ली थी इसीलिये नहलाने के समय प्राय: कहा करती, मेरा रवि भले ही सावंला हो, बहुत गोरा न हो लेकिन वह अपने तेज से सब पर छा जायेगा।

रवीन्द्रनाथ ने अपनी बड़ी बहन की इस भविष्यवाणी को पूरी तरह सच साबित करके दिखाया और न सिर्फ अपने देश बल्कि पूरे विश्व को मानवता की उदात्तता का प्रकाश दिखाया।

रवीन्द्रनाथ टैगोर की मृत्यु पर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी | Father of the Nation Mahatma Gandhi on the death of Rabindranath Tagore

उनकी मृत्यु पर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने लिखा –

‘‘रवीन्द्रनाथ टैगोर की मृत्यु में हमने न केवल इस युग के एक महानतम कवि को खोया है बल्कि एक उत्कृष्ट राष्ट्रभक्त जो एक मानवतावादी भी थे, उन्हें खोया है। शायद ही ऐसा कोई सार्वजनिक कार्य हो जिस पर उनके शक्तिशाली व्यक्तित्व ने छाप न छोड़ी हो। शांतिनिकेतन और श्रीनिकेतन के रूप में उन्होंने सारे राष्ट्र के लिए, वस्तुत: विश्व के लिए एक विरासत छोड़ी है।‘‘

आज के इस अंधेरे दौर में रवीन्द्रनाथ की उस महान विरासत को याद करके उन्हीं की तरह हम उस अक्षत, अपराजित विश्वास को हासिल कर सकें और कह सके-

‘‘टुक खड़े तो हो जाओ एक बार सिर उठाकर ! जिसके भय से तुम डर रहे हो, वह अन्यायी तुम से कहीं अधिक कमजोर है। तुम जागे नहीं कि वह भाग खड़ा होगा- जैसे ही तुम उसके सामने तनकर खड़े हुए कि वह राह के कुत्ते की भांति संकोच और त्रास से दुबककर रह जायेगा। देवता उससे विमुख हैं-कोई नहीं है उसका सहायक-वह तो केवल मुंह से ही बड़ी-बड़ी बातें हांका करता है; किंतु मन ही मन अपनी हीनता को खूब पहचानता है! अतएव हे कवि ,उठ आओ ! यदि तुम्हारे अंदर केवल प्राण ही बाकी हों, तो उन्हें ही साथ लेते आओ-(वही क्या कम है)-उन्हें न्यौछावर कर दो। बड़ा दुख है…बड़ी व्यथा है-सामने कष्ट का संसार फैला हुआ है। बड़ा ही दरिद्र है-शून्य है-क्षुद्र है…अंधकार में बद्ध है। उसे अन्न चाहिए-प्राण चाहिए-आलोक चाहिए, चाहिए मुक्त वायु, बल, स्वास्थ्य-आनंदोज्जवल परमायु और चाहिए साहस से चौड़ी छाती। इसी दीनता के बीच, हे कवि, एक बार ले तो आओ स्वर्ग से विश्वास की छवि!‘‘

रवीन्द्रनाथ का स्वर्ग कोई काल्पनिक इन्द्रलोक नहीं था। वे ब्रह्म सत्य है, जगत मिथ्या में विश्वास नहीं करते थे। वे इस पृथ्वी को ही मनुष्य की सबसे सुंदर कृति बनाना चाहते थे। और इसलिये इस पृथ्वी को छोड़कर वैरागी बनकर किसी देवता की शरण में जाकर स्वर्ग को खोजने वालों को कहते हैं, देवता मंदिर में नही है, मनुष्यत्व में है।

अपनी एक कहानी में वे कहते हैं।–

‘‘संसार से वैराग्य लेने वाला एक वैरागी गंभीर रात्रि में बोल उठा : आज मैं इष्टदेव के लिए घर छोड़ दूंगा -कौन मुझे भुलाकर यहां बांधे हुए है ? देवता ने कहा : ‘मैं‘ ! उसने नहीं सुना। नींद में डूबे शिशु को छाती से चिपटाकर प्रेयसी शैय्या के एक किनारे सो रही थी। वैरागी ने कहा : ऐ माया की छलना, तू कौन है ? देवता बोल उठे : ‘मैं‘! किंतु किसी ने नहीं सुना। शैय्या पर से उठकर वैरागी ने पुकारा : प्रभो ! तुम कहां हो ? देवता ने उत्तर दिया : ‘यहां‘! तो भी वैरागी ने नहीं सुना। स्वप्न में माता को शिशु खींच कर रो पड़ा – देवता ने कहा : ‘लौट आओ‘। वैरागी को यह वाणी भी नहीं सुनाई दी। अंत में लंबी सांस लेकर देवता ने कहा – ‘हाय, मेरा भक्त मुझे छोड़कर कहां चला !‘ ‘‘

रवीन्द्रनाथ ने कबीर की तरह बार-बार मनुष्य को चेताया कि तुम्हारे देवता देवालयों में नहीं है। उन्होंने इस भले मानुष को समझाते हुए कहा-

