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हिंदू-राष्ट्रवादी एजेंडा और चुनावी तानाशाही

Hindu-nationalist agenda and electoral dictatorship

स्वीडन के गोथेनबर्ग विश्वविद्यालय से जुड़े स्वतंत्र शोध संस्थान, वी-डैम (The V-Dem Institute (Varieties of Democracy) is an independent research institute founded by Professor Staffan I. Lindberg in 2014.) ने वह काम कर दिया है, जो एक बहुउद्यृत लोक कथा में उस बच्चे किया था, जो बड़ों की जुबान को बांधे डर और संकोच से मुक्त होने के चलते राजा को देखकर दरबार में ही बरबस कह देता है–राजा तो नंगा है।

बेशक, कहानी का राजा नंगा था, यह जानते तो सभी थे। पर राजा को नाराज करने के डर से किसी की हिम्मत नहीं थी, न दरबारियों की और न प्रजा की कि राजा के सामने कह दे कि वह नंगा है। और राजा दरबार में इतरा-इतरा कर अपने नंग का प्रदर्शन करते हुए बैठता था क्योंकि उसे यह समझा दिया गया था कि उसका नंगा होना, नंगा होना नहीं बल्कि उसका ऐसे न भूतो न भविष्यत परिधान में सजा हुआ होना है, इतना बारीक है, इतना बारीक है कि अदृश्य ही है। अब राजा को यह तो कौन सा दरबारी बताता कि परिधान चूंकि अदृश्य है, राजा के जिस नंगेपन को अदृश्य होना चाहिए था, वही सबसे ज्यादा दृश्य है! और प्रजा भी भले मुंह से न कहे, पर जो इस कदर दृश्य है, उसे देखकर भी अनदेखा नहीं करने वाली है।

Monitoring the state of democracy around the world

खैर! एक दिन दरबार में संयोग से एक बच्चा पहुंच गया और उसने शोर मचा दिया–राजा तो नंगा है! दुनिया भर में जनतंत्र की स्थिति की निगरानी करने तथा उसमें उतार-चढ़ावों का माप करने वाले वी-डैम शोध संस्थान ने बहुत ही विशद तथा आंकड़ामय छानबीन के बाद एलान कर दिया–भारत, एक चुनावी तानाशाही बन चुका है। मोदी राज के करीब सात सालों में भारत, दुनिया के सबसे बड़े जनतंत्र से, चुनावी निरंकुशतंत्र तक का सफर तय कर चुका है।

बेशक, जैसाकि खासतौर पर किसान आंदोलन के लिए व्यापक अंतर्राष्ट्रीय सहानुभूति व समर्थन सामने आने के बाद से मोदी सरकार ने नियम ही बना लिया है, मोदी सरकार द्वारा इस रिपोर्ट का आधिकारिक रूप से न सिर्फ खारिज किया जाना तय है बल्कि उसका ऐसी रिपोर्ट के लिए वी-डैम पर हमला ही बोल देना और उसे बदनाम करने की कोशिश करना भी तय है। राजनीतिक स्तर पर यह हमलावर खेल क्या शक्ल लेने जा रहा है, इसका अंदाजा इस रिपोर्ट के हवाले से भारत में जनतंत्र की स्थिति (Democracy in india) का सवाल उठाने के लिए, सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी के शीर्ष नेता राहुल गांधी को, भाजपा के सिर चढ़े प्रवक्ता, संबित पात्रा के इसकी सलाह देने से लगाया जा सकता है कि अगर भारत में उन्हें डैमोक्रेसी नजर नहीं आ रही है, ‘तो वह अपनी नानी के घर, इटली चले जाएं।’

खैर! वी-डैम की रिपोर्ट में भारत को चुनावी तानाशाही या निरंकुश तंत्र की श्रेणी में यकायक ही नहीं रख दिया गया है। पिछले साल की अपनी रिपोर्ट में ही उसने आगाह कर दिया था कि भारत, अपना लोकतंत्र का दर्जा खोने के कगार पर था। फिर भी पर्याप्त आंकड़े उपलब्ध न होने से तब तस्वीर इतनी साफ नहीं हो पायी थी। इस साल की रिपोर्ट में, जो 2020 के आंकड़ों पर आधारित है, उस खतरे के एक वास्तविकता बन जाने को दर्शाया गया है। इसके साथ भारत, लोकतंत्र के पैमाने से दुनिया के कुल 180 देशों में से, 97वें पायदान पर पहुंच गया है और पचास फीसद ऐसे देशों की श्रेणी में शामिल हो गया है, जहां किसी न किसी प्रकार की तानाशाहीपूर्ण व्यवस्था कायम है।

