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Ranjan Gogoi

सीजेआई गोगोई न्यायपालिका पर धब्बा थे, लेकिन बाकी जज सुप्रीम कोर्ट के चीर हरण को देखते हुए भीष्म पितामह की तरह क्यों खामोश थे ?

CJI Gogoi was blot on judiciary, but why were the other justices mute like Bheeshma Pitamah, seeing the cheer haran of the Supreme Court?

भारतीयों को गोगोई के कार्यकाल में न्यायपालिका की विफलताओं के जवाब चाहिएं

Indians need answers to judiciary’s failures in Gogoi’s tenure

जब भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा ने सुप्रीम कोर्ट में मामलों को आवंटित करने में दुर्व्यवहार किया, तो रंजन गोगोई सहित शीर्ष अदालत के चार वरिष्ठतम न्यायाधीशों ने इसका विरोध किया। इन न्यायाधीशों ने जनवरी 2018 में एक खुली प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित करके मिश्रा के खिलाफ आवाज उठाई।

लेकिन गोगई (मैं उसे जस्टिस कहने से इंकार करता हूँ) ने कई गुना अधिक कई तरह के दुराचार किए, और लोगों के अधिकारों की रक्षा करने के कर्तव्य की तिलांजलि देते हुए व्यावहारिक रूप से भाजपा द्वारा संचालित सरकार के समक्ष दण्डवत् किया व लगभग पूरे सुप्रीम कोर्ट को राजनीतिक कार्यपालिका के हवाले कर दिया। जब गोगोई ने यह सब किया, तो सुप्रीम कोर्ट के किसी भी जस्टिस की ओर से खुली असहमति की एक भी आवाज़ नहीं सुनी गई।

जब 1976 का घृणित मीसा जजमेंट (एडीएम जबलपुर बनाम शिवाकांत शुक्ला) दिया गया था, तो कम से कम न्यायमूर्ति एच. आर. खन्ना की बहादुर असहमतिपूर्ण आवाज थी। लेकिन जब नवंबर 2019 में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा शर्मनाक अयोध्या का फैसला सुनाया गया, तो यह सर्वसम्मत था।

गोगोई न्यायपालिका पर एक धब्बा था, लेकिन न्यायिक पक्ष में, सभी न्यायाधीश समान हैं, और मुख्य न्यायाधीश उनके वरिष्ठ नहीं हैं। तब अन्य अन्य न्यायाधीशों ने गोगोई के सामने अपनी अंतरात्मा की आवाज का आत्मसमर्पण क्यों कर दिया, जैसा कि इन उदाहरणों (अन्य बहुत के बीच) से स्पष्ट है:

  1. अयोध्या पीठ में सुप्रीम कोर्ट के पांच न्यायाधीश थे। यह निश्चित रूप से गोगोई के लिए अपेक्षित था, जैसा कि उन्हें केंद्र सरकार ने बताया था। लेकिन अन्य चार न्यायमूर्तियों ने इस तरह के अपमानजनक, निंदनीय और अपमानजनक फैसले पर सहमति कैसे जताई? (देखें ऑनलाइन प्रकाशित अयोध्या का फैसला एक अजीबोगरीब तर्क पर आधारित है)। इन चार न्यायाधीशों की अंतरआत्मा और शर्म कहाँ थी ? या फिर इन न्यायाधीशों ने उन्हें गोगोई को सौंप दिया था?
  2. 2. अक्टूबर 2018 में स्तंभकार अभिजीत अय्यर मित्रा की जमानत याचिका को खारिज करते हुए गोगोई ने एक भद्दी और क्रूर टिप्पणी की : “आपके लिए सबसे सुरक्षित जगह जेल है।” 1977 में राजस्थान राज्य बनाम बालचंद में दिए गए न्यायधीश कृष्णा अय्यर के प्रमुख फैसले के बाद यह अच्छी तरह से तय हो गया है कि जमानत, जेल नहीं, भारतीय अदालतों द्वारा पालन किया जाने वाला सामान्य नियम है, जब तक कि अभियुक्त के फरार होने या सुबूतों छेड़छाड़ की आशंका नहीं है या अभियुक्त एक जघन्य अपराध का आरोपी है। अभिजीत ने केवल कोणार्क मंदिर के बारे में व्यंग्यपूर्ण टिप्पणी की थी, जिसके लिए उन्होंने जल्द ही माफी मांग ली थी।

निश्चित रूप से यह जमानत देने के लिए एक उपयुक्त मामला था, फिर भी याचिका खारिज कर दी गई। गोगोई, निश्चित रूप से, कानूनी सिद्धांतों का पालन नहीं करने में सक्षम थे, लेकिन उनके साथ बेंच के अन्य दो न्यायाधीशों के बारे में क्या कहें? उन्होंने गोगोई से असहमति क्यों नहीं जताई, और उन्हें क्यों नहीं बताया कि यह मामला स्थापित कानून के मद्देनजर जमानत के लायक है? उन्होंने उनके (गोगोई) सामने प्रणाम क्यों कर लिया ?

