Home » Latest » चुन्नी गोस्वामी: भारतीय फुटबॉल की स्वर्णिम पीढ़ी के पर्याय
फुटबॉलर चुन्नी गोस्वामी ,Chuni Goswami, Subimal Goswami,

चुन्नी गोस्वामी: भारतीय फुटबॉल की स्वर्णिम पीढ़ी के पर्याय

मानव जाति अदृश्य शत्रु कोरोना से भयाक्रांत है। इस लाइलाज शत्रु ने जिंदगी जीने की उमंग पर ब्रेक लगा दिया है और इससे बचने के लोग खुद को घरों में कैद कर लिए हैं। ऐसे तनावपूर्ण दौर में 29 से 30 अप्रैल के मध्य, महज 22 घंटों के अंतराल में इरफान खान और ऋषि कपूर जैसे दो विरल अभिनेताओं की असामयिक मौत ने लोगों को हिलाकर रख दिया। लोग इनकी मौत के सदमे से उबर भी नहीं पाये थे कि 30 अप्रैल की शाम अर्थात ऋषि के जाने के महज 9-10 घंटे के अंतराल में महान फुटबॉलर सुबिमल (चुन्नी) गोस्वामी (Chuni Goswami, Subimal Goswami) के निधन की खबर से राष्ट्र को रूबरू होना पड़ गया।

मधुमेह, प्रोस्ट्रेट और तंत्रिका तंत्र संबंधित बीमारियों से जूझ रहे चुन्नी के निकनेम से विख्यात 82 वर्षीय सुबिमल गोस्वामी को 30 अप्रैल की सुबह कोलकाता के सिटी हॉस्पिटल में रुटिन चेकअप के लिए ले जाया गया था, जहां से वापस लौटने के बाद शाम 5 बजे के करीब महज 14 मिनट के अंदर 3 बार दिल के दौरे पड़ने से उनकी मौत हो गई।

दो दिन भी नहीं, महज डेढ़ दिनों में, प्राकृतिक आपदा नहीं, सामान्य स्थिति में तीन-तीन महान शख़्सियतों की मौत के सदमे से देश को कब गुजरना पड़ा था, बताना मुश्किल है।

बहरहाल चुन्नी गोस्वामी का निधन इरफान खान और ऋषि कपूर के जाने से कम दुखद घटना नहीं रही, किन्तु आमजन से लेकर सेलेब्रेटीज़ तक ने जिस तरह सोशल मीडिया पर इरफान खान और ऋषि कपूर के अवदानों को याद करने; उनके प्रति श्रद्धा उड़ेलने मे होड़ लगाया, वैसा चुन्नी गोस्वामी के प्रति नहीं देखा गया।

Indifference to a footballer in a country that considers cricket a religion

वैसे क्रिकेट को धर्म समझने वाले देश में एक फुटबॉलर के प्रति उदासीनता कोई विस्मय की बात नहीं है, किन्तु इरफान और ऋषि कपूर के प्रति श्रद्धा उड़ेलने वाले बड़े- बड़े एक्टरों, क्रिकेटरों, लेखकों द्वारा चुन्नी गोस्वामी की अनदेखी जरूर विस्मय की बात रही ।

अवश्य ही राष्ट्रपति रामनाथ कोविन्द, लोकसभा स्पीकर ओम बिरला, राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलौत, भारतीय क्रिकेट संघ, भारतीय फुटबॉल संघ के साथ कुछ नेता, अभिनेता, स्पोर्ट्स स्टार भी उनके प्रति श्रद्धा ज्ञापन करने के लिए सामने आए, पर                             एआईएफएफ के अध्यक्ष प्रफुल्ल पटेल के शब्दो में, ’भारत के सबसे महान फुटबॉलरों में से एक ‘चुन्नी दा’ भारतीय फुटबाल की स्वर्णिम पीढ़ी का पर्याय बने रहेंगे’, ऐसा संदेश भारतमय नहीं पहुंचा।

