/hastakshep-prod/media/post_banners/WXEXFD0vGJQf5FW7iHpM.jpg)
Covid 19 and claims to increase immunity: misconceptions of government and media
हमारे देश में कोविड 19 के फ़ैलाने की रफ़्तार भले ही अपेक्षाकृत धीमी हो, पर इसकी आड़ में समाज का हिन्दू-मुसलमान विभाजन (Hindu-Muslim division of society) और रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के दावे (Claims to increase immunity) और कोविड 19 के दावे फैलाने की रफ़्तार बहुत तेज है. सरकारी स्तर पर तो कोविड 19 से जुड़ी वैज्ञानिक जानकारियाँ आ ही नहीं रहीं हैं, पर इससे सम्बंधित नीमी-हकीमी दावे लगातार किये जा रहे हैं.
The AYUSH ministry of the Government of India is working day and night to spread misleading news these days.
भारत सरकार का आयुष मंत्रालय तो इन दिनों ऐसी ही भ्रामक खबरें फैलाने का काम दिन-रात कर रहा है. प्रधानमंत्री जी भी देशवासियों को संबोधित करते हुए काढ़ा पीने और गर्म पानी पीने की सलाह देते हैं. मेनस्ट्रीम मीडिया भी ऐसी ही भ्रामक दावों का प्रचार कर रहा है.
इसी बीच में दुनिया के महान व्यापारी रामदेव भी सरसों के तेल को नाक में डाल कर कोविड 19 को दूर करने का दावा कर रहे हैं. गौमूत्र और गोबर का उपयोग तो सभी देश चुके हैं, जब इसकी चर्चा शुरू हुई थी तब देश में कोरोना के एक हजार मरीज भी नहीं थे पर अब गौमूत्र और गोबर का सेवन करते-करते लगभग 45 हजार रोगी हो गए हैं.
Does COVID-19 transmit through houseflies
अब लगभग 100 वैज्ञानिकों, पत्रकारों और बुद्धिजीवियों ने कोविड 19 के वैकल्पिक उपचार से सम्बंधित दावों की वैज्ञानिक व्याख्या से सम्बंधित एक बयान जारी किया है. इसके अनुसार,
“कोविड 19 के आरम्भ से ही देश में हरेक स्तर पर रोग प्रतिरोधक क्षमता बढाने और इसके उपचार के भी अनेक भ्रामक प्रचार किये जा रहे हैं. इन उपायों में सरसों का तेल, हाइड्रोक्सीक्लोरोक्विन, चाय, काढ़ा, गौ-मूत्र और यहाँ तक कि ताबीज भी प्रमुख हैं. इन्हें वैकल्पिक दवा के तौर पर बताया जा रहा है. इस तरह की कुछ मान्यताएं राज्य सरकारों या केंद्र सरकार की तरफ से भी व्यापक तौर पर प्रचारित की जा रहीं हैं. हम, वैज्ञानिक समुदाय, इस बयान के माध्यम से इन दावों की वैज्ञानिक व्याख्या जनता के समक्ष प्रस्तुत कर रहे हैं”.
“अब तक कोई भी वैज्ञानिक अध्ययन यह साबित करने में नाकाम रहा है कि हाइड्रोक्सीक्लोरोक्विन जैसी आधुनिक औषधि या फिर अर्सेनिकम अल्बम डी30 जैसी होमियोपैथिक औषधि या फिर कोई भी आयुर्वेदिक दवा कोविड 19 के विरुद्ध शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाती है. इन सबका यह प्रभाव बड़े पैमाने पर कोविड 19 के मरीजों पर गहन परीक्षण के बाद ही पता चल सकता है, और ये परीक्षण किये नहीं गए हैं. संभव है कुछ स्थितियों में इनसे आराम हो, या फिर कुछ अन्य रोगों में इनसे लाभ हो रहा हो, इसका मतलब यह नहीं है कि ये सभी कोविड 19 के विरुद्ध भी प्रभावी होंगीं.”
