क्या भारत की न्यायपालिका में वैचारिक बदलाव आया है?

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मामला अदालत के चैम्बर के ‘शुद्धिकरण’ का

वह 1990 के दशक का उत्तरार्द्ध जब इलाहाबाद उच्च न्यायालय में एक अदालत के चैम्बर के ‘शुद्धिकरण’ का मामला सुर्खियों में था। दरअसल उपरोक्त चेम्बर पहले अनुसूचित जाति से सम्बद्ध न्यायाधीश के लिए आबंटित हुआ था और उनके तबादले के बाद किन्हीं ‘उच्च जाति’ के व्यक्ति को उस चेम्बर का आबंटन हुआ। ख़बर यह बनी कि ‘उच्च जाति’ के उपरोक्त न्यायाधीश ने ‘गंगाजल’ से उसका शुद्धिकरण करवाया। अख़बार के रिपोर्टरों ने उन सम्बद्ध व्यक्तियों से भी बात की थी, जो इस कार्रवाई में शामिल थे।

ख़बरों को पढ़ कर अनुसूचित जाति से सम्बद्ध न्यायाधीश ने अदालत की शरण ली और उनके बाद वहां विराजमान हुए उच्च जाति के न्यायाधीश को दंडित करने की मांग की। मामला अंतत: अदालत द्वारा ही रफा दफा किया गया, बाद में पता चला कि अदालत ने जो जांच कमेटी बनाई थी उसने उन लोगों से बात तक नहीं की थी, जो ‘शुद्धिकरण में शामिल थे।’

अब बीते लगभग ढाई दशक में गंगा-यमुना से तमाम पानी बह चुका है, अलबत्ता ऐसी घटनाओं का कत्तई अकाल नहीं सामने आया है, जब न्यायाधीशों का लिंग, जाति या सांप्रदायिक पूर्वाग्रह (Judges’ gender, caste or sectarian bias) सामने आए हैं और फिर यह सवाल भी उठता रहा है कि ऐसी मान्यताओं के आधार पर अगर वह न्याय के सिंहासन पर बैठेंगे तो वह जो फैसला लेंगे, वह किस हद तक संविधान सम्मत होगा।

मनुस्मृति की उपासक जज साहिबा!

बहरहाल, पिछले दिनों यह बहस नए सिरे से उपस्थित हुई जब दिल्ली उच्च न्यायालय की एक न्यायाधीश ने ‘फिक्की’ द्वारा आयोजित एक समारोह में विज्ञान, टेक्नोलॉजी आदि क्षेत्रों में महिलाओं के समक्ष उपस्थित चुनौतियों (Challenges faced by women in the fields of science, technology etc.) के बारे में बात करते हुए स्त्रियों के सम्मान, उनकी मौजूदा स्थिति और धार्मिक ग्रंथों की अहमियत पर न केवल बात की बल्कि उनकी एक नयी परिभाषा भी देने की कोशिश की। गौरतलब था कि अपनी इस तकरीर में उन्होंने मनुस्मृति के कसीदे पढ़े। जज महोदया के इन विचारों की काफी आलोचना हुई।

लोगों को इस बात पर भी ताज्जुब हुआ कि मनुस्मृति का उनका महिमामंडन न केवल उसके तमाम विवादास्पद पहलुओं की भी अनदेखी कर रहा था बल्कि भारत के राजनीतिक एवं सामाजिक आज़ादी के आंदोलन के एक अहम पड़ाव के प्रति अपनी समूची अनभिज्ञता को प्रतिबिम्बित कर रहा था।

धार्मिक ग्रंथों में स्त्रियों एवं दलितों एवं अन्य वंचितों की स्थिति के संबंध में आज़ादी के आंदोलन के दौरान उठी थी आवाज

याद रहे आज़ादी के आंदोलन में धार्मिक ग्रंथों में स्त्रियों एवं दलितों एवं अन्य वंचितों की स्थिति को लेकर विभिन्न सामाजिक क्रांतिकारक एवं सुधारकों ने लगातार अपनी आवाज़ बुलंद की है, यहां तक वर्ष 1927 में डॉ. अम्बेडकर की अगुआई में छेड़े गए महाड सत्याग्रह (1927) के दूसरे चरण में (25 दिसम्बर 1927) में महाड में डॉ. अम्बेडकर ने मनुस्मृति का दहन किया था (Dr. Ambedkar burnt Manusmriti in Mahad) और उनके इस कार्रवाई की तुलना फ्रेंच इन्कलाब (1789) से की थी, जबकि पहले चरण में (19-20 मार्च) को महाड के चवदार तालाब पर अपने हजारों सहयोगियों के साथ पानी पीकर मनुष्य होने के अपने अधिकार को रेखांकित किया था।

गौरतलब था कि महाड सत्याग्रह (Mahad Satyagraha) की इस ऐतिहासिक कार्रवाई के बाद समय-समय पर अपने लेखन और व्याख्यानों में डॉ. अम्बेडकर ने मनु के विश्व नज़रिये की लगातार मुखालिफत की थी।

मनु के शासन को संविधान ने समाप्त किया

महाड सत्याग्रह के लगभग 23 साल बाद जब भारत के संविधान का ऐलान हो रहा था तब डॉ. अम्बेडकर ने इस अवसर पर कहा था कि संविधान ने ‘मनु के शासन को समाप्त किया है।’

विडम्बना कही जाएगी कि इक्कीसवीं सदी की तीसरी दहाई में एक न्यायविद द्वारा मनुस्मृति का यह समर्थन- जिसे डॉ. अम्बेडकर ने ‘प्रतिक्रांति’ का दस्तावेज कहा था- निश्चित ही कोई अपवाद नहीं कहा जा सकता। विगत कुछ वर्षों में ऐसे मामले बार-बार आए हैं, जब परोक्ष अपरोक्ष रूप से कुछ न्यायविदों ने अपने ऐसे तमाम पूर्वाग्रहों को प्रकट किया है।

क्या भारत की कानूनी प्रणाली के भारतीयकरण की आवश्यकता है?

दिसम्बर माह में जम्मू-कश्मीर उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश ने अधिवक्ता परिषद के कार्यक्रम में कहा था कि भारत के संविधान के प्राक्कथन में ‘धर्मनिरपेक्ष’ और ‘समाजवादी’ शब्द के समावेश ने भारत की आध्यात्मिक छवि को सीमित किया है।

इसके बाद जनवरी की शुरूआत में सुप्रीम कोर्ट के एक अग्रणी जज सुर्खियों में आए, जब उन्होंने इसी अधिवक्ता परिषद के सम्मेलन में शामिल होकर भारतीय कानून व्यवस्था के गैर उपनिवेशीकरण विषय पर बात रखते हुए यह दावा किया कि भारत की कानूनी प्रणाली एक तरह से औपनिवेशिक कानूनी प्रणाली की विरासत है, जो भारतीय जनता के लिए अनुकूल नहीं है तथा उसके भारतीयकरण की आवश्यकता है।

उन्होंने कहा कि ‘प्राचीन भारत की कानूनी प्रणाली की वास्तविक स्थिति जानने के लिए हमें प्राचीन भारतीय ग्रंथों की ओर लौटना होगा और हम पाएंगे कि भारत की वह न्याय प्रणाली कानून के राज पर टिकी थी।’…उन्होंने इस बात पर भी अफसोस प्रकट किया कि किस तरह भारत की आधुनिक कानूनी प्रणाली ने ‘मनु, कौटिल्य, कात्यायन, बृहस्पति, नारद, याज्ञवल्क्य आदि प्राचीन भारत के महान कानूनविदों के योगदानों की अनदेखी की है और वह ‘औपनिवेशिक कानूनी प्रणाली चिपकी रही है।’ लाजिम था कि प्रबुद्ध दायरों में यह बहस चल पड़ी कि क्या न्यायपालिका के अंदर कोई गंभीर विचारधारात्मक शिफ्ट हो रहा है।

जातिवादी न्यायाधीश (Casteist judges)!

याद कर सकते हैं कि बमुश्किल तीन साल पहले केरल उच्च न्यायालय के न्यायाधीश चिदंबरेश (Kerala high Court judge Justice V Chitambaresh) सुर्खियों में आए थे जब उन्होंने ‘ग्लोबल ब्राह्मण मीट अर्थात वैश्विक ब्राह्मण सम्मेलन (Global Brahmin Meat) को संबोधित करते हुए ब्राह्मण जाति की कथित वरीयता को रेखांकित किया था और सम्मेलन को यह आह्वान किया था कि आरक्षण का आधार क्या जाति होना चाहिए।

न्यायमूर्ति के पूर्वाग्रह (Justice’s Prejudice) किस तरह समाज में व्याप्त विषाक्तता को मजबूती देते हैं, इसे प्रमाणित करने के लिए अंत में हम मुंबई उच्च न्यायालय के एक फैसले पर बात कर सकते हैं। मुंबई उच्च न्यायालय ने एक मुस्लिम युवक की लिंचिग के मामले में सभी अभियुक्तों को पैरोल पर रिहा किया। अदालत का तर्क था कि ‘यह मृतक की एकमात्र गलती थी कि वह दूसरे धर्म से सम्बद्ध था, यह तथ्य मैं अभियुक्तों के पक्ष में मानती हूं … ऐसा प्रतीत होता है कि धर्म के नाम पर वह भड़क गए।’

अंत में सर्वोच्च न्यायालय को इस मुददे पर हस्तक्षेप करना पड़ा और अभियुक्तों की जमानत रद्द करनी पड़ी।

कई उदाहरण, एक ही चिन्ता, भारत को पुराना गौरव कब हासिल होगा और हम विश्व गुरु कैसे बनेंगे? कई अन्य उदाहरण दिए जा सकते हैं, लेकिन फिलवक्त इतना ही कहना काफी होगा कि आज़ादी की इस पचहत्तरवीं सालगिरह पर न्यायपालिका पर भी गहराते बादलों को हम देख सकते हैं, जो यह संकेत जरूर देते हैं कि चीजें अब जबरदस्त उथल-पुथल में हैं। इसका समाधान क्या निकलेगा, इसका उत्तर भविष्य के गर्भ में है।

– सुभाष गाताडे

Is there an ideological shift in India’s judiciary?

बलात्कारियों का सम्मान! कैसा समाज बना रहे हैं हम?

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गर निर्भया के दोषी कर दिए जाएं रिहा, तो कैसी होगी आपकी प्रतिक्रिया?

फर्ज़ कीजिये किसी दिन आपको यह ख़बर मिलती है कि निर्भया के दोषियों को जेल से रिहा कर दिया गया है, क्योंकि आज़ादी के मौके पर सरकार ने अच्छी चाल-चलन वाले और बीमार कैदियों को रिहा करने का फैसला किया है, तब आपकी प्रतिक्रिया क्या होती?

निर्भया, जिसके साथ छह लोगों (जिनमें एक नाबालिग) ने बलात्कार किया था, अमानुषिक तरीके से मार-पीटकर घायल किया था और जिसके बाद उसकी मौत हो गई थी। यानी बलात्कार के बाद हत्या (murder after rape)। आप कहेंगे कि उसके चार अपराधियों को तो फांसी हो गई, पांचवे ने जेल में ही ख़ुदकुशी कर ली थी और एक नाबालिक को रिहा कर दिया गया।

ऐसी ही सजा के लायक हैं सामूहिक बलात्कारी

बेशक, सामूहिक बलात्कारी ऐसी ही सजा के लायक हैं। पूरा देश उस वक्त निर्भया के लिए उद्वेलित था जो अपने परिवार के सपनों को पूरा करने के लिए फिज़ियोथेरेपी की पढ़ाई कर रही थी।

क्या बलात्कारी माफी के योग्य हैं?

निर्भया की मां और पिता का सतत संघर्ष था जो अपराधी फांसी के फंदे तक पहुंचे। दूसरी तरफ बिलकिस बानो (Bilkis Bano) हैं जो लगभग निर्भया की ही उम्र की थीं, जब मार्च 2002 के गुजरात दंगों में उनसे सामूहिक बलात्कार हुआ, उनकी तीन साल की बेटी मार दी गई, उनके गर्भस्थ शिशु की भी मौत हो गई, परिवार के सात सदस्यों को भी मार दिया गया। सीबीआई की विशेष अदालत ने मुजरिमों को सजा दी जिसे बॉम्बे हाई कोर्ट ने बरक़रार रखा। ये संख्या में 11 थे जिन्हें पंद्रह अगस्त को गुजरात सरकार ने रिहा कर दिया। बेशक माफी का प्रावधान होता है लेकिन बलात्कार जैसे जघन्य मामलों में नहीं।

कई सवाल खड़े करती है बिलकिस के बलात्कारियों की रिहाई

यह ब्यौरा कई सवाल खड़े करता है। निर्भया के अपराधियों को फांसी, तो बिलकिस बानो के बलात्कारियों की रिहाई क्यों (Why the release of rapists of Bilkis Bano)? मामला जब सीबीआई का था तो राज्य सरकार माफी क्यों दे रही है? आरोपी पहले तिहाड़ जेल में थे, तो गुजरात की जेल में स्थानांतरित क्योंकर किये गए? गुजरात के विधानसभा चुनाव सामने हैं। क्या सरकार को इस बात का कोई डर नहीं कि इस रिहाई से जनता में गलत संदेश जाएगा?

क्या अब मज़हब देख कर मिलेगा न्याय?

बिलकिस बानो जैसों को न्याय अब मज़हब को देखते हुए मिलेगा? जकिया जाफरी, तीस्ता सीतलवाड़ को जेल और अब बिलकिस बानो के अपराधियों की रिहाई न्याय की किस किताब का प्रतिनिधित्व करती हैं? सर्वोच्च न्यायालय पहले भी बिलकिस बानो के हक़ में खड़ा हुआ था। क्या अब भी होगा?

प्रधानमंत्री के कथनी और करनी के फर्क

यह सब तब होता है जब प्रधानमंत्री 15 अगस्त को ही लाल किले की प्राचीर से नारी सम्मान को लौटाने की बात करते हैं। कथनी और करनी के इस फर्क को क्या जनता इन दिनों नज़रअंदाज़ कर रही है?

शायद हां, तभी किसी राजनीतिक दल की सरकार ऐसी दरिंदगी करने वालों को माफी के काबिल समझने लगती है। फिर विश्व हिंदू परिषद के दफ्तर में उनके मस्तक पर तिलक लगते हैं और मिठाइयां बांटी जाती हैं। इसके वायरल हो रहे वीडियो पार्टी के कार्यकर्ताओं को इस बात का संदेश भी देंगे कि हमने जो किया उसके बाद हमें रिहाई भी दिलाई जाती है और सम्मान भी। पार्टी अकेला नहीं छोड़ती। ठीक वैसे ही जैसे भाजपा के सांसद जयंत सिन्हा ने मॉब लिंचिंग के बाद ग्यारह अपराधियों के जेल से रिहा होते ही उनका फूलों की माला से स्वागत किया था।

पीड़ित का नाम बिलकिस बानो हो जाने से क्या नज़रिये में फर्क आ जाता है? निस्संदेह पार्टी को यह यकीन तो होगा ही कि इस फैसले से उनके मतदाताओं में उनकी पैठ नहीं घटने वाली। वास्तविक चिंता वोट बैंक की होनी चाहिए या उस सरोकार की जिससे देश की आधी आबादी भी सुरक्षित रहे। उन्नाव, हाथरस की घटनाओं से बहुत पहले राजस्थान के भटेरी गांव की भंवरी देवी भी हैं जिन्हें कोई न्याय नहीं मिला।

बलात्कारियों की कवच बन गई है सियासत

भंवरी देवी के साथ तीस साल पहले सामूहिक बलात्कार हुआ था। वे साथिन (आंगनवाड़ी कार्यकर्ता ) की ड्यूटी संभाल रही थीं और उन्होंने एक बाल विवाह को रुकवाया था।

भंवरी देवी का बाल विवाह रुकवाना कथित ऊंची जाति वालों को बरदाश्त नहीं हुआ। भंवरी देवी का हुक्का-पानी बंद कर दिया गया और इस पर भी शांति न मिली तो पांच लोगों ने उसके पति के सामने उसका बलात्कार किया। 22 सितंबर, 1992 के बाद से भंवरी देवी ‘मन्ने न्याय चाहिए’ की पुकार लगा रही हैं और तब से ही उनकी पुकार पर प्रहार का सिलसिला जारी है। घटना के 52 घंटे बाद तक उनका मेडिकल मुआयना नहीं किया गया। वे अपने पेटीकोट को ले लेकर भटकती रहीं। फिर कोर्ट ने तो यहां तक कह दिया कि कोई ऊंची जाति वाला नीची जाति से बलात्कार कैसे कर सकता है? उन पर दबाव बनाया गया कि मुकदमा वापस ले लें लेकिन उनका कहना था कि अगर ये मेरा मान लौटा सकते हैं तो मैं भी मुकदमा वापस ले लूंगी। यही बात उन्होंने गांव के बुर्जुगों से भी कही। इस बीच खूब राजनीतिक दांव-पेंच खेले गए। सियासत बलात्कारियों की कवच बन गई। भंवरी देवी के कई रिश्तेदारों ने भी उनसे मुंह मोड़ लिया। सिवाय उनके पति के।

इस व्यवस्था में स्त्री का भरोसा कैसे कायम रह सकता है?

व्यवस्था जब यूं डोल रही हो तब स्त्री का भरोसा इस व्यवस्था में कैसे कायम रह सकता है? उत्तर प्रदेश के हाथरस में 19 साल की दलित लड़की के साथ चार ऊंची जाति के लोगों ने बलात्कार किया। पंद्रह दिन बाद दिल्ली के अस्पताल में इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई। पुलिस ने जबरदस्ती गुपचुप उसका अंतिम संस्कार कर दिया।

व्यवस्था जब-तब एक स्त्री के सम्मान को यूं आग में भस्म करती रही है। क्यों नहीं एक स्त्री के मन में यह विचार आएगा कि जो भी हो रहा है उसे बर्दाश्त करते रहो क्योंकि न्याय मांगने की राह में व्यवस्था अक्सर उसके खिलाफ देखी गई है।

बलात्कारियों को सत्ता का संरक्षण

उन्नाव मामला 2017 में सामने आया था। पीड़िता की उम्र केवल सत्रह साल थी। भाजपा के पूर्व सदस्य और विधायक कुलदीप सिंह सेंगर को जेल हुई। न्याय मिलने की प्रक्रिया तब शुरू हुई जब उसने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के आवास के सामने खुद को जलाने की कोशिश की। उसके बाद उसके पिता को हिरासत में लिया गया जहां पीड़िता के पिता की मौत हो गई। बाद में पीड़िता भी नहीं रही।

ऐसे मामलों की फेहरिस्त लंबी है जहां की पीड़ा और फिर शोर सुनाई तो दे गया लेकिन न्याय का रास्ता बहुत मुश्किलों वाला रहा। ऐसे में महिलाएं अपनी आवाज घोंट देने में ही अपनी भलाई समझती हैं।

भविष्य के लिए खतरनाक है यह परिपाटी

बिलकिस बानो अब डरी हुई हैं और गहरे विषाद में आ गई हैं। वह कहती है कि मैंने अपनी बच्ची सलेहा की रूह की शांति के लिए दुआ पढ़ी। उनके पति का यह भी कहना था कि ऐसा कोई माफीनामा भी होता है, हमें बिलकुल पता नहीं था।

बिलकिस ने कई जानलेवा धमकियों के बीच इस लड़ाई को लड़ा था। सुनवाई गुजरात की बजाय महाराष्ट्र स्थानांतरित हुई। सर्वोच्च न्यायालय ने 50 लाख रुपए बतौर मुआवजा और नौकरी देने के निर्देश भी दिए। नौकरी मिलना शेष है लेकिन ये पैसे वे अब अपनी बड़ी होती बेटियों की शिक्षा पर खर्च करेंगी। क्या वाकई सरकार का यह भ्रम है या यकीन कि बिलकिस बानो जैसे मामलों से उसके मतदाताओं को कोई फर्क नहीं पड़ता?

