वो चितरंजन सिंह बीमार हैं जिन्हें देखकर महसूस किया कि जनसंघर्ष की आग में कैसे इस्पात ढलता है

पलाश विश्वास

मन बहुत दुःखी है। कोलकाता में इंडियन एक्सप्रेस की नौकरी के दिनों हम देश के किसी भी कोने में जब तब पहुंच जाते थे। अब कोरोना काल में पांव में बेड़ियां पड़ी हुई हैं। मेरे पिता पुलिन बाबू की बात अलग थी। वे कभी भी खाली जेब देश विदेश कहीं नकल सकते थे। सरहद को उन्होंने सरहद कभी नहीं माना और पासपोर्ट वीसा भी नहीं बनाया। वे कहते थे, सड़क पर निकलो तो पैसे की कमी नहीं होती। वे पैदल भी कहीं से कहीं निकल सकते थे। प्रेरणा अंशु के सम्पादक प्रताप मास्साब भी उनकी तरह जुनूनी थे। उनकी सवारी साइकिल थी और वे सवारी गाड़ी और ट्रक का इस्तेमाल भी खूब करते थे।

हमने छात्र जीवन में पैदल खूब चला है पहाड़ और मैदान में। 1980 से मीडिया में होने की वजह से डेडलाइन के दबाव में रहा हमेशा। तब से तनाव घटाने के लिए घड़ी नहीं पहनता। प्रेरणा अंशु के लिए रोज़ कोई न कोई जरूरी काम निकल आता है। इसलिए चार साल से मीडिया से बाहर होने के बाद भी डेडलाइन हमारे लिए सबसे बड़ी दीवार है। इस वजह से अपना लिखा दोबारा पढ़ने की आदत भी नहीं है। यह सबसे बुरा है।

वक्त किसी के लिए ठहरता नहीं है। पुलिन बाबू और मास्साब दोनों वक्त को शिकस्त दे कर निकल चुके हैं। दोनों को कैंसर था। दोनों कैंसर से हारे नहीं। आखिरी सांस तक अपने मोर्चे पर लामबंद रहे।

चित्तरंजन सिंह भी ऐसे ही व्यक्ति हैं। हमेशा अपने मोर्चे पर तैनात। इतना प्रतिबद्ध हमारे हवा हवाई सारे साथी हो जाते तो किसी को बीस जवानों की शहादत के बाद, भारत के 60 किमी अंदर चीनी सेना के लंगर डालने के बाद यह कहने की हिम्मत नहीं होती कि कोई हमारी सीमा में घुसा नहीं, किसी ने कोई कब्जा नहीं किया।

शहादत को युद्धोन्मादी नस्ली धार्मिक ध्रुवीकरण की फासिस्ट राजनीति में हम इतने मजबूर और लाचार नहीं होते कि देश के सबसे प्रतिबद्ध सबसे जहीन बीस साथियों को जेल में बन्द कर दिए जाने के बाद हम साहित्य और कला की विशुद्धता पर गाल बजा रहे हैं और सामाजिक यथार्थ पर एक शब्द लिखने बोलने की हिम्मत नहीं करते।

चित्तरंजन सिंह और कुमुदनी पति से 1979 में इलाहाबाद में मुलाकात हुई थी। तब भी साहित्य का केंद्र भोपाल के भारत भवन के बावजूद इलाहाबाद बना हुआ था। भैरव प्रसाद गुप्त, शैलेश मटियानी, उपेन्द्रनाथ अश्क, मार्कंडेय, मंगलेश डबराल, अमरकांत, वीरेन डंगवाल, सतीश जमाली, शेखर जोशी, दूधनाथ सिंह, रविन्द्र कालिया, ममता कालिया, नीलाभ जैसे लोगों के बीच चित्तरंजन सिंह हमारे हीरो थे। तब से लेकर अब तक उन्हें कभी निष्क्रिय निराश नहीं देखा।