‘‘अरे ओ भलेमानुष, क्यों तू देवालय का दरवाजा बंद करके उसके कोने में पड़ा हुआ है ? अरे, रहने दे अपने इस भजन और पूजन को, ध्यान और आराधना को। अपने मन के अंधेरे में छिपा हुआ तू चुपचाप किसकी पूजा कर रहा है ? जरा आंख खोलकर देख तो भला, देवता तेरे घर में नहीं है। वे वहां चले गये हैं, जहां किसान जमीन तोड़कर हल जोत रहा है, जहां मजदूर बारह महीने पत्थर काटकर रास्ता तैयार कर रहा है। वे धूप और पानी में सबके साथ हैं। उनके दोनों हाथों में धूल लगी हुई है। भले मानस, तू भी उन्हीं के समान इस पवित्र वस्त्र को फेंककर धूल में उतर जा। रहने दे अपनी घ्यान धारणा, पड़ी रहने दे अपने फूलों की डलिया, फट जाने दे इस शुचि-वस्त्र को, लगने दे इस शरीर में धूल और बालू। ऐसा हो कि उनके साथ कर्मयोग में चूर होकर तेरा पसीना चुए।‘‘

रवीन्द्रनाथ ने जहां कहीं भी मनुष्य और मनुष्यता का अपमान होते हुए देखा फिर चाहे वह सांमती-पूंजीवादी-साम्राज्यवादी शोषण हो, संकीर्ण उग्रराष्ट्रवाद हो, फासीवाद हो, स्वार्थों की आग से धधकता युद्धोन्माद हो, जातिवाद और धार्मिक कट्टरता हो, हर किसी का तीखा विरोध किया। साम्राज्यवादी वैश्वीकरण और उसको संचालित करने वाली मुक्त बाजार की इस बर्बर व्यवस्था में जब एक बार फिर सर्वोत्तम की उत्तरजीविता का राग अलापा जा रहा है, उस समय हमें रवीन्द्रनाथ की वाणी याद आती है-

‘‘जापान को पश्चिम के बाह्य लक्षणों का अनुकरण करने में खतरा नहीं है, बल्कि पश्चिमी राष्ट्रवाद की प्रेरक शक्ति को अपना बना लेने से है। राजनीति के दबाव के आगे उसके सामाजिक आदर्शों के ह्रास के संकेत अभी से दिखने लगे हैं। विज्ञान से उधार लिया गया आदर्श वाक्य, ‘योग्यत्तम की उत्तरजीविता‘ मुझे उसके आधुनिक इतिहास पर लिखा हुआ साफ-साफ दिखाई पड़ रहा है। यह एक ऐसा आदर्श वाक्य है जिसका एक अर्थ यह भी होता है कि ‘अपनी सहायता खुद करो और दूसरों की परवाह मत करो‘। यह एक ऐसा आदर्श वाक्य है जो उस अंधे आदमी का आदर्श होता है जो केवल उसी चीज में विश्वास करता है जिसे वह छू रहा होता है क्योंकि बाकी को तो वह देख ही नहीं पाता। लेकिन जो लोग देख सकते हैं, वे अच्छी तरह जानते हैं कि मानव एक-दूसरे से एक सूत्र में पिरोया हुआ है और जब आप दूसरों पर चोट करते हैं तो उसका असर आप पर भी होता है। नैतिक नियम जो मनुष्य का सबसे बड़ा आविष्कार है, वह इस अद्भुत सत्य पर आधारित है कि मानव उतना ही अधिक सच्चा साबित होता है जितना अधिक वह दूसरों में स्वयं को अनुभूत करता है।‘‘

रवीन्द्रनाथ मनुष्य में ही सत्य को देखते थे।

‘‘सत्य ही मनुष्य का प्रकाश है। इस सत्य के विषय में उपनिषद का कहना है : ‘आत्मवत् सर्वभूतेषू य पश्यति स पश्यति‘। जिन्होंने जीवन मात्र को अपने समान समझा है, उन्होंने ही सत्य को समझा है।‘‘

इस सत्य की अवहेलना करके, उसे अपमानित और उपेक्षित करके पूंजी को ब्रह्म और मुनाफे को मोक्ष समझने वालों को धिक्कारते हुए रवीन्द्रनाथ ने कहा था –

‘‘ये तो महास्वार्थ को ही विश्व के सभी देशों का सार्वभौमिक धर्म बनाने पर तुले हुए हैं। हम विज्ञान द्वारा दी गई किसी भी अन्य चीज को स्वीकार करने के लिये तैयार हैं लेकिन हम उसके द्वारा नैतिकता के अमृत को नष्ट होता स्वीकार नहीं कर सकते।‘‘

लेकिन आज हिंस्र, बर्बर और अराजक हो चुकी आवारा पूंजी मनुष्यता के हर मूल्य को बाजार में बेच रही है। लगभग 200 वर्ष पहले कार्ल मार्क्स ने पूंजी के इस भयावह दानवीय रूप के बारे में कहा था –

‘‘यदि लाभ समुचित हो तो, पूंजी बहुत साहसी होती है। 10 प्रतिशत निश्चित लाभ उसकी व्यग्रता सुनिश्चित करेगा और 50 प्रतिशत उसकी अति साहसिकता; 100 प्रतिशत लाभ के लिए यह सभी कानूनों को पैरों तले रौंदने को तैयार हो जायेगी; लाभ 300 प्रतिशत हो तो ऐसा कोई अपराध नहीं है जिसे करने में यह हिचकिचायेगी, न कोई ऐसा खतरा है जो यह नहीं उठाएगी, चाहे इसके मालिक के फांसी चढ़ने की ही संभावना क्यों न हो…।‘‘