हम वही समाज हैं जहां बाल विवाह, बहुविवाह, सती प्रथा के खिलाफ कानून बने जबकि समाज में इन कुप्रथाओं की जड़ें गहरी थीं। एक बेहतर समाज की रचना तभी संभव है जब हरेक के लिए लिंग भेद से परे जीने के समान अवसर हों। अगर कोई सत्ता प्रतिष्ठान यह मानने लगे कि बिलकिस बानो जैसे मामले उसके वोट बैंक को कतई प्रभावित नहीं करेंगे तो यह मान लेना चाहिए कि अब हम भी भीड़तंत्र या लोक लुभावन राजनीति के घेरे में आ चुके हैं; बिना इसकी परवाह किये कि यह भविष्य के लिए खतरनाक है।

वर्षा भम्भाणी मिर्ज़ा

(लेखिका स्वतंत्र पत्रकार हैं)

मूलतः देशबन्धु में प्रकाशित आलेख किंचित् संपादन के साथ साभार

What kind of society are we creating by respecting rapists?

रेटिनोब्लास्टोमा : समय रहते निदान व उपचार न हो तो बच्चों को अपनी जान से भी हाथ धोना पड़ सकता है

Eye's Health

रेटिनोब्लास्टोमा : लक्षण, कारण और उपचार

नई दिल्ली 02 अगस्त 2022. आंखें हमारे मन का आईना होती हैं। शरीर की स्वस्थता व अस्वस्थता तो कोई भी हमारी आखों में झांककर ही देख सकता है। आंखें कुछ न कहते हुए भी इशारों में बहुत कुछ कह जाती हैं। लेकिन, सोचिए उस अवस्था या उन लोगों के बारे में, जिनकी आंखें नहीं हैं। वे लोग जो कि नेत्रहीन हैं।

यह भी सच है कि दुर्भाग्यवश बहुत से बच्चे आंख के साथ पैदा तो होते हैं, लेकिन रेटिनोब्लास्टोमा (Retinoblastoma in Hindi) जैसी बीमारियां उनकी दृष्टि पर धावा बोल देती हैं। अगर समय रहते निदान या उपचार न हो तो बच्चों को अपनी जान से भी हाथ धोना पड़ सकता है।

क्या होता है रेटिनोब्लास्टोमा यानी आंखों का कैंसर?

नई दिल्ली स्थित सेंटर फॉर साइट के निदेशक डॉ. महिपाल एस सचदेव (Dr. Mahipal S Sachdev, Director, Center for Sight, New Delhi) का कहना है कि दरअसल, रेटिनोब्लास्टोमा आंखों का एक ऐसा कैंसर होता है जो कि छोटे बच्चों की आंखों पर प्रहार कर सकता है। ये एक आंख या दोनों आंखों में एक साथ भी हो सकता है। इसका ट्यूमर रेटिना में उभरता है जो कि आंखों को दृष्टि प्रदान करती है। जिस केस में एक आंख में ही ट्यूमर उभरता है, उसे यूनिलैटरल रेटिनोब्लास्टोमा (Unilateral Retinoblastoma) कहा जाता है। जिन केसों में दोनों आंखों में ट्यूमर उभरता है, उस स्थिति को बाइलेटरल रेटिनोब्लास्टोमा (Bilateral Retinoblastoma) कहा जाता है।

Symptoms of Retinoblastoma

डॉ. महिपाल एस सचदेव ने एक विज्ञप्ति में बताया कि रेटिनोब्लास्टोमा के लक्षण निम्र हैं, जैसे कि

भेंगापन;

आंखों की पुतली का लाल होना;

सामान्य से बड़ी पुतली;

रंग-बिरंगी पुतली;

निम्न दृष्टि या दृष्टि का कम होना;

आंखों में सूजन होना आदि।

उन्होंने बताया कि यदि उपरोक्त दिए गए किन्हीं भी लक्षणों से आप का बच्चा पीड़ित हो तो यह आवश्यक नहीं है कि आपके बच्चे को रेटिनोब्लास्टामा ही हो। किंतु ऐसी अवस्था आने से पहले ही अपने बच्चे की आंखों की जांच अवश्य ही कराएं।

रेटिनोब्लास्टोमा का निदान और रेटिनोब्लास्टोमा का कारण (Diagnosis of Retinoblastoma and Cause of Retinoblastoma)

डॉ. सचदेव ने बताया कि अल्ट्रासाउंड, सीटी स्कैन, एम आर आई, बायोप्सी की आवश्यकता हर केस में नहीं होती है।

डॉ. महिपाल एस सचदेव के अनुसार रेटिनोब्लास्टोमा का एक मुख्य कारण आनुवांशिक होता है। यह अक्सर पैदा हुए बच्चों से लेकर 4 वर्ष तक के बच्चों को हो सकता है। लक्षणों की बात करें तो बच्चों की आंखों के मध्य में सफेद रोशनी जैसी दिखने लगती है। इसके अलावा भेंगापन के कईकेंसों में भी कैंसर हो सकता है।

उन्होंने बताया कि प्राय: आंखों के कैंसर का निदान (eye cancer diagnosis) एक कुशल नेत्र रोग विषेशज्ञ द्वारा ही किया जा सकता है। लेकिन जितनी जल्दी इसका निदान हो सके, उतना ही आसानी से उपचार हो सकता है।

रेटिनोब्लास्टोमा की रोकथाम

डॉ. सचदेव ने बताया कि इसकी रोकथाम (Prevention of Retinoblastoma) इसके प्रति अधिक से अधिक जागरुकता से ही की जा सकती है। पहले कुछ समय तक रेटिनोब्लास्टोमा को जानलेवा समझा जाता था, लेकिन आज चिकित्सा जगत की नई तकनीकों के आ जाने से इसका उपचार संभव हो गया है। नई तकनीक व उचित प्रबंधन से आंखों की बरौनियों, पलकों, आंखों के भीतरी भाग आदि में होने वाले ट्यूमरों को भी कम किया जा सकता है।

डॉ. महिपाल एस सचदेव का कहना है कि आम लोगों में रेटिनोब्लास्टोमा के प्रति जागरूकता (Awareness of Retinoblastoma) होना आवश्यक है, तभी यह संभव हो पाएगा।

रेटिनोब्लास्टोमा का उपचार

डॉ. महिपाल एस सचदेव का कहना है कि उपचारों की बात करें तो रेटिनोब्लास्टोमा के लिए बहुत से उपचार (treatment of retinoblastoma) उपलब्ध हैं जैसे कीमोथेरेपी, रेडियोथेरेपी, लेजर थेरेपी, क्रायोथेरेपी, थर्मोथैरेपी, सर्जरी। केस की जटिलता को देखते हुए ही चिकित्सक के द्वारा उपयुक्त उपचार सुझाया जाता है। लेकिन उपचार के साथ बच्चों को विशेष तौर पर समझाना व उपचार के लिए तैयार करना बहुत आवश्यक होता है, जो कि मां बाप के लिए मुश्किल भी होता है।

Retinoblastoma: If not diagnosed and treated in time, children can also lose their lives.

पेट्रोलियम राज्य मंत्री ने बता दिया उज्ज्वला योजना का सच, 4.13 करोड़ लोगों ने एक बार भी नहीं भरवाया सिलेंडर!

narendra modi violin

4 करोड़ से अधिक लोगों ने एक बार भी नहीं भरवाया सिलेंडर!

नई दिल्ली, 02 अगस्त 2022. पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस राज्यमंत्री रामेश्वर तेली (Minister of State for Petroleum and Natural Gas Rameshwar Teli) ने राज्यसभा को एक लिखित उत्तर में बताया है कि उज्ज्वला योजना के 4.13 करोड़ लोगों ने एक बार भी रसोई गैस को रिफिल नहीं कराया है।

राज्यसभा में कांग्रेस के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे के एक सवाल के उत्तर में राज्यमंत्री रामेश्वर तेली ने ये जानकारी दी।

इस पर केंद्र सरकार को घेरते हुए मल्लिकार्जुन खड़गे ने ट्वीट किया

“उज्ज्वला “प्रचार” योजना का झांसा मोदी सरकार के आंकड़ों से ही उजागर होता है।

FY21-22 में, 2 Cr+ लोग LPG की सिंगल रिफिल का खर्च नहीं उठा सकते थे, जबकि 2.11 Cr ने इसे केवल एक बार रिफिल किया।

मोदी जी, रीफिल की लागत ₹1053 और नगण्य सब्सिडी के साथ आपने गरीब भारतीयों को अंधकार युग में धकेल दिया है!”

Minister of State for Petroleum told the truth of Ujjwala scheme

Good Luck Jerry review : सिनेमा का ‘गुड लक जैरी’ तमाशा

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Good Luck Jerry review in Hindi | गुड लक जैरी की समीक्षा

बिहार का एक परिवार पंजाब में रहता है। परिवार के नाम पर दो बेटी और माँ है। बड़ी वाली मसाज पार्लर में काम करती है जिसके ब्याह को लेकर माँ चिंता में है। माँ मोमे बेचती है…ओह सॉरी…मोमो…उफ़्फ़.. यार मोमोज। जैरी की छोटी बहन चैरी पढ़ रही है अभी घर में इन तीन स्त्रियों के अलावा कोई मर्द नहीं है तो पड़ोस के एक पंजाबी अंकल उन बेटियों की माँ से प्यार कर बैठे हैं। लेकिन फिर आता है अचानक से एक मोड़ और फिल्म आपको बीच-बीच में उड़ता पंजाब‘ की याद दिलाती हुई भी पूरी तरह ‘उड़ता पंजाब’ न होकर तमाशा सा बनकर रह जाती है।

कैंसर से लड़ रही माँ को बचाती हुई इस फिल्म की कहानी ज्यादा समय तक हंसाती हुई और तमाशा सा दिखाती हुई कब खत्म हो जाती है पता ही नहीं लगता।

तमिल फिल्म ‘कोलामावू कोकिला’ का रीमेक है गुड लक जैरी

यह फिल्म एक तमिल फिल्म ‘कोलामावू कोकिला’ की रीमेक है जिसमें हंसाने के लिए थोड़े मसाले इस तरह मिलाये गए हैं कि चाइनीज मोमो की कहानी की आड़ में नशे से होती हुई यह बस तमाशा सा लगती है। जिसमें न ज्यादा आप खुल कर हंस पाते हैं, न ही एक्शन सीन देखकर आप के दिल में हौल उठते हैं।

गुड लक जैरी फिल्म की कहानी (good luck jerry movie story) को जिस तरह दक्षिण भारत से उठाकर पंजाब के बैक ग्राउंड से सेट किया गया है और उसमें बिहार तथा पूर्वोत्तर भारत का तड़का लगाया गया है वह जरूर इसकी कहानी को गुड बनाता है।

तमिल सिनेमा के चर्चित निर्देशक ‘नेल्सन दिलीप कुमार’ की लिखी इस कहानी को हिंदी और पंजाबी, भोजपुरी के मिश्रण से इसके लेखक ‘पंकज मट्टा’ ने अच्छे से बुना। बावजूद इसके स्क्रिप्ट तथा सिनेमैटोग्राफी के हल्के-फुल्के झोल के कारण यह उतनी उम्दा नहीं बन पाई है। टाइम पास मनोरंजन के लिए इसे देखा जरूर जा सकता है।

फिल्म की कलरिंग और सेट डिजाइनिंग के साथ-साथ इसका गीत-संगीत आपको बोरियत महसूस नहीं होने देता। अच्छे और गहरे रंगों का चयन जिस तरह से फिल्म में किया गया है उसके लिए तारीफ की जानी चाहिए।

एडिटर, कैमरामैन, कास्टिंग करने वालों सुनने लायक गीत देने वालों की तारीफ भले आप खुलकर न कर पाएं लेकिन ये निराश कतई नहीं करते। सिनेमा की अच्छी पहचान रखने वाले इसे एकदम से नकार तो नहीं सकते लेकिन कई दिनों से कचरा फिल्मों का ड्रग्स सूँघे बैठे दर्शकों के लिए फिर से बता दू यह टाइम पास फिल्म जरूर है।

‘जान्हवी कपूर’ काफी समय बाद अच्छा अभिनय करती नजर आती हैं।

थियेटर की बड़ी कलाकार ‘मीता वशिष्ठ’ सबसे उम्दा जमी हैं माँ के किरदार को उन्होंने हर जगह अच्छे से पकड़ा है। ‘सुशांत सिंह’ , ‘दीपक डोबरियाल’ , ‘सौरभ सचदेव’ , ‘मोहन कंबोज’ , ‘शिवम गौड़’, ‘सुशांत सिंह’ , ‘ जसवंत सिंह दलाल’ , ‘नीरज सूद’ , ‘ मोहन कम्बोज’ , ‘संदीप नायक’ आदि भी फिल्म को भरपूर सहारा देते हैं।

निर्देशक ‘सिद्धार्थ सेन’ ने फिल्म का निर्देशन तो अच्छा किया लेकिन स्क्रिप्ट को पर्दे पर उतारते समय थोड़ा और इमोशन, थोड़ा और अच्छा एक्शन, थोड़ा और कहानी के ट्विस्ट एंड टर्न्स में कायदे से बदलाव करते तो फिल्म और अच्छा गुड लक अपने साथ ला सकती थी।

इस शुक्रवार को सिनेमाघरों में रिलीज हुई ‘विक्रांत रोणा’ तथा ‘एक विलेन रिटर्न्स’ पर अपने कीमती रुपये लगाने से पहले ‘गुड लक जेरी’ देख ली जाए तो इस सप्ताह का यह कहीं बेहतर चुनाव होगा। बाकी आपकी मर्जी आपका रुपया आपका है हमारा थोड़े है।

लेकिन जाते-जाते कह दूँ “डर से बस दो-तीन कदम आगे ही एक दुनियां है जहां जाने के लिए ना रिक्शा लगता है ना ऑटो लगता है तो बस हिम्मत। लेकिन एक बार वहां पहुंच गये ना तो कसम से मजा आ जाता है।”

तो सिनेमाघर इस सप्ताह अपने घर को ही बनाइये बेहतर रहेगा। वरना जैसे फिल्म अपने शुरुआत में कहती है “मोमोज दार्जिलिंग के हैं, बना बिहारी रहे हैं और पेल पंजाबी रहे हैं। तो सिनेमाघरों में बेवजह अपने आपको पेलवाना चाहते हैं तो जाइये वरना आराम से घर बैठिये है कि नहीं।

अपनी रेटिंग – 3.5 स्टार

तेजस पूनियां

सत्य अहिंसा और प्रेम के साथ बने रहेंगे गांधी

Mahatma Gandhi महात्मा गांधी

सरकारी संस्था ‘गांधी दर्शन एवं स्मृति’ की मासिक पत्रिका ‘अंतिम जन’ के सावरकर विशेषांक को लेकर कुछ गांधी-जन आक्रोश में हैं। साथ ही कुछ पत्रकारों, बुद्धिजीवियों और पार्टी प्रवक्ताओं/नेताओं ने भी अपना विरोध प्रकट किया है। गांधी के प्रपौत्र तुषार गांधी का भी विशेषांक के विरोध में बयान आया है।

क्या है गांधी दर्शन एवं स्मृति?

गांधी दर्शन एवं स्मृति’ गांधी के जीवन और विचारों से जुड़ी संस्था है। विरोधियों का मानना है कि इस संस्था द्वारा सावरकर पर विशेषांक निकालना मौजूदा सरकार के ‘हिंदुत्ववादी’ एजेंडे का हिस्सा है। वे कहते हैं कि ऐसा करके सरकार ने गांधी के दर्शन को विकृत करने और उनके कद को छोटा करने का प्रयास किया है।

गांधी भारत और विश्व के पटल पर अपने जीवन-काल में अपनी भूमिका और चिंतन के आधार पर स्वीकृत हुए थे। जीवन समाप्त हो जाने के बाद भी वे उसी आसन पर बने रहे हैं, तो उसका कारण उनकी भूमिका और विचार ही हैं।

दरअसल, गांधी का भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के निर्णयकारी दौर का नेतृत्व करना मानव सभ्यता के इतिहास में उनकी भूमिका का एक हिस्सा है। उनकी भूमिका और चिंतन समूची मानव सभ्यता के धरातल पर चरितार्थ होता है। तभी आइंस्टीन ने कहा था कि आने वाली पीढ़ियों को बड़ी मुश्किल से यह भरोसा होगा कि हाड़-मांस से बना ऐसा कोई व्यक्ति भी धरती पर मौजूद रहा था।

ध्यान दें कि गांधी को दुनिया के समस्त नेताओं में सबसे अधिक सूझ-बूझ रखने वाला नेता मानने वाले महान वैज्ञानिक आइंस्टीन की गांधी से कभी व्यक्तिगत मुलाकात नहीं हुई थी।

मानव सभ्यता का इतिहास असत्य, हिंसा, घृणा, कपट, कायरता, षड़यंत्र, दुरभिसंधि, वैमनस्य, लालच जैसी प्रवृत्तियों का सिलसिला बन कर न रह जाए, इसलिए मानवता को गांधियों की जरूरत होती है – सत्य, अहिंसा और प्रेम को जीवन के केंद्र में बनाए रखने के लिए। अगर सीमित समझ के लोगों के प्रयासों से गांधी का दर्शन विकृत और कद छोटा होने लगे तो मानव सभ्यता के इतिहास में गांधी जैसों के होने की घटना ही निरर्थक हो जाती है। जो लोग गांधी के चिंतन की विकृति और कद को छोटा करने के प्रयासों से चिंतित हैं, उन्हें ऐसा करने वालों की समझदारी पर सवाल उठाने से पहले अपने को अच्छा गांधी की समझ वाला बनाना चाहिए। तब गांधी का होना कभी निरर्थक नहीं होगा।

गांधी सामने वाले को अपना शत्रु नहीं मानते थे। भले वे अंग्रेजों का साथ देने और स्वतंत्रता आंदोलन का विरोध करने वाले हों; या भारत पर आधिपत्य जमाने वाले खुद ब्रिटिश। क्योंकि उनके पास मानवता के लिए एक रचनात्मक कार्यभार था।  

गांधी को किसी अन्य विभूति की तुलना में खड़ा करके छोटा बताने के प्रयास भारत में पहले भी होते रहे हैं। कोई उन्हें भगत सिंह से तौलता है, कोई अंबेडकर से, कोई जिन्ना से, कोई कार्ल मार्क्स से, कोई माओ से। इस सबके बावजूद गांधी वही रहते हैं, जो अपनी भूमिका और चिंतन के चलते हैं।

यही स्थिति उन विभूतियों की है, जिनसे तुलना करके गांधी का कद काम करने की कोशिश की जाती  है। मूल बात यह है कि गांधी की भूमिका और चिंतन को किसी भी सरकारी, पार्टीगत या व्यक्तिगत प्रयास से अनकिया नहीं किया जा सकता।

आधुनिक औद्योगिक सभ्यता हिंसा-प्रतिहिंसा और भोगवाद के विषाक्त चक्र में फंस चुकी है। पृथ्वी, समुद्र और अंतरिक्ष – सभी जगह मानव सभ्यता का संकट पसरा है। अतिशय भोग और भूख के बीच प्राणियों और वनस्पतियों की करोड़ों प्रजातियां विलुप्त हो चुकी हैं। भारत खुद बुरी तरह इस सभ्यता की चपेट में है। गांधी को खुद, खास कर विभाजन की विभीषिका के बीच, लगा था कि उनके लाख प्रयासों के बावजूद प्रति-मानवीयता बाजी मार ले गई है। लेकिन मानवता में उनका विश्वास डिगा नहीं। उन्होंने स्वीकार किया कि “मैं जब भी निराश होता हूं, मैं याद करता हूं इतिहास में हमेशा सच और प्यार की जीत हुई है। अत्याचारी और हत्यारे हुए और कुछ वक़्त के लिए वो अजेय भी जान पड़े, लेकिन अंत में उनका ख़ात्मा हो ही गया…ये बात हमेशा याद रखिए।“

गांधी की चिंता करने वाले लोग गांधी को लेकर मानव सभ्यता के संकट का समाधान निकालने की सच्ची कोशिश करेंगे, तो गांधी के होने की सार्थकता मिथ्या आख्यानों के बावजूद बनी रहेगी।

यह जरूरी नहीं है कि गांधी की साधारण विराटता को सब समझ लें। लेकिन नहीं समझने वाले लोगों से खफा होने या लड़ने की जरूरत नहीं है।

गांधी की जरूरत खुद नेहरू, पटेल और मौलाना को नहीं रह गई थी। लेकिन हम जानते हैं, तब भी गांधी की जरूरत रत्ती-भर कम नहीं हुई थी। उनकी हत्या नहीं हुई होती, तो वे अपनी भूमिका और चिंतन पर अडिग रहते हुए, भारत-पाकिस्तान की जनता के साथ रहते या आजाद भारत और पाकिस्तान की जेलों में!

