कांप उठी हैं महाशक्तियां/ कि अब ताबूत कम पड़ गए हैं/ कब्रगाहों में जगह नहीं बची है

कोरोना सिर्फ महामारी भर नहीं है। इसमें जन सामान्य के खिलाफ पर्याप्त हिंसा है। साफ दिखा कि एक तरफ किसान और मजदूर तो दूसरी ओर सरकार और काॅरपोरेट। मजदूरों के काफिले वस्तुतः दर्द के काफिले थे। सोशल मीडिया पर यह दर्द आौर प्रतिरोध दर्ज हुआ।

Corona virus In India : ‘बदलना होगा लिखने को लड़ाई में’

कोरोना काल की कविताओं का संकलन ‘दर्द के काफ़िले’ जारी हुआ

A compilation of poems of the Corona period, ‘Dard ke Kafile’ released A compilation of poems of the Corona period, ‘Dard ke Kafile’ released

लखनऊ, 23 दिसम्बर। कोरोना काल की कविताओं का संकलन ‘दर्द के काफिले’ शिरोज हैंगआउट, गोमतीनगर, लखनऊ में जारी किया गया। इसका संपादन जन संस्कृति मंच उत्तर प्रदेश के कार्यकारी अध्यक्ष, कवि और लेखक कौशल किशोर ने किया है। इसमें हिन्दी कविता की कई पीढ़ियों के 87 कवियों की कविताएं शामिल है। विजेन्द्र, रामकुमार कृषक, विष्णु नागर, असद जैदी, अनीता वर्मा, सरला महेश्वरी दिविक रमेश, सुधीर सक्सेना, मदन कश्यप, स्वप्निल श्रीवास्तव, जयप्रकाश कर्दम जैसे वरिष्ठ रचनाकार हैं वही युवाओं की भी अच्छी खासी संख्या है। लखनऊ के चन्द्रेश्वर, शोभा सिंह, सुभाष राय, भगवान स्वरूप कटियार, उमेश पंकज, अशोक श्रीवास्तव, मालविका हरिओम, विमल किशोर, मधु गर्ग, राजवन्त राज, रोली शंकर, फरजाना महदी और मोहित पाण्डेय की कविताएं इसमें हैं।

इस कविता संकलन को जारी करने वालों में प्रमुख थे जनसंदेश टाइम्स के प्रधान संपादक और जाने-माने कवि और लेखक सुभाष राय, कवि और लेखक भगवान स्वरूप कटियार, कवि उमेश पंकज, कवयित्री विमल किशोर, आलोचक अजीत प्रियदर्शी, कवि व आलोचक आशीष सिंह और युवा कवि अचिंत्य त्रिपाठी।

इस मौके पर कवि गोष्ठी भी हुई। शुरुआत उमेश पंकज ने की। उन्होंने ‘दर्द के काफिले’ में संकलित अपनी दोनों कविताओं का पाठ किया। कोरोना काल की त्रासदी को चिन्हित करते हुए वे कहते हैं

‘कितना भयानक समय है यह/कि कांप उठी है महाशक्तियां/कि अब ताबूत कम पड़ गए हैं/ कब्रगाहों में जगह नहीं बची है/लाशों की गिनती अब नहीं की जा रही/अदृश्य हत्यारा पकड़ से बाहर है/पूरी दुनिया तब्दील हो गई है कैदखाने मे’।

इसी भाव विचार को आगे बढ़ाते हुए भगवान स्वरूप कटियार ने अपनी कविता ‘दुनिया एक कारखाना’ सुनाई। वे कहते हैं ‘कैदखाने में तब्दील होती दुनिया के/इस दौर में/दुश्मन की क्रूर हंसी से टकराने के लिए/जरूरत है 130 करोड़ देशवासियों के/जोश भरे अट्टहास की/अब बदलना होगा/लिखने को लड़ाई में/जो ठोक सके दुश्मन के ताबूत में/आखिरी कील’।

 सुभाष राय ने अपनी कविता के माध्यम से कहा कि चाहे जितना भी कठिन और बुरा समय हो उम्मीद को बनाये रखना जरूरी है। अपनी कविता ‘उम्मीद में वे कहते  हैं ‘जब उम्मीद खत्म होने को होती है/तभी जमीन्दोज इमारत के मलबे से/एक शिशु की पुकार फूट पड़ती है/जीवन का अहसास कराती हुई’। विमल किशोर ने संकलन में छपी अपनी कविता ‘फैंस के इस पार या उस पार’ का पाठ किया।

लॉकडाउन के समय में प्रवासी मजदूरों को जिस तरह से महानगरों से पलायन करना पड़ा, उसे कविता में कुछ यू उन्होंने दर्ज किया ‘मीलों पैदल चलकर/घर पहुंचने की आस/पैरों की फटी बेवाइयां/तुम्हारी बेबसी और संघर्ष की कहानी/बयां कर रही हैं/रेल की पटरियों पर बिछी हुई लाशें/क्रूरता की पराकाष्ठा है। कौशल किशोर ने लॉकडाउन में लिखी अपनी कविता ‘कमीज’ का पाठ किया। आशीष सिंह ने संकलन में छपी भास्कर चौधरी की कविता ‘नौ मिनट’ तथा युवा कवि अचिंत्य त्रिपाठी ने इस मौके पर अपनी कविता सुनाई।

‘दर्द के काफिले’ और कोरोना काल की कवितााओं पर बालते हुए आलोचक अजीत प्रियदर्शी का कहना  था कि कोरोना सिर्फ महामारी भर नहीं है। इसमें जन सामान्य के खिलाफ पर्याप्त हिंसा है। साफ दिखा कि एक तरफ किसान और मजदूर तो दूसरी ओर सरकार और काॅरपोरेट। मजदूरों के काफिले वस्तुतः दर्द के काफिले थे। सोशल मीडिया पर यह दर्द आौर प्रतिरोध दर्ज हुआ। कोरो काल की कविताओं में जन व्यथा, जन प्रतिबद्धता तथा प्रतिरेध की मुखर अभिव्यक्ति हुई। इसका संकलन उस दौर का दस्तावेज है।

युवा कवि-आलोचक आशीष सिंह ने कहा कि हमने देखा कि पहली बार सिस्टम कोलैप्स कर गया। पूंजीवादी ताने-बाने का एक्सपोजर हुआ। उसका असली चेहरा सामने आया। दूसरी तरफ सहयोग में लोग सामने आये।

‘दर्द के काफिले’ कविता संकलन उस समय की गवाही देता है। इसमें वरिष्ठ से लेकर युवा तक शामिल हैं। स्त्री रचनाकारों की अच्छी उपस्थित है।
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उपाध्याय अमलेन्दु:
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