अथातो चित्त जिज्ञासा – 6, जॉक लकान के मनोविश्लेषण के सिद्धांतों पर केंद्रित एक विमर्श

Jacques Lacan जॉक लकान, Jacques Marie Émile Lacan was a French psychoanalyst and psychiatrist who has been called "the most controversial psycho-analyst since Freud".

अथातो चित्त जिज्ञासा – 6

(जॉक लकान के मनोविश्लेषण के सिद्धांतों पर केंद्रित एक विमर्श की प्रस्तावना – – Preface to a discussion centered on Jacques Lacan ‘s theories of psychoanalysis.)

मानव प्राणी की मूल प्रकृति और लकान

इस धरती के अन्य प्राणी अपने पर्यावरण के अनुरूप उससे ताल-मेल बैठाते हुए कैसे जीए, इसे वे जानते हैं। लेकिन अकेला मानव प्राणी है जो इस बात को नहीं जानता क्योंकि वह नैसर्गिक तौर पर ही सिर्फ अपने प्रकृत परिवेश के दायरे में नहीं जीता है। लकान कहते थे कि हमारे प्राणी जगत में मानव प्राणी एक मात्र है जो अनिवार्य तौर पर समय पूर्व (premature) पैदा होता है। उसका पूरा निर्माण उसके परिवेश के दृश्यों-छवियों से हुआ करता है, जो पल-पल कुछ-कुछ बदलता भी रहता है। यह भी शुद्ध रूप में प्राकृतिक अर्थात् भौतिक नहीं होता है।

हम हमेशा वास्तुकला, चित्रकला, फिल्म, फैशन की बदलती हुई शैलियों में अपने जीवन को नाना रूपों में बनते-बिगड़ते हुए देखते हैं। इस प्रकार हम यह कह सकते हैं कि हमारा पर्यावरण प्रकृति की तरह ही कहीं न कहीं इन तमाम दृश्य कलाओं से भी निर्मित होता है और हमारे मानस को निर्मित करने में इनकी एक बड़ी भूमिका होती है। हम अपने को हमेशा एक जटिल सांस्कृतिक परिवेश से घिरा पाते हैं जो हमें जन्म के साथ अपने बुजुर्गों से, माता-पिता से मिलता है।

सेक्स की एक प्राणी मात्र से जुड़ी सार्विक (universal) प्रक्रिया के बीच से x y क्रोमोजोम्स के मेल से गर्भ में पैदा होने और धरती पर आने के बाद बहुत जल्द हम जैसे ही अपने मन से स्वतंत्र रूप में कोई काम करते हैं, तभी हम अपने जीवन में एक प्रकार के परिवर्तन को अपनाते हैं, अर्थात् लकान के शब्दों में, परिस्थिति का लाभ उठाते हैं। काल के उसी क्षण और भूगोल के उसी स्थान में हम अपनी उस जाति-सत्ता की सार्विकता को छोड़ कर, जो हमें अन्य प्राणियों से जोड़ती थी, अपने अहम् (ego) को प्राप्त करते हैं। आदमी का अहम् एक प्रकृत परिवेश में उसका अपना हस्ताक्षर होता है।

इसके साथ ही क्रमशः हम यह भी देखते हैं कि हम मनुष्यों के भी किसी एक परिवार के अंग मात्र नहीं है, बल्कि विभिन्न भाषाओं, जातियों, नस्लों, धर्मों, सामाजिक वर्गों, राजनीतिक निष्ठाओँ, पारिवारिक परंपराओं और पंथों में बटे हुए हैं। यहीं से हमारे अंदर एक प्रमुख समस्या, एक कशमकश पैदा हो जाती है कि हम कैसे इन अलग-अलग पहचानमूलक सांस्कृतिक समूहों में खुद को शामिल करें, इन समूहों के नये सदस्य कैसे बनें ? कला और संस्कृति का बहुविध संसार ही मुख्य रूप से हमारे सामने यह समस्या पेश करता है। यही मनुष्य के ज्ञान, कामनाओं और क्रियाओं के मूल में काम कर रहा होता है।

और कहना न होगा, लकान के विश्लेषणों से हमें जीवन और कला के, मनुष्यों और उनके अपने दृश्यात्मक रचाव के बीच संबंधों के मूलभूत सवालों पर सोचने का रास्ता मिलता है।

लकान के प्रति हमारी तमाम जिज्ञासाओं की कुंजी इस बात में है कि हम जो भी सवाल करते हैं, जो जानना चाहते हैं, वे किससे करते हैं और हम किससे उनके जवाब की उम्मीद कर रहे होते हैं। लकान कहते हैं कि हमारे सवाल हमेशा उन अन्य से पूछे जाते हैं जिनके बारे में हम समझते हैं कि वे उनके जवाब जानते हैं। मसलन् माता, पिता, शिक्षक, चिकित्सक, पुजारी, मित्र, प्रेमी, यहां तक कि हमारे दुश्मन भी।

हमारे अभिनवगुप्त इस ‘अन्य’ को ही गुरू भी कहते हैं। हमारे प्रश्नों का प्रथम लक्ष्य। हमारे ये सवाल हमारे उन परिजनों, सामान्य ‘अन्यों’ से होते हैं जो उस परिवेश का निर्माण करते हैं जिसमें हम जन्म लेते हैं, शिक्षा पाते हैं, जिसमें हम अपनी इच्छा-अनिच्छा से शामिल होते हैं और कई प्रकार के खास शब्दों और मुहावरों में जिन्हें हम अपने को परेशान करने वाले सवालों के जवाबों से देखने की कोशिश करते हैं। ‘तुम हम से क्या चाहते हो ? तुम मुझे किस प्रकार के इंसान के रूप में देखना चाहते हो ?’ — उन सबसे मन ही मन में इस प्रकार के सवालों के जरिये हम अपने लिये उनके जगत से स्वीकृति पाने की कोशिश करते हैं, और इस प्रकार हम अपने स्तर पर भी हमेशा इन सवालों के तनावों को झेलते रहते हैं।

  1. फ्रायड का प्रवेश

लकान को आदमी के अपने इन अस्तित्वीय सवालों का पहला स्पष्टीकरण फ्रायड से मिला था — रोगी की मनोगत तकलीफों को दूर करने की उनकी कोशिशों से, जिन तकलीफों के रहस्यमय शारीरिक प्रभावों का तत्कालीन चिकित्सा विज्ञान के पास कोई जवाब या निदान नहीं हुआ करता था।

फ्रायड ने अपने रोगियों की कहानियों से जाना कि उनकी तकलीफें झूठी नहीं, वास्तविक हैं। उनके सवाल आज भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। ‘मैं आदमी हूं या औरत ?’ — एक प्रमादग्रस्त व्यक्ति पूछता है जो पुरुष या औरत की मान्य भूमिका अदा करने से इंकार करता है। ‘मैं जिंदा हूं या मर चुका हूं ?’ — जुनूनी आदमी यह सवाल करता है। वो सामाजिक तौर पर अपने खास, मन के तयशुदा रास्ते पर चलने पर अड़ा रहता है, उसे छोड़ना नहीं चाहता।

इन दोनों के ही मुख्य सवालों में एक मूलभूत व्यग्रता होती है — अधिकार-प्राप्त प्रतिनिधियों मसलन् मां-बाप, शिक्षक, बौस, सुपरवाइजर्स, आफिसर, संपादक, आलोचक, मंत्री, रबी, इमाम, शमन, गुरू, पादरी की उनसे की जाने वाली मांगों में निहित उन सबकी अपनी रहस्यमय इच्छाओं, कामनाओं को जानने की व्यग्रता।

हर व्यक्ति इस बात को लेकर परेशान रहता है कि अन्य उससे क्या चाहता है। जैसे कोई कथाकार या चित्रकार किसी को चरित्र या पात्र बना कर उसे पेश करता है तो उस चरित्र के सामने यह स्वाभाविक सवाल पैदा हो रहा है कि वह लेखक, कलाकार हमसे चाहता क्या है ? जो उन्मादी चरित्र होता है वह अपने से की जाने वाली तमाम उम्मीदों का प्रतिवाद और प्रतिरोध करता है। यह प्रतिरोध अवांगर्द कलाकारों जैसा होता है जो अपने वक्त के कला के मानक नियमों को मानने से हमेशा इंकार करते रहे हैं। इसके विपरीत, जुनूनी आदमी — अथवा संस्कृति की पारंपरिक और अकादमिक दुनिया का आदमी — अन्य की कल्पित कामनाओं में हमेशा इस बात को ढूंढता रहता है कि उसमें सामान्य अनुशासन का पालन किया गया है या नहीं ? उसका बल इस बात पर ही ज्यादा से ज्यादा होता है कि इन मान्य नियमों का शत्-प्रतिशत पालन किया जाना चाहिए। वह एक प्रकार से बिल्कुल अंधा हो कर चली आ रही परंपराओं को पकड़ा रहता है।

आज मनोचिकित्सा के क्रम में ऐसे रोगियों को मनोविश्लेषक यही सुझाव देते हैं कि न सिर्फ प्रतिरोध करते जाने की जरूरत है और न पूरी तरह से परंपरा और नियमों का पालन, अर्थात न लकीर का फकीर हो कर ही चलने की जरूरत है। इसका साधारण सा कारण यह है कि जिस ‘अन्य’ के बारे में आप सोचते हैं कि वह जीवन के मूलभूत सवालों का जवाब जानता है, ऐसी सर्वज्ञानी-आत्मा का कहीं कोई अस्तित्व ही नहीं है, जिसकी मान्यताओं को आदमी को अपनी खुद की इच्छाओं के ऊपर तरजीह देना जरूरी हो।  विश्लेषक के सलाह-परामर्श के सेशन की एक लंबी और कठिन प्रक्रिया के जरिये वह आदमी अपने को अन्य की कामनाओं की कल्पना से मुक्त करता है और अपनी कामना के अनुसार जीने का रास्ता अपनाता है। हमारे तंत्रशास्त्र में इसे ही स्व छंद को पाना कहते हैं। यह गुरू से भी मुक्ति की प्रक्रिया है, जिसके सर पर लदे रहने तक आदमी की आंतरिक कसमसाहट का कोई अंत नहीं होता है, उसका व्यक्तित्व दमित ही रहता है। आदमी की स्वतंत्रता की अंतहीन इच्छा और क्रियात्मकता ही उसकी आत्म-मुक्ति का एक सनातन संघर्ष है। स्वतंत्रता ही आदमी के जीवन संघर्ष का पारमार्थिक संदर्भ, अभिनवगुप्त की भाषा में, मोक्ष है।

यह सच है कि किसी भी मनुष्य के शरीर में उसकी अपनी कामनाओं की स्वतंत्रता के धारण की शक्ति की सीमा होती है। लेकिन यह सीमा व्यक्ति की हो सकती है। प्रचलित सामाजिक शील और नियमों की नहीं। महान कलाकार इस सत्य को हमेशा जानते हैं। और इसे जान कर ही वे अपनी इसी शक्ति के साथ उड़ान भरा करते हैं। वे अपने को समग्र सामाजिक प्रक्रियाओं और परिघटनाओं के अंग के रूप में देखते हैं और शाश्वत मूल्यों की कृतियों की रचना करते हैं।

आदमी की मूलभूत नैसर्गिक वृत्तियों, परिस्थिति से लाभ उठाने की सख्त जकड़बंदी के बजाय स्वातंत्र्य की संस्कृति के लचीले दायरे में हमें रखने के लिये ही लकान ने मानवीय अनुभूति की तीन ग्रंथियों (तीन खातों) की तुलना की, जिन्हें सामने रख कर ही हम लकान की मूलभूत स्थापनाओं को समझ सकते हैं। ये है ठोस यथार्थ (Reality), प्रतीकमूलकता (Symbolic) और काल्पनिक (Imaginary) अनुभूतियां। RSI। सत्, चित्त, आनंद — सच्चिदानंद। हमारी आंखें जब इनके अबूझ से चिन्हों को, लक्षणों को धीरे-धीरे दृष्ट रूप में पहचानती है और दिमागी स्तर पर इनका विखंडन करती है, हम अपने इन त्रिआयामी अनुभवों में ही नाना प्रकार से डूबते जाते हैं।

जैसा कि हमने पहले दृष्ट की चर्चा की, लकान इन सारी अनुभूतियों को चित्रात्मक छवियों के रूप में विवेचन का विषय बनाते हैं — लकान की पदावली में संकेतक (signifiers) जिसे उन्होंने स्विस भाषाशास्त्री फर्दिनांद द सौस्योर से लिया है। ये संकेतक (लक्षण) ही आदमी के दृष्ट की पहचान की ग्रंथी को संचालित करते हैं जिन्हें लकान कल्पना के जगत के तत्वों के तौर पर देखते हैं। शब्दों और वाक्यों के अर्थ भी छवियों के रूप में, मानसिक छवियों के रूप में, जिन्हें संकेतित (signifieds) कहते हैं, प्रकट होते हैं, जो चीजों की अलग-अलग पहचान की भेदमूलक क्रियात्मक अंतरक्रिया का जगत रचते हैं, जिसे लकान ने प्रतीकमूलक व्यवस्था (symbolic order) कहा, कह सकते हैं, उसे ही तंत्रशास्त्र में चित्त की संज्ञा दी गई है। आदमी का चित्त ही उसके अंतर का symbolic order  है, यथार्थ और उसकी अनुभूति के बीच का प्रसारित बोधमूलक क्षेत्र।

चित्त के इसी अदृश्य खालीपन मे जिसमें अक्षरों की दृष्ट छवियां और शब्दों के क्रियात्मक अर्थ अपने अस्पष्ट स्वरूप में प्रकट होते हैं, उनसे वह जरूरी जमीन तैयार होती है जो खुद न पूरी तरह से दृष्ट होती है और न क्रियात्मक। यह लक्षणों का जगत होता है जिन्हें परिस्थिति के अनुसार यथार्थ का रूप लेना होता है। यही मनुष्य की संभावनाओं और असंभवताओं का क्षेत्र है।

किसी पृष्ठ का खालीपन, जैसे नक्शा बनाये जाने और भाषा से चिन्हित किये जाने के पहले का शरीर और विश्व — इसे ही लकान ने अद्भुत रहस्यमय ढंग से यथार्थ (reality) बताया है — चित्रों और भाषा के परे का स्वयं में पूर्ण संसार। मनुष्य का यथार्थ महज कोई दृष्ट संसार नहीं है। लकान की विलक्षण विडंबना यह है कि यह यथार्थ हमारे लिये सिर्फ घटित हो जाने के बाद ही, अनुभूति में ढल कर ही अस्तित्व में आता है — यह तभी सामने आता है जब उसकी आदिम अदृष्ट पूर्णता हमेशा के लिये काल्पनिक और प्रतीकात्मक चिन्हों के चित्रों और अभिलेखों के महाजाल में लुप्त हो जाती है ! यही हेगेल और मार्क्स के चिंतन का द्वंद्ववाद है।

हेगेल का बहुत प्रसिद्ध कथन है —“स्वर्ग का उल्लू शाम के उतरने के बाद ही अपने पर फैलाता है।”( The owl of Minerva spreads its wings only with the falling of the dusk.) बुद्धि और दर्शन की युनानी देवी एथेना से उल्लू को जोड़ा जाता है। हेगेल का कहना था कि जब दिन की प्रमुख घटनाएं घट जाती है, तभी दिन के अंत में दर्शन और विचार के उल्लू की उड़ान शुरू होती है। अर्थात् किसी इतिहास के अंत के बाद ही मनुष्य इतिहास के विकास के तर्क को समझ सकता है ; और एक बार पूरी तरह से समझ जाने पर वह इतिहास के साथ अपना हिसाब बैठा लेता है, उसकी गति को अपना लेता है। अर्थात् घटना घटित होने के बाद ही पूरी तरह से हमारी अनुभूति/अनुभव का रूप ले पाती है।

इसी में, किंतु वह चमत्कार भी होता है, जैसा कि न्यूयार्क में 9/11 या लंदन में 7/7 के बारे में कहा जाता है कि दुनिया एक क्षण में पहले जैसी नहीं रही, जो अब तक था जैसे एक क्षण में मिट कर सपाट हो गया है, यथार्थ की अपौरुषेय अर्थहीनता अचानक और डराती हुई हमारे दृश्य में प्रविष्ट करती है और हमारे जाने-पहचाने जगत की अब तक की काल्पनिक और प्रतीकात्मक संहति को, उसके समन्वित, उसके समंजित रूप को अस्थिर कर देती है।

जब सत्, चित्त, और आनंद के तीन प्रारंभिक अक्षरों से सच्चिदानंद कहा जाता है, जैसे फ्रेंच भाषा में R.S.I  (reality, symbolic, imaginary) तो लगता है जैसे शायद कोई अन्य नक्षत्र का प्राणी बोल रहा है। इस प्रकार के मौखिक श्लेष और उनके भौतिक रूपों का अंतर-संबंध और उनका उन्मोचन — इन तीन क्रमों को पूरी तरह से व्यक्त करने का यह एक खास लकानियन उदाहरण भी कहलाता है जिसमें मानव अनुभव के समूचे सत्य को समेट लिया गया है। लकान के अनुसार सचमुच ऐसे ही गंभीर, मायावी, ज्ञान-विहीन झूठ में ही सत्य निहित होता है, यद्यपि वह भी ‘परम सत्य’ नहीं है, जिसे वे बार-बार बल दे कर बताते रहते हैं।

Arun Maheshwari - अरुण माहेश्वरी, लेखक सुप्रसिद्ध मार्क्सवादी आलोचक, सामाजिक-आर्थिक विषयों के टिप्पणीकार एवं पत्रकार हैं। छात्र जीवन से ही मार्क्सवादी राजनीति और साहित्य-आन्दोलन से जुड़ाव और सी.पी.आई.(एम.) के मुखपत्र ‘स्वाधीनता’ से सम्बद्ध। साहित्यिक पत्रिका ‘कलम’ का सम्पादन। जनवादी लेखक संघ के केन्द्रीय सचिव एवं पश्चिम बंगाल के राज्य सचिव। वह हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं।
Arun Maheshwari – अरुण माहेश्वरी, लेखक सुप्रसिद्ध मार्क्सवादी आलोचक, सामाजिक-आर्थिक विषयों के टिप्पणीकार एवं पत्रकार हैं। छात्र जीवन से ही मार्क्सवादी राजनीति और साहित्य-आन्दोलन से जुड़ाव और सी.पी.आई.(एम.) के मुखपत्र ‘स्वाधीनता’ से सम्बद्ध। साहित्यिक पत्रिका ‘कलम’ का सम्पादन। जनवादी लेखक संघ के केन्द्रीय सचिव एवं पश्चिम बंगाल के राज्य सचिव। वह हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं।

प्राणियों के जगत में इस प्रकार के भाषाई निदेशकों के बीच में आने से ही मानव का पशुओं की तुलना में बिल्कुल रूपांतरण हो जाता है। मनुष्यों का संसार शरीरों और भाषाओं का संसार हो जाता है। वह सांस्कृतिक तौर पर संचालित होने लगता है और ऐतिहासिक तौर पर भेदमूलक मानव समूहों में रूपांतरित हो जाता है। इसके साथ ही किसी भी पर्यवेक्षक की सबसे बड़ी विडंबना होती है कि वह विश्व में किसी भी मानव प्राणी की मूल वृत्ति से जुड़ी पूर्णता तक तत्काल पहुंच के रास्ते को खो देता है। मनुष्य असंख्य भेदों का समुच्चय हो जाता है। भेदाभेद ही उसका सच होता है। ‘शब्द ही ब्रह्म है’ के हमारे वाक्यपदीयकार की बात का रहस्य यही है।

लकान कहते हैं कि किसी भी दृष्ट प्राणीसत्ता के रूप में हमें जो उपलब्ध हो पाता है उसकी दृष्ट छवियों के आवरण के पीछे घटित हुई इस आदिम क्षति को हम सहने के लिये अभिशप्त हैं। इस क्षति के स्थान पर हमें सांत्वना के तौर पर हासिल क्या होता है ? हमारी कथित ‘संस्कृति’।

आदमी पर बार-बार और लगातार संकेतकों की श्रृंखला का दबाव ही उसके व्यवहार में दोहराव की स्वतःस्फूर्तता का कारण है। वे कहते हैं कि यदि हमें फ्रायड की खोज को गंभीरता से लेना हैं तो आदमी के अवचेतन के विषय को हमें इसी में कहीं खोजना होगा। (देखें — Seminar on “The Purloined Letter”, Ecrits, page -12) इस प्रकार हमारी वाक्-प्राणीसत्ता को संकेतकों-प्रतीकों के क्रियात्मक अर्थों की सीमाओं में खुद के बारे में कुछ तात्कालिक अवबोध कायम करने के लिये कहा जाता है, जिसमें हमारी भाषा हमें संबोधित करती है और एक प्रकार से हमें सजाती-संवारती है।

हमारी शारीरिक प्राणीसत्ता इस डरावने आधे-अधूरेपन को ही मान कर चलने के लिये मजबूर होती है, जो चुपचाप और अदृश्य रूप में हमें, सामाजिक मान्यताओं और नैतिकताओं के नाम पर घेरे रहती है। हम अपने तई, अपनी स्वतंत्र नैसर्गिकता के तई इन संदिग्ध संरचनाओं में जीने के लिये वास्तव में अपने स्तर पर जूझते रहते हैं। चित्त की ये संदिग्ध संरचनाएं ही जब किसी एक चरण में आकर मानो किसी विस्फोट से उड़ा दी जाती है, या उड़ जाती है — उससे मेल बैठाने में असमर्थ आदमी असामान्य या मनोरोगी कहलाने लगता है।

अरुण माहेश्वरी

Notes – Jacques Lacan, French psychoanalyst

Jacques Marie Émile Lacan was a French psychoanalyst and psychiatrist who has been called “the most controversial psycho-analyst since Freud”.

Jacques Lacan Quotes

What does it matter how many lovers you have if none of them gives you the universe?

The knowledge that there is a part of the psychic functions that are out of conscious reach, we did not need to wait for Freud to know this!

In other words, the man who is born into existence deals first with language; this is a given. He is even caught in it before his birth.

