Home » Latest » किसान आंदोलन को बिखरने घोषणा करने वाली चालू क़िस्म की पत्रकारिता
Peasant Movement Coverage

किसान आंदोलन को बिखरने घोषणा करने वाली चालू क़िस्म की पत्रकारिता

किसान आंदोलन की गति-प्रकृति पर दैनंदिन टिप्पणियों पर एक टिप्पणी

A Commentary on the Day-to-Day Comments on the Nature of the Peasant Movement

सरकार या कोई भी पत्रकार, जब किसी भी तर्क पर किसान आंदोलन के स्वत: बिखरने की कल्पना करता है, तो उसके यथार्थबोध पर गहरा शक होता है। तब वह आंदोलन की अपनी आंतरिक गति, ‘उसके अपने तर्क’ के प्रति अंधा हो कर पूरी तरह से आत्म-केंद्रित हो चुका होता है।

किसान आंदोलन को यदि ऐसे ही बिखरना होता तो उसका इतने लंबे काल, अब तक चलना ही असंभव होता।

‘आंदोलन का अपना तर्क’ उसकी अपनी आंतरिक गति होती है।

आंतरिक गति का अर्थ है उसमें अन्तर्निहित वह शक्ति जो उसकी अपनी मूल वृत्तियों (basic instincts) को संतुष्ट करने के लिए प्रेरित रहती है।

यह अनेक रूपी होती है जो उसके साथ जुड़ी हुई कोई बाहर की चीज नहीं, उसकी नैसर्गिकता है। इसे मूल वृत्ति को संतुष्ट करने की संभावना कहा जा सकता है, उसका अभीष्ट।

अर्थात् ‘आंतरिक गति’ के उद्दीपन का लक्ष्य स्वयं को संतुष्ट करना होता है। इसे अन्य की कामनाओं के चौखटे में देखना चालू क़िस्म की पत्रकारिता का एक बुनियादी दोष होता है।

अक्सर, अपने को अतिरिक्त समझदार और चपल मानने वाले चालू पत्रकार इसी दोष के चलते अपनी सारी बातों को कोरी बकवास में पर्यवसित कर देते हैं।

हम थोड़ी सी अतिरिक्त जानकारियों से उत्साहित रहने वाले अच्छे-अच्छे पत्रकारों की इन हवाबाजियों के विडंबनापूर्ण मसखरेपन के दृश्यों को हर रोज़ देखते हैं।

वे बात-बेबात आंदोलन के स्वत: बिखर जाने की संभावना की बातों का ऐसे ज़िक्र करते हैं जैसे उन्होंने इसकी आंतरिक गति को अच्छी तरह से जान लिया है ! उनकी यह बेचैनी उनकी सारी चर्चा के एक आंतरिक सूत्र के रूप में ही हमेशा बनी रहती है।

दरअसल,, चीजों को देखने का यह पहलू उनकी खुद की कथित ‘पत्रकारी नैतिकता’ की तटस्थता की उपज है। और यही उस कथित नैतिकता को रसद भी जुटाता है।

कहना न होगा कि किसी भी घटना-क्रम की अपनी ‘खुद की गति’ के प्रति यह बेफ़िक्री ही उन्हें सत्य के प्रति निष्ठा और प्रतिबद्धता से दूर करती है और अंतत: उन्हें एक और बाज़ारू पत्रकारों की श्रेणी में ही खड़ा कर देता है।

अरुण माहेश्वरी

Arun Maheshwari - अरुण माहेश्वरी, लेखक सुप्रसिद्ध मार्क्सवादी आलोचक, सामाजिक-आर्थिक विषयों के टिप्पणीकार एवं पत्रकार हैं। छात्र जीवन से ही मार्क्सवादी राजनीति और साहित्य-आन्दोलन से जुड़ाव और सी.पी.आई.(एम.) के मुखपत्र ‘स्वाधीनता’ से सम्बद्ध। साहित्यिक पत्रिका ‘कलम’ का सम्पादन। जनवादी लेखक संघ के केन्द्रीय सचिव एवं पश्चिम बंगाल के राज्य सचिव। वह हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं।
Arun Maheshwari – अरुण माहेश्वरी, लेखक सुप्रसिद्ध मार्क्सवादी आलोचक, सामाजिक-आर्थिक विषयों के टिप्पणीकार एवं पत्रकार हैं। छात्र जीवन से ही मार्क्सवादी राजनीति और साहित्य-आन्दोलन से जुड़ाव और सी.पी.आई.(एम.) के मुखपत्र ‘स्वाधीनता’ से सम्बद्ध। साहित्यिक पत्रिका ‘कलम’ का सम्पादन। जनवादी लेखक संघ के केन्द्रीय सचिव एवं पश्चिम बंगाल के राज्य सचिव। वह हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं।
Donate to Hastakshep
नोट - हम किसी भी राजनीतिक दल या समूह से संबद्ध नहीं हैं। हमारा कोई कॉरपोरेट, राजनीतिक दल, एनजीओ, कोई जिंदाबाद-मुर्दाबाद ट्रस्ट या बौद्धिक समूह स्पाँसर नहीं है, लेकिन हम निष्पक्ष या तटस्थ नहीं हैं। हम जनता के पैरोकार हैं। हम अपनी विचारधारा पर किसी भी प्रकार के दबाव को स्वीकार नहीं करते हैं। इसलिए, यदि आप हमारी आर्थिक मदद करते हैं, तो हम उसके बदले में किसी भी तरह के दबाव को स्वीकार नहीं करेंगे।

हमारे बारे में उपाध्याय अमलेन्दु

Check Also

priyanka gandhi at mathura

मथुरा की धरती अहंकार को तोड़ती है, भगवान श्रीकृष्ण ने इंद्रदेव का अहंकार तोड़ा था-प्रियंका गांधी

भाजपा सरकार ने भी अहंकार पाल लिया है, किसान से मारपीट कर रही है-प्रियंका गांधी …

Leave a Reply