सरला माहेश्वरी (Sarala Maheshwari) लेखिका पूर्व सांसद (सदस्य राज्यसभा) हैं।
सरला माहेश्वरी (Sarala Maheshwari) लेखिका पूर्व सांसद (सदस्य राज्यसभा) हैं।

खतरों की खिलाड़ी इस चमत्कारी पूंजी ने अपने मुनाफे के लिये पूरी मानवता को खतरे में डाल दिया, एक ओर मुट्ठी भर लोगों के वैभव का सुखी संसार और दूसरी और अभावों और असुरक्षा का दुखी संसार। पूंजी का इतना कुत्सित रूप कि खुद पूंजीवाद के प्रवक्ता शर्मसार हो गये और पूंजी के इस कुत्सित रूप को मानवीच चेहरा देने, विकास के इस एकांगी रूप को समावेशी रूप देने, नैतिकता की राजनीति, और ऐथिक्स आफ इकोनोमी की बातें होने लगी, ताकि किसी तरह इस डूबते हुए जहाज को बचाया जा सके। लेकिन अन्याय, अत्याचार, अमानवीयता से भरा हुआ यह जहाज किनारे लग नहीं सकता। डूबना ही इसकी नियति है। एक बार फिर रवीन्द्रनाथ याद आते हैं

‘‘मानव के इतिहास में आतिशबाजी के कुछ ऐसे युग भी आते हैं, जो अपनी शक्ति व गति से हमें चकित कर देते हैं। ये न केवल हमारे साधारण घरेलू दीपकों की हंसी उड़ाते हैं, बल्कि अनंत नक्षत्रों का भी मजाक उड़ाते हैं। लेकिन इस भड़काऊ दिखावे के आगे हममें अपने दीपकों को निरस्त करने की इच्छा मन में नहीं आनी चाहिए। हमें इस अपमान को धैर्यपूर्वक सहना होगा और यह समझना होगा कि इस आतिशबाजी में आकर्षण तो है पर यह स्थायी नहीं है क्योंकि इसकी अति ज्वलनशीलता ही इसकी शक्ति और अंतत: इसके बुझ जाने का भी कारण होती है। यह किसी लाभ व उत्पादन के बजाय अपनी ऊर्जा तथा क्षार को भारी मात्रा में खर्च करती है।‘‘

मनुष्य की आत्मा के दीपक को बुझाकर कोई भी सभ्यता जिंदा नहीं रह सकती और रवीन्द्रनाथ मनुष्य की इसी अक्षत, अपराजेय आत्मशक्ति के महान गायक थे। उनकी वाणी आज भी हमें बल प्रदान कर रही है- ‘तुम सबको इस स्वार्थ-दानव के मंदिर की दीवालें तोड़ देनी होगी, यह नरबली अब नहीं चलेगी। हुक्म मिलते ही तोप के गोले आकर उस मंदिर की दीवालों को तड़ातड़ चूर्ण करने में जुट गये हैं। …जो लोग आराम में थे, वे आराम को धिक्कार देकर कहने लगे हैं-प्राणों से चिपके नहीं रहेंगें, मनुष्य के पास प्राणों से भी बढ़कर कोई और चीज है। आज तोपों के गर्जन में मानव का जय-संगीत बज उठा है।‘‘

सरला माहेश्वरी

 

डॉ. जफरुल इस्लाम खान के आवास पर गृह मंत्रालय/ मोदी सरकार के इशारे पर दिल्ली पुलिस का छापा बेहद निंदनीय व शर्मनाक कृत्य

Delhi Police raids at the residence of Dr. Zafarul Islam Khan, Chairman of Delhi Minorities Commission

Delhi Police raids at the residence of Dr. Zafarul Islam Khan, Chairman of Delhi Minorities Commission.

दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग के चेयरमैन डॉ. जफरुल इस्लाम खान के आवास पर गृह मंत्रालय/ मोदी सरकार के इशारे पर दिल्ली पुलिस का छापा बेहद निंदनीय व शर्मनाक कृत्य है।

फासिस्टों की सरकार द्वारा डॉ. खान को केवल इसलिए निशाना बनाया जा रहा है, क्यों कि उन्होंने दिल्ली हिंसा में पुलिस की साम्प्रदायिक भूमिका (Communal role of police in Delhi violence) को बेनकाब किया था। और कोरोना संकट के समय फासिस्टों और उनकी गोदी मीडिया द्वारा इस्लामोफोबिया (Islamophobia) पैदा करने, कोरोना के लिए मुसलमानों को दोषी ठहराने और उनके प्रति नफरत घृणा व वैमनस्य का विभाजनकारी माहौल बनाने की आलोचना की।

Ajit Yadav, अजीत सिंह यादव
अजीत सिंह यादव

जो डॉ. खान ने कहा वह किसी भी स्वस्थ लोकतंत्र के लिए सामान्य बात है और भारत के संविधान में नागरिकों को प्रदत्त अभिव्यक्ति की आजादी के अधिकार के अंतर्गत आता है। लेकिन फासिस्टों की सरकार ने भारत के लोकतंत्र और लोकतांत्रिक संस्थाओं की धज्जियां उड़ा दी है और संवैधानिक अधिकारों पर संगठित हमला बोल कर मुल्क में तानाशाही का खतरा पैदा कर दिया है। इसलिए जो भी फासिस्ट सरकार का विरोध कर रहे हैं उनका दमन किया जा रहा है। आंदोलनकारियों पर आतंकवाद निरोधक कानून जैसे काले कानून के तहत मुकदमे दर्ज किये जा रहे हैं। और डॉ जफरुल इस्लाम खान पर देशद्रोह के तहत मुकदमा लगा दिया गया है ।

क्या सरकार के जनविरोधी कृत्यों और फासिस्टों की नफरत की राजनीति का विरोध देशद्रोह है ?