Jacques Lacan Books

हम मिडिल क्लास घर में बैठ कर पर्यावरण का आनंद ले रहे लेकिन लॉकडाउन ने करोड़ों मज़दूरों की आजीविका को संकट में डाल दिया है

Lockdown, migration and environment

लॉकडाउन, पलायन और पर्यावरण | Lockdown, migration and environment

बीते दिनों दो तस्वीरें सबसे ज़्यादा सोशल मीडिया के माध्यम से सरकुलेट हुई थी दोनों तस्वीरें नदी और पहाड़ से जुड़ी हुई थी।

पहली तस्वीर में जालंधर शहर के बाहरी इलाकों से हिमाचल प्रदेश के धौलाधार पहाड़ दिखने लगे हैं। और दूसरी तस्वीर में दिल्ली से बहने वाली यमुना नदी को नोएडा के किनारे से ली गयी तस्वीर में साफ़ – सुथरी और नीला रंगी दिखाया गया।

उससे पहले की कुछ तस्वीर सोशल मीडिया में वायरल हुई थी जो तस्वीरें लॉकडाउन की थी, लॉकडाउन के एक दिन के बाद की थी, जो देश के मेहनतकश मज़दूरों की बेचैनी की तस्वीर थी।

इन तस्वीरों में लॉकडाउन की घोषणा के बाद देश भर के शहरों-महानगरों से लाखों की तादाद में प्रवासी मजदूरों का पलायन देखा गया।

देश में लॉकडाउन के दौरान कई पर्यावरण स्टडी (Environmental study during lockdown) भी आ रहे हैं, सारे संगठन इस बात पर ज़ोर दे रहे हैं कि लॉकडाउन के बाद देश की नदियाँ और हवा साफ़ हुई, आँकड़े भी शायद यही कह रही है।

ये लॉकडाउन और पर्यावरण का साफ़ होना हम सब के लिए शायद एक अच्छी घटना हो, मगर उन मेहनतकश मज़दूरों के लिए ये लॉकडाउन से बढ़ी बेरोज़गारी किसी पीड़ा की तरह ही है, जिन्हें प्रकृति के साफ़ होने से ज़्यादा रोज़गार के ख़त्म होने का डर मार रहा है।

लॉकडाउन ने देश के करोड़ों मज़दूर लोगों की आजीविका को संकट में डाल दिया है, हम मिडिल क्लास लोग घर में बैठ कर पर्यावरण का आनंद तो ले रहे हैं क्योंकि हमारी सैलरी आ रही है या देर सवेर आ ही जाएगी ? मगर उनका क्या होगा ? जिसे लॉकडाउन के बाद साफ़ हवा और साफ़ यमुना की जगह रोज़ी और रोटी का जुगाड़ करना है, उन्हें लौटना है उन कारख़ानों में जहां दिहाड़ी मज़दूरी करना है, अपना और अपने परिवार का पेट भी भरना है?

गंगा मैया की ये वो करोड़ों अभागी संतान हैं जिन्हें पर्यावरण नहीं रोटी चाहिए, इन्हें मालूम है कि देश के लाखों कारख़ानों के करोड़ों चिमनियों से निकलने वाला धुआँ ज़हर बनकर इनके सीने में दौड़ेगा पर इसके बावजूद भी लॉकडाउन के बाद इनको कारख़ानों के चलने की आस होगी, वहाँ लौटने के लिए कुछ पैसे बचा कर, न होने पर गाँव से उधार माँग कर वापस आएँगे ताकि पेट के अंदर का भूख मेहनत मज़दूरी करके मिटाया जाए ?

मुन्ना झा

(लेखक पर्यावरण कार्यकर्ता हैं। )

कोरोना काल की राजनीति : विपदा का प्रहसन

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Corona period politics: farce of calamity

जब सारा देश एकजुटता के साथ अभूतपूर्व कोरोना संकट (Corona crisis) से जूझ रहा है और संपूर्ण विपक्ष  पूरी तरह सरकार के प्रयासों का समर्थन कर रहा है, वहीं भारतीय जनता पार्टी, उसकी केन्द्र और राज्यों की सरकारें और समूचा संघ समूह आज भी अपनी तुच्छ और संकीर्ण राजनीति (RSS’s petty and narrow politics) को आगे बढ़ाने का कोई मौका नहीं छोड़ रहे हैं।

भाजपा और संघ की दलीय हितों में संलिप्त रहने की कारगुजारियों का ही परिणाम था कि भारत में कोरोना के खिलाफ जंग (War against Corona in India) लगभग एक माह लेट शुरू हुयी। जनवरी के प्रारंभ में ही जब पहले कोरोना ग्रसित की पहचान हुयी, केरल सरकार ने उसे अंकुश में रखने की जो फुलप्रूफ व्यवस्था की उसकी सर्वत्र प्रशंसा हो रही है। लेकिन केन्द्र सरकार और भाजपा की  राज्य सरकारों ने फरवरी के अंत तक कोई नोटिस नहीं लिया।

इस पूरे दौर में वे सीएए, एनपीआर एवं एनआरसी के विरोध में चल रहे आंदोलनों (Movements in protest against CAA, NPR and NRC) को सांप्रदायिक करार देने में जुटे रहे। दर्जनों की जान लेने वाले और अरबों- खरबों की संपत्ति को विनष्ट करने वाले सरकार संरक्षित दिल्ली के दंगे भी इसी दौर में हुये।

मध्य प्रदेश की पूर्ण बहुमत वाली सरकार को षड़यंत्रपूर्वक अपदस्थ करने का खेल भी इसी दरम्यान खेला गया।

कोरोना की संभावित भयावहता पर फोकस करने के बजाय संपूर्ण सरकारी तंत्र और मीडिया चीन, पाकिस्तान और मुसलमान पर ही अरण्यरोदन करता रहा।

लोगों की आस्था के दोहन की गरज से सारा फोकस राम मंदिर निर्माण की तैयारियों पर केन्द्रित था।

जब देश को कोरोना से जूझने के लिये तैयार करने की जरूरत थी, तब हमारी केन्द्र सरकार और कई राज्य सरकारें, सपरिवार निजी यात्रा पर भारत भ्रमण को आये अमेरिकी राष्ट्रपति के भव्य और बेहद खर्चीले स्वागत की तैयारियों में जुटी थीं। यूरोप और अमेरिका में भी जब कोरोना पूरी तरह फैल चुका था, श्री ट्रंप ने अमेरिकी नागरिकों की रक्षा से ज्यादा निजी यात्रा को प्राथमिकता दी। परिणाम सामने है।

जनवरी और फरवरी में ही कोरोना ने चीन, यूरोप, अमेरिका आदि अनेक देशों को बुरी तरह चपेट में ले लिया था, तब उच्च और उच्च मध्यम वर्ग के तमाम लोग धड़ाधड़ इन देशों से लौट रहे थे। इन वर्गों के लिये पलक – पांबड़े बिछाने वाली सरकार ने एयरपोर्ट पर मामूली जांच के बाद उन्हें घरों को जाने दिया। ये ही लोग भारत में कोरोना के प्रथम आयातक और विस्तारक बने। चिकित्सा और बचाव संबंधी तमाम सामग्री का निर्यात भी 19 मार्च तक जारी रहा।

The government became aware when Corona started spreading in India

सरकार को होश तब आया जब कोरोना भारत में फैलने लगा। अपनी लोकप्रियता और छवि निर्माण के लिये हर क्षण प्रयत्नशील रहने वाले प्रधान मंत्री श्री मोदी ने 22 मार्च को 14 घंटे के लाक डाउन और और शाम को थाली- ताली पीटने का आह्वान कर डाला। निशाना कोरोना से जूझ रहे उन स्वास्थ्यकर्मियों के कंधे पर रख कर साधा गया जिन्हें आज तक सुरक्षा किटें नहीं मिल सकी हैं और उसकी मांग करने पर उन्हें बर्खास्तगी जैसे दंडों को झेलना पड़ रहा है।

यह ध्रुव सत्य है कि कोरोना अथवा किसी भी महामारी और बीमारी का निदान विज्ञान के द्वारा ही संभव है, उन मंदिर, मस्जिद, चर्च से नहीं जिन पर आज ताले लटके हुये हैं। लेकिन शोषक वर्ग खास कर धर्म, पाखंड और टोने- टोटकों के बल पर वोट बटोरने वाली जमातों को वैज्ञानिक सोच से बहुत डर लगता है।

सभी जानते हैं कि श्री दाभोलकर, गोविन्द पंसारे, कलबुर्गी और गौरी लंकेश की हत्याओं के पीछे इन्हीं विज्ञान विरोधी कट्टरपंथियों का हाथ रहा है।

भारत में साँप के काटने पर लोग आज भी थाली बजाते हैं। आज भी पशुओं में बीमारी फैलने पर तंत ( तंत्र ) कर खप्पड़ निकालते हैं और थाली ढोल मंजीरा पीटते हैं। तमाम ओझा,फकीर और मौलवी- मुल्ले कथित भूत्त- प्रेत बाधा का निवारण और कई बीमारियों का इलाज भी झाड फूक और थाली लोटा बजा कर करते हैं। प्रधानमंत्री ने आम जन को इसी तंत्र मंत्र में उलझा कर विज्ञान की वरीयता को निगीर्ण करने की चेष्टा की। अति उत्साही उनके अनुयायियों ने उसमें आतिशबाज़ी का तड़का भी लगा दिया। वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखने वाले लोगों ने स्वास्थ्यकर्मियों को सैल्यूट कर उनके प्रति कृतज्ञता का इजहार किया।

प्रधानमंत्री जी का रात आठ बजे टीवी पर प्रकट होना और आधी रात से लागू होने वाले उनके फैसले देश के लिये संकट का पर्याय बन चुके हैं।

नोटबंदी और जीएसटी से मिले घाव अभी देश भुला नहीं पाया था कि अचानक प्रधानमंत्री टीवी पर पुनः प्रकट हुये और 25 मार्च से 3 सप्ताह के लिये लाक डाउन की घोषणा कर दी। अधिकतर ट्रेनें, बसें और एयर लाइंस पहले ही बंद किए जा चुके थे। अचानक और बिना तैयारी के उठाये इस कदम से सभी अवाक रह गये।

कल- कारखाने, व्यापार- दुकान बन्द हो जाने से करोड़ों मजदूर सड़क पर आ गये। रोज कमा कर खाने वाले और गरीबों के घर में तो अगले दिन चूल्हा जलाने को राशन तेल भी नहीं था। बदहवास लोग बाज़ारों की ओर दौड़े। अधिकांश बाजार बंद हो चुके थे। जो दुकानें खुली थीं उन्होंने भीड़ बढ़ती देख मनमानी कीमत बसूली। गंभीर बीमारियों से पीड़ितों के पास पर्याप्त दवा तक नहीं थी।

अनेकों सेवायोजकों ने मजदूरों को काम पर से हटा दिया। मकान मालिकों ने उन्हें घरों से निकाल दिया। धनाढ्य लोगों के कहने पर दिल्ली पुलिस ने उनकी झोपड़ियों को उजाड़ दिया और उन्हें दिल्ली की सीमाओं के बाहर छोड़ दिया।

सरकार की इस अदूरदर्शिता ने करोड़ों लोगों को सड़क पर ला दिया। बहु प्रचारित सोशल डिस्टेन्सिंग तार-तार हो गयी और विस्थापन को मजबूर मजदूर और अन्य गरीबों ने पहाड़ जैसी पीड़ा झेलते हुये जन्मभूमि का रुख किया। भूख- प्यास और थकान से तीन दर्जन लोगों ने रास्ते में ही दम तोड़ दिया। सरकार की कड़ी आलोचना हुयी। तब भाजपा और उसकी सरकार हानि की भरपाई के रास्ते तलाशने में जुट गयी।

सीएए विरोधी आंदोलन और बाद में हुये दिल्ली के दंगों के चलते दिल्ली में धारा 144 लागू थी। सारे देश में राजनैतिक दलों के कार्यक्रमों के आयोजन की इजाजत दी नहीं जा रही थी। तमाम वामपंथी जनवादी दलों एवं संगठनों ने कोरोना की भयावहता (Horrors of corona) को भाँप कर अपने अनेकों कार्यक्रम रद्द कर दिये थे। पर ये केन्द्र सरकार थी जो विपक्ष के आगाह करने के बावजूद संसद को चलाती रही। भाजपा के लिये राजनीतिक जमीन तैयार करने वाले धर्मध्वजधारी समूह अपने कार्यक्रमों को अंजाम देते रहे।

दफा 144 के बावज़ूद दिल्ली के निज़ामुद्दीन मरकज में जमात चलती रही। लॉक डाउन लागू होने के बाद भी जमातियों को हटाने और गंतव्य तक पहुंचाने को कदम उठाए नहीं गये। जब जमाती बीमार पड़ने लगे तब भी सरकार के कान पर जूं नहीं रेंगी। आखिर क्यों?

फिर क्या था, सरकार और मीडिया को आखिर वह नायाब शैतान मिल ही गया जिस के ऊपर कोरोना के विस्तार की सारी ज़िम्मेदारी डाल कर वह सरकार की मुजरिमाना नाकामियों पर पर्दा डाल सकते थे। सरकार, उसके मंत्री, राज्यों के मुख्यमंत्री, भाजपा और संघ के प्रवक्ता, भाजपा की मीडिया सेल और सारा गोदी मीडिया जनता के कोरोना विरोधी संघर्ष को सांप्रदायिक बनाने में जुट गये। स्वास्थ्य मंत्रालय के मना करने के बावजूद भी यह आज तक उसी रफ्तार से जारी है।

दूसरे धर्मों के ठेकेदार भी उन दिनों वही सब कर रहे थे जो जमात कर रही थी। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री आदित्यनाथ जी सोशल डिस्टेन्सिंग की धज्जियां उड़ाते हुये अयोध्या में अगली कार सेवा का आगाज कर रहे थे। कोरोना की विभीषिका की फिक्र से कोसों दूर वे पूरे दो दिनों तक अयोध्या में थे। इससे पहले वे मथुरा में लट्ठमार होली का आनंद ले रहे थे।

इस बीच कई बार भाजपा के जन प्रतिनिधियों के बयानों और कारगुजारियों से भाजपा का जन विरोधी, गरीब विरोधी, फासिस्ट चेहरा उजागर हुआ। एक विधायक लॉक डाउन में पुलिस की मार खा रहे लोगों को गोली से उड़ाने का आदेश देते दिखे तो एक अन्य विधायक तब्लीगियों को कोरोना जेहादी बता रहे थे। यूपी के बलरामपुर की भाजपा जिलाध्यक्ष ने खुलेआम पिस्तौल से फायरिंग कर कानून की धज्जियां बिखेरीं।

मोदीजी 3 अप्रेल को फिर टीवी पर नमूदार हुये। उन्होंने एक बार फिर 5 अप्रैल को रात 9 बजे घर की बत्तियाँ बंद कर 9 मिनट तक घर के दरवाजे या बालकनी में रोशनी करने का आह्वान किया। किसी की समझ में नहीं आया कि इस नए टोने से कोरोना पर क्या असर पड़ेगा? प्रबुद्ध जनों ने खोज निकाला कि 40 वर्ष पूर्व 5 अप्रैल को विगत जनसंघ के शूरमाओं ने नई पार्टी- भाजपा बनाने का निर्णय लिया था, जिसकी घोषणा 6अप्रेल को की गयी थी। यह लॉक डाउन में भी पार्टी के स्थापना दिवस को भव्य तरीके से मनाने की जुगत थी।

यूं तो कार्यक्रम को स्वैच्छिक बताया गया लेकिन केन्द्र और राज्यों की कई सरकारें इसकी कामयाबी के लिये पसीना बहाती दिखीं। संगठन और मीडिया तो और भी आगे थे। ठीक 9 बजे सायरन भी बजाए गए। जागरूक लोगों को यह समझने में देर नहीं लगी कि कोरोना की आड़ में यह एक राजनीतिक कार्यक्रम है। अतएव वैज्ञानिक सोच के लोगों, तार्किक लोगों, पोंगा पंथ विरोधी लोगों और सामाजिक न्याय की ताकतों ने इससे दूरी बनाए रखी।

लेकिन 5 अप्रैल की रात को जो सामने आया वह केवल वह नहीं था जिसकी भावुक अपील श्री मोदी जी ने की थी। मोदी जी ने स्ट्रीट लाइट्स जलाये रखने को कहा था, पर अति उत्साही प्यादों ने अनेक जगह वह भी बुझा दी। गांवों में अनेक जगह ट्रांसफार्मर से ही बिजली उड़ा दी गयी। दीपक, मोमबत्तियाँ, टार्च जलीं यहाँ तक तो ठीक था। पर जय श्रीराम एवं मोदी जिंदाबाद के नारे लगे और सोशल डिस्टेन्सिंग की धज्जियां बिखेरते हुये कैंडिल मार्च निकाले गये।

और इस सबसे ऊपर वह था जिसकी गम के इस माहौल में कल्पना नहीं की जा सकती। कोरोना प्रभावित कई दर्जन लोगों की मौतें हो चुकी थीं। अपने घरों की राह पकड़े भूख प्यास से मरे लोगों की संख्या भी तीन दर्जन हो चुकी थी। पर 9 बजते ही बेशुमार पटाखों की आवाजों से आसमान गूंज उठा। आतिशबाज़ी का यह क्रम 20 से 25 मिनट तक जारी रहा। सोशल मीडिया के माध्यम से मिनटों में पता लग गया कि यह आतिशबाज़ी पूरे देश में की जा रही थी।

मध्यवर्ग का अट्टहास तो देखते ही बनता था। वे गरीब भी पीछे नहीं थे जिनके घरों में मुश्किल से चूल्हे जल पा रहे थे। वे युवा भी थे जो अपनी नौकरियाँ गंवा बैठे थे। लाशों पर ऐसा उत्सव पहले कभी देखा सुना नहीं गया।

सवाल उठता है कि जब सारे देश में लॉक डाउन था इतनी बारूद लोगों तक कैसे पहुंची? क्या लोगों के घरों में आतिशबाज़ी की इस विशाल सामग्री का जखीरा जमा था? दीवाली पर शहरों की सुरक्षित जगहों पर आतिशबाज़ी के बाज़ार सजते हैं, पर अब तो बाज़ार ही बंद थे।  छान बीन से नतीजा निकला कि आम लोगों तक दीपक और पटाखे पहुंचाये गये थे। संघ समूह का खुला एजेंडा रोशनी करना- कराना था,पर छुपा एजेंडा था बड़े पैमाने पर आतिशबाज़ी कराकर जनता पर मोदी जी के कथित प्रभाव का प्रदर्शन कराना। गणेश जी को दूध पिलाने जैसा यह जनता की विवेकशक्ति को परखने का एक और हथकंडा था।

लेकिन इसकी पहुँच में सरकारी अधिकारी और अर्ध सैनिक बल भी थे। तमाम पुलिस प्रशासनिक अधिकारियों ने ड्यूटी छोड़ घरों पर सपरिवार रोशनी करने की तस्वीरें सगर्व सार्वजनिक कीं।

एक जाने माने हिन्दी कवि श्री कुमार विश्वास ने इस पूरे कथानक पर अपनी गहन पीड़ा व्यक्त करते हुये इसे “विपदा का प्रहसन” करार दिया। पर जिन लोगों ने फासीवाद का इतिहास (History of fascism) पड़ा है वे जानते हैं कि फासीवादी शक्तियाँ अपनी भावुक अपीलों से जनता को छलती रहीं हैं।

किसी मुद्दे पर विपक्ष के मुंह खोलते ही उस पर राजनीति का आरोप जड़ने वाली भाजपा आज भी अपनी परंपरागत राजनीति धड़ल्ले से चला रही है। सत्ता और मीडिया के बल पर झूठ और दुष्प्रचार की सारी सीमाएं लांघ रही है। पूरे देश में एक साथ लाइटें बंद करने से ग्रिड पर संकट मंडराने लगा था। ग्रिड के अधिकारियों ने इस स्थिति से निपटने को वाकायदा तैयारियां कीं और अधिकारी कर्मचारियों को मुस्तैद रहने के लिखित निर्देश जारी किये। विपक्ष ने जब आवाज उठायी तो सरकार सकपकाई। फ्रिज, एसी आदि चालू रखने की अपीलें की गईं। भले ही वो विपक्ष पर आरोप लगाये कि वह अफवाह फैला रहा है, पर इससे यह खुलासा तो हो ही गया कि अति उत्साह में मोदीजी ने ग्रिड को संकट में डाल दिया था।

कोरोना के विरूद्ध इस जंग में विज्ञान की प्रभुता और धर्मों का खोखलापन उजागर हो गया है। धीरे-धीरे धर्मों के नाम पर समाज को बांटने की साज़िशों की कलई खुलती जा रही है। भाजपा और संघ इससे परेशान हैं। वे कोरोना के विरुद्ध जनता के संयुक्त संघर्ष (Joint struggle of the people against Corona) को अकेले मोदी जी का संघर्ष बताने में जुटे हैं। विपक्ष की गतिविधियों को पिंजड़े में बंद कर अपने एजेंडे पर वे पूर्ववत कार्य कर रहे हैं।

डॉ. गिरीश

लेखक भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की उत्तर प्रदेश इकाई के सचिव हैं।

अशिक्षित और अक्ल के अंधे न्यूज़ चैनलों को तो जमातियों के थूकने और मूतने के फर्जी वीडियो दिखाने से ही फुरसत नहीं..

Desh ka dushman media

आत्मा को सब्जीमंडी में तलाशता समाज | Society seeks soul in vegetable market

आत्मा-परमात्मा, आस्था-अनास्था, देह, देह से परे, शरीर एक पिंजरा है, सर्व शक्तिमान, क्या लेकर आया है क्या ले कर जाएगा वाले इस समाज को अक्सर विपरीत परिस्थितियों में मसक्कली की तरह फड़फड़ाते और डोलते देखा है.. तब आध्यात्म से लिपा पुता यह समाज इस कदर इहलौकिक हो जाता है कि चितकबरा नज़र आने लगता है..