Conversion from democracy to electoral dictatorship : v dem institute democracy report 2020 india

          बेशक, मोदी सरकार इससे कुछ तसल्ली ले सकती है कि वी-डैम की रिपोर्ट सिर्फ भारत के ही जनतंत्र से चुनावी तानाशाही में रूपांतरण को रेखांकित नहीं करती है बल्कि बाकायदा एक ‘तानाशाही की तीसरी’ लहर की निशानदेही करती है। इस रिपोर्ट के अनुसार इस लहर में ऐसे 25 देशों का तानाशाहीकरण हो रहा है, जहां दुनिया की कुल एक-तिहाई जनसंख्या रहती है यानी 2.6 अरब लोग। भारत के साथ ही तुर्की, ब्राजील तथा अमरीका जैसे जी-20 के देश भी इस लहर में शामिल हैं।

जाहिर है कि भारत इस लहर की अगुआई कर रहा है। उसके संदर्भ में रिपोर्ट में दर्ज किया गया है कि, ‘साल 2014 में नरेंद्र मोदी की अगुआई में भाजपा की जीत और हिंदू-राष्ट्रवादी एजेंडा (Hindu nationalist agenda) को आगे बढ़ाए जाने के बाद से ही ज्यादातर गिरावट आयी है। साल 2020 के अंत तक भारत का उदारवादी लोकतंत्र अंक 0.34 रह गया था, जबकि 2013 में यह 0.57 अंक के अपने शिखर पर था। इस तरह उदारवादी लोकतंत्र सूचकांक में 23 फीसद की कमी आयी है।’

इस सिलसिले में यह रिपोर्ट तानाशाहीकरण के आगे बढ़ने के एक आम पैटर्न को भी इंगित करती है।

रिपोर्ट के अनुसार, इस गिरावट की शुरूआत वहां से होती है जहां सत्ता, मीडिया और नागरिक समाज पर हमले करने लगती है; विरोध का अनादर करते हुए समाज को बांटा जाता है और झूठ का प्रचार किया जाता है। खासतौर पर भारत के संदर्भ में धीरे-धीरे मीडिया की, अकादमिक जगत की और सिविल सोसाइटी की आजादी छीने जाने को रेखांकित किया गया है। रिपोर्ट मीडिया पर अघोषित सरकारी सेंसरशिप थोपे जाने, सिविल सोसाइटी के दमन तथा चुनाव आयोग की स्वायत्तता के ह्रास को इस गिरावट के लिए विशेष रूप से जिम्मेदार मानती है और मीडिया में बहुत ज्यादा पक्षपात होने और अकादमिक व धार्मिक स्वतंत्रताओं में कमी को रेखांकित करती है। सरकार द्वारा राजद्रोह, मानहानि तथा यूएपीए जैसे कठोर कानूनों का लगातार इस्तेमाल किए जाने को भी रेखांकित किया गया है। रिपोर्ट ध्यान दिलाती है: ‘मिसाल के तौर पर भाजपा के सत्ता में आने के बाद से 7,000 लोगों पर राजद्रोह का मुकद्दमा बनाया गया है।’

नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ प्रदर्शनों के दमन को खासतौर पर उदाहरण की तरह पेश किया गया है।

वी डेम ने कहा कि मीडिया का सरकारी सेंसरशिप (Government censorship of media), सिविल सोसायटी का दमन (Suppression of civil society) और चुनाव आयोग की स्वायत्तता (Election Commission Autonomy) में कमी के चलते भारत की ये स्थिति हुई है.

उन्होंने कहा कि मीडिया में बहुत ज्यादा पक्षपात हो रहा है और अकदामिक एवं धार्मिक स्वतंत्रता में कमी आई है.

रिपोर्ट में भारत सरकार द्वारा राजद्रोह, मानहानि और कठोर यूएपीए कानूनों का लगातार इस्तेमाल करने को लेकर भी आलोचना की है. उन्होंने कहा, च्उदाहरण के तौर पर सत्ता में भाजपा के आने के बाद से 7,000 लोगों पर रोजद्रोह का मुकदमा किया गया है.ज

इसके साथ ही वी-डेम ने विवादित नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ चल रहे प्रदर्शनों को सरकार द्वारा दमन किए जाने की आलोचना की.

राजेंद्र शर्मा

Rajendra Sharma राजेंद्र शर्मा, लेखक वरिष्ठ पत्रकार व हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं। वह लोकलहर के संपादक हैं।
Rajendra Sharma राजेंद्र शर्मा, लेखक वरिष्ठ पत्रकार व हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं। वह लोकलहर के संपादक हैं।

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