‘संविधान दिवस’ कार्यक्रम : तिलमिला क्यों गए प्रधानमंत्री मोदी?

‘संविधान दिवस’ कार्यक्रम : तिलमिला क्यों गए प्रधानमंत्री मोदी?

दिवस वहां, संविधान कहां!

‘संविधान दिवस’ के इस आयोजन से अनुपस्थित रहने का 14 विपक्षी दलों का फैसला : तिलमिला गए प्रधानमंत्री

‘Constitution Day’ program: Why did Prime Minister Modi go to tears?

इस में हैरानी की कोई बात नहीं है कि सेंट्रल हाल में आयोजित सातवें ‘संविधान दिवस’ कार्यक्रम में प्रधानमंत्री मोदी (PM Modi at the 7th ‘Constitution Day’ program organized in the Central Hall), विपक्ष पर जमकर बरसे। इसकी विडंबना शायद ही लोगों से छुपी रहेगी कि प्रधानमंत्री एक ओर तो इसका दावा कर रहे थे कि ‘यह कार्यक्रम किसी राजनीतिक दल का नहीं था। किसी प्रधानमंत्री का नहीं था। यह कार्यक्रम स्पीकर पद की गरिमा थी’ तथा विपक्ष को इसका उपदेश दे रहे थे कि, ‘हम संविधान की गरिमा बनाए रखें।’ और दूसरी ओर वह ऐसे ‘‘संविधान की गरिमा’’ से जुड़े आयोजन में, प्रधानमंत्री के पद के नाते मिले बोलने के मौके का इस्तेमाल, विपक्षी पार्टियों पर आक्रमण करने के लिए करके उसे, अपनी पार्टी के दलगत आयोजन में बदलने में लगे हुए थे।

    बेशक, संसद में सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी, कांग्रेस समेत 14 विपक्षी पार्टियों के ‘संविधान दिवस’ के इस आयोजन से अनुपस्थित रहने का फैसला प्रधानमंत्री मोदी को बहुत नागवार गुजरा। यहां तक कि प्रधानमंत्री ने इसका भी एलान कर दिया कि, ‘इस कदम से संविधान की भावना को चोट पहुंची है। इसकी एक-एक धारा को चोट पहुंची है।’ लेकिन, इससे कोई अगर यह समझता है कि  एक ‘गरिमापूर्ण संवैधानिक आयोजन’ में विपक्ष पर प्रधानमंत्री का हमला (Prime Minister’s attack on the opposition), विपक्ष के उक्त निर्णय की ही प्रतिक्रिया था, तो वह भारी गलती कर रहा होगा। सचाई यह है कि मोदी के राज में, जिस प्रकार संविधान के बुनियादी प्रावधानों समेत, तमाम संवैधानिक संस्थाओं व एजेंसियों को, उनकी स्वायत्तता को छीनकर, कार्यपालिका पर पूरी तरह से निर्भर बनाकर छोड़ दिया गया है, उसी समूची प्रक्रिया के हिस्से के तौर पर, संवैधानिक या शासकीय काम-काज और सत्ताधारी राजनीतिक पार्टी के काम-काज के अंतर को, एक प्रकार से मिटा ही दिया गया है।