Air Pollution may further impact coronavirus patients – Doctors
“किसी भी बैक्टीरिया या वायरस के विरुद्ध शरीर में प्रतिरोधक क्षमता केवल दो स्थितियों में उत्पन्न हो सकती है – या तो इसने शरीर पर आक्रमण किया हो और फिर हम इससे ठीक हो गए हों, या फिर हमने इसका टीका लगवाया हो. दोनों ही स्थितियों में शरीर में एंटीबाडीज उत्पन्न होते हैं, जो उस रोग से मुकाबला करते हैं. बोलचाल की भाषा में लोग अच्छे स्वास्थ्य का मतलब रोगप्रतिरोधक क्षमता समझ लेते हैं, पर ऐसा नहीं होता. व्यायाम या फिर बेहतर दिनचर्या से आप स्वास्थ्य हो सकते हैं, और कुछ हद तक सामान्य रोग प्रतिरोधक क्षमता बाधा सकते हैं, पर इसका कोविड 19 की प्रतिरोधक क्षमता से कोई नाता नहीं है. दूसरी तरफ कोविड 19 के सन्दर्भ में अति गंभीर मामलों में बेहतर सामान्य रोग प्रतिरोधक क्षमता कोविड 19 से निपटने की प्रक्रिया को और जटिल बना देती है. इसलिए कोविड 19 के मामले में सामान्य रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाना या फिर जिन तरीकों का परीक्षण नहीं किया गया है उन्हें अपनाना, दोनों ही खतरनाक हैं”.
गौ मूत्र से फायदे का कोई भी वैज्ञानिक आधार नहीं | There is no scientific basis of benefit from cow urine
“गौ मूत्र से फायदे, पराबैंगनी किरणों वाले बल्ब के नीचे खड़ा होना, या फिर कीटाणुनाशक का सेवन करना – ऐसे दावों का कोई भी वैज्ञानिक आधार नहीं है, दावों के विपरीत ये सभी तरीके स्वास्थ्य शरीर को भी नुकसान पहुंचाते हैं. इसी तरीके से अन्य उपाय जैसे लहसुन से शरीर को कम से कम नुक्सान नहीं पहुंचेगा, पर धतूरे के बीज या फिर जिंक का अधिक मात्र में सेवन बहुत हानिकारक असर डाल सकता है. ऐसे भ्रामक प्रचार से लोगों को यह महसूस हो सकता है कि इन सबके सेवन के बाद उनपर कोविड 19 का अब कोई असर नहीं हो सकता है और फिर वे सामान्य निर्देशों, जैसे शारीरिक दूरी, लॉकडाउन, चेहरे पर मास्क लगाना इत्यादि के पालन में लापरवाह हो सकते हैं. यह लापरवाही कोविड 19 के संकट को और विकराल बना सकती है”.
Indian Scientists' Response to CoViD-19 (ISRC) | कोरोना वायरस पर अफवाहों का वैज्ञानिक समाधान
इससे पहले 400 से भी अधिक वैज्ञानिकों ने “इंडियन साइंटिस्ट्स रेस्पोंस टू कोविड 19” यानि आईएसआरसी नामक समूह तैयार किया है. यह समूह विभिन्न माध्यमों से कोविड 19, यानि कोरोना वायरस को लेकर जनता के बीच फ़ैली, या फैलाई जा रही भ्रांतियों के निवारण का प्रयास कर रहा है. प्रायः वैज्ञानिकों के समुदाय की भाषा अंग्रेजी रहती है, पर इस समुदाय ने देश की बड़ी आबादी तक पहुँचने के लिए अंग्रेजी के साथ 14 अन्य भारतीय भाषाओं में भी अपनी सामग्री उपलब्ध कराई है. इस समुदाय ने अभी तक लगभग 19 पोस्टरों के माध्यम से चुनिन्दा अफवाहों या झूठी खबरों का तार्किक और वैज्ञानिक पक्ष उजागर किया है.
हरेक पोस्टर को तीन खण्डों – दावा, निर्णय और क्यों खण्डों में विभाजित किया गया है. उदाहरण के लिए, एक पोस्टर में दावा है, ज्योतिषियों ने कोविड 19 बीमारी को समझने में मदद के लिए महत्वपूर्ण जानकारियाँ दी हैं. आईएसआरसी का निर्णय है – असत्य/झूठ और फिर “क्यों” में बताया गया है कि “खगोलीय मंडलों की गति और स्थान से मानव जीवन और विषाणुओं पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है. इस कारण ज्योतिषीय भविष्यवाणियाँ भी उपयोगी नहीं हैं. कोरोना विषाणु के बारे में हमारी सभी जानकारी वैज्ञानिक अनुसंधान से प्राप्त की गई है.”
Daily life and Covid-19
जाहिर है, हमारे देश के वैज्ञानिक भ्रामक खबरों से जनता को आगाह करने में और वैज्ञानिक तथ्य के प्रसार में अपनी सामाजिक भूमिका निभा रहे हैं, पर बड़ा सवाल तो यह है कि जिस देश में सरकार ही भ्रम और अफवाह फैला रही हो वहां इन वैज्ञानिकों की आवाज कितने लोगों तक पहुंचेगी?
महेंद्र पाण्डेय
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)