आरएसएस की विचारधारा पर चलने वाले कांग्रेसी, पार्टी की राह का सबसे बड़ा रोड़ा बने

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Congressmen who follow the ideology of RSS, become the biggest obstacle in the party’s path

लखनऊ से तौसीफ़ क़ुरैशी। देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस के अंदर भी संकट का दौर चल रहा है। कहते हैं जब बुरा दौर चल रहा होता है तो ऊँट पर बैठे हुए भी कुत्ता काट लेता है, इस लिए बहुत फूंक-फूंक कर क़दम रखना पड़ता है। और यह सही भी है, रखना भी चाहिए। ख़ैर जब मोदी की भाजपा सरकार चारों ओर से घिरी हुई नज़र आ रही है, हर तरफ़ त्राहि- त्राहि है, जनता कांग्रेस की वापसी पर विचार करने को विवश लग रही है, ऐसे समय में कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी मोदी सरकार को हर मोर्चे पर घेरने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ रहे हैं। इस वक्त पूरी कांग्रेस को राहुल गाँधी के पीछे लामबंद होना चाहिए, लेकिन वहाँ तो एक दूसरे को नीचा दिखाने की होड़ मची हुई है।

वरिष्ठ कांग्रेसियों द्वारा जो टांग खिंचाई की जा रही है उसका जनता में ग़लत संदेश जा रहा है, जो कांग्रेस के भविष्य के लिए ठीक नहीं है।

अब सवाल उठता है कि क्या हमेशा वरिष्ठों ने कांग्रेस को कमज़ोर करने का काम किया ?

कांग्रेस की सबसे बड़ी कमज़ोरी उसके अंदर ही मौजूद साँप नहीं बल्कि अजगरों ने कांग्रेस और उसकी विचारधारा को निगल लिया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उसके अंदर RSS की विचारधारा को पसंद करने एवं उस पर काम करने वाले मौजूद हैं, जो हिन्दुस्तान के राजनीतिक भविष्य राहुल गाँधी को मंज़ूर नहीं। यही वजह है कि राहुल की राह में रोड़े डालने में कोई कमी नहीं छोड़ी जा रही है, जबकि किसी और पर निशाना साधते हुए राहुल गाँधी यह साफ़ कर चुके हैं कि मेरा राजनीतिक भविष्य चाहे ख़त्म हो जाए लेकिन मैं झूठ की राजनीति नहीं करूँगा और न ही झूठ बोलूँगा।

राहुल गाँधी के इस बयान के बाद जनता में एक अलग ही संदेश गया। झूठ के इस दौर में अगर कोई सच की बात करे तो उसका सकारात्मक संदेश जाना ही है। जनता इस पर चर्चा कर रही है कि राहुल गाँधी सच की राजनीति करना चाहते हैं, लेकिन कांग्रेस के बुजुर्ग हो चुके नेता उन्हें अपने पुराने ढर्रे पर चलाना चाहते हैं और उन्हें यह मंज़ूर नहीं है।

जिन्होंने कांग्रेस की भट्टी पर चढ़ी कढ़ाई से दूध नहीं मलाई मलाई खाकर अपने आपको पाला पोसा है बल्कि मृतक आश्रितों को भी आगे बढ़ाने का काम किया, आज वही उसमें कमियाँ निकाल कांग्रेस को कमज़ोर करने का प्रयास कर रहे हैं।

अब देखना यह है कि क्या हिन्दुस्तान का राजनीतिक भविष्य इनकी महत्वाकांक्षाओं के चलते हार मान लेगा या अपने सिद्धांतों पर चलते हुए उनको अपने ही सिद्धांतों पर चलने के लिए मजबूर कर देगा।

वैसे तो राहुल गाँधी के सक्रिय होने बाद से ही कांग्रेस में उनकी टांग खिंचाई शुरू हो गई थी, जो अब मंजरे आम पर आ गई है। लगता है अब या तो कांग्रेस इससे भी बुरा दौर आएगा या कांग्रेस और उसकी विचारधारा इन वरिष्ठों के मकड़जाल से बाहर निकल निखर कर सामने आएगी और ऐसा जब हो सकता है जब सोनिया, प्रियंका व राहुल गाँधी एक साथ मज़बूत और पक्का मन कर इस कांग्रेस को इन्हीं पुराने कांग्रेसियों को सौंपकर नई कांग्रेस का गठन करें, अपनी दादी आर्यन लेडी पूर्व प्रधानमंत्री स्व श्रीमती इंदिरा गाँधी की तरह। तभी कुछ हो सकता है नहीं तो ये संघ विचारक कांग्रेसी पार्टी को अपने पैरों पर खड़ी नहीं होने देंगे।