अपने छज्जे पर खड़े हो कर ताली बजाने को कहो तो सड़कों पर निकल जुलूस निकालने लगते हैं.. घर की मुंडेर पर दिया जलाने को कहो तो आतिशबाजी करने लगते हैं.. अफ़वाहें फैलाने में उस्ताद चैनल बिना व्याख्या किये कोई सरकारी आदेश निकाल दें तो देश भर का नागरिक आपदा पीड़ित हो भुखमरी का शिकार हो जाता है..और पागलों जैसा व्यवहार करता है..जैसे कल हॉट-स्पॉट और सील जैसे दो शब्द सुनते ही सब जगह बदहवासी फैल गयी और सड़कों पर भीड़ उमड़ पड़ी..कोरोना का डिस्टेंसिंग वाले सिद्धांत पर मिट्टी डाल सब ख़रीदारी करने सड़कों पर निकल पड़े, जैसे अगली सुबह किसी के घरों में अन्न का दाना न होगा..

कल शाम सड़कों पर मेले का दृश्य था..

एक फोन आया तो यही देखने की तमन्ना लेकर बाइक उठाई और निकल पड़ा..

यह देख कर और अफसोस हुआ लेकिन आश्चर्य नहीं कि भीड़ माध्यम वर्ग की औरतों से लबरेज थी.. मरद की अकल पर भरोसा नहीं था, तो दुपहिया और चौपायों पर खुद भी सवार.. एक-एक दुकान पर 30-30 की भीड़.. जैसे कोरोना नहीं, सब भुखमरी का शिकार होने वाले हैं..

जैसा राजा वैसी प्रजा को सम्पूर्ण अर्थ दे दिया है गरीबों के लिए बैंक में पहुंचे 500-500 रुपयों ने..

Rajeev mittal राजीव मित्तल वरिष्ठ पत्रकार हैं।
Rajeev mittal राजीव मित्तल वरिष्ठ पत्रकार हैं।

लुभाने का कोई भी तरीका राजा हाथ से जाने नहीं देना चाहता, चाहे वो कितना भी बदतरीन क्यों न हो, और प्रजा भेड़ की तरह कूच कर देती है.. बैंकों में डाले गए 500 रुपये ने कोरोना से बचाव के सारे नियम कानून ध्वस्त कर दिए हैं.. और गरीबी में आटा गीला कर रहे हैं हमारे अशिक्षित और अक्ल के अंधे न्यूज़ चैनल, जिन्हें यह अव्यवस्था से कोई मतलब नहीं, क्योंकि उन्हें तो जमातियों के थूकने और मूतने के फर्जी वीडियो दिखाने से ही फुरसत नहीं..

ऐसे में “राम नाम सत्त है’ से सटीक कोई वाक्य नहीं..

राजीव मित्तल

जानिए आखिर क्या है भीलवाड़ा मॉडल

Corona virus

Know what is the Bhilwara model

अगर हम सभी इस मैनिपुलेशन, झूठ, बेईमानी और भ्रष्ट व छद्म आचरण को छोड़ सकते तो कितना बेहतर हो? पर नहीं, सबको अपना ही सब कुछ ठीक लगता है और दूसरे का गलत।

यह सोचने की बात है कि दिक्कत तब बढ़ जाएगी जब आप अपने अड़ियल रवैये को अपनाते हुए किसी अच्छे प्रोजेट को स्वीकार न करें। जब यह कुटैव सामाजिक रूप से विस्तृत हो जाती है और फिर एक पूरा समाज ही अपने से भिन्न लोगों को खारिज़ करने, उनको गलत तरीके से लेबल करने और अपने हर तरह के धत-करम को उचित ठहराने लगता है।

ऐसा समाज स्वयं ढोंग, पाखंड और दिखावा करते हुए भी दूसरों से उत्तम आचरण व आदर्शों की अपेक्षा रखता है, जबकि ज्यादातर लोग व्यक्तिगत स्तर पर आचरण की शुद्धता और अपने कर्म-व्यवहार की सार्थकता सिद्ध करने में बहुत पीछे रह जाते हैं।

आज दिनांक 8 अप्रैल को भारत में कोरोना पीड़ित मरीजों की संख्या (Number of patients suffering from corona in India) 5 हज़ार से पार कर गई है, लेकिन अभी सरकार के पास इस वैश्विक महामारी से लड़ने के लिए कोई ब्लूप्रिंट या कहें कोई श्वेत पत्र, नहीं है जिसको मानक मान कर सरकार अपनी रणनीति पर आगे बढ़ें।

इस वक्त सरकार की कमियों को उजागर करना गलत है, पर मानव जीवन भी अमूल्य है जिसके कारण उसके लिए नई रणनीति बनाकर देना भी हम जैसों का ही दायित्व है। धरातल पर कुछ होता नहीं दिख रहा है। इस बीच राजस्थान के एक शहर के नाम की चर्चा बहुत हो रही है जिसने कोरोना से लड़ने का भीलवाड़ा मॉडल (‘Bhilwara model’ of fighting Corona) तैयार किया है।

भीलवाड़ा कोरोना का मार्च महीने में सबसे बड़ा सेंटर था। वहाँ विदेश से आये एक डॉक्टर के संक्रमित होने की वजह से उनके संपर्क में आये 26 लोग पॉज़िटिव पाए गए थे। तत्काल कलेक्टर श्री राजेंद्र जी ने राज्य सरकार के निर्देश पर 20 मार्च से ही पूरे शहर में कर्फ्यू लगाकर बॉर्डर सील कर दिया। जिले की सीमाएं सील करते हुए 14 एंट्री पॉइंट्स पर चेक पोस्ट बनाईं, ताकि कोई भी शहर से न बाहर जा सके और न अंदर आ सके।

भीलवाड़ा में पब्लिक ट्रांसपोर्ट को पूरी तरह से बंद कर दिया, इसमें रोडवेज बस से लेकर ऑटो-रिक्शा, टैक्सी सभी शामिल थीं।

Bhilwara became the first district in the country where media was also banned

भीलवाड़ा देश का पहला जिला बना जहाँ मीडिया को भी बैन किया गया।एनजीओ को भी बैन किया गया। कर्फ्यू पास भी रद्द किए गए। यहाँ तक कि जनप्रतिनिधियों को भी शहर में घुसने नहीं दिया, सिर्फ काम के पुलिस और प्रशासन के अधिकारी ही घुस पाए। भीलवाड़ा में कोरोना के आंकड़ों को 26 पर ही रोक दिया गया।

16 हजार स्वास्थ्य कर्मियों की टीम को एक साथ भीलवाड़ा भेजा गया गया। स्वास्थ्य कर्मियों ने घर-घर जाकर स्क्रीनिंग शुरू कर दी। इस दौरान करीब 18 हजार लोगों में सर्दी-जुकाम के लक्षण पाए गए।

डॉक्टर से संक्रमण फैलने का पता चलते ही हॉस्पिटल का स्टॉफ, उनके परिवार वाले, जो मरीज हॉस्पिटल में आए थे, उनके परिजन सभी की स्क्रीनिंग की गई। इनमें से शहर में करीब 11 हजार लोग संदिग्ध मिले। उनमें से करीब 6445 को उनके ही घरों में ही आइसोलेशन किया गया। पूरे शहर में फैले हुए संक्रमण की चेन को तोड़ने के लिए करीब 77 हजार घरों का तीन बार सर्वे किया गया।

स्वास्थ्य विभाग की टीम ने एक-एक घर में जाकर सभी लोगों के स्वास्थ्य की स्क्रीनिंग की। इसमें पहले चरण में छह हजार स्वास्थ्य टीमों ने 24 लाख लोगों की स्क्रीनिंग केवल 9 दिनों में पूरी की। जो अपने आप में एक मिसाल है।

इसके ही दूसरे चरण में 18 हजार लोगों का सर्वे के साथ ही सर्दी, जुखाम का इलाज किया गया। कोरोना संदिग्धों को भीलवाड़ा के थ्री स्टार होटल और रिजॉर्ट तक में रखा गया। कई जगह तो हर कमरे के लिए अलग गार्डन भी हैं। वहीं, घर में क्वारन्टाइन किए गए 6445 लोगों की ऐप से निगरानी की गई।

आज के दौर में डिजिटल दुनिया का सर्वोत्तम प्रयोग करके तथा कुछ के घर के बाहर पुलिस भी बैठाई गई।

Amit Singh ShivBhakt Nandi अमित सिंह शिवभक्त नंदी, कंप्यूटर साइन्स - इंजीनियर, सामाजिक-चिंतक हैं। दुर्बलतम की आवाज बनना और उनके लिए आजीवन संघर्षरत रहना ही अमित सिंह का परिचय है। हिंदी में अपने लेख लिखा करते हैं
Amit Singh ShivBhakt Nandi अमित सिंह शिवभक्त नंदी, कंप्यूटर साइन्स – इंजीनियर, सामाजिक-चिंतक हैं। दुर्बलतम की आवाज बनना और उनके लिए आजीवन संघर्षरत रहना ही अमित सिंह का परिचय है। हिंदी में अपने लेख लिखा करते हैं

इस पूरे प्रोजेक्ट की निगरानी कलेक्टर श्री राजेंद्र जी ने खुद अपने हाथ में रखी। पीएम के द्वारा प्रायोजित टोटकों और  नौटंकी में शामिल होने वालों के लिए भी कलेक्टर ने कड़े नियम लागू किये थे। आप एक तरह से कह सकते हैं कि भीलवाड़ा में महाकर्फ्यू लागू है।

इसका परिणाम ये आया कि अब भीलवाड़ा 15 दिन में ही कोरोना मुक्त हो गया है। 26 पॉजिटिव लोगों में से 17 लोगों की रिपोर्ट निगेटिव आ चुकी है। वहीं इसमें से 9 लोगों को अस्पताल से डिस्चार्ज कर दिया गया। दो की मौत हुई है। शेष लोग जल्द डिस्चार्ज किये जायेंगे।

लेकिन बाकी देश के जिलों को देखा जाए तो उनके जिला प्रशासन ने ये 15 दिन बर्बाद किये और सरकारी प्रायोजित ताली, थाली, और दिए जलाए गए पर मुख्य कोरोना महामारी को रोकने के लिए कोई ठोस कदम उठाने की हिम्मत नहीं जुटा पाए।

जबकि भीलवाड़ा मॉडल का परिणाम सामने है। भीलवाड़ा मॉडल कोरोना से प्रभावित जिलों में अविलंब लागू करने की जरूरत है।

प्रधानमंत्री जी को तत्काल प्रभाव से पूरे देश मे लागू करने के लिए जिला प्रशासन को बोलना चाहिए। और हम को भीलवाड़ा जिले के कलेक्टर श्री राजेन्द्र जी को सम्मान देना चाहिए।

अमित सिंह शिवभक्त नंदी

बल्लीमारान की चूड़ी वाली तंग गली में.. इन दिनों खनक नहीं है..

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बल्लीमारान की चूड़ी वाली तंग गली में..

इन दिनों खनक नहीं है ..

बाज़ार में लड़कियों की धनक नहीं है…

ज़रा ज़रा से बहाने मेंहदी लगवाने ..

भइया पक्का रचेगी ना ..

करती हुई बातें …

शगुनों वाली औरतों की जमातें ..

काशीदा दुपट्टे कानों के झूलते बाले ..

वो रौनक़ों के उजाले..

सब ग़ायब हैं …

पाँच रूपये के छह गोलगप्पो के लिये..

झगड़ती लड़कियाँ …

इन गलियों की तरफ़ खुलती खिड़कियाँ ..

चाट के ठेले ..

लोगों के रेले ..

अब नहीं दिखते …

अजब सा ठहराव है ..

हर तरफ़ सन्नाटों का पसराव है ..

सड़क किनारे ज़ायक़े ढूँढती चटोरी जबां …

गर्मागर्म जलेबी समोसे की ख़ुशबू वाली सुबह  …

अदरक वाली चाय का धुआँ ..

जाने कहाँ गुम हुआ …

पाकड़ के खोके वाला अब्दुल अब भट्टी नही फूंकता ..

कोई भी पाकड़ के मुँह पर पुड़ियाँ नहीं थूकता ..

टाइयाँ गले में टाँगे चश्मे वाले लोगों का..

सिरा पता ना छोर..

फ़र्राटों से गुज़रता हुआ शोर ..

जाने कहाँ जा के थम गया ..

खौफजदा है हर शख़्स ..

शहर का शहर सहम गया ..

जूस, शरबत, निम्बू पानी, लेमनसोडा, नारियलपा नी..

बेचने वाले …

सिग्नल पर कार को बेवजह पोंछने वाले लड़के ..

अब नज़र नहीं आते ..

जाम में फँसे  लोग भी आपस में नहीं टकराते ..

अब सड़कों के कलेजे में सुकून बड़ा है ..

सिग्नल भी बत्तियाँ बुझाये चैन से पड़ा है ..

घड़ियाँ टिकटिका रही हैं ..

मगर वक़्त पर किसी ने हाथ रक्ख दिया ….

अखबारों की काली सुर्ख़ियो में रोज डर छपता है …

हर्फ़ दर हर्फ़ ..बेबसी ..

बस यही इक लफ़्ज़ खपता है ..

मगर इन सबसे परे …

डॉ. कविता अरोरा (Dr. Kavita Arora) कवयित्री हैं, महिला अधिकारों के लिए लड़ने वाली समाजसेविका हैं और लोकगायिका हैं। समाजशास्त्र से परास्नातक और पीएचडी डॉ. कविता अरोरा शिक्षा प्राप्ति के समय से ही छात्र राजनीति से जुड़ी रही हैं।
डॉ. कविता अरोरा (Dr. Kavita Arora) कवयित्री हैं, महिला अधिकारों के लिए लड़ने वाली समाजसेविका हैं और लोकगायिका हैं। समाजशास्त्र से परास्नातक और पीएचडी डॉ. कविता अरोरा शिक्षा प्राप्ति के समय से ही छात्र राजनीति से जुड़ी रही हैं।

बिना डरे ..

छज्जों छतों पर फिर हो रही है पतंग बाज़ियाँ….

मुस्करा रही है फिर मोहल्लों की छतें सांझियां ….

फलक पर ..

फजां की नीली झलक पर ..

इक चाँद फ़िदा है ..

फूलों से महकती बाग की अदा है ..

सितारों से जगमगा रहा है कायनात का शरारा है..

रात भीगी-भीगी ..

और इक चाँद प्यारा प्यारा है…

डॉ. कविता अरोरा

क्या भारत में अब संवेदनाएं और कानूनी विवेकशीलता की मृत्यु हो चुकी है ?

How many countries will settle in one country

Have sensitivities and legal conscience now died in India?

क्यों सरकार ने 30 फीसदी दिहाड़ी मजदूर कोरोना पॉजिटिव (30 percent daily wage laborers Corona positive) बताया है !

क्या भारत जैसे विशाल लोकतांत्रिक देश में अब संवेदनाएं और कानूनी विवेकशीलता की मृत्यु हो चुकी है ?

भारत एक कृषि प्रधान देश व सामाजिक कबीलाई गणराज्य है। हम पर किसी विचारधारा, परंपरा, मान्यता या अपनी बात को दूसरों पर जबरन थोपना या इनके समर्थन में कुतर्क करना अतिवाद है। प्राय: ये अतिवादी लोग खुद को ऊंचाई पर रखते हुए अपनी विचारधारा से अलग लोगों की आलोचना तो करते ही हैं, उनको कोसते हैं, हर घटना के लिए उन्हें ही दोष देते ही हैं।

इसी का जीवंत उदाहरण सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में पेश किया है, जिसमें आधारहीन तत्थों से शहर छोड़ कर गांव जा रहे 30 फीसदी मजदूरों को कोरोना पॉजिटिव बताया है! इसमें कहाँ तक सच्चाई है ?  सरकार जनता को बताए कि उनके इतनी बड़ी संख्या में दिहाड़ी मजदूरों में कोरोना पोसिटिव का आधार क्या है ? जबकि वो कभी देश से बाहर नहीं गए और जबकि सरकार के मुताबिक 31 जनवरी 2020 से 25 मार्च 2020 तक विदेशों से करीब 2.5 लाख लोगों ने भारत में आगमन किया था, क्या उनमें से कोई भी कोरोना पॉजिटिव नहीं मिला? जबकि कोरोना जैसी वैश्विक महामारी का स्रोत तो विदेश से ही है ना कि देश से।

क्या सरकार 2.5 लाख अमीरों को बचाने के चक्कर में सवा करोड़ लोगों को देश में एक शहर से दूसरे शहर में विस्थापित हुए दिहाड़ी मजदूरों के साथ अनजाने में सही, उनके सामाजिक बहिष्कार करने का प्रोहत्साहन कर गई है ?

अपने गाँव की ओर विस्थापन कर रहे दिहाड़ी मजदूरों को रास्ते में सुविधा मुहैया कराने के लिए दाखिल की गयी याचिका पर जब सुप्रीम कोर्ट के प्रसिद्ध वकील प्रशांत भूषण ने भारत के मुख्य न्यायमूर्ति को मजदूरों को पैसे देने का सुझाव रखा तो … मुख्य न्यायमूर्ति श्री बोबड़े साहब जी ने कहा  कि जब सरकारें मज़दूरों और गरीबों को मुफ्त राशन मुहैया करवा रही हैं, तो उन्हें नगद पैसा देने की क्या जरूरत है।

माननीय न्यायमूर्ति जी मेरा आपसे विनम्र अनुरोध है कि आप सभी न्यायाधीशों का वेतन तत्काल प्रभाव से रोक दें और उन्हें केवल दो वक़्त भोजन उपलब्ध करवाया जाए। शायद ऐसा करने से विद्वान् न्यायमूर्ति महोदय को समझ आये।

Amit Singh ShivBhakt Nandi अमित सिंह शिवभक्त नंदी, कंप्यूटर साइन्स - इंजीनियर, सामाजिक-चिंतक हैं। दुर्बलतम की आवाज बनना और उनके लिए आजीवन संघर्षरत रहना ही अमित सिंह का परिचय है। हिंदी में अपने लेख लिखा करते हैं
Amit Singh ShivBhakt Nandi अमित सिंह शिवभक्त नंदी, कंप्यूटर साइन्स – इंजीनियर, सामाजिक-चिंतक हैं। दुर्बलतम की आवाज बनना और उनके लिए आजीवन संघर्षरत रहना ही अमित सिंह का परिचय है। हिंदी में अपने लेख लिखा करते हैं

फिर गरीब दैनिक श्रम मजदूरों को कोरोना वैश्विक महामारी का साधक बनाने का मकसद समझ नहीं आया। कहीं सरकार विदेश से आये जाहिलों को बचाकर सारा का सारा ठीकरा इन मजदूरी करने वालों पर तो नहीं फोड़ रही है?

ऐसे लोग दूसरों का दोषारोपण करते हैं, उन्हें अपमानित करने में कोई कसर नहीं छोड़ते हैं और आप कभी उनपर या उनके समर्थकों को ऊंगली से छूभर दीजिए, वे तुरंत बिफर पड़ेंगे। इससे वे अपनी वास्तविकता का पता दे देंगे कि वे कैसे हैं ? उनकी विचारधारा कैसी है ?

सभी अपने भीतर में देखें तो दिख जाएगा कि हम स्वयं ही कहीं न कहीं किसी रूप में भयंकर अतिवाद से ग्रस्त हैं। ऐसे विरले लोग हैं जो साध्य के लिए साधन की शुद्धता को मानते हों। क्या हम-आप मौका मिलने पर गलत का साथ नहीं देते? शायद ही कोई होगा जिसने अपने के नाम पर जानबूझकर मक्खी न निगल ली हो। गलत पर आंखें न फेर ली हों, मौन नहीं धारण न कर लिया हो।

अब तो हद ही होती जा रही है असंवेदनशीलता की ! देश के सर्वोच्च न्यायालय से ऐसी उम्मीद कदापि नहीं की जा सकती थी लेकिन पिछले दो साल से गरीबों और मजदूरों के लिए सामाजिक न्याय की उम्मीदों पर पानी फेर दिया है…

अमित सिंह शिवभक्त नंदी

अच्छा मर भी गए तो क्या होगा ? इतनी बड़ी जनसंख्या है, आप विदेशी संबंध निभाइये

Trump Modi

यमलोक में भी दीये जलाकर दिया जा रहा है एकजुटता का परिचय!

Even in Yamlok, lamps are being burnt, showing solidarity!

