सुनंदा के. दत्ता-रे की यह कैसी अनोखी विमूढ़ता ! ज़मीनी राजनीति से पूरी तरह कटा हुआ एक वरिष्ठ पत्रकार

SUNANDA K. DATTA-RAY ARTICLE INDIAN INEFFICIENCY MAY BE THE SAVING OF INDIA A note of assurance

Comment on SUNANDA K. DATTA-RAY ARTICLE in The telegraph “INDIAN INEFFICIENCY MAY BE THE SAVING OF INDIA : A note of assurance”

जब भी किसी विषय को उसके संदर्भ से काट कर पेश किया जाता है, वह विषय अंधों के लिये हाथी के अलग-अलग अंग की तरह हो जाता है ; अर्थात् विषय के ऐसे प्रस्तुतीकरण को द्रष्टा को अंधा बनाना भी कहा जा सकता है। अच्छे-अच्छे समझदार लोग भी चालाक लोगों की इन चकमेबाजियों के शिकार बन जाते हैं।

आज इसका सबसे ज्वलंत उदाहरण देखने को मिला ‘टेलिग्राफ़’ में वरिष्ठ पत्रकार सुनंदा के दत्ता राय (SUNANDAK. DATTA-RAY) के लेख (INDIAN INEFFICIENCY MAY BE THE SAVING OF INDIA : A note of assurance) में। इस लेख में उन्होंने नागरिकता क़ानून को घोड़े का चश्मा लगा कर सिर्फ़ उतना भर देखा है जितना अभी मोदी-शाह दुनिया को दिखाना चाहते हैं – पड़ौस के तीन मुल्कों के धार्मिक रूप से सताये हुए अल्पसंख्यकों को न्याय और दिलासा देने का एक कदम।

सुनंदा दत्ता राय ने इस विषय पर पैदा हुए व्यापक जन रोष को समझने की जरा भी कोशिश नहीं की है। किसी भी ऊपर से दिखाई देने वाले तथ्य के सत्य को देखने के लिये आदमी की कल्पनाओं की जो अहम् भूमिका होती है, दत्ता राय ने उसका जरा सा भी परिचय नहीं दिया है। भारत के विभाजन के इतिहास के कुछ पुराने पन्नों को तो उन्होंने कुछ आत्मगत ढंग से टटोला है, लेकिन आज जो लोग सत्ता में बैठे हैं, उनकी पृष्ठभूमि, उनकी तमाम करतूतों को ज़रूरी तरजीह देने से चूक गये हैं।

Relations between RSS and Nazism

वे आरएसएस और नाजीवाद के संबंध को ही यदि अपने ज़ेहन में रखते तो कश्मीर, धारा 370, तीन तलाक़ के बाद इस नागरिकता नागरिकता के कहीं ज़्यादा जोखिम भरे इनके खेल की सच्चाई को ठीक पकड़ पाते। उन्हें यह देख पाने में कोई कठिनाई नहीं होती कि मोदी-शाह इन कदमों के ज़रिये किसी को न्याय देने का नहीं, भारत में एक ख़ास समुदाय को क्रमश: अलग-थलग करके अपने हमलों का शिकार बनाने की योजना में लगे हुए हैं, जिसके क्रम में वे भारतीय समाज का ऐसा बर्बरीकरण कर देना चाहते हैं जिसमें सभ्यता और जनतंत्र की किसी भी नीति-नैतिकता की कोई संभावना शेष न रह जाए। वे अपनी प्रेरणा, उनके गुरू गोलवलकर के शब्दों में “भिन्न संस्कृति के लोगों (यहूदियों) से निपटने के श्रेष्ठ उपाय” , नाजीवाद का भारत में प्रयोग (Use of Nazism in India) करना चाहते हैं।

Amit Shah’s crafty announcement to bring NRC after CAA

Arun Maheshwari - अरुण माहेश्वरी, लेखक सुप्रसिद्ध मार्क्सवादी आलोचक, सामाजिक-आर्थिक विषयों के टिप्पणीकार एवं पत्रकार हैं। छात्र जीवन से ही मार्क्सवादी राजनीति और साहित्य-आन्दोलन से जुड़ाव और सी.पी.आई.(एम.) के मुखपत्र ‘स्वाधीनता’ से सम्बद्ध। साहित्यिक पत्रिका ‘कलम’ का सम्पादन। जनवादी लेखक संघ के केन्द्रीय सचिव एवं पश्चिम बंगाल के राज्य सचिव। वह हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं।
Arun Maheshwari – अरुण माहेश्वरी, लेखक सुप्रसिद्ध मार्क्सवादी आलोचक, सामाजिक-आर्थिक विषयों के टिप्पणीकार एवं पत्रकार हैं। छात्र जीवन से ही मार्क्सवादी राजनीति और साहित्य-आन्दोलन से जुड़ाव और सी.पी.आई.(एम.) के मुखपत्र ‘स्वाधीनता’ से सम्बद्ध। साहित्यिक पत्रिका ‘कलम’ का सम्पादन। जनवादी लेखक संघ के केन्द्रीय सचिव एवं पश्चिम बंगाल के राज्य सचिव। वह हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं।

दत्ता राय ने अपने इस लेख में जिस प्रकार सीएए के बाद ही एनआरसी को लाने की अमित शाह की दर्पपूर्ण घोषणा को कोई तवज्जो नहीं दी है, वह इस लेख की सबसे बड़ी कमजोरी है और इसके पीछे के उनके आशय को संदेहास्पद बनाती है। इन दोनों को जोड़ने पर ही सीएए के प्रति मोदी-शाह की अति व्याकुलता और अब एनपीआर के काम में जुट जाने की उनकी तत्परता को सही रूप में समझा जा सकता है। उल्टे, आश्चर्यजनक रूप में वे भारतीय राज्य के निकम्मेपन की आड़ ले कर इन कदमों के दुष्परिणामों की संभावनाओं को कम करके दिखाते हैं ! “सिद्धांततः इन सूचनाओं का प्रयोग पुलिस राज तैयार करने में किया जा सकता है लेकिन यहाँ के जीवन में फैले हुए आलस्य को देखते हुए यह ख़तरा उतना सच नहीं लगता है।”

सुनंदा दत्ता राय के ऐसे मंतव्य और मोदी-शाह की राजनीति (Modi-Shah politics) के सभी पक्षों से आँख मूँदने से यह लेख किंचित प्रबुद्ध जनों तक को धोखा दे पाने में मोदी-शाह की सफलता का एक उदाहरण पेश करता है। भारत के संवेदनशील और जागरूक युवा मोदी-शाह के बदइरादों को जितनी आसानी से पढ़ पा रहे हैं, ज़मीनी राजनीति से पूरी तरह कटा हुआ एक वरिष्ठ पत्रकार इस मामले में यहाँ बिल्कुल ऊसर साबित हुआ है।

अरुण माहेश्वरी

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