समस्या यह नहीं है कि आरएसएस गांधी को विकृत करता है। समस्या गांधी के दावेदारों के साथ है। वे बता नहीं पाते कि उन्हें गांधी क्यों चाहिए? क्या आखिरी आदमी के लिए? लेकिन गांधी के आखिरी आदमी को पीछे धकेल कर वे ‘आम आदमी’ को लेकर आ चुके हैं। उनका नेता अपने दोनों तरफ भगत सिंह और अंबेडकर की तस्वीर लगा कर बैठता है। वह जानता है कि उसकी आदर्श पार्टी आरएसस/भाजपा एक दिन गांधी को नीचे गिरा देगी। लेकिन समझने की बात यह है कि उसके बावजूद गांधी का होना खत्म नहीं होगा। गांधी संस्थाओं और सरकारों पर निर्भर नहीं हैं।

भारत को एक शो-पीस गांधी की जरूरत क्यों पड़ी हुई है?

गांधी शो-पीस होंगे तो अलग-अलग नेता और सरकारें उन्हें अपने ढंग से सजाएंगी और इस्तेमाल करेंगी। देश में भी, विदेश में भी। कांग्रेस यह काम बखूबी करती रही है। आप सक्रिय गांधी को अपनाइए। तब सावरकरों के पक्ष में या मुकाबले में उनका इस्तेमाल नहीं हो पाएगा। न ही कारपोरेट पूंजीवाद के पक्ष में।

जब आप पिछले तीस सालों से ‘गांधी के सपनों का भारत’ बना रहे हैं, तो ‘अंतिम जन’ के विशेषांक से कोई पहाड़ नहीं टूट पड़ा है!

प्रेम सिंह

(समाजवादी आंदोलन से जुड़े लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व शिक्षक और भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला के पूर्व फ़ेलो हैं।)  

महात्मा गांधी का पुनर्पाठ- दसवां एपिसोड – महात्मा गांधी के मार्क्स संबंधी विचारों का मूल्यांकन

Gandhi will live with truth, non-violence and love

खाद्य वस्तुओं पर जीएसटी भारतीय गरीबों के बीच कुपोषण को और बढ़ाएगा

goods and services tax GST

खाद्य वस्तुओं पर जीएसटी का गरीबों पर असर क्या होगा? | What will be the impact of GST on food items on the poor?

ग्लोबल हंगर इंडेक्स 2021 (जीएचआई) रिपोर्ट में भारत 116 देशों में से 101वें स्थान पर (2021 Global Hunger Index, India ranks 101st out of the 116 countries) है। 27.5 के स्कोर के साथ भारत गंभीर स्तर की भूख की श्रेणी में आता है। हम भूख के गंभीर स्तर पर हैं, यह हमारे लिए चिंता का विषय है। सभी नागरिकों को पोषण सुनिश्चित करने के लिए सक्रिय योजना की आवश्यकता है।

ग्लोबल हंगर इंडेक्स रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनिया भर में कुपोषितों की संख्या में पिछले दो साल में 15 करोड़ यानी 24.3 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। 2019 में कुपोषितों की संख्या 61.8 करोड़ थी जबकि 2021 में यह बढ़कर 76.8 करोड़ हो गई।

भूख सूचकांक के मानदंड क्या हैं? | What are the criteria for the Hunger Index?

भूख सूचकांक तीन मानदंडों पर आधारित है, अपर्याप्त खाद्य आपूर्ति, बाल मृत्यु दर और बाल कुपोषण। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि दुनिया के कुल कुपोषित लोगों में से एक चौथाई भारत में रहते हैं। यह ऐसे समय में है जब हमारा देश 5 ट्रिलियन अर्थव्यवस्था के साथ आर्थिक विकास में वैश्विक नेता बनने की आकांक्षा रखता है।

कुपोषण को कम करने के लिए देश के सभी नागरिकों को संतुलित भोजन की आपूर्ति मूलभूत आवश्यकता है। संतुलित आहार का अर्थ (Meaning of balanced diet) है विटामिन और खनिजों के रूप में पर्याप्त मात्रा में प्रोटीन, वसा, कार्बोहाइड्रेट और सूक्ष्म पोषक तत्व।

एक व्यक्ति के संतुलित आहार में क्या- क्या आहार आते हैं?

nutritious food
पौष्टिक आहार

प्रतिष्ठित मेडिकल जर्नल लैंसेट ने एक व्यक्ति की पोषण संबंधी आवश्यकताओं में जाने के लिए एक समिति का गठन किया था। इसमें 232 ग्राम साबुत अनाज, 50 ग्राम कंद या स्टार्च वाली सब्जियां जैसे आलू, 300 ग्राम सब्जियां, 200 ग्राम फल, 250 ग्राम डेयरी भोजन, 250 ग्राम प्रोटीन स्रोत मांस, अंडा, मुर्गी के रूप में सेवन करने का सुझाव दिया गया है। मछली, फलियां, मेवा, 50 ग्राम संतृप्त और असंतृप्त तेल 30 ग्राम चीनी। वर्तमान बाजार मूल्य पर इन खाद्य पदार्थों की कीमत प्रति व्यक्ति लगभग 225 रुपये है। इसका मतलब है कि पांच सदस्यों के परिवार को प्रतिदिन 1125 रुपये या केवल भोजन पर 33750 रुपये प्रति माह खर्च करना चाहिए।

एक छोटी आबादी को छोड़कर हमारे लोग इस लक्ष्य से बहुत दूर हैं। 5 किलो अनाज और एक किलो दाल और थोड़ा सा तेल देने की सरकार की योजना पोषण संबंधी आवश्यकताओं को पूरा नहीं करती है। यह उचित भरण-पोषण के लिए भी पर्याप्त नहीं है। यह शारीरिक और मानसिक विकास के लिए आवश्यक विटामिन और खनिजों जैसे सूक्ष्म पोषक तत्वों की आवश्यकताओं को बिल्कुल भी पूरा नहीं करता है।

उत्तर प्रदेश में 23 करोड़ की आबादी में से 15 करोड़ लोगों के लिए इतना राशन मुफ्त पाने के लिए कतार में लगना पोषण सुरक्षा के मामलों की बेहद निराशाजनक स्थिति का एक प्रक्षेपण है।

गरीबी दूर करने के उपाय

यह प्रासंगिक है कि लोगों की क्रय क्षमता गरीबी उन्मूलन, पर्याप्त मजदूरी और नागरिकों के लिए गुणवत्तापूर्ण भोजन की आवश्यकता को पूरा करने के लिए आजीविका के साधन सुनिश्चित करने के माध्यम से बढ़ाई जाती है। नोबेल पुरस्कार विजेता अभिजीत बनर्जी सहित कई आर्थिक विशेषज्ञों ने गरीबी दूर करने के कई उपाय सुझाए हैं।

हाल के आर्थिक सर्वेक्षणों से पता चला है कि हमारी 90 प्रतिशत आबादी प्रति माह 10,000 दस हजार रुपये से कम कमाती है, उनके लिए संतुलित आहार केवल एक सपना है जो वर्तमान परिस्थितियों में सच होता नहीं दिख रहा है। जरूरी खाद्य पदार्थों पर टैक्स लगाने से पेट भरने का खर्चा बढ़ना तय है। दूसरी ओर मजदूरी में गिरावट का रुझान दिख रहा है क्योंकि रोजगार बिना नौकरी की सुरक्षा के और न ही भविष्य निधि या ईएसआई जैसे किसी रोजगार लाभ के ठेके पर काम कर रहा है। लघु उद्योग क्षेत्र जो बड़ी संख्या में लोगों को आजीविका प्रदान करता है, नवउदारवादी आर्थिक नीति के तहत प्राप्त होने वाले अंत में है।

एक युवा वयस्क के लिए कितनी कैलोरी जरूरी है?

एक युवा वयस्क के लिए 2300 कैलोरी और एक स्वस्थ भोजन और कपड़ों की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए, विभिन्न श्रमिक संगठनों ने इन कैलोरी आवश्यकताओं के सिद्धांत के आधार पर न्यूनतम मजदूरी की मांग की है। उन्होंने न्यूनतम वेतन 21000 रुपये प्रति माह की मांग की है। पूरी तरह से निराश करने के लिए, सरकार ने 178 रुपये प्रति दिन या 5340 रुपये प्रति माह के रूप में न्यूनतम वेतन की घोषणा की। यह आंतरिक श्रम मंत्रालय की समिति की 375 रुपये प्रति दिन की सिफारिश के बावजूद है। यह उच्चतम न्यायालय के 650 रुपये प्रति दिन के वेतन की मांग पर दिए गए फैसले के खिलाफ भी है। समय आधारित कार्य वेतन शुरू करने की सरकार की मंशा आर्थिक रूप से हानिकारक होने के साथ-साथ किसी व्यक्ति की चिकित्सा सलाह और स्वास्थ्य आवश्यकताओं के विरुद्ध भी होगी।

हमारे देश में बड़ी संख्या में आबादी असंगठित क्षेत्र में है जहां कानूनी फॉर्मूलेशन शायद ही लागू होते हैं। किसान और कृषि श्रमिक जो उत्पादक हैं, सबसे ज्यादा पीड़ित हैं। खेतिहर मजदूरों को आर्थिक के साथ-साथ सामाजिक भी दोहरे उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है। किसानों ने नए कृषि कानूनों का विरोध किया, उन्हें डर था कि इससे न केवल उनकी आर्थिक स्थिति पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा, बल्कि नागरिकों की खाद्य सुरक्षा से भी समझौता होगा।

यह आवश्यक है कि आवश्यक खाद्य पदार्थ लागत प्रभावी हों और निम्न सामाजिक-आर्थिक समूहों की पहुंच के भीतर हों। सभी वर्गों के लिए मजदूरी को वर्तमान कीमतों पर कैलोरी की जरूरत, संतुलित आहार, कपड़े, स्वास्थ्य, शिक्षा और आवास के अनुसार संशोधित किया जाए। इस संदर्भ में भोजन और अन्य दिन-प्रतिदिन की आवश्यकता वाली वस्तुओं पर लगाए गए जीएसटी को और कुपोषण को रोकने के लिए वापस लिया जाना चाहिए।

– डॉ अरुण मित्रा

RBI ने माना नोटबंदी और GST ने देश के व्यापारियों की हालत कर दी पतली

GST on food items will further exacerbate malnutrition among Indian poor

अपने ही किले में धसक रही महाराज की ज़मीन..!

jyotiraditya m. scindia

ग्वालियर में 57 साल बाद कांग्रेस का महापौर।

महलकी छाया से निकली तो फिर हरियाने लगी कांग्रेस।

भोपाल, 18 जुलाई 2022. ग्वालियर के महापौर की कुर्सी पर करीब सत्तावन साल बाद कांग्रेस की शोभा सतीश सिकरवार बैठने जा रहीं हैं। सिंधिया राजघराने के जयविलास प्रासाद के सामने जल विहार में नगर निगम मुख्यालय है।

इस इमारत में जिस दिन शोभा आसंदी पर बैठेंगीं, उस दिन इतिहास की नई इबारत लिखी जाएगी।

मप्र में स्थानीय निकाय के चुनावों (local body elections in mp) में सियासी सयानों की सबसे ज्यादा दिलचस्पी ग्वालियर में थी। यह दलबदल करके भाजपा में आए केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया का गढ़ (Union Minister Jyotiraditya Scindia’s stronghold) है इसलिए यहां की हार जीत के छींटे उनके दामन पर आने ही थे।

दलबदल के बाद भाजपा में ज्योतिरादित्य सिंधिया का कद लगातार बढ़ रहा है।

अपने लोगों को शिवराज सरकार में मनमाफिक मंत्री बनवाने वाले सिंधिया ख़ुद मोदी सरकार में नागरिक उड्डयन मंत्री हैं। हाल ही में उन्हें इस्पात मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार मिला है। पार्टी में बढ़ते कद के बीच अपने ही शहर में पार्टी का मेयर न बनवा पाना उनके माथे पर शिकन लाने वाली बात है।

यूं भाजपा प्रत्याशी सुमन शर्मा, नरेंद्र सिंह के खेमे की मानी जाती हैं, लेकिन उनकी जीत के लिए पूरी पार्टी ने एड़ी चोटी का जोर लगाया। तोमर तो जिम्मा लिए ही थे लेकिन उनके अलावा स्वयं सिंधिया, मुख्यमंत्री शिवराज सिंह, प्रदेश अध्यक्ष वीडी शर्मा, कई मंत्री,सांसद, विधायक पर्चा भरवाने आए। मतदान के आखिरी दौर में एक ही गाड़ी पर सवार होकर इन सब दिग्गजों ने जंगी रोड शो किया।

उधर कांग्रेस उम्मीदवार शोभा के विधायक पति सतीश सिकरवार अपनी ख़ुद की फ़ौज के दम पर डटे हुए थे। सिंधिया को उनके गढ़ में घेरने की रणनीति पर चुनाव के पहले से ही काम कर रहे कमलनाथ, दिग्विजय सिंह ने भी कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। शुरुआती खींचतान के बाद ग्वालियर के ही दूसरे विधायक प्रवीण पाठक और जिला इकाई ने भी जोर लगाया।

नतीज़ा सामने है… भाजपा अपने और संघ के परंपरागत गढ़ में मात खा गई।

ग्वालियर में कांग्रेस की यह जीत क्यों महत्वपूर्ण है

कांग्रेस की यह जीत इस मायने में भी बहुत बड़ी है कि यहां माधवराव सिंधिया भी कभी कांग्रेस का महापौर नहीं बनवा सके थे। लगभग चार दशक तक कांग्रेस के एकछत्र नेता रहे माधवराव के दौर में भी जनसंघ, भाजपा के ही महापौर जीतते रहे। साठ के दशक के बाद से कांग्रेस ने महापौर की कुर्सी को ‘हाथ’ भी नहीं लगाया।

बीस साल पहले पिता की मृत्यु के बाद कांग्रेस से ही राजनीति का ककहरा पढ़ने वाले ज्योतिरादित्य के दौर में सन 2004, 2009 और 2014 में भी कांग्रेस महापौर के चुनाव में जीत की बाट जोहती ही रह गई।

और अब सिंधिया नाम के साए से बाहर निकली कांग्रेस शहर का ‘प्रथम नागरिक’ बनवा कर फूली नहीं समा रही।

अपने ही घर में लगातार मात खा रहे हैं ज्योतिरादित्य सिंधिया

ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कांग्रेस छोड़ कर कमलनाथ के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार को धराशाई कर दिया था। दलबदल के बाद भाजपा की शिवराज सरकार  बन गई, लेकिन उप चुनाव में सिंधिया को अपने ही घर में मात खाना पड़ी।

तब ग्वालियर जिले की तीन में से दो सीटों पर सिंधिया के प्रत्याशी हार गए थे। इनमें से एक सीट तो ग्वालियर पूर्व है जहां खुद सिंधिया का महल है। इस सीट पर ही शोभा के पति सतीश ने जीत दर्ज़ की थी।

इस उप चुनाव में ग्वालियर चंबल में कुल 9 सीटों पर कांग्रेस जीती थी। सिंधिया के कांग्रेस छोड़ने पर ऐसा दावा किया गया था कि अब कांग्रेस यहां खत्म हो जाएगी जबकि हुआ इसके उलट। महल की छाया से निकल कर कांग्रेस हरियाने लगी है।

लोकसभा चुनाव अपने ही कार्यकर्ता से हारे

ज्योतिरादित्य सिंधिया अपने पिता माधवराव सिंधिया के सन 2001 में असामयिक निधन के बाद सक्रिय राजनीति में आए। गुना शिवपुरी संसदीय क्षेत्र से पहली बार 2002 में सांसद बने। 2004, 2009, 2014 में भी जीते और दो बार केंद्र में मंत्री बने।

सन 2019 के लोकसभा चुनाव में वे अपने ही एक पूर्व सहयोगी डॉ के पी यादव से चुनाव हार गए। यादव पहले कांग्रेस में ही थे। बाद में भाजपा में शामिल हो गए और सिंधिया को हरा कर चौंकाया।

सिंधिया ने 2018 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की जीत के बाद मुख्यमंत्री बनने के लिए जोर आजमाइश की, लेकिन तब उनके साथ एक दर्जन विधायक ही थे और ज्यादा विधायक साथ होने पर कमलनाथ मुख्यमंत्री बन गए। सन 2020 में सिंधिया ने कांग्रेस छोड़ कर भाजपा का दामन थाम लिया।

फिलवक्त ग्वालियर में महापौर पद पर भाजपा की हार से सिंधिया के लिए असहज स्थिति बन गई है।

पार्टी में उनकी आमद के बाद से अंदर ही अंदर कसमसा रहे कुछ दिग्गज इस मौके को अपने हिसाब से भुनाने की कोशिश कर सकते हैं।

मध्य प्रदेश में अगले साल होने वाले विधानसभा तक सिंधिया की सियासत का ऊंट किस करवट बैठता है यह भविष्य के गर्त में है।

डॉ राकेश पाठक

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

Congress mayor after 57 years in Gwalior.

एक क्लिक में आज की बड़ी खबरें । 03 जुलाई 2022 की खास खबर

headlines breaking news

ब्रेकिंग : आज भारत की टॉप हेडलाइंस | दिन भर की खबर | आज की खबर | भारत समाचार |शीर्ष समाचार| हस्तक्षेप समाचार

Top headlines of India today. Today’s big news 03 July 2022

कोविड-19 अपडेट : पिछले 24 घंटों में 16,103 नए मामले सामने आए

भारत में कोविड-19सक्रिय मरीजों की संख्या 1,11,711 है, जबकि सक्रिय मामलों की दर 0.26 प्रतिशत है। स्वस्थ होने की वर्तमान दर 98.54 प्रतिशत है।

लक्ष्मण रेखा लांघ रहा है मीडिया, सोशल और डिजिटल मीडिया का नियमन जरूरी – जस्टिस पारदीवाला

मीडिया रिपोर्ट्स में बताया गया है कि सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस जेबी पारदीवाला ने कहा है कि मीडिया लक्ष्मण रेखा को लांघ रहा है और इसीलिए संसद को डिजिटल और सोशल मीडिया के लिए समुचित कानून बनाने पर विचार करना चाहिए।

मणिपुर : भूस्खलन से मरने वालों की संख्या बढ़कर 37 हुई, 28 लापता

प्राप्त जानकारी के मुताबिक मणिपुर के नोनी जिले में एक रेलवे निर्माण स्थल पर बीते गुरुवार को हुए विनाशकारी भूस्खलन में मरने वालों की संख्या बढ़कर 37 हो गई, जिसमें 24 प्रादेशिक सेना के जवान शामिल हैं।

आज रविवार को और शव बरामद किए गए, जबकि प्रतिकूल मौसम की स्थिति के बीच तलाशी अभियान जारी था।

भारत में मई महीने में 46 हजार से ज्यादा ट्विटर अकाउंट पर लगा बैन

माइक्रोब्लॉगिंग प्लेटफॉर्म ट्विटर ने अपनी मासिक शिकायत रिपोर्ट में कहा कि मई में दिशानिर्देशों के उल्लंघन के कारण 46,000 से अधिक भारतीय ट्विटर अकाउंट को बैन किया गया है।

4 जुलाई को सीबीएसई 10वीं बोर्ड के नतीजे आने की संभावना

केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड यानी सीबीएसई 10वीं कक्षा बोर्ड के नतीजे कल सोमवार यानी 4 जुलाई को आ सकते हैं। सीबीएसई को 10वीं और 12वीं दोनों ही कक्षाओं के लिए अंतिम परिणाम जारी करना है। 10वीं बोर्ड के बाद अगले सप्ताह सीबीएसई 12वीं कक्षा के बोर्ड नतीजे घोषित किए जाएंगे।

महाराष्ट्र : भाजपा के राहुल नार्वेकर बने विधानसभा के नए अध्यक्ष

भारतीय जनता पार्टी के विधायक राहुल नार्वेकर रविवार को महाराष्ट्र विधानसभा के नए अध्यक्ष चुने गए।

भाजपा ने उर्दू में किया ट्वीट, टीआरएस ने गुजराती में दिया जवाब

सोशल मीडिया पर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) के बीच हुए ट्वीट वार ने रविवार को एक नया मोड़ ले लिया, जब भाजपा ने तेलंगाना की सत्ताधारी पार्टी के हमले का मुकाबला करने के लिए उर्दू भाषा का इस्तेमाल किया।

पाकिस्तान : सेना की आलोचना करने पर पत्रकार अयाज आमिर पर हुआ हमला?

