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COVID-19: जानिए चीन ने किस तरह महामारी रोकने के पुराने तरीक़ों में आधुनिक तकनीक-विज्ञान के गठजोड़ का इस्तेमाल किया

China’s all-of-government and all-of-society approach, so rare in the world, has shown that COVID-19 can be contained.

नोवेल कोरोना वायरस (novel coronavirus) या COVID-19 का संक्रमण चीन में धीमा हो रहा है, लेकिन यह वायरस इटली, ईरान या दक्षिण कोरिया में नए केंद्र बना सकता है। अगर ऐसा होता है, तो हम एक वैश्विक महामारी की ओर बढ़ रहे हैं।

25 फरवरी तक दक्षिण कोरिया में 214 मामले सामने आ चुके हैं। उत्तरी इटली के कई कस्बों को पूरी तरह बंद कर दिया गया है। इटली इस वायरस के एक नए केंद्र के तौर पर उभर रहा है, वहां से लौट रहे लोग वायरस को दूसरी जगह फैला रहे हैं। 25 फरवरी को इटली में 100 नए केस सामने आए। हालांकि ईरान में संक्रमित लोगों की संख्या 100 से कम है, लेकिन वहां उपस्वास्थ्य मंत्री के ही इस वायरस से संक्रमित होने की ख़बर ने डर को बढ़ा दिया है। अंदेशा लगाया जा रहा है कि संक्रमण के शिकार लोगों की संख्या ज़्यादा भी हो सकती है।

चीन में कोरोनावायरस के केंद्र ‘हुबेई प्रांत’ को अगर छोड़ दिया जाए, तो वहां 25 फरवरी को महज़ 9 नए मामले सामने आए, जिनमें वायरस की पुष्टि की गई। पिछले कुछ हफ्तों से वहां संक्रमित लोगों की संख्या में लगातार कमी हो रही है। यहां तक कि हुबेई में भी संक्रमित लोगों की संख्या 500 से कम है। जबकि दो हफ्ते पहले ही प्रतिदिन 2500 संक्रमण के मामले सामने आ रहे थे।

चीन की सरकार और लोगों ने इस वायरस को रोकने के लिए ज़बरदस्त प्रयास किए हैं। लेकिन बाकी दुनिया में संक्रमण रोकथाम इतने प्रभावी तरीके से होना मुश्किल है। अच्छी बात यह है कि जिन देशों में संक्रमण सामने आया है, वहां के लोगों ने रोकथाम के लिए चीन का ही रास्ता अख़्तियार किया है। इन देशों में भी कस्बों और संक्रमित स्थानीय जगहों को पूरी तरह से बंद कर दिया गया, मरीज़ों को एकांत में रखा गया और उनसे संबंधित लोगों की तेजी से जांच की गई। ईरान फिलहाल कड़े अमेरिकी प्रतिबंधों का सामना कर रहा है, उसे दवाईयां, डॉयग्नोस्टिक किट और दूसरी चीजों को इकट्ठा करने में दिक्कत हो सकती है, फिर भी ईरान उस इलाके में दूसरे देशों से मजबूत राज्य है।

24 फरवरी को वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइज़ेशन (WHO) के ‘हेल्थ इमरजेंसी प्रोग्राम‘ में कार्यकारी निदेशक माइक रेयान (Mike Ryan, Executive Director of the World Health Organisation’s (WHO) Health Emergencies Programme,) ने कहा,

”अब वक्त आ चुका है कि हम इस महामारी से निपटने के लिए जितना कुछ कर सकते हैं, वो करें। लेकिन कोरोनावायरस को अभी वैश्विक महामारी घोषित करना जल्दबाजी हो जाएगी। जब हम इसके लिए तैयारी की बात करते हैं, तो हमारा मतलब होता है कि संक्रमण के मामलों को खोजा जाए, उनके इलाज़ की पुख़्ता तैयारी की जाए, संक्रमण पीड़ितों के संपर्क में आए लोगों तक तेजी से पहुंच बनाई जाए और मरीज़ों को रखने के लिए सर्वसुविधायुक्त जगहों को तैयार किया जाए। इसके लिए कोई 100 तरीके अपनाने की जरूरत नहीं है, महज़ पांच-छ: कदम ही उठाए जाने काफ़ी हैं।”