रात मुझे सपना आया कि जो लोग कोरोना से मरे हैं (People who died from Corona) वे यमलोक में भी दीये जलाकर एकजुट हैं। यमलोक में भेजने पर प्रधानमंत्री का आभार व्यक्त कर रहे हैं। उनका कहना है कि प्रधानमंत्री जी मान गए आपकी दरियादिली को। भारतीयों के स्वागत के लिए तो वे तैयार बैठे हैं। आप विदेशियों का बचाकर विश्वविजेता बनिये।

उनका कहना है कि उन्हें इस बात की पीड़ा हो रही है कि अमेरिका को आप कोरोना से निपटने में कारगर साबित हो रही मलेरिया रोधी दवा हाइड्रो क्लोरोक्वीन (Anti-malarial drug hydroxychloroquine) को देने के लिए खुद नहीं जा रहे हैं। दवा के साथ ट्रंप के गले में हाथ डालकर आपका फोटो वे देख लेते तो उन्हें बहुत सुकून पहुंचता।

दिल्ली से पैदल जाते हुए जो मजदूर आगरा में मरा है, वह कह रहा था कि मोदी सरकार में भूखा रह-रह कर मैं बहुत मजबूत हो गया था। पैदल ही चला तो अपने गांव के लिए था पर मोदी का चेहरा मेरी नजरों के सामने आते ही मुझमें इतनी ताकत आ गई कि यमलोक में ही छलांग लगा दी।

इन लोगों का कहना है कि उन्हें खुशी है भले ही यह दवा उनके काम न आई पर अमेरिका के लिए काम जरूर आ जायेगी।

दीयों के जगमगाते प्रकाश में ये लोग कह रहे हैं कि हमारे प्रधानमंत्री बहुत दयालु हैं। त्याग बलिदान के मामले में उनका कोई जवाब नहीं। हम तो शहीद हुए हैं और भी हो जाएंगे तब भी गम नहीं। हमारे प्रधानमंत्री की अमेरिका राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से मित्रता निभाने में यदि हमारे पूरे परिवार को भी शहादत देनी पड़ गई तब भी वे खुश ही होंगे।

उनका कहना है कि इससे यमलोक में उनकी एकजुटता और बढ़ जाएगी। ये लोग इस बात पर गुस्सा भी जाहिर कर रहे थे कि यह दवा ट्रंप ने हमारे विश्वविजेता होने जा रहे प्रधानमंत्री को धमकाकर ली है।

इन लोगों ने मोदी को आश्वस्त किया है कि हमारे परिजन, परिचित, रिश्तेदार और दूसरे भरतीय तो थाली बजाकर और दीये जलाकर एकजुटता के बल पर भी जिंदा रह लेंगे। अमेरिका के लोगों का बचना जरूरी है। इनका कहना था कि मोदी जी अभी तो हमारे यहां बहुत कम लोग मरे हैं। जब अमेरिका के बराबर हो जाएंगे तब देख लेंगे। विश्वविजेता बनना है तो यह त्याग तो करना ही होगा। किट के अभाव में हमारे डॉक्टर मरे सो मरे, अपने देश के लोगों को दवा मिले या न मिले। विदेशियों को जरूर मिलनी चाहिए।

CHARAN SINGH RAJPUT, चरण सिंह राजपूत, लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।
CHARAN SINGH RAJPUT, CHARAN SINGH RAJPUT, चरण सिंह राजपूत, लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

ये लोग मोदी की तारीफ करते हुए कह रहे थे कि प्रधानमंत्री जी आपने साबित कर दिया कि आप भारतीय संस्कृति से ओतप्रोत हैं। अपनों को तो बाद में भी बचा लेंगे। मर भी गए तो क्या होगा? इतनी बड़ी जनसंख्या है। थोड़ी सी कम हो जाएगी कौन सा आसमान टूट जाएगा। हमारे लिए तो दूसरे पहले रहे हैं। यह आपने कोरोना फैलने के शुरुआती दिनों में भी किया। जो भारतीय मूल के लोग हमारे संसाधनों, हमारी संस्कृति को दरकिनार कर विदेश चले गए थे। उनको आप ससम्मान अपने देश में ले आये।

ये लोग कह रहे थे कि उन्हें इस बात का भी दुख नहीं है कि वे विदेशियों से संक्रमित होकर यहां यमलोक पहुंचे हैं।

इनका कहना था कि प्रधानमंत्री ने बड़ा दिल दिखाकर देश की राजधानी दिल्ली में लॉक डाउन के बावजूद तब लीगी जमात का कार्यक्रम होने दिया। कार्यक्रम में विदेशियों को भी आने दिया।

ये लोग कह रहे थे कि जब देश में मलेरिया फैलेगा और मरीजों को दवा भी न मिल सकेगी। और जो हमारे साथी यमलोक आएंगे तो हम सब मिलकर फिर थाली बजा लेंगे। फिर से दीये जलाकर एकजुटता का परिचय दे देंगे आप विदेशी संबंध निभाइये।

चरण सिंह राजपूत

कोरोना और तीन-बटे-तीन

Corona virus

As if nature has demanded its right from cities : Wildlife is seen walking fearlessly on the streets of cities.

बहुत से समाचारपत्रों में देवभूमि हिमाचल की पहाड़ियों और बस्तियों की सुंदर तस्वीरें छप रही हैं जो पंजाब और चंडीगढ़ में रह रहे लोगों ने अपने घर से ही देखीं। हिमाचल प्रदेश रमणीक तो है ही पर अब ट्रैफिक न होने और कारखानों का धुंआ न होने की वजह से हवा साफ हो गई है, हवा में ही नहीं, नदियों में भी प्रदूषण कम हो गया है, दिल्ली में यमुना नदी खुद-ब-खुद साफ हो गई है। हम लोग अपने-अपने घरों से ही प्रकृति का यह नज़ारा देख पा रहे हैं। शहरों की सड़कों पर वन्य जीव निर्भय विचरण करते दिखाई दे रहे हैं। कहीं हिरन घूम रहे हैं, कहीं मोर नाच रहे हैं। प्रकृति ने शहरों से मानो अपना हक मांगा है।

हमने यह भी सीखा है कि हम घर बैठकर भी न केवल उपयोगी ढंग से समय बिता सकते हैं, बल्कि कुछ नया भी कर सकते हैं, हम घर में रहकर भी मित्रों-रिश्तेदारों से संपर्क बनाए रह सकते हैं, हम जंक फूड के बिना भी जिंदा रह सकते हैं, अधिकांश स्थितियों में एकल परिवार की अपेक्षा सामूहिक परिवार ज़्यादा बेहतर है, भारतीय महिलाओं के योगदान की वजह से हमारा घर भी मंदिर समान ही है, जब स्थितियां विकट हों तो आपसी रिश्ते पैसे से भी ज़्यादा महत्वपूर्ण हो जाते हैं।

Karona has helped to tie the world in one thread, but Karona has also hurt the world economy.

यह सच है कि करोना ने विश्व को एक सूत्र में बांधने में मदद की है लेकिन करोना ने विश्व भर की अर्थव्यवस्था पर चोट भी की है। इसके कारण बहुत से रोज़गार नष्ट हो गए हैं, या अभी और रोज़गार नष्ट हो जाएंगे, बहुत सी नौकरियां चली जाएंगी, मंदी का यह दौर अभी कई महीने चल सकता है और हमें संयम से और आत्मबल से जीना सीखना पड़ेगा, बहुत से लोगों को अपने जीवन से विलासिता की बहुत सी चीजों को तिलांजलि देनी होगी। यह बहुत आसानी से नहीं होगा, लेकिन करोना के इस दौर ने हमें यह भी सिखाया है कि हम खुद को बदल सकते हैं, सामान्य जीवन जी सकते हैं, खुश रहने के कई कारण ढूंढ़ सकते हैं और सचमुच खुश रह सकते हैं।

लेकिन क्या ऐसे कुछ और भी सबक हैं जो हमें सीखने चाहिएं ?

इस समय हम लोग घर में समय बिताने के लिए विवश हैं लेकिन इस विवशता में कुछ छुपे हुए वरदान हैं जिन्हें पहचान लें तो हमारा भावी जीवन भी सुखद हो सकता है। बहुत से लोग चूंकि घर में ही हैं, न तो उन्हें कहीं आना-जाना है, न ही उनके पास कोई आने वाला है। परिणाम यह है कि यदि वे दफ्तर का काम कर भी रहे हैं तो भी वे रात के कपड़ों में ही हैं, शेव नहीं करते, तैयार नहीं होते, कुछ महानुभाव तो नहाने से भी छुट्टी ले चुके हैं। स्वस्थ रहने के लिए यह आवश्यक है कि हम इस “पायजामा मोड” से बाहर आयें और अपने दिन को पूरा सदुपयोग करें। हैपीनेस गुरू के रूप में अपनी वर्कशाप में मैं प्रतिभागियों को एक प्रभावी तरीका बताता हूं जिसमें एक नियम का पालन करना होता है जो सदैव उपयोगी रहा है। इस नियम को मैं “तीन-बटे-तीन” (थ्री-बाई-थ्री) का नाम देता हूं। करना सिर्फ यह होता है कि उठते ही हम सबसे पहले दस मिनट के लिए, कम से कम दस मिनट के लिए कुछ भी व्यायाम करें, प्राणायाम करें, उछलें, योग करें, कुछ भी करें पर शरीर में हरकत होने दें। इससे आपकी सुस्ती तुरंत भाग जाएगी और आप दिन के शेष कार्यों के लिए अपने शरीर को तैयार कर लेंगे।

अब बारी है दिन के काम के लिए दिमाग को तैयार करने की। उसके लिए यह तय करें कि आप दिन में सबसे महत्वपूर्ण कार्य क्या करना चाहते हैं और शेष सारा दिन कैसे बिताना चाहते हैं। इसे लिख लें। याद्दाश्त पर निर्भर न रहें, लिख लेना महत्वपूर्ण है। दिन का काम शुरू कर देने के बाद हर तीन घंटे के बाद, याद रखिए, हर तीन घंटे के बाद अपने द्वारा लिखे गए दिनचर्या के निश्चय को पढ़ें और तय करें कि आपने अब तक जो किया, क्या वह उस उद्देश्य की पूर्ति में सहायक हुआ, जो आपने तय किया था। दिन में दो-तीन बार अपने काम की समीक्षा से आप समय की बर्बादी से बच जाएंगे, और आपकी उत्पादकता बढ़ जाएगी। तीन-बटे-तीन का यह नियम आपको उदासी से, हताशा से, बोरियत से बचाता है और प्रेरणा देता रहता है कि आप अपने लक्ष्य के प्रति और समय के प्रति सचेत रहें।

तीन-बटे-तीन के नियम का अगला भाग यह है कि हम जीवन के तीन क्षेत्रों में बराबर-बराबर काम करें। वे तीन क्षेत्र हैं, खुद हम, हमारे रिश्ते और हमारा लक्ष्य अथवा काम। इनमें से किसी एक की उपेक्षा भी हमारे लिए हानिकारक हो सकती है। आइये, ज़रा इसे समझने की कोशिश करते हैं।
“दि हैपीनेस गुरू” के नाम से विख्यात, पी. के. खुराना दो दशक तक इंडियन एक्सप्रेस, हिंदुस्तान टाइम्स, दैनिक जागरण, पंजाब केसरी और दिव्य हिमाचल आदि विभिन्न मीडिया घरानों में वरिष्ठ पदों पर रहे। वे मीडिया उद्योग पर हिंदी की प्रतिष्ठित वेबसाइट “समाचार4मीडिया” के प्रथम संपादक थे।
“दि हैपीनेस गुरू” के नाम से विख्यात, पी. के. खुराना दो दशक तक इंडियन एक्सप्रेस, हिंदुस्तान टाइम्स, दैनिक जागरण, पंजाब केसरी और दिव्य हिमाचल आदि विभिन्न मीडिया घरानों में वरिष्ठ पदों पर रहे। वे मीडिया उद्योग पर हिंदी की प्रतिष्ठित वेबसाइट “समाचार4मीडिया” के प्रथम संपादक थे।

कुछ लोग जीवन में आगे बढ़ना चाहते हैं। वे अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित होते हैं। अच्छी बात है, बहुत अच्छी बात है। लेकिन बहुत से लोग लक्ष्य के पीछे इतने पागल होते हैं कि वे न अपना ध्यान रखते हैं या न अपने रिश्तों का। जब हम व्यायाम नहीं करते, समय पर खाना नहीं खाते, पूरी नींद नहीं लेते तो हम अपने शरीर पर अत्याचार कर रहे होते हैं जिसका खामियाज़ा आगे जाकर हमें गंभीर बीमारियों के रूप में भुगतना पड़ता है। कई बार तो जीवन भर चलने वाले रोग लग जाते हैं। इसी तरह जब हम रिश्तों पर ध्यान नहीं देते, काम में इतना उलझ जाते हैं कि बीवी-बच्चों के लिए समय ही नहीं निकालते तो अक्सर बच्चे बिगड़ जाते हैं, गलत राह पर चल देते हैं, बीवियां इतनी निराश हो जाती हैं कि तलाक तक की नौबत आ जाती है। पुरुष अक्सर यह सोचता है कि वह बच्चे को महंगी शिक्षा दिलवा रहा है, बीवी के ऐशो-आराम के लिए मेहनत कर रहा है लेकिन भूल जाता है कि परिवार को उसका समय भी चाहिए, साथ भी चाहिए।

तीन-बटे-तीन के नियम की खासियत ही यही है कि यह हमें इन तीनों भागों को बराबर महत्ता देने के योग्य बनाता है। इस नियम पर चलने वाले लोगों को न केवल कैरिअर में उन्नति मिल रही है बल्कि वे खुशहाल पारिवारिक जीवन भी बिता रहे हैं। यह नियम जीवन भर काम आने वाला मंत्र है पर करोना जैसे कठिन समय में तो इसकी उपयोगिता कई गुना बढ़ जाती है। इसलिए आवश्यक है कि हम अपने जीवन की रूपरेखा बनाएं और उसके अनुसार खुद को ढालें ताकि जब यह कठिन दौर समाप्त हो हम तब भी इतने अधिक मजबूत हों कि आने वाले जीवन की अनिश्चितताओं को संभाल सकें।

मैं दोहराना चाहूंगा कि करोना से उत्पन्न स्थिति लंबी चल सकती है, मंदी का दौर लंबा चल सकता है, लॉक-डाउन भी कुछ और बढ़ सकता है और जब लॉक-डाउन खुलेगा तब भी सब कुछ एकदम से सामान्य नहीं हो जाएगा। ऐसे समय में योजनाबद्ध ढंग से काम करना बहुत उपयोगी होता है। हम इसका महत्व समझेंगे तो सफलता की राह पर निरंतर अग्रसर होते रहेंगे। आमीन !  ***

पी. के. खुराना

अमेरिका से सावधान : अमेरिका भारत का दोस्त न कभी था, और न है और न हो सकता है

Namaste Trump

Beware of America: America was never a friend of India, and neither is nor can be.

अमेरिका से सावधान।

कोरोना फैलने के बाद विदेश से आये 15 लाख लोगों की जांच और निगरानी, वायरस से निपटने की तैयारी और लॉक डाउन में देरी (Lock down delay,), स्वास्थ्य सेवा में सुधार के जरूरी काम छोड़कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने जिस खास दोस्त के लिए अहमदाबाद में बहुत बड़ा मजमा (Namaste Trump) खड़ा किया, उसने कोरोना से निपटने के लिये दवा (Anti-malarial drug hydroxychloroquine) न भेजने की स्थिति में भारत के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने की चेतावनी दे दी है।

अमेरिका को अपनी युद्धक अर्थ व्यवस्था (America’s war economy) को पटरी पर लाने के लिए भारत में आंतरिक और बाहरी खतरे की स्थितियों का फायदा उठाना था।

परमाणु भट्टियों का उत्पादन अमेरिका में एकदम ठप हो गया था। इसे पुनर्जीवित करने के लिए बुश ने भारत के साथ परमाणु सन्धि करने की पहल की। तब भाजपा विपक्ष में थी।

भारत में पाकिस्तान और चीन के साथ युद्ध की स्थिति पैदा करते रहने में अमेरिका की बड़ी भूमिका रही है।

भारत और पाकिस्तान में हथियारों की होड़ (Arms race in India and Pakistan) पैदा करके दोनों देशों को हथियार बेचता रहा है अमेरिका। रक्षा क्षेत्र में विदेशी निवेश (Foreign investment in defense sector) से देशी पूँजीपतियों को फायदा हुआ तो सबसे ज्यादा फायदा अमेरिका के युद्ध गृहयुद्ध उद्योग को हुआ।

1991 से पहले तक, भारत का बाजार खुला छोड़ने से पहले तक हर मौके पर अमेरिका भारत का विरोध करता रहा है।

अफगानिस्तान में तालिबान को मदद के बहाने पंजाब और पूर्वोत्तर के अलगाववादियों को अमेरिका ने खुलकर मदद दी। अलगाववादियों को अमरीका से भारत के खिलाफ मुहिम चलाने की खुली छूट है।

भारत में आंतरिक संकट  पैदा करने में अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए की हमेशा बड़ी भूमिका रही है।

पलाश विश्वास जन्म 18 मई 1958 एम ए अंग्रेजी साहित्य, डीएसबी कालेज नैनीताल, कुमाऊं विश्वविद्यालय दैनिक आवाज, प्रभात खबर, अमर उजाला, जागरण के बाद जनसत्ता में 1991 से 2016 तक सम्पादकीय में सेवारत रहने के उपरांत रिटायर होकर उत्तराखण्ड के उधमसिंह नगर में अपने गांव में बस गए और फिलहाल मासिक साहित्यिक पत्रिका प्रेरणा अंशु के कार्यकारी संपादक। उपन्यास अमेरिका से सावधान कहानी संग्रह- अंडे सेंते लोग, ईश्वर की गलती। सम्पादन- अनसुनी आवाज - मास्टर प्रताप सिंह चाहे तो परिचय में यह भी जोड़ सकते हैं- फीचर फिल्मों वसीयत और इमेजिनरी लाइन के लिए संवाद लेखन मणिपुर डायरी और लालगढ़ डायरी हिन्दी के अलावा अंग्रेजी औऱ बंगला में भी नियमित लेखन अंग्रेजी में विश्वभर के अखबारों में लेख प्रकाशित। 2003 से तीनों भाषाओं में ब्लॉग
पलाश विश्वास
जन्म 18 मई 1958
एम ए अंग्रेजी साहित्य, डीएसबी कालेज नैनीताल, कुमाऊं विश्वविद्यालय
दैनिक आवाज, प्रभात खबर, अमर उजाला, जागरण के बाद जनसत्ता में 1991 से 2016 तक सम्पादकीय में सेवारत रहने के उपरांत रिटायर होकर उत्तराखण्ड के उधमसिंह नगर में अपने गांव में बस गए और फिलहाल मासिक साहित्यिक पत्रिका प्रेरणा अंशु के कार्यकारी संपादक।
उपन्यास अमेरिका से सावधान
कहानी संग्रह- अंडे सेंते लोग, ईश्वर की गलती।
सम्पादन- अनसुनी आवाज – मास्टर प्रताप सिंह
चाहे तो परिचय में यह भी जोड़ सकते हैं-
फीचर फिल्मों वसीयत और इमेजिनरी लाइन के लिए संवाद लेखन
मणिपुर डायरी और लालगढ़ डायरी
हिन्दी के अलावा अंग्रेजी औऱ बंगला में भी नियमित लेखन
अंग्रेजी में विश्वभर के अखबारों में लेख प्रकाशित।
2003 से तीनों भाषाओं में ब्लॉग

1971 में बांग्लादेश युद्ध के दौरान पाकिस्तान की मदद करने के लिए भारत के खिलाफ सातवां नौसैनिक बेड़ा अमेरिका ने भेजा था।

मैंने अपने उपन्यास में भारत में अमेरिकी साजिशों और उसकी भारत विरोधी तमाम गतिविधियों का सिलसिलेवार ब्यौरा दिया है।

The US President cannot be anyone’s friend.

अमेरिकी राष्ट्रपति किसी के दोस्त नहीं हो सकते।

विश्व के बड़े राजनेताओं की सबसे ज्यादा हत्याएं अमेरिका ने ही करवाई हैं, ऐसे नेता जो अमेरिका का पिट्ठू थे। अरब देशों में अमेरिकी यद्ध और उसके लोकतंत्र निर्यात के तेल यद्ध आज भी जारी है।

आज तक किसी भारतीय प्रधानमंत्री ने अमेरिका को इतना भरोसेमंद नहीं माना और न ही किसी अमेरिकी राष्ट्रपति को अपना दोस्त बताया, उनमें विश्व नेता भी बने। अब ट्रम्प के हर सही गलत कदम के साथ खड़े होने वाले हमारे प्रधानमंत्री को ट्रम्प की इस चेतावनी के बाद अपनी राजनय की मरम्मत जरूर करनी चाहिए।

पलाश विश्वास

कोराना काल में नफ़रत व भेदभाव : भारत का नरभक्षी मीडिया और उसके रक्तपिपासु एंकर अपना वही हिन्दू मुसलमान का भौंडा राग अलाप रहे हैं

Desh ka dushman media

हमारी संचित नफरतें कोराना वायरस के कुदरती कहर (Natural havoc of Corana virus) के वक्त भी उसी तरह प्रकट हो रही है, जैसे सामान्य दिनों में होती रहती है। वैसे भी जाति और धर्म आधारित घृणायें (Caste and religion based hate) तात्कालिक नहीं होती हैं, यह हमारे देश में लोगों के दिल, दिमाग में व्याप्त है, उसे थोड़ी सी हवा मिले तो अपने सबसे शर्मनाक स्तर पर बाहर आ जाती है।

In these days many sections of the society are oppressed by the hatred of the Koreans.

इन दिनों में कईं तबके कोराना जन्य नफरत से प्रताड़ित हैं। कोराना का वायरस (Corana virus) तो फेफड़ों को संक्रमित कर रहा है, पर साम्प्रदायिकता व जातिवाद का वायरस दिमाग को बुरी तरह से संक्रमित किये हुए हैं। सामने भयावह मौत का खतरा होने के बावजूद भी लोग अपने जाति दंभ और मजहबी मूर्खताओं को बचाने में जी जान लगा रहे हैं, इससे यह साबित होता है कि लोगों को मरना मंजूर है पर सुधरना स्वीकार नहीं है।

Is Indian society learning from the global epidemic like Corana

क्या कोराना जैसी वैश्विक महामारी से भारतीय समाज कोई सीख ले रहा है या वह उतना ही अहमक बना हुआ है,जितना बना रहने की उसकी क्षमता है।

क्या हम इस दौर में सोच पा रहे हैं कि कोराना जैसे अदृश्य दुश्मन के सामने विश्व की तमाम सत्ताओं ने घुटने टेक दिए हैं, राष्ट्रवाद व नकली सरहदों की फर्जी अवधारणायें भूलुंठित हैं, धर्मसत्ताओं ने अपनी प्रासंगिकता खोना प्रारम्भ कर दिया है। काबा हो या काशी,वे टिकन हो या बोधगया सबकी तालाबंदी हो गई है। कोई पोप, कोई पीर, कोई शंकराचार्य, कोई महामंडलेश्वर, कोई परमपूज्य, कोई पंडित, कोई मुल्ला, कोई पादरी कुछ भी करने की स्थिति में नहीं है। इन्सान को बरगलाने वाले इन लोगों के पास इन्सान को बचाने का कोई मैकेनिज्म नहीं है, फिर भी कुछ धर्मस्थल अज्ञान बाँट रहे हैं, जहालत परोस रहे हैं, लेकिन ये लोगों को कोराना से संक्रमित होने से नहीं बचा पा रहे हैं, अपने आपको सर्वशक्तिमान समझ बैठे मनुष्य को कोराना ने आईना दिखा दिया है कि उसकी औकात क्या है ?

बावजूद इसके भी जिन लोगों के दिमाग में नफ़रत व भेदभाव का गोबर भरा हुआ है, वे अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहे हैं, भारत का नरभक्षी मीडिया और उसके रक्तपिपासु एंकर अपना वही हिन्दू मुसलमान का भौंडा राग अलाप रहे हैं। प्रलय के क्षणों में भारत के जातिवादी और घनघोर मीडिया का यह प्रलाप स्वयं में ही एक महामारी है, जिसकी कोई वैक्सीन नहीं बन पायेगी, कईं बार तो लगता है कि इस मनुधारा ( मनुस्ट्रीम ) मीडिया में अधिकांश मनोरोगी घुस आये हैं और अब ये लाइलाज है.