मुझे याद है जब मैं इलाहाबाद उच्च न्यायालय का न्यायाधीश था, मैं एक बार एक वरिष्ठ न्यायाधीश के साथ एक डिवीजन बेंच पर बैठा था, जिन्होंने ऐसे मामलों में आदेश पारित करना शुरू कर दिया था, जो उन्होंने मुझसे सलाह के बिना सुने थे। दो या तीन मामलों में ऐसा करने के बाद, मैंने उनसे कहा कि यह मुझे स्वीकार्य नहीं है। मैं पीठ का एक समान सदस्य था, और किसी भी आदेश को पारित करने से पहले मुझसे परामर्श किया जाना चाहिए, अन्यथा मैं आदेशों पर हस्ताक्षर नहीं करूँगा। गोगोई के साथ बैठे न्यायधीशों ने उन्हें ऐसा क्यों नहीं कहा?

  1. न्यायमूर्ति अकील कुरैशी के मामले में, सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम के चार सदस्य गोगोई के साथ क्यों गए और भाजपा सरकार के सामने झुक गए, जो अपेक्षाकृत बड़े मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय में मुस्लिम मुख्य न्यायाधीश नहीं चाहती थी, इसके बजाय उन्हें बहुत छोटे त्रिपुरा उच्च न्यायालय भेजा गया था? निश्चित रूप से गोगई से अपेक्षा थी कि वे सरकार की लाइन का अनुसरण करेंगे, लेकिन कॉलेजियम में अन्य चार न्यायाधीशों के बारे में क्या? उनकी अंतरात्मा कहाँ थी?
  2. जस्टिस प्रदीप नंदराजोग के साथ जिस तरह से तुच्छ बर्ताव किया गया वह सर्वविदित है। उच्चतम न्यायालय के पांच-न्यायाधीशों के कॉलेजियम द्वारा उनको सर्वोच्च न्यायलय में पदोन्नत करने की एकमत से सिफारिश की गई थी, और सभी पाँच न्यायाधीशों ने सिफारिश पर हस्ताक्षर किए थे (जैसा तबके कॉलेजियम के एक सदस्य सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति मदन लोकुर, ने मुझे बताया)। लेकिन गोगोई ने, जस्टिस वाल्मिकी मेहता, जो जस्टिस नंदराजोग के सामने अक्षम थे, के नाम की सिफारिश को अपनी जेब में रखा जब तक कि जस्टिस लोकुर सेवानिवृत्त नहीं हो गए,  और फिर एक और अधिक लचीली कॉलेजियम द्वारा सिफारिश (जस्टिस नंदराजोग की पदोन्नति) को वापस ले लिया गया।
  3. गोगोई की अध्यक्षता वाली सर्वोच्च न्यायालय की पीठ द्वारा पूर्व सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा के साथ किया गया बर्ताव अच्छी तरह से याद है। जब न्याय का ऐसा नंगा नाच किया जा रहा था तो दूसरे क्या कर रहे थे?
  4. गोगोई द्वारा यौन उत्पीड़न का आरोप लगाने वाली महिला क्लर्क के मामले में, सुप्रीम कोर्ट के दो अन्य न्यायाधीशों के साथ ही मुख्य न्यायाधीश इस मामले को सुनने के लिए उनके द्वारा गठित तीन-सदस्यीय बेंच में स्वयं बैठ गए। गोगोई ने खुद को सुनवाई से दूर करने का नाटक किया, लेकिन उस मामले में पीठ को भंग चाहिए था और मामले को गोगोई के बिना एक अन्य पीठ के समक्ष सूचीबद्ध किया जाना था। बेंच में मौजूद अन्य दो सदस्यों ने गोगोई के इस अजीब और घिनौने कृत्य को स्वीकार करने के लिए उनका बेंच में बैठना क्यों जारी रखा?
Justice Markandey Katju
Justice Markandey Katju
  कई अन्य ऐसे चौंकाने वाले उदाहरण दिए जा सकते हैं।

गोगोई भारत के मुख्य न्यायाधीश के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान गलती कर रहे थे, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के अन्य न्यायाधीश सर्वोच्च न्यायालय का चीर हरण देखते हुए भीष्म पितामह की तरह मौन क्यों थे? क्या वे समान रूप से दोषी नहीं हैं? उन्होंने गोगोई के दुष्कर्मों की जानकारी देने के लिए एक खुली प्रेस कॉन्फ्रेंस क्यों नहीं की, जैसा कि मिश्रा के मामले में किया गया था?

ये गंभीर सवाल हैं जिनका भारत के लोगों को जवाब चाहिए, अन्यथा न्यायपालिका में उनका विश्वास, जो पहले से ही बहुत कमजोर है, पूरी तरह से गायब हो जाएगा।

जस्टिस मार्कंडेय काटजू

(जस्टिस मार्कंडेय काटजू 2011 में सुप्रीम कोर्ट से सेवानिवृत्त हुए)

अंग्रेजी में प्रकाशित मूल लेख का अनुवाद हस्तक्षेपटीम द्वारा

 

CJI Gogoi was blot on judiciary, but why were the other justices mute like Bheeshma Pitamah, seeing the cheer haran of the Supreme Court?

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