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कोरोना : भगवान बने डॉक्टर

Corona: Doctors Become God

भगवान डॉक्टर के रूप होते हैं: नयी सदी मे इस कहावत को बलिष्ठतापूर्वक सही प्रमाणित किया है, covid-19 ने। आज पूरी दुनिया कोरोना क चपेट में है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इसे महामारी घोषित कर दिया है। मानव जाति इस तरह उद्भ्रांत व भयग्रस्त कब हुई थी, कहना मुश्किल है।

कोरोना के आतंक का आलम यह है कि जिन देवालयों में पहुँचकर लोग तमाम तरह के खतरों से महफूज महसूस करने लगते थे, आज उनके कपाट भक्तों के लिए बंद हो चुके हैं: मूर्तिपूजक हिन्दू खुद अपने भगवानों को कोरोना के कहर से बचाने के लिए मास्क इत्यादि पहनाने का उपक्रम चला रहे हैं। ऐसी स्थिति में डॉक्टर ही उम्मीद की आखरी किरण बनकर सामने आए हैं।

सुप्रसिद्ध चिकित्सक डॉ. एम.एल. परिहार, जिनकी चिकत्सा विज्ञान पर लिखीं किताबें मेडिकल कोर्स में लगी हैं, के शब्दों में, ’आज कोरोना के कारण मानव समाज मुश्किल में है. हर देश में मेडिकल क्षेत्र व रिसर्च के वैज्ञानिक देवदूत बन कर मानवता की सेवा कर रहे हैं. अपनी जान जोखिम में डालकर आम व्यक्ति से लेकर धर्म के उन ठेकेदारों की भी जान बचाने में लगे हुए हैं जो हर दिन विज्ञान व वैज्ञानिक को नकारते व दुत्कारते हैं, जो हर पल वैज्ञानिक सोच की धज्जियां उड़ाते हुए धार्मिक अंधविश्वासों को स्थापित करते हैं. इन्हें अच्छी तरह पता है कि रोग के ऐसे भयावह प्रकोप में उन्हें काल्पनिक ईश्वर बचाने नहीं आएगा और वैज्ञानिक ही उनको जीवन दान देंगे।’

और दुनिया भर मे डॉक्टर अपनी जान जोखिम में डालकर कोरोना से आक्रांत लोगों को जीवन दान देने का काम किए जा रहे हैं। इस अभूतपूर्व संकट में उनके अवदानों से उपकृत दुनिया तरह-तरह से उनके प्रति आभार प्रकट कर रही है। इस क्रम में भारत में तो 22 मार्च को एक इतिहास ही रच गया, जब प्रधानमंत्री के आह्वान पर सवा सौ करोड़ से अधिक लोग ताली और थाली के साथ शंख बजाकर डॉक्टरों के प्रति कृतज्ञता जाहिर किए।

आज कोटि-कोटि लोगों के आइकॉन बने खेल-कूद, नृत्य-गायन इत्यादि विविध क्षेत्रों के नायक-नायिकाएँ पृष्ठ में चले गये, चर्चा में हैं तो सिर्फ डॉक्टर और डॉक्टर !

कोरोना वायरस के शिकार रोगियों की सेवा करते-करते खुद कोरोना की शिकार होकर मौत को गले लगाने वाले डॉ. ली वेंलियांग चीन में सबसे बड़े नायक के रूप में उभरे हैं।

वेंलियांग वही डॉक्टर हैं, जिन्होंने गत दिसंबर में सोशल मीडिया पर डॉक्टरों के समूह में जानकारी दी थी कि उन्हें सार्स जैसे एक नए कोरोना वायरस का पता चला है। तब इस जानकारी को अफवाह बताकर चीन की पुलिस ने उन्हें तरह-तरह से प्रताड़ित किया था। वही डॉक्टर ली जब खुद कोरोना का शिकार होकर 21 मार्च को दुनिया को अलविदा कहे, चीन की कोटि-कोटि जनता ने उनके प्रति श्रद्धांजलि देने होड़ लगाई।

इन पंक्तियों को लिखे जाने के दौरान इंडोनेशिया के एक डा. हैदियो अली की तस्वीर खूब वायरल हो रही है। यह उनकी आख़री तस्वीर बताई जा रही है। अली कोविद – 19 के मरीज़ों का का ईलाज करते हुए खुद संक्रमित हो गये थे, जब उनको लगा कि अब वो नहीं बचेंगे तो घर गए और गेट के बाहर खड़े होकर अपने बच्चों और प्रैग्नेंट बीवी को आख़री बार निहारा और फिर चले गए। यह तस्वीर उनकी पत्नी ने ली थी। जब वो अपने बच्चों को जी भरकर देखने और उनसे विदा लेने आये थे, वो दूर ही खड़े रहे, क्योंकि वो नही चाहते थे कि उनके बीवी बच्चों तक कोरोना पहुंचे। हालाँकि इस कबर की पुष्टि नहीं हुई है।

Who is the lady with the lamp

बहरहाल भगवान की भूमिका में अवतरित डॉक्टरों में इटली के एक डॉक्टर दंपति ने तो ‘लेडी विथ द लैम्प’ की याद ताजी कर दी है।

