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चेन्नई की बाढ़ : कौन ज़िम्मेदार है इस अव्यवस्था के लिए?

Chennai Floods: Who is Responsible For The Mess?

विशेषज्ञों का मानना है कि भारी जल निकासी के डिज़ाइन में तकनीकी ख़ामियों (Technical flaws in the design of heavy drainage), शहरीकरण के कारण प्राकृतिक जल निकासी व्यवस्था (natural drainage system) के ख़ात्मे और जल निकायों पर अतिक्रमण की वजह से चेन्नई में हर तरफ जलभराव की स्थिति बनी हुई है।

चेन्नई की गलियों, रिहायशी इलाकों और सड़कों पर एक बार फिर से जलजमाव हो चुका है क्योंकि पिछले हफ्ते महानगर में भारी बारिश हुई थी। बारिश थमने के चार दिन बाद भी शहर के कई हिस्सों में जलभराव की स्थिति बनी हुई है। शहर और इसके बाहरी इलाकों में बाढ़-ग्रस्त स्थिति ने एक बार फिर से इस बहस को छेड़ दिया है कि वर्तमान परिस्थितियों के लिए किसे जिम्मेदार ठहराया जाये। स्थाई समाधान को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।

इस निराशाजनक स्थिति के लिए जहाँ सभी उँगलियाँ राज्य सरकार और वृहत्तर चेन्नई निगम (Greater Chennai Corporation -जीसीसी) की ओर उठ रही हैं, वहीँ इस घटना ने दो द्रविड़ पार्टियों के बीच में एक दूसरे पर कीचड़ उछालने के लिए उत्प्रेरित करने का काम किया है, जबकि कई दशक से इन्हीं दोनों दलों का शासन चल रहा है।

पिछले 15 वर्षों में स्टॉर्मवाटर जल निकासी एवं संबंधित बुनियादी ढाँचे पर कुलमिलाकर 16,000 करोड़ रूपये खर्च किये जा चुके हैं, लेकिन शहर और इसके निवासियों को जलभराव की स्थिति से बचाने के लिए कुछ भी बदलाव नहीं हो सका है।

विशेषज्ञ जहाँ स्टॉर्मवाटर निकासी के निर्माण और तमाम जल निकायों में अतिक्रमण में योजना की कमी की ओर इशारा कर रहे हैं, वहीँ भ्रष्टाचार-विरोधी संगठनों की ओर से चेन्नई के निवासियों की मुश्किलों में इजाफे के लिए भ्रष्ट क्रियाकलापों की ओर ऊँगली उठाई जा रही है।

जल-निकायों की क्षति का कारण (LOSS OF WATER BODIES)

एक समय था जब चेन्नई शहर को उत्तर से दक्षिण तक इसके कई जल-निकायों के लिए जाना जाता था। तीन शहरी नदियाँ, उत्तर में कोसस्थलैय्यार, मध्य में कुउम, और दक्षिण में अडयार बरसात के पानी को अपने में समाहित करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती थीं। पूरे शहर में बकिंघम नहर समुद्र तट के समानांतर चलते हुए इन नदियों को आपस में जोड़ती थी। शहर में सैकड़ों जल निकायों के साथ-साथ बड़ी और छोटी नहरों का जाल भी बिछा हुआ था।

लेकिन शहर में तेजी से विकास के चलते जल निकायों का अतिक्रमण और प्रदूषित होते जाने का क्रम बना हुआ है।

भ्रष्टाचार विरोधी संगठन अरप्पोर इयक्कम के जयराम वेंकटेशन का इस बारे में कहना था

“2015 में आई भीषण, विनाशकारी बाढ़ के बावजूद हमने कोई सबक नहीं लिया है। सरकार को सौंपे गए कई अध्ययनों और रिपोर्टों के बावजूद, छह सालों के बाद भी स्थिति में कोई खास बदलाव नहीं हुआ है।

उन्होंने कहा

“नदियों और नहरों के अलावा शहर में पानी को जमा करने के लिए सैकड़ों की संख्या में जल निकाय मौजूद हैं और वे प्राकृतिक वर्षा जल संचयन प्रणाली के तौर पर काम करने में सक्षम हैं। दुर्भाग्यवश, इन जल निकायों को बहाल करने के लिए किये गए प्रयास और ऐसी इकाइयों के महत्व के बारे में बुनियादी समझ ही अत्यंत दयनीय बनी हुई है।”

पूवुलागिन नानबर्गल के जी सुन्दरराजन का मानना था कि तेजी से बढ़ते शहरीकरण के कारण चेन्नई ने अपनी प्राकृतिक जल निकासी की व्यवस्था को खो दिया है।

उनका कहना था कि

“हमें अपनी बदतर जल निकासी व्यस्था के लिए जलवायु परिवर्तन की आड़ नहीं लेनी चाहिए। 2015 के बाद से, हमारी सभी जल निकासी प्रणालियों को कुछ घंटों में 10 सेंटीमीटर बारिश को जज्ब कर लेने के हिसाब से फिर से डिजाइन किया जाना था। पिछली सरकार ने दावा किया था कि उसने बाढ़ से निपटने के लिए 6,770 करोड़ रूपये खर्च किये थे, लेकिन हमें जमीन पर कोई बदलाव होते नहीं दिखता है।”

अतिक्रमण करने वाले लोग कौन हैं? (WHO ARE THE ENCROACHERS?)