एक दम नहीं ।

मैं समझता हूं कि सरकार के जनविरोधी कृत्यों का विरोध और फासिस्टों की देश को तोड़ने वाली नफरत की राजनीति (Politics of hate) का विरोध ही आज सबसे बड़ी देश भक्ति है। इसलिए मैं डॉ. जफरुल इस्लाम खान को भारत का देश भक्त वीर सपूत मानता हूं जिसने सच को बोलने का साहस किया है और फासिस्ट सत्ता के सामने चुनौती पेश की है। हमें आप पर गर्व है डॉ जफरुल इस्लाम खान। हम आपके साथ हैं।

अजीत सिंह यादव

क्यूबा और भारत का नक्सलबाड़ी आंदोलन

Things you should know

Naxalbadi Movement of Cuba and India

कोरोना महामारी के संकट में आज सबसे चर्चा का विषय या केन्द्र बिन्दु कोई है तो क्यूबा देश है, जो अपने चिकित्सा और चिकित्सकों के तमाम पूंजीवादी देशों की नि:सहाय लोगों की बिना भेदभाव के बिना दुश्मनी को याद किए दिल से सेवा कर रहे हैं। जिन देशों ने कभी क्यूबा पर प्रतिबंध (Ban on Cuba) लगा कर दिन रात जहर उगला दिन रात वहाँ की जनता को गाली दी, आज भी वही क्रम जारी है, वहीं क्यूबा अमेरिका, इंग्लैंड सहित तमाम यूरोपियन देशों में अपने चिकित्सक भेज रहा है वह भी बिना डर भय के, जान जोखिम में डाल कर. और न और…..वह भी अपने खर्च पर… ऐसा काम सिर्फ और सिर्फ समाजवादी देश ही कर सकता है जो बिना लालच और भेदभाव के सेवा कर सकता है…. .संवेदनशीलता की सबसे बड़ी मिशाल समाजवादी ही होते हैं आज पूरे विश्व में यह साबित भी हो गया….. लोग अपने जाति, धर्म अपने देश के लिए लड़ मर रहे हैं तमाम तरह के खूनखराबे कर रहे हैं वहीं समाजवादी देश दूसरों के लिए, देश की सीमाओं से उठ कर  एक नजीर बन गया है… वह देश है क्यूबा जिसे युगों युगों तक दुनिया याद करेगी……

आज इसी अवसर पर भारत से सबंधित क्यूबा की एक छोटी सी ऐतिहासिक घटना से हम क्यूबा को भारत के परिप्रेक्ष्य में समझेंगे वैसे तो बहुत सी राजनैतिक घटना क्रम हैं भारत और क्यूबा के मध्य लेकिन यह घटना हमारे देश में हो रहे कम्युनिस्ट आंदोलनों के प्रति क्यूबा के प्रेम और सहानुभूति की अनोखी मिशाल है……. इतिहास के आयने से एक सत्य घटना जो तमाम कामरेडों के लिए प्रेरणा का स्रोत है और भविष्य में होगी, समाजवादी इतिहास इस प्रेरणा को अपने में समाहित करे हुए है हालांकि इतिहास के तथ्य और कुछ नामों का क्रम पाठक या जानकार हमें अपडेट भी करेंगे.. लेकिन यह घटना ऐतिहासिक सच है जो साथी रोहित शर्मा जी ने एक वार्ता में प्रसंगवश बतलाई… हमने सोचा यह प्रेरणा देने के लिए बहुत आवश्यक प्रसंग हो सकता है, इसलिए इन कोरोना अवकाश में आपके लिए प्रस्तुत है…

क्यूबा और भारत का संबंध और उस पर भी कामरेडापन इस ऐतिहासिक घटना का मुख्य अंश है… बात नक्सलबाड़ी आंदोलन के समय की है तमाम लोग इस आंदोलन के गवाह रहे हजारों लोग तब शहीद हो गए थे उनमें अधिकांश पढे लिखे डाक्टर, इंजीनियर, प्रोफेसर , तमाम अध्यापक सरकारी, उच्च पदों से त्यागपत्र देकर आए आंदोलनकारी जेलों में सड़ रहे थे उस समर में भारत का हर युवा उस आंदोलन से जुड़ा था वह भी दिलोजान से….. उन्ही में से एक इंजीनियर का छात्र था जिसके पिता बंगाल में किसी विश्व विद्यालय में प्रोफेसर पद पर कार्यरत थे … वह, बिहार के एक जेल, कैम्प जेल (तृतीय खण्ड) भागलपुर जेल में वह अपने साथियों सहित बंद था। एक रोज कुछ क्रांतिकारी लोगों ने जेल तोड़ कर इन अपने साथियों को छुड़ाने का प्रयास किया। प्रयास भी सफल भी हो गया, लेकिन अंतिम समय में कुछ कामरेड पुलिस से मुकाबला करते हुए शहीद हो गए…

इस भाग दौड़ में 16 नक्सलवादी क्रांतिकारी शहीद हो गए थे….  उनमें एक वह इंजीनियर, जिनके पिता बंगाल में विश्व विद्यालय में प्रोफेसर थे…भी था…. जब उन्हें ज्ञात हुआ तो उन्हें दुख होना लाजमी था लेकिन… उन्होंने उसकी लाश लेने से मना कर दिया, यहाँ तक कि उससे कोई संबंध न होने की बात तक स्वीकारी… और पुलिस ने ही किसी तरह अंतिम संस्कार कर दिया… उस समय तक वो हमेशा अपने लड़के के खिलाफ रहते और वामपंथियों से नफरत करते थे अपनी औलाद को बहुत समझाते रहते… लेकिन वह तो कम्युनिस्ट था आंदोलन की रौ में सवार हो शहीद हो गया…..

