Home » समाचार » देश » सामान्य रूप से सीख सकते हैं डिस्लेक्सिया से पीड़ित बच्चे भी
Children's health

सामान्य रूप से सीख सकते हैं डिस्लेक्सिया से पीड़ित बच्चे भी

Children with dyslexia can also learn normally | Child mental health

दुनिया भर में हर दस में से एक बच्चे को होता है डिस्लेक्सिया (One in ten children around the world has dyslexia) | डिस्लेक्सिया से पीड़ित बच्चों के साथ कैसे व्यवहार करें (How to deal with children with dyslexia)?

नई दिल्ली, 29 जुलाई 2017: दुनिया भर में प्रति 10 में से एक बच्चे को डिस्लेक्सिया होता है। डिस्लेक्सिया सीखने की अक्षमता वाली स्थिति है। डिस्लेक्सिया एक सीखने का विकार है जिसमें भाषण ध्वनियों की पहचान करने और अक्षरों और शब्दों (डिकोडिंग) से वे कैसे संबंधित हैं, सीखने में समस्याओं के कारण पढ़ने में कठिनाई होती है। पढ़ने की अक्षमता भी कहा जाता है, डिस्लेक्सिया मस्तिष्क के उन क्षेत्रों को प्रभावित करता है जो भाषा को संसाधित करते हैं।

डिस्लेक्सिया एसोसिएशन ऑफ इंडिया (Dyslexia Association of India) का कहना है कि यदि तरीका सही हो तो डिस्लेक्सिया वाले बच्चे भी सामान्य रूप से सीख सकते हैं।

How many people are dyslexic in India? भारत में कितने लोग डिस्लेक्सिक हैं?

डिस्लेक्सिया एसोसिएशन ऑफ इंडिया का अनुमान है कि भारत में लगभग 10 से 15 प्रतिशत स्कूली बच्चे किसी न किसी प्रकार प्रकार के डिस्लेक्सिया से ग्रस्त हैं। हमारे देश में बहुत सारी भाषाएं हैं, जो स्थिति को और अधिक कठिन बना सकती हैं। यह स्थिति लड़कों व लड़कियों को समान रूप से प्रभावित कर सकती हैं। यदि कक्षा दो तक ऐसे बच्चों की पहचान नहीं हो पाई, तो ऐसे बच्चे बड़े होकर भी इस समस्या से परेशान रह सकते हैं और उस बिंदु पर इसे ठीक नहीं किया जा सकता।

डिस्लेक्सिया का कारण (cause of dyslexia)

इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) के अध्यक्ष डॉ. के.के. अग्रवाल ने कहा, “डिस्लेक्सिक बच्चों का मस्तिष्क मानसिक संरचना और काम के लिहाज से सामान्य मस्तिष्क से भिन्न होता है। ऐसे बच्चों में, मानसिक विकास के लिए जिम्मेदार तंत्रिका तंत्र बचपन से ही अलग प्रकार का होता है। यह भिन्न वाइरिंग ही डिस्लेक्सिया का कारण बनती है। इसी वजह से सीखने व पढ़ने की सामान्य प्रक्रियाएं भी ऐसे बच्चों में लंबा समय ले लेती हैं।”

उन्होंने कहा, “हमारे देश में इस स्थिति के बारे में दुखद बात यह है कि ऐसे बच्चों को आलसी और कम बुद्धि वाला घोषित कर दिया जाता है। ये बातें उनके व्यक्तित्व को प्रभावित कर सकती हैं और उनका आत्मविश्वास व आत्मसम्मान कम होता जाता है। ऐसे बच्चों की मदद करने में प्रारंभिक पहचान एक प्रमुख भूमिका निभा सकती है। बच्चे के परिवार के इतिहास और अन्य संबंधित जानकारी के सहारे ऐसे बच्चों की मदद की जा सकती है।”

बच्चों में डिस्लेक्सिया के लक्षण (Symptoms of dyslexia in children)

डॉ. अग्रवाल ने बताया कि बच्चों में डिस्लेक्सिया के कुछ आम लक्षण हैं- बोलने में कठिनाई, हाथों व आंख में तालमेल न होना, ध्यान न दे पाना, कमजोर स्मरण शक्ति और समाज में फिट होने में कठिनाई।

उन्होंने बताया, “बच्चे की समझदारी का पहला पायदान होते हैं – उसके माता-पिता। उन्हें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि समस्या से भागने की बजाय, वे बच्चे की इस कठिनाई का हल खोजने की कोशिश करें, उसका चेकअप कराएं और उचित इलाज भी करवाने की पहल करें। यदि चिकित्सक बताता है कि बच्चे को डिसलेक्सिया है तो इसे जीवन का अंत न समझें। अपने बच्चे के प्रयासों को समझें, स्वीकार करें और समर्थन करें। धैर्य व समझदारी से इस समस्या का समाधान प्राप्त करने में आसानी हो सकती है।”

डिस्लेक्सिक बच्चों को उनकी शिक्षा और समझ संबंधी समस्याएं दूर करने की तकनीक : Techniques for addressing dyslexic children’s problems with their learning and understanding
  • सकारात्मक दृष्टिकोण रखें (have a positive attitude) : बच्चे के साथ सकारात्मक तरीके से संवाद करें और धैर्य रखें। ऐसे बच्चों को चीजों को समझने में समय लगता है।
  • डिस्लेक्सिक बच्चे अधिक जिज्ञासु होते हैं। इसलिए, उन्हें तार्किक जवाब देना जरूरी है। उनके संदेह दूर करने में उनकी मदद करें।
  • विज्ञान और गणित को टाइम टेबल के हिसाब से पढ़ाने से उन्हें विषयों को समझने में मदद मिल सकती है।
  • ऑडियो-विजुअल सामग्री (audio-visual material) का अधिक उपयोग करें, क्योंकि वे इस तकनीक के साथ चीजों को बेहतर तरीके से समझ सकते हैं। छोटे बच्चों के लिए फ्लैश कार्ड का उपयोग किया जा सकता है।

योग से ऐसे बच्चों में एकाग्रता बढ़ाई जा सकती है। सांस लेने के व्यायाम और वैकल्पिक चिकित्सा दवाइयों से स्थिति को संभालने में मदद मिल सकती है।

हमें गूगल न्यूज पर फॉलो करें. ट्विटर पर फॉलो करें. वाट्सएप पर संदेश पाएं. हस्तक्षेप की आर्थिक मदद करें

Enter your email address:

Delivered by FeedBurner

हमारे बारे में देशबन्धु

Deshbandhu is a newspaper with a 60 years standing, but it is much more than that. We take pride in defining Deshbandhu as ‘Patr Nahin Mitr’ meaning ‘Not only a journal but a friend too’. Deshbandhu was launched in April 1959 from Raipur, now capital of Chhattisgarh, by veteran journalist the late Mayaram Surjan. It has traversed a long journey since then. In its golden jubilee year in 2008, Deshbandhu started its National Edition from New Delhi, thus, becoming the first newspaper in central India to achieve this feet. Today Deshbandhu is published from 8 Centres namely Raipur, Bilaspur, Bhopal, Jabalpur, Sagar, Satna and New Delhi.

Check Also

Say no to Sexual Assault and Abuse Against Women

जानिए खेल जगत में गंभीर समस्या ‘सेक्सटॉर्शन’ क्या है

Sport’s Serious Problem with ‘Sextortion’ एक भ्रष्टाचार रोधी अंतरराष्ट्रीय संस्थान (international anti-corruption body) के मुताबिक़, …

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.