Overview of Indian football history

बहरहाल चुन्नी गोस्वामी भारतीय स्पोर्ट्स हिस्ट्री की कितनी बड़ी शख्सियत रहे, इसे जानने के लिए एक बार भारतीय फुटबॉल इतिहास का सिंहावलोकन कर लेना होगा।

फुटबॉल के जानकारों के मुताबिक 1951 से 1962 के कालखंड को भारतीय फुटबॉल का स्वर्ण युग (Golden Age of Indian Football) माना जाता है। इस कालखंड मे सैय्यद अब्दुल रहीम के प्रशिक्षण में भारतीय टीम एशिया की सर्वश्रेष्ठ टीम बन गयी। भारतीय टीम ने 1951 के एशियाई खेलों में स्वर्ण जीता, जिसकी मेजबानी भारत ने ही की थी।1954 के एशियाई खेलों, जो कि मनीला में हुए थे, में भारत ने ग्रुप चरण में दूसरा स्थान प्राप्त किया।

1956 के ओलम्पिक खेलों में भारत ने चौथा स्थान प्राप्त किया। यह भारतीय टीम की सबसे बड़ी उपलब्धि थी। भारतीय टीम ने 1962 के एशियाई खेलों में दक्षिण कोरिया को 2-1 से हराकर स्वर्ण पदक जीता।1964 एशियाई कप में भारत उपविजेता रहा। यह टूर्नामेन्ट भारतीय टीम के लिए यादगार साबित हुआ। इसके बाद भारतीय टीम के प्रदर्शन में जो गिरावट शुरू हुई वह दशकों तक जारी।

बहरहाल 1951 से 1962 तक भारतीय फुटबॉल का जो स्वर्णिम अध्याय रचा गया, उसमें पीके बनर्जी और तुलसीदास बलराम के साथ प्रमुख फॉरवर्ड रहे चुन्नी गोस्वामी। इनके ही सौजन्य से भारतीय फुटबाल उस ऊंचाई पर पहुंचा, जिसका सपना देखना आज की तारीख मे दुष्कर है।

उस स्वर्णिम दौर में गोस्वामी 1956 से 1964 के मध्य  भारत के लिए 50 अंतरराष्ट्रीय मैच (जिसमें से 36 अधिकारिक थे) खेले, जिनमें रोम ओलिंपिक शामिल था। उन्होंने अपने अंतरराष्ट्रीय करियर में 13 गोल दागे। भारतीय फुटबाल टीम के कप्तान के रूप में उन्होंने देश को 1962 एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक और इस्राइल में 1964 एशिया कप में रजत पदक दिलाया। यह अब तक का भारत का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन है।

1962 के एशियन गेम्स में उन्हें सर्वश्रेष्ठ स्ट्राइकर से सम्मानित होने का गौरव प्राप्त हुआ था। उस स्वर्णिम दौर मे असाधारण प्रदर्शन के कारण ही उन्हें 1963 में अर्जुन पुरस्कार और 1983 में पद्मश्री से नवाजा गया। उनके बैलेंस, सिल्की ड्रिब्लिंग स्किल, बॉल कंट्रोल और चालाकी से बॉल पासिंग करने के उनके हुनर ने उन्हें देश का स्टार खिलाड़ी बना दिया था।

उनकी बेहतरीन कद-काठी लोगों को काफी आकर्षित करती थी और इन्हीं खूबियों ने उन्हें अपने युग के अन्य महान लोगों से अलग बना दिया।

वैसे तो चुन्नी गोस्वामी पूरे भारत के हीरो रहे, पर उन्होंने भारतीय फुटबॉल के मक्का कहे जाने वाले कोलकाता के दो प्रमुख क्लबों में से एक, मोहन बागान के प्रति जिस प्रतिबद्धता का परिचय दिया, उससे इस क्लब के समर्थकों के हृदय सिंहासन पर उनका जैसा स्थान बना, वह और किसी की मयस्सर नहीं हुआ। वह 1954 से लेकर 1968 तक लगातार 15 साल तक मोहन बागान क्लब का हिस्सा रहे और इसके लिए 200 गोल किए। इनमें से 145 कलकत्ता फुटबॉल लीग, 25 गोल आईएफए शील्ड, 18 गोल डूरंड कप, 11 गोल रोवर्स कप और एक गोल डॉ. एचके मुखर्जी शील्ड के लिए शामिल है।

