कोरोना एक, मगर कारण अनेक हैं

Corona virus COVID19, Corona virus COVID19 image

Corona is one, but the reasons are many

घर हो, चाहे देश, अपनी आर्थिक और सामाजिक स्थिति, सांस्कृतिक परंपराओं, भौतिक और मानव संसाधनों की क्षमताओं और आमजन में स्वास्थ्य व स्वच्छता को लेकर प्रचलित व्यवहार का आकलन कर निर्णय लेना ही दूरदर्शी सोच का परिचायक है। इस वक्त पूरी दुनिया में कोरोना (कोविड-19) वायरस के कहर को ध्यान रखते हुए हमारी सरकारों द्वारा समस्त परिस्थितियों के मददेनजर लॉक डाउन, सोशल डिस्टेंसिंग, जनता कर्फ्यू (Lock down, social distancing, Janata curfew,) जैसे नामों से लिए गए फैसले का पालन करना ही समझदारी है।

24 मार्च को देश को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने देश की जनता से अपील करते हुए जो बातें कहीं, उनमें महत्वपूर्ण यह है कि दुनिया के सक्षम देश इस बीमारी को रोकने में बेबस हैं।

बात सही भी है। जो देश इस वायरस के संक्रमण की रोकथाम (Virus infection prevention) के लिए जूझ रहे हैं, उनमें से अधिकांश सक्षम, धनी और विकसित देशों की श्रेणी में आते हैं। यह देश मानव विकास सूचकांक, ग्लोबल हंगर इंडेक्स, ग्लोबल जेंडर गैप इंडेक्स और स्वास्थ्य मानकों में हमसे काफी आगे है। वहां लोगों का जीवन स्तर हम से कई गुणा बेहतर है। इसके बावजूद कोरोना वायरस के आगे बेबसी हमारे जैसे विकासशील देशों के लिए बड़ी सीख हो सकती है।

नागरिकों से ही देश बनता है। हमें स्वयं भी अपनी आदतों, व्यवहार और क्षमताओं का आंकलन करनी चाहिए। हमारे देश में स्वस्थ रहने की परंपरा कम और बीमार होने के बाद उपचार लेने में अधिक है। खुले में शौच जाने की प्रवृति को रोकने के लिए सरकारी अभियान के बावजूद आशातीत सफलता नहीं मिली है।

शौचालय का उपयोग नागरिकों के व्यवहार से जुड़ा हुआ है। इसी के कारण उल्टी, दस्त और अन्य बीमारियां हमें जकड़े हुए रहती है और मौत का भी कारण बनती हैं। खाने की चीजों को छूने से पहले और शौच जाने के बाद साबुन या राख से हाथ धोने का साधारण सा व्यवहार हमारे जीवन का हिस्सा नहीं बन पाया है। यही कारण है कि कोरोना से बचाव के लिए साबुन से हाथ धोने की हिदायत देनी पड़ रही है।

बहुत से सामाजिक रीतिरिवाज, गलत परंपराएं और आदतें स्वास्थ्य के खतरों को बढ़ा देती हैं। हालांकि राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन, जननी शिशु सुरक्षा कार्यक्रम के तहत संस्थागत प्रसव, स्वास्थ्य बीमा, राजस्थान जैसे प्रदेश में निःशुल्क दवा व जांच जैसे कार्यक्रमों के चलते स्वास्थ्य के क्षेत्र में काफी बदलाव आया है, लेकिन आज भी गलत धारणाओं, परंपराओं और धार्मिक मान्यताओं के चलते बाल विवाह, घर पर प्रसव कराने की परपंरा, बालिकाओं के साथ भेदभाव, महावारी के दौरान असुरक्षित व्यवहार, प्रजनन रोगों से ग्रसितता, महिलाओं व लड़कियों तथा बच्चों में कुपोषण, झोलाछाप डॉक्टरों से उपचार और स्वस्थ रहने की सामान्य सी आदतों के अभाव, ऐसे कारण हैं जो हमें बीमारी की तरफ धकेलते हैं।

वैश्विक जल गुणवत्ता सूचकांक में 122 देशों में हम 120 वें स्थान पर है।

नीति आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक देश में करीब 60 करोड़ लोग पानी की गंभीर किल्लत का सामना कर रहे हैं। करीब दो लाख लोग अशुद्ध जल उपयोग से जनित रोगों के कारण जान गंवा देते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में 70 प्रतिशत आबादी अशुद्ध जल का उपयोग करती है। अधिकांश रोग जल की अशुद्धि के कारण होते हैं और आने वाले समय में यह संकट और भी बढ़ने वाला है।