विश्वस्त सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गाँधी राज्यसभा सांसदों के साथ वीडियो कांफ्रेंस के ज़रिए बैठक ले रही थीं, इसी बीच कुछ सांसदों, जिसमें पार्टी के संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल, पीएल पुनिया, राजीव सातव. रिपुन वोरा एवं छाया शर्मा जैसे सांसदों ने राहुल गाँधी को फिर से पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाने की माँग की। उनका तर्क था कि देश के मौजूदा सियासी हालात का सामना राहुल गाँधी जिस मज़बूती के साथ सकारात्मक विपक्ष की भूमिका निभा रहे हैं उससे साफ़ हो जाता है राहुल को पार्टी की कमान सौंप देनी चाहिए। वह मोदी सरकार की नकारात्मक नीतियों को जनता के बीच रख रहे हैं, जबकि आज देश में मोदी सरकार के सामने खड़े होने की किसी भी पार्टी अथवा नेता की हिम्मत नहीं हो रही है लेकिन राहुल गाँधी सीना ठोंककर मोदी सरकार की जनविरोधी नीतियों का विरोध कर और मोदी सरकार को कटघरे में खड़ा कर रहे हैं।

इसके बाद बुज़ुर्ग कांग्रेसी, राज्यसभा के सांसद पूर्व केन्द्रीय मंत्री पी चिदंबरम, कपिल सिब्बल एवं आनन्द शर्मा आदि जैसे सरीखे नेताओं का पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी की कार्यशैली पर सवालिया निशान लगाते-लगाते दर्द छलक गया। उन्होंने कहा कि वेणुगोपाल और सातव को राज्यसभा में भेजने का फ़ैसला राहुल गाँधी ने किसकी सलाह पर लिया और किस हैसियत से लिया।

मामला यहीं नहीं रूका, इन नेताओं ने राहुल गाँधी द्वारा ट्विटर पर मोदी सरकार से सवाल पूछने को भी ग़लत क़रार दिया।

राहुल विरोधी कांग्रेस नेताओं का कहना था कि हमें नहीं पता राहुल गाँधी को सवाल पूछने की सलाह कौन देता है, उसे विदेश नीति एवं रक्षा नीति का क्या ज्ञान है। इनका यह भी तर्क था कि इस तरह के सवालों से पार्टी को कोई फ़ायदा नहीं हो रहा है। वह यही नहीं रूके उन्होंने कहा कि राहुल गाँधी के क़रीबी ज्योतिरादित्य सिंधिया और सचिन पायलट जैसे ही पार्टी को कमज़ोर कर रहे हैं, इन हालात में पार्टी की कमान यदि राहुल गाँधी के हाथ में दे भी दी तो वह पार्टी को कैसे सँभालेंगे? इसकी क्या गारंटी है कि उनकी टीम के सदस्य आगे मोदी की भाजपा में नहीं जाएँगे?

यह सब सोनिया गाँधी की मौजूदगी में ही हो रहा था। राहुल के विरोधियों द्वारा पहली बार सार्वजनिक रूप से राहुल गाँधी का विरोध किया गया। यह सब होता देख कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष त्याग की मूर्ति सोनिया गाँधी ख़ामोशी अख़्तियार किए रहीं, लेकिन राहुल गाँधी के हामी सांसद ख़ामोश नहीं रहे। उन्होंने बुजुर्गों पर यूपीए-2 में ख़राब प्रदर्शन को हथियार बनाते हुए पार्टी को इस हालत में लाने का ज़िम्मेदार बता दिया। उन्होंने कहा कि यूपीए दो में आप सरकार में मंत्री थे इसके बाद भी पार्टी को नुक़सान हुआ जिसका ख़ामियाज़ा पार्टी अभी तक भुगत रही है।