कई अध्ययनों में इस बात को पाया गया है कि अतिक्रमण की वजह से सारे शहर भर के जल निकायों का आकार सिकुड़ चुका है। अतिक्रमण करने वालों की लंबी सूची में राज्य सरकार के विभिन्न विभाग शामिल हैं, जो इसके लिए सरकार को चिरस्थायी दोषी बनाते हैं।

जयराम आरोप लगाते हैं “खुद राज्य सरकार ने ही जल निकायों का अतिक्रमण करके कई सरकारी कार्यालयों का निर्माण कार्य किया है। उदाहरण के लिए, 39 एकड़ के विल्लिवक्कम झील के जीर्णोद्धार के बाद, जल भंडारण के लिए सिर्फ 15 एकड़ का इस्तेमाल किया जा रहा है। सरकार ने 24 एकड़ पर एक सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट और एक थीम पार्क बनाने की योजना बना रखी है।”

बड़े-बड़े घराने और कंपनियां बड़ी आसानी से जलाशयों के अतिक्रमण से बेदखल किये जाने की प्रकिया से बच जाते हैं, लेकिन गरीब लोगों की बेदखली तो एक रोजमर्रा का विषय है।

जयराम के मुताबिक “झुग्गी वासियों के पुनर्वासन के दौरान भी सरकार जल निकायों में बस्तियों के निर्माण कार्य को अंजाम देती है। सेम्मंचेरी ऐसे ही उल्लंघनों का एक उत्कृष्ट नमूना है। हमने जल निकाय में निर्मित पुलिस थाने को भी हटाए जाने के लिए एक मामला दर्ज किया है।”

भूमि को पुनर्वर्गीकृत करने के लिए स्थानीय निकायों में मौजूद सत्ताधारियों को ऐसे जल निकायों को निर्माण कार्यों के उद्देश्य से इस्तेमाल करने से रोकने के लिए चुनौती दी गई है।

इस बात के आरोप लगाये गये थे कि अडयार नदी की और बहने वाले माम्बलम नहर में मलबा गिराए जाने की वजह से शहर के कुछ हिस्सों में बाढ़ की स्थिति विकट हुई थी। अरप्पोर इयक्कम ने जीसीसी के उपर ऐसे उल्लंघनों पर नजर बनाये रखने में विफल रहने का आरोप लगाया, जिसके कारण लोगों को तकलीफ का सामना करना पड़ रहा है।

चेन्नई महानगर विकास प्राधिकरण (सीएमडीए) के उपर जल निकायों में रिहायशी इमारतों का नक्शा पास करने का आरोप लगाया जा रहा है। पर्यावरण कार्यकर्त्ता नित्यानंद जयरामन ने अपने ट्वीट में कहा है, “बरसात के दौरान सिंचाई के टैंक में बाढ़ नहीं आती है। वे भर जाते हैं। यदि आप अपना घर किसी झील के अंदर बनायेंगे, तो आपका घर पानी से भर जाएगा- उसमें बाढ़ नहीं आयेगी। पानी किसी सीएमडीए की मंजूरी की परवाह नहीं करता है।”

वेलाचेरी उन कई जलाशयों में से एक है जिनका क्षेत्र शहरीकरण के चलते पहले की तुलना में काफी सिकुड़ चुका है।

क्या स्टॉर्मवाटर ड्रेन काम कर रहे हैं? (ARE THE STORMWATER DRAINS WORKING?)

हाल ही में हुई बारिश ने एक बार फिर से शहर को पूरी तरह से ठप कर दिया है। मौजूदा द्रमुक सरकार और पिछली अन्नाद्रमुक सरकार की ओर से जल-जमाव की समस्या का समाधान ढूंढ लिए जाने का दावा जल्द ही खोखला साबित हो गया।

मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ़ डेवलपमेंट स्टडीज (एमआईडीएस) के एक सेवानिवृत्त प्रोफेसर जनकराजन ने पिछले एक दशक में निर्मित किये गये स्टॉर्मवाटर नालों की दोषपूर्ण डिजाइन (Defective design of stormwater drains) की ओर इशारा किया है।

