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Arvind Kejriwal

चंडीगढ़-विवाद : हरियाणा-पंजाब के किसानों की एकता तोड़ने का ‘आप’ का प्रयास

चंडीगढ़-विवाद : कृपया जिम्मेदारी से सम्हालें

यह टिप्पणी पंजाब और हरियाणा राज्यों के बीच 1966 से शुरू हुए चंडीगढ़-विवाद के इतिहास और राजनीति के बारे में नहीं है। केंद्र सरकार के केंद्र-शासित प्रदेश चंडीगढ़ की प्रशासनिक व्यवस्था में फेर-बदल संबंधी बयान, और उस बयान पर पंजाब की आम आदमी पार्टी (आप) सरकार के ‘पलटवार’ – विधानसभा में चंडीगढ़ को पंजाब में शामिल करने का प्रस्ताव एक बार फिर पारित करना – की रोशनी में भी चंडीगढ़-विवाद पर यहां विचार नहीं किया गया है।

निर्लज्ज कारपोरेट राजनीति के दौर में जनता को अपनी परवाह स्वयं करनी है

कहने की जरूरत नहीं कि केंद्र की भाजपा सरकार और दिल्ली राज्य की आप सरकार की कॉर्पोरेट-सांप्रदायिक गठजोड़ के साझा प्लेटफॉर्म पर जो पैंतरेबाज़ी चलती रहती है, अब वह पंजाब के स्तर पर भी बखूबी चलेगी। चंडीगढ़-विवाद के संभावित हल पर भी इस टिप्पणी में विचार नहीं किया गया है।

यह संक्षिप्त टिप्पणी इस चिंता और आशंका की मिली-जुली अभिव्यक्ति है कि कारपोरेट राजनीति के दौर में भारत का सत्ताखोर शासक-वर्ग जनता की भावनाओं से खिलवाड़ करने के मामले में पूरा बेलिहाज हो चुका है। लिहाजा, जनता को अपनी परवाह आप करनी है।  

मुझे अच्छी तरह याद है कि पंजाब पुनर्गठन अधिनियम 1966 (THE PUNJAB REORGANISATION ACT, 1966) के तहत जब हरियाणा 1 नवंबर 1966 को एक अलग राज्य के रूप में अस्तित्व में आया, तो लोगों में उमंग की लहर दौड़ गई थी। मैं उस समय तीसरी या चौथी जमात का छात्र था। उस उमंग की अभिव्यक्ति में पूरे हरियाणा में कई लोकगीत रचे गए थे। हरियाणा के लोक-संपर्क विभाग के कलाकार गांव-गांव की जाने वाली अपनी प्रस्तुतियों में उन लोकगीतों को अक्सर गाते थे। हरियाणा बनने से जुड़े लोकगीत स्कूलों में भी खासे लोकप्रिय हुए थे। ‘आजा हरियाणे की सैर करा दूं मतवाले सैलानी’ लोकगीत में पूरे हरियाणा प्रदेश की विविधता और विशिष्टता का पूरा नक्शा खींच दिया गया था। ‘यो सूबो थो पंजाब याको अब बण गो हरियाणो’ लोकगीत गुड़गांव-फरीदाबाद-नूह इलाके में खासा लोकप्रिय हुआ था। मिडल स्कूल में हमारा एक मेवात का सहपाठी पूरे अभिनय के साथ वह लोकगीत सुनाता था। उस लोकगीत के एक बंद की पंक्तियां मुझे अभी याद हैं – ‘हरियाणा ऐक्टिंग मेरी नस-नस पै, हरियाणा नंबर छप गयो हर एक बस पै। अरे ये इधर-उधर सूं आवें घूम कै, देश अपणे लूं जाणो। यो सूबो थो पंजाब याको अब बण गो हरियाणो।’ हरियाणा के अलग राज्य बनने के साथ शुरू हुए हरियाणा रोडवेज के किस्सों का सिलसिला आज तक चल आ रहा है।

लेकिन उमंग का वह माहौल 70 का दशक शुरू होते-होते दोनों राज्यों के बीच उठे चंडीगढ़-विवाद से आक्रांत हो गया। इस कदर कि दोनों तरफ से धार्मिक ग्रंथों की बेअदबी तक की गई। पंजाब में उभरे अलगाववादी-आतंकवादी आंदोलन के तार दोनों राज्यों के बीच के चंडीगढ़-विवाद से भी जुड़े थे। भारत से अलग खालिस्तान की मांग का अलगाववादी-आतंकवादी आंदोलन भारी कीमत चुकाने के बाद दबाया जा सका। लोगों ने एक बार फिर परस्पर सौहार्द और शांति से रहने का संकल्प बनाया। अलगाववादी-आतंकवादी दौर में नफरत और हिंसा का जो दंश देश और खास कर पंजाबी समाज को झेलना पड़ा, वह शासक-वर्ग के लिए एक गंभीर सबक होना चाहिए था। लेकिन पिछले करीब एक दशक से पंजाब में जिस तरह की राजनीति हो रही है, उससे लगता नहीं कि सत्ता की भूख में अंधे शासक-वर्ग ने कोई सबक लिया है।

कौन थे सरदार मोता सिंह?

