प्रारंभिक शिक्षा की चुनौतियां

प्रारंभिक शिक्षा की चुनौतियां

Challenges of early education in Hindi

सभी असंतुष्ट हैं स्कूली शिक्षा से (all are dissatisfied with school education). अंग्रेजी मीडियम में पढ़ने वाले बच्चों के अभिभावकों का कष्ट क्या है? सरकारी स्कूलों में शिक्षक पाठ्यक्रम के साथ न्याय कैसे कर पायेगा? प्रारंभिक शिक्षा की प्रमुख आवश्यकता क्या है? प्रारंभिक बाल्यावस्था शिक्षा की चुनौतियां क्या है? इन विषयों पर चर्चा करते हुए इंदिरा मिश्र का एक पुराना लेख … 

आज स्कूलों में दी जा रही शिक्षा से सभी असन्तुष्ट हैं। जो अंग्रेजी मीडियम में पढ़ते हैं उनके अभिभावकों को यह कष्ट है (What is the problem of parents of children studying in English medium?) कि बच्चों की अपनी संस्कृति की समझ नहीं बढ़ रही। जो निजी स्कूलों में पढ़ रहे हैं वहां फीस बहुत है और वहां पैसे की संस्कृति चलती है जिसको झेलना शिक्षक व बच्चों दोनों के लिए कष्टकर है। बच्चे शिक्षक का हृदय से सम्मान करना नहीं सीखते।

How will the teacher in government schools do justice to the curriculum?

जो बच्चे सरकारी स्कूलों में हैं वहां बहुधा शिक्षक ईमानदारी से अपना काम नहीं करते। कई जगह देखा जाता है कि 10 की जगह 5 शिक्षक ही पढ़ा रहे हैं या एक शिक्षक को 2-3 कक्षाओं को एक साथ संभालना पड़ रहा है। ऐसे में वह पाठ्यक्रम के साथ न्याय कैसे कर पायेगा?

सांस्कृतिक जड़ें कमजोर होने के दुष्परिणाम (The consequences of weakening cultural roots)

पहले भाषा और गणित पर बहुत जोर दिया जाता था। पहाड़े रटाये जाते थे। जुबानी हिसाब-किताब के गुर सिखाये जाते थे। इसमें शिक्षक की भूमिका प्रमुख थी। सु-लेख और श्रुति-लेख (इमला) की भी परीक्षा होती थी। घर पर भी तख्ती या कापी पर सुलेख का अभ्यास किया जाता था। आज भाषा की शुद्धता पर या भाषा के लालित्य की बात तो कोई नहीं करता। मुहावरों और लोकोक्तियों का प्रयोग सिरे से गायब है। बोलचाल में ‘हिंग्लिश’ प्रचलन में है-जिसमें एक वाक्य भाषा का प्रचलन में है। जिसमें एक वाक्य में 10 शब्दों में से 3 इंग्लिश के होंगे, एक-दो ‘स्लैग’ (चलताऊ भाषा) के होंगे। अर्थात् जो भाषा हमारे सांस्कृतिक नायकों के मुंह से फूलों की तरह झड़ती थी, वह भुलाई जा चुकी है। सांस्कृतिक जड़ें कमजोर होने के कारण आज नाटकों, फिल्मों में भी वे गंभीर मुद्दे उठाये नहीं जाते और इनके विषय निस्सार व नीरस प्रतीत होते हैं अन्यथा निम्नस्तरीय का फूहड़!

संचार माध्यमों ने एकाग्रता का हरण कर लिया (The media lost the concentration)

संचार माध्यमों और मीडिया ने जनसामान्य की एकाग्रता को आज ग्रस लिया है। टी.वी. के ढेरों चैनल्स न जाने कहां-कहां की मनोरंजक सामग्री परोस रहे हैं और हम मानों नशे में डूबे उसी को ग्रहण करते जा रहे है। कहीं एक वाक्य पढ़ा था कि ऊबना, या बोर होना भी कभी-कभी उपयोगी होता है। यह वह समय होता है कि जब किसी नये विचार को आपके मन में आकर बसने के लिए एक खाली जगह मिलती थी। परन्तु यदि आप सभी-जागते घंटों फोन या मोबाईल पर बड़बड़ाते रहेंगे तो किसी न किसी फिल्मी दृश्य पर गौर फरमाते रहेंगे, तो वह जह तो भर गई न जिसमें आप के मन में कोई नया विचार आता- मसलन कि पड़ोस के निर्धन परिवार के बच्चे आगे चलकर क्या करेंगे? एक निर्धन परिवार की लड़की पूरी तरह जीवन की नीरसता और निराशा से घिर कर किसी ए.बी.सी.डी. के साथ, घर से भाग सकती है। माना कि यह उसी परिवार का मसला है तो फिर पड़ोसी होने के नाते और उन लोगों से अधिक प्रबुद्ध या जानकार होने के नाते क्या आपका कोई फर्ज नहीं बनता?