कोराना के इस संकट काल में जिस भारतीयता व इन्सानियत की उम्मीद की जानी चाहिए, उसकी अनुपस्थिति चिंतित कराती है, जिस तरह की खबरें आ रही है, वे हैरान और परेशान करने वाली हैं।

बस्ती के भानपुर सोनहा में जिन कोराना संदिग्धों को क्वारंटीन करके लाया गया, वहां का रसोइया अनुसूचित जाति का था, तो उच्च जाति के तुच्छ दंभ से ग्रसित जातिवादियों ने उसके हाथ का खाना खाने से इंकार कर दिया। हालाँकि कोराना को उनका उच्च वर्ण और ऊपरी जाति होना भी नहीं रोक पा रहा है, सब समान रूप से संक्रमित हो रहे हैं,पर जाति के वायरस से पहले से ही इन्फेक्टेड सवर्ण हिन्दू अब भी सुधरने की इच्छा नहीं रखते हैं, इसका ज्वलंत उदहारण कोराना के हॉटस्पॉट के रूप में उभरे भीलवाड़ा जिले के गंगापुर थाना क्षेत्र के जयसिंहपुरा गाँव में सामने आया है, जहाँ पर एक दलित आंगनबाड़ी सहायिका और उसका किराणा व्यवसायी पति जातीय घृणा के शिकार हुए हैं। महिला को अनुसूचित जाति का होने की वजह से घर में घुसने व पोषाहार बनाने से मना किया गया है और उसके पति की दुकान पर जा कर उससे मारपीट की गई। दुकान में लगी डॉ आंबेडकर की तस्वीर को तोडा गया। जातिगत गाली गलौज किया गया। पीड़ित पारस सालवी ने बताया कि गाँव के सवर्ण लोग हम पर कोराना फ़ैलाने का आरोप लगा कर अत्याचार कर रहे हैं, घटना की रिपोर्ट दी गई है, पर कोई कार्यवाही नहीं हुई है।

तब्लीगी जमात के बहाने मीडिया और सत्ता तंत्र ने जो विमर्श खड़ा किया है, उसके नतीजे अब आम मुसलमानों को भुगतने पड़ रहे हैं। राजस्थान के विभिन्न इलाकों से आई खबरें वाकई शर्मनाक हैं, जहाँ पर मुस्लिमों के साथ भेदभाव व कोराना के कोरियर बन जाने का सरेआम आरोप लगाते हुए उनके उत्पीडन की घटनाएँ हो रही हैं। ऐसी घटनाओं के बढ़ने से चिंतित जन संगठनों ने राजस्थान सरकार को एक संयुक्त ज्ञापन दिया है, जिसमें बताया गया कि जयपुर के सीतापुरा औद्योगिक क्षेत्र की हाऊसिंग कालोनी तथा अन्य सार्वजनिक स्थानों पर मुस्लिम व्यापारियों को फल व सब्जी बेचने से रोका जा रहा है। जोधपुर के नागोरी गेट इलाके में मुस्लिम मजदूरों पर उनके हिन्दू पड़ौसियों ने मध्य रात्रि में यह कहते हुए मारपीट व गाली गलौज किया कि वे कोराना संक्रमण फ़ैलाने में लगे हैं, हालाँकि तुरंत पुलिस आई और इन मजदूरों को अन्यत्र शिफ्ट किया गया है, लेकिन ऐसी घटनाओं का बढ़ते जाना कोराना की आड़ में मॉब लिंचिंग का खतरा पैदा कर देती है।

भरतपुर के जनाना हॉस्पिटल में परवीना नामक गर्भवती मुस्लिम महिला को एडमिट नहीं किया जाना और उसे जयपुर रेफर कर देने के बाद रास्ते में प्रसव हो जाने से नवजात की मौत जैसी शर्मनाक घटना पर तो राज्य सरकार के पर्यटन मंत्री विश्वेन्द्र सिंह खुद भी अफ़सोस जता चुके हैं, हालाँकि प्रशासन व जनाना अस्पताल के डॉक्टर्स इसे बेबुनियाद बता रहे हैं।

तब्लीगी जमात की निंदनीय घटना के बाद से सोशल मिडिया पर जमातियों द्वारा थूकने, अश्लील बर्ताव करने, मुस्लिम व्यापारी द्वारा कथित रूप से फलों के थूक लगाकर बेचने और मेडिकल टीमों पर हमलों की अफवाहों को नियोजित तरीके से फैलाया जा रहा है, ताकि मुसलमानों के प्रति द्वेष का भाव और सघन हो तथा बहुसंख्यक आबादी उनका आर्थिक बहिष्करण शुरू कर दे। नफरत के कारोबारी इस तरह के प्रोपेगंडा करने में बहुत माहिर है।

इस बीच इंदौर जैसी दुखद घटनाएँ भी हुई हैं, जहाँ स्वास्थ्यकर्मियों पर पथराव व उनको भगाने का शर्मनाक कृत्य हुआ है। अच्छी बात यह रही कि मुस्लिम समाज ने बड़े पैमाने पर पहल करते हुए सार्वजनिक रूप से इस घटना के प्रति शर्मिंदगी जाहिर की और बाकायदा विज्ञापन छपवा कर माफ़ी मांगी। इसका सुखद परिणाम रहा, अविश्वास का अँधेरा छंटा और मेडिकल टीम वापस उन इलाकों में जाकर अपना काम सुचारू कर पाई, लेकिन तब्लीगी जमात और इंदौर जैसी घटनाओं की आड़ में कईं फर्जी वीडियो फैलाये गए हैं, ताकि लोग एक दुसरे से नफरत करने लगे,यह स्थिति भयावह है।

कोराना से जंग बहुत महत्वपूर्ण लड़ाई है, जिससे केवल भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया लड़ रही है, यह किसी एक देश अथवा एक धर्म या एक जाति संप्रदाय की वजह से नहीं फ़ैल रहा है, न ही कोई शुद्ध खून का दावा करने वाले कथित उच्च लोग इससे बच रहे हैं, इसकी चपेट में अमीर –गरीब, हिन्दू-मुसलमान,यहूदी, जैन बौद्ध, ईसाई, आस्तिक नास्तिक सब है, इसलिए किसी एक कौम,एक जगह, एक हॉस्पिटल, एक जाति, एक विचार या विश्वास पर आरोप प्रत्यारोप लगाकर अपने भीतर बसी नफरत का प्रकटीकरण मत कीजिये। कोराना के सामने इस वक्त सब निहायत ही निरे असहाय इन्सान मात्र हैं। बस इन्सान बने रहिये, एक दूसरे की मदद कीजिये, शायद मानव प्रजाति यह जंग जीत ले, इस जंग के फ्रंट पर लड़ रहे लोगों के प्रति और इसकी दवा खोज रहे वैज्ञानिकों के प्रति हिकारत, नफरत व भेदभाव का भाव मत लाइए, क्योंकि आपका अज्ञान आपको नहीं बचा सकेगा, अब भी अंतिम उम्मीद विज्ञान से ही है, देर सवेर वही बचायेगा।

भंवर मेघवंशी

( लेखक सामाजिक कार्यकर्ता व स्वतंत्र पत्रकार है )

मोदी है तो कुछ भी मुमकिन है। इतनी बड़ी तबाही भी मुमकिन है।

भारत विभाजन के दौरान सीमा पार से शरणार्थी आ रहे थे। कोरोना संकट में देश की एक चौथाई आबादी शरणार्थी बन गई है

How many countries will settle in one country

Refugees were coming from across the border during the partition of India. A quarter of the country’s population has become refugees in the Corona crisis.

क्या भारत में कोरोना की स्थिति स्पेन, इटली और अमेरिका से भी भयावह होने जा रही है?

क्या भारत में कोरोना संक्रमण का तीसरा स्टेज शुरू हो गया है?

Has the third stage of corona infection started in India?

क्या लॉक डाउन उठाने की तैयारी है या लॉक डाउन जारी रहेगा?

Preparation for lifting the lock down or will the lock down continue?

क्या भारत सरकार और राज्य सरकारें कोरोना संक्रमण के बारे में तथ्य और आंकड़े छुपा रही है?

क्या लॉक डाउन में फंसे घर से बाहर करोड़ो लोगों को घर वापसी के लिए दो तीन दिन की मोहलत देकर फिर लम्बे समय तक कोरोना कर्फ्यू जारी रहेगा?

इन सवालों और दूसरे जरूरी सवालों पर दिन आकर्षित करना चाहता हूँ। सम्वाद भी इस संकट से निकलने के लिए जरूरी है। पोस्ट थोड़ा लम्बे हो जाये तो माफ करें।

मैं एक सामाजिक कार्यकर्ता के अलावा अंग्रेजी, बंगला और हिंदी में 1970 से लगातार लिखता रहा हूँ। जनसत्ता के संपादकीय में 25 साल काम किया है। इसके अलावा जागरण, अमरउजाला, प्रभात खबर और आवाज के संपादकीय में कुल 40 साल तक काम किया है।

मेरे लिए मनुष्य और मनुष्यता सबसे ऊपर है।

में जन्म से दलित शरणार्थी परिवार का बेटा हूँ।

में नास्तिक हूँ, लेकिन हर धर्म और हर व्यक्ति की आस्था का, उनकी संस्कृति, लोक रीति का सम्मान करता हूँ।

मैं न राजनीतिक कार्यकर्ता हूँ और न राजनेता। राजनीति में शामिल होने और सरकारी पड़ लेने के, यहां तक कि पुरस्कार और सम्मान लेने से भी में परहेज करता हूं। मैं तो अपने लिखे की, जो पचास साल में कम नहीं है, छपवाने की कोशिश नहीं करता।

यह स्पष्ट करना इसलिए जरूरी है कि इस देश में बहुसंख्य लोग अब भगवा हैं, वे जिस सरलता से नस्ल, जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र आदि के नाम एक दूसरे के खिलाफ हो जाते हैं, उतनी ही आसानी से राजनीतिक एजेंडे में घृणा और हिंसा के आत्मध्वंस में निष्णात भी हो जाते हैं। उग्र धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद ने उन्हें इतना असहिष्णु बना दिया है कि वे वस्तुपरक ढंग से किसी मुद्दे या समस्या के हल के लिए सम्वाद के लिए तैयार नहीं होते। पढ़े लिखे लोग भी पढ़ते नहीं है और सिरे से लोकतंत्री हैं।

यह अभूतपूर्व दुस्समय है। विभिन्न धर्मग्रन्थों में जिस प्रलय या कयामत की चर्चा होती है, शायद उससे भी बुरा समय है।

प्रधानमंत्री सच कहते हैं कि महायुद्धों के दौरान भी पूरी दुनिया इस तरह एक साथ प्रभावित नहीं हुई थी।

इस वक्त सबसे ज्यादा जरूरी है प्रेम, भ्रातृत्व, शांति और संयम का। लेकिन सत्ता की राजनीति ने अस्मिताओं के नाम पर हमें इस तरह बांट दिया है कि हमें आपस में सिर्फ लड़ रहे हैं घृणा और हिंसा की राजनीति बुद्धि, विवेक और अपने धार्मिक सांस्कृतिक मूल्यों के खिलाफ कर रहे है। कृपया इससे बाज आएं।

कल भारत में 24 घण्टे में 32 लोगों की मौत कोरोना से हुई है। जबकि बड़ी संख्या में डॉक्टर, नर्स और पुलिसकर्मी संक्रमित हैं। हालात इतने खराब हैं कि तमिलनाडु में 90 हजार लोग लॉक डाउन तोड़ने के लिए गिरफ्तार किए गए।

कोरोना संक्रमण की शरुआत जनवरी में हुई और यह अप्रैल का महीना है। इस बीच विदेश से 15 लाख लोग आए। सिर्फ तब्लीगी जमात के लोग नहीं हैं इतने सारे लोग। गनीमत है कि रोज़ी रोटी के लिए अब भी भारत में लोगों की माली हालत ऐसी नही है कि हवाई जहाज में बैठकर अमेरिका और यूरोप की तरह बड़ी संख्या में लोग विदेश जाएं।

अब तक जांच कुल अस्सी हजार हुई हैं। यानी कोरोना संक्रमित 15 लाख विदेशियों में एक लाख की भी जांच नहीं हुई।

गनीमत है कि भारत में गांव और किसान अभी अपनी बदहाली के बावजूद जिंदा है और शहरीकरण, स्मार्ट सिटी, सेज और महानगरों का जाल बहुत छोटा है। गनीमत है कि महंगेपन और बड़े शहरों की तरह धारावी जैसो बस्तियां गांवों में नहीं हैं।

फि रभी अँधाधुंध शहरीकरण और कृषि अर्थव्यवस्था की हत्या कर देश को अमेरिका बनाने की कोशिश में गांवों में रोज़ी रोटी खत्म होने से करोड़ों की तादाद में लोग महानगरों और बड़े शहरों की घनी गन्दी बस्तियों में रहते है। लॉक डाउन की वजह से उनमें से 38 करोड़ लोगों की रोज़ी रोटी छीन गयी। यही लोग बचने के लिए गांव छोड़ने के वर्षों बाद फिर लॉक डाउन के अवरोधों को तोड़कर पैदल ही गांव लौटने लगे हैं उनमें से अनेक लोग भूख प्यास से बीच रास्ते ही मरने लगे है, आत्महत्या करने लगे हैं एयर दुर्घटनाओं का शिकार होने लगे हैं।

भारत विभाजन के दौरान सीमा पार से शरणार्थी आ रहे थे। कोरोना संकट में देश की एक चौथाई आबादी शरणार्थी बन गई हैं।

अभी भारत में इटली, स्पेन, अमेरिका, फ्रांस,चीन, इंग्लैंड और ईरान जैसे हालात नहीं बने। फिर भी इतनी भयावह स्थिति है।

कोरोना संक्रमण तीसरे चरण में गांवों तक फैला तो क्या हालत होगी, इसकी कल्पना नही की जा सकती।

अभी देश में जो नफरत और हिंसा का माहौल बना है, उसके मद्देनज़र लॉकडाउन लम्बा चलने या बिना किसी योजना के लॉक डाउन दो तीन रोज़ के लिए उठाकर फिर लागू करने, खेती चौपट होने से अनाज का संकट पैदा होने, रोजी रोटी का संकट तेज़ होने और डॉलर से नत्थी शेयर बाजार की अर्थव्यवस्था खत्म होने और विदेशी पूंजी की आवक कम होने के बाद भूख और बेरोज़गारी के साथ घृणा और हिंसा की इस राजनीति से विभाजन से भी भयानक दंगे होने की आशंका है।

पलाश विश्वास जन्म 18 मई 1958 एम ए अंग्रेजी साहित्य, डीएसबी कालेज नैनीताल, कुमाऊं विश्वविद्यालय दैनिक आवाज, प्रभात खबर, अमर उजाला, जागरण के बाद जनसत्ता में 1991 से 2016 तक सम्पादकीय में सेवारत रहने के उपरांत रिटायर होकर उत्तराखण्ड के उधमसिंह नगर में अपने गांव में बस गए और फिलहाल मासिक साहित्यिक पत्रिका प्रेरणा अंशु के कार्यकारी संपादक। उपन्यास अमेरिका से सावधान कहानी संग्रह- अंडे सेंते लोग, ईश्वर की गलती। सम्पादन- अनसुनी आवाज - मास्टर प्रताप सिंह चाहे तो परिचय में यह भी जोड़ सकते हैं- फीचर फिल्मों वसीयत और इमेजिनरी लाइन के लिए संवाद लेखन मणिपुर डायरी और लालगढ़ डायरी हिन्दी के अलावा अंग्रेजी औऱ बंगला में भी नियमित लेखन अंग्रेजी में विश्वभर के अखबारों में लेख प्रकाशित। 2003 से तीनों भाषाओं में ब्लॉग
पलाश विश्वास
जन्म 18 मई 1958
एम ए अंग्रेजी साहित्य, डीएसबी कालेज नैनीताल, कुमाऊं विश्वविद्यालय
दैनिक आवाज, प्रभात खबर, अमर उजाला, जागरण के बाद जनसत्ता में 1991 से 2016 तक सम्पादकीय में सेवारत रहने के उपरांत रिटायर होकर उत्तराखण्ड के उधमसिंह नगर में अपने गांव में बस गए और फिलहाल मासिक साहित्यिक पत्रिका प्रेरणा अंशु के कार्यकारी संपादक।
उपन्यास अमेरिका से सावधान
कहानी संग्रह- अंडे सेंते लोग, ईश्वर की गलती।
सम्पादन- अनसुनी आवाज – मास्टर प्रताप सिंह
चाहे तो परिचय में यह भी जोड़ सकते हैं-
फीचर फिल्मों वसीयत और इमेजिनरी लाइन के लिए संवाद लेखन
मणिपुर डायरी और लालगढ़ डायरी
हिन्दी के अलावा अंग्रेजी औऱ बंगला में भी नियमित लेखन
अंग्रेजी में विश्वभर के अखबारों में लेख प्रकाशित।
2003 से तीनों भाषाओं में ब्लॉग

अभी जहां कोरोना नहीं फैला, वहां भी स्वाभाविक मृत्यु के बाद अंतिम संस्कार में परिजन, रिश्ते नातेदार और पड़ोसी लाश को कंधा देने को तैयार नहीं हैं।

1952 में गांव बसने के बाद से अब तक मेरे गांव में कभी पुलिस नहीं आयी। लॉक डाउन के बाद रोज़ आ रही है। जो लोग एसपीसी विवाद मिल बैठकर सुलझा लेते थे, कोरोना से आतंकित वे ही लोग एक दूसरे के खिलाफ लॉक डाउन की शिकायत लेकर पुलिस को बार- बार शिकायत कर रहे हैं।

मातम के इस समय इन्हीं लोगों ने कल रात देशभर में खुशी की दीवाली मनाई। 9 मिनट के बदले देर रात तक इन्होंने ही पटाखे छोड़े। ऐसा माहौल पूरे देश में बन रहा है जो कोरोना से भयानक है।

हजार लाख जो भी मफिटकाओं की संख्या हों, हर महामारी  की तरह हम कोरोना को आखिरकार हरा देंगे। आर्थिक हालत देश दुनिया की जो हो 130 करोड़ जनता में कुछेक लाख से ज्यादा कमी नहीं होगी। बाकी लोग जिंदा रहेंगे

लेकिन इस घृणा, हिंसा और बंटवारे से हम कब मुक्त होंगे?

पलाश विश्वास

शर्म हमको मगर नहीं आती : मज़दूरों के दुःख के समय हम दीवाली मना रहे हैं !

9baje9minute

जिनके पेट भरे हों वे कोरोना संकट में भी दीवाली मनाते हैं

#9बजे9मिनट : Those who are full, celebrate Diwali even in corona crisis.

जब उस दिन मोदी जी ने वीडियो में अपनी नई फरमाइश रखी थी तभी से मेरे दिमाग में ये चल रहा था कि इस बार भी ऐसा ही होगा कि जो मोदीजी बोलेंगे, लोग उससे भी आठ कदम आगे जाकर उस पर अमल करेंगे। जैसे कि ताली, थाली पीटने के तमाशे के दौरान लोगों ने किया था। पूरी सोशल डिस्टेंसिंग की ऐसी तैसी कर के लोगों ने रैलियां निकाल दी थीं। तो ठीक उसी तरह हमारे बेहतरीन स्कूल कॉलेजों के डिग्री धारी होनहारों ने 5 अप्रैल की रात को 9 बजे मोदी जी की दिया जलाने वाली कही बात में कई पॉवर जोड़ते हुए शोर मचाया, शंख, घंटे बजाए और पुरज़ोर पटाखे जलाए।

समझ में नहीं आ रहा था कि ये महाशक्ति दिखाना हो रहा था या कोई जश्न था।

जश्न उस वक्त जब देश कोविड-19 के संकट में जकड़ा हुआ (#IndiaFightsCoronavirus) है, रोजगारों में ताले लगे हैं और आर्थिक स्थिति बदहाली की ओर है। अभी भी मजदूर लोग सड़कों पर हैं उनके पास खाने के सामान के लाले पड़े हैं। पर शर्म हमको मगर नहीं आती जो हम तमाशे में लगे हैं और मज़दूरों के दुःख के समय हम दीवाली मना रहे हैं। दिए तक तो तमाशा फिर भी सही था कि चलो ठीक है थोड़ा धीरज और सकारात्मकता के लिए ऐसा किया गया। पर पटाखे जलाने वालों को क्या देश के हाल में ख़ुशी ज़ाहिर करनी थी?