उनके मुताबिक, “नालों को पानी अपने साथ ले जाने के लिए वैज्ञानिक तरीके से डिजाइन किया जाना चाहिए। मुझे इस बात में संदेह है कि निर्माण से पहले किसी प्रकार की उंचाई और गुरुत्वाकर्षण का सर्वेक्षण किया गया होगा। नालों का खराब तरीके से रख-रखाव ने भी शहर में जलभराव की विभीषिका को बढ़ाने में अपनी भूमिका निभाई है।”

जयराम ने दावा किया कि अरप्पोर इयक्कम द्वारा किये गए सामाजिक परीक्षण में भी डिजाइन में इस तरह की तकनीकी खामियों की पुष्टि की गई है।

उनका कहना था,

“सारे शहर में नाले हैं, लेकिन वे बरसाती पानी को अवशोषित नहीं कर पा रहे हैं, बल्कि उन्होंने पानी को रोक दिया है। पानी को भण्डारण निकायों तक ले जाने के लिए बहुत सारे अंतर्संबंध गायब हैं और चढ़ाव-उतराव के मुद्दे स्पष्ट रूप से दिख रहे हैं।”

जनकराजन ने लगातार बढ़ती जनसंख्या और घटते शहरी स्थान को भी शहर के द्वारा सामना करने वाली समस्याओं में से एक और वजह गिनाया है।

उन्होंने जोर देते हुए कहा,

“2011 में चेन्नई का जनसंख्या घनत्व 26,000 प्रति वर्ग किलोमीटर से बढ़कर 34,000 हो चुका था। बढ़ते जनसंख्या घनत्व और ढांचागत विकास के परिणामस्वरूप प्रति व्यक्ति जल निकासी की जगह लगातार कम होती जा रही है। इसका एकमात्र समाधान जल निकासी व्यवस्था के संपूर्ण पुनर्गठन में है।”

जीसीसी द्वारा नालों से पानी निकालने के लिए भारी-भरकम मोटर पंपों को इस्तेमाल में लाना, इस बात को स्पष्ट रूप से उजागर कर रहा है कि शहर को बाढ़ से बचाने के लिए जलनिकासी प्रणाली पूरी तरह से नाकाफी है।

WAS THE GOVT PREPARED BEFORE THE MONSOON? क्या सरकार मानसून से पहले तैयार थी?

उत्तर-पूर्व मानसून (एनईएम) के आने से ठीक पहले द्रमुक सरकार ने दावा किया था कि उसने स्टॉर्मवाटर नालों से गाद साफ़ कर दी है। लेकिन, जब बाढ़ की स्थिति लगातार बिगड़ने लगी तो इसके लिए उसने पिछली सरकार को जिम्मेदार ठहराना शुरू कर दिया।

मुख्यमंत्री ने पूर्ववर्ती अन्नाद्रमुक सरकार पर बरसाती नालों के निर्माण कार्य में भ्रष्टाचार करने का आरोप लगाया है और संबंधित समस्याओं का अध्ययन करने के लिए एक जाँच समिति की घोषणा की है। इस पर अन्नाद्रमुक नेताओं की तरफ से द्रमुक सरकार पर उत्तर-पूर्व मानसून के लिए की तैयारियों में कमी का आरोप मढ़ा है।

जयराम ने कहा

“शहर के कुछ हिस्सों में बरसाती पानी नालों के जरिये अवशोषित होने के बजाय सीवर पाइपों के जरिये निकाला जा रहा था, जो स्पष्ट रूप से बुनियादी ढाँचे की विफलता की ओर इंगित करता है। जीसीसी और चेन्नई मेट्रो जल प्राधिकरण आमतौर पर इस मुद्दे पर एक दूसरे पर आरोप मढ़ते हैं, जो उनके बीच में समन्वय की कमी का खुलासा कर रहे हैं।”

उन्होंने यह भी दावा किया कि जीसीसी द्वारा हाल ही में 120 करोड़ रूपये की एक निविदा जारी की गई थी, जिसमें से 30 करोड़ रुपयों का आवंटन मिस्सिंग लिंक के निर्माण के लिए था, जबकि 90 करोड़ रूपये मौजूदा नालों को ध्वस्त करने और पुनर्निर्माण के लिए निर्धारित किये गए थे।

गाद निकासी की प्रक्रिया के अभाव में शहर के चारों और मौजूद प्रमुख भंडारण टैंकों की क्षमता भी पहले से घट चुकी है।

उन्होंने कहा,

“गाद की परत यदि निकाल ली जाती है तो इससे टैंकों की क्षमता में वृद्धि होने के साथ-साथ भारी बारिश के दौरान जलभराव की समस्या को भी कम करने में मदद मिल सकती है।”

नीलाबंरन ए

(न्यूज क्लिक में प्रकाशित खबर का संपादित रूप साभार)

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