कोविड -19 और नैदानिक चिकित्सा का अंत, जैसा कि हम जानते हैं : ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में प्रोफेसर का लेख

COVID-19 news & analysis

सरकारें लगातार विरोधाभासी और भ्रामक नीतियों का निर्माण कर रहीं हैं

प्रसिद्ध चिकित्सा विज्ञानी प्रोफेसर कार्ल हेनेगन और टॉम जेफरसन (Renowned medical scientists Professor Carl Heneghan and Tom Jefferson) ने इस टिप्पणी में चिकित्सा शास्त्र के उन बुनियादी सरोकारों (Those basic concerns of medical science) को उठाया है, जिनके तहत मरीज से संवेदनशील और पारदर्शी व्यवहार अच्छे उपचार के लिए आवश्यक माना गया है। कोविड के इस दौर में उन सरोकारों को भुला दिया गया है तथा अनेक ऐसे अवैज्ञानिक समाधान पेश किए गए हैं, जिनकी सफलता के बारे में कोई साक्ष्य उपलब्ध नहीं है। इन्हीं में से एक है – फेस मास्क।  इस टिप्पणी का अनुवाद चिकित्सक  एवं साहित्यिक पत्रिका किरण वार्ता के संपादक शैलेंद्र राकेश ने किया है।

कोविड-19, नैदानिक चिकित्सा और अहम् तुष्टि की होड़

कार्ल हेनेगन और टॉम जेफरसन 

मेडिकल शिक्षा के दौरान हमें पढ़ाया गया था कि प्रत्येक मरीज की उसकी रोग-विशिष्टता के आधार पर पहचान होनी चाहिए। हमें उसके रोग का इतिहास जानना चाहिए : पूर्व में हुई उसकी बीमारियों, ली गईं दवाओं, और अभी की तकलीफों के बारे में पूछना चाहिए तथा उसके शारीरिक परीक्षण के बाद, आवश्यक जांच आदि करा कर उसके संभावित रोग की पहचान करनी चाहिए। उपचार उसका अगला विकल्प है। यही सब सीखने के बाद हमें डॉक्टर की उपाधि से सम्मानित किया गया – पेशेवर रूप से प्रशिक्षित, लाइसेंस प्राप्त और वर्णित प्रक्रियाओं को पूरा करने के अधिकार से सम्पन्न।

इस प्रक्रिया का एक लंबा इतिहास है, जिसे नैदानिक-चिकित्सा (clinical medicine) कहा जाता है। किन्तु यह विचारणीय है कि उपचार करने के इस आजमाए और परखे हुये तरीके पर कोरोना-19 ने क्या प्रभाव डाला है?

पिछले तीस वर्षों में, नैदानिक चिकित्सा के क्षेत्र में दो महत्वपूर्ण विकास हुए हैं। पहले तरीके में, मरीजों के प्रति चिकित्सकों के व्यवहार में मरीजों की प्रधानता को महत्व दिया गया। जिससे कि चिकित्सक, रोगी और चिकित्सा प्रणाली के बीच महज एक सौम्य एजेंट की भूमिका में का निर्वाह करे तथा मरीज की जटिल परिस्थितियों को समझकर बेहतरीन सलाह दे। दूसरा तरीका प्रामाणिक दवाओं (evidence based medicines,ईबीएम ) का आगमन से संबंधित है, जिसमें किए जा रहे उपचार की वैज्ञानिक प्रामाणिकता महत्वपूर्ण है। इसमें भी यह शामिल है कि किसी तरह के संदेह की स्थिति में मरीज को पूर्व में ही इसके बारे में सूचित किया जाए। 

मरीज-केन्द्रीयता तथा ईबीएम को बड़ी तेजी से नैदानिक चिकित्सा में शामिल किया गया। अतएव अच्छी चिकित्सा अथवा अच्छे चिकित्सक का मतलब हुआ मरीज के साथ स्पष्ट संवाद तथा विश्वास बनाकर उनका उपचार करना। उनके साथ प्रभावी ढंग से बातचीत करना और यह सुनिश्चित करना कि उनकी सभी चिंताओं को सुना जाता है। इस प्रक्रिया में सर्वोपरि यह सुनिश्चित करना है कि रोगियों की देखभाल ही हमारी पहली चिंता है। किन्तु कोविड-19 के इस महामारी के काल में नैदानिक चिकित्सा, मरीज केन्द्रीयता तथा ईबीएम का ह्रास हो चुका है। 