ग्लोबर हंगर इंडेक्स (वैश्विक भूख सूचकांक) में हम 117 देशों में 102 वें पायदान पर हैं जो इस बात का सूचक है कि देश के नागरिकों को स्वस्थ रहने के लिए जितनी कैलोरी का भोजन जरूरी है, उतना नहीं मिलता। जिससे उनमें रोगों से लड़ने की आंतरिक ताकत कमजोर हो जाती है और वह सामान्य स्वस्थ्य व्यक्ति के मुकाबले संक्रमण की जकड़ में जल्दी आते हैं।

सरकार ने खाद्य सुरक्षा कानून बनाया है तथा कई कार्यक्रम भी चलते आ रहे हैं। कार्यक्रमों के क्रियान्वयन और निगरानी में नागरिक भागीदारी के बावजूद कार्यक्रमों का लाभ योग्य लोगों तक नहीं पहुंच पाता। सेवाएं देने वाले हमारे स्थानीय लोग हैं, निगरानी के लिए समुदाय के अतिरिक्त ग्राम पंचायत है। जबकि भूख से निपटने का मामला जितना सरकार से जुड़ा है, उतना ही हमारी सामाजिक व्यवस्था से भी जुड़ा हुआ है।

वर्ल्ड जैंडर गैप इंडेक्स (लिंग आधारित भेदभाव) में हम 112 वें स्थान पर हैं। महिलाओं की (आधी आबादी) सामाजिक, आर्थिक, राजनितिक, पिता की संपत्ति में हक, इसी से जुड़ी स्वास्थ्य और पोषण में गैर बराबरी की स्थिति को दिखाता है।

महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव की स्थिति हमें स्वास्थ्य और पोषण के क्षेत्र में आगे नहीं बढ़ने देती है। सामाजिक मान्यताओं के चलते सरकार के लाख प्रयासों के बावजूद हम उनको कुपोषण के चक्र से बाहर नहीं निकाल पाएं हैं। कम उम्र में शादी, कम उम्र में मां बनने, एक संतान से दूसरी संतान में कम अंतराल, माहावरी के दौरान सुरक्षा और पर्याप्त पोषण की कमी का असर भावी पीढ़ी पर साफ दिखता है।

मातृ, शिशु और बाल मृत्यु दर को पूरी तरह से समाप्त नहीं कर पाए हैं। संतान और उसमें प्राथमिकता से लड़के की कामना तो करते हैं, पर कभी सोचा भी नहीं कि संतान पैदा करने वाली मां को गर्भावस्था में कितना भोजन और कितना आराम चाहिए। वह संतानोत्पति के लिए शारीरिक और मानसिक रूप से मैच्योर है भी या नहीं।

ग्लोबल हैल्थ इंडेक्स रिपोर्ट (स्वास्थ्य सेवाओं की नागरिकों तक पहुंच और गुणवत्ता) में हमारा स्थान 159 देशों में 120 वां है। विश्व स्वास्थ्य सुरक्षा सूचकांक (नागरिकों के स्वास्थ्य की सुरक्षा के क्षेत्र में) 195 देशों में हमारा स्थान 57 वां है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानकों के अनुसार प्रति एक हजार नागरिकों पर 1 डाक्टर होना चाहिए। जबकि भारत में प्रति दस हजार नागरिकों पर एक डाक्टर है।

भारत अपनी कुल जीडीपी का मात्र 1.5 फीसदी स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता पर खर्च करता है जबकि वैश्विक स्तर 6.1 है। हमारी नई स्वास्थ्य नीति 2017 के अनुसार भारत 2025 तक कुल जीडीपी का 2.5 प्रतिशत खर्च का लक्ष्य रखा गया है जो वैश्विक स्तर से काफी कम है। इन सभी कारणों को जोड़कर बनता है मानव विकास सूचकांक, जिसमें हमारी स्थिति सांप सीढ़ी के खेल की तरह उतार-चढ़ाव लेती रहती है।

वर्ष 2019 में मानव विकास सूचकांक में हमारे हमारा 129 वां स्थान है। जो विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश के लिए चिंता की बात है। यही हमारी वह परिस्थितियां हैं, जिसको ध्यान में रखते हुए केंद्र व राज्य सरकारों ने कोरोना जैसे संकट से बचाव के लिए लॉक डाउन जैसा फैसला लिया है। बचाव के अतिरिक्त हमारे पास कोई रास्ता नहीं है। जिन देशों में कोरोना ने कहर ढाया है, वैसी परिस्थिति हमारे देश में बनी, तो स्वास्थ्य के प्रति हमारी आदतों और व्यवहार के कारण स्थितियां गंभीर हो सकती हैं।

दिलीप बीदावत

राजस्थान

(चरखा फीचर्स)

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