इस बैठक में पूर्व प्रधानमंत्री डाक्टर मनमोहन सिंह, राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष ग़ुलाम नबी आज़ाद, पार्टी के कोषाध्यक्ष रणनीतिकारों में शामिल अहमद पटेल, पूर्व रक्षा मंत्री ए के एंटनी शामिल थे।

ए के एंटनी वही हैं,जिन्होंने पार्टी की 2014 में हुई हार के बाद बनी जाँच कमेटी की रिपोर्ट देते हुए कहा था कि पार्टी की हार मुस्लिम तुष्टिकरण की वजह से हुई है, जबकि वह यह नहीं बता पाए थे कि क्या मुस्लिम तुष्टिकरण किया गया है। मुस्लिम तुष्टिकरण का आरोप संघ एवं भाजपा के नेताओं का एक षड्यंत्र था बहुसंख्यकों को बहकाने का जिसमें वह कामयाब रहे और अब तक भी हैं जिसे एंटनी कमेटी ने मज़बूती दी थी। उन्होंने भी संघ के दृष्टिकोण को सही क़रार दे दिया था जिसे किसी भी नज़रिये से सही नहीं कहा जा सकता था। मुसलमान को कांग्रेस ने नुक़सान के सिवा कुछ नहीं दिया इसके बाद भी मुसलमान पूरी ईमानदारी दयानतदारी से कांग्रेस के साथ खड़ा रहा। एंटनी उन तथ्यों को उजागर नहीं कर पाए थे जिनकी वजह से यूपीए दो को नुक़सान हुआ। जैसे केन्द्रीय गृह सचिव आर के सिंह मोदी की भाजपा के लिए काम कर रहे थे, यूपीए-दो ने उन्हें केन्द्रीय गृह सचिव जैसे महत्वपूर्ण पद पर बिठा रखा था जो रिटायर होने पर मोदी की भाजपा में शामिल हुए। आज भाजपा से सांसद हैं। RSS के मुख्यालय नागपुर में हाजरी लगाने वाले सतपाल सिंह मुम्बई पुलिस कमिश्नर के पद पर विराजमान थे, सरकार कांग्रेस की थी। ऐसे और भी कई नाम हैं जो यूपीए दो में मोदी की भाजपा के एजेंट की तरह में काम कर रहे थे, लेकिन संघ विचारधारा के हामी कहने को कांग्रेसी ख़ामोशी की चादर ओढ़े सत्ता का आनन्द ले रहे थे, पार्टी को बर्बादी के कगार पर पहुँचा रहे थे, एंटनी ने उनको निशाना नहीं बनाया था, जो RSS चाहता था वही रिपोर्ट दी थी।

बैठक में एंटनी भी शामिल थे लेकिन वह ख़ामोश रहे, दोनों की तरफ़ से नहीं बोले।

अहमद पटेल ने 37 सालों बाद आई शिक्षा नीति पर अपने सुझाव रखे। पूर्व गृहमंत्री रहे पी चिदंबरम ने ज़मीनी स्तर पर पार्टी के कमज़ोर होते संगठन पर भी चिंता जताई, लेकिन यूपीए के दस साल के शासनकाल में संगठन के लिए उन्होंने क्या किया इस पर कुछ नहीं बताया। यूपीए एक और दो का यह हाल था कि पार्टी के कार्यकर्ताओं की कोई हैसियत नहीं थी।

दोनों कार्यकाल में शामिल मंत्रियों के पास इस बात का कोई जवाब नहीं है ना था कि यह संगठन कमज़ोर क्यों और किस कारण से हुआ। जिस राज्य में पार्टी का संगठन कमज़ोर था वहाँ के लोगों को बुलाकर कितनी बार चर्चा की गई। यूपी की बात करें तो पिछले तीन दशक से पार्टी वेंटिलेटर पर चल रही है, इसके बावजूद कहने को इन बड़े नेताओं ने क्या और क्यों प्रयास नहीं किए इसका कोई जवाब नहीं है, जबकि यूपी ने यूपीए दो को इसी वेंटिलेटर पर पड़ी कांग्रेस ने 22 सांसद दिए थे। उसके बाद भी यूपी पर कोई ध्यान नहीं दिया गया, जबकि यूपी के नेता भी केन्द्र में मंत्री थे। तब कुछ नहीं किया गया। यूपी में अब आकर पार्टी महासचिव यूपी प्रभारी श्रीमती प्रियांका गाँधी मेहनत कर रही हैं जिसका असर साफ़ देखा जा सकता है।

