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नए भारत की चुनौतियां और आरएसएस

Challenges of New India and RSS

मौजूदा दौर सांप्रदायिक ताकतों के आक्रामक रवैय्ये का दौर है। इस दौर को विराट पैमाने पर माध्यमों की क्षमता ने संभव बनाया है। सांप्रदायिक ताकतों, विशेषकर हिन्दुत्ववादी संगठनों की सांप्रदायिक विचारधारा (Communal Ideology of Hindutva Organizations) को व्यापक पैमाने पर प्रचारित-प्रसारित करने में परंपरागत और इलैक्ट्रॉनिक संचार माध्यमों की प्रभावी भूमिका रही है। हिंदुस्तानी ताकतों ने किस तरह की माध्यम रणनीति अख्तियार की, उसका परिप्रेक्ष्य और विचारधारात्मक पक्ष क्या रहा है? इसका समग्रता में मूल्यांकन किया जाना चाहिए।

आरएसएस ने अयोध्या को सांप्रदायिक आंदोलन का केंद्र क्यों चुना? | Why did the RSS choose Ayodhya as the center of the communal movement?

आरएसएस की माध्यम रणनीति पर विचार करते समय पहला प्रश्न यह उठता है कि अयोध्या, मथुरा, वाराणसी का ही चयन क्यों किया गया? इनमें से अयोध्या को ही सांप्रदायिक आंदोलन का केंद्र क्यों चुना गया? क्या यह चयन किसी वैचारिक योजना का अंग है? मेरा मानना है कि सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की दिशा में यह महत्वपूर्ण कदम है। इसका प्रेरक तत्व हिटलर की रणनीति से लिया गया है।

हिटलर ने मीन कॉम्फ में लिखा था कि किसी आंदोलन के लिए स्थान विशेष की भौगोलिक, राजनीतिक महत्ता का महत्वपूर्ण स्थान होता है। स्थान विशेष के कारण ही मक्का या रोम का महत्वपूर्ण स्थान है। किसी स्थान विशेष को केंद्र में रखकर ही एकता को स्वीकृति मिलती है। इस एकता को अर्जित करने के लिए हिटलर ने म्यूनिख का चयन किया।

हिटलर ने म्यूनिख का चयन क्यों किया?

कैनेथ बुक ने ‘रेहटोरिक ऑफ हिटलर्स बैटल्स(Rhetoric of Hitler’s Battles) में रेखांकित किया कि म्यूनिख का चयन धार्मिक दृष्टि एवं पद्धति के आधार पर किया गया। यह भयानक प्रभावकारी औजार साबित हुआ। खासकर जब कई देशों में पूंजीवादी कमजोर हो रहा था। हिटलर ने जब म्यूनिख को केंद्र बनाया तो आर्य श्रेष्ठता को जर्मनों से जोड़ा और स्वत:स्फूर्त ढंग से यहूदी विरोधी भावनाओं को उभारा और संसदीय प्रणाली पर हमला किया।

आरएसएस ने हिटलर से क्या सीखा ? क्या हिटलर जैसा है राष्‍ट्रीय स्‍वयं सेवक संघ का एजेंडा? | What did the RSS learn from Hitler? Is the agenda of the Rashtriya Swayamsevak Sangh similar to Hitler?

हिटलर का मानना था कि धार्मिक महत्व के स्थान को आंदोलन का केंद्र चुनने से आर्य एकता, सम्मान, श्रेष्ठत्व अर्जित करने के लिए आंदोलन सफलता अर्जित करेगा। हमारे यहां आरएसएस ने इसी धारणा से प्रेरणा लेकर साम्प्रदायिक एकता के लिए धार्मिक स्थानों का चयन किया है।