सक्रिय फुटबॉल से रिटायर होने के बाद भी उनका रिश्ता मोहन बागान से ताउम्र बना रहा। चुन्नी गोस्वामी ने अपने असाधारण खेल से भारतीय फुटबॉल को बुलंदियों पर पहुंचाने में अविस्मरणीय योगदान तो किया ही, भारतीय फुटबॉल की नर्सरी कहे जाने वाले टाटा फुटबॉल अकादमी(टीएफए) के खड़ा करने में जो योगदान किया, उसे भी कभी नहीं भुलाया जा सकता।

आज भारतीय फुटबॉल सर्किट में 70 फीसद से ज्यादा खिलाड़ी अगर टाटा फुटबॉल अकादमी से हैं तो इसका श्रेय चुन्नी गोस्वामी को ही जाता है।

कार्लटन चैपमैन,  रेनेडी सिंह, एफ लिटाओ, रिजुल मुस्तफा, दीपेंदु बिस्वास, कमलजीत सिंह जैसे कई ऐसे नाम है, जिन्हें चुन्नी गोस्वामी का खोज बताया जाता है।

चुन्नी गोस्वामी ने चुनौतियों का सामना करते हुए टीएफए की ऐसी बुनियाद रखी कि ब्रिटेन की शेफील्ड फुटबॉल अकादमी व स्पेन की एटलेटिको आज डि मैड्रिड जैसी पेशेवर क्लब इसका गुणगान करने से नहीं अघाते।

1986 में जब टाटा स्टील के तत्कालीन प्रबंध निदेशक रूसी मोदी ने लौहनगरी में टाटा फुटबॉल अकादमी (टीएफए) की नींव रखी तो उसे चलाने के लिए ऐसे प्रतिभाशाली खिलाड़ी की जरूरत थी, जो बहुमुखी प्रतिभा का धनी हो। उस समय देश में किसी खेल विशेष का अकादमी खोलने का यह अनोखा प्रयास था।

रूसी मोदी ने काफी गहन विमर्श के बाद चुन्नी गोस्वामी को यह जिम्मेवारी सौंपी। 1986 में वह टाटा फुटबॉल अकादमी के पहले निदेशक बने। रूसी मोदी के सपने को चुन्नी गोस्वामी ने पंख दिया। चार साल के बाद वह टाटा फुटबॉल अकादमी से सेवानिवृत्त हो गए। उनके बाद ही पीके बनर्जी को टाटा फुटबॉल अकादमी का निदेशक बनाया गया था।

टीएफए के पहले बैच के लिए कैडेट को खोजना किसी भागीरथ प्रयास से कम नहीं था। चुन्नी दा ने ऐसे राज्यों का चयन किया, जहां फुटबॉल चयन ट्रायल लगाया जा सकता है। इसमें पंजाब, जम्मू-कश्मीर से लेकर उत्तर पूर्व के कई राज्य शामिल थे। शुरुआत में प्रशिक्षुओं के माता-पिता अपने बच्चों को अकादमी में छोड़ऩे को लेकर चिंतित थे। लेकिन सौम्य स्वभाव के चुन्नी ने उन्हें भरोसा दिया कि अकादमी में बच्चों को घर जैसा माहौल मिलेगा। बाद में बच्चों को अकादमी में ही पढऩे की व्यवस्था की गई। इसके लिए विभिन्न विषयों के शिक्षक अकादमी आते थे।