भगिनी निवेदिता ने शिक्षा के बारे में क्या कहा था (शिक्षा के बारे में भगिनी निवेदिता के विचार)

भगेनी निवेदिता ने शिक्षा के बारे में कहा था, कि यह व्यक्तित्व के समग्र विकास के लक्ष्य को लेकर देनी चाहिये। कोई सिद्धान्त लादना नहीं चाहिये बल्कि बच्चों की नैसर्गिक प्रतिभा को बढ़ने के लिए उपयुक्त उर्वर भूमि या वातावरण प्रदान करना शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य (main aim of education) है। साथ ही निर्धन लोगों का जीवन जानने के लिए उन्हें भ्रमण के लिए भेजना, और उन्हें अपने हाथ से कुछ बनाने या उगाने के लिये प्रेरित करना चाहिये। क्या ही अच्छा होता अगर गांव के स्कूलों में ऐसा हुआ होता।

टैगोर का सन्देश : बच्चा शिक्षक का मित्र हो

गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने कहा था, कि मैं तो सामान्यत: स्कूलों को ऐसा पाता था कि जैसे कोई खानेदार सन्दूक हो, जिसमें देखने योग्य कुछ भी न हो, न लेश मात्र सजावट या आकर्षण। ऐसी भी न हो शैक्षणिक संस्थायें। स्कूलों में सलीका और सजावट का समावेश इसके संचालकों का स्कूल से लगाव दर्शाता है। यही है टैगोर का सन्देश जो कहते हैं, बच्चा शिक्षक का मित्र हो।

भारत में जब तक स्वतंत्रता नहीं मिली थी- उस वक्त में गांधीजी ने तथा डॉ. जाकिर हुसैन ने ऐसे स्कूलों की सिफारिश की थी, जहां गणित, मातृभाषा, आदि तो पढ़ाए जाएं, वहीं कुछ ऐसी दस्तकारी भी बच्चों को सिखाई जाए, जिसके बल पर शिक्षकों का वेतन कमाया जा सके। आज उसकी आवश्यकता नहीं है। सर्व शिक्षा अभियान, शिक्षा का अधिकार अधिनियम और 50,000 से अधिक शिक्षक वर्ग अकेले छत्तीसगढ़ जैसे प्रदेश में हैं, जो जनसंख्या के हिसाब से 17वां सबसे बड़ा प्रदेश है। अर्थात् देश में शिक्षकों की संख्या लाखों में है। इन्हें अच्छा खासा वेतन मिलता है। बल्कि शिक्षा कर्मी बनने के लिए इनमें होड़ मची रहती है। फिर क्या कारण है कि बार-बार यह सुनने में आता है कि 5वीं क्लास पास बच्चा अपना नाम तक ठीक से लिखना नहीं जानता! आज की भोगवादी संस्कृति में इनकी सपने कर्तव्यबोध के प्रति एकाग्रता छीन ली है, यही मानना होगा।

प्रकृति प्रेम से दूर छात्र : Student away from nature love (प्रकृति से दूर होने के चलते स्वाभाव से क्रूर, निर्मोही, स्वार्थी, और आत्मकेन्द्रित होते जा रहे हैं बच्चे)

प्रकृति के सौम्य और रौद्र दोनों ही रूप मनुष्य के लिए सतत् कौतुहल का विषय रहे हैं। लेकिन प्राकृतिक साधनों का बेतरतीब दोहन ऐसा हुआ है, कि बच्चों के चलने के लिये नदी किनारा नहीं बचा, पहाड़ों को सड़कों ने घेरा है, नदियों को प्लास्टिक ने सराबोर कर दिया है, हवाओं को प्रदूषण ने हमें ही इन्द्रधनुष देखे वर्षों हो गए। बगीचे- अव्वल तो हैं नहीं और यदि हैं तो तरह-तरह के पक्के चबूतरों, सड़कों, सैलानियों से भरे। हम भूलते जा रहे हैं कि इन सबसे दूर तो बच्चे स्वाभाव से क्रूर, निर्मोही, स्वार्थी, और आत्मकेन्द्रित होते जा रहे हैं। एक दिन एक बालिका अपने माता-पिता सहित हमसे मिलने आई। किन्तु वह पूरे एक घंटे के समय में अपने मोबाईल पर ही अनेक बटन दबाने में व्यस्त रही। उसने हमसे एक शब्द भी नहीं कहा, न सुना। कैसा गहरा है यह बिछोह! कैसा भयानक! इस समय याद आता है। विनोबा भावे का समवाय, जिसमें वे कहते थे कि ज्ञान और कर्म का सम्मेलन शिक्षा में हो। सेवा परायणता पाठशाला में ही सीखी जाए।

वे कहते थे कि छात्र दूसरों के अनुभव और अपने अनुभव मिलाते हुए अपने प्रयोग करें। आज वे संभावनायें बदल गई हैं। सोच विचार की स्वतंत्रता छात्रों के लिए बिरली चीज हो गई है। शिक्षक दिवस हमारे पूर्व राष्ट्रपति डॉ. राधाकृष्णन के सम्मान में 5 सितम्बर को मनाया जाता है। उन्होंने अपने कैरियर की शुरुआत एक शिक्षक के रूप में की थी। वे दर्शनशास्त्री व शिक्षाशास्त्री थे। उन्होंने ही पूरे भारत में विश्वविद्यालय स्थापित करने व संचालन करने की प्रणाली बनाई। उनके प्रतिवेदन (1950) के आधार पर केन्द्रीय विश्वविद्यालय अनुदान आयोग बना। आज तो ये संस्थायें भी बूढ़ी हो चली हैं। संक्षेप में पूरी शिक्षा प्रणाली एक नवाचार की अपेक्षा रखती है।

इंदिरा मिश्र

2014-09-05

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