WHO ने COVID-19 की रोकथाम के लिए ज़िम्मेदारी से काम किया है। संगठन ने साफ किया कि यह एक नया वायरस है, जिसके बारे में हमें पर्याप्त जानकारी नहीं है। वायरस, चमगादड़ों से पैदा हुआ है। इंसानों में यह छिपकलियों (Pangolin) से होते हुए पहुंचा है। इसके बाद यह वायरस इंसानों से इंसानों में संक्रमित हुआ।

WHO के मुताबिक़, हम इसके फैलाव के बारे में फ्लू वायरस से कम जानकारी रखते हैं। इसके चलते कोरोनावायरस की रोकथाम मुश्किल हो जाती है और वायरस के वैश्विक महामारी बनने के आसार बढ़ जाते हैं।

अगर नए संक्रमण को कुछ हफ्तों के लिए भी रोके जाने में कामयाबी मिलती है, तो दुनिया के पास इस महामारी से निपटने की बेहतर क्षमताएं होंगी। उत्तरी गोलार्द्ध के देशों में फ्लू का मौसम खत्म होने वाला है, इससे अस्पतालों में कई बेड भी खाली होंगे और नई महामारी से निपटने के लिए स्वास्थ्य कर्मियों की जरूरी संख्या भी मौजूद होगी।

Do we have drugs to treat the COVID-19 infections? A combination of HIV drugs—lopinavir with a low dose of ritonavir—can be used to fight the novel coronavirus.

क्या हमारे पास COVID-19 को ठीक करने के लिए जरूरी दवाईयां हैं? HIV ड्रग- ”लोपिनाविर और रिटोनाविर की कम मात्रा के मिश्रण” का इस्तेमाल कोरोनावायरस के खिलाफ़ हो सकता है। WHO ने पुष्टि की है कि इबोला के खिलाफ़ बनाए गए ड्रग- ”रेमडेसिविर” को कोरोनावायरस के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। हालांकि यह ड्रग इबोला के इलाज़ के लिए ठीक साबित नहीं हुआ था।

एक दूसरा तरीका भी है। इसमें कोरोनावायरस से संक्रमण से सफलता के साथ मुकाबला कर चुके लोगों के खून से प्लाज़्मा का स्थानांतरण, संक्रमित रोगी में किया जाता है। ज्यादा बीमार व्यक्ति के लिए इलाज का यह तरीका अपनाया जा सकता है, क्योंकि स्थानांतरित प्लाज़्मा में वायरस से लड़ने वाली एंटीबॉडीज़ मौजूद होते हैं। यह एक तरह का नया इलाज़ है। फिलहाल 30,000 लोग कोरोनावायरस से उबर रहे हैं, मतलब रक्त-दान करने वालों की अच्छी संख्या भी उपलब्ध होगी।

अब वैक्सीन के बारे में क्या?  What about vaccines?

कोरोनावायरस से लड़ने के लिए कई वैक्सीन का निर्माण किया जा रहा है। इनका जल्द ही ”क्लीनिक्ल ट्रायल” होगा।  जेनेटिक इंजीनियरिंग से एक नए वैक्सीन- ”मैसेंजर राइबोन्यूक्लिक एसिड (RNA या mRNA)” को बनाया गया है, जिसका जल्द ही ट्रायल होने वाला है। इस तरीके का वैक्सीन पारंपरिक वैक्सीन से ज्यादा तेजी से तैयार होता है। लेकिन नए वैक्सीन को रोकथाम के लिए इस्तेमाल करने से पहले जानवरों और इंसानों पर पूरी ट्रॉयल से गुजरना होगा। WHO के मुख्य वैज्ञानिक डॉक्टर सौम्या स्वामीनाथन ने 11 फरवरी को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा,

”बड़े स्तर पर वैक्सीन की उपलब्धता के लिए 12 से 18 महीने का वक्त लगेगा।” संक्षेप में कहें तो हम बीमारी के दूसरे चरण के लिए वैक्सीन उपलब्ध करवा पाएंगे, लेकिन फिलहाल की स्थितियों के लिए तो कतई नहीं।