सेना और इमरान खान के बीच बढ़ती दरार के साथ, अब सेना की आलोचना करने वालों को निशाना बनाया जा रहा है।

कोलंबिया में मंकीपॉक्स के 5 मामले आए

कोलंबिया में मंकीपॉक्स के दो नए मामलों का पता चला है, जिससे देश में कुल मामलों की संख्या पांच हो गई है।

खबरों में : बिल गेट्स, सावधि जमा, भारत, ब्याज दर, करिकुलम विटे, Finance, माइक्रोसॉफ़्ट, साईबर अपराध.

अग्निपथ – संविदा-सैनिक योजना : सुधारों की स्वाभाविक परिणति!

dr. prem singh

यह सही है कि अग्निपथ भर्ती योजना संविदा-सैनिक योजना है. यानि 17 से 21 साल की उम्र के युवाओं को चार साल के लिए ठेके पर सेना में भर्ती किया जाएगा. अभी तक सैनिकों को मिलने वाली सुविधाएं और सामाजिक सुरक्षा के वे हकदार नहीं होंगे. (योजना का बड़े पैमाने पर, और काफी जगह हिंसक विरोध के होने के बाद जिन रियायतों की बात की जा रही है, वह सरकार का उत्तर-विचार (आफ्टर थॉट) है. उसका यह उत्तर-विचार कितना टिकेगा, कहा नहीं जा सकता.)

ठेके की नियुक्ति किस तरह की होती है, देश को इसका पिछले 20-25 साल का लम्बा अनुभव हो चुका है. इस बीच सभी दलों की सरकारें सत्ता में रह चुकी हैं. लिहाज़ा, उस ब्यौरे में जाने की जरूरत नहीं है. जरूरत यह देखने की है कि जब शिक्षा, स्वास्थ्य, सफाई सहित हर क्षेत्र में संविदा-भर्ती पर लोग काम कर रहे हैं, तो सेना की बारी भी एक दिन आनी ही थी.

अग्निपथ भर्ती योजना का आकांक्षियों द्वारा विरोध समझ में आने वाली बात है. लेकिन विपक्षी नेताओं, बुद्धिजीवियों और नागरिक समाज एक्टिविस्टों के विरोध का क्या आधार है?

नियुक्तियों में ठेका-प्रथा नवउदारवादी सुधारों की देन है और हर जगह व्याप्त देखी जा सकती है. (दो दिन पहले एक पत्रकार मित्र ने मुझे संविदा-शिक्षण पर एक आलेख लिखने का जिम्मा सौंपा. प्राथमिक विद्यालयों से लेकर कालेजों तक संविदा-शिक्षण की व्याप्ति का उल्लेख करते हुए मैंने जल्दी ही उन्हें आलेख भेज दिया. शिक्षा के क्षेत्र से जुड़ा होने के चलते मुझे आलेख तैयार करने में जरा भी मुश्किल का सामना नहीं करना पड़ा. संविदा-शिक्षण संबंधी समस्त ब्यौरा हाथ पर रखे आंवले की तरह उपलब्ध था.)

क्या सेना में संविदा-भर्ती का विरोध करने वाले ये लोग नवउदारवादी सुधारों के विरोधी रहे हैं? अगर हां, तो पूरे देश में इतने बड़े पैमाने पर स्थायी नियुक्तियों की जगह संविदा नियुक्तियों ने कैसे ले ली? अगर यह मान लिया जाए कि उन्हें अंदेशा नहीं था कि मामला सेनाओं में संविदा-नियुक्तियों तक पहुंच जाएगा, तो क्या अब वे इस संविधान-विरोधी प्रथा का मुकम्मल विरोध करेंगे?

यानि सुधारों के नाम पर जारी नवउदारवादी अथवा निगम पूंजीवादी सरकारी नीतियों का विरोध करेंगे?

अगर वे पिछले तीन दशकों से देश में जारी इस नव-साम्राज्यवादी हमले को नहीं रोकते हैं, तो उसकी चपेट से सेना को नहीं बचाया जा सकता. फिर वे किस आधार पर योजना के खिलाफ आंदोलनरत युवाओं को ‘फर्जी राष्ट्रवादियों’ से सावधान रहने की नसीहत दे रहे हैं?        

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, उनके पितृ-संगठन और ‘नवरत्नों’ के सेना के बारे विचित्र विचार सबके सामने रहते हैं – व्यापारी सैनिकों से ज्यादा खतरा उठाते हैं, भारत की सेना के पहले ही आरएसएस की सेना शत्रु के खिलाफ मोर्चे पर पहुंच जाएगी और फतह हासिल कर लेगी, शत्रु की घातों को नाकाम करने के लिए बंकरों को गाय के गोबर से लीपना चाहिए, सैनिकों को प्रशिक्षण और अभ्यास की जगह वीरता बनाए रखने के लिए गीता-रामायण का नियमित पाठ करना चाहिए, शत्रु को मुंह-तोड़ जवाब देने के लिए इतने इंच का सीना होना चाहिए, इतने सिरों का बदला लेने के लिए शत्रु के इतने सिर लेकर आने चाहिए, आरएसएस/भाजपा राज में भारत फिर से महान और महाशक्ति बन चुका है, अब ‘अखंड भारत’ का सपना साकार करने से कोई नहीं रोक सकता … और न जाने क्या-क्या! ऐसे निज़ाम से सेना, वीरता और युद्ध के बारे में किसी गंभीर विमर्श या पहल की आशा करना बेकार है.

लेकिन सेना के वरिष्ठतम अधिकारियों के बारे में क्या कहा जाए? यह सही है कि लोकतंत्र में सेना नागरिक सरकार के मातहत काम करती है. इस संवैधानिक कर्तव्य को बनाए रखने में ही सेना का गौरव है. हालांकि, महत्वपूर्ण और नाजुक मुद्दों पर कम से कम अवकाश-प्राप्त सैन्य अधिकारियों को समय-समय पर अपने विवेक से राष्ट्र को निर्देशित करना चाहिए.

सरकार ने अग्निपथ भर्ती योजना की पैरवी के लिए बड़े सैन्य अधिकारियों को आगे किया है. निश्चित ही इस रणनीति का भावनात्मक वजन है. तीनों सेनाओं के प्रमुखों ने समस्त विरोध के बावजूद अग्निपथ भर्ती योजना की शुरुआत की घोषणा कर दी है. यह भी स्पष्ट कह दिया है कि योजना के विरोध के दौरान हिंसक गतिविधियों में शामिल युवाओं को अग्निवीर बनने का अवसर नहीं दिया जाएगा. उन्होंने इसे सैन्य अधिकारियों द्वारा सुविचारित योजना बताते हुए सेना में युवा जोश शामिल करने का तर्क दिया है.

बेहतर होता उनके मुताबिक इस सुविचारित योजना के बन जाने के बाद उस पर थोड़ा पब्लिक डोमेन में भी विचार हो जाता. तब शायद योजना के हिंसक प्रतिरोध की नौबत नहीं आती.

सवाल उठता है कि अगर सेना में युवा जोश इतना ही जरूरी है कि उसके लिए हर चार साल बाद नया खून चाहिए, जैसा कि तीनों सेना प्रमुख एवं कुछ अन्य वरिष्ठ सैन्य अधिकारी कह रहे हैं, तो सेना की अफसरशाही में भी यह जोश दाखिल करना चाहिए. सेना के बड़े अफसरों को सब कुछ उपलब्ध है. वे स्वैच्छिक अवकाश लें और नए अफसरों को अपनी जगह लेने दें. नए अफसरों ने उनकी योग्य कमान में हर जरूरी जिम्मेदारी सम्हालने का प्रशिक्षण और कौशल हासिल किया ही होगा. वैसे भी वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों के लिए सरकारों में कई महत्वपूर्ण पद इंतजार कर रहे होते हैं. निगम-भारत में कारपोरेट घराने भी उनका बढ़िया ठिकाना हो सकते हैं.

सैन्य अधिकारियों के साथ न्याय करते हुए यह माना जा सकता है कि इस योजना पर आग्रह बना कर वे केवल चुनी हुई सरकार के आदेश का पालन नहीं कर रहे हैं. योजना को उनका अपना भी सोचा-समझा समर्थन है.

जिस तरह से देश का राजनीतिक और बौद्धिक नेतृत्व नवउदारवाद का समर्थक है, उसका प्रभाव सैन्य नेतृत्व पर भी पड़ना स्वाभाविक है. जिस तरह सिविल मामलों में पुरानी व्यवस्था के तहत अपनी ताकत हासिल करने वाले अधिकारीगणों को संविदा-भर्ती में खटने वाले युवा-अधेड़ों की पीड़ा नज़र नहीं आती, उसी तरह सैन्य अधिकारियों को भी लग सकता है कि सेना का काम बिना दीर्घावधि सेवा (और उसके साथ जुड़ी सुविधाओं के) वाले सैनिकों से चल सकता है. तीनों सेनाओं के लेफ्टिनेंट जनरल अनिल पुरी, जो सैन्य मामलों के विभाग में अतिरिक्त सचिव हैं, ने गम्भीरात्पूर्वक बताया है कि उन्होंने अडानी, अम्बानी और कारपोरेट घरानों से अच्छी तरह बात कर ली है कि वे अग्निवीरों को अपने यहां नौकरी देंगे! यानि देश का युवा खून एक ऐसी सस्ती चीज़ है जिसे जो चाहे इस्तेमाल करके फेंक सकता है.    

अग्निपथ भर्ती योजना के खिलाफ आंदोलनरत युवाओं को क्या कहा जाए, कुछ समझ नहीं आता है. हमारी पीढ़ी के लोग उनके अपराधी हैं. यही कहा जा सकता है कि उनका आंदोलन सही है, हिंसा नहीं.

कई युवा आन्दोलनकारियों ने किसान आंदोलन का हवाला दिया है. उनकी स्थिति ऐसी नहीं है कि वे एक और लम्बा आंदोलन खड़ा कर सकें. उन्हें समझना होगा कि किसान आंदोलन की फसल भी नवउदारवादी काट कर ले गए. किसान आंदोलन के दौरान जिन लोगों पर मुकद्दमे दायर हुए थे, उन्हें अभी तक वापस नहीं लिया गया है. आपके अभी दूध के दांत हैं, और सरकार ने आपके सामने सेना को खड़ा कर दिया है, जिसका आदेश है कि प्रत्येक आकांक्षी को लिख कर देना होगा कि वे हिंसक प्रतिरोध में शामिल नहीं थे. आप में जिनके खिलाफ मामले दर्ज हो चुके हैं, वे अपने कैरियर की फ़िक्र करें. जो आपको ‘अपने बच्चे’ बताते हैं या जो अग्निपथ योजना का विरोध और आपका समर्थन करने वाले हैं, आपके भविष्य के साथी बनेंगे, ऐसा नहीं लगता है. आपके सामने पूरा भविष्य पड़ा है.

प्रेम सिंह

(समाजवादी आन्दोलन से जुड़े लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व शिक्षक और भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला के पूर्व फेलो हैं)    

प्रेम सिंह

(समाजवादी आन्दोलन से जुड़े लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व शिक्षक और भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला के पूर्व फेलो हैं)    

Web title : Agneepath – Samvida-Sainik Yojana: The natural culmination of reforms!

सबकी खबर ले, सबकी खबर दे वाला जनसत्ता अपने ही पत्रकार की मृत्यु की खबर न दे पाया

press freedom

प्रताप सिंह जी ने व्हाट्सएप पर सतीश पेडणेकर के निधन की खबर (news of the death of Satish Pednekar) दी।

हम 1980 से 2016 तक लगातार अखबार का संस्करण निकलते रहे हैं। यह बहुत चुनौतीपूर्ण काम है और इसकी जवाबदेही बड़ी होती है। अखबार कितना ही अच्छा निकले, उसकी तारीफ हो या न हो, कहीं कोई चूक हो जाती है तो खाल उधेड़ दी जाती है। यह बहैसियत एक संपादक हर खबर पर स्टैंड लेने का मामला जितना है, पूरी टीम को साथ लेकर चलने का मामला उससे बड़ा है।

अखबार में बतौर संपादक जिनका नाम छपता है, संपादकीय लिखने और नीतियां तय करने तक उनकी भूमिका सीमित हो जाती है। सारा खेल डेस्क के जिम्मे होता है।

सतीश पेडणेकर जी जनसत्ता को डेस्क से आकार और तेवर देने वाले पत्रकार थे। प्रताप जी की सूचना के बाद कहीं कोई चर्चा नहीं देखी। अब अमित जी का यह पोस्ट।

हमारी बात अलग है कि हर मुद्दे, हर खबर पर मैनेजमेंट से हमारा सीधा टकराव हो जाता था और हम जो सही समझते थे, वही करते थे। मालिक मैनेजर किसी की नहीं सुनते थे। सतीश जी निर्विवाद व्यक्ति थे।

सतीश पेडणेकर जैसे महत्वपूर्ण व्यक्ति के निधन की खबर जनसत्ता में न होना, जिन्होंने जनसत्ता को जनसत्ता बनाया, बताता हैं कि पत्रकारिता का किस हद तक पतन हुआ और इसमें काम करने वाले लोग कितने संवेदनाहीन हो गए हैं।

हमने प्रभाष जी और ओम थानवी के खिलाफ, उनकी नीतियों के खिलाफ हंस और समयांतर समेत समाचार पोर्टल पर तब लिखा, जब वे सर्वेसर्वा थे। देश भर में सामाजिक आंदोलन में शामिल होते रहे। लेकिन तब जनसत्ता में हम सब की स्वतंत्रता और स्वायत्तता का माहौल इतना जबर्दस्त था कि न प्रभाष जी और न थानवी जी ने हमें कभी रोका, टोका। हम लोगों में बरसों तक बोलचाल बन्द रहती थी। सभी अपने स्टैंड से टस से मस नहीं होते थे लेकिन अखबार निकलने में हमेशा एक टीम बने रहे। ऐसे अखबार में अपने पुराने साथियों के प्रतिन ऐसे अमानुषिक बर्ताव से स्तंभित हूं।

चौथाई सदी हमने आखिर इस अखबार में खफा दिए। सतीश जी के शुरू से साथी रहे अमित जी का लिखा दरअसल हिंदी पत्रकारिता की शोक वृत्तांत है। लीजिए, पढ़ लीजिए।

अफसोस कि ‘जनसत्ता’ में तीन दशक खपाने वाले पत्रकार के निधन की खबर तक नहीं अमित प्रकाश सिंह

हिंदी दैनिक “जनसत्ता” वाकई दुर्दिन में है। इस दैनिक में नींव से इमारत तक बनाने वाले पत्रकारों के निधन की खबर भी आज इसके संपादक नहीं छपने देते। सतीश पेंडरेकर जनसत्ता की शुरुआती संपादकीय टीम में थे। वे काबिल थे इसीलिए दिल्ली जनसत्ता में चुने गए। वे योग्य थे तभी वे मुंबई संस्करण शुरू कराने भेजे गए। वे काबिल थे इसी लिए उन्हें संझा संस्करण का संपादक बनाया गया। योग्य वे जरूर थे इसलिए वे नई दिल्ली जनसत्ता में विशेष संवाददाता भी बने।

काम करने की अट्ठावन साल की उम्र आते ही वे सेवा निवृत्त हुए। छह जून 2022 को उन्होंने दिल्ली में ही अंतिम सांस ली। लेकिन उनकी खबर जनसत्ता में छापी नहीं गई।

किसी दैनिक को कामयाब करने में उस टीम की जरूरत होती है जो मुख्य संपादक के इशारों को समझते हुए परिश्रम करे। जब अखबार जम जाता है तो हर आदमी, जो उस अखबार से जुडा होता है खुद को संपादक भी मानता है और खुश होता है।

कोई अखबार सिर्फ चित्र, कार्टून, विचार और खबर के बल पर बाजार में नहीं टिकता। उसका जुड़ाव पेंदीदार बुद्धिजीवियों, लेखकों से होना जरूरी है। प्रभाष जोशी यह गणित जानते थे। इसलिए हर दम्भी लेखक, सामाजिक कार्यकर्ता और पत्रकार को उन्होंने अपने तरीके से चुना।

अखबार यदि धनी-मानी लोग निकाल पाते तो हिन्दी के अखाड़े में दिल्ली शहर में हजार स्तरीय अखबार होते। अखबार निकालना यदि प्रबंधकों के बस में होता तो हर प्रबंधक खुद अपना नाम संपादक के रूप में डालता और बाजार में कामयाब होता। हालांकि आज कुछ अपवाद संभव हैं।

बहरहाल जनसत्ता का झुकाव शुरू से समाज संस्कृति और रचनाकारों के साथ जुडाव का था। इनसे जुडे लोग संपादकीय टीम में भी थे। लेकिन वह परम्परा ‘जनसत्ता ‘के बाजार में कामयाब होने के बाद गड़बड़ाने लगी। इस पर प्रबंधक और मालिक तब हावी हो गए जब रामनाथ गोयनका ने अपनी देह छोड़ी। अखबार के कई संस्करण निकले और प्रबंधकों और मालिकों का दखल खूब बढ़ने लगा। संपादकीय टीम के पुराने लोगों ने प्रतिरोध किया लेकिन उनकी ज्यादा नहीं चली। सब जानते हैं कि कैसे इस अखबार को समाप्त किया गया। और मंजिल दूर भी नहीं।

दिल्ली छोड़ लगभग अन्य शहरों के सारे संस्करण सिमट चुके हैं। दिल्ली को भी सिमटाने में टीम जुटी है। पर सिंधु घाटी का दबा इतिहास खोदने वाले जुटें, इसके पहले यह इच्छा तो होती ही है कि हमारा काम न सही पर मरने पर नाम तो काश उस अखबार में छपा होता जिसमें अपनी जवानी दे दी। लेकिन जनसत्ता के मालिक, प्रबंधक और संपादक इस तथ्य के लिए हमेशा याद किए जाएंगे कि कैसे अपने स्वार्थों के लिए इन्होंने दूसरे परिश्रमी सहयोगियों के नाम और काम को बतौर सूचना भी उनके दिवंगत हो जाने पर छपने नहीं दिए।

सोचिए, जनसत्ता संपादकीय में चाकरी कर रहे उस सहयोगी के अपने बच्चे, युवा और रिश्तेदार और मित्र क्या सोचते होंगे ? अपने, पापा या मम्मी के निधन के बाद जब उनके बारे में उस अख़बार में कोई खबर नहीं मिलती जिसमें काम के लिए भागने की बेचैनी में वे उनके साथ कभी बैठ नहीं पाते थे! क्या यह शर्मनाक नहीं है बंधु । ————————-अमितप्रकाश सिंह———–“

पलाश विश्वास

भारत में मौत की जाति 

national news

Death caste in India!

क्या मौत की जाति भी होती है?