लेडी विद द लैम्प कौन, इससे निश्चय ही सुधी पाठक अवगत होंगे। जो नहीं जानते हैं, उन्हें आज उनको जानना और उनसे प्रेरणा लेना बहुत जरूरी है।

सच तो यह है कोरोना की महामारी में लेडी विद द लैम्प से लोगों को अवगत कराना एक अत्याज्य कर्तव्य हो गया है।

जिस महिला की लेडी विद द लैम्प के रूप में पहचान हैं, उनका फ्लोरेन्स नाइटिंगेल (Florence Nightingale) है। 12 मई,1820 को एक संभ्रांत ब्रिटिश परिवार मे जन्मीं फ्लोरेन्स को आधुनिक नर्सिग आन्दोलन का जन्मदाता माना जाता है। दया व सेवा की प्रतिमूर्ति फ्लोरेंस नाइटिंगेल ने उच्च कुल में जन्म लेकर भी सेवा का मार्ग चुना और परिवार के तमाम विरोधों के बावजूद उन्होंने अभावग्रस्त लोगों की सेवा का व्रत ले लिया।

दिसंबर 1844 में चिकित्सा सुविधाओं को सुधारने का कार्यक्रम आरंभ करने वाली फ्लोरेंस का सबसे महत्वपूर्ण योगदान क्रीमिया के युद्ध में सामने आया। अक्तूबर 1854 में वह 38 स्त्रियों का एक दल लेकर घायलों की सेवा के लिए तुर्की पहुंची। युद्ध में घायल लोगों की उन्होंने जिस अनुकरणीय अंदाज में सेवा किया, उससे धन्य दुनिया ने उन्हें ‘लेडी विद द लैंप’ की उपाधि से सम्मानित किया।

जब चिकित्सक चले जाते तब वह रात के घने अंधेरे में मोमबत्ती जलाकर घायलों की सेवा के लिए उपस्थित हो जाती और रात-रात भर जागकर उनकी सेवा-सुश्रुषा में लगीं रहतीं। इस अक्लांत सेवा के फलस्वरूप वह गंभीर रूप से संक्रमित हो गईं। पर, जैसे आज डॉ. ली और अली सहित कई कोरोना से संक्रमित होकर मौत के मुंह मे समा चुके हैं, वैसा हादसा उनके साथ नहीं हुआ।

परवर्तीकाल में 1859 में फ्लोरेंस ने सेंट थॉमस अस्पताल में एक नाइटिंगेल प्रक्षिक्षण विद्यालय की स्थापना की। इसी बीच उन्होंने नोट्स ऑन नर्सिंग (Notes on nursing) पुस्तक लिखी। जीवन का बाकी समय उन्होंने नर्सिंग के कार्य को बढ़ाने व इसे आधुनिक रूप देने में लगा दिया।

13 अगस्त, 1910 को 90 वर्ष की उम्र में आखिरी सांस लेने वाली लेडी विद लैम्प ने रोगियों की सेवा के क्षेत्र में जो स्वर्णिम अध्याय रचा, उससे अभिभूत महारानी विक्टोरिया ने उन्हें 1869 में ‘रॉयल रेड क्रॉस’ (Royal Red Cross) से सम्मानित किया। उनसे पहले कभी भी बीमार घायलों के उपचार पर ध्यान नहीं दिया जाता था, किन्तु सेवा और करुणा की प्रतिमूर्ति फ्लोरेंस नाइटिंगेल ने तस्वीर को सदा के लिये बदल दिया।

अगर हम डॉक्टर-नर्सों में भगवान और माँ-बहन का दर्शन पाते हैं, तो उनके उस रूप में अवतरित होने के पीछे लेडी विद द लैम्प से मिली प्रेरणा ही है।

कोरोना की महामारी में इटली के जिस डॉक्टर दंपत्ति ने फ्लोरेन्स की याद ताज़ी कर दी है, उनकी कहानी इतनी मार्मिक है कि आने वाले दिनों में हम उन पर आधुनिक प्रेम की अमर कथा ‘टाइटेनिक’ जैसी कई फिल्मों के साक्षी भी बन सकते हैं। इनकी कहानी लखनऊ से छपने वाले अखबार मे प्रकाशित हुई है, जिसमें लिखा है –

‘जब पूरी दुनिया कोरोना वायरस की दहशत में खुद को बचाने के लिए हर संभव कदम उठा रही है। ऐसे समय में इटली का एक चिकित्सक दंपति अपनी खुद की परवाह किए बगैर, कोरोना से संक्रमित 134 मरीजों का उपचार कर उनकी जान बचाई, लेकिन दुर्भाग्य से वे खुद आठवें दिन इस वायरस की चपेट में आ गए। हालत अधिक बिगड़ने पर पति और पत्नी दोनों को हास्पिटल के अलग-अलग कमरों मे शिफ्ट करना पड़ा। इसके बाद जब दोनों को यह लगा कि नहीं बच पाएंगे तो उन्होंने हास्पिटल के लाउंज मे खड़े होकर एक दूसरे को आखिरी बार मोहब्बत भरी नजरों से निहारा। फिर कमरों में कैद हुये तो महज आधे घंटे में उनकी ज़िदगी खत्म हो गयी।‘