इस भयावह मानवीय आपदा और वैश्विक सहयोग की जरूरत के वक्त में भी, अफ़वाह फैलाने वाली अमेरिकी फैक्ट्रियों ने चीन के खिलाफ़ प्रोपगेंडा युद्ध जारी रखा है। द न्यूयॉर्क टाइम्स और द वाशिंगटन पोस्ट जैसे संस्थानों के नेतृत्व में पश्चिमी मीडिया ने चीन पर बीमारी से निपटने के लिए ”जरूरी प्रयास न करने” और ”जानकारियों को छुपाने” का आरोप लगाया है। पश्चिमी मीडिया ने चीन की तस्वीर कुछ ऐसे बनाने की कोशिश की है, जैसे उसने बीमारी ने निपटने के लिए, मानवाधिकारों का उल्लंघन करने वाले कदम उठाए, जो जरूरी नहीं थे। ऐसा इसलिए किया जा रहा है ताकि पश्चिमी मीडिया चीन को एक तानाशाह राज्य के तौर पर दिखा सके, जो अपने नागरिकों से बहुत दूर है। वो यह मानने के लिए तैयार नहीं हैं कि चीन के नागरिकों ने अपनी सरकार में भरोसा जताया है और अनुशासन का जबरदस्त परिचय दिया है। उन्होंने अपने पैसे को दांव पर लगाया है। लोगों ने लॉक-डॉउन और अलग-थलग किए जाने वाली कठिन प्रक्रिया का संयम से पालन किया है।

चीन के डॉक्टर और नर्स इस जंग में सबसे आगे नेतृत्व कर रहे हैं। संक्रमण के मामलों में गिरावट और इस बीमारी को लगभग एक ही चीनी राज्य में समेटने में मिली कामयाबी इन चीजों का सबूत हैं।

चाहे मानवीय पहलू हो या अर्थव्यवस्था का, चीन के लोगों ने बहुत त्याग किया है। जबकि अमेरिकी मीडिया इन चीजों को लगातार नज़रंदाज़ कर रहा है। ट्रंप के नेतृत्व वाली अमेरिकी सरकार से कोई अपेक्षा भी नहीं होनी चाहिए। लेकिन WHO ने चीन की कामयाबी के बारे में जो तथ्य बताए, उन्हें भी अमेरिका के मीडिया ने नजरंदाज कर दिया।

WHO के पूर्व असिस्टेंट डॉयरेक्टर-जनरल डॉक्टर ब्रूस आयलवार्ड के हवाले से मैं कुछ बातों को रख रहा हूं। आयलवार्ड (Dr. Bruce Aylward, former Assistant Director-General of the WHO and one of the two team leaders of the WHO-China Joint Mission COVID-19) ”WHO-चीन ज्वाइंट मिशन COVID-2019” के दो नेतृत्वकर्ताओं में से एक हैं। यह बातें डॉ आयलवार्ड और डॉ लिआंग वैनियन द्वारा बीजिंग में 24 फरवरी को हुई एक प्रेस कॉन्फ्रेंस से हैं।

प्रेस से बात करते हुए डॉ आयलवार्ड ने कहा,

एक ऐसी बीमारी, जिसके बारे में हम कुछ नहीं जानते थे, उससे निपटने के लिए चीन ने संक्रमण रोकथाम की पुरानी तरकीबें अपनाईं। चीन ने संक्रमण रोकथाम के इतिहास में सबसे आक्रामक, महत्वकांक्षी और चुस्त-दुरुस्त  कार्यक्रम चलाया है।

चीन ने कोरोनावायरस की रोकथाम के लिए पुराने तरीके अपनाए हैं। हाथ धोने का राष्ट्रीय कार्यक्रम, मास्क लगाना, सभी लोगों के लिए तापमान जांच और लोगों को दूर रखने जैसे पुराने तरीके इस पूरी कवायद के तहत अपनाए गए हैं। चीन ने इन पुराने तरीकों में आधुनिक विज्ञान और तकनीकों को अभूतपूर्व तरीके से इस्तेमाल किया। कुछ साल पहले इन तरीकों के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता था।

दो उदाहरण देता हूं। बड़ी संख्या में COVID-19 संक्रमण का शिकार मरीजों को अस्पतालों में जगह दिलाने के लिए चीन ने दूसरी स्वास्थ्य सेवाओं के आम प्रावधानों को ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर जारी कर दिया, यह पूरा कार्यक्रम बेहद आधुनिक तकनीक से सुसज्जित था। जब हम सिचुआन में थे, तो सोच रहे थे कि चीन ने दूर-दराज के इलाकों में कैसे काम किया होगा। उन्होंने हमें बताया कि उन्होंने एक प्राथमिकता के साथ एक 5G प्लेटफॉर्म का निर्माण किया है, जिसके ज़रिए मैदान पर मौजूद जांचकर्ताओं से तुरंत संपर्क स्थापित कर, उन्हें जरूरी मदद मुहैया कराई जा सकती है।