यह कहना अजीब लग सकता है कि भारत में पैदा हुआ आदमी कितना लंबा जीवन जिएगा, यह इससे तय हो जाता है कि उसने किस जाति में जन्म लिया है। लेकिन यही सच है।

Adivasis, Dalits, Muslims have lowest mean age of death among Indians, reveals report

चर्चित अर्थशास्त्री वाणीकांत बोरा (economist Vani Kant Borooah) का इससे संबंधित एक विस्तृत शोध “Caste, Religion, and Health Outcomes in India, 2004-14” से किया था, जो वर्ष 2018 में इकोनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली में प्रकाशित हुआ था।

नेशनल सेंपल सर्वे (2004-2014) पर आधारित अपने इस शोध में उन्होंने वर्ष 2004 से 2014 के बीच भारतीयों की मृत्यु के समय औसत आयु का अध्ययन (Study of the mean age at death of Indians between 2004 and 2014) किया।

यह अध्ययन बताता है कि भारत में ऊंची कही जाने वाले जातियों और अन्य पिछड़ी, दलित, आदिवासी जातियों की औसत उम्र में बहुत अंतर है।

सामान्यत: आदिवासी समुदाय से आने वाले लोग सबसे कम उम्र में मरते हैं, उसके बाद दलितों का नंबर आता है, फिर अन्य पिछड़ा वर्गों का। एक औसत सवर्ण हिंदू इन बहुजन समुदायों से बहुत अधिक वर्षों तक जीता है।

2014 में आदिवासियों की मृत्यु के समय औसत उम्र 43 वर्ष, अनुसूचित जाति की 48 वर्ष, मुसलमान ओबीसी  की 50 वर्ष और हिंदू ओबीसी की 52 वर्ष थी, जबकि इसी वर्ष उच्च जाति के लोगों (हिंदू व अन्य गैर-मुसलमान) की औसत उम्र 60 वर्ष थी।

आश्चर्यजनक रूप से ऊंची जाति के मुसलमानों की औसत उम्र ओबीसी मुसलमानों से एक वर्ष कम थी (चार्ट देखें)।

भारत में विभिन्न सामाजिक समूहों की औसत आयु, 2004 और 2014

सामाजिक समूह 2004 में औसत आयु 2014 में औसत आयु
उच्च जाति (गैर-मुसलमान) 55 60
ओबीसी (गैर-मुसलमान) 49 52
ओबीसी मुसलमान 43 50
उच्च जाति मुसलमान 44 49
अनुसूचित जाति 42 48
अनुसूचित जनजाति 45 43

2004 से 2014 के बीच के 10 सालों में सवर्ण हिंदू की औसत उम्र 5 साल, हिंदू ओबीसी की 5 साल,  मुसलमान ओबीसी की 7 साल, ऊँची जाति के मुसलमान की 5 साल और अनुसूचित जाति की 6 साल बढ़ी। लेकिन, इस अवधि में अनुसूचित जनजाति की औसत उम्र 2 वर्ष कम हो गई।

बताने की आवश्यकता नहीं कि आदिवासियों की औसत उम्र का कम होना देश के विकास की किस दिशा की ओर संकेत कर रहा है।
स्त्रियों को केंद्र में रखकर इसी प्रकार का एक और शोध इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ दलित स्टडीज (Indian Institute of Dalit Studies) द्वारा 2013 में भी किया गया था, जिसे बाद में संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी अपने स्त्रियों संबंधी एक विशेष अंतराष्ट्रीय अध्ययन में उद्धृत किया था।

इस शोध में पाया गया था कि पुरुषों और स्त्रियों की औसत उम्र में बहुत फर्क है। स्त्रियों में जाति के स्तर पर जो फर्क है, वह और भी चिंताजनक है।

शोध बताता है कि औसतन दलित स्त्री उच्च जाति की महिलाओं से 14.5 साल पहले मर जाती  है। 2013 में दलित महिलाओं की औसत आयु  में 39.5 वर्ष थी जबकि ऊँची जाति की महिलाओं की 54.1 वर्ष।

इसी तरह, एक ‘पिछड़े’ या कम विकसित राज्य में रहने वाले और विकसित राज्य में रहने वाले लोगों की औसत उम्र में बड़ा फर्क है। “पिछड़े राज्यों” के लोगों की औसत उम्र सात साल कम है। विकसित राज्य में रहने वाले लोगों की औसत उम्र 51.7 वर्ष है, जबकि पिछड़े राज्यों की 44.4 वर्ष।

हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि उच्च जातियों के सभी लोग 60 वर्ष जीते हैं और बहुजन तबकों के 43 से 50 साल। लेकिन अध्ययन बताता है कि भारत में विभिन्न सामाजिक समुदायों की “औसत उम्र” में बहुत ज्यादा फर्क है। 

इस शोध से सामने आए तथ्यों से भारत में मौजूद भयावह सामाजिक असमानता उजागर होती है तथा हमें सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हमारे विकास की दिशा ठीक है? क्या सामाजिक रूप से कमजोर तबकों के कथित कल्याण के लिए राज्य द्वारा उठाए गए कदम पर्याप्त हैं?

-प्रमोद रंजन

[प्रमोद रंजन असम विश्वविद्यालय के रवीन्द्रनाथ टैगोर स्कूल ऑफ़ लैंग्वेज एंड कल्चरल स्टडीज़ में सहायक प्रोफ़ेसर हैं। ]

सस्ती बिजली देने वाले सरकारी प्रोजेक्ट्स से थर्मल बैकिंग पर वर्कर्स फ्रंट ने जताई नाराजगी

दिनकर कपूर Dinkar Kapoor अध्यक्ष, वर्कर्स फ्रंट

प्रदेश सरकार की ऊर्जा नीति को बताया कारपोरेट हितैषी

Workers Front expressed displeasure over thermal backing from government projects giving cheap electricity

लखनऊ 18 मई 2022. प्रदेश में जारी बिजली संकट और इनर्जी एक्सचेंज से बेहद महंगी दर से कारपोरेट बिजली कंपनियों से बिजली खरीदने के दरम्यान कल बेहद सस्ती बिजली देने वाले अनपरा तापीय परियोजना से 250 मेगावाट की थर्मल बैकिंग के औचित्य पर सवाल खड़ा करते हुए वर्कर्स फ्रंट अध्यक्ष दिनकर कपूर ने कहा इसका मकसद ऊर्जा नीति एवं समझौतों का हवाला देकर कारपोरेट बिजली कंपनियों को अरबों रुपये का मुनाफा पहुंचाने का है जोकि प्रदेश एवं राष्ट्र हित में कतई नहीं है।

उन्होंने कहा कि दरअसल उत्तर प्रदेश की ऊर्जा नीति और बिजली अधिनियम-2003 में जो प्रावधान हैं उसका मकसद ही ऊर्जा क्षेत्र में कारपोरेट सेक्टर को तरजीह देने का है जो और कुछ नहीं बल्कि पब्लिक सेक्टर के इंफ्रास्ट्रक्चर को कारपोरेट के अधीन करना और उसके हवाले करने का है।

उन्होंने आगे आरोप लगाया कि कारपोरेट बिजली कंपनियों की मुनाफाखोरी व लूट को अंजाम देने वाली नीतियों से ही आज प्रदेश समेत देश भर के सरकारी बिजली बोर्ड भारी घाटे में हैं और आम जनता को महंगी बिजली मिल रही है। अगर ऊर्जा क्षेत्र में पब्लिक सेक्टर को मजबूत बनाने की नीति अमल में लायी जाती तो आज कोयला व बिजली उत्पादन में देश आत्मनिर्भर होता और बिजली संकट न होता बल्कि जनता को सस्ती बिजली भी मुहैया होती। लेकिन इन नीतियों में बदलाव करने के बजाय मोदी सरकार बिजली अधिनियम-2021 को पारित करने के लिए आमादा है। जिससे न सिर्फ डिस्कॉम का संपूर्ण इंफ्रास्ट्रक्चर कारपोरेट सेक्टर के अधीन/हवाले करने का मार्ग प्रशस्त होगा बल्कि बिजली की दरों में भी भारी इजाफा होगा।

दाँतों के बेहतर उपचार में मदद करेंगे स्वदेशी नैनो रोबोट

tiny bots

Indigenous nano robots will help in better treatment of teeth

नई दिल्ली, 18 मई (इंडिया साइंस वायर): चुंबकीय क्षेत्र का उपयोग करके विकसित किए गए नैनो-आकार के रोबोट (nano-sized robots) अब दंत नलिकाओं के अंदर बैक्टीरिया (bacteria inside the dental tubules) को मारने में मदद कर सकते हैं, और रूट कैनाल उपचार की सफलता की दर (Root canal treatment success rate) को बढ़ा सकते हैं।

भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc) और इसके द्वारा इनक्यूबेटेड स्टार्टअप – थेरानॉटिलस के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए एक नये अध्ययन में यह बात उभरकर आयी है।

रूट कैनाल ट्रीटमेंट कैसे किया जाता है?

दाँतों के संक्रमण के इलाज के लिए रूट कैनाल प्रक्रिया (root canal procedure) नियमित उपचार का एक अहम हिस्सा है। इस प्रक्रिया में दाँत के भीतर संक्रमित नरम ऊतकों को हटाना, जिसे पल्प कहा जाता है, और संक्रमण का कारण बनने वाले बैक्टीरिया को मारने के लिए एंटीबायोटिक या रसायनों के साथ दाँत को फ्लश किया जाता है। लेकिन, कई बार यह उपचार बैक्टीरिया को पूरी तरह से हटाने में विफल रहता है।

एंटरोकोकस फ़ेकलिस (Enterococcus faecalis) जैसे एंटीबायोटिक-प्रतिरोधी बैक्टीरिया इनमें विशेष रूप से शामिल हैं, जो दाँतों की माइक्रोस्कोपिक कैनाल (दंत नलिकाओं) के भीतर छिपे रहते हैं, जिन्हें डेंटिनल ट्यूबल (dentinal tubules) कहा जाता है।

“दंत नलिकाएं बहुत छोटी होती हैं, और बैक्टीरिया ऊतकों में गहरे छिपे रहते हैं।

आईआईएससी के सेंटर फॉर नैनो साइंस ऐंड इंजीनियरिंग (CeNSE) के रिसर्च एसोसिएट और थेरानॉटिलस के सह-संस्थापक, शनमुख श्रीनिवास बताते हैं – “वर्तमान में प्रचलित तकनीक पूरी तरह से भीतर पहुँचकर बैक्टीरिया को मारने के लिए पर्याप्त कुशल नहीं हैं।”

शोध पत्रिका एडवांस्ड हेल्थकेयर मैटेरियल्स में प्रकाशित इस अध्ययन में, शोधकर्ताओं ने आयरन के साथ लेपित सिलिकॉन डाइऑक्साइड से बने हेलीकल नैनोबोट (Helical nanobots made of silicon dioxide coated with iron) तैयार किए हैं, जिन्हें कम तीव्रता वाले चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न करने वाले डिवाइस का उपयोग करके नियंत्रित किया जा सकता है।

इन नैनोबॉट्स को निकाले गए दाँत नमूनों में इंजेक्ट किया गया है, और शोधकर्ताओं ने माइक्रोस्कोप का उपयोग करके उनके मूवमेंट को ट्रैक किया है।

चुंबकीय क्षेत्र की आवृत्ति को कम करके, शोधकर्ता नैनोबॉट्स को आवश्यकतानुसार स्थानांतरित करने में सक्षम थे, और दाँतों की नलिकाओं के अंदर गहराई से प्रवेश कर सकते थे।

श्रीनिवास कहते हैं, “हमने यह भी दिखाया है कि हम उन्हें पुनः प्राप्त कर सकते हैं, और उन्हें रोगी के दाँतों से वापस खींच सकते हैं।”

महत्वपूर्ण रूप से, शोधकर्ताओं को नैनोबॉट्स के चुंबकीय क्षेत्र में परिवर्तन करके उसकी सतह पर गर्मी उत्पन्न करने में सफलता मिली है, जो आसपास के बैक्टीरिया को मार सकती है।

सेंटर फॉर नैनो साइंस ऐंड इंजीनियरिंग के रिसर्च एसोसिएट और थेरानॉटिलस के एक अन्य सह-संस्थापक देबयान दासगुप्ता कहते हैं, ”बाजार में उपलब्ध कोई अन्य तकनीक अभी ऐसा करने में सक्षम नहीं है।”

पहले वैज्ञानिकों ने रूट कैनाल उपचार की दक्षता में सुधार के उद्देश्य से बैक्टीरिया और ऊतक अपशिष्ट को बाहर निकालने के लिए उपयोग किए जाने वाले तरल पदार्थ में शॉकवेव पैदा करने के लिए अल्ट्रासाउंड या लेजर तरंगों का उपयोग किया है। लेकिन, ये तरंगें केवल 800 माइक्रोमीटर की दूरी तक ही प्रवेश कर सकती हैं, और उनकी ऊर्जा तेजी से नष्ट हो जाती है। जबकि, नैनोबॉट 2,000 माइक्रोमीटर तक तक प्रवेश कर सकते हैं। शोधकर्ताओं का कहना है कि बैक्टीरिया को मारने के लिए गर्मी का उपयोग हानिकारक रसायनों या एंटीबायोटिक दवाओं का एक सुरक्षित विकल्प भी प्रदान करता है।

शोधकर्ताओं ने चूहों के मॉडल में दंत नैनोबॉट्स का परीक्षण किया और उन्हें सुरक्षित और प्रभावी पाया है। वे एक नये प्रकार के चिकित्सा उपकरण को विकसित करने पर भी काम कर रहे हैं, जो आसानी से मुँह के अंदर फिट हो सकते हैं, और दंत चिकित्सक को रूट कैनाल उपचार के दौरान दाँतों के अंदर नैनोबॉट्स को इंजेक्ट और उनमें बदलाव करने में सक्षम बनाते हैं।

सेंटर फॉर नैनो साइंस ऐंड इंजीनियरिंग के प्रोफेसर अंबरीश घोष कहते हैं, “हम इस तकनीक को क्लिनिकल सेटिंग में लागू करने के बहुत करीब हैं, जिसे तीन साल पहले तक भविष्य की प्रौद्योगिकी माना जाता था।” “यह देखना खुशी की बात है कि कैसे एक साधारण वैज्ञानिक जिज्ञासा एक चिकित्सा हस्तक्षेप के रूप में आकार ले रही है, जो सिर्फ भारत में ही लाखों लोगों को प्रभावित कर सकती है।”

(इंडिया साइंस वायर)

Topics: Tiny bots, teeth cleaning, Nano robots, magnetic field, bacteria, Theranautilus, CeNSE

ज्ञानवापी मस्जिद के अंदर सर्वे : मीडिया और न्यायपालिका के सांप्रदायिक हिस्से के गठजोड़ से देश का माहौल बिगाड़ने की हो रही है कोशिश

shahnawaz alam

फव्वारे के टूटे हुए पत्थर को शिवलिंग बता कर अफवाह फैलायी जा रही है- शाहनवाज़ आलम

दीन मोहम्मद बनाम सेक्रेटरी ऑफ स्टेट केस 1937 और 1942 में ही इलाहाबाद हाई कोर्ट ने तय कर दिया था मंदिर और मस्जिद का दायरा

लखनऊ, 16 मई 2022। अल्पसंख्यक कांग्रेस अध्यक्ष शाहनवाज़ आलम ने बनारस की निचली अदालत द्वारा ज्ञानवापी मस्जिद के अंदर सर्वे में कथित शिवलिंग मिलने के बाद उस स्थान को सील करने के आदेश को अदालत के सांप्रदायिक हिस्से और सांप्रदायिक मीडिया के गठजोड़ से देश का माहौल बिगाड़ने का षड़यंत्र बताया है।

शाहनवाज़ आलम ने आरोप लगाया कि ज़िला अदालत का सर्वे का आदेश ही पूजा स्थल अधिनियम 1991 के खिलाफ़ था। लेकिन आश्चर्यजनक तरीके से हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने इस तथ्य को नज़र अंदाज़ किया।

उन्होंने कहा कि दो दिनों तक कथित सर्वे के बाद कुछ भी नहीं मिलने पर तीसरे दिन सांप्रदायिक मीडिया और इस मामले में शुरू से ही गैर विधिक रवैया अपनाये जज के सहयोग से मस्जिद में वज़ू करने के लिए बने पुराने फव्वारे के बीच में लगे पत्थर, जो कालांतर में टूट गया था, को ही टूटा हुआ शिवलिंग बताकर अफवाह फैलायी जा रही है।

शाहनवाज़ आलम ने कहा कि देश के क़रीब सभी पुरानी और बड़ी मस्जिदों में इस तरह के फव्वारे और उसके बीच में ऐसे ही पत्थर लगे हुए हैं।

shivling india tv
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कांग्रेस नेता ने कहा कि शिवलिंग मिलने की अफवाह फैलाने के उत्साह में सतर्कता नहीं बरतने के कारण ही हर चैनल में सर्वे के आधार पर उसकी लंबाई अलग-अलग बताई जा रही है।

शाहनवाज़ आलम ने कहा कि

  • वर्ष 1937 में बनारस ज़िला न्यायालय में दीन मोहम्मद द्वारा दाखिल वाद में ये तय हो गया था कि कितनी जगह मस्जिद की संपत्ति है और कितनी जगह मंदिर की संपत्ति है।
  • इस फैसले के ख़िलाफ़ दीन मोहम्मद ने हाई कोर्ट इलाहाबाद में अपील दाखिल की जो 1942 में  ख़ारिज हो गयी थी। इसके बाद प्रशासन ने बेरिकेटिंग करके मस्जिद और मंदिर के क्षेत्रों को अलग-अलग विभाजित कर दिया. वर्तमान वजूखाना उसी समय से मस्जिद का हिस्सा है.

शाहनवाज़ आलम ने कहा कि सवाल उठता है कि क्या 1937 और 1942 में ये कथित शिवलिंग जिसे आज सर्वे टीम खोज निकालने का दावा कर रही है, वहां मौजूद नहीं था। और अगर तब नहीं था तो आज कैसे मिल गया?

shivling aaj tak
shivling aaj tak

शाहनवाज़ आलम ने कहा कि पूजा स्थल अधिनियम 1991 स्पष्ट करता है कि 15 अगस्त 1947 को पूजा स्थलों की जो स्थिति, कस्टडी और चरित्र था उसमें कोई बदलाव नहीं हो सकता। इस मामले में भी 1937 और 1942 के मुकदमों में किसी शिवलिंग की मौजूदगी अदालत को नहीं दिखी थी। ऐसे में आज सर्वे के नाम पर शिवलिंग मिलने की अफवाह फैलाकर 15 अगस्त 1947 की स्थिति को बदलने की गैर विधिक कोशिश की जा रही है। जिसमें बनारस की निचली अदालत के जज खुद शामिल हैं।

उन्होंने कहा कि इतने महत्वपूर्ण और संवेदनशील मुद्दे पर विचार करते हुए जज ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के चर्चित दीन मोहम्मद बनाम सेक्रेटरी ऑफ स्टेट मुकदमे और उसके फैसले का अध्ययन नहीं किया हो ऐसा नहीं हो सकता। इसलिए उनकी निष्पक्षता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

Web title : Survey inside Gyanvapi Masjid: An attempt is being made to spoil the atmosphere of the country due to the nexus of the communal section of the media and the judiciary.

कामसूत्र में कामुकता के नि‍यमों का खेल

what is at the center of the kamasutra

The game of rules of sexuality in the Kamasutra in Hindi

कामसूत्र के केंद्र में क्या है? (What is at the center of the Kamasutra?)

आनंद में जब अविश्वास पैदा हो जाता है तो उसका सीधा असर शरीर और आत्मा पर पड़ता है। साथ ही वैवाहिक जीवन में कामुक सुख और वैवाहिक दायित्वों पर भी असर पड़ता है। कामसूत्र में कामुकता संबंधी चिन्ताओं और समस्याओं (Sexuality concerns and problems in the Kamasutra) पर उतना ध्यान नहीं दिया गया जितना कामुक आनंद (Erotic pleasure in the Kamasutra) प्राप्त करने पर।

कामुक आनंद से संबंधित जो तत्व और संबंध हैं, वे ही कामसूत्र के केन्द्र में हैं। इसमें कामुकता के पीछे निहित मंशा और कामुक रूपों के रूपायन पर मुख्य रूप से ध्यान दिया गया है। इसमें कामुकता के कुछ रूपों की भी चर्चा है जो सामाजिक तौर पर अस्वीकृत हैं। जिनकी राजनीतिक व्याख्या करना पसंद करें।

कामसूत्र में मुख्य जोर इस बात पर है कि वैवाहिक जीवन कैसे बचाएं, परिवार को कैसे बचाएं। साथ ही अनेक ऐसे स्थल भी हैं जिनमें अवैध संबंधों की निंदा की गई है।

कामसूत्र में कामुकता के मानकों के पालन पर जोर (Emphasis on observance of norms of sexuality in Kamasutra)

कामसूत्र में कामुक आनंद और स्वाधीनता को संस्था और नियमों के तहत रखकर देखा गया है। संस्था और नियमरहित कामुकता की तीखी आलोचना की गई है। इसके कारण कामसूत्र के कामुकता विमर्श का आने वाले समाज और समकालीन समाज के नैतिक मानकों पर गहरा असर पड़ा। कामुक इच्छाओं को अभिव्यक्ति देते समय उसे नैतिक मानदण्डों से जोड़ा गया, प्रत्यक्षत: सामाजिक संस्थाओं के हस्तक्षेप से जोड़ा गया। कामुकता के मानकों के उल्लंघन का अर्थ था सामाजिक हस्तक्षेप को आमंत्रित करना। इसका परिणाम यह निकला कि जो लोग संस्था और नियमों के दायरे के बाहर जाकर अपनी कामुक इच्छाओं को अभिव्यक्त करना चाहते थे उन्हें कठिन चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता था। अन्यथा सभी से यह उम्मीद की गई कि वे कामुकता के मानकों का पालन करेंगे।

एक अर्से के बाद विवाह के आठ रूपों में पहले चार रूपों का बाद के चार रूपों के साथ सीधा अन्तर्विरोध पैदा हो गया। पहले चार विवाह प्रकार वैध मान लिए गए और बाद के चार को समाज ने अपनी स्वीकृति नहीं दी। कामसूत्र ने कामुकता को निजता, आत्मसम्मान और सामाजिक हैसियत के साथ जोड़ दिया।

कामसूत्र के आने पहले व्यक्ति का कामुक संबंध सिर्फ एक ही व्यक्ति तक ही सीमित नहीं था, सिर्फ विवाहिता के साथ ही सीमित नहीं था। उस समय व्यक्ति अपनी निजता के प्रति ज्यादा सचेत था। निजी अनुभूति,निजी भूमिकाओं और निजी अस्तित्व के सवालों के प्रति ज्यादा सजग था। फलत: साधारण लोगों का फोकस अपने निजी जीवन पर ज्यादा था, इससे तत्कालीन सामाजिक, राजनीतिक सत्ता कमजोर हो रही थी। नैतिकता का आधार व्यक्तिगत था। व्यक्ति की स्वयं के प्रति जबावदेही थी। वह अपनी निजी जिन्दगी के परे जाकर देखता ही नहीं था। यह आदिम व्यक्तिवाद का एक रूप था।

व्यक्तिवाद के बारे में मि‍शेल फूको क्या कहता है? What does Foucault say about individualism?