Coronavirus Update

असल में मोदी जी और उनकी पार्टी मिडल क्लास और एलीट तबके से नीचे देख नहीं पाते हैं। उनके निर्णयों, अकस्मात फैसलों से ऐसे लगता है कि जैसे देश में सिर्फ खाते पीते अमीर लोग ही रहते हों। क्या उन्हें नहीं पता था कि लॉक डाउन लम्बा रहा तो रोज़ खाती कमाती अधिकतर जनता सड़क पर आ जाएगी। क्या वे अभी यह नहीं समझ सके थे कि देश में कितने ही प्रवासी मज़दूर, गैर संगठित क्षेत्र के रोज़ खाने कमाने वाले लोग अभी परेशान हैं। अभी उनकी व्यवस्था को पहले ध्यान देना होगा ना कि ये मिडल क्लास और एलीट लोगों के लिए एक नए करतब की घोषणा करना सही होगा। शायद वे अगर ऐसा कुछ संदेश देते कि अपने आस पास के ठेकेदार से लोग सम्पर्क करें और एक मज़दूर का भोजन मुहैया कराएं या ये कह देते कि सरकारी अफसर राशन वितरण की प्रणाली व तरीकों में तेज़ी लाएं और उसे जल्द दूर दराज़ में भी पहुँचाने की सुचारू व्यवस्था करें, तो फिर भी ठीक होता कि संकट में एक प्रधानमंत्री कुछ संदेश दे रहा है।

रही बात जनता की तो उनके भक्त अब राजनैतिक छूट की आदत के एक ऐसे दौर में हैं जब वे बीजेपी या मोदी जी की भी नहीं सुनते हैं। वरना कहीं भी मोदी जी ने पटाखों की बात नहीं की थी और भीड़ में बाहर आने को तो मना ही किया था। पर फिर भी पटाखे भी जले और लोग सड़क पर भी आए। ये जहालत नेताओं और सरकारों की ढील का ही नतीजा है जो काफी समय से कानून तोड़ने के विभिन्न रूपं में दिखती आ रही थी।

खुदगर्ज़ मिडल क्लास  | Greedy Middle Class
Mohammad Zafar मोहम्मद ज़फ़र, शिक्षा के क्षेत्र में कार्यरत
Mohammad Zafar मोहम्मद ज़फ़र, शिक्षा के क्षेत्र में कार्यरत

इससे हमें यह भी पता चलता है कि भले ही कई जगह लोग मज़दूरों के लिए मदद को आ रहे हों पर वर्ग विभाजन के रूप में देखें तो ये हकीकत है कि सामान्यतः देश की एलीट व मिडल क्लास बड़ी ही मतलबी व खुदगर्ज़ है। वो दान दक्षिणा से फिर भी मजदूरों की मदद कर दें पर उनके साथ सम्भाव याने एम्पैथी में शामिल नहीं हैं। और सरकारों का कितना ध्यान मजदूर व किसानों पे रहता है यह तो हम जानते हैं। उनकी अनदेखी कोई आज नई बात नहीं है। हमारी सामाजिक व्यवस्था ही उस पर आधारित है। वो तो जो लोग कम्बल में थे उन्हें कोरोना के आने के बाद जब मज़दूर सडकों पर निकले तब देश की असमता दिखाई दे रही है वरना हम सब जानते ही हैं कि देश में असमता व असमानता की कितनी गहरी खाई है।

अपने स्वयं के अनुभव से भी मैंने अभी देखा कि मज़दूरों को सरकार के द्वारा भोजन पहुँचाने में ही अभी बड़ी समस्याएँ हैं। लिस्टों के बनने के बाद भी कई लोग भोजन के लिए भटक रहे हैं। स्वाभिमान से खाता कमाता इंसान सरकार पर निर्भर हो गया। मगर हम लोग हैं कि उनके दर्द पे तमाशे पर तमाशे कर रहे हैं और कभी थाली बजा रहे हैं तो कभी पटाखे छुड़ा रहे हैं।

प्यारे देशवासियों, अभी इस कठिन समय में कम से कम कुछ तो शर्म करो।

मोहम्मद ज़फ़र

देश आर्थिक प्रबंधन में मूर्खताओं की कीमत तो अदा ही कर रहा था, कोरोना दैवीय प्रकोप बन कर आ गया

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The country was paying the price for foolishness in economic management, Corona became a divine wrath

आर्थिक तौर से जर्जर भारत इस भंवर से कैसे निकलेगा

कोरोना के कारण लॉकडाउन (Lockdown due to corona) के अभी दस दिन हुए हैं इस लॉकडाउन से जो आर्थिक गतिविधियाँ बंद हुई हैं (This lockdown has stopped economic activities) बेरोज़गारी फैली है, खेतियाँ बर्बाद हुई हैं, उनके असर अभी दिखाई भी नहीं दिये हैं, लेकिन देश का जर्जर आर्थिक ढांचा अब पूरी तरह बैठ चुका है। आने वाले दिन कैसे होंगे, यह सोच कर ही रूह काँप जाती है। कोरोना से जो मौतें होंगी उनका प्रभावित परिवार तो कुछ दिनों बाद रो धो कर सब्र कर लेगा लेकिन जो आर्थिक महामारी आने वाली है, उसके असर अगले 25 वर्षों तक दिखाई देंगे।

जरा सोचिये अभी केवल दस दिन हुए हैं और प्रधान मंत्री को जनता से अपने जेवर बेच कर कोरोना से लड़ाई में आर्थिक सहयोग की अपील करनी पड़ी है, सांसदों और विधायकों को क्षेत्र में विकास के लिए जो फंड मिलता था उस पर दो वर्षों के लिए रोक लगा दी गयी है। यह केवल बानगी मात्र है। अभी तो आर्थिक मदद की केवल पहली किस्त ही दी गयी है, आने वाले दिनों में इससे भी सख्त आर्थिक क़दम उठाये जायेंगे। लेकिन सवाल यह है कि जनता से वसूलने की भी एक हद है, गाय को ज्यादा दुहा जाएगा तो फिर वह दूध के बजाए खून देने लगेगी।

देश की आर्थिक बर्बादी का सिलसिला नोट बंदी जैसे मूर्खता पूर्ण क़दम से शुरू हुआ था उसके बाद गलत तरीकं से जीएसटी लागू किया गया, जिसने सभी आर्थिक गतिविधियों को जैसे जाम कर दिया। उस मार से देश उबर नहीं पाया कि सकल घरेलू उत्पाद लगातार नीचे आ रहा है। आज वह सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 4.5% है जबकि खुद बीजेपी सांसद डॉ सुब्रमण्यम स्वामी का कहना है कि मोदी सरकार गलत आंकड़े पेश कर रही है, जीडीपी किसी भी तरह 1.5% से अधिक नहीं है। अंदाजा लगाया जा सकता है कि यह स्थिति देश को कहाँ ले जाने वाली है।

देश का खजाना बिलकुल खाली हो चुका है। जीएसटी कलेक्शन की हालत यह है कि अभी तक राज्यों का हिस्सा केंद्र सरकार नहीं दे पायी है, जिससे राज्य सरकारें भी त्राहि-त्राहि कर रही हैं। सरकारी काम चलता रहे इसके लिए सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम या तो निजी हाथों में बेचे जा रहे हैं या सरकार उनमें अपना शेयर बेच रही है। लेकिन यह तो उधार ले के घी पीने वाली बात है। जब तक आर्थिक सरगर्मियां नहीं बढ़ेंगी, डिमांड और उसके साथ प्रोडक्शन नहीं बढ़ेगा, देश की आर्थिक स्थिति सुधर नहीं सकती, लेकिन डिमांड तो तभी बढ़ सकती है जब जनता की खरीदने की ताक़त बढ़ेगी, उसकी जेब में पैसा होगा। सरकार की कोई ऐसी आर्थिक नीति सामने नहीं आई है जिससे डिमांड और प्रोडक्शन बढ़ सके।

सरकार हर सम्भव जगह से धन की उगाही कर चुकी है, यहांतक कि रिज़र्व बैंक से इमरर्जेंसी फण्ड का भी डेढ़ लाख करोड़ रुपया ले लिया है। 45 हजार करोड़ उसके बाद फिर लिया और बाद में फिर दस हजार करोड़ माँगा था, लेकिन अब आर बी आई ने भी हाथ खड़े कर दिए हैं।

अंतराष्ट्रीय बाज़ार में तेल के दाम जमीन पर आ चुके हैं लेकिन मोदी सरकार उन पर टैक्स बढ़ती चली जा रही है और आज यही टैक्स सरकार की आमदनी का बहुत बड़ा ज़रिया है। अगर ओपेक देश तेल के दाम बढ़ाने का फैसला कर लें, क्योंकि ईरान, सऊदी अरब और अन्य कई तेल उत्पादक देश corona के कर्ण आर्थिक तंगी से जूझ रहे हैं, तो भारत की अर्थ व्यवस्था चरमरा जायेगी।

देश आर्थिक प्रबन्धन में मूर्खताओं की कीमत तो अदा ही कर रहा था की corona दैवीय प्रकोप बन कर आ गया। दुनिया का हर देश इस महामारी से जूझ रहा था, लेकिन 20 मार्च तक हमारी मोदी सरकार बंसुरी बजा रही थी। राहुल गाँधी ने 12 फरवरी को ही देश को चेताना शुरू कर दिया था, दुनिया भर से चिंताजनक खबरें भी आ रही थीं, लेकिन केंद्र सरकार और शासक दल को विपक्ष के विधायक खरीदने और अपनी सरकार बनाने के काम के अलावा कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। 22 मार्च तक यह खेल चला और अचानक 24 मार्च को मोदी जी रात 8 बजे फिर टीवी पर नमूदार होते हैं और देश में नोटबंदी की ही तरह अचानक लॉकडाउन का एलान कर देते हैं, इससे जनता ख़ास कर मजदूर किसान और गरीबों पर क्या मार पड़ी, इसका वर्णन करने के लिए अलग से लेख लिखना पड़ेगा।

अब एक ओर देश एक महामारी और विपदा में फंसा दूसरी ओर देश का खजाना खाली है। ऐसे ही समय के लिए रिज़र्व बैंक का इमरजेंसी फंड काम आता, लेकिन रिज़र्व बैंक तो जर्जर हो चुका है, जिसके जर्जर होने से अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाओं से क़र्ज़ मिलना भी मुश्किल हो सकता है।

देश आर्थिक तौर से तबाह हो चुका है, लेकिन इसका समाजी ताना तबाह करने की सरकार मीडिया और शासक दल की कोशिशें चरम पर हैं जबकि आवश्यकता सामाजिक और भावनात्मक एकता द्वारा इस चैलेंज का मुकाबला करने की है।

उबैद उल्लाह नासिर

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

मोदी जी, आप सेर हैं, तो आपके भक्त सवा सेर निकले!

PM Modi Speech On Coronavirus

‘तुम सेर हो, तो मैं सवा सेर हूँ ‘ उक्त लोकोक्ति मेरे गांव में काफी प्रचलित है। (सेर मतलब 1200 ग्राम) बीते 5 अप्रैल के रात के 9 बजे से आपके भक्तों के द्वारा जो विचित्र नजारा पूरे देश को दिखाया गया, उसे देखकर तो यही कहा जा सकता है मोदी जी कि आप सेर हैं, तो आपके भक्त सवा सेर है।

जब पूरा विश्व वैश्विक महामारी कोरोना की चपेट में है (The whole world is vulnerable to global epidemic corona) और इस बीमरी से मरने वाले की संख्या कुछ दिनों में लाख में पहुंच जाएगी। हमारे देश में भी इस बीमारी से मरने वालों की गिनती सौ तक पहुंच गयी है। हमारे डॉक्टरों के पास अभी भी पर्याप्त मात्रा में स्वास्थ्य उपकरण (पीपीई, थ्री लेयर मास्क, एन-95 मास्क, कोरोना जांच किट) नहीं है। लाखों मजदूर मौत के साये में जीने को विवश है। किसान की रबी फसल खेत में बर्बाद हो रही है। सब्जी उपजाने वाले किसान अपनी सब्जी को बाजार तक नहीं पहुंचा पाने की सूरत में उसे औने-पौने दाम पर बेचने को विवश है।

Chaos spread due to nationwide lockdown

देशव्यापी लॉकडाउन के कारण फैली अव्यवस्था के कारण लाखों लोग सड़क पर हैं और रोजी-रोटी की चिंता में आत्महत्या तक कर रहे हैं। ऐसे ही हालात में 3 अप्रैल को आपने घोषणा किया कि 5 अप्रैल को रात 9 बजे से 9 मिनट तक अपने घरों की बत्ती बुझाकर बालकनी में ‘कोरोना से फैले अंधकार’ को दूर करने के लिए दीया, मोमबत्ती, टॉर्च या फिर मोबाईल का फ्लैशलाइट जलाएं और ‘मां भारती’ का स्मरण करें।

आपने अपने इस मेगाइवेंट को कोरोना के खिलाफ देशवासियों की एकजुटता(Citizens solidarity against Corona) प्रदर्शित करने वाला घोषित किया था, लेकिन आपके भक्तों ने 5 अप्रैल की रात 9 बजे से क्या किया ? क्या आपने जानने की कोशिश की ? ओह्ह, आप तो हमारे देश के ‘ग्रेट लीडर’ हैं, आपको तो सब पता होगा ही।

फिर भी इस देश के एक जिम्मेदार नागरिक होने के नाते 5 अप्रैल की रात 9 बजे के आपके भक्त के ‘काले कारनामों’ को आपको बताना चाहता हूँ।

सच कहूं तो, संकट की घड़ी में घोषित आपका यह ‘मेगाइवेंट’ मुझे शुरु से ही मूर्खतापूर्ण लगा था, इसलिए मैंने दूसरे दिन ही अपने फेसबुक और ट्विटर पर घोषणा कर दिया था कि ‘मैं ना तो लाईट बुझाउंगा और ना ही दीया जलाउंगा।’

मैंने 5 अप्रैल की रात 9 बजे के पहले ही आपको टैग करते हुए भी हैशटैग #मोदीजी_हम_दीप_नहीं_जलाएंगे और #अंधेर_नगरी_चौपट_राजा के साथ ट्वीट भी किया, लेकिन मेरा इसका यह कहीं से मतलब नहीं था कि मैं कोरोना के खिलाफ देशवासियों की एकजुटता का विरोधी हूँ। मैं तो बस एकजुटता दिखाने के इस तरह के भौंडे और बेहूदे प्रदर्शन का विरोधी हूँ।

खैर, 5 अप्रैल को रात 9 बजे के कुछ मिनट पहले ही मैं अपने घर का लाईट बिना बुझाये आपके भक्तों के कारनामे को देखने के लिए छत पर आ गया। आपके घोषणा के मुताबिक ही 9 बजे मेरे घर के चारों तरफ (एक-दो घर को छोड़कर) घर की लाइटें बुझ गई और लोगों ने आपके कहे मुताबिक दीया, मोमबत्ती, मोबाईल का फ्लैशलाइट जला लिया।

ठीक 09:02 में ‘हर-हर महादेव’ ‘जय श्री राम’ के नारे के साथ आतिशबाजी का शोर मेरे कानों तक पहुंचने लगा। फिर गो कोरोना गो ‘हू-हू’ की आवाज के साथ ताली, थाली, शंख और घंटी भी बजने लगी। कहीं-कहीं आग की तेज लपटें भी दिखाई दी, बाद में पता करने पर मालूम हुआ कि लोगों ने कोरोना के विशालकाय पुतला को भी जलाया है  मोदी जी, अभी लॉकडाउन चल रहा है, तो फिर आपके भक्तों के पास पटाखे, बम, रॉकेट आदि आतिशबाजी के सामान कैसे आए? आपने ‘हर-हर महादेव’ और ‘जय श्री राम’ का नारा लगाने का संदेश अपने भक्तों तक कब पहुंचाया था ? 5 अप्रैल की रात के 9 बजे से जो विचित्र नजारा आपकी सार्वजनिक वीडियो संदेश से इतर देखने को मिला, उसके लिए भी आपने कोई गुप्त संदेश भेजा था क्या ?

What happened in our country at 9 pm on 5 April is very embarrassing.

5 अप्रैल की रात्रि 9 बजे जो कुछ हमारे देश में हुआ, वह सच में बहुत ही शर्मनाक है। कोई भी व्यक्ति जिसमें थोड़ी सी भी मानवीय संवेदना बची होगी, वह इस वैश्विक संकट की घड़ी में इस तरह के जश्न में शामिल नहीं होगा। मुझे हमारे दोस्तों ने जो कि दूसरे शहर में रहते हैं, उन्होंने जो बताया और जो कुछ मैंने फेसबुक और ट्विटर पर वायरल हो रहे वीडियो में देखा, उससे तो मैं और भी शर्मिंदा हो गया हूँ। 5 अप्रैल की रात को आपके भक्तों ने कई शहरों में ‘सोशल डिस्टेन्सिंग’ की धज्जी उड़ाते हूए मशाल जुलूस तक निकाला और बेहद ही साम्प्रदायिक नारा लगाते हुए एक समुदाय को मानसिक आघात पहुंचाने का काम किया।

You have failed modiji

मोदी जी, आपने अपने इस ‘मेगाइवेंट’ को कोरोना महामारी के खिलाफ देशवासियों की एकजुटता के लिए आयोजित किया था, लेकिन मुझे बहुत ही खेद के साथ कहना पड़ रहा है कि आप इसमें फेल हो गये हैं। इस ‘मेगाइवेंट’ में लग रहे धार्मिक नारों ने मुसलमानों के अंदर और भी ज्यादा असुरक्षा की भावना को बढ़ा दिया है। आपके इस ‘मेगाइवेंट’ ने एक समुदाय को भयंकर मानसिक यातना झेलने को मजबूर कर दिया है। मोदी जी, मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि कोरोना महामारी के खिलाफ पूरे देश की जनता एक है, इसके लिए किसी भोंडे प्रदर्शन की जरूरत नहीं है और ना ही अरबों रूपये बेवजह के प्रदर्शन में बर्बाद करने की। आज जरूरत है कोरोना महामारी के खिलाफ  लड़ रहे डॉक्टरों को समुचित मेडिकल सुविधा देने की, जरूरत है मुसलमानों से भाइचारे की, जरूरत है लॉकडाउन से पस्त जनता को आर्थिक सुरक्षा देने की और साथ में जरूरत है कोरोना से पीड़ित होने वालों को भी मानसिक संबल देने के साथ उसे मौत के मुंह से खींच लाने की।।

रूपेश कुमार सिंह (Rupesh Kumar Singh)

स्वतंत्र पत्रकार

कोरोना वायरस : ईश्वर, धर्म और विज्ञान

डॉ. राम पुनियानी (Dr. Ram Puniyani) लेखक आईआईटी, मुंबई में पढ़ाते थे और सन्  2007 के नेशनल कम्यूनल हार्मोनी एवार्ड से सम्मानित हैं

इन दिनों पूरी दुनिया कोरोना वायरस से जूझ रही है. इससे लड़ने और इसे परास्त करने के लिए विश्वव्यापी मुहिम चल रही है. मानवता एक लंबे समय के बाद इस तरह के खतरे का सामना कर रही है. किसी ज्योतिषी ने यह भविष्यवाणी नहीं की थी कि पूरी दुनिया पर इस तरह की मुसीबत आने वाली है.

At this time locks are installed at the top worship sites of all religions.

सामान्य समय में जब कोई व्यक्ति किसी गंभीर बीमारी से ग्रस्त हो जाता है तो वह या उसे चाहने वाले आराधना स्थलों पर जाकर ईश्वर से उसकी जान बचाने की गुहार लगाते हैं. निःसंदेह वे ईश्वर पर पूरी तरह निर्भर नहीं रहते. वे अस्पतालों में रोगी का इलाज भी कराते हैं. इस समय सभी धर्मों के शीर्ष आराधना स्थलों पर ताले जड़े हुए हैं, चाहे वह वेटिकन हो, मक्का, बालाजी, शिरडी या वैष्णोदेवी. पुरोहित, पादरी और मौलवी, जो लोगों का संदेश ईश्वर तक पहुंचाते हैं, स्वयं को कोरोना से बचाने में लगे हुए हैं और उनके भक्तगण अपनी-अपनी सरकारों की सलाह पर अमल करने का प्रयास कर रहे हैं. ये सलाहें वैज्ञानिकों और डाक्टरों से विचार-विमर्श पर आधारित हैं.

Science on Duty, Religion on Holiday | God is not powerful

सोशल मीडिया में इन दिनों दो दिलचस्प संदेश ट्रेंड कर रहे हैं. एक है, ‘साइंस ऑन डयूटी, रिलीजन ऑन हॉलिडे’ (विज्ञान मुस्तैद है, धर्म छुट्टी मना रहा है), दूसरा है ‘गॉड इज़ नाट पावरफुल’- (ईश्वर शक्तिशाली नहीं है). नास्तिकों सहित कुछ ऐसे लेखक, जो अपनी बात खुलकर कहने से सकुचाते नहीं हैं, का विचार है कि जब मानवता एक गंभीर संकट के दौर से गुजर रही है उस समय ईश्वर भाग गया है. कई धर्मों का पुरोहित वर्ग श्रद्धालुओं को सलाह दे रहा है कि वे अपने घरों में प्रार्थना करें. अजान हो रही है परंतु वह अब मस्जिद में आने का बुलावा नहीं होती. अब वह खुदा के बंदों को यह याद दिलाती है कि वे अपने घरों में नमाज अता करें. यही बात चर्चों में होने वाले संडे मास और मंदिरों और अन्य तीर्थस्थानों पर होने वाली पूजाओं और आरतियों के बारे में भी सही है. यहां तक कि कुछ भगवानों को मास्क पहना दिए गए हैं ताकि कोरोना से उनकी रक्षा हो सके!

9baje9minute

Debate regarding the existence of God

ईश्वर के अस्तित्व के संबंध में अनंतकाल से बहस होती रही है. कहा जाता है कि ईश्वर इस दुनिया का निर्माता और रक्षक है. फिर, क्या कारण है कि इस कठिन समय में पुरोहित वर्ग दूर से तमाशा देख रहा है. कुछ बाबा अस्पष्ट सलाहें दे रहे हैं. एक बाबा, जिन्हें उनके अनुयायी भगवान मानते थे और जो अब जेल में हैं, इस आधार पर जमानत चाह रहे हैं कि जेल में उन्हें कोरोना का खतरा है. अगर ईश्वर सर्वशक्तिमान है तो वह दुनिया को इस मुसीबत से क्यों नहीं बचा रहा है? क्या कारण है कि इस जानलेवा वायरस से मानवता की रक्षा करने का भार केवल विज्ञान के कंधों पर है?

इतिहास गवाह है कि विज्ञान को अपने सिद्धांतों को स्थापित करने के लिए लंबा और कठिन संघर्ष करना पड़ा है. पुरोहित वर्ग हमेशा से विज्ञान के विरोध में खड़ा  रहा है. रोमन कैथोलिक चर्च, जो कि दुनिया का सबसे संगठित पुरोहित वर्ग है, वैज्ञानिक खोजों और वैज्ञानिकों का विरोधी रहा है. कापरनिकस से लेकर गैलिलियो तक सभी को चर्च के कोप का शिकार बनना पड़ा. अन्य धर्मों का पुरोहित वर्ग इतना संगठित नहीं है. इस्लाम में आधिकारिक रूप से पुरोहित वर्ग के लिए कोई जगह नहीं है परंतु वहां भी यह वर्ग है. सभी धर्मों के पुरोहित वर्ग हमेशा शासकों के पिट्ठू और सामाजिक रिश्तों में यथास्थितिवाद के पोषक रहे हैं.

पुरोहित वर्ग ने कभी वर्ग, नस्ल व लिंग के आधार पर भेदभाव का विरोध नहीं किया. पुरोहित वर्ग ने हमेशा राजाओं और जमींदारों को ईश्वर का प्रतिरूप बताया ताकि लोग इन भगवानों के लिए कमरतोड़ मेहनत करते रहें और इसके बाद भी कोई शिकायत न करें.

