नई शिक्षा नीति : युवाओं को दिहाड़ी मजदूर बनाने का कार्यक्रम

Modi in Gamchha

हम नई शिक्षा नीति पर सम्वाद (Communication on new education policy) शुरू करने की कोशिश कर रहे हैं। विशेषज्ञों से हमें नई शिक्षा नीति पर मुख्य आपत्तियों के कुछ बिंदु मिले हैं, जो मूल अंग्रेजी में शेयर किए जा रहे हैं।

हम चाहते हैं कि कक्षा पांच तक मातृभाषा के माध्यम से शिक्षा की योजना सर्वत्र लागू हो। उत्तराखण्ड में कुमायूंनी, गढ़वाली, बांग्ला और गुरमुखी जैसी मातृभाषा वाले बच्चे बहुत ज्यादा हैं, लेकिन उनके लिए न पाठ्य पुस्तक हैं और न स्कूल। शिक्षक भी नहीं हैं। ऐसी समस्या हर राज्य में है। इस योजना को कैसे लागू किया जाए, इस पर व्यापक सम्वाद जरूरी है।

दूसरा महत्वपूर्ण मुद्दा शिक्षा का वाणिज्यकरण है। सरकारी और निजी छोटे स्कूल भारी संकट में हैं, वे बन्द होने के कगार पर हैं। जबकि हर सेक्टर पर पूंजी का वर्चस्व और निजीकरण को सत्ता की ओर से प्रोत्साहन है। उच्च शिक्षा में एक-एक साल का सर्टिफिकेट या दो साल का डिप्लोमा युवाओं के किस काम आएगा?

ग्रेजुएशन में चार साल और एमए में एक साल?

जिन्हें विशेषज्ञता नहीं चाहिए, उन्हें रियायत का मतलब आठवीं तक सभी पास की तरह उच्च शिक्षा को बेमतलब करके युवाओं को दिहाड़ी मजदूर बनाने का कार्यक्रम तो नहीं है।

मेडिकल की पढ़ाई के लिए फीस में भारी वृद्धि से गरीबों की क्या कहें, उच्च मध्यम वर्गों के लिए भी मेडिकल कालेजों का दरवाजा बंद कर देने के बाद चिकित्सा की पढ़ाई सिर्फ अमीर बच्चे ही कर पाएंगे।

उच्च शिक्षा संस्थानों जैसे आईआईटी और आईआईएम में रिजर्वेशन के बावजूद फीस इतनी ज्यादा है कि उनमें दाखिला लेना दलितों, पिछड़ों, आदिवासियों, शरणार्थियों, बेरोजगारों, किसानों मजदूरों के बच्चों के लिए असम्भव है।

यही नहीं, उच्च शिक्षा से प्राथमिक शिक्षा के कॉरपोरेटीकरण से देश के नब्बे फीसदी नागरिकों के लिए शिक्षा का अधिकार का मतलब सिर्फ सर्टिफिकेट और डिग्री हासिल करने की साक्षरता अभियान जैसी औपचारिकता है। नई शिक्षा नीति से कारपोरेटीकरण बढ़ेगा। शिक्षा में असमानता और अन्याय की व्यवस्था को और मजबूत बनाने की बुनियाद रखी जायेगी। इसका प्रतिरोध जरूरी है।

शिक्षा के केंद्रीयकरण से क्षेत्रीय विविधता और बहुलता का क्या होगा? राज्यों की क्या भूमिका होगी?

नई शिक्षा नीति में समान गुणवत्ता वाली शिक्षा की कोई खिड़की नहीं खुली है।

जीडीपी का छह प्रतिशत भी एक छलावा है। शिक्षा और उच्च शिक्षा पर बजट लगातार घट रहा है। विश्व विद्यालयों से अपने संसाधन खुद जुटाने को कहा जा रहा है।

कक्षा छह से अनिवार्य व्यावसायिक पाठ और इंटर्नशिप से क्या हम फिर बाल श्रम को बढ़ावा देने जा रहे हैं?

इंटर डिसिप्लिन स्टडी का स्वागत करते हैं लेकिन यह कितना व्यावहारिक होगा।

इन सभी मुद्दों पर हम आपके लिखे का स्वागत करेंगे।

ज्यादातर लोग इस सम्वाद में शामिल हों, इसलिए शब्द सीमा 200 शब्दों की है। सिर्फ विशेषज्ञों के लिए 1500 शब्द के लेख की रियायत है।

पलाश विश्वास

पाठकों सेअपील - “हस्तक्षेप” जन सुनवाई का मंच है जहां मेहनतकश अवाम की हर चीख दर्ज करनी है। जहां मानवाधिकार और नागरिक अधिकार के मुद्दे हैं तो प्रकृति, पर्यावरण, मौसम और जलवायु के मुद्दे भी हैं। ये यात्रा जारी रहे इसके लिए मदद करें। 9312873760 नंबर पर पेटीएम करें या नीचे दिए लिंक पर क्लिक करके ऑनलाइन भुगतान करें