प्रसि‍द्ध फ्रांसीसी वि‍द्वान मि‍शेल फूको के अनुसार आदिम व्यक्तिवाद (Primitive individualism according to Michel Foucault) व्यक्ति के व्यक्तिगत व्यवहार, निजी जिन्दगी तक सीमित था। वह अन्य से कटी हुई जिन्दगी जीता था। वह ऐसे यथार्थ में कैद था जो परंपरागत बंधनों से मुक्त था। उसके लिए व्यक्तिगत मूल्य परम सत्य थे। उसके निजी जीवन का सकारात्मक मूल्यांकन किया गया। उसके पारिवारिक संबंधों को महत्ता दी गयी। व्यक्ति की निजी सघन अनुभूतियों को महत्ता दी गयी। जिसके कारण व्यक्ति की भूमिका, व्यक्ति के ज्ञान, व्यक्ति के रूपांतरण, दुरूस्तीकरण, पवित्रता और मुक्ति को महत्व दिया गया। ये सारे तत्व अन्तस्संबंधित हैं। यही वजह है कि कालान्तर में व्यक्तिवाद ने निजी जीवन के मूल्यों को सघन रूप में अभिव्यक्ति दी। यह जरूरी नहीं कि सभी सामाजिक समूहों में व्यक्तिवाद की सक्रिय भूमिका हो। विभिन्न सामाजिक समूहों में व्यक्तिवाद अलग-अलग रूपों में व्यक्त हुआ। मसलन् अभिजात्यवर्ग में व्यक्तिगत मूल्यों और निजता के प्रति आक्रामक आकर्षण होता है। फलत: वह अपने से इतर समूहों को आकर्षित नहीं कर पाता।

अनेक ऐसे सामाजिक समूह हैं जिनके लिए निजी जिन्दगी बेहद कीमती है। वे उसको सजग तरीकों से संरक्षित और संवर्धित करने का प्रयास करते हैं। किन्तु ऐसे समाजों में व्यक्तिवाद बेहद कमजोर होता है। भारत के समाज का बहुत बड़ा हिस्सा लंबे समय से ऐसा ही रहा है। यहां आत्मविकास और निज की देखभाल पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया गया। जो लोग आत्मविकास पर जोर देते थे वे निजी देखभाल पर ध्यान नहीं देते थे। जो लोग निजी देखभाल पर ध्यान देते थे उनके यहां आत्मविकास की धारणा का विकास ही नहीं हुआ।

समग्रता में देखें तो आत्मविकास और निजी देखभाल को हमारे समाज ने लंबे समय से उपेक्षित रखा ।

क्या फूको ने कामसूत्र देखा था?

सेक्स या काम स्वाभाविक होता है

स्वाभाविकता के आधार पर ही लिंगभेद होता है। फूको ने लिखा आधुनिक कामुकता ने हमें यह बताया कि ”सेक्स व्यक्ति सत्य है।” इस तथ्य की पहचान कामसूत्र में सबसे पहले हुई। यह बात दीगर है कि फूको ने कामसूत्र देखा नहीं था। सेक्स सिर्फ प्रजनन के अंग तक सीमित नहीं है अपितु शारीरिक संरचना या शारीरिक अंगों तक उसकी गहरी जड़ें हैं। कामसूत्र में लिंग को काम (सेक्स) और वर्ण के साथ भी जोड़ा गया। एक ही वर्ण की लड़की और लड़के के विवाह को विवाह की पहली चार पद्धतियों में सम्मानजनक स्थान दिया गया । जबकि बाकी चार विवाह पद्धतियों में वर्ण को सेक्स के साथ जोड़कर पेश नहीं किया गया। स्त्री पुरूष भेद और साम्य का आधार सेक्स को बनाया गया। कामुकता को सेक्स और सेक्स को स्त्री से जोड़ा गया।

कामुकता, काम और स्त्री ये तीनों अन्तर्गृथित हैं।

इसका अर्थ यह भी है कि कामुकता, सेक्स और सामाजिक व्यवस्था के अन्तस्सबंध को भी हमें सामने रखना होगा। तमाम आधुनिक समाजशास्त्री यह मानते हैं कि कामुकता और कामुक भिन्नता ये दोनों आधुनिक फिनोमिना हैं। किन्तु भारतीय संदर्भ में ये आधुनिक नहीं प्राचीन संवृत्ति हैं। इनका जिक्र कामसूत्र में है। सुश्रुत की ‘चरक संहिता’ में है। कामुकता और शरीर चर्चा और प्रसाधन चर्चा पर मध्यकाल में जितना समृद्ध विमर्श भारत में तैयार हुआ है उतना पश्चिमी चिन्तन में नहीं हुआ।

कामसूत्र में विवाह हेतु ऐसी लड़की के चयन को श्रेष्ठ माना गया है जो अभिजात्य गुणों से सम्पन्न हो। जिसके माता-पिता हों, प्रतिष्ठित खानदान हो, सदाचारी मित्रगण जिसे देखकर प्रशंसा करें। जिसका सुंदर नाम हो। इसके अलावा अवगुणी लड़की के बारे में भी लिखा है। यह भी लिखा कि जिस विवाह से पति-पत्नी को समान आनन्द की अनुभूति हो। दोनों एक-दूसरे के पूरक और शोभावर्धक हों। पति अपनी पत्नी से तब ही संभोग का अधिकारी बताया गया है जब वह अपनी पत्नी का दिल जीत ले। उसके साथ जबर्दस्ती न करे। सुहागरात की पहली तीन रात को पत्नी को कामकला की शिक्षा दे। ये सारे उपाय ब्राह्म, अग्नि, दैव और प्राजापत्य विवाह पद्धतियों के अनुसार शादी करने वालों के लिए सुझाए गए हैं।

शादी का फैसला करते समय देश, पात्र, वर्ण और हैसियत को महत्व दिया गया है। जो लोग इन तत्वों का ख्याल करके शादी करते हैं उनका वैवाहिक जीवन सफल होता है।

कामसूत्रकार ने असल में शादी के सवाल को परिवार और वर्ण के मातहत कर दिया है। परिवार और वर्ण के मातहत रखने का एक ही लक्ष्य है उपयुक्त कन्या की प्राप्ति। इसका कोई अन्य अर्थ नहीं है। शादी के बाद पत्नी अपनी खुशी व्यक्त करने के लिए क्या-क्या करे। पति क्या क्या करे। इन बातों की ओर ध्यान दिया गया है। इसमें बुनियादी तौर पर पति और पत्नी दोनों को अपनी अवस्था पर मास्टरी हासिल करने के सुझाव दिए गए हैं। अच्छी पत्नी और अच्छे पति के गुण (Qualities of a good wife and good husband in Kamasutra) हासिल करने पर जोर है। जिससे वे सम्मानजनक जीवन यापन कर सकें।

कामसूत्र में शादी का अर्थ (Meaning of marriage in Kamasutra)

शादी के सवाल पर निरंतर तरह-तरह से विमर्श चलता रहा है ,इसका अर्थ यह है कि शादी के बाद हमेशा पति-पत्नी एक नए जीवन की शुरूआत करते हैं और नए जीवन की प्रक्रिया में जो समस्याएं आती हैं उनके समाधान खोजते जाते हैं। कामसूत्र में शादी का जिस तरह वर्णन मिलता है उसके अनुसार शादी एक कला है। जिसमें मानवीय रिश्तों में महारत हासिल करनी पड़ती है। शादी का आनंद के साथ संबंध है। आनंद हासिल करने के लिए जरूरी है कि स्त्री-पुरूष अपने दायित्व का निर्वाह करें। स्वयं के ऊपर प्रभुत्व स्थापित करें। एक-दूसरे के प्रति सम्मान व्यक्त करें। प्यार व्यक्त करें। दोनों के बीच बेहतर शारीरिक संबंध हो। सेक्स करते हुए दोनों आनंदित हों। एक-दूसरे के प्रति सहानुभूति और संतुलित समझ हो।

साथ रहने की कला का संबंध संवाद की कला से है। संवाद जितना बेहतर होगा, संबंध भी उतना ही अच्छा होगा। इस प्रसंग में सबसे चौंकाने वाली बात यह है शादी के बाद पत्नी के लिए बहुत सीमित सामाजिक भूमिका सौंपी गई है। स्त्री का कार्य है बच्चे पैदा करना, क्योंकि शादी का प्रधान लक्ष्य था संतानोत्पत्ति। एक साथ रहना, घर संभालना, पति और उसके परिवार की सेवा करना। पति-पत्नी के बीच यदि शारीरिक संबंध न रहे, या वे एक-दूसरे के साथ सेक्स न करें तो यह संबंध टूट जाता था। इसके कारण ही दूसरी पत्नी की परंपरा शुरू हुई, अथवा अन्य औरतों की ओर पुरूष मुखातिब हुआ। इसका अर्थ यह है कि पति-पत्नी के बीच का रिश्ता बहुत ही सीमित आधार पर टिका था। इसका अर्थ यह भी है कि पति को शारीरिक आनंद सिर्फ अपनी पत्नी से ही प्राप्त करना होता था। पत्नी के अलावा किसी और से शारीरिक आनंद प्राप्त करने को अवैध और असहनीय माना गया। परस्त्रीगमन या परपुरूषगमन को अवैध माना गया। परस्त्री या परपुरूषगमन का राजा और उससे जुड़े तंत्र में वैध रिवाज था।

   ( लेखक- जगदीश्‍वर चतुर्वेदी, सुधासिंह )

हसदेव अरण्य बचाने के लिए भूपेश बघेल को खुला पत्र

Kamal Shukla, Bhupesh Baghel Badal Saroj

Open letter to Bhupesh Baghel to save Hasdev Aranya

नई दिल्ली, 05 मई 2022. छत्तीसगढ़ में हसदेव अरण्य बचाने के लिए मध्यप्रदेश के कई संगठनों ने छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को खुला पत्र लिखा है। पत्र का मजमून निम्न है –

श्री भूपेश बघेल

मुख्यमंत्री, छत्तीसगढ़ सरकार

रायपुर, छत्तीसगढ़

मान्यवर

हसदेव अरण्य बचाने के लिए आंदोलनरत नागरिकों के प्रति एकजुटता व्यक्त करते हुए मध्यप्रदेश के अनेक जिलों में हुई कार्यवाहियों के बाद

राजधानी भोपाल में एकत्रित हुए मध्यप्रदेश के अनेक संगठनों, दलों, समूहों, व्यक्तियों के रूप में हम सब;

एक; हसदेव अरण्य को लेकर वहां के नागरिकों, निवासियों तथा छग सहित देश भर के पर्यावरण शुभाकांक्षियों की चिंता के साथ हैं। हम मानते हैं कि करीब चार लाख से अधिक वृक्षों, घनी हरियाली, विराट प्राकृतिक सम्पदा वाले इस इलाके में कुछ धनपिशाचों के मुनाफे के लिए वृक्षों का संहार करने की अनुमति देना पृथ्वी, मनुष्य और मानवता के प्रति अपराध है। जिन दिनों समूची दुनिया जलवायु परिवर्तन को लेकर फिक्रमंद हो ऐसे में इस तरह के विनाश को होने देना, होते हुए देखना और चुप्प रहना इस आपराधिकता को द्विगुणित कर देता है। यूं भी जिसे हम बना नहीं सकते उसका विनाश करने का कोई नैतिक, वैधानिक अधिकार हमारा नहीं है।

अतएव हमारा अनुरोध है कि तत्काल प्रभाव से हसदेव अरण्य से जुड़ी जंगल कटाई और उत्खनन की सारी अनुमतियाँ निरस्त की जाएँ। इस काम को तत्काल प्रभाव से रोका जाए। उखाड़ने वाले व्यक्तियों, कंपनियों द्वारा इस बीच में जितने वृक्ष उखाड़े जा चुके हैं उन्हें उनसे पांच गुना वृक्ष लगवाने का निर्देश दिया जाए।

दो; हंसदेव अरण्य की रक्षा के लिए लोकतांत्रिक तरीके से आंदोलित नागरिकों तथा संगठनों पर मुकद्दमे लगाने तथा उनके विरुद्ध कार्यवाहियां करने की खबरें मिली हैं। कायदे से तो प्रदेश के पर्यावरण और प्राकृतिक सम्पदा की हिफाजत करने वाले इन नागरिकों, संगठनो को आपके मुख्यमंत्रित्व वाली सरकार के द्वारा सम्मानित किया जाना चाहिए था मगर ऐसा करने की बजाय उन्हें अपमानित, दण्डित तथा प्रताड़ित किया जा रहा है। हम सब आपसे अनुरोध करते हैं कि सरकार तथा प्रशासन का उपयोग निजी कंपनियों के लिए करने पर तत्काल रोक लगाई जाए। अब तक की गयी सभी कार्यवाहियां निरस्त की जाएँ।

तीन; छग पहले से ही तुलनात्मक रूप से देश के पर्याप्त औद्योगीकृत प्रदेशों में से एक है। इसलिए भविष्य में किसी भी प्रकार के औद्योगीकरण इत्यादि के काम को आरम्भ करने से पूर्व उसके पर्यावरणीय प्रभावों के आंकलन (भले केंद्र की वर्तमान सरकार ने पूँजी घरानों के दबाब में ऐसा करने से छूट क्यों न दे दी हो ) तथा स्थानीय नागरिकों – विशेषकर आदिवासियों – से निर्धारित प्रक्रिया के तहत सूचित सहमति लिया जाना चाहिए। इसे सिर्फ नौकरशाही तरीकों से तय नहीं किया जाना चाहिए।

मान्यवर

यह याद दिलाना सामयिक होगा कि यूपीए सरकार के कार्यकाल में तत्कालीन पर्यावरण मंत्री श्री जयराम रमेश ने हसदेव में “नो गो” के आदेश दिए थे और हसदेव अरण्य में किसी भी तरह की छेड़छाड़ को प्रतिबंधित किया था।

हमें विश्वास है कि आप इन तीनों आग्रहों पर सकारात्मक रुख अपनाएंगे और समुचित आदेश जारी करेंगे।

हमारा यह विश्वास विधानसभा चुनाव से पूर्व बस्तर के टाटा समूह के प्लांट को लेकर किये गए वायदे से और मजबूत होता है – उसी भावना से इस प्रकरण तथा इसी तरह के सभी प्रकरणों में निर्देश जारी करने का कष्ट करेंगे।

शुभकामनाओं सहित

हम सब अधोहस्ताक्षरकर्ता

बादल सरोज; संयुक्त सचिव अखिल भारतीय किसान सभा / डॉ सुनीलम; पूर्व विधायक, अध्यक्ष किसान संघर्ष समिति/ प्रह्लाद दास वैरागी; मध्यप्रदेश किसान सभा / इरफ़ान जाफरी; जाग्रत किसान संगठन / राकेश दीवान; हम सब / आशा मिश्रा, पवन पंवार, शिल्पा जैन; भारत ज्ञान विज्ञान समिति / एस आर आज़ाद; मध्यप्रदेश विज्ञान सभा / संध्या शैली, खुशबू केवट; अखिल भारतीय जनवादी महिला समिति। विजया ठाकुर; हिम्मत-एडवा / वीरेन्द्र जैन, मनोज कुलकर्णी, अनवारे इस्लाम; जनवादी लेखक संघ / राजेंद्र शर्मा; प्रगतिशील लेखक संघ / एटी पद्मनाभन, पीएन वर्मा; सीटू / सुरेन्द्र जैन; लोकजतन/ सचिन श्रीवास्तव; संविधान लाइव / वैभव यादव, अमित कुमार; डीकेबी/ राजकुमार सिन्हा; बरगी बाँध एवं प्रभावित संघ – एनएपीएम/ दादूलाल कुड़ापे; चुटका परमाणु संयंत्र विरोधी संघर्ष समिति / मुकेश भगोरिया; नर्मदा बचाओ आंदोलन / पूषण भट्टाचार्य; सेन्ट्रल ज़ोन इंश्योरेंस एम्प्लॉइज असोशिएशन / योगेश दीवान; जन पहल मध्यप्रदेश /

जसविंदर सिंह; सीपीआई (एम), शैलेन्द्र कुमार शैली; सीपीआई), रामावतार शर्मा, विनोद लौगरिया; एसयूसीआई (सी),

राजेंद्र कोठारी / अवि कठपालिया /

हस्ताक्षर एकत्रीकरण का सिलसिला अभी जारी है।

मुश्किल वक्त में मोदी जी का इस वर्ष का पहला विदेश दौरा

pm modi's europe tour

मुश्किल वक्त में मोदी जी का यूरोप दौरा | प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के यूरोप दौरे पर संपादकीय टिप्पणी

देशबन्धु में संपादकीय आज (Editorial in Deshbandhu today) | Modi ji’s first foreign tour of this year in difficult times

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी साल 2022 के पांचवें महीने में पहली विदेश यात्रा पर निकले हैं। जर्मनी, डेनमार्क और फ्रांस इन तीन देशों की तीन दिन की यात्रा पर प्रधानमंत्री गए हैं। दौरे पर रवानगी के वक्त उन्होंने कहा था कि उनका यूरोप दौरा ऐसे समय हो रहा है जब यह क्षेत्र कई चुनौतियों का सामना कर रहा है। प्रधानमंत्री की इस बात से असहमत होने का कोई कारण नहीं है। रूस और यूक्रेन के बीच जंग को दो माह से ऊपर हो चुके हैं। लेकिन अब तक सुलह के कोई आसार नजर नहीं आ रहे। रूस पर अमेरिका समेत अन्य पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों का कोई असर नहीं हुआ। जबकि नाटो देशों से मदद की उम्मीद में यूक्रेन तबाह हो गया है।

यूरोप में युद्ध के संकट से पहले दो साल कोरना संकट में निकले

यूरोप में युद्ध का ये संकट तो इस साल आया है, इससे पहले के दो साल कोरोना की मार सहते हुए निकले हैं। इसलिए वहां भी आर्थिक संकट, सामाजिक उथल-पुथल, राजनैतिक असंतोष ये सब किसी न किसी तरह महसूस किए जा रहे हैं।

इस चुनौती भरे दौर में प्रधानमंत्री मोदी अपनी विदेश यात्रा से यूरोपीय साझेदारों के साथ सहयोग की भावना को मजबूत करेंगे। इस यात्रा में भारत तथा यूरोप के बीच व्यापार, रक्षा, सुरक्षा और ऊर्जा संबंधों को आगे बढ़ाने पर ज़ोर रहेगा। लेकिन ये उद्देश्य किस तरह पूरे होंगे, ये अभी कह पाना कठिन है।

रूस और यूक्रेन के बीच जंग में भारत का रुख काफी हद तक तटस्थ रहा है। अमेरिका-यूरोप के दबाव के बावजूद भारत ने रूस के खिलाफ कोई कड़ा कदम नहीं उठाया है।

क्या मौजूदा हालात में भारत गुटनिरपेक्षता के सिद्धांत पर सफल हो सकता है?