पुरोहित वर्ग का यह दावा रहा है कि धार्मिक ग्रंथों में जो कुछ लिखा है वह सटीक, अचूक और परम सत्य है जिसे चुनौती नहीं दी जा सकती.

उत्पादन के वैज्ञानिक साधनों के विकास से दुनिया में औद्योगिक क्रांति का सूत्रपात हुआ. इस क्रांति के बाद पुरोहित वर्ग ने भी अपनी भूमिका बदल ली. औद्योगिक युग में भी वे प्रासंगिक और महत्वपूर्ण बने रहे. इस वर्ग का जोर कर्मकांडों पर रहा और ईश्वर के कथित वास स्थलों को महत्वपूर्ण और पवित्र बताने में उसने कभी कोई कसर बाकी नहीं रखी.

ये सभी तर्क उचित और सही हैं परंतु धर्म के आलोचकों द्वारा धर्म के एक महत्वपूर्ण पक्ष को नजरअंदाज किया जा रहा है. और वह यह है कि सभी धर्मों के पैगंबर अपने काल के क्रांतिकारी रहे हैं और उन्होंने प्रेम व करूणा जैसे मानवीय मूल्यों को प्रोत्साहित किया है. आखिर भक्ति और सूफी संत भी धर्म का हिस्सा थे परंतु उन्होंने शोषणकारी व्यवस्था का विरोध किया और समाज में सद्भाव और शांति को बढ़ावा दिया. धर्म का एक और पक्ष महत्वपूर्ण है और वह यह कि धर्म इस क्रूर और पत्थर दिल दुनिया में कष्ट और परेशानियां भोग रहे लोगों का संबल होता है.

हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि कई धर्मों जैसे बौद्ध धर्म में ईश्वर की अवधारणा नहीं है.

परालौकिक शक्ति की अवधारणा भी समय के साथ बदलती रही है. आदि मानव प्रकृति पूजक था. फिर बहुदेववाद आया. उसके बाद एकेश्वरवाद और फिर आई निराकार ईश्वर की अवधारणा. नास्तिकता भी मानव इतिहास का हिस्सा रही है. भारत में चार्वाक से लेकर भगतसिंह और पेरियार जैसे विख्यात नास्तिक हुए हैं. धर्म का उपयोग बादशाहों और सम्राटों द्वारा अपने साम्राज्यवादी मंसूबों को पूरा करने के लिए किया जाता रहा है. धर्मयुद्ध, क्रूसेड और जिहाद, दरअसल, शासकों के अपने साम्राज्यों की सीमा को विस्तार देने के उपक्रम के अलग-अलग नाम हैं. आज की दुनिया में भी धर्म का इस्तेमाल राष्ट्रों द्वारा अपने-अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए किया जा रहा है.

दुनिया के कच्चे तेल के संसाधनों पर कब्जा करने की अपनी लिप्सा के चलते अमरीका ने पहले अल्कायदा को खड़ा किया. अल्कायदा आज ‘म्यूटेट’ होकर इस्लामिक स्टेट बन चुका है और भस्मासुर साबित हो रहा है.

अमरीका ने अल्कायदा को 800 करोड़ डालर और 7,000 टन हथियार उपलब्ध करवाए और अब वह ऐसा व्यवहार कर रहा है मानो आईएस की आतंकी गतिविधियों से उसका कोई लेनादेना नहीं है.

आज धर्म के नाम पर राजनीति भी की जा रही है. चाहे कट्टरवादी, मुसलमान हों, ईसाई हों अथवा हिन्दू या बौद्ध, उन्हें धर्मों के नैतिक मूल्यों से कोई मतलब नहीं है. वे दुनिया को लैंगिक और सामाजिक ऊँचनीच के अंधेरे युग में वापिस ढ़केलना चाहते हैं.

भारत में हिन्दू धर्म के नाम पर राजनीति करने वालों में हिन्दुत्ववादी अग्रणी हैं. वे कहते हैं कि चाहे प्लास्टिक सर्जरी हो या जैनेटिक इंजीनियरिंग, चाहे हवाईजहाज हों या इंटरनेट, प्राचीन भारत में वे सब थे. यहां तक कि न्यूटन का गुरूत्वाकर्षण का सिद्धांत भी हमारे प्राचीन ऋषि-मुनियों को ज्ञात था!

हम केवल उम्मीद कर सकते हैं कि हमारी सरकारों, वैज्ञानिकों और डाक्टरों की मदद से हमारी दुनिया कोरोना के कहर से निपट सकेगी.

हमें यह भी उम्मीद है कि मानवता पर आई यह आपदा हमें अधिक तार्किक बनाएगी और हम अंधविश्वास और अंधश्रद्धा पर विजय प्राप्त करेंगे.

डॉ. राम पुनियानी

(हिंदी रूपांतरणः अमरीश हरदेनिया) (लेखक आईआईटी, मुंबई में पढ़ाते थे और सन्  2007 के नेशनल कम्यूनल हार्मोनी एवार्ड से सम्मानित हैं).

जब दलित होने के कारण पीएम नहीं बन पाए थे बाबू जगजीवनराम

Babu Jagjeevan Ram

When Babu Jagjivan Ram could not become PM due to being a Dalit

आज स्वतंत्रता संग्राम सेनानी बाबू जगजीवनराम की जयंती है। एक समय ऐसा आया जब दलित होने के कारण बाबू जगजीवनराम प्रधानमंत्री नहीं बन पाए, क्योंकि आरएसएस मोरारजी देसाई के साथ खड़ा हो गया था।

दरअसल जनता पार्टी की राजनीति में जेपी के अनुयायी और डॉ. लोहिया के अनन्य सहयोगी कमांडर अर्जुन सिंह भदौरिया, बाबू जगजीवन राम व रामधन को आगे बढ़ा रहे थे। इस गुट में हेमवती नंदन बहुगुणा भी जुड़ गए थे, जो आरएसएस के घनघोर विरोधी थे, अब ये बात अलग है कि बहुगुणा की संतानें आजकल आरएसएस की सेवा कर रही हैं।

जेएनयू में प्रोफेसर और समाजवादी चिंतक आनंद कुमार ने इस लेखक को कुछ दिन पहले एक बातचीत में बताया था कि कमांडर साहब चूंकि दलितों को राजनीति में आगे बढ़ाने के लिए काम करते रहते थे इसलिए उनका सोचना था कि मोरारजी का विकल्प बन रहे चौधरी चरण सिंह के मुकाबले बाबू जगजीवनराम बेहतर साबित होंगे क्योंकि उनके अंदर जो दोष थे, वह आपातकाल का विरोध करके खतम हो चुके। रामधन तो आपातकाल में जेल भी गए थे।

अगर कमांडर साहब की चली होती तो देश को पहला दलित प्रधानमंत्री मिलता

प्रो. आनंद कुमार ने बताया कि उनको जगजीवनराम को लेकर कमांडर साहब से बात करने का लंबा मौका मिला क्योंकि उन दिनों वह एक संसदीय समिति के सदस्य के रूप में संभवतः पेरिस से लोटते समय लंदन में रुके थे। उस समय आनंद कुमार रिसर्च के लिए शिकागो से लंदन आ गए थे। एक तरह से वहां वह ही उनके ऑफीसर ऑन स्पेशल ड्यूटी बने। वहां गोरे साहब राजदूत थे, उन्होंने दूतावास में कमांडर साहब का इंतजाम किया था। लेकिन कमांडर साहब ने कहा कि हमें तुमसे जरूरी बातें करनी हैं इसलिए हमको वाईएमसीए में ठहरना है। उनके साथ कल्पनाथ राय भी थे, वह कांग्रेस में थे और उसी डेलीगेशन का हिस्सा थे।

प्रो. आनंद कुमार ने बताया कि, “लंदन दिखाने के बहाने कमांडर साहब से तीन-चार दिन खूब बात हुई। वह यही मानते थे कि जनता पार्टी की राजनीति का अगला अध्याय अब जयप्रकाश जी की सहमति से यही होगा कि अब मोरारजी से नहीं संभल रहा है और चरण सिंह चलने नहीं दे रहे हैं, राजनारायण बाहर हैं। कुछ मुस्लिम साथियों से भी बात हुई है कि जब मैं लौटूंगा तो हम लोग आरएसएस के चंगुल में फंस चुके मोरारजी से देश को बचाने के लिए जगजीवन बाबू को प्रधानमंत्री बनवाएंगे।“

अगर कमांडर साहब की सही समय पर चलती तो सौ फीसदी जगजीवनराम प्रधानमंत्री बन गए होते।

कमांडर साहब कहते थे कि हमने तो मोरारजी को मौका दे दिया, भरसक सहयोग भी किया, लेकिन मोरारजी भाई खांटी कांग्रेसी अंदाज़ में सरकार चला रहे हैं। समाजवादियों की अनदेखी करते हैं, तो हम लोग क्यों न मोरारजी भाई की जगह जगजीवन बाबू को प्रधानमंत्री बनाएं।

प्रो. आनंद कुमार ने बताया कि, माता जी (सरला भदौरिया, कमांडर अर्जुन सिंह भदौरिया की पत्नी) जयप्रकाश जी के पास गईं और जय प्रकाशजी ने बाबू जगजीवन बाबू के समर्थन में एक पत्र लिखा। उन्होंने चिट्ठी में लिखा कि जो समस्याएं चल रही हैं, मेरी राय में उनके समाधान के लिए अब बाबू जगजीवनराम को प्रधानमंत्री बनाया जाए। और उस चिट्ठी की बड़ी चर्चा हुई। क्योंकि माताजी को न करना कमांडर साहब को बहुत मुश्किल था। और वह (जेपी) बहुत क्षुब्ध थे, मोरारजी को उन्होंने एक पत्र भी लिखा था। उस पत्र को लाने या तैयार कराने में माताजी और कमांडर साहब की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका थी।

सवाल है कि अगर बाबू जगजीनवराम उस समय प्रधानमंत्री बन गए होते तो आज की राजनीति की दिशा कुछ अलग होती ?

अमलेन्दु उपाध्याय (Amalendu Upadhyaya) लेखक वरिष्ठ पत्रकार, राजनैतिक विश्लेषक व टीवी पैनलिस्ट हैं। वह हस्तक्षेप के संपादक हैं।
अमलेन्दु उपाध्याय (Amalendu Upadhyaya) लेखक वरिष्ठ पत्रकार, राजनैतिक विश्लेषक व टीवी पैनलिस्ट हैं। वह हस्तक्षेप के संपादक हैं।

प्रो. आनंद कुमार के मुताबिक अगर बाबू जगजीवन राम उस समय प्रधानमंत्री बन गए होते तो बाद में कांशीराम के जरिए जो दलित अस्मिता का एक क्षेत्रीय उभार हुआ, उसको एक राष्ट्रीय अभिव्यक्ति मिलती। देश के पैमाने पर जाति के सवाल पर समाजवादियों का अपनी एक साफ समझ थी। गांधी की एक विरासत थी और अंबेडकर की राजनीति का भी एक योगदान था। हरित क्रांति के बाद मध्यम जातियां बहुत आक्रामक होने लगीं। उनका झगड़ा बड़ी जातियों से नहीं था। बड़ी जातियों ने तो सरकारी नौकरियां, शहरी नौकरियां यह सब कर लिया था। फंसे थे भूमिहीन मजदूर के रूप में दलित, और रोज-रोज की खेती के रूप में मध्यम जातियां। उस प्रश्न का भी एक ठोस समाधान होता अगर जगजीवन बाबू उस समय प्रधानमंत्री बन जाते। जो दबंगों की राजनीति चली देहाती भारत में उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान मे उसका कोई समाधान होता, क्योंकि जगजीनवराम को अपने दलित आधार के लिए न्याय करना था और बाकी लोगों को भी समेट कर चलना था। वो कांशीरामजी की तरह दलित केंद्रित राजनीति के तो नायक थे नहीं, इसका उनको अभ्यास भी था। कांग्रेस में रहते हुए उन्होंने बिहार जैसे राज्य से अपना अस्तित्व बनाए रखा, तो वह कुछ कर लेते।

बाबू जगजीनव राम आजादी के आंदोलन से निकले थे, उन्होंने अंबेडकर साहब के समानांतर अपनी राजनीति की थी। और जब दलितों और कांग्रेस के बीच बहस चली तो उन्होंने पूरे देश में दलितों के सम्मेलन कराए। 15 साल से सत्ता में थे, उस समय दलित अस्मिता के सबसे बड़े प्रतीक थे। अंबेडकरवादी भी उनसे नाराज़ नहीं रहते थे, क्योंकि काम तो आखिर उन्हीं से होता था। उनके अंदर सूझ-बूझ थी, वह कुछ सही समाधान कर लेते।

प्रो. आनंद कुमार कहते हैं कि लेकिन वह इतिहास का अब एक ऐसा अध्याय है जिसके बारे में हम और आप अब केवल अनुमान ही लगा सकते हैं।

अमलेन्दु उपाध्याय

तबलीगी ज़मात की हरकत : मोहन भागवत संकट के संकट स्वयंसेवकों को घृणा का वायरस न फैलाने का आदेश दें

Mohan Bhagwat

तबलीगी ज़मात की हरकत और मुस्लिम विरोधी वातावरण

Tabligi Jamaat’s actions and anti-Muslim atmosphere

मुझे मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री श्री बाबूलाल गौर से मुलाकात (Meeting with former Chief Minister of Madhya Pradesh Mr. Babulal Gaur) करने में अत्यधिक बौद्धिक आनंद आता था। उनका जीवन संघर्ष से भरपूर था। उनके संस्मरण काफी दिलचस्प होते थे।

एक दिन इसी तरह की मुलाकात के दौरान मैंने उनसे जानना चाहा कि श्री अटलबिहारी वाजपेयी ने क्या सच में श्रीमती इंदिरा गांधी को दुर्गा माता कहा था? इसपर उन्होंने कहा कि ‘‘इस बारे में मुझे श्री वाजपेयी ने जो बताया था वह बताता हूं।

‘‘उस समय बांग्लादेश को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध चल रहा था। युद्ध के दौरान इंदिराजी ने वाजपेयीजी से संपर्क किया। इंदिराजी ने वाजपेयीजी से कहा कि उन्हें शीघ्र ही नागपुर जाना होगा। कारण पूछने पर इंदिराजी ने कहा कि नागपुर में उन्हें सरसंघ चालक माधव सदाशिव गोलवलकर से मिलकर उन्हें मेरा एक संदेश देना है। मेरा संदेश यह है कि इन कठिन परिस्थितियों में वे मेरी मदद करें। मैं चाहती हूं कि देश में शांति बनाए रखने में वे मेरी सहायता करें। वे यह सुनिश्चित करें कि देश में एक भी मुस्लिम विरोधी घटना न हो। यदि ऐसी कोई घटना होती है तो पाकिस्तान उसका भरपूर लाभ उठाएगा और विश्व में हमारी प्रतिष्ठा पर आंच आएगी। इंदिराजी ने यह भी कहा कि वे नागपुर पहुंचकर गुरूजी से मेरी बात भी करवाएं।

‘‘उन्होंने नागपुर जाने के लिए अटलजी को विशेष विमान भी उपलब्ध करवाया। नागपुर पहुंचकर अटलजी ने गुरूजी से इंदिराजी की बात करवाई। गुरूजी ने उन्हें आश्वस्त किया कि वे देश में शांति और व्यवस्था बनाए रखने में पूरी मदद करेंगे ताकि युद्ध के दौरान देश में सौहार्द और सद्भावना का वातावरण बना रहे। इस बीच इंदिराजी को दुर्गा माता कहा गया। यह उन्होंने कहा या मैंने यह स्मरण नहीं है।‘‘

आज तबलीगी जमात को लेकर पूरे देश में मुस्लिम विरोधी वातावरण बन रहा है। यदि इस प्रवृत्ति को रोका नहीं गया तो विस्फोटक स्थिति बन सकती है।

इसमें कोई संदेह नहीं कि जमात के कुछ सदस्यों ने आपत्तिजनक गतिविधि की है। कुछ हद तक इस कारण आक्रोश होना स्वाभाविक है। परंतु इसे लेकर पूरे मुस्लिम समाज के विरूद्ध वातावरण बनाना उचित नहीं है।

परंतु इसी तरह की आपत्तिजनक गतिविधि कई अन्य व्यक्तियों और समूहों ने भी की हैं। जमात समेत ऐसी अनुचित गतिविधि करने वाले प्रत्येक व्यक्ति के विरूद्ध पुलिस एवं प्रशासन द्वारा सख्त से सख्त कानूनी कार्यवाही की जानी चाहिए।

आरएसएस एक शक्तिशाली संस्था है जिसके सदस्य नेतृत्व के निर्देशों का शत प्रतिशत पालन करते हैं। इसलिए वर्तमान सरसंघ चालक डा. मोहन भागवत से अपेक्षा है कि वे स्वयंसेवकों को आदेश दें कि वे ऐसे नाजुक समय में देश में सद्भावना बनाए रखने में पूरी मदद करें। यह याद रखना आवश्यक है कि घृणा एक ऐसा वायरस है जिसका मुकाबला करना कोरोना से मुकाबला करने की तुलना में कई गुना कठिन है।

एल. एस. हरदेनिया

कोविड-19 : नव-उदारवादवाद व्यक्तिवाद को बढ़ावा देता है, मनुष्य की सामाजिक चेतना को नष्ट कर देता है – डी राजा

D Raja - Doraisamy Raja is a politician and former member of Rajya Sabha from Tamil Nadu. He was the national secretary of the Communist Party of India from 1994 to 2019, and became general secretary in 2019

कोविड-19 (COVID-19) के खिलाफ लड़ाई – डी राजा

Battle against COVID-19 – D Raja

देश में तालाबंदी की घोषणा के एक हफ्ते बाद। दो हफ्ते और बचे हैं। जब यह हो जाएगा, तो मोदी लक्ष्मण रेखा को मिटा देंगे। नरेंद्र मोदी ने जनता कर्फ्यू को समाप्त करने के लिए 19 मार्च को आयोजित जनता कर्फ्यू को समाप्त करने का आह्वान किया था। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी सरकार द्वारा देश में जारी कोरोना प्रसार को रोकने के लिए किए गए उपायों का समर्थन करती है और लोगों को सुरक्षित बनाती है। लॉकडाउन के हिस्से के रूप में, किसानों, खेत श्रमिकों और नीलांबर के संकट बढ़ रहे हैं।

दिसंबर 2019 की शुरुआत में, WHO और WHO ने इसे मान्यता दी। हालांकि, देश के हवाई अड्डों पर पहुंचने वाले यात्रियों को फरवरी के पहले सप्ताह तक चेक नहीं किया गया था। यदि बीमारी फैल गई थी, तो अस्पताल, मास्क, वेंटिलेटर, डायग्नोस्टिक सिस्टम और प्रशिक्षित चिकित्सा पेशेवरों का कोई आकलन नहीं किया गया था।

सरकार ने इस तथ्य को गंभीरता से नहीं लिया है कि पिछले 10 वर्षों में यात्रियों की संख्या में काफी वृद्धि हुई है। प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह को जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा रद्द करने पर खुशी हुई। कश्मीर के लोग और नेता कड़े प्रतिबंध लगा रहे थे। बाद में, वह राष्ट्रीय नागरिकता संशोधन अधिनियम, राष्ट्रीय नागरिकता सूची और राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर के लिए कानून पारित करने में व्यस्त थे, जो बाद में दिल्ली चुनाव अभियान का केंद्र बन गया, जिसने सांप्रदायिक घृणा को जन्म दिया।

अंतत: जब कोरोना महामारी आ गई, तो सरकारी अस्पताल अपर्याप्त थे और मौजूदा अस्पताल अपर्याप्त थे। कम्युनिस्ट पार्टी  ने चिकित्सा शिक्षा के निजीकरण के लिए कानून में संशोधन (Amendment in law for privatization of medical education) का विरोध किया था। मोदी सरकार सार्वजनिक वितरण, सार्वजनिक परिवहन और सार्वजनिक क्षेत्र में अन्य सभी चीज़ों पर रोक लगा रही है जो देश के गरीबों के मूल में है। सांप्रदायिक फासीवादी राज्याभिषेक के बावजूद अपना सांप्रदायिक एजेंडा छोड़ने को तैयार नहीं हैं। इसका क्लासिक उदाहरण निज़ामुद्दीन घटना है। सैकड़ों विदेशियों सहित 2,100 लोग थे। उनमें से कुछ संक्रमित थे। दस लोग मारे गए। अभी भी एक बड़ा खतरा है।

यह ध्यान में रखना होगा कि सरकार ने कोरोना की रक्षा के लिए -डब्ल्यूएचओ के प्रस्तावों को जानबूझकर नजरअंदाज किया है। वायरस सांप्रदायिक ताकतों, जाति या धर्म को प्रभावित नहीं करता है।

संदिग्ध संक्रमण वाले लोगों को स्वैच्छिक स्क्रीनिंग से गुजरना चाहिए। आने वाले दिनों में वायरस बढ़ने की संभावना है। इसे दूर करने के लिए स्वास्थ्य प्रणालियाँ उपलब्ध हैं या नहीं, यह जाँचना अनिवार्य है।

सांप्रदायिक फासीवादी ताकतें मोदी शासन के पिछले छह वर्षों में अवैज्ञानिक तर्क दे रही हैं। मार्च के पहले दो हफ्तों में, यहां तक ​​कि एक अफवाह थी कि बकरी कोरोना पर काबू पाने के लिए दवा थी। पिछले कुछ दिनों में विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ एक वीडियो कॉन्फ्रेंस में प्रधान मंत्री द्वारा किए गए कई सुझावों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि केंद्र सरकार सख्त रुख में है।

केरल में एलडीएफ सरकार ने पहले से ही कई प्रस्तावों को लागू किया है जो अब प्रधानमंत्री कहते हैं। मानवता गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का सामना कर रही है। कोरोनरी प्लेग ने एशिया, संयुक्त राज्य अमेरिका, यूरोप और अफ्रीका को प्रभावित किया है। कोरोना ने सभी देशों के सबसे गरीब लोगों को मारा है। पूंजीवादी समाज में, महामारी अपनी सारी शक्ति का प्रसार करती है। नव-उदारवादी पूंजीवादी व्यवस्था असमानता और अन्याय को बढ़ावा देती है। आवास, स्वास्थ्य देखभाल, शिक्षा और रोजगार सभी मौलिक अधिकार हैं। नव-उदारवादवाद व्यक्तिवाद और उपभोग को बढ़ावा देता है। यह मनुष्य की सामाजिक चेतना को नष्ट कर देता है।

यह साथी प्राणियों के लिए उनकी चिंता को भी समाप्त करता है। नवउदारवादी प्रणाली अपने और हमारे विचार को बरकरार नहीं रख सकती। इस संदर्भ में स्वास्थ्य देखभाल, आवास, शिक्षा और उत्पादन के साधनों का समाजीकरण आवश्यक है। जो लोग यह तर्क देते हैं कि यह समाजवाद नहीं है, वे इसे स्वीकार करेंगे।

वर्तमान स्थिति यह साबित करती है कि पूंजीवादी व्यवस्था अनुचित और अनुचित है।

आइए हम याद करें कि 1954 में विंस्टन चर्चिल ने मार्क्स और एंगेल्स को क्या कहा था। चर्चिल के शब्द भाग्य के वितरण में असमानता, पूंजीवाद की बुराई और समाजवाद की भलाई दुख का निवारण है। समाजवाद मौजूदा संकट से उबरने का एकमात्र तरीका है। यही भविष्य और आशा है।

पहले भूख मिटाएं – फिर दिया जलाएं : मोदी के संसदीय क्षेत्र में कोरोना कहर टूटा !