आज अस्पतालों में चिकित्सकीय परामर्श प्राप्त करना कठिन हो गया है।

संक्रामक रोग नियंत्रण की बुनियादी आवश्यकताओं की अनदेखी (Ignoring the basic requirements of ‘infectious disease control’) ने अस्पतालों को ‘संक्रमण केंद्रों’ में बदल दिया है। मरीज भयभीत हैं और अस्पतालों के ओपीडी तक में जाने से डरते हैं, भर्ती होना तो दूर की बात है।

पूर्वानुमान लगानेवाले गणितीय मॉडलों तथा तरह-तरह के उचित-अनुचित परीक्षणों ने, जिससे यह भी ठीक से पता नहीं चल सका कि कौन संक्रमित है, जिसे क्वारेंटाइन करने की ज़रूरत है और कौन संक्रमण वाहक है और छुट्टा घूम रहा है, आमलोगों में घबराहट पैदा कर दी है। आज रोगी उस प्रणाली का कैदी बन गया है जो उसे ‘पॉज़िटिव’ लेबल करता है जबकि हमें ठीक-ठीक पता भी नहीं कि उस लेबल का क्या मतलब है? चिकित्सकों के निर्णय लेने की प्रक्रिया को दरकिनार कर एक ‘बायोटेक’ मशीन की जांच और रिपोर्ट के आधार पर रोग सुनिश्चित किया जा रहा है।  

Governments are constantly creating contradictory and misleading policies.

और इन सबके बीच ईबीएम का क्या?

अभी कोरोना संबंधी अध्ययनों की बाढ़ सी आ गई है, जबकि इससे कोरोना को समझने में हमारी प्रगति न के बराबर है। अधिकांश शोधकर्ताओं के प्रयास इस महामारी के साथ अपना नाम जोड़कर ‘अहम-तुष्टि’ से अधिक कुछ नहीं है। इसका एक सुंदर उदाहरण है – ‘मास्क’ के उपयोग पर पिछले तीन महीनों में कम से कम 15 रिव्यू प्रकाशित हुए हैं किन्तु अभी तक कोविड-19 के प्रसार में मास्क के प्रभाव के किसी ‘परीक्षण’ की कोई रिपोर्ट नहीं आई है – एक भी नहीं ! सरकारें लगातार विरोधाभासी और भ्रामक नीतियों का निर्माण कर रही हैं जो आनेवाले संकट में कतई कारगर नहीं हो सकती।  

एक अच्छे चिकित्सक का कर्तव्य (The duties of a good doctor) है कि वह रोगियों को विश्वास में लेकर काम करे, ताकि वे अपने रोग के बारे में समझ सकें कि और यह भी कि उन्हें क्या चाहिए। अपने उपचार और देखभाल के बारे में निर्णय लेने के उनके अधिकारों का सम्मान होना चाहिए। लेकिन यह सब कैसे होगा यदि आप अपने डॉक्टर को देख भी  नहीं सकते हैं, खासकर जब आपको अपना जवाब पाने के लिए कतार में लगना पड़ता है। और अंततः एक ‘अच्छा परीक्षण’ क्या है? अच्छा परीक्षण वह जो चिकित्सक को मरीज की समस्या की उत्पत्ति और उपचार के आसपास की अनिश्चितता को कम करने में मदद करे। 

क्या इस कोविड काल में ऐसा हो पा रहा है?

(लंदन से प्रकाशित स्पेक्टेटर पत्रिका के 7 सितंबर, 2020 अंक में “Covid-19 and the end of clinical medicine as we know it” शीर्षक से प्रकाशित। शैलेंद्र राकेश द्वारा संपादित प्रकाश्य पुस्तक ‘कोरोना काल’ में संकलित)

(कार्ल हेनेगन ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में साक्ष्य-आधारित दवा के प्रोफेसर हैं और सेंटर फॉर एविडेंस-बेस्ड मेडिसिन के निदेशक हैं। टॉम जेफरसन सेंटर फॉर एविडेंस-बेस्ड मेडिसिन के एक वरिष्ठ सहयोगी ट्यूटर और मानद अनुसंधान सदस्य हैं।) 

Note – Prof Carl Heneghan & Tom Jefferson

Carl Heneghan is professor of evidence-based medicine at the University of Oxford and director of the Centre for Evidence-Based Medicine Tom Jefferson is a senior associate tutor and honorary research fellow at the Centre for Evidence-Based Medicine, University of Oxford

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