    सत्ताधारी राजनीतिक पार्टी के चुनावी हितों के लिए, चुनाव के हरेक चक्र के महीनों पहले से, सरकारी धन से बेशुमार परियोजनाओं आदि का एलान और उनके बहाने से भूमिपूजन/ शिलान्यास/ उद्घाटन के सरकारी कार्यक्रमों में, चुनावी भीड़ें इकट्ठी कर के, प्रधानमंत्री समेत सभी सरकारी अधिकारियों द्वारा विपक्ष को हमलों का निशाना बनाने की हद तक, सत्ताधारी पार्टी के लिए कमोबेश प्रत्यक्ष रूप से चुनाव प्रचार किया जाना ऐसी कार्यनीति है, जिसे मोदी राज ने बड़ी नंगई से इतना आम बना दिया है कि अब, इसके औचित्य-अनौचित्य पर विपक्ष तक शायद ही कभी चर्चा करता है। इसका ताजातरीन उदाहरण, ‘संविधान दिवस’ के  आयोजन से एक दिन पहले ही हुआ, दिल्ली के निकट, नोएडा के अंतर्गत जेवर में प्रस्तावित नये अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे का भूमि-पूजन कार्यक्रम (Bhoomi-Poojan program of the proposed new international airport at Jewar) था, जिसमें सरकारी आयोजन के नाम पर, सरकारी सुविधाओं के सहारे इकट्ठी की गयी भीड़ों को, मोदी-योगी का डबल इंजन चुनावी संबोधन सुनाया गया था।

जाहिर है कि इस राजनीतिक-चुनावी कार्यनीति के हिस्से के तौर पर, मोदी राज द्वारा हर-संभव मौके को सिर्फ अपना ढोल खुद बजाने का ही नहीं, विपक्ष पर हमला करने का भी मौका बनाना, विपक्ष की ओर से ‘बहिष्कार’ जैसा कोई बहाना दिए जाने का मोहताज नहीं है।

बहरहाल, हम ‘संविधान दिवस’ के प्रसंग पर लौटें।

अचरज की बात नहीं है कि मोदी सरकार ने इस आयोजन का प्रारूप ही ऐसा बनाया है, जिसमें विपक्ष के लिए अपनी बात कहने की कोई जगह ही नहीं है। वास्तव में मोदी सरकार के पहले ही वर्ष में, जब इसकी घोषणा की गयी थी कि अब से 26 नवंबर (26 November) का दिन, जिस दिन संविधान सभा द्वारा संविधान का मसौदा (draft constitution) स्वीकार किया गया था, ‘संविधान दिवस’ के रूप में मनाया जाएगा, बहुतों ने इसे प्रधानमंत्री मोदी की ईवेंट-प्रियता से ही जोड़कर देखा था, जिसके चलते वह एक और वार्षिक ईवेंट की शुरूआत कर रहे थे।

जिस चीज की भीतर से हत्या करनी होती है उसके नाम पर कोई स्मारक/ईवेंट/ तमाशा जरूर चालू करा देते हैं मोदी

बेशक, इस सचाई का एहसास तो धीरे-धीरे हुआ कि यह तो मोदी की खास प्रचार-राज कार्यनीति ही है कि वह उन्हें जिस चीज की भीतर से हत्या करनी होती है, जिसे नष्ट करना होता है, उसके नाम पर कोई स्मारक/ईवेंट/ तमाशा जरूर चालू करा देते हैं, ताकि हत्या को कम से कम ‘भक्तों’ की नजर से छुपाया जा सके। ‘संविधान दिवस’ ठीक ऐसे ही एक मौलिक मोदी ईवेंट (Original Modi Event) का मामला है, जिसका स्वरूप ऐसा है कि उसका सर्वानुमति या कंसेंसस की उस भावना से दूर-दूर तक कुछ लेना-देना ही नहीं है, जो हमारे संविधान की रचना के मूल में रही है।

वास्तव में डॉ आंबेडकर को संविधान निर्माण में संचालक की भूमिका दिया जाना भी, कंसेंसस की इस भावना की ही अभिव्यक्ति थी।

    बहरहाल, मोदी के संविधान दिवस के इस आयोजन का अर्थ (Meaning of this event of Modi’s Constitution Day), विपक्ष द्वारा इस बार इस आयोजन के बहिष्कार और मोदी द्वारा विपक्ष पर हमले तक ही सीमित नहीं है। इससे भी महत्वपूर्ण हैं, इस आयोजन में मोदी के संबोधन के वैचारिक संकेत, जो इस आयोजन की पूरी कसरत के वास्तविक अर्थ को सामने लाते हैं।