इस घटना के कुछ सालों बाद भारत सरकार ने एक प्रतिनिधिमण्डल क्यूबा भेजा। उस समय तक उस शहीद इंजीनियर के पिता किसी विश्व विद्यालय के कुलपति बन गए थे और विषय के विशेषज्ञ बन गए थे… उन्हें भी एक उस दल का एक सदस्य बनाया गया प्रतिनिधिमंडल में… और वो क्यूबा गए… क्यूबा में फिदेल कास्त्रो का शासन था… प्रतिनिधिमंडल की अच्छी व्यवस्था थी, जैसे अमूमन होती है राजनायिकों की….

एक सुबह नाश्ते में उन कुलपति महोदय ने नाश्ता नहीं किया , तो इस पर सबको चिंता हो गई। वो उस दिन बहुत उदास भी थे दल के लिए नियुक्त लोगों ने कुलपति महोदय से जानना चाहा तो.! पहले तो वे नहीं बोले लेकिन… फिर अनुरोध करने पर बता ही दिया कि वो आज ही के दिन उनका लड़का मारा गया था… इसलिए हर साल उसकी याद में वे खाना छोड़ देते हैं….. और दुख मनाते हैं…

क्यूबा सरकार की तरफ से नियुक्त सदस्य में से एक ने खेद जताते हुए उनसे सहानुभूतिपूर्ण रूप से बात की और कुछ और जानना चाहा ताकि उनका दुख कम हो सके…तो… उन्होंने सारी ऐतिहासिक कहानी बता दी….

कामरेड को जब यह ज्ञात हुआ यह तो भारत में कम्युनिस्ट मुवमेंट का हिस्सा वाली घटना थी उन्होंने तुरंत फिदेल कास्त्रो को सम्पर्क किया और उन्हें सारी बात उन प्रोफेसर महोदय की, बतलाई गई…. फिदेल कास्त्रो ने उनसे यकायक ही मुलाकात की और उन्हें सांत्वना दी तथा सारे क्यूबा में उस दिन भोजन न करने का सभी को राज्य की ओर से निर्देश दिया …

एक भारत का कामरेड शहीद का पिता और आज उनके साथ था वह भी उस शहादत दिवस पर…. उन क्यूबाईयो से बेहतर कौन जान सकता था मरने, शहादत  का मूल्य…जिन्होंने चे ग्वेरा से लेकर लाखों लोग क्रांति में खोए थे… ऐसी महान शहादत को भला वो कैसे नहीं मानते…. क्यूबा के ऐसे सम्मान देने पर वह भी उनके लड़के के शहीद होने पर……

वो कुलपति महोदय गदगद हो गए… जिस बेटे की लाश लेने से उन्होंने मना कर दिया था, आज उसी लड़के की बदौलत सारा क्यूबा उन्हें जान रहा है इतना सम्मान एक शहीद के पिता के रूप में हो रहा है…. आज पहली बार उन्हें अपने बेटे के कम्युनिस्ट होने पर गर्व हो रहा था….

ऐसी गहरी संवेदनशीलता क्यूबा ने भारत के सुदूर में चले नक्सली आंदोलन के प्रति रखी यह मानवीय होने के प्रमाण थे… सात समुद्र पार अनजान देश में वह भी पहली बार बेगाने लोगों के बीच ऐसा सम्मान मिल रहा है जिस क्यूबा की चर्चा तत्कालीन विश्व में प्रमुखता में थी क्यूबा की क्रांति रुस और चीन की क्रांति के बाद सबसे आकर्षित क्रांति थी क्योंकि विश्व के तथाकथित दाद अमेरिका की नाक के नीचे यह क्रांति सम्पन्न हुई थी… जबकि अमेरिका ने सारी ताकत झोंक दी थी क्यूबा की क्रांति को असफल करने के लिए। यह सर्वविदित है इतिहास के पन्नों में सब भरा पड़ा है…. उस क्यूबा में जो आज भी एक मात्र समाजवाद का झंडा उठाए खड़ा है उस कम्युनिस्ट देश में एक बाप को ऐसा अनोखा सम्मान मिला उसकी आंखों में आंसू आना स्वाभाविक था। उसका रोम रोम अचंभित था कि जिस, देश में उसके बेटे और तमाम ऐसे लड़ाकों को नक्सली कह कर गाली दी जाती है उस देश में ऐसा सम्मान नही मिला और कोसों दूर इस क्यूबा में ऐसा सम्मान….. उस बाप को पछतावा जरूर हुआ और कम्युनिस्टों के प्रति नजरिया बदला कि यह लड़ाई एक आदमी या एक जाति एक क्षेत्र की नहीं न ही एक विश्व मात्र की है, यह लड़ई तो वास्तव में सम्पूर्ण मानवता की लड़ाई है, जो बिना देश की सीमा को मानते हुए निरंतर जारी है और अपने अंतिम सोपान तक मानव के मानव के शोषण तक समाप्त किया बिना और एक अहिंसात्मक सभ्य समाज बनने तक जारी रहेगी. जिसकी विजय सुनिश्चित है तय है…….

