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famous human rights activist of Assam Pranab Doley

हिंदुत्व के नाम पर ध्रुवीकरण की राजनीति करने वाली भाजपा आदिवासियों को भी संदिग्ध नागरिक बता रही

सिंधु सभ्यता के वारिस आदिवासी और दलित इस देश के नागरिक नहीं हैं तो नागरिक कौन हैं?

असम में अभयारण्यों की किलेबंदी के खिलाफ आदिवासियों और वनवासियों के वनाधिकार की लड़ाई लड़ रहे असम के प्रसिद्ध मानवाधिकार कार्यकर्ता प्रणब डोले की नागरिकता (Citizenship of famous human rights activist of Assam Pranab Doley) संदिग्ध बताते हुए उनके पासपोर्ट के नवीकरण से इनकार कर दिया गया है।

प्रेरणा अंशु के मानवाधिकार केंद्रित दिसम्बर अंक में इन्हीं प्रणब डोले का लेख (Pranab Doley’s article in Hindi) काज़ीरंगा में कर्फ्यू (Curfew in Kaziranga) प्रकाशित हुआ है। मूल अंग्रेजी से इस लेख का अनुवाद किया है हिंदी की विश्वप्रसिद्ध कवयित्री झारखण्ड में जल जमीन जंगल की लड़ाई में बहादुर योद्धा जसिंता केरकेट्टा ने।

न पढ़ा हो तो तुरन्त पढ़ लें।

2003 में बंगाली विभाजनपीड़ितों को नागरिकता संशोधन कानून बनाकर घुसपैठिया करार देकर हिन्दू बंगालियों को घुसपैठिया करार देकर देशभर में उनका देशनिकाला मुहिम शुरू करके असम में मुसलमानों के साथ भारी संख्या में बंगाली हिंदुओं को डी वोटर यानी संदिग्ध नागरिक बताकर जानवरों की तरह हिटलर की तर्ज पर कॉन्सन्ट्रेशन कॅम्प (concentration camp) में डालकर एनआरसी और एनपीआर के जरिये नागरिकता साबित करने के रास्ते बंद करके हिंदुओं को नागरिकता देने के नाम पर नया नागरिकता संशोधन कानून पुराने संशोधन रद्द किए बिना हिंदुत्व के नाम पर हिन्दू वोटरों के ध्रुवीकरण की राजनीति करने वाली भाजपा अब आदिवासियों को भी संदिग्ध नागरिक (suspected citizen) बता रही है।

असम में एनआरसी (NRC in Assam) के तहत लगभग सारे आदिवासियों की नागरिकता संदिग्ध (Tribal citizenship doubtful) हो गयी है। बाकी देश में भी आदिवासी और वन गांव के राजस्व गांव न होने और एनआरसी के लिए अनिवार्य कागजात न होने के कारण आदिवासियों और दलितों की नागरिकता सन्दिग्ध हो गयी है। इनमें पूर्वी बंगाल के भारत विभाजन के शिकार सभी बंगाली विस्थापित भी शामिल हैं, जिनमें 90 प्रतिशत दलित हैं।

कौन कहता है कि एनआरसी, एनपीआर और सीएए सिर्फ मुसलमानों के खिलाफ है?

असम का उदाहरण काफी है। किसी को नागरिकता देना मकसद हैं ही नहीं, नागरिकता खत्म करके जल जंगल जमीन कारपोरेट हवाले करने के लिए तमाम संशोधन नागरिकता कानून और दूसरे कायदे कानून में कर दिए गए हैं।

सिंधु घाटी की सभ्यता के वारिस आदिवासी और दलित इस देश के नागरिक नहीं हैं तो कौन  नागरिक है?