बेशक, इनमें सबसे मुखर संकेत तो कथित ‘‘वंशवादी पार्टियों’’ पर मोदी के हमले में ही था। 

जाहिर है कि इस हमले के मुख्य निशाने पर तो नाम लिए बिना ही कांग्रेस ही थी, लेकिन भाजपा की कार्यनीतिक सहूलियतों के अनुसार अन्य अनेक क्षेत्रीय पार्टियों को इस आलोचना के दायरे से अंदर-बाहर किया जाता रहता है। बाद वाला पहलू इसलिए याद दिलाना जरूरी है कि अकाली दल, शिव सेना, पीडीपी, लोजपा जैसी कितनी ही कथित रूप से वंशवादी पार्टियों के साथ, भाजपा अलग-अलग समय पर गठजोड़ ही नहीं करती आयी है, खुद अपने पार्टीगत दायरे में भी कितने ही राजनीतिक नेताओं के वंशों को खींचने की कोशिश करती आयी है।

वंशवाद और वंशवादी पार्टियों की प्रधानमंत्री की आलोचना की मुख्य समस्या क्या है?

बहरहाल, वंशवाद और वंशवादी पार्टियों की प्रधानमंत्री की आलोचना की मुख्य समस्या यही नहीं है कि अपनी इस आलोचना में वह अवसरवादी हैं। बात सिर्फ इतनी भी नहीं है कि इस दुहाई के पीछे खुद उनकी नीयत संदेह के घेरे में है कि, ‘वंशवादी पार्टियां, उन लोगों के लिए बड़ी चिंता का विषय हैं, जो देश के संविधान की रक्षा करना चाहते हैं।’ कम से कम भाजपा समेत संघ परिवार के बारे में तो, जोकि प्रधानमंत्री का मातृ संगठन तथा उनकी सरकार का कमोबेश प्रत्यक्ष संचालक है, डॉ आंबेडकर के संविधान पर आपत्तियों के उनके रिकार्ड को देखते हुए और संविधान को पलटने की उनकी पुकारों तथा कोशिशों को देखते हुए, कोई नहीं मानेगा कि वे ‘देश के संविधान की रक्षा करना चाहते हैं।’

उल्टे सभी देख रहे हैं कि किस तरह मोदी राज के सात सालों में, खुद भारतीय सुप्रीम कोर्ट द्वारा भारतीय संविधान के मूलाधारों के रूप में परिभाषित की गयी, उसकी दो मूलभूत विशेषताओं को तो व्यावहारिक मानों में ध्वस्त ही कर दिया गया है। इनमें पहली विशेषता, जैसाकि सभी जानते हैं, राज्य की धर्मनिरपेक्षता ही है। औैर दूसरी विशेषता, संघात्मक व्यवस्था है।

संविधान की इन दोनों विशेषताओं को ध्वस्त करने के जरिए, एक आधुनिक जनतांत्रिक समाज की उस बुनियादी संकल्पना को ही ध्वस्त किया जा रहा है, जो हमारे भीषण असमानताओं से ग्रसित समाज ने, स्वतंत्रता के लिए साझा संघर्ष के जरिए विकसित की थी और मानव समानता जिसका मूलाधार है। यही इस देश की एकता का भी मूलाधार है।

इतना ही नहीं, सच तो यह है कि राजकीय सत्ता के ज्यादा से ज्यादा तानाशाहीपूर्ण होते तथा असहमति के हरेक स्वर के खिलाफ हिंसक विद्वेषपूर्ण इस्तेमाल से लेकर, कार्पोरेटों तथा धन्नासेठों द्वारा फाइनेंसिंग की पूर्ण गोपनीयता सुनिश्चित करने वाली चुनावी बांड आदि की व्यवस्थाओं और इस तरह जमा की गयी अकूत धनशक्ति के हर तरह के कानूनी-गैरकानूनी दुरुपयोग के जरिए, मोदी राज ने तो उस चुनावी व्यवस्था तक को खोखला कर दिया है, जोकि जनतंत्र की न्यूनतम शर्त है। अचरज नहीं है कि दुनिया में जनतंत्र की स्थिति पर नजर रखने वाली करीब-करीब सारी अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं ने, मोदी राज में जनतंत्र के पैमाने पर भारत के पीछे फिसलने को दर्ज किया है और किसी ने उसे इलैक्टोरल ऑटोक्रेसी की श्रेणी में रखा है तो, किसी ने आंशिक रूप से स्वतंत्रतासंपन्न की श्रेणी में।