हिटलर ने आर्यों की मर्यादा एवं सम्मान को धार्मिक एवं मानवीय स्तर पर अर्जित करने एवं इनके श्रेष्ठत्व की धारणा पर बल दिया। हमारे यहां संघ ने हिंदू सम्मान एवं हिंदुओं की मर्यादा की रक्षा को मुद्दा बनाया। उनके माध्यम नजरिए का अध्ययन करें तो पाएंगे कि वे भी हिंदुओं की उपेक्षा, तिरस्कार एवं अपमानजनक स्थितियों का बार-बार वर्णन करते हैं। हिंदू को भारत का आदिम निवासी मानते हैं और गैर हिंदुओं को, विशेषकर अल्पसंख्यकों को हिंदूराष्ट्र से एकात्म स्थापित करने का आह्वान करते हैं।

आरएसएस के अखबार पांचजन्य के अपना ‘भारत अंक’ (21 मार्च 1993) में आरएसएस के प्रमुख सिद्धांतकार के .सी.सुदर्शन का ‘अगली सदी का हिंदूराष्ट्र’ शीर्षक लेख छपा है। इसमें वे लिखते हैं, ‘मुसलमान और ईसाई भी अपने आपको इस धरती के और यहां के पूर्वजों के साथ जोड़ें। देश के सांस्कृतिक प्रभाव में अपने आपको समरस कर लें। हिदूराष्ट्र की गौरव वृद्धि में योगदान दें।’

आरएसएस एवं उसके सहयोगी संगठन दीनदयाल उपाध्याय के एकात्मवाद का बार-बार प्रचार करते हैं। सुदर्शन ने अपने लेख में लिखा कि ‘जहां तक व्यक्ति के स्वतंत्र अस्तित्व और अधिकार का प्रश्न है, हिंदू चिंतन नहीं मानता कि व्यक्ति का कोई सर्वतंत्र स्वतंत्र अस्तिव है।’

उल्लेखनीय है हिटलर भी व्यक्ति के स्वतंत्र अस्तित्व को अस्वीकार करता था और दीनदयाल उपाध्याय का भी यही दृष्टिकोण था।

व्यक्ति के स्वतंत्र अस्तित्व को अस्वीकार करने का अर्थ है भारतीय नवजागरण की उपलब्धियों का अस्वीकार एवं विरोध करना। भारतीय नवजागरण एवं यूरोपीय नवजागरण, दोनों के प्रभाववश व्यक्ति की स्वतंत्र पहचान, अधिकार एवं ज्ञान-विज्ञान की उपलब्धियां सामने आई। हिटलर ने उन सबको नष्ट किया। सांप्रदायिक ताकतें भारत में भी ऐसा करने का सपना देख रही हैं।

एकात्मवाद मूलत: सांस्कृतिक, जातीय, भाषायी वैविध्य को अस्वीकार करता है। हिंदू सांप्रदायिक चेतना के साथ एक रस हो जाने का संदेश देता है।

सांप्रदायिक ताकतों की माध्यम रणनीति की धुरी है धर्म का भ्रष्टीकरण।

इनकी धार्मिक धारणाओं का धर्म की बुनियादी धारणाओं से दूर-दूर तक संबंध नहीं है। फासिज्म की यह रणनीति जर्मनी में भी थी। उसने धर्म का ‘डि स्टैंडराजइजेशन’ किया था।

कैनेथ बुक ने लिखा भ्रष्टाचार उसकी धुरी था। हिटलर मानता था जो सबसे अच्छी चीज है उसे भ्रष्ट कर दो तो वह सबसे घृणित कार्य भी होगा।

कैनेथ बुक की राय है कि धर्म को भ्रष्ट करने वाले आज दुनिया में सबसे भयानक माने जाते हैं। वे धार्मिक सिद्धांतों के अंदर विकृतियां पैदा करके नई-नई व्याख्याओं को जन्म देते हैं।