यूक्रेन पर हमले के लिए भारत रूस को खुले तौर पर कुछ नहीं कह रहा है, और बातचीत तथा कूटनीति पर ज़ोर दे रहा है, इसके साथ ही रूस के साथ हथियारों और तेल का व्यापार जारी रखे हुए है। रविवार को विदेश सचिव विनय मोहन क्वात्रा ने कहा है कि, ‘जहां तक यूक्रेन पर भारत के रुख़ का सवाल है, उसे कई मंचों पर बहुत विस्तार से बताया गया है, और स्पष्ट किया गया है ‘हमारा रुख़ हमेशा से ये रहा है कि यूक्रेन में युद्ध थमना चाहिए, और समाधान का रास्ता कूटनीति और बातचीत से होकर जाता है’।

रूस भारत का पुराना और विश्वस्त मित्र देश रहा है, लेकिन बदलते वक्त के साथ भारत के आर्थिक-सामरिक-वाणिज्यिक हित अन्य देशों के साथ भी जुड़े हैं। ऐसे में गुटनिरपेक्षता के सिद्धांत पर चलते हुए अपने हितों का संतुलन साधना कठिन है।

पीएम मोदी पर भारत को रूस के खिलाफ बोलने का दबाव होगा

प्रधानमंत्री के तीन दिनों के दौरे में उन पर यह दबाव बनाने की कोशिश फिर की जाएगी कि वे रूस के खिलाफ कुछ कहें या भारत के नजरिए में कोई बदलाव लाया जाए। अगर भारत यूरोप के अपने साझेदारों के दबाव में झुकता दिखता है तो फिर गुटनिरपेक्षता के सिद्धांत को ठेस पहुंचेगी और रूस के साथ संबंधों में खटास आएगी। लेकिन अगर भारत किसी भी दबाव में नहीं आता है, तो फिर क्या हमारे यूरोपीय साझेदार व्यापार, रक्षा और ऊर्जा क्षेत्र में मदद और सहयोग का हाथ बढ़ाते हैं, ये देखना होगा।

भारत के लिए ये समय दुधारी तलवार पर चलने जैसा है, जहां हर कदम फूंक-फूंक कर रखना होगा। क्योंकि राष्ट्रप्रमुखों के दौरों और मुलाकातों के वक्त दोस्ती और सद्भाव की बड़ी बातें होती हैं, लेकिन उन पर अमल हो, तभी इन दौरों की सार्थकता होगी।

देश के हालात कहीं ज्यादा चुनौतीपूर्ण

वैसे मोदीजी केवल यूरोप के चुनौती भरे वक्त में यात्रा पर नहीं हैं। इस वक्त देश में कहीं ज्यादा चुनौतीपूर्ण हालात हैं। महंगाई, बेरोजगारी और कमजोर अर्थव्यवस्था का संकट तो है ही, देश इस वक्त बिजली और ऊर्जा के भी भारी संकट से गुजर रहा है। सरकार ने पहले से अनुमान लगा लिया होता कि हमारे पास कितने दिन का कोयला बचा है और उसकी आपूर्ति न होने से किस तरह की वैकल्पिक व्यवस्था हो सकती है, तो शायद इस संकट को टाला जा सकता था। मगर सरकार ने आग लगने के बाद कुआं खोदने का फैसला लिया है। बिजली की कमी कुछेक हफ्तों तक और परेशान करने के बाद शायद दूर भी हो जाए।

लेकिन देश में इन के अलावा सामाजिक ताने-बाने के बिखरने का संकट भी गहरा गया है।

पिछले कई दिनों से सांप्रदायिक हिंसा और तनाव के माहौल में मोदीजी से उम्मीद की जा रही थी कि वे कभी तो कुछ कहेंगे और हिंदुत्व के नाम पर नफरत फैलाने वालों को कोई नसीहत देंगे। मगर कुछ बोलना या शांति की अपील करना तो दूर, मोदीजी अल्पसंख्यकों और पीड़ितों को उनके हाल पर छोड़ते हुए विदेश चले गए। 3 दिनों में 65 घंटों में कम से कम 25 कार्यक्रमों में शामिल होने का एक नया रिकार्ड शायद उनके नाम दर्ज हो जाएगा। लेकिन इससे भारत की आंतरिक समस्याओं पर क्या फर्क पड़ेगा, ये सवाल तो उठेगा ही।

आज का देशबन्धु का संपादकीय (Today’s Deshbandhu editorial) का संपादित रूप साभार.

News 18 द्वारा देश में सांप्रदायिक एजेंडा चलाने के खिलाफ अवकाशप्राप्त आईपीएस का मुकेश अंबानी को खुला पत्र

retired senior ips officer vijay shankar singh

मुकेश अंबानी के नाम एक पत्र – संदर्भ पत्रकारिता

नई दिल्ली, 02 मई 2022. मुकेश अंबानी के स्वामित्व वाले News 18 द्वारा देश में सांप्रदायिक एजेंडा चलाने के खिलाफ अवकाशप्राप्त आईपीएस विजय शंकर सिंह ने मुकेश अंबानी के नाम एक खुला खत लिखा है।

सिंह ने कहा कि यह पत्र टीवी चैनल News 18 के मालिक, मुकेश अंबानी के नाम है। पिछले 8 साल से उनके स्वामित्व वाले न्यूज चैनल के नियमित कार्यक्रमों का यदि सर्वेक्षण किया जाए तो आप इस निष्कर्ष पर पहुंचेंगे कि, इस न्यूज चैनल का एक उद्देश्य यह भी है, देश में सांप्रदायिक एजेंडा चलाना और एक ऐसा मानसिक अनुकूलन करना जो देश को विभाजनकारी एजेंडे की ओर ले जाए। खंड खंड भारत की ओर ले जाने की यह निंदनीय कोशिश, ‘या तो आर या पार’ के संकल्प के साथ नित नए शीर्षक, बहसें और गोएबलिस्ट खबरों के रूप में परोसी जा रही हैं। उस पर तुर्रा यह है कि उसके सद्यः पुरस्कृत एंकर खुद को देशभक्त का सुपर्लेटिव डिग्री वाला प्रमाणपत्र अंगीकृत किए बैठे हैं।

उन्होंने कहा कि ऐसी पत्रकारिता के असर का स्वाद खुद इनके ही एक बड़े पत्रकार ने चखा है, पर वे भी तो एक वेतनभोगी कर्मचारी ही हैं तो उनसे क्या गिला किया जाए, पर हां, उनसे, उनकी पत्नी और उनके बेटे जिसे लेकर उनके भी हजारों खूबसूरत सपने होंगे, से मेरी पूरी सहानुभूति है।

अवकाशप्राप्त आईपीएस ने कहा कि “मुझे नहीं पता मुकेश अंबानी जी, अपना न्यूज चैनल कभी देखते भी हैं या नहीं, पर मैं उनसे यह अनुरोध करूंगा कि वे इस चैनल के कुछ प्रोग्राम जरूर देखें और वे न्यूज चैनल क्या परोस रहे हैं, उससे भी रूबरू हों।“

उन्होंने कहा कि “हर टीवी चैनल के अपने नियम कायदे होते हैं, उनकी नीतियां होती हैं। वे सरकार के पक्ष में भी हो सकती हैं और सरकार के विरोध में भी। सरकार से उनका जो भी समीकरण हो, इस पर भी किसी को आपत्ति नहीं है और न होनी चाहिए, पर जब संविधान के मूल उद्देश्यों के खिलाफ देश में धर्म के आधार पर विभाजनकारी बहसें कराना ही एक मकसद बन जाए तो, यह जरूरी हो जाता है कि न्यूज चैनल के मालिक तक यह बात पहुंचा दी जाए।“

पत्र का मजमून निम्नवत् है –

सेवा,

श्री मुकेश अंबानी

रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड,

मेकर्स चैंबर्स IV

नरीमन पॉइंट

मुंबई – 400021

विषय : भारतीय समाज में सद्भाव और हित के लिए समाचारों के प्रसारण में सुधारात्मक उपायों की आवश्यकता।

प्रिय महोदय,

यह पत्र, देश में आजकल बढ़ रही, सांप्रदायिक उथल-पुथल और न्यूज18 के पत्रकार श्री सौरभ शर्मा को प्राप्त धमकी भरी एक प्रतिक्रिया के संबंध में है, जो नेटवर्क18 मीडिया एंड इन्वेस्टमेंट लिमिटेड का एक लोकप्रिय समाचार चैनल है, जो आप के स्वामित्व वाले एक भारतीय मीडिया समूह का अंग भी है।

आप वर्तमान में सबसे अधिक ट्रेंडिंग होने वाले समाचारों के बारे में शायद अवगत होंगे, जिसमें नोएडा उत्तर प्रदेश में हुई एक घटना, जिसमें कुछ लोगों ने सौरभ शर्मा, उनकी पत्नी और बेटे को सार्वजनिक रूप से मारने पीटने और उनकी पत्नी के कपड़े फाड़ने की धमकी भी दी थी, क्योंकि सौरभ शर्मा ने नोएडा में राम नवमी के अवसर पर एक मस्जिद के बाहर लाउड स्पीकर नहीं बजाने का सुझाव दिया था। तब कुछ हिंदू संगठनों द्वारा उन्हें “राष्ट्र-विरोधी” और “पाकिस्तानी” भी कहा गया।

भारत के संविधान में, प्रेस को बोलने, लिखने और रिपोर्टिंग करने की स्वतंत्रता का अधिकार है, लेकिन यह अधिकार एक गंभीर जिम्मेदारी के साथ भी है, जिसे समाचार रिपोर्टिंग के वर्तमान युग में लगभग नजरअंदाज कर दिया गया है। प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया द्वारा प्रकाशित जर्नलिस्टिक कंडक्ट एडिशन 2020 के मानदंडों के अनुसार, सांप्रदायिक शांति और सौहार्द को बढ़ावा देने के लिए पत्रकारों की भी, अपने देश के प्रति एक विशेष जिम्मेदारी है। इसलिए, यह अत्यंत महत्वपूर्ण है कि,  न्यूज चैनल जनता के लिए अपनी खबरों को सावधानी और संयम के साथ पहुंचाएं।

सांप्रदायिक विद्वेष की हाल की खतरनाक स्थितियों में मीडिया की भूमिका विशेष रूप से रामनवमी ‘2022 के अवसर पर हुई घटनाएं, शांति और कानून व्यवस्था बनाए रखने के उद्देश्य से सकारात्मक रूप में होनी चाहिए थीं, न कि भड़काऊ और उकसाने वाली। लेकिन न्यूज18 के समाचार प्रसारण की हालिया प्रवृत्ति, पत्रकारिता की इस नैतिक और निर्धारित मूल सिद्धांतों के विपरीत है। दुर्भाग्य से आपसी भाईचारे की भावना को उनकी रिपोर्टिंग में कम ही देखा गया है और न्यूज18 ने अपने खास तरीके से एक विशेष समुदाय को लगातार निशाना बनाकर और उनके खिलाफ राष्ट्र विरोधी होने का, एक कभी न खत्म होने वाला प्रोपेगेंडा चलाया है।

इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि देश में सामाजिक सद्भाव बनाए रखने में, कल जब देश का इतिहास लिखा जायेगा तो, मीडिया की इस भूमिका का भी आकलन किया जाएगा। अतः साम्प्रदायिक सद्भाव बनाए रखना, मीडिया का एक प्रमुख कर्तव्य भी है। पत्रकारिता आचरण, 2020 के मानदंडों के अनुसार सांप्रदायिक विवादों / झड़पों की रिपोर्टिंग करते समय सनसनीखेज, उत्तेजक और खतरनाक सुर्खियों से समाचार चैनलों को बचना चाहिए। यह अत्यंत पीड़ा की बात है कि, आज हमें अधिक प्रचार और कम समाचारों के साथ, जानबूझकर विभाजनकारी एजेंडे के अनुसार खबरें परोसी जा रही है। हम आज उस मोड़ पर पहुंच गए हैं, जहां आपके अपने ही मीडिया चैनल के एक वरिष्ठ पत्रकार को, उस समुदाय के गुंडों द्वारा पीटा गया, जिसके बारे में दावा किया जाता है कि, वह नियमित रूप से आपके समाचार चैनल द्वारा लक्षित समुदाय के हाथों से ही पीड़ित है। यह सब मीडिया घरानों द्वारा प्रचारित परिभाषा के अनुसार “हिंदुत्व” के नाम पर मस्जिद के आसपास रैली करने वाले कुछ लोगों द्वारा किया गया था।

पत्रकारीय नैतिकता, किसी भी समुदाय या समुदायों और व्यक्तियों पर भद्दे और भड़काऊ अपमानजनक हमलों की अनुमति नहीं देती है। लेकिन हमारे देश के एक विशेष धार्मिक समुदाय को पिछले कुछ वर्षों से न्यूज़18 द्वारा बार-बार लक्षित और राष्ट्र-विरोधी समाज के रूप में दर्शाया जा रहा है। पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने 26-29 जनवरी, 2001 को अंतर्राष्ट्रीय प्रेस संस्थान (आईपीआई) के विश्व कांग्रेस के उद्घाटन समारोह में कहा था कि,

“एक स्वतंत्र और जिम्मेदार प्रेस लोकतंत्र का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है, जैसा कि आवश्यक है विधायिका या न्यायपालिका की तरह ही एक स्वस्थ और स्वतंत्र प्रेस स्वस्थ लोकतंत्र के लिए भी आवश्यक है।”

इसलिए, उपरोक्त बातों के आलोक में, आप से, रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड के अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक की हैसियत से, आईबीएन 7 समाचार चैनल द्वारा प्रसारित समाचार रिपोर्टों द्वारा प्रेस नैतिकता और आचार संहिता को अपने प्रसारण में, सुधारात्मक उपाय लागू करने की पहल करने का अनुरोध करता हूं, ताकि यह न्यूज चैनल राष्ट्र के सांप्रदायिक सद्भाव की दिशा में सक्रिय रूप से, अपना योगदान दे सके, और वह किसी भी समूह विशेष के दुष्प्रचार का अंग न बने।

सादर एवं हार्दिक शुभकामनाओं सहित।

आप का,

विजय शंकर सिंह

सेवानिवृत्त आईपीएस – यूपी

कानपुर।

ईश्वरप्पा ने अपने ही कुनबे के पाटिल को क्यों मारा?

badal saroj

कटप्पा ने बाहुबली को क्यों मारा के बाद ईश्वरप्पा ने अपने ही कुनबे के पाटिल को क्यों मारा?

कटप्पा ने बाहुबली को क्यों मारा ?”

यह डायलॉग हमारे प्रधानमंत्री मोदी जी के प्रिय फ़िल्मी संवादों में से एक है। वे इसे एकाधिक बार दोहरा चुके हैं। पिछले दिनों कर्नाटक की उनकी पार्टी – भाजपा – ने इस डायलॉग को अपडेट किया है। अब यह “ईश्वरप्पा ने संतोष पाटिल को क्यों मारा?” में बदल गया है। यहां हमारा इरादा सिर्फ क्यों मारा (आत्महत्या के लिए मजबूर करना भी एक तरह से मारा जाना ही होता है ) तक नहीं है। जिसे मारा वह कौन था, पर भी है।

आत्महत्या के लिए मजबूर किया गया ठेकेदार संतोष पाटिल का प्रकरण

संतोष पाटिल कर्नाटक के बेलगावी जिले के अपेक्षाकृत युवा ठेकेदार थे। उनकी समस्या यह थी कि कर्नाटक के मंत्री के एस ईश्वरप्पा 4 करोड़ रुपयों के पूरे हो चुके सरकारी काम के बिल का भुगतान दबाये बैठे थे। इस बिल को पास करने के लिए 40 प्रतिशत कमीशन की मांग कर रहे थे। इस बात की शिकायत संतोष ने बाकी सबके साथ ऊपर तक, यानि ईश्वरप्पा के ब्रह्मा जी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी की थी। मगर इससे समस्या सुलझने की बजाय और उलझ गयी। कर्नाटक के इस मंत्री ने अपने सारे भेड़िये उसके पीछे लगा दिए। मानहानि का मुकद्दमा भी ठोंक दिया। अंततः हारे निराश संतोष पाटिल ने उडुपी के लॉज से आख़िरी व्हाट्सप्प मेसेज में ईश्वरप्पा को अपनी मौत का जिम्मेदार बताते हुए 14 अप्रैल को आत्महत्या कर ली।

भ्रष्टाचार में भाजपा का रिकॉर्ड

भाजपाई भ्रष्टाचार के बारे में बात करना फालतू में समय को जाया करना होगा। भाजपा ने घपलों और घोटालों, बेईमानियों और काली कमाईयों के सकल ब्रह्माण्ड के अब तक के सारे रिकॉर्ड ही नहीं तोड़े हैं बल्कि उसके नए नए जरिये, हर संभव असंभव रास्ते तलाश कर इस विधा में उतरने को आमादा और तत्पर आगामी पीढ़ी के प्रशिक्षुओं के लिए अनगिनत रास्ते भी खोले हैं।

एक प्रचलित लोकोक्ति को थोड़ा बदल कर कहें तो “जहां न पहुंचे आज तक के भ्रष्टाचारी कभी / वहां पहुँच गए भाजपाई ऊपर से नीचे तक सभी।”

इस मामले में इनकी आविष्कारी अनुसन्धानी क्षमता कमाल ही है; उन्होंने हिमालय फतह ही नहीं किये – एवरेस्ट की चोटी से भी ऊंची नई-नई चोटियां खड़ी भी की हैं। इनमें से कुछ पर ही नजर डालने से यह नूतनता और मौलिकता उजागर हो जाती है। जैसे; कोरोना दौर में कुछ लोग जीवन रक्षक दवाओं की कालाबाजारी करके कमा रहे थे मगर जो सबने किया वह किया तो क्या किया – इसलिए भाजपा और संघी नकली दवाईयां कालाबाजार में बेचकर उनसे ज्यादा कमाई करने में जुट गए।

ऐसा करके वे “बेईमानी में भी एक तरह की ईमानदारी होती है”, कि “चोर डाकुओं का भी कुछ ईमान होता है” आदि के फालतू मुगलकालीन मिथक तोड़ रहे थे। एक मिथक यह भी था कि इस तरह के उद्यमी कमसेकम भगवान को तो बख्श देते हैं। उन्हें अपनी उद्यमशीलता का शिकार नहीं बनाते। ऐसा होता भी रहा। हमारे चम्बल में पुराने जमाने के डकैत सारी जोखिमें उठाकर मंदिरों पर घंटा चढाने जाते थे। भाजपाईयों ने चढ़े चढ़ाये घंटों को उतारने की असाधारण करतूते दिखाकर उन सबको पीछे छोड़ दिया। इस कर्मकांडी मिथ्याभास को भी तोड़ा और सिंहस्थ और कुम्भ के मेलों से लेकर अयोध्या के राम मंदिर तक में अपनी कमाई के जरिये ढूंढ निकाले। इस तरह उन्होंने जहां एक तरफ कबीर साब के कहे कि ; “राम नाम की लूट है, लूट सके तो लूट / अंत काल पछतायेगा, जब प्राण जायेंगे छूट” को चरितार्थ कर दिखाया वहीँ दूसरी तरफ “कण कण में हैं भगवान” को नयी तरह से परिभाषित कर आध्यात्मिक विमर्श की धारा को नयी दिशा में प्रवाहमान किया।

ऐसा करते में वे भाषा और शब्दकोष को समृद्ध करने का काम करना भी नहीं भूले; भ्रष्टाचार बासी पड़ गया था भाईयों ने उसे “व्यापमं” का संबोधन देकर व्यापकता और पवित्रता दोनों प्रदान की।

सबसे बढ़कर यह कि भाजपा ने इस तरह से हुयी कमाई सिर्फ नेताओं के घर भरने तक ही सीमित नहीं रखी – देश भर में भाजपा कार्यालयों के रूप में इसके ताजमहल भी खड़े किये। मगर कर्नाटक का मामला नवीनता के हिसाब से इन सबसे भी थोड़ा और आगे जाता है।