डॉ. नवीन जोशी

( इस एतिहासिक घटना पर किसी के पास कोई तथ्यात्मक आंकड़े हों या ऐतिहासिक तिथि तो अवश्य अवगत कराइये। वैसे घटना पूर्णतः सत्य है जिस कामरेड रोहित शर्मा साथी ने अवगत कराया.. लिपिबद्ध करने की प्रेरणा दी….लेकिन फिर भी कुछ और शोधात्मक जोड़ा जाए तो बेहतर रहेगा )

हाइड्रोक्सी क्लोरोक्वाइन  से मर रहे हैं कोविड 19 के मरीज…. भारत कहीं दरियादिली में दुनिया में मौत का सामान तो नहीं भेज रहा है?

Coronavirus CDC

Covid-19 patients dying of hydroxychloroquine

दुनिया में आज के दौर के शासक निरंकुश हैं, दक्षिणपंथी हैं, कट्टरवादी हैं, छद्म-राष्ट्रवादी हैं, जनता से दूर हैं, और सबसे बड़े बेवकूफ भी हैं – इसका उदाहरण अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प से अच्छा मिलाना कठिन है. दुनिया का इतिहास अगर आगे लिखा जाएगा तो उसमें आज के दौर के शासकों की बेवकूफियों (Idiots of rulers) पर जरूर एक अध्याय होगा. भारत के प्रधानमंत्री तो केवल प्राचीन ग्रंथों में विज्ञान खोजते हैं और बादलों में रडार को विफल करते हैं, डोनाल्ड ट्रम्प तो रोज कोविड 19 की दवा खोज लाते हैं. पहले मलेरिया की दवा हाइड्रोक्सीक्लोरोक्विन, फिर एंटी-वायरल दवा रेम्देसेविर, फिर पराबैगनी किरणें और अब तो डिसइन्फेक्टैंट पीने की सलाह भी देने लगे हैं. अब तो अमेरिका के बड़े स्वास्थ्य विशेषज्ञ (US Big Health Specialist) भी कहने लगे हैं की ट्रम्प अपने प्रेस ब्रीफिंग (Donald Trump’s press briefing) द्वारा जनता के स्वास्थ्य से सक्रिय खिलवाड़ करने लगे हैं.

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार कोविड 19 के मरीजों पर किये गए एक बड़े प्रयोग में रेम्देसेविर अप्रभावी साबित हो गई है. इसे एक अमेरिकी कंपनी ने बनाया था और यह कुछ वायरस को मारने में सक्षम है. पर, एबोला वायरस के संक्रमण के दौर में भी यह दवा अफ्रीका में बेअसर थी.

कोविड 19 के 237 मरीजों के साथ किया गए प्रयोगों में 158 रोगियों को यह दवा दी गई और शेष 79 का उपचार बिना इस दवा के किया गया. जिन्हें रेम्देसेविर दी गयी थी उसमें 14 प्रतिशत व्यक्तियों की मृत्यु हो गई, जबकि जिन्हें यह दवा नहीं दी गई थी उसमें मृत्य दर 13 प्रतिशत ही रही. रेम्देसेविर लेने वाले मरीजों में इस दवा के कुछ गंभीर दुष्परिणाम भी देखे गए.

Trump admin ignored concern over hydroxychloroquine import from India, Pakistan: Fired US scientist

कुछ समय पहले तक अमेरिका में राष्ट्रपति ट्रम्प के अनुसार मलेरिया की दवाएं (Malaria medicines) ही कोविड-19 का एकमात्र इलाज (The only treatment of Covid-19) थीं. स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मना करने के बाद भी भारत को धमका कर उन्होंने ये दवाएं हासिल कीं. अब तक अमेरिका में कुछ मौतें केवल मलेरिया की दवाओं से उपचार के कारण दर्ज की गयीं हैं.

ट्रम्प की धमकी के बाद भारत सरकार ने आनन्-फानन में हाइड्रोक्सीक्लोरोक्विन की टैबलेट बड़ी संख्या में अमेरिका भेज दीं. इसके बाद ब्राज़ील समेत लगभग 55 देशों में भारत सरकार मलेरिया की यह दवा भेज चुकी है.

पर सवाल यह है कि कोविड 19 के इस घातक दौर में एक ऐसी दवा दुनियाभर में क्यों भेज रही है, जिसका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है और फिर यदि इससे मौतें होतीं हैं तो क्या हमारी सरकार इसकी जिम्मेदारी लेने को तैयार है? इस दवा से कोई ठीक तो नहीं होता है, पर कम से कम दो देशों में इससे संकट जरूर खड़ा हो गया.

ब्राज़ील के राष्ट्रपति जेर बोल्सोनारो के अनुसार कोविड 19 सामान्य फ्लू से अधिक कुछ नहीं है और मीडिया इसे बढ़ा-चढ़ा कर बता रहा है. कोविड 19 से निपटने के लिए सख्त पाबदियों के हिमायती पूर्व स्वास्थ्य मंत्री लुइज़ हेनरिक मंदता को उन्होंने 16 अप्रैल को अपने मंत्रिमंडल से बाहर का रास्ता दिखा दिया. इस सम्बन्ध में वहां की समाजवादी विचारधारा वाली लिबर्टी पार्टी के एक सदस्य ने कहा था कि ब्राज़ील दुनिया का अकेला देश होगा, जहां कोविड 19 को नियंत्रित करने के कारण स्वास्थ्य मंत्री को हटना पड़ा.