Corruption of Hinduism is the basic target of communal forces

हिंदू धर्म का भ्रष्टीकरण सांप्रदायिक ताकतों का मूल लक्ष्य है इससे धार्मिक एवं सामाजिक परंपराओं को विद्रूपीकरण की दिशा में ले जाने में मदद मिलती है। वे हिटलर की तरह ही धर्म को जीवन में सर्वोच्च स्थान देते हैं। हिटलर लोकतंत्र विरोधी था हिंदू सांप्रदायिक ताकतें भी लोकतंत्र का विरोध करती हैं।

सुदर्शन ने लिखा ‘धर्म के नियम का उल्लंघन करने से यह सामंजस्य टूटता है और अव्यवस्था फैलती है।’

वे यह भी मानते हैं कि ‘दसवीं सदी के आसपास पुन: पतन की प्रक्रिया आरंभ होती है और 15 अगस्त 1947 को यह प्रक्रिया पतन के निम्नतम बिंदु पर पहुंचती है जब वेद काल से लेकर आज तक संजोई भारत माता की मूर्ति खंडित होती है।’

यानी सार्वभौम स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में भारत का उदय पतन का निम्नतम बिंदु है। इस तरह आरएसएस के सिद्धांतकार संविधान एवं उसके बुनियादी सिद्धांतों की अवमानना व्यक्त करते हैं।

आरएसएस की माध्यम रणनीति (RSS Medium Strategy) का एक पहलू यह भी है कि वे अपने विरोधियों के मंतव्य, दृष्टिकोण आदि को विकृत रूप में पेश करते हैं। साथ ही, पत्र-पत्रिकाओं में ज्यादा से ज्यादा जगह घेरने के लिए प्रतिदिन विभिन्न संगठनों के नामों से ढेर सारी प्रेस विज्ञप्तियां देते हैं। इंटरनेट पर उनके स्वयंसेवक गंदी-गंदी टिप्पणियां लिखते हैं। वे अफवाहों एवं तथ्यहीन बातों का सघन प्रचार करते हैं,  इसकी ‘पुनरावृत्ति करते हैं। ‘पुनरावृत्ति‘ एवं नारेबाजी की शैली का जन सभाओं एवं माध्यमों में प्रयोग करते हैं।

‘पुनरावृत्ति की शक्ति’ मूलत: विज्ञापन की पर्सुएशन क्षमता का अनुकरण है। हिटलर ने अपनी कृति मीन कॉम्फ एवं जनसभा के भाषणों में इसका प्रभावी प्रयोग किया था। उल्लेखनीय है नाजी प्रचार को पुनरावृत्ति शक्ति के प्रयोग का आदर्श नमूना माना जाता है।

आरएसएस–भाजपा के नेताओं ने माध्यमों एवं जनसभाओं में मूलत: दो विषयों पर जमकर बोला है। प्रथम, मुसलमानों के बर्बर अत्याचारों और मुगल शासकों की असहिष्णुता। दूसरा, हिंदू एकता।

हिंदुत्ववादी अपने नेतृत्व को ‘नार्मल’ और विपक्ष को ‘एबनार्मल’ कहते हैं। वे आर्थिक कठिनाइयों से ज्यादा महत्वपूर्ण ‘हिंदू एकता’ एवं ‘हिंदू गौरव’ को स्थान देते हैं। ‘हिंदू’ को वे रचनात्मक मानते हैं। यह भी बताते हैं कि हिंदुओं की परंपरा में रचनात्मक भूमिका रही है। मुसलमानों की विध्वसंक भूमिका रही है। हिंदू ‘सहिष्णु’ और मुसलमान ‘असहिष्णु’ हैं। हिटलर ने ‘नई जीवन शैली’ की बात की थी। हिंदू सांप्रदायिक ताकतें भी नई हिंदू जीवन पद्धति की वकालत करते हैं।

प्रोफेसर जगदीश्वर चतुर्वेदी

प्रोफेसर जगदीश्वर चतुर्वेदी की एफबी टिप्पणी का संपादित अंश

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