चुन्नी ने वार्डन से लेकर कोच, सहायक कोच नियुक्त करने में महती भूमिका निभाई।

वास्तव टीएफए को खड़ा करने के लिए अगर बहुमुखी प्रतिभा के धनी खिलाड़ी की जरूरत थी तो वह जरूरत चुन्नी गोस्वामी ही पूरी कर सकते थे। क्योंकि वह सिर्फ अपने जमाने के ही नहीं, बल्कि भारतीय खेल इतिहास की श्रेष्ठतम बहुमुखी प्रतिभावों में एक रहे।
एच.एल. दुसाध (लेखक बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं.)  
लेखक एच एल दुसाध बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। इन्होंने आर्थिक और सामाजिक विषमताओं से जुड़ी गंभीर समस्याओं को संबोधित ‘ज्वलंत समस्याएं श्रृंखला’ की पुस्तकों का संपादन, लेखन और प्रकाशन किया है। सेज, आरक्षण पर संघर्ष, मुद्दाविहीन चुनाव, महिला सशक्तिकरण, मुस्लिम समुदाय की बदहाली, जाति जनगणना, नक्सलवाद, ब्राह्मणवाद, जाति उन्मूलन, दलित उत्पीड़न जैसे विषयों पर डेढ़ दर्जन किताबें प्रकाशित हुई हैं।

चुन्नी गोस्वामी के पास वह सब कुछ था जो एक खिलाड़ी अपने पास होने का सपना देखता है,लेकिन विरले ही लोगों मे वह होती है, जिनमें एक गोस्वामी रहे। उनकी इस प्रतिभा से गैरी सोबेर्स जैसे महान खिलाड़ी तक विस्मित हुये थे। क्योंकि मूलतः फुटबॉलर गोस्वामी ने उन्हे क्रिकेटर के रूप मे हतप्रभ कर दिया था। एक क्रिकेटर के रूप में 1962 में चुन्नी गोस्वामी के करियर की शुरुआत हुई, जब वह रणजी ट्रॉफी में बंगाल के लिए एक ऑलराउंडर के रूप में उभरकर सामने आए। कोलकाता के इस प्रतिभाशाली इंसान ने बंगाल के लिए 46 फर्स्ट क्लास मैच खेले, जिसकी बदौलत उन्हें 1972 में रणजी ट्रॉफी के फाइनल में टीम का नेतृत्व करने का मौका मिला। हालांकि, चुन्नी गोस्वामी को कभी भी नेशनल टीम के लिए क्रिकेट खेलने का मौका नहीं मिला, लेकिन वह 1966-67 सीज़न के दौरान गैरी सोबर्स की अगुवाई वाली वेस्टइंडीज़ टीम के खिलाफ एक अभ्यास मैच में अपनी छाप छोड़ने में जरूर सफल रहे। इस दाएं हाथ के मीडियम पेसर गेंदबाज ने मैच में कुल आठ विकेट लिए, जिसमें पहली पारी में पांच विकेट शामिल थे। वेस्टइंडीज़ को अपने इस टूर गेम में हार का सामना करना पड़ा था।

और अंत में ! इरफान खान और ऋषि कपूर जैसे विरल एक्टरों के साथ ही डेढ़ दिनों के मध्य भारतीय खेल इतिहास के चुन्नी गोस्वामी जैसे विरल खिलाड़ी भी हमें छोडकर चले गए। इनमें फर्क एक ही था कि जहां चुन्नी गोस्वामी अपना सर्वश्रेष्ठ देश को दे चुके थे, वहीं इरफान और ऋषि कपूर के पास देने को बहुत कुछ बाकी था, इसलिए उनकी मौत ज्यादे शॉकिंग रही। किन्तु सवाल पैदा होता है चुन्नी गोस्वामी ने जिस बड़े पैमाने पर राष्ट्र की सेवा की थी, क्या उनके जाने के बाद हम उसे याद कर सके !

एच. एल. दुसाध

(लेखक बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के अध्यक्ष हैं.)

हमारे बारे में उपाध्याय अमलेन्दु

Check Also

आपके काम की खबर,आपके लिए उपयोगी खबर,Useful news for you,

जानिए आज है विश्व विरासत दिवस या विश्व धरोहर दिवस

विश्व विरासत दिवस क्यों मनाते हैं आज रविवार 18 अप्रैल 2021 को International Day For …