अपने कामरेड, अपने नेता ने जब उनके ही घर में सेंध मारी और एक रात कुमुदिनी ने उनसे कहा दिया कि उनका? विवाह खत्म है और उन्होंने कामरेड को अपना जीवन साथी बना लिया, वे बहुत दुखी हो गए। कोलकाता जनसत्ता पहुंच गए। हमारे साथी विनय विहारी सिंह ने उनका इन्टरव्यू किया जनसत्ता के लिए।

गोरख पांडेय की आत्महत्या से हम दुखी और नाराज थे। लेकिन चित्तरंजन सिंह से इस विश्वासघात पर सवाल यह उठा ली कामरेड की कोई नैतिकता नहीं होनी चाहिए क्या? कामरेड को अपने साथियों से इस तरह विश्वासघात करना चाहिये क्या? फिर दलितों, आदिवासियों और शरणार्थियों के मामले में उनकी करनी और कथनी के फर्क से उस जमात से दूरी बढ़ती ही गई।

चित्तरंजन सिंह ने लेकिन निजी दुख को विचारधारा और प्रतिबद्धता पर हावी होने नहीं दिया। मेरठ से लेकर कोलकाता तक कितनी ही बार उन्हें देखा और महसूस किया कि जनसंघर्ष की आग में कैसे इस्पात ढलता है।

आज हमारे पिता के अंतिम दिनों की तरह बीमारी से चित्तरजन सिंह बिस्तर पर है।

यह दृश्य मेरे पितृशोक को ताजा कर रहा है। मास्साब के अंतिम दिन से पहले उनकी आंखों में जो चमक मैंने देखी थी, मुझे पक्का यकीन है कि उसकी रोशनी हमारे प्रिय मित्र के दिलोदिमाग की रोशनी होगी। मरने से पहले तक पुलिनबाबू जैसे मेहनतकश जनता के दर्द से तड़पते हुए कैंसर को हरा रहे थे, ठीक वही जिगर उनमें भी होगा।

पलाश विश्वास जन्म 18 मई 1958 एम ए अंग्रेजी साहित्य, डीएसबी कालेज नैनीताल, कुमाऊं विश्वविद्यालय दैनिक आवाज, प्रभात खबर, अमर उजाला, जागरण के बाद जनसत्ता में 1991 से 2016 तक सम्पादकीय में सेवारत रहने के उपरांत रिटायर होकर उत्तराखण्ड के उधमसिंह नगर में अपने गांव में बस गए और फिलहाल मासिक साहित्यिक पत्रिका प्रेरणा अंशु के कार्यकारी संपादक।

  बलवंत यादव ने जानकारी दी है

“भईया चितरंजन सिंह देश भर में प्रसिद्ध मानवाधिकार कार्यकर्ता के रूप में जाने जाते हैं। तीन दिन से अस्पताल में भर्ती हैं।

सुगर काफी बढ़ा हुआ है। गौरव हास्पीटल, तिखमपुर, बलिया (उप्र) डाक्टर डी राय की निगरानी में दवा दी जा रही है। पहले से काफी कुछ सुधार में हैं। मुझसे बातचीत नहीं कर पाये क्योंकि थोड़ी देर पहले ही सो गए थे। भाई मनोरंजन सिंह ने कहा कि अभी सोने दीजीए।

बातचीत लम्बी करने में असमर्थ हैं। मिलने के लिए लोग लगातार आ रहे हैं। उनके छोटे भाई मनोरंजन सिंह, अखिलेश सिन्हा और साथियों का आना जाना लगा हुआ है। इनको जानने और मानने वाले लोग देश भर में हैं।

बलिया में जयप्रकाश नारायण के जयंती के पूर्व संध्या पर 10अक्तूबर को हर साल एक समसामयिक विषयों पर गोष्ठी का आयोजन का सिलसिला उन्होंने शुरू किया। जिसको बलिया के क्रान्ति मैदान टाऊन हॉल के बापू भवन में पीयूसीएल के बैनर तले हर साल आयोजित किया जाता है।“

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उपाध्याय अमलेन्दु:
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