WHO delivers more medicines to Islamic Republic of Iran for COVID-19 “Solidarity” clinical trial

Novel Coronavirus SARS-CoV-2 Colorized scanning electron micrograph of a cell showing morphological signs of apoptosis, infected with SARS-COV-2 virus particles (green), isolated from a patient sample. Image captured at the NIAID Integrated Research Facility (IRF) in Fort Detrick, Maryland.  भारत ने हाइड्रोक्सीक्लोरोक्विन का तोहफा ट्रम्प के साथ ही जेर बोल्सोनारो को भी दिया था, जिस पर जेर बोल्सोनारो (Jer Bolsonaro) ने मोदी जी को हनुमान बताया था. राष्ट्रपति और स्वास्थ्य मंत्री में इस हाइड्रोक्सीक्लोरोक्विन पर भी तीव्र मतभेद थे. राष्ट्रपति इस दवा को रामवाण बता रहे थे, जबकि स्वास्थ्य मंत्री ने कहा था कि मैं विज्ञान के साथ हूँ और जिस दवा का कोविड 19 के मरीजों पर कोई व्यापक परीक्षण नहीं किया गया हो उसे मैं बढ़ावा नहीं दे सकता था.

अमेरिका में राष्ट्रपति ट्रम्प ने हाइड्रोक्सीक्लोरोक्विन के विरोध के कारण बायोमेडिकल एडवांस्ड रिसर्च एंड डेवलपमेंट अथॉरिटी के प्रमुख, रिक ब्राइट, को भी पद से हटा दिया है. रिक ब्राइट का आरोप है कि ट्रम्प हाइड्रोक्सीक्लोरोक्विन को कोविड 19 के इलाज के लिए रामवाण मानते हैं और उन्हें भी इसके प्रचार के लिए कहा था.

रिक ब्राइट के अनुसार ट्रम्प चाहते थे कि न्यू यॉर्क और न्यू जर्सी के सभी अस्पतालों में हाइड्रोक्सीक्लोरोक्विन भरपूर मात्रा में पहुंचाया जाए, और डोक्टरों पर दबाव डाला जाए कि वे इसी से इलाज करें. पर, रिक ब्राइट ने इसके लिए मना कर दिया था और कहा था कि वे विज्ञान के साथ हैं और जानते हैं कि कोविड 19 के मरीजों के साथ इसका व्यापक परीक्षण कहीं नहीं हुआ है. रिक ब्राइट के अनुसार हाइड्रोक्सीक्लोरोक्विन को भारी मात्रा में पाकिस्तान और भारत से मंगाया गया, पर इसकी जांच अमेरिकी फ़ूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (American Food and Drug Administration) ने नहीं की थी, जो अमेरिकी क़ानून के हिसाब से जरूरी थी. बाद में फ़ूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन ने भी हाइड्रोक्सीक्लोरोक्विन के उपयोग के विरुद्ध चेतावनी जारी कर दी थी.

Concern over hydroxychloroquine

सबसे पहले फ्रांस के डॉक्टरों ने हाइड्रोक्सीक्लोरोक्विन का परीक्षण कोविड 19 के मरीजों पर (Trial of hydroxychloroquine on Covid 19 patients) किया था. इसमें वैज्ञानिकों के अनुसार इससे फायदा नजर आया था, पर बाद में जब प्रयोग का विस्तृत विश्लेषण किया गया तब पता चला कि इस प्रयोग में बहुत सारी गलतियां की गयीं थीं, और इसे प्रयोग और निष्कर्ष को दुनियाभर के वैज्ञानिकों ने सिरे से खारिज कर दिया. पर, डोनाल्ड ट्रम्प को कोविड 19 से लड़ने का एक यही तरीका समझ आया. स्वास्थ्य विशेषज्ञों के लगातार विरोध के बाद भी ट्रम्प इसे रामवाण बताते रहे.

महेंद्र पाण्डेय Mahendra pandey लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।
महेंद्र पाण्डेय
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

अमेरिका में एनबीसी न्यूज़ के अनुसार न्यू यॉर्क में हाइड्रोक्सीक्लोरोक्विन देने के बाद एक महिला की मृत्यु हो गई. अमेरिका में कोविड 19 से ग्रस्त 368 बुजुर्गों पर किये गए एक अध्ययन से स्पष्ट होता है कि हाइड्रोक्सीक्लोरोक्विन लेने वाले मरीजों में मृत्यु दर अधिक रहती है. ब्राज़ील में 81 मरीजों पर किये गए अध्ययन के भी यही नतीजे मिले. चीन में 150 मरीजों पर किये गए अध्ययन का नतीजा था, हाइड्रोक्सीक्लोरोक्विन देने के बाद मरीजों की हालत में सुधार के कोई साक्ष्य नहीं हैं.