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First eradicate hunger – then burn it: Corona wreaks havoc in Modi’s parliamentary constituency!

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के संसदीय क्षेत्र (Parliamentary constituency of Prime Minister Narendra Modi) में कोरोना का कहर टूट पड़ा है जिससे प्रशासन को मजबूर होकर कर्फ्यू लगाना पड़ा है, दूसरी ओर गरीब मुसहर जाति के लोगों को अखाद्य सामग्री खाने के लिए मजबूर होना पड रहा है। मोदी किट को लेकर दबंगों और गरीब मुसहर जाति को लेकर मारपीट का सिलसिला भी शुरू हो गया है।

सरकार द्वारा किए जा रहे प्रयास न काफी हो रहे हैं। जिसका उदाहरण यह कि फूलपुर पुलिस थाना क्षेत्र के थाना गांव में शनिवार की शाम मोदी किट (अनाज) को लेकर दबंगों और गरीब व भूखे मुसहरों के बीच जंग शुरू हो गई।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक आरोप है कि उन्होंने पुलिस पर पथराव किया। इस हमले में फूलपुर के इंस्पेक्टर समेत कई पुलिसकर्मी घायल हो गए। खबर है कि उग्र भीड़ ने पुलिस का टियर गन और एक मोबाइल छीन लिया है। पुलिस की एक बाइक भी कूंच दी गई है। बाद में मौके पर पहुंची पुलिस ने थाना गांव में जमकर तांडव मचाया। कई मुसहरों की मड़इयां फूंक दी गई हैं।

लॉकडाउन के बाद करोड़ों की संख्या में ग्रामीण मजदरों की मजदूरी चली गई है और वह भुखमरी के शिकार हो गए हैं। सरकारी मदद पहुंच नहीं पा रही है यदि थोड़ा बहुत पहुंच पा रही है तो दबंगों के आगे गरीब बौने साबित हो रहे हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक ही जनपद गोंडा में मनरेगा के रुपयों को लेकर दो हत्याएं हो गयी हैं उसका मुख्य कारण है कि सत्तारूढ़ दल के लोग विपक्षी पार्टियों के लोगों को मदद नहीं होने दे रहे हैं।

प्रधानमंत्री भाषण में भारतीयता की दुहाई देते हैं लेकिन व्यवहार में भयानक साम्प्रदायिककरण किया जा रहा है। विपक्षी दलों के साथ सौतेला व्यवहार किया जा रहा है।

Randhir Singh Suman CPI
Randhir Singh Suman

राष्ट्रीय एकता प्रदर्शित करने के बहाने राजनीतिक एजेंडा अपनाया जा रहा है, आज का भी कार्यक्रम उसी एजेंडे की एक कड़ी है क्योंकि आज भारतीय जनता पार्टी की स्थापना के 40 वर्ष पूरे हो रहे हैं और कोरोना के कारण 6 अप्रैल को कार्यक्रम नहीं हो सकता है, इसलिए जनसंघ के चुनाव निशान दिया का सहारा लेकर ‘दिया जलाएं’ कार्यक्रम हो रहा है। कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री कुमार स्वामी ने यह आरोप स्पष्ट शब्दों में लगाया है।

जनता के संकट के समय मनुष्यता नहीं छोड़नी चाहिए किन्तु जो व्यवहार में दिखाई दे रहा है उसमें जरा भी मनुष्यता नहीं है।

‘मुंह राम बगल में छुरी है। ‘

सरकार अविलंब गरीब तबके की भूख समाप्त करने के लिए आवश्यक कदम उठाए तभी इस तरह की घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकी जा सकती है।

रणधीर सिंह सुमन

कोरोना और सभ्यता का संकट : हम अभी सभ्यता के एक सबसे बड़े संकट के दौर में जी रहे हैं

Arun Maheshwari - अरुण माहेश्वरी, लेखक सुप्रसिद्ध मार्क्सवादी आलोचक, सामाजिक-आर्थिक विषयों के टिप्पणीकार एवं पत्रकार हैं। छात्र जीवन से ही मार्क्सवादी राजनीति और साहित्य-आन्दोलन से जुड़ाव और सी.पी.आई.(एम.) के मुखपत्र ‘स्वाधीनता’ से सम्बद्ध। साहित्यिक पत्रिका ‘कलम’ का सम्पादन। जनवादी लेखक संघ के केन्द्रीय सचिव एवं पश्चिम बंगाल के राज्य सचिव। वह हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं।

कोरोना और सभ्यता का संकट वार्ता श्रृंखला (1) | Corona and Crisis of Civilization Dialogue Series (1)

—अरुण माहेश्वरी

संवाद के एक नए और शायद प्रभावी माध्यम की तलाश में ही आज हम आपसे इस वीडियो के माध्यम से मुखातिब है। तकरीबन साठ साल पहले ही हमारे युग के एक प्रमुख फ्रांसीसी दार्शनिक और भाषा वैज्ञानिक जॉक दरीदा ने भाषा के अवमूल्यन की बात को जोर देकर कहा था। जिस प्रकार लोगों के बीच संचार के माध्यम (Medium of communication) के तौर पर प्रतीक चिन्हों का प्रभुत्व कायम हुआ है, उसमें भाषा पर आधारित ज्ञान के प्रति लोगों में जैसे एक गहरी अरुचि पैदा कर दी है। नित्शे सुकरात को याद करते हुए कहते थे —‘वह, जिसने कभी लिखा नहीं’। दरीदा की सबसे महत्वपूर्ण पुस्तक ‘Grammatology’ के एक अध्याय का शीर्षक है — ‘The End of the Book and the Beginning of Writing’ , किताब का अंत और लेखन का प्रारंभ

यह कैसा लेखन है, जिसमें किताब का अंत निहित होता है ? वह जो चिन्हों से, प्रतीकों से, तस्वीरों और चलचित्रों से भरा हुआ है।

हम नहीं जानते कि दरीदा का यह कथन कितना सारवान था। चिन्हों से भरी संवाद और संचार की एक नई भाषा के विकास का अर्थ पुरानी अक्षरों, वाक्यों और उनके बीच पसरी भविष्य की अलीक दरारों और सत्य के मौन से समृद्ध, अर्थात दृष्ट से अदृष्ट तक की यात्रा की संभावनाओं से लबालब भाषाई उपकरण का अंत हो जायेगा, विश्वासयोग्य नहीं लगता। यद्यपि उपभोक्ता पाठक की बढ़ती हुई भूख चिन्हों से भरे संवाद माध्यमों का बाजार जरूर गर्म किये रहती है।

बहरहाल, हम आज इस दृष्ट माध्यम में अपनी लगभग शुद्ध भाषाई सामग्री के साथ ही आपके सामने उपस्थित हैं, क्योंकि हम आज के ऐसे ज्वलंत मुद्दे पर बात करना चाहते हैं जो हमारे तात्कालिक अस्तित्व के साथ ही बहुत निकट से हमारे सुदूर भविष्य की आशंकाओं को भी सामने रख दे रहा है।

हम अभी कोरोना की वैश्विक महामारी के संदर्भ से अपने इस नए प्रयोग को शुरू कर रहे हैं।

आज यह कहने की जरूरत नहीं है कि हम अभी सभ्यता के एक सबसे बड़े संकट के दौर में जी रहे हैं। इसके पहले भी मनुष्यों ने भयंकर महामारियों और महायुद्धों का सामना किया है, अस्तित्व के संकट का सवाल तब भी मनुष्य जाति के सामने आया था, पर इस कोरोना वायरस के संकट के बारे में कहा जा रहा है कि पहले के सभ्यता के किसी भी संकट के साथ इसकी तुलना नहीं की जा सकती है। आज ही संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनिउ गूतेरिस ने अपने बयान में कहा है कि द्वितीय विश्वयुद्ध के वक्त का संकट भी इस संकट के सामने कुछ नहीं था।

सचमुच, हम जब अपने दिमाग पर जोर डालते हैं तो यह समझने में कोई कष्ट नहीं होता है कि यह आज के एक नए, जिसे उत्तर-औपनिवेशिक, पूरी तरह से परस्पर निर्भर विश्व के युग की महामारी है।

इस महामारी का अब तक का असर ही बताता है कि आज की दुनिया किस कदर आपस में गुँथ चुकी है। तमाम आबादियों के बीच अविभाज्य संपर्क तैयार हो चुके हैं। राष्ट्रीय राज्यों की सीमाएँ वास्तव में टूट चुकी हैं। दुनिया का कोई कोना अब पहले के जमाने की तरह अलग-थलग, कटा हुआ नहीं रह गया है।

महामारियों ने मनुष्यों के बीच आपसी व्यवहार और सभ्यता के इतिहास पर पहले भी बड़ा असर डाला है। लेकिन कोरोना के असर की गहराई और व्यापकता से पहले की किसी भी महामारी से इसीलिये तुलना नहीं की जा सकती है, क्योंकि आज की दुनिया एक बदली हुई दुनिया है। परस्पर निर्भरशीलता इस दुनिया की एक ठोस सचाई है। इसीलिये कोरोना के आर्थिक-सामाजिक प्रभावों का पूर्व के अनुभवों के आधार पर अभी कोई भी पूरा अनुमान नहीं लगा सकता है।

सबसे पहले चीन में इस वायरस के सामने आने के लगभग दो महीने बाद 2 मार्च को जिस दिन डब्बूएचओ ने यह घोषणा की थी कि कोरोना वायरस को रोकने की संभावनाएँ कम होती जा रही है। मक्का में विदेशी हज यात्रियों के प्रवेश को रोक दिया गया था। वेनिस में सालाना कार्निवल का कार्यक्रम स्थगित हो गया और ईरान में जुम्मे की नमाज़ के लिये मस्जिदों में इकट्ठा होना रोक दिया गया है। ब्रिटेन में सरकार ने अपने हाथ में कुछ आपातकालीन अधिकार लेने की पेशकश की ताकि नागरिकों के आने-जाने को नियंत्रित कर सके। तभी यह साफ होने लगा था कि अब बहुत जल्द ही नागरिक समाज के लिए सारी दुनिया में एक बिल्कुल नई संहिता सामने आएगी। लोग भीड़ और मेलों से बचे ; ग़ैर-ज़रूरी यात्राएँ न करे; एक प्रकार की आत्म-अलगाव की स्थिति को अपनाएँ  — यह तो तत्काल शुऱू हो जाएगा।

और तभी यह भी साफ हो गया था कि दुनिया की जो भी सरकार लोगों में खुद ऐसी एक नई संहित के प्रति स्वीकार्यता की चेतना पैदा नहीं कर पाएगी, वह इस महामारी से लड़ने में विफल रहेगी। जनतंत्र के इस काल की सरकारों के सामने यह एक सबसे बड़ी चुनौती होगी। नागरिक के अधिकारों और राज्य के अधिकारों के बीच सही संतुलन कायम करने की एक नई चुनौती पूरी दुनिया के सामने खड़ी होगी। अब तक के विश्व वाणिज्य संबंध उलट-पुलट जाएंगे। शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार की बाजार-केंद्रित नीतियों की उपयोगिता गहरी जांच का विषय बन जाएगी। यहां तक कि इससे स्कूलों-कालेजों और अस्पतालों के वर्तमान स्वरूप पर भी तत्काल गहरा असर पड़ सकता है।

This crisis on human existence will also present a challenge to a completely new global morality.

मानव अस्तित्व पर यह संकट सिर्फ हमारे भौतिक जीवन के स्वरूपों को ही प्रभावित नहीं करेगा, यह अपने साथ एक बिल्कुल नई वैश्विक नैतिकता की चुनौती भी पेश करेगा।

यूरोप में द्वितीय विश्व युद्ध के काल में जब मनुष्यता के अस्तित्व पर ख़तरा (Danger on the existence of humanity) महसूस किया जाने लगा था, तब बौद्धिक जगत में प्लेग और हैज़ा जैसी महामारियों से जूझते हुए इंसान के अस्तित्वीय संकट के वक़्त को याद किया गया था। क़ामू और काफ़्का का आज अमर माना जाने वाला लेखन उसी भय और उससे जूझने की व्यक्तिगत और सामूहिक अनुभूतियों की उपज था।

नई मानवता के अस्तित्ववादी दर्शन का जन्म भी उसी पृष्ठभूमि में हुआ था जिसमें अपने अस्तित्व की रक्षा के लिये जूझते मनुष्य में श्रेष्ठतम नैतिक मूल्यों के उदय को देखा गया था। साफ़ कहा गया था कि मनुष्य की प्राणीसत्ता अपने अस्तित्व की रक्षा के क्रम में ही नए मानव मूल्यों का सृजन करने के लिए प्रेरित होती है। व्यक्ति के आत्मबल को ही समाज और पूरी मानवता के आत्मबल के रूप में देखा गया था।

तब उस समय के मार्क्सवादियों ने नये मनुष्य के निर्माण में उसकी अन्त: प्रेरणा के तत्व को प्रमुखता देने के कारण इस दर्शन की आलोचना की थी। इसे सामाजिक अन्तर्विरोधों पर आधारित परिवर्तन के सत्य का परिपंथी माना था। और, इसी आधार पर इसे वर्ग-संघर्ष पर टिके समाजवाद के लिये संघर्षों का विरोधी बताते हुए मानव-विरोधी तक कहा गया। जनवादी लेखक संघ जैसे संगठन के घोषणापत्र में भी कोई इस प्रकार के सूत्रीकरण को देख सकता है।

लेकिन सार्त्र सहित तमाम आधुनिक अस्तित्ववादियों ने अपने जीवन और राजनीतिक विचारों से भी बार-बार यह साबित किया कि हर प्रकार के अन्याय के खिलाफ संघर्ष की अग्रिम पंक्ति में शामिल होने से उन्होंने कभी परहेज़ नहीं किया। वियतनाम युद्ध से लेकर अनेक मौक़ों पर वे वामपंथी क्रांतिकारियों के भी विश्वस्त मित्र साबित हुए थे।

यह मानव-केंद्रित एक ऐसा सोच था जिसमें जीवन को बनाने में मनुष्यों के आत्म की भूमिका को प्रमुखता प्रदान की गई थी। इसके प्रणेता माने गये किर्केगार्द आदमी के अपने आत्म को ही उसके जीवन के लिये मुख्य रूप से ज़िम्मेदार मानते थे। हाइडेगर और नित्शे, जिनके विचारों में हिटलर के व्यक्तिवाद की प्रेरणा देखी जाती थी, वे भी प्राणीसत्ता की तात्त्विकता पर बल देने के नाते अस्तित्ववादी माने गये। सार्त्र इस धारा के सबसे मुखर सामाजिक प्रतिनिधि हुए।

बहरहाल, आज कोरोना वायरस के इस काल में अस्तित्ववादी सोच का महत्व कुछ अजीब प्रकार से सामने आ रहा है। वायरस मानव शरीर की आंतरिक प्रक्रियाओं की उपज होता है ; मनुष्य के अपने शरीर के अंदर के एक प्राकृतिक उत्पादन-चक्र का परिणाम। शरीर के भौतिक अस्तित्व से उत्पन्न चुनौती। इसके कारण किसी बाहरी कीटाणु में नहीं होते हैं। इसकी संक्रामकता के बावजूद अक्सर इसका शरीर के अंदर ही स्वत: शमन हो जाता है।

लेकिन जब किसी भी वजह से यह शरीर की प्रतिरोध-शक्ति को परास्त करने लगता है, तब यह जानलेवा बन जाता है। कोरोना एक ऐसा ही वायरस है जिसका संक्रमण कल्पनातीत गति से हो रहा है और यह अनेक लोगों के लिए प्राणघाती भी साबित हो रहा है।

कोरोना के चलते आज जो बात फिर एक बार बिल्कुल साफ़ तौर पर सामने आई है वह यह कि आदमी का यह भौतिक शरीर अजर-अमर नहीं है। बल्कि यह अपने स्वयं के कारणों से ही क्षणभंगुर है। इसीलिये सिर्फ़ इसके भौतिक अस्तित्व के भरोसे पूरी तरह से नहीं चला जा सकता है, बल्कि इसकी रक्षा के लिये ही जितनी इसकी अपनी प्रतिरोधक क्षमता को साधने की ज़रूरत है, उतनी ही एक भिन्न प्रकार के आत्म-बल की, मनुष्यों के बीच परस्पर सहयोग और समर्थन की भी ज़रूरत है। यह मनुष्य के प्रयत्नों के एक व्यापक सामूहिक आयोजन की माँग करता है, जैसा कि अब तक चीन, वियतनाम, क्यूबा ने दिखाया है। चीन के डाक्टरों के जत्थे इटली की मदद के लिये चल पड़े हैं, तो क्यूबा अपने तट पर इंग्लैंड के कोरोना पीड़ित जहाज़ के यात्रियों की सहायता कर रहा है।

सारी दुनिया में कोरोना के परीक्षण की मुफ़्त व्यवस्था है। दुनिया के कोने-कोने में हर रोज़ ऐसे तमाम प्रेरक उदाहरण सामने आ रहे हैं। इसने एक भिन्न प्रकार से, मानव-समाज के आत्म बल को साधने की, अस्तित्ववादी दर्शन की सामाजिक भूमिका को सामने रखा है।

आज हम एक बदली हुई, परस्पर-निर्भर, आपस में गुँथी हुई दुनिया में रह रहे हैं। इसमें सभी मनुष्यों के सामूहिक सहयोगमूलक प्रयत्नों के बिना, जब तक इसका प्रतिषेधक तैयार नहीं हो जाता, इस प्रकार के वायरस का मुक़ाबला संभव नहीं है। और क्रमश: यह भी साफ़ है कि इससे मुक़ाबले का कहीं भी और कोई भी प्रतिषेधक विकसित होने पर वह सारी दुनिया के लोगों को मुफ़्त में ही उपलब्ध कराया जाएगा।

अमेरिका में जो ट्रंप वहाँ की जन-स्वास्थ्य व्यवस्था को ख़त्म करने पर उतारू था, कोरोना ने उसके अमानवीय मूर्खतापूर्ण सोच की सीमाओं को बेपर्द कर दिया है। डेमोक्रेटिक पार्टी के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार बर्नी सैन्डर्स की यह माँग कि मुफ़्त सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं का सिर्फ़ राष्ट्रीय नहीं, अन्तर्राष्ट्रीय ढाँचा तैयार किया जाना चाहिए, कोरोना की चुनौती के सम्मुख मानव समाज की एक सबसे ज़रूरी और प्रमुख माँग दिखाई पड़ती है।

The challenge of Corona has truly exposed the futility of limited thinking of national states.

कोरोना की चुनौती ने सचमुच राष्ट्रीय राज्यों के सीमित सोच की व्यर्थता को उजागर कर दिया है। यह न धनी-गरीब में भेद करेगा, न हिंदू, मुसलमान, बौद्ध और ईसाई में। महाकाय अमेरिकी बहु-राष्ट्रीय निगम भी अमेरिका को इसके प्रकोप से बचाने में असमर्थ है। इसने मनुष्यों के अस्तित्व की रक्षा के लिये ही पूरे मानव समाज की एकजुट सामूहिक पहल की ज़रूरत को रेखांकित किया है। इसीलिये जो भी ताकतें स्वास्थ्य और शिक्षा की तरह के विषय की समस्याओं का निदान इनके व्यवसायीकरण में देखती है, वे मानव-विरोधी ताकते हैं। हमारे शास्त्रों तक में न्याय, शिक्षा और स्वास्थ्य को पाशुपत धर्म के तहत, मनुष्य का प्रकृतिप्रदत्त अधिकार माना गया है। आज कोरोना से पैदा हुआ अस्तित्व का यह संकट शुद्ध रूप से निजी या संकीर्ण राष्ट्रीय स्वार्थों के लिये भी आपसी खींचतान की व्यर्थता को ज़ाहिर करता है।

आदमी का अपने भौतिक अस्तित्व की चुनौतियों से जूझना ही द्वंद्वात्मक भौतिकवाद है और इसी संघर्ष की आत्मिक परिणतियों का एक नाम अस्तित्ववाद है। सच्चा द्वंद्वात्मक भौतिकवाद आदमी के आत्म को भी उसकी भौतिक सत्ता से अभिन्न रूप में जोड़ कर देखता है। जीवन का सत्य इन दोनों स्तरों पर ही, शरीर और भाषा दोनों स्तरों पर, अपने को प्रकट किया करता है।

आज की अपनी वार्ता की इस पहली किस्त को फिलहाल यहीं तक सीमित रखने के बाद अपनी दूसरी किस्त में हम और भी ठोस रूप में इसी विषय के आर्थिक पहलुओं पर चर्चा करेंगे।

आप इस वार्ता को इस लिंक पर सुन सकते हैं

https://youtu.be/sy9SyiSSrRg