कपिल सिब्बल ने पार्टी में सभी को अपनी-अपनी समीक्षा करने की ओर इशारा किया। संगठन को मज़बूत बनाने के लिए ज़ोर आज़माइश करने की ज़रूरत है न कि पार्टी का अध्यक्ष बनाने की।

राहुल गाँधी फिर से अध्यक्ष नहीं बनना चाहतें हैं। 2019 के आमचुनाव में कांग्रेस को अपेक्षा से बहुत कम सीटें मिली थी बल्कि पार्टी की करारी हार हुई थी जिसकी ज़िम्मेदारी लेते हुए पार्टी के अध्यक्ष पद से इस्तीफा देते हुए कहा था कि गाँधी परिवार से पार्टी का कोई अध्यक्ष नहीं होगा। कांग्रेसियों की लाख मान मनौव्वल के बाद भी राहुल गाँधी नहीं माने थे। इनके अलावा भी अन्य कोई आगे नहीं आया था जिसके बाद सोनिया गाँधी को ही अंतरिम अध्यक्ष बनाया गया था जो अभी तक है।

परमानेन्ट अध्यक्ष बनाने की माँग के चलते ही राहुल गाँधी का नाम फिर आगे किया जा रहा था, जिसमें बुजुर्गों ने टांग मार दी है। सियासी जानकारों का कहना है राहुल गाँधी सिद्धांतवादी नेता हैं अब वह पार्टी का पुनः अध्यक्ष नहीं बनना चाहेंगे। इन वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं का यह भी आरोप है कि राहुल, प्रियंका गाँधी सोनिया गाँधी की भी बात नहीं सुनते हैं।

सूत्रों का कहना है कि मनीष तिवारी ने भी पार्टी से चार सवाल किए हैं। पहला सवाल क्या 2014 के आमचुनाव में कांग्रेस के ख़राब प्रदर्शन लिए यूपीए-दो की सरकार की नीतियाँ ज़िम्मेदार थीं? दूसरा क्या यूपीए के अंदर ही साज़िश रची गई थी? तीसरा 2019 के आमचुनाव की भी समीक्षा होनी चाहिए। चौथा सवाल पिछले छह साल में यूपीए पर किसी तरह का आरोप नहीं लगाया गया।

पूर्व केन्द्रीय मंत्री मनीष तिवारी ने कहा कि यूपीए सरकार ने सूचना का अधिकार, खाद्य सुरक्षा क़ानून और शिक्षा का अधिकार जैसे जनता के लिए अच्छे क़ानून बनाए। ऐसे में अगर मूल्यांकन करना है तो इसका भी होना चाहिए कि यूपीए सरकार पर जो ग़लत लांछनों की बारिश की गई उस सियासी षड्यंत्र में कौन-कौन वरिष्ठ या कनिष्ठ शामिल थे।

उन्होंने कहा कि तत्कालीन सीएजी विनोद राय की क्या मंशा थी इसकी भी समीक्षा होनी बेहद ज़रूरी है कि इतनी उपलब्धियों के बाद भी हम क्यों 2014 हार गए। इसके बाद मोदी की झूठ पर आधारित सरकार 2019 में भी क्यों जीत गई और हम क्यों हार गए।

यूपीए पर जो कीचड़ उछाला गया था वह सब षड्यंत्रकारी की देन था। इन्हीं सब आरोप प्रत्यारोपों के चलते कांग्रेस को ऑक्सीजन दिया जा रहा है, जबकि सामने झूठ का महल बनाने वाला है, इसके बावजूद भी कांग्रेसी अपने पुराने ढर्रे से बाहर आने को तैयार नहीं हैं। सोनिया, राहुल, प्रियंका गाँधी कांग्रेस को खड़ी करने के चाहे जितने गंभीर प्रयास कर लें, लेकिन कांग्रेस के ये बुज़ुर्ग और युवाओं की लड़ाई उन तीनों के संयुक्त प्रयास को पलीता लगा रही है। इस आपसी खींच तान के क्या नतीजे निकल कर आएँगे यह तो आनेवाले दिनों में पता चलेगा जिसे हम भी देखेंगे और आप भी देखेंगे।

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