जनसंदेश टाइम्स की भावुक बना देने वाली इस खबर को सोशल मीडिया पर लोगों ने खूब शेयर किया। इस लेख को लिखने के दौरान मैंने फेसबुक पर एक पोस्ट डाल कर डॉक्टर दंपति का नाम और धर्म जानने का प्रयास किया, क्योंकि जनसंदेश टाइम्स की खबर में उनके नाम और धर्म का उल्लेख नहीं था।

बहरहाल मैं चिकित्सक दंपति का नाम और धर्म तो नहीं जान पाया किन्तु शत प्रतिशत यकीन है कि वे फ्लोरेंस नाइटिंगल की भांति ईसाई ही होंगे। क्योंकि दुनिया में यह एक मात्र ईसाई धर्म है, जिसके अनुयायियों को मानव सेवा में ही जीवन की सार्थकता का अहसास होता है और मानव सेवा में ही वे मरणोपरांत परम सुख का संधान करते हैं। इसीलिए वे गरीब, असहाय, अनाथ तथा एड्स, कैंसर, कुष्ठ रोग इत्यादि असाध्य रोगों से जूझते लोगों की सेवा में हद से गुजर जाते हैं।

एच.एल. दुसाध (लेखक बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं.)  
एच.एल. दुसाध (लेखक बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं.)

मानव सेवा में ही जीवन की सार्थकता का एहसास एंजॉय करने के लिए संभ्रांत परिवार की कन्या होकर भी फ्लोरेन्स नाइटिंगल ने सेवा का क्षेत्र चुना और रोगियों की सेवा के क्षेत्र में स्वर्णिम अध्याय रचा।

मानव सेवा में हद से गुजरना क्या होता है, इसका साक्षात हमने बीसवीं सदी के शेष दिनों में भारत में ‘भारत रत्न’ से सम्मानित मदर टेरसा तथा कुष्ठ रोगियों के मसीहा के रूप मे उभरे ग्राहम स्टेंस में किया।

मानव सेवा की उत्कट चाह मेसीडोनिया की राजधानी स्कोपजे में जन्मी एग्नेस गोंझा बोयाजीजू को महज 19 वर्ष की उम्र मे भारत खींच लायी और यहां मदर टेरेसा के रूप में उन्होंने गरीब, दुखियों, अनाथों और एड्स, कुष्ठ और तपेदिक रोगियों की सेवा में इस हद तक समर्पित किया कि भारत के खाते में एक नोबल प्राइज़ दर्ज हो गया।

मानव सेवा की यही चाह आस्ट्रेलिया के ग्राहम स्टेंस को कुष्ठ रोगियों की सेवा के लिए ओड़ीशा के दुर्गम इलाके मयूरभंज खींच लायी थी, जिन्हें परवर्तीकाल में उनके दो बच्चों के साथ कार में जलाकर अमानवीय हिंदुओं के गिरोह ने मानवता को शर्मसार कर दिया था।

बहरहाल फ्लोरेन्स नाइटिंगेल से लगाए मदर टेरेसा, ग्राहम स्टेंस इत्यादि सहित ईसा के समस्त अनुयायियों के चरित्र मानव सेवा के लिए अपार कष्ट सहन करने का जो गुण रहा, उसके आधार पर ही दावे के साथ कहा जा सकता है कि कोरोना संक्रमित सवा सौ से अधिक लोगों की जिंदगियाँ बचाने के क्रम मृत्यु की मुख में पहुंचा इटालियन चिकित्सक दंपति अवश्य ही ईसाई ही रहा होगा।

एच. एल . दुसाध

लेखक बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।

क्रमशः

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पलाश विश्वास जन्म 18 मई 1958 एम ए अंग्रेजी साहित्य, डीएसबी कालेज नैनीताल, कुमाऊं विश्वविद्यालय दैनिक आवाज, प्रभात खबर, अमर उजाला, जागरण के बाद जनसत्ता में 1991 से 2016 तक सम्पादकीय में सेवारत रहने के उपरांत रिटायर होकर उत्तराखण्ड के उधमसिंह नगर में अपने गांव में बस गए और फिलहाल मासिक साहित्यिक पत्रिका प्रेरणा अंशु के कार्यकारी संपादक। उपन्यास अमेरिका से सावधान कहानी संग्रह- अंडे सेंते लोग, ईश्वर की गलती। सम्पादन- अनसुनी आवाज - मास्टर प्रताप सिंह चाहे तो परिचय में यह भी जोड़ सकते हैं- फीचर फिल्मों वसीयत और इमेजिनरी लाइन के लिए संवाद लेखन मणिपुर डायरी और लालगढ़ डायरी हिन्दी के अलावा अंग्रेजी औऱ बंगला में भी नियमित लेखन अंग्रेजी में विश्वभर के अखबारों में लेख प्रकाशित। 2003 से तीनों भाषाओं में ब्लॉग

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