इस मौके पर मित्र सरदार मोता सिंह की याद आती है।

मोता सिंह अपने गांव बुवान कोठी (जिला फतेहाबाद) से 1963 में इंग्लैंड गए थे। वे लंदन से करीब 100 मील दूर लेमिंगटनस्पा टाउन में रहते थे। वे लेबर पार्टी के वरिष्ठ नेता थे और लगातार 25 साल तक काउंटी काउंसलर चुने गए। वे लेमिंगटन के मेयर भी रहे। पिछले साल 31 जनवरी को 81 साल की उम्र में इंग्लैंड में उनका निधन हुआ।

पंजाबी के कवि और पंजाबी व अंग्रेजी के नियमित स्तंभकार सरदार मोता सिंह भारतीयता की एक अनूठी मिसाल थे। 60 साल तक विदेश में रहने के बावजूद उन्होंने अपना पासपोर्ट भारत का ही रखा। वे एक संजीदा राजनीतिज्ञ थे और भारत में जड़ जमाने वाली कारपोरेट-परस्त और सांप्रदायिक राजनीति के सख्त खिलाफ थे। मैं जब भी उनसे इंग्लैंड या भारत में मिला, उन्होंने इंग्लैंड समेत विदेशों में बसे खालिस्तान समर्थक सिखों को लेकर परेशानी और नाराजगी का इजहार किया। वे कहते थे कि खास मौकों पर ये लोग अपने घरों पर खालिस्तान का झंडा लहराते हैं, जिससे यहां भारतीय समुदाय के लोगों में परस्पर अविश्वास और मनमुटाव पैदा होता है।

2019 के जून महीने में मोता सिंह के साथ मेरी इंग्लैंड में कुछ खालिस्तान समर्थक लोगों से बात-चीत हुई। वे लोग कोई तर्क सुनने को तैयार नहीं थे। 10 साल के आतंकवादी दौर, ऑपरेशन ब्लूस्टार, श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या, उसके बाद दिल्ली समेत भारत के कई शहरों में फैले सिख-विरोधी दंगों में हजारों सिखों के नरसंहार की त्रासदी का उनके ऊपर कोई असर नहीं दिखता था। मैंने जब उनसे खालिस्तान समर्थकों द्वारा आम आदमी पार्टी को समर्थन देने का कारण पूछा, तो उन्होंने कहा कि पंजाब की राजनीति में अकाली-कांग्रेस वर्चस्व को खत्म करने के लिए यह जरूरी है। उनके मुताबिक अकाली-कांग्रेस वर्चस्व को तोड़े बिना खालिस्तान के लिए संघर्ष को फिर से खड़ा नहीं किया जा सकता। 

यह जरूरी नहीं है कि विदेशों में बैठे खालिस्तान समर्थक सिखों की समझ और रणनीति के हिसाब से पंजाब में खालिस्तान समर्थकों के अनुकूल स्थितियां बन जाएंगी। लेकिन देश में सत्ता हथियाने के लिए समुदायों के बीच नफरत, हिंसा और भ्रम फैलाने का जो सरकारी कारोबार इन दिनों जोरों से चल रहा है, उसे देखते हुए पंजाब सरकार द्वारा उछाला गया चंडीगढ़-विवाद डर पैदा करता है। 

किसान आंदोलन ने पंजाब और हरियाणा दोनों राज्यों के हर पेशे और तबके के निवासियों के बीच भाईचारा और एकता कायम की है। आंदोलन में बड़े पैमाने पर पंजाब की स्त्रियों की भागीदारी ने उस भाईचारे और एकता को गहरा आयाम प्रदान किया है। आंदोलन की राजनीतिक ताकत को विधानसभा चुनावों में आप, जिसने केंद्र सरकार द्वारा थोपे गए तीन काले कृषि कानूनों का समर्थन और दिल्ली पहुंचे किसानों को सरकार के साथ मिल कर गुमराह किया था, खा गई। अब भाईचारे और एकता को बचा कर रखने की जरूरत है।

संयुक्त किसान मोर्चा (एसकेएम) के 28 किसान संगठनों द्वारा पंजाब विधानसभा चुनावों के ठीक पहले बनाए गए संयुक्त समाज मोर्चा ने आप से चुनावी तालमेल बनाने की कोशिश की थी। शायद एसकेएम के ये किसान नेता समझ नहीं पाए कि आप को किसान आंदोलन का जितना इस्तेमाल करना था, उसने कर लिया है।

बहरहाल, कहने का आशय यह कि एसकेएम नेतृत्व में आप के समर्थकों की कमी न पहले थी, न अब है। लिहाजा, पंजाब और हरियाणा के निवासियों के बीच भाईचारा और एकता कायम रखने का जरूरी उद्यम संजीदा नागरिकों की सतत सावधानी से ही सफल हो सकता है। सरकारों और नेताओं से प्रार्थना ही की जा सकती है कि वे चंडीगढ़-विवाद को जिम्मेदारी से सम्हाल कर उपयुक्त समाधान तक पहुंचाएं।   

प्रेम सिंह

(समाजवादी आंदोलन से जुड़े लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व शिक्षक हैं) 

Chandigarh controversy: AAP’s attempt to break the unity of farmers of Haryana-Punjab

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