मसला केवल कांग्रेस के भविष्य का नहीं, मसला देश के भविष्य का है

मसला केवल कांग्रेस के भविष्य का नहीं, मसला देश के भविष्य का है

कांग्रेस की चुनावी विफलता | Congress’s electoral failure

कांग्रेस को इस चुनाव में जैसी हार मिली है उससे निश्चित ही कांग्रेस विचार को पसन्द करने वाले लोगों को गहरा धक्का लगा है।

कांग्रेस जहां एक ओर खुद गंभीर आंतरिक चुनौतियों से गुजर रही है,वहीं दूसरी ओर भाजपा आरएसएस के सबसे वीभत्स विरोध का सामना भी उसी को करना पड़ रहा है।

भाजपा आरएसएस का एकमात्र राजनीतिक लक्ष्य कांग्रेस को खत्म करना है, उसे अन्य किसी राजनीतिक दल से कोई खतरा नहीं है।

भाजपा आरएसएस इसलिए कांग्रेस को खत्म करना चाहती है क्योंकि भारतीय संविधान, देश का संघीय ढांचा, लोकतांत्रिक मूल्य, धर्मनिरपेक्षता आदि सब उसे अखरते हैं। उसका लक्ष्य आरएसएस के दृष्टिकोण अनुसार एक नए भारत के निर्माण का है। कांग्रेस को समाप्त किये बिना यह सम्भव नहीं है।

वास्तव में कांग्रेस क्या है, कांग्रेस की ताकत और कमजोरियां क्या हैं?

कांग्रेस के सारे भीतरी मर्ज एक साथ सतह पर आ गए हैं। कांग्रेस के पास वैचारिक स्पष्टता का अभाव है कि कांग्रेस वास्तव में क्या है, उसकी ताकत और कमजोरियां क्या हैं। कांग्रेस की लीडरशिप में जो लोग हैं उनमें वैचारिक उश्रृंखलता है व बौद्धिक अनुशासन नहीं है। ज्यादातर कांग्रेसी कार्यकर्ता व नेता, विधायक एमपी से आगे देखना ही नहीं चाहते। एक दूसरे की बुराई, प्रपंच, षड्यंत्र में ही ज्यादातर लोग ऊर्जा गवांते हैं। हर कोई के पास सलाह का जखीरा है लेकिन प्रतिबद्धता कुछ नहीं है।

कांग्रेस के मंच से उन प्रतीकों, विमर्शों को बढ़ाया जाता है जो गैर कांग्रेसवाद से निकले हुए हैं। कांग्रेसियों को सुनिए तो लगता है कि ये तो गलती से कांग्रेस में हैं, उन्हें तो कोई जातिवादी पार्टी या वामपंथी क्रांतिकारी दल में होना चाहिए था।

कुछ कांग्रेसी इतने प्रचंड ज्ञान से भरे हैं कि उन्हें तो विदेशी विश्वविद्यालयों में प्रोफेसर होना चाहिए। कुछ कांग्रेसी इतने अधिक आध्यात्मिक मानवता से ओत प्रोत दिखते हैं कि उन्हें आध्यात्मिक ऊंचाइयां प्राप्त करने के लिए हिमालय चले जाना चाहिए।

यह बिल्कुल सही है कि कांग्रेस में नए लोगों की बहुत जरूरत है। उन्हें अधिक अवसर भी दिए जाने चाहिए, लेकिन यह सब चुनने तय करने का मापदंड कांग्रेस विचार के प्रति उनकी प्रतिबद्धता व गहराई ही हो सकता है न कि कांग्रेसी बैनर तले गैर कांग्रेसवादी जोश।

कांग्रेस को इस सबका निर्मम विश्लेषण करना ही होगा और आत्मविश्वास के साथ सामने आना होगा। मसला केवल कांग्रेस के भविष्य का नहीं है। मसला उससे बड़ा देश के भविष्य का है और कांग्रेस को ही इस जिम्मेदारी को खुलकर उठाना होगा। कांग्रेस की चुनावी असफलता पर खुश होना आरएसएस भाजपा के खेमे में थोड़ा और खिसकना ही है।

आलोक वाजपेयी

लेखक राजनीतिक विश्लेषक व इतिहासकार हैं।

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