आदिवासी भूगोल के हमारे मित्र याद करें कि हम 2003 से लगातार देश भर में और खासतौर पर आदिवासी इलाकों में चेतावनी देते रहे हैं कि नागरिकता संशोधन कानून (citizenship amendment act) और आधार परियोजना आदिवासियों को जल जंगल जमीन से बेदखल करने का मास्टर प्लान है क्योंकि उनकी जमीन और जंगल के नीचे की प्राकृतिक संपदा को बिना प्रतिरोध कारपोरेट हवाले किये जाना है।

बंगाल के बाहर 22 राज्यों में जहां बंगाली शरणार्थी बसाए गए हैं, वे सारे इलाके जंगल और पहाड़ के आदिवासी इलाके हैं और इसीलिए पहले बंगाली शरणार्थियों को घुसपैठिया बनाकर आदिवासी इलाके खाली कराकर आदिवासियों से निपटने का यह चाक चौबंद इंतज़ाम है।

बंगाली शरणार्थी घुसपैठिया करार दिए जाने के बाद नागरिकता की उम्मीद में ज्यादा हिन्दू हो गए हैं और असम में उनका हाल देख लीजिए। असम के मुख्यमंत्री के वायदे से उलझकर इनमें से बहुत लोग अब कॉनसन्ट्रेशन कैम्प में सड़ रहे हैं।

अब आदिवासी भी कम हिन्दू नहीं है।

हिंदुत्व की सरकार उनका क्या हाल करने वाली है, काज़ीरंगा में कर्फ्यू उसका उदाहरण है।

खुद बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर ने 1947 के तुरन्त बाद ही पंडित जवाहर लाल नेहरू को पत्र लिखकर शिकायत की थी कि भारत विभाजन के शिकार दलित शरणार्थियों से भेदभाव (Discrimination against Dalit Refugees Victims of the Partition of India) किया गया है।

गौरतलब है कि पूर्वी बंगाल से आये विस्थापितों में 90 प्रतिशत दलित हैं, जिन्हें बंगाल, असम, ओडीशा और त्रिपुरा के अलावा कहीं अनुसूचित दर्जा नहीं मिला है।

इनमें से 10 प्रतिशत को भी पुनर्वास नहीं मिला। सिर्फ उत्तराखण्ड के दिनेशपुर में इन्हें आठ एकड़ जमीन दी गयी। अन्यत्र कहीं 5 एकड़, कहीं तीन एकड़, कहीं एक और आधा एकड़।

बिना पुनर्वास इन्हें घनघोर जंगलों में बाघ का चारा सिर्फ इसलिए बना दिया गया क्योंकि इन्होंने किन्हीं डॉ भीमराव अंबेडकर को जैशोर खुलना सीट से चुना। 71 प्रतिशत हिन्दू जनसंख्या वाले इस चुनाव क्षेत्र के सभी चार जिले जैशोर, खुलना, बोरिशाल और फरीदपुर पाकिस्तान को दे दिए गए। जहां दलितों की जनसँख्या थी। आज भी आज़ाद भारत में उनका उत्पीड़न जारी है।

आदिवासी और दलित एकजुट होकर इस बेदखली का प्रतिरोध न करेंगे तो शरण लेने के लिए धर्मस्थल भी काम नहीं आएंगे और न कोई ईश्वर किसी को बचाएगा।

पलाश विश्वास

हमारे बारे में पलाश विश्वास

पलाश विश्वास। लेखक वरिष्ठ पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता एवं आंदोलनकर्मी हैं । आजीवन संघर्षरत रहना और दुर्बलतम की आवाज बनना ही पलाश विश्वास का परिचय है। एम ए अंग्रेजी साहित्य, डीएसबी कालेज नैनीताल, कुमाऊं विश्वविद्यालय दैनिक आवाज, प्रभात खबर, अमर उजाला, जागरण के बाद जनसत्ता में 1991 से 2016 तक सम्पादकीय में सेवारत रहने के उपरांत रिटायर होकर उत्तराखण्ड के उधमसिंह नगर में अपने गांव में बस गए और फिलहाल मासिक साहित्यिक पत्रिका प्रेरणा अंशु के कार्यकारी संपादक। उपन्यास अमेरिका से सावधान कहानी संग्रह- अंडे सेंते लोग, ईश्वर की गलती। सम्पादन- अनसुनी आवाज - मास्टर प्रताप सिंह चाहे तो परिचय में यह भी जोड़ सकते हैं- फीचर फिल्मों वसीयत और इमेजिनरी लाइन के लिए संवाद लेखन मणिपुर डायरी और लालगढ़ डायरी हिन्दी के अलावा अंग्रेजी औऱ बंगला में भी नियमित लेखन अंग्रेजी में विश्वभर के अखबारों में लेख प्रकाशित। 2003 से तीनों भाषाओं में ब्लॉग पलाश जी हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं।

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