स्वतंत्रता आंदोलन की विरासत (legacy of freedom movement) से जुड़े संविधान से दूर और वास्तव में मनुस्मृति के रास्ते पर भारत की इसी वास्तविक फिसलन को छुपाने के लिए, उसकी ओर से ध्यान हटाने के लिए, नरेंद्र मोदी ने अपने संविधान दिवस का इस्तेमाल, वंशवादी पार्टियों के खतरे का हौवा खड़ा करने के लिए किया है और इसकी अनिष्टकर आगाहियां की हैं कि, ‘‘भारत एक संकट की ओर बढ़ रहा है।’’ बेशक, कोई दल अगर किसी एक परिवार की संपत्ति बना रहे, तो इससे उसकी जनतांत्रिक संभावनाएं सीमित होती ही हैं। इसी प्रकार, इससे भी कोई असहमत नहीं होगा कि ‘अगर कोई पार्टी कई पीढ़ियों तक एक ही परिवार के हाथ में रहे, तो यह स्वस्थ लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं है।’ लेकिन, नेतृत्व के वंशवृक्ष को किसी शक्ति की जनतांत्रिक भूमिका के माप का मुख्य या एकमात्र पैमाना बना देना, न सिर्फ अलोकतांत्रिक है बल्कि शरारतपूर्ण है।

    इसके जरिए हमारी जनतांत्रिक व्यवस्था और उसे सुनिश्चित करने वाले हमारे संविधान के सामने खड़े वास्तविक खतरों से ही, ध्यान बंटाने की बल्कि इन खतरों का रास्ता निरापद बनाने की ही कोशिश की जा रही है।

प्रधानमंत्री जब अपनी जानी-पहचानी शैली में सिर्फ लफ्फाजी के सहारे, इस दलील से अपने राज में जनतंत्र के बढ़ते लोप की तरफ से ध्यान हटाने की कोशिश करते हैं कि, ‘तब जब राजनीतिक दल लोकतांत्रिक चरित्र खो चुके हों। वो लोकतंत्र की रक्षा कैसे कर सकते हैं’, खुद उनके अपने दल के ‘लोकतांत्रिक चरित्र’ पर उठते रहे बुनियादी सवालों को जरूर याद रखा जाना चाहिए। ऐसी पार्टी और ऐसी सरकार निश्चित रूप से जनतंत्र और हमारे संविधान के लिए किसी भी वंशवाद से बड़ा खतरा है, जिसका वास्तविक संचालन उससे बाहर का एक निरंकुश संगठन करता हो, जो न तो उक्त राजनीतिक पार्टी के सदस्यों के प्रति जवाबदेह है और देश के कानून व संविधान के प्रति। भारतीय जनतंत्र और संविधान के लिए अगर कोई सबसे बड़ा खतरा है, तो यही जोड़ी है। उसे वंशवाद का हौवा खड़ा कर के, भारतीय संविधान को ध्वस्त करने में कामयाब नहीं होने दिया जा सकता है।

26 नवंबर को ही किसान आंदोलन का पूरा होने का संयोग, इसकी जोरदार तरीके से याददिहानी करता है कि जनता, भारतीय संविधान के खिलाफ संघ-भाजपा जोड़ की इस कपटलीला को पहचान रही है।                               

0 राजेंद्र शर्मा

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