न्यू यॉर्क स्थित मेयो क्लिनिक के कार्डियोलोजिस्ट माइकल एकरमैंन के अनुसार क्लोरोक्विन और हाइड्रोक्सीक्लोरोक्विन के प्रभाव से कुछ समय तक दिल की धड़कन असामान्य हो जाती है, इसे मेडिकल की शब्दावली में अर्रीथीमा (अतालता – arrhythmias meaning in hindi) कहा जाता है. कोविड 19 से जूझते मरीज की सामान्य अवस्था में भी दिल की धड़कन असामान्य रहती है, ऐसे में हाइड्रोक्सीक्लोरोक्विन के असर से उसकी धड़कन भी रुक सकती है. अब तक किसी भी बड़े पैमाने के प्रयोग में कोविड 19 के मरीजों को किसी भी फायदे की खबर नहीं आयी है, अलबत्ता इससे नुकसान तो बहुत देखे गए.

Azithromycin: Side Effects COVID-19 (under study)

हाइड्रोक्सीक्लोरोक्विन से जुडी दूसरी चिंता भी स्वास्थ्य विशेषज्ञों को है. हाइड्रोक्सीक्लोरोक्विन को अक्सर एंटीबायोटिक अज़िथ्रोमाइसिन (Antibiotic Azithromycin) के साथ दिया जा रहा है और इसके बेवजह उपयोग से एंटीबायोटिक प्रतिरोधक बैक्टीरिया उत्पन्न होंगे. इससे दूसरी गंभीर समस्याएं पैदा होंगीं. इन सबके बीच सबसे बड़ा प्रश्न तो यही है, भारत कहीं दरियादिली में दुनिया में मौत का सामान तो नहीं भेज रहा है?

महेंद्र पाण्डेय

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

जब तक आरएसएस के मोदी की तरह के प्रचारक के हाथ में सत्ता रहेगी, देश यूँ ही परेशान रहेगा

Modi in Gamchha

मोदी शासन का असली रोग क्या है ! What is the real disease of Modi rule?

फ्रायड के मनोविश्लेषण का एक बुनियादी सिद्धांत है – रोगी की खुद की कही बात पर कभी भरोसा मत करो। उसके रोग के पीछे का सच उसकी जुबान की फिसलन, अजीबोग़रीब कल्पनाओं, ऊटपटाँग आचरण में कहीं गहरे छिपा होता है। उस पर नज़र रखो, रोग के निदान का रास्ता खोज लोगे। यह बात मोदी पर शत-प्रतिशत लागू होती है।

मोदी के रुग्ण शासन का सच भी उसके झूठे प्रचार, हिंदू-मुस्लिम विद्वेष और पाकिस्तान-विरोध मात्र में नहीं, इस शासन के दौरान जनता की बदहवासी के जो तमाम दृश्य बार-बार दिखाई पड़ते हैं, भारत में बढ़ती हुई भूख और प्रेस की आज़ादी के हनन के जो तथ्य बार- बार सामने आते हैं, पीएम केयर में हज़ारों करोड़ होने पर भी प्रवासी मज़दूरों को घर भेजने के लिये उनसे पाई-पाई वसूलने, कोरोना से लड़ने के लिये ताली, थाली बजाने और मोमबत्ती, दीया जलाने तथा सेना से पुष्प वर्षा और बैंड बजवाने की तरह के अकल्पनीय और घृणास्पद दृश्यों से मोदी शासन के रोग का सच अपने को ज़ाहिर करता है।

The RSS never believes in any governmental move to give relief to the public.

यह सच मूलत: आरएसएस के विचारों का सच है। आरएसएस कभी भी जनता को राहत देने के किसी भी शासकीय कदम पर विश्वास नहीं करता है। वह कमज़ोरों के दलन और ताकतवर के प्रभुत्व के सिद्धांत पर बेहद निष्ठुर ढंग से विश्वास करता है। हिटलर का समर्थक होने के नाते सामाजिक डार्विनवाद, सर्वोत्तम की उत्तरजीविता को मन-प्राण से मानता है। ताक़त के थोथे प्रदर्शन की शक्ति पर हद से ज़्यादा यक़ीन करता है।

RSS is an anti-science organization

इसके अलावा एक चरम पुरातनपंथी संगठन होने के नाते आरएसएस एक विज्ञान-विरोधी संगठन है। इसी वजह से राष्ट्र के विकास की इसकी कोई वैज्ञानिक अवधारणा नहीं है। वह राष्ट्र की सभी समस्याओं का निदान अपने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद में देखता है, जिसका एक मात्र अर्थ है भारत के हिंदुओं में हिंदू गौरव का भाव पैदा करना। इस गौरव को वह मुस्लिम-विरोध की मात्रा से मापता है। इसीलिये कोरोना जैसे वैश्विक महामारी के संकट के काल में भी मोदी-अमित शाह की जोड़ी लोगों में बीमारी से लड़ने के लिये वैज्ञानिक चेतना के प्रसार के बजाय मुस्लिम-विरोधी घृणा को फैलाने में ज़्यादा शिद्दत से लगी हुई है।

आज हमारे देश में जनता की दुर्दशा के अकल्पनीय दृश्यों से मोदी शासन के रोग के इस विचारधारात्मक मूल को पकड़ा जा सकता है। ऐसे में केंद्र सरकार को उसकी मौजूदा पंगुता से तब तक मुक्त नहीं किया जा सकता है, जब तक आरएसएस और उसके मोदी की तरह के प्रचारक के हाथ में सत्ता की बागडोर रहेगी। भारत के आज के दुर्भाग्य का यह एक मूलभूत कारण है।

अरुण माहेश्वरी