हमने इसे देखने की इच्छा जताई। उन्होंने सिर्फ दो मिनट में एक बड़ी स्क्रीन पर मैदान में मौजूद एक जांच टीम को दिखाया, जो सैकड़ों किलोमीटर दूर थी। इस टीम को कुछ समस्या हो रही थी। समस्या के निपटारे के लिए जांच टीम, राज्य के सबसे बेहतरीन विश्लेषकों से इस तंत्र के ज़रिए लगातार परामर्श ले रही थी। रणनीति के बारे में इस घटना से हमें बहुत कुछ समझ में आ गया। जबकि ख़तरनाक श्वसन संबंधी बीमारी से निपटने के लिए अपनाए जाने वाले आम तरीकों से यह बहुत अलग था।

दूसरी बात यह है कि चीन ने यह सब संभव कैसे किया। कैसे उन्होंने रणनीति को वास्तविकता में बदला? यह सब सिर्फ चीन के सामूहिक दायित्व बोध और उनके लोगों की दृढ़ इच्छाशक्ति की वजह से मुमकिन हुआ। इसमें सामुदायिक स्तर के नेताओं (जिनसे हम मिले) से लेकर ऊपरी स्तर के गवर्नर भी शामिल थे। यह एक बेहद शानदार सामूहिक सरकारीऔर सामूहिक सामाजिकसाझा प्रयास थे। आप में से कई लोग यहां रहने की वजह से इसे महसूस कर रहे होंगे। लेकिन इस तरह की कोशिशें आसानी से दिखाई नहीं देतीं।

डॉ आयलवार्ड ने बीमारी के रोकथाम के लिए चीनी लोगों द्वारा की गई कोशिशों की भी चर्चा की। बतौर ऑयलवर्ड पूरी दुनिया पर चीन के लोगों का उधार है। चीनी लोगों द्वारा जिन सामूहिक सरकारी-सामाजिक तरीकों को अपनाया गया, वैसे उदाहरण आज मिलना मुश्किल है। यह चीन की समाजवादी प्रवृत्ति है, जिसके चलते बाक़ी दुनिया को वक़्त मिला, ताकि वो इस नई बीमारी से निपटने के लिए नए तरीके ईजाद कर सके और हमें इस नई बीमारी की रोकथाम की उम्मीद मिल सके। लेकिन इन चीजों को चीन और उसके लोगों के प्रति पूर्वागृह से ग्रसित पश्चिमी मीडिया देखने में नाकामयाब है।

प्रबीर पुरकायस्थ

अंग्रेजी में लिखा मूल आलेख आप नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं।

COVID-19: How China Supercharged Conventional Epidemic Control with Modern Science and Technology

 

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पलाश विश्वास जन्म 18 मई 1958 एम ए अंग्रेजी साहित्य, डीएसबी कालेज नैनीताल, कुमाऊं विश्वविद्यालय दैनिक आवाज, प्रभात खबर, अमर उजाला, जागरण के बाद जनसत्ता में 1991 से 2016 तक सम्पादकीय में सेवारत रहने के उपरांत रिटायर होकर उत्तराखण्ड के उधमसिंह नगर में अपने गांव में बस गए और फिलहाल मासिक साहित्यिक पत्रिका प्रेरणा अंशु के कार्यकारी संपादक। उपन्यास अमेरिका से सावधान कहानी संग्रह- अंडे सेंते लोग, ईश्वर की गलती। सम्पादन- अनसुनी आवाज - मास्टर प्रताप सिंह चाहे तो परिचय में यह भी जोड़ सकते हैं- फीचर फिल्मों वसीयत और इमेजिनरी लाइन के लिए संवाद लेखन मणिपुर डायरी और लालगढ़ डायरी हिन्दी के अलावा अंग्रेजी औऱ बंगला में भी नियमित लेखन अंग्रेजी में विश्वभर के अखबारों में लेख प्रकाशित। 2003 से तीनों भाषाओं में ब्लॉग

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पलाश विश्वास वरिष्ठ पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता एवं आंदोलनकर्मी हैं। आजीवन संघर्षरत रहना और दुर्बलतम की …