यह एक और प्रचलित धारणा कि “नागिन भी एक घर छोड़कर काटती है और बाहर कितनी भी टेढ़ी टेढ़ी जाए, अपनी बाँबी में जब घुसती है तो सीधी होकर ही घुसती है” को भी बेकार और कालातीत बनाती है। इसलिए कि ईश्वरप्पा ने जिसे मारा है वह कोई अज्ञात कुलशील ठेकेदार नहीं था। वह खुद उनके ही कुटुम्ब कबीले और विचार गिरोह – जिसे भाई लोग संघ परिवार कहते हैं – का समर्पित सदस्य था। वह आरएसएस का छोटा मोटा कार्यकर्ता नहीं था। बाकायदा ओटीसी प्रशिक्षित था। आरएसएस के संगठन हिन्दू वाहिनी का राष्ट्रीय सचिव था। देश प्रदेश के अनेक संघ प्रचारकों के साथ उसका घरोपा था। वह भारतीय जनता पार्टी का भी अपने इलाके का प्रमुख नेता था। जिनकी वजह से उसने मौत का रास्ता चुना वे ग्रामीण विकास तथा पंचायत मंत्री के एस ईश्वरप्पा तो हैं हीं संघ के अत्यंत पुराने स्वयंसेवक, करीब 50 वर्ष पुराने संघी हैं। जनसंघ के जमाने से भाजपा के देश के बड़े नेताओं में से एक हैं – कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री भी रहे हैं।

इस तरह दोनों ही पक्ष “मातृभूमि की निःस्वार्थ सेवा” के लिए समर्पित “विश्व के सबसे बड़े” सांस्कृतिक संगठन के प्रतिबद्ध सेवक थे और इनमे से जो खुद ईश्वर थे वे अपने आचरण से एक और कहावत कि “नमक से नमक नहीं खाया जाता” को गलत साबित कर रहे थे। संघी हस्ते संघी ह्त्या ह्त्या न भवति का नया वैदिक सूत्र गढ़ रहे थे।

कहानी में एक ट्विस्ट और भी है और वह यह है कि संतोष पाटिल ने ईश्वरप्पा द्वारा मांगे जा रहे कमीशन की शिकायत भाजपा – आरएसएस के सभी छोटे बड़े नेताओं से की। यहां सुनवाई नहीं हुयी तो उन्होंने ईश्वरप्पा के ब्रह्मा-अप्पा स्वयंसेवक प्रधानमंत्री मोदी के दरबार में गुहार लगाई। उनकी वहां भी नहीं सुनी गयी। आत्महत्या करने के पहले उन्होंने अपने “गुरु जी के साथ दिल्ली जाने” और वहां ब्रह्मा के दरबार में सीधे पहुँचने के इरादे की घोषणा की थी। मगर ईश्वर ने उन्हें वहां जाने ही नहीं दिया।

इस बीच ईश्वरप्पा इस्तीफा दे चुके हैं, उनके खिलाफ एफआईआर हो गयी हैं – और उनके कुलगुरु येदियुरप्पा एलान कर चुके हैं कि “कुछ नहीं होगा; ईश्वरप्पा मंत्रिमंडल में दोबारा वापस आएंगे।)

चलते चलते बिन माँगी सलाह;

कटप्पा ने बाहुबली को क्यों मारा का सवाल देने वाली फिल्म बाहुबली-2 के विम्ब में कहें तो यह है कि देवसेना भी बची रहे, महिष्मती राज्य भी सलामत रहे, कटप्पा की पारम्परिक गुलामी से उपजे दासत्व भाव में भी दाग न लगे और बाहुबली भी न मरे इसके लिए भल्लाल देव को ही कुछ करना होगा।

मतलब यह कि संघ इसका संज्ञान ले, इस हादसे से सबक ले और अपने परिवार में सुलह समझौते – आर्बिट्रेशन – का ऐसा मैकेनिज्म बनाए जहां बँटवारे और हिस्सेदारियों के सारे झगड़े टंटे हल किये जा सकें। ताकि ईश्वर भी बचे रहें, व्यापमी पुण्याई की मलाई भी परिवार में सबको मिल जाए और संतोष पाटिलों को भी बिन बुलाये ईश्वर के पास जाने के रास्ते चुनने से बचाया जा सके।

बादल सरोज

सम्पादक लोकजतन, संयुक्त सचिव अखिल भारतीय किसान सभा

Web title : Why did Eshwarappa kill Patil of his own clan?

दवा-प्रतिरोधक टीबी : क्या सभी जरूरतमंदों तक पहुँच रहे हैं नवीनतम जाँच-इलाज?

tb eradication

Drug-resistant TB: Are the latest tests and treatments reaching all those in need?

दवा-प्रतिरोधक टीबी सम्बंधित जाँच और इलाज में जो शोध पिछले दशक में हुए हैं वह निसंदेह सराहनीय हैं। पर क्या हम इन नवीनतम पक्की जाँच से हर दवा-प्रतिरोधक टीबी से ग्रसित व्यक्ति (person with drug-resistant TB) को चिन्हित कर पा रहे हैं? क्या हम हर जरूरतमंद की नवीनतम बेहतर उपचार से इलाज कर पा रहे हैं?

2030 तक टीबी उन्मूलन कैसे होगा?

विश्व स्वास्थ्य संगठन की वैश्विक टीबी रिपोर्ट (World Health Organization’s global TB report) के अनुसार, लगभग पाँच लाख में से डेढ़ लाख लोगों की हम जाँच कर पाए और इलाज प्रदान कर सके। यदि हम हर रोगी तक जाँच-इलाज बिना-विलम्ब नहीं पहुँचाएँगे तो 2025 तक भारत में और 2030 तक दुनिया में टीबी उन्मूलन कैसे कर पाएँगे?

दवा प्रतिरोधक टीबी के इलाज की अवधि कितनी है?

वैज्ञानिक शोध को यदि देखें तो पाएँगे कि अब दवा प्रतिरोधक टीबी के इलाज की अवधि (Duration of treatment for drug resistant TB) दो साल से घट कर छह माह होना सम्भव है। नवीनतम इलाज उतने विषाक्त नहीं और सफल इलाज की सम्भावना भी 58% से बढ़ कर 90% हो जाती है, मृत्यु का ख़तरा बहुत कम होता है। परंतु यदि यह नवीनतम इलाज, दवा-प्रतिरोधक टीबी के हर रोगी तक नहीं पहुँचेंगे तो न सिर्फ़ जन-स्वास्थ्य की पराजय है बल्कि मानवाधिकार की भी।

जानिए दवा-प्रतिरोधक टीबी क्या है? (Learn about drug-resistant TB in Hindi)

वर्ल्ड टीबी डे 2022 (World TB Day 2022) पर जारी हुआ “द डोस पाडकास्ट” की संचालिका और सीएनएस (सिटिज़न न्यूज़ सर्विस) की संस्थापिका शोभा शुक्ला ने कहा कि जब टीबी कीटाणु (बैक्टिरिया) किसी दवा से प्रतिरोधक हो जाता है तो वह दवा उसको मार नहीं पाती। ऐसी दवा-प्रतिरोधक टीबी के इलाज के लिए अन्य दवा का उपयोग किया जाता है जिससे वह कीटाणु प्रतिरोधक नहीं है। पर दवाएँ सीमित हैं इसीलिए दवा प्रतिरोधक टीबी का इलाज मुश्किल, लम्बा (२ साल तक या अधिक अवधि का), और जटिल हो जाता है, और इलाज के परिणाम भी अपेक्षानुसार नहीं रहते।

दवाओं की विषाक्ता, उनसे हुई विकृतियाँ, आदि अनेक ऐसी चुनौतियाँ हैं जो दवा प्रतिरोधक टीबी के इलाज को अधिक कठिन बना देती हैं। पर अच्छा समाचार यह है कि अब दवा प्रतिरोधक टीबी के इलाज के लिए नए उपचार हैं जो 6-9 माह अवधि के हैं, सफलता की सम्भावना 90% है (पहले 58% से कम थी), विषाक्ता कम है। हमारे समक्ष चुनौती यह है कि नयी जाँच विधि और नए बेहतर उपचार हर जरूरतमंद तक नहीं पहुँच रहे हैं।

वर्ल्ड टीबी डे 2022 पर वैश्विक स्टॉप टीबी पार्टनरशिप (Global Stop TB Partnership) के “वर्किंग ग्रुप ऑफ़ न्यू टीबी ड्रग्स” ने “द डोस पोडकास्ट” का पाँचवा एपिसोड जारी किया जिसमें दुनिया के दो प्रख्यात टीबी वैज्ञानिकों ने भाग लिया और सीएनएस की शोभा शुक्ला ने इस सत्र का संचालन किया।

अमरीका की कैलीफ़ोर्निया विश्वविद्यालय के डॉ गुस्टावो वेल्सकुएज ने कहा कि विश्व स्वास्थ्य संगठन की नवीनतम वैश्विक टीबी रिपोर्ट के अनुसार, दवा-प्रतिरोधक टीबी की सफलता 58% रही है जो बहुत कम है। अनेक देशों या स्थानों पर, इलाज की सफलता दर अत्याधिक कम रही है। 2012 में दवा प्रतिरोधक टीबी की सफलता दर 50% के आसपास थी। पर अब वैज्ञानिक शोध ने यह साबित कर दिया है कि दवा प्रतिरोधक टीबी के इलाज की सफलता 90% तक हो सकती है। यह दो महत्वपूर्ण शोध हैं निक्स-टीबी और जी-निक्स।

दवा प्रतिरोधक टीबी के इलाज की सफलता दर कितनी है? | What is the success rate of drug resistant TB treatment?

निक्स-टीबी शोध की प्रमुख शोधकर्ता और दक्षिण अफ़्रीका की विशेषज्ञ डॉ फ़्रानसेसका कोनरेडी ने कहा कि निक्स-टीबी शोध ने यह सिद्ध किया है कि बीपीएएल दवाओं (बिडाक्वीलीन, प्रीटोमानिड और लिनोजोलिड/ Bedaquiline, Pretomanid, Linezolid) से दवा प्रतिरोधक टीबी के इलाज करने पर सफलता दर 90% तक रहता है।

डॉ फ़्रानसेसका दक्षिण अफ़्रीका में कार्यरत रही हैं जहां पहले दवा प्रतिरोधक टीबी के इलाज की सफलता 40% तक रही है।

डॉ फ़्रानसेसका ने बताया कि निक्स-टीबी शोध के नतीजे यकीनन अत्यंत हौसलावर्धक रहे हैं पर एक क़ीमत भी चुकानी पड़ी है। बीपीएएल दवाओं (बिडाक्वीलीन, प्रीटोमानिड और लिनोजोलिड) में लिनोजोलिड एक पुरानी दवा है जिसकी विशक्ता एक चिंता का विषय है। लिनोजोलिड की अधिक मात्रा होने के कारण परिधीय तंत्रिकाविकृति की रिपोर्ट आयी। दो रोगियों को नेत्र में तंत्रिकाविकृति हुई तो कुछ के बोन मैरो में सप्रेशन के कारण हीमोग्लोबिन का स्तर कम हो गया।

निक्स-टीबी शोध के बाद हुआ जीनिक्स शोध

इसीलिए एक नए शोध, जी-निक्स शोध, किया गया कि क्या 90% इलाज की सफलता के साथ-साथ अधिक सुरक्षित और कम विषाक्त इलाज मुमकिन है? इस जी-निक्स शोध में चार समूह थे जिनमें दवा-प्रतिरोधक टीबी के रोगियों का इलाज बीपीएएल दवाओं (बिडाक्वीलीन, प्रीटोमानिड और लिनोजोलिड) से किया गया – पर इन चार समूह में लिनोजोलिड की मात्रा और अवधि दोनों में भिन्नता थी।

  • पहले समूह में लिनोजोलिड 1200 मिग्र, 6 माह तक लेना था
  • दूसरे समूह में लिनोजोलिड 1200 मिग्र, 2 माह तक लेना था
  • तीसरे समूह में लिनोजोलिड 600 मिग्र, 6 माह तक लेना था
  • चौथे समूह में लिनोजोलिड 600 मिग्र, 2 माह तक लेना था

डॉ फ़्रानसेसका ने बताया कि जी-निक्स शोध ने यह साबित किया है कि निक्स-टीबी शोध के नतीजे सही थे – 90% सफल इलाज सम्भव रहा। चारों समूह में 90% इलाज सफलता दर रही। सबसे महत्वपूर्ण यह है कि जैसे-जैसे लिनोजोलिड दवा की मात्रा और अवधि कम हुई वैसे-वैसे विशक्ता भी कम हुई पर इलाज सफलता दर 90% ही रही।

जी-निक्स शोध को यूरोपी देशों और दक्षिण अफ़्रीका में किया गया था और सभी शोध-क्षेत्र में सफलता दर 90% रहा।

डॉ फ़्रानसेसका ने कहा कि उनके अधिकांश दवा-प्रतिरोधक टीबी के रोगी अत्यंत कमजोर आर्थिक-सामाजिक पृष्ठभूमि से आते हैं। इसीलिए जितना जल्दी उनका सफल इलाज हो और वह पुन: अपने समुदाय और रोज़गार पर वापस जा सकें उतना श्रेष्ठतम रहेगा।

इसीलिए दवा प्रतिरोधक टीबी के 6 माह अवधि का इलाज, जिसमें सिर्फ़ मौखिक लेने वाली दवाएँ हैं (एक भी इंजेक्शन नहीं है) और सफलता दर भी 90% है, पहले के इलाज जिसमें दो साल तक लग जाते थे उससे कहीं बेहतर है और सब जगह उपलब्ध होना चाहिए।

जी-निक्स शोध ने यह भी सिद्ध किया कि यदि व्यक्ति दवा-प्रतिरोधक टीबी के साथ-साथ एचआईवी से भी सह-संक्रमित है तो भी बीपीएएल दवाओं से इलाज उतना ही सफल रहता है।

इसीलिए अमरीका के एफ़डीए ने दवा प्रतिरोधक टीबी से ग्रसित लोगों के इलाज के लिए बीपीएएल दवाओं को पारित किया है और 2020 की विश्व स्वास्थ्य संगठन गाइडलाइन्स भी इसका समर्थन करती हैं।

डॉ गुस्टावो वेल्सकुएज ने कहा कि लिनोजोलिड दवा की विशक्ता एक चुनौती बनी हुई है। शोधकर्ता, चिकित्सक एवं स्वास्थ्यकर्मी को निगरानी रखनी होगी और देखभाल करनी होगी जिससे कि लिनोजोलिड वाले इलाज को ले रहे लोगों को कम-से-कम कष्ट हो।

जी-निक्स शोध ने यह सिद्ध किया है कि लिनोजोलिड की मात्रा कम करने से विशक्ता भी कम होती है पर इलाज सफलता दर 90% ही रहती है। इसी तरह से और शोध के ज़रिए कम-से-कम विशक्ता वाली दवाएँ उपयोग में रहनी चाहिएँ।

जब तक सबकी जाँच नहीं होगी तब तक हर जरूरतमंद को दवा कैसे देंगे?

यह ज़मीनी हक़ीक़त है कि दवा प्रतिरोधक टीबी की जाँच अभी भी सबको नसीब नहीं। विश्व स्वास्थ्य संगठन की वैश्विक टीबी रिपोर्ट के अनुसार, 5 लाख लोग हर साल दवा प्रतिरोधक टीबी से ग्रसित होते हैं परंतु एक-तिहाई से भी कम लोगों को जाँच-इलाज मिल पाता है। जो जाँच मिल रही है वह हर जगह नवीनतम जाँच नहीं है, कई जगह रिपोर्ट आने में 6-8 सप्ताह तक लग जाते हैं।

भारत के हर ज़िले में अब ऐसी जाँच उपलब्ध है (जीन एक्स्पर्ट) जिससे 100 मिनट में यह पता चलता है कि टीबी है कि नहीं, और रिफ़ैमपिसिन दवा से टीबी-कीटाणु प्रतिरोधक है कि नहीं। पर अन्य दवाएँ जैसे कि बिडाक्वीलीन से कीटाणु प्रतिरोधक है या नहीं, यह पता करने के लिए फ़िलहाल कोई ऐसी मॉडर्न जाँच नहीं – बल्कि पुरानी वाली जाँच हैं जिसके इस्तेमाल से रिपोर्ट आने में 6-8 हफ़्ते लगते हैं।

यह बहुत ज़रूरी है कि नवीनतम जाँच जैसे कि जीन एक्स्पर्ट, एक्स्पर्ट अल्ट्रा, एक्स्पर्ट एक्सडीआर, आदि सबको हर जगह उपलब्ध हो जिससे कि हर रोगी को यह तुरंत पक्का पता चल सके कि उसको टीबी है कि नहीं, और यदि टीबी है तो कौन सी दवाएँ उस पर असरदार रहेंगी (और कौन से दवाओं से उसका टीबी-बैक्टिरिया प्रतिरोधक है)।

जब तक हर दवा प्रतिरोधक टीबी से ग्रसित व्यक्ति को पक्की जाँच नहीं मिलेगी तब तक उसको नवीनतम इलाज कैसे मिलेगा? टीबी उन्मूलन कैसे सम्भव है? दवा प्रतिरोधक टीबी का संक्रमण फैलना कैसे थमेगा?

बिडाक्वीलीन से भी टीबी बैक्टिरिया हुआ प्रतिरोधक

एक लम्बे इंतेज़ार और लम्बे वैज्ञानिक शोध के पश्चात हमें टीबी की नयी दवाएँ मिली हैं। यदि इनसे टीबी बैक्टिरिया प्रतिरोधक हो गया तो इलाज के विकल्प फिर कम हो जाएँगे। टीबी दवाओं का समझदारी से सही इस्तेमाल करना अत्यंत ज़रूरी है जिससे कि दवा के दुरुपयोग से कोई दवा प्रतिरोधकता न उत्पन्न हो।

डॉ फ़्रानसेसका ने बताया कि दक्षिण अफ़्रीका में उनके कार्यक्रम में जिसके तहत बीपीएएल दवाएँ जरूरतमंद लोगों को दी जाती हैं, उसमें वर्तमान में 70 मरीज़ लाभार्थी हैं जिनमें से 2 रोगियों को बिडाक्वीलीन से प्रतिरोधकता हो चुकी है। वर्तमान में बिडाक्वीलीन प्रतिरोधकता जाँचने के लिए पुरानी वाली जाँच इस्तेमाल होती हैं जिसकी रिपोर्ट आने में 6-8 हफ़्ते लगते हैं।

दक्षिण अफ़्रीका के डॉ नाज़िर इस्माइल ने एक शोध प्रकाशित किया है जिसके अनुसार, जो रोगी रिफ़ैमपिसिन दवा से प्रतिरोधक थे उनमें से 2% बिडाक्वीलीन से भी प्रतिरोधक निकले।

एमडीआर-टीबी, एक्सडीआर-टीबी, प्री-एक्सडीआर-टीबी क्या है? (What is MDR-TB, XDR-TB, Pre-XDR-TB?)

– एमडीआर-टीबी : जब टीबी बैक्टिरिया सबसे प्रभावकारी दो टीबी दवाओं से प्रतिरोधक हो जाए – आइसोनियाज़िड और रिफ़ैमपिसिन।

– एक्सडीआर-टीबी : जब टीबी बैक्टिरिया, आइसोनियाज़िड और रिफ़ैमपिसिन के साथ-साथ फलूरोकुईनोलोन और इंजेक्शन-वाली दवाओं से भी प्रतिरोधक हो

– प्री-एक्सडीआर-टीबी : जब टीबी बैक्टिरिया, आइसोनियाज़िड और रिफ़ैमपिसिन के साथ-साथ फलूरोकुईनोलोन या इंजेक्शन-वाली दवाओं से भी प्रतिरोधक हो

जनवरी 2021 में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने एक्सडीआर-टीबी और प्री-एक्सडीआर-टीबी की परिभाषा में परिवर्तन किया क्योंकि इंजेक्शन-वाली दवाएँ इतनी प्राथमिकता नहीं रह गयी हैं और बेहतर खाने वाली गोलियाँ आ गयी हैं। अब एक्सडीआर-टीबी उसे कहते हैं जब टीबी बैक्टिरिया, आइसोनियाज़िड और रिफ़ैमपिसिन के साथ-साथ फलूरोकुईनोलोन और एक अन्य दवा-समूह या दवा (बिडाक्वीलीन या लीनोजोलिड) से प्रतिरोधक हो। प्री-एक्सडीआर-टीबी अब उसे कहते हैं जब टीबी बैक्टिरिया, आइसोनियाज़िड और रिफ़ैमपिसिन के साथ-साथ फलूरोकुईनोलोन से भी प्रतिरोधक हो।

बॉबी रमाकांत

(विश्व स्वास्थ्य संगठन महानिदेशक से पुरस्कृत बॉबी रमाकांत, सीएनएस (सिटिज़न न्यूज़